बायोम (Biome):
बायोम पृथ्वी पर पौधों और जानवरों का एक बहुत बड़ा समुदाय है, जो एक विशेष प्रकार की जलवायु, वनस्पति और मृदा के साथ एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैला होता है। यह एक वृहद पारिस्थितिक इकाई (Ecological Unit) है।
सीधे शब्दों में, एक बायोम एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ की जलवायु के कारण एक विशेष प्रकार के पेड़-पौधे और जीव-जंतु पाए जाते हैं।
- पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और बायोम में अंतर: एक बायोम में कई छोटे-छोटे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystems) हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, उष्णकटिबंधीय वर्षावन एक बायोम है, लेकिन उसके भीतर एक नदी, एक झील या एक विशेष पेड़ का अपना अलग पारिस्थितिकी तंत्र हो सकता है।
बायोम का निर्धारण करने वाले कारक
पृथ्वी पर किसी भी स्थान पर किस प्रकार का बायोम विकसित होगा, यह कुछ प्रमुख प्राकृतिक कारकों की परस्पर क्रिया पर निर्भर करता है। ये कारक तय करते हैं कि वहाँ किस प्रकार की वनस्पति उग सकती है, और वनस्पति ही उस बायोम में रहने वाले जीव-जंतुओं और समग्र पारिस्थितिकी तंत्र का आधार बनती है।
बायोम को निर्धारित करने वाले पाँच मुख्य कारक हैं:
1. जलवायु (Climate)
यह बायोम का निर्धारण करने वाला सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक कारक है। जलवायु के दो मुख्य घटक हैं जो सीधे तौर पर वनस्पति के प्रकार को नियंत्रित करते हैं:
- तापमान (Temperature):
- प्रभाव: तापमान पौधों की वृद्धि दर, प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया और जैविक अपघटन को प्रभावित करता है। अत्यधिक ठंडा तापमान (जैसे टुंड्रा में) पौधों की वृद्धि को सीमित कर देता है, जबकि वर्ष भर गर्म तापमान (जैसे उष्णकटिबंध में) तीव्र वृद्धि को बढ़ावा देता है।
- उदाहरण: भूमध्य रेखा के पास के गर्म क्षेत्रों में ऊँचे वर्षावन पाए जाते हैं, जबकि ध्रुवों के पास के ठंडे क्षेत्रों में केवल काई और लाइकेन ही उग पाते हैं।
- वर्षण (Precipitation):
- प्रभाव: वर्षण (वर्षा, बर्फ आदि) की मात्रा यह निर्धारित करती है कि किसी क्षेत्र में कितना पानी उपलब्ध है। यह तय करता है कि क्षेत्र में जंगल होंगे, घास के मैदान होंगे, या रेगिस्तान बनेगा।
- उदाहरण: अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में घने जंगल (जैसे अमेज़ॅन) होते हैं। मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में घास के मैदान (जैसे प्रेयरी) विकसित होते हैं। और बहुत कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मरुस्थल (जैसे सहारा) बनते हैं।
2. अक्षांश (Latitude)
- अवधारणा: भूमध्य रेखा से किसी स्थान की दूरी को अक्षांश कहते हैं।
- प्रभाव: जैसे-जैसे हम भूमध्य रेखा (0° अक्षांश) से ध्रुवों (90° अक्षांश) की ओर बढ़ते हैं, सूर्य की किरणें अधिक तिरछी होती जाती हैं।
- परिणाम: इससे प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा कम हो जाती है और औसत तापमान गिरता जाता है।
- उदाहरण: अक्षांश में वृद्धि के साथ बायोम का एक निश्चित क्रम देखा जा सकता है:
भूमध्य रेखा (कम अक्षांश) → उष्णकटिबंधीय वर्षावन → सवाना → मरुस्थल → शीतोष्ण वन/घास के मैदान → टैगा (शंकुधारी वन) → टुंड्रा (उच्च अक्षांश) → ध्रुवीय बर्फ।
3. ऊँचाई / तुंगता (Altitude/Elevation)
- अवधारणा: समुद्र तल से किसी स्थान की ऊँचाई।
- प्रभाव: जैसे-जैसे हम ऊँचाई पर चढ़ते हैं, वायुदाब कम होता है और तापमान गिरता जाता है (प्रति 165 मीटर पर लगभग 1°C की गिरावट)।
- परिणाम: ऊँचाई में वृद्धि का प्रभाव अक्षांश में वृद्धि के समान होता है।
- उदाहरण: एक ऊँचे उष्णकटिबंधीय पर्वत (जैसे एंडीज या हिमालय) पर चढ़ते हुए, हमें विभिन्न बायोम की परतें देखने को मिलती हैं जो अक्षांश के साथ मिलने वाले बायोम के समान होती हैं:
पर्वत का आधार (कम ऊँचाई) → उष्णकटिबंधीय वन → शीतोष्ण पर्णपाती वन → शंकुधारी वन (टैगा) → अल्पाइन टुंड्रा → स्थायी बर्फ (उच्च ऊँचाई)।
4. मृदा का प्रकार (Soil Type)
- अवधारणा: मिट्टी की संरचना, pH और पोषक तत्वों की उपलब्धता।
- प्रभाव: मृदा यह निर्धारित करती है कि कोई विशेष प्रकार का पौधा वहाँ उग सकता है या नहीं, भले ही जलवायु अनुकूल हो।
- उदाहरण: शंकुधारी वन (टैगा) की अम्लीय और पोषक तत्वों से रहित पॉडज़ोल मिट्टी (Podzol soil) चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों के लिए अनुपयुक्त होती है। इसी तरह, मरुस्थल की लवणीय मिट्टी अधिकांश पौधों को उगने नहीं देती।
5. स्थलाकृति (Topography)
- अवधारणा: भू-भाग का भौतिक स्वरूप, जैसे ढलान, दिशा (Aspect) और पर्वत श्रृंखलाओं की उपस्थिति।
- प्रभाव:
- ढलान की दिशा (Aspect): उत्तरी गोलार्ध में, दक्षिण-मुखी ढलानों को अधिक सीधी धूप मिलती है, जिससे वे गर्म और शुष्क होती हैं। उत्तर-मुखी ढलानें ठंडी और नम होती हैं, जिससे दोनों पर अलग-अलग प्रकार की वनस्पतियाँ उग सकती हैं।
- वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Effect): जब नम हवाएँ एक पर्वत श्रृंखला से टकराती हैं, तो वे ऊपर उठकर ठंडी होती हैं और अपनी सारी नमी पहाड़ के एक तरफ (पवनमुखी ढलान) बरसा देती हैं। पहाड़ के दूसरी तरफ (पवनविमुख ढलान) उतरती हुई हवा शुष्क हो जाती है, जिससे वहाँ वर्षा नहीं होती और मरुस्थल या शुष्क घास का मैदान बन जाता है (जैसे हिमालय के पीछे तिब्बती पठार का शुष्क होना)।
निष्कर्ष: यद्यपि जलवायु बायोम के प्रकार का प्राथमिक नियंत्रक है, लेकिन अक्षांश, ऊँचाई, मृदा और स्थलाकृति जैसे कारक क्षेत्रीय स्तर पर जलवायु को संशोधित करते हैं और किसी भी स्थान पर पाए जाने वाले विशिष्ट बायोम को अंतिम रूप देते हैं।
बायोम के प्रमुख प्रकार (Types of Biomes)
बायोम को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है: स्थलीय (Terrestrial) और जलीय (Aquatic)।
A. स्थलीय बायोम (Terrestrial Biomes)
1. वन बायोम (Forest Biomes)
| वन का प्रकार | जलवायु | प्रमुख वनस्पति | प्रमुख जीव-जंतु | क्षेत्र/उदाहरण | परीक्षा हेतु विशेष तथ्य |
| उष्णकटिबंधीय वर्षावन (Tropical Rainforest) | वर्ष भर गर्म और अत्यधिक वर्षा। | ऊँचे, चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार पेड़, घना कैनोपी (canopy)। | बंदर, सांप, चमगादड़, विभिन्न प्रकार के कीड़े-मकौड़े। | अमेज़ॅन बेसिन (द. अमेरिका), कांगो बेसिन (अफ्रीका)। | सर्वाधिक जैव-विविधता (Highest Biodiversity)। इसे “पृथ्वी का फेफड़ा” (Lungs of the Planet) भी कहा जाता है। |
| शीतोष्ण पर्णपाती वन (Temperate Deciduous Forest) | स्पष्ट चार ऋतुएँ, मध्यम वर्षा। | चौड़ी पत्ती वाले पतझड़ी पेड़ (ओक, मेपल) जो सर्दियों में पत्तियाँ गिरा देते हैं। | हिरण, भालू, गिलहरी, लोमड़ी। | पूर्वी USA, पश्चिमी यूरोप, पूर्वी चीन। | शरद ऋतु में पत्तियों का रंग बदलना इसकी विशेषता है। |
| शंकुधारी वन / टैगा (Coniferous Forest / Taiga) | लंबी, ठंडी सर्दियाँ; छोटी, ठंडी गर्मियाँ। | नुकीली पत्ती वाले (कोणधारी) सदाबहार पेड़ (चीड़, देवदार, स्प्रूस)। | भालू, भेड़िया, मूस (बड़ा हिरण), साइबेरियन बाघ। | कनाडा, स्कैंडिनेविया, साइबेरिया (रूस)। | यह विश्व का सबसे बड़ा स्थलीय बायोम है। |
2. घास के मैदान बायोम (Grassland Biomes)
| घास के मैदान का प्रकार | जलवायु | प्रमुख वनस्पति | प्रमुख जीव-जंतु | क्षेत्र/उदाहरण | परीक्षा हेतु विशेष तथ्य |
| सवाना (Savanna) | गर्म, स्पष्ट शुष्क और आर्द्र मौसम। | लंबी-ऊँची घास और दूर-दूर तक फैले हुए पेड़। | शेर, हाथी, जिराफ, जेब्रा (बड़े शाकाहारी और मांसाहारी)। | अफ्रीका (अधिकांश), ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका। | यह विशाल चराई करने वाले जानवरों के झुंडों का समर्थन करता है। |
| शीतोष्ण घास के मैदान (Temperate Grassland) | मध्यम वर्षा, गर्म ग्रीष्मकाल, ठंडा शीतकाल। | छोटी घासें, लगभग वृक्ष रहित। | बाइसन (उत्तरी अमेरिका), जंगली घोड़े। | प्रेयरी (उत्तरी अमेरिका), स्टेपी (यूरेशिया), पंपास (द. अमेरिका), डाउन्स (ऑस्ट्रेलिया)। | इन्हें “विश्व की रोटी की टोकरी” (Breadbasket of the world) कहा जाता है क्योंकि ये अत्यधिक उपजाऊ होते हैं। |
3. मरुस्थल बायोम (Desert Biome)
- जलवायु: बहुत कम वर्षा (प्रति वर्ष 25 सेमी से कम) और अत्यधिक तापमान।
- वनस्पति: पानी जमा करने के लिए अनुकूलित पौधे जैसे कैक्टस, नागफनी (Xerophytes)।
- प्रमुख जीव-जंतु: ऊँट, सरीसृप (सांप, छिपकली), और रात में सक्रिय रहने वाले जीव।
- प्रकार:
- गर्म मरुस्थल: सहारा (अफ्रीका), थार (एशिया)।
- ठंडा मरुस्थल: गोबी (एशिया), पेटागोनिया (दक्षिण अमेरिका)।
4. टुंड्रा बायोम (Tundra Biome)
- जलवायु: अत्यधिक ठंडा, बहुत छोटी गर्मी का मौसम, स्थायी रूप से जमी हुई जमीन।
- वनस्पति: वृक्ष रहित। केवल काई (Moss), लाइकेन और छोटी झाड़ियाँ।
- प्रमुख जीव-जंतु: रेंडियर, ध्रुवीय भालू, आर्कटिक लोमड़ी।
- क्षेत्र: आर्कटिक क्षेत्र, ऊँचे पर्वतों की चोटियाँ (अल्पाइन टुंड्रा)।
- विशेष तथ्य: इसकी सबसे बड़ी विशेषता परमाफ्रॉस्ट (Permafrost) है—एक ऐसी मिट्टी जो स्थायी रूप से जमी रहती है। [UPSC, CDS के लिए बहुत महत्वपूर्ण]
B. जलीय बायोम (Aquatic Biomes)
यह पृथ्वी का सबसे बड़ा बायोम है, जो सतह के लगभग 75% हिस्से को कवर करता है।
| बायोम का प्रकार | विवरण और विशेषताएँ | उदाहरण |
| अलवणीय जल बायोम (Freshwater Biome) | इसमें लवण (Salt) की मात्रा बहुत कम होती है। यह स्थिर (झीलें, तालाब) या बहते हुए (नदियाँ, धाराएँ) हो सकते हैं। | गंगा नदी, बैकाल झील, महान झीलें। |
| लवणीय जल बायोम (Marine Biome) | यह पृथ्वी का सबसे बड़ा बायोम है। इसमें लवण की उच्च सांद्रता होती है। इसमें गहरे समुद्र, खुले महासागर और तटीय क्षेत्र शामिल हैं। | प्रशांत महासागर, हिंद महासागर। प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) इसी बायोम का हिस्सा हैं और इन्हें “समुद्र का वर्षावन” (Rainforests of the Sea) कहा जाता है क्योंकि इनकी जैव-विविधता बहुत अधिक होती है। |
1. वन बायोम (Forest Biomes): परीक्षा की दृष्टि से
वन बायोम उन क्षेत्रों को कहते हैं जहाँ वृक्षों का प्रभुत्व होता है और एक घना वितान (Canopy) बनता है। पृथ्वी के लगभग एक-तिहाई भू-भाग पर वनों का विस्तार है। इन्हें मुख्य रूप से अक्षांश और जलवायु के आधार पर तीन प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: उष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण और शंकुधारी (बोरियल)।
A. उष्णकटिबंधीय वर्षावन बायोम (Tropical Rainforest Biome)
यह पृथ्वी का सबसे जटिल, उत्पादक और जैव-विविधता से भरपूर बायोम है।
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| जलवायु | उच्च तापमान (वर्ष भर लगभग 25°C से 28°C) और अत्यधिक वर्षा (200 सेमी से अधिक वार्षिक)। कोई स्पष्ट शुष्क मौसम नहीं होता। |
| स्थान | भूमध्य रेखा के निकट (लगभग 10° N से 10° S अक्षांशों के बीच)। प्रमुख क्षेत्र: अमेज़ॅन बेसिन (दक्षिण अमेरिका), कांगो बेसिन (अफ्रीका), और दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, मलेशिया)। |
| प्रमुख वनस्पति | * चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार (Broadleaf Evergreen) वृक्ष। वृक्ष अपनी पत्तियाँ एक साथ नहीं गिराते, जिससे वन वर्ष भर हरे-भरे रहते हैं।<br/>* अत्यधिक ऊँचे वृक्ष और घना वितान (Canopy), जिसके कारण सूर्य का प्रकाश जमीन तक मुश्किल से पहुँचता है।<br/>* अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण वृक्षों में स्तरीकरण (Stratification) पाया जाता है (जैसे: Emergent Layer, Canopy Layer, Understory)।<br/>* उदाहरण: महोगनी, आबनूस (Ebony), रोज़वुड, रबर। |
| प्रमुख जीव-जंतु | यहाँ जीवन का अधिकांश हिस्सा पेड़ों पर (Arboreal) पाया जाता है। उदाहरण: बंदर, सुस्त भालू (Sloth), विभिन्न प्रकार के सर्प, उभयचर (मेढ़क), और दुनिया की सबसे अधिक कीट प्रजातियाँ। |
| मृदा | लैटेराइट मृदा (Laterite Soil)। यह गहरी लेकिन पोषक तत्वों में अत्यंत गरीब होती है क्योंकि अत्यधिक वर्षा के कारण पोषक तत्व (Nutrients) निक्षालित (leached) हो जाते हैं। |
| महत्वपूर्ण तथ्य | * इसे “पृथ्वी का फेफड़ा” (Lungs of the Planet) कहा जाता है क्योंकि यह वैश्विक ऑक्सीजन आपूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान देता है।<br/>* यहाँ विश्व की सर्वाधिक जैव-विविधता (Highest Biodiversity) पाई जाती है। दुनिया की लगभग आधी प्रजातियाँ इन्हीं वनों में रहती हैं। [UPSC, SSC – यह तथ्य बहुत बार पूछा गया है।] |
B. शीतोष्ण पर्णपाती वन बायोम (Temperate Deciduous Forest Biome)
यह बायोम स्पष्ट चार ऋतुओं के लिए जाना जाता है।
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| जलवायु | चार स्पष्ट ऋतुएँ (गर्म ग्रीष्मकाल, ठंडी सर्दियाँ), और मध्यम वार्षिक वर्षा। |
| स्थान | मध्य अक्षांशों में। प्रमुख क्षेत्र: पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, पूर्वी चीन और जापान। |
| प्रमुख वनस्पति | * चौड़ी पत्ती वाले पर्णपाती (Broadleaf Deciduous) वृक्ष, जो शरद ऋतु में अपने पत्ते गिरा देते हैं ताकि सर्दियों में पानी के नुकसान को कम कर सकें।<br/>* उदाहरण: ओक, मेपल, बीच, हिकॉरी।<br/>* इन वनों का वितान कम घना होता है, जिससे सूर्य का प्रकाश जमीन तक पहुँचता है, जिससे झाड़ियों और जड़ी-बूटियों की एक समृद्ध निचली परत विकसित होती है। |
| प्रमुख जीव-जंतु | हिरण, भूरे भालू, गिलहरी, रैकून, सैलामैंडर। कई पक्षी और जानवर सर्दियों में या तो पलायन कर जाते हैं या शीतनिद्रा (Hibernation) में चले जाते हैं। |
| मृदा | अल्फिसोल और भूरी वन मृदा। गिरी हुई पत्तियों के धीमे अपघटन के कारण मिट्टी पोषक तत्वों और ह्यूमस से भरपूर होती है, जो इसे कृषि के लिए उपजाऊ बनाती है। |
| महत्वपूर्ण तथ्य | * यह बायोम मानवीय गतिविधियों (कृषि और शहरीकरण) से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है।<br/>* शरद ऋतु में पत्तियों का रंग बदलना (Autumn foliage) इस बायोम की एक विशिष्ट और सुंदर विशेषता है। |
C. शंकुधारी वन / टैगा / बोरियल वन बायोम (Coniferous / Taiga / Boreal Forest Biome)
यह दुनिया का सबसे बड़ा स्थलीय बायोम है, जो एक विशाल पट्टी के रूप में उत्तरी गोलार्ध में फैला है।
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| जलवायु | लंबी, अत्यधिक ठंडी सर्दियाँ और छोटी, ठंडी गर्मियाँ। वर्षा मुख्य रूप से हिमपात (Snowfall) के रूप में होती है। |
| स्थान | उच्च अक्षांशों में (लगभग 50° N से 70° N), शीतोष्ण वनों के उत्तर में और टुंड्रा के दक्षिण में। प्रमुख क्षेत्र: कनाडा, स्कैंडिनेविया (नॉर्वे, स्वीडन), और रूस (साइबेरिया)। |
| प्रमुख वनस्पति | * सुई जैसी पत्तियों वाले शंकुधारी (Needle-leaf Coniferous) वृक्ष। इनकी पत्तियाँ मोमयुक्त होती हैं और आकार शंकु जैसा होता है, जो इन्हें पानी के नुकसान को कम करने और बर्फ का भार सहन करने में मदद करता है।<br/>* यह सदाबहार (Evergreen) वन होते हैं।<br/>* उदाहरण: चीड़ (Pine), देवदार (Fir), स्प्रूस, लार्च।<br/>* जमीन पर गिरी हुई सुइयों का अम्लीय ह्यूमस और कम प्रकाश के कारण यहाँ झाड़ियों की परत बहुत विरल होती है। |
| प्रमुख जीव-जंतु | भूरे भालू (Grizzly Bear), साइबेरियन बाघ, भेड़िया, मूस (Moose), लिंक्स। कई जानवरों की मोटी फर होती है और वे सर्दियों में शीतनिद्रा में चले जाते हैं। |
| मृदा | पॉडज़ोल मृदा (Podzol Soil)। यह पतली, अम्लीय और पोषक तत्वों में बहुत गरीब होती है। |
| महत्वपूर्ण तथ्य | * यह विश्व का सबसे बड़ा स्थलीय बायोम (Largest Terrestrial Biome) है। [State PSC, RRB]<br/>* यह लुगदी (Pulp) और कागज उद्योग के लिए लकड़ी का एक प्रमुख स्रोत है।<br/>* “टैगा” रूसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ “जंगल” है। |
2. घास के मैदान बायोम (Grassland Biomes): परीक्षा की दृष्टि से
घास के मैदान ऐसे बायोम हैं जहाँ घासों का प्रभुत्व होता है और पेड़ या तो बहुत कम होते हैं या पूरी तरह से अनुपस्थित होते हैं। यह स्थिति उन क्षेत्रों में बनती है जहाँ वर्षा वनों के विकास के लिए अपर्याप्त होती है, लेकिन इतनी भी कम नहीं होती कि रेगिस्तान बन जाए। ये बायोम दुनिया के कुछ सबसे महत्वपूर्ण कृषि और पशुचारण क्षेत्रों का निर्माण करते हैं।
इन्हें मुख्य रूप से दो प्रमुख प्रकारों में विभाजित किया जाता है: सवाना (उष्णकटिबंधीय) और शीतोष्ण घास के मैदान।
A. सवाना बायोम (Savanna Biome)
इसे उष्णकटिबंधीय घास के मैदान (Tropical Grasslands) भी कहा जाता है।
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| जलवायु | वर्ष भर गर्म। इसमें दो स्पष्ट ऋतुएँ होती हैं: एक लंबी, शुष्क शीत ऋतु (Dry Season) और एक छोटी, आर्द्र ग्रीष्म ऋतु (Wet Season)। |
| स्थान | यह उष्णकटिबंधीय वर्षावनों और गर्म मरुस्थलों के बीच एक संक्रमणकालीन क्षेत्र (Transitional Zone) है। प्रमुख क्षेत्र: अफ्रीका (महाद्वीप का बड़ा हिस्सा), ब्राजील के कुछ हिस्से (कैम्पोस), वेनेजुएला (लानोस) और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया। |
| प्रमुख वनस्पति | * लंबी, मोटी और मोटी घासें (जैसे हाथी घास) प्रमुख वनस्पति हैं।<br/>* पेड़ बहुत कम और दूर-दूर तक फैले होते हैं। ये पेड़ अक्सर सूखे का सामना करने के लिए अनुकूलित होते हैं, जैसे बबूल (Acacia) और बाओबाब (Baobab)।<br/>* यहाँ बार-बार लगने वाली आग और चरने वाले जानवर पेड़ों के विकास को रोकते हैं और घास के मैदानों को बनाए रखते हैं। |
| प्रमुख जीव-जंतु | यह बायोम दुनिया के सबसे बड़े शाकाहारी स्तनधारियों (जैसे हाथी, जिराफ, जेब्रा, वाइल्डबीस्ट) और उनके शिकारियों (जैसे शेर, तेंदुआ, चीता) का घर है। इसे “बिग गेम कंट्री” (Big Game Country) भी कहा जाता है। |
| मृदा | मिट्टी बहुत उपजाऊ नहीं होती क्योंकि शुष्क मौसम में जैविक पदार्थ का अपघटन धीमा होता है और आर्द्र मौसम में पोषक तत्व निक्षालित हो जाते हैं। |
| महत्वपूर्ण तथ्य | * यह विशाल चराई करने वाले जानवरों (Grazing Animals) और उनके शिकारियों की खाद्य श्रृंखला के लिए प्रसिद्ध है।<br/>* अफ्रीका के विश्व प्रसिद्ध राष्ट्रीय पार्क (जैसे सेरेनगेटी, मसाई मारा) इसी बायोम में स्थित हैं। |
B. शीतोष्ण घास के मैदान बायोम (Temperate Grassland Biome)
ये घास के मैदान अपनी अत्यधिक उपजाऊ मिट्टी और कृषि महत्व के लिए जाने जाते हैं।
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| जलवायु | चार स्पष्ट ऋतुएँ। गर्मियाँ गर्म होती हैं और सर्दियाँ ठंडी (अक्सर बर्फबारी के साथ)। वर्षा मध्यम होती है, जो पेड़ों के विकास के लिए पर्याप्त नहीं होती। |
| स्थान | ये आमतौर पर महाद्वीपों के आंतरिक भागों में पाए जाते हैं। |
| प्रमुख वनस्पति | * छोटी और पौष्टिक घासें। ये घासें मोटी परत बनाती हैं, जो मिट्टी के कटाव को रोकती हैं।<br/>* यह क्षेत्र लगभग वृक्ष रहित (Treeless) होता है, केवल नदियों के किनारे कुछ पेड़ पाए जा सकते हैं। |
| प्रमुख जीव-जंतु | यहाँ के मूल जीव चराई करने वाले जानवर हैं, जैसे बाइसन (उत्तरी अमेरिका) और प्रोंगहॉर्न। छोटे बिल बनाने वाले जानवर (जैसे प्रेयरी डॉग्स) भी आम हैं। |
| मृदा | यहाँ की मिट्टी, जिसे चेरनोज़म (Chernozem) या मॉलिसोल (Mollisol) कहा जाता है, दुनिया की सबसे उपजाऊ मिट्टियों में से एक है।<br/>* कारण: ठंडी सर्दियों के कारण घासों और उनकी जड़ों का अपघटन धीमा होता है, जिससे मिट्टी में ह्यूमस की मोटी और गहरी परत जमा हो जाती है। यह परत मिट्टी को काला रंग प्रदान करती है। [UPSC, CDS के लिए बहुत महत्वपूर्ण] |
| महत्वपूर्ण तथ्य | * अत्यधिक उपजाऊ मिट्टी के कारण, इन घास के मैदानों के अधिकांश हिस्से को अब व्यापक कृषि (Extensive Farming) के लिए साफ कर दिया गया है, खासकर गेहूं और मक्का के उत्पादन के लिए।<br/>* इसी कारण इन्हें “विश्व की रोटी की टोकरी” (Breadbaskets of the World) कहा जाता है। |
दुनिया भर में शीतोष्ण घास के मैदानों के स्थानीय नाम
यह परीक्षाओं में सीधे तौर पर मिलान करने या पहचानने के लिए पूछा जाता है। [SSC, RRB, NDA के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण]
| स्थानीय नाम (Local Name) | महाद्वीप / देश |
| प्रेयरी (Prairies) | उत्तरी अमेरिका (USA, कनाडा) |
| पंपास (Pampas) | दक्षिण अमेरिका (अर्जेंटीना, उरुग्वे) |
| स्टेपी (Steppes) | यूरोप और उत्तरी एशिया (यूरेशिया) |
| वेल्ड (Veld) | अफ्रीका (दक्षिण अफ्रीका) |
| डाउन्स (Downs) | ऑस्ट्रेलिया |
| कैंटबरी के मैदान (Canterbury Plains) | न्यूजीलैंड |
| पुश्ताज़ (Pustaz) | हंगरी |
3. मरुस्थल बायोम (Desert Biome): परीक्षा की दृष्टि से
मरुस्थल बायोम ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ वर्षा की अत्यधिक कमी होती है, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ की परिस्थितियाँ पौधों और जानवरों के जीवन के लिए अत्यंत कठोर होती हैं। ये बायोम पृथ्वी की सतह के लगभग पांचवें हिस्से को कवर करते हैं। आमतौर पर मरुस्थल का नाम सुनते ही गर्म, रेतीले टीलों की छवि मन में आती है, लेकिन ये ठंडे और चट्टानी भी हो सकते हैं।
मरुस्थल बायोम की मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| जलवायु की defining feature | अत्यधिक शुष्कता (Aridity)। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 25 सेंटीमीटर (या 10 इंच) से कम होती है। वाष्पीकरण की दर वर्षण की दर से कहीं अधिक होती है। |
| तापमान | तापमान अत्यधिक होता है। दिन और रात के तापमान में भारी अंतर (High Diurnal Range of Temperature) होता है। इसका कारण साफ आसमान और कम आर्द्रता है, जिससे दिन में सौर विकिरण तेजी से सतह को गर्म करता है और रात में गर्मी तेजी से अंतरिक्ष में चली जाती है। |
| प्रमुख वनस्पति | * वनस्पति बहुत विरल होती है। यहाँ पाए जाने वाले पौधों को ज़ेरोफाइट (Xerophytes) यानी मरुद्भिद कहा जाता है, जो सूखे को सहन करने के लिए अनुकूलित होते हैं।<br/>* अनुकूलन (Adaptations): लंबी जड़ें (पानी की गहराई तक पहुंचने के लिए), छोटी मोमयुक्त पत्तियां या कांटे (पानी के वाष्पीकरण को कम करने के लिए), और मोटे तने (पानी जमा करने के लिए)।<br/>* उदाहरण: कैक्टस, नागफनी, बबूल, खजूर। |
| प्रमुख जीव-जंतु | * यहाँ के अधिकांश जानवर निशाचर (Nocturnal) होते हैं, यानी वे दिन की भीषण गर्मी से बचने के लिए बिलों में रहते हैं और भोजन के लिए रात में बाहर निकलते हैं।<br/>* अनुकूलन: पानी का संरक्षण करने की अद्भुत क्षमता (जैसे ऊँट का कूबड़ वसा जमा करता है जिसे ऊर्जा और पानी में बदला जा सकता है)।<br/>* उदाहरण: ऊँट, सरीसृप (सांप, छिपकली), बिच्छू, लोमड़ी (Fennec fox), और विभिन्न प्रकार के कृंतक (Rodents)। |
| मृदा | एरिडोसोल (Aridisols)। यह पतली, रेतीली या पथरीली, और जैविक पदार्थों (ह्यूमस) में बहुत गरीब होती है। निक्षालन (Leaching) की कमी के कारण मिट्टी अक्सर लवणीय और क्षारीय होती है। |
मरुस्थलों के प्रकार (Types of Deserts)
मरुस्थलों को मुख्य रूप से उनके तापमान और स्थान के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है:
1. उष्ण और उपोष्णकटिबंधीय मरुस्थल (Hot and Subtropical Deserts)
- विशेषता: ये पृथ्वी के सबसे गर्म और सबसे शुष्क स्थान हैं। गर्मियाँ बहुत गर्म और सर्दियाँ हल्की होती हैं।
- कारण: ये अक्सर महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर 15° से 30° अक्षांशों के बीच पाए जाते हैं, जहाँ स्थायी उच्च दाब क्षेत्र (Subtropical High-Pressure Belts) होते हैं और ठंडी महासागरीय धाराएँ वर्षा को रोकती हैं।
- प्रमुख उदाहरण:
- सहारा (अफ्रीका): विश्व का सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल। [SSC CGL]
- अरब मरुस्थल (एशिया): दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा।
- ग्रेट विक्टोरिया और ग्रेट सैंडी (ऑस्ट्रेलिया)।
- कालाहारी (दक्षिणी अफ्रीका)।
- थार (भारत और पाकिस्तान)।
- सोनोरन और चिहुआहुआन (उत्तरी अमेरिका)।
- अटाकामा (दक्षिण अमेरिका): विश्व का सबसे शुष्क मरुस्थल। [State PSC]
2. शीतकालीन वर्षा वाले मरुस्थल (Cool Coastal Deserts)
- विशेषता: ये गर्म मरुस्थलों के समान हैं, लेकिन ठंडी अपतटीय महासागरीय धाराओं (Cold Ocean Currents) के प्रभाव के कारण यहाँ की गर्मियाँ थोड़ी ठंडी और कोहरे वाली होती हैं।
- प्रमुख उदाहरण:
- नामीब मरुस्थल (अफ्रीका): बेंगुएला ठंडी धारा के प्रभाव में।
- अटाकामा मरुस्थल (दक्षिण अमेरिका): पेरू (हम्बोल्ट) ठंडी धारा के प्रभाव में।
3. शीत मरुस्थल (Cold Deserts)
- विशेषता: यहाँ गर्मियाँ तो गर्म या हल्की गर्म होती हैं, लेकिन सर्दियाँ अत्यंत ठंडी (हिमांक से नीचे) होती हैं। यहाँ वर्षण मुख्य रूप से हिमपात के रूप में होता है।
- कारण: ये उच्च अक्षांशों में, महाद्वीपों के आंतरिक भागों में या ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं के वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) में स्थित होते हैं।
- प्रमुख उदाहरण:
- गोबी मरुस्थल (चीन और मंगोलिया): यह एक शीत मरुस्थल का उत्कृष्ट उदाहरण है। [UPPSC]
- पेटागोनिया मरुस्थल (अर्जेंटीना): एंडीज पर्वत के वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित है।
- लद्दाख (भारत): हिमालय के वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित भारत का शीत मरुस्थल।
4. ध्रुवीय मरुस्थल (Polar Deserts)
- विशेषता: ये पृथ्वी के सबसे ठंडे, सबसे शुष्क और सबसे बड़े मरुस्थल हैं। यहाँ स्थायी रूप से अत्यधिक ठंड और बर्फ होती है।
- उदाहरण:
- अंटार्कटिक ध्रुवीय मरुस्थल: विश्व का सबसे बड़ा मरुस्थल (किसी भी प्रकार का)।
- आर्कटिक ध्रुवीय मरुस्थल।
4. टुंड्रा बायोम (Tundra Biome): परीक्षा की दृष्टि से
टुंड्रा, जिसका फिनिश भाषा में अर्थ “वृक्षहीन मैदान” (Treeless Plain) होता है, पृथ्वी का सबसे ठंडा और सबसे शुष्क बायोम है (ध्रुवीय बर्फ को छोड़कर)। यह एक विशाल, लगभग सपाट और वृक्ष रहित क्षेत्र है, जिसकी विशेषता स्थायी रूप से जमी हुई जमीन, ठंडी हवाएं और बहुत कम वनस्पति है। यह बायोम जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जो इसे अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनाता है।
टुंड्रा बायोम की मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| जलवायु | अत्यधिक ठंडी और लंबी सर्दियाँ (-30°C से -40°C), और छोटी, ठंडी गर्मियाँ (तापमान 10°C से शायद ही ऊपर जाता है)। बहुत कम वर्षण (एक मरुस्थल के समान), जो मुख्य रूप से हिमपात (Snowfall) के रूप में होता है। तेज और स्थायी हवाएं चलती हैं। |
| सबसे प्रमुख विशेषता | परमाफ्रॉस्ट (Permafrost) – स्थायी तुषार भूमि। यह जमीन की वह परत है जो साल भर (कम से कम लगातार दो वर्षों तक) स्थायी रूप से जमी रहती है। गर्मियों में केवल ऊपरी कुछ इंच की सक्रिय परत (Active Layer) ही पिघलती है। [यह UPSC, CDS की परीक्षाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है।] |
| प्रमुख वनस्पति | * वृक्ष रहित (Treeless) बायोम। यहाँ बड़े पेड़ नहीं उग सकते क्योंकि परमाफ्रॉस्ट उनकी जड़ों को गहराई तक जाने से रोकता है, सक्रिय परत बहुत पतली होती है, और वृद्धि का मौसम बहुत छोटा होता है।<br/>* प्रमुख वनस्पति बहुत कम ऊँचाई वाली होती है: काई (Mosses), लाइकेन (Lichens, जैसे रेंडियर मॉस), सेज (Sedges), और कुछ छोटी झाड़ियाँ। |
| प्रमुख जीव-जंतु | * यहाँ के जानवर ठंड के अनुकूल होते हैं। उनके शरीर पर मोटी फर या वसा की परतें होती हैं।<br/>* उदाहरण: रेंडियर/कैरिबू (Reindeer/Caribou), मस्क बैल (Musk Ox), आर्कटिक लोमड़ी (Arctic Fox), लेमिंग्स, बर्फीला उल्लू (Snowy Owl), और ग्रीष्मकाल में प्रवासी पक्षियों के झुंड। ध्रुवीय भालू (Polar Bear) अक्सर तटीय टुंड्रा क्षेत्रों में आते हैं। |
| मृदा | टुंड्रा मृदा (Tundra Soil)। यह पतली, अविकसित, और पोषक तत्वों में बहुत गरीब होती है। परमाफ्रॉस्ट के कारण जल निकासी खराब होती है, जिससे गर्मियों में जब ऊपरी परत पिघलती है तो यह दलदली हो जाती है। अपघटन बहुत धीमा होता है, जिससे मिट्टी में जैविक पदार्थ जमा हो जाते हैं। |
टुंड्रा बायोम के प्रकार (Types of Tundra Biome)
टुंड्रा को मुख्य रूप से दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है:
1. आर्कटिक टुंड्रा (Arctic Tundra)
- स्थान: यह उत्तरी ध्रुव के चारों ओर और टैगा/शंकुधारी वन बायोम के उत्तर में एक विशाल पट्टी के रूप में फैला हुआ है।
- प्रमुख क्षेत्र: उत्तरी कनाडा, अलास्का (USA), साइबेरिया (रूस), ग्रीनलैंड और स्कैंडिनेविया का उत्तरी भाग।
- विशेषता: यहाँ विशाल, दूर-दूर तक फैले वृक्षहीन मैदान हैं जो परमाफ्रॉस्ट की विशेषता से युक्त हैं। गर्मियों में, जब सतह की बर्फ पिघलती है, तो मच्छरों और अन्य कीड़ों की भारी आबादी पैदा होती है, जो प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करती है।
2. अल्पाइन टुंड्रा (Alpine Tundra)
- स्थान: यह दुनिया भर के ऊँचे पर्वतों पर वृक्ष रेखा (Tree Line) के ऊपर पाया जाता है। वृक्ष रेखा वह ऊँचाई है जिसके ऊपर ठंड और कठोर परिस्थितियों के कारण पेड़ नहीं उग सकते।
- प्रमुख क्षेत्र: हिमालय, एंडीज, रॉकी पर्वत और आल्प्स की ऊँचाइयाँ।
- आर्कटिक टुंड्रा से अंतर:
- कोई परमाफ्रॉस्ट नहीं: अल्पाइन टुंड्रा की मिट्टी में स्थायी रूप से जमी हुई परत यानी परमाफ्रॉस्ट नहीं होता है।
- बेहतर जल निकासी: पर्वतीय ढलानों के कारण यहाँ की मिट्टी में जल निकासी आर्कटिक टुंड्रा की दलदली मिट्टी की तुलना में बेहतर होती है।
- अधिक सौर विकिरण: अधिक ऊँचाई पर होने के कारण इसे तीव्र सौर विकिरण प्राप्त होता है।
- समानता: दोनों ही प्रकार के टुंड्रा वृक्ष रहित होते हैं और कम ऊँचाई वाली वनस्पतियों (काई, लाइकेन) का समर्थन करते हैं।
परीक्षा हेतु विशेष और समसामयिक तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| परमाफ्रॉस्ट का पिघलना | जलवायु परिवर्तन (Global Warming) के कारण परमाफ्रॉस्ट तेजी से पिघल रहा है। इसके पिघलने से इसमें संग्रहीत प्राचीन कार्बन और मीथेन जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में मुक्त हो रही हैं। यह ग्लोबल वार्मिंग को और तेज करने वाली एक खतरनाक सकारात्मक प्रतिक्रिया पाश (Positive Feedback Loop) है। [UPSC Mains और Prelims के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।] |
| पारिस्थितिक नाजुकता | टुंड्रा बायोम अत्यधिक नाजुक (Fragile) होता है। मानव गतिविधियों (जैसे तेल अन्वेषण) से हुए नुकसान को ठीक होने में सैकड़ों साल लग सकते हैं क्योंकि यहाँ पौधों की वृद्धि बहुत धीमी होती है। |
| “फूल वाले पौधे” | छोटी गर्मियों के मौसम के दौरान, टुंड्रा छोटे, रंगीन फूलों वाले पौधों से ढक जाता है जो बहुत तेजी से अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं। |
| जीवों का अनुकूलन | कई जानवर (जैसे आर्कटिक लोमड़ी) सर्दियों में सफेद रंग के हो जाते हैं ताकि वे बर्फ में छिप सकें (छलावरण – Camouflage)। |
जलीय बायोम (Aquatic Biomes): परीक्षा की दृष्टि से
जलीय बायोम पृथ्वी की सतह के लगभग 75% हिस्से को कवर करते हैं, जो उन्हें पृथ्वी पर सबसे बड़ा बायोम बनाता है। ये बायोम पौधों और जानवरों के उन समुदायों को समाहित करते हैं जो पानी में रहने के लिए अनुकूलित होते हैं। इन्हें मुख्य रूप से पानी में घुले हुए लवण की मात्रा (Salinity) के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: अलवणीय जल बायोम और लवणीय जल (समुद्री) बायोम।
A. अलवणीय जल बायोम (Freshwater Biome)
इनमें लवण की सांद्रता बहुत कम (आमतौर पर 1% से कम) होती है। ये पृथ्वी के मीठे पानी के संसाधनों का निर्माण करते हैं, जो जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
1. स्थिर या रुके हुए जल निकाय (Standing Water Bodies: Lentic Ecosystems)
- विवरण: इनमें पानी का प्रवाह बहुत धीमा या न के बराबर होता है।
- उदाहरण:
- झीलें और तालाब (Lakes and Ponds): ये आकार में भिन्न होते हैं। इनमें अक्सर विभिन्न क्षेत्र (Zones) होते हैं, जैसे लिटोरल ज़ोन (किनारे का उथला क्षेत्र) जहाँ जड़ वाले पौधे उगते हैं, और गहरा लिम्नेटिक ज़ोन (खुले पानी का क्षेत्र)।
- आर्द्रभूमि (Wetlands): ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ जमीन स्थायी रूप से या मौसमी रूप से पानी से संतृप्त रहती है। ये अत्यधिक उत्पादक होते हैं और जैव-विविधता के हॉटस्पॉट माने जाते हैं। इन्हें “प्रकृति की किडनी” (Kidneys of Nature) कहा जाता है क्योंकि ये पानी को छानकर शुद्ध करते हैं।
- उदाहरण: दलदल (Marshes), कच्छ भूमि (Swamps), और अनूप भूमि (Bogs)।
- रामसर कन्वेंशन (Ramsar Convention) आर्द्रभूमियों के संरक्षण से संबंधित एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है। [UPSC, State PSC]
2. बहते हुए जल निकाय (Flowing Water Bodies: Lotic Ecosystems)
- विवरण: इनमें पानी एक निश्चित दिशा में निरंतर प्रवाहित होता है।
- उदाहरण:
- नदियाँ और धाराएँ (Rivers and Streams): इनका उद्गम (Source) आमतौर पर पहाड़ों में होता है, जहाँ पानी ठंडा, साफ, ऑक्सीजन से भरपूर और तेज गति वाला होता है। जैसे-जैसे यह मैदानों से होकर मुहाने (Mouth) की ओर बढ़ती है, पानी गर्म होता है, गति धीमी हो जाती है, और इसमें तलछट (Sediments) की मात्रा बढ़ जाती है।
B. लवणीय जल (समुद्री) बायोम (Marine Biome)
ये पृथ्वी पर सबसे बड़े जलीय बायोम हैं, जिनमें लवण की उच्च सांद्रता (औसतन 3.5%) होती है।
1. महासागर (Oceans)
- विवरण: महासागरों को गहराई और सूर्य के प्रकाश की उपलब्धता के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में बांटा गया है:
- प्रकाशित क्षेत्र (Photic Zone): ऊपरी परत जहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) संभव है। यहाँ फाइटोप्लांकटन (Phytoplankton) पाए जाते हैं, जो समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं और पृथ्वी के अधिकांश ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं।
- अप्रकाशीत क्षेत्र (Aphotic Zone): गहरा, ठंडा और अंधेरा क्षेत्र जहाँ प्रकाश संश्लेषण नहीं होता। यहाँ के जीव ऊपरी परतों से गिरने वाले भोजन पर निर्भर करते हैं।
2. प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs)
- विवरण: ये गर्म, उथले और साफ उष्णकटिबंधीय पानी में प्रवाल (Corals) नामक छोटे समुद्री जीवों द्वारा बनाए गए कंकालों से निर्मित विशाल संरचनाएं हैं।
- महत्व:
- इन्हें “समुद्र का वर्षावन” (Rainforests of the Sea) कहा जाता है क्योंकि इनकी जैव-विविधता अत्यंत उच्च होती है। [UPSC, SSC CGL]
- ये समुद्री प्रजातियों की एक चौथाई से अधिक प्रजातियों को आश्रय प्रदान करती हैं।
- खतरे: जलवायु परिवर्तन, समुद्र के तापमान में वृद्धि और अम्लीकरण के कारण प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) की गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं, जिससे इनका अस्तित्व खतरे में है।
3. ज्वारनदमुख (Estuaries)
- विवरण: यह एक संक्रमणकालीन (Transitional) क्षेत्र है जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं। यहाँ मीठा और खारा पानी आपस में मिलता है, जिससे खारा जल (Brackish Water) बनता है।
- महत्व:
- ये अत्यधिक उत्पादक पारिस्थितिकी तंत्र होते हैं।
- ये कई व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछलियों और शंखों (Shellfish) के लिए प्रजनन स्थल और नर्सरी के रूप में काम करते हैं।
- ये प्राकृतिक जल शोधक (Water Purifiers) के रूप में कार्य करते हैं।
- उदाहरण: मैंग्रोव वन (Mangrove Forests) अक्सर ज्वारनदमुख और तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। ये सुनामी और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ प्राकृतिक बफर (Natural Buffer) के रूप में कार्य करते हैं। सुंदरवन (Sunderbans) विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन है। [BPSC]
परीक्षा हेतु विशेष तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| नेक्टन (Nekton) | वे जीव जो धारा के विरुद्ध तैर सकते हैं, जैसे मछली, व्हेल। |
| प्लांकटन (Plankton) | वे जीव जो पानी की धाराओं के साथ बहते हैं, तैर नहीं सकते। फाइटोप्लांकटन (पादप प्लवक) प्रकाश संश्लेषण करते हैं और ज़ूप्लांकटन (जंतु प्लवक) इन्हें खाते हैं। |
| बेंथोस (Benthos) | वे जीव जो समुद्र तल पर या तलछट में रहते हैं, जैसे केंकड़े, स्टारफिश, सीप। |
| यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) | जब किसी जल निकाय में कृषि अपवाह से नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों की अधिकता हो जाती है, तो शैवाल (Algae) का अत्यधिक विकास (अल्गल ब्लूम) होता है। बाद में जब ये शैवाल मरकर सड़ते हैं, तो वे पानी से ऑक्सीजन को खत्म कर देते हैं, जिससे जलीय जीवन मर जाता है। इसे सुपोषण कहते हैं। |
| डेड ज़ोन (Dead Zone) | यूट्रोफिकेशन के कारण बने ऑक्सीजन रहित (Hypoxic) क्षेत्र, जहाँ समुद्री जीवन जीवित नहीं रह सकता। |
विश्व के संसाधन और उद्योग (World Resources and Industries)
संसाधनों की अवधारणा और वर्गीकरण
संसाधन की परिभाषा (Definition of Resource)
संसाधन कोई भी ऐसी वस्तु, पदार्थ, ऊर्जा स्रोत या सेवा है जो मानवीय आवश्यकताओं और इच्छाओं को पूरा करती है, या जिसका उपयोग किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है।
इस परिभाषा के तीन मुख्य पहलू हैं:
- उपयोगिता (Utility/Functionality): किसी भी वस्तु को संसाधन तभी कहा जा सकता है जब वह मनुष्य के लिए किसी प्रकार से उपयोगी हो। यदि कोई वस्तु उपयोगी नहीं है, तो वह संसाधन नहीं है।
- मूल्य (Value): प्रत्येक संसाधन का कोई न कोई मूल्य होता है। यह मूल्य आर्थिक (जैसे सोना, कोयला), कानूनी (जैसे भूमि का स्वामित्व), सौंदर्यपरक (जैसे सुंदर परिदृश्य) या नैतिक हो सकता है।
- कार्यात्मकता (Functionality): एक वस्तु स्वयं में संसाधन नहीं होती, बल्कि उसका कार्यात्मक गुण उसे संसाधन बनाता है। उदाहरण के लिए, कोयला जमीन के नीचे लाखों वर्षों तक सिर्फ एक पत्थर था, लेकिन जब मनुष्य ने उसे ऊर्जा के स्रोत के रूप में उपयोग करना सीखा, तब वह एक संसाधन बना।
व्यापक परिप्रेक्ष्य
प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता ज़िमरमैन (E.W. Zimmermann) के अनुसार:
“संसाधन होते नहीं, बनाए जाते हैं।” (Resources are not, they become.)
इसका अर्थ यह है कि प्रकृति में मौजूद वस्तुएं केवल “तटस्थ पदार्थ” (Neutral Stuff) होती हैं। वे संसाधन तभी बनती हैं जब मनुष्य अपने ज्ञान, कौशल, और प्रौद्योगिकी (Knowledge, Skill, and Technology) का उपयोग करके उन्हें अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने योग्य बना लेता है।
संसाधन बनने की प्रक्रिया
एक वस्तु को संसाधन बनने के लिए तीन मुख्य घटकों की आवश्यकता होती है:
- प्रकृति (Nature): यह हमें कच्ची सामग्री या “तटस्थ पदार्थ” प्रदान करती है। (जैसे, कच्चा लोहा, बहता पानी, धूप)।
- मानव (Human): मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और ज्ञान के साथ इन पदार्थों को पहचानता है और उन्हें उपयोग करने की योजना बनाता है।
- संस्कृति (Culture)/प्रौद्योगिकी (Technology): यह वह माध्यम या उपकरण है जिससे मनुष्य प्राकृतिक पदार्थों को मूल्यवान संसाधनों में परिवर्तित करता है। (जैसे, लौह अयस्क को इस्पात में बदलने की तकनीक)।
उदाहरण:
- नदी का पानी: लाखों वर्षों से नदियाँ बह रही थीं, लेकिन वे केवल एक प्राकृतिक प्रवाह थीं। जब मनुष्य ने प्रौद्योगिकी (टर्बाइन, बांध) का विकास किया, तो उसने उसी बहते पानी को जलविद्युत (एक ऊर्जा संसाधन), सिंचाई के जल (एक कृषि संसाधन) और पेयजल (एक जीवन-रक्षक संसाधन) में बदल दिया।
निष्कर्ष: संक्षेप में, संसाधन मानवीय धारणा और क्षमता का एक गतिशील और कार्यात्मक उत्पाद है। जो वस्तु आज एक बेकार पदार्थ है, वह भविष्य में नई प्रौद्योगिकी के विकास से एक मूल्यवान संसाधन बन सकती है।
प्राकृतिक और मानव निर्मित संसाधन (Natural and Man-made Resources)
संसाधनों को उनके निर्माण की प्रक्रिया और स्रोत के आधार पर दो मौलिक श्रेणियों में बांटा जा सकता है: प्राकृतिक संसाधन और मानव निर्मित संसाधन।
1. प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)
परिभाषा:
वे सभी संसाधन जो हमें सीधे तौर पर प्रकृति से प्राप्त होते हैं और जिन्हें बनाने में मनुष्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं। ये संसाधन पृथ्वी के पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं।
विशेषताएँ:
- प्रकृति का उपहार: ये मनुष्य को प्रकृति द्वारा दिए गए उपहार हैं।
- न्यूनतम संशोधन: मनुष्य इनका उपयोग या तो सीधे करता है या फिर उनमें न्यूनतम संशोधन करके करता है।
- नवीकरणीय और अनवीकरणीय: ये दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
उदाहरण:
| श्रेणी | उदाहरण | विवरण |
| भूमि संसाधन | मृदा (Soil), चट्टानें, मैदान, पर्वत, पठार। | कृषि और आवास का आधार। |
| जल संसाधन | नदियाँ, झीलें, महासागर, भूजल, वर्षा। | जीवन के लिए अनिवार्य; सिंचाई, उद्योग और ऊर्जा के लिए आवश्यक। |
| वायु संसाधन | ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और अन्य वायुमंडलीय गैसें। | श्वसन और विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण। |
| खनिज संसाधन | लौह अयस्क, कोयला, पेट्रोलियम, तांबा, बॉक्साइट, सोना, हीरा। | उद्योग और ऊर्जा के प्रमुख स्रोत। ये अनवीकरणीय होते हैं। |
| वनस्पति संसाधन | वन, घास के मैदान, प्राकृतिक रूप से उगने वाले पौधे। | लकड़ी, औषधियाँ, पारिस्थितिक संतुलन और जैव-विविधता का स्रोत। |
| पशु संसाधन | वन्यजीव (Wild Animals)। | पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और जैव-विविधता का हिस्सा हैं। |
| ऊर्जा संसाधन | सौर ऊर्जा (Solar Energy), पवन ऊर्जा (Wind Energy), भूतापीय ऊर्जा। | ये नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत हैं और प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं। |
2. मानव निर्मित संसाधन (Man-made/Human-made Resources)
परिभाषा:
जब मनुष्य अपने ज्ञान, कौशल और प्रौद्योगिकी का उपयोग करके प्राकृतिक संसाधनों का रूप बदलकर उन्हें अधिक उपयोगी और मूल्यवान बना देता है, तो इस प्रकार बने नए संसाधनों को मानव निर्मित संसाधन कहते हैं। ये संसाधन प्रकृति में सीधे तौर पर मौजूद नहीं होते; इन्हें मनुष्य द्वारा बनाया जाता है।
विशेषताएँ:
- मानव का हस्तक्षेप: इनका निर्माण पूरी तरह से मानवीय प्रयास और प्रौद्योगिकी पर निर्भर करता है।
- प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित: ये प्राकृतिक संसाधनों को कच्चे माल के रूप में उपयोग करके बनाए जाते हैं।
- मूल्य में वृद्धि: ये अक्सर अपने मूल प्राकृतिक रूप से अधिक मूल्यवान और उपयोगी होते हैं।
उदाहरण:
| मानव निर्मित संसाधन | उपयोग किया गया प्राकृतिक संसाधन |
| इमारतें, घर, सड़कें, पुल | मृदा, चट्टानें, चूना पत्थर, लौह अयस्क (स्टील बनाने के लिए) |
| वाहन (कार, ट्रेन, हवाई जहाज) | लौह अयस्क, बॉक्साइट (एल्यूमीनियम), रबर, पेट्रोलियम (ईंधन और प्लास्टिक के लिए) |
| मशीनरी और उपकरण | विभिन्न धातुएँ और खनिज |
| प्लास्टिक | पेट्रोलियम (एक प्राकृतिक संसाधन) |
| सिंथेटिक फाइबर (नायलॉन, पॉलिएस्टर) | पेट्रोकेमिकल्स (पेट्रोलियम से प्राप्त) |
| बिजली (Thermal Power) | कोयला, प्राकृतिक गैस या यूरेनियम (प्राकृतिक संसाधन) |
| औषधियाँ और रसायन | पौधे, खनिज और अन्य प्राकृतिक पदार्थ |
| प्रौद्योगिकी और सॉफ्टवेयर | मनुष्य का ज्ञान और कौशल (मानव संसाधन) |
मानव संसाधन: एक विशेष श्रेणी (Human Resource: A Special Category)
मनुष्य स्वयं एक विशेष प्रकार का और सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है।
- क्यों? क्योंकि मनुष्य ही अपने ज्ञान (Knowledge), कौशल (Skill), स्वास्थ्य (Health), और प्रौद्योगिकी (Technology) से प्राकृतिक पदार्थों को मूल्यवान संसाधनों में बदलने की क्षमता रखता है।
- बिना मानव संसाधन के, प्रकृति में मौजूद अन्य सभी पदार्थ केवल “तटस्थ” रहेंगे। इसलिए, मानव संसाधन विकास (Human Resource Development) – यानी शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश करना – किसी भी देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सारांश तालिका
| आधार | प्राकृतिक संसाधन | मानव निर्मित संसाधन |
| स्रोत | प्रकृति | मनुष्य |
| निर्माण | प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा | मानवीय प्रौद्योगिकी और कौशल द्वारा |
| कच्चा माल | – | प्राकृतिक संसाधन |
| उदाहरण | हवा, पानी, मिट्टी, खनिज, वन | इमारतें, सड़कें, वाहन, प्लास्टिक, प्रौद्योगिकी |
संसाधनों का वर्गीकरण (Classification of Resources)
संसाधनों को उनकी विशेषताओं और गुणों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। यह वर्गीकरण हमें संसाधनों के प्रबंधन, संरक्षण और सतत उपयोग की योजना बनाने में मदद करता है। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए, निम्नलिखित चार प्रमुख आधारों पर किया गया वर्गीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है:
1. उत्पत्ति के आधार पर (On the Basis of Origin)
| वर्ग | विवरण | उदाहरण |
| जैव संसाधन (Biotic Resources) | वे सभी संसाधन जो जीवमंडल से प्राप्त होते हैं और जिनमें जीवन होता है। ये जीवित या मृत जीवों से प्राप्त होते हैं। | वनस्पति (वन, फसलें), जीव-जंतु (पशुधन, वन्यजीव, मत्स्य), सूक्ष्मजीव, जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) क्योंकि ये जैविक उत्पत्ति के हैं। |
| अजैव संसाधन (Abiotic Resources) | वे सभी संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बने होते हैं। ये भौतिक वातावरण से प्राप्त होते हैं। | भूमि, चट्टानें, मृदा, जल, वायु, खनिज (लोहा, तांबा), धातुएँ, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा। |
2. समाप्यता / नवीकरणीयता के आधार पर (On the Basis of Exhaustibility/Renewability)
यह संसाधनों का सबसे आम और महत्वपूर्ण वर्गीकरण है, जो सीधे तौर पर सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा से जुड़ा है।
| वर्ग | विवरण | उदाहरण |
| नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources) | वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः उत्पन्न या नवीकृत किया जा सकता है। ये प्रकृति में एक सतत प्रवाह में उपलब्ध होते हैं और मानवीय गतिविधियों से समाप्त नहीं होते (जब तक कि उनका दुरुपयोग न हो)। | सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल (जलचक्र द्वारा), वन, वन्यजीव। इन्हें असमाप्य (Inexhaustible) या सतत संसाधन भी कहते हैं। |
| अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources) | वे संसाधन जिनका भंडार सीमित है और जिन्हें बनने में लाखों वर्ष लगते हैं। एक बार समाप्त हो जाने के बाद, उन्हें मानवीय जीवनकाल में पुनः उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। | खनिज (लोहा, तांबा), जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस)। इन्हें समाप्य (Exhaustible) संसाधन भी कहते हैं। |
3. स्वामित्व के आधार पर (On the Basis of Ownership)
| वर्ग | विवरण | उदाहरण |
| व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources) | जिन पर किसी एक व्यक्ति या परिवार का निजी स्वामित्व होता है। | घर, जमीन (प्लॉट), कार, निजी तालाब। |
| सामुदायिक संसाधन (Community-owned Resources) | जिन पर किसी समुदाय के सभी सदस्यों का समान अधिकार होता है। | सार्वजनिक पार्क, खेल के मैदान, श्मशान भूमि, चारागाह, सामुदायिक तालाब। |
| राष्ट्रीय संसाधन (National Resources) | वे सभी संसाधन जो किसी देश की राजनीतिक सीमाओं के भीतर मौजूद होते हैं, चाहे वे निजी हों या सार्वजनिक। देश की सरकार को सार्वजनिक हित में निजी संपत्ति का भी अधिग्रहण करने का अधिकार होता है। | सड़कें, नहरें, रेलवे, नदियाँ, वन, वन्यजीव, देश के भीतर मौजूद सभी खनिज और जल संसाधन। (तट से 12 समुद्री मील तक का महासागरीय क्षेत्र भी राष्ट्रीय संपत्ति है)। |
| अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources) | वे संसाधन जिन पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता, बल्कि उनका प्रबंधन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा किया जाता है। | खुला महासागर (Open Ocean) – किसी भी देश की तटरेखा से 200 समुद्री मील (अनन्य आर्थिक क्षेत्र – Exclusive Economic Zone, EEZ) से परे का समुद्री क्षेत्र। अंटार्कटिका, वायुमंडल, अंतरिक्ष। |
4. विकास के स्तर के आधार पर (On the Basis of the Status of Development)
| वर्ग | विवरण | उदाहरण |
| संभावी संसाधन (Potential Resources) | वे संसाधन जो किसी क्षेत्र में मौजूद तो हैं, लेकिन प्रौद्योगिकी या आर्थिक कारणों से अभी तक उनका व्यापक रूप से उपयोग नहीं किया गया ہے। भविष्य में इनका उपयोग होने की संभावना है। | भारत के पश्चिमी भागों (गुजरात, राजस्थान) में सौर और पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएं, जिनका अभी पूरी तरह से दोहन नहीं हुआ है। लद्दाख में यूरेनियम का भंडार। |
| विकसित संसाधन (Developed Resources) | वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है, उनकी गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है, और वर्तमान प्रौद्योगिकी की मदद से उनका उपयोग किया जा रहा ہے। | झारखंड और छत्तीसगढ़ में कोयले का खनन, असम में पेट्रोलियम का निष्कर्षण। |
| भंडार (Stock) | पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानवीय आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं, लेकिन हमारे पास उन्हें प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी (Appropriate Technology) का अभाव ہے। | पानी (H₂O) हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक है; हाइड्रोजन ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत हो सकता है, लेकिन हमारे पास इसे सस्ते और प्रभावी ढंग से निकालने की तकनीक नहीं है। |
| संचित कोष (Reserves) | ये भंडार (Stock) का ही एक हिस्सा हैं, जिन्हें मौजूदा प्रौद्योगिकी की मदद से भविष्य की जरूरतों के लिए निकाला और उपयोग किया जा सकता है, लेकिन वर्तमान में इन्हें भविष्य के लिए संरक्षित रखा गया है। | नदियों के बांधों में जल, वन संपदा जिन्हें भविष्य के उपयोग के लिए संरक्षित किया गया है। |
संसाधनों का वर्गीकरण: उत्पत्ति के आधार पर (Classification of Resources: On the Basis of Origin)
उत्पत्ति (Origin) के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण यह बताता है कि कोई संसाधन हमें जीवित स्रोतों से मिला है या निर्जीव स्रोतों से। यह वर्गीकरण सबसे मौलिक है और संसाधनों की प्रकृति को समझने में हमारी मदद करता है।
उत्पत्ति के आधार पर, संसाधनों को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
- जैव संसाधन (Biotic Resources)
- अजैव संसाधन (Abiotic Resources)
1. जैव संसाधन (Biotic Resources)
परिभाषा:
वे सभी संसाधन जो हमें जीवमंडल (Biosphere) से प्राप्त होते हैं और जिनमें जीवन होता है या जो जीवित प्राणियों से उत्पन्न हुए हैं, जैव संसाधन कहलाते हैं। ये सभी संसाधन जैविक (Organic) प्रकृति के होते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- सजीव स्रोत: ये पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों से प्राप्त होते हैं।
- नवीकरणीयता: अधिकांश जैव संसाधन प्रजनन (Reproduction) और पुनर्जनन (Regeneration) की क्षमता के कारण नवीकरणीय (Renewable) होते हैं। हालांकि, उनका अत्यधिक उपयोग उन्हें समाप्त कर सकता है।
- उदाहरण:
- वनस्पति (Flora): वन और उनसे प्राप्त होने वाले उत्पाद (लकड़ी, कागज, गोंद, औषधियाँ), कृषि फसलें (अनाज, फल, सब्जियाँ), घास के मैदान।
- जीव-जंतु (Fauna): पशुधन (जिनसे दूध, मांस, ऊन, चमड़ा मिलता है), मत्स्य (मछलियाँ), वन्यजीव।
- मनुष्य: मानव स्वयं एक महत्वपूर्ण जैव संसाधन है।
- जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels): कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को उनकी उत्पत्ति के आधार पर जैव संसाधन माना जाता है, क्योंकि वे लाखों वर्ष पहले दबे हुए मृत पौधों और जानवरों के अवशेषों से बने हैं। हालांकि, उपयोग की दृष्टि से वे अनवीकरणीय (Non-renewable) हैं। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है जो अक्सर परीक्षाओं में भ्रम पैदा करता है।
2. अजैव संसाधन (Abiotic Resources)
परिभाषा:
वे सभी संसाधन जो निर्जीव (Non-living) वस्तुओं से बने होते हैं और भौतिक या रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा निर्मित होते हैं, अजैव संसाधन कहलाते हैं। ये संसाधन भौतिक पर्यावरण का हिस्सा हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- निर्जीव स्रोत: ये निर्जीव भौतिक जगत से प्राप्त होते हैं।
- नवीकरणीयता: अजैव संसाधन नवीकरणीय और अनवीकरणीय दोनों हो सकते हैं।
- उदाहरण:
- भूमि और मृदा: कृषि और निवास का आधार।
- चट्टानें और खनिज: लोहा, तांबा, बॉक्साइट, सोना, हीरा, अभ्रक। (ये अनवीकरणीय हैं)।
- जल: नदियाँ, झीलें, महासागर, भूजल। (यह जलचक्र के कारण नवीकरणीय है)।
- वायु: ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि गैसें।
- नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा। (ये प्रकृति में सतत प्रवाह में हैं और नवीकरणीय हैं)।
सारांश तालिका
| आधार | जैव संसाधन (Biotic Resources) | अजैव संसाधन (Abiotic Resources) |
| मूल स्रोत | जीवमंडल (जीवित वस्तुएं) | स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल (निर्जीव वस्तुएं) |
| जीवन की उपस्थिति | जीवन होता है या जीवित स्रोतों से आते हैं। | जीवन नहीं होता है। |
| प्रकृति | जैविक (Organic) | भौतिक / अकार्बनिक (Physical / Inorganic) |
| पुनर्जनन | सामान्यतः प्रजनन के माध्यम से नवीकृत होते हैं (जीवाश्म ईंधन को छोड़कर)। | प्राकृतिक चक्रों (जैसे जल चक्र) से नवीकृत हो सकते हैं या अनवीकरणीय हो सकते हैं। |
| मुख्य उदाहरण | वन, फसलें, जानवर, मछली, मनुष्य, कोयला, पेट्रोलियम। | भूमि, जल, वायु, खनिज, धातु, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा। |
संसाधनों का वर्गीकरण: समाप्यता / नवीकरणीयता के आधार पर (On the Basis of Exhaustibility / Renewability)
यह संसाधनों का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक वर्गीकरण है, क्योंकि यह सीधे तौर पर उनके उपयोग, प्रबंधन, संरक्षण और सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा से जुड़ा है। समाप्यता का अर्थ है कि उपयोग के बाद कोई संसाधन समाप्त हो जाएगा या नहीं।
इस आधार पर, संसाधनों को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
- नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources)
- अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources)
1. नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources)
परिभाषा:
वे संसाधन जिन्हें उपयोग के बाद भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः उत्पन्न (Regenerated) या नवीकृत (Renewed) किया जा सकता है, नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं। इनका भंडार प्रकृति में एक सतत प्रवाह में बना रहता है, इसलिए इन्हें असमाप्य (Inexhaustible) संसाधन भी कहा जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- पुनर्स्थापन: ये प्रकृति में एक निश्चित समय के भीतर अपने आप फिर से भर जाते हैं।
- सतत प्रवाह: कुछ संसाधन (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) एक निरंतर प्रवाह में उपलब्ध होते हैं और मानवीय उपयोग से प्रभावित नहीं होते।
- पर्यावरण के अनुकूल: अधिकांश नवीकरणीय संसाधन, विशेष रूप से ऊर्जा के स्रोत, पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होते हैं।
- शर्तें: हालांकि ये नवीकरणीय हैं, लेकिन इनका अत्यधिक और गैर-जिम्मेदाराना उपयोग इनकी नवीनीकरण की दर को बाधित कर सकता है (जैसे वनों की अत्यधिक कटाई या भूजल का अत्यधिक दोहन)।
उदाहरण:
| श्रेणी | उदाहरण | नवीकरण का आधार |
| सतत प्रवाह संसाधन | सौर ऊर्जा (Solar Energy), पवन ऊर्जा (Wind Energy), ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा। | ये प्रकृति में लगातार उपलब्ध हैं और मानवीय उपयोग से समाप्त नहीं होते। |
| जैविक संसाधन | वन और पेड़-पौधे, वन्यजीव, पशुधन। | प्रजनन (Reproduction) और पुनर्जनन (Regeneration) द्वारा अपनी आबादी बढ़ा सकते हैं। |
| जल | नदियाँ, झीलें, भूजल। | जल चक्र (Hydrological Cycle) द्वारा निरंतर नवीकृत होता है। |
| मानव संसाधन | मनुष्य। | शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास द्वारा निरंतर विकसित और नवीकृत होते हैं। |
| मृदा | मिट्टी। | धीमी गति से प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा नवीकृत होती है (लेकिन इसका क्षरण बहुत तेजी से हो सकता है)। |
2. अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources)
परिभाषा:
वे संसाधन जिनका भंडार प्रकृति में सीमित है और जिन्हें बनने में लाखों वर्षों का एक लंबा भूवैज्ञानिक समय लगता है, अनवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं। एक बार इनका भंडार समाप्त हो जाने पर, इन्हें मानवीय जीवनकाल में पुनः बनाया या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। इन्हें समाप्य (Exhaustible) संसाधन भी कहते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- सीमित भंडार (Fixed Stock): पृथ्वी पर इनकी एक निश्चित मात्रा ही उपलब्ध है।
- अत्यंत धीमी निर्माण प्रक्रिया: इनका निर्माण भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा लाखों वर्षों में होता है।
- पुनर्चक्रण की संभावना: कुछ अनवीकरणीय संसाधनों (जैसे धातुओं) को पुनर्चक्रित (Recycled) करके बार-बार उपयोग किया जा सकता है, लेकिन जीवाश्म ईंधन को नहीं।
- पर्यावरणीय प्रभाव: इनके उपयोग से अक्सर महत्वपूर्ण पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं (जैसे प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग)।
उदाहरण:
| श्रेणी | उदाहरण |
| जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) | कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस। |
| धात्विक खनिज (Metallic Minerals) | लौह अयस्क, तांबा, बॉक्साइट, सोना, चांदी, यूरेनियम। |
| अधात्विक खनिज (Non-Metallic Minerals) | अभ्रक, चूना पत्थर, जिप्सम। |
सारांश तालिका
| आधार | नवीकरणीय संसाधन | अनवीकरणीय संसाधन |
| परिभाषा | जिन्हें पुनः उत्पन्न किया जा सकता है। | जिनका भंडार सीमित है और पुनः उत्पन्न नहीं हो सकते। |
| भंडार | असमाप्य (सतत प्रवाह) | समाप्य (सीमित) |
| नवीकरण की दर | तेज (मानवीय जीवनकाल के भीतर) | अत्यंत धीमी (लाखों वर्ष) |
| पर्यावरणीय प्रभाव | आमतौर पर कम। | आमतौर पर अधिक। |
| सततता | सतत विकास के लिए उपयुक्त। | सतत उपयोग की चुनौती। |
| मुख्य उदाहरण | सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, वन। | कोयला, पेट्रोलियम, खनिज, धातुएँ। |
संसाधनों का वर्गीकरण: स्वामित्व के आधार पर (On the Basis of Ownership)
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण यह स्पष्ट करता है कि किसी संसाधन तक पहुँच और उसके उपयोग का अधिकार किसके पास है—किसी एक व्यक्ति के पास, पूरे समुदाय के पास, देश के पास या संपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के पास। यह वर्गीकरण संसाधनों के प्रबंधन, वितरण और उपयोग से संबंधित नीतियों को समझने में मदद करता है।
1. व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources)
- परिभाषा: वे संसाधन जिन पर निजी तौर पर व्यक्तियों या परिवारों का स्वामित्व होता है। इन संसाधनों के उपयोग और हस्तांतरण का अधिकार व्यक्ति विशेष के पास होता है, हालांकि सरकार नियमों के तहत इस पर कर लगा सकती है या इसे नियंत्रित कर सकती है।
- उदाहरण:
- भूमि और संपत्ति: लोगों के स्वामित्व वाले खेत, घर, प्लॉट, दुकानें।
- जल निकाय: निजी कुआँ, निजी तालाब, फार्म में बना ट्यूबवेल।
- वाहन: कार, ट्रैक्टर, मोटरबाइक।
- अन्य: निजी बागान, व्यक्तिगत बचत और संपत्ति।
2. सामुदायिक संसाधन (Community-owned Resources)
- परिभाषा: वे संसाधन जो एक समुदाय (Community) के सभी सदस्यों के लिए उपलब्ध होते हैं और जिन पर पूरे समुदाय का सामूहिक स्वामित्व होता है। इन संसाधनों का उपयोग समुदाय के सभी सदस्य कर सकते हैं।
- उदाहरण:
- सार्वजनिक भूमि: गाँव के चारागाह (Grazing grounds), सार्वजनिक पार्क, खेल के मैदान, पिकनिक स्थल।
- श्मशान और कब्रिस्तान: समुदाय के उपयोग की भूमि।
- जल निकाय: गाँव का तालाब, सार्वजनिक कुआँ।
- सामुदायिक भवन: सामुदायिक केंद्र, पंचायत घर।
- परंपरागत ज्ञान: लोक गीत, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियाँ, जो एक समुदाय की साझा विरासत होती हैं।
3. राष्ट्रीय संसाधन (National Resources)
- परिभाषा: तकनीकी रूप से, किसी देश की राजनीतिक सीमाओं और समुद्री क्षेत्र के भीतर पाए जाने वाले सभी संसाधन राष्ट्रीय संसाधन कहलाते हैं, चाहे वे व्यक्तिगत हों या सामुदायिक। राष्ट्र (सरकार) के पास सार्वजनिक हित में निजी संपत्ति का भी अधिग्रहण करने का कानूनी अधिकार होता है।
- विस्तार: इसमें देश की भूमि, खनिज, जल संसाधन, वन, वन्यजीव, और समुद्री संसाधन शामिल हैं।
- समुद्री सीमा: किसी देश की तटरेखा से 12 समुद्री मील (Nautical Miles) (लगभग 22.2 किलोमीटर) तक का महासागरीय क्षेत्र, जिसे प्रादेशिक सागर (Territorial Waters) कहते हैं, पूरी तरह से राष्ट्रीय संसाधन माना जाता है।
- उदाहरण:
- सभी खनिज, जल संसाधन, वन और वन्यजीव।
- राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे, नहरें।
- शहरी विकास प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित भूमि।
- अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone – EEZ): तटरेखा से 200 समुद्री मील तक का क्षेत्र, जहाँ देश को समुद्री संसाधनों (मछली, खनिज) का सर्वेक्षण, दोहन, संरक्षण और प्रबंधन करने का अनन्य अधिकार (Exclusive Right) प्राप्त होता है, हालांकि अन्य देशों को यहाँ से गुजरने की अनुमति होती है।
4. अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources)
- परिभाषा: वे संसाधन जो किसी भी एक देश के विशेष अधिकार क्षेत्र से बाहर होते हैं और जिनका विनियमन और प्रबंधन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा किया जाता है। इन संसाधनों का उपयोग संपूर्ण मानव जाति के लाभ के लिए किया जाता है।
- किसी भी एक देश का अधिकार नहीं: कोई भी देश इन संसाधनों का उपयोग बिना अंतर्राष्ट्रीय सहमति के नहीं कर सकता।
- उदाहरण:
- खुला महासागर (Open Ocean): किसी भी देश के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) से 200 समुद्री मील से परे का महासागरीय क्षेत्र। यहाँ के संसाधनों (जैसे समुद्री तल पर मौजूद मैंगनीज नोड्यूल) का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति से ही किया जा सकता है। [UPSC, CDS के लिए बहुत महत्वपूर्ण]
- अंटार्कटिका: अंटार्कटिक संधि (Antarctic Treaty) के तहत यह महाद्वीप किसी भी देश की संपत्ति नहीं है और केवल वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए समर्पित है।
- अंतरिक्ष (Outer Space): अंतरिक्ष और वहाँ मौजूद खगोलीय पिंड किसी भी एक राष्ट्र की संपत्ति नहीं हैं।
- वायुमंडल: यह एक वैश्विक साझा संसाधन है।
सारांश
| स्वामित्व का प्रकार | किसके अधीन | उदाहरण |
| व्यक्तिगत | व्यक्ति / परिवार | घर, खेत, कार, निजी कुआँ |
| सामुदायिक | समुदाय / समाज | सार्वजनिक पार्क, चारागाह, तालाब, श्मशान |
| राष्ट्रीय | देश / राष्ट्र (सरकार) | खनिज, नदियाँ, वन, रेलवे, 12 समुद्री मील तक का सागर |
| अंतर्राष्ट्रीय | अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ | 200 समुद्री मील से परे का खुला महासागर, अंटार्कटिका, अंतरिक्ष |
संसाधनों का वर्गीकरण: विकास के स्तर के आधार पर (On the Basis of the Status of Development)
यह वर्गीकरण हमें बताता है कि क्या हम किसी ज्ञात संसाधन का उपयोग करने में सक्षम हैं, क्या हमने उसे भविष्य के लिए बचाकर रखा है, या क्या हमारे पास अभी उसे उपयोग करने की तकनीक ही नहीं है। यह संसाधनों के प्रबंधन और भविष्य की योजना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस आधार पर, संसाधनों को चार मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
- संभावी संसाधन (Potential Resources)
- विकसित संसाधन (Developed Resources)
- भंडार (Stock)
- संचित कोष (Reserves)
1. संभावी संसाधन (Potential Resources)
- परिभाषा: वे संसाधन जो किसी क्षेत्र में मौजूद तो हैं और भविष्य में उपयोग किए जा सकते हैं, लेकिन विभिन्न कारणों (जैसे प्रौद्योगिकी की उच्च लागत या वर्तमान आवश्यकता की कमी) से अभी तक उनका व्यापक रूप से उपयोग शुरू नहीं किया गया है।
- मुख्य विशेषताएँ:
- इनकी उपस्थिति ज्ञात है।
- इनके उपयोग की तकनीक भी मौजूद हो सकती है, लेकिन वह अभी आर्थिक रूप से व्यवहार्य (Economically viable) नहीं हो सकती।
- इनमें भविष्य में हमारी जरूरतों को पूरा करने की immense संभावना होती है।
- उदाहरण:
- भारत में सौर और पवन ऊर्जा: भारत के पश्चिमी भागों, विशेषकर गुजरात और राजस्थान, में सौर और पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। हालांकि हमने कुछ प्रगति की है, लेकिन अभी भी इस विशाल क्षमता का पूरी तरह से उपयोग नहीं किया गया है। [SSC, UPSC]
- ज्वारीय ऊर्जा: भारत के तटीय क्षेत्रों, जैसे खंभात की खाड़ी, में ज्वारीय ऊर्जा उत्पन्न करने की काफी संभावनाएं हैं, लेकिन तकनीकी और लागत संबंधी बाधाओं के कारण अभी तक इसका बड़े पैमाने पर विकास नहीं हुआ है।
- लद्दाख में यूरेनियम: लद्दाख में यूरेनियम के भंडार का पता चला है, जो भविष्य में एक महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन हो सकता है, लेकिन अभी इसका दोहन नहीं हो रहा है।
2. विकसित संसाधन (Developed Resources)
- परिभाषा: वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण (Survey) किया जा चुका है, उनकी गुणवत्ता (Quality) और मात्रा (Quantity) निर्धारित की जा चुकी है, और वर्तमान में उनका उपयोग करने के लिए हमारे पास उपयुक्त प्रौद्योगिकी और आर्थिक व्यवहार्यता दोनों मौजूद हैं।
- मुख्य विशेषताएँ:
- ये उपयोग के लिए पूरी तरह से तैयार हैं और वर्तमान में इनका दोहन हो रहा है।
- इनका विकास प्रौद्योगिकी और आर्थिक faisabilité के स्तर पर निर्भर करता है।
- उदाहरण:
- झारखंड और छत्तीसगढ़ में कोयला भंडार: हमें पता है कि वहाँ कितना और किस गुणवत्ता का कोयला है, और हम उसे निकाल कर उपयोग कर रहे हैं।
- असम और मुंबई हाई में पेट्रोलियम: इन क्षेत्रों से पेट्रोलियम का निष्कर्षण और उपयोग विकसित संसाधनों का उदाहरण है।
- नदियों पर बने बांधों से जलविद्युत: यह एक विकसित संसाधन है जिसका हम उपयोग कर रहे हैं।
3. भंडार (Stock)
- परिभाषा: पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता तो रखते हैं, लेकिन हमारे पास उन्हें प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी (Appropriate Technology) का अभाव है।
- मुख्य विशेषताएँ:
- हम जानते हैं कि ये उपयोगी हैं, लेकिन हमें यह नहीं पता कि उन्हें कैसे निकालें या उपयोग करें।
- प्रौद्योगिकी के विकास के साथ, भंडार विकसित संसाधन बन सकते हैं।
- उदाहरण:
- पानी (H₂O) से ऊर्जा: पानी दो ज्वलनशील गैसों, हाइड्रोजन (H) और ऑक्सीजन (O), का यौगिक है। हाइड्रोजन ऊर्जा का एक विशाल और स्वच्छ स्रोत हो सकता है। हम जानते हैं कि यह मौजूद है, लेकिन हमारे पास इसे सस्ते और प्रभावी ढंग से ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग करने की उन्नत तकनीक अभी तक नहीं है। इसलिए, यह एक ‘भंडार’ है। [यह UPSC की परीक्षाओं के लिए एक क्लासिक उदाहरण है।]
4. संचित कोष (Reserves)
- परिभाषा: ये भंडार (Stock) का ही एक हिस्सा हैं, जिन्हें मौजूदा तकनीकी ज्ञान की मदद से भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए निकाला जा सकता है, लेकिन वर्तमान में इनका उपयोग शुरू नहीं किया गया है या बहुत सीमित मात्रा में किया जा रहा है। इन्हें भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखा गया है।
- मुख्य विशेषताएँ:
- इनके उपयोग की तकनीक हमें पता है।
- ये भविष्य के लिए हमारी “पूंजी” या “बचत” हैं।
- उदाहरण:
- बांधों में जल: नदियों के बांधों में जमा पानी एक संचित कोष है। हम इसका उपयोग बिजली बनाने के लिए कर सकते हैं, लेकिन इसे भविष्य की सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा जरूरतों के लिए भी बचाकर रखते हैं।
- वन संपदा: सरकार द्वारा संरक्षित वन भविष्य के लिए एक संचित कोष हैं।
भंडार और संचित कोष में अंतर (Difference between Stock and Reserves)
यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है:
- भंडार (Stock): तकनीक नहीं है, इसलिए उपयोग नहीं कर सकते।
- संचित कोष (Reserves): तकनीक है, लेकिन भविष्य के लिए बचाकर रखा है, इसलिए उपयोग नहीं कर रहे हैं।
सभी संचित कोष (Reserves) भंडार (Stock) का हिस्सा होते हैं, लेकिन सभी भंडार संचित कोष नहीं होते।
सतत विकास (Sustainable Development): परीक्षा की दृष्टि से
सतत विकास, जिसे सतत पोषणीय विकास या धारणीय विकास भी कहा जाता है, विकास की एक ऐसी अवधारणा है जो आज के समय में वैश्विक स्तर पर योजना और नीति-निर्माण का केंद्र बिंदु बन चुकी है। यह केवल एक पर्यावरणीय अवधारणा नहीं है, बल्कि विकास का एक समग्र दृष्टिकोण है।
परिभाषा: ब्रंटलैंड आयोग (The Brundtland Commission Definition)
सतत विकास की सबसे प्रामाणिक और विश्व स्तर पर स्वीकृत परिभाषा 1987 में ब्रंटलैंड आयोग (Brundtland Commission) द्वारा अपनी रिपोर्ट “हमारा साझा भविष्य” (Our Common Future) में दी गई थी।
“सतत विकास का अर्थ है, ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना, वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करता है।”
(“Sustainable development is development that meets the needs of the present without compromising the ability of future generations to meet their own needs.”)
मुख्य अवधारणा (Core Concept)
इस परिभाषा का सार दो मुख्य विचारों में निहित है:
- वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ: विकास का प्राथमिक लक्ष्य गरीबी को दूर करना और सभी लोगों के लिए एक बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित करना है।
- भविष्य की पीढ़ियों का अधिकार: हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों (जैसे जल, जंगल, खनिज, स्वच्छ वायु) का उपयोग इस प्रकार बुद्धिमानी से करना चाहिए कि हमारी ज़रूरतें भी पूरी हों और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ये संसाधन बचे रहें। हमें उन्हें एक प्रदूषित और संसाधनों से विहीन ग्रह विरासत में नहीं देना है।
सतत विकास के तीन स्तंभ (The Three Pillars of Sustainable Development)
सतत विकास की अवधारणा तीन मुख्य स्तंभों पर टिकी है, जिनके बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है:
| स्तंभ (Pillar) | विवरण |
| 1. पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability) | प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, प्रदूषण पर नियंत्रण, जैव-विविधता की रक्षा, और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना। |
| 2. आर्थिक स्थिरता (Economic Sustainability) | ऐसा आर्थिक विकास जो सभी को लाभ पहुँचाए और जो दीर्घकाल तक टिकाऊ हो, बिना प्राकृतिक पूंजी को नष्ट किए। |
| 3. सामाजिक स्थिरता (Social Sustainability) | सामाजिक न्याय और समानता सुनिश्चित करना, सभी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, और बेहतर जीवन की गुणवत्ता प्रदान करना, तथा सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना। |
वैश्विक प्रयास: MDGs और SDGs (Global Efforts: MDGs and SDGs)
सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वैश्विक स्तर पर दो महत्वपूर्ण पहलें की गई हैं:
- सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (Millennium Development Goals – MDGs):
- अवधि: 2000 – 2015
- लक्ष्य: इसमें 8 लक्ष्य थे, जो मुख्य रूप से विकासशील देशों में गरीबी, भुखमरी, बीमारी, अशिक्षा और लैंगिक असमानता को कम करने पर केंद्रित थे।
- सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals – SDGs):
- अवधि: 2015 – 2030
- अवधारणा: MDGs की समाप्ति के बाद, संयुक्त राष्ट्र ने 2015 में “एजेंडा 2030” के हिस्से के रूप में 17 लक्ष्य (Goals) और 169 प्रयोजन (Targets) अपनाए।
- मुख्य अंतर: SDGs सार्वभौमिक हैं, यानी ये विकसित और विकासशील, सभी देशों पर लागू होते हैं। इनका दायरा बहुत व्यापक है, जिसमें जलवायु परिवर्तन, सतत उपभोग, नवाचार और शांति जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।
17 सतत विकास लक्ष्य (The 17 SDGs)
- शून्य गरीबी (No Poverty)
- शून्य भुखमरी (Zero Hunger)
- अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण (Good Health and Well-being)
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (Quality Education)
- लैंगिक समानता (Gender Equality)
- स्वच्छ जल और स्वच्छता (Clean Water and Sanitation)
- सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा (Affordable and Clean Energy)
- उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक विकास (Decent Work and Economic Growth)
- उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढाँचा (Industry, Innovation and Infrastructure)
- असमानताओं में कमी (Reduced Inequalities)
- सतत शहर और समुदाय (Sustainable Cities and Communities)
- सतत उपभोग और उत्पादन (Responsible Consumption and Production)
- जलवायु कार्रवाई (Climate Action)
- जलीय जीवन (Life Below Water)
- स्थलीय जीवन (Life on Land)
- शांति, न्याय और मजबूत संस्थान (Peace, Justice and Strong Institutions)
- लक्ष्यों के लिए भागीदारी (Partnerships for the Goals)
(UPSC की परीक्षाओं में इन लक्ष्यों की सीधी संख्या, अवधि और कुछ प्रमुख लक्ष्यों के बारे में पूछा जाता है।)
भारत और सतत विकास
- नोडल एजेंसी: भारत में, सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के कार्यान्वयन, समन्वय और निगरानी की ज़िम्मेदारी नीति आयोग (NITI Aayog) को सौंपी गई है। [UPSC Prelims]
- एसडीजी इंडिया इंडेक्स (SDG India Index): नीति आयोग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा SDGs में की गई प्रगति को मापने के लिए “एसडीजी इंडिया इंडेक्स” जारी करता है।
- सरकारी योजनाएँ: भारत की कई प्रमुख योजनाएँ सीधे तौर पर SDGs से जुड़ी हैं, जैसे:
- स्वच्छ भारत मिशन (SDG 6 – स्वच्छ जल और स्वच्छता)
- उज्ज्वला योजना (SDG 7 – स्वच्छ ऊर्जा)
- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (SDG 5 – लैंगिक समानता)
- राष्ट्रीय सौर मिशन (SDG 13 – जलवायु कार्रवाई)
निष्कर्ष: सतत विकास एक भविष्योन्मुखी और समावेशी विकास मॉडल है जो यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि आर्थिक प्रगति सामाजिक कल्याण और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की कीमत पर न हो। यह आज की दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों (जैसे जलवायु परिवर्तन, असमानता, और संसाधन क्षरण) का एक व्यापक समाधान प्रस्तुत करता है।
संसाधन संरक्षण: अवधारणा, आवश्यकता और वैश्विक प्रयास (Resource Conservation: Concept, Need, and Global Efforts)
1. अवधारणा (Concept)
संसाधन संरक्षण (Resource Conservation) का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों का सतर्कतापूर्ण, बुद्धिमानी से और योजनाबद्ध तरीके से उपयोग करना ताकि उनकी बर्बादी को रोका जा सके, उनकी गुणवत्ता को बनाए रखा जा सके, और उन्हें भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी उपलब्ध कराया जा सके।
यह संरक्षण का “उपयोग न करने” (Non-use) का सिद्धांत नहीं है, बल्कि “विवेकपूर्ण उपयोग” (Wise Use) का सिद्धांत है। इसका उद्देश्य विकास को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विकास सतत (Sustainable) तरीके से हो।
प्रसिद्ध कथन:
गांधीजी ने कहा था, “पृथ्वी पर हर किसी की जरूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन किसी एक के लालच के लिए नहीं।” (“The Earth has enough for everyone’s need, but not for anyone’s greed.”) यह कथन संसाधन संरक्षण के मूल सार को दर्शाता है।
2. आवश्यकता (Need for Conservation)
संसाधन संरक्षण आज की दुनिया में एक अनिवार्यता बन चुका है, जिसके कई कारण हैं:
| आवश्यकता का कारण | विवरण |
| सीमित संसाधन (Limited Resources) | अधिकांश महत्वपूर्ण संसाधन, जैसे जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) और खनिज, अनवीकरणीय (Non-renewable) हैं। उनका भंडार सीमित है और यदि हम उनका तेजी से उपयोग करते रहे तो वे भविष्य में समाप्त हो जाएंगे। |
| बढ़ती जनसंख्या (Growing Population) | विश्व की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे भोजन, ऊर्जा, जल और आवास जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। |
| अत्यधिक उपभोग (Over-consumption) | विकसित और विकासशील देशों में बढ़ती उपभोक्तावादी जीवनशैली के कारण संसाधनों का अत्यधिक और अविवेकपूर्ण दोहन हो रहा है, जिससे संसाधनों की कमी और बर्बादी हो रही है। |
| पर्यावरणीय निम्नीकरण (Environmental Degradation) | संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जैसे वनों की कटाई, मृदा अपरदन, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जैव-विविधता का ह्रास और जलवायु परिवर्तन। |
| सतत विकास के लिए (For Sustainable Development) | भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करने और उनके लिए एक स्वस्थ और संसाधन-संपन्न ग्रह छोड़ने के लिए, हमें वर्तमान में संसाधनों का संरक्षण करना होगा। यही सतत विकास की मूल अवधारणा है। |
| आर्थिक विकास बनाए रखने के लिए | उद्योग, कृषि और अन्य आर्थिक गतिविधियाँ सीधे तौर पर संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करती हैं। संसाधनों की कमी आर्थिक विकास को बाधित कर सकती है। |
3. संसाधन संरक्षण के उपाय (Methods of Conservation)
संसाधन संरक्षण के लिए “3-R” का सिद्धांत सबसे प्रसिद्ध है, जिसे अब “5-R” तक विस्तारित किया गया है:
- Refuse (इनकार करें): उन वस्तुओं को खरीदने से मना करें जिनकी आपको आवश्यकता नहीं है, जैसे एकल-उपयोग प्लास्टिक।
- Reduce (कम उपयोग करें): अपनी खपत को कम करें, जैसे बिजली बंद करना, पानी की बचत करना।
- Reuse (पुनः उपयोग करें): वस्तुओं को फेंकने के बजाय उनका बार-बार उपयोग करें, जैसे कपड़े के थैले का उपयोग करना, कांच के जार का भंडारण के लिए उपयोग करना।
- Repurpose/Upcycle (पुनः प्रयोजन): किसी वस्तु को एक नए उद्देश्य के लिए उपयोग करना।
- Recycle (पुनर्चक्रण): पुरानी वस्तुओं (कागज, प्लास्टिक, धातु, कांच) को पिघलाकर या संसाधित करके नई वस्तुएं बनाना।
अन्य उपाय:
- नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन) का अधिक उपयोग करना।
- वर्षा जल संचयन और जल का उचित प्रबंधन।
- वनरोपण और सतत वानिकी को बढ़ावा देना।
- खनिजों के विकल्पों की खोज और प्रौद्योगिकी में सुधार।
- सतत कृषि पद्धतियों को अपनाना।
4. वैश्विक प्रयास (Global Efforts)
संसाधनों के संरक्षण और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं:
| प्रयास / सम्मेलन / संगठन | वर्ष | मुख्य उद्देश्य / विशेषताएँ (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण) |
| क्लब ऑफ रोम (Club of Rome) | 1968 | पहली बार व्यवस्थित तरीके से संसाधन संरक्षण की वकालत की। इसकी पुस्तक “लिमिट्स टू ग्रोथ” (1972) ने दुनिया का ध्यान संसाधनों की कमी की ओर आकर्षित किया। |
| स्टॉकहोम सम्मेलन (Stockholm Conference) | 1972 | “मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन”। इसे पर्यावरण पर पहला बड़ा वैश्विक सम्मेलन माना जाता है। इसी सम्मेलन के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की स्थापना हुई। 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। |
| ब्रंटलैंड आयोग (Brundtland Commission) | 1987 | इसकी रिपोर्ट “हमारा साझा भविष्य” (Our Common Future) ने “सतत विकास” (Sustainable Development) की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया और इसकी परिभाषा दी। |
| पृथ्वी शिखर सम्मेलन (Earth Summit), रियो डी जनेरियो | 1992 | “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” (UNCED)। इसमें तीन प्रमुख दस्तावेज सामने आए: <br>1. एजेंडा 21 (Agenda 21) – सतत विकास के लिए एक वैश्विक कार्य योजना। <br>2. रियो घोषणा (Rio Declaration) – पर्यावरण और विकास पर। <br>3. वन सिद्धांत (Forest Principles)। इसी सम्मेलन से UNFCCC (जलवायु परिवर्तन) और CBD (जैव-विविधता) जैसे सम्मेलनों का जन्म हुआ। |
| क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol) | 1997 | UNFCCC के तहत एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता, जिसमें विकसित देशों के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। |
| जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन (Johannesburg Summit) | 2002 | सतत विकास पर विश्व शिखर सम्मेलन। इसने MDGs (सहस्राब्दी विकास लक्ष्य) को प्राप्त करने पर जोर दिया। |
| पेरिस समझौता (Paris Agreement) | 2015 | UNFCCC के तहत एक ऐतिहासिक समझौता। इसका मुख्य लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2°C से काफी नीचे रखना और 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास करना है। |
| सतत विकास लक्ष्य (SDGs) | 2015 | 2015-2030 की अवधि के लिए 17 वैश्विक लक्ष्यों का एक सेट, जो सतत विकास के तीनों स्तंभों को संबोधित करता है। |
ऊर्जा संसाधन (Energy Resources): परीक्षा की दृष्टि से
ऊर्जा संसाधन किसी भी देश के आर्थिक विकास, औद्योगिक प्रगति और मानव जीवन स्तर की रीढ़ होते हैं। ये वे संसाधन हैं जिनका उपयोग ऊष्मा उत्पन्न करने, प्रकाश करने, मशीनों को चलाने और परिवहन के लिए किया जाता है। ऊर्जा संसाधनों को मुख्य रूप से उनकी नवीकरणीयता के आधार पर दो प्रमुख श्रेणियों में बांटा जाता है:
- अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन (परंपरागत स्रोत)
- नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन (गैर-परंपरागत स्रोत)
1. अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन (Non-Renewable Energy Resources) – परंपरागत स्रोत
अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन वे ऊर्जा स्रोत हैं जिनका भंडार पृथ्वी पर सीमित है और जिनका निर्माण एक अत्यंत धीमी भूवैज्ञानिक प्रक्रिया के माध्यम से लाखों वर्षों में हुआ है। एक बार इनका उपयोग कर लेने के बाद, इन्हें मानवीय जीवनकाल में पुनः उत्पन्न या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। इन्हें समाप्य (Exhaustible) संसाधन भी कहा जाता है।
ये संसाधन ऐतिहासिक रूप से औद्योगिक क्रांति के बाद से ऊर्जा के मुख्य स्रोत रहे हैं, इसलिए इन्हें परंपरागत ऊर्जा स्रोत (Conventional Sources of Energy) भी कहा जाता है।
A. कोयला (Coal): परीक्षा की दृष्टि से
कोयला एक ठोस, काला या भूरे-काले रंग का, ज्वलनशील अवसादी चट्टान है, जिसका निर्माण लाखों वर्षों पहले पृथ्वी के दलदली क्षेत्रों में दबे हुए पेड़-पौधों के अवशेषों से हुआ है। यह दुनिया का सबसे प्रचुर जीवाश्म ईंधन है और औद्योगिक क्रांति का आधार रहा है। इसे “उद्योगों की जननी” और “दफन धूप” (Buried Sunshine) जैसे उपनामों से भी जाना जाता है।
कोयले का निर्माण: कार्बनीकरण (Coalification)
- प्रारंभिक चरण: लाखों वर्ष पहले, दलदली क्षेत्रों में घने जंगल थे। जब ये पेड़-पौधे मरकर पानी में गिरे, तो ऑक्सीजन की कमी के कारण वे पूरी तरह से सड़ नहीं पाए।
- पीट का निर्माण: धीरे-धीरे इन जैविक अवशेषों पर मिट्टी और तलछट की परतें जमती गईं। दबाव और गर्मी के कारण यह पदार्थ संकुचित होकर पीट (Peat) में बदल गया, जो कोयला निर्माण का सबसे प्रारंभिक चरण है।
- लिग्नाइट से एन्थ्रेसाइट तक: समय के साथ, और अधिक दबाव और तापमान के कारण, पीट से नमी और अन्य वाष्पशील पदार्थ बाहर निकल गए और कार्बन की सांद्रता बढ़ती गई, जिससे यह क्रमशः लिग्नाइट (Lignite), बिटुमिनस (Bituminous), और अंत में एन्थ्रेसाइट (Anthracite) में परिवर्तित हो गया। इस पूरी प्रक्रिया को कार्बनीकरण (Carbonification) कहते हैं।
कोयले के प्रकार: गुणवत्ता का वर्गीकरण
कोयले का वर्गीकरण उसमें मौजूद कार्बन की मात्रा, नमी, वाष्पशील पदार्थ और ऊष्मा उत्पन्न करने की क्षमता (कैलोरिफिक मान) के आधार पर किया जाता है। उच्च कार्बन और कम नमी वाला कोयला सर्वोत्तम गुणवत्ता का माना जाता है।
| प्रकार | कार्बन की मात्रा (%) | विशेषताएँ (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण) |
| 1. एन्थ्रेसाइट (Anthracite) | >85% (अक्सर 90-95%) | सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता वाला कोयला (Best Quality Coal)। यह सबसे कठोर, घना और चमकदार होता है। यह जलते समय सबसे कम धुआँ और राख छोड़ता है और सर्वाधिक ऊष्मा प्रदान करता है। इसका उपयोग घरेलू हीटिंग और विशेष धातुकर्म प्रक्रियाओं में होता है। भारत में यह केवल जम्मू और कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। |
| 2. बिटुमिनस (Bituminous) | 60-80% | यह मध्यम गुणवत्ता का कोयला है, लेकिन यह विश्व में सबसे अधिक पाया जाने वाला और व्यावसायिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण कोयला है। इसका उपयोग मुख्य रूप से ताप विद्युत संयंत्रों में बिजली बनाने (Steam Coal) और लौह-इस्पात उद्योग (Coking Coal) में किया जाता है। भारत का अधिकांश कोयला (गोंडवाना कोयला) इसी श्रेणी का है। |
| 3. लिग्नाइट (Lignite) | 40-55% | यह निम्न गुणवत्ता का कोयला है, जिसे इसके भूरे रंग के कारण “भूरा कोयला” (Brown Coal) भी कहा जाता है। इसमें नमी की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह जलने पर अधिक धुआँ देता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन में किया जाता है। भारत में इसके विशाल भंडार तमिलनाडु (नेयवेली), राजस्थान और गुजरात में पाए जाते हैं। |
| 4. पीट (Peat) | < 40% | यह कोयला निर्माण की प्रारंभिक अवस्था है। इसमें बहुत अधिक नमी और अशुद्धियाँ होती हैं और यह जलने पर बहुत धुआँ और राख पैदा करता है, जबकि ऊष्मा बहुत कम देता है। इसे एक कुशल ईंधन नहीं माना जाता है। |
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Global Distribution and Production)
- प्रमुख भंडार वाले देश: संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, ऑस्ट्रेलिया, भारत।
- प्रमुख उत्पादक देश (2023 के आंकड़ों के अनुसार):
- चीन: दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता (विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 50%)।
- भारत: दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता।
- इंडोनेशिया: दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक।
- संयुक्त राज्य अमेरिका
- ऑस्ट्रेलिया
भारत में कोयला
- कोयले के प्रकार: भारत में कोयले के भंडार दो मुख्य भूवैज्ञानिक युगों के हैं:
- गोंडवाना कोयला (लगभग 20 करोड़ वर्ष पुराना): यह भारत के लगभग 98% कोयला भंडार का निर्माण करता है। यह उच्च गुणवत्ता (मुख्यतः बिटुमिनस) का है और दामोदर, महानदी, सोन और गोदावरी नदी घाटियों में पाया जाता है। [प्रमुख राज्य: झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश]।
- टर्शियरी कोयला (लगभग 5.5 करोड़ वर्ष पुराना): यह निम्न गुणवत्ता (मुख्यतः लिग्नाइट) का कोयला है और पूर्वोत्तर राज्यों (असम, मेघालय), तमिलनाडु, राजस्थान और गुजरात में पाया जाता है।
- भारत का कोयला हब: छोटा नागपुर पठार को भारत का “खनिज हृदय स्थल” कहा जाता है, जहाँ विशाल कोयला भंडार हैं। झरिया (झारखंड) भारत की सबसे बड़ी कोयला खदान है। रानीगंज (पश्चिम बंगाल) भारत की पहली कोयला खदान थी।
कोयले से जुड़ी पर्यावरणीय समस्याएँ
- वायु प्रदूषण: जलने पर यह कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂, एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस), सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂, अम्लीय वर्षा का कारण), नाइट्रोजन ऑक्साइड और कालिख (Soot) छोड़ता है।
- खनन का प्रभाव: खनन से वनों की कटाई, मृदा अपरदन, और जल संसाधनों का प्रदूषण होता है।
- फ्लाई ऐश (Fly Ash): ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राख एक प्रमुख प्रदूषक है, हालांकि अब इसका उपयोग सीमेंट, ईंट और सड़क निर्माण में किया जा रहा है।
B. पेट्रोलियम (Petroleum) / कच्चा तेल (Crude Oil): परीक्षा की दृष्टि से
पेट्रोलियम, जिसका शाब्दिक अर्थ “चट्टानी तेल” (Rock Oil; Petra = Rock, Oleum = Oil) है, एक गाढ़ा, ज्वलनशील, गहरे भूरे या हरे रंग का तरल है जो पृथ्वी की सतह के नीचे अवसादी चट्टानों की परतों के बीच पाया जाता है। आधुनिक सभ्यता की ऊर्जा आवश्यकताओं और परिवहन प्रणाली का यह आधार है, जिसके कारण इसे इसके अत्यधिक आर्थिक महत्व के लिए “तरल सोना” (Liquid Gold) भी कहा जाता है।
पेट्रोलियम का निर्माण (Formation of Petroleum)
- उत्पत्ति: पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का निर्माण लाखों वर्ष पहले समुद्रों और झीलों में रहने वाले छोटे समुद्री पौधों और जानवरों (मुख्य रूप से प्लैंकटन – Plankton) के अवशेषों से हुआ है।
- दबाव की प्रक्रिया: जब ये जीव मरे, तो वे समुद्र तल पर जाकर जमा हो गए। समय के साथ, उन पर रेत, गाद और चट्टानों की परतें जमती गईं।
- ताप और दाब का प्रभाव: इन परतों के भारी दबाव और पृथ्वी के आंतरिक भाग की गर्मी के कारण, इन जैविक अवशेषों में रासायनिक परिवर्तन हुए। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में, ये धीरे-धीरे एक गाढ़े, कार्बन-समृद्ध तरल और गैस में परिवर्तित हो गए, जिसे हम आज कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस कहते हैं।
- प्रवासन और संचयन (Migration and Trapping): बनने के बाद, तेल और गैस हल्के होने के कारण ऊपर की ओर सरंध्र (Porous) चट्टानों (जैसे बलुआ पत्थर, चूना पत्थर) से होकर प्रवास करते हैं। अंततः, वे एक गैर-सरंध्र (Impermeable) चट्टान (जैसे शेल या नमक के गुंबद) की परत के नीचे आकर फँस (trap) जाते हैं, जिससे एक तेल भंडार (Oil Reservoir) का निर्माण होता है।
पेट्रोलियम का निष्कर्षण और परिष्करण (Extraction and Refining)
- निष्कर्षण (Extraction): तेल भंडारों तक विशाल ड्रिलिंग मशीनों द्वारा कुएँ खोदकर तेल निकाला जाता है। यह अपतटीय (Offshore) यानी समुद्र तल से और स्थलीय (Onshore) यानी भूमि से दोनों तरीकों से किया जाता है।
- परिष्करण (Refining): कच्चा तेल सीधे उपयोग के योग्य नहीं होता है। इसे रिफाइनरियों में ले जाकर प्रभाजी आसवन (Fractional Distillation) नामक प्रक्रिया द्वारा गर्म किया जाता है। अलग-अलग क्वथनांक (Boiling Points) के आधार पर इससे विभिन्न उपयोगी उत्पाद (by-products) अलग किए जाते हैं।
प्रमुख उत्पाद:
| उत्पाद | उपयोग |
| :— | :— |
| LPG (तरलीकृत पेट्रोलियम गैस) | घरेलू ईंधन |
| पेट्रोल (Gasoline/Petrol) | हल्के वाहनों (कारों, मोटरसाइकिलों) में ईंधन |
| नैफ्था (Naphtha) | उर्वरक और पेट्रोकेमिकल उद्योग में कच्चा माल |
| केरोसिन (मिट्टी का तेल)| विमानन टरबाइन ईंधन (ATF), घरेलू ईंधन |
| डीजल | भारी वाहनों (ट्रकों, बसों, ट्रेनों) और जनरेटरों में ईंधन |
| स्नेहक तेल (Lubricating Oil)| मशीनरी में घर्षण कम करने के लिए |
| बिटुमेन/डामर (Bitumen/Asphalt)| सड़क निर्माण, छतों की वाटरप्रूफिंग |
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Global Distribution and Production)
- प्रमुख भंडार वाले देश: वेनेजुएला के पास विश्व का सबसे बड़ा ज्ञात तेल भंडार है, इसके बाद सऊदी अरब, कनाडा, ईरान और इराक आते हैं।
- प्रमुख उत्पादक देश (2023 के आंकड़ों के अनुसार):
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): शेल तेल क्रांति (Shale Oil Revolution) के कारण दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक।
- रूस (Russia)
- सऊदी अरब (Saudi Arabia): OPEC का सबसे प्रभावशाली सदस्य।
- कनाडा (Canada)
- इराक (Iraq)
- OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries): यह पेट्रोलियम निर्यातक देशों का एक संगठन है, जिसकी स्थापना 1960 में हुई थी। यह वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। इसका मुख्यालय वियना, ऑस्ट्रिया में है।
भारत में पेट्रोलियम
- पहला तेल क्षेत्र: भारत और एशिया में पहला तेल का कुआँ डिगबोई, असम (1889) में खोदा गया था। [SSC, RRB]
- प्रमुख उत्पादन क्षेत्र:
- पश्चिमी अपतट (Western Offshore): यह भारत के कुल उत्पादन का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसमें मुंबई हाई (सबसे बड़ा क्षेत्र), बसीन और आलियाबेट शामिल हैं।
- असम-अराकान बेसिन (स्थलीय): इसमें डिगबोई, नहरकटिया, मोरन-हुगरीजन जैसे पुराने क्षेत्र शामिल हैं।
- गुजरात के मैदान (स्थलीय): अंकलेश्वर (सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र), खंभात, मेहसाणा।
- पूर्वी अपतट (Eastern Offshore): कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन, जो प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार के लिए भी प्रसिद्ध है।
- अन्य: राजस्थान (बाड़मेर), कावेरी बेसिन।
- आयात पर निर्भरता: भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का 85% से अधिक आयात करता है, जिससे यह वैश्विक तेल कीमतों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
पेट्रोलियम से जुड़ी पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक समस्याएँ
- वायु प्रदूषण: वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले धुएँ से स्मॉग और श्वसन संबंधी बीमारियाँ होती हैं।
- तेल रिसाव (Oil Spills): तेल टैंकरों से समुद्र में तेल का रिसाव समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विनाशकारी होता है।
- ग्लोबल वार्मिंग: इसके दहन से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) निकलती है।
- भू-राजनीतिक अस्थिरता: मध्य-पूर्व जैसे तेल-समृद्ध क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए वैश्विक शक्तियों के बीच तनाव और संघर्ष का यह एक प्रमुख कारण रहा है।
C. प्राकृतिक गैस (Natural Gas): परीक्षा की दृष्टि से
प्राकृतिक गैस हाइड्रोकार्बन गैसों का एक प्राकृतिक मिश्रण है जो पृथ्वी के नीचे पेट्रोलियम भंडारों के साथ या अकेले पाई जाती है। इसमें मुख्य रूप से मीथेन (Methane, CH₄) होती है, साथ ही थोड़ी मात्रा में इथेन, प्रोपेन और ब्यूटेन भी हो सकती है। अपनी स्वच्छ दहन प्रकृति के कारण, इसे जीवाश्म ईंधनों में सबसे स्वच्छ (Cleanest of the Fossil Fuels) माना जाता है और यह ऊर्जा के स्रोत के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
निर्माण और गुण (Formation and Properties)
- निर्माण: इसका निर्माण भी पेट्रोलियम की तरह ही लाखों साल पहले दबे हुए समुद्री जीवों और पौधों के अवशेषों से, अत्यधिक ताप और दाब के कारण होता है। यह अक्सर तेल भंडारों के ऊपर गैस के एक गुंबद के रूप में पाई जाती है।
- प्रमुख गुण: यह रंगहीन, गंधहीन और हवा से हल्की होती है। इसमें मिलाई जाने वाली तीव्र गंध (Mercaptan) सुरक्षा कारणों से डाली जाती है ताकि रिसाव का पता चल सके।
प्राकृतिक गैस के प्रकार (Types of Natural Gas)
यह खंड परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासकर अपरंपरागत गैस के प्रकार।
1. परंपरागत प्राकृतिक गैस (Conventional Natural Gas)
- यह सरंध्र (Porous) और पारगम्य (Permeable) चट्टानों (जैसे बलुआ पत्थर) में फंसी होती है, जहाँ से इसे पारंपरिक ड्रिलिंग तकनीकों द्वारा आसानी से निकाला जा सकता है।
2. अपरंपरागत प्राकृतिक गैस (Unconventional Natural Gas)
- यह कम पारगम्यता वाली चट्टानों में फंसी होती है, जिसे निकालने के लिए विशेष और उन्नत तकनीकों की आवश्यकता होती है।
- A. शेल गैस (Shale Gas):
- यह शेल (Shale) नामक अवसादी चट्टान की परतों के भीतर फंसी होती है।
- निष्कर्षण तकनीक: इसे हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग या फ्रैकिंग (Hydraulic Fracturing or Fracking) नामक तकनीक से निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में, पानी, रेत और रसायनों के एक उच्च दबाव वाले मिश्रण को चट्टान में इंजेक्ट किया जाता है ताकि चट्टान में दरारें बन जाएं और गैस बाहर निकल सके। [UPSC, CDS]
- महत्व: फ्रैकिंग तकनीक ने संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में एक ऊर्जा क्रांति ला दी है, जिससे वह दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस उत्पादक बन गया है।
- B. कोल-बेड मीथेन (Coal-Bed Methane – CBM):
- यह कोयले की परतों (Coal Seams) में फंसी हुई मीथेन गैस है।
- महत्व: भारत के पास CBM के महत्वपूर्ण भंडार हैं। यह कोयला खदानों में सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मीथेन एक विस्फोटक गैस है।
- भारत में क्षेत्र: दामोदर घाटी (रानीगंज, झरिया), सोन घाटी।
परिवहन और उपयोग (Transportation and Uses)
प्राकृतिक गैस का उपयोग कई रूपों में किया जाता है:
- पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG): पाइपलाइनों के माध्यम से सीधे घरों और उद्योगों तक पहुंचाई जाने वाली गैस, जिसका उपयोग खाना पकाने और हीटिंग के लिए होता है।
- संपीड़ित प्राकृतिक गैस (CNG – Compressed Natural Gas): गैस को उच्च दबाव में संपीड़ित करके वाहनों में ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है। यह पेट्रोल और डीजल की तुलना में सस्ता और कम प्रदूषणकारी है।
- तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG – Liquefied Natural Gas):
- यह लंबी समुद्री दूरियों तक परिवहन के लिए गैस को -162°C तक ठंडा करके तरल अवस्था में बदलने की प्रक्रिया है। [State PSC, SSC]
- तरल अवस्था में इसका आयतन गैस अवस्था की तुलना में 600 गुना कम हो जाता है, जिससे इसे विशेष टैंकरों में परिवहन करना आसान हो जाता है।
- प्रमुख LNG निर्यातक देश: कतर, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका।
वैश्विक वितरण और उत्पादन
- प्रमुख भंडार वाले देश: रूस के पास विश्व का सबसे बड़ा ज्ञात भंडार है, इसके बाद ईरान और कतर आते हैं। (ईरान और कतर फारस की खाड़ी में दुनिया के सबसे बड़े गैस क्षेत्र – साउथ पार्स/नॉर्थ डोम – को साझा करते हैं)।
- प्रमुख उत्पादक देश:
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
- रूस
- ईरान
- चीन
भारत में प्राकृतिक गैस
- प्रमुख उत्पादन क्षेत्र:
- पश्चिमी अपतट: मुंबई हाई और बसीन क्षेत्र (सबसे बड़ा उत्पादक)।
- पूर्वी अपतट: कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन, विशेषकर धीरूभाई-6 (D6) ब्लॉक, गैस के विशाल भंडार के लिए प्रसिद्ध है।
- स्थलीय क्षेत्र: असम, त्रिपुरा, गुजरात, राजस्थान (बाड़मेर)।
- भारत की नीति: भारत सरकार अपनी कुल ऊर्जा खपत में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को वर्तमान के ~6% से बढ़ाकर 2030 तक 15% करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके लिए “वन नेशन, वन गैस ग्रिड” जैसी पहलें की जा रही हैं।
लाभ और हानियाँ
| लाभ | हानियाँ |
| सबसे स्वच्छ जीवाश्म ईंधन: कोयले और तेल की तुलना में बहुत कम CO₂ और प्रदूषक उत्सर्जित करता है। | यह अभी भी एक जीवाश्म ईंधन है और CO₂ उत्सर्जित करता है। |
| बहुमुखी उपयोग: बिजली, उद्योग, परिवहन और घरेलू उपयोग में। | मीथेन (CH₄) का रिसाव एक बड़ी चिंता है, क्योंकि यह CO₂ की तुलना में एक अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। |
| “ब्रिज फ्यूल”: इसे उच्च-कार्बन वाले जीवाश्म ईंधन से पूर्णतः नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के दौरान एक “सेतु ईंधन” (Bridge Fuel) माना जाता है। | फ्रैकिंग जैसी तकनीकों से भूजल संदूषण और छोटे भूकंपों का खतरा होता है। |
| परिवहन और भंडारण कोयले की तुलना में आसान है। | LNG टर्मिनल स्थापित करना बहुत महंगा है और इसका परिवहन भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है। |
D. परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy): परीक्षा की दृष्टि से
परमाणु ऊर्जा, जिसे नाभिकीय ऊर्जा भी कहा जाता है, परमाणुओं के नाभिक (Nucleus) में संग्रहीत ऊर्जा का उपयोग करके उत्पन्न की जाती है। हालांकि यह एक जीवाश्म ईंधन नहीं है, लेकिन इसके लिए उपयोग होने वाला ईंधन (यूरेनियम, थोरियम) एक सीमित और अनवीकरणीय (Non-renewable) खनिज संसाधन है, इसलिए इसे इसी श्रेणी में पढ़ा जाता है।
यह ऊर्जा उत्पादन की एक अत्यधिक शक्तिशाली और जटिल तकनीक है, जिसके फायदे और नुकसान दोनों ही बहुत बड़े हैं।
ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया: नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission)
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में बिजली बनाने के लिए मुख्य रूप से नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया का उपयोग होता है:
- प्रक्रिया: इसमें एक भारी परमाणु के नाभिक (जैसे यूरेनियम-235) पर न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है।
- नाभिक का टूटना: इस टकराव से भारी नाभिक लगभग दो बराबर, छोटे नाभिकों में टूट जाता है।
- ऊर्जा का उत्सर्जन: इस प्रक्रिया में, द्रव्यमान की एक छोटी सी मात्रा ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है (आइंस्टीन के समीकरण E=mc² के अनुसार), जिससे भारी मात्रा में ऊष्मा (Heat) और अतिरिक्त न्यूट्रॉन निकलते हैं।
- श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction): मुक्त हुए ये अतिरिक्त न्यूट्रॉन आगे अन्य यूरेनियम-235 नाभिकों से टकराते हैं, जिससे यह प्रक्रिया एक नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया (Controlled Chain Reaction) के रूप में जारी रहती है। [UPSC, SSC CGL]
- बिजली का उत्पादन: इस प्रक्रिया से उत्पन्न भारी ऊष्मा का उपयोग पानी को उच्च दबाव वाली भाप में बदलने के लिए किया जाता है। यह भाप टरबाइन (Turbine) को घुमाती है, जो जनरेटर (Generator) से जुड़ा होता है और बिजली पैदा करता है।
नोट: सूर्य में ऊर्जा नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) से उत्पन्न होती है, जिसमें हल्के नाभिक जुड़कर भारी नाभिक बनाते हैं। यह विखंडन के विपरीत प्रक्रिया है।
परमाणु ऊर्जा का ईंधन (Fuel for Nuclear Energy)
| ईंधन | विवरण |
| यूरेनियम (Uranium) | * यह वर्तमान में परमाणु ऊर्जा का मुख्य ईंधन है।<br/>* प्राकृतिक यूरेनियम में दो मुख्य समस्थानिक (Isotopes) होते हैं: U-238 (99.3%) और U-235 (0.7%)।<br/>* केवल U-235 ही आसानी से विखंडित हो सकता है। इसलिए, ईंधन बनाने के लिए प्राकृतिक यूरेनियम को समृद्ध (Enrich) करके उसमें U-235 की मात्रा बढ़ाई जाती है।<br/>* प्रमुख भंडार: कजाकिस्तान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया। |
| थोरियम (Thorium) | * यह यूरेनियम से अधिक प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला रेडियोधर्मी तत्व है।<br/>* थोरियम स्वयं विखंडनीय नहीं है, लेकिन इसे एक रिएक्टर में न्यूट्रॉन बमबारी द्वारा विखंडनीय यूरेनियम-233 (U-233) में बदला जा सकता है।<br/>* भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा थोरियम भंडार है, जो मुख्य रूप से केरल की मोनाजाइट रेत (Monazite Sand) में पाया जाता है। [यह UPSC और State PSC की परीक्षाओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है।]<br/>* इसे भविष्य का परमाणु ईंधन माना जाता है, और भारत का त्रि-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम इसी पर आधारित है। |
लाभ और हानियाँ (Advantages and Disadvantages)
| लाभ (Advantages) | हानियाँ (Disadvantages) |
| शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: बिजली उत्पादन के दौरान CO₂ या अन्य ग्रीनहाउस गैसें नहीं निकलतीं। यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) स्रोत है। | रेडियोधर्मी कचरे का निपटान (Radioactive Waste Disposal): यह इसकी सबसे बड़ी और सबसे जटिल समस्या है। इस्तेमाल किए गए ईंधन की छड़ें हजारों वर्षों तक खतरनाक रूप से रेडियोधर्मी बनी रहती हैं, और उनके सुरक्षित भंडारण के लिए अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं मिला है। |
| अत्यधिक ऊर्जा घनत्व: ईंधन की एक बहुत छोटी मात्रा (कुछ किलोग्राम यूरेनियम) से भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो लाखों टन कोयले के बराबर हो सकती है। | परमाणु दुर्घटना का खतरा (Risk of Nuclear Accidents): एक छोटी सी गलती या प्राकृतिक आपदा के कारण रिएक्टर में रिसाव हो सकता है, जिसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। उदाहरण: चेरनोबिल, यूक्रेन (1986) और फुकुशिमा, जापान (2011)। |
| विश्वसनीय ऊर्जा स्रोत: यह सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, मौसम पर निर्भर नहीं है और 24×7 निरंतर बिजली (Base Load Power) प्रदान कर सकता है। | उच्च प्रारंभिक और decommissioning लागत: परमाणु संयंत्रों का निर्माण करना और उनकी जीवन अवधि समाप्त होने पर उन्हें सुरक्षित रूप से बंद करना (Decommissioning) दोनों ही अत्यधिक महंगे हैं। |
| कम भूमि की आवश्यकता: एक समान क्षमता के सौर या पवन फार्म की तुलना में एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र बहुत कम भूमि पर स्थापित किया जा सकता है। | सीमित ईंधन भंडार: यूरेनियम एक अनवीकरणीय संसाधन है। |
| ऊर्जा सुरक्षा: यह ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता को कम करता है। | परमाणु अप्रसार (Nuclear Proliferation): परमाणु ऊर्जा प्रौद्योगिकी और सामग्री का उपयोग परमाणु हथियार बनाने के लिए किए जाने का खतरा बना रहता है। |
भारत का परमाणु कार्यक्रम
- पितामह: डॉ. होमी जहांगीर भाभा को “भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक” कहा जाता है।
- त्रि-स्तरीय कार्यक्रम (Three-Stage Nuclear Program): यह भारत के यूरेनियम के सीमित भंडार और थोरियम के विशाल भंडार का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए डिज़ाइन किया गया एक दीर्घकालिक कार्यक्रम है। [UPSC Mains के लिए महत्वपूर्ण]
- नियामक संस्था: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (Atomic Energy Regulatory Board – AERB)।
- प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्र: तारापुर (महाराष्ट्र – भारत का पहला), रावतभाटा (राजस्थान), कलपक्कम (तमिलनाडु), नरौरा (उत्तर प्रदेश), काकरापार (गुजरात), कैगा (कर्नाटक), कुडनकुलम (तमिलनाडु – रूस के सहयोग से)।
भारत के प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्र: परीक्षा उपयोगी तथ्यों के साथ
यहाँ भारत के प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की सूची दी गई है, जिसमें उनकी स्थापना, क्षमता और परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य शामिल हैं।
| संयंत्र का नाम | राज्य | स्थापना वर्ष (पहली यूनिट) | क्षमता (मेगावाट) | परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य |
| तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र (TAPS) | महाराष्ट्र (पालघर जिला) | 1969 | 1,400 | * भारत का पहला वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा स्टेशन और सबसे पुराना रिएक्टर। [SSC, RRB, State PSC]<br/>* इसे संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के सहयोग से बनाया गया था।<br/>* शुरुआत में इसमें उबलते पानी रिएक्टर (BWR) थे। |
| रावतभाटा परमाणु ऊर्जा संयंत्र (RAPS)<br/>(इसे ‘राजस्थान परमाणु ऊर्जा स्टेशन’ भी कहते हैं) | राजस्थान (रावतभाटा, चित्तौड़गढ़) | 1973 | 1,180 | * इसे कनाडा के सहयोग से बनाया गया था।<br/>* यह संयंत्र दबावयुक्त भारी जल रिएक्टरों (Pressurized Heavy Water Reactors – PHWRs) पर आधारित है, जो भारत के परमाणु कार्यक्रम की मुख्य तकनीक है।<br/>* “हेवी वाटर” (भारी जल) का उत्पादन भी यहाँ होता है। |
| मद्रास परमाणु ऊर्जा स्टेशन (MAPS)<br/>(कलपक्कम) | तमिलनाडु (कलपक्कम) | 1984 | 440 | * यह भारत का पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से निर्मित पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र है। [UPSC Prelims]<br/>* यह स्थल इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) का भी घर है।<br/>* भारत के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का निर्माण यहीं किया जा रहा है, जो भारत के त्रि-स्तरीय कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण है। |
| नरौरा परमाणु ऊर्जा संयंत्र (NAPS) | उत्तर प्रदेश (बुलंदशहर जिला) | 1991 | 440 | * यह गंगा नदी के किनारे स्थित उत्तर भारत का एक महत्वपूर्ण संयंत्र है।<br/>* यह भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है और इसे भूकंपरोधी मानकों के अनुसार डिजाइन किया गया है। |
| काकरापार परमाणु ऊर्जा स्टेशन (KAPS) | गुजरात (सूरत जिला) | 1993 | 1,140<br/>(नई यूनिट के साथ क्षमता बढ़ रही है) | * हाल ही में यहाँ 700 मेगावाट की पहली स्वदेशी PHWR इकाई का वाणिज्यिक संचालन शुरू हुआ, जो आत्मनिर्भर भारत की एक बड़ी उपलब्धि है। [Current Affairs] |
| कैगा उत्पादन स्टेशन (KGS) | कर्नाटक (उत्तर कन्नड़ जिला) | 2000 | 880 | * यह काली नदी के किनारे स्थित है।<br/>* इसके एक रिएक्टर ने बिना रुके लगातार 962 दिनों तक काम करके एक विश्व रिकॉर्ड बनाया था। |
| कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (KKNPP) | तमिलनाडु (तिरुनेलवेली जिला) | 2013 | 2,000<br/>(यूनिट 1 & 2) | * यह भारत का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र (क्षमता के हिसाब से) है। [CDS, SSC CGL]<br/>* इसे रूस के तकनीकी सहयोग से बनाया गया है और इसमें VVER-1000 प्रकार के दबावयुक्त जल रिएक्टरों (Pressurized Water Reactors) का उपयोग किया गया है।<br/>* अभी और यूनिट्स का निर्माण चल रहा है, जिससे इसकी कुल क्षमता 6,000 मेगावाट हो जाएगी। |
निर्माणाधीन और प्रस्तावित संयंत्र (परीक्षा के लिए प्रासंगिक)
| संयंत्र का नाम | राज्य | सहयोग (यदि है) | महत्व |
| गोरखपुर, हरियाणा अणु विद्युत परियोजना (GHAVP) | हरियाणा (फतेहाबाद) | स्वदेशी (PHWR) | उत्तर भारत में स्थापित होने वाला नया संयंत्र। |
| जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना | महाराष्ट्र (रत्नागिरी) | फ्रांस (EDF) | पूरा होने पर यह दुनिया के सबसे शक्तिशाली परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में से एक हो सकता है (9,900 MW)। |
| कोव्वाडा परमाणु ऊर्जा पार्क | आंध्र प्रदेश (श्रीकाकुलम) | संयुक्त राज्य अमेरिका | अमेरिका के साथ परमाणु सहयोग का प्रतीक। |
| प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) | तमिलनाडु (कलपक्कम) | स्वदेशी (IGCAR) | यह भारत के त्रि-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण का दिल है। यह थोरियम का उपयोग करके ईंधन बनाने की तकनीक की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। |
संक्षेप में महत्वपूर्ण तथ्य:
- पहला/सबसे पुराना: तारापुर (महाराष्ट्र)
- सबसे बड़ा (क्षमता में): कुडनकुलम (तमिलनाडु)
- पहला पूर्णतः स्वदेशी: कलपक्कम (तमिलनाडु)
- सबसे महत्वपूर्ण भविष्य की परियोजना: PFBR, कलपक्कम
- प्रमुख तकनीक: PHWR (दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर)
नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन (Renewable Energy Resources) – गैर-परंपरागत स्रोत
नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन (Renewable Energy Resources) वे ऊर्जा स्रोत हैं जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा लगातार नवीकृत या पुनः भरपाई (Replenished) होते रहते हैं और मानवीय गतिविधियों से समाप्त नहीं होते। ये प्रकृति में एक सतत प्रवाह (Continuous Flow) में या असीमित भंडार (Virtually Inexhaustible) के रूप में उपलब्ध हैं।
चूँकि इन ऊर्जा स्रोतों का व्यापक रूप से उपयोग हाल ही के दशकों में शुरू हुआ है, इन्हें गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत (Non-Conventional Sources of Energy) भी कहा जाता है। ये सतत विकास और स्वच्छ पर्यावरण की अवधारणा के केंद्र में हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा की मुख्य विशेषताएँ
- असमाप्य (Inexhaustible): ये मानवीय समय-पैमाने पर कभी समाप्त नहीं होते। सूर्य अरबों वर्षों तक चमकता रहेगा, हवाएं चलती रहेंगी, और जल चक्र जारी रहेगा।
- पर्यावरण के अनुकूल (Environment-friendly): इनके उपयोग से लगभग शून्य या बहुत कम ग्रीनहाउस गैसों (जैसे CO₂) और अन्य प्रदूषकों का उत्सर्जन होता है, जिससे ये जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण से लड़ने में मदद करते हैं। इन्हें “स्वच्छ ऊर्जा” (Clean Energy) भी कहा जाता है।
- सतत (Sustainable): ये वर्तमान और भविष्य दोनों की ऊर्जा जरूरतों को पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना पूरा कर सकते हैं।
- स्थानीय उपलब्धता: ये अक्सर स्थानीय रूप से उपलब्ध होते हैं, जिससे ऊर्जा के लिए आयात पर निर्भरता कम होती है और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) बढ़ती है।
- चुनौतियाँ: इनकी कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जैसे उच्च प्रारंभिक लागत, ऊर्जा उत्पादन का मौसम पर निर्भर होना (जैसे सौर और पवन ऊर्जा का रात में या हवा न चलने पर उत्पादन न होना), और बड़ी भूमि की आवश्यकता।
प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन
1. सौर ऊर्जा (Solar Energy): परीक्षा की दृष्टि से
सौर ऊर्जा वह ऊर्जा है जो सूर्य के प्रकाश और ऊष्मा से प्राप्त होती है। यह पृथ्वी पर जीवन का मूल स्रोत है और सबसे प्रचुर, स्वच्छ और स्थायी नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में से एक है। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ, यह वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखता है।
सौर ऊर्जा प्राप्त करने की प्रौद्योगिकी (Technologies to Harness Solar Energy)
सौर ऊर्जा का उपयोग मुख्य रूप से दो तकनीकों के माध्यम से किया जाता है:
A. सौर फोटोवोल्टेइक (Solar Photovoltaic – PV)
- अवधारणा: यह तकनीक “फोटोवोल्टेइक प्रभाव” (Photovoltaic Effect) पर काम करती है, जिसमें कुछ अर्धचालक (Semiconductor) पदार्थ (मुख्य रूप से सिलिकॉन – Silicon) सूर्य के प्रकाश (फोटॉन) को सीधे विद्युत ऊर्जा (Direct Current – DC) में परिवर्तित कर देते हैं। [UPSC Prelims, SSC]
- मुख्य घटक: सोलर सेल (Solar Cell), जो इस प्रक्रिया की मूल इकाई है। कई सेलों को मिलाकर सोलर मॉड्यूल या पैनल बनता है।
- प्रणाली:
- सोलर पैनल DC बिजली उत्पन्न करते हैं।
- एक इन्वर्टर (Inverter) इस DC बिजली को AC बिजली (Alternating Current) में बदलता है, जिसे हमारे घरों और ग्रिड में उपयोग किया जा सकता है।
- अतिरिक्त बिजली को बैटरी में संग्रहीत किया जा सकता है या ग्रिड में भेजा जा सकता है।
- अनुप्रयोग (Applications): घरों की छतों पर लगे पैनल, बड़े पैमाने पर बने सोलर पार्क/सोलर फार्म, सोलर स्ट्रीट लाइट, सोलर पंप, कैलकुलेटर, और उपग्रहों (Satellites) को बिजली देना।
B. सौर तापीय (Solar Thermal)
- अवधारणा: यह तकनीक सूर्य की ऊष्मा (Heat) का उपयोग करती है, न कि उसके प्रकाश का।
- प्रौद्योगिकी और अनुप्रयोग:
- निम्न-तापमान अनुप्रयोग:
- सोलर वाटर हीटर: घरों में पानी गर्म करने के लिए छतों पर लगाए जाने वाले सिस्टम।
- सोलर कुकर: खाना पकाने के लिए सूर्य की गर्मी का उपयोग।
- उच्च-तापमान अनुप्रयोग / सांद्रित सौर ऊर्जा (Concentrated Solar Power – CSP):
- प्रक्रिया: इसमें कई सारे दर्पणों (Mirrors) या लेंसों का उपयोग करके सूर्य के प्रकाश को एक छोटे से क्षेत्र पर केंद्रित (Concentrate) किया जाता है, जिससे अत्यधिक उच्च तापमान उत्पन्न होता है।
- बिजली उत्पादन: इस तीव्र गर्मी का उपयोग एक तरल (जैसे पानी या पिघला हुआ नमक) को गर्म करके भाप बनाने के लिए किया जाता है। यह भाप फिर एक पारंपरिक टरबाइन-जनरेटर को चलाकर बिजली पैदा करती है।
- लाभ: CSP प्लांट ऊष्मा को पिघले हुए नमक (Molten Salt) में संग्रहीत कर सकते हैं, जिससे वे रात में या बादल होने पर भी बिजली उत्पन्न कर सकते हैं। यह PV की तुलना में एक बड़ा लाभ है। [UPSC Mains]
- निम्न-तापमान अनुप्रयोग:
वैश्विक परिप्रेक्ष्य (Global Scenario)
- अग्रणी देश: चीन सौर ऊर्जा उत्पादन और सौर पैनलों के निर्माण दोनों में दुनिया का निर्विवाद नेता है। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, जर्मनी और भारत आते हैं।
भारत और सौर ऊर्जा (India and Solar Energy)
भारत, एक उष्णकटकटिबंधीय देश होने के नाते, वर्ष में लगभग 300 दिन धूप प्राप्त करता है, जो इसे सौर ऊर्जा के लिए एक आदर्श स्थान बनाता है। भारत सरकार ने इसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।
- प्रमुख पहल:
- जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन (Jawaharlal Nehru National Solar Mission – JNNSM): 2010 में शुरू किया गया यह भारत का पहला बड़ा सौर कार्यक्रम था।
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance – ISA):
- अवधारणा: यह भारत और फ्रांस द्वारा 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन (COP21) के दौरान शुरू की गई एक ऐतिहासिक पहल है। [UPSC, CDS, State PSC]
- मुख्यालय: गुरुग्राम, हरियाणा, भारत। यह भारत में स्थित पहला अंतर्राष्ट्रीय अंतर-सरकारी संगठन है।
- उद्देश्य: कर्क और मकर रेखा के बीच स्थित “धूप वाले देशों” को सौर ऊर्जा के उत्पादन और उपयोग में सहयोग करने के लिए एक मंच प्रदान करना। (अब इसकी सदस्यता सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के लिए खुली है)।
- वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड (One Sun, One World, One Grid – OSOWOG): भारत द्वारा प्रस्तावित एक महत्वाकांक्षी पहल जिसका उद्देश्य विभिन्न देशों के सौर ऊर्जा ग्रिडों को आपस में जोड़कर एक वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है, ताकि चौबीसों घंटे सौर ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
- प्रमुख सोलर पार्क:
- भाडला सोलर पार्क, राजस्थान: दुनिया के सबसे बड़े सोलर पार्कों में से एक।
- पावागड़ा सोलर पार्क, कर्नाटक।
सौर ऊर्जा के लाभ और चुनौतियाँ
| लाभ (Advantages) | चुनौतियाँ (Challenges) |
| स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल: शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन। | आंतरायिकता (Intermittency): यह केवल दिन में और साफ मौसम में ही ऊर्जा उत्पन्न करता है। रात में और बादल होने पर उत्पादन बंद हो जाता है। |
| प्रचुर और असमाप्य: यह ऊर्जा का एक अटूट स्रोत है। | ऊर्जा भंडारण (Energy Storage): दिन में उत्पन्न अतिरिक्त ऊर्जा को रात के लिए संग्रहीत करने हेतु बैटरी की आवश्यकता होती है, जो अभी भी महंगी है। |
| कम परिचालन लागत: एक बार स्थापित हो जाने के बाद, इसकी ईंधन लागत शून्य होती है और रखरखाव का खर्च कम होता है। | उच्च प्रारंभिक निवेश (High Initial Investment): सोलर पैनल और संबंधित प्रणाली को स्थापित करने की लागत अधिक है। |
| ऊर्जा सुरक्षा: ऊर्जा के लिए आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करता है। | बड़ी भूमि की आवश्यकता (Large Land Requirement): बड़े पैमाने पर सोलर फार्म स्थापित करने के लिए विशाल भूमि क्षेत्र की आवश्यकता होती है। |
| विकेंद्रीकृत उत्पादन: इसे दूरदराज के उन क्षेत्रों में भी स्थापित किया जा सकता है जहाँ बिजली ग्रिड नहीं है। | पैनलों का निपटान: सोलर पैनलों का जीवनकाल (~25 वर्ष) समाप्त होने पर उनके इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E-waste) का निपटान एक उभरती हुई पर्यावरणीय चिंता है। |
2. पवन ऊर्जा (Wind Energy): परीक्षा की दृष्टि से
पवन ऊर्जा, हवा की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) का उपयोग करके बिजली उत्पन्न करने की प्रक्रिया है। यह सौर ऊर्जा के बाद सबसे तेजी से बढ़ने वाले और सबसे स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में से एक है। प्राचीन काल से ही पवन चक्कियों का उपयोग अनाज पीसने और पानी पंप करने के लिए किया जाता रहा है, लेकिन आज की आधुनिक पवन टरबाइनें मुख्य रूप से बिजली उत्पादन के लिए डिज़ाइन की गई हैं।
पवन ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया
- पवन का निर्माण: पृथ्वी की सतह के असमान रूप से गर्म होने से हवा के दबाव में अंतर पैदा होता है, जिससे हवा उच्च दाब वाले क्षेत्रों से निम्न दाब वाले क्षेत्रों की ओर बहती है, जिसे पवन (Wind) कहते हैं।
- टरबाइन का घूमना: जब यह बहती हुई हवा एक विशाल पवन चक्की (Wind Turbine) के ब्लेड से टकराती है, तो यह उन्हें घुमाती है, जिससे हवा की गतिज ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा में बदल जाती है।
- बिजली का उत्पादन: घूमते हुए ब्लेड एक गियरबॉक्स के माध्यम से एक जनरेटर (Generator) से जुड़े होते हैं। जनरेटर इस यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा (Electricity) में परिवर्तित करता है।
- ग्रिड से जुड़ाव: उत्पन्न हुई बिजली को ट्रांसफार्मर के माध्यम से वोल्टेज बढ़ाकर पॉवर ग्रिड (Power Grid) में भेज दिया जाता है, जहाँ से इसे घरों और उद्योगों तक पहुँचाया जाता है।
पवन फार्म (Wind Farm): एक बड़े क्षेत्र में कई पवन टरबाइनों के समूह को पवन फार्म कहा जाता है।
पवन ऊर्जा के प्रकार
पवन फार्मों को उनकी स्थापना के स्थान के आधार पर दो मुख्य प्रकारों में बांटा गया है:
A. स्थलीय पवन फार्म (Onshore Wind Farms)
- अवधारणा: ये पवन फार्म भूमि पर, आमतौर पर खुले मैदानों, पहाड़ियों या तटीय क्षेत्रों में स्थापित किए जाते हैं, जहाँ हवा की गति निरंतर और तेज होती है।
- लाभ: इन्हें स्थापित करना और रखरखाव करना अपेक्षाकृत आसान और सस्ता है।
- चुनौतियाँ: भूमि की आवश्यकता, दृश्य प्रदूषण (Aesthetic impact), ध्वनि प्रदूषण (Noise) और पक्षियों के लिए खतरा।
- उदाहरण: भारत में अधिकांश पवन फार्म इसी प्रकार के हैं।
B. अपतटीय पवन फार्म (Offshore Wind Farms)
- अवधारणा: ये पवन फार्म समुद्र के उथले तटीय क्षेत्रों में स्थापित किए जाते हैं। [UPSC Mains]
- लाभ:
- अधिक कुशल: समुद्र के ऊपर हवा की गति भूमि की तुलना में अधिक तेज और निरंतर होती है, जिससे ये अधिक बिजली उत्पन्न करते हैं।
- कम दृश्य प्रभाव: ये आबादी वाले क्षेत्रों से दूर होते हैं।
- विशाल टरबाइनें: समुद्र में जगह की कमी न होने के कारण बहुत बड़ी और अधिक क्षमता वाली टरबाइनें स्थापित की जा सकती हैं।
- चुनौतियाँ:
- अत्यधिक महंगा: समुद्र के खारे पानी और कठोर वातावरण के कारण इनका निर्माण और रखरखाव बहुत जटिल और महंगा होता है।
- वैश्विक प्रवृत्ति: यूरोप (विशेषकर UK, जर्मनी, डेनमार्क) इस क्षेत्र में अग्रणी है, और यह पवन ऊर्जा का भविष्य माना जा रहा है। भारत भी अपनी लंबी तटरेखा का लाभ उठाने के लिए इस क्षेत्र में संभावनाएं तलाश रहा है (जैसे गुजरात और तमिलनाडु के तट पर)।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य (Global Scenario)
- अग्रणी देश:
- चीन: पवन ऊर्जा की स्थापित क्षमता में दुनिया का निर्विवाद नेता है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)
- जर्मनी
- भारत: स्थापित क्षमता के मामले में दुनिया में चौथे स्थान पर है। [यह रैंकिंग परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है।]
- स्पेन
भारत और पवन ऊर्जा
- भारत के पास एक लंबी तटरेखा और अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं, जो इसे पवन ऊर्जा के लिए एक आदर्श स्थान बनाती हैं।
- प्रमुख पवन ऊर्जा उत्पादक राज्य (घटते क्रम में):
- तमिलनाडु: पारंपरिक रूप से भारत का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक राज्य रहा है। मुप्पंडल पवन फार्म (कन्याकुमारी) दुनिया के सबसे बड़े स्थलीय पवन फार्मों में से एक है। [SSC]
- गुजरात: अपनी लंबी तटरेखा और तेज हवाओं के कारण यह अब तेजी से अग्रणी बन रहा है।
- कर्नाटक
- महाराष्ट्र
- राजस्थान
- राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (National Institute of Wind Energy – NIWE): यह भारत में पवन ऊर्जा के विकास, अनुसंधान और प्रमाणन के लिए नोडल एजेंसी है। इसका मुख्यालय चेन्नई, तमिलनाडु में है।
पवन ऊर्जा के लाभ और चुनौतियाँ
| लाभ (Advantages) | चुनौतियाँ (Challenges) |
| स्वच्छ ऊर्जा: शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और कोई वायु प्रदूषण नहीं। | आंतरायिकता (Intermittency): यह केवल तभी बिजली पैदा करता है जब हवा चल रही हो। हवा के रुकने पर उत्पादन बंद हो जाता है। |
| ईंधन लागत शून्य: एक बार स्थापित हो जाने के बाद, इसकी कोई ईंधन लागत नहीं होती। | उच्च प्रारंभिक निवेश: टरबाइनों की लागत और स्थापना का खर्च अधिक होता है। |
| कम भूमि की आवश्यकता (वास्तविक पदचिह्न में): टरबाइनों के बीच की भूमि का उपयोग कृषि और पशुचारण के लिए किया जा सकता है। | उपयुक्त स्थानों की सीमितता: केवल उन्हीं स्थानों पर स्थापित किया जा सकता है जहाँ निरंतर और तेज हवाएं चलती हों। |
| स्थानीय रोजगार: निर्माण और रखरखाव से स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा होता है। | पर्यावरणीय और सामाजिक चिंताएँ: ध्वनि प्रदूषण, दृश्य प्रभाव (Aesthetics), और प्रवासी पक्षियों तथा चमगादड़ों के लिए खतरा। |
| ऊर्जा सुरक्षा: जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता कम करता है। | ग्रिड एकीकरण (Grid Integration): पवन ऊर्जा की आंतरायिक प्रकृति को स्थिर बिजली ग्रिड के साथ एकीकृत करना एक तकनीकी चुनौती है। |
जैव ऊर्जा / बायोमास ऊर्जा (Bioenergy / Biomass Energy): परीक्षा की दृष्टि से
जैव ऊर्जा वह नवीकरणीय ऊर्जा है जो जैविक पदार्थों, जिन्हें बायोमास (Biomass) कहा जाता है, से प्राप्त होती है। बायोमास कोई भी ऐसा जैविक पदार्थ है जिसमें सूर्य की ऊर्जा संग्रहीत होती है – जैसे पौधे, पेड़, शैवाल, और जानवरों तथा मनुष्यों के अपशिष्ट। यह ऊर्जा का सबसे प्राचीन रूपों में से एक है, जिसका उपयोग मानव सभ्यता की शुरुआत से ही आग जलाने (लकड़ी) के लिए किया जाता रहा है।
बायोमास क्या है? (What is Biomass?)
बायोमास के प्रमुख स्रोत हैं:
- वन और कृषि अपशिष्ट (Forest and Agricultural Residues):
- लकड़ी और लकड़ी के उत्पाद: सूखी लकड़ी, पेड़ों की छाल, बुरादा।
- फसलों के अवशेष: पुआल, भूसी, गन्ने की खोई (Bagasse), मक्के की डंडियां।
- ऊर्जा फसलें (Energy Crops):
- वे फसलें जो विशेष रूप से ऊर्जा उत्पादन के लिए उगाई जाती हैं, जैसे जट्रोफा (Jatropha), करंज (Pongamia), गन्ना, स्विचग्रास।
- जैविक अपशिष्ट (Organic Wastes):
- पशु अपशिष्ट: गोबर, पोल्ट्री कचरा।
- नगरपालिका का ठोस कचरा (Municipal Solid Waste – MSW): भोजन के अवशेष, कागज, कार्डबोर्ड।
- औद्योगिक अपशिष्ट: खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों से निकला कचरा।
- जलीय बायोमास (Aquatic Biomass):
- शैवाल (Algae), जलीय पौधे।
बायोमास से ऊर्जा बनाने की प्रक्रियाएँ
बायोमास से ऊर्जा प्राप्त करने के कई तरीके हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
1. तापीय रूपांतरण (Thermal Conversion)
इसमें बायोमास को सीधे ऊष्मा देकर ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
- A. दहन (Combustion):
- प्रक्रिया: यह सबसे सरल और सबसे आम तरीका है। इसमें बायोमास (जैसे लकड़ी, पुआल) को ऑक्सीजन की उपस्थिति में सीधे जलाया जाता है।
- ऊर्जा का रूप: इससे ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिसका उपयोग सीधे हीटिंग, खाना पकाने, या पानी को भाप बनाकर टरबाइन चलाकर बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है।
- उदाहरण: चीनी मिलों में गन्ने की खोई (Bagasse) को जलाकर बिजली बनाना।
- B. गैसीकरण (Gasification):
- प्रक्रिया: बायोमास को सीमित ऑक्सीजन की आपूर्ति में उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है।
- उत्पाद: इससे “प्रोड्यूसर गैस” (Producer Gas) या “सिनगैस” (Syngas) नामक एक ज्वलनशील गैस मिश्रण बनता है (मुख्य रूप से हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और मीथेन)।
- उपयोग: इस गैस का उपयोग इंजन चलाने या बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है।
- C. ताप-अपघटन (Pyrolysis):
- प्रक्रिया: बायोमास को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है।
- उत्पाद: इससे तीन मुख्य उत्पाद बनते हैं:
- बायो-ऑयल (Bio-oil): एक तरल ईंधन।
- सिनगैस (Syngas): एक ज्वलनशील गैस।
- बायोचार (Biochar): चारकोल जैसा एक ठोस पदार्थ, जो एक उत्कृष्ट मृदा सुधारक (Soil Conditioner) है और कार्बन को संग्रहीत कर सकता है। [UPSC Prelims – बायोचार बहुत महत्वपूर्ण है।]
2. जैव-रासायनिक रूपांतरण (Biochemical Conversion)
इसमें सूक्ष्मजीवों (जैसे बैक्टीरिया, खमीर) की मदद से बायोमास को ईंधन में बदला जाता है।
- A. अवायवीय अपघटन (Anaerobic Digestion):
- प्रक्रिया: ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में बैक्टीरिया द्वारा गीले जैविक कचरे (जैसे गोबर, मानव मल, रसोई का कचरा) को सड़ाया जाता है।
- उत्पाद: बायोगैस (Biogas), जो मुख्य रूप से मीथेन (CH₄) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का मिश्रण है। [SSC CGL]
- उपयोग: बायोगैस का उपयोग खाना पकाने, प्रकाश करने और बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है। बचा हुआ पदार्थ (स्लरी – Slurry) एक उत्कृष्ट जैविक खाद होता है।
- उदाहरण: गोबर गैस संयंत्र।
- B. किण्वन (Fermentation):
- प्रक्रिया: खमीर (Yeast) जैसे सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके चीनी या स्टार्च युक्त बायोमास (जैसे गन्ना, मक्का, शैवाल) को सड़ाया जाता है।
- उत्पाद: इथेनॉल (Ethanol), जो एक प्रकार का जैव-ईंधन (Biofuel) है।
- उपयोग: इथेनॉल को पेट्रोल के साथ मिलाकर वाहनों में ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।
- भारत का प्रयास: भारत “इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम” (Ethanol Blending Programme – EBP) चला रहा है, जिसका लक्ष्य पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण बढ़ाना है। [Current Affairs]
लाभ और हानियाँ (Advantages and Disadvantages)
| लाभ (Advantages) | हानियाँ (Disadvantages) |
| नवीकरणीय: यह पौधों और अपशिष्टों से प्राप्त होता है, जो पुनः उत्पन्न हो सकते हैं। | निम्न ऊर्जा घनत्व: कोयले या तेल की तुलना में बायोमास की समान मात्रा में कम ऊर्जा होती है, जिससे बड़े भंडारण और परिवहन की आवश्यकता होती है। |
| कार्बन न्यूट्रल (सैद्धांतिक रूप से): जलने पर यह उतनी ही CO₂ छोड़ता है जितनी पौधे ने अपने जीवनकाल में अवशोषित की थी। इसलिए यह ग्लोबल वार्मिंग में शुद्ध वृद्धि नहीं करता। | वायु प्रदूषण: सीधे जलाने पर (विशेष रूप से अकुशल तरीकों से) कालिख (Soot), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और अन्य हानिकारक प्रदूषक उत्पन्न हो सकते हैं। |
| अपशिष्ट का प्रबंधन: यह कृषि, वानिकी और शहरी कचरे के निपटान का एक प्रभावी तरीका प्रदान करता है। | भूमि का उपयोग: बड़े पैमाने पर ऊर्जा फसलें उगाने से खाद्य फसलों (Food vs. Fuel Debate) और वनों के लिए भूमि के साथ प्रतिस्पर्धा हो सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। |
| ग्रामीण विकास: यह ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार पैदा कर सकता है और उन्हें ऊर्जा में आत्मनिर्भर बना सकता है। | वनों की कटाई: यदि लकड़ी का उपयोग स्थायी रूप से नहीं किया जाता है, तो यह वनों के विनाश का कारण बन सकता है। |
| ऊर्जा का विकेंद्रीकृत स्रोत: इसे स्थानीय स्तर पर छोटे पैमाने पर उत्पन्न किया जा सकता है। | पानी की अधिक आवश्यकता (ऊर्जा फसलें उगाने के लिए)। |
1. तरंग ऊर्जा (Wave Energy)
परिभाषा:
तरंग ऊर्जा वह नवीकरणीय ऊर्जा है जो महासागर की सतह पर हवा द्वारा उत्पन्न लहरों (Waves) की गति से प्राप्त की जाती है। जब हवा समुद्र की सतह पर चलती है, तो यह अपनी कुछ ऊर्जा पानी में स्थानांतरित कर देती है, जिससे लहरें बनती हैं। इन लहरों की ऊपर-नीचे और आगे-पीछे की गति में अपार गतिज (Kinetic) और स्थितिज (Potential) ऊर्जा संग्रहीत होती है।
तरंग ऊर्जा से बिजली बनाने की प्रक्रिया:
तरंग ऊर्जा को बिजली में बदलने के लिए कई अलग-अलग प्रौद्योगिकियाँ विकसित की जा रही हैं, लेकिन अभी तक कोई एक मानक तरीका नहीं है। कुछ प्रमुख अवधारणाएँ हैं:
- ऑसिलेटिंग वॉटर कॉलम (Oscillating Water Column – OWC):
- प्रक्रिया: इसमें एक आंशिक रूप से जलमग्न कक्ष होता है। जब लहरें कक्ष में प्रवेश करती हैं, तो वे पानी के स्तर को ऊपर उठाती हैं, जिससे कक्ष के अंदर की हवा बाहर निकलती है। जब लहरें पीछे हटती हैं, तो पानी का स्तर गिरता है और हवा वापस अंदर खिंचती है। हवा का यह अंदर-बाहर का प्रवाह एक विशेष “वेल्स टरबाइन” (Wells Turbine) को घुमाता है (जो दोनों दिशाओं में हवा के प्रवाह से घूम सकती है) और बिजली पैदा करती है।
- उदाहरण: भारत में विझिंजम, केरल के पास एक OWC प्लांट स्थापित किया गया था।
- पॉइंट एब्जॉर्बर बॉय (Point Absorber Buoys):
- प्रक्रिया: ये पानी की सतह पर तैरने वाले उपकरण (Buoys) होते हैं जो लहरों की ऊपर-नीचे की गति के साथ हिलते हैं। इस गति का उपयोग हाइड्रोलिक पंप चलाने या सीधे एक रैखिक जनरेटर को चलाने के लिए किया जाता है, जिससे बिजली बनती है।
- ऑसिलेटिंग वेव सर्ज कन्वर्टर्स (Oscillating Wave Surge Converters):
- प्रक्रिया: ये समुद्र तल पर लगे होते हैं और एक भुजा या फ्लैप होता है जो लहरों की आगे-पीछे की गति (Sway) से हिलता है। इस गति का उपयोग तरल पदार्थ को पंप करके टरबाइन चलाने के लिए किया जाता है।
| तरंग ऊर्जा के लाभ | तरंग ऊर्जा की चुनौतियाँ |
| उच्च ऊर्जा घनत्व: पानी हवा की तुलना में बहुत अधिक सघन होता है, इसलिए लहरों में पवन ऊर्जा की तुलना में अधिक ऊर्जा होती है। | अपरिपक्व प्रौद्योगिकी: यह अभी भी विकास के प्रारंभिक चरण में है और बहुत महंगी है। |
| पूर्वानुमानित: लहरों का पूर्वानुमान लगाना हवा की तुलना में अधिक आसान और सटीक है। | कठोर समुद्री वातावरण: समुद्री तूफान और खारे पानी का संक्षारक प्रभाव उपकरणों को नुकसान पहुँचा सकता है, जिससे रखरखाव मुश्किल और महंगा हो जाता है। |
| पर्यावरण के अनुकूल: शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन। | समुद्री पारिस्थितिकी पर प्रभाव: उपकरणों से ध्वनि और उनकी भौतिक उपस्थिति समुद्री जीवन और नौवहन को प्रभावित कर सकती है। |
| निरंतर स्रोत: लहरें दिन-रात चलती रहती हैं। | तटीय क्षेत्रों तक सीमित: केवल उन्हीं क्षेत्रों में व्यवहार्य है जहाँ शक्तिशाली लहरें आती हों। |
2. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy)
परिभाषा:
ज्वारीय ऊर्जा वह नवीकरणीय ऊर्जा है जो मुख्य रूप से चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण समुद्र के जल स्तर में होने वाले नियमित उतार-चढ़ाव (यानी, ज्वार-भाटे) से प्राप्त की जाती है। यह एक अत्यंत विश्वसनीय और पूर्वानुमानित ऊर्जा स्रोत है।
ज्वारीय ऊर्जा से बिजली बनाने की प्रक्रिया:
ज्वारीय ऊर्जा का उपयोग करने का सबसे आम और स्थापित तरीका ज्वारीय बैराज (Tidal Barrage) बनाना है।
- प्रक्रिया:
- एक नदी के मुहाने (Estuary) या खाड़ी में एक बांध (Barrage) बनाया जाता है।
- जब उच्च ज्वार (High Tide) आता है, तो समुद्र का पानी बांध के गेट से होकर बेसिन (खाड़ी) में भर जाता है।
- उच्च ज्वार पर गेट बंद कर दिए जाते हैं, जिससे बेसिन में बड़ी मात्रा में पानी संग्रहीत हो जाता है।
- जब निम्न ज्वार (Low Tide) आता है और समुद्र का स्तर नीचे चला जाता है, तो बेसिन और समुद्र के बीच पानी के स्तर का एक बड़ा अंतर (Head) पैदा होता है।
- फिर बांध के गेट खोल दिए जाते हैं, और संग्रहीत पानी टरबाइनों से होकर समुद्र में वापस बहता है। टरबाइनों के घूमने से बिजली पैदा होती है।
- कुछ आधुनिक संयंत्र ज्वार के आने और जाने, दोनों समय बिजली पैदा कर सकते हैं।
- उदाहरण:
- ला रांस, फ्रांस (La Rance, France): दुनिया का पहला और सबसे प्रसिद्ध ज्वारीय ऊर्जा संयंत्र (1966)।
- सिहवा लेक, दक्षिण कोरिया (Sihwa Lake, South Korea): वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा ज्वारीय ऊर्जा संयंत्र।
| ज्वारीय ऊर्जा के लाभ | ज्वारीय ऊर्जा की चुनौतियाँ |
| अत्यंत विश्वसनीय और पूर्वानुमानित: ज्वार-भाटे का समय और ऊंचाई गुरुत्वाकर्षण के नियमों के अनुसार होती है और वर्षों पहले इसकी सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है। यह सौर या पवन ऊर्जा की तरह आंतरायिक (intermittent) नहीं है। | उच्च प्रारंभिक लागत: ज्वारीय बैराज का निर्माण एक बहुत ही बड़ी और महंगी परियोजना है। |
| लंबा जीवनकाल: ज्वारीय ऊर्जा संयंत्रों का जीवनकाल बहुत लंबा (100 वर्ष तक) हो सकता है। | सीमित स्थान: केवल उन्हीं स्थानों पर बनाया जा सकता है जहाँ ज्वारीय रेंज (Tidal Range) यानी उच्च और निम्न ज्वार के बीच का अंतर बहुत अधिक (आमतौर पर 5 मीटर से अधिक) हो। |
| कुशल: ज्वार के चक्र के दौरान यह लगातार और स्थिर बिजली प्रदान करता है। | गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव: बैराज के निर्माण से मुहाने का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) नष्ट हो सकता है, जिससे मछली के प्रवासन और तलछट के प्रवाह में बाधा आती है। |
| शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: एक बार स्थापित हो जाने के बाद यह स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करता है। | निर्माण अवधि बहुत लंबी होती है। |
भारत में संभावना: भारत में खंभात की खाड़ी (गुजरात), कच्छ की खाड़ी (गुजरात) और सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) में ज्वारीय ऊर्जा की महत्वपूर्ण संभावनाएं हैं।
भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy): परीक्षा की दृष्टि से
भू-तापीय ऊर्जा (Geo = पृथ्वी, Thermal = ऊष्मा) पृथ्वी के आंतरिक भाग में संग्रहीत ऊष्मा से प्राप्त होने वाली एक नवीकरणीय ऊर्जा है। यह ऊष्मा पृथ्वी के निर्माण के समय से बची हुई अवशिष्ट गर्मी और पृथ्वी के क्रोड में रेडियोधर्मी पदार्थों के प्राकृतिक क्षय (decay) से लगातार उत्पन्न होती रहती है।
भू-तापीय ऊर्जा कैसे काम करती है? (How Geothermal Energy Works?)
पृथ्वी की सतह के नीचे गहराई में जाने पर तापमान बढ़ता जाता है। कुछ स्थानों पर, यह गर्मी भूजल (Groundwater) के विशाल भंडारों को गर्म करती है, जिससे गर्म पानी या भाप के जलाशय (Geothermal Reservoirs) बन जाते हैं। भू-तापीय ऊर्जा संयंत्र इसी गर्म पानी या भाप का उपयोग बिजली बनाने के लिए करते हैं।
प्रक्रिया:
- ड्रिलिंग: पृथ्वी की सतह में गहरे कुएँ खोदे जाते हैं ताकि भू-तापीय जलाशयों तक पहुँचा जा सके।
- भाप या गर्म पानी निकालना: इन कुओं के माध्यम से, उच्च दबाव वाली भाप या अत्यधिक गर्म पानी को सतह पर लाया जाता है।
- टरबाइन चलाना:
- यदि जलाशय से सीधे भाप निकलती है (ड्राई स्टीम प्लांट), तो उसे सीधे टरबाइन चलाने के लिए उपयोग किया जाता है।
- यदि गर्म पानी निकलता है (फ्लैश स्टीम प्लांट), तो उसे सतह पर लाया जाता है जहाँ दबाव कम होने के कारण वह तेजी से भाप में बदल जाता है, और फिर इस भाप से टरबाइन चलाई जाती है।
- यदि पानी बहुत अधिक गर्म नहीं है (बाइनरी साइकिल प्लांट), तो उस पानी की गर्मी का उपयोग एक दूसरे तरल (जिसका क्वथनांक कम हो) को गर्म करके भाप बनाने के लिए किया जाता है, जिससे टरबाइन चलती है।
- बिजली उत्पादन: घूमती हुई टरबाइन एक जनरेटर को चलाकर बिजली पैदा करती है।
- पानी का पुनर्चक्रण: उपयोग के बाद, ठंडे पानी को अक्सर एक इंजेक्शन वेल (injection well) के माध्यम से वापस जमीन में भेज दिया जाता है ताकि जलाशय में पानी का स्तर बना रहे और यह प्रक्रिया सतत बनी रहे।
भू-तापीय ऊर्जा के प्रकार और उपयोग
| प्रकार/उपयोग | विवरण | उदाहरण |
| विद्युत उत्पादन (Electricity Generation) | यह भू-तापीय ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक उपयोग है। इसके लिए 150°C से अधिक तापमान की आवश्यकता होती है। यह मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होता है जहाँ टेक्टोनिक प्लेट की सीमाएँ (Plate Boundaries) होती हैं, क्योंकि वहाँ भू-तापीय ग्रेडिएंट बहुत अधिक होता है। | प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित “रिंग ऑफ फायर” (Ring of Fire)। |
| प्रत्यक्ष उपयोग (Direct Use) | इसमें जमीन से निकले गर्म पानी का सीधे तौर पर उपयोग किया जाता है।<br/> * हीटिंग: घरों, इमारतों और ग्रीनहाउस को गर्म रखने के लिए।<br/> * औद्योगिक प्रक्रियाएँ: खाद्य प्रसंस्करण, कागज उद्योग।<br/> * कृषि: फसलों को सुखाना, मत्स्य पालन (Aquaculture)।<br/> * पर्यटन और स्वास्थ्य: गर्म पानी के झरने (Hot Springs) और स्पा। | आइसलैंड अपनी लगभग 90% हीटिंग की जरूरतें भू-तापीय ऊर्जा से पूरी करता है। |
वैश्विक परिप्रेक्ष्य (Global Scenario)
- प्रमुख उत्पादक देश:
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): दुनिया का सबसे बड़ा भू-तापीय ऊर्जा उत्पादक। “द गीजर” (The Geysers) कैलिफोर्निया में दुनिया का सबसे बड़ा भू-तापीय परिसर है।
- इंडोनेशिया
- फिलीपींस
- तुर्की
- न्यूजीलैंड
- आइसलैंड: अपनी कुल बिजली का लगभग 30% और हीटिंग का 90% भू-तापीय ऊर्जा से प्राप्त करता है। यह भू-तापीय प्रौद्योगिकी का एक वैश्विक नेता है। [CDS, UPSC के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण]
भारत में भू-तापीय ऊर्जा की संभावनाएं (Potential in India)
भारत में भू-तापीय ऊर्जा का उपयोग अभी भी शुरुआती चरणों में है, लेकिन इसके कई क्षेत्रों में संभावनाएं बेहद उज्जवल हैं।
संभावित क्षेत्र: भारत में लगभग 300 से अधिक गर्म पानी के झरने हैं, जिनका उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
| प्रमुख क्षेत्र | राज्य / केंद्र शासित प्रदेश | परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य |
| पूगा घाटी (Puga Valley) | लद्दाख | भारत में भू-तापीय ऊर्जा के लिए सबसे संभावनाशील स्थल। यहाँ भारत की पहली भू-तापीय क्षेत्र विकास परियोजना स्थापित की जा रही है। [UPSC, State PSC – यह बहुत महत्वपूर्ण है।] |
| मणिकरण (Manikaran) | हिमाचल प्रदेश | यहाँ गर्म पानी के झरनों का उपयोग धार्मिक स्नान और प्रायोगिक बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है। |
| तातापानी (Tattapani) | छत्तीसगढ़ | एक अन्य महत्वपूर्ण संभावित क्षेत्र, जहाँ गर्म जल स्रोतों का उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। |
| सूरजकुंड | झारखंड | – |
| पश्चिमी घाट | महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय क्षेत्र | – |
| हिमालय क्षेत्र | – | भारत के अधिकांश भू-तापीय स्रोत हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं। |
भू-तापीय ऊर्जा के लाभ और हानियाँ
| लाभ (Advantages) | हानियाँ (Disadvantages) |
| विश्वसनीय और सतत (Reliable and Continuous): सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, भू-तापीय ऊर्जा मौसम पर निर्भर नहीं है और यह 24×7 निरंतर ऊर्जा (Base Load Power) प्रदान कर सकती है। | स्थान-विशिष्ट (Site-Specific): भू-तापीय ऊर्जा केवल उन्हीं स्थानों पर प्रभावी होती है जहाँ भू-तापीय गतिविधि सतह के पास मौजूद हो, जैसे टेक्टोनिक प्लेट सीमाओं या हॉटस्पॉट्स पर। |
| स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy): बिजली उत्पादन के दौरान लगभग शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है। | उच्च प्रारंभिक लागत (High Initial Cost): ड्रिलिंग और संयंत्र निर्माण की लागत काफी महंगी होती है। |
| कम भूमि की आवश्यकता (Low Land Requirement): समान क्षमता वाले अन्य ऊर्जा संयंत्रों (सौर, पवन, कोयला) की तुलना में भू-तापीय ऊर्जा संयंत्रों के लिए बहुत कम भूमि क्षेत्र की आवश्यकता होती है। | पर्यावरणीय जोखिम (Environmental Risks): ड्रिलिंग के दौरान भूजल का संदूषण और छोटे भूकंपीय हलचल (Micro-seismicity) होने का जोखिम रहता है। साथ ही, जमीन से हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S) जैसी गैसों का उत्सर्जन भी हो सकता है। |
| कम परिचालन लागत (Low Operational Cost): एक बार संयंत्र स्थापित हो जाने के बाद, इसमें कोई ईंधन लागत नहीं होती और परिचालन लागत भी बहुत कम होती है। | ड्रिलिंग की सफलता पर अनिश्चितता (Uncertainty of Drilling Success): ड्रिलिंग के दौरान सफलता की कोई गारंटी नहीं होती, यानी हर बार अपेक्षित तापमान और ऊर्जा स्रोत की प्राप्ति नहीं हो सकती। |
| स्थिर और अनुमानित (Stable and Predictable): यह ऊर्जा का एक बहुत ही स्थिर और अनुमानित स्रोत है, जिसे मौसम या अन्य बाहरी कारकों से कोई फर्क नहीं पड़ता। | संसाधनों का अत्यधिक दोहन (Over-exploitation of Resources): यदि जलाशयों से अत्यधिक ऊर्जा निकाली जाती है, तो इससे उनके तापमान में गिरावट आ सकती है और क्षमता कम हो सकती है। |
जलविद्युत ऊर्जा (Hydroelectric Energy): परीक्षा की दृष्टि से
जलविद्युत ऊर्जा बहते हुए पानी या ऊँचाई पर संग्रहीत पानी की गतिज (Kinetic) और स्थितिज (Potential) ऊर्जा का उपयोग करके बिजली उत्पन्न करने की एक प्रक्रिया है। यह नवीकरणीय ऊर्जा का सबसे पुराना, सबसे स्थापित और सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला रूप है। दुनिया की कुल नवीकरणीय बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा जलविद्युत से ही आता है।
जलविद्युत ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया (Process of Hydropower Generation)
इसका सबसे आम तरीका एक पारंपरिक बांध (Dam) बनाना है।
- बांध का निर्माण: एक नदी के आर-पार एक विशाल बांध का निर्माण किया जाता है, जो नदी के पानी को रोककर एक बड़ा जलाशय (Reservoir) बनाता है।
- स्थितिज ऊर्जा का भंडारण: जलाशय में संग्रहीत पानी में अत्यधिक स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) होती है। पानी का स्तर जितना ऊँचा होगा, ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी।
- पानी का प्रवाह: जब बिजली की आवश्यकता होती है, तो बांध के फाटकों (Gates) को खोला जाता है, और पानी उच्च दबाव में एक बड़े पाइप, जिसे पेनस्टॉक (Penstock) कहा जाता है, के माध्यम से बहता है।
- टरबाइन का घूमना: पेनस्टॉक से बहता हुआ पानी तीव्र गति से टरबाइन (Turbine) के ब्लेड से टकराता है और उन्हें घुमाता है। इस प्रक्रिया में, पानी की स्थितिज और गतिज ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) में परिवर्तित हो जाती है।
- बिजली का उत्पादन: घूमती हुई टरबाइन एक जनरेटर से जुड़ी होती है, जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा (Electrical Energy) में परिवर्तित करती है।
- पानी का निकास: टरबाइन से गुजरने के बाद, पानी नदी के प्रवाह में वापस छोड़ दिया जाता है।
जलविद्युत के प्रकार (Types of Hydropower)
| प्रकार | विवरण |
| जलाशय आधारित (Impoundment/Storage): | यह सबसे आम प्रकार है, जिसमें एक बड़ा बांध बनाकर पानी जमा किया जाता है। ये बिजली की मांग के अनुसार उत्पादन को नियंत्रित कर सकते हैं और सिंचाई तथा बाढ़ नियंत्रण जैसे बहुउद्देश्यीय लाभ भी प्रदान करते हैं। |
| रन-ऑफ-रिवर (Run-of-River): | इनमें कोई बड़ा जलाशय नहीं बनाया जाता है। नदी के प्राकृतिक प्रवाह का एक हिस्सा सीधे टरबाइन की ओर मोड़ दिया जाता है। इनका पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है, लेकिन ये बिजली की मांग के अनुसार उत्पादन को समायोजित नहीं कर सकते और केवल तभी बिजली बनाते हैं जब नदी में पर्याप्त पानी हो। |
| पंप-संचयन (Pumped Storage): | यह ऊर्जा उत्पादन से अधिक भंडारण की एक विधि है। इसमें दो जलाशय होते हैं—एक ऊपरी और एक निचला। जब बिजली की मांग कम और सस्ती होती है (जैसे रात में), तो निचले जलाशय से पानी को ऊपरी जलाशय में पंप किया जाता है। जब मांग अधिक होती है, तो ऊपरी जलाशय से पानी को टरबाइन के माध्यम से नीचे छोड़कर बिजली पैदा की जाती है। यह एक विशाल “बैटरी” की तरह काम करता है। [UPSC Prelims] |
वैश्विक परिप्रेक्ष्य (Global Scenario)
- प्रमुख उत्पादक देश:
- चीन: जलविद्युत उत्पादन में दुनिया का निर्विवाद नेता। यहीं पर दुनिया का सबसे बड़ा पावर स्टेशन “थ्री गॉर्जेज डैम” (Three Gorges Dam) यांग्त्ज़ी नदी पर स्थित है। [SSC, CDS]
- ब्राजील: इताइपु बांध (Itaipu Dam), जो ब्राजील और पराग्वे की सीमा पर है, दुनिया के सबसे बड़े संयंत्रों में से एक है।
- कनाडा
- संयुक्त राज्य अमेरिका
- रूस
- भारत भी जलविद्युत के प्रमुख उत्पादकों में से एक है।
भारत में जलविद्युत
- संभावनाएं: भारत के पास, विशेष रूप से हिमालयी नदियों में, जलविद्युत की अपार संभावनाएं हैं।
- प्रमुख परियोजनाएं:
- भाखड़ा-नांगल बांध (सतलुज नदी): भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं में से एक।
- टिहरी बांध (भागीरथी नदी, उत्तराखंड): भारत का सबसे ऊंचा बांध।
- हीराकुंड बांध (महानदी, ओडिशा): भारत का सबसे लंबा बांध।
- सरदार सरोवर बांध (नर्मदा नदी, गुजरात)।
- नागार्जुन सागर बांध (कृष्णा नदी, आंध्र प्रदेश/तेलंगाना)।
- कोयना परियोजना (महाराष्ट्र)।
जलविद्युत ऊर्जा के लाभ और हानियाँ (Advantages and Disadvantages)
| लाभ (Advantages) | हानियाँ/चुनौतियाँ (Disadvantages/Challenges) |
| स्वच्छ और नवीकरणीय: बिजली उत्पादन के दौरान कोई ग्रीनहाउस गैस या वायु प्रदूषक उत्पन्न नहीं होता। | उच्च प्रारंभिक लागत और लंबी निर्माण अवधि: बांधों का निर्माण अत्यधिक महंगा होता है और इसमें कई वर्ष लग जाते हैं। |
| सबसे सस्ती बिजली: एक बार बांध बन जाने के बाद, बिजली उत्पादन की परिचालन लागत (Operating Cost) बहुत कम होती है, क्योंकि ईंधन की कोई लागत नहीं होती। | विस्थापन और सामाजिक मुद्दे: बड़े बांधों के निर्माण से जलाशयों में एक बड़ा क्षेत्र डूब जाता है, जिससे लाखों लोगों, विशेषकर आदिवासी और स्थानीय समुदायों, को विस्थापित (Displace) होना पड़ता है। नर्मदा बचाओ आंदोलन इसका एक प्रमुख उदाहरण है। |
| विश्वसनीय और स्थिर: यह सौर और पवन ऊर्जा की तरह मौसम पर निर्भर नहीं है और 24×7 स्थिर और विश्वसनीय बिजली (Base Load Power) प्रदान कर सकता है। | पारिस्थितिक और पर्यावरणीय प्रभाव:<br/> * जलीय जीवन को नुकसान: बांध मछलियों और अन्य जलीय जीवों के प्राकृतिक प्रवासन (Migration) में बाधा डालते हैं।<br/> * वनों की कटाई और जैव-विविधता का ह्रास: जलाशय क्षेत्र में आने वाले जंगल और आवास नष्ट हो जाते हैं।<br/> * तलछट का जमाव (Siltation): बांध नदी द्वारा लाए गए उपजाऊ तलछट को अपने पीछे रोक लेते हैं, जिससे下游 (Downstream) के डेल्टा और कृषि भूमि की उर्वरता कम हो जाती है। |
| बहुउद्देश्यीय लाभ: बिजली उत्पादन के अलावा, बांधों का उपयोग सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, पेयजल आपूर्ति, मत्स्य पालन और पर्यटन के लिए भी किया जाता है। | भूकंप का खतरा (Seismic Risk): जलाशयों का भारी वजन भूगर्भीय भ्रंशों पर दबाव डाल सकता है, जिससे भूकंप-प्रेरित कंपन (Reservoir-induced Seismicity) का खतरा बढ़ सकता है। |
| लचीलापन (Flexibility): बिजली की मांग में उतार-चढ़ाव के अनुसार उत्पादन को बहुत जल्दी बढ़ाया या घटाया जा सकता है। | जलवायु परिवर्तन पर निर्भरता: वर्षा के पैटर्न में बदलाव और ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों में पानी के प्रवाह पर असर पड़ सकता है, जो जलविद्युत उत्पादन को प्रभावित करेगा। |
खनिज संसाधन (Mineral Resources): परीक्षा की दृष्टि से
खनिज (Mineral) एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला, अकार्बनिक (Inorganic), ठोस पदार्थ है जिसकी एक निश्चित रासायनिक संरचना और एक व्यवस्थित परमाणु संरचना (क्रिस्टलीय रूप) होती है। ये पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) में पाए जाते हैं और मानव सभ्यता के विकास, उद्योग और प्रौद्योगिकी का आधार हैं।
जिन चट्टानों में खनिजों का पर्याप्त सांद्रण होता है, जिन्हें आर्थिक रूप से निकालना लाभप्रद हो, उन्हें अयस्क (Ore) कहा जाता है।
खनिजों का वर्गीकरण (Classification of Minerals)
खनिजों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
1. धात्विक खनिज (Metallic Minerals): परीक्षा की दृष्टि से
धात्विक खनिज (Metallic Minerals) वे खनिज हैं जिनसे हमें कच्चे रूप (Raw Form) में एक या एक से अधिक धातुएँ (Metals) प्राप्त होती हैं। ये आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के निर्माण खंड (Building Blocks) हैं, जिनका उपयोग मशीनरी से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक और निर्माण से लेकर परिवहन तक हर क्षेत्र में होता है।
धात्विक खनिजों के गुण (Properties of Metallic Minerals)
धातुओं से युक्त होने के कारण, इन खनिजों में कुछ विशिष्ट गुण होते हैं:
- चमक (Lustre): इनमें अपनी एक विशेष धातुई चमक होती है (जैसे सोना और चांदी की चमक)।
- कठोरता (Hardness): ये सामान्यतः कठोर और ठोस होते हैं (पारा एक अपवाद है जो तरल होता है)।
- चालकता (Conductivity): ये ऊष्मा (Heat) और विद्युत (Electricity) के उत्कृष्ट सुचालक होते हैं, जिसके कारण तांबा और एल्यूमीनियम जैसे खनिजों का विद्युत उद्योग में अत्यधिक महत्व है।
- तन्यता (Ductility): इन्हें खींचकर पतले तार बनाए जा सकते हैं (जैसे तांबे और सोने के तार)।
- आघातवर्धनीयता (Malleability): इन्हें पीटकर पतली चादरें बनाई जा सकती हैं (जैसे एल्यूमीनियम फॉयल)।
धात्विक खनिजों का वर्गीकरण
धात्विक खनिजों को उनमें लोहे (Iron) की उपस्थिति के आधार पर दो मुख्य समूहों में बांटा जाता है:
A. लौह युक्त धात्विक खनिज (Ferrous Metallic Minerals)
- परिभाषा: वे धात्विक खनिज जिनमें लोहा एक मुख्य घटक के रूप में मौजूद होता है।
- महत्व:
- ये कुल धात्विक खनिजों के उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा बनाते हैं।
- ये लौह और इस्पात उद्योग (Iron and Steel Industry) का आधार हैं, जिसे किसी भी देश की औद्योगिक प्रगति का “मेरुदंड” (Backbone) माना जाता है।
- ये मजबूत और टिकाऊ होते हैं।
- प्रमुख उदाहरण:
- लौह अयस्क (Iron Ore): यह लौह युक्त खनिजों में सबसे महत्वपूर्ण है। इसके मुख्य प्रकार हैं:
- मैग्नेटाइट: सर्वोत्तम गुणवत्ता का लौह अयस्क (70% से अधिक लोहा), इसमें चुंबकीय गुण होते हैं।
- हेमाटाइट: औद्योगिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण लौह अयस्क, जिसकी सबसे अधिक खपत होती है (60-70% लोहा)। भारत में यह प्रमुखता से पाया जाता है।
- लिमोनाइट और साइडराइट: निम्न गुणवत्ता वाले अयस्क।
- मैंगनीज (Manganese): यह इस्पात (Steel) बनाने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कच्चा माल है। स्टील को मजबूत, कठोर और जंग-रोधी बनाने के लिए इसमें मैंगनीज मिलाया जाता है (फेरो-मैंगनीज के रूप में)।
- क्रोमाइट (Chromite): इससे क्रोमियम प्राप्त होता है, जिसका उपयोग स्टेनलेस स्टील बनाने और धातुओं पर परत चढ़ाने (Chrome-plating) में होता है।
- निकल (Nickel) और टंगस्टन (Tungsten)।
- लौह अयस्क (Iron Ore): यह लौह युक्त खनिजों में सबसे महत्वपूर्ण है। इसके मुख्य प्रकार हैं:
B. अलौह युक्त धात्विक खनिज (Non-Ferrous Metallic Minerals)
- परिभाषा: वे धात्विक खनिज जिनमें लोहे की मात्रा नहीं होती या नगण्य होती है।
- महत्व: यद्यपि लौह युक्त खनिजों की तुलना में इनका उत्पादन कम होता है, फिर भी ये कई विशिष्ट और महत्वपूर्ण उद्योगों (जैसे इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, विमानन) के लिए अनिवार्य हैं।
- प्रमुख उदाहरण:
- तांबा (Copper):
- गुण: विद्युत का उत्कृष्ट सुचालक, तन्य और आघातवर्धनीय।
- उपयोग: विद्युत तार बनाने, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (सर्किट बोर्ड), और नलसाजी में इसका व्यापक उपयोग होता है।
- बॉक्साइट (Bauxite):
- गुण: यह एल्यूमीनियम (Aluminium) का मुख्य अयस्क है।
- उपयोग: एल्यूमीनियम हल्का, मजबूत, जंग-रोधी और ऊष्मा का अच्छा सुचालक होता है। इसका उपयोग विमान बनाने, वाहनों के पुर्जे, बर्तन और पैकेजिंग (एल्यूमीनियम फॉयल) में किया जाता है।
- सीसा (Lead): बैटरी, केबल और एक्स-रे मशीनों में उपयोग।
- जस्ता (Zinc): लोहे पर जंग-रोधी परत चढ़ाने (गैल्वनीकरण – Galvanization) और मिश्र धातु (पीतल) बनाने में उपयोग।
- टिन (Tin): मिश्र धातु (कांसा) बनाने और कोटिंग में उपयोग।
- तांबा (Copper):
C. बहुमूल्य खनिज/धातुएँ (Precious Minerals/Metals)
- ये भी अलौह खनिज हैं, लेकिन इनकी दुर्लभता और उच्च आर्थिक मूल्य के कारण इन्हें एक अलग श्रेणी में रखा जाता है।
- उदाहरण: सोना (Gold), चांदी (Silver), प्लैटिनम (Platinum)।
- उपयोग: आभूषण बनाने, मुद्रा के रूप में, निवेश के लिए, और कुछ इलेक्ट्रॉनिक और दंत चिकित्सा अनुप्रयोगों में।
वैश्विक वितरण के कुछ मुख्य बिंदु
| खनिज | प्रमुख उत्पादक/भंडार वाले देश |
| लौह अयस्क | ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, भारत |
| तांबा | चिली (विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक), पेरू, चीन |
| बॉक्साइट | ऑस्ट्रेलिया, गिनी, चीन, ब्राजील |
| सोना | चीन, ऑस्ट्रेलिया, रूस, अमेरिका |
| चांदी | मेक्सिको, पेरू, चीन |
| मैंगनीज | दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, चीन |
2. अधात्विक खनिज (Non-Metallic Minerals): परीक्षा की दृष्टि से
अधात्विक खनिज (Non-Metallic Minerals) वे खनिज हैं जिनमें धातु के गुण नहीं पाए जाते हैं और जिनसे धातु प्राप्त नहीं की जा सकती। हालांकि ये धात्विक खनिजों की तरह चमकीले या कठोर नहीं होते, फिर भी ये आधुनिक जीवन और उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका उपयोग निर्माण सामग्री से लेकर रासायनिक उर्वरकों तक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर आभूषणों तक में होता है।
अधात्विक खनिजों के गुण (Properties of Non-Metallic Minerals)
ये धात्विक खनिजों के गुणों के विपरीत होते हैं:
- चमक: इनमें धातुई चमक नहीं होती (हीरा और अभ्रक कुछ हद तक अपवाद हैं)।
- चालकता: ये सामान्यतः ऊष्मा और विद्युत के कुचालक (Insulators) होते हैं (ग्रेफाइट एक अपवाद है जो सुचालक होता है)।
- कठोरता: ये विभिन्न कठोरता के हो सकते हैं – कुछ बहुत नरम होते हैं (जैसे अभ्रक) और कुछ अत्यंत कठोर होते हैं (जैसे हीरा)।
- तन्यता और आघातवर्धनीयता: ये तन्य या आघातवर्धनीय नहीं होते। इन्हें पीटने या खींचने पर ये टूट जाते हैं (भंगुर होते हैं)।
- विविधता: ये विभिन्न रंगों और रूपों में पाए जाते हैं।
प्रमुख अधात्विक खनिज और उनके उपयोग
इन्हें मुख्य रूप से इनके उपयोग और रासायनिक संरचना के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
| खनिज का नाम | रासायनिक संरचना/प्रकार | मुख्य गुण और उपयोग | प्रमुख वैश्विक उत्पादक | भारत में स्थिति |
| अभ्रक (Mica) | पोटेशियम एल्यूमीनियम सिलिकेट | उत्कृष्ट विद्युत रोधक (Excellent Electrical Insulator), ऊष्मा प्रतिरोधी, पतली परतों में तोड़ा जा सकता है।<br/>उपयोग: विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में कैपेसिटर और इंसुलेटर बनाने के लिए। [UPSC, SSC – यह सबसे महत्वपूर्ण गुण है।] | चीन, रूस, फिनलैंड, दक्षिण कोरिया। | भारत पारंपरिक रूप से दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक और निर्यातक में से एक रहा है, विशेष रूप से उच्च गुणवत्ता वाले रूबी अभ्रक के लिए (झारखंड, आंध्र प्रदेश)। |
| चूना पत्थर (Limestone) | कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) | अवसादी चट्टान | सीमेंट उद्योग का आधारभूत कच्चा माल। लौह-इस्पात उद्योग में फ्लक्स के रूप में (अशुद्धियों को हटाने के लिए)। रासायनिक उद्योगों में। | चीन, भारत, अमेरिका। |
| हीरा (Diamond) | कार्बन (Carbon) का क्रिस्टलीय रूप | सबसे कठोर ज्ञात प्राकृतिक पदार्थ। अत्यधिक चमक (अपवर्तनांक के कारण)।<br/>उपयोग: आभूषण में, और औद्योगिक रूप से काटने, पीसने और ड्रिलिंग करने वाले उपकरणों में। | रूस, बोत्सवाना, कनाडा। | भारत में, मध्य प्रदेश का पन्ना क्षेत्र हीरे के खनन के लिए प्रसिद्ध है। |
| ग्रेफाइट (Graphite) | कार्बन (Carbon) का दूसरा रूप | नरम, चिकना (स्नेहक)। विद्युत का सुचालक (Good Conductor) (अधातु होते हुए भी)।<br/>उपयोग: पेंसिल की लेड, स्नेहक (Lubricant), बैटरी में इलेक्ट्रोड। | चीन, भारत, ब्राजील। | अरुणाचल प्रदेश, झारखंड। |
| जिप्सम (Gypsum) | कैल्शियम सल्फेट हाइड्रेट | उर्वरक उद्योग, प्लास्टर ऑफ पेरिस बनाने और सीमेंट को जमने की दर को नियंत्रित करने के लिए। क्षारीय मिट्टी के उपचार के लिए। | चीन, ईरान, थाईलैंड, अमेरिका। | राजस्थान भारत का सबसे बड़ा उत्पादक है। |
| पोटाश (Potash) | पोटेशियम युक्त खनिज | मुख्य रूप से उर्वरक उद्योग में एक आवश्यक पोषक तत्व के रूप में। रासायनिक उद्योग में भी उपयोग। | कनाडा, रूस, बेलारूस। | भारत लगभग पूरी तरह से पोटाश के आयात पर निर्भर है, क्योंकि यहाँ इसके वाणिज्यिक रूप से दोहन योग्य भंडार नहीं हैं। |
| नमक (Salt) | सोडियम क्लोराइड | भोजन, खाद्य संरक्षण और रासायनिक उद्योग में। | चीन, अमेरिका, भारत। | भारत नमक का एक प्रमुख उत्पादक है (समुद्री जल, झीलों और चट्टानी नमक से)। |
| एस्बेस्टस (Asbestos) | रेशेदार सिलिकेट खनिज | ऊष्मा रोधी और अग्निरोधी।<br/>उपयोग: छत की चादरें, पाइप। (नोट: स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक (कैंसरकारी) होने के कारण अब इसका उपयोग प्रतिबंधित है।) | रूस, चीन, कजाकिस्तान। | – |
| संगमरमर, बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट | निर्माण और सजावटी पत्थर | इमारतों, स्मारकों और मूर्तियों के निर्माण के लिए। | भारत, चीन, इटली, स्पेन। | भारत में विशेष रूप से राजस्थान उच्च गुणवत्ता वाले संगमरमर और बलुआ पत्थर के लिए प्रसिद्ध है। |
निष्कर्ष
अधात्विक खनिज हमारे दैनिक जीवन में पर्दे के पीछे रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सीमेंट और पत्थर के बिना हमारा निर्माण उद्योग, उर्वरकों के बिना हमारी कृषि और अभ्रक के बिना हमारा इलेक्ट्रॉनिक उद्योग असंभव होगा। इनका आर्थिक महत्व धात्विक खनिजों से कम नहीं है, हालांकि इनकी मात्रा और वितरण भिन्न होता है।
3. ऊर्जा खनिज (Energy Minerals): परीक्षा की दृष्टि से
ऊर्जा खनिज वे खनिज हैं जिनका उपयोग ऊष्मा और ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। ये आधुनिक औद्योगिक समाजों, परिवहन प्रणालियों और घरेलू जीवन के संचालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन्हें ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत माना जाता है।
ऊर्जा खनिजों को मोटे तौर पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels)
- परमाणु/नाभिकीय खनिज (Atomic/Nuclear Minerals)
1. जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels)
ये अनवीकरणीय (Non-renewable) ऊर्जा खनिज हैं, जिनका निर्माण लाखों वर्ष पहले दबे हुए जैविक पदार्थों (मृत पौधों और जानवरों) के अपघटन से हुआ है। ये वैश्विक ऊर्जा खपत का सबसे बड़ा हिस्सा हैं।
A. कोयला (Coal)
- प्रकार: ठोस हाइड्रोकार्बन।
- महत्व:
- यह दुनिया का सबसे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध जीवाश्म ईंधन है।
- ताप विद्युत संयंत्रों (Thermal Power Plants) में बिजली उत्पादन का मुख्य स्रोत है।
- लौह-इस्पात उद्योग में धातुकर्म कोक (Coking Coal) के रूप में अनिवार्य है।
- वर्गीकरण (गुणवत्ता के आधार पर): एन्थ्रेसाइट (सर्वोत्तम), बिटुमिनस, लिग्नाइट, पीट (निम्नतम)।
- प्रमुख वैश्विक उत्पादक: चीन, भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया।
- पर्यावरणीय प्रभाव: दहन से भारी मात्रा में CO₂, सल्फर डाइऑक्साइड (अम्लीय वर्षा), और कालिख निकलती है, जो इसे सबसे अधिक प्रदूषणकारी ईंधन बनाता है।
B. पेट्रोलियम (Petroleum) / कच्चा तेल (Crude Oil)
- प्रकार: तरल हाइड्रोकार्बन का जटिल मिश्रण।
- महत्व:
- यह परिवहन क्षेत्र (Transport Sector) – पेट्रोल, डीजल, विमानन ईंधन (ATF) – की जीवन रेखा है।
- इसे “तरल सोना” (Liquid Gold) भी कहा जाता है।
- यह पेट्रोकेमिकल उद्योग (प्लास्टिक, उर्वरक, सिंथेटिक फाइबर) का आधार है।
- प्रमुख वैश्विक उत्पादक: अमेरिका, रूस, सऊदी अरब, कनाडा, इराक। OPEC एक प्रमुख उत्पादक कार्टेल है।
- पर्यावरणीय प्रभाव: इसके दहन से वायु प्रदूषण होता है। तेल रिसाव (Oil Spills) समुद्री पारिस्थितिकी के लिए विनाशकारी होते हैं।
C. प्राकृतिक गैस (Natural Gas)
- प्रकार: गैसीय हाइड्रोकार्बन, जिसमें मुख्य रूप से मीथेन (Methane, CH₄) होती है।
- महत्व:
- यह जीवाश्म ईंधनों में सबसे स्वच्छ है, क्योंकि इसके जलने से कोयले और तेल की तुलना में बहुत कम CO₂ और प्रदूषक निकलते हैं।
- इसका उपयोग बिजली उत्पादन, घरेलू ईंधन (PNG), वाहन ईंधन (CNG) और उद्योगों में होता है।
- इसे एक “सेतु ईंधन” (Bridge Fuel) माना जाता है जो उच्च-कार्बन वाले ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण में मदद करता है।
- प्रकार: परंपरागत और अपरंपरागत (शेल गैस, कोल-बेड मीथेन)।
- प्रमुख वैश्विक उत्पादक: अमेरिका, रूस, ईरान, कतर।
2. परमाणु/नाभिकीय खनिज (Atomic/Nuclear Minerals)
ये वे रेडियोधर्मी खनिज हैं जिनके परमाणुओं के नाभिक में संग्रहीत ऊर्जा को नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) प्रक्रिया द्वारा मुक्त करके बिजली उत्पन्न की जाती है। चूँकि ये खनिज पृथ्वी की भूपर्पटी से खनन द्वारा निकाले जाते हैं और इनका भंडार सीमित है, इन्हें भी अनवीकरणीय (Non-renewable) ऊर्जा खनिज माना जाता है।
A. यूरेनियम (Uranium)
- महत्व: यह वर्तमान में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का मुख्य ईंधन है।
- अयस्क: इसका मुख्य अयस्क पिचब्लेंड (Pitchblende) है।
- समस्थानिक: प्राकृतिक यूरेनियम में मुख्य रूप से U-238 (99.3%) और U-235 (0.7%) होते हैं। विखंडन के लिए U-235 का उपयोग होता है, जिसे संवर्धन (Enrichment) प्रक्रिया द्वारा बढ़ाया जाता है।
- प्रमुख वैश्विक उत्पादक: कजाकिस्तान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, नामीबिया।
- भारत में: जादूगोड़ा (झारखंड), आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भंडार।
B. थोरियम (Thorium)
- महत्व: यह यूरेनियम की तुलना में अधिक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और इसे भविष्य का परमाणु ईंधन माना जाता है।
- अयस्क: यह मोनाजाइट (Monazite) नामक खनिज से प्राप्त होता है।
- भारत का महत्व: भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा थोरियम का भंडार है, जो मुख्य रूप से केरल के तटीय रेत में पाया जाता है। [यह UPSC/State PSC के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है।]
- प्रक्रिया: थोरियम सीधे विखंडनीय नहीं है; इसे रिएक्टर में U-233 में बदला जाता है, जो फिर ईंधन के रूप में उपयोग होता है। भारत का त्रि-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम इसी तकनीक पर केंद्रित है।
ऊर्जा खनिजों की मुख्य विशेषताएँ (परीक्षा हेतु)
| विशेषता | विवरण |
| अनवीकरणीय प्रकृति | ये सभी संसाधन समाप्य हैं, जिनका संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। |
| असमान वितरण | ऊर्जा खनिजों का वैश्विक वितरण बहुत असमान है, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, भू-राजनीति और संघर्ष का एक प्रमुख कारण है। मध्य-पूर्व का तेल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। |
| पर्यावरणीय प्रभाव | जीवाश्म ईंधन जलवायु परिवर्तन (Global Warming) और वायु प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत हैं। परमाणु ऊर्जा से ग्रीनहाउस गैस नहीं निकलती, लेकिन रेडियोधर्मी कचरे का निपटान और दुर्घटना का खतरा सबसे बड़ी चिंताएँ हैं। |
| ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) | प्रत्येक देश अपने आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए इन खनिजों की एक स्थिर और सस्ती आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है, जिसे ऊर्जा सुरक्षा कहा जाता है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं, के लिए यह एक प्रमुख चुनौती है। |
खनिजों की प्रमुख विशेषताएँ (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण)
| विशेषता | विवरण |
| अनवीकरणीय (Non-renewable) | खनिज एक समाप्य (Exhaustible) संसाधन हैं। इनके निर्माण में लाखों वर्ष लगते हैं, और इनके भंडार सीमित हैं। इसलिए, इनका संरक्षण और पुनर्चक्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है। |
| असमान वितरण (Uneven Distribution) | खनिजों का वितरण पृथ्वी पर बहुत असमान है। कुछ देश खनिजों से अत्यंत समृद्ध हैं (जैसे दक्षिण अफ्रीका में सोना/हीरा, चिली में तांबा), जबकि कई देशों में इनकी कमी है। यह असमान वितरण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीति को प्रभावित करता है। |
| गुणवत्ता और मात्रा में विपरीत संबंध | आमतौर पर, उच्च गुणवत्ता (High-grade) वाले खनिजों का भंडार कम मात्रा में होता है, जबकि निम्न गुणवत्ता (Low-grade) वाले खनिजों का भंडार अधिक मात्रा में पाया जाता है। |
| खनन प्रक्रिया (Mining) | खनिजों को पृथ्वी से खनन द्वारा निकाला जाता है, जिसके गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव हो सकते हैं, जैसे वनों की कटाई, मृदा अपरदन, जल प्रदूषण और विस्थापन। |
चट्टानों में खनिजों की उपस्थिति (Occurrence of Minerals in Rocks)
| चट्टान का प्रकार | संबंधित खनिज |
| आग्नेय और कायांतरित चट्टानें (Igneous and Metamorphic Rocks) | इन चट्टानों के शिराओं (Veins) और लोड्स (Lodes) में अक्सर धात्विक खनिज पाए जाते हैं, जैसे तांबा, जस्ता, सीसा, सोना। |
| अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks) | इन चट्टानों की परतों (Beds or Layers) में अक्सर अधात्विक खनिज और ऊर्जा खनिज पाए जाते हैं, जैसे कोयला, चूना पत्थर, जिप्सम, पोटाश, पेट्रोलियम। |
| धरातलीय चट्टानों का अपघटन (Decomposition of Surface Rocks) | चट्टानों के घुलनशील घटकों के अपक्षय से बची हुई अवशिष्ट मिट्टी में बॉक्साइट जैसे अयस्क बनते हैं। |
| जलोढ़ निक्षेप (Alluvial Deposits) / प्लेसर निक्षेप (Placer Deposits) | पहाड़ियों के आधार पर या नदी घाटियों की रेत में मूल्यवान खनिज (जो कटाव से प्रतिरोधी होते हैं) जमा हो जाते हैं, जैसे सोना, चांदी, टिन, प्लैटिनम। |
खनिजों के निष्कर्षण की विभिन्न तकनीकें (Various Techniques of Mineral Extraction)
पृथ्वी की भूपर्पटी से खनिजों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को खनन (Mining) कहा जाता है। उपयोग की जाने वाली तकनीक इस बात पर निर्भर करती है कि खनिज कितनी गहराई पर है, अयस्क की प्रकृति कैसी है, और आर्थिक तथा पर्यावरणीय कारक क्या हैं।
खनिजों के निष्कर्षण की तकनीकों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- सतही खनन (Surface Mining)
- भूमिगत खनन (Underground Mining)
इनके अलावा, कुछ अन्य विशिष्ट तकनीकें भी हैं।
1. सतही खनन (Surface Mining)
यह विधि तब अपनाई जाती है जब खनिज अयस्क पृथ्वी की सतह के निकट कम गहराई पर मौजूद होते हैं। इसमें अयस्क तक पहुँचने के लिए ऊपर की मिट्टी, वनस्पति और चट्टानों (जिन्हें अधिभार – Overburden कहा जाता है) को हटा दिया जाता है। यह भूमिगत खनन की तुलना में सस्ता, तेज और सुरक्षित होता है, लेकिन इसका पर्यावरणीय प्रभाव बहुत अधिक होता है।
इसके प्रमुख प्रकार हैं:
A. विवृत-खदान खनन / ओपन-पिट माइनिंग (Open-pit Mining)
- प्रक्रिया: इसमें जमीन पर एक बहुत बड़ा, खुला गड्ढा (Pit) बनाया जाता है। अयस्क को निकालने के लिए सीढ़ीनुमा benches (बेंच) का निर्माण करते हुए गड्ढे को लगातार गहरा और चौड़ा किया जाता है।
- उपयोग: यह धात्विक खनिजों जैसे लौह अयस्क, तांबा, बॉक्साइट, सोना, हीरा और निर्माण सामग्री (जैसे ग्रेनाइट, संगमरमर) को निकालने के लिए सबसे आम तरीका है।
- उदाहरण: चिली में चुक्वीकमाटा (Chuquicamata) तांबे की खदान।
B. पट्टी खनन / स्ट्रिप माइनिंग (Strip Mining)
- प्रक्रिया: यह विधि तब उपयोग की जाती है जब खनिज (विशेषकर कोयला) सतह के समानांतर एक क्षैतिज परत (Horizontal Seam) में मौजूद होता है। इसमें एक लंबी पट्टी से अधिभार (Overburden) हटाकर अयस्क निकाला जाता है। फिर उस पट्टी को भरकर, उसके बगल वाली पट्टी से अधिभार हटाकर वहाँ डाला जाता है और अयस्क निकाला जाता है।
- उपयोग: मुख्य रूप से कोयला (Coal) और लिग्नाइट के खनन के लिए।
C. पर्वत शिखर हटाना / माउंटेनटॉप रिमूवल (Mountaintop Removal)
- प्रक्रिया: यह एक अत्यंत विवादास्पद विधि है, जिसमें किसी पर्वत के शिखर या ऊपरी हिस्से को विस्फोटकों से उड़ा दिया जाता है ताकि नीचे दबे कोयले की परतों तक पहुँचा जा सके। उड़ाए गए मलबे को अक्सर पास की घाटियों में भर दिया जाता है।
- उपयोग: मुख्य रूप से कोयले के लिए, विशेषकर अमेरिका के एपलेशियन पर्वतों में।
- प्रभाव: यह विधि पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी रूप से नष्ट कर देती है।
D. उत्खनन / क्वारीइंग (Quarrying)
- प्रक्रिया: यह ओपन-पिट माइनिंग के समान है, लेकिन इसका उपयोग मुख्य रूप से निर्माण सामग्री को निकालने के लिए किया जाता है। गड्ढा उतना गहरा नहीं होता।
- उपयोग: रेत, बजरी, चूना पत्थर, संगमरमर, ग्रेनाइट, स्लेट जैसी निर्माण सामग्री निकालने के लिए।
2. भूमिगत खनन (Underground Mining)
यह विधि तब अपनाई जाती है जब अयस्क भंडार पृथ्वी की सतह से बहुत अधिक गहराई में स्थित होते हैं। इसमें अयस्क तक पहुँचने के लिए ऊर्ध्वाधर (Vertical) शाफ्ट (Shafts) या क्षैतिज (Horizontal) सुरंगें (Tunnels/Adits) खोदी जाती हैं, और फिर अयस्क को निकालकर सतह पर लाया जाता है।
- तुलना: यह सतही खनन की तुलना में अधिक महंगा, जोखिम भरा और धीमा होता है। इसमें खनिकों के लिए दुर्घटना (जैसे खदान का धँसना, जहरीली गैसों का रिसाव) का खतरा अधिक होता है।
- पर्यावरणीय प्रभाव: सतही खनन की तुलना में इसका प्रत्यक्ष पर्यावरणीय प्रभाव (जैसे भूमि का विनाश) कम होता है, लेकिन इससे भी खनन अवशिष्ट (Mine Tailing) और भूमि धँसान (Subsidence) जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
इसके प्रमुख प्रकार हैं:
- शाफ्ट माइनिंग (Shaft Mining): गहरी परतों तक पहुँचने के लिए ऊर्ध्वाधर कुएँ या शाफ्ट खोदे जाते हैं। (उदाहरण: सोने और हीरे की गहरी खदानें)।
- स्लोप/ड्रिफ्ट माइनिंग (Slope/Drift Mining): अयस्क तक पहुँचने के लिए तिरछी या क्षैतिज सुरंगें बनाई जाती हैं, खासकर पहाड़ी इलाकों में।
- रूम एंड पिलर माइनिंग (Room and Pillar Mining): कोयला खनन में आम विधि, जहाँ अयस्क को “कमरों” (Rooms) के रूप में निकाला जाता है और छत को सहारा देने के लिए कोयले या चट्टान के स्तंभ (Pillars) छोड़ दिए जाते हैं।
3. अन्य विशिष्ट तकनीकें
A. प्लेसर खनन (Placer Mining)
- प्रक्रिया: इस विधि का उपयोग नदी की रेत या जलोढ़ निक्षेपों (Alluvial Deposits) में मौजूद भारी खनिजों को निकालने के लिए किया जाता है। इसमें पानी की धार का उपयोग करके रेत और बजरी को धोया जाता है, जिससे भारी खनिज (जैसे सोना) नीचे बैठ जाते हैं और अलग हो जाते हैं। इसे “पैनिंग” (Panning) भी कहते हैं।
- उपयोग: सोना (Gold), टिन, प्लैटिनम, हीरा जैसे भारी और मूल्यवान खनिजों के लिए।
B. इन-सीटू लीचिंग (In-situ Leaching – ISL) / सॉल्यूशन माइनिंग
- प्रक्रिया: यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें अयस्क को भौतिक रूप से बाहर निकालने के बजाय, जमीन के नीचे ही एक घोलक (Solvent), आमतौर पर एक कमजोर एसिड, को पंप किया जाता है। यह घोलक चट्टानों से खनिज को घोल लेता है, और फिर इस खनिज युक्त घोल को सतह पर पंप कर लिया जाता है।
- उपयोग: यह यूरेनियम (Uranium) और तांबे के कम-ग्रेड वाले अयस्कों के लिए तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
- लाभ: सतह पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है।
- हानि: भूजल के संदूषण का गंभीर खतरा रहता है।
C. वेधन / ड्रिलिंग (Drilling)
- प्रक्रिया: यह विधि तरल और गैसीय खनिजों को निकालने के लिए उपयोग की जाती है। इसमें सतह से बहुत गहरे कुएँ खोदे जाते हैं।
- उपयोग: पेट्रोलियम (Crude Oil) और प्राकृतिक गैस (Natural Gas) के निष्कर्षण के लिए।
| खनन का प्रकार | खनिज की स्थिति | उदाहरण | पर्यावरणीय प्रभाव |
| सतही खनन (Surface) | सतह के निकट | कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट | बहुत अधिक (भूमि विनाश) |
| भूमिगत खनन (Underground) | अधिक गहराई में | सोना, हीरा, तांबा | मध्यम (भूमि धँसान) |
| वेधन (Drilling) | तरल/गैसीय | पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस | मध्यम (तेल रिसाव) |
लौह अयस्क (Iron Ore): परीक्षा की दृष्टि से (नवीनतम डेटा सहित)
लौह अयस्क एक धात्विक, लौह-युक्त (Ferrous) खनिज है, जिससे धातु-रूप में लोहा प्राप्त किया जाता है। यह आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का आधार या “मेरुदंड” (Backbone of Modern Industry) है, क्योंकि इससे बनने वाला इस्पात (Steel) निर्माण, मशीनरी, परिवहन और लगभग हर उद्योग के लिए अनिवार्य है।
लौह अयस्क के प्रकार (Types of Iron Ore)
अयस्क में मौजूद लोहे की मात्रा और उसकी गुणवत्ता के आधार पर इसे चार मुख्य प्रकारों में बांटा जाता है। यह परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाने वाला खंड है।
| अयस्क का नाम | लोहे की मात्रा (%) | विशेषताएँ (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण) |
| 1. मैग्नेटाइट (Magnetite) | ~ 72% | * यह सर्वोत्तम गुणवत्ता (Best Quality) का लौह अयस्क है।<br/>* इसमें उत्कृष्ट चुंबकीय गुण (Magnetic properties) होते हैं, जो इसे विद्युत उद्योग के लिए मूल्यवान बनाते हैं।<br/>* भारत में यह कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और गोवा में पाया जाता है। |
| 2. हेमाटाइट (Hematite) | 60 – 70% | * यह औद्योगिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण और सर्वाधिक उपयोग किया जाने वाला लौह अयस्क है।<br/>* इसका रंग लाल या भूरा होता है (जिसके कारण इसे ‘गेरू’ भी कहते हैं)।<br/>* भारत में पाया जाने वाला अधिकांश लौह अयस्क हेमाटाइट श्रेणी का है। |
| 3. लिमोनाइट (Limonite) | 40 – 60% | * यह निम्न गुणवत्ता का अयस्क है।<br/>* इसका रंग पीला होता है और यह जलयोजित (Hydrated) लौह ऑक्साइड होता है। |
| 4. साइडराइट (Siderite) | < 40% | * यह सबसे निम्न गुणवत्ता का लौह अयस्क है।<br/>* इसमें बहुत अधिक अशुद्धियाँ होती हैं, इसलिए इसका आर्थिक रूप से खनन अक्सर लाभप्रद नहीं होता। |
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Latest Global Data ~2023)
| श्रेणी | देश (घटते क्रम में) |
| विश्व के सबसे बड़े भंडार (Reserves) | 1. ऑस्ट्रेलिया, 2. ब्राजील, 3. रूस, 4. चीन, 5. भारत |
| विश्व के सबसे बड़े उत्पादक (Producers) | 1. ऑस्ट्रेलिया, 2. ब्राजील, 3. चीन, 4. भारत (विश्व में चौथा सबसे बड़ा उत्पादक) |
प्रमुख क्षेत्र: ऑस्ट्रेलिया का पिलबारा क्षेत्र (Pilbara Region) और ब्राजील की काराजास खदान (Carajás Mine) दुनिया की सबसे बड़ी लौह अयस्क खदानों में से हैं।
भारत में लौह अयस्क (Latest Indian Data ~2022-23)
1. भंडार और उत्पादन (Reserves and Production)
- भंडार: भारत में हेमाटाइट और मैग्नेटाइट दोनों के विशाल भंडार हैं।
- कुल भंडार की दृष्टि से राज्य: 1. ओडिशा, 2. झारखंड, 3. छत्तीसगढ़, 4. कर्नाटक।
- उत्पादन: भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा लौह अयस्क उत्पादक है।
- उत्पादन की दृष्टि से अग्रणी राज्य: [UPPSC, SSC, RRB के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण]
- ओडिशा (Odisha): भारत के कुल उत्पादन का 50% से अधिक हिस्सा अकेले उत्पादित करता है, जिससे यह निर्विवाद रूप से अग्रणी है।
- छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh)
- कर्नाटक (Karnataka)
- झारखंड (Jharkhand)
- उत्पादन की दृष्टि से अग्रणी राज्य: [UPPSC, SSC, RRB के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण]
2. भारत की प्रमुख लौह अयस्क पेटियाँ (Major Iron Ore Belts in India)
यह UPSC और State PSC की परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण खंडों में से एक है।
| पेटी का नाम | विस्तार (राज्य) | प्रमुख खदानें और विशेषताएँ |
| 1. ओडिशा-झारखंड पेटी | ओडिशा और झारखंड | * ओडिशा: मयूरभंज जिले में बादामपहाड़, गुरुमहिसानी और सुलेपात खदानें। क्योंझर जिला।<br/>* झारखंड: सिंहभूम जिले में नोआमुंडी और गुवा खदानें।<br/>* यहाँ उच्च गुणवत्ता का हेमाटाइट अयस्क पाया जाता है। |
| 2. दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर पेटी | छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र | * छत्तीसगढ़: बस्तर जिले की बैलाडिला (Bailadila) पर्वत श्रृंखलाएँ अत्यंत उच्च गुणवत्ता वाले हेमाटाइट के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। [CDS]<br/>* विशेष तथ्य: यहाँ से निकाले गए अयस्क को जापान और दक्षिण कोरिया को विशाखापत्तनम बंदरगाह के माध्यम से निर्यात किया जाता है। |
| 3. बल्लारी-चित्रदुर्ग-चिकमंगलूर-तुमकुरु पेटी | कर्नाटक | * कर्नाटक में लौह अयस्क के विशाल भंडार हैं।<br/>* कुद्रेमुख (Kudremukh) खदानें (अब बंद) विश्व की सबसे बड़ी खदानों में से थीं। यहाँ से अयस्क को पाइपलाइन के माध्यम से घोल (Slurry) बनाकर मंगलुरु बंदरगाह तक ले जाया जाता था।<br/>* बाबाबूदान की पहाड़ियाँ (Bababudan Hills) भी प्रसिद्ध हैं। |
| 4. महाराष्ट्र-गोवा पेटी | गोवा और महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला | * यहाँ का अयस्क बहुत उच्च गुणवत्ता का नहीं है।<br/>* फिर भी, इसका कुशलतापूर्वक खनन किया जाता है और मार्मागाओ (Mormugao) बंदरगाह से इसका निर्यात किया जाता है। |
3. व्यापार (Trade)
- भारत उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के प्रमुख निर्यातकों में से एक है।
- प्रमुख खरीदार देश: जापान, दक्षिण कोरिया, चीन।
- प्रमुख निर्यातक बंदरगाह: पारादीप (ओडिशा), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश), मार्मागाओ (गोवा), मंगलुरु (कर्नाटक)।
निष्कर्ष: लौह अयस्क भारत की खनिज संपदा और औद्योगिक आधार का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। ओडिशा उत्पादन में स्पष्ट रूप से अग्रणी है, और बैलाडिला जैसी खदानें विश्व स्तर पर अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं।
मैंगनीज (Manganese – Mn): परीक्षा की दृष्टि से
मैंगनीज एक धात्विक, लौह-युक्त (Ferrous) खनिज है जो प्रकृति में स्वतंत्र रूप से नहीं मिलता, बल्कि अन्य तत्वों, विशेषकर लोहे, के साथ मिश्रित पाया जाता है। यह लौह और इस्पात उद्योग के लिए एक अपरिहार्य (Indispensable) कच्चा माल है, जिस कारण इसे एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खनिज माना जाता है।
मैंगनीज के उपयोग (Uses of Manganese)
| उपयोग का क्षेत्र | विवरण और महत्व |
| 1. लौह और इस्पात उद्योग (मुख्य उपयोग) | यह मैंगनीज का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा उपयोग (लगभग 85-90%) है।<br/> * इस्पात निर्माण (Steel Making): लगभग 1 टन स्टील बनाने के लिए लगभग 10 किलोग्राम मैंगनीज अयस्क की आवश्यकता होती है। [SSC, RRB – यह तथ्य अक्सर पूछा जाता है।]<br/> * कार्य: इसे इस्पात में एक वि-ऑक्सीकारक (Deoxidizer) और वि-गंधक (Desulfurizer) के रूप में मिलाया जाता है, जो अशुद्धियों को हटाता है। यह स्टील को अत्यधिक मजबूत, कठोर, और घिसाव-रोधी बनाता है।<br/> * फेरो-मैंगनीज (Ferro-Manganese): लौह अयस्क के साथ मैंगनीज को गलाकर फेरो-मैंगनीज मिश्र धातु बनाई जाती है, जिसका सीधा उपयोग इस्पात बनाने में होता है। |
| 2. शुष्क सेल बैटरी (Dry Cell Batteries) | मैंगनीज डाइऑक्साइड का उपयोग शुष्क सेल बैटरियों में एक विध्रुवक (depolarizer) के रूप में किया जाता है। |
| 3. रासायनिक उद्योग | ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशकों, पेंट, वार्निश और रासायनिक अभिकर्मकों के निर्माण में। |
| 4. कांच उद्योग | कांच को गुलाबी रंग देने और अशुद्धियों को दूर करके उसे साफ करने के लिए। |
| 5. मिश्र धातु निर्माण (Alloy Making) | एल्यूमीनियम के साथ मिलकर यह एक मजबूत मिश्र धातु बनाता है जिसका उपयोग पेय पदार्थों के केन (Cans) बनाने में होता है। |
अयस्क (Ores of Manganese)
मैंगनीज के मुख्य अयस्क हैं:
- पायरोलुसाइट (Pyrolusite) – सबसे महत्वपूर्ण।
- साइलोमेलेन (Psilomelane)
- रोडोनाइट (Rhodonite)
- ब्रॉनाइट (Braunite)
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Latest Global Data ~2023)
| श्रेणी | देश (घटते क्रम में) |
| विश्व के सबसे बड़े भंडार (Reserves) | 1. दक्षिण अफ्रीका (दुनिया के कुल भंडार का 70% से अधिक), 2. यूक्रेन, 3. ब्राजील, 4. ऑस्ट्रेलिया, 5. भारत |
| विश्व के सबसे बड़े उत्पादक (Producers) | 1. दक्षिण अफ्रीका, 2. गैबॉन, 3. ऑस्ट्रेलिया, 4. चीन, … 6. भारत |
विशेष तथ्य: कालाहारी मैंगनीज क्षेत्र, दक्षिण अफ्रीका (Kalahari Manganese Field) दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध मैंगनीज भंडार है।
भारत में मैंगनीज (Latest Indian Data ~2022-23)
भारत मैंगनीज के उत्पादन और भंडार दोनों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
1. भंडार और उत्पादन (Reserves and Production)
- भंडार: भारत में मैंगनीज का अच्छा भंडार है, जो मुख्य रूप से धारवाड़ युग की चट्टानों से जुड़ा है।
- कुल भंडार की दृष्टि से राज्य: [UPPSC]
- ओडिशा (Odisha) – (कुल भंडार का लगभग 44%)
- कर्नाटक (Karnataka)
- मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh)
- कुल भंडार की दृष्टि से राज्य: [UPPSC]
- उत्पादन: भारत दुनिया का छठा सबसे बड़ा मैंगनीज उत्पादक है।
- उत्पादन की दृष्टि से अग्रणी राज्य: [BPSC, CDS – यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।]
- मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh): बालाघाट खदान भारत की सबसे बड़ी मैंगनीज खदान है, और यह राज्य को भारत का सबसे बड़ा उत्पादक बनाती है।
- महाराष्ट्र (Maharashtra): नागपुर और भंडारा जिले प्रमुख केंद्र हैं।
- ओडिशा (Odisha): क्योंझर और सुंदरगढ़ जिले प्रमुख हैं।
- कर्नाटक (Karnataka): शिमोगा, बेल्लारी, चित्रदुर्ग।
- उत्पादन की दृष्टि से अग्रणी राज्य: [BPSC, CDS – यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।]
2. प्रमुख खदानें और क्षेत्र
- मध्य प्रदेश: बालाघाट-छिंदवाड़ा पेटी, विशेष रूप से भारवेली (Bharveli) खदान (बालाघाट), जो एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत मैंगनी-उत्पादक खदान है।
- महाराष्ट्र: नागपुर-भंडारा पेटी।
- ओडिशा: क्योंझर (Kendujhar), सुंदरगढ़, कोरापुट, कालाहांडी।
- कर्नाटक: बेल्लारी-होसपेट-संडूर क्षेत्र।
3. व्यापार (Trade)
- भारत अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाले मैंगनीज और फेरो-मैंगनीज का निर्यात भी करता है।
- प्रमुख आयातक देश: जापान, चीन।
निष्कर्ष: मैंगनीज भारतीय अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से इसके इस्पात उद्योग के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है। उत्पादन में मध्य प्रदेश (बालाघाट खदान) और भंडार में ओडिशा का प्रभुत्व है। स्टील बनाने में इसकी अपरिहार्य भूमिका इसे एक रणनीतिक खनिज बनाती है।
कोबाल्ट (Cobalt – Co): परीक्षा की दृष्टि से (नवीनतम डेटा सहित)
कोबाल्ट एक धात्विक, लौह-चुंबकीय (Ferromagnetic) खनिज है, जो अपने अद्वितीय गुणों के कारण उच्च-प्रौद्योगिकी (High-tech) और हरित ऊर्जा (Green Energy) उद्योगों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक (Critical and Strategic) खनिज बन गया है। इसका अधिकांश उत्पादन कुछ ही देशों में केंद्रित होने के कारण यह भू-राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील है।
कोबाल्ट के उपयोग: भविष्य की प्रौद्योगिकी का आधार
कोबाल्ट के उपयोग ने इसे 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण खनिजों में से एक बना दिया है।
| उपयोग का क्षेत्र | विवरण और महत्व (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण) |
| 1. रिचार्जेबल बैटरी (Rechargeable Batteries) – मुख्य उपयोग | यह कोबाल्ट का सबसे बड़ा और सबसे तेजी से बढ़ता हुआ उपयोग है।<br/> * लिथियम-आयन बैटरी (Lithium-ion Batteries): कोबाल्ट का उपयोग लिथियम-आयन बैटरी के कैथोड (Cathode) को स्थिर करने के लिए किया जाता है। यह बैटरी की ऊर्जा घनत्व (Energy Density) को बढ़ाता है, जिससे वे अधिक समय तक चार्ज रहती हैं और उनका जीवनकाल बढ़ता है।<br/> * अनुप्रयोग: इलेक्ट्रिक वाहन (Electric Vehicles – EVs), स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य सभी पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में।<br/> * “ऊर्जा धातु” (Energy Metal): EV क्रांति के कारण, कोबाल्ट को लिथियम और निकल के साथ एक प्रमुख “ऊर्जा धातु” माना जाता है। |
| 2. सुपरएलॉय (Superalloys) | * ये निकल, कोबाल्ट और अन्य धातुओं से बने उच्च-प्रदर्शन वाले मिश्र धातु होते हैं।<br/> * गुण: ये अत्यधिक उच्च तापमान, दबाव और संक्षारण (Corrosion) का सामना कर सकते हैं।<br/> * उपयोग: जेट इंजन टरबाइन, गैस टरबाइन, और एयरोस्पेस उद्योग में। |
| 3. कठोर धातुएं और काटने के उपकरण (Hard Metals & Cutting Tools) | टंगस्टन कार्बाइड जैसे पदार्थों के साथ मिलाकर, कोबाल्ट सीमेंटेड कार्बाइड बनाता है जो अत्यंत कठोर और घिसाव-रोधी होता है।<br/>उपयोग: औद्योगिक मशीनरी के लिए ड्रिलिंग और कटिंग उपकरण बनाने में। |
| 4. चुंबक (Magnets) | Alnico (एल्यूमीनियम, निकल, कोबाल्ट) जैसी स्थायी चुंबक बनाने में। |
| 5. रंजक और पिगमेंट (Pigments) | प्राचीन काल से, कोबाल्ट का उपयोग कांच, सिरेमिक और पेंट को एक गहरा नीला रंग (“Cobalt Blue”) देने के लिए किया जाता रहा है। |
अयस्क (Ores of Cobalt)
कोबाल्ट का शायद ही कभी अकेले खनन किया जाता है। यह आमतौर पर तांबे (Copper) और निकल (Nickel) के अयस्कों के सह-उत्पाद (By-product) के रूप में प्राप्त होता है।
इसके मुख्य अयस्क हैं:
- कोबाल्टाइट (Cobaltite)
- स्माल्टाइट (Smaltite)
- एरिथ्राइट (Erythrite)
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Latest Global Data ~2023)
यह खंड भू-राजनीति और आपूर्ति श्रृंखला के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
| श्रेणी | देश (घटते क्रम में) | महत्वपूर्ण तथ्य |
| विश्व के सबसे बड़े भंडार (Reserves) | 1. कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC): विश्व के कुल भंडार का लगभग 50% यहीं है।<br/>2. ऑस्ट्रेलिया<br/>3. क्यूबा<br/>4. फिलीपींस | DRC पर अत्यधिक निर्भरता एक बड़ी वैश्विक चिंता है। |
| विश्व के सबसे बड़े उत्पादक (Mine Production) | 1. कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC): विश्व के कुल उत्पादन का 70% से अधिक अकेले उत्पादित करता है। यह इस पर अपना लगभग एकाधिकार बनाता है। [UPSC, CDS – यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।]<br/>2. इंडोनेशिया<br/>3. रूस<br/>4. ऑस्ट्रेलिया | DRC में राजनीतिक अस्थिरता, बाल श्रम और अनैतिक खनन की चिंताएं वैश्विक कोबाल्ट आपूर्ति श्रृंखला के लिए एक बड़ा जोखिम हैं। |
| रिफाइंड कोबाल्ट का सबसे बड़ा उत्पादक | 1. चीन (China) | यद्यपि चीन में कोबाल्ट का खनन बहुत कम होता है, लेकिन यह DRC से कच्चा कोबाल्ट आयात करके उसे रिफाइन (परिष्कृत) करने में दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। यह बैटरी निर्माण की आपूर्ति श्रृंखला में चीन के प्रभुत्व को दर्शाता है। |
भारत में कोबाल्ट
भारत अपनी कोबाल्ट की जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। यहाँ कोबाल्ट का कोई महत्वपूर्ण प्राथमिक खनन नहीं होता है।
- भंडार: भारत में कोबाल्ट के बहुत सीमित और निम्न-श्रेणी के भंडार हैं, जो झारखंड, ओडिशा और नागालैंड राज्यों में तांबे, निकल और क्रोमाइट अयस्कों के साथ जुड़े हुए हैं। इनका आर्थिक रूप से दोहन अभी तक संभव नहीं हुआ है।
- समुद्रयान मिशन: भारत सरकार का महत्वाकांक्षी “समुद्रयान मिशन” (Samudrayaan Mission) हिंद महासागर में पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स (Polymetallic Nodules) का पता लगाने और खनन की तकनीक विकसित करने पर केंद्रित है। इन नोड्यूल्स में निकल, तांबा, कोबाल्ट और मैंगनीज जैसी महत्वपूर्ण धातुएं मौजूद हैं। यह मिशन भविष्य में भारत की कोबाल्ट पर आयात निर्भरता को कम करने में मदद कर सकता है।
- महत्व: इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी निर्माण के लिए भारत के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों (जैसे फेम इंडिया योजना – FAME India Scheme) को देखते हुए, कोबाल्ट की एक स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना भारत के लिए एक प्रमुख रणनीतिक चुनौती है। भारत इस दिशा में ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और चिली जैसे देशों के साथ खनिज साझेदारी विकसित कर रहा है।
निष्कर्ष: कोबाल्ट आज की दुनिया की हरित और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए एक “अपरिहार्य खनिज” बन चुका है। इसका उत्पादन कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में और शोधन चीन में केंद्रित होने के कारण यह एक गंभीर आपूर्ति श्रृंखला जोखिम प्रस्तुत करता है, जिसे भारत जैसे देश अपनी रणनीतिक साझेदारी और समुद्र-आधारित अन्वेषण के माध्यम से कम करने का प्रयास कर रहे हैं।
क्रोमियम (Chromium – Cr) और क्रोमाइट (Chromite): परीक्षा की दृष्टि से (नवीनतम डेटा सहित)
क्रोमियम एक कठोर, चमकीली, चांदी-ग्रे रंग की धातु है जो संक्षारण (Corrosion) और धूमिल होने (Tarnishing) के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है। यह प्रकृति में स्वतंत्र रूप से नहीं पाई जाती है। क्रोमियम का एकमात्र व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण स्रोत इसका अयस्क क्रोमाइट (Chromite) है, जो एक लौह-युक्त (Ferrous) खनिज है।
इसलिए, जब हम क्रोमियम संसाधन की बात करते हैं, तो हम वास्तव में क्रोमाइट अयस्क (Chromite Ore) की बात कर रहे होते हैं।
क्रोमियम/क्रोमाइट के उपयोग
क्रोमियम का उपयोग मुख्य रूप से तीन उद्योगों में होता है, जो लगभग बराबर महत्व रखते हैं:
| उपयोग का क्षेत्र | विवरण और महत्व (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण) |
| 1. धातुकर्म उद्योग (Metallurgical) – मुख्य उपयोग | यह क्रोमियम का सबसे बड़ा उपयोग (लगभग 80-85%) है।<br/> * स्टेनलेस स्टील (Stainless Steel): क्रोमियम स्टेनलेस स्टील का एक अनिवार्य घटक है। स्टील में लगभग 11% या उससे अधिक क्रोमियम मिलाने पर यह उसे जंग-रोधी (Rust-proof), संक्षारण-रोधी (Corrosion-resistant) और चमकदार बनाता है। यह गुण क्रोमियम के चारों ओर एक पतली, अदृश्य और सुरक्षात्मक ऑक्साइड परत बनने के कारण होता है। [SSC CGL, RRB]<br/> * सुपरएलॉय (Superalloys): निकल और कोबाल्ट के साथ मिलकर यह उच्च-प्रदर्शन वाले सुपरएलॉय बनाता है, जिनका उपयोग जेट इंजन जैसे उच्च तापमान वाले अनुप्रयोगों में होता है। |
| 2. रासायनिक उद्योग (Chemical) | क्रोमियम रसायनों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है:<br/> * पिगमेंट (Pigments): पेंट, स्याही और रबर को पीला, हरा और नारंगी रंग देने के लिए (जैसे क्रोम येलो, क्रोम ग्रीन)।<br/> * चमड़ा शोधन (Leather Tanning): चमड़े को नरम, टिकाऊ और सड़न-रोधी बनाने के लिए क्रोमियम सल्फेट का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।<br/> * लकड़ी का परिरक्षण (Wood Preservation)। |
| 3. रिफ्रेक्ट्री उद्योग (Refractory) | * रिफ्रेक्ट्री (Refractory): ये वे पदार्थ होते हैं जो अत्यधिक उच्च तापमान का सामना कर सकते हैं और पिघलते नहीं हैं।<br/> * उपयोग: क्रोमाइट अयस्क में उच्च गलनांक (High melting point) होता है। इसलिए, क्रोमाइट रेत (Chromite Sand) और क्रोम ब्रिक्स (Chrome Bricks) का उपयोग धातुओं को गलाने वाली भट्टियों (Furnaces), भट्टों (Kilns) और लैडलों के आंतरिक अस्तर (lining) के रूप में किया जाता है, ताकि वे उच्च तापमान से सुरक्षित रहें। |
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Latest Global Data ~2023)
| श्रेणी | देश (घटते क्रम में) | महत्वपूर्ण तथ्य |
| विश्व के सबसे बड़े भंडार (Reserves) | 1. कजाकिस्तान: विश्व के कुल भंडार का एक बहुत बड़ा हिस्सा यहीं है।<br/>2. दक्षिण अफ्रीका<br/>3. भारत<br/>”बुशवेल्ड कॉम्प्लेक्स” (Bushveld Complex), दक्षिण अफ्रीका, दुनिया के सबसे बड़े स्तरित आग्नेय निक्षेपों में से एक है, जिसमें प्लैटिनम के साथ क्रोमाइट के विशाल भंडार हैं। | |
| विश्व के सबसे बड़े उत्पादक (Mine Production) | 1. दक्षिण अफ्रीका: दुनिया का निर्विवाद रूप से सबसे बड़ा उत्पादक।<br/>2. कजाकिस्तान<br/>3. तुर्की<br/>4. भारत: (विश्व में शीर्ष 5 उत्पादकों में शामिल)।<br/>5. फिनलैंड | उत्पादन कुछ ही देशों में केंद्रित है, जो इसे एक रणनीतिक खनिज बनाता है। |
भारत में क्रोमाइट (Latest Indian Data ~2022-23)
भारत क्रोमाइट के भंडार और उत्पादन दोनों में एक महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी है।
1. भंडार और उत्पादन
- भंडार: भारत के पास क्रोमाइट के विशाल और उच्च गुणवत्ता वाले भंडार हैं।
- भारत के कुल भंडार का लगभग 95% से अधिक हिस्सा अकेले एक राज्य में केंद्रित है। [यह तथ्य परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।]
- उत्पादन: भारत दुनिया के शीर्ष 5 क्रोमाइट उत्पादक देशों में से एक है।
2. राज्य-वार एकाधिकार (State-wise Monopoly)
भारत में क्रोमाइट के मामले में एक राज्य का लगभग एकाधिकार है:
| राज्य | विवरण |
| ओडिशा (Odisha) | * यह राज्य भंडार (96%) और उत्पादन (लगभग 100%) दोनों में भारत में पहले स्थान पर है, जिससे इसका लगभग एकाधिकार (Monopoly) है। [UPSC, BPSC, SSC CGL – यह तथ्य सबसे महत्वपूर्ण है।]<br/> * सुकिंदा घाटी (Sukinda Valley): जाजपुर और क्योंझर जिलों में स्थित सुकिंदा घाटी, भारत का सबसे बड़ा क्रोमाइट उत्पादक क्षेत्र है और दुनिया के सबसे समृद्ध ओपन-कास्ट क्रोमाइट अयस्क भंडारों में से एक है।<br/> * प्रमुख खदानें: टाटा स्टील की सुकिंदा माइंस और ओडिशा माइनिंग कॉर्पोरेशन (OMC) की माइंस। |
अन्य छोटे भंडार: बहुत कम मात्रा में क्रोमाइट के भंडार कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मणिपुर और नागालैंड में भी पाए जाते हैं, लेकिन ओडिशा की तुलना में उनका उत्पादन नगण्य है।
3. व्यापार और उद्योग (Trade and Industry)
- भारत अपनी घरेलू जरूरतों (विशेषकर स्टेनलेस स्टील उद्योग) को पूरा करने के साथ-साथ क्रोमाइट अयस्क और फेरोक्रोम (Ferrochrome) का एक प्रमुख निर्यातक भी है।
- भारत फेरोक्रोम के दुनिया के अग्रणी उत्पादकों में से एक है। “चार्ज क्रोम” (Charge Chrome), फेरोक्रोम का एक निम्न-कार्बन रूप, भारत में ओडिशा में उत्पादित किया जाता है।
- प्रमुख आयातक देश: चीन, जापान, दक्षिण कोरिया।
निष्कर्ष: क्रोमियम एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण धातु है जिसका स्टेनलेस स्टील बनाने में कोई विकल्प नहीं है। वैश्विक स्तर पर इसका उत्पादन और भंडार दक्षिण अफ्रीका और कजाकिस्तान में केंद्रित है। भारत में, क्रोमिया का उत्पादन और भंडार लगभग पूरी तरह से ओडिशा की सुकिंदा घाटी में केंद्रित है, जो इसे भारत का “क्रोमाइट कैपिटल” बनाता है।
निकल (Nickel – Ni): परीक्षा की दृष्टि से (नवीनतम डेटा सहित)
निकल एक चांदी-सफेद, कठोर, तन्य और लौह-चुंबकीय (Ferromagnetic) धातु है जो संक्षारण (Corrosion) के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है। यह पृथ्वी की भूपर्पटी में अपेक्षाकृत कम मात्रा में पाया जाता है। इसके अद्वितीय गुणों के कारण, यह आधुनिक उद्योगों, विशेष रूप से स्टेनलेस स्टील और बैटरी निर्माण, के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
निकल के उपयोग
| उपयोग का क्षेत्र | विवरण और महत्व (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण) |
| 1. स्टेनलेस स्टील का निर्माण (मुख्य उपयोग) | यह निकल का सबसे बड़ा उपयोग (लगभग 70%) है।<br/> * कार्य: स्टील में क्रोमियम के साथ निकल मिलाने से उसकी संक्षारण प्रतिरोधक क्षमता, मजबूती, और उच्च तापमान सहन करने की क्षमता और बढ़ जाती है।<br/> * “18/8” स्टेनलेस स्टील: सबसे आम प्रकार के स्टेनलेस स्टील में लगभग 18% क्रोमियम और 8% निकल होता है, जिसका उपयोग बरतन, सर्जिकल उपकरण और औद्योगिक उपकरणों में होता है। [SSC] |
| 2. मिश्र धातु (Alloys) और सुपरएलॉय | * निकल का उपयोग कई उच्च-प्रदर्शन वाले अलॉय और सुपरएलॉय बनाने में होता है।<br/> * उदाहरण: <br/> * इन्वार (Invar): लोहा-निकल मिश्र धातु, जो गर्म होने पर बहुत कम फैलता है, जिसका उपयोग सटीक वैज्ञानिक उपकरणों और घड़ियों में होता है।<br/> * सुपरएलॉय (जैसे इंकोनेल – Inconel): ये निकल-आधारित मिश्र धातु होते हैं जो अत्यधिक उच्च तापमान पर भी अपनी मजबूती बनाए रखते हैं। इनका उपयोग जेट इंजन के टरबाइन ब्लेड, गैस टरबाइन और परमाणु रिएक्टरों में होता है। |
| 3. इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) – निकल चढ़ाना | * संक्षारण को रोकने और एक चमकदार, आकर्षक सतह प्रदान करने के लिए अन्य धातुओं (जैसे स्टील, पीतल) पर निकल की एक पतली परत चढ़ाई जाती है। इसे “निकल प्लेटिंग” कहते हैं।<br/> * इसका उपयोग बाथरूम फिटिंग्स, ऑटोमोबाइल पार्ट्स और सजावटी वस्तुओं में होता है। |
| 4. रिचार्जेबल बैटरी (Rechargeable Batteries) | यह निकल का दूसरा सबसे तेजी से बढ़ता हुआ उपयोग है।<br/> * निकल-कैडमियम (Ni-Cd) और निकल-मेटल हाइड्राइड (Ni-MH) बैटरी पारंपरिक रिचार्जेबल बैटरियाँ हैं।<br/> * लिथियम-आयन बैटरी: आधुनिक इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के लिए उच्च-प्रदर्शन वाली बैटरियों में, निकल का उपयोग कैथोड की ऊर्जा घनत्व (Energy Density) और स्थिरता को बढ़ाने के लिए कोबाल्ट और मैंगनीज के साथ किया जाता है (NMC – निकल मैंगनीज कोबाल्ट कैथोड)।<br/> * निकल को EV बैटरी के लिए “छिपा हुआ नायक” (Unsung Hero) कहा जाता है। |
| 5. सिक्का निर्माण (Coinage) | शुद्ध निकल या क्यूप्रो-निकल (तांबा-निकल मिश्र धातु) का उपयोग सिक्के बनाने में किया जाता है क्योंकि यह घिसाव और संक्षारण प्रतिरोधी होता है। भारतीय सिक्के (जैसे ₹1, ₹2, ₹5) क्यूप्रो-निकल से बने होते हैं। |
अयस्क और निक्षेप के प्रकार (Ores and Deposit Types)
निकल अयस्कों के दो मुख्य प्रकार हैं:
- मैग्मैटिक सल्फाइड निक्षेप (Magmatic Sulfide Deposits):
- इसमें निकल अयस्क (मुख्यतः पेंटलैंडाइट – Pentlandite) तांबे और प्लैटिनम समूह की धातुओं के साथ पाया जाता है। ये भूमिगत खनन द्वारा निकाले जाते हैं।
- उदाहरण: सडबरी (कनाडा), नोरिल्स्क (रूस)।
- लैटराइट निक्षेप (Laterite Deposits):
- ये उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अल्ट्रामाफिक चट्टानों के गहन रासायनिक अपक्षय (Weathering) से बनते हैं। ये सतह के पास पाए जाते हैं और ओपन-पिट माइनिंग द्वारा निकाले जाते हैं।
- उदाहरण: इंडोनेशिया, फिलीपींस।
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Latest Global Data ~2023)
| श्रेणी | देश (घटते क्रम में) |
| विश्व के सबसे बड़े भंडार (Reserves) | 1. इंडोनेशिया, 2. ऑस्ट्रेलिया, 3. ब्राजील, 4. रूस |
| विश्व के सबसे बड़े उत्पादक (Mine Production) | 1. इंडोनेशिया: दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक (कुल उत्पादन का लगभग आधा)। [UPSC, CDS के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण]<br/>2. फिलीपींस<br/>3. रूस<br/>4. न्यू कैलेडोनिया (फ्रांस का क्षेत्र)<br/>5. ऑस्ट्रेलिया<br/>6. कनाडा |
भारत में निकल
भारत निकल का एक महत्वपूर्ण उपभोक्ता है (विशेष रूप से स्टेनलेस स्टील उद्योग के लिए), लेकिन इसका घरेलू उत्पादन लगभग नगण्य है।
- भंडार और उत्पादन:
- भारत अपनी निकल की लगभग 100% आवश्यकता आयात से पूरी करता है।
- भारत में निकल के प्राथमिक भंडार मुख्य रूप से ओडिशा में पाए जाते हैं।
- ओडिशा का सुकिंदा घाटी: यह क्षेत्र क्रोमाइट के साथ-साथ भारत के निकल भंडार का सबसे बड़ा स्रोत (लगभग 93%) है। यहाँ निकल अयस्क क्रोमाइट ओवरबर्डन (Chromite Overburden) के साथ लैटराइट निक्षेपों के रूप में मौजूद है। [BPSC]
- अन्य छोटे भंडार झारखंड (सिंहभूम जिला) और नागालैंड में पाए जाते हैं।
- विकास:
- हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) ने झारखंड के घाटशिला में भारत का पहला निकल रिफाइनरी संयंत्र स्थापित करने की पहल की है, जो तांबे के खनन से निकले अपशिष्ट से निकल निकालने का प्रयास करेगा।
- भारत सरकार रणनीतिक खनिज साझेदारी के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया जैसे देशों से निकल की आपूर्ति सुरक्षित करने का प्रयास कर रही है, खासकर अपने “मेक इन इंडिया” और EV मिशन के लिए।
निष्कर्ष: निकल स्टेनलेस स्टील और EV बैटरी के लिए एक महत्वपूर्ण घटक है, जो इसे 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था के लिए एक रणनीतिक धातु बनाता है। वैश्विक उत्पादन पर इंडोनेशिया का दबदबा है, जबकि भारत, जिसके पास ओडिशा में महत्वपूर्ण भंडार हैं, अपनी जरूरतों के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है, जो इसकी रणनीतिक भेद्यता को दर्शाता है।
तांबा (Copper – Cu): परीक्षा की दृष्टि से
तांबा (कॉपर) मानव सभ्यता द्वारा उपयोग की जाने वाली सबसे पहली धातुओं में से एक है। यह एक नरम, तन्य (Ductile) और आघातवर्धनीय (Malleable) अलौह-युक्त (Non-ferrous) धातु है जो अपने विशिष्ट लाल-भूरे रंग और उत्कृष्ट विद्युत चालकता (Excellent Electrical Conductivity) के लिए जानी जाती है। सोने और चांदी के बाद, यह बिजली का सबसे अच्छा सुचालक है, लेकिन उनकी तुलना में बहुत सस्ता होने के कारण इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
तांबे के उपयोग
| उपयोग का क्षेत्र | विवरण और महत्व (परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण) |
| 1. विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग (मुख्य उपयोग) | यह तांबे का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण उपयोग (60% से अधिक) है।<br/> * तार और केबल (Wiring and Cables): इसकी उत्कृष्ट चालकता और तन्यता के कारण, इसका उपयोग बिजली के तारों, मोटरों की वाइंडिंग, ट्रांसफार्मर और लगभग सभी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया जाता है। [SSC, RRB]<br/> * इलेक्ट्रॉनिक सर्किट: प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCBs) और एकीकृत परिपथों (Integrated circuits) में। |
| 2. निर्माण उद्योग (Construction) | * पाइप और नलसाजी (Pipes and Plumbing): यह टिकाऊ, संक्षारण-रोधी और जीवाणु-रोधी होता है, जिससे यह पानी की पाइप लाइनों के लिए एक आदर्श सामग्री है।<br/> * छत निर्माण (Roofing)। |
| 3. परिवहन उद्योग (Transportation) | * वाहनों में वायरिंग और रेडिएटर के लिए।<br/> * इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) में पारंपरिक कारों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक तांबे का उपयोग होता है, जिससे इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। |
| 4. मिश्र धातु निर्माण (Alloy Making) | * तांबे का उपयोग कई महत्वपूर्ण मिश्र धातुएं बनाने के लिए किया जाता है:<br/> * पीतल (Brass) = तांबा + जस्ता (Zinc)। इसका उपयोग संगीत वाद्ययंत्र, सजावटी सामान और फिटिंग्स में होता है।<br/> * कांसा (Bronze) = तांबा + टिन (Tin)। इसका उपयोग मूर्तियों, सिक्कों और बियरिंग्स में होता है। [State PSC, CDS – यह मिलान के लिए अक्सर पूछा जाता है।]<br/> * क्यूप्रो-निकल = तांबा + निकल। इसका उपयोग सिक्का निर्माण और समुद्री अनुप्रयोगों में होता है। |
| 5. सिक्का निर्माण (Coinage) | शुद्ध तांबा और इसकी मिश्र धातुओं (जैसे कांस्य और क्यूप्रो-निकल) का उपयोग प्राचीन काल से सिक्के बनाने में होता रहा है। |
अयस्क और निक्षेप (Ores and Deposits)
- तांबा मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों के रूप में पाया जाता है।
- इसके मुख्य अयस्क हैं:
- चाल्कोपाइराइट (Chalcopyrite) – सबसे महत्वपूर्ण।
- चाल्कोसाइट (Chalcocite)
- बोर्नाइट (Bornite)
- विश्व के सबसे बड़े तांबे के निक्षेप “पोर्फिरी कॉपर डिपॉजिट्स” (Porphyry Copper Deposits) प्रकार के होते हैं, जो अक्सर ज्वालामुखी गतिविधि से जुड़े होते हैं और “रिंग ऑफ फायर” के साथ पाए जाते हैं।
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Latest Global Data ~2023)
| श्रेणी | देश (घटते क्रम में) | महत्वपूर्ण तथ्य |
| विश्व के सबसे बड़े भंडार (Reserves) | 1. चिली (Chile): दुनिया का सबसे बड़ा भंडार।<br/>2. ऑस्ट्रेलिया<br/>3. पेरू<br/>4. रूस<br/>5. मेक्सिको | – |
| विश्व के सबसे बड़े उत्पादक (Mine Production) | 1. चिली (Chile): दुनिया का निर्विवाद रूप से सबसे बड़ा उत्पादक (कुल उत्पादन का 25% से अधिक)। [UPSC, NDA]<br/>2. पेरू<br/>3. कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC)<br/>4. चीन<br/>5. संयुक्त राज्य अमेरिका | चुक्वीकमाटा (Chuquicamata), चिली, दुनिया की सबसे बड़ी ओपन-पिट तांबे की खदानों में से एक है। |
भारत में तांबा (Latest Indian Data ~2022-23)
भारत तांबे के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं है और अपनी अधिकांश जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
1. भंडार और उत्पादन
- भंडार: भारत में तांबे का भंडार सीमित है।
- कुल भंडार की दृष्टि से राज्य: [State PSC]
- राजस्थान (Rajasthan): (कुल भंडार का लगभग 53%)
- झारखंड (Jharkhand)
- मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh)
- कुल भंडार की दृष्टि से राज्य: [State PSC]
- उत्पादन: उत्पादन भंडार की तुलना में बहुत कम है।
- उत्पादन की दृष्टि से अग्रणी राज्य: [UPPSC, BPSC]
- मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh): (कुल उत्पादन का लगभग 52%)
- राजस्थान (Rajasthan): (कुल उत्पादन का लगभग 43%)
- झारखंड (Jharkhand): (कुल उत्पादन का लगभग 5%)
- उत्पादन की दृष्टि से अग्रणी राज्य: [UPPSC, BPSC]
2. भारत की प्रमुख तांबा खदानें (Major Copper Mines in India)
यह परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
| राज्य | प्रमुख खदान/क्षेत्र | महत्वपूर्ण तथ्य |
| :— | :— | :— |
| मध्य प्रदेश | मलंजखंड (Malanjkhand), बालाघाट जिला।| यह भारत की सबसे बड़ी ओपन-कास्ट तांबे की खदान है और भारत के कुल तांबा उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा यहीं से आता है। |
| राजस्थान| खेतड़ी कॉपर बेल्ट (Khetri Copper Belt), झुंझुनूं और अलवर जिला। | ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र। सिंधु घाटी सभ्यता के समय से यहाँ तांबे का खनन होता आ रहा है। [SSC, CDS]<br/>खेतड़ी नगर को भारत की “ताम्र नगरी” (Copper Town) कहा जाता है। |
| झारखंड | सिंहभूम जिला, विशेषकर मोसाबनी, घाटशिला और राखा क्षेत्र।| यह भारत के शुरुआती आधुनिक तांबा खनन क्षेत्रों में से एक था। |
- प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी: हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (Hindustan Copper Ltd. – HCL) भारत में तांबे के खनन, शोधन और विपणन के लिए जिम्मेदार मुख्य सरकारी कंपनी है।
निष्कर्ष: तांबा विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की रीढ़ है, और हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण (EVs, सौर पैनल) के साथ इसकी मांग और बढ़ रही है। वैश्विक स्तर पर चिली का इस पर दबदबा है, जबकि भारत, जिसके पास मध्य प्रदेश (मलंजखंड) और राजस्थान (खेतड़ी) में महत्वपूर्ण खदानें हैं, अपनी जरूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
एल्यूमीनियम (Aluminium) और बॉक्साइट (Bauxite): परीक्षा की दृष्टि से
एल्यूमीनियम (Aluminium – Al) एक चांदी-सफेद, हल्की, मजबूत और संक्षारण-रोधी (Corrosion-resistant) अलौह-युक्त (Non-ferrous) धातु है। यह पृथ्वी की भूपर्पटी में पाई जाने वाली सबसे प्रचुर धातु है और ऑक्सीजन तथा सिलिकॉन के बाद तीसरा सबसे प्रचुर तत्व है। हालांकि, यह प्रकृति में स्वतंत्र रूप से नहीं पाया जाता है।
एल्यूमीनियम का मुख्य और लगभग एकमात्र व्यावसायिक स्रोत इसका अयस्क बॉक्साइट (Bauxite) है।
बॉक्साइट (Bauxite)
- परिभाषा: बॉक्साइट एक अवसादी चट्टान है, जिसमें एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड का उच्च सांद्रण होता है। इसका नाम फ्रांस के लेस बॉक्स (Les Baux) गाँव के नाम पर पड़ा, जहाँ इसे पहली बार खोजा गया था।
- निर्माण: बॉक्साइट का निर्माण उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में लैटराइज़ेशन (Laterization) नामक अपक्षय प्रक्रिया द्वारा होता है। इस प्रक्रिया में, एल्यूमीनियम युक्त चट्टानों (जैसे ग्रेनाइट, बेसाल्ट) पर तीव्र वर्षा और उच्च तापमान के कारण सिलिका और अन्य घुलनशील तत्व बह जाते हैं और केवल अघुलनशील एल्यूमीनियम और लौह ऑक्साइड बच जाते हैं। [UPSC]
- खनन: चूँकि यह सतह के पास बनता है, इसका खनन आमतौर पर ओपन-पिट माइनिंग (Open-pit Mining) द्वारा किया जाता है।
एल्यूमीनियम के उत्पादन की प्रक्रिया (Production Process of Aluminium)
एल्यूमीनियम का उत्पादन दो चरणों वाली एक बहुत ही ऊर्जा-गहन (Energy-intensive) प्रक्रिया है:
- बायर प्रक्रिया (Bayer Process): इस प्रक्रिया में, बॉक्साइट अयस्क को शुद्ध करके एल्यूमिना (Alumina – Al₂O₃), यानी एल्यूमीनियम ऑक्साइड का एक सफेद पाउडर, बनाया जाता है।
- हॉल-हेरोल्ट प्रक्रिया (Hall-Héroult Process): इस प्रक्रिया में, एल्यूमिना को इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) द्वारा पिघलाकर शुद्ध एल्यूमीनियम धातु में परिवर्तित किया जाता है। इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में बिजली की खपत होती है।
परीक्षा हेतु तथ्य: एल्यूमीनियम उद्योग अक्सर उन स्थानों पर स्थापित होता है जहाँ बॉक्साइट के भंडार के साथ-साथ सस्ती जलविद्युत ऊर्जा (Cheap Hydroelectric Power) उपलब्ध हो। [CDS, State PSC]
एल्यूमीनियम के गुण और उपयोग (Properties and Uses of Aluminium)
| गुण | उपयोग का क्षेत्र और महत्व |
| हल्का और मजबूत (Lightweight and Strong) | इसका घनत्व स्टील का लगभग एक-तिहाई होता है। इस गुण के कारण, यह परिवहन उद्योग (Transportation Industry) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।<br/> * विमान निर्माण (Aircraft Manufacturing)<br/> * ऑटोमोबाइल उद्योग: कार, ट्रेन और जहाजों को हल्का बनाकर ईंधन दक्षता (Fuel efficiency) बढ़ाने के लिए। |
| संक्षारण-रोधी (Corrosion-resistant) | हवा के संपर्क में आने पर, एल्यूमीनियम की सतह पर एल्यूमीनियम ऑक्साइड की एक पतली, अदृश्य और सुरक्षात्मक परत बन जाती है, जो इसे जंग लगने से बचाती है।<br/> * खिड़कियों के फ्रेम, दरवाज़े, छतें<br/> * पेय पदार्थों के केन (Beverage Cans) |
| उत्कृष्ट ऊष्मा और विद्युत सुचालक (Good Conductor of Heat and Electricity) | यह ऊष्मा और बिजली का बहुत अच्छा सुचालक है।<br/> * उच्च-वोल्टेज बिजली के तार (High-tension power lines): तांबे की तुलना में हल्का होने के कारण लंबी दूरी के बिजली Übertragung के लिए आदर्श है।<br/> * बर्तन (Utensils) और रेडिएटर बनाने में। |
| आघातवर्धनीय और तन्य (Malleable and Ductile) | इसे आसानी से पतली चादरों या तारों में बदला जा सकता है।<br/> * एल्यूमीनियम फॉयल (Aluminium Foil): खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग के लिए। |
| गैर-चुंबकीय और गैर-विषाक्त (Non-magnetic and Non-toxic) | इन गुणों के कारण इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स और खाद्य उद्योग में होता है। |
| पुनर्चक्रणीय (Recyclable) | एल्यूमीनियम 100% पुनर्चक्रणीय है और इसे पुनर्चक्रित करने में प्राथमिक उत्पादन की तुलना में केवल 5% ऊर्जा लगती है, जिससे यह एक पर्यावरण के अनुकूल “हरी धातु” (Green Metal) बन जाता है। |
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Latest Global Data ~2023)
| श्रेणी | देश (बॉक्साइट) | देश (एल्यूमीनियम) |
| सबसे बड़े भंडार (Reserves) | 1. गिनी (Guinea): विश्व के कुल बॉक्साइट भंडार का लगभग 25% यहीं है।<br/>2. वियतनाम<br/>3. ऑस्ट्रेलिया | – |
| सबसे बड़े उत्पादक (Producers) | 1. ऑस्ट्रेलिया (बॉक्साइट का सबसे बड़ा उत्पादक)।<br/>2. गिनी<br/>3. चीन | 1. चीन (प्राथमिक एल्यूमीनियम का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक)।<br/>2. भारत (दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक)।<br/>3. रूस |
भारत में बॉक्साइट और एल्यूमीनियम (Latest Indian Data ~2022-23)
भारत बॉक्साइट के भंडार और एल्यूमीनियम के उत्पादन दोनों में एक महत्वपूर्ण देश है।
1. बॉक्साइट के भंडार और उत्पादन (Bauxite Reserves and Production)
- भंडार:
- कुल भंडार की दृष्टि से राज्य:
- ओडिशा (Odisha): (भारत के कुल भंडार का 50% से अधिक)
- आंध्र प्रदेश
- गुजरात
- कुल भंडार की दृष्टि से राज्य:
- उत्पादन:
- उत्पादन की दृष्टि से अग्रणी राज्य: [UPPSC, BPSC, SSC]
- ओडिशा (Odisha): भारत का सबसे बड़ा बॉक्साइट उत्पादक राज्य (कुल उत्पादन का 70% से अधिक)। कालाहांडी और कोरापुट जिले “बॉक्साइट राजधानी” माने जाते हैं, जहाँ पंचपत्माली खदान स्थित है।
- उत्पादन की दृष्टि से अग्रणी राज्य: [UPPSC, BPSC, SSC]
2. एल्यूमीनियम उद्योग
- भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एल्यूमीनियम उत्पादक है।
- प्रमुख एल्यूमीनियम संयंत्र: भारत में प्रमुख एल्यूमीनियम कंपनियां (NALCO, BALCO, HINDALCO, VEDANTA) उन क्षेत्रों में स्थित हैं जहाँ बॉक्साइट और कोयला आधारित ताप विद्युत या जलविद्युत दोनों उपलब्ध हैं।
- NALCO (National Aluminium Company Ltd.): कोरापुट और अंगुल (ओडिशा)। यह एशिया के सबसे बड़े एकीकृत एल्यूमीनियम संयंत्रों में से एक है।
- HINDALCO: रेणुकूट (उत्तर प्रदेश) – रिहंद बांध से सस्ती बिजली मिलती है।
- BALCO: कोरबा (छत्तीसगढ़)।
सोना (Gold – Au): परीक्षा की दृष्टि से
सोना (Gold) एक चमकीली, पीली, अत्यधिक तन्य (Ductile) और आघातवर्धनीय (Malleable) बहुमूल्य धातु (Precious Metal) है। यह रासायनिक रूप से लगभग अक्रिय (Chemically inert) है, जिसका अर्थ है कि यह हवा, पानी या अम्ल से आसानी से संक्षारित (corrode) या धूमिल (tarnish) नहीं होता। इन्हीं गुणों के कारण, यह प्राचीन काल से ही आभूषणों, सिक्कों और धन के प्रतीक के रूप में उपयोग होता आ रहा है।
आज के समय में, यह एक महत्वपूर्ण निवेश (Investment) और सुरक्षित आश्रय संपत्ति (Safe Haven Asset) माना जाता है।
सोने के उपयोग (Uses of Gold)
| उपयोग का क्षेत्र | विवरण और महत्व |
| 1. आभूषण (Jewelry) – मुख्य उपयोग | यह सोने का सबसे बड़ा उपयोग (लगभग 50%) है। इसकी सुंदरता, स्थायित्व और अक्रिय प्रकृति इसे आभूषणों के लिए एक आदर्श धातु बनाती है। शुद्ध सोना (24 कैरेट) बहुत नरम होता है, इसलिए इसे कठोर बनाने के लिए इसमें तांबा (Copper), चांदी (Silver) या निकल जैसी अन्य धातुएं मिलाई जाती हैं। “कैरेट” (Karat) सोने की शुद्धता का माप है। |
| 2. निवेश (Investment) | यह सोने का दूसरा सबसे बड़ा उपयोग है। इसे सिक्कों (Coins) और बार/बिस्कुट (Bullion) के रूप में संग्रहीत किया जाता है। आर्थिक अनिश्चितता या मुद्रास्फीति के समय में, निवेशक इसे एक सुरक्षित निवेश मानते हैं क्योंकि इसका मूल्य आमतौर पर स्थिर रहता है या बढ़ता है। कई देशों के केंद्रीय बैंक इसे विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) के हिस्से के रूप में रखते हैं। |
| 3. इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग | * सोना विद्युत का एक उत्कृष्ट सुचालक है और यह संक्षारित नहीं होता है।<br/> * उपयोग: इसका उपयोग हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे मोबाइल फोन, कंप्यूटर (CPUs), और GPS इकाइयों में स्विच, कनेक्टर और कनेक्टिंग तारों पर एक पतली परत चढ़ाने के लिए किया जाता है ताकि एक विश्वसनीय और स्थायी कनेक्शन सुनिश्चित हो सके। |
| 4. दंत चिकित्सा (Dentistry) | * यह गैर-विषाक्त और टिकाऊ होता है।<br/> * उपयोग: इसका उपयोग फिलिंग, क्राउन और ब्रिज बनाने के लिए किया जाता है। |
| 5. एयरोस्पेस उद्योग | सोने की पतली परतें अंतरिक्ष यानों (Spacecrafts) और अंतरिक्ष यात्रियों के हेलमेट पर लगाई जाती हैं ताकि वे हानिकारक अवरक्त विकिरण (Infrared Radiation) को परावर्तित कर सकें और उपकरणों को अत्यधिक गर्मी से बचा सकें। |
अयस्क और निक्षेप (Ores and Deposits)
- प्राथमिक निक्षेप (Primary Deposits) / लोड डिपॉजिट (Lode Deposits):
- सोना भूमिगत चट्टानों में शिराओं (Veins) के रूप में पाया जाता है, अक्सर क्वार्ट्ज (Quartz) के साथ। यहाँ सोने को निकालने के लिए भूमिगत खनन (Underground Mining) की आवश्यकता होती है।
- द्वितीयक निक्षेप (Secondary Deposits) / प्लेसर डिपॉजिट (Placer Deposits):
- जब सोने युक्त चट्टानों का अपरदन होता है, तो सोना (भारी होने के कारण) नदी की धाराओं, घाटियों और प्राचीन नदी तलों की रेत और बजरी (Alluvial deposits) में जमा हो जाता है। इसे प्लेसर खनन (जैसे पैनिंग) द्वारा निकाला जाता है। [SSC]
वैश्विक वितरण और उत्पादन (Latest Global Data ~2023)
| श्रेणी | देश (घटते क्रम में) |
| विश्व के सबसे बड़े भंडार (Reserves) | 1. ऑस्ट्रेलिया, 2. रूस, 3. दक्षिण अफ्रीका, 4. संयुक्त राज्य अमेरिका |
| विश्व के सबसे बड़े उत्पादक (Mine Production) | 1. चीन (China): कई वर्षों से दुनिया का सबसे बड़ा सोने का उत्पादक बना हुआ है।<br/>2. ऑस्ट्रेलिया<br/>3. रूस<br/>4. कनाडा<br/>5. संयुक्त राज्य अमेरिका<br/>(ऐतिहासिक रूप से दक्षिण अफ्रीका का विटवाटरसैंड क्षेत्र सोने का सबसे बड़ा स्रोत रहा है।) |
| सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता (Consumer) | चीन सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, इसके बाद भारत का स्थान आता है (विशेषकर आभूषण के लिए)। |
भारत में सोना (Latest Indian Data)
भारत सोने के उत्पादन में बहुत पीछे है और अपनी लगभग 98-99% सोने की जरूरतें आयात से पूरी करता है, जिससे यह देश के आयात बिल पर एक बड़ा बोझ है।
1. भंडार और उत्पादन
- भंडार:
- भारत में सोने के अयस्क का सबसे बड़ा भंडार बिहार (लगभग 44%) में अनुमानित है, इसके बाद राजस्थान और कर्नाटक का स्थान आता है। (नोट: यह केवल अयस्क का भंडार है, शुद्ध सोने का नहीं)।
- उत्पादन:
- भारत में सोने का उत्पादन लगभग पूरी तरह से एक ही राज्य में केंद्रित है।
- उत्पादन में अग्रणी राज्य: [UPPSC, SSC CGL]
- कर्नाटक (Karnataka): भारत के कुल सोने के उत्पादन का 99% से अधिक हिस्सा यहीं से आता है।
2. भारत की प्रमुख सोना खदानें (Major Gold Mines in India)
यह परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
| राज्य | खदान/क्षेत्र | महत्वपूर्ण तथ्य |
| :— | :— | :— |
| कर्नाटक | हट्टी गोल्ड माइंस (Hutti Gold Mines), रायचूर जिला।| वर्तमान में, यह भारत की एकमात्र प्रमुख और सबसे बड़ी उत्पादक सोने की खदान है। [UPSC Prelims, CDS] |
| | कोलार गोल्ड फील्ड्स (Kolar Gold Fields – KGF) | यह ऐतिहासिक रूप से भारत की सबसे प्रसिद्ध सोने की खदान थी और दुनिया की सबसे गहरी खदानों में से एक थी। उच्च लागत और कम उत्पादन के कारण इसे 2001 में बंद कर दिया गया। |
| आंध्र प्रदेश| रामागिरि गोल्ड फील्ड, अनंतपुर जिला। | यहाँ भी सोने का कुछ उत्पादन होता है। |
| झारखंड| सुवर्णरेखा नदी (Subarnarekha River) की रेत में प्लेसर डिपॉजिट के रूप में कुछ सोना पाया जाता है। | – |
- अन्य हालिया खोज: बिहार के जमुई जिले में विशाल स्वर्ण भंडार का पता चला है, लेकिन इसका खनन अभी शुरू नहीं हुआ है।
निष्कर्ष: सोना एक अत्यंत मूल्यवान धातु है जिसका उपयोग आभूषणों और निवेश से लेकर उच्च-तकनीकी अनुप्रयोगों तक होता है। वैश्विक उत्पादन में चीन, ऑस्ट्रेलिया और रूस का दबदबा है। भारत, सोने के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक होने के बावजूद, इसके उत्पादन में बहुत पीछे है और कर्नाटक की हट्टी खदान ही वर्तमान में इसका एकमात्र प्रमुख उत्पादक केंद्र है।
हीरा उद्योग: यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से नवीनतम डेटा के साथ
हीरा, अपनी चमक और कठोरता के लिए प्रसिद्ध, न केवल एक बहुमूल्य रत्न है, बल्कि वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा के लिए, हीरा उद्योग का आर्थिक, भौगोलिक और सामरिक महत्व इसे एक प्रासंगिक विषय बनाता है। प्रस्तुत है नवीनतम आंकड़ों के साथ इस विषय का विस्तृत विश्लेषण।
वैश्विक हीरा परिदृश्य
उत्पादन और भंडार:
- प्रमुख उत्पादक देश: उत्पादन की मात्रा के हिसाब से रूस दुनिया का सबसे बड़ा हीरा उत्पादक है, जो वैश्विक आपूर्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा नियंत्रित करता है। रूस की सरकारी कंपनी ‘अलरोसा’ (Alrosa) विश्व की सबसे बड़ी हीरा खनन कंपनी है। मूल्य के हिसाब से बोत्सवाना उच्च गुणवत्ता वाले हीरों के लिए एक अग्रणी उत्पादक है। अन्य प्रमुख उत्पादक देशों में कनाडा, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।
- बाजार की वर्तमान स्थिति: वैश्विक स्तर पर पॉलिश किए हुए हीरों की मांग में कमी आई है, जिसका मुख्य कारण प्रयोगशाला में विकसित हीरों (Lab-Grown Diamonds – LGDs) की बढ़ती स्वीकार्यता और चीन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे प्रमुख उपभोक्ता बाजारों में आर्थिक अनिश्चितता है।
भारतीय हीरा उद्योग: एक अवलोकन
भारत कच्चे हीरों का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक और तराशे व पॉलिश किए हुए हीरों का सबसे बड़ा निर्यातक है। दुनिया में बिकने वाले लगभग 10 में से 9 हीरे भारत में ही तराशे और पॉलिश किए जाते हैं।
- सूरत – डायमंड हब: गुजरात का सूरत शहर विश्व में हीरा कटाई और पॉलिशिंग का सबसे बड़ा केंद्र है। हाल ही में उद्घाटित ‘सूरत डायमंड बोर्स’ को दुनिया का सबसे बड़ा कार्यालय भवन माना जाता है, जो इस उद्योग में भारत के प्रभुत्व को और मजबूत करता है।
- अर्थव्यवस्था में योगदान: रत्न और आभूषण क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 7% का योगदान देता है और देश के प्रमुख निर्यात अर्जकों में से एक है। यह उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
- निर्यात के आंकड़े: हाल के वर्षों में भारतीय हीरा निर्यात में गिरावट दर्ज की गई है। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान कट और पॉलिश किए गए हीरों का निर्यात काफी कम हो गया। इसका मुख्य कारण वैश्विक मांग में कमी और प्रयोगशाला में विकसित हीरों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। अमेरिका और चीन भारतीय तराशे हुए हीरों के सबसे बड़े बाजार बने हुए हैं।
भारतीय हीरा उद्योग के समक्ष चुनौतियाँ:
- कच्चे माल पर निर्भरता: भारत अपनी कच्चे हीरे की जरूरत के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है, जिसमें रूस एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। रूस-यूक्रेन संघर्ष और उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने कच्चे हीरे की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है, जिससे भारतीय उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
- प्रयोगशाला में विकसित हीरों (LGDs) से प्रतिस्पर्धा: LGDs या सिंथेटिक हीरे, जो भौतिक और रासायनिक रूप से प्राकृतिक हीरों के समान होते हैं, प्राकृतिक हीरा बाजार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। वे अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं और उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, भारत LGD के उत्पादन और निर्यात में भी एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है।
- वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव: भारतीय हीरा उद्योग प्रमुख आयातक देशों, विशेषकर अमेरिका और चीन की आर्थिक स्थितियों पर बहुत अधिक निर्भर है। इन देशों में मंदी की स्थिति सीधे तौर पर भारत के निर्यात को प्रभावित करती है।
- वित्तीय और विनियामक मुद्दे: उद्योग को बैंकों से ऋण प्राप्त करने में कठिनाइयों और सख्त विनियामक मानदंडों का सामना करना पड़ता है, जो इसके विकास में बाधा डालते हैं।
भारत में हीरे का भौगोलिक वितरण
भारत में हीरे के भंडार सीमित हैं। वर्तमान में, मध्य प्रदेश का पन्ना जिला भारत का एकमात्र सक्रिय हीरा उत्पादक क्षेत्र है। हालांकि, मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र, विशेष रूप से छतरपुर जिले के बकस्वाहा के जंगलों में बड़े पैमाने पर हीरे के भंडार होने का अनुमान है, जो देश के अब तक के सबसे बड़े भंडार हो सकते हैं। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र और पूर्वी घाट के कुछ हिस्सों में भी ऐतिहासिक रूप से हीरे के भंडार पाए गए हैं।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न:
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: भारत में हीरे के सबसे बड़े भंडार हाल ही में किस राज्य में पाए जाने का अनुमान है?
(a) कर्नाटक
(b) आंध्र प्रदेश
(c) मध्य प्रदेश
(d) झारखंड - प्रश्न: ‘सूरत डायमंड बोर्स’ के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह विश्व का सबसे बड़ा हीरा व्यापार केंद्र है।
- इसका उद्देश्य मुंबई से हीरा व्यापार को सूरत स्थानांतरित करना है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: “भारत विश्व में तराशे और पॉलिश किए हुए हीरों का निर्विवाद नेता है, लेकिन यह उद्योग अब कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।” इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। [GS Paper 3: Indian Economy]
- प्रश्न: प्रयोगशाला में विकसित हीरे (Lab-Grown Diamonds) क्या हैं? भारतीय हीरा उद्योग के लिए यह किस प्रकार एक चुनौती और एक अवसर, दोनों प्रस्तुत करते हैं? चर्चा कीजिए। [GS Paper 3: Science & Technology/Economy]
- प्रश्न: भारत की ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) योजना के संदर्भ में, हीरा उद्योग सूरत शहर की आर्थिक पहचान को कैसे मजबूत करता है? [GS Paper 2: Government Policies]
चाँदी: यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक विस्तृत विश्लेषण (नवीनतम आँकड़ों के साथ)
चाँदी, जिसे एक बहुमूल्य धातु के रूप में जाना जाता है, केवल आभूषण और निवेश तक ही सीमित नहीं है। इसका बढ़ता औद्योगिक उपयोग, आर्थिक महत्व और सामरिक भूमिका इसे संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बनाते हैं। प्रस्तुत है नवीनतम आँकड़ों, विश्लेषण और संभावित प्रश्नों के साथ चाँदी का एक विस्तृत अवलोकन।
चाँदी का महत्व: एक बहुआयामी धातु
चाँदी को मुख्य रूप से दोहरी भूमिका के लिए जाना जाता है:
- मौद्रिक और निवेश धातु (Monetary and Investment Metal): सोने के बाद चाँदी को पारंपरिक रूप से एक सुरक्षित निवेश (safe-haven asset) माना जाता है। आर्थिक अनिश्चितता के समय निवेशक अक्सर इसमें निवेश करते हैं। इसे “गरीबों का सोना” भी कहा जाता है।
- औद्योगिक धातु (Industrial Metal): चाँदी किसी भी अन्य धातु की तुलना में सबसे अधिक विद्युत और ताप सुचालक है। इसके अद्वितीय गुणों, जैसे कि रोगाणुरोधी, निंदनीय और तन्य होने के कारण, इसका उपयोग विभिन्न उद्योगों में तेजी से बढ़ रहा है।
वैश्विक चाँदी परिदृश्य: उत्पादन और खपत
विश्व स्तर पर चाँदी का उत्पादन और खपत इसके आर्थिक मूल्य को निर्धारित करते हैं।
- शीर्ष उत्पादक देश: मेक्सिको दुनिया का सबसे बड़ा चाँदी उत्पादक देश है, इसके बाद चीन, पेरू और चिली का स्थान आता है। ये देश मिलकर वैश्विक चाँदी आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा नियंत्रित करते हैं।
विश्व के शीर्ष 5 चाँदी उत्पादक देश (अनुमानित 2023-24)
| रैंक | देश | अनुमानित उत्पादन (मिलियन औंस) |
| :— | :— | :— |
| 1 | मेक्सिको | 196.2 |
| 2 | चीन | 114.4 |
| 3 | पेरू | 99.6 |
| 4 | चिली | 46.5 |
| 5 | ऑस्ट्रेलिया | 44.5 |
- वैश्विक मांग और उपयोग: वैश्विक चाँदी की मांग का लगभग आधा हिस्सा औद्योगिक अनुप्रयोगों से आता है। शेष मांग निवेश, आभूषण और सिल्वरवेयर (चाँदी के बर्तन) से पूरी होती है।
- औद्योगिक उपयोग: सौर पैनल (फोटोवोल्टिक सेल), इलेक्ट्रॉनिक्स (स्मार्टफोन, लैपटॉप), इलेक्ट्रिक वाहन (EVs), 5G प्रौद्योगिकी और चिकित्सा उपकरणों में इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
- हरित ऊर्जा में भूमिका: चाँदी हरित ऊर्जा संक्रमण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, विशेष रूप से सौर ऊर्जा उत्पादन में इसके उपयोग के कारण। एक औसत सौर पैनल में लगभग 20 ग्राम चाँदी का उपयोग होता है।
भारतीय चाँदी उद्योग: एक अवलोकन
भारत दुनिया में चाँदी के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है, लेकिन इसका घरेलू उत्पादन बहुत सीमित है।
- उत्पादन और भंडार:
- भारत में चाँदी का उत्पादन मुख्य रूप से सीसा-जस्ता (lead-zinc) अयस्कों के उप-उत्पाद (by-product) के रूप में होता है।
- हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) भारत की सबसे बड़ी और दुनिया की अग्रणी एकीकृत सीसा-जस्ता-चाँदी उत्पादक कंपनियों में से एक है।
- भारत के अधिकांश चाँदी के भंडार राजस्थान में केंद्रित हैं, इसके बाद झारखंड, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक का स्थान आता है। राजस्थान देश के लगभग 87% चाँदी संसाधनों का घर है।
- आयात और खपत:
- अपनी उच्च मांग को पूरा करने के लिए भारत लगभग पूरी तरह से चाँदी के आयात पर निर्भर है।
- भारत ने हाल के वर्षों में रिकॉर्ड मात्रा में चाँदी का आयात किया है। यह आयात मुख्य रूप से यूनाइटेड किंगडम, हांगकांग और चीन जैसे देशों से होता है।
- घरेलू खपत मुख्य रूप से आभूषण, बर्तन (सिल्वरवेयर) और औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा संचालित होती है। ग्रामीण भारत में, चाँदी को निवेश और आभूषण के रूप में एक पारंपरिक संपत्ति माना जाता है।
भारत में चाँदी की मांग के प्रमुख क्षेत्र
| क्षेत्र | उपयोग | मांग की प्रवृत्ति |
| :— | :— | :— |
| औद्योगिक | सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा | तीव्र वृद्धि |
| आभूषण | पारंपरिक और आधुनिक आभूषण | स्थिर |
| सिल्वरवेयर | बर्तन, सजावटी सामान, उपहार | मध्यम वृद्धि |
| निवेश | सिक्के, बार (सिल्लियाँ), ETFs | आर्थिक रुझानों पर निर्भर |
भारतीय चाँदी उद्योग और प्राप्ति-स्थान
भारत दुनिया में चाँदी के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है, लेकिन इसका घरेलू उत्पादन बहुत सीमित है। भारत अपनी अधिकांश चाँदी की जरूरतों को आयात के माध्यम से पूरा करता है।
- उत्पादन, भंडार और प्राप्ति-स्थान:
- भारत में चाँदी का उत्पादन अयस्क के रूप में स्वतंत्र रूप से नहीं होता है। यह मुख्य रूप से सीसा-जस्ता (lead-zinc), तांबा और सोने के अयस्कों के उप-उत्पाद (by-product) के रूप में प्राप्त की जाती है।
- हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL), जिसका मुख्यालय उदयपुर में है, भारत की सबसे बड़ी एकीकृत सीसा-जस्ता-चाँदी उत्पादक कंपनी है।
- भारत के लगभग 87% चाँदी संसाधन राजस्थान में केंद्रित हैं।
भारत में चाँदी का विस्तृत भौगोलिक वितरण
| राज्य | प्रमुख जिले/खदानें | विवरण |
| राजस्थान | जावर खदानें (उदयपुर), राजपुरा-दरीबा खदान (राजसमंद), रामपुरा-आगुचा खदान (भीलवाड़ा), सिंदेसर खुर्द खदान (राजसमंद) | यह भारत का सबसे बड़ा चाँदी उत्पादक राज्य है। यहाँ सीसा-जस्ता के बड़े भंडार हैं, जिनसे उप-उत्पाद के रूप में चाँदी निकाली जाती है। |
| आंध्र प्रदेश | गुंटूर, कुरनूल | यहाँ सीसा अयस्कों के साथ चाँदी के भंडार पाए जाते हैं। |
| कर्नाटक | चित्रदुर्ग, बेल्लारी | यहाँ सोने की खदानों (जैसे कोलार और हट्टी) से सोने के अयस्क के साथ उप-उत्पाद के रूप में चाँदी प्राप्त होती है। |
| झारखंड | संथाल परगना, सिंहभूम | यहाँ तांबा और सीसा-जस्ता अयस्कों के साथ चाँदी के भंडार मौजूद हैं। |
| उत्तराखंड | अल्मोड़ा | इस क्षेत्र में भी सीसा, जस्ता और तांबे के साथ चाँदी की उपस्थिति पाई गई है। |
भारत सरकार की नीतियाँ और योजनाएँ
- गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (Gold Monetization Scheme): हालांकि यह योजना मुख्य रूप से सोने पर केंद्रित है, लेकिन कीमती धातुओं के मुद्रीकरण का विचार चाँदी पर भी लागू होता है। सरकार घरेलू कीमती धातुओं को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में लाने के लिए प्रयासरत है।
- हॉलमार्किंग: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने सोने की तरह ही चाँदी के आभूषणों और कलाकृतियों के लिए भी हॉलमार्किंग को अनिवार्य कर दिया है। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को शुद्धता सुनिश्चित करना और उद्योग में पारदर्शिता लाना है।
- मेक इन इंडिया और PLI स्कीम्स: इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर पैनलों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली योजनाओं से अप्रत्यक्ष रूप से भारत में चाँदी की औद्योगिक मांग को बढ़ावा मिल रहा है।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित में से किस राज्य में चाँदी के सबसे बड़े भंडार हैं?
(a) कर्नाटक
(b) झारखंड
(c) राजस्थान
(d) आंध्र प्रदेश
[UPSC Prelims Format] - प्रश्न: हाल के दिनों में चाँदी की औद्योगिक मांग में वृद्धि के प्रमुख कारण क्या हैं?
- सौर पैनलों का बढ़ता उपयोग
- इलेक्ट्रिक वाहनों का निर्माण
- 5G प्रौद्योगिकी का विस्तार
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: “चाँदी अब केवल एक कीमती धातु नहीं, बल्कि हरित ऊर्जा भविष्य के लिए एक रणनीतिक तत्व भी है।” इस कथन की विवेचना कीजिए और भारत के लिए इसके आर्थिक और सामरिक निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए। [GS Paper 3: Economy/Infrastructure: Energy]
- प्रश्न: भारत विश्व में चाँदी के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक होने के बावजूद इसके घरेलू उत्पादन में बहुत पीछे है। इसके कारणों पर चर्चा करते हुए, इस आयात निर्भरता को कम करने के लिए संभावित उपाय सुझाइए। [GS Paper 3: Economy/Indian Geography]
प्लैटिनम: यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक विस्तृत विश्लेषण (नवीनतम आँकड़ों के साथ)
प्लेटिनम एक दुर्लभ, अत्यंत स्थिर और बहुमूल्य धातु है, जिसे ‘सफेद सोना’ (White Gold) के नाम से भी जाना जाता है। इसका महत्व केवल आभूषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑटोमोबाइल, हरित ऊर्जा और चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इसके अद्वितीय उत्प्रेरक (catalytic) गुणों के कारण यह एक रणनीतिक धातु (strategic metal) बन गई है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा के लिए इसका औद्योगिक, पर्यावरणीय और आर्थिक महत्व इसे एक महत्वपूर्ण विषय बनाता है।
प्लेटिनम का महत्व और उपयोग
प्लेटिनम के अद्वितीय भौतिक और रासायनिक गुण इसे कई उद्योगों के लिए अपरिहार्य बनाते हैं:
- उत्प्रेरक परिवर्तक (Catalytic Converters): प्लैटिनम का सबसे बड़ा उपयोग ऑटोमोबाइल उद्योग में होता है, जहाँ इसका उपयोग उत्प्रेरक परिवर्तकों में किया जाता है। यह वाहनों से निकलने वाली हानिकारक गैसों (जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड) को कम हानिकारक पदार्थों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन और जल) में परिवर्तित कर देता है।
- आभूषण (Jewellery): इसकी दुर्लभता, चमक और संक्षारण-प्रतिरोध (corrosion-resistance) के कारण यह आभूषणों के लिए एक लोकप्रिय विकल्प है।
- हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था (Hydrogen Economy): प्लैटिनम हरित हाइड्रोजन के उत्पादन (इलेक्ट्रोलाइज़र में) और उपयोग (हाइड्रोजन फ्यूल सेल में) के लिए एक प्रमुख उत्प्रेरक है। जैसे-जैसे दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, प्लैटिनम की यह भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती जा रही है।
- अन्य औद्योगिक उपयोग: इसका उपयोग पेट्रोलियम रिफाइनिंग, ग्लास-मेकिंग उपकरण, मेडिकल सेंसर, कैंसर-रोधी दवाओं (जैसे सिसप्लेटिन) और कंप्यूटर हार्ड डिस्क के निर्माण में भी होता है।
वैश्विक प्लैटिनम परिदृश्य: उत्पादन और प्राप्ति-स्थान
प्लेटिनम का उत्पादन दुनिया के कुछ ही देशों में केंद्रित है, जो इसे भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाता है।
- प्रमुख उत्पादक देश:
- दक्षिण अफ्रीका: दुनिया का सबसे बड़ा प्लैटिनम उत्पादक है, जो वैश्विक आपूर्ति का लगभग 70-75% हिस्सा नियंत्रित करता है। अधिकांश उत्पादन बुशवेल्ड कॉम्प्लेक्स (Bushveld Complex) से होता है, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्लैटिनम समूह तत्वों (PGE) का भंडार है।
- रूस: दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसका उत्पादन मुख्य रूप से नोरिल्स्क निकल (Norilsk Nickel) कंपनी द्वारा साइबेरिया में किया जाता है।
- जिम्बाब्वे: तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसका उत्पादन ग्रेट डाइक (Great Dyke) क्षेत्र में केंद्रित है।
- कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका: ये भी महत्वपूर्ण उत्पादक देश हैं।
विश्व के शीर्ष प्लैटिनम उत्पादक देश (अनुमानित 2023-24)
| रैंक | देश | प्रमुख खनन क्षेत्र |
| :— | :— | :— |
| 1 | दक्षिण अफ्रीका | बुशवेल्ड कॉम्प्लेक्स (Bushveld Complex) |
| 2 | रूस | नोरिल्स्क, साइबेरिया |
| 3 | जिम्बाब्वे | ग्रेट डाइक (Great Dyke) |
| 4 | कनाडा | सडबरी बेसिन (Sudbury Basin) |
| 5 | संयुक्त राज्य अमेरिका | स्टिलवॉटर कॉम्प्लेक्स (Stillwater Complex), मोंटाना |
भारत में प्लैटिनम: भंडार और प्राप्ति-स्थान
भारत में प्लैटिनम का वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य उत्पादन लगभग नगण्य है। भारत अपनी प्लैटिनम की लगभग शत-प्रतिशत आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है।
- प्राप्ति-स्थान और भंडार:
- भारत में प्लेटिनम समूह के तत्वों (Platinum Group of Elements – PGE), जिसमें प्लैटिनम, पैलेडियम, रोडियम आदि शामिल हैं, के भंडार बहुत सीमित हैं।
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के अनुसार, भारत में PGE के प्राथमिक भंडार ओडिशा राज्य में पाए जाते हैं।
भारत में प्लैटिनम समूह तत्वों (PGE) का भौगोलिक वितरण
| राज्य | प्रमुख क्षेत्र/अयस्क पट्टी | विवरण |
| ओडिशा | बैला-नौसाही मासिफ (Baula-Nausahi massif) जो सुकिंदा घाटी (Sukinda Valley) में स्थित है। | यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण PGE भंडार वाला क्षेत्र है। यहाँ के भंडार क्रोमाइट अयस्क के साथ जुड़े हुए हैं। |
| तमिलनाडु | सित्तामपुंडी एनोरथोसाइट कॉम्प्लेक्स (Sittampundi Anorthosite Complex) | यहाँ प्लैटिनम और संबंधित तत्वों के संकेत मिले हैं, लेकिन वाणिज्यिक खनन अभी तक शुरू नहीं हुआ है। |
| कर्नाटक | चित्रदुर्ग और तुमकुर जिले | यहाँ सोने और तांबे के अयस्कों के साथ PGE की उपस्थिति के संकेत मिले हैं। |
| अन्य संभावित क्षेत्र | महाराष्ट्र, केरल और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी अनुसंधान के दौरान PGE की मामूली उपस्थिति दर्ज की गई है। | ये भंडार आर्थिक रूप से खनन के लिए उपयुक्त नहीं माने गए हैं। |
आयात निर्भरता: भारत मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE), स्विट्जरलैंड और हांगकांग जैसे देशों से प्लैटिनम का आयात करता है। यह आयात मुख्य रूप से आभूषण और औद्योगिक क्षेत्रों की मांग को पूरा करने के लिए किया जाता है।
बाजार के रुझान और भविष्य की संभावनाएं
- इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) का प्रभाव: पारंपरिक पेट्रोल और डीजल वाहनों में उत्प्रेरक परिवर्तकों की आवश्यकता होती है, जो प्लैटिनम की मांग का एक बड़ा स्रोत है। बैटरी इलेक्ट्रिक वाहनों (BEVs) में उत्प्रेरक परिवर्तक नहीं होते, जिससे भविष्य में प्लैटिनम की इस क्षेत्र में मांग कम होने की आशंका है।
- हाइड्रोजन फ्यूल सेल से उम्मीद: दूसरी ओर, हाइड्रोजन फ्यूल सेल इलेक्ट्रिक वाहनों (FCEVs) में प्लैटिनम एक अनिवार्य उत्प्रेरक है। जैसे-जैसे दुनिया स्वच्छ ऊर्जा समाधानों की ओर बढ़ेगी, FCEVs प्लैटिनम के लिए एक नया और बढ़ता हुआ मांग स्रोत बना सकते हैं। यह “ग्रीन प्लैटिनम” की अवधारणा को जन्म दे रहा है।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: भारत में प्लैटिनम समूह के तत्वों (PGE) का सबसे महत्वपूर्ण भंडार निम्नलिखित में से किस राज्य में स्थित है?
(a) कर्नाटक
(b) झारखंड
(c) ओडिशा
(d) तमिलनाडु
[UPSC Prelims Format] - प्रश्न: हाल के दिनों में प्लैटिनम के रणनीतिक महत्व में वृद्धि हुई है। निम्नलिखित में से किस “उभरती हुई प्रौद्योगिकी” में यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है?
- उत्प्रेरक परिवर्तक (Catalytic Converters)
- हाइड्रोजन फ्यूल सेल
- लिथियम-आयन बैटरी
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2
(d) 1, 2 और 3
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: “प्लेटिनम एक दोराहे पर खड़ा है, जहाँ इलेक्ट्रिक वाहनों का आगमन इसके पारंपरिक बाजार को चुनौती दे रहा है, वहीं हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था इसके लिए नए अवसर खोल रही है।” इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। [GS Paper 3: Technology/Energy/Economy]
- प्रश्न: भारत में प्लैटिनम जैसे रणनीतिक खनिजों के सीमित भंडार और आयात पर उच्च निर्भरता देश की औद्योगिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्या चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं? इन चुनौतियों से निपटने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? [GS Paper 3: Economy/Energy Security]
एस्बेस्टस: यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक विस्तृत और संतुलित विश्लेषण
एस्बेस्टस, जिसे कभी इसके अग्निरोधी और मजबूत गुणों के कारण ‘जादूई खनिज’ (magic mineral) कहा जाता था, आज एक गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चिंता का विषय है। इसके दोहरे चरित्र – एक तरफ उपयोगिता और दूसरी तरफ जानलेवा खतरों – के कारण यह यूपीएससी के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।
एस्बेस्टस क्या है?
एस्बेस्टस प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एक रेशेदार सिलिकेट खनिज है। इसके रेशे मजबूत, लचीले और गर्मी व रसायन-प्रतिरोधी होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण इसका व्यापक रूप से निर्माण सामग्री, ऑटोमोबाइल पार्ट्स और अन्य औद्योगिक उत्पादों में उपयोग किया जाता था।
एस्बेस्टस के प्रकार
एस्बेस्टस को मुख्य रूप से दो समूहों में बांटा गया है, जिनके गुण और स्वास्थ्य पर प्रभाव अलग-अलग होते हैं।
| मानदंड (Criteria) | क्राइसोलाइट (Chrysotile) – सर्पेन्टाइन समूह | एम्फीबोल समूह (Amphibole Group) |
| अन्य नाम | सफेद एस्बेस्टस (White Asbestos) | नीला एस्बेस्टस (क्रोसिडोलाइट), भूरा एस्बेस्टस (एमोसाइट) |
| रेशे की संरचना | घुंघराले और लचीले (Curly and Flexible) | सीधे, सुई की तरह और भंगुर (Straight, needle-like, and brittle) |
| स्वास्थ्य पर खतरा | खतरनाक। हालांकि, इसके रेशे शरीर में कम समय तक रहते हैं। | अत्यधिक खतरनाक। इसके सुई जैसे रेशे फेफड़ों में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं और स्थायी रूप से वहीं रह जाते हैं, जिससे कैंसर का खतरा अधिक होता है। |
| प्रमुख उपयोग | एस्बेस्टस सीमेंट की चादरें (Roofing Sheets), पाइप, ब्रेक लाइनिंग, गास्केट। | इन्सुलेशन बोर्ड, थर्मल इन्सुलेशन, स्प्रे कोटिंग्स। |
| वैश्विक स्थिति | विश्व में उपयोग होने वाले एस्बेस्टस का लगभग 95% यही प्रकार है। भारत जैसे कई देशों में अभी भी इसका उपयोग होता है। | अधिकांश देशों ने इसके उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। |
स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
एस्बेस्टस के महीन रेशे सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और फेफड़ों की झिल्लियों में जमा हो जाते हैं। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से निम्नलिखित गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं:
- एस्बेस्टोसिस (Asbestosis): फेफड़ों का एक दीर्घकालिक रोग, जिसमें फेफड़ों के ऊतक जख्मी हो जाते हैं और सांस लेना मुश्किल हो जाता है।
- फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer): एस्बेस्टस के संपर्क में आने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
- मेसोथेलियोमा (Mesothelioma): यह एक दुर्लभ और आक्रामक प्रकार का कैंसर है जो फेफड़ों, पेट और हृदय को ढकने वाली पतली झिल्ली (मेसोथेलियम) में होता है। इसका एकमात्र ज्ञात कारण एस्बेस्टस का एक्सपोजर है।
भारत में एस्बेस्टस: एक विरोधाभासी स्थिति
भारत में एस्बेस्टस की स्थिति जटिल और विरोधाभासी है। एक ओर जहाँ इसके खनन पर प्रतिबंध है, वहीं इसके आयात और उपभोग पर कोई रोक नहीं है।
- खनन पर प्रतिबंध: भारत सरकार ने पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण 2011 से एस्बेस्टस के खनन और खदानों के पट्टों के नवीनीकरण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है।
- भंडार और प्राप्ति-स्थान: प्रतिबंध से पहले, भारत में एस्बेस्टस का खनन किया जाता था। इसके प्रमुख भंडार निम्नलिखित राज्यों में हैं:
| राज्य | प्रमुख जिले/क्षेत्र | विवरण |
| राजस्थान | उदयपुर, अजमेर, पाली, डूंगरपुर | यहाँ क्राइसोलाइट और एम्फीबोल दोनों प्रकार के भंडार हैं। देश का अधिकांश भंडार यहीं केंद्रित है। |
| आंध्र प्रदेश | कडप्पा (Cuddapah) जिला | यह क्षेत्र विशेष रूप से उच्च गुणवत्ता वाले क्राइसोलाइट फाइबर के लिए जाना जाता था। |
| झारखंड | सिंहभूम जिला | यहाँ भी एस्बेस्टस के भंडार पाए गए हैं, जो अन्य खनिजों के साथ मिश्रित हैं। |
| कर्नाटक | मांड्या, हसन | इन जिलों में भी एम्फीबोल प्रकार के एस्बेस्टस के छोटे भंडार हैं। |
आयात और उपभोग: भारत आज भी सफेद एस्बेस्टस (Chrysotile) के सबसे बड़े आयातकों और उपभोक्ताओं में से एक है। यह मुख्य रूप से रूस और कजाकिस्तान से आयात किया जाता है। इसका सर्वाधिक उपयोग एस्बेस्टस सीमेंट की चादरें (Roofing Sheets) और पाइप बनाने में होता है, जो ग्रामीण और निम्न-आय वाले आवासों में बहुत लोकप्रिय हैं।
भारत में कानूनी और नियामक ढाँचा
- सर्वोच्च न्यायालय के फैसले: न्यायालय ने कई फैसलों में एस्बेस्टस के खतरों को स्वीकार किया है और श्रमिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं।
- रॉटरडैम कन्वेंशन (Rotterdam Convention): भारत इस अंतर्राष्ट्रीय संधि का एक पक्ष है, जो खतरनाक रसायनों और कीटनाशकों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करती है। क्राइसोलाइट एस्बेस्टस को इस सूची में शामिल करने का कई बार प्रयास किया गया, लेकिन भारत और रूस जैसे देशों ने इसका विरोध किया है।
- श्रम और पर्यावरण कानून: फैक्ट्री अधिनियम, 1948 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत श्रमिकों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए नियम हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती है।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत में सभी प्रकार के एस्बेस्टस के खनन पर प्रतिबंध है।
- भारत क्राइसोलाइट एस्बेस्टस का एक प्रमुख आयातक और उपभोक्ता है।
- भारत में एस्बेस्टस के सबसे बड़े भंडार केरल राज्य में हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: एस्बेस्टस से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों के बावजूद भारत में इसके उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया है? इससे उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक दुविधा का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। [GS Paper 3: Economy/Environment]
- प्रश्न: भारत की ‘एस्बेस्टस नीति’ एक विरोधाभास प्रस्तुत करती है, जिसमें खनन पर प्रतिबंध है लेकिन आयात की अनुमति है। इस नीति के पीछे के तर्कों और इसके दीर्घकालिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों का परीक्षण कीजिए। [GS Paper 2: Government Policies/Health]
अभ्रक (Mica): यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक व्यापक विश्लेषण
अभ्रक, जिसे इसके अद्वितीय गुणों के कारण ‘खनिजों की दुनिया का सौंदर्य’ भी कहा जाता है, एक जटिल और बहुआयामी खनिज है। एक तरफ यह आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और सौंदर्य प्रसाधन उद्योग की नींव है, तो दूसरी तरफ यह भारत में गंभीर सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय मुद्दों, जैसे अवैध खनन और बाल श्रम, से जुड़ा हुआ है।
अभ्रक क्या है?
अभ्रक एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला सिलिकेट खनिज है, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी पूर्ण बेसल क्लीवेज (perfect basal cleavage) है। इसका अर्थ है कि इसे अत्यंत पतली, लचीली और पारदर्शी परतों में आसानी से अलग किया जा सकता है।
अभ्रक के गुण और उनके प्रमुख उपयोग
अभ्रक के अद्वितीय गुण इसे कई उद्योगों के लिए अपरिहार्य बनाते हैं।
| गुण (Property) | विवरण (Description) | परिणामी उपयोग (Resulting Use) |
| उत्कृष्ट विद्युत रोधक गुण (Excellent Dielectric Strength) | यह बिजली का कुचालक है और उच्च वोल्टेज को सहन कर सकता है। | इलेक्ट्रॉनिक्स: कैपेसिटर, ट्रांजिस्टर, इंसुलेटर बनाने में। यह इसका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग है। |
| ऊष्मारोधी गुण (Thermal Resistance) | यह उच्च तापमान को सहन कर सकता है और ऊष्मा का कुचालक है। | भट्टियों (Furnaces) में इंसुलेशन, बॉयलर, प्रेसिंग आयरन (इस्तरी)। |
| लचीलापन और मजबूती (Flexibility and Strength) | इसकी पतली चादरें लचीली होती हैं और आसानी से टूटती नहीं हैं। | इंसुलेटिंग शीट, गास्केट। |
| चमक (Lustre/Sheen) | इसमें प्राकृतिक चमक होती है। | सौंदर्य प्रसाधन (Cosmetics): लिपस्टिक, आई-शैडो, नेल पॉलिश में चमक लाने के लिए। <br> पेंट उद्योग: पेंट को एक चमकदार और टिकाऊ फिनिश देने के लिए। |
| रासायनिक अक्रियता (Chemical Inertness) | यह रासायनिक रूप से स्थिर है और एसिड से प्रभावित नहीं होता। | विश्लेषणात्मक उपकरणों में, रासायनिक रूप से स्थिर भराव (filler) के रूप में। |
भारत में अभ्रक: उत्पादन, भंडार और प्राप्ति-स्थान
भारत कभी विश्व का सबसे बड़ा अभ्रक उत्पादक और निर्यातक था, जिसे ‘अभ्रक की विश्व राजधानी’ (Mica Capital of the World) के रूप में जाना जाता था। यद्यपि आधिकारिक उत्पादन में कमी आई है, भारत आज भी शीट अभ्रक (Sheet Mica) का एक प्रमुख प्रोसेसर और निर्यातक है।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980: इस अधिनियम के लागू होने के बाद, कई खदानें वन क्षेत्रों में आने के कारण बंद हो गईं, जिससे कानूनी खनन में भारी गिरावट आई। इसने अवैध खनन के लिए जमीन तैयार की।
भारत में अभ्रक का विस्तृत भौगोलिक वितरण
| राज्य | प्रमुख पेटी / क्षेत्र | विवरण |
| झारखंड – बिहार पेटी (Great Mica Belt) | झारखंड: कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग <br> बिहार: गया, नवादा, जमुई | यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण और विश्व प्रसिद्ध अभ्रक पेटी है, जिसकी चौड़ाई लगभग 40 किमी है। कोडरमा को कभी ‘अभ्रक नगरी’ कहा जाता था। यहाँ से उच्च गुणवत्ता वाला ‘रूबी अभ्रक’ (Ruby Mica) प्राप्त होता है। |
| आंध्र प्रदेश | नेल्लोर अभ्रक पेटी | यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी पेटी है। यहाँ से ‘हरा अभ्रक’ (Green Mica) का उत्पादन होता है। प्रमुख जिले: नेल्लोर, विशाखापत्तनम। |
| राजस्थान | जयपुर से भीलवाड़ा और उदयपुर तक फैली पेटी | यह देश की तीसरी महत्वपूर्ण पेटी है। प्रमुख जिले: भीलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, टोंक। |
| अन्य राज्य | कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में भी अभ्रक के मामूली भंडार पाए जाते हैं। | ये भंडार आर्थिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। |
अभ्रक का स्याह पक्ष: सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय मुद्दे
- अवैध खनन (Illegal Mining): कानूनी खदानों के बंद होने से, झारखंड और बिहार की अभ्रक पेटी में बड़े पैमाने पर अवैध खनन शुरू हो गया। इसे स्थानीय भाषा में ‘ढिबरा’ (Dhibra) निकालना कहा जाता है। ये असुरक्षित, अस्थायी खदानें होती हैं, जिन्हें ‘घोस्ट माइन्स’ (Ghost Mines) भी कहते हैं।
- बाल श्रम (Child Labour): गरीबी और स्कूलों की कमी के कारण, इन अवैध खदानों में बड़ी संख्या में बच्चे काम करते हैं। वे अपने छोटे हाथों से अभ्रक के टुकड़ों को इकट्ठा करने के लिए आदर्श माने जाते हैं। यह उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।
- स्वास्थ्य संबंधी खतरे: अभ्रक के धूल कणों के लगातार संपर्क में रहने से श्रमिकों को सिलिकोसिस (Silicosis) और अन्य फेफड़ों की घातक बीमारियाँ हो जाती हैं।
- पर्यावरणीय प्रभाव: अवैज्ञानिक खनन तरीकों से भूमि का क्षरण, वनों की कटाई और जल स्रोतों का प्रदूषण होता है।
सरकारी और अंतर्राष्ट्रीय पहल
- कानूनी ढाँचा: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 और बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 जैसे कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन एक चुनौती है।
- राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR): इसने अभ्रक खनन में बाल श्रम को खत्म करने के लिए सर्वेक्षण और सिफारिशें की हैं।
- Responsible Mica Initiative (RMI): यह एक वैश्विक पहल है जिसमें कई बड़ी कॉस्मेटिक और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां शामिल हैं। इसका उद्देश्य भारतीय अभ्रक आपूर्ति श्रृंखला को बाल श्रम से मुक्त और पारदर्शी बनाना है।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: अभ्रक का उपयोग मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में कैपेसिटर और इंसुलेटर बनाने के लिए किया जाता है क्योंकि इसमें निम्नलिखित में से कौन सा अद्वितीय गुण होता है?
(a) अच्छी तापीय चालकता
(b) उच्च पारगम्यता
(c) उत्कृष्ट परावैद्युत शक्ति (Dielectric Strength)
(d) चुंबकीय गुण
[UPSC Prelims Format] - प्रश्न: ‘रूबी अभ्रक’ के विश्व प्रसिद्ध भंडार भारत की किस प्रमुख अभ्रक पेटी में पाए जाते हैं?
(a) नेल्लोर पेटी
(b) जयपुर-भीलवाड़ा पेटी
(c) कोडरमा-हजारीबाग पेटी
(d) बस्तर पठार
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: “अभ्रक भारत के लिए एक आर्थिक संपत्ति और सामाजिक अभिशाप दोनों है।” इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए, जिसमें भारत में अभ्रक खनन से जुड़े नैतिक और पर्यावरणीय मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया हो। [GS Paper 3: Economy/Environment]
- प्रश्न: भारत में अवैध अभ्रक खनन में बाल श्रम की व्यापकता के क्या कारण हैं? इस समस्या के समाधान के लिए एक बहु-आयामी रणनीति सुझाएं, जिसमें सरकारी, उद्योग और सामुदायिक स्तर पर की जाने वाली कार्रवाइयां शामिल हों। [GS Paper 2: Social Justice]
दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements – REE): यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक सामरिक विश्लेषण
दुर्लभ मृदा तत्व (REEs), जिन्हें अक्सर ’21वीं सदी का सोना’ या ‘प्रौद्योगिकी धातु’ कहा जाता है, आधुनिक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य बन गए हैं। इनके नाम के विपरीत, ये पृथ्वी की पपड़ी में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, लेकिन इनका सांद्रण कम होता है और इनका निष्कर्षण तथा शोधन एक अत्यंत जटिल, खर्चीली और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील प्रक्रिया है।
दुर्लभ मृदा तत्व क्या हैं?
REEs 17 धात्विक तत्वों का एक समूह है जिसमें आवर्त सारणी के 15 लैंथेनाइड्स (Lanthanides) के साथ-साथ स्कैंडियम (Scandium) और इट्रियम (Yttrium) शामिल हैं। इन्हें उनके परमाणु भार के आधार पर दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
- हल्के दुर्लभ मृदा तत्व (Light REEs – LREEs): लैंथेनम (La) से लेकर समेरियम (Sm) तक। ये अधिक प्रचुर और सस्ते हैं।
- भारी दुर्लभ मृदा तत्व (Heavy REEs – HREEs): यूरोपियम (Eu) से लेकर ल्यूटेशियम (Lu) तक, साथ ही इट्रियम (Y)। ये कम प्रचुर, अधिक मूल्यवान और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
रणनीतिक महत्व: दुर्लभ मृदा तत्वों का उपयोग
इन तत्वों के अद्वितीय चुंबकीय, ल्यूमिनसेंट और उत्प्रेरक गुण उन्हें उच्च-प्रौद्योगिकी अनुप्रयोगों के लिए अनिवार्य बनाते हैं।
| क्षेत्र (Sector) | प्रमुख दुर्लभ मृदा तत्व | अनुप्रयोग (Application) |
| स्वच्छ ऊर्जा (Green Energy) | नियोडिमियम (Neodymium), प्रेज़िओडिमियम (Praseodymium), डिस्प्रोसियम (Dysprosium) | स्थायी चुंबक (Permanent Magnets) बनाने के लिए, जिनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की मोटरों और पवन टरबाइनों (Wind Turbines) के जनरेटर में होता है। |
| रक्षा एवं एयरोस्पेस | समेरियम (Samarium), इट्रियम (Yttrium), टर्बियम (Terbium) | लेजर, सटीक-निर्देशित मिसाइलें (Precision-guided missiles), रडार सिस्टम, ड्रोन और जेट इंजन के निर्माण में। |
| उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स | यूरोपियम (Europium), टर्बियम (Terbium), इट्रियम (Yttrium) | स्मार्टफोन स्क्रीन, LED/LCD डिस्प्ले, कंप्यूटर हार्ड ड्राइव, कैमरा लेंस और फाइबर ऑप्टिक केबल में। |
| चिकित्सा क्षेत्र | गैडोलिनियम (Gadolinium) | MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) मशीनों में कंट्रास्ट एजेंट के रूप में, पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों में। |
| औद्योगिक उत्प्रेरक | सेरियम (Cerium), लैंथेनम (Lanthanum) | पेट्रोलियम रिफाइनिंग में कच्चे तेल को क्रैक करने और ऑटोमोबाइल के उत्प्रेरक परिवर्तकों (Catalytic Converters) में। |
वैश्विक भू-राजनीति: चीन का प्रभुत्व
REEs का वैश्विक बाजार एकतरफा है, जिस पर चीन का भारी प्रभुत्व है।
- खनन से लेकर शोधन तक: चीन न केवल दुनिया का सबसे बड़ा REE उत्पादक है (वैश्विक उत्पादन का लगभग 60-70%), बल्कि वह शोधन और प्रसंस्करण (Refining and Processing) क्षमता में लगभग 90% हिस्सेदारी रखता है। यही उसका सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ है।
- आपूर्ति श्रृंखला का शस्त्रीकरण (Weaponization of Supply Chain): चीन ने अतीत में भू-राजनीतिक विवादों के दौरान REE के निर्यात को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की धमकी दी है, जिससे दुनिया भर के देशों में अपनी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने की होड़ मच गई है।
भारत की स्थिति: अवसर और चुनौतियाँ
भारत के पास REEs के विशाल भंडार हैं, लेकिन उत्पादन और प्रसंस्करण में वह बहुत पीछे है।
- भंडार: भारत के पास दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा दुर्लभ मृदा भंडार (लगभग 6.9 मिलियन टन) है, जो वैश्विक भंडार का लगभग 6% है।
- स्रोत: भारत में REEs का मुख्य स्रोत मोनाजाइट रेत (Monazite Sand) है, जो समुद्र तटीय इलाकों में पाया जाता है। मोनाजाइट में थोरियम (Thorium) भी पाया जाता है, जो एक रेडियोधर्मी तत्व है। इसी कारण, इसका खनन और प्रसंस्करण परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy – DAE) के दायरे में आता है।
- उत्पादन: भारत में एकमात्र सरकारी कंपनी इंडियन रेयर अर्थ लिमिटेड (IREL) ही मोनाजाइट से REE ऑक्साइड का उत्पादन करती है, लेकिन यह भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है।
भारत में दुर्लभ मृदा तत्वों का भौगोलिक वितरण
| राज्य | प्रमुख तटीय क्षेत्र/जिले | विवरण |
| :— | :— | :— |
| केरल | कोल्लम, तिरुवनंतपुरम | भारत के सबसे समृद्ध मोनाजाइट भंडारों में से एक, जो “चावरा तट” पर केंद्रित है। |
| आंध्र प्रदेश | विशाखापत्तनम | पूर्वी तट पर मोनाजाइट का एक महत्वपूर्ण भंडार। |
| तमिलनाडु | कन्याकुमारी तट | यहाँ भी समुद्र तटीय रेत में मोनाजाइट पाया जाता है। |
| ओडिशा | गंजाम जिला | महानदी के डेल्टा क्षेत्र में भी इसके भंडार हैं। |
भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी का अभाव: भारत REE ऑक्साइड का उत्पादन तो करता है, लेकिन इन ऑक्साइड्स को शुद्ध धातुओं और मिश्र धातुओं में बदलने की जटिल और महंगी तकनीक का अभाव है, जिसके लिए हमें चीन पर निर्भर रहना पड़ता है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: मोनाजाइट के प्रसंस्करण से रेडियोधर्मी कचरा (थोरियम) निकलता है, जिसके सुरक्षित निपटान की प्रक्रिया महंगी और जटिल है।
- निजी क्षेत्र की कम भागीदारी: रणनीतिक महत्व और रेडियोधर्मिता के कारण, इस क्षेत्र में लंबे समय तक निजी क्षेत्र को प्रवेश की अनुमति नहीं थी, जिससे नवाचार और निवेश में कमी आई।
- आर्थिक व्यवहार्यता: चीन की कम लागत वाली उत्पादन क्षमता के साथ प्रतिस्पर्धा करना भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
सरकारी पहल और भविष्य की दिशा
- खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम: सरकार ने हाल ही में कुछ खनिजों को परमाणु खनिजों की सूची से हटाकर निजी क्षेत्र को खनन और अन्वेषण के लिए प्रोत्साहित करने हेतु कानून में संशोधन किया है।
- खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL): इस संयुक्त उद्यम कंपनी का गठन विदेशों में लिथियम और कोबाल्ट जैसे रणनीतिक खनिज संपत्तियों की पहचान करने और उन्हें हासिल करने के लिए किया गया है।
- आत्मनिर्भर भारत: सरकार घरेलू स्तर पर REE प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी और एक पूर्ण आपूर्ति श्रृंखला (value chain) विकसित करने पर जोर दे रही है ताकि चीन पर निर्भरता कम की जा सके।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: भारत में, दुर्लभ मृदा तत्वों (REEs) का मुख्य स्रोत ‘मोनाजाइट रेत’ है। यह मुख्य रूप से निम्नलिखित में से किस कारण से परमाणु ऊर्जा विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है?
(a) इसमें कीमती भारी REEs पाए जाते हैं।
(b) इसमें सामरिक रूप से महत्वपूर्ण यूरेनियम पाया जाता है।
(c) इसमें परमाणु ईंधन के रूप में उपयोग होने वाला थोरियम पाया जाता है।
(d) इसका खनन केवल समुद्र तट पर ही संभव है।
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: दुर्लभ मृदा तत्वों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर एक देश के प्रभुत्व से उत्पन्न भू-राजनीतिक जोखिमों का विश्लेषण कीजिए। इन जोखिमों को कम करने और इस रणनीतिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए भारत द्वारा क्या कदम उठाए जा रहे हैं? [GS Paper 2: International Relations / GS Paper 3: Economy/Security]
- प्रश्न: “भारत दुर्लभ मृदा तत्वों के विशाल भंडार पर तो बैठा है, लेकिन वह उनका लाभ उठाने में असमर्थ है।” इस कथन के आलोक में भारत के दुर्लभ मृदा क्षेत्र के सामने आने वाली प्रमुख तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। [GS Paper 3: Economy/Indian Geography]
कोयला (Coal): यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक समग्र विश्लेषण
कोयला, जिसे ‘काला हीरा’ (Black Diamond) और ‘उद्योग की जननी’ भी कहा जाता है, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास का आधार स्तंभ है। यह देश की लगभग 55% ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। हालांकि, इसके पर्यावरणीय प्रभावों के कारण यह लगातार बहस और नीतिगत सुधारों के केंद्र में भी बना रहता है।
कोयले का निर्माण और प्रकार
कोयले का निर्माण लाखों वर्षों तक उच्च दाब और ताप के तहत दबे हुए वनस्पति पदार्थ (पेड़-पौधे) के रूपांतरण से होता है। कार्बन की मात्रा, नमी और ऊष्मीय मान (Calorific Value) के आधार पर कोयले को चार प्रमुख प्रकारों में बांटा जाता है:
| कोयले का प्रकार | कार्बन की मात्रा | ऊष्मीय मान (Heating Value) | विशेषताएँ और भारत में प्राप्ति-स्थान |
| एन्थ्रासाइट (Anthracite) | 80% – 95% | उच्चतम (Highest) | सबसे कठोर, चमकदार और सर्वोत्तम गुणवत्ता वाला कोयला। यह जलने पर धुआँ रहित लौ देता है। भारत में यह केवल जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में सीमित मात्रा में पाया जाता है। |
| बिटुमिनस (Bituminous) | 60% – 80% | उच्च (High) | भारत में पाया जाने वाला सबसे आम कोयला। यह वाणिज्यिक रूप से सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। कोकिंग कोल (धातुकर्म कोयला) इसी श्रेणी का होता है, जो लोहा गलाने के लिए अनिवार्य है। |
| लिग्नाइट (Lignite) | 40% – 55% | निम्न (Low) | इसे ‘भूरा कोयला’ (Brown Coal) भी कहते हैं। इसमें नमी की मात्रा अधिक होती है। इसका उपयोग मुख्य रूप से विद्युत उत्पादन में होता है। भारत में इसके विशाल भंडार तमिलनाडु के नेवेली में हैं। |
| पीट (Peat) | < 40% | निम्नतम (Lowest) | यह कोयला निर्माण की पहली अवस्था है। इसमें नमी और अशुद्धियाँ बहुत अधिक होती हैं और यह जलने पर बहुत धुआँ देता है। |
भारत में कोयले का भौगोलिक वितरण
भारत में कोयले के भंडार मुख्य रूप से दो प्रमुख भूवैज्ञानिक कालों (Geological Eras) की चट्टानों में पाए जाते हैं:
- गोंडवाना कोयला क्षेत्र (लगभग 250 मिलियन वर्ष पुराने): भारत का लगभग 98% कोयला भंडार और 99% उत्पादन इसी क्षेत्र से होता है। यह उच्च गुणवत्ता वाला बिटुमिनस कोयला है, जो मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत की नदी घाटियों में पाया जाता है।
- टर्शियरी कोयला क्षेत्र (लगभग 15-60 मिलियन वर्ष पुराने): यह कोयला नया है और इसमें सल्फर की मात्रा अधिक होती है। यह मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्यों में पाया जाता है।
भारत के प्रमुख कोयला क्षेत्र
| राज्य | प्रमुख कोयला क्षेत्र | महत्वपूर्ण तथ्य |
| झारखंड | झरिया, बोकारो, गिरिडीह, करनपुरा, रामगढ़ | झरिया भारत का सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र है और कोकिंग कोल का एकमात्र स्रोत है। राज्य भंडार की दृष्टि से प्रथम स्थान पर है। |
| ओडिशा | तलचर, रामपुर-हिमगिरि, इब नदी घाटी | उत्पादन की दृष्टि से यह भारत का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक राज्य है। तलचर देश के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक है, जो महानदी के बेसिन में स्थित है। |
| छत्तीसगढ़ | कोरबा, बिश्रामपुर, हसदेव-अरंड, चिरमिरी | कोरबा भारत के प्रमुख कोयला क्षेत्रों में से एक है। राज्य उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। |
| पश्चिम बंगाल | रानीगंज, दार्जिलिंग | रानीगंज भारत का पहला कोयला क्षेत्र है जहाँ 1774 में खनन शुरू हुआ था। यह उच्च गुणवत्ता वाले गैर-कोकिंग कोयले के लिए प्रसिद्ध है। |
| मध्य प्रदेश | सिंगरौली, सोहागपुर, उमरिया | सिंगरौली को ‘भारत की ऊर्जा राजधानी’ (Energy Capital of India) भी कहा जाता है। |
| तेलंगाना / आंध्र प्रदेश | सिंगरेनी, गोदावरी घाटी | सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड (SCCL) यहाँ खनन का कार्य करती है। |
| महाराष्ट्र | वर्धा घाटी, काम्पटी | वर्धा नदी घाटी में प्रमुख भंडार हैं। |
टर्शियरी कोयला क्षेत्र:
- पूर्वोत्तर भारत: असम (माकुम, नजीरा), मेघालय (चेरापूंजी), अरुणाचल प्रदेश। यहाँ पाया जाने वाला कोयला निम्न गुणवत्ता का होता है और ‘रैट-होल माइनिंग’ जैसी अवैध और असुरक्षित प्रथाएं यहाँ एक बड़ी समस्या हैं।
- अन्य क्षेत्र: तमिलनाडु (नेवेली – लिग्नाइट), राजस्थान (पलना – लिग्नाइट), गुजरात (कच्छ – लिग्नाइट)।
भारतीय कोयला क्षेत्र की प्रमुख समस्याएँ और चुनौतियाँ
- उच्च राख सामग्री (High Ash Content): भारतीय कोयले में राख की मात्रा (35-45%) बहुत अधिक होती है, जिससे इसका ऊष्मीय मान कम हो जाता है और प्रदूषण बढ़ता है।
- कोकिंग कोल का अभाव: भारत के पास उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोल का सीमित भंडार है, इसलिए हमें अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से इसका आयात करना पड़ता है।
- खनन और परिवहन: कई खदानें पुरानी तकनीक का उपयोग कर रही हैं। खदानों से बिजली संयंत्रों तक कोयले को पहुंचाने के लिए अपर्याप्त रेल अवसंरचना एक बड़ी बाधा है।
- पर्यावरणीय और सामाजिक चिंताएँ: कोयला खनन से वनों की कटाई, भूमि क्षरण, जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण होता है। इसके अलावा, विस्थापन और पुनर्वास एक बड़ा सामाजिक मुद्दा है।
- अवैध खनन: विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों में रैट-होल माइनिंग एक गंभीर समस्या है, जो श्रमिकों के जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए खतरनाक है।
- फंसी हुई संपत्तियाँ (Stranded Assets): जैसे-जैसे दुनिया नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, भविष्य में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के आर्थिक रूप से अव्यवहार्य होने का खतरा है।
सरकारी सुधार और पहल
- कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण (1973): ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया गया और कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) की स्थापना हुई।
- वाणिज्यिक खनन (Commercial Mining): 2020 में, सरकार ने निजी क्षेत्र को वाणिज्यिक खनन और बिक्री की अनुमति देकर इस क्षेत्र को पूरी तरह से खोल दिया ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके और आयात कम किया जा सके।
- SHAKTI नीति (Scheme for Harnessing and Allocating Koyala Transparently in India): इसका उद्देश्य बिजली संयंत्रों को पारदर्शी तरीके से कोयला आवंटित करना है।
- स्वच्छ कोयला प्रौद्योगिकी: सरकार उत्सर्जन को कम करने के लिए सुपरक्रिटिकल और अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल पावर प्लांट जैसी तकनीकों को बढ़ावा दे रही है।
- न्यायसंगत संक्रमण (Just Transition): सरकार कोयला आधारित अर्थव्यवस्था से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के दौरान कोयला क्षेत्रों के श्रमिकों और समुदायों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण को सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही है।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
- झरिया : झारखंड
- रानीगंज : ओडिशा
- तलचर : पश्चिम बंगाल
- कोरबा : छत्तीसगढ़
उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?
(a) केवल 1 और 4
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: “भारत के पास विश्व के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक होने के बावजूद, उसे उच्च गुणवत्ता वाले कोयले का आयात क्यों करना पड़ता है?” भारतीय कोयला क्षेत्र के सामने आने वाली संरचनात्मक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। [GS Paper 1: Geography / GS Paper 3: Economy]
- प्रश्न: भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए कोयले के महत्व और जलवायु परिवर्तन के प्रति इसकी प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी नीतिगत चुनौती है। इस संदर्भ में ‘न्यायसंगत संक्रमण’ (Just Transition) की अवधारणा की विवेचना कीजिए। [GS Paper 3: Environment/Energy]
यूरेनियम: यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक सामरिक विश्लेषण
यूरेनियम एक भारी, सघन और रेडियोधर्मी धातु है जो पृथ्वी की पपड़ी में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। यह परमाणु ऊर्जा का मुख्य ईंधन है और इसका उपयोग परमाणु हथियारों के निर्माण में भी होता है। इन दोहरी भूमिकाओं के कारण, यूरेनियम न केवल एक महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन है, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक खनिज भी है, जो किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों को गहराई से प्रभावित करता है।
यूरेनियम का सामरिक महत्व और उपयोग
यूरेनियम का उपयोग मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में होता है, जिनका महत्व बिल्कुल भिन्न है।
| क्षेत्र (Sector) | अनुप्रयोग (Application) और महत्व |
| नागरिक (Civilian) | परमाणु रिएक्टरों में बिजली उत्पादन: यूरेनियम-235 के विखंडन (Fission) से भारी मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिसका उपयोग पानी को भाप में बदलकर टरबाइन चलाकर बिजली बनाने के लिए किया जाता है। यह कार्बन उत्सर्जन के बिना बिजली उत्पादन का एक शक्तिशाली स्रोत है, जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने में महत्वपूर्ण है।<br>अन्य उपयोग: चिकित्सा में रेडियोआइसोटोप का उत्पादन, खाद्य संरक्षण और औद्योगिक रेडियोग्राफी। |
| सैन्य (Military) | परमाणु हथियार: समृद्ध यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) परमाणु बमों के लिए एक प्रमुख विखंडनीय पदार्थ है।<br>अन्य उपयोग: कम समृद्ध यूरेनियम (Depleted Uranium) का उपयोग इसकी उच्च सघनता के कारण टैंकों के कवच और कवच-भेदी गोलियों (Armour-piercing projectiles) में किया जाता है। |
वैश्विक परिदृश्य: भंडार और उत्पादन
- सबसे बड़े भंडार: यूरेनियम के सबसे बड़े ज्ञात भंडार ऑस्ट्रेलिया में हैं, इसके बाद कजाकिस्तान और कनाडा का स्थान आता है।
- सबसे बड़े उत्पादक: उत्पादन के मामले में कजाकिस्तान विश्व का नेता है, जो वैश्विक आपूर्ति का लगभग 40% से अधिक हिस्सा नियंत्रित करता है। इसके बाद कनाडा और नामीबिया का स्थान आता है।
- भू-राजनीति: परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (Nuclear Suppliers Group – NSG) एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय निकाय है जो यूरेनियम और परमाणु प्रौद्योगिकी के व्यापार को नियंत्रित करता है। 2008 में भारत को मिला NSG छूट (waiver) भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक मील का पत्थर था, जिसने उसे परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए बिना अंतरराष्ट्रीय यूरेनियम बाजार तक पहुंच प्रदान की।
भारत में यूरेनियम: एक जटिल चित्र
भारत के पास यूरेनियम के भंडार हैं, लेकिन वे आम तौर पर निम्न-श्रेणी (low-grade) के हैं, जिससे उनका निष्कर्षण महंगा और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
- प्रमुख संगठन:
- परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय (AMD): देश में यूरेनियम भंडारों की खोज और अन्वेषण के लिए जिम्मेदार है।
- यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL): यह एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है जो यूरेनियम अयस्क का खनन और प्रसंस्करण (Processing) करता है। इसका मुख्यालय जादुगुडा, झारखंड में है।
- आयात पर निर्भरता: अपने बढ़ते परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को चलाने के लिए भारत काफी हद तक कजाकिस्तान, कनाडा, रूस और फ्रांस जैसे देशों से यूरेनियम के आयात पर निर्भर है।
भारत में यूरेनियम का भौगोलिक वितरण
| राज्य | प्रमुख खदान/क्षेत्र | महत्वपूर्ण तथ्य |
| झारखंड | जादुगुडा, नरवापहाड़, बागजाता, तुरामडीह | जादुगुडा भारत की पहली यूरेनियम खदान है (1967 में स्थापित)। यह क्षेत्र सिंहभूम थ्रस्ट बेल्ट का हिस्सा है और भारत के यूरेनियम उत्पादन की रीढ़ रहा है। |
| आंध्र प्रदेश | तुम्मलपल्ले (कडप्पा जिला) | इसे दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडारों में से एक माना जाता है। हालांकि, यहाँ का अयस्क बहुत निम्न-श्रेणी का है, जिससे इसका प्रसंस्करण चुनौतीपूर्ण और महंगा हो जाता है। |
| मेघालय | डोमियासियात / क्यालेंग-प्यंडेंग्सोइंग (पश्चिम खासी हिल्स) | यह भारत में पाए जाने वाले उच्चतम श्रेणी (high-grade) के यूरेनियम भंडारों में से एक है। हालांकि, स्थानीय समुदायों द्वारा पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण यहां खनन का तीव्र विरोध हो रहा है, जिससे परियोजना रुकी हुई है। |
| राजस्थान | रोहिल (सीकर जिला) | यह हाल ही में खोजा गया एक महत्वपूर्ण भंडार है, जो भारत के यूरेनियम मानचित्र पर एक नया क्षेत्र है। |
| तेलंगाना | लम्बापुर-पेद्दागट्टू (नलगोंडा जिला) | यहाँ भी यूरेनियम के महत्वपूर्ण भंडार हैं। |
| कर्नाटक | गोगी (यादगीर जिला) | यह भी एक महत्वपूर्ण यूरेनियम खनन स्थल है। |
भारत का त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम की भूमिका
भारत का परमाणु कार्यक्रम डॉ. होमी जहांगीर भाभा द्वारा देश के सीमित यूरेनियम और विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करने के लिए डिजाइन किया गया था।
- चरण 1: दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर (PHWRs) जो प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन के रूप में उपयोग करते हैं।
- चरण 2: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs) जो पहले चरण से निकले प्लूटोनियम का उपयोग करेंगे और थोरियम को यूरेनियम-233 में परिवर्तित करेंगे।
- चरण 3: उन्नत रिएक्टर जो थोरियम-यूरेनियम-233 चक्र पर आधारित होंगे।
यह कार्यक्रम भारत को अंततः अपने विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करके ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य रखता है, जिससे यूरेनियम पर उसकी निर्भरता कम हो जाएगी।
चुनौतियाँ
- निम्न-श्रेणी के अयस्क: घरेलू खनन को आर्थिक रूप से अव्यवहार्य बनाता है।
- पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: यूरेनियम खनन से रेडियोधर्मी कचरा (Tailings) निकलता है और भूजल के संदूषण का खतरा रहता है।
- सार्वजनिक विरोध: कई संभावित खनन स्थलों पर स्थानीय समुदायों का कड़ा विरोध।
- परमाणु कचरा प्रबंधन: खर्च हो चुके ईंधन का सुरक्षित और दीर्घकालिक भंडारण एक बड़ी तकनीकी चुनौती है।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: भारत में, ‘जादुगुडा’, ‘तुम्मलपल्ले’ और ‘डोमियासियात’ नामक स्थान निम्नलिखित में से किस खनिज के भंडारों के लिए प्रसिद्ध हैं?
(a) बॉक्साइट
(b) यूरेनियम
(c) कोयला
(d) लौह-अयस्क
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्या है? यह कार्यक्रम भारत को अपने घरेलू यूरेनियम संसाधनों की सीमाओं से पार पाने और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने में कैसे मदद कर सकता है? विवेचना कीजिए। [GS Paper 3: Energy/Science & Technology]
- प्रश्न: यूरेनियम खनन से जुड़ी पर्यावरणीय और सामाजिक चिंताओं का विश्लेषण कीजिए। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के बीच एक संतुलन कैसे बना सकता है? [GS Paper 3: Environment/Energy]
टिन (Tin): यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक सामरिक और आर्थिक विश्लेषण
टिन, जिसे हिंदी में ‘रांगा’ या ‘वंग’ भी कहा जाता है, एक नरम, चांदी जैसी सफेद धातु है। इसका महत्व प्रागैतिहासिक कांस्य युग (Bronze Age) से है, जब इसे तांबे के साथ मिलाकर कांस्य (Bronze) बनाया जाता था, जो एक क्रांतिकारी मिश्र धातु थी। आज, यह आधुनिक प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की एक अनिवार्य और रणनीतिक धातु बन गया है।
टिन के गुण और प्रमुख उपयोग
टिन के अद्वितीय गुण इसे विभिन्न प्रकार के अनुप्रयोगों के लिए अत्यंत उपयोगी बनाते हैं।
| गुण (Property) | विवरण (Description) | प्रमुख उपयोग (Major Use) |
| संक्षारण-रोधी (Corrosion-Resistant) | यह आसानी से ऑक्सीकृत नहीं होता (जंग नहीं लगता), विशेष रूप से खाद्य अम्लों के प्रतिरोधी है। | टिन-प्लेटिंग: खाद्य और पेय पदार्थों की पैकेजिंग के लिए स्टील के डिब्बों पर एक सुरक्षात्मक परत चढ़ाने में। यह इसका सबसे बड़ा उपयोग है। |
| निम्न गलनांक (Low Melting Point) | यह 232°C जैसे अपेक्षाकृत कम तापमान पर पिघल जाता है। | सोल्डरिंग (Soldering): इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में सर्किट बोर्ड (PCBs) पर घटकों को जोड़ने के लिए ‘सोल्डर’ (एक मिश्र धातु) बनाने में यह अनिवार्य है। |
| मिश्रधातु निर्माण (Alloy Formation) | यह अन्य धातुओं के साथ आसानी से मिलकर उपयोगी मिश्र धातु बनाता है। | कांस्य (Bronze): तांबे के साथ। <br> प्यूटर (Pewter): मुख्य रूप से टिन, साथ में तांबा और एंटीमनी। <br> सोल्डर (Solder): टिन और सीसा (अब लेड-फ्री सोल्डर में चांदी और तांबा)। |
| गैर-विषाक्त (Non-Toxic) | यह मनुष्यों के लिए हानिकारक नहीं है। | खाद्य पैकेजिंग और कोटिंग्स में इसके व्यापक उपयोग का यह एक मुख्य कारण है। |
| रासायनिक यौगिक | टिन के रासायनिक यौगिकों का उपयोग टूथपेस्ट (स्टैनस फ्लोराइड), पिगमेंट और PVC प्लास्टिक के उत्पादन में स्टेबलाइजर के रूप में किया जाता है। |
वैश्विक परिदृश्य: उत्पादन और भू-राजनीति
- प्रमुख उत्पादक देश: वैश्विक टिन उत्पादन कुछ ही देशों में केंद्रित है, जिनमें चीन, इंडोनेशिया, म्यांमार और पेरू प्रमुख हैं।
- आपूर्ति श्रृंखला की भेद्यता: उत्पादन का यह केंद्रीकरण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को भू-राजनीतिक तनावों, व्यापार नीतियों और पर्यावरणीय नियमों के प्रति संवेदनशील बनाता है।
- संघर्ष खनिज (Conflict Mineral): टिन को 3TG (Tin, Tantalum, Tungsten, and Gold) खनिजों में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसका मतलब है कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) जैसे संघर्ष क्षेत्रों में, इसके खनन का उपयोग सशस्त्र समूहों को वित्त पोषित करने के लिए किया जा सकता है, जिससे यह एक नैतिक और भू-राजनीतिक चिंता का विषय बन जाता है।
भारत में टिन: ‘शून्य उत्पादन’ और पूर्ण आयात निर्भरता
भारत में टिन की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। भारत टिन धातु का लगभग शून्य घरेलू उत्पादन करता है और अपनी शत-प्रतिशत आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। यह भारत की रणनीतिक भेद्यता को उजागर करता है, विशेषकर तब जब सरकार ‘मेक इन इंडिया’ और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पर जोर दे रही है।
- टिन का अयस्क: टिन का मुख्य अयस्क कैसिटेराइट (Cassiterite – SnO₂) है।
भारत में टिन के भंडार
भले ही भारत में वाणिज्यिक उत्पादन नगण्य है, लेकिन इसके भंडार मुख्य रूप से निम्नलिखित राज्यों में पाए जाते हैं:
| राज्य | प्रमुख क्षेत्र/जिला | महत्वपूर्ण तथ्य |
| छत्तीसगढ़ | बस्तर, दंतेवाड़ा जिले | भारत का एकमात्र टिन उत्पादक राज्य (नाममात्र का)। देश का लगभग सारा आर्थिक रूप से व्यवहार्य टिन अयस्क भंडार इसी क्षेत्र में केंद्रित है। यह ग्रेनाइट और पेग्माटाइट चट्टानों में पाया जाता है। |
| हरियाणा | तोशाम हिल्स (भिवानी जिला) | यहाँ के चट्टानी क्षेत्रों में कैसिटेराइट अयस्क के महत्वपूर्ण भंडार होने के संकेत मिले हैं, लेकिन वाणिज्यिक खनन अभी तक शुरू नहीं हुआ है। |
| ओडिशा | मलकानगिरी, कोरापुट | इन जिलों में भी टिन के भंडार पाए गए हैं, लेकिन वे अभी तक आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं माने गए हैं। |
भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ और भविष्य की दिशा
- रणनीतिक भेद्यता: इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य प्रसंस्करण और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भरता देश को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी बाधा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है।
- ‘मेक इन इंडिया’ के लिए बाधा: एक मजबूत घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए सोल्डर के रूप में टिन एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इसकी कमी इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को धीमा कर सकती है।
- आगे की राह:
- घरेलू अन्वेषण: छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे राज्यों में ज्ञात भंडारों का व्यवस्थित रूप से अन्वेषण और खनन प्रौद्योगिकी का विकास करना।
- रणनीतिक अधिग्रहण: सरकार की कंपनी खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) के माध्यम से विदेशों (जैसे, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका) में टिन की खदानों में हिस्सेदारी हासिल करना।
- पुनर्चक्रण और शहरी खनन (Urban Mining): फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक कचरे (e-waste) से टिन को कुशलतापूर्वक पुनर्प्राप्त करने के लिए एक मजबूत रीसाइक्लिंग बुनियादी ढांचा स्थापित करना।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: भारत के संदर्भ में, टिन अयस्क (कैसिटेराइट) का एकमात्र आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण भंडार और नाममात्र का उत्पादन निम्नलिखित में से किस राज्य से जुड़ा है?
(a) हरियाणा
(b) झारखंड
(c) ओडिशा
(d) छत्तीसगढ़
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: “टिन, कांस्य युग से लेकर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स युग तक एक रणनीतिक धातु बना हुआ है।” इस कथन के आलोक में, भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के लिए टिन की लगभग पूर्ण आयात निर्भरता से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। [GS Paper 3: Economy/Infrastructure]
- प्रश्न: संघर्ष खनिज (Conflict Minerals) क्या हैं? टिन जैसे खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी नैतिक और भू-राजनीतिक चिंताओं पर चर्चा कीजिए। [GS Paper 2: International Relations / GS Paper 4: Ethics]
चूना पत्थर (Limestone)
चूना पत्थर एक अवसादी चट्टान (Sedimentary Rock) है जो मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) से बनी होती है। यह भारत के निर्माण और औद्योगिक क्षेत्र की रीढ़ है, विशेष रूप से सीमेंट उद्योग के लिए यह एक अनिवार्य कच्चा माल है।
चूना पत्थर के गुण और प्रमुख उपयोग
| उद्योग / क्षेत्र | उपयोग का विवरण | कारण / बनने वाला उत्पाद |
| सीमेंट उद्योग | मुख्य कच्चा माल | क्लिंकर बनाने के लिए चूना पत्थर को गर्म किया जाता है, जो सीमेंट का मुख्य घटक है। भारत के चूना पत्थर का लगभग 75% हिस्सा इसी उद्योग में उपयोग होता है। |
| लौह एवं इस्पात उद्योग | फ्लक्स (Flux) / गालक के रूप में | यह ब्लास्ट फर्नेस में लोहे से अशुद्धियों को हटाने और लावा (slag) बनाने में मदद करता है। इसके लिए स्टील मेल्टिंग शॉप (SMS) ग्रेड चूना पत्थर की आवश्यकता होती है। |
| रसायन उद्योग | विभिन्न रसायनों का उत्पादन | इसका उपयोग सोडा ऐश, कास्टिक सोडा, ब्लीचिंग पाउडर और कैल्शियम कार्बाइड बनाने के लिए किया जाता है। |
| कृषि | मृदा कंडीशनर | अम्लीय मिट्टी के pH मान को बेअसर करने और उसे उपजाऊ बनाने के लिए। |
| निर्माण एवं सजावट | निर्माण सामग्री | इसे सीधे बिल्डिंग स्टोन (जैसे कोटा स्टोन, शाहबाद स्टोन) और सड़क निर्माण के लिए समुच्चय (aggregates) के रूप में उपयोग किया जाता है। |
| अन्य उपयोग | – | चीनी और कागज उद्योग में शोधन एजेंट के रूप में, ग्लास बनाने में। |
भारत में चूना पत्थर का भौगोलिक वितरण
भारत में चूना पत्थर के विशाल भंडार हैं और यह देश के लगभग सभी राज्यों में पाया जाता है।
| राज्य | प्रमुख क्षेत्र / बेल्ट | महत्वपूर्ण तथ्य |
| राजस्थान | चित्तौड़गढ़, नागौर, उदयपुर, सिरोही, जैसलमेर | यह भारत का सबसे बड़ा चूना पत्थर उत्पादक राज्य है। यहाँ सीमेंट-ग्रेड और स्टील-ग्रेड दोनों प्रकार के उच्च गुणवत्ता वाले भंडार हैं। |
| मध्य प्रदेश | सतना-रीवा बेल्ट, कटनी, जबलपुर, दमोह | भंडार और उत्पादन दोनों में यह एक अग्रणी राज्य है। कटनी को ‘चूना नगरी’ (City of Lime) भी कहा जाता है। |
| आंध्र प्रदेश | कडप्पा, गुंटूर, कुरनूल, कृष्णा | राज्य में उच्च गुणवत्ता वाले सीमेंट-ग्रेड चूना पत्थर के विशाल भंडार हैं। |
| छत्तीसगढ़ | रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, रायगढ़ | सीमेंट संयंत्रों का एक बड़ा समूह यहाँ केंद्रित है। यह पूर्वी भारत के लिए एक प्रमुख आपूर्ति केंद्र है। |
| गुजरात | कच्छ, सौराष्ट्र क्षेत्र (जूनागढ़, जामनगर) | यहाँ रासायनिक-ग्रेड चूना पत्थर के बड़े भंडार हैं। इसकी तटीय अवस्थिति बंदरगाह आधारित निर्यात और परिवहन में मदद करती है। |
| कर्नाटक | कलबुर्गी (गुलबर्गा), बागलकोट, चित्रदुर्ग (भीमा बेसिन) | उत्तर कर्नाटक में विशाल सीमेंट-ग्रेड चूना पत्थर के भंडार हैं। |
| तेलंगाना | नलगोंडा, आदिलाबाद, करीमनगर | आंध्र प्रदेश से अलग होने के बाद भी यह एक महत्वपूर्ण उत्पादक राज्य बना हुआ है। |
| तमिलनाडु | रामनाथपुरम, तिरुनेलवेली, तिरुचिरापल्ली | यहाँ उच्च श्रेणी के चूना पत्थर और चूना-खोल (Limeshell) के भंडार हैं। |
जिप्सम (Gypsum)
जिप्सम एक नरम सल्फेट खनिज है जो जलयोजित कैल्शियम सल्फेट (CaSO₄·2H₂O) से बना होता है। यह एक प्रमुख औद्योगिक खनिज है जिसका उपयोग मुख्य रूप से सीमेंट और उर्वरक उद्योगों में किया जाता है।
जिप्सम के गुण और प्रमुख उपयोग
| उद्योग / क्षेत्र | उपयोग का विवरण | कारण / बनने वाला उत्पाद |
| सीमेंट उद्योग | मंदक (Retarder) के रूप में | यह सीमेंट के जमने की प्रक्रिया को धीमा करता है ताकि उसे परिवहन और उपयोग के लिए पर्याप्त समय मिल सके। यह जिप्सम का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग है। |
| उर्वरक उद्योग | उर्वरक और मृदा सुधारक | ‘अमोनियम सल्फेट’ उर्वरक के उत्पादन में। क्षारीय (alkaline) और लवणीय (saline) मिट्टी को सुधारने और उसकी उर्वरता बढ़ाने के लिए। यह मिट्टी को कैल्शियम और सल्फर प्रदान करता है। |
| निर्माण उद्योग | प्लास्टर और बोर्ड बनाना | जिप्सम को गर्म करने पर प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP – CaSO₄·½H₂O) बनता है, जिसका उपयोग मूर्तियां बनाने, दीवारों को चिकना करने और सजावटी काम के लिए होता है। इसका उपयोग वॉल-बोर्ड (drywall) बनाने में भी होता है। |
| अन्य उपयोग | – | कागज उद्योग में फिलर के रूप में, कुछ प्रकार के पेंट में और खाद्य उद्योग में। |
भारत में जिप्सम का भौगोलिक वितरण
भारत में जिप्सम के विशाल भंडार हैं, लेकिन इसका वितरण बहुत असमान है, जिसका अधिकांश हिस्सा केवल एक राज्य में केंद्रित है।
| राज्य | प्रमुख क्षेत्र / जिला | महत्वपूर्ण तथ्य |
| राजस्थान | बीकानेर, नागौर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, जैसलमेर, जोधपुर | भारत के कुल जिप्सम भंडार का लगभग 99% हिस्सा यहीं है। यह भारत का सबसे बड़ा जिप्सम उत्पादक राज्य है। यहाँ के भंडार विश्व के सबसे समृद्ध भंडारों में से हैं। |
| जम्मू और कश्मीर | बारामूला, डोडा, उरी | भंडार की दृष्टि से यह दूसरा सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन दुर्गम भू-भाग और अवसंरचना की कमी के कारण उत्पादन बहुत कम है। |
| गुजरात | कच्छ, जामनगर (सौराष्ट्र) | यहाँ समुद्री प्रकार (marine type) के जिप्सम के भंडार हैं। |
| तमिलनाडु | तिरुचिरापल्ली, कोयंबटूर | यहाँ भी जिप्सम के छोटे भंडार पाए जाते हैं। |
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: सीमेंट के उत्पादन में, जिप्सम को क्लिंकर में क्यों मिलाया जाता है?
(a) सीमेंट की ताकत बढ़ाने के लिए।
(b) सीमेंट के जमने की दर को धीमा करने के लिए।
(c) उत्पादन लागत को कम करने के लिए।
(d) सीमेंट को जलरोधी बनाने के लिए।
[UPSC Prelims Format] - प्रश्न: भारत का लगभग 99% जिप्सम संसाधन और उत्पादन निम्नलिखित में से किस एक राज्य में केंद्रित है?
(a) मध्य प्रदेश
(b) आंध्र प्रदेश
(c) राजस्थान
(d) गुजरात
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: भारत में सीमेंट उद्योग के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिए, जिसमें कच्चे माल (चूना पत्थर और जिप्सम) की उपलब्धता की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया हो। [GS Paper 1: Geography]
- प्रश्न: क्षारीय और लवणीय मिट्टी के सुधार में जिप्सम की भूमिका का वर्णन कीजिए। यह भारत में कृषि भूमि के उद्धार (land reclamation) और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में कैसे योगदान दे सकता है? [GS Paper 3: Agriculture]
भारत के खनिज संसाधनों से जुड़ी प्रमुख समस्याएँ और चुनौतियाँ
1. प्रशासनिक और नीतिगत मुद्दे (Administrative and Policy Issues)
- अपूर्ण अन्वेषण और मानचित्रण (Incomplete Exploration & Mapping): भारत का एक बड़ा हिस्सा, विशेष रूप से गहरे दबे हुए खनिज भंडारों के लिए, अभी तक पूरी तरह से खोजा नहीं गया है। हम काफी हद तक केवल सतह के करीब मौजूद खनिजों पर निर्भर हैं, जिससे हमारी वास्तविक खनिज क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है।
- नियामक बाधाएँ और विलंब (Regulatory Hurdles and Delays): खनन परियोजनाओं को मंजूरी देने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और समय लेने वाली है। इसमें भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण और वन मंजूरी, और कई मंत्रालयों से अनुमोदन शामिल हैं, जिससे परियोजनाओं में वर्षों की देरी होती है और निवेश हतोत्साहित होता है।
- अवैध खनन (Illegal Mining): यह देश की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। कोयला, रेत, लौह अयस्क और अन्य खनिजों का अवैध खनन बड़े पैमाने पर होता है।
- परिणाम: इससे सरकार को भारी राजस्व का नुकसान होता है, पर्यावरण का अंधाधुंध विनाश होता है, और यह अक्सर संगठित अपराध और भ्रष्टाचार को जन्म देता है। “रेत माफिया” इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
- लाभ साझा करने में असमानता (Inequitable Benefit Sharing): यद्यपि जिला खनिज फाउंडेशन (District Mineral Foundation – DMF) की स्थापना खनन प्रभावित समुदायों के लाभ के लिए की गई है, लेकिन इसके धन के उपयोग में पारदर्शिता और प्रभावशीलता की कमी अक्सर देखी जाती है।
2. सामाजिक-आर्थिक मुद्दे (Socio-Economic Issues)
- संसाधन का अभिशाप (The Resource Curse / Paradox of Plenty): यह एक विरोधाभासी स्थिति है जहाँ भारत के सबसे अमीर खनिज संसाधन वाले क्षेत्र (जैसे झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़) सबसे गरीब और सबसे अविकसित मानव विकास संकेतकों वाले क्षेत्रों में से हैं।
- विस्थापन और पुनर्वास का मुद्दा (Displacement and Rehabilitation Issue): बड़ी खनन परियोजनाएँ अक्सर स्थानीय, विशेषकर आदिवासी समुदायों को उनकी भूमि और आजीविका से विस्थापित कर देती हैं। पुनर्वास और पुनर्स्थापन (R&R) नीतियां अक्सर अपर्याप्त होती हैं या उनका कार्यान्वयन खराब होता है, जिससे सामाजिक अशांति और संघर्ष उत्पन्न होता है।
- स्वास्थ्य संबंधी खतरे (Health Hazards): खनन श्रमिक और आसपास के समुदाय गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करते हैं।
- उदाहरण: कोयला खदानों में न्यूमोकोनियोसिस (ब्लैक लंग डिजीज), अभ्रक और सिलिका खनन में सिलिकोसिस जैसी घातक फेफड़ों की बीमारियाँ आम हैं। जल और वायु प्रदूषण से अन्य बीमारियाँ भी फैलती हैं।
- मानवाधिकार और संघर्ष (Human Rights and Conflicts): खनन क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के अधिकारों (विशेषकर पेसा अधिनियम, 1996 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत) और कॉर्पोरेट हितों के बीच अक्सर टकराव होता है, जो संघर्ष को जन्म देता है। नियमगिरि हिल्स (ओडिशा) का मामला इसका एक प्रतिष्ठित उदाहरण है।
3. पर्यावरणीय मुद्दे (Environmental Issues)
- वनों की कटाई और जैव विविधता का नुकसान (Deforestation and Loss of Biodiversity): अधिकांश खदानें वन क्षेत्रों में स्थित हैं, जिससे बड़े पैमाने पर वनों की कटाई होती है। इससे वन्यजीवों के आवास नष्ट हो जाते हैं, पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होता है और जैव विविधता का गंभीर नुकसान होता है।
- प्रदूषण (Pollution): खनन सभी प्रकार के प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत है:
- वायु प्रदूषण: खनन, परिवहन और प्रसंस्करण से धूल के कण (PM2.5, PM10) और हानिकारक गैसें निकलती हैं।
- जल प्रदूषण: खदानों से निकलने वाला अम्लीय जल (Acid Mine Drainage) और भारी धातुएं नदियों और भूजल को दूषित करती हैं।
- मृदा प्रदूषण: ऊपरी उपजाऊ मिट्टी का क्षरण और विषाक्त पदार्थों का रिसाव भूमि को बंजर बना देता है।
- वैज्ञानिक खदान बंदी का अभाव (Lack of Scientific Mine Closure): खनन समाप्त होने के बाद खदानों को अक्सर यूं ही छोड़ दिया जाता है (“अनाथ खदानें” – Orphaned Mines)। इन क्षेत्रों का वैज्ञानिक तरीके से जीर्णोद्धार और पुनर्ग्रहण नहीं किया जाता, जिससे वे स्थायी पर्यावरणीय खतरा बन जाते हैं।
4. तकनीकी और अवसंरचनात्मक मुद्दे (Technological and Infrastructural Issues)
- पुरानी खनन तकनीक (Outdated Mining Technology): भारत में कई खदानें अभी भी पुरानी और अक्षम प्रौद्योगिकियों का उपयोग करती हैं, जिससे उत्पादकता कम होती है, लागत बढ़ती है और सुरक्षा मानक खराब होते हैं। रैट-होल माइनिंग (मेघालय) जैसी असुरक्षित और अवैज्ञानिक प्रथाएं भी प्रचलित हैं।
- अवसंरचना की कमी (Lack of Infrastructure): खदानों से बंदरगाहों, रेलवे लाइनों और औद्योगिक केंद्रों तक खनिजों को पहुंचाने के लिए “लास्ट-मील कनेक्टिविटी” एक बड़ी चुनौती है। अपर्याप्त सड़कें और रेलवे नेटवर्क परिवहन लागत को बढ़ाते हैं और बाधा उत्पन्न करते हैं।
5. रणनीतिक और भू-राजनीतिक मुद्दे (Strategic and Geopolitical Issues)
- महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों पर आयात निर्भरता (Import Dependency on Critical & Strategic Minerals): यद्यपि भारत के पास पारंपरिक खनिजों (कोयला, लौह अयस्क) के विशाल भंडार हैं, लेकिन यह रणनीतिक खनिजों के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है।
- उदाहरण: लिथियम, कोबाल्ट, निकल (बैटरी के लिए), और दुर्लभ मृदा तत्व (इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा के लिए)। यह निर्भरता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों के लिए एक बड़ी कमजोरी है।
- प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन का अभाव (Lack of Processing and Value Addition): भारत अक्सर कच्चे खनिजों का निर्यात करता है और महंगे मूल्य वर्धित उत्पादों का आयात करता है। देश के भीतर अयस्कों को उच्च मूल्य वाली धातुओं और मिश्र धातुओं में संसाधित करने की क्षमता का अभाव है, विशेष रूप से रणनीतिक खनिजों के मामले में।
निष्कर्ष:
भारत के खनिज संसाधन दोधारी तलवार की तरह हैं। वे आर्थिक विकास को गति दे सकते हैं, लेकिन यदि उनका प्रबंधन जिम्मेदारी से नहीं किया गया, तो वे गंभीर पर्यावरणीय विनाश और सामाजिक अन्याय का कारण बन सकते हैं। आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका एक “सतत और समावेशी खनन” मॉडल को अपनाना है, जिसमें कठोर पर्यावरणीय नियमों, उन्नत प्रौद्योगिकी, स्थानीय समुदायों के साथ न्यायसंगत लाभ-साझाकरण, और रणनीतिक खनिजों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने पर जोर दिया जाए।
खनिज संसाधन प्रबंधन: अर्थ और उद्देश्य
खनिज संसाधन प्रबंधन एक व्यापक ढाँचा है जिसके तहत देश के खनिज धन का सतत (sustainable), कुशल (efficient), और न्यायसंगत (equitable) तरीके से अन्वेषण, विकास, उपयोग और संरक्षण किया जाता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य आर्थिक विकास को गति देना है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि पर्यावरण की रक्षा हो और स्थानीय समुदायों का सामाजिक कल्याण हो।
प्रबंधन के मुख्य स्तंभ (Key Pillars of Management):
- आर्थिक दक्षता: खनिजों से अधिकतम आर्थिक मूल्य प्राप्त करना।
- पर्यावरणीय स्थिरता: खनन के नकारात्मक प्रभावों को न्यूनतम करना।
- सामाजिक न्याय: लाभों का उचित वितरण और प्रभावित समुदायों की सुरक्षा।
- रणनीतिक सुरक्षा: राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना।
भारत में खनिज संसाधन प्रबंधन का ढाँचा
भारत सरकार ने खनिज संसाधनों के प्रबंधन के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें विधायी, संस्थागत और तकनीकी उपाय शामिल हैं।
1. विधायी और नीतिगत ढाँचा (Legislative & Policy Framework)
- खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 [MMDR Act, 1957]: यह भारत में खनन क्षेत्र को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून है।
- 2015 का संशोधन: यह एक मील का पत्थर था जिसने नीलामी (Auction) के माध्यम से खनिज रियायतों के आवंटन की एक पारदर्शी प्रणाली शुरू की। इसने भ्रष्टाचार को कम किया और सरकारी राजस्व बढ़ाया।
- जिला खनिज फाउंडेशन (District Mineral Foundation – DMF): इसी संशोधन ने इसकी स्थापना की। यह एक गैर-लाभकारी ट्रस्ट है जिसे खनन संबंधित कार्यों से प्रभावित प्रत्येक जिले में स्थापित किया जाता है। खनन कंपनियों को अपनी रॉयल्टी का एक निश्चित प्रतिशत DMF में योगदान करना होता है, जिसका उपयोग खनन प्रभावित समुदायों के कल्याण (स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल) के लिए किया जाता है।
- राष्ट्रीय खनिज नीति, 2019 (National Mineral Policy, 2019): इसने 2008 की नीति का स्थान लिया। इसके मुख्य उद्देश्य हैं:
- निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
- “जीरो-वेस्ट माइनिंग” (Zero-Waste Mining) को बढ़ावा देना, जिसमें निम्न-श्रेणी के अयस्कों और ओवरबर्डन का उपयोग किया जाए।
- एक दीर्घकालिक आयात-निर्यात नीति बनाना।
- खनन में सतत विकास के सिद्धांतों को एकीकृत करना।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: इसके तहत खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) अनिवार्य है, ताकि परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का पहले से मूल्यांकन किया जा सके।
2. संस्थागत ढाँचा (Institutional Framework)
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI): यह देश में खनिज भंडारों का सर्वेक्षण, मानचित्रण और मूल्यांकन करने वाली प्रमुख एजेंसी है।
- भारतीय खान ब्यूरो (IBM): यह खनन योजनाओं के अनुमोदन, खनिजों के संरक्षण और वैज्ञानिक खनन को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है। यह खदानों की “स्टार रेटिंग” भी करता है, जो पर्यावरणीय और सामाजिक मानकों के अनुपालन पर आधारित होती है।
- राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET): इसकी स्थापना देश में खनिज अन्वेषण को बढ़ावा देने के लिए की गई है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ अभी तक खोज नहीं हुई है।
- खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL): यह एक संयुक्त उद्यम कंपनी है जिसका गठन विदेशों में लिथियम और कोबाल्ट जैसे रणनीतिक खनिजों की पहचान करने और उन्हें हासिल करने के लिए किया गया है ताकि भारत की आयात निर्भरता को कम किया जा सके।
3. तकनीकी और परिचालन प्रबंधन (Technological & Operational Management)
- वैज्ञानिक खनन (Scientific Mining): इसमें अधिकतम खनिज वसूली और न्यूनतम अपशिष्ट उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी का उपयोग शामिल है।
- वैज्ञानिक खदान बंदी (Scientific Mine Closure): खनन समाप्त होने के बाद खदान क्षेत्र का चरणबद्ध तरीके से पुनर्ग्रहण और पुनर्वास करना, ताकि भूमि को वनस्पति लगाकर या किसी अन्य उत्पादक उपयोग के लिए बहाल किया जा सके।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: अन्वेषण में ड्रोन, उपग्रह इमेजरी और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) का उपयोग किया जा रहा है ताकि खनिजों का पता सटीकता से लगाया जा सके।
प्रबंधन में चुनौतियाँ
उपरोक्त प्रयासों के बावजूद, खनिज प्रबंधन में कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं:
- कार्यान्वयन की खाई: नीतियों और कानूनों का जमीनी स्तर पर प्रभावी कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती है (जैसे- DMF फंड का सही उपयोग न होना)।
- अवैध खनन: सख्त कानूनों के बावजूद, अवैध खनन जारी है, जिससे राजस्व और पर्यावरण को नुकसान होता है।
- सामाजिक बनाम आर्थिक हित: स्थानीय समुदायों के अधिकारों और बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल है।
- प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन का अभाव: भारत अभी भी कई खनिजों का कच्चे माल के रूप में निर्यात करता है, जिससे मूल्यवर्धन का अवसर खो जाता है।
आगे की राह: सतत खनिज प्रबंधन का भविष्य
- चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को अपनाना:
- खनिजों के पुन: उपयोग (Reuse) और पुनर्चक्रण (Recycling) पर ध्यान केंद्रित करना।
- शहरी खनन (Urban Mining) को बढ़ावा देना, जिसमें फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक कचरे (e-waste) और अन्य अपशिष्टों से कीमती धातुओं को निकाला जाए।
- प्रौद्योगिकी एकीकरण:
- खनन कार्यों की वास्तविक समय पर निगरानी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) का उपयोग करना ताकि अवैध खनन और पर्यावरणीय उल्लंघनों को रोका जा सके।
- मूल्य श्रृंखला का विकास:
- घरेलू स्तर पर अयस्कों को संसाधित करने और उच्च मूल्य वाले उत्पादों का निर्माण करने की क्षमता विकसित करना, विशेष रूप से रणनीतिक खनिजों के लिए।
- “न्यायसंगत संक्रमण” (Just Transition) की योजना:
- जैसे-जैसे भारत कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से दूर जाएगा, उन समुदायों के लिए वैकल्पिक आजीविका और आर्थिक अवसरों की योजना बनाना जो वर्तमान में कोयला खनन पर निर्भर हैं।
निष्कर्ष:
भारत के लिए खनिज संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन केवल एक आर्थिक अनिवार्यता नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी है। एक मजबूत नियामक ढाँचे, आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग और स्थानीय समुदायों को विकास में भागीदार बनाकर ही भारत अपने खनिज संसाधनों का सतत और समावेशी तरीके से उपयोग कर सकता है, जो “आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा।
वन संसाधन: यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से एक समग्र विश्लेषण
भारत के वन संसाधन देश की पारिस्थितिक सुरक्षा, आर्थिक विकास और लाखों लोगों, विशेषकर आदिवासी समुदायों की आजीविका के लिए आधार स्तंभ हैं। ये केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र हैं जो जैव विविधता के भंडार, जलवायु के नियामक और एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संसाधन हैं।
भारत में वनों की स्थिति: इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2021
भारत वन सर्वेक्षण (FSI) द्वारा हर दो साल में जारी की जाने वाली यह रिपोर्ट देश में वनों की स्थिति पर सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है। ISFR 2021 के अनुसार:
- कुल वनावरण (Forest Cover): देश का कुल वनावरण 7,13,789 वर्ग किमी है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 21.71% है।
- कुल वृक्षावरण (Tree Cover): कुल वृक्षावरण 95,748 वर्ग किमी है, जो भौगोलिक क्षेत्र का 2.91% है।
- कुल वन और वृक्षावरण: भारत का कुल वन और वृक्षावरण मिलाकर 8,09,537 वर्ग किमी है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का 24.62% है।
- राष्ट्रीय लक्ष्य: राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के अनुसार देश के 33% भौगोलिक क्षेत्र को वन और वृक्षावरण के अंतर्गत लाने का लक्ष्य है।
वनावरण का वर्गीकरण (Classification of Forest Cover)
| श्रेणी | विवरण | क्षेत्रफल (वर्ग किमी) |
| अति सघन वन (Very Dense Forest – VDF) | 70% से अधिक कैनोपी घनत्व | 99,779 |
| मध्यम सघन वन (Mod. Dense Forest – MDF) | 40% से 70% कैनोपी घनत्व | 3,06,890 |
| खुले वन (Open Forest – OF) | 10% से 40% कैनोपी घनत्व | 3,07,120 |
| झाड़ी (Scrub) | 10% से कम कैनोपी घनत्व (इसे वनावरण में नहीं गिना जाता) | 46,539 |
प्रमुख राज्य:- क्षेत्रफल के अनुसार शीर्ष राज्य: मध्य प्रदेश > अरुणाचल प्रदेश > छत्तीसगढ़ > ओडिशा।
- भौगोलिक क्षेत्र के प्रतिशत के रूप में शीर्ष राज्य: मिजोरम (84.5%) > अरुणाचल प्रदेश (79.3%) > मेघालय (76.0%)।
भारत में वनों का वर्गीकरण
- प्रशासनिक वर्गीकरण (Administrative Classification):
- आरक्षित वन (Reserved Forests): ये सबसे अधिक प्रतिबंधित वन हैं; चराई और कटाई जैसी सभी गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध होता है।
- संरक्षित वन (Protected Forests): इनमें कुछ स्थानीय समुदायों को चराई और लकड़ी इकट्ठा करने जैसी गतिविधियों की अनुमति होती है।
- अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests): ये सरकार और निजी व्यक्तियों/समुदायों के स्वामित्व वाले बड़े पैमाने पर अनियमित वन हैं।
- भौगोलिक वर्गीकरण (Geographical Classification):
- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen): पश्चिमी घाट, अंडमान-निकोबार, पूर्वोत्तर भारत।
- उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous): भारत के सबसे बड़े क्षेत्र में फैले हैं; इन्हें मानसूनी वन भी कहते हैं।
- उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन (Tropical Thorn): राजस्थान, गुजरात, हरियाणा के शुष्क क्षेत्र।
- पर्वतीय वन (Montane Forests): हिमालय और नीलगिरी में पाए जाते हैं; ऊंचाई के साथ वनस्पति बदलती है।
- मैंग्रोव वन (Mangrove Forests): गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुंदरवन), महानदी, कृष्णा, गोदावरी के डेल्टा।
वन संसाधनों का महत्व
- पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance):
- जैव विविधता का भंडार: भारत के वन दुनिया की लगभग 8% ज्ञात प्रजातियों का घर हैं।
- जलवायु नियामक: ये कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर (कार्बन सिंक) जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करते हैं।
- जल चक्र का नियमन: वन वर्षा को आकर्षित करते हैं और भूजल स्तर को बनाए रखते हैं।
- मृदा संरक्षण: पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं, जिससे मृदा अपरदन रुकता है।
- आर्थिक महत्व (Economic Importance):
- लकड़ी आधारित उद्योग: फर्नीचर, कागज, लुगदी और निर्माण के लिए लकड़ी प्रदान करते हैं।
- गैर-इमारती वन उत्पाद (Non-Timber Forest Products – NTFPs): तेंदू पत्ता (बीड़ी के लिए), महुआ, शहद, औषधीय जड़ी-बूटियाँ, लाख, राल आदि प्रदान करते हैं, जो करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार हैं।
- सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व (Social & Cultural Importance):
- आदिवासी समुदायों का जीवन आधार: भारत के लगभग 25 करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर वनों पर निर्भर हैं, जिनमें अधिकांश आदिवासी समुदाय शामिल हैं।
- आस्था और संस्कृति: कई वन और पेड़ों को पवित्र माना जाता है (जैसे- देवराई – Sacred Groves)।
वन संसाधनों से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ
- वनोन्मूलन और वन क्षरण (Deforestation and Forest Degradation):
- कारण: कृषि का विस्तार, अनियंत्रित शहरीकरण, बांध और सड़क जैसी अवसंरचना परियोजनाएं, और खनन।
- वनाग्नि (Forest Fires): हर साल, विशेषकर गर्मियों में, वनाग्नि के कारण वनों का एक बड़ा क्षेत्र नष्ट हो जाता है।
- झूम खेती (Shifting Cultivation): पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित यह पारंपरिक कृषि पद्धति वनोन्मूलन का एक कारण है।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict): वनों के सिकुड़ने और गलियारों के बाधित होने से यह संघर्ष बढ़ रहा है।
- अतिक्रमण और अवैध कटाई: वनों पर मानवीय दबाव बढ़ने से अतिक्रमण और लकड़ी की अवैध कटाई की घटनाएं बढ़ रही हैं।
- कानूनों का कमजोर कार्यान्वयन: वन अधिकार अधिनियम, 2006 जैसे महत्वपूर्ण कानूनों का कार्यान्वयन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।
वन प्रबंधन: संवैधानिक प्रावधान, कानून और नीतियां
- संवैधानिक प्रावधान:
- 42वां संशोधन, 1976: इसके द्वारा वन और वन्यजीवों के संरक्षण को राज्य सूची से समवर्ती सूची (Concurrent List) में स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे केंद्र सरकार को भी कानून बनाने का अधिकार मिला।
- अनुच्छेद 48A (DPSP): राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।
- अनुच्छेद 51A(g) (Fundamental Duty): वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।
- प्रमुख कानून और नीतियां:
- राष्ट्रीय वन नीति, 1988: इसने वनों पर पारिस्थितिक स्थिरता को व्यावसायिक हितों से ऊपर रखा और 33% वन क्षेत्र का लक्ष्य निर्धारित किया।
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980: इसका उद्देश्य वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए परिवर्तित करने पर रोक लगाना है।
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: वन्यजीवों की सुरक्षा और राष्ट्रीय उद्यानों तथा अभयारण्यों के प्रबंधन का प्रावधान करता है।
- वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006: यह एक ऐतिहासिक कानून है जो वन में रहने वाले आदिवासी समुदायों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है।
- प्रमुख कार्यक्रम:
- संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM): इसमें वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर ख़राब वनों के प्रबंधन और संरक्षण का कार्य करते हैं।
- प्रतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम (CAMPA), 2016: इसके तहत, जब भी वन भूमि को किसी परियोजना के लिए गैर-वन उपयोग में परिवर्तित किया जाता है, तो उपयोगकर्ता एजेंसी को उस भूमि के बराबर गैर-वन भूमि पर वनीकरण करने या खराब वनों के सुधार के लिए धन देना पड़ता है।
UPSC परीक्षा के लिए संभावित प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
- प्रश्न: भारत की ‘वन अधिकार अधिनियम, 2006’ के तहत, किसी समुदाय को ‘सामुदायिक वन संसाधन’ पर अधिकार देने का प्राधिकारी कौन है?
(a) जिला कलेक्टर
(b) वन विभाग
(c) ग्राम सभा
(d) राज्य सरकार
[UPSC Prelims Format]
मुख्य परीक्षा (Mains):
- प्रश्न: राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के 33% वनावरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में भारत की प्रगति का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति में आने वाली प्रमुख बाधाएँ क्या हैं और उन्हें दूर करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? [GS Paper 3: Environment]
- प्रश्न: “वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन संरक्षण और आदिवासी समुदायों के न्याय के बीच एक सेतु का काम करता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए और इसके कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालिए। [GS Paper 2: Social Justice / GS Paper 3: Environment]
वनों का आर्थिक महत्व (Economic Significance of Forests)
भारत के वन देश की अर्थव्यवस्था में एक मौन, फिर भी अपरिहार्य योगदानकर्ता हैं। इनका आर्थिक महत्व अक्सर देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में पूरी तरह से परिलक्षित नहीं होता, क्योंकि इनके कई लाभ गैर-विपणन (non-marketed) होते हैं। वनों के आर्थिक महत्व को निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है:
1. प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ (Direct Economic Benefits)
ये वे मूर्त उत्पाद और राजस्व हैं जो सीधे वनों से प्राप्त होते हैं और जिनका बाजार में आसानी से मूल्यांकन किया जा सकता है।
- इमारती और औद्योगिक लकड़ी (Timber and Industrial Wood):
- यह वनों का सबसे पारंपरिक आर्थिक उत्पाद है।
- उद्योग: यह निर्माण उद्योग (फर्नीचर, दरवाजे, खिड़कियां), कागज और लुगदी उद्योग, प्लाईवुड, खेल का सामान और रेलवे स्लीपर जैसे कई उद्योगों के लिए प्राथमिक कच्चा माल है।
- राजस्व: सरकार लकड़ी की बिक्री और रॉयल्टी के माध्यम से महत्वपूर्ण राजस्व अर्जित करती है।
- गैर-इमारती वन उत्पाद (Non-Timber Forest Products – NTFPs):
- यह भारत के ग्रामीण और जनजातीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। करोड़ों लोग अपनी आजीविका के लिए इन पर निर्भर हैं।
- प्रमुख NTFPs:
- तेंदू पत्ता: बीड़ी उद्योग का आधार, जो लाखों लोगों को रोजगार देता है।
- बांस: “हरा सोना” (Green Gold) कहा जाता है; कागज, हस्तशिल्प और निर्माण में उपयोग होता है।
- औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियाँ: फार्मास्यूटिकल और आयुर्वेदिक उद्योगों का आधार।
- लाख, गोंद और राल: वार्निश, पेंट और खाद्य उद्योगों में उपयोग होता है।
- शहद, मोम, फल, और कंद-मूल: खाद्य सुरक्षा और अतिरिक्त आय का स्रोत।
- रोजगार सृजन (Employment Generation):
- वन क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिसमें वन रक्षक, शोधकर्ता, NTFP संग्राहक, हस्तशिल्प कारीगर और पर्यटन गाइड शामिल हैं।
- पशुओं के लिए चारागाह और चारा (Pasture and Fodder for Livestock):
- वन देश की विशाल पशुधन आबादी के लिए चारे का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं, जो डेयरी और पशुपालन उद्योग का समर्थन करते हैं।
2. अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ (Indirect Economic Benefits)
ये वनों द्वारा प्रदान की जाने वाली पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं (Ecosystem Services) हैं, जिनका प्रत्यक्ष बाजार मूल्य लगाना कठिन है, लेकिन अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- कृषि और खाद्य सुरक्षा का समर्थन (Support to Agriculture and Food Security):
- मृदा संरक्षण: वन मृदा अपरदन को रोककर कृषि भूमि की उर्वरता बनाए रखते हैं, जिससे हर साल अरबों रुपये के उर्वरक की बचत होती है।
- जल संरक्षण और विनियमन: वन एक “प्राकृतिक स्पंज” के रूप में कार्य करते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं और नदियों में प्रवाह को नियंत्रित करते हैं, जो सिंचाई और पेयजल के लिए महत्वपूर्ण है।
- जलवायु विनियमन: वन स्थानीय तापमान और वर्षा पैटर्न को प्रभावित करते हैं, जो कृषि उत्पादकता के लिए आवश्यक है।
- परागण: वन मधुमक्खियों और अन्य परागणकों को आश्रय देते हैं जो कृषि फसलों के उत्पादन के लिए अनिवार्य हैं।
- पारिस्थितिकी पर्यटन (Eco-Tourism):
- राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और जैव विविधता हॉटस्पॉट घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
- यह स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार पैदा करता है और विदेशी मुद्रा अर्जित करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
- आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction):
- बाढ़ नियंत्रण: वन बाढ़ के वेग को कम करते हैं, जिससे जान-माल की हानि कम होती है।
- भूस्खलन की रोकथाम: पहाड़ी ढलानों पर पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा कम होता है।
- तटीय संरक्षण: मैंग्रोव वन सुनामी और चक्रवातों के खिलाफ एक प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं, जिससे तटीय समुदायों की रक्षा होती है। इन सेवाओं का मूल्य अरबों डॉलर में है।
- जलवायु परिवर्तन शमन (Climate Change Mitigation):
- वन कार्बन सिंक (Carbon Sink) के रूप में कार्य करते हैं, वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं।
- यह भारत को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है। इसके माध्यम से भारत भविष्य में कार्बन क्रेडिट (Carbon Credits) के बाजार से आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकता है।
- जैव विविधता का भंडार (Repository of Biodiversity):
- वन एक विशाल “आनुवंशिक पुस्तकालय” (Genetic Library) हैं। इनसे भविष्य में नई दवाइयां, फसलें और अन्य उत्पाद विकसित किए जा सकते हैं, जिनका अपार आर्थिक मूल्य है।
वनों के आर्थिक महत्व का सारणीबद्ध सारांश
| लाभ का प्रकार | उदाहरण | आर्थिक प्रभाव |
| प्रत्यक्ष (Direct) | लकड़ी, कागज, लुगदी, तेंदू पत्ता, शहद, औषधियां, लाख | उद्योगों के लिए कच्चा माल, सरकारी राजस्व, लाखों लोगों के लिए प्रत्यक्ष आय और रोजगार |
| अप्रत्यक्ष (Indirect) | मृदा संरक्षण, जल चक्र का नियमन, बाढ़/भूस्खलन की रोकथाम, इको-टूरिज्म, कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) | कृषि उत्पादकता में वृद्धि, आपदाओं से होने वाले नुकसान में कमी, सेवा क्षेत्र से राजस्व, जलवायु वित्त (Climate Finance) की संभावनाएं |
निष्कर्ष और “ग्रीन जीडीपी” की अवधारणा
यह स्पष्ट है कि वनों का आर्थिक महत्व पारंपरिक जीडीपी गणनाओं में मापे जाने वाले मूल्य से कहीं अधिक है। पारंपरिक जीडीपी वनों के कटान को एक आर्थिक लाभ के रूप में तो गिनती है, लेकिन उससे होने वाले पारिस्थितिक नुकसान (बाढ़, सूखा, जैव विविधता की हानि) की लागत को नहीं घटाती।
इसीलिए, “ग्रीन जीडीपी” (Green GDP) जैसी अवधारणाओं की मांग बढ़ रही है, जो राष्ट्रीय लेखांकन में प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के मूल्य को शामिल करती है। भारत की दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, वनों को केवल एक वस्तु भंडार के रूप में नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक पूंजी (Natural Capital) के रूप में प्रबंधित करना अनिवार्य है।
वनों का पारिस्थितिक महत्व (Ecological Significance of Forests)
वन केवल पेड़ों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के सबसे जटिल, गतिशील और महत्वपूर्ण स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Terrestrial Ecosystems) हैं। वे पृथ्वी की जीवन-समर्थन प्रणाली (Life Support System) का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। उनका पारिस्थितिक महत्व निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है:
1. जैव विविधता के भंडार और आवास (Hubs of Biodiversity and Habitats)
- “आनुवंशिक पुस्तकालय” (Genetic Library): वन पृथ्वी की लगभग 80% स्थलीय जैव विविधता का घर हैं। वे पौधों, जानवरों, कीड़ों और सूक्ष्मजीवों की लाखों प्रजातियों को आश्रय देते हैं। यह विशाल आनुवंशिक विविधता भविष्य में नई दवाओं, फसलों और वैज्ञानिक खोजों के लिए एक अमूल्य संसाधन है।
- जटिल आवास (Complex Habitats): वन एक बहु-स्तरीय (multi-layered) आवास प्रदान करते हैं – कैनोपी (ऊपरी परत), अंडरस्टोरी (मध्य परत) और वन तल (forest floor)। प्रत्येक परत विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के लिए एक अनूठा निवास स्थान प्रदान करती है, जिससे एक जटिल और स्थिर पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है।
- खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल का आधार (Foundation of Food Chains and Food Webs): वन उत्पादक (Producer) के रूप में कार्य करते हैं, जो सूर्य के प्रकाश को ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं। यह ऊर्जा शाकाहारियों से लेकर मांसाहारियों और अपघटकों (decomposers) तक एक जटिल खाद्य जाल का समर्थन करती है।
- महत्वपूर्ण प्रजातियों का संरक्षण: वन कीस्टोन प्रजातियों (Keystone Species) जैसे बाघ, हाथी और संकेतक प्रजातियों (Indicator Species) को आवास प्रदान करते हैं, जिनकी उपस्थिति एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत देती है।
2. जलवायु के नियामक (Regulators of Climate)
- पृथ्वी के फेफड़े (Lungs of the Earth): प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया के माध्यम से, वन वायुमंडल से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन (O₂) छोड़ते हैं, जो स्थलीय जीवन के लिए प्राणवायु है।
- कार्बन सिंक (Carbon Sinks): वन कार्बन को अपनी बायोमास (लकड़ी, पत्तियों, जड़ों) और मिट्टी में संग्रहीत करके एक विशाल “कार्बन सिंक” के रूप में कार्य करते हैं। यह ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- स्थानीय और क्षेत्रीय जलवायु का नियमन: वन वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) की प्रक्रिया के माध्यम से हवा में नमी छोड़ते हैं, जिससे बादल बनते हैं और वर्षा होती है। वे स्थानीय तापमान को कम करते हैं और हवा की गति को नियंत्रित करते हैं, जिससे एक स्थिर माइक्रॉक्लाइमेट बनता है।
3. जल चक्र के संचालक (Drivers of the Hydrological Cycle)
- “विशालकाय प्राकृतिक स्पंज” (Giant Natural Sponges): वनों की मिट्टी और पत्तियों का आवरण वर्षा के पानी को सीधे बहने से रोकता है। यह पानी को धीरे-धीरे रिसने देता है, जिससे भूजल का पुनर्भरण (Groundwater Recharge) होता है।
- सतही अपवाह की रोकथाम (Prevention of Surface Runoff): वनों की उपस्थिति से पानी तेजी से नहीं बहता, जिससे अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods) का खतरा कम हो जाता है।
- नदियों के प्रवाह को बनाए रखना: भूजल का पुनर्भरण करके, वन यह सुनिश्चित करते हैं कि नदियों में शुष्क मौसम के दौरान भी एक सतत प्रवाह बना रहे, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और मानव उपयोग दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
4. मृदा के संरक्षक और निर्माता (Protectors and Builders of Soil)
- मृदा अपरदन की रोकथाम (Prevention of Soil Erosion): पेड़ों की व्यापक जड़ प्रणाली मिट्टी के कणों को एक साथ बांधकर रखती है, जिससे हवा और पानी द्वारा उपजाऊ ऊपरी मिट्टी का कटाव रुकता है।
- मृदा की उर्वरता में वृद्धि: पेड़ों से गिरने वाली पत्तियाँ और अन्य कार्बनिक पदार्थ विघटित होकर ह्यूमस (Humus) का निर्माण करते हैं, जो मिट्टी को पोषक तत्वों से समृद्ध करता है। यह एक सतत पोषक तत्व चक्र (Nutrient Cycling) को बढ़ावा देता है।
- मरुस्थलीकरण की रोकथाम (Prevention of Desertification): वन शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में एक अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं, जो उपजाऊ भूमि को मरुस्थल में बदलने से रोकते हैं।
5. प्राकृतिक शोधक (Natural Purifiers)
- वायु शोधक (Air Purifier): वन अपनी पत्तियों के माध्यम से सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य कणकीय पदार्थों जैसे वायु प्रदूषकों को अवशोषित और फ़िल्टर करते हैं।
- जल शोधक (Water Purifier): वनों का तलछट और मिट्टी एक प्राकृतिक फिल्टर के रूप में कार्य करते हैं, जो भूजल और नदियों में प्रवेश करने से पहले पानी से अशुद्धियों को हटाते हैं।
- ध्वनि प्रदूषण को कम करना: घने पेड़ शहरी क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण के लिए एक प्रभावी अवरोधक के रूप में कार्य कर सकते हैं।
पारिस्थितिक महत्व का सारांश
| पारिस्थितिक कार्य | प्रक्रिया / तंत्र | महत्व / प्रभाव |
| जैव विविधता संरक्षण | आवास, भोजन और संरक्षण प्रदान करना | आनुवंशिक पूल की सुरक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र का लचीलापन, प्रजातियों का अस्तित्व |
| जलवायु विनियमन | प्रकाश संश्लेषण, वाष्पोत्सर्जन | कार्बन सिंक, ऑक्सीजन उत्पादन, तापमान और वर्षा का नियमन |
| जल चक्र का नियमन | वर्षा का अवरोधन, भूजल पुनर्भरण | बाढ़ नियंत्रण, सूखा शमन, नदियों में बारहमासी प्रवाह |
| मृदा संरक्षण | जड़ों द्वारा मिट्टी को बांधना, ह्यूमस निर्माण | मृदा अपरदन की रोकथाम, उर्वरता बनाए रखना, मरुस्थलीकरण रोकना |
| प्राकृतिक शुद्धिकरण | प्रदूषकों का अवशोषण और फ़िल्टरिंग | स्वच्छ हवा और पानी, स्वस्थ मानव जीवन |
निष्कर्ष:
वनों का पारिस्थितिक महत्व केवल पर्यावरणविदों के लिए एक अकादमिक रुचि का विषय नहीं है, बल्कि यह मानव अस्तित्व की पूर्व शर्त है। ये जटिल पारिस्थितिकी तंत्र उन मौलिक सेवाओं को प्रदान करते हैं जिनके बिना हमारी अर्थव्यवस्था, हमारी कृषि, हमारा स्वास्थ्य और वास्तव में हमारा पूरा समाज ढह जाएगा। इसलिए, वनों का संरक्षण केवल कुछ प्रजातियों को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के भविष्य को सुरक्षित करने का एक अनिवार्य निवेश है।
वनों का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व (Socio-Cultural Significance of Forests)
भारत में, विशेष रूप से आदिवासी (Adivasi) और अन्य पारंपरिक वनवासी समुदायों के लिए, वन केवल एक आर्थिक या पारिस्थितिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि वे एक जीवित সত্তা (living entity), एक माता, एक देवता, और उनकी पहचान, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने का एक अविभाज्य अंग हैं। उनके और वनों के बीच एक सहजीवी (symbiotic) संबंध है।
1. पहचान और अस्तित्व का आधार (Basis of Identity and Existence)
- मूल पहचान: कई आदिवासी समुदायों के लिए ‘आदिवासी’ शब्द का अर्थ ही ‘मूल निवासी’ या ‘जंगल के निवासी’ है। उनका पूरा अस्तित्व और उनकी पहचान जंगलों से परिभाषित होती है। जंगल से उनका अलगाव उनकी पहचान को मिटाने जैसा है।
- गोत्र और वंश: कई समुदायों के गोत्र (Clans) और वंश के नाम पेड़ों, जानवरों या जंगल की अन्य विशेषताओं पर आधारित होते हैं (जैसे, ‘मरावी’ गोत्र ‘महुआ’ के पेड़ से जुड़ा है)। यह उनके और प्रकृति के बीच गहरे वंशानुगत संबंध को दर्शाता है।
2. आध्यात्मिक और धार्मिक केंद्र (Spiritual and Religious Hub)
- पवित्र उपवन (Sacred Groves / देवराई / सरना स्थल): भारत भर में, वनों के कुछ हिस्सों को देवताओं का निवास स्थान मानकर पवित्र माना जाता है। इन “पवित्र उपवनों” में किसी भी प्रकार की कटाई या मानवीय हस्तक्षेप वर्जित होता है। ये स्थल न केवल धार्मिक महत्व के हैं, बल्कि जैव विविधता के इन-सीटू संरक्षण (in-situ conservation) के उत्कृष्ट उदाहरण भी हैं।
- प्रकृति पूजा: कई समुदाय प्रकृति के विभिन्न रूपों—पेड़ों (पीपल, बरगद), पहाड़ों, नदियों, और जानवरों—की पूजा करते हैं। जंगल उनके लिए एक मंदिर है और उनकी धार्मिक प्रथाओं का केंद्र है।
3. आजीविका एक सामाजिक ताने-बाने के रूप में (Livelihood as a Social Fabric)
- सामुदायिक गतिविधि: गैर-इमारती वन उत्पादों (NTFPs) जैसे महुआ, तेंदू पत्ता, शहद आदि को इकट्ठा करना केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि एक सामुदायिक और पारिवारिक गतिविधि है। यह सामाजिक मेलजोल, ज्ञान के आदान-प्रदान और सामुदायिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर होता है।
- लैंगिक भूमिकाएँ: NTFPs का संग्रहण अक्सर महिलाओं द्वारा किया जाता है, जो उन्हें परिवार की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका और सामाजिक सम्मान प्रदान करता है।
4. पारंपरिक ज्ञान का भंडार (Repository of Traditional Knowledge)
- “जीवित विश्वविद्यालय”: वन स्वदेशी समुदायों के लिए एक जीवित विश्वविद्यालय की तरह हैं। पीढ़ियों से, उन्होंने वनों के बारे में एक गहन और समग्र ज्ञान प्रणाली (Traditional Ecological Knowledge – TEK) विकसित की है।
- एथनोबोटनी (Ethnobotany): वे जानते हैं कि कौन से पौधे औषधीय हैं, कौन से खाने योग्य हैं, और किनका उपयोग विभिन्न औजारों या अनुष्ठानों के लिए किया जा सकता है। यह ज्ञान उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का आधार है।
- सतत प्रबंधन: उनका पारंपरिक ज्ञान उन्हें यह सिखाता है कि संसाधनों का उपयोग स्थायी रूप से कैसे किया जाए ताकि वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी उपलब्ध रहें।
5. सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का स्रोत (Source of Cultural Expression)
- लोकगीत, कथाएं और नृत्य: उनकी पूरी मौखिक परंपरा—लोकगीत, मिथक, और कथाएं—जंगलों, वन्यजीवों और प्रकृति के चक्रों के इर्द-गिर्द बुनी हुई है। उनके कई नृत्य और त्योहार भी बुवाई, कटाई और मौसम के बदलने जैसे प्राकृतिक चक्रों का जश्न मनाते हैं।
- कला और शिल्प: उनकी कला (जैसे, वारली पेंटिंग) और शिल्प (बांस की टोकरियाँ, लकड़ी की नक्काशी) में जंगल के रूपांकनों का प्रमुखता से उपयोग होता है। यह उनकी रचनात्मकता और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति है।
6. सामाजिक सामंजस्य और शासन (Social Cohesion and Governance)
- साझा संसाधन: जंगल एक साझा सामुदायिक संसाधन (Common Property Resource) के रूप में कार्य करते हैं। इसके उपयोग और प्रबंधन के लिए समुदाय के भीतर सहयोग और आपसी सहमति की आवश्यकता होती है, जो सामाजिक सामंजस्य को बढ़ावा देता है।
- पारंपरिक शासन प्रणाली: कई समुदायों के पास वनों के प्रबंधन के लिए अपनी पारंपरिक शासन प्रणालियाँ और नियम होते हैं। पेसा अधिनियम (PESA Act), 1996 और वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 इन पारंपरिक अधिकारों और ग्राम सभा की भूमिका को कानूनी मान्यता देने का प्रयास करते हैं।
सारांश तालिका
| सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम | महत्व और अभिव्यक्ति |
| पहचान और अस्तित्व | ‘आदिवासी’ शब्द का अर्थ, गोत्रों का प्रकृति से जुड़ाव। |
| आध्यात्मिक विश्वास | पवित्र उपवन (देवराई), प्रकृति पूजा, सरना स्थल, जंगल को मंदिर मानना। |
| सामाजिक ताना-बाना | सामुदायिक रूप से वन उत्पादों का संग्रहण, सामाजिक मेलजोल, लैंगिक भूमिकाओं का निर्धारण। |
| पारंपरिक ज्ञान | औषधीय पौधों का ज्ञान, स्थायी संसाधन उपयोग, पारिस्थितिकी की समझ (TEK)। |
| सांस्कृतिक अभिव्यक्ति | लोकगीत, नृत्य, कथाएं, कला (जैसे वारली) और शिल्प जो जंगल से प्रेरित हैं। |
| सामुदायिक शासन | साझा संसाधन प्रबंधन, पारंपरिक नियम, ग्राम सभा की भूमिका। |
निष्कर्ष: संरक्षण की मानवीय विमा
वनों का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व हमें यह याद दिलाता है कि वन संरक्षण केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकार, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का भी मुद्दा है। जब खनन या बांध परियोजनाओं के लिए वनों को काटा जाता है, तो हम सिर्फ पेड़ और जानवर नहीं खोते; हम एक जीवन शैली, एक पहचान, पीढ़ियों का संचित ज्ञान और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का एक अनमोल हिस्सा भी खो देते हैं। इसलिए, किसी भी वन संरक्षण नीति की सफलता के लिए स्थानीय समुदायों को उसके केंद्र में रखना और उनके अधिकारों तथा ज्ञान का सम्मान करना अनिवार्य है।
भारत के प्रमुख वन प्रकारों का वर्गीकरण
1. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)
इन्हें उष्णकटिबंधीय वर्षा वन (Tropical Rainforests) भी कहा जाता है।
- जलवायु परिस्थितियाँ:
- वर्षा: 200 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा।
- तापमान: औसतन 22°C से ऊपर।
- आर्द्रता: उच्च आर्द्रता (70% से अधिक)।
- विशेषताएँ:
- ये वन अत्यंत सघन होते हैं।
- पेड़ बहु-स्तरीय (multi-layered) होते हैं, जिसमें एक लंबी कैनोपी (45-60 मीटर), मध्य परत और झाड़ियाँ होती हैं, जो सूर्य के प्रकाश को जमीन तक पहुंचने से रोकती हैं।
- पेड़ों के पत्ते गिराने, फूल आने और फल लगने का कोई निश्चित समय नहीं होता, इसलिए ये वन साल भर हरे-भरे दिखाई देते हैं।
- अत्यधिक जैव विविधता पाई जाती है।
- प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ: रोजवुड (Rosewood), महोगनी (Mahogany), एबोनी (Ebony), ऐनी (Aini), रबर, बांस।
- भौगोलिक वितरण:
- पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलान (महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल)।
- पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियाँ (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय)।
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।
2. उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous Forests)
ये भारत में सबसे बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। इन्हें मानसूनी वन (Monsoon Forests) भी कहा जाता है। इन्हें वर्षा की मात्रा के आधार पर दो उप-प्रकारों में बांटा जाता है:
A) उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous Forests)
- जलवायु परिस्थितियाँ:
- वर्षा: 100 से 200 सेमी के बीच।
- विशेषताएँ:
- ये वन शुष्क गर्मियों में नमी बचाने के लिए अपने पत्ते गिरा देते हैं (लगभग 6-8 सप्ताह के लिए)।
- ये सदाबहार वनों की तुलना में कम सघन होते हैं।
- प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ: सागौन (Teak) और साल (Sal) सबसे महत्वपूर्ण प्रजातियाँ हैं। शीशम (Shisham), चंदन (Sandalwood), खैर, कुसुम, अर्जुन, महुआ भी पाए जाते हैं।
- भौगोलिक वितरण:
- पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलान।
- हिमालय की तलहटी (शिवालिक)।
- झारखंड, पश्चिमी ओडिशा, छत्तीसगढ़ और छोटानागपुर पठार।
B) उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous Forests)
- जलवायु परिस्थितियाँ:
- वर्षा: 70 से 100 सेमी के बीच।
- विशेषताएँ:
- शुष्क मौसम लंबा होने पर ये वन एक विशाल घास के मैदान (Parkland) की तरह दिखते हैं, जहाँ पेड़ बिखरे हुए होते हैं।
- इन वनों का एक बड़ा हिस्सा कृषि के लिए साफ कर दिया गया है।
- प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ: तेंदू (Tendu), पलास (Palas), अमलतास, बेल, खैर, एक्सलवुड (Axlewood)।
- भौगोलिक वितरण:
- उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाके।
- प्रायद्वीपीय पठार के वर्षा-छाया क्षेत्र (Rain-shadow areas)।
3. उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन और झाड़ियाँ (Tropical Thorn Forests and Scrubs)
- जलवायु परिस्थितियाँ:
- वर्षा: 70 सेमी से कम।
- विशेषताएँ:
- पानी की कमी के कारण, पेड़ छोटे होते हैं, पत्तियाँ छोटी और कांटेदार होती हैं ताकि वाष्पीकरण को कम किया जा सके।
- पेड़ों की जड़ें पानी की तलाश में बहुत गहरी जाती हैं।
- प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ: बबूल (Acacia), कीकर, बेर, खजूर (Date Palms), खैर, नागफनी (Cacti)।
- भौगोलिक वितरण:
- देश के अर्ध-शुष्क क्षेत्र: दक्षिण-पश्चिमी पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के शुष्क क्षेत्र।
4. पर्वतीय वन (Montane Forests)
ऊंचाई में वृद्धि के साथ तापमान में कमी के कारण इन वनों में वनस्पति की एक श्रृंखला पाई जाती है।
A) उत्तरी पर्वतीय वन (हिमालयी वन)
- 1000 – 2000 मीटर: आर्द्र शीतोष्ण वन (Wet Temperate Forests) – चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार पेड़ जैसे ओक (Oak) और चेस्टनट (Chestnut)।
- 1500 – 3000 मीटर: शीतोष्ण शंकुधारी वन (Temperate Coniferous Forests) – चीड़ (Pine), देवदार (Deodar), सिल्वर फ़र (Silver Fir), स्प्रूस (Spruce)।
- 3600 मीटर से अधिक: अल्पाइन वनस्पति (Alpine Vegetation) – सिल्वर फ़र, जुनिपर, पाइन और बर्च (Birches)। अंततः ये अल्पाइन घास के मैदानों (Alpine grasslands) में विलीन हो जाते हैं।
B) दक्षिणी पर्वतीय वन
- ये मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत के तीन क्षेत्रों में पाए जाते हैं: पश्चिमी घाट, विंध्य और नीलगिरी।
- नीलगिरी, अन्नामलाई और पलानी पहाड़ियों में पाए जाने वाले शीतोष्ण वनों को “शोला” (Sholas) कहा जाता है।
- प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ: मैगनोलिया, लॉरेल, सिनकोना और वैटल।
5. मैंग्रोव वन (Mangrove Forests)
इन्हें ज्वारीय वन (Tidal Forests) भी कहा जाता है।
- जलवायु परिस्थितियाँ:
- ये तटों के किनारे नदियों के डेल्टा और ज्वार-भाटे वाले क्षेत्रों में उगते हैं।
- विशेषताएँ:
- ये खारे और ताजे पानी के मिश्रण में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होते हैं (हेलोफाइट्स – Halophytes)।
- उनकी जड़ें (जिन्हें न्यूमेटोफोर्स / Pneumatophores या श्वसन जड़ें कहते हैं) कीचड़ से बाहर निकलकर ऑक्सीजन ग्रहण करती हैं।
- ये सुनामी और चक्रवातों के खिलाफ एक शक्तिशाली प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं।
- प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ: सुंदरी (जिसके नाम पर सुंदरवन का नाम पड़ा है) सबसे महत्वपूर्ण प्रजाति है। इसके अलावा केवड़ा, अगर, नारियल, ताड़ भी पाए जाते हैं।
- भौगोलिक वितरण:
- गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (पश्चिम बंगाल का सुंदरवन – विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन)।
- महानदी, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी नदियों के डेल्टा।
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा गुजरात के कुछ हिस्से।
सारांश तालिका
| वन प्रकार | वार्षिक वर्षा | प्रमुख वृक्ष प्रजातियाँ | भौगोलिक वितरण |
| उष्णकटिबंधीय सदाबहार | > 200 सेमी | रोजवुड, महोगनी, एबोनी | पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर भारत, अंडमान-निकोबार |
| उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती | 100 – 200 सेमी | सागौन, साल, शीशम | हिमालय की तलहटी, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ |
| उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती | 70 – 100 सेमी | तेंदू, पलास, बेल | यूपी-बिहार के मैदान, प्रायद्वीपीय पठार |
| उष्णकटिबंधीय कांटेदार | < 70 सेमी | बबूल, बेर, खजूर | राजस्थान, गुजरात, हरियाणा के अर्ध-शुष्क क्षेत्र |
| पर्वतीय वन | ऊंचाई पर निर्भर | ओक, चेस्टनट, चीड़, देवदार | हिमालय, नीलगिरी (शोला) |
| मैंग्रोव वन | तटीय/डेल्टाई क्षेत्र | सुंदरी, केवड़ा | सुंदरवन, महानदी/कृष्णा/गोदावरी डेल्टा |
वनोन्मूलन (Deforestation) क्या है?
परिभाषा:
वनोन्मूलन का सीधा अर्थ है वनों का स्थायी रूप से विनाश करना या उन्हें स्थायी तौर पर गैर-वन भूमि में परिवर्तित करना। यह केवल पेड़ों को काटने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश शामिल है। जब भूमि को कृषि, शहरीकरण, खनन या अन्य अवसंरचना परियोजनाओं के लिए स्थायी रूप से साफ कर दिया जाता है, तो उसे वनोन्मूलन कहा जाता है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि यदि पेड़ों को वैज्ञानिक तरीके से काटा जाता है और उस स्थान पर फिर से पुनर्वनरोपण (Reforestation) कर दिया जाता है, तो उसे वनोन्मूलन नहीं माना जाएगा। वनोन्मूलन एक स्थायी भूमि-उपयोग परिवर्तन है।
वनोन्मूलन के प्रमुख कारण (Major Causes of Deforestation)
वनोन्मूलन के कारण जटिल और एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
A. प्रत्यक्ष कारण (Direct Causes)
ये वे तात्कालिक गतिविधियाँ हैं जो सीधे तौर पर जंगलों को साफ करती हैं।
- कृषि का विस्तार (Expansion of Agriculture): यह वनोन्मूलन का सबसे बड़ा एकल कारण है। बढ़ती जनसंख्या की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए, वन भूमि को कृषि भूमि में बदला जा रहा है। इसमें शामिल हैं:
- स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation / झूम खेती): विशेषकर पूर्वोत्तर भारत में, आदिवासी समुदाय जंगल के एक हिस्से को जलाकर खेती करते हैं और कुछ वर्षों बाद उसे छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं।
- व्यावसायिक कृषि (Commercial Agriculture): पाम तेल, सोयाबीन, कॉफी, और रबर जैसी फसलों के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को साफ किया जा रहा है।
- अवसंरचना विकास (Infrastructure Development):
- सड़कें, राजमार्ग, रेलवे लाइनें, बांध, बिजली पारेषण लाइनें और औद्योगिक परिसरों के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर वन भूमि की आवश्यकता होती है।
- शहरीकरण (Urbanization):
- शहरों और कस्बों के विस्तार के लिए आवास और अन्य नागरिक सुविधाओं के निर्माण हेतु जंगलों को काटा जा रहा है।
- खनन (Mining):
- कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और अन्य खनिजों को निकालने के लिए ओपन-कास्ट माइनिंग में जंगल की पूरी सतह को हटा दिया जाता है।
- अवैध कटाई और लकड़ी की मांग (Illegal Logging and Timber Demand):
- फर्नीचर, कागज, और निर्माण के लिए लकड़ी की बढ़ती मांग के कारण अवैध रूप से पेड़ों की कटाई होती है।
- ईंधन की लकड़ी के लिए भी स्थानीय समुदाय वनों पर निर्भर हैं, जिससे वनों का क्षरण होता है।
- वनाग्नि (Forest Fires):
- हालांकि कुछ आग प्राकृतिक होती हैं, लेकिन अधिकांश मानव-जनित होती हैं – या तो जानबूझकर भूमि पर कब्जा करने के लिए या लापरवाही से।
B. अप्रत्यक्ष / अंतर्निहित कारण (Indirect / Underlying Causes)
ये वे सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कारक हैं जो प्रत्यक्ष कारणों को बढ़ावा देते हैं।
- जनसंख्या वृद्धि: बढ़ती जनसंख्या का मतलब है भोजन, आवास और संसाधनों की बढ़ती मांग, जो सीधे तौर पर वनों पर दबाव डालती है।
- गरीबी: गरीब समुदाय अपनी आजीविका और ऊर्जा की जरूरतों के लिए सीधे तौर पर वनों पर निर्भर होते हैं, जिससे संसाधनों का अस्थिर उपयोग हो सकता है।
- खराब शासन और कमजोर कानून: भ्रष्टाचार और वन कानूनों का कमजोर कार्यान्वयन अवैध कटाई और अतिक्रमण को बढ़ावा देता है।
- बाजार की मांग: वैश्विक और घरेलू बाजार में लकड़ी, कागज और कृषि उत्पादों की मांग वनोन्मूलन को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाती है।
वनोन्मूलन के प्रभाव/परिणाम (Impacts/Consequences of Deforestation)
वनोन्मूलन के परिणाम विनाशकारी और बहुआयामी होते हैं।
| प्रभाव का क्षेत्र | विवरण |
| पारिस्थितिक प्रभाव (Ecological) | जैव विविधता का विनाश: वन लाखों प्रजातियों का घर हैं। उनके विनाश से आवास नष्ट हो जाते हैं और प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं। <br> जलवायु परिवर्तन: वन कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं। उनकी कटाई से संग्रहीत कार्बन वायुमंडल में CO₂ के रूप में वापस चला जाता है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है। <br> जल चक्र का बाधित होना: वन वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से वर्षा को प्रभावित करते हैं। उनके विनाश से सूखा और वर्षा के पैटर्न में बदलाव हो सकता है। <br> मृदा अपरदन और मरुस्थलीकरण: पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं। उनके कटने से उपजाऊ मिट्टी बह जाती है, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ता है और भूमि बंजर हो जाती है। |
| सामाजिक प्रभाव (Social) | आदिवासी समुदायों का विस्थापन: वनवासी समुदायों की आजीविका, संस्कृति और पहचान वनों से जुड़ी होती है। वनोन्मूलन उन्हें उनकी जड़ों से विस्थापित कर देता है। <br> आजीविका का संकट: करोड़ों लोग NTFPs (गैर-इमारती वन उत्पाद) पर निर्भर हैं। वनों के विनाश से उनकी आय का स्रोत समाप्त हो जाता है। <br> मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि: जब वन्यजीवों के आवास सिकुड़ते हैं, तो वे भोजन और आश्रय के लिए मानव बस्तियों में प्रवेश करते हैं, जिससे संघर्ष बढ़ता है। |
| आर्थिक प्रभाव (Economic) | पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का नुकसान: वन हमें स्वच्छ हवा, पानी, परागण और बाढ़ नियंत्रण जैसी अमूल्य “सेवाएं” प्रदान करते हैं। इनके विनाश से दीर्घकाल में भारी आर्थिक नुकसान होता है (जैसे बाढ़ से होने वाली क्षति)। <br> संसाधनों की कमी: भविष्य में लकड़ी, औषधियों और अन्य वन उत्पादों की कमी हो सकती है, जिससे संबंधित उद्योग प्रभावित होंगे। |
निष्कर्ष:
वनोन्मूलन केवल पेड़ों को काटना नहीं है, यह पृथ्वी की जीवन समर्थन प्रणाली पर एक हमला है। यह एक जटिल समस्या है जिसके गहरे पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक परिणाम हैं। इसके समाधान के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, सतत विकास मॉडल को अपनाना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना शामिल है।
वनोन्मूलन की व्यापकता: एक वैश्विक और भारतीय परिप्रेक्ष्य
वनोन्मूलन की सीमा को दो स्तरों पर मापा जाता है:
- मात्रात्मक (Quantitative): कितने क्षेत्रफल (हेक्टेयर/वर्ग किमी) में वन समाप्त हो गए।
- गुणात्मक (Qualitative): वनों के घनत्व और स्वास्थ्य में गिरावट, जिसे वन क्षरण (Forest Degradation) कहा जाता है।
1. वैश्विक परिदृश्य (The Global Picture)
वैश्विक स्तर पर, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (Tropics) में वनोन्मूलन की दर सबसे अधिक और चिंताजनक है।
- मुख्य डेटा स्रोत: संयुक्त राष्ट्र का खाद्य और कृषि संगठन (FAO) हर 5 साल में वैश्विक वन संसाधन आकलन (Global Forest Resources Assessment – FRA) रिपोर्ट जारी करता है, जो इस पर सबसे प्रामाणिक डेटा है।
- प्रमुख आँकड़े (FAO FRA 2020 के अनुसार):
- कुल हानि: 1990 के बाद से, दुनिया ने अनुमानित 420 मिलियन हेक्टेयर वन खो दिए हैं – यह भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल से भी बड़ा क्षेत्र है।
- वर्तमान दर: हालाँकि वनोन्मूलन की दर में कुछ कमी आई है, फिर भी यह खतरनाक रूप से उच्च बनी हुई है। 2015-2020 के बीच, दुनिया हर साल औसतन 10 मिलियन हेक्टेयर वन खो रही थी।
- प्राथमिक वन (Primary Forests): ये मूल, प्राचीन वन हैं जिन्हें मानव ने छुआ नहीं है। 1990 के बाद से दुनिया ने 80 मिलियन हेक्टेयर से अधिक प्राथमिक वन खो दिए हैं।
- वनोन्मूलन के हॉटस्पॉट (Global Hotspots):
- दक्षिण अमेरिका: विशेष रूप से अमेज़ॅन वर्षावन (Amazon Rainforest)। ब्राजील, बोलीविया और पैराग्वे जैसे देशों में पशुपालन (Cattle ranching) और सोयाबीन की खेती के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को साफ किया जा रहा है।
- अफ्रीका: उप-सहारा अफ्रीका, विशेष रूप से कांगो बेसिन (Congo Basin)। छोटे पैमाने पर कृषि और लकड़ी का कोयला उत्पादन यहाँ वनोन्मूलन के प्रमुख चालक हैं।
- दक्षिण पूर्व एशिया: इंडोनेशिया और मलेशिया में पाम तेल (Palm Oil) के बागानों के लिए बड़े पैमाने पर वर्षावनों को नष्ट किया गया है।
2. भारतीय परिप्रेक्ष्य (The Indian Context)
भारत की तस्वीर जटिल और अक्सर विरोधाभासी दिखाई देती है।
- मुख्य डेटा स्रोत: भारत वन सर्वेक्षण (FSI) की “भारत वन स्थिति रिपोर्ट” (India State of Forest Report – ISFR)।
- आधिकारिक आँकड़े (ISFR 2021 के अनुसार):
- कुल वृद्धि: आधिकारिक तौर पर, भारत के कुल वन और वृक्षावरण (Forest and Tree Cover) में वृद्धि दर्ज की जा रही है। ISFR 2019 की तुलना में ISFR 2021 में 2,261 वर्ग किमी की वृद्धि हुई है।
- सकारात्मक तस्वीर: यह आँकड़ा सरकार की वृक्षारोपण योजनाओं, कृषि वानिकी और बेहतर संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाता है।
- आँकड़ों के पीछे की वास्तविकता (The Reality Behind the Numbers):
यह सकारात्मक तस्वीर पूरी कहानी नहीं बताती है। वनोन्मूलन की व्यापकता को समझने के लिए गहराई से विश्लेषण करना महत्वपूर्ण है:- वन क्षरण (Forest Degradation): जहाँ एक ओर कुल वनावरण बढ़ रहा है, वहीं प्राकृतिक और घने वनों की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है।
- ISFR 2021 ने दिखाया कि मध्यम सघन वनों (Moderately Dense Forests) में 1,582 वर्ग किमी की कमी आई है। इस गिरावट का एक हिस्सा खुले वनों (Open Forests) में वृद्धि से संतुलित हो जाता है, जो पारिस्थितिक रूप से कम मूल्यवान हैं। इसका मतलब है कि घने जंगल कम घने हो रहे हैं।
- प्राकृतिक वनों का नुकसान: कुल वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा वाणिज्यिक वृक्षारोपण, कृषि वानिकी और शहरी पार्कों से आता है। इन्हें FSI की परिभाषा के अनुसार “वन” के रूप में गिना जाता है, लेकिन वे प्राकृतिक वनों की जैव विविधता और पारिस्थितिक सेवाओं की जगह नहीं ले सकते।
- पूर्वोत्तर भारत में भारी नुकसान: भारत के सबसे घने, जैव विविधता से भरपूर और प्राचीन वन पूर्वोत्तर राज्यों में हैं। ISFR 2021 के अनुसार, इसी क्षेत्र ने 1,020 वर्ग किमी के वनावरण का शुद्ध नुकसान दर्ज किया। यह भारत में वास्तविक वनोन्मूलन का हॉटस्पॉट है, जो झूम खेती, अवसंरचना विकास और अतिक्रमण के कारण हो रहा है।
- वन क्षरण (Forest Degradation): जहाँ एक ओर कुल वनावरण बढ़ रहा है, वहीं प्राकृतिक और घने वनों की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है।
वैश्विक बनाम भारतीय परिदृश्य की सारांश तालिका
| मानदंड | वैश्विक व्यापकता | भारतीय व्यापकता |
| समग्र प्रवृत्ति | वन क्षेत्र में शुद्ध हानि (Net Loss) जारी है, हालांकि दर थोड़ी धीमी हुई है। | वन क्षेत्र में आधिकारिक तौर पर शुद्ध वृद्धि (Net Increase) दर्ज की जा रही है। |
| प्राथमिक चालक | उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में व्यावसायिक कृषि (पाम तेल, सोयाबीन) और पशुपालन। | अवसंरचना परियोजनाएं, शहरीकरण, खनन और पूर्वोत्तर में झूम खेती। |
| हॉटस्पॉट | अमेज़ॅन वर्षावन (दक्षिण अमेरिका), कांगो बेसिन (अफ्रीका), दक्षिण पूर्व एशिया। | पूर्वोत्तर भारत के राज्य (अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम)। |
| चिंता का विषय | प्राथमिक, प्राचीन वनों का तीव्र और स्थायी विनाश। | प्राकृतिक और सघन वनों का क्षरण (Degradation) तथा उन्हें खुले वनों/वृक्षारोपण में बदलना। |
| आँकड़ों की बारीकी | FAO की रिपोर्ट व्यापक रूप से वनोन्मूलन को स्वीकार करती है। | FSI की “वन” की व्यापक परिभाषा (जिसमें वृक्षारोपण भी शामिल है) प्राकृतिक वनों के नुकसान को छिपा सकती है। |
निष्कर्ष:
वैश्विक स्तर पर, वनोन्मूलन की व्यापकता एक खुला और गंभीर संकट है, जिसमें हर साल लाखों हेक्टेयर प्राकृतिक वन स्थायी रूप से नष्ट हो रहे हैं। इसके विपरीत, भारत कागजों पर एक सकारात्मक तस्वीर प्रस्तुत करता है, लेकिन यह तस्वीर प्राकृतिक और घने वनों की गुणवत्ता में हो रहे क्षरण तथा पूर्वोत्तर भारत जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में हो रहे वास्तविक नुकसान को पूरी तरह से नहीं दर्शाती है। इसलिए, भारत के लिए चुनौती केवल वनीकरण की मात्रा बढ़ाने की नहीं, बल्कि अपने मौजूदा प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता को बचाने और पुनर्स्थापित करने की भी है।
वनोन्मूलन के प्रमुख वैश्विक उदाहरण (Global Examples of Deforestation)
ये केस स्टडीज वनोन्मूलन के विभिन्न चालकों, प्रभावों और इससे जुड़ी जटिलताओं को दर्शाती हैं।
1. अमेज़ॅन वर्षावन, ब्राजील: “पृथ्वी के फेफड़ों” पर संकट
- संदर्भ: अमेज़ॅन दुनिया का सबसे बड़ा वर्षावन है, जो वैश्विक जैव विविधता और जलवायु विनियमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका लगभग 60% हिस्सा ब्राजील में है।
- वनोन्मूलन के प्रमुख चालक (Drivers):
- पशुपालन (Cattle Ranching): अमेज़ॅन में वनोन्मूलन का यह सबसे बड़ा कारण है। वैश्विक बीफ़ (गोमांस) की मांग को पूरा करने के लिए विशाल वन क्षेत्रों को साफ करके चरागाहों में बदल दिया गया है।
- सोयाबीन की खेती: सोयाबीन का उपयोग पशुओं के चारे और जैव ईंधन के लिए होता है। इसकी बढ़ती वैश्विक मांग के कारण वनों को कृषि भूमि में बदला जा रहा है।
- अवैध कटाई, खनन और अवसंरचना: सड़कों (जैसे ट्रांस-अमेज़ोनियन हाईवे) और बांधों के निर्माण ने दूरदराज के जंगली क्षेत्रों को मानव हस्तक्षेप के लिए खोल दिया है।
- प्रभाव:
- अभूतपूर्व जैव विविधता का विनाश।
- स्वदेशी समुदायों का विस्थापन और उनकी संस्कृति का विनाश।
- कार्बन सिंक के रूप में अमेज़ॅन की क्षमता में कमी, जिससे वैश्विक जलवायु परिवर्तन तेज हो रहा है।
- यूपीएससी के लिए महत्व: यह उदाहरण दर्शाता है कि कैसे वैश्विक बाजार की मांग (Global Market Demand) स्थानीय स्तर पर वनोन्मूलन को बढ़ावा दे सकती है। यह “विकास बनाम पर्यावरण” की बहस का एक क्लासिक उदाहरण है।
2. पाम तेल और वनोन्मूलन, इंडोनेशिया और मलेशिया
- संदर्भ: इंडोनेशिया और मलेशिया मिलकर दुनिया के लगभग 85% पाम तेल का उत्पादन करते हैं। पाम तेल एक सस्ता वनस्पति तेल है जिसका उपयोग प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (Processed Foods), सौंदर्य प्रसाधनों और जैव ईंधन में व्यापक रूप से होता है।
- वनोन्मूलन के प्रमुख चालक:
- पाम तेल के बागान (Palm Oil Plantations): पाम तेल की अत्यधिक मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर उष्णकटिबंधीय वर्षावनों, विशेष रूप से पीटभूमि वनों (Peatland Forests) को जलाकर साफ कर दिया गया है।
- प्रभाव:
- वन्यजीवों का संकट: इससे ओरंगुटान (Orangutan), सुमात्राई बाघ और हाथियों जैसे गंभीर रूप से लुप्तप्राय जानवरों के आवास नष्ट हो गए हैं।
- ग्रीनहाउस गैसों का भारी उत्सर्जन: पीटभूमि को जलाने से जमीन में संग्रहीत भारी मात्रा में कार्बन वायुमंडल में छोड़ दिया जाता है, जिससे इंडोनेशिया दुनिया के शीर्ष कार्बन उत्सर्जकों में से एक बन गया है।
- वायु प्रदूषण (Haze): जंगलों में लगी आग से उत्पन्न धुएं का गुबार पड़ोसी देशों (जैसे सिंगापुर, मलेशिया) तक फैल जाता है, जिससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं।
- यूपीएससी के लिए महत्व: यह उदाहरण एक एकल वस्तु (Single Commodity) के कारण होने वाले विनाशकारी वनोन्मूलन को दर्शाता है। यह स्थायी आपूर्ति श्रृंखला (Sustainable Supply Chains) और उपभोक्ता जागरूकता के महत्व पर भी प्रकाश डालता है। राउंडटेबल ऑन सस्टेनेबल पाम ऑयल (RSPO) जैसी पहलों का उल्लेख किया जा सकता है।
3. कांगो बेसिन, मध्य अफ्रीका: छोटा किसान, बड़ा प्रभाव
- संदर्भ: कांगो बेसिन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा वर्षावन है। अमेज़ॅन के विपरीत, यहाँ वनोन्मूलन मुख्य रूप से बड़ी कंपनियों द्वारा नहीं, बल्कि स्थानीय आबादी द्वारा संचालित होता है।
- वनोन्मूलन के प्रमुख चालक:
- लघु-स्तरीय निर्वाह कृषि (Small-scale Subsistence Agriculture): स्थानीय किसान अपने परिवारों का पेट भरने के लिए जंगलों के छोटे-छोटे हिस्सों को साफ करते हैं।
- लकड़ी का कोयला (Charcoal) उत्पादन: शहरी क्षेत्रों में खाना पकाने और ऊर्जा के लिए लकड़ी के कोयले की बहुत मांग है, जिसे बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाते हैं।
- अवैध कटाई और खनन: राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर शासन के कारण यह समस्या बढ़ रही है।
- प्रभाव:
- मानव-वन्यजीव संघर्ष, विशेष रूप से हाथियों और गोरिल्ला के साथ।
- गरीबी और पर्यावरणीय गिरावट का एक दुष्चक्र।
- यूपीएससी के लिए महत्व: यह उदाहरण दर्शाता है कि गरीबी और ऊर्जा सुरक्षा की कमी कैसे वनोन्मूलन का एक प्रमुख चालक हो सकती है। यह इंगित करता है कि संरक्षण के प्रयासों को स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी आजीविका के विकल्प प्रदान करने के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)
हालांकि UPSC सीधे तौर पर “अमेज़ॅन में वनोन्मूलन” पर प्रश्न नहीं पूछ सकता है, लेकिन वह अवधारणाओं पर प्रश्न पूछता है जहाँ आप इन उदाहरणों का उपयोग कर सकते हैं।
- प्रश्न: “विकास की प्रक्रिया में जीवन-सक्षम पर्यावरण का हनन होना आवश्यक है”। इस दृष्टिकोण का, विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देशों के संदर्भ में, समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
(The process of development alienates people from their environment. Critically evaluate this viewpoint, particularly in the context of developing countries like India.)- यहाँ कैसे उपयोग करें: आप अमेज़ॅन का उदाहरण दे सकते हैं जहाँ सड़कों और बांधों जैसे ‘विकास’ ने पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है और स्वदेशी लोगों को विस्थापित किया है।
- प्रश्न: मरुस्थलीकरण के प्रक्रम की जलवायविक सीमाएँ नहीं होती हैं। उदाहरणों सहित पुष्टि कीजिए।
(The process of desertification does not have climatic boundaries. Justify with examples.)- यहाँ कैसे उपयोग करें: आप समझा सकते हैं कि कैसे अमेज़ॅन जैसे वर्षावन क्षेत्र में भी, व्यापक वनोन्मूलन वर्षा के पैटर्न को बदल सकता है और एक समय के हरे-भरे क्षेत्र को एक शुष्क सवाना (Dry Savanna) में बदलने का खतरा पैदा कर सकता है। यह ‘मानव-जनित मरुस्थलीकरण’ का एक उदाहरण है।
- प्रश्न: आज विश्व में वन संसाधनों के समाप्त होने के मुख्य कारण क्या हैं?
(What are the main reasons for the depletion of forest resources in the world today?)- यहाँ कैसे उपयोग करें: इस प्रश्न के उत्तर में, आप उपरोक्त तीनों केस स्टडीज का उपयोग कर सकते हैं—अमेज़ॅन (व्यावसायिक कृषि), इंडोनेशिया (एकल वस्तु की मांग), और कांगो (गरीबी और निर्वाह कृषि)—ताकि यह दिखाया जा सके कि वनोन्मूलन के कारण क्षेत्र के अनुसार कैसे भिन्न होते हैं।
इन उदाहरणों का उपयोग करके, आप अपने उत्तरों को अधिक व्यावहारिक और विश्लेषणात्मक बना सकते हैं, जो UPSC में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
वन संरक्षण के लिए अपनाए गए दृष्टिकोण (Approaches to Forest Conservation)
वन संरक्षण के लिए कई रणनीतियों और दृष्टिकोणों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें अक्सर एक साथ लागू किया जाता है।
| दृष्टिकोण (Approach) | विवरण (Description) | उदाहरण (Examples in India) |
| नियामक और कानूनी दृष्टिकोण (Regulatory & Legal) | इसमें सख्त कानूनों, नीतियों और नियमों के माध्यम से वनों की रक्षा करना शामिल है ताकि उनके विनाश को रोका जा सके। | वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980; वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972; पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986। |
| सहभागिता दृष्टिकोण (Participatory) | इसमें वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों, विशेषकर वनवासियों को भागीदार बनाना शामिल है। यह स्वीकार करता है कि स्थानीय समुदाय संरक्षण में सबसे महत्वपूर्ण हितधारक हैं। | संयुक्त वन प्रबंधन (JFM); वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) के तहत सामुदायिक वन अधिकार; इको-डेवलपमेंट समितियाँ। |
| वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण (Scientific & Technical) | इसमें वन प्रबंधन, निगरानी और पुनर्स्थापन के लिए आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग शामिल है। | रिमोट सेंसिंग और GIS का उपयोग करके वनों की मैपिंग और निगरानी; वैज्ञानिक पुनर्वनरोपण (Reforestation); स्थायी वन प्रबंधन (Sustainable Forest Management – SFM)। |
| क्षेत्र-आधारित संरक्षण (Area-Based Conservation) | इसमें जैव विविधता की रक्षा के लिए विशिष्ट क्षेत्रों को कानूनी रूप से संरक्षित घोषित करना शामिल है। | संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क (Protected Area Network): राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व। |
| प्रोत्साहन-आधारित दृष्टिकोण (Incentive-Based) | इसमें संरक्षण गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करना शामिल है। | प्रतिपूरक वनीकरण कोष (CAMPA Fund); इको-टूरिज्म से होने वाली आय को समुदायों के साथ साझा करना; REDD+ जैसी अंतर्राष्ट्रीय पहलें। |
भारत में वन संरक्षण के लिए प्रमुख कानूनी और नीतिगत ढाँचा
- भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act, 1927): यह औपनिवेशिक काल का कानून है, जिसका मुख्य उद्देश्य लकड़ी के परिवहन को नियंत्रित करना और उस पर कर लगाना था।
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972):
- इसने संकटग्रस्त प्रजातियों के शिकार पर प्रतिबंध लगाया।
- राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना के लिए एक कानूनी ढाँचा प्रदान किया।
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (Forest (Conservation) Act, 1980):
- यह सबसे महत्वपूर्ण वन संरक्षण कानूनों में से एक है।
- इसका मुख्य उद्देश्य वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए परिवर्तित करने (diversion) को प्रतिबंधित करना है।
- किसी भी वन भूमि के परिवर्तन के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।
- राष्ट्रीय वन नीति, 1988 (National Forest Policy, 1988):
- इसने वन प्रबंधन में एक क्रांतिकारी बदलाव किया। इसने राजस्व सृजन के बजाय पर्यावरणीय स्थिरता और संरक्षण को प्राथमिकता दी।
- देश के 33% भौगोलिक क्षेत्र को वनावरण के तहत लाने का लक्ष्य निर्धारित किया।
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी (JFM) पर जोर दिया।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006 – FRA):
- यह एक ऐतिहासिक कानून है जो वन संरक्षण को सामाजिक न्याय से जोड़ता है।
- यह उन आदिवासी समुदायों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है जो पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं।
- यह ग्राम सभा को सामुदायिक वन संसाधनों (Community Forest Resources – CFR) के प्रबंधन और संरक्षण का अधिकार देता है।
- प्रतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम (CAMPA), 2016:
- यह अधिनियम उन निधियों का प्रबंधन करने के लिए बनाया गया था जो वन भूमि के परिवर्तन के बदले में प्राप्त होती हैं।
- इस धन का उपयोग राज्यों द्वारा पुनर्वनरोपण, वन संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण के लिए किया जाता है।
प्रमुख संरक्षण कार्यक्रम और पहल
- संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM): यह 1980 के दशक के अंत में शुरू किया गया एक कार्यक्रम है जिसमें वन विभाग और स्थानीय समुदाय (ग्राम वन समितियों के माध्यम से) खराब और अवक्रमित वनों के प्रबंधन के लिए एक साथ काम करते हैं। समुदाय को बदले में गैर-इमारती वन उत्पादों और लकड़ी की बिक्री में हिस्सा मिलता है।
- राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम (National Afforestation Programme – NAP): इसका उद्देश्य अवक्रमित वन भूमि का पुनर्वनरोपण करना है।
- ग्रीन इंडिया मिशन (Green India Mission – GIM): यह जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) का हिस्सा है। इसका उद्देश्य वनावरण को बढ़ाना और मौजूदा वनों की गुणवत्ता में सुधार करना है ताकि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम किया जा सके।
वन संरक्षण में चुनौतियाँ
- विकास का दबाव: अवसंरचना, खनन और शहरीकरण का लगातार दबाव।
- अधिकार बनाम संरक्षण: FRA के तहत अधिकारों को मान्यता देने और सख्त संरक्षण के बीच अक्सर टकराव की स्थिति पैदा होती है।
- फंड का कुप्रबंधन: CAMPA जैसे फंड का उपयोग अक्सर अप्राकृतिक वृक्षारोपण (monoculture plantations) के लिए किया जाता है जो जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष: संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बढ़ता संघर्ष संरक्षण के प्रयासों को कमजोर करता है।
- कमजोर कार्यान्वयन: कई प्रगतिशील कानूनों और नीतियों का जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन खराब रहता है।
आगे की राह
- समग्र भूमि उपयोग योजना: ऐसी योजना बनाना जो विकास की जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण को एकीकृत करे।
- समुदाय आधारित संरक्षण को मजबूत करना: FRA के तहत ग्राम सभाओं को सशक्त बनाना और JFM को पुनर्जीवित करना।
- पारिस्थितिक पुनर्स्थापन: अप्राकृतिक वृक्षारोपण के बजाय स्थानीय प्रजातियों का उपयोग करके संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करना।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: आग की निगरानी, अतिक्रमण का पता लगाने और वन स्वास्थ्य के मूल्यांकन के लिए ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी का प्रभावी उपयोग।
- पर्यावरण-विकास को मुख्यधारा में लाना: आर्थिक विकास की योजनाओं में पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के मूल्य को शामिल करना।
A. विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs) – मुख्य परीक्षा (Mains)
पर्यावरण और भूगोल के दृष्टिकोण से (GS-1 & GS-3)
- **** भारत में जैव-विविधता किस प्रकार अलग-अलग पाई जाती है? वनस्पति और जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए सरकार द्वारा क्या कदम उठाए गए हैं?
(How is the biodiversity of India varied? What are the steps taken by the Government for the conservation of flora and fauna?)- संकेत: इस प्रश्न में, आप भारत के विभिन्न वन प्रकारों (उष्णकटिबंधीय, पर्वतीय आदि) का उल्लेख करके जैव-विविधता की भिन्नता बता सकते हैं और फिर संरक्षण के कदमों में वन संरक्षण अधिनियम, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क आदि का वर्णन कर सकते हैं।
- **** तटीय अपरदन के कारणों एवं प्रभावों को स्पष्ट कीजिए। खतरे का मुकाबला करने के लिए उपलब्ध तटीय प्रबंधन तकनीकें क्या हैं?
(Explain the causes and effects of coastal erosion. What are the available coastal management techniques for combating the hazard?)- संकेत: तटीय प्रबंधन तकनीकों में मैंग्रोव वनों का संरक्षण और पुनर्स्थापन एक महत्वपूर्ण जैविक समाधान है। आपको यहाँ मैंग्रोव की भूमिका का विशेष उल्लेख करना चाहिए।
- **** “भारत में वनाग्नि की घटनाएँ हाल के वर्षों में बढ़ी हुई प्रतीत होती हैं।” इसके कारणों और प्रभावों पर चर्चा कीजिए।
(The incidents of forest fires in India seem to have increased in recent years. Discuss the causes and effects of these incidents.) - **** भारत में ‘आदिवासी’ बनाम ‘वनवासी’ के रूप में वनवासियों को बाहर रखने की औपनिवेशिक वन नीतियों के परिणामों की विवेचना कीजिए।
(Discuss the consequences of colonial forest policies in India that excluded forest dwellers, framing them as ‘tribals’ versus ‘forest dwellers’.)- संकेत: यह एक ऐतिहासिक-सामाजिक प्रश्न है जो GS-1 के लिए प्रासंगिक है। इसमें आपको ब्रिटिश वन नीतियों के नकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों और बाद में वन अधिकार अधिनियम, 2006 जैसे कानूनों के महत्व को दर्शाना होगा।
- **** भारत में बहुत बड़े ‘अनर्थकारी बाढ़’ की घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि क्यों हो रही है, जब पूर्वानुमान लगाने की तथा रिमोट सेंसिंग आंकड़ों की उपलब्धता बढ़ रही है?
(Why are there more incidents of ‘disastrous floods’ in India even as forecasting and remote sensing data are becoming more available?)- संकेत: इसके कई कारणों में से एक प्रमुख कारण है जलग्रहण क्षेत्रों (catchment areas) में व्यापक वनोन्मूलन, जिससे पानी का बहाव तेज हो जाता है और बाढ़ की तीव्रता बढ़ जाती है।
सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से (GS-2)
- **** “विकासात्मक परियोजनाओं के लिए अनिवार्य भूमि अधिग्रहण हमेशा स्थानीय समुदायों के लिए पीड़ा का स्रोत रहा है।” वन अधिकार अधिनियम, 2006 को ध्यान में रखते हुए, सरकार की नीति पर टिप्पणी करें।
(“Compulsory land acquisition for developmental projects has always been a source of anguish for local communities.” Keeping in mind the Forest Rights Act, 2006, comment on the government’s policy.)
B. विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs) – प्रारंभिक परीक्षा (Prelims)
- **** निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत में, जैव-विविधता प्रबंधन समितियाँ नागोया प्रोटोकॉल के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए प्रमुख कुंजी हैं।
- जैव-विविधता प्रबंधन समितियों के, अपने क्षेत्राधिकार के भीतर जैविक संसाधनों तक पहुँच के लिए संग्रह शुल्क लगाने की शक्ति सहित, पहुँच और लाभ सहभागिता को निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण प्रकार्य हैं।
- (संकेत: यह प्रश्न सीधे तौर पर वन से नहीं है, लेकिन इसका संबंध वन संसाधनों के प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भूमिका से है, जो FRA और JFM की भावना के अनुरूप है।)
- **** “भारत में, केंद्रीय सरकार के सिवाय अन्य कोई निकाय या राज्य सदाबहार वन को आरक्षित वन घोषित कर सकता है।”
(यह प्रश्न कानूनी प्रावधानों की समझ का परीक्षण करता है।) - **** ‘सामुदायिक वन संसाधन’ अधिकारों को, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के अधीन किन्हें दिया जाता है?
(Who are given the rights to ‘Community Forest Resources’ under the Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006?)- (a) ग्राम सभा
- (b) जिला कलेक्टर
- (c) राज्य वन विभाग
- (d) केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय
- **** यदि आप हिमालय से होकर यात्रा करते हैं, तो आपको वहाँ निम्नलिखित में से किस/किन पादप/पादपों को प्राकृतिक रूप से उगते हुए देखने की संभावना है?
- बांज (Oak)
- बुरूंश (Rhododendron)
- चंदन (Sandalwood)
- (संकेत: यह पर्वतीय वनों की वनस्पति पर आधारित है।)
C. संभावित अभ्यास प्रश्न – मुख्य परीक्षा (Mains)
- प्रश्न: राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के 33% वनावरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में भारत की प्रगति का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) के नवीनतम निष्कर्षों के आलोक में इस लक्ष्य की प्राप्ति में आने वाली प्रमुख बाधाओं पर चर्चा करें।
(GS-3, Environment) - प्रश्न: भारत में वनोन्मूलन के अंतर्निहित कारण क्या हैं? यह देश की खाद्य और जल सुरक्षा को कैसे प्रभावित करता है? एक स्थायी समाधान के लिए एक बहुआयामी रणनीति सुझाएं।
(GS-1 Geography / GS-3 Environment) - प्रश्न: ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ की अवधारणा की विवेचना कीजिए। क्या भारत में CAMPA फंड अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रहा है? इसके कार्यान्वयन से जुड़ी चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।
(GS-3, Environment) - प्रश्न: “वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन संरक्षण और आदिवासी न्याय के बीच एक सेतु बनाने का वादा करता है, लेकिन इसका कार्यान्वयन इन दोनों के बीच एक संघर्ष का मैदान बन गया है।” इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(GS-2, Social Justice / GS-3, Environment) - प्रश्न: मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल एक संरक्षण समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक मुद्दे के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उपयुक्त उदाहरणों के साथ इस कथन को स्पष्ट करें और इस संघर्ष को कम करने के उपाय बताएं।
(GS-3, Environment & Security)
वन संरक्षण: समाधान और दीर्घकालिक प्रबंधन
भारत में वन संरक्षण को अब केवल पेड़ लगाने या अवैध कटाई को रोकने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए एक समग्र, बहु-आयामी और दूरंदेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो पारिस्थितिक स्थिरता, आर्थिक व्यवहार्यता और सामाजिक न्याय को एक साथ साध सके।
भाग 1: संरक्षण के समाधान (Immediate to Mid-Term Solutions)
ये वे ठोस कदम और रणनीतियाँ हैं जिन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता है।
A. नीतिगत और कानूनी समाधान (Policy and Legal Solutions)
- मौजूदा कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन:
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA): ग्राम सभाओं को उनके सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकारों का प्रबंधन, संरक्षण और उपयोग करने के लिए सशक्त बनाना। यह संरक्षण को स्थानीय समुदायों की आजीविका और पहचान से जोड़ता है।
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980: वन भूमि के परिवर्तन को न्यूनतम और केवल अपरिहार्य परिस्थितियों में ही अनुमति देना।
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA): EIA प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, वैज्ञानिक और स्वतंत्र बनाना ताकि परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव का सटीक आकलन हो सके।
- अवैध गतिविधियों पर अंकुश:
- अवैध खनन, अतिक्रमण और लकड़ी माफिया के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई। इसके लिए वन विभाग को बेहतर तकनीक और अधिक अधिकार देने की आवश्यकता है।
B. समुदाय-आधारित और सहभागी समाधान (Community-Based and Participatory Solutions)
- संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) का पुनरुद्धार:
- JFM समितियों को अधिक अधिकार और लाभों में एक न्यायसंगत हिस्सा देकर पुनर्जीवित करना। इसका ध्यान केवल अवक्रमित वनों से आगे बढ़कर अच्छी गुणवत्ता वाले वनों के सह-प्रबंधन तक होना चाहिए।
- स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देना:
- गैर-इमारती वन उत्पादों (NTFPs) पर आधारित उद्यम: महुआ, शहद, औषधीय पौधों आदि के प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और विपणन के लिए स्वयं-सहायता समूहों (SHGs) और सहकारी समितियों को बढ़ावा देना। इससे वनों को बचाने के लिए एक मजबूत आर्थिक प्रोत्साहन मिलता है।
- उदाहरण: वन धन योजना।
- इको-टूरिज्म का सामुदायिक प्रबंधन:
- संरक्षित क्षेत्रों के आसपास इको-टूरिज्म का विकास करना, जिसका प्रबंधन और लाभ सीधे स्थानीय समुदायों को मिले। यह मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में भी मदद करता है।
C. आर्थिक और वित्तीय समाधान (Economic and Financial Solutions)
- पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भुगतान (Payment for Ecosystem Services – PES):
- एक ऐसा तंत्र विकसित करना जहाँ स्थानीय समुदायों को उन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं (जैसे स्वच्छ जल, कार्बन भंडारण) को बनाए रखने के लिए भुगतान किया जाए जो उनके जंगल प्रदान करते हैं। यह भुगतान शहरी नगर पालिकाओं या उद्योगों द्वारा किया जा सकता है जो इन सेवाओं से लाभान्वित होते हैं।
- CAMPA फंड का पारिस्थितिक उपयोग:
- यह सुनिश्चित करना कि प्रतिपूरक वनीकरण कोष (CAMPA Fund) का उपयोग केवल पेड़ गिनने के लिए अप्राकृतिक वृक्षारोपण पर न हो, बल्कि स्थानीय प्रजातियों का उपयोग करके संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (घास के मैदानों सहित) के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (Ecological Restoration) पर हो।
- ग्रीन फाइनेंस को प्रोत्साहित करना:
- उन व्यवसायों और परियोजनाओं को प्रोत्साहित करना जो स्थायी आपूर्ति श्रृंखला (Sustainable Supply Chains) का उपयोग करते हैं और जिनकी वन पदचिह्न (forest footprint) न्यूनतम है।
D. वैज्ञानिक और तकनीकी समाधान (Scientific and Technological Solutions)
- उन्नत निगरानी:
- वनों की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग, GIS और ड्रोन का व्यापक उपयोग। इससे वनाग्नि, अतिक्रमण और अवैध कटाई का वास्तविक समय में पता लगाया जा सकता है।
- उदाहरण: FSI का फायर अलर्ट सिस्टम।
- वन्यजीव गलियारों का संरक्षण:
- टुकड़ों में बंटे जंगलों को जोड़ने वाले वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) की वैज्ञानिक रूप से पहचान करना और उन्हें सुरक्षित करना। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष कम होता है और प्रजातियों की आनुवंशिक विविधता बनी रहती है।
- वनाग्नि प्रबंधन:
- आग की भविष्यवाणी करने वाले मॉडल विकसित करना, नियंत्रित आग (Controlled Burning) का उपयोग करना और आग बुझाने के लिए आधुनिक तकनीकें अपनाना।
भाग 2: दीर्घकालिक प्रबंधन रणनीतियाँ (Long-Term Management Strategies)
समाधानों को टिकाऊ बनाने के लिए, उन्हें एक मजबूत दीर्घकालिक प्रबंधन ढांचे में एकीकृत करना आवश्यक है।
- एकीकृत परिदृश्य प्रबंधन (Integrated Landscape Management):
- वन को एक पृथक इकाई के रूप में देखने के बजाय, पूरे परिदृश्य (Landscape)—जिसमें वन, कृषि भूमि, जल निकाय और मानव बस्तियाँ शामिल हैं—को एक एकीकृत प्रणाली के रूप में प्रबंधित करना। यह विभिन्न भूमि उपयोगों के बीच संघर्ष को हल करता है और पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करता है।
- संस्थागत सुदृढ़ीकरण (Institutional Strengthening):
- वन विभाग का आधुनिकीकरण: वन अधिकारियों को केवल कानून लागू करने वालों के बजाय पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधकों, सामुदायिक सूत्रधारों और जलवायु विशेषज्ञों के रूप में प्रशिक्षित करना।
- अंतर-विभागीय समन्वय: वन, राजस्व, जनजातीय मामले और ग्रामीण विकास मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना ताकि नीतियां एक-दूसरे के विरुद्ध काम न करें।
- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन:
- वन प्रबंधन योजनाओं में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों (जैसे सूखा, बाढ़, कीटों का प्रकोप) को शामिल करना।
- अधिक लचीले पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए देशी और जलवायु-प्रतिरोधी प्रजातियों के मिश्रण का रोपण करना।
- सतत वित्तपोषण (Sustainable Financing):
- केवल सरकारी बजट पर निर्भर रहने के बजाय, वित्तपोषण के स्रोतों में विविधता लाना। इसमें कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR), ग्रीन बॉन्ड, अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्त और PES योजनाओं से राजस्व शामिल हो सकता है।
- शिक्षा, जागरूकता और अनुसंधान:
- स्कूली पाठ्यक्रम से लेकर जन मीडिया तक, वनों के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना।
- वन पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और स्थायी प्रबंधन तकनीकों पर निरंतर अनुसंधान को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
वन संरक्षण की सफलता एक ऐसे “त्रिकोण” (Triangle) पर निर्भर करती है जिसके तीन कोने हैं: सरकार का मजबूत नियामक ढाँचा (Top-down Governance), स्थानीय समुदायों का सशक्तिकरण और भागीदारी (Bottom-up Empowerment), और ठोस वैज्ञानिक ज्ञान तथा प्रौद्योगिकी (Scientific Knowledge)। एक दीर्घकालिक और स्थायी समाधान वही होगा जो इन तीनों को एक साथ लेकर चले, और यह स्वीकार करे कि एक स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था और एक न्यायपूर्ण समाज की नींव है।
जल संसाधन: एक सामरिक राष्ट्रीय संपत्ति
जल जीवन के लिए एक मौलिक आवश्यकता, कृषि की धुरी, उद्योगों की जान और एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है। भारत, जिसके पास विश्व की लगभग 18% जनसंख्या है, के पास दुनिया के नवीकरणीय जल संसाधनों का केवल 4% ही उपलब्ध है। यह आंकड़ा भारत में प्रभावी जल संसाधन प्रबंधन की गंभीरता और तात्कालिकता को रेखांकित करता है।
1. भारत के जल संसाधन: एक अवलोकन
भारत के जल संसाधनों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
A. सतही जल (Surface Water)
यह पानी का वह रूप है जो नदियों, झीलों, तालाबों और जलाशयों में पाया जाता है।
- स्रोत: इसका मुख्य स्रोत वर्षा (विशेषकर दक्षिण-पश्चिम मानसून) और हिमनदों (Glaciers) का पिघलना है।
- प्रमुख नदी घाटियाँ: भारत में 12 प्रमुख और कई छोटी नदी घाटियाँ हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन देश का सबसे बड़ा बेसिन है, जिसमें देश के कुल जल संसाधनों का लगभग 60% हिस्सा है।
- चुनौतियाँ:
- स्थानिक और कालिक असमानता: मानसून के कारण, भारत की अधिकांश वर्षा वर्ष के केवल 3-4 महीनों में होती है। साथ ही, ब्रह्मपुत्र और गंगा बेसिन जैसे क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में पानी है, जबकि राजस्थान और प्रायद्वीपीय पठार के आंतरिक भागों में पानी की भारी कमी है।
- प्रदूषण: औद्योगिक अपशिष्ट, अशोधित सीवेज और कृषि अपवाह के कारण अधिकांश भारतीय नदियाँ गंभीर रूप से प्रदूषित हैं।
- अत्यधिक दोहन: कई क्षेत्रों में नदियों और जलाशयों से अत्यधिक पानी निकाला जा रहा है।
B. भूजल (Groundwater)
यह चट्टानों और मिट्टी के छिद्रों में जमा पानी है।
- महत्व: भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है। यह देश की सिंचाई की लगभग 65% और ग्रामीण पेयजल की 85% जरूरतों को पूरा करता है। इसने भारत की “हरित क्रांति” को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- प्रमुख जलभृत (Aquifers): सिंधु-गंगा के जलोढ़ मैदानों में भारत के सबसे विपुल और उत्पादक जलभृत हैं।
- चुनौतियाँ:
- अति-दोहन (Over-exploitation): कृषि के लिए मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली के कारण, कई क्षेत्रों, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भूजल का दोहन पुनर्भरण दर से कहीं अधिक है।
- गुणवत्ता में गिरावट: आर्सेनिक (पश्चिम बंगाल, बिहार), फ्लोराइड (राजस्थान) और नाइट्रेट (कृषि अपवाह से) जैसे संदूषकों के कारण भूजल की गुणवत्ता गिर रही है।
2. भारत में जल संकट के प्रमुख कारण
- जनसंख्या वृद्धि और शहरीकरण: बढ़ती आबादी से पानी की मांग (घरेलू, कृषि, औद्योगिक) बढ़ती है। तेजी से हो रहे शहरीकरण से कंक्रीट के कारण भूजल पुनर्भरण कम हो जाता है।
- कृषि क्षेत्र में अकुशल उपयोग:
- जल-गहन फसलें: पंजाब और हरियाणा जैसे पानी की कमी वाले क्षेत्रों में गन्ना और चावल जैसी जल-गहन फसलों को उगाना।
- अकुशल सिंचाई पद्धतियाँ: आज भी भारत में अधिकांश सिंचाई पारंपरिक बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) से होती है, जिसमें 40% से अधिक पानी वाष्पित या बह जाता है। स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई का उपयोग बहुत कम है।
- जलवायु परिवर्तन:
- मानसून के पैटर्न में अनिश्चितता, वर्षा के दिनों में कमी लेकिन अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि, और ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना जल संसाधनों पर गंभीर दबाव डाल रहा है।
- जल प्रदूषण:
- औद्योगिक और घरेलू अपशिष्टों का नदियों में छोड़ा जाना सतही जल को अनुपयोगी बना रहा है।
- असंरचनात्मक और प्रबंधन संबंधी मुद्दे:
- पानी का असमान वितरण।
- जलाशयों और नहरों में गाद (siltation) जमा होने से उनकी भंडारण क्षमता में कमी।
- अपर्याप्त जल उपचार अवसंरचना।
3. जल संसाधन प्रबंधन: सरकारी पहल और रणनीतियाँ
प्रभावी जल प्रबंधन के लिए एक एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें आपूर्ति-पक्ष और मांग-पक्ष दोनों पर ध्यान दिया जाए।
A. आपूर्ति-पक्ष प्रबंधन (Supply-Side Management)
इसका उद्देश्य पानी की उपलब्धता को बढ़ाना है।
- जल शक्ति मंत्रालय का गठन (2019): यह जल से संबंधित सभी मुद्दों के लिए एक एकीकृत मंत्रालय है, जो समग्र योजना और प्रबंधन सुनिश्चित करता है।
- नदी जोड़ो परियोजना (River Interlinking Project): इसका उद्देश्य जल-अधिशेष बेसिन से जल-कमी वाले बेसिनों में पानी स्थानांतरित करना है। (उदाहरण: केन-बेतवा लिंक परियोजना)।
- जल संचयन और पुनर्भरण:
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इसका एक घटक ‘हर खेत को पानी’ है।
- अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana): यह भूजल के सतत प्रबंधन के लिए एक सामुदायिक भागीदारी वाली योजना है।
- पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों (जैसे टांका, बावड़ी) का पुनरुद्धार।
B. मांग-पक्ष प्रबंधन (Demand-Side Management)
इसका उद्देश्य पानी के उपयोग की दक्षता को बढ़ाना और बर्बादी को कम करना है।
- ‘प्रति बूंद, अधिक फसल’ (Per Drop, More Crop): PMKSY का यह घटक सूक्ष्म-सिंचाई (Micro-irrigation) जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम को बढ़ावा देता है।
- फसल विविधीकरण (Crop Diversification): किसानों को कम पानी वाली फसलों (जैसे मोटे अनाज, दलहन) को उगाने के लिए प्रोत्साहित करना।
- जल मूल्य निर्धारण (Water Pricing): पानी के तर्कसंगत और कुशल उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए घरेलू और औद्योगिक दोनों क्षेत्रों के लिए एक उचित मूल्य निर्धारण नीति लागू करना।
- ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम: गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने और उसके पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए एक एकीकृत मिशन।
- जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission): इसका लक्ष्य 2024 तक प्रत्येक ग्रामीण घर में नल से कार्यात्मक जल कनेक्शन प्रदान करना है, जिससे पानी की गुणवत्ता और पहुंच दोनों में सुधार हो।
4. अंतर-राज्यीय जल विवाद
जल एक राज्य का विषय है, लेकिन अंतर-राज्यीय नदियाँ केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। कई राज्यों के बीच नदी जल के बंटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहे हैं।
- प्रमुख विवाद:
- कावेरी: कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी।
- कृष्णा: महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना।
- रावी-ब्यास: पंजाब, हरियाणा, राजस्थान।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय जल विवादों के अधिनिर्णय के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है और यह भी प्रावधान करता है कि ऐसे विवादों में सर्वोच्च न्यायालय का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होगा।
आगे की राह
भारत को अपनी जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने वाले एक विकेंद्रीकृत, समुदाय-संचालित मॉडल की ओर बढ़ना होगा। इसमें जल पुनर्चक्रण, जल-कुशल कृषि और सबसे महत्वपूर्ण, जल को एक साझा और सीमित राष्ट्रीय संसाधन के रूप में मानने के लिए व्यवहारिक बदलाव की आवश्यकता है।