ब्रह्मांड (The Universe)
परिभाषा:
ब्रह्मांड, अस्तित्व में मौजूद हर चीज का कुल योग है। इसमें समय (Time), अंतरिक्ष (Space), पदार्थ (Matter), और ऊर्जा (Energy) शामिल हैं। यह छोटे परमाणुओं से लेकर विशाल आकाशगंगाओं तक सब कुछ समाहित करता है। ब्रह्मांड का अध्ययन ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) कहलाता है।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति:
महाविस्फोट सिद्धांत (The Big Bang Theory)
ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संबंध में महाविस्फोट सिद्धांत सबसे अधिक मान्य सिद्धांत है। इसे विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना भी कहा जाता है। [R.A.S./R.T.S.(Pre) 2007] यह सिद्धांत बताता है कि ब्रह्मांड की शुरुआत कैसे हुई और यह आज के स्वरूप में कैसे विकसित हुआ।
इस सिद्धांत के अनुसार, लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले, ब्रह्मांड का संपूर्ण पदार्थ और ऊर्जा एक अत्यधिक गर्म और घने बिंदु में केंद्रित था, जिसे ‘एकाकी परमाणु’ या ‘सिंगुलैरिटी’ (Singularity) कहा गया। इस बिंदु का आयतन अत्यंत सूक्ष्म और तापमान तथा घनत्व अनंत था।
वैज्ञानिकों का योगदान
| वैज्ञानिक | योगदान |
| जॉर्ज लेमैत्रे | बेल्जियम के खगोलशास्त्री और पादरी, जिन्होंने 1927 में सबसे पहले इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने इसे “आदिम परमाणु की परिकल्पना” कहा। |
| एडविन हबल | 1929 में, इन्होंने प्रमाण दिया कि आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से दूर जा रही हैं, जिससे ब्रह्मांड के विस्तार की पुष्टि हुई। |
| रॉबर्ट वैगनर | इन्होंने 1967 में इस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की। |
महाविस्फोट के प्रमुख चरण
| समय | घटना |
| घटना का आरंभ (t=0) | एकाकी परमाणु में एक भीषण विस्फोट हुआ, जिसे महाविस्फोट कहा गया। इसी के साथ समय, स्थान और ऊर्जा का प्रादुर्भाव हुआ। |
| पहले कुछ सेकंड में | ब्रह्मांड का अत्यधिक तीव्रता से विस्तार हुआ (स्फीति)। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन जैसे मूलभूत कणों का निर्माण हुआ। |
| पहले 3 मिनट के भीतर | ब्रह्मांड ठंडा होने पर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन मिलकर हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्वों के नाभिक बनाने लगे। |
| लगभग 3.8 लाख वर्ष बाद | ब्रह्मांड और ठंडा हुआ, जिससे परमाणु नाभिक इलेक्ट्रॉनों को पकड़कर उदासीन परमाणु बना सके। ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया और प्रकाश पहली बार स्वतंत्र रूप से यात्रा करने लगा। इसी समय का अवशेष कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड विकिरण है। |
| 30 करोड़ से 1 अरब वर्ष बाद | गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में पदार्थ का जमावड़ा शुरू हुआ और पहली आकाशगंगाओं तथा तारों का निर्माण आरंभ हुआ। |
| लगभग 9 अरब वर्ष बाद (आज से 4.5 अरब वर्ष पूर्व) | सौरमंडल का विकास हुआ, जिसमें सूर्य, ग्रहों और उपग्रहों का निर्माण हुआ। |
| वर्तमान (लगभग 13.8 अरब वर्ष बाद) | ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। आकाशगंगाएँ एक दूसरे से दूर जा रही हैं। |
सिद्धांत के पक्ष में साक्ष्य
- आकाशगंगाओं का दूर जाना: एडविन हबल ने पाया कि अधिकांश आकाशगंगाओं से आने वाला प्रकाश लाल-विचलन (Redshift) प्रदर्शित करता है, जिसका अर्थ है कि वे हमसे दूर जा रही हैं। यह ब्रह्मांड के विस्तार का सबसे बड़ा प्रमाण है।
- कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड (CMB): 1965 में खोजी गई यह ब्रह्मांड में हर जगह फैली हुई एक हल्की विकिरण है। इसे महाविस्फोट के बाद बचे हुए “ताप” का अवशेष माना जाता है।
- हल्के तत्वों की प्रचुरता: यह सिद्धांत ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम की जो अनुमानित मात्रा बताता है, वह वास्तविक प्रेक्षणों से मेल खाती है।
- अवधारणाएं: ‘इवेंट होराइजन’, ‘सिंगुलैरिटी’, ‘स्ट्रिंग थ्योरी’ और ‘स्टैंडर्ड मॉडल’ जैसे शब्द अक्सर ब्रह्मांड की अवधारणा और महाविस्फोट सिद्धांत के संदर्भ में समाचारों में आते हैं। [UPSC Prelims 2017]
PYQ:
प्रश्न: “बिग बैंग सिद्धांत” किसकी व्याख्या करता है?
(a) सौर मंडल का निर्माण
(b) आकाशगंगाओं का निर्माण
(c) ब्रह्मांड की उत्पत्ति
(d) तारों का जीवन चक्र
[UPSC Prelims 2018]
अवधारणाएं: ‘इवेंट होराइजन’, ‘सिंगुलैरिटी’, ‘स्ट्रिंग थ्योरी’ और ‘स्टैंडर्ड मॉडल’
ये अवधारणाएं आधुनिक भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान से संबंधित हैं तथा ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने का प्रयास करती हैं। ‘इवेंट होराइजन’, ‘सिंगुलैरिटी’, ‘स्ट्रिंग थ्योरी’ और ‘स्टैंडर्ड मॉडल’ जैसे शब्द अक्सर ब्रह्मांड की अवधारणा और समझ के संदर्भ में समाचारों में आते हैं। [UPSC Prelims 2017]
सिंगुलैरिटी (Singularity)
- क्या है? यह अंतरिक्ष-समय (space-time) में एक ऐसा बिंदु है जहाँ घनत्व और गुरुत्वाकर्षण अनंत हो जाता है। इस बिंदु पर भौतिकी के ज्ञात नियम काम करना बंद कर देते हैं।
- उदाहरण:
- ब्लैक होल का केंद्र: हर ब्लैक होल के केंद्र में एक सिंगुलैरिटी होती है, जहाँ पदार्थ अत्यधिक घनत्व तक सिकुड़ जाता है।
- महाविस्फोट (बिग बैंग): महाविस्फोट सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड की शुरुआत एक सिंगुलैरिटी से ही हुई थी, जिसमें ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा और पदार्थ समाहित थे।
इवेंट होराइजन (Event Horizon)
- क्या है? यह ब्लैक होल के चारों ओर की एक अदृश्य सीमा है। इसे “घटना क्षितिज” या “बिना वापसी का बिंदु” (Point of No Return) भी कहा जाता है।
- कार्यप्रणाली: इस सीमा के अंदर गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली हो जाता है कि प्रकाश सहित कुछ भी इससे बाहर नहीं निकल सकता। एक बार कोई वस्तु या प्रकाश इस सीमा को पार कर ले, तो वह हमेशा के लिए ब्लैक होल के अंदर समा जाती है। इसी कारण ब्लैक होल हमें दिखाई नहीं देते।
स्ट्रिंग थ्योरी (String Theory)
- क्या है? यह एक सैद्धांतिक ढांचा है जो ब्रह्मांड के मूलभूत कणों (जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन) को बिंदु-समान कणों के बजाय ऊर्जा के छोटे, एक-आयामी, कंपन करने वाले “तारों” या “स्ट्रिंग्स” के रूप में वर्णित करता है।
- अवधारणा: इन स्ट्रिंग्स के कंपन के अलग-अलग तरीकों से ही अलग-अलग कणों का निर्माण होता है, ठीक वैसे ही जैसे एक गिटार के तार के अलग-अलग कंपन से अलग-अलग संगीत की धुनें निकलती हैं।
- उद्देश्य: इस सिद्धांत का लक्ष्य ब्रह्मांड के सभी बलों (गुरुत्वाकर्षण सहित) और कणों को एक ही सिद्धांत में समाहित करना है, जिसे “थ्योरी ऑफ एवरीथिंग” कहा जाता है।
स्टैंडर्ड मॉडल (Standard Model)
- क्या है? यह कण भौतिकी का सबसे सफल सिद्धांत है जो ब्रह्मांड को बनाने वाले मूलभूत कणों और तीन मूलभूत बलों (विद्युत चुम्बकीय, कमजोर परमाणु बल, और मजबूत परमाणु बल) का वर्णन करता है।
- कणों का वर्गीकरण:
- पदार्थ के कण (फर्मिऑन): जैसे क्वार्क (जिससे प्रोटॉन और न्यूट्रॉन बनते हैं) और लेप्टॉन (जिसमें इलेक्ट्रॉन शामिल है)।
- बल-वाहक कण (बोसॉन): जैसे फोटॉन, जो प्रकाश और विद्युत चुम्बकीय बल का वाहक है।
- सीमाएं: यह सिद्धांत बेहद सफल होने के बावजूद अधूरा है। यह गुरुत्वाकर्षण बल की व्याख्या नहीं करता और न ही यह डार्क मैटर और डार्क एनर्जी के अस्तित्व को समझा पाता है।
ब्रह्मांड के मॉडल: भू-केंद्रित और सूर्य-केंद्रित दृष्टिकोण
ब्रह्मांड की संरचना को समझने के लिए प्राचीन काल से दो प्रमुख और परस्पर विरोधी अवधारणाएं प्रचलित रही हैं। ये अवधारणाएं इस बात पर आधारित थीं कि ब्रह्मांड का केंद्र क्या है – पृथ्वी या सूर्य।
भू-केंद्रित अवधारणा (Geocentric Model)
यह एक प्राचीन अवधारणा है, जिसके अनुसार पृथ्वी को पूरे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता था।
- मुख्य प्रतिपादक: इस सिद्धांत का व्यवस्थित रूप से प्रतिपादन यूनानी खगोलशास्त्री क्लॉडियस टॉलेमी ने दूसरी शताब्दी में किया था। इसी कारण इसे टॉलेमिक मॉडल भी कहा जाता है।
- मुख्य मान्यताएं:
- पृथ्वी स्थिर है और ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित है।
- सूर्य, चंद्रमा और अन्य सभी ग्रह तथा तारे पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं।
- यह अवधारणा सामान्य प्रेक्षण पर आधारित थी, क्योंकि हमें प्रतिदिन सूर्य और तारे आकाश में घूमते हुए प्रतीत होते हैं।
- प्रभाव: यह मॉडल लगभग 1400 से अधिक वर्षों तक यूरोप और अरब जगत में सर्वमान्य बना रहा।
सूर्य-केंद्रित अवधारणा (Heliocentric Model)
यह एक वैज्ञानिक क्रांति की शुरुआत थी, जिसने ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को पूरी तरह से बदल दिया।
- मुख्य प्रतिपादक: निकोलस कॉपरनिकस ने 16वीं शताब्दी में इस क्रांतिकारी सिद्धांत को प्रस्तुत किया, जिसने बताया कि ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी नहीं, बल्कि सूर्य है। [SSC CGL] इसी कारण इसे कॉपरनिकन मॉडल भी कहा जाता है।
- प्रमुख समर्थक और विकास:
- जोहान्स केपलर ने 17वीं शताब्दी में ग्रहों की गति के नियम दिए और बताया कि ग्रह सूर्य की परिक्रमा वृत्ताकार नहीं, बल्कि अंडाकार कक्षाओं में करते हैं।
- गैलीलियो गैलिली ने अपनी दूरबीन से किए गए प्रेक्षणों द्वारा सूर्य-केंद्रित मॉडल के लिए ठोस सबूत प्रदान किए। [RRB NTPC]
- आइजैक न्यूटन ने अपने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से यह समझाया कि ग्रह सूर्य के चारों ओर क्यों घूमते हैं।
- मुख्य मान्यताएं:
- सूर्य सौरमंडल के केंद्र में स्थित है।
- पृथ्वी एक ग्रह है और अन्य ग्रहों के साथ सूर्य की परिक्रमा करती है।
- पृथ्वी अपने अक्ष पर भी घूमती है, जिसके कारण दिन और रात होते हैं।
दोनों अवधारणाओं की तुलना
| विशेषता | भू-केंद्रित मॉडल (टॉलेमी) | सूर्य-केंद्रित मॉडल (कॉपरनिकस) |
| केंद्र | पृथ्वी | सूर्य |
| पृथ्वी की स्थिति | स्थिर और केंद्र में | गतिशील, सूर्य की परिक्रमा करती है |
| सूर्य की स्थिति | पृथ्वी की परिक्रमा करता है | केंद्र में स्थिर है |
| वैज्ञानिक आधार | सामान्य अवलोकन पर आधारित | गणितीय गणनाओं और दूरबीन के प्रेक्षणों पर आधारित |
| वर्तमान स्थिति | ऐतिहासिक और अमान्य | वैज्ञानिक रूप से सिद्ध और मान्य |
ब्रह्मांड के घटक (Components of the Universe)
ब्रह्मांड आश्चर्यजनक रूप से खाली है, लेकिन यह अविश्वसनीय संरचनाओं से भरा है।
| घटक (Component) | विवरण (Description) | उदाहरण |
| आकाशगंगा (Galaxy) | गुरुत्वाकर्षण द्वारा एक साथ बंधे अरबों तारों, गैस, धूल और डार्क मैटर का एक विशाल समूह। | हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी (Milky Way) है। हमारी निकटतम बड़ी आकाशगंगा एंड्रोमेडा है। [SSC CGL 2017] |
| तारे (Stars) | गर्म प्लाज्मा के विशाल, चमकदार गोले। इनकी ऊर्जा इनके केंद्र में होने वाली नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया से आती है। | हमारा सूर्य एक तारा है। [BPSC 2018] |
| सौर मंडल (Solar System) | एक तारे (जैसे सूर्य) और उसकी परिक्रमा करने वाले खगोलीय पिंडों (ग्रह, बौने ग्रह, क्षुद्रग्रह, धूमकेतु) का एक समूह। | हमारा सौर मंडल। |
| नीहारिका (Nebula) | गैस (मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम) और धूल के विशाल बादल। इन्हें “तारों की नर्सरी” भी कहा जाता है, क्योंकि यहीं नए तारे जन्म लेते हैं। | ओरियन नेबुला। |
ब्रह्मांड का रहस्यमयी पक्ष:
ब्रह्मांड का अधिकांश हिस्सा उस पदार्थ से नहीं बना है जिसे हम देख या छू सकते हैं।
- साधारण पदार्थ (Ordinary Matter): (~5%) – यह वह सब कुछ है जिसे हम देख सकते हैं: तारे, ग्रह, हम और आप।
- डार्क मैटर (Dark Matter): (~27%) – यह एक रहस्यमयी, अदृश्य पदार्थ है जो प्रकाश के साथ कोई क्रिया नहीं करता है, लेकिन इसका गुरुत्वाकर्षण प्रभाव आकाशगंगाओं को एक साथ बांधे रखने के लिए आवश्यक है। [UPSC 2019]
- डार्क ऊर्जा (Dark Energy): (~68%) – यह एक और भी रहस्यमयी शक्ति है जो गुरुत्वाकर्षण के विपरीत कार्य करती है और ब्रह्मांड के त्वरित विस्तार (accelerated expansion) का कारण बन रही है।
आकाशगंगा (Galaxy)
आकाशगंगा, जिसे गैलेक्सी भी कहा जाता है, अरबों तारों, उनके सौरमंडलों, धूल के कणों और गैस के विशाल बादलों का एक विशाल संग्रह है जो गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा एक साथ बंधा होता है। ब्रह्मांड में अरबों आकाशगंगाएँ मौजूद हैं, और हमारा सौर मंडल भी एक ऐसी ही आकाशगंगा का हिस्सा है।
हमारी आकाशगंगा: मिल्की वे (The Milky Way)
हमारा सौर मंडल जिस आकाशगंगा में स्थित है, उसे मिल्की वे (Milky Way) या मंदाकिनी के नाम से जाना जाता है। रात के साफ आसमान में, यह एक छोर से दूसरे छोर तक फैली एक धुंधली, दूधिया रोशनी की पट्टी के रूप में दिखाई देती है, इसीलिए इसका नाम “मिल्की वे” पड़ा।
मिल्की वे की मुख्य विशेषताएँ
- आकार और संरचना: हमारी आकाशगंगा का आकार एक सर्पिलाकार (Spiral) तश्तरी की तरह है। [BPSC Prelims] इसके केंद्र में तारों का एक घना जमावड़ा है, जिसे केंद्रीय उभार (Central Bulge) कहा जाता है, और इसी केंद्र से कई सर्पिलाकार भुजाएँ बाहर की ओर निकलती हैं।
- व्यास: इसका व्यास लगभग 1,00,000 प्रकाश-वर्ष है।
- केंद्र: मिल्की वे के केंद्र में सैजिटेरियस ए* (Sagittarius A*) नामक एक अत्यधिक विशालकाय ब्लैक होल (Supermassive Black Hole) स्थित है। यह ब्लैक होल बहुत शक्तिशाली है और पूरे आकाशगंगा को एक साथ बांधे रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- तारों की संख्या: अनुमान के अनुसार, हमारी आकाशगंगा में 100 से 400 अरब तारे मौजूद हैं।
सौर मंडल की स्थिति
- हमारा सूर्य और उसका सौर मंडल आकाशगंगा के केंद्र में नहीं है।
- यह केंद्र से लगभग 27,000 प्रकाश-वर्ष की दूरी पर ओरियन भुजा (Orion Arm) नामक एक छोटी सर्पिलाकार भुजा में स्थित है।
- सूर्य को भी आकाशगंगा के केंद्र का एक पूरा चक्कर लगाने में लगभग 22 से 25 करोड़ वर्ष का समय लगता है। इस अवधि को एक ब्रह्मांडीय वर्ष (Cosmic Year) कहा जाता है। [UPPSC Prelims]
आकाशगंगा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| सबसे नजदीकी बड़ी आकाशगंगा | एंड्रोमेडा गैलेक्सी (Andromeda Galaxy) हमारी आकाशगंगा की सबसे निकटतम बड़ी आकाशगंगा है। |
| आकाशगंगा की खोज | गैलीलियो गैलिली पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी दूरबीन से यह सिद्ध किया कि यह दूधिया पट्टी वास्तव में अनगिनत तारों का एक विशाल समूह है। |
| सूर्य का सबसे निकटतम तारा | प्रॉक्सिमा सेंटॉरी (Proxima Centauri) |
| सौर मंडल के बाहर सबसे चमकीला तारा | साइरस (Sirius), जिसे डॉग स्टार (Dog Star) भी कहा जाता है, रात के आकाश में दिखने वाला सबसे चमकीला तारा है। |
तारे (Stars)
तारे अत्यधिक गर्म और चमकदार खगोलीय पिंड हैं जो गैस और प्लाज्मा से बने होते हैं। ये अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण द्वारा एक साथ बंधे रहते हैं। तारों के केंद्र में नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया होती है, जिसमें हाइड्रोजन के परमाणु मिलकर हीलियम बनाते हैं। इसी प्रक्रिया के कारण तारे भारी मात्रा में ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। हमारा सूर्य भी एक तारा है।
तारों का जीवन चक्र
किसी तारे का जीवन चक्र और उसका अंतिम भविष्य उसके प्रारंभिक द्रव्यमान (Mass) पर निर्भर करता है।
तारों के जन्म का सिद्धांत: गुरुत्वाकर्षण पतन मॉडल
तारों के जन्म की प्रक्रिया को समझाने वाला सबसे स्वीकृत वैज्ञानिक सिद्धांत गुरुत्वाकर्षण पतन (Gravitational Collapse) का मॉडल है। इस सिद्धांत के अनुसार, तारों का निर्माण सीधे तौर पर नहीं होता, बल्कि यह एक लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया का परिणाम है जो अरबों वर्षों तक चल सकती है।
सिद्धांत के मुख्य चरण
यह सिद्धांत बताता है कि तारों का जन्म विशाल, ठंडे और घने आणविक बादलों (Giant Molecular Clouds) के भीतर होता है। इन बादलों को तारकीय नेबुला (Stellar Nebula) या निहारिका भी कहा जाता है।
चरण 1: विशाल आणविक बादल और जीन्स अस्थिरता (Jeans Instability)
- आरंभिक अवस्था: अंतरिक्ष में हाइड्रोजन और हीलियम गैस तथा धूल के विशाल बादल मौजूद होते हैं। ये बादल सामान्यतः स्थिर रहते हैं, क्योंकि इनके भीतर का गैसीय दबाव गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित करता है।
- अस्थिरता का क्षण: जब इस बादल का कोई हिस्सा पर्याप्त रूप से विशाल और घना हो जाता है, तो उसका अपना गुरुत्वाकर्षण उसके आंतरिक दबाव पर हावी होने लगता है। इस स्थिति को “जीन्स अस्थिरता” (Jeans Instability) कहते हैं। यह अस्थिरता किसी बाहरी घटना, जैसे किसी पास के सुपरनोवा विस्फोट से उत्पन्न शॉक वेव या किसी अन्य बादल से टक्कर के कारण भी शुरू हो सकती है।
चरण 2: गुरुत्वाकर्षण पतन और विखंडन (Gravitational Collapse & Fragmentation)
- एक बार अस्थिरता शुरू होने के बाद, बादल का वह हिस्सा अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण अंदर की ओर ढहने (संकुचित होने) लगता है।
- जैसे-जैसे यह विशाल बादल सिकुड़ता है, यह छोटे और सघन टुकड़ों में टूट जाता है। प्रत्येक टुकड़ा आगे सिकुड़ता रहता है और भविष्य में एक नए तारे को जन्म देने की क्षमता रखता है। इसी कारण तारे अक्सर झुंड या क्लस्टर में पैदा होते हैं।
चरण 3: आदि तारे का निर्माण (Formation of a Protostar)
- प्रत्येक सिकुड़ता हुआ टुकड़ा केंद्र में पदार्थ जमा करना शुरू कर देता है। जैसे-जैसे पदार्थ केंद्र में गिरता है, गुरुत्वाकर्षण स्थितिज ऊर्जा, ऊष्मीय ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है, जिससे केंद्र का तापमान और घनत्व तेजी से बढ़ने लगता है।
- यह गर्म और घना कोर आदि तारा (Protostar) कहलाता है। यह अभी तक एक पूर्ण तारा नहीं है क्योंकि इसके केंद्र में नाभिकीय संलयन शुरू नहीं हुआ है। हालांकि, यह अत्यधिक गर्म होने के कारण चमकता है।
चरण 4: एक्रिशन डिस्क और नाभिकीय संलयन की शुरुआत
- आदि तारे के चारों ओर घूमती हुई गैस और धूल की एक चपटी तश्तरी बन जाती है, जिसे एक्रिशन डिस्क (Accretion Disk) कहते हैं। आदि तारा इसी डिस्क से पदार्थ खींचकर अपना द्रव्यमान बढ़ाता रहता है।
- जब आदि तारे के केंद्र का तापमान लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो एक महत्वपूर्ण घटना घटित होती है: नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस प्रक्रिया में, हाइड्रोजन के परमाणु अत्यधिक दबाव और तापमान के कारण आपस में जुड़कर हीलियम के परमाणु बनाते हैं, जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है।
चरण 5: एक स्थिर तारे का जन्म
- नाभिकीय संलयन से उत्पन्न ऊर्जा बाहर की ओर एक शक्तिशाली दबाव बनाती है। यह दबाव गुरुत्वाकर्षण के अंदर की ओर लगने वाले खिंचाव को संतुलित करता है।
- जब ये दोनों बल—गुरुत्वाकर्षण का आंतरिक खिंचाव और संलयन का बाहरी दबाव—संतुलित हो जाते हैं, तो आदि तारा सिकुड़ना बंद कर देता है और एक स्थिर मुख्य अनुक्रम तारे (Main-sequence star) के रूप में अपने जीवन की शुरुआत करता है। हमारा सूर्य भी वर्तमान में इसी अवस्था में है।
प्रक्रिया का सारांश
| चरण | मुख्य प्रक्रिया | परिणाम |
| नेबुला | गैस और धूल का स्थिर बादल | तारे के निर्माण के लिए कच्चा माल |
| गुरुत्वाकर्षण पतन | बादल का अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ना | बादल का छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटना |
| आदि तारा (Protostar) | केंद्र में पदार्थ का जमाव और तापमान में वृद्धि | गर्म और घना कोर जो अभी तारा नहीं बना है |
| नाभिकीय संलयन | केंद्र में हाइड्रोजन का हीलियम में बदलना | ऊर्जा का भारी मात्रा में उत्सर्जन |
| मुख्य अनुक्रम तारा | गुरुत्वाकर्षण और ऊर्जा के दबाव में संतुलन | एक स्थिर और चमकदार तारे का जन्म |
2. मुख्य अनुक्रम तारा (Main Sequence Star)
- अपने जीवन का लगभग 90% समय, तारा इसी अवस्था में बिताता है।
- इस अवस्था में, तारा अपने केंद्र में हाइड्रोजन को हीलियम में परिवर्तित कर ऊर्जा उत्पन्न करता है। हमारा सूर्य वर्तमान में इसी अवस्था में है।
3. तारे का अंत: द्रव्यमान पर आधारित दो पथ
तारे का ईंधन (हाइड्रोजन) समाप्त होने के बाद उसका भविष्य उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है।
पथ A: औसत द्रव्यमान वाले तारे (जैसे सूर्य)
- लाल दानव (Red Giant): जब तारे के केंद्र में हाइड्रोजन खत्म हो जाती है, तो वह फूलकर बहुत बड़ा और ठंडा हो जाता है, जिसे लाल दानव कहते हैं। इसका रंग लाल दिखाई देता है।
- ग्रहीय नेबुला (Planetary Nebula): इसके बाद, तारे की बाहरी परतें अंतरिक्ष में फैल जाती हैं, जिससे गैस और धूल का एक चमकदार खोल बनता है, जिसे ग्रहीय नेबुला कहते हैं।
- श्वेत वामन (White Dwarf): बाहरी परतों के फैल जाने के बाद तारे का केवल अत्यधिक गर्म और सघन केंद्र ही बचता है। इस अवशेष को श्वेत वामन कहते हैं। यह धीरे-धीरे अरबों वर्षों में ठंडा होता जाता है।
- काला वामन (Black Dwarf): यह एक श्वेत वामन का सैद्धांतिक अंतिम चरण है, जब वह अपनी सारी ऊष्मा खोकर पूरी तरह से ठंडा और अंधकारमय हो जाता है।
पथ B: विशाल द्रव्यमान वाले तारे (सूर्य से कई गुना बड़े)
- लाल महादानव (Red Supergiant): ये तारे फूलकर लाल दानव से भी कई गुना बड़े हो जाते हैं।
- सुपरनोवा (Supernova): अंत में, तारे का केंद्र अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण ढह जाता है और एक भयंकर विस्फोट होता है, जिसे सुपरनोवा कहा जाता है। इस विस्फोट के दौरान भारी तत्वों का निर्माण होता है और immense ऊर्जा निकलती है।
- अवशेष: सुपरनोवा विस्फोट के बाद दो संभावनाएं होती हैं:
- न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star): यदि मूल तारे का द्रव्यमान बहुत अधिक नहीं था, तो एक अत्यधिक सघन पिंड बचता है, जिसे न्यूट्रॉन तारा कहते हैं। तेजी से घूमने वाले न्यूट्रॉन तारे पल्सर (Pulsar) कहलाते हैं।
- ब्लैक होल (Black Hole): यदि मूल तारा बहुत विशाल था, तो गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि वह अपने केंद्र को असीमित घनत्व तक संकुचित कर देता है, जिससे एक ब्लैक होल का निर्माण होता है।
यूपीएससी परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| तारे का रंग | किसी तारे का रंग उसकी सतह के तापमान का सूचक होता है। [UPSC Prelims] नीले रंग के तारे सबसे गर्म, जबकि लाल रंग के तारे सबसे ठंडे होते हैं। |
| चंद्रशेखर सीमा | (Chandrasekhar Limit) यह किसी स्थिर श्वेत वामन तारे की अधिकतम संभव द्रव्यमान सीमा (लगभग 1.44 सौर द्रव्यमान) है। यदि किसी तारे का अवशेष इस सीमा से अधिक होता है, तो वह एक न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल में ढह जाएगा। इस सिद्धांत का प्रतिपादन भारतीय-अमेरिकी खगोलभौतिकविद् सुब्रह्मण्यन् चंद्रशेखर ने किया था। [UPPSC (Mains) 2014, UPSC Prelims] |
| सूर्य का भविष्य | हमारा सूर्य अपने जीवन के अंत में एक श्वेत वामन (White Dwarf) बनेगा। |
| तारकीय ईंधन | तारों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत हाइड्रोजन और हीलियम का नाभिकीय संलयन है। |
| निकटतम तारा | पृथ्वी का सबसे निकटतम तारा सूर्य है। सौर मंडल के सबसे निकट का तारा प्रॉक्सिमा सेंटॉरी (Proxima Centauri) है। [SSC] |
| सबसे चमकीला तारा | रात के आकाश में दिखाई देने वाला सबसे चमकीला तारा साइरस (Sirius) है, जिसे डॉग स्टार भी कहा जाता है। [RRB] |
| कृष्ण छिद्र (ब्लैक होल) | यह एक ऐसा खगोलीय क्षेत्र है जिसका गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि प्रकाश सहित कुछ भी इसके खिंचाव से बच नहीं सकता। यह सिद्धांत अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत द्वारा दिया गया था। [CDS 2020] |
ब्रह्मांड की संरचना और पैमाना (Structure and Scale of the Universe)
ब्रह्मांड एक विशाल पदानुक्रम में व्यवस्थित है:
ग्रह ➔ सौर मंडल ➔ आकाशगंगा ➔ स्थानीय समूह ➔ सुपरक्लस्टर ➔ अवलोकन योग्य ब्रह्मांड
- आकाशगंगा (Galaxy): हमारी मंदाकिनी आकाशगंगा का व्यास लगभग 1,00,000 प्रकाश वर्ष है।
- प्रकाश वर्ष (Light-year): यह दूरी की एक इकाई है, समय की नहीं। यह वह दूरी है जो प्रकाश एक वर्ष में तय करता है (लगभग 9.46 ट्रिलियन किलोमीटर)।
- अवलोकन योग्य ब्रह्मांड: यह ब्रह्मांड का वह हिस्सा है जिसे हम देख सकते हैं, जिसका व्यास लगभग 93 अरब प्रकाश वर्ष है। हम इससे परे नहीं देख सकते क्योंकि प्रकाश को हम तक पहुँचने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला है।
PYQ:
प्रश्न: प्रकाश वर्ष (Light-year) किसकी माप की इकाई है?
(a) समय
(b) प्रकाश की गति
(c) दूरी
(d) ऊर्जा
[Railway NTPC 2021]
ब्रह्मांड का भविष्य (The Future of the Universe)
ब्रह्मांड के अंतिम भाग्य के बारे में कई सिद्धांत हैं, जो मुख्य रूप से डार्क ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण के बीच की लड़ाई पर निर्भर करते हैं:
- बिग फ्रीज (Big Freeze) या हीट डेथ: यह सबसे स्वीकृत सिद्धांत है। यदि डार्क ऊर्जा स्थिर रहती है, तो ब्रह्मांड हमेशा के लिए फैलता रहेगा। आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से बहुत दूर चली जाएँगी, तारे जलकर खत्म हो जाएंगे, और ब्रह्मांड ठंडा, अंधकारमय और निर्जीव हो जाएगा।
- बिग क्रंच (Big Crunch): यदि गुरुत्वाकर्षण अंततः डार्क ऊर्जा पर हावी हो जाता है, तो ब्रह्मांड का विस्तार धीमा हो जाएगा, रुक जाएगा, और फिर वापस अपने आप में ढहना शुरू कर देगा, अंततः एक और विलक्षणता में समाप्त हो जाएगा।
- बिग रिप (Big Rip): एक और संभावना है कि डार्क ऊर्जा समय के साथ और अधिक शक्तिशाली हो जाएगी। यदि ऐसा होता है, तो यह अंततः गुरुत्वाकर्षण पर इतना हावी हो जाएगी कि यह आकाशगंगाओं, तारों, ग्रहों और अंत में परमाणुओं को भी चीर कर अलग कर देगी।
तारामंडल (Constellation)
तारामंडल, जिसे नक्षत्रमंडल भी कहा जाता है, आकाश में दिखाई देने वाले तारों के एक ऐसे समूह को कहते हैं जो एक विशेष आकृति या पैटर्न बनाते हुए प्रतीत होते हैं। प्राचीन काल से ही विभिन्न सभ्यताओं ने इन आकृतियों की पहचान करने और उन्हें पौराणिक कथाओं के पात्रों, जानवरों या वस्तुओं का रूप देने के लिए अपनी कल्पना का उपयोग किया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, एक तारामंडल के तारे आवश्यक रूप से एक-दूसरे के करीब नहीं होते हैं। वे पृथ्वी से देखने पर एक ही दिशा में स्थित होने के कारण एक समूह के रूप में दिखाई देते हैं, जबकि वास्तविकता में उनके बीच अरबों किलोमीटर की दूरी हो सकती है।
आधुनिक खगोल विज्ञान में, आकाश को 88 आधिकारिक तारामंडलों में विभाजित किया गया है। यह विभाजन अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) द्वारा किया गया है, ताकि खगोलशास्त्री आकाश के किसी भी हिस्से की स्थिति को सटीकता से बता सकें।
प्रमुख और आसानी से पहचाने जाने वाले तारामंडल
| तारामंडल का नाम (अंतर्राष्ट्रीय) | भारतीय नाम | मुख्य पहचान / आकृति | महत्वपूर्ण तथ्य |
| Ursa Major | सप्तऋषि मंडल | सात सबसे चमकीले तारे एक बड़ी करछुल या प्रश्न चिह्न की आकृति बनाते हैं। | इसके दो संकेतक तारों की मदद से ध्रुव तारे (Pole Star) का पता लगाया जा सकता है। यह पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध से दिखाई देता है। [UPPSC Prelims] |
| Ursa Minor | लघु सप्तऋषि मंडल | यह भी एक छोटी करछुल जैसी आकृति बनाता है। | ध्रुव तारा (Dhruva Tara) इसी तारामंडल का सबसे चमकीला सदस्य है और यह इसके हैंडल के सिरे पर स्थित है। [SSC CGL] |
| Orion | मृग / कालपुरुष | तीन चमकीले तारे एक सीधी रेखा में स्थित हैं, जो “शिकारी की बेल्ट” कहलाते हैं। | यह सर्दियों के आकाश में दिखाई देने वाले सबसे प्रमुख तारामंडलों में से एक है। इसमें साइरस (Sirius), जो रात का सबसे चमकीला तारा है, को खोजने में मदद मिलती है। [RRB NTPC] |
| Cassiopeia | शर्मिष्ठा | अंग्रेजी के अक्षर ‘M’ या ‘W’ जैसी आकृति। | यह उत्तरी आकाश में सप्तऋषि के विपरीत दिशा में स्थित होता है और ध्रुव तारे के चारों ओर घूमता हुआ दिखाई देता है। |
| Scorpius | वृश्चिक | एक बिच्छू जैसी आकृति। | इसका सबसे चमकीला तारा अन्टारेस (Antares) है, जो एक लाल महादानव (Red Supergiant) तारा है और जिसे ज्येष्ठा नक्षत्र कहा जाता है। |
राशि मंडल (Zodiac Constellations)
राशि मंडल उन 12 तारामंडलों का समूह है जो क्रांतिवृत्त (Ecliptic) पर स्थित हैं। क्रांतिवृत्त आकाश में सूर्य का वह काल्पनिक पथ है जिस पर वह पूरे वर्ष चलता हुआ प्रतीत होता है। ज्योतिष शास्त्र में इन राशियों का विशेष महत्व है, लेकिन खगोल विज्ञान में ये आकाश के 12 विशेष खंड हैं।
- उदाहरण: मेष (Aries), वृषभ (Taurus), मिथुन (Gemini), सिंह (Leo), कन्या (Virgo) आदि।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| कुल तारामंडल | अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने आकाश को 88 आधिकारिक तारामंडलों में बांटा है। [State PSC] |
| सबसे बड़ा तारामंडल | क्षेत्रफल की दृष्टि से हाइड्रा (Hydra) सबसे बड़ा तारामंडल है। |
| ध्रुव तारा (Pole Star) | यह हमेशा उत्तर दिशा को इंगित करता है। यह पृथ्वी के घूर्णन अक्ष की सीध में स्थित होने के कारण आकाश में लगभग स्थिर प्रतीत होता है। |
| नक्षत्र और तारामंडल में अंतर | भारतीय ज्योतिष में नक्षत्र (Lunar Mansions) चंद्रमा के पथ को 27 भागों में बांटते हैं, जबकि तारामंडल (Constellations) तारों द्वारा बनाई गई एक व्यापक आकृति या आकाश का एक क्षेत्र है। |
सौरमंडल (Solar System)
सौरमंडल, सूर्य और उन सभी खगोलीय पिंडों का एक गुरुत्वाकर्षण रूप से बंधा हुआ निकाय है जो सीधे या परोक्ष रूप से इसकी परिक्रमा करते हैं। इसमें केंद्र में सूर्य, आठ ग्रह, उनके 170 से अधिक ज्ञात उपग्रह, बौने ग्रह, और अरबों की संख्या में छोटे पिंड जैसे क्षुद्रग्रह, धूमकेतु और उल्कापिंड शामिल हैं।
सूर्य (The Sun)
- सूर्य हमारे सौरमंडल के केंद्र में स्थित एक तारा है और इसका सबसे बड़ा पिंड है।
- यह पूरे सौरमंडल के कुल द्रव्यमान का लगभग 99.8% हिस्सा अपने में समाहित किए हुए है।
- सूर्य की ऊर्जा का स्रोत इसके केंद्र में होने वाली नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया है, जिसमें हाइड्रोजन के परमाणु मिलकर हीलियम में बदलते हैं।
- सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में औसतन 8 मिनट 20 सेकंड का समय लगता है। [SSC, RRB]
ग्रह (Planets)
सौरमंडल में कुल आठ ग्रह हैं, जो सूर्य से दूरी के बढ़ते क्रम में इस प्रकार हैं: बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण। इन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:
- आंतरिक या पार्थिव ग्रह (Inner or Terrestrial Planets): ये सूर्य के निकटतम चार ग्रह (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल) हैं। ये मुख्य रूप से चट्टानों और धातुओं से बने हैं और इनका घनत्व अधिक होता है।
- बाह्य या जोवियन ग्रह (Outer or Jovian Planets): ये अंतिम चार ग्रह (बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण) हैं। ये विशाल गैस के गोले हैं, जिन्हें गैस दानव (Gas Giants) भी कहा जाता है। इनका आकार बहुत बड़ा है और घनत्व कम होता है। इन सभी के चारों ओर वलय (Rings) पाए जाते हैं।
सौरमंडल के ग्रहों का अवलोकन
| ग्रह का नाम (Hindi/English) | सूर्य से क्रम | प्रमुख विशेषताएँ |
| बुध (Mercury) | पहला | सबसे छोटा और सूर्य के सबसे निकट का ग्रह। इसका कोई उपग्रह नहीं है। |
| शुक्र (Venus) | दूसरा | पृथ्वी का “जुड़वां ग्रह” कहलाता है। यह सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है (घने वायुमंडल के कारण)। इसे “भोर का तारा” और “सांझ का तारा” भी कहते हैं। [UPPSC, SSC CGL] |
| पृथ्वी (Earth) | तीसरा | नीला ग्रह कहलाता है (जल की उपस्थिति के कारण)। सौरमंडल का एकमात्र ग्रह जहाँ जीवन ज्ञात है। |
| मंगल (Mars) | चौथा | लाल ग्रह कहलाता है (आयरन ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण)। इसके दो उपग्रह हैं- फोबोस और डीमोस। [SSC] |
| बृहस्पति (Jupiter) | पाँचवाँ | सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह। इस पर एक विशालकाय लाल धब्बा (Great Red Spot) है, जो एक सदियों पुराना तूफान है। [BPSC] |
| शनि (Saturn) | छठा | अपने शानदार वलयों (Rings) के लिए जाना जाता है जो बर्फ और चट्टान के कणों से बने हैं। इसका घनत्व पानी से भी कम है। |
| अरुण (Uranus) | सातवाँ | अपने अक्ष पर अत्यधिक झुकाव के कारण इसे “लेटा हुआ ग्रह” कहते हैं। इसका रंग मीथेन गैस के कारण हरा-नीला है। |
| वरुण (Neptune) | आठवाँ | सूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह। यह सबसे ठंडा ग्रह है और सूर्य की एक परिक्रमा करने में सबसे अधिक समय (लगभग 165 वर्ष) लेता है। |
सौरमंडल के अन्य पिंड
| पिंड | विवरण |
| बौने ग्रह (Dwarf Planets) | ये ग्रहों की तरह ही सूर्य की परिक्रमा करते हैं और लगभग गोलाकार होते हैं, लेकिन इन्होंने अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र को अन्य पिंडों से साफ नहीं किया होता है। प्लूटो (Pluto) इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। |
| क्षुद्रग्रह (Asteroids) | ये चट्टानी और धात्विक पिंड हैं जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं। अधिकांश क्षुद्रग्रह मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के बीच स्थित मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्ट (Main Asteroid Belt) में पाए जाते हैं। [UPSC Prelims, SSC] |
| धूमकेतु (Comets) | ये धूल, बर्फ और गैसों के बने खगोलीय पिंड हैं। जब ये सूर्य के पास आते हैं, तो गर्म होकर गैस और धूल की एक पूंछ छोड़ते हैं जो हमेशा सूर्य से विपरीत दिशा में होती है। हैली का धूमकेतु (Halley’s Comet) हर 76 वर्ष में दिखाई देता है। [State PSC] |
| उल्का और उल्कापिंड (Meteor & Meteorite) | जब कोई छोटा क्षुद्रग्रह (उल्कापिंड) पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो घर्षण से जलने लगता है और एक चमकदार धारी बनाता है, जिसे उल्का (Meteor) या “टूटता तारा” कहते हैं। यदि उसका कोई भाग बिना जले पृथ्वी की सतह तक पहुंचता है, तो उसे उल्कापिंड (Meteorite) कहते हैं। |
सूर्य (The Sun)
सूर्य हमारे सौरमंडल के केंद्र में स्थित एक तारा है। यह अत्यधिक गर्म गैसों, मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम का एक विशाल, धधकता हुआ गोला है। सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल ही पूरे सौरमंडल को एक साथ बांधे रखता है, जिसके कारण ग्रह और अन्य पिंड इसकी परिक्रमा करते हैं। यह पृथ्वी पर जीवन के लिए ऊर्जा का अंतिम स्रोत है।
सूर्य की आंतरिक संरचना (Internal Structure)
सूर्य की आंतरिक संरचना को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:
- क्रोड (Core):
- यह सूर्य का सबसे भीतरी और सबसे गर्म भाग है।
- यहाँ का तापमान लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस और दबाव अत्यंत उच्च होता है।
- इसी क्षेत्र में नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया होती है, जो सूर्य की ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। [SSC CGL, BPSC Prelims, RRB]
- विकिरण मेखला (Radiative Zone):
- यह क्रोड के चारों ओर का क्षेत्र है।
- क्रोड में उत्पन्न ऊर्जा इस क्षेत्र से फोटॉन (प्रकाश के कण) के रूप में बाहर की ओर यात्रा करती है।
- इस क्षेत्र का घनत्व बहुत अधिक होने के कारण ऊर्जा को इससे बाहर निकलने में लाखों वर्ष लग सकते हैं।
- संवहन मेखला (Convective Zone):
- यह सूर्य की सबसे बाहरी आंतरिक परत है।
- इस क्षेत्र में ऊर्जा का स्थानांतरण संवहन धाराओं (Convection Currents) के माध्यम से होता है, ठीक वैसे ही जैसे पानी उबलता है। गर्म प्लाज्मा ऊपर उठता है, सतह पर ठंडा होता है, और फिर वापस नीचे धंस जाता है।
सूर्य का वायुमंडल (Atmosphere)
सूर्य की सतह के ऊपर के गैसीय आवरण को उसका वायुमंडल कहते हैं, जिसे तीन परतों में बांटा गया है:
- प्रकाशमंडल (Photosphere):
- यह सूर्य की वह सतह है जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं।
- इसका तापमान लगभग 5,500 डिग्री सेल्सियस होता है।
- सौर कलंक (Sunspots) इसी परत में दिखाई देने वाले गहरे और ठंडे क्षेत्र हैं। [SSC, RRB NTPC]
- वर्णमंडल (Chromosphere):
- यह प्रकाशमंडल के ऊपर स्थित एक पतली और लाल रंग की परत है।
- यह सामान्यतः दिखाई नहीं देती, लेकिन पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान इसे देखा जा सकता है।
- कोरोना / किरीट (Corona):
- यह सूर्य के वायुमंडल की सबसे बाहरी और सबसे विस्तृत परत है।
- इसका तापमान आश्चर्यजनक रूप से लाखों डिग्री सेल्सियस तक होता है।
- यह भी केवल पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय ही दिखाई देता है। [UPSC Prelims, CDS]
सूर्य से जुड़ी प्रमुख घटनाएं
| घटना | विवरण |
| नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) | सूर्य के क्रोड में हाइड्रोजन के परमाणु मिलकर हीलियम बनाते हैं, जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही सूर्य की ऊर्जा का स्रोत है। [UPPSC] |
| सौर कलंक (Sunspots) | प्रकाशमंडल पर दिखाई देने वाले अपेक्षाकृत ठंडे (लगभग 4,000°C) और गहरे धब्बे जो तीव्र चुंबकीय गतिविधि के क्षेत्र होते हैं। इनका एक पूरा चक्र 11 वर्षों का होता है। [NDA, CDS] |
| सौर पवन (Solar Wind) | सूर्य के कोरोना से निकलने वाले आवेशित कणों की एक धारा जो पूरे सौरमंडल में फैलती है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराने पर यह ध्रुवीय ज्योति (Auroras) का निर्माण करती है। |
| सौर ज्वाला (Solar Flare) | सौर कलंक के आसपास होने वाला एक शक्तिशाली ऊर्जा का विस्फोट, जो अंतरिक्ष में भारी मात्रा में विकिरण फेंकता है। |
सूर्य से जुड़ी प्रमुख घटनाएं (विस्तृत विवरण)
सूर्य एक अत्यंत सक्रिय और गतिशील तारा है। इसकी सतह और वायुमंडल में लगातार ऐसी शक्तिशाली घटनाएं होती रहती हैं जो न केवल अद्भुत होती हैं बल्कि पूरे सौरमंडल पर, विशेषकर पृथ्वी पर, गहरा प्रभाव डालती हैं।
सौर कलंक (Sunspots)
परिभाषा:
सौर कलंक (या सनस्पॉट) सूर्य की दिखाई देने वाली सतह, यानी प्रकाशमंडल (Photosphere) पर मौजूद अस्थायी धब्बे हैं। ये अपने आसपास के क्षेत्र की तुलना में अधिक ठंडे और गहरे रंग के दिखाई देते हैं।
विस्तृत विवरण:
ये कोई स्थायी दाग नहीं हैं, बल्कि तीव्र चुंबकीय गतिविधि के क्षेत्र हैं। सूर्य के भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं कई बार उलझकर सतह पर आ जाती हैं। जब ऐसा होता है, तो यह शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र अपने नीचे से गर्म प्लाज्मा की संवहन धाराओं को सतह तक आने से रोक देता है। ऊर्जा का यह प्रवाह रुकने के कारण सतह का वह हिस्सा ठंडा हो जाता है (लगभग 4,000°C) और आसपास के गर्म क्षेत्र (लगभग 5,500°C) की तुलना में काला दिखाई देता है। इनका आकार पृथ्वी से भी कई गुना बड़ा हो सकता है। सौर कलंकों की संख्या एक लगभग 11-वर्षीय चक्र में घटती-बढ़ती है, जिसे सौर चक्र कहा जाता है। [NDA, CDS]
सौर ज्वाला (Solar Flare)
परिभाषा:
यह सूर्य के वायुमंडल में चुंबकीय ऊर्जा के अचानक मुक्त होने से होने वाला विकिरण का एक प्रचंड विस्फोट है। यह अक्सर सौर कलंकों के पास होता है।
विस्तृत विवरण:
जब सौर कलंकों के आसपास अत्यधिक उलझी हुई चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं अचानक टूटती हैं और पुनर्व्यवस्थित होती हैं, तो इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के लगभग हर हिस्से में (रेडियो तरंगों से लेकर एक्स-रे और गामा किरणों तक) एक विस्फोट के रूप में फैलती है। चूँकि यह विकिरण प्रकाश की गति से यात्रा करता है, इसलिए इसका प्रभाव पृथ्वी पर लगभग 8.2 मिनट में ही महसूस होता है। इसका सबसे प्रमुख प्रभाव पृथ्वी के आयनमंडल पर पड़ता है, जिससे उच्च-आवृत्ति वाले रेडियो संचार और जीपीएस सिग्नल बाधित हो सकते हैं।
कोरोनल मास इजेक्शन (Coronal Mass Ejection – CME)
परिभाषा:
यह सूर्य के कोरोना (सबसे बाहरी वायुमंडल) से प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के एक विशाल बादल का अंतरिक्ष में फेंका जाना है।
विस्तृत विवरण:
यह सौर ज्वाला से भिन्न है। सौर ज्वाला मुख्य रूप से ऊर्जा और विकिरण का विस्फोट है, जबकि CME अरबों टन आवेशित कणों और चुंबकीय क्षेत्र का वास्तविक निष्कासन है। यह एक विशाल चुंबकीय बुलबुले की तरह है जो सूर्य से दूर अंतरिक्ष में फैलता है। इसकी गति सौर ज्वाला से कम होती है और इसे पृथ्वी तक पहुंचने में 1 से 3 दिन लग सकते हैं। यदि इसकी दिशा पृथ्वी की ओर हो, तो यह पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराकर एक भू-चुंबकीय तूफान (Geomagnetic Storm) उत्पन्न कर सकता है। ऐसे तूफान उपग्रहों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, पावर ग्रिड को विफल कर सकते हैं और बहुत ही तीव्र ध्रुवीय ज्योति उत्पन्न कर सकते हैं।
सौर पवन (Solar Wind)
परिभाषा:
यह सूर्य के अत्यधिक गर्म कोरोना से सभी दिशाओं में लगातार बहने वाले आवेशित कणों (मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन) की एक सतत धारा है।
विस्तृत विवरण:
सूर्य का कोरोना इतना गर्म है कि सूर्य का गुरुत्वाकर्षण भी इन उच्च-ऊर्जा कणों को रोककर नहीं रख पाता, और ये लाखों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अंतरिक्ष में फैलते रहते हैं। यह एक सतत प्रक्रिया है। सौर पवन पूरे सौर मंडल को घेर लेती है और एक सुरक्षात्मक बुलबुला बनाती है जिसे “हेलियोस्फीयर” कहा जाता है। यह हेलियोस्फीयर सौरमंडल को बाहरी अंतरिक्ष से आने वाली हानिकारक ब्रह्मांडीय किरणों से बचाता है।
ध्रुवीय ज्योति (Aurora)
परिभाषा:
यह पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों के आकाश में रात के समय दिखाई देने वाला एक अद्भुत, रंगीन प्रकाश प्रदर्शन है। इसे उत्तरी गोलार्ध में सुमेरु ज्योति (Aurora Borealis) और दक्षिणी गोलार्ध में कुमेरु ज्योति (Aurora Australis) कहा जाता है।
विस्तृत विवरण:
इसका निर्माण सौर पवन या CME से आए आवेशित कणों द्वारा होता है। जब ये कण पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में फंस जाते हैं, तो वे चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के साथ यात्रा करते हुए ध्रुवों की ओर चले जाते हैं। यहां वे पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल (लगभग 100 से 400 किमी की ऊंचाई पर) में मौजूद ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के अणुओं से टकराते हैं। इस टक्कर से वायुमंडलीय गैस के अणु उत्तेजित हो जाते हैं और शांत होने पर विभिन्न रंगों में प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। ऑक्सीजन से हरा और लाल प्रकाश निकलता है, जबकि नाइट्रोजन से नीला और बैंगनी प्रकाश उत्पन्न होता है।
सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse)
परिभाषा:
यह एक खगोलीय घटना है जो तब होती है जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच एक सीधी रेखा में आ जाता है, जिससे वह पृथ्वी से देखने पर सूर्य के प्रकाश को आंशिक या पूर्ण रूप से अवरुद्ध कर देता है। यह घटना हमेशा अमावस्या को ही होती है। [State PSC]
विस्तृत विवरण:
पूर्ण सूर्य ग्रहण वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल इसी समय के दौरान सूर्य का रहस्यमयी और बेहद धुंधला बाहरी वायुमंडल, जिसे कोरोना (Corona) कहते हैं, पृथ्वी से नग्न आंखों से दिखाई देता है। सामान्य दिनों में सूर्य के प्रकाशमंडल की चकाचौंध के कारण कोरोना अदृश्य रहता है। यह घटना वैज्ञानिकों को कोरोना की संरचना, तापमान और गतिशीलता का अध्ययन करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है, जो यह समझने में मदद करता है कि सूर्य की सतह से लाखों गुना अधिक गर्म क्यों है। [UPSC Prelims]
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| रासायनिक संरचना | लगभग 74% हाइड्रोजन, 24% हीलियम, और शेष में अन्य भारी तत्व जैसे ऑक्सीजन, कार्बन, लोहा आदि शामिल हैं। |
| पृथ्वी से दूरी | लगभग 14.96 करोड़ किलोमीटर। |
| प्रकाश की गति | सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग 8 मिनट 20 सेकंड का समय लगता है। [RRB NTPC, SSC] |
| सूर्य का भविष्य | लगभग 5 अरब वर्षों के बाद, सूर्य एक लाल दानव (Red Giant) में बदल जाएगा और अंत में एक श्वेत वामन (White Dwarf) के रूप में समाप्त होगा। |
| ऊर्जा उत्पादन | सूर्य प्रति सेकंड लगभग 40 लाख टन पदार्थ को ऊर्जा में परिवर्तित करता है। |
सौरमंडल के ग्रह: एक विस्तृत अवलोकन
सौरमंडल में सूर्य की परिक्रमा करने वाले आठ ग्रह हैं। इन ग्रहों को उनकी संरचना और सूर्य से दूरी के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है: आंतरिक (पार्थिव) ग्रह और बाह्य (जोवियन) ग्रह।
आंतरिक या पार्थिव ग्रह (Inner or Terrestrial Planets)
ये सूर्य के सबसे निकट के चार ग्रह हैं। ये मुख्य रूप से चट्टान और धातु से बने हैं, इनका आकार छोटा, घनत्व अधिक और सतह ठोस होती है। इनके बहुत कम या कोई उपग्रह नहीं हैं।
बुध ग्रह (Mercury)
बुध हमारे सौरमंडल का सबसे छोटा और सूर्य के सबसे निकट स्थित ग्रह है। इसका नाम रोमन दूत देवता “मरकरी” के नाम पर रखा गया है, जो अपनी तेज गति के लिए जाने जाते थे, ठीक उसी तरह जैसे यह ग्रह सूर्य की परिक्रमा अत्यंत तीव्रता से करता है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| सूर्य से क्रम | पहला |
| सूर्य की परिक्रमा | 88 पृथ्वी दिन (सभी ग्रहों में सबसे छोटा वर्ष) |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | 59 पृथ्वी दिन |
| उपग्रह | शून्य (0) [RRB, State PSC] |
| वलय (Rings) | नहीं |
| वायुमंडल | लगभग न के बराबर (एक बहुत पतला बाह्यमंडल) |
| तापमान | सौरमंडल में सबसे अधिक तापांतर (दिन में 430°C, रात में -180°C) |
कक्षा और घूर्णन (Orbit and Rotation)
बुध की कक्षा और घूर्णन इसकी सबसे अनूठी विशेषताओं में से एक है।
- सबसे तेज परिक्रमा: सूर्य के सबसे निकट होने के कारण, यह सौरमंडल के किसी भी अन्य ग्रह की तुलना में सबसे तेजी से सूर्य का चक्कर लगाता है। इसका एक वर्ष पृथ्वी के केवल 88 दिनों के बराबर होता है। [SSC CGL]
- धीमा घूर्णन: अपनी कक्षा की तुलना में इसका घूर्णन बहुत धीमा है। यह अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने में 59 पृथ्वी-दिन लगाता है।
- अनोखा दिन-रात चक्र: इसके धीमे घूर्णन और तेज परिक्रमा के कारण, बुध पर एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक का समय (एक सौर दिवस) 176 पृथ्वी-दिनों के बराबर होता है, जो इसके एक वर्ष (88 दिन) से दोगुना है।
सतह और भू-आकृति (Surface and Geology)
बुध की सतह पहली नजर में हमारे चंद्रमा के समान दिखती है, जो उल्कापिंडों के टकराव से बने गड्ढों (Craters) से भरी हुई है।
- क्रेटर: इसकी सतह पर अनगिनत छोटे और बड़े गड्ढे हैं।
- स्कार्प्स (Scarps): इसकी सतह पर लंबी और ऊंची चट्टानें या कगारें पाई जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि जब ग्रह का आंतरिक भाग ठंडा होकर सिकुड़ा, तो उसकी ऊपरी परत फट गई, जिससे इन संरचनाओं का निर्माण हुआ।
- लोहे का विशाल क्रोड: बुध सौरमंडल के अन्य पार्थिव ग्रहों की तुलना में असामान्य रूप से सघन है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका क्रोड (Core) विशाल और धातु (मुख्य रूप से लोहा) से बना है, जो ग्रह के कुल आयतन का 60% तक हो सकता है।
वायुमंडल और तापमान
- वायुमंडल की अनुपस्थिति: बुध का कोई स्थायी वायुमंडल नहीं है। इसका गुरुत्वाकर्षण इतना कमजोर है और यह सूर्य के इतना निकट है कि सौर पवनों ने इसके वायुमंडल को लगभग उड़ा दिया है। यहाँ जो है वह एक बहुत ही पतला बाह्यमंडल (Exosphere) है।
- सर्वाधिक तापांतर: एक स्थिर वायुमंडल की कमी के कारण बुध दिन और रात के तापमान में सौरमंडल का सबसे चरम अंतर अनुभव करता है। [CDS] दिन में, जब सतह सूर्य के सामने होती है, तो तापमान 430 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जबकि रात में यह -180 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है।
- ध्रुवों पर बर्फ: आश्चर्यजनक रूप से, अत्यधिक गर्मी के बावजूद, नासा के MESSENGER अंतरिक्ष यान ने बुध के ध्रुवों पर मौजूद गहरे क्रेटरों में जल-बर्फ (Water Ice) के प्रमाण खोजे हैं। ये क्रेटर ऐसे हैं जिनकी गहराइयों में सूर्य का प्रकाश कभी नहीं पहुँचता और वे स्थायी रूप से छाया में रहते हैं।
2. शुक्र ग्रह (Venus)
शुक्र, सूर्य से दूसरा ग्रह है और सौरमंडल के सबसे दिलचस्प पिंडों में से एक है। आकार और संरचना में पृथ्वी से काफी समानता के कारण इसे “पृथ्वी की जुड़वां बहन” (Earth’s Twin Sister) कहा जाता है, लेकिन इसकी सतह की परिस्थितियाँ पृथ्वी से बिलकुल भिन्न और अत्यंत कठोर हैं।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| सूर्य से क्रम | दूसरा |
| सूर्य की परिक्रमा | 225 पृथ्वी दिन |
| अपने अक्ष पर घूर्णन | 243 पृथ्वी दिन (धीमा और विपरीत दिशा में) |
| उपग्रह | शून्य (0) [RRB] |
| वलय (Rings) | नहीं |
| वायुमंडल | अत्यधिक सघन, मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (96%) |
| उपनाम | पृथ्वी की जुड़वां बहन, भोर का तारा (Morning Star), सांझ का तारा (Evening Star) [UPPSC, SSC CGL] |
कक्षा और घूर्णन: सौरमंडल का सबसे अनोखा ग्रह
शुक्र का घूर्णन (Rotation) सौरमंडल में इसे अद्वितीय बनाता है।
- विपरीत घूर्णन (Retrograde Rotation): सौरमंडल के अधिकांश ग्रहों के विपरीत, शुक्र अपनी धुरी पर पूर्व से पश्चिम की ओर (दक्षिणावर्त या Clockwise) घूमता है। इसका अर्थ है कि शुक्र पर सूर्य पश्चिम में उगता है और पूर्व में अस्त होता है।
- दिन, साल से बड़ा: शुक्र का घूर्णन काल (243 पृथ्वी दिन) उसके परिक्रमण काल (225 पृथ्वी दिन) से भी अधिक है। इसका मतलब है कि शुक्र पर एक दिन उसके एक साल से भी लंबा होता है। यह सौरमंडल के सभी ग्रहों में सबसे लंबा दिन है।
वायुमंडल और चरम ग्रीनहाउस प्रभाव
शुक्र सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है, जबकि यह सूर्य के सबसे निकट नहीं है। [BPSC Prelims]
- सघन वायुमंडल: इसका वायुमंडल अत्यधिक सघन है, जिसका सतह पर दबाव पृथ्वी की तुलना में 90 गुना अधिक है, जो समुद्र में लगभग 1 किलोमीटर की गहराई पर महसूस होने वाले दबाव के बराबर है।
- भगोड़ा ग्रीनहाउस प्रभाव (Runaway Greenhouse Effect): इसका वायुमंडल मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide) से बना है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। यह गैस सूर्य की गर्मी को ग्रह की सतह पर कैद कर लेती है, लेकिन उसे वापस अंतरिक्ष में जाने नहीं देती। इसी प्रभाव के कारण इसकी सतह का औसत तापमान 465 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक रहता है, जो सीसा (Lead) को भी पिघलाने के लिए पर्याप्त है।
- सल्फ्यूरिक एसिड के बादल: शुक्र पीले रंग के सल्फ्यूरिक एसिड के घने बादलों से ढका हुआ है, जो सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं। इसी कारण यह आकाश में चंद्रमा के बाद रात में सबसे चमकीली प्राकृतिक वस्तु के रूप में दिखाई देता है।
सतह और भू-आकृति (Surface and Geology)
घने बादलों के कारण शुक्र की सतह को सीधे देखना असंभव है। अंतरिक्ष यानों द्वारा भेजे गए रडार डेटा से पता चलता है कि इसकी सतह सूखी, ऊबड़-खाबड़ और ज्वालामुखियों से भरी है।
- ज्वालामुखी: शुक्र की सतह पर हजारों ज्वालामुखी हैं, जिनमें से कुछ अभी भी सक्रिय हो सकते हैं।
- ऊंची भूमि और मैदान: इसकी सतह पर दो महाद्वीप जैसे ऊंचे पठार हैं, इश्तार टेरा (Ishtar Terra) और एफ्रोडाइट टेरा (Aphrodite Terra), जो विशाल ज्वालामुखीय मैदानों से घिरे हैं।
“भोर का तारा” और “सांझ का तारा”
चूंकि शुक्र की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के अंदर है, यह हमें कभी भी सूर्य से बहुत दूर दिखाई नहीं देता है। इसलिए, यह पृथ्वी से केवल सूर्योदय से कुछ घंटे पहले पूर्वी आकाश में, या सूर्यास्त के कुछ घंटे बाद पश्चिमी आकाश में ही दिखाई देता है। अपनी इसी दृश्यता और अत्यधिक चमक के कारण इसे “भोर का तारा (Morning Star)” और “सांझ का तारा (Evening Star)” कहा जाता है। [UPSC Prelims]
[UPSC Prelims, SSC CGL]
3. पृथ्वी ग्रह (Earth)
पृथ्वी, सूर्य से दूरी के क्रम में तीसरा और आकार में पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह है। यह सौरमंडल का एकमात्र ज्ञात खगोलीय पिंड है जिस पर जीवन का अस्तित्व है। इसकी सतह पर तरल पानी की प्रचुरता के कारण, अंतरिक्ष से देखने पर यह नीले रंग की दिखाई देती है, इसीलिए इसे “नीला ग्रह” (Blue Planet) भी कहा जाता है। [SSC, RRB]
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| सूर्य से क्रम | तीसरा |
| परिक्रमण काल (एक वर्ष) | 365.25 दिन (या 365 दिन, 6 घंटे) |
| घूर्णन काल (एक दिन) | 23 घंटे, 56 मिनट और 4 सेकंड |
| अक्षीय झुकाव | 23.5 डिग्री [UPPSC, State PSC] |
| उपग्रह | एक (चंद्रमा) |
| उपनाम | नीला ग्रह (Blue Planet), हरित ग्रह (Green Planet) |
कक्षा और घूर्णन गतियाँ
पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ हैं जो इसके पर्यावरण और जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
- घूर्णन (Rotation):
- पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है।
- एक घूर्णन पूरा करने में यह लगभग 24 घंटे (23 घंटे, 56 मिनट) का समय लेती है।
- पृथ्वी की इसी गति के कारण दिन और रात होते हैं।
- परिक्रमण (Revolution):
- पृथ्वी अपनी अंडाकार कक्षा में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है।
- एक परिक्रमा पूरी करने में यह 365 दिन और लगभग 6 घंटे का समय लेती है।
- यही अतिरिक्त 6 घंटे हर चार साल में जुड़कर एक अतिरिक्त दिन (29 फरवरी) बनाते हैं, जिसे लीप वर्ष (Leap Year) कहा जाता है।
अक्षीय झुकाव और ऋतु परिवर्तन
- पृथ्वी अपनी कक्षा के तल पर सीधी खड़ी न होकर अपनी धुरी पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है।
- पृथ्वी का यही झुकाव सूर्य की परिक्रमा के साथ मिलकर ऋतुओं में परिवर्तन (Change of Seasons) का मुख्य कारण है। [UPSC Prelims, SSC CGL] जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका होता है, तो वहाँ गर्मी होती है और जब यह सूर्य से दूर झुका होता है, तो वहाँ सर्दी होती है।
उपसौर और अपसौर (Perihelion and Aphelion)
अपनी अंडाकार कक्षा के कारण पृथ्वी की सूर्य से दूरी वर्ष भर बदलती रहती है:
- उपसौर (Perihelion): वह स्थिति जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है। यह स्थिति लगभग 3 जनवरी को होती है। [CDS, NDA]
- अपसौर (Aphelion): वह स्थिति जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है। यह स्थिति लगभग 4 जुलाई को होती है।
पृथ्वी की संरचना
आंतरिक रूप से, पृथ्वी तीन मुख्य परतों से बनी है:
- भूपर्पटी (Crust): सबसे बाहरी, पतली और ठोस परत।
- मैंटल (Mantle): भूपर्पटी के नीचे की मोटी, अर्ध-तरल परत।
- क्रोड (Core): सबसे भीतरी हिस्सा, जो मुख्य रूप से लोहे और निकल जैसी भारी धातुओं से बना है। इसका बाहरी हिस्सा तरल और आंतरिक हिस्सा ठोस है।
वायुमंडल (Atmosphere)
पृथ्वी एक गैसीय आवरण से घिरी हुई है जिसे वायुमंडल कहते हैं।
- प्रमुख गैसें: नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%)। [SSC, Railway]
- महत्व: यह हमें सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाता है (ओजोन परत के माध्यम से), जीवन के लिए आवश्यक गैसें प्रदान करता है और ग्रह के तापमान को नियंत्रित करता है। [UPSC Prelims, State PSC]
प्राकृतिक उपग्रह: चंद्रमा (The Moon)
- चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है।
- चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही महासागरों में ज्वार-भाटा (Tides) आते हैं।
- चंद्रमा पर मौजूद धूल के मैदान को “शांति का सागर” (Sea of Tranquility) कहा जाता है। [SSC]
4. मंगल ग्रह (Mars)
मंगल, सूर्य से दूरी के क्रम में चौथा ग्रह है और सौरमंडल में सबसे अधिक खोजे गए ग्रहों में से एक है। इसकी सतह पर मौजूद आयरन ऑक्साइड (Iron Oxide), यानी लोहे की जंग की प्रचुरता के कारण यह नारंगी-लाल रंग का दिखाई देता है, इसीलिए इसे “लाल ग्रह” (Red Planet) कहा जाता है। [SSC, RRB NTPC]
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| सूर्य से क्रम | चौथा |
| परिक्रमण काल (एक वर्ष) | 687 पृथ्वी दिन |
| घूर्णन काल (एक दिन) | 24 घंटे 37 मिनट (पृथ्वी के लगभग बराबर) |
| अक्षीय झुकाव | 25.19 डिग्री (पृथ्वी के 23.5° के समान) |
| उपग्रह | दो (फोबोस और डीमोस) [BPSC, SSC] |
| वलय (Rings) | नहीं |
| उपनाम | लाल ग्रह (Red Planet) |
कक्षा, घूर्णन और ऋतुएँ (Orbit, Rotation, and Seasons)
मंगल ग्रह की कई विशेषताएँ पृथ्वी से मिलती-जुलती हैं, जो इसे वैज्ञानिकों के लिए विशेष रूप से आकर्षक बनाती हैं।
- दिन की अवधि: मंगल का एक दिन (जिसे ‘सोल’ कहा जाता है) 24 घंटे 37 मिनट का होता है, जो पृथ्वी के दिन की अवधि के बहुत करीब है।
- ऋतु परिवर्तन: पृथ्वी की तरह ही मंगल भी अपनी धुरी पर लगभग 25 डिग्री झुका हुआ है। इस अक्षीय झुकाव के कारण मंगल पर भी पृथ्वी के समान ही चार ऋतुएँ (गर्मी, सर्दी, वसंत, पतझड़) होती हैं। हालांकि, इसका वर्ष पृथ्वी के वर्ष से लगभग दोगुना लंबा होने के कारण प्रत्येक ऋतु भी लगभग दोगुनी लंबी होती है। [UPPSC Prelims]
सतह और भू-आकृति (Surface and Geology)
मंगल की सतह ठंडी, सूखी, चट्टानी और रेगिस्तानी है। यहाँ सौरमंडल की कुछ सबसे विशाल और अद्भुत भू-आकृतियाँ मौजूद हैं:
- ओलिंपस मॉन्स (Olympus Mons): यह मंगल पर स्थित एक विशाल शील्ड ज्वालामुखी है, जो हमारे सौरमंडल का सबसे ऊंचा ज्ञात ज्वालामुखी और पर्वत है। इसकी ऊंचाई माउंट एवरेस्ट से लगभग तीन गुना अधिक है। [CDS, NDA]
- वैलस मैरिनेरिस (Valles Marineris): यह एक विशाल घाटी प्रणाली है जो मंगल की भूमध्य रेखा के साथ-साथ फैली हुई है। यह सौरमंडल की सबसे बड़ी घाटियों में से एक है, जो अमेरिका के ग्रैंड कैन्यन से कई गुना लंबी और गहरी है।
- ध्रुवीय बर्फीली चोटियाँ (Polar Ice Caps): मंगल के दोनों ध्रुवों पर पृथ्वी के समान ही बर्फीली चोटियाँ हैं। ये चोटियाँ जल-बर्फ (Water Ice) और जमी हुई कार्बन डाइऑक्साइड (सूखी बर्फ) की परतों से बनी हैं।
वायुमंडल (Atmosphere)
- मंगल का वायुमंडल बहुत पतला है, जो पृथ्वी के वायुमंडल के घनत्व का केवल 1% है।
- इसमें मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide) (लगभग 95%) गैस है, साथ ही नाइट्रोजन और आर्गन की भी कुछ मात्रा है।
- पतले वायुमंडल के कारण यह गर्मी को रोक नहीं पाता, जिससे सतह का तापमान बहुत ठंडा रहता है। मंगल पर अक्सर विशाल धूल भरी आंधियाँ (Dust Storms) चलती हैं, जो कभी-कभी हफ्तों तक पूरे ग्रह को ढक लेती हैं।
उपग्रह: फोबोस और डीमोस (Moons: Phobos and Deimos)
मंगल के दो छोटे और अनियमित आकार के चंद्रमा हैं:
- फोबोस (Phobos): यह दोनों में बड़ा और मंगल के अधिक निकट है।
- डीमोस (Deimos): यह छोटा है और मंगल से अधिक दूर है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये दोनों चंद्रमा मूल रूप से क्षुद्रग्रह (Asteroids) थे, जो मंगल के गुरुत्वाकर्षण द्वारा पकड़ लिए गए थे।
मंगल पर जीवन की खोज
मंगल वैज्ञानिकों के लिए विशेष रुचि का केंद्र है क्योंकि यहाँ अरबों साल पहले गर्म और नम वातावरण होने के प्रमाण मिले हैं। सूखी नदी घाटियों और डेल्टाओं जैसी संरचनाएं इस बात का संकेत देती हैं कि कभी इसकी सतह पर तरल पानी बहता था। इसी कारण, विभिन्न देशों द्वारा भेजे गए रोवर (जैसे नासा का क्यूरियोसिटी और पर्सिवियरेंस) मंगल पर प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन के संकेतों (बायोसिग्नेचर) की खोज कर रहे हैं।
बाह्य या जोवियन ग्रह (Outer or Jovian Planets)
ये सूर्य से दूर स्थित अंतिम चार ग्रह हैं। इन्हें “गैस दानव” (Gas Giants) भी कहा जाता है क्योंकि ये मुख्य रूप से हाइड्रोजन, हीलियम और मीथेन जैसी गैसों से बने हैं। ये आकार में बहुत विशाल हैं और इन सभी के चारों ओर वलय (Rings) पाए जाते हैं। इनके उपग्रहों की संख्या बहुत अधिक है।
5. बृहस्पति ग्रह (Jupiter)
बृहस्पति, सूर्य से दूरी के क्रम में पाँचवाँ ग्रह है और हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा और सबसे विशाल ग्रह है। [BPSC Prelims] इसका द्रव्यमान सौरमंडल के अन्य सभी ग्रहों के कुल द्रव्यमान से भी लगभग ढाई गुना अधिक है। बृहस्पति एक “गैस दानव” (Gas Giant) है, जिसका अर्थ है कि इसकी कोई ठोस सतह नहीं है और यह मुख्य रूप से गैसों और तरल पदार्थों से बना है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| सूर्य से क्रम | पाँचवाँ |
| परिक्रमण काल (एक वर्ष) | 11.9 पृथ्वी वर्ष |
| घूर्णन काल (एक दिन) | 9 घंटे 55 मिनट (सौरमंडल में सबसे छोटा दिन) [SSC CGL] |
| प्रमुख गैसें | हाइड्रोजन (लगभग 90%) और हीलियम |
| उपग्रह | 90 से अधिक (सौरमंडल में सबसे अधिक में से एक) |
| वलय (Rings) | हाँ (एक धुंधली और पतली वलय प्रणाली) |
| उपनाम | सौरमंडल का राजा, सौरमंडल का वैक्यूम क्लीनर |
सबसे तेज घूर्णन और सबसे छोटा दिन
- अपने विशाल आकार के बावजूद, बृहस्पति सौरमंडल के सभी ग्रहों में अपनी धुरी पर सबसे तेजी से घूमता है।
- यह अपना एक चक्कर केवल 9 घंटे और 55 मिनट में पूरा कर लेता है, जिसके कारण बृहस्पति पर सौरमंडल का सबसे छोटा दिन होता है। इस तेज गति के कारण ग्रह थोड़ा चपटा (ध्रुवों पर) दिखाई देता है।
वायुमंडल और संरचना (Atmosphere and Composition)
बृहस्पति का वायुमंडल बहुत गहरा और सघन है, जो इसकी सबसे प्रमुख विशेषता है।
- संरचना: यह मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम से बना है, ठीक सूर्य की तरह।
- मेघ पट्टियाँ (Cloud Bands): बृहस्पति पर अलग-अलग रंगों की सुंदर पट्टियाँ दिखाई देती हैं। हल्की पट्टियों को जोन्स (Zones) और गहरी पट्टियों को बेल्ट्स (Belts) कहा जाता है। ये विपरीत दिशाओं में बहने वाली हवाओं के कारण बनती हैं।
- द ग्रेट रेड स्पॉट (The Great Red Spot): यह बृहस्पति के दक्षिणी गोलार्ध में स्थित एक विशाल, अंडाकार, लाल रंग का धब्बा है। यह वास्तव में एक विशाल प्रतिचक्रवाती तूफान है जो कम से vकम 350 से अधिक वर्षों से सक्रिय है। इसका आकार इतना बड़ा है कि इसमें दो या तीन पृथ्वी समा सकती हैं। [CDS, NDA]
“लघु सौरमंडल”: बृहस्पति के चंद्रमा
बृहस्पति के 90 से अधिक ज्ञात उपग्रह हैं, जो इसे एक “लघु सौरमंडल” (Mini Solar System) जैसा बनाते हैं। इसके चार सबसे बड़े उपग्रहों की खोज 1610 में गैलीलियो गैलिली ने की थी, इसलिए इन्हें गैलीलियन चंद्रमा (Galilean Moons) कहा जाता है।
- आयो (Io): यह सौरमंडल का सबसे अधिक ज्वालामुखीय रूप से सक्रिय पिंड है, जिसकी सतह पर सैकड़ों ज्वालामुखी हैं।
- यूरोपा (Europa): इसकी सतह बर्फीली है, और वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बर्फीली परत के नीचे एक विशाल खारे पानी का महासागर मौजूद हो सकता है, जिससे यह जीवन की संभावना के लिए एक प्रमुख स्थान बन जाता है। [UPSC Prelims]
- गैनिमीड (Ganymede): यह न केवल बृहस्पति का, बल्कि पूरे सौरमंडल का सबसे बड़ा उपग्रह है। यह बुध ग्रह से भी बड़ा है। [SSC, RRB NTPC]
- कैलिस्टो (Callisto): इसकी सतह सौरमंडल के सबसे पुराने और सबसे अधिक गड्ढों (क्रेटरों) वाली सतहों में से एक है।
सौरमंडल का वैक्यूम क्लीनर
बृहस्पति का गुरुत्वाकर्षण अत्यंत शक्तिशाली है। यह एक विशाल “वैक्यूम क्लीनर” की तरह काम करता है, जो बाहरी सौरमंडल से आने वाले क्षुद्रग्रहों (Asteroids) और धूमकेतुओं (Comets) को अपनी ओर खींच लेता है या उनकी दिशा बदल देता है। ऐसा करके यह पृथ्वी सहित आंतरिक ग्रहों को संभावित विनाशकारी प्रभावों से बचाता है।
6. शनि ग्रह (Saturn)
शनि, सूर्य से दूरी के क्रम में छठा और बृहस्पति के बाद सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। यह अपनी शानदार और विशाल वलय प्रणाली (Ring System) के लिए जाना जाता है, जो इसे सौरमंडल का सबसे सुंदर और आसानी से पहचाने जाने वाला ग्रह बनाती है। इसे “सौरमंडल का गहना” (Jewel of the Solar System) भी कहा जाता है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| सूर्य से क्रम | छठा |
| परिक्रमण काल (एक वर्ष) | 29.5 पृथ्वी वर्ष |
| घूर्णन काल (एक दिन) | 10 घंटे 42 मिनट |
| प्रमुख गैसें | हाइड्रोजन और हीलियम |
| ज्ञात उपग्रह | 140 से अधिक |
| वलय (Rings) | हाँ (एक जटिल और विशाल वलय प्रणाली) |
| घनत्व | सौरमंडल में सबसे कम (पानी से भी कम) [SSC, RRB] |
| उपनाम | वलयों वाला ग्रह (The Ringed Planet), गैसों का गोला |
शानदार वलय प्रणाली (The Spectacular Ring System)
शनि की सबसे आकर्षक विशेषता इसके चारों ओर मौजूद वलय हैं।
- संरचना: ये वलय ठोस नहीं हैं, बल्कि ये अरबों की संख्या में बर्फ के कणों, धूल और चट्टानी टुकड़ों से मिलकर बने हैं। इन कणों का आकार एक धूल के कण से लेकर एक घर जितना बड़ा हो सकता है।
- विशालता और मोटाई: ये वलय अत्यंत विशाल हैं, जो शनि की सतह से हजारों किलोमीटर तक फैले हुए हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ये बहुत पतले हैं, जिनकी औसत मोटाई केवल कुछ मीटर से लेकर एक किलोमीटर तक ही है। [UPPSC]
- उत्पत्ति: वैज्ञानिकों का मानना है कि ये वलय किसी प्राचीन चंद्रमा, धूमकेतु या क्षुद्रग्रह के अवशेष हो सकते हैं जो शनि के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण के कारण टूटकर बिखर गए।
घनत्व: पानी में तैरने वाला ग्रह
- शनि की एक अद्वितीय विशेषता इसका अत्यंत कम घनत्व है। यह सौरमंडल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जिसका औसत घनत्व पानी से भी कम है। [State PSC, RRB]
- इसका अर्थ यह है कि यदि कोई इतना बड़ा महासागर होता जिसमें शनि को रखा जा सकता, तो यह उसमें डूबेगा नहीं, बल्कि तैरेगा।
वायुमंडल और संरचना (Atmosphere and Composition)
शनि भी बृहस्पति की तरह एक गैस दानव है।
- संरचना: यह मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम से बना है।
- रंग: इसके वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में मौजूद अमोनिया क्रिस्टल के कारण इसका रंग हल्का पीला दिखाई देता है।
- तीव्र हवाएं: शनि पर बहुत तेज हवाएं चलती हैं, जिनकी गति 1,800 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है।
शनि के महत्वपूर्ण चंद्रमा
शनि के 140 से अधिक चंद्रमा हैं, जिनमें से कुछ सौरमंडल में सबसे दिलचस्प पिंडों में से हैं।
- टाइटन (Titan):
- यह शनि का सबसे बड़ा और सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह है।
- यह सौरमंडल का एकमात्र ऐसा उपग्रह है जिसका अपना सघन वायुमंडल है, जो पृथ्वी के वायुमंडल से भी अधिक घना है। [UPSC Prelims, CDS]
- इसका वायुमंडल मुख्य रूप से नाइट्रोजन से बना है।
- टाइटन की सतह पर तरल मीथेन और इथेन की नदियाँ, झीलें और समुद्र मौजूद हैं।
- एन्सेलाडस (Enceladus):
- यह एक छोटा, बर्फीला चंद्रमा है जो वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- इसकी बर्फीली सतह के नीचे एक विशाल खारे पानी का वैश्विक महासागर होने के प्रबल प्रमाण मिले हैं।
- इसके दक्षिणी ध्रुव से पानी की भाप और बर्फ के कणों के विशाल फव्वारे (Geysers) अंतरिक्ष में फूटते रहते हैं, जो एक भूमिगत महासागर की उपस्थिति का संकेत देते हैं और इसे जीवन की खोज के लिए एक प्रमुख स्थान बनाते हैं।
7. अरुण ग्रह (Uranus)
अरुण, सूर्य से दूरी के क्रम में सातवाँ ग्रह है। यह सौरमंडल का तीसरा सबसे बड़ा ग्रह (त्रिज्या में) और चौथा सबसे विशाल ग्रह है। बृहस्पति और शनि की तरह गैस दानव होने के बजाय, इसे अपनी विशिष्ट संरचना के कारण “बर्फ़ीला दानव” (Ice Giant) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह पहला ग्रह था जिसे प्राचीन काल के बजाय आधुनिक समय में दूरबीन (Telescope) की सहायता से खोजा गया था।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| सूर्य से क्रम | सातवाँ |
| परिक्रमण काल (एक वर्ष) | 84 पृथ्वी वर्ष |
| घूर्णन काल (एक दिन) | 17 घंटे 14 मिनट (विपरीत दिशा में) |
| अक्षीय झुकाव | 97.77 डिग्री (लगभग 98 डिग्री) |
| ज्ञात उपग्रह | 27 |
| वलय (Rings) | हाँ (13 ज्ञात धुंधले और पतले वलय) |
| प्रमुख गैसें/यौगिक | हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन, अमोनिया, जल |
| उपनाम | लेटा हुआ ग्रह (Sideways Planet), हरा ग्रह |
सबसे अनूठा अक्षीय झुकाव: “लेटा हुआ ग्रह”
अरुण की सबसे असाधारण और परिभाषित विशेषता इसका अत्यधिक अक्षीय झुकाव है।
- 98 डिग्री का झुकाव: जहाँ पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 23.5 डिग्री झुकी है, वहीं अरुण लगभग 98 डिग्री तक झुका हुआ है। यह इतना अधिक है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो ग्रह अपनी कक्षा में सीधा घूमने के बजाय एक तरफ “लुढ़क” रहा हो। [SSC, CDS]
- अत्यधिक लंबी ऋतुएँ: इस अद्वितीय झुकाव के कारण अरुण पर अत्यंत लंबी और चरम ऋतुएँ होती हैं। इसके 84 साल के परिक्रमण काल के दौरान, ग्रह का एक ध्रुव लगातार 42 वर्षों तक सूर्य के प्रकाश में रहता है (ग्रीष्मकाल), जबकि दूसरा ध्रुव 42 वर्षों तक पूर्ण अंधकार (सर्दियों) में डूबा रहता है।
- उत्पत्ति: वैज्ञानिकों का मानना है कि अरबों साल पहले सौरमंडल के प्रारंभिक काल में किसी पृथ्वी के आकार के विशाल पिंड से हुई विनाशकारी टक्कर के कारण अरुण इतना अधिक झुक गया होगा।
वायुमंडल और संरचना: “बर्फ़ीला दानव”
अरुण की संरचना बृहस्पति और शनि से भिन्न है।
- प्रमुख यौगिक: इसके वायुमंडल और आंतरिक भाग में हाइड्रोजन और हीलियम के अलावा, पानी (H₂O), अमोनिया (NH₃) और मीथेन (CH₄) की जमी हुई अवस्था (बर्फ़) की प्रचुरता है। इसी बर्फीली संरचना के कारण इसे “बर्फ़ीला दानव” (Ice Giant) कहा जाता है।
- हरा-नीला रंग: अरुण का विशिष्ट हरा-नीला या सियान (Cyan) रंग इसके ऊपरी वायुमंडल में मौजूद मीथेन गैस के कारण है। [UPPSC, State PSC] मीथेन गैस सूर्य के प्रकाश से लाल हिस्से को अवशोषित कर लेती है और नीले-हरे हिस्से को परावर्तित करती है, जिससे ग्रह का यह रंग दिखाई देता है।
वलय और उपग्रह (Rings and Moons)
- वलय प्रणाली: शनि की तरह, अरुण के चारों ओर भी वलय हैं, लेकिन वे बहुत पतले, धुंधले और गहरे रंग के हैं, जिससे उन्हें देखना बहुत मुश्किल होता है। इसके 13 ज्ञात वलय हैं।
- उपग्रह: अरुण के 27 ज्ञात चंद्रमा हैं। दिलचस्प बात यह है कि अन्य ग्रहों के चंद्रमाओं के विपरीत, जिनके नाम पौराणिक कथाओं से लिए गए हैं, अरुण के चंद्रमाओं के नाम विलियम शेक्सपियर और अलेक्जेंडर पोप के साहित्यिक पात्रों के नाम पर रखे गए हैं। इसके पांच प्रमुख चंद्रमाओं में मिरांडा, एरियल, उम्ब्रियल, टाइटेनिया और ओबेरॉन शामिल हैं।
खोज (Discovery)
अरुण को 1781 में विलियम हर्शेल (William Herschel) द्वारा खोजा गया था। यह दूरबीन का उपयोग करके खोजा जाने वाला पहला ग्रह थ
8. वरुण ग्रह (Neptune)
वरुण, सूर्य से दूरी के अनुसार आठवाँ और हमारे सौरमंडल का सबसे दूर स्थित ग्रह है। [RRB, State PSC] यह व्यास के अनुसार चौथा सबसे बड़ा ग्रह है लेकिन द्रव्यमान में तीसरा सबसे बड़ा है। अरुण (Uranus) की तरह, इसे भी अपनी संरचना के कारण एक “बर्फ़ीला दानव” (Ice Giant) के रूप of में वर्गीकृत किया गया है। यह एकमात्र ऐसा ग्रह है जिसे सीधे अवलोकन के बजाय गणितीय भविष्यवाणी (Mathematical Prediction) द्वारा खोजा गया था।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| सूर्य से क्रम | आठवाँ |
| परिक्रमण काल (एक वर्ष) | 164.8 पृथ्वी वर्ष |
| घूर्णन काल (एक दिन) | 16 घंटे 6 मिनट |
| प्रमुख गैसें/यौगिक | हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन |
| ज्ञात उपग्रह | 14 |
| वलय (Rings) | हाँ (5 मुख्य धुंधले वलय) |
| मुख्य पहचान | सौरमंडल की सबसे तेज हवाएँ, सबसे ठंडा ग्रह |
गणित द्वारा खोजा गया ग्रह
वरुण की खोज खगोल विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। 19वीं सदी के मध्य में, खगोलविदों ने देखा कि अरुण (Uranus) की कक्षा उस पथ का अनुसरण नहीं कर रही थी जिसका अनुमान न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों के अनुसार लगाया गया था। इससे यह सिद्धांत सामने आया कि अरुण से परे एक और अज्ञात ग्रह मौजूद है जिसका गुरुत्वाकर्षण अरुण की कक्षा को प्रभावित कर रहा है।
फ्रांसीसी गणितज्ञ अर्बन ले वेरियर (Urbain Le Verrier) और ब्रिटिश गणितज्ञ जॉन काउच एडम्स (John Couch Adams) ने स्वतंत्र रूप से गणना करके इस अज्ञात ग्रह की स्थिति की भविष्यवाणी की। 1846 में, जर्मन खगोलशास्त्री जोहान गाले (Johann Galle) ने ले वेरियर की गणनाओं का उपयोग करके लगभग उसी स्थान पर वरुण ग्रह को खोज निकाला।
वायुमंडल और संरचना: नीला और तूफानी ग्रह
- गहरा नीला रंग: वरुण का गहरा, आकर्षक नीला रंग इसके ऊपरी वायुमंडल में मौजूद मीथेन गैस के कारण है, जो सूर्य के प्रकाश से लाल रंग को अवशोषित कर लेती है और नीले रंग को परावर्तित करती है। [CDS] इसका रंग अरुण की तुलना में अधिक गहरा और जीवंत है, जिसका कारण एक अज्ञात वायुमंडलीय घटक माना जाता है।
- सौरमंडल की सबसे तेज हवाएँ: वरुण सौरमंडल का सबसे तूफानी ग्रह है। यहाँ अत्यधिक तेज गति वाली हवाएँ चलती हैं, जिनकी गति 2,000 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक तक पहुँच सकती है, जो ध्वनि की गति से भी तेज है।
- द ग्रेट डार्क स्पॉट (The Great Dark Spot): 1989 में जब वोयेजर 2 अंतरिक्ष यान वरुण के पास से गुजरा, तो उसने बृहस्पति के ग्रेट रेड स्पॉट के समान एक विशाल, अँधेरे तूफान को देखा था। हालांकि, बाद के अवलोकनों में यह धब्बा गायब हो गया, जो यह दर्शाता है कि वरुण का वायुमंडल बहुत गतिशील और परिवर्तनशील है।
सबसे दूर और सबसे ठंडा ग्रह
- सूर्य से सबसे दूर होने के कारण वरुण को सूर्य की परिक्रमा पूरी करने में लगभग 165 पृथ्वी वर्ष लगते हैं। इसका मतलब है कि 1846 में अपनी खोज के बाद से, इसने 2011 में ही अपनी पहली पूर्ण कक्षा पूरी की थी।
- सूर्य से अत्यधिक दूरी के कारण यह सौरमंडल का सबसे ठंडा ग्रह है, जिसके ऊपरी बादलों का तापमान -214 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है।
वलय और उपग्रह (Rings and Moons)
- वलय प्रणाली: वरुण के चारों ओर एक बहुत ही धुंधली और पतली वलय प्रणाली है। शनि के वलयों के विपरीत, इसके वलयों में कुछ घने क्षेत्र हैं जिन्हें “आर्क” (Arcs) कहा जाता है।
- उपग्रह – ट्राइटन (Triton):
- वरुण का सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध चंद्रमा ट्राइटन है।
- यह सौरमंडल का एकमात्र बड़ा चंद्रमा है जो अपने ग्रह की घूर्णन दिशा के विपरीत कक्षा (Retrograde Orbit) में परिक्रमा करता है।
- इस विपरीत कक्षा से यह अनुमान लगाया जाता है कि ट्राइटन मूल रूप से एक स्वतंत्र पिंड था (जैसे प्लूटो), जिसे वरुण के गुरुत्वाकर्षण द्वारा कुइपर बेल्ट (Kuiper Belt) से पकड़ लिया गया था।
- ट्राइटन सौरमंडल के सबसे ठंडे पिंडों में से एक है, जिसकी सतह पर नाइट्रोजन बर्फ के बर्फीले ज्वालामुखी (Cryovolcanism) हैं जो अंतरिक्ष में बर्फीले पदार्थ उगलते हैं।
कुइपर बेल्ट और प्लूटो (Kuiper Belt and Pluto)
कुइपर बेल्ट और प्लूटो सौरमंडल के सबसे बाहरी, ठंडे और रहस्यमयी क्षेत्रों में से हैं। प्लूटो की कहानी और उसका वर्गीकरण सीधे तौर पर कुइपर बेल्ट की खोज और समझ से जुड़ा हुआ है।
कुइपर बेल्ट (The Kuiper Belt)
परिभाषा:
कुइपर बेल्ट, नेप्च्यून (वरुण) ग्रह की कक्षा से परे, सौरमंडल के बाहरी किनारों पर स्थित बर्फीले और चट्टानी पिंडों की एक विशाल, तश्तरी के आकार की पट्टी (Disk-shaped region) है। इसे सौरमंडल के निर्माण के बाद बचे हुए अवशेषों का क्षेत्र माना जाता है।
| विशेषता | विवरण |
| स्थान | नेप्च्यून की कक्षा (लगभग 30 AU) से शुरू होकर लगभग 50 AU तक। (AU = पृथ्वी-सूर्य की दूरी) |
| आकृति | एक मोटी, फूली हुई तश्तरी या डोनट जैसी। |
| संरचना | इसमें अरबों की संख्या में बर्फीले पिंड हैं, जिन्हें कुइपर बेल्ट ऑब्जेक्ट्स (KBOs) कहा जाता है। ये पानी, मीथेन और अमोनिया की बर्फ के साथ-साथ चट्टानों से बने हैं। |
| महत्व | यह छोटे-आवधिक धूमकेतुओं (Short-period comets) का स्रोत माना जाता है (वे धूमकेतु जो 200 वर्ष से कम समय में सूर्य का चक्कर लगाते हैं)। |
| क्षुद्रग्रह बेल्ट से अंतर | क्षुद्रग्रह बेल्ट (Asteroid Belt) मंगल और बृहस्पति के बीच है और इसमें मुख्य रूप से चट्टानी पिंड हैं, जबकि कुइपर बेल्ट नेप्च्यून से परे है और इसमें मुख्य रूप से बर्फीले पिंड हैं। [UPSC Prelims] |
उत्पत्ति और महत्व:
वैज्ञानिकों का मानना है कि कुइपर बेल्ट में मौजूद पिंड सौरमंडल के प्रारंभिक काल में किसी ग्रह का हिस्सा नहीं बन पाए। बृहस्पति जैसे विशाल ग्रहों के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण ने इन्हें बाहर की ओर धकेल दिया। यह क्षेत्र सौरमंडल के “डीप फ्रीज” की तरह है, जिसने 4.6 अरब साल पुरानी मौलिक सामग्री को संरक्षित रखा है। इसका अध्ययन करने से हमें सौरमंडल के गठन और विकास को समझने में मदद मिलती है।
प्लूटो (Pluto)
परिभाषा:
प्लूटो, कुइपर बेल्ट में स्थित एक जटिल और दिलचस्प बौना ग्रह (Dwarf Planet) है। यह कुइपर बेल्ट में खोजा गया पहला और अब तक का सबसे प्रसिद्ध पिंड है।
| विशेषता | विवरण |
| खोज | 1930 में अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉमबॉ (Clyde Tombaugh) द्वारा। [SSC] |
| वर्गीकरण | बौना ग्रह (Dwarf Planet) – 2006 से। |
| स्थान | कुइपर बेल्ट के भीतर। |
| कक्षा | अत्यधिक अंडाकार और झुकी हुई (सूर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों के तल से 17 डिग्री पर झुकी हुई)। |
| उपग्रह | पाँच (सबसे बड़ा – कैरन, जो प्लूटो के आधे आकार का है)। |
| सतह | नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड की बर्फ से ढकी है, साथ ही इसमें पर्वत, घाटियाँ और मैदान भी हैं। |
अनोखी कक्षा:
प्लूटो की कक्षा बहुत ही विलक्षण (eccentric) है। अपनी 248 साल की लंबी परिक्रमा के दौरान, यह लगभग 20 वर्षों के लिए नेप्च्यून की कक्षा के अंदर आ जाता है। हालांकि, उनकी कक्षाओं के झुकाव के कारण, उनके आपस में टकराने की कोई संभावना नहीं है।
सतह और वायुमंडल:
2015 में नासा के न्यू होराइजंस (New Horizons) मिशन ने प्लूटो की पहली विस्तृत तस्वीरें भेजीं, जिसने एक जटिल दुनिया का खुलासा किया। इसकी सतह पर “टॉमबॉ रेगियो” नामक एक विशाल, हृदय के आकार का नाइट्रोजन बर्फ का ग्लेशियर है। प्लूटो का एक पतला वायुमंडल भी है जो मुख्य रूप से नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड से बना है। जब प्लूटो सूर्य से दूर जाता है, तो इसका वायुमंडल जम कर इसकी सतह पर बर्फ के रूप में गिर जाता है।
प्लूटो और कैरन: एक दोहरा निकाय
प्लूटो का सबसे बड़ा चंद्रमा कैरन (Charon) इतना बड़ा है कि कई खगोलशास्त्री प्लूटो-कैरन प्रणाली को एक “दोहरा बौना ग्रह” या “बाइनरी सिस्टम” (Binary System) मानते हैं। वे एक दूसरे की परिक्रमा एक ऐसे साझा गुरुत्वाकर्षण केंद्र (barycenter) के चारों ओर करते हैं जो प्लूटो के अंदर नहीं, बल्कि उसके बाहर अंतरिक्ष में स्थित है।
ग्रह से बौने ग्रह तक: वर्गीकरण क्यों बदला?
1930 में अपनी खोज के बाद से 2006 तक, प्लूटो को सौरमंडल का नौवाँ ग्रह माना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे दूरबीनें अधिक शक्तिशाली होती गईं, खगोलविदों ने कुइपर बेल्ट में प्लूटो के आकार के कई अन्य पिंडों की खोज शुरू कर दी, जैसे एरIS (Eris), जो प्लूटो से भी अधिक विशाल था।
इससे एक सवाल खड़ा हुआ: यदि प्लूटो एक ग्रह है, तो क्या एरिस और अन्य खोजे गए पिंडों को भी ग्रह माना जाना चाहिए?
इस समस्या को हल करने के लिए, 2006 में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने एक ग्रह को परिभाषित करने के लिए तीन मानदंड निर्धारित किए:
- यह सूर्य की परिक्रमा करता हो।
- यह लगभग गोलाकार होने के लिए पर्याप्त विशाल हो (अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण)।
- इसने अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र को अन्य पिंडों से “साफ” कर दिया हो।
प्लूटो पहले दो मानदंडों को पूरा करता है, लेकिन तीसरे मानदंड में विफल रहता है। [UPPSC Mains, CDS] यह अपनी कक्षा को “साफ” नहीं कर पाया है क्योंकि यह कुइपर बेल्ट के लाखों अन्य बर्फीले पिंडों के साथ अपनी कक्षा साझा करता है। इसी कारण, प्लूटो और उसके जैसे अन्य पिंडों (जैसे एरिस, सेरेस) के लिए “बौना ग्रह” नामक एक नई श्रेणी बनाई गई।
ग्रहों की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत
ग्रहों के निर्माण को समझाने के लिए कई सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं, जो बताते हैं कि हमारे सौरमंडल के ग्रह कैसे बने। इनमें से कुछ ऐतिहासिक हैं, जबकि एक सिद्धांत को वर्तमान में सबसे अधिक वैज्ञानिक मान्यता प्राप्त है।
1. नीहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis)
यह ग्रहों की उत्पत्ति से संबंधित सबसे पुराने और आधारभूत सिद्धांतों में से एक है।
- प्रतिपादक: इस सिद्धांत की मूल संकल्पना जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट (Immanuel Kant) ने 1755 में दी थी। बाद में, 1796 में फ्रांसीसी गणितज्ञ पियरे-साइमन लाप्लास (Pierre-Simon Laplace) ने इसे संशोधित और परिष्कृत किया।
- सिद्धांत का सार:
- प्रारंभ में, अंतरिक्ष में गैस और धूल के कणों का एक विशाल, गर्म और धीमी गति से घूमता हुआ बादल मौजूद था, जिसे नीहारिका (Nebula) कहा गया।
- समय के साथ, यह नीहारिका गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ने लगी और ठंडी होने लगी।
- सिकुड़ने के कारण इसके घूमने की गति (कोणीय संवेग संरक्षण के कारण) तेज हो गई।
- तेज गति के कारण, केंद्र में एक गैसीय पिंड (आद्य-सूर्य) बना और बाहरी पदार्थ एक चपटी तश्तरी के रूप में बाहर फैल गया।
- इसी तश्तरी से कई छल्ले (Rings) अलग हुए।
- बाद में, इन्हीं छल्लों का पदार्थ संघनित होकर और एकत्रित होकर ग्रहों, उपग्रहों और अन्य पिंडों के रूप में विकसित हो गया।
2. ग्रहाणु परिकल्पना (Planetesimal Hypothesis)
यह नीहारिका परिकल्पना का ही आधुनिक और वैज्ञानिक रूप से सबसे स्वीकृत संस्करण है। इसे नाभिकीय अभिवृद्धि मॉडल (Core Accretion Model) भी कहा जाता है और यह वर्तमान में ग्रहों के निर्माण की सबसे प्रमुख व्याख्या है। [UPSC Mains, State PSC]
- सिद्धांत के चरण:
- आद्य-ग्रह तश्तरी (Protoplanetary Disk): सूर्य के निर्माण के बाद, उसके चारों ओर गैस और धूल की एक विशाल घूमती हुई तश्तरी बची रह गई, जिसे आद्य-ग्रह तश्तरी कहा जाता है।
- अभिवृद्धि (Accretion) की शुरुआत: इस तश्तरी में मौजूद धूल के छोटे-छोटे कण tĩnhविद्युत (static electricity) के कारण आपस में चिपकने लगे, जिससे बड़े गुच्छे बने।
- ग्रहाणुओं (Planetesimals) का निर्माण: जब ये गुच्छे काफी बड़े (लगभग 1 किलोमीटर व्यास के) हो गए, तो उनका अपना गुरुत्वाकर्षण प्रभावी हो गया। ये छोटे पिंड ग्रहाणु (Planetesimals) कहलाए।
- आद्य-ग्रहों (Protoplanets) का निर्माण: ये ग्रहाणु आपस में टकराकर और जुड़कर और भी बड़े पिंड बनाने लगे, जिन्हें आद्य-ग्रह (Protoplanets) या ग्रह-भ्रूण कहा गया। यह एक हिंसक दौर था जिसमें करोड़ों टक्करें हुईं।
- ग्रहों का अंतिम स्वरूप: अंततः, कुछ बड़े आद्य-ग्रह अपने गुरुत्वाकर्षण से आसपास के छोटे पिंडों को अपनी ओर खींचकर या तो अपने में मिला लेते हैं या उन्हें अपनी कक्षा से बाहर फेंक देते हैं। इस प्रक्रिया में अरबों वर्षों के बाद ग्रहों का वर्तमान स्वरूप बना।
आंतरिक और बाह्य ग्रहों में अंतर का कारण: हिम रेखा (Frost Line)
यह मॉडल यह भी समझाता है कि आंतरिक ग्रह चट्टानी और बाह्य ग्रह गैसीय क्यों हैं:
- हिम रेखा के भीतर (आंतरिक ग्रह): सूर्य के निकट का क्षेत्र बहुत गर्म था। यहाँ केवल चट्टानें और धातु जैसे उच्च-तापमान वाले पदार्थ ही ठोस अवस्था में रह सकते थे। बर्फ जैसे पदार्थ वाष्पीकृत हो गए। इसलिए, बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल जैसे छोटे और चट्टानी ग्रहों का निर्माण हुआ।
- हिम रेखा के बाहर (बाह्य ग्रह): सूर्य से दूर यह क्षेत्र इतना ठंडा था कि यहाँ चट्टान और धातु के साथ-साथ पानी, मीथेन और अमोनिया की बर्फ भी ठोस अवस्था में मौजूद थी। बर्फ की मौजूदगी के कारण यहाँ ठोस पदार्थ की मात्रा बहुत अधिक थी। इससे विशालकाय नाभिक (Cores) बने, जिनका गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली हो गया कि उन्होंने आसपास की विशाल मात्रा में हाइड्रोजन और हीलियम गैस को अपनी ओर खींच लिया, जिससे बृहस्पति और शनि जैसे गैस दानव ग्रहों का निर्माण हुआ।
3. द्वैतारक या ज्वारीय परिकल्पना (Binary or Tidal Hypothesis)
यह एक ऐतिहासिक सिद्धांत है जिसे अब वैज्ञानिक समुदाय द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है।
- प्रतिपादक: यह परिकल्पना ब्रिटिश वैज्ञानिकों जेम्स जीन्स (James Jeans) और बाद में हेरोल्ड जेफ्रीस (Harold Jeffreys) द्वारा दी गई थी।
- सिद्धांत का सार:
- इस सिद्धांत के अनुसार, सौरमंडल का निर्माण सूर्य और एक अन्य विशाल तारे की नजदीकी टक्कर से हुआ।
- जब यह विशाल तारा सूर्य के पास से गुजरा, तो उसके शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण (ज्वारीय बल) ने सूर्य की सतह से गैस का एक सिगार के आकार का विशाल फिलामेंट खींच लिया।
- बाद में यह फिलामेंट टूटकर और ठंडा होकर ग्रहों में संघनित हो गया।
- अस्वीकृति का कारण: इस सिद्धांत की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि दो तारों के बीच इस तरह की नजदीकी टक्कर की संभावना बहुत ही कम होती है। साथ ही, सूर्य से खींची गई गर्म गैस के ग्रहों में संघनित होने की प्रक्रिया को भी यह ठीक से समझा नहीं पाया।
गैस-धूल परिकल्पना (Gas-Dust Hypothesis)
गैस-धूल परिकल्पना ग्रहों की उत्पत्ति से संबंधित एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत है, जिसने पुरानी नीहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis) की कमियों को दूर करते हुए एक अधिक तार्किक और विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की। यह सिद्धांत ग्रहाणु परिकल्पना (Planetesimal Hypothesis) का एक विकसित रूप माना जाता है और वर्तमान में ग्रहों के निर्माण की हमारी समझ का आधार है।
मुख्य प्रतिपादक:
इस सिद्धांत का प्रतिपादन 20वीं शताब्दी के मध्य में रूसी वैज्ञानिक ओटो श्मिट (Otto Schmidt) द्वारा किया गया था। बाद में अन्य वैज्ञानिकों ने इसमें और सुधार किए।
परिकल्पना के मूल सिद्धांत
ओटो श्मिट का सिद्धांत इस विचार से शुरू होता है कि ग्रहों का निर्माण सूर्य से नहीं, बल्कि सूर्य द्वारा पकड़े गए अंतरतारकीय (Interstellar) गैस और धूल के बादल से हुआ है।
सिद्धांत के चरण:
- प्रारंभिक अवस्था: विशाल और शीतल बादल:
- इस सिद्धांत के अनुसार, जब हमारा सूर्य अंतरिक्ष में अपनी आकाशगंगा के चारों ओर घूम रहा था, तो उसके मार्ग में गैस (मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम) और धूल के कणों का एक विशाल, ठंडा और घना बादल आया।
- यह पुरानी नीहारिका परिकल्पना से एक बड़ा अंतर था, जो एक गर्म और घूमते हुए बादल से शुरुआत करती थी।
- बादल का सूर्य द्वारा अधिग्रहण (Capture):
- सूर्य ने अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल के कारण इस विशाल गैस-धूल के बादल को अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उसे अपने चारों ओर परिक्रमा करने के लिए मजबूर कर दिया।
- यह बादल अब सूर्य के चारों ओर एक विशाल, चपटी तश्तरी (Disk) के रूप में घूमने लगा, जिसे आद्य-ग्रह तश्तरी (Protoplanetary Disk) कहा गया।
- कणों का संघनन और एकत्रीकरण (Condensation and Accretion):
- इस ठंडी तश्तरी में, धूल और गैस के कण एक-दूसरे से टकराने और चिपकने लगे। धूल के कणों ने संघनन के लिए नाभिक (nucleus) के रूप में काम किया, जिसके चारों ओर पदार्थ जमा होने लगा।
- गुरुत्वाकर्षण और tĩnhविद्युत (static electricity) बलों के कारण, ये छोटे कण मिलकर बड़े गुच्छे बनाने लगे।
- ग्रहाणुओं (Planetesimals) का निर्माण:
- समय के साथ, ये गुच्छे बड़े होकर किलोमीटर के आकार के छोटे चट्टानी और बर्फीले पिंडों में बदल गए। इन्हीं पिंडों को ग्रहाणु (Planetesimals) कहा गया। ये ग्रह निर्माण की “ईंटें” थीं।
- ग्रहों का अंतिम निर्माण:
- इन ग्रहाणुओं के बीच टकराव और विलय (collision and merger) की प्रक्रिया तेज हो गई। बड़े ग्रहाणु अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण से छोटे ग्रहाणुओं को अपनी ओर खींचकर अपने आकार को और बड़ा करने लगे।
- अरबों वर्षों की इस प्रक्रिया के बाद, इन्हीं विशाल पिंडों ने अंततः ग्रहों और उनके उपग्रहों का रूप ले लिया।
इस सिद्धांत का महत्व और नीहारिका परिकल्पना से भिन्नता
इस सिद्धांत ने कांट और लाप्लास की पुरानी नीहारिका परिकल्पना की कई समस्याओं का समाधान किया:
- तापमान: पुरानी परिकल्पना एक गर्म नीहारिका से शुरू होती थी, जिसमें कणों का जुड़ना मुश्किल होता। श्मिट की ठंडी नीहारिका की अवधारणा ने कणों के आपस में चिपकने और संघनित होने की प्रक्रिया को अधिक संभव और तार्किक बना दिया।
- पदार्थ का स्रोत: इसने यह प्रस्तावित किया कि ग्रहों का पदार्थ सूर्य से नहीं, बल्कि बाहरी स्रोत से आया था, जिसे सूर्य ने बाद में पकड़ा। इसने कोणीय संवेग (Angular Momentum) की समस्या को हल करने में मदद की (अर्थात्, सूर्य में सौरमंडल का 99% से अधिक द्रव्यमान क्यों है, लेकिन ग्रहों में 98% से अधिक कोणीय संवेग क्यों है)।
- विभिन्न ग्रहों की संरचना: यह सिद्धांत “हिम रेखा” (Frost Line) की अवधारणा का समर्थन करता है, जो बताता है कि सूर्य के निकट केवल चट्टानी पदार्थ ठोस रह सकते थे (जिससे आंतरिक चट्टानी ग्रह बने), जबकि सूर्य से दूर बर्फ भी ठोस रह सकती थी (जिससे बाहरी विशाल गैसीय/बर्फीले ग्रह बने)।
निष्कर्ष:
हालांकि, “सूर्य द्वारा बादल को पकड़ने” की मूल अवधारणा को अब संशोधित कर दिया गया है और माना जाता है कि यह गैस-धूल की तश्तरी सूर्य के निर्माण के समय से ही बची हुई सामग्री थी, फिर भी गैस-धूल के कणों से अभिवृद्धि (Accretion) द्वारा ग्रहों के निर्माण का मूल विचार आज भी ग्रहों की उत्पत्ति के आधुनिक सिद्धांतों का केंद्र है।
नेब्युलर परिकल्पना का आधुनिक रूप: आद्य-ग्रह परिकल्पना (The Protoplanet Hypothesis)
आद्य-ग्रह परिकल्पना (Protoplanet Hypothesis) ग्रहों की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाला वर्तमान में सबसे स्वीकृत और वैज्ञानिक रूप से समर्थित मॉडल है। यह इमैनुएल कांट और लाप्लास द्वारा दी गई मूल नेब्युलर परिकल्पना का ही एक आधुनिक, परिष्कृत और विस्तृत रूप है। इसे नाभिकीय अभिवृद्धि मॉडल (Core Accretion Model) भी कहा जाता है। यह बताता है कि ग्रहों का निर्माण ऊपर से नीचे (Top-down) यानी किसी बादल के टूटने से नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर (Bottom-up) यानी छोटे कणों के जुड़ने से हुआ है।
मूल अवधारणा (Core Concept)
इस परिकल्पना के अनुसार, सूर्य और ग्रहों का निर्माण एक ही विशाल अंतरतारकीय गैस और धूल के बादल, जिसे सौर नीहारिका (Solar Nebula) कहा जाता है, से लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले हुआ। ग्रहों का निर्माण सूर्य के बनने के बाद बची हुई सामग्री की एक विशाल तश्तरी से धीरे-धीरे अभिवृद्धि (Accretion) की प्रक्रिया के माध्यम से हुआ।
निर्माण की चरणबद्ध प्रक्रिया (Step-by-Step Process)
- सौर नीहारिका का पतन (Collapse of the Solar Nebula):
- एक विशाल और ठंडे गैस-धूल के बादल ने अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ना शुरू किया।
- जैसे-जैसे यह सिकुड़ता गया, इसके घूमने की गति तेज होती गई और यह एक चपटी, घूमती हुई तश्तरी के रूप में बन गया।
- इस तश्तरी के केंद्र में अधिकांश पदार्थ जमा हो गया, जिससे अत्यधिक घनत्व और तापमान के कारण आद्य-सूर्य (Proto-sun) का निर्माण हुआ।
- आद्य-ग्रह तश्तरी का निर्माण (Formation of the Protoplanetary Disk):
- आद्य-सूर्य के चारों ओर बची हुई गैस और धूल की विशाल, घूमती हुई तश्तरी को ही आद्य-ग्रह तश्तरी (Protoplanetary Disk) कहा जाता है। यही वह “कच्चा माल” था जिससे ग्रहों का निर्माण होना था।
- संघनन और अभिवृद्धि (Condensation and Accretion):
- जैसे-जैसे तश्तरी ठंडी होने लगी, गैसें ठोस कणों के रूप में संघनित होने लगीं। धूल के छोटे-छोटे कण tĩnhविद्युत (static electricity) के कारण एक-दूसरे से चिपकने लगे, ठीक वैसे ही जैसे घर में धूल के कण मिलकर बड़े गुच्छे बना लेते हैं।
- ग्रहाणुओं का निर्माण (Formation of Planetesimals):
- लाखों वर्षों के दौरान, ये कण आपस में जुड़कर कंकड़, पत्थर और फिर किलोमीटर के आकार के बड़े पिंडों में बदल गए। इन्हीं प्रारंभिक पिंडों को ग्रहाणु (Planetesimals) कहा जाता है। ये ग्रह निर्माण की “ईंटों” की तरह थे।
- आद्य-ग्रहों का उदय (Rise of the Protoplanets):
- अब गुरुत्वाकर्षण की भूमिका प्रमुख हो गई। बड़े ग्रहाणु अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण से छोटे ग्रहाणुओं और अन्य मलबे को अपनी ओर खींचने लगे। यह एक हिंसक और टकरावों से भरा दौर था।
- धीरे-धीरे, चंद्रमा से लेकर मंगल के आकार तक के विशाल पिंड बनने लगे, जिन्हें आद्य-ग्रह (Protoplanets) कहा गया।
- ग्रहों का अंतिम स्वरूप:
- अंत में, प्रत्येक कक्षा में सबसे विशाल आद्य-ग्रह हावी हो गए। उन्होंने अपनी कक्षा के भीतर के लगभग सभी बचे हुए ग्रहाणुओं और मलबे को या तो अपने में समाहित कर लिया या अपनी कक्षा से बाहर फेंक दिया। इस प्रकार अरबों वर्षों की प्रक्रिया के बाद सौरमंडल के आठ ग्रहों का वर्तमान स्वरूप बना।
मुख्य अवधारणा: हिम रेखा (The Frost Line)
यह परिकल्पना यह भी स्पष्ट करती है कि आंतरिक ग्रह चट्टानी और बाह्य ग्रह गैसीय क्यों हैं। इसका कारण हिम रेखा (Frost Line) है:
- हिम रेखा के भीतर: यह सूर्य के निकट का गर्म क्षेत्र था। यहाँ केवल उच्च तापमान को सहन करने वाले पदार्थ जैसे चट्टान और धातु ही ठोस अवस्था में रह सकते थे। पानी, मीथेन, अमोनिया जैसी गैसें भाप बन गईं। चूँकि ठोस पदार्थ कम उपलब्ध था, इसलिए यहाँ छोटे और चट्टानी ग्रह (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल) बने।
- हिम रेखा के बाहर: यह सूर्य से दूर का ठंडा क्षेत्र था। यहाँ चट्टान और धातु के साथ-साथ पानी, मीथेन और अमोनिया की बर्फ भी ठोस रूप में मौजूद थी। ठोस पदार्थ की विशाल उपलब्धता के कारण यहाँ पृथ्वी से 5-10 गुना बड़े विशाल ठोस नाभिक (Cores) बने। इन विशाल नाभिकों का गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली हो गया कि उन्होंने आसपास की विशाल मात्रा में हाइड्रोजन और हीलियम गैस को अपनी ओर खींच लिया, जिससे बृहस्पति और शनि जैसे गैस दानवों और अरुण और वरुण जैसे बर्फ़ीले दानवों का निर्माण हुआ। [UPSC Mains]
यह पुरानी नेब्युलर परिकल्पना से बेहतर क्यों है?
| आधार | पुरानी नेब्युलर परिकल्पना (लाप्लास) | आधुनिक आद्य-ग्रह परिकल्पना |
| प्रक्रिया | गर्म नीहारिका से पहले से बने-बनाए छल्लों का अलग होना (Top-down)। | एक ठंडी तश्तरी में छोटे कणों का धीरे-धीरे जुड़कर ग्रह बनाना (Bottom-up)। |
| कोणीय संवेग | यह समझाने में विफल रही कि सूर्य में अधिकांश द्रव्यमान क्यों है और ग्रहों में अधिकांश कोणीय संवेग क्यों। | टकराव और गुरुत्वाकर्षण अंतःक्रिया के माध्यम से कोणीय संवेग के हस्तांतरण की व्याख्या करती है। |
| ग्रहों में भिन्नता | यह चट्टानी और गैसीय ग्रहों के बीच के अंतर को स्पष्ट नहीं कर सकी। | हिम रेखा (Frost Line) की अवधारणा से इस अंतर की सटीक और तार्किक व्याख्या करती है। |
| वैज्ञानिक आधार | यह मुख्य रूप से दार्शनिक और गणितीय थी। | यह आधुनिक खगोल-भौतिकी, कंप्यूटर सिमुलेशन और अन्य युवा तारों के चारों ओर आद्य-ग्रह तश्तरियों के वास्तविक अवलोकन द्वारा समर्थित है। [UPSC Prelims] |
हमारे सौरमंडल के अन्य सदस्य
सूर्य और आठ मुख्य ग्रहों के अलावा, हमारा सौरमंडल अरबों अन्य छोटे-बड़े खगोलीय पिंडों का घर है। ये सभी पिंड भी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बंधे हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं। सौरमंडल के ये अन्य सदस्य हमें इसके निर्माण और विकास की कहानी बताते हैं।
1. बौने ग्रह (Dwarf Planets)
2006 में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने “बौना ग्रह” नामक एक नई श्रेणी बनाई। ये ऐसे पिंड हैं जो ग्रह होने के दो मानदंड तो पूरे करते हैं (सूर्य की परिक्रमा और लगभग गोलाकार होना), लेकिन तीसरा मानदंड पूरा नहीं कर पाते—अर्थात्, इन्होंने अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र को अन्य छोटे पिंडों से साफ नहीं किया है।
| प्रमुख बौना ग्रह | स्थान | मुख्य तथ्य |
| प्लूटो (Pluto) | कुइपर बेल्ट | सबसे प्रसिद्ध बौना ग्रह, जिसे 2006 तक एक ग्रह माना जाता था। [CDS] |
| सेरेस (Ceres) | मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्ट | यह क्षुद्रग्रह बेल्ट में स्थित सबसे बड़ा पिंड है। |
| एरIS (Eris) | कुइपर बेल्ट से परे | द्रव्यमान में प्लूटो से भी बड़ा, इसकी खोज ने ही ग्रहों की परिभाषा बदलने पर मजबूर किया। |
| मेकमेक (Makemake) | कुइपर बेल्ट | प्लूटो के बाद कुइपर बेल्ट का दूसरा सबसे चमकीला पिंड। |
| हउमेया (Haumea) | कुइपर बेल्ट | अपने तेज घूर्णन के कारण इसका आकार अंडे जैसा चपटा है। |
2. क्षुद्रग्रह (Asteroids)
क्षुद्रग्रह चट्टानी और धात्विक पिंड हैं जिन्हें “लघु ग्रह” (Minor Planets) भी कहा जाता है। ये सौरमंडल के निर्माण के समय बचे हुए अवशेष हैं जो किसी ग्रह का हिस्सा नहीं बन पाए।
- मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्ट (Main Asteroid Belt): अधिकांश क्षुद्रग्रह मंगल और बृहस्पति ग्रह की कक्षाओं के बीच स्थित एक विशाल पट्टी में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। [UPSC Prelims, SSC] ऐसा माना जाता है कि बृहस्पति के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण ने इस क्षेत्र में किसी ग्रह को बनने से रोक दिया।
3. धूमकेतु (Comets)
धूमकेतुओं को अक्सर “गंदी बर्फीली गेंदें” (Dirty Snowballs) कहा जाता है। ये मुख्य रूप से धूल, चट्टान और जमी हुई गैसों (बर्फ, मीथेन, अमोनिया) से बने होते हैं।
- पूंछ का निर्माण: जब एक धूमकेतु अपनी कक्षा में घूमते हुए सूर्य के पास आता है, तो सूर्य की गर्मी से इसकी बर्फ पिघलकर गैस और धूल में बदल जाती है। सौर पवन इस गैस और धूल को बाहर की ओर धकेलती है, जिससे एक चमकदार पूंछ (Tail) का निर्माण होता है।
- पूंछ की दिशा: धूमकेतु की पूंछ हमेशा सूर्य से विपरीत दिशा में होती है, चाहे वह सूर्य की ओर आ रहा हो या उससे दूर जा रहा हो। [UPPSC]
- स्रोत:
- कुइपर बेल्ट (Kuiper Belt): छोटे-आवधिक (Short-period) धूमकेतुओं का स्रोत।
- ऊर्ट बादल (Oort Cloud): लंबे-आवधिक (Long-period) धूमकेतुओं का स्रोत।
- प्रसिद्ध धूमकेतु: हैली का धूमकेतु (Halley’s Comet) हर 76 वर्षों में पृथ्वी से दिखाई देता है। [State PSC]
4. उल्कापिंड, उल्का, और उल्कापिंड (Meteoroid, Meteor, Meteorite)
ये तीनों शब्द अक्सर भ्रमित करते हैं, लेकिन ये एक ही घटना के तीन अलग-अलग चरण हैं।
| शब्द | परिभाषा और विवरण |
| उल्कापिंड (Meteoroid) | अंतरिक्ष में मौजूद एक छोटा चट्टानी या धात्विक पिंड। यह किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु का टूटा हुआ टुकड़ा हो सकता है। |
| उल्का (Meteor) | जब उल्कापिंड पृथ्वी के वायुमंडल में तेज गति से प्रवेश करता है, तो हवा के घर्षण से जलने लगता है और आकाश में प्रकाश की एक चमकदार धारी बनाता है। इसी घटना को उल्का या “टूटता तारा” (Shooting Star) कहते हैं। |
| उल्कापिंड (Meteorite) | यदि उल्कापिंड का कोई टुकड़ा वायुमंडल में पूरी तरह से जलने से बच जाता है और पृथ्वी की सतह पर आ गिरता है, तो उस बचे हुए पिंड को उल्कापिंड (Meteorite) कहा जाता है। |
5. कुइपर बेल्ट और ऊर्ट बादल (Kuiper Belt and Oort Cloud)
ये सौरमंडल के सबसे बाहरी और ठंडे क्षेत्र हैं जहाँ अरबों की संख्या में बर्फीले पिंड मौजूद हैं।
- कुइपर बेल्ट (Kuiper Belt): यह नेप्च्यून ग्रह की कक्षा के ठीक परे स्थित एक विशाल बर्फीली पट्टी है। यह प्लूटो जैसे बौने ग्रहों और कई छोटे-आवधिक धूमकेतुओं का घर है।
- ऊर्ट बादल (Oort Cloud): यह एक विशाल, गोलाकार क्षेत्र है जो पूरे सौरमंडल को एक खोल की तरह घेरे हुए है। यह कुइपर बेल्ट से भी बहुत दूर स्थित है और माना जाता है कि यहीं से लंबे-आवधिक धूमकेतु आते हैं।
सौरमंडल की उत्पत्ति और विकास
हमारे सौरमंडल का जन्म किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि अरबों वर्षों तक चली एक लंबी और जटिल प्रक्रिया का फल है। इसकी कहानी लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले शुरू हुई और आज भी जारी है। सौरमंडल की उत्पत्ति और विकास की व्याख्या करने वाला सबसे स्वीकृत वैज्ञानिक सिद्धांत “सौर नीहारिका परिकल्पना” (Solar Nebula Hypothesis) का आधुनिक रूप है, जिसे आद्य-ग्रह परिकल्पना (Protoplanet Hypothesis) भी कहा जाता है।
चरण 1: उत्पत्ति – सौर नीहारिका का पतन
(लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व)
- प्रारंभिक अवस्था: शुरुआत में, हमारा सौरमंडल अस्तित्व में नहीं था। इसकी जगह पर अंतरिक्ष में गैस (मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम) और धूल के कणों का एक विशाल, ठंडा और घूमता हुआ बादल मौजूद था, जिसे सौर नीहारिका (Solar Nebula) कहा जाता है।
- गुरुत्वाकर्षण पतन: किसी पास के तारे में हुए विस्फोट (सुपरनोवा) से उत्पन्न शॉक वेव या किसी अन्य खगोलीय घटना के कारण इस बादल में अस्थिरता उत्पन्न हुई। इस अस्थिरता ने गुरुत्वाकर्षण पतन (Gravitational Collapse) की प्रक्रिया शुरू कर दी, जिससे बादल अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण तेजी से सिकुड़ने लगा।
चरण 2: सूर्य का निर्माण – एक तारे का जन्म
- आद्य-सूर्य का निर्माण: जैसे-जैसे नीहारिका सिकुड़ती गई, कोणीय संवेग संरक्षण के नियम के कारण उसके घूमने की गति तेज होती गई और वह एक चपटी तश्तरी का रूप लेने लगी। अधिकांश गैस और धूल का जमावड़ा तश्तरी के केंद्र में होने लगा, जिससे यह क्षेत्र अत्यधिक गर्म और घना हो गया। इसी घने और गर्म केंद्र को आद्य-सूर्य (Proto-sun) कहा गया।
- नाभिकीय संलयन की शुरुआत: जब केंद्र का तापमान और दबाव लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, तो नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया शुरू हो गई। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन के परमाणु मिलकर हीलियम बनाने लगे, जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न हुई। इसी ऊर्जा के उत्सर्जन के साथ हमारे सूर्य का एक स्थिर तारे के रूप में जन्म हुआ।
चरण 3: ग्रहों का निर्माण – आद्य-ग्रह परिकल्पना
(सूर्य के जन्म के बाद)
सूर्य के निर्माण के बाद बची हुई गैस और धूल की विशाल, घूमती हुई तश्तरी को आद्य-ग्रह तश्तरी (Protoplanetary Disk) कहा जाता है। इसी तश्तरी से ग्रहों का निर्माण हुआ।
- अभिवृद्धि (Accretion): तश्तरी में मौजूद धूल के छोटे-छोटे कण tĩnhविद्युत बल के कारण आपस में चिपकने लगे, जिससे धीरे-धीरे बड़े गुच्छे बने।
- ग्रहाणुओं (Planetesimals) का निर्माण: जब ये गुच्छे लगभग एक किलोमीटर के आकार के हो गए, तो उनका अपना गुरुत्वाकर्षण प्रभावी हो गया। इन प्रारंभिक पिंडों को ग्रहाणु (Planetesimals) कहा गया, जो ग्रह निर्माण की “ईंटें” थीं।
- आद्य-ग्रहों (Protoplanets) का निर्माण: ये ग्रहाणु आपस में टकराते और जुड़ते रहे, जिससे चंद्रमा से लेकर मंगल के आकार तक के विशाल पिंडों का निर्माण हुआ। इन्हें आद्य-ग्रह (Protoplanets) कहा गया।
चरण 4: सौरमंडल का विकास और व्यवस्थापन
(पहले कुछ करोड़ वर्षों के दौरान)
- हिम रेखा (Frost Line): सौरमंडल के विकास में “हिम रेखा” की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सूर्य से वह दूरी है जिसके परे तापमान इतना कम हो जाता है कि पानी, मीथेन और अमोनिया जैसे यौगिक बर्फ के रूप में जम सकते हैं। [UPSC Mains]
- आंतरिक सौरमंडल (हिम रेखा के भीतर): सूर्य के निकट यह क्षेत्र बहुत गर्म था। यहाँ केवल चट्टानें और धातु ही ठोस अवस्था में रह सके। चूंकि ठोस पदार्थ कम था, इसलिए यहाँ बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल जैसे छोटे और चट्टानी ग्रहों का निर्माण हुआ।
- बाह्य सौरमंडल (हिम रेखा के बाहर): सूर्य से दूर इस ठंडे क्षेत्र में चट्टान और धातु के साथ-साथ बर्फ भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी। अधिक ठोस पदार्थ होने के कारण यहाँ विशाल नाभिक (Cores) बने, जिनके शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण ने भारी मात्रा में हाइड्रोजन और हीलियम गैस को अपनी ओर खींच लिया। इसी से बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण जैसे विशाल गैसीय और बर्फीले ग्रहों का निर्माण हुआ।
- महाबमबारी का दौर (Late Heavy Bombardment): निर्माण के शुरुआती दौर में, विशाल ग्रहों (विशेषकर बृहस्पति और शनि) ने अपनी कक्षाओं को थोड़ा बदला। इस बदलाव ने क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं की कक्षाओं में भारी उथल-पुथल मचा दी, जिससे करोड़ों की संख्या में ये पिंड आंतरिक ग्रहों से टकराए। चंद्रमा और बुध की सतह पर मौजूद अनगिनत गड्ढे (क्रेटर्स) इसी दौर के प्रमाण हैं।
चरण 5: आज का सौरमंडल
अरबों वर्षों के इस विकास के बाद, सौरमंडल एक अपेक्षाकृत स्थिर अवस्था में पहुँच गया है, जिसकी संरचना इस प्रकार है:
| घटक | विवरण |
| सूर्य | केंद्र में स्थित तारा, जो पूरे निकाय को ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण प्रदान करता है। |
| आंतरिक ग्रह | बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल – छोटे, घने और चट्टानी। |
| क्षुद्रग्रह बेल्ट | मंगल और बृहस्पति के बीच चट्टानी पिंडों की एक पट्टी; एक विफल ग्रह के अवशेष। [SSC CGL] |
| बाह्य ग्रह | बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण – विशाल, कम घनत्व वाले गैसीय और बर्फीले ग्रह। |
| कुइपर बेल्ट | नेप्च्यून से परे बर्फीले पिंडों की एक विशाल पट्टी, जिसमें प्लूटो जैसे बौने ग्रह और धूमकेतु शामिल हैं। |
| ऊर्ट बादल | सौरमंडल को घेरे हुए बर्फीले पिंडों का एक विशाल गोलाकार खोल, जो लंबे-आवधिक धूमकेतुओं का स्रोत माना जाता है। |
पृथ्वी का भूवैज्ञानिक विकास
पृथ्वी का जन्म एक गर्म, निर्जन और चट्टानी गोले के रूप में हुआ था और आज यह जीवन से भरपूर एक जटिल और गतिशील ग्रह है। इसका 4.6 अरब वर्षों का इतिहास ज्वालामुखियों, महाद्वीपों के निर्माण, महासागरों के जन्म, वायुमंडल में परिवर्तन और जीवन के उद्भव जैसी क्रांतिकारी घटनाओं से भरा है। पृथ्वी का भूवैज्ञानिक विकास एक सतत प्रक्रिया है, जिसे कई महाकल्पों (Eons) और कल्पों (Eras) में बांटा गया है।
चरण 1: निर्माण और विभेदन (Formation and Differentiation)
(लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व)
- अभिवृद्धि (Accretion): पृथ्वी का निर्माण सूर्य के चारों ओर घूम रही आद्य-ग्रह तश्तरी (Protoplanetary Disk) में मौजूद धूल, चट्टानों और ग्रहाणुओं (Planetesimals) के आपस में टकराकर और जुड़कर हुआ।
- तप्त और पिघली हुई अवस्था: प्रारंभिक टकरावों से उत्पन्न अत्यधिक गर्मी और रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय के कारण, प्रारंभिक पृथ्वी पूरी तरह से पिघली हुई अवस्था में थी।
- विभेदन (Differentiation): इस पिघली हुई अवस्था में, भारी तत्व (जैसे लोहा और निकल) गुरुत्वाकर्षण के कारण केंद्र की ओर डूब गए, जिससे पृथ्वी के क्रोड (Core) का निर्माण हुआ। वहीं, हल्के सिलिकेट खनिज ऊपर की ओर आ गए, जिससे मैंटल (Mantle) और प्रारंभिक भूपर्पटी (Crust) का निर्माण हुआ। इसी प्रक्रिया ने पृथ्वी की परतदार संरचना की नींव रखी।
चरण 2: हेडियन महाकल्प – प्रारंभिक ‘नारकीय’ पृथ्वी
(Hadean Eon, ~4.6 से 4 अरब वर्ष पूर्व)
यह पृथ्वी के इतिहास का सबसे प्रारंभिक काल था, जिसका नाम ग्रीक देवता ‘हेडीस’ (नर्क) के नाम पर रखा गया है, क्योंकि इस समय पृथ्वी की परिस्थितियाँ अत्यंत कठोर थीं।
- चंद्रमा का निर्माण: इसी काल में, माना जाता है कि “थिया” (Theia) नामक मंगल के आकार का एक विशाल पिंड पृथ्वी से टकराया। इस महा-टक्कर (Giant-Impact) से निकले मलबे ने ही बाद में संगठित होकर हमारे चंद्रमा का निर्माण किया। [CDS, NDA]
- महाबमबारी का दौर (Late Heavy Bombardment): इस दौरान, पृथ्वी और आंतरिक सौरमंडल पर क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं की भारी बमबारी हुई।
- कोई स्थायी स्थलमंडल नहीं: सतह पर लगातार ज्वालामुखी फट रहे थे और लावा बह रहा था, जिससे किसी स्थायी भूपर्पटी का निर्माण संभव नहीं था।
चरण 3: स्थलमंडल, वायुमंडल और जलमंडल का निर्माण
- प्रथम स्थलमंडल (Lithosphere):
- जैसे-जैसे पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी होने लगी, इसकी पिघली हुई सतह पर एक पतली और अस्थायी भूपर्पटी जमने लगी। यह आज की महाद्वीपीय भूपर्पटी से बहुत अलग थी और बेसाल्टिक चट्टानों से बनी थी।
- द्वितीयक वायुमंडल (Secondary Atmosphere):
- प्रारंभिक पृथ्वी का वायुमंडल नहीं था। आज हम जो वायुमंडल देखते हैं, उसका निर्माण मुख्य रूप से ज्वालामुखीय गैस उत्सर्जन (Volcanic Outgassing) से हुआ। ज्वालामुखियों से भारी मात्रा में जल वाष्प (H₂O), कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), नाइट्रोजन (N₂) और मीथेन (CH₄) जैसी गैसें निकलीं।
- महत्वपूर्ण: इस प्रारंभिक वायुमंडल में स्वतंत्र ऑक्सीजन (Oxygen) न के बराबर थी। [UPSC Prelims]
- महासागरों का निर्माण (Formation of Oceans):
- जब पृथ्वी का तापमान 100°C से नीचे गिर गया, तो वायुमंडल में मौजूद विशाल मात्रा में जल वाष्प संघनित होकर तरल पानी में बदल गई।
- इसके बाद लाखों वर्षों तक लगातार मूसलाधार बारिश हुई, जिससे पृथ्वी के निचले हिस्से भर गए और विशाल महासागरों का निर्माण हुआ। धूमकेतुओं द्वारा लाई गई बर्फ ने भी इस प्रक्रिया में योगदान दिया।
चरण 4: महाद्वीपों का निर्माण और प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics)
- महाद्वीपीय भूपर्पटी का निर्माण: ज्वालामुखीय गतिविधि और भूपर्पटी के पुनर्चक्रण (recycling) के माध्यम से, हल्के ग्रेनाइटिक चट्टानों का निर्माण शुरू हुआ। यही चट्टानें महाद्वीपों का आधार बनीं।
- प्लेट विवर्तनिकी की शुरुआत: पृथ्वी की बाहरी ठोस परत (स्थलमंडल) कई विशाल टुकड़ों में टूट गई, जिन्हें टेक्टोनिक प्लेट्स (Tectonic Plates) कहा जाता है। ये प्लेट्स गर्म और अर्ध-तरल मैंटल के ऊपर तैरती हैं और लगातार गति करती हैं।
- महाद्वीपों का संचलन: इसी प्लेट विवर्तनिकी के कारण महाद्वीपों ने अपनी स्थिति बदलना शुरू किया, जिससे पहाड़ बने, घाटियाँ बनीं और ज्वालामुखी फटे।
- महामहाद्वीप (Supercontinents): पृथ्वी के इतिहास में कई बार लगभग सभी महाद्वीप मिलकर एक विशाल भू-भाग बने, जिसे महामहाद्वीप (Supercontinent) कहते हैं। पैंजिया (Pangaea) सबसे प्रसिद्ध हालिया महामहाद्वीप था। [SSC, Railway]
चरण 5: जीवन का प्रभाव और वायुमंडल का महान परिवर्तन
- जीवन का उद्भव: लगभग 3.8 अरब वर्ष पहले महासागरों में पहले सरल एक-कोशिकीय जीवन का विकास हुआ।
- ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट (Great Oxidation Event): लगभग 2.4 अरब वर्ष पहले, सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria) जैसे सूक्ष्मजीवों ने प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) करना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया के उप-उत्पाद के रूप में उन्होंने वायुमंडल में बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ना शुरू कर दिया।
- भूवैज्ञानिक प्रभाव:
- इस ऑक्सीजन ने महासागरों में घुले हुए लोहे के साथ प्रतिक्रिया की और समुद्र तल पर विशाल बैंडेड आयरन फॉर्मेशन (Banded Iron Formations) का निर्माण किया, जो आज दुनिया के लौह अयस्क का मुख्य स्रोत हैं।
- वायुमंडल में ऑक्सीजन की उपस्थिति ने जीवन के विकास को हमेशा के लिए बदल दिया और ओजोन परत (Ozone Layer) का निर्माण किया, जिसने पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाया और जीवन को जमीन पर आने का अवसर दिया।
भूवैज्ञानिक समय-सारणी का सारांश
| महाकल्प (Eon) | समय | प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाएँ |
| हेडियन | ~4.6 से 4 अरब वर्ष पूर्व | पृथ्वी का निर्माण, विभेदन, चंद्रमा का निर्माण, महाबमबारी। |
| आर्कियन | 4 से 2.5 अरब वर्ष पूर्व | प्रथम महाद्वीपीय भूपर्पटी का निर्माण, महासागरों का बनना, प्रारंभिक जीवन का उदय। |
| प्रोटरोज़ोइक | 2.5 अरब से 54 करोड़ वर्ष पूर्व | ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट, महामहाद्वीपों का बनना और टूटना (रोडिनिया)। |
| फ़ैनरोज़ोइक | 54 करोड़ वर्ष पूर्व से आज तक | जटिल जीवन का विस्फोट, पैंजिया का निर्माण और विखंडन, वर्तमान महाद्वीपों का स्वरूप। |
आज भी, प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखी और कटाव जैसी ताकतें पृथ्वी को लगातार बदल रही हैं, यह साबित करते हुए कि पृथ्वी का भूवैज्ञानिक विकास एक निरंतर जारी रहने वाली कहानी है।
भूवैज्ञानिक समय-सारणी की संरचना
इस सारणी का एक पदानुक्रमित (hierarchical) ढाँचा है, जिसे समय की सबसे बड़ी अवधि से लेकर सबसे छोटी अवधि तक विभाजित किया गया है:
- महाकल्प (Eon): सबसे बड़ी समय इकाई, जो अरबों वर्षों तक फैली होती है।
- महायुग (Era): महाकल्प को महायुगों में बांटा जाता है, जो जीवन के विकास में प्रमुख परिवर्तनों को दर्शाते हैं।
- कल्प (Period): महायुगों को कल्पों में बांटा जाता है, जो महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक घटनाओं (जैसे बड़े पैमाने पर विलुप्ति या नए प्रकार के जीवन के उदय) द्वारा चिह्नित होते हैं।
- युग (Epoch): कल्पों को और भी छोटी समय-अवधि, यानी युगों में बांटा जाता है।
भूवैज्ञानिक ग्रिड/सारणी (Geological Grid/Time Scale)
यहाँ पृथ्वी के इतिहास की एक सरलीकृत लेकिन विस्तृत सारणी प्रस्तुत है:
| महाकल्प (Eon) | महायुग (Era) | कल्प (Period) | समय-अवधि (लगभग) | प्रमुख भूवैज्ञानिक और जैविक घटनाएँ |
| फ़ैनरोज़ोइक <br/> (Phanerozoic) <br/> “दृश्य जीवन” | नूतनजीवी <br/> (Cenozoic) <br/> “नवीन जीवन”<br/> (स्तनधारियों का युग) | चतुर्थ (Quaternary) | 26 लाख वर्ष पूर्व से आज तक | मानव का उदय (Age of Humans), बार-बार हिमयुग का आना-जाना। |
| नियोजीन (Neogene) | 2.3 करोड़ से 26 लाख वर्ष पूर्व | प्रारंभिक होमिनिड्स (हमारे पूर्वजों) का विकास। | ||
| पैलियोजीन (Paleogene) | 6.6 करोड़ से 2.3 करोड़ वर्ष पूर्व | डायनासोरों की विलुप्ति के बाद स्तनधारियों का विकास और प्रभुत्व। | ||
| मध्यजीवी <br/> (Mesozoic) <br/> “मध्य जीवन”<br/> (सरीसृपों/डायनासोर का युग) | क्रेटेशियस (Cretaceous) | 14.5 करोड़ से 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व | पुष्पीय पौधों का उदय, डायनासोर अपने चरम पर, क्षुद्रग्रह के प्रभाव से डायनासोरों की विलुप्ति। | |
| जुरैसिक (Jurassic) | 20.1 करोड़ से 14.5 करोड़ वर्ष पूर्व | विशाल डायनासोरों का प्रभुत्व, प्रथम पक्षियों का विकास, पैंजिया का विखंडन। | ||
| ट्रायसिक (Triassic) | 25.2 करोड़ से 20.1 करोड़ वर्ष पूर्व | प्रथम डायनासोर और प्रथम स्तनधारियों का उदय। | ||
| पुराजीवी <br/> (Paleozoic) <br/> “प्राचीन जीवन” | पर्मियन (Permian) | 29.9 करोड़ से 25.2 करोड़ वर्ष पूर्व | महामहाद्वीप पैंजिया का निर्माण, पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी विलुप्ति घटना (“The Great Dying”)। | |
| कार्बोनिफेरस (Carboniferous) | 35.9 करोड़ से 29.9 करोड़ वर्ष पूर्व | विशाल दलदली वनों का निर्माण (जो आज के कोयले का स्रोत हैं), प्रथम सरीसृपों का उदय। | ||
| डेवोनियन (Devonian) | 41.9 करोड़ से 35.9 करोड़ वर्ष पूर्व | “मछलियों का युग”, प्रथम उभयचरों का जमीन पर आना, प्रथम वनों का विकास। | ||
| सिल्यूरियन (Silurian) | 44.4 करोड़ से 41.9 करोड़ वर्ष पूर्व | जीवन का जमीन पर पहला कदम (पौधे, कीड़े-मकौड़े)। | ||
| ऑर्डोविशियन (Ordovician) | 48.5 करोड़ से 44.4 करोड़ वर्ष पूर्व | प्रथम कशेरुकी (Vertebrates) यानी बिना जबड़े वाली मछलियों का विकास। | ||
| कैम्ब्रियन (Cambrian) | 54.1 करोड़ से 48.5 करोड़ वर्ष पूर्व | “कैम्ब्रियन विस्फोट”: अचानक से लगभग सभी प्रमुख प्राणी संघों का विकास, कठोर खोल वाले जीवों का उदय। | ||
| प्रोटरोज़ोइक<br/>(Proterozoic) | 2.5 अरब से 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व | ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट: वायुमंडल में ऑक्सीजन का निर्माण, प्रथम यूकेरियोटिक (जटिल) कोशिकाओं का उदय। | ||
| आर्कियन<br/>(Archean) | 4 अरब से 2.5 अरब वर्ष पूर्व | प्रथम महाद्वीपों का निर्माण, प्रथम जीवन का उदय (सरल एक-कोशिकीय बैक्टीरिया)। | ||
| हेडियन<br/>(Hadean) | 4.6 अरब से 4 अरब वर्ष पूर्व | पृथ्वी का निर्माण, पिघली हुई सतह, चंद्रमा का निर्माण, महासागरों का बनना शुरू। |
यह सारणी कैसे बनाई गई?
वैज्ञानिकों ने इस समय-सारणी को दो मुख्य तरीकों का उपयोग करके बनाया है:
- सापेक्ष काल निर्धारण (Relative Dating): चट्टानों की परतों (Stratigraphy) का अध्ययन करके। सबसे पुराना नियम यह है कि निचली परतें ऊपरी परतों से अधिक पुरानी होती हैं। जीवाश्मों का उपयोग दुनिया भर में विभिन्न स्थानों की चट्टानों की परतों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए किया जाता है।
- निरपेक्ष काल निर्धारण (Absolute Dating): रेडियोमेट्रिक डेटिंग जैसी तकनीकों का उपयोग करके। इसमें चट्टानों में मौजूद रेडियोधर्मी समस्थानिकों (जैसे यूरेनियम, पोटेशियम) के क्षय की दर को मापा जाता है, जिससे चट्टान की आयु का सटीक पता वर्षों में लगाया जा सकता है।
यह ग्रिड या सारणी स्थिर नहीं है; नई खोजों के साथ इसमें लगातार सुधार और परिशोधन होता रहता है।
अक्षांश रेखाएँ (Lines of Latitude)
अक्षांश, पृथ्वी पर किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति को उत्तर-दक्षिण दिशा में बताने के लिए उपयोग होने वाला एक कोणीय माप है। ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गईं काल्पनिक क्षैतिज रेखाओं को अक्षांश रेखाएँ कहा जाता है। ये रेखाएँ पृथ्वी की सतह पर किसी भी बिंदु की भूमध्य रेखा (Equator) से उत्तर या दक्षिण की कोणीय दूरी को दर्शाती हैं।
अक्षांश रेखाओं की मुख्य विशेषताएँ
- समानांतर: ये सभी रेखाएँ एक-दूसरे के समानांतर होती हैं, इसलिए ये कभी भी आपस में नहीं मिलती हैं।
- पूर्ण वृत्त: ध्रुवों (Poles) को छोड़कर सभी अक्षांश रेखाएँ पूर्ण वृत्त होती हैं।
- लंबाई: भूमध्य रेखा सबसे लंबी अक्षांश रेखा है। जैसे-जैसे हम ध्रुवों की ओर जाते हैं, इन वृत्तों का आकार छोटा होता जाता है।
- दिशा: ये रेखाएँ ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची जाती हैं।
- दूरी: 1 डिग्री अक्षांश के बीच की दूरी लगभग 111 किलोमीटर होती है।
मापन (Measurement)
- अक्षांश को डिग्री (°), मिनट (‘) और सेकंड (“) में मापा जाता है।
- भूमध्य रेखा (Equator) को 0° अक्षांश माना जाता है। यह पृथ्वी को दो बराबर भागों में बांटती है:
- उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere): 0° से 90° उत्तर (N) तक।
- दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere): 0° से 90° दक्षिण (S) तक।
- ध्रुव (Poles): उत्तरी ध्रुव 90° N और दक्षिणी ध्रुव 90° S पर स्थित बिंदु हैं।
प्रमुख अक्षांश रेखाएँ और उनका महत्व
पृथ्वी पर कुछ अक्षांश रेखाएँ जलवायु और मौसम की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये सूर्य की किरणों के कोण और दिन-रात की अवधि को निर्धारित करती हैं।
भूमध्य रेखा (Equator): परीक्षा की दृष्टि से
भूमध्य रेखा, ग्लोब पर मौजूद सबसे महत्वपूर्ण काल्पनिक रेखा है और प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। यह भूगोल, जलवायु विज्ञान और भौतिकी की कई मौलिक अवधारणाओं का आधार है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| अक्षांश मान | 0° (शून्य डिग्री) |
| लंबाई | लगभग 40,075 किलोमीटर |
| मुख्य कार्य | पृथ्वी को उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) और दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) में विभाजित करती है। |
| दर्जा | यह एक बृहत् वृत्त (Great Circle) और सबसे लंबी अक्षांश रेखा है। |
| दिन-रात की अवधि | वर्ष भर दिन और रात की अवधि लगभग 12-12 घंटे की होती है। |
| जलवायु कटिबंध | यह उष्ण कटिबंध (Torrid Zone) के ठीक बीच में स्थित है। |
भौगोलिक और वैज्ञानिक महत्व (Geographical and Scientific Significance)
1. जलवायु का निर्धारण
- कारण: भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें वर्ष भर लगभग सीधी (लंबवत) पड़ती हैं।
- प्रभाव: सीधी किरणें कम वायुमंडल से होकर गुजरती हैं और एक छोटे क्षेत्र पर केंद्रित होती हैं, जिससे यह पृथ्वी का सबसे गर्म क्षेत्र बन जाता है। यहाँ उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (Tropical Rainforests) वाला गर्म और आर्द्र विषुवतीय जलवायु (Equatorial Climate) पाया जाता है। [UPSC Prelims, State PSC]
2. दिन और रात की समान अवधि
- पृथ्वी के अपने अक्ष पर झुके होने के बावजूद, भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें वर्ष भर लगभग एक समान कोण पर पड़ती हैं। इसी कारण यहाँ दिन और रात की लंबाई में बहुत कम अंतर होता है और वे लगभग 12-12 घंटे के होते हैं।
3. विषुव (Equinox)
- वर्ष में दो दिन, 21 मार्च और 23 सितंबर को सूर्य ठीक भूमध्य रेखा के ऊपर लंबवत चमकता है।
- इन दो तिथियों को विषुव (Equinox) कहा जाता है। इस दिन पूरी पृथ्वी पर दिन और रात की अवधि बराबर होती है। [SSC, CDS]
4. पृथ्वी की घूर्णन गति और गुरुत्वाकर्षण
- पृथ्वी की घूर्णन गति (Rotational Speed) भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक होती है (लगभग 1,670 किमी/घंटा)।
- इस तेज गति के कारण उत्पन्न अपकेंद्री बल (Centrifugal Force), गुरुत्वाकर्षण बल का थोड़ा विरोध करता है, जिसके परिणामस्वरूप भूमध्य रेखा पर गुरुत्वाकर्षण का मान ध्रुवों की तुलना में थोड़ा कम होता है।
5. अंतरिक्ष प्रक्षेपण के लिए आदर्श स्थान
- पृथ्वी की सर्वाधिक घूर्णन गति का लाभ उठाने के लिए अधिकांश अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र (Space Launch Centers) भूमध्य रेखा के निकट बनाए जाते हैं।
- यहाँ से रॉकेट लॉन्च करने पर पृथ्वी की घूर्णन गति से एक प्राकृतिक “धक्का” (boost) मिलता है, जिससे ईंधन की बचत होती है। उदाहरण: फ्रेंच गुयाना का कौरू प्रक्षेपण केंद्र। [UPSC Prelims]
6. कोरिओलिस बल (Coriolis Effect)
- कोरिओलिस बल पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न होता है और उत्तरी गोलार्ध में हवाओं और धाराओं को दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मोड़ता है।
- भूमध्य रेखा पर कोरिओलिस बल का मान शून्य होता है। इसी कारण यहाँ चक्रवाती तूफानों का निर्माण नहीं होता है। [CDS, NDA]
भूमध्य रेखा पर स्थित प्रमुख देश, महाद्वीप और जल निकाय
यह परीक्षाओं में सबसे अधिक पूछे जाने वाले खंडों में से एक है।
| महाद्वीप | भूमध्य रेखा पर स्थित देश |
| दक्षिण अमेरिका | इक्वाडोर, कोलंबिया, ब्राजील |
| अफ्रीका | साओ टोमे और प्रिंसिपे, गैबॉन, कांगो गणराज्य, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, युगांडा, केन्या, सोमालिया |
| एशिया | मालदीव, इंडोनेशिया, किरिबाती |
| जल निकाय | अटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर, हिंद महासागर |
महत्वपूर्ण नोट: भूमध्य रेखा भारत से होकर नहीं गुजरती है। कर्क रेखा (23.5° N) भारत के मध्य से होकर गुजरती है।
परीक्षा हेतु विशेष तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| नदी जो दो बार काटती है | अफ्रीका की कांगो नदी (Zaire River) भूमध्य रेखा को दो बार काटती है। [SSC, State PSC] |
| उच्चतम बिंदु | भूमध्य रेखा पर स्थित सबसे ऊंचा बिंदु इक्वाडोर में वोल्कैन कैयाम्बे (Volcán Cayambe) ज्वालामुखी की चोटी है। |
| शहर | इक्वाडोर की राजधानी क्विटो (Quito), भूमध्य रेखा के सबसे निकट स्थित राजधानी शहर है। |
कर्क रेखा (Tropic of Cancer): परीक्षा की दृष्टि से
कर्क रेखा (23.5° N) एक महत्वपूर्ण अक्षांश रेखा है जो भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित है। भूगोल, जलवायु और विशेष रूप से भारत के संदर्भ में इसका अत्यधिक महत्व है, जिस कारण यह प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| अक्षांश मान | 23.5° उत्तरी अक्षांश (23° 26′ N) |
| अन्य नाम | उत्तरी अयनांत रेखा |
| गोलार्ध | उत्तरी गोलार्ध |
| महत्व | उष्ण कटिबंध (Torrid Zone) की उत्तरी सीमा निर्धारित करती है। |
| संबंधित घटना | ग्रीष्म अयनांत / कर्क संक्रांति (Summer Solstice) |
भौगोलिक और जलवायु संबंधी महत्व
1. सूर्य की स्थिति और ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice)
- परिभाषा: कर्क रेखा उत्तरी गोलार्ध में वह अंतिम या अधिकतम सीमा है, जहाँ तक सूर्य की किरणें दोपहर के समय सीधी (लंबवत) चमक सकती हैं। [UPPSC, State PSC]
- कर्क संक्रांति (21 जून): वर्ष में एक दिन, लगभग 21 जून को, सूर्य ठीक कर्क रेखा के ऊपर लंबवत होता है।
- इस दिन उत्तरी गोलार्ध में सबसे लंबा दिन और सबसे छोटी रात होती है।
- इसी दिन से उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्म ऋतु की आधिकारिक शुरुआत मानी जाती है। [SSC CGL, RRB NTPC]
2. उष्ण कटिबंध की उत्तरी सीमा
- कर्क रेखा, मकर रेखा (23.5° S) के साथ मिलकर उष्ण कटिबंध (Torrid Zone) का निर्धारण करती है। यह पृथ्वी का सबसे गर्म क्षेत्र है।
- कर्क रेखा के उत्तर में स्थित किसी भी स्थान पर सूर्य कभी भी सीधा सिर के ऊपर नहीं आता है।
3. दाब पेटियों का खिसकाव और भारतीय मानसून
- सूर्य के उत्तरायण (उत्तर की ओर गति) के साथ, वायुदाब पेटियाँ भी उत्तर की ओर खिसकती हैं।
- ग्रीष्मकाल में, ITCZ (Inter-Tropical Convergence Zone) उत्तर की ओर खिसककर भारतीय उपमहाद्वीप पर आ जाता है, जो भारतीय मानसून को आकर्षित करने और उसकी उत्पत्ति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। [UPSC Prelims]
कर्क रेखा और भारत (Tropic of Cancer and India)
यह परीक्षाओं का सबसे पसंदीदा खंड है।
- स्थिति: कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य से होकर गुजरती है, जो देश को मोटे तौर पर दो जलवायु क्षेत्रों में विभाजित करती है: दक्षिण में उष्णकटिबंधीय और उत्तर में उपोष्णकटिबंधीय।
- 8 राज्यों से गुजरती है: कर्क रेखा भारत के 8 राज्यों से होकर गुजरती है। पश्चिम से पूर्व की ओर इनका क्रम याद रखना महत्वपूर्ण है:
- गुजरात (Gujarat)
- राजस्थान (Rajasthan)
- मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh)
- छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh)
- झारखंड (Jharkhand)
- पश्चिम बंगाल (West Bengal)
- त्रिपुरा (Tripura)
- मिजोरम (Mizoram)
[BPSC, UPPCS, SSC – अनेक बार पूछा गया प्रश्न]
कर्क रेखा पर स्थित प्रमुख देश (विश्व के संदर्भ में)
| महाद्वीप | प्रमुख देश |
| उत्तरी अमेरिका | मेक्सिको, बहामास |
| अफ्रीका | मिस्र, लीबिया, नाइजर, अल्जीरिया, माली, पश्चिमी सहारा, मॉरिटानिया |
| एशिया | ताइवान, चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भारत, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब |
परीक्षा हेतु विशेष तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| नदी जो दो बार काटती है | भारत की माही नदी (Mahi River) कर्क रेखा को दो बार काटती है। यह मध्य प्रदेश से निकलकर राजस्थान से गुजरती हुई गुजरात में प्रवेश करती है। [State PSC, SSC CGL] |
| निकटतम राजधानी शहर | झारखंड की राजधानी रांची (Ranchi) और गुजरात की राजधानी गांधीनगर (Gandhinagar) कर्क रेखा के बहुत निकट स्थित हैं। |
| लंबाई | कर्क रेखा की सर्वाधिक लंबाई भारत के मध्य प्रदेश राज्य में है, जबकि सबसे कम लंबाई राजस्थान में है। |
| सूर्योदय | भारत में कर्क रेखा पर स्थित स्थानों में से मिजोरम में सूर्योदय सबसे पहले होगा (क्योंकि यह सबसे पूर्व में है)। |
मकर रेखा (Tropic of Capricorn): परीक्षा की दृष्टि से
मकर रेखा (23.5° S) एक प्रमुख अक्षांश रेखा है जो भूमध्य रेखा के दक्षिण में स्थित है। यह कर्क रेखा की दक्षिणी समकक्ष है और वैश्विक जलवायु, मौसम और खगोलीय घटनाओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| अक्षांश मान | 23.5° दक्षिणी अक्षांश (23° 26′ S) |
| अन्य नाम | दक्षिणी अयनांत रेखा |
| गोलार्ध | दक्षिणी गोलार्ध |
| महत्व | उष्ण कटिबंध (Torrid Zone) की दक्षिणी सीमा निर्धारित करती है। |
| संबंधित घटना | शीत अयनांत / मकर संक्रांति (Winter Solstice) |
भौगोलिक और जलवायु संबंधी महत्व
1. सूर्य की स्थिति और शीत अयनांत (Winter Solstice)
- परिभाषा: मकर रेखा दक्षिणी गोलार्ध में वह अंतिम या अधिकतम सीमा है, जहाँ तक सूर्य की किरणें दोपहर के समय सीधी (लंबवत) चमक सकती हैं। [UPPSC]
- मकर संक्रांति (22 दिसंबर): वर्ष में एक दिन, लगभग 22 दिसंबर को, सूर्य ठीक मकर रेखा के ऊपर लंबवत होता है। इस खगोलीय घटना को अयनांत (Solstice) कहते हैं।
- इस दिन दक्षिणी गोलार्ध में सबसे लंबा दिन और सबसे छोटी रात होती है और यहाँ ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत होती है।
- इसके विपरीत, इसी दिन उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात होती है और यहाँ शीत ऋतु की शुरुआत होती है। [SSC CGL, CDS]
2. उष्ण कटिबंध की दक्षिणी सीमा
- मकर रेखा, कर्क रेखा (23.5° N) के साथ मिलकर उष्ण कटिबंध (Torrid Zone) की délimitation करती है। यह पृथ्वी का सबसे गर्म क्षेत्र है, जो इन दोनों रेखाओं के बीच स्थित है।
- मकर रेखा के दक्षिण में स्थित किसी भी स्थान पर सूर्य कभी भी सीधा सिर के ऊपर नहीं आता है।
मकर रेखा पर स्थित प्रमुख देश और महाद्वीप
यह जानना महत्वपूर्ण है कि मकर रेखा किन महाद्वीपों और देशों से होकर गुजरती है।
| महाद्वीप | प्रमुख देश |
| दक्षिण अमेरिका | चिली, अर्जेंटीना, पराग्वे, ब्राजील |
| अफ्रीका | नामीबिया, बोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक, मेडागास्कर |
| ऑस्ट्रेलिया | ऑस्ट्रेलिया (महाद्वीप के लगभग मध्य से) |
| अन्य | फ्रेंच पोलिनेशिया (फ्रांस) जैसे कुछ द्वीपीय क्षेत्रों से भी गुजरती है। |
अति महत्वपूर्ण नोट: मकर रेखा भारत से होकर नहीं गुजरती है।
परीक्षा हेतु विशेष तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| नदी जो दो बार काटती है | अफ्रीका की लिम्पोपो नदी (Limpopo River) मकर रेखा को दो बार काटती है। [State PSC, SSC] |
| मकर संक्रांति: त्यौहार बनाम खगोलीय घटना | मकर संक्रांति का त्यौहार, जो भारत में 14 जनवरी के आसपास मनाया जाता है, सूर्य के मकर राशि (Zodiac Sign of Capricorn) में प्रवेश का प्रतीक है। यह खगोलीय मकर संक्रांति (22 दिसंबर) से अलग है। पृथ्वी के अयन चलन (Precession) के कारण इन दोनों घटनाओं की तिथियों में अंतर आ गया है। [UPSC Prelims के लिए महत्वपूर्ण अवधारणा] |
| निकटतम शहर | ब्राजील का साओ पाउलो (São Paulo) शहर मकर रेखा के बहुत निकट स्थित है। ऑस्ट्रेलिया में, रॉकहैम्प्टन (Rockhampton) शहर को अक्सर मकर रेखा का शहर कहा जाता है। |
आर्कटिक वृत्त (Arctic Circle): परीक्षा की दृष्टि से
आर्कटिक वृत्त, पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में स्थित एक प्रमुख अक्षांश रेखा है। यह केवल एक काल्पनिक रेखा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण खगोलीय और जलवायु सीमा है जो आर्कटिक क्षेत्र को परिभाषित करती है। यह क्षेत्र अपनी चरम जलवायु, अद्वितीय प्राकृतिक घटनाओं और बढ़ते भू-राजनीतिक महत्व के लिए जाना जाता है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| अक्षांश मान | 66.5° उत्तरी अक्षांश (66° 33′ N) |
| गोलार्ध | उत्तरी गोलार्ध |
| मुख्य विशेषता | “मध्यरात्रि के सूर्य” और “ध्रुवीय रात्रि” की घटनाओं का निर्धारण करती है। |
| जलवायु कटिबंध | उत्तरी शीत कटिबंध (North Frigid Zone) की दक्षिणी सीमा है। |
| संबंधित घटनाएं | सुमेरु ज्योति (Aurora Borealis), जलवायु परिवर्तन, परमाफ्रॉस्ट का पिघलना। |
भौगोलिक और वैज्ञानिक महत्व
1. मध्यरात्रि का सूर्य (Midnight Sun)
- परिभाषा: यह वह घटना है जब आर्कटिक वृत्त के भीतर किसी स्थान पर, वर्ष में कम से कम एक दिन सूर्य 24 घंटे तक क्षितिज से नीचे नहीं डूबता है।
- कारण और समय: पृथ्वी के अपने अक्ष पर 23.5° झुके होने के कारण, ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice, ~21 जून) के आसपास, उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है। इस समय आर्कटिक वृत्त के भीतर के सभी स्थानों पर 24 घंटे या उससे अधिक समय तक सूर्य का प्रकाश रहता है। जैसे-जैसे हम उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं, इन दिनों की संख्या बढ़ती जाती है, और उत्तरी ध्रुव पर यह 6 महीने तक रहता है।
- संबंधित देश: नॉर्वे को अक्सर “मध्यरात्रि के सूर्य का देश” (Land of the Midnight Sun) कहा जाता है। [SSC, RRB]
2. ध्रुवीय रात्रि (Polar Night)
- परिभाषा: यह मध्यरात्रि के सूर्य के विपरीत घटना है, जब वर्ष में कम से कम एक दिन सूर्य 24 घंटे तक क्षितिज से ऊपर नहीं उठता है।
- कारण और समय: शीत अयनांत (Winter Solstice, ~22 दिसंबर) के आसपास, उत्तरी ध्रुव सूर्य से दूर झुका होता है। इस समय आर्कटिक वृत्त के भीतर के सभी स्थानों पर 24 घंटे या उससे अधिक समय तक अंधेरा (सिविल ट्वाइलाइट को छोड़कर) रहता है। उत्तरी ध्रुव पर यह अवधि भी 6 महीने की होती है।
3. शीत कटिबंध की सीमा
- आर्कटिक वृत्त, उत्तरी शीत कटिबंध (North Frigid Zone) की दक्षिणी सीमा का निर्धारण करता है।
- इस क्षेत्र में सूर्य की किरणें वर्ष भर अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं, जिससे सौर ऊर्जा एक बड़े क्षेत्र में फैल जाती है और गर्मी बहुत कम मिलती है। इसी कारण यह क्षेत्र स्थायी रूप से ठंडा रहता है और बर्फ से ढका रहता है।
4. सुमेरु ज्योति (Aurora Borealis)
- आर्कटिक क्षेत्र, सुमेरु ज्योति (उत्तरी ध्रुवीय ज्योति) देखने के लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगहों में से एक है। यह एक रंगीन खगोलीय प्रकाश प्रदर्शन है जो तब होता है जब सौर पवन से आए आवेशित कण पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र द्वारा ध्रुवों की ओर खींचे जाते हैं और वायुमंडलीय गैसों से टकराते हैं।
आर्कटिक वृत्त पर स्थित देश (Countries on the Arctic Circle)
आर्कटिक वृत्त 8 देशों के भू-भाग से होकर गुजरता है। यह एक बहुत ही सामान्य परीक्षा प्रश्न है।
- नॉर्वे (Norway)
- स्वीडन (Sweden)
- फिनलैंड (Finland)
- रूस (Russia) (इसका सबसे बड़ा आर्कटिक क्षेत्र है)
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) (अलास्का राज्य के माध्यम से)
- कनाडा (Canada)
- डेनमार्क (Denmark) (ग्रीनलैंड के माध्यम से, जो एक स्वायत्त क्षेत्र है)
- आइसलैंड (Iceland) (मुख्य भूमि से थोड़ा उत्तर में स्थित इसके ग्रिम्सी द्वीप से गुजरती है)
[State PSC, SSC CGL]
समसामयिक महत्व (परीक्षाओं के लिए विशेष)
- जलवायु परिवर्तन का केंद्र: आर्कटिक क्षेत्र दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में दोगुनी से भी अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। समुद्री बर्फ का पिघलना, ग्लेशियरों का पीछे हटना और समुद्र के स्तर में वृद्धि इसके प्रमुख परिणाम हैं।
- परमाफ्रॉस्ट का पिघलना (Melting of Permafrost): परमाफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी हुई जमीन) के पिघलने से भारी मात्रा में मीथेन (Methane), एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस, वायुमंडल में मुक्त हो रही है, जो ग्लोबल वार्मिंग को और तेज कर रही है। [UPSC Prelims]
- भू-राजनीतिक महत्व:
- नए शिपिंग मार्ग: बर्फ पिघलने से उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) जैसे नए और छोटे शिपिंग मार्ग खुल रहे हैं, जो यूरोप और एशिया के बीच की दूरी को कम करते हैं।
- प्राकृतिक संसाधन: माना जाता है कि आर्कटिक क्षेत्र में दुनिया के अनदेखे तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं, जिन पर प्रभुत्व के लिए विभिन्न देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।
अंटार्कटिक वृत्त (Antarctic Circle): परीक्षा की दृष्टि से
अंटार्कटिक वृत्त, पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध में स्थित एक प्रमुख अक्षांश रेखा है। यह आर्कटिक वृत्त का दक्षिणी समकक्ष है और यह अंटार्कटिका महाद्वीप के बर्फीले और चरम वातावरण को परिभाषित करने वाली एक महत्वपूर्ण खगोलीय सीमा है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| अक्षांश मान | 66.5° दक्षिणी अक्षांश (66° 33′ S) |
| गोलार्ध | दक्षिणी गोलार्ध |
| मुख्य विशेषता | “मध्यरात्रि के सूर्य” और “ध्रुवीय रात्रि” की घटनाओं का निर्धारण करती है। |
| जलवायु कटिबंध | दक्षिणी शीत कटिबंध (South Frigid Zone) की उत्तरी सीमा है। |
| संबंधित घटनाएं | कुमेरु ज्योति (Aurora Australis), जलवायु परिवर्तन का अध्ययन, अंटार्कटिक संधि। |
भौगोलिक और वैज्ञानिक महत्व
1. मध्यरात्रि का सूर्य (Midnight Sun)
- परिभाषा: यह वह घटना है जब अंटार्कटिक वृत्त के भीतर किसी स्थान पर, वर्ष में कम से कम एक दिन सूर्य 24 घंटे तक क्षितिज से नीचे नहीं डूबता है।
- कारण और समय: पृथ्वी के अपने अक्षीय झुकाव के कारण, दक्षिणी गोलार्ध में ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice, ~22 दिसंबर) के आसपास, दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है। इस समय अंटार्कटिक वृत्त के भीतर 24 घंटे या उससे अधिक समय तक सूर्य का प्रकाश रहता है। दक्षिणी ध्रुव पर यह अवधि 6 महीने तक चलती है। [CDS, NDA]
2. ध्रुवीय रात्रि (Polar Night)
- परिभाषा: यह मध्यरात्रि के सूर्य के विपरीत घटना है, जब वर्ष में कम से कम एक दिन सूर्य 24 घंटे तक क्षितिज से ऊपर नहीं उठता है।
- कारण और समय: दक्षिणी गोलार्ध में शीत अयनांत (Winter Solstice, ~21 जून) के आसपास, दक्षिणी ध्रुव सूर्य से दूर झुका होता है। इस समय अंटार्कटिक वृत्त के भीतर 24 घंटे या उससे अधिक समय तक अंधेरा रहता है। दक्षिणी ध्रुव पर यह अवधि भी 6 महीने की होती है।
3. शीत कटिबंध की सीमा
- अंटार्कटिक वृत्त, दक्षिणी शीत कटिबंध (South Frigid Zone) की उत्तरी सीमा को चिह्नित करता है।
- इस क्षेत्र में सूर्य की किरणें अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं, जिससे यहाँ तापमान स्थायी रूप से बहुत कम रहता है और यह पृथ्वी का सबसे ठंडा, शुष्क और सबसे ऊँचा महाद्वीप है।
4. कुमेरु ज्योति (Aurora Australis)
- अंटार्कटिक क्षेत्र कुमेरु ज्योति (दक्षिणी ध्रुवीय ज्योति) देखने के लिए एक प्रमुख स्थान है। यह सौर पवन के आवेशित कणों के पृथ्वी के वायुमंडल से टकराने से उत्पन्न एक शानदार प्रकाश प्रदर्शन है।
एक बर्फीला महाद्वीप (A Continent of Ice)
आर्कटिक वृत्त के विपरीत, जो कई देशों और एक महासागर से होकर गुजरता है, अंटार्कटिक वृत्त की भौगोलिक स्थिति अद्वितीय है:
- महाद्वीपीय सीमा: यह वृत्त लगभग पूरी तरह से अंटार्कटिका महाद्वीप और दक्षिणी महासागर को घेरता है। केवल अंटार्कटिक प्रायद्वीप (Antarctic Peninsula) का कुछ हिस्सा इस वृत्त के उत्तर तक फैला हुआ है।
- कोई स्थायी मानव आबादी नहीं: अंटार्कटिक वृत्त किसी भी स्थायी आबादी वाले देश के भू-भाग से होकर नहीं गुजरता है। यहाँ कोई शहर या स्थायी बस्तियाँ नहीं हैं, केवल विभिन्न देशों द्वारा संचालित वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (Research Stations) हैं।
समसामयिक महत्व और भारत (परीक्षाओं के लिए विशेष)
- वैज्ञानिक अनुसंधान का महाद्वीप: अंटार्कटिक संधि (Antarctic Treaty, 1959) के तहत, अंटार्कटिका महाद्वीप केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों, विशेष रूप से वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए समर्पित है। यहाँ किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि प्रतिबंधित है। [UPSC Prelims]
- भारत के अनुसंधान केंद्र: भारत अंटार्कटिक संधि का एक सदस्य है और वहाँ अपने सक्रिय अनुसंधान कार्यक्रम संचालित करता है। भारत के प्रमुख अनुसंधान केंद्र हैं:
- दक्षिण गंगोत्री (Dakshin Gangotri, 1984): भारत का पहला स्टेशन, जो अब बर्फ में दफन हो चुका है और केवल आपूर्ति आधार के रूप में उपयोग होता है।
- मैत्री (Maitri, 1989): भारत का दूसरा स्थायी अनुसंधान केंद्र (सक्रिय)।
- भारती (Bharati, 2012): भारत का नवीनतम और तीसरा अनुसंधान केंद्र (सक्रिय)।
[SSC CGL, BPSC, State PSC – यह एक बहुत ही सामान्य प्रश्न है]
- जलवायु परिवर्तन का अध्ययन:
- अंटार्कटिका की बर्फ की चादरें (Ice Sheets) पृथ्वी के लाखों वर्षों के जलवायु इतिहास का रिकॉर्ड रखती हैं। वैज्ञानिक आइस कोर (Ice Cores) की ड्रिलिंग करके過去 के वायुमंडल, तापमान और ग्रीनहाउस गैसों के स्तर का अध्ययन करते हैं।
- पश्चिम अंटार्कटिक बर्फ की चादर का पिघलना समुद्र के स्तर में वृद्धि के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है, जिसका वैश्विक प्रभाव पड़ सकता है।
| रेखा का नाम | डिग्री | महत्व और विशेषताएँ |
| भूमध्य रेखा (Equator) | 0° | सबसे बड़ी अक्षांश रेखा। यहाँ वर्ष भर दिन और रात लगभग बराबर होते हैं और सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जिससे यह क्षेत्र गर्म रहता है। |
| कर्क रेखा (Tropic of Cancer) | 23.5° N | यह उत्तरी गोलार्ध में वह अधिकतम सीमा है जहाँ तक सूर्य की किरणें सीधी चमक सकती हैं (ग्रीष्म संक्रांति के समय)। यह भारत के 8 राज्यों से होकर गुजरती है। |
| मकर रेखा (Tropic of Capricorn) | 23.5° S | यह दक्षिणी गोलार्ध में वह अधिकतम सीमा है जहाँ तक सूर्य की किरणें सीधी चमक सकती हैं (शीत संक्रांति के समय)। |
| आर्कटिक वृत्त (Arctic Circle) | 66.5° N | यह उत्तरी गोलार्ध की वह सीमा है जिसके उत्तर में गर्मियों में 24 घंटे का दिन और सर्दियों में 24 घंटे की रात अनुभव की जा सकती है। |
| अंटार्कटिक वृत्त (Antarctic Circle) | 66.5° S | यह दक्षिणी गोलार्ध की वह सीमा है जिसके दक्षिण में गर्मियों में 24 घंटे का दिन और सर्दियों में 24 घंटे की रात अनुभव की जा सकती है। |
अक्षांश और जलवायु कटिबंध (Latitude and Climate Zones)
अक्षांश रेखाएँ पृथ्वी को तीन मुख्य जलवायु कटिबंधों (Climate Zones) में विभाजित करने का आधार हैं:
उष्ण कटिबंध (Torrid Zone): परीक्षा की दृष्टि से
उष्ण कटिबंध, जिसे ‘टोरिड ज़ोन’ भी कहा जाता है, पृथ्वी का सबसे गर्म और जैविक रूप से सबसे समृद्ध जलवायु कटिबंध है। यह कटिबंध कर्क रेखा (23.5° N) और मकर रेखा (23.5° S) के बीच, भूमध्य रेखा के दोनों ओर स्थित है। यह भूगोल की एक मौलिक अवधारणा है जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| अक्षांशीय विस्तार | 23.5° उत्तरी अक्षांश (कर्क रेखा) से 23.5° दक्षिणी अक्षांश (मकर रेखा) तक। |
| सीमाएँ | उत्तरी सीमा – कर्क रेखा, दक्षिणी सीमा – मकर रेखा। भूमध्य रेखा इसके ठीक बीच से गुजरती है। |
| सूर्य की स्थिति | वर्ष में कम से कम एक बार सूर्य की किरणें सीधी (सिर के ऊपर) पड़ती हैं। |
| मुख्य विशेषता | यह पृथ्वी का सबसे गर्म क्षेत्र है जहाँ कोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं होती है। |
विस्तृत भौगोलिक और जलवायु विशेषताएँ
1. सूर्य की सीधी किरणें (Direct Sun Rays)
यह उष्ण कटिबंध की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है जो अन्य सभी विशेषताओं को जन्म देती है।
- अवधारणा: यह पृथ्वी का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ सूर्य की किरणें वर्ष में कम से कम एक बार लंबवत (Perpendicular) या 90° के कोण पर पड़ती हैं। भूमध्य रेखा पर यह दो बार (विषुव के दिन) होता है, और कर्क व मकर रेखाओं पर एक बार (अयनांत के दिन) होता है।
- प्रभाव: सीधी किरणें कम वायुमंडल से गुजरती हैं और उनकी ऊष्मा एक छोटे क्षेत्र पर केंद्रित होती है, जिससे इस क्षेत्र को सर्वाधिक सौर ऊर्जा प्राप्त होती है। [UPSC Prelims]
2. वर्ष भर उच्च तापमान (High Temperatures Year-Round)
- निरंतर सीधी सौर किरणों के कारण, इस क्षेत्र में तापमान पूरे वर्ष ऊंचा बना रहता है।
- यहाँ स्पष्ट शीत ऋतु का अभाव होता है। वार्षिक और दैनिक तापांतर (तापमान में अंतर) बहुत कम होता है, खासकर भूमध्य रेखा के पास।
3. प्रमुख जलवायु प्रकार (Major Climate Types)
उष्ण कटिबंध में मुख्य रूप से दो प्रमुख प्रकार की जलवायु पाई जाती है:
- विषुवतीय जलवायु (Equatorial Climate): भूमध्य रेखा के निकट, जहाँ वर्ष भर उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता के साथ लगभग प्रतिदिन वर्षा होती है। यह उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (Tropical Rainforests) का क्षेत्र है, जैसे अमेज़ॅन और कांगो बेसिन।
- सवाना तुल्य जलवायु (Savanna Climate): विषुवतीय क्षेत्र के उत्तर और दक्षिण में, जहाँ स्पष्ट शुष्क और आर्द्र मौसम होते हैं। यहाँ लंबी घास के मैदान और कहीं-कहीं पेड़ पाए जाते हैं।
4. समृद्ध जैव-विविधता (Rich Biodiversity)
- वर्ष भर गर्म और आर्द्र जलवायु तथा प्रचुर सौर ऊर्जा के कारण, उष्ण कटिबंध दुनिया का सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाला क्षेत्र है।
- दुनिया के कई प्रमुख बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट इसी क्षेत्र में स्थित हैं, जैसे अमेज़ॅन वर्षावन, कांगो बेसिन और दक्षिण-पूर्व एशिया के द्वीप समूह। [CDS, State PSC]
5. दिन-रात की अवधि में कम भिन्नता
- इस क्षेत्र में, विशेषकर भूमध्य रेखा के पास, वर्ष भर दिन और रात की लंबाई में बहुत कम अंतर होता है, जो लगभग 12-12 घंटे की बनी रहती है।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| पृथ्वी का कवरेज | उष्ण कटिबंध पृथ्वी के कुल सतह क्षेत्र का लगभग 40% हिस्सा कवर करता है। |
| विश्व जनसंख्या | दुनिया की लगभग 40% आबादी इसी उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में निवास करती है। |
| मानसून | भारतीय मानसून जैसी महत्वपूर्ण मौसमी घटनाएँ प्रत्यक्ष रूप से उष्ण कटिबंध में होने वाले तापमान और दबाव परिवर्तनों से जुड़ी हैं। ITCZ का खिसकाव इसका प्रमुख उदाहरण है। [UPSC] |
| अद्वितीय घटना | यह पृथ्वी का एकमात्र कटिबंध है जहाँ आप खड़े होकर देख सकते हैं कि सूर्य ठीक आपके सिर के ऊपर (Zenith पर) है। |
शीतोष्ण कटिबंध (Temperate Zones): परीक्षा की दृष्टि से
शीतोष्ण कटिबंध, पृथ्वी पर उष्ण कटिबंध और शीत कटिबंध के बीच स्थित विशाल क्षेत्र हैं। ये अपनी मध्यम जलवायु और स्पष्ट रूप से परिभाषित चार ऋतुओं के लिए जाने जाते हैं। दुनिया के अधिकांश विकसित देश और एक बड़ी मानव आबादी इसी कटिबंध में निवास करती है, जो इसे भूगोल, अर्थशास्त्र और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| अक्षांशीय विस्तार | उत्तरी गोलार्ध: 23.5° N (कर्क रेखा) से 66.5° N (आर्कटिक वृत्त) तक।<br>दक्षिणी गोलार्ध: 23.5° S (मकर रेखा) से 66.5° S (अंटार्कटिक वृत्त) तक। |
| सूर्य की स्थिति | सूर्य की किरणें हमेशा तिरछी पड़ती हैं; सूर्य कभी भी सीधा सिर के ऊपर नहीं आता है। |
| प्रमुख विशेषता | चार स्पष्ट ऋतुओं (वसंत, ग्रीष्म, शरद, शीत) की उपस्थिति। मध्यम तापमान और परिवर्तनशील मौसम। |
विस्तृत भौगोलिक और जलवायु विशेषताएँ
1. सूर्य की तिरछी किरणें (Slanted Sun Rays)
- अवधारणा: शीतोष्ण कटिबंध में सूर्य की किरणें कभी भी 90° के कोण पर सीधी नहीं पड़ती हैं। वे हमेशा एक झुके हुए या तिरछे कोण पर आती हैं।
- प्रभाव: तिरछी किरणों को वायुमंडल की मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है और उनकी ऊर्जा एक बड़े क्षेत्र में फैल जाती है। इस कारण यहाँ उष्ण कटिबंध की तुलना में कम सौर ऊर्जा प्राप्त होती है और तापमान मध्यम रहता है।
2. चार स्पष्ट ऋतुएँ (Four Distinct Seasons)
यह शीतोष्ण कटिबंध की सबसे परिभाषित विशेषता है।
- कारण: पृथ्वी के 23.5° अक्षीय झुकाव के कारण, जैसे-जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, इन क्षेत्रों को प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा वर्ष भर बदलती रहती है, जिससे वसंत (Spring), ग्रीष्म (Summer), शरद (Autumn), और शीत (Winter) ऋतुओं का एक स्पष्ट चक्र बनता है। [UPSC Prelims, CDS]
- अयनांत और विषुव: इन क्षेत्रों में अयनांत (Solstices) और विषुव (Equinoxes) का प्रभाव बहुत स्पष्ट होता है। गर्मियों में दिन लंबे और सर्दियों में छोटे होते हैं।
3. प्रमुख जलवायु और वनस्पति प्रकार (Major Climate and Vegetation Types)
शीतोष्ण कटिबंध में महाद्वीपों की स्थिति और समुद्र से दूरी के आधार पर कई प्रकार की जलवायु पाई जाती है:
- भूमध्यसागरीय जलवायु (Mediterranean Climate): महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर। गर्म, शुष्क ग्रीष्मकाल और हल्की, नम सर्दियों के लिए प्रसिद्ध। रसीले फलों (जैसे अंगूर, जैतून, संतरा) की खेती के लिए प्रसिद्ध। [UPPSC]
- चीन तुल्य जलवायु (China-Type Climate): महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर। गर्म, आर्द्र ग्रीष्मकाल और ठंडी सर्दियाँ।
- स्टेपी/प्रेयरी घास के मैदान (Steppe/Prairie Grasslands): महाद्वीपों के आंतरिक भागों में, जहाँ वर्षा कम होती है। इन्हें “विश्व की रोटी की टोकरी” (Breadbasket of the world) कहा जाता है क्योंकि यहाँ बड़े पैमाने पर गेहूं की खेती होती है। [SSC, RRB]
- पतझड़ी वन (Deciduous Forests): जहाँ पर्याप्त वर्षा होती है, वहाँ चौड़ी पत्ती वाले पतझड़ी वन पाए जाते हैं जो सर्दियों में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं।
- शंकुधारी/टैगा वन (Coniferous/Taiga Forests): इन कटिबंधों के ठंडे, उत्तरी भागों में नुकीली पत्ती वाले (कोणधारी) वन पाए जाते हैं।
4. पछुआ पवनों का प्रभाव (Westerlies’ Influence)
- शीतोष्ण कटिबंध मुख्य रूप से पछुआ पवनों (Westerlies) के प्रभाव क्षेत्र में आता है। ये हवाएँ पश्चिम से पूर्व की ओर चलती हैं और इस क्षेत्र के मौसम को बहुत प्रभावित करती हैं, खासकर महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| मानव जनसंख्या | यह कटिबंध दुनिया का सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र है। विश्व के अधिकांश प्रमुख आर्थिक और औद्योगिक केंद्र (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, अधिकांश यूरोप, चीन, जापान) इसी कटिबंध में स्थित हैं। |
| कृषि महत्व | यह विश्व का प्रमुख अनाज और खाद्यान्न उत्पादक क्षेत्र है। |
| जेट स्ट्रीम | क्षोभमंडल के ऊपरी हिस्से में चलने वाली तेज गति की जेट स्ट्रीम पवनें भी शीतोष्ण कटिबंध के मौसम को अत्यधिक प्रभावित करती हैं, विशेषकर चक्रवातों की उत्पत्ति में। [CDS, NDA] |
| उत्तरी और दक्षिणी शीतोष्ण कटिबंध में अंतर | उत्तरी गोलार्ध में भूमि का विशाल विस्तार होने के कारण, यहाँ के शीतोष्ण कटिबंध में जलवायु की चरम सीमाएं (बहुत गर्म ग्रीष्म और बहुत ठंडी सर्दियाँ) अधिक पाई जाती हैं। इसके विपरीत, दक्षिणी शीतोष्ण कटिबंध में महासागरों की अधिकता के कारण जलवायु अधिक समुद्री और समशीतोष्ण (maritime and moderate) रहती है। |
शीत कटिबंध (Frigid Zones): परीक्षा की दृष्टि से
शीत कटिबंध, पृथ्वी के सबसे ठंडे, बर्फीले और चरम जलवायु वाले क्षेत्र हैं। ये पृथ्वी के ध्रुवों (Poles) के चारों ओर स्थित हैं और इनकी सीमा क्रमशः आर्कटिक और अंटार्कटिक वृत्त द्वारा निर्धारित होती है। इन क्षेत्रों का अध्ययन खगोल विज्ञान, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मुख्य तथ्य एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| अक्षांशीय विस्तार | उत्तरी शीत कटिबंध: 66.5° N (आर्कटिक वृत्त) से 90° N (उत्तरी ध्रुव) तक।<br>दक्षिणी शीत कटिबंध: 66.5° S (अंटार्कटिक वृत्त) से 90° S (दक्षिणी ध्रुव) तक। |
| सूर्य की स्थिति | सूर्य की किरणें वर्ष भर अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं। सूर्य कभी भी ऊँचाई पर नहीं चढ़ता। |
| प्रमुख विशेषता | मध्यरात्रि का सूर्य (Midnight Sun) और ध्रुवीय रात्रि (Polar Night) की घटना। वर्ष भर अत्यधिक ठंड। |
| अन्य नाम | ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions), टुंड्रा प्रदेश। |
| जलवायु | टुंड्रा जलवायु (Tundra Climate) और हिमटोप जलवायु (Ice Cap Climate)। |
विस्तृत भौगोलिक और जलवायु विशेषताएँ
1. सूर्य की अत्यधिक तिरछी किरणें (Extremely Slanted Sun Rays)
यह शीत कटिबंध की सभी विशेषताओं का मूल कारण है।
- अवधारणा: इन क्षेत्रों में सूर्य की किरणें हमेशा बहुत ही झुके हुए या तिरछे कोण पर पहुँचती हैं।
- प्रभाव: इन तिरछी किरणों को वायुमंडल की एक बहुत मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है और इनकी ऊर्जा एक विशाल क्षेत्र में फैल जाती है। इस कारण यहाँ प्रति इकाई क्षेत्र में बहुत कम सौर ऊर्जा पहुँचती है, जिससे तापमान स्थायी रूप से बहुत कम बना रहता है।
2. मध्यरात्रि का सूर्य और ध्रुवीय रात्रि (Midnight Sun and Polar Night)
पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण इन क्षेत्रों में अद्वितीय खगोलीय घटनाएं होती हैं:
- मध्यरात्रि का सूर्य: गर्मियों के दौरान (उत्तरी गोलार्ध में जून के आसपास, दक्षिणी में दिसंबर के आसपास), ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है। इस समय वृत्त के भीतर 24 घंटे या उससे अधिक समय तक सूर्य क्षितिज से नीचे नहीं डूबता है।
- ध्रुवीय रात्रि: सर्दियों के दौरान, ध्रुव सूर्य से दूर झुका होता है। इस समय वृत्त के भीतर 24 घंटे या उससे अधिक समय तक सूर्य क्षितिज से ऊपर नहीं उठता है, जिससे स्थायी अंधेरा रहता है।
- अवधि: वृत्त पर यह घटना 24 घंटे की होती है, और ध्रुवों की ओर बढ़ने पर इसकी अवधि बढ़ती जाती है, जो ठीक ध्रुवों पर 6 महीने तक पहुँच जाती है।
3. चरम शीत और स्थायी बर्फ (Extreme Cold and Permanent Ice)
- निरंतर कम सौर ऊर्जा के कारण ये पृथ्वी के सबसे ठंडे क्षेत्र हैं।
- यहाँ टुंड्रा जलवायु पाई जाती है, जहाँ जमीन स्थायी रूप से जमी रहती है, जिसे परमाफ्रॉस्ट (Permafrost) कहते हैं, और केवल गर्मियों में ऊपरी कुछ इंच ही पिघलती है।
- ध्रुवों के निकट हिमटोप जलवायु (Ice Cap Climate) पाई जाती है, जहाँ सतह स्थायी रूप से बर्फ और ग्लेशियरों की मोटी चादरों से ढकी रहती है।
4. अल्प वनस्पति और विशिष्ट जीव-जंतु (Sparse Vegetation and Specific Fauna)
- कठोर जलवायु के कारण यहाँ बड़े पेड़ नहीं उगते। केवल काई (Moss), लाइकेन (Lichen) और कुछ छोटी झाड़ियाँ ही पनप पाती हैं।
- यहाँ के जीव-जंतु इस चरम वातावरण के अनुकूल होते हैं, जैसे:
- उत्तरी शीत कटिबंध (आर्कटिक): ध्रुवीय भालू (Polar Bear), आर्कटिक लोमड़ी, रेंडियर, सील, व्हेल।
- दक्षिणी शीत कटिबंध (अंटार्कटिक): पेंगुइन (Penguins), सील, व्हेल। [SSC, CDS – यह एक सामान्य प्रश्न है कि ध्रुवीय भालू और पेंगुइन प्राकृतिक रूप से एक ही स्थान पर नहीं पाए जाते।]
उत्तरी और दक्षिणी शीत कटिबंध में अंतर
| आधार | उत्तरी शीत कटिबंध (Arctic) | दक्षिणी शीत कटिबंध (Antarctic) |
| भौगोलिक स्वरूप | केंद्र में एक महासागर (आर्कटिक महासागर) है जो महाद्वीपों से घिरा है। | केंद्र में एक महाद्वीप (अंटार्कटिका) है जो महासागरों से घिरा है। |
| मानव उपस्थिति | यहाँ स्वदेशी लोग (जैसे इनुइट) हजारों वर्षों से रहते आए हैं। | कोई स्थायी मानव आबादी नहीं है, केवल वैज्ञानिक और सहायक कर्मचारी रहते हैं। |
| प्रमुख जीव | ध्रुवीय भालू | पेंगुइन |
| राजनीतिक स्थिति | 8 देशों (रूस, USA, कनाडा आदि) के संप्रभु क्षेत्र में आता है। | अंटार्कटिक संधि (1959) के तहत शासित है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और शांति के लिए समर्पित करती है। |
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
| परमाफ्रॉस्ट का पिघलना | ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्माफ्रॉस्ट पिघल रहा है, जिससे वायुमंडल में मीथेन जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें मुक्त हो रही हैं, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज कर रही हैं। [UPSC Prelims] |
| अंटार्कटिक संधि | यह एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो अंटार्कटिका पर किसी भी सैन्य गतिविधि और खनिज खनन पर रोक लगाता है और वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देता है। |
| भारत के अनुसंधान केंद्र | अंटार्कटिका में भारत के अनुसंधान केंद्र हैं – मैत्री और भारती (सक्रिय), तथा दक्षिण गंगोत्री (अब निष्क्रिय)। [BPSC, State PSC] |
| भू-राजनीतिक महत्व | आर्कटिक में बर्फ पिघलने से नए शिपिंग मार्ग खुल रहे हैं और तेल व गैस के भंडारों तक पहुंच आसान हो रही है, जिससे इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। |
| कटिबंध (Zone) | स्थान (Location) | विशेषता (Characteristic) |
| उष्ण कटिबंध (Torrid Zone) | कर्क रेखा (23.5°N) और मकर रेखा (23.5°S) के बीच। | सबसे गर्म क्षेत्र। यहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं। |
| शीतोष्ण कटिबंध (Temperate Zones) | कर्क रेखा से आर्कटिक वृत्त (23.5°N से 66.5°N) और मकर रेखा से अंटार्कटिक वृत्त (23.5°S से 66.5°S) के बीच। | मध्यम तापमान। यहाँ सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं और चार स्पष्ट ऋतुएँ होती हैं। |
| शीत कटिबंध (Frigid Zones) | आर्कटिक वृत्त से उत्तरी ध्रुव (66.5°N से 90°N) और अंटार्कटिक वृत्त से दक्षिणी ध्रुव (66.5°S से 90°S) के बीच। | सबसे ठंडा क्षेत्र। यहाँ सूर्य की किरणें अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं, जिससे तापमान बहुत कम रहता है और बर्फ जमी रहती है। |
महत्वपूर्ण तथ्य
- कुल अक्षांश रेखाएँ: यदि 1° के अंतराल पर रेखाएँ खींची जाएँ, तो भूमध्य रेखा के उत्तर में 89 और दक्षिण में 89 रेखाएँ होती हैं। भूमध्य रेखा को मिलाकर कुल 179 अक्षांश रेखाएँ होती हैं।
- कुल अक्षांश: यदि ध्रुवों को भी गिना जाए तो 90° उत्तर + 90° दक्षिण + 0° (भूमध्य रेखा) = कुल 181 अक्षांश होते हैं।
- महत्व: अक्षांश का उपयोग देशांतर (Longitude) के साथ मिलकर पृथ्वी पर किसी भी स्थान की सटीक स्थिति (Coordinates) बताने के लिए किया जाता है।
देशांतर रेखाएँ (Lines of Longitude)
देशांतर, पृथ्वी पर किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति को पूर्व-पश्चिम दिशा में बताने के लिए उपयोग होने वाला एक कोणीय माप है। ग्लोब पर उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव से मिलाने वाली काल्पनिक ऊर्ध्वाधर (Vertical) रेखाओं को देशांतर रेखाएँ कहा जाता है। इन्हें याम्योत्तर (Meridians) के नाम से भी जाना जाता है।
देशांतर रेखाओं की मुख्य विशेषताएँ
- अर्ध-वृत्त: ये रेखाएँ पूर्ण वृत्त नहीं होतीं, बल्कि उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक खींचे गए अर्ध-वृत्त होती हैं।
- समान लंबाई: सभी देशांतर रेखाओं की लंबाई एक समान होती है।
- असमानांतर: ये रेखाएँ एक-दूसरे के समानांतर नहीं होती हैं। इनके बीच की दूरी भूमध्य रेखा पर सबसे अधिक (111.32 किलोमीटर) होती है और ध्रुवों की ओर जाने पर यह दूरी कम होती जाती है।
- ध्रुवों पर मिलना: सभी देशांतर रेखाएँ उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर एक बिंदु पर आकर मिल जाती हैं।
- दिशा: ये रेखाएँ ग्लोब पर उत्तर-दक्षिण दिशा में खींची जाती हैं।
मापन (Measurement)
- देशांतर को भी डिग्री (°), मिनट (‘) और सेकंड (“) में मापा जाता है।
- गणना के लिए 0° देशांतर रेखा को मानक माना गया है, जिसे प्रमुख याम्योत्तर (Prime Meridian) कहते हैं।
- प्रमुख याम्योत्तर से 180° पूर्व तक के क्षेत्र को पूर्वी गोलार्ध (Eastern Hemisphere) और 180° पश्चिम तक के क्षेत्र को पश्चिमी गोलार्ध (Western Hemisphere) कहा जाता है।
- कुल 360 देशांतर रेखाएँ होती हैं (180° पूर्व और 180° पश्चिम)। 180° पूर्व और 180° पश्चिम एक ही रेखा होती है।
प्रमुख याम्योत्तर (Prime Meridian – 0° Longitude)
- परिभाषा: यह 0° देशांतर रेखा है, जिसे दुनिया के समय की गणना के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक के रूप में चुना गया है।
- स्थान: यह रेखा इंग्लैंड के लंदन के पास ग्रीनविच (Greenwich) में स्थित रॉयल वेधशाला से होकर गुजरती है। [SSC, RRB NTPC]
- महत्व: इसी रेखा के आधार पर ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) या समन्वित सार्वभौमिक समय (UTC) निर्धारित किया जाता है, जो दुनिया भर की घड़ियों के लिए मानक समय है।
प्रमुख याम्योत्तर निम्नलिखित देशों से होकर गुजरती है:
| महाद्वीप (Continent) | देश (Country) |
| यूरोप | यूनाइटेड किंगडम (UK), फ्रांस, स्पेन |
| अफ्रीका | अल्जीरिया, माली, बुर्किना फासो, टोगो, घाना |
| अन्य | अंटार्कटिका |
देशांतर और समय (Longitude and Time): परीक्षा की दृष्टि से
देशांतर का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक उपयोग पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों के समय का निर्धारण करना है। यह विषय प्रतियोगी परीक्षाओं के संख्यात्मक और अवधारणा-आधारित दोनों प्रकार के प्रश्नों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मूल सिद्धांत: पृथ्वी का घूर्णन (The Core Principle: Earth’s Rotation)
समय की गणना का पूरा आधार पृथ्वी की गति पर टिका है।
- घूर्णन दिशा: पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। इसी कारण हमें सूर्य पूर्व में उगता हुआ और पश्चिम में अस्त होता हुआ प्रतीत होता है।
- घूर्णन गति: पृथ्वी अपना एक पूरा चक्कर (360° देशांतर) लगभग 24 घंटे में पूरा करती है।
समय की गणना का आधार (The Basis of Time Calculation)
इसी घूर्णन गति से हम समय और देशांतर के बीच का गणितीय संबंध स्थापित करते हैं, जो सभी गणनाओं का आधार है।
- पृथ्वी 24 घंटे में घूमती है = 360°
- पृथ्वी 1 घंटे में घूमती है = 360° / 24 = 15° देशांतर
- पृथ्वी 1° देशांतर घूमने में समय लेती है = 60 मिनट / 15° = 4 मिनट
यह दो मान परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं:
1 घंटा = 15° देशांतर
1° देशांतर = 4 मिनट
[UPSC, CDS, SSC CGL – इन पर आधारित गणना वाले प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं]
संदर्भ बिंदु: प्रमुख याम्योत्तर (Prime Meridian – 0°) और GMT
- प्रमुख याम्योत्तर (0° देशांतर): यह रेखा इंग्लैंड के ग्रीनविच (London) से होकर गुजरती है और इसे अंतर्राष्ट्रीय समय गणना के लिए शुरुआती बिंदु माना गया है। [SSC, RRB]
- GMT (Greenwich Mean Time): प्रमुख याम्योत्तर पर स्थित समय को GMT कहते हैं। इसे UTC (Coordinated Universal Time) भी कहा जाता है, जो आज के समय में अधिक वैज्ञानिक और सटीक मानक है।
समय निर्धारण के नियम
किसी भी स्थान का समय निकालने के लिए दो सरल नियम हैं:
- पूर्व की ओर जाने पर: ग्रीनविच (0°) से पूर्व की ओर स्थित स्थानों का समय GMT से आगे (+) होता है, क्योंकि वहाँ सूर्योदय पहले होता है।
- पश्चिम की ओर जाने पर: ग्रीनविच (0°) से पश्चिम की ओर स्थित स्थानों का समय GMT से पीछे (-) होता है, क्योंकि वहाँ सूर्योदय बाद में होता है।
उदाहरण: भारतीय मानक समय (Indian Standard Time – IST)
यह सबसे सामान्य उदाहरण है जो परीक्षाओं में पूछा जाता है।
- भारत का मानक याम्योत्तर: भारत का मानक समय 82.5° पूर्वी देशांतर (82.5° E) से निर्धारित होता है, जो उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर (प्रयागराज के पास) से होकर गुजरती है।
- गणना:
- GMT (0°) और IST (82.5° E) के बीच देशांतरीय अंतर = 82.5°
- समय में कुल अंतर = 82.5° × 4 मिनट = 330 मिनट
- घंटों में बदलने पर = 330 / 60 = 5.5 घंटे यानी 5 घंटे 30 मिनट
- परिणाम: चूँकि भारत पूर्वी गोलार्ध में है, इसलिए भारतीय मानक समय (IST), ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) से 5 घंटे 30 मिनट आगे है। (IST = GMT +5:30) [BPSC, UPPSC, SSC – अनेक बार पूछा गया]
मानक समय और समय क्षेत्र (Standard Time and Time Zones)
- स्थानीय समय (Local Time): किसी स्थान पर सूर्य की स्थिति के अनुसार निर्धारित समय उसका स्थानीय समय कहलाता है। एक ही देश में अलग-अलग देशांतरों पर अलग-अलग स्थानीय समय होंगे।
- मानक समय (Standard Time): देश के भीतर समय की एकरूपता बनाए रखने के लिए, किसी एक केंद्रीय देशांतर (मानक याम्योत्तर) के स्थानीय समय को पूरे देश का मानक समय मान लिया जाता है।
- समय क्षेत्र (Time Zone): दुनिया को 15-15 डिग्री के 24 समय क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक क्षेत्र 1 घंटे के समय अंतराल का प्रतिनिधित्व करता है। रूस, कनाडा, USA जैसे बड़े देशों में एक से अधिक समय क्षेत्र हैं।
अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line – IDL)
- परिभाषा: यह 180° देशांतर के लगभग समानांतर प्रशांत महासागर से होकर गुजरने वाली एक काल्पनिक रेखा है।
- कार्य: इस रेखा को पार करने पर तिथि (Date) और दिन (Day) बदल जाता है। [UPSC Prelims]
- नियम:
- पश्चिम की ओर यात्रा करते हुए पार करने पर (एशिया की ओर): एक दिन जोड़ा जाता है (Gain a Day)। यदि आप रविवार को रेखा पार करते हैं, तो दूसरी तरफ सोमवार होगा।
- पूर्व की ओर यात्रा करते हुए पार करने पर (अमेरिका की ओर): एक दिन घटाया जाता है (Lose a Day)। यदि आप सोमवार को रेखा पार करते हैं, तो दूसरी तरफ रविवार होगा।
- टेढ़ी-मेढ़ी रेखा: यह रेखा सीधी नहीं है। इसे कई स्थानों पर पूर्व या पश्चिम की ओर मोड़ा गया है ताकि यह किसी भी एक देश या द्वीप समूह को दो भागों में न बांटे, जिससे वहाँ एक ही समय में दो अलग-अलग तारीखें होने की समस्या न हो। [CDS, NDA]
अक्षांश और देशांतर में मुख्य अंतर
| आधार | अक्षांश रेखाएँ (Latitude) | देशांतर रेखाएँ (Longitude) |
| आकृति | पूर्ण वृत्त | अर्ध-वृत्त |
| लंबाई | भिन्न-भिन्न (भूमध्य रेखा सबसे लंबी) | एक समान |
| समानांतरता | एक-दूसरे के समानांतर होती हैं | समानांतर नहीं होतीं, ध्रुवों पर मिलती हैं |
| संख्या | 179 रेखाएँ (1° के अंतराल पर) | 360 रेखाएँ (1° के अंतराल पर) |
| मुख्य कार्य | जलवायु कटिबंध का निर्धारण | समय का निर्धारण |
| प्रमुख रेखा | भूमध्य रेखा (0°) | प्रमुख याम्योत्तर (0°) |
डेलाइट सेविंग टाइम (Daylight Saving Time – DST): परीक्षा की दृष्टि से
डेलाइट सेविंग टाइम (DST) एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें घड़ियों को निर्धारित समय से, आमतौर पर एक घंटा आगे, सेट कर दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य गर्मियों के महीनों के दौरान दिन की रोशनी (प्राकृतिक प्रकाश) का बेहतर उपयोग करना है। DST को “ग्रीष्मकालीन समय” (Summer Time) भी कहा जाता है।
मूल अवधारणा (Core Concept)
DST का आधार यह है कि गर्मियों में दिन लंबे होते हैं, यानी सूर्य जल्दी उगता है और देर से अस्त होता है। अगर हम अपनी घड़ियों को एक घंटा आगे कर दें, तो:
- सुबह की प्राकृतिक रोशनी बर्बाद नहीं होती है (जब अधिकांश लोग सो रहे होते हैं)।
- शाम को काम के बाद के घंटों में एक अतिरिक्त घंटे की प्राकृतिक रोशनी मिलती है।
उदाहरण:
मान लीजिए किसी शहर में सामान्य समय (Standard Time) पर सूर्योदय सुबह 5 बजे और सूर्यास्त शाम 7 बजे होता है।
- DST लागू होने पर:
- घड़ियों को एक घंटा आगे कर दिया जाएगा।
- अब सूर्योदय सुबह 6 बजे होगा (पुरानी घड़ी के हिसाब से 5 बजे ही है)।
- सूर्यास्त शाम 8 बजे होगा (पुरानी घड़ी के हिसाब से 7 बजे)।
- परिणाम: लोगों को शाम को एक घंटा अतिरिक्त प्राकृतिक प्रकाश मिला, जिससे बिजली की खपत कम हुई और बाहरी गतिविधियों के लिए अधिक समय मिला।
उद्देश्य और लाभ (Objectives and Benefits)
| उद्देश्य/लाभ | विवरण |
| ऊर्जा की बचत | यह DST का सबसे प्रमुख और पारंपरिक तर्क है। शाम को अतिरिक्त प्राकृतिक प्रकाश मिलने से लोग बिजली की लाइटें देर से जलाते हैं, जिससे बिजली की खपत कम होती है। [SSC, CDS] |
| मनोरंजन और पर्यटन को बढ़ावा | शाम को एक घंटा अधिक उजाला मिलने से लोग काम के बाद शॉपिंग, खेलकूद और अन्य बाहरी गतिविधियों में अधिक समय बिता पाते हैं, जिससे पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है। |
| सड़क दुर्घटनाओं में कमी | शाम के व्यस्त समय (Rush Hour) में बेहतर दृश्यता होने से सड़क दुर्घटनाओं में कमी आती है। |
| अपराध दर में कमी | कुछ अध्ययनों के अनुसार, शाम को अधिक उजाला होने से सड़क पर होने वाले अपराधों में कमी आ सकती है। |
प्रक्रिया (Process)
- “स्प्रिंग फॉरवर्ड, फॉल बैक” (Spring Forward, Fall Back): यह DST को याद रखने का एक लोकप्रिय तरीका है।
- स्प्रिंग फॉरवर्ड: वसंत ऋतु (Spring) की शुरुआत में, आमतौर पर मार्च या अप्रैल में, घड़ियों को एक घंटा आगे किया जाता है।
- फॉल बैक: शरद ऋतु (Fall/Autumn) की शुरुआत में, आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में, घड़ियों को वापस एक घंटा पीछे कर दिया जाता है और मानक समय (Standard Time) फिर से लागू हो जाता है।
DST से संबंधित मुद्दे और आलोचनाएँ (Issues and Criticisms)
DST के कई नुकसान भी हैं, जिनके कारण इस पर लगातार बहस होती रहती है:
| मुद्दा | विवरण |
| स्वास्थ्य समस्याएं | घड़ी के समय में अचानक बदलाव से शरीर की प्राकृतिक घड़ी (जैविक घड़ी या सर्कैडियन रिदम) बाधित होती है। इससे नींद की समस्या, हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। |
| जटिलता और भ्रम | DST के कारण समय-निर्धारण, बैठकों और यात्रा में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, खासकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब अलग-अलग देश अलग-अलग समय पर DST लागू करते हैं। |
| आधुनिक जीवनशैली में कम प्रासंगिकता | कुछ आलोचकों का तर्क है कि आधुनिक समाज (24×7 अर्थव्यवस्था, एयर कंडीशनिंग) में ऊर्जा की बचत का पारंपरिक लाभ अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रहा। |
| किसानों के लिए असुविधा | पारंपरिक रूप से, किसान सूर्य के अनुसार काम करते हैं, न कि घड़ी के अनुसार। DST उनकी दिनचर्या में बाधा डालता है। |
वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत की स्थिति
- कौन उपयोग करता है? DST का उपयोग मुख्य रूप से शीतोष्ण कटिबंध (Temperate Zones) के देशों द्वारा किया जाता है, जहाँ गर्मियों और सर्दियों में दिन की लंबाई में महत्वपूर्ण अंतर होता है। उदाहरण: उत्तरी अमेरिका का अधिकांश हिस्सा और यूरोप।
- कौन उपयोग नहीं करता? भूमध्य रेखा के पास के उष्ण कटिबंधीय (Tropical) देशों में DST का उपयोग लगभग नहीं होता है, क्योंकि वहाँ वर्ष भर दिन की लंबाई में बहुत कम बदलाव होता है। [UPSC Prelims]
- भारत और DST:
- भारत वर्तमान में डेलाइट सेविंग टाइम का उपयोग नहीं करता है।
- इसका मुख्य कारण यह है कि भारत का विस्तार काफी बड़ा है, लेकिन उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहाँ दिन की लंबाई में उतना अधिक मौसमी अंतर नहीं होता जितना कि उच्च अक्षांशों वाले देशों में होता है।
- हालांकि, भारत में दो अलग-अलग समय क्षेत्रों (Time Zones) या DST को लागू करने पर समय-समय पर बहस होती रहती है, खासकर पूर्वोत्तर राज्यों की ऊर्जा बचाने और उत्पादकता बढ़ाने की मांग को लेकर। [UPSC Mains के लिए प्रासंगिक]
पृथ्वी की विभिन्न गतियाँ: परीक्षा की दृष्टि से
पृथ्वी स्थिर नहीं है; यह अंतरिक्ष में लगातार गति कर रही है। इसकी विभिन्न गतियाँ पृथ्वी पर जीवन, मौसम, दिन-रात और समय जैसी मूलभूत अवधारणाओं को जन्म देती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ सबसे महत्वपूर्ण हैं: घूर्णन (Rotation) और परिक्रमण (Revolution)।
1. घूर्णन या दैनिक गति (Rotation or Diarunal Motion): परीक्षा की दृष्टि से
घूर्णन, पृथ्वी की अपने अक्ष पर होने वाली गति है, जिसे दैनिक गति भी कहा जाता है क्योंकि इसके कारण ही दिन और रात का चक्र पूरा होता है। यह पृथ्वी की सबसे मौलिक गतियों में से एक है जिसके प्रभाव हम हर दिन अनुभव करते हैं।
मूल अवधारणाएँ
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| परिभाषा | पृथ्वी का अपनी काल्पनिक धुरी (Axis) पर घूमना। |
| अक्षीय झुकाव | यह धुरी अपनी कक्षा के तल पर सीधी न होकर 23.5° झुकी हुई है। |
| घूर्णन की दिशा | पश्चिम से पूर्व। जब हम उत्तरी ध्रुव के ऊपर से देखते हैं तो यह वामावर्त (Anticlockwise) दिशा होती है। |
| घूर्णन की अवधि | 23 घंटे, 56 मिनट और 4 सेकंड। यह एक नाक्षत्र दिवस (Sidereal Day) कहलाता है, यानी पृथ्वी को किसी दूर स्थित तारे के सापेक्ष एक चक्कर पूरा करने में लगा समय। |
| सौर दिवस (Solar Day) | ठीक 24 घंटे। यह पृथ्वी को सूर्य के सापेक्ष उसी स्थिति में वापस आने में लगा समय है। यह नाक्षत्र दिवस से लगभग 4 मिनट लंबा होता है क्योंकि इस दौरान पृथ्वी अपनी कक्षा में भी थोड़ा आगे बढ़ जाती है। |
| घूर्णन की गति | भूमध्य रेखा (Equator) पर सर्वाधिक (लगभग 1,670 किमी/घंटा)। ध्रुवों (Poles) पर शून्य (0)। [SSC, RRB] |
| प्रकाश वृत्त | वह काल्पनिक वृत्त जो पृथ्वी के प्रकाशित (दिन वाले) और अप्रकाशित (रात वाले) हिस्से को अलग करता है, प्रदीप्ति वृत्त (Circle of Illumination) कहलाता है। |
घूर्णन गति के प्रभाव और परिणाम (Effects of Rotation)
1. दिन और रात का होना (Occurrence of Day and Night)
- सबसे प्रमुख प्रभाव: पृथ्वी के घूमने के कारण, इसका हर हिस्सा बारी-बारी से सूर्य के सामने आता है और फिर सूर्य से दूर हो जाता है, जिससे क्रमशः दिन और रात का चक्रीय क्रम बनता है। यदि पृथ्वी घूमना बंद कर दे, तो इसके एक हिस्से पर स्थायी दिन और दूसरे पर स्थायी रात हो जाएगी। [यह लगभग हर सामान्य प्रतियोगी परीक्षा में पूछा जाने वाला प्रश्न है।]
2. कोरिओलिस बल का उत्पन्न होना (Generation of Coriolis Effect)
- वैज्ञानिक अवधारणा: यह घूर्णन से उत्पन्न एक आभासी बल है जो गतिमान वस्तुओं (जैसे हवा और समुद्री धाराओं) की दिशा को मोड़ देता है। [UPSC Prelims, CDS]
- प्रभाव:
- उत्तरी गोलार्ध में: हवाएँ और धाराएँ अपनी गति की दिशा से दाईं ओर मुड़ जाती हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध में: हवाएँ और धाराएँ अपनी गति की दिशा से बाईं ओर मुड़ जाती हैं।
- महत्व: यह चक्रवातों के घूर्णन की दिशा (उत्तरी गोलार्ध में वामावर्त, दक्षिणी में दक्षिणावर्त) और महासागरीय धाराओं के पैटर्न (जिसे ‘गायर’ कहते हैं) को निर्धारित करता है।
- नियम: यह फेरेल के नियम (Ferrel’s Law) का आधार है।
- शून्य प्रभाव: भूमध्य रेखा पर कोरिओलिस बल शून्य होता है।
3. सूर्योदय और सूर्यास्त की दिशा (Direction of Sunrise and Sunset)
- क्योंकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, हमें सूर्य पूर्व में उगता और पश्चिम में अस्त होता हुआ दिखाई देता है। यह पृथ्वी की घूर्णन दिशा का एक प्रत्यक्ष दृश्य प्रमाण है।
4. ज्वार-भाटा की आवृत्ति (Frequency of Tides)
- हालांकि ज्वार-भाटा मुख्य रूप से चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण होते हैं, लेकिन पृथ्वी के घूर्णन के कारण ही किसी स्थान पर प्रतिदिन दो बार उच्च ज्वार और दो बार निम्न ज्वार का पैटर्न अनुभव होता है।
5. पृथ्वी का भू-आभीय आकार (Oblate Spheroid Shape of Earth)
- घूर्णन के कारण भूमध्य रेखा पर अपकेंद्री बल (Centrifugal Force) कार्य करता है, जो पदार्थ को बाहर की ओर धकेलता है। इसी बल के कारण, पृथ्वी भूमध्य रेखा पर थोड़ी उभरी हुई (Bulge) और ध्रुवों पर थोड़ी चपटी (Flattened) है। इसी विशिष्ट आकार को भू-आभ (Geoid) या Oblate Spheroid कहते हैं।
- परिणाम: इसी कारण, भूमध्य रेखा पर गुरुत्वाकर्षण का मान ध्रुवों की तुलना में थोड़ा कम होता है और पृथ्वी की भूमध्यरेखीय त्रिज्या (Equatorial radius) उसकी ध्रुवीय त्रिज्या (Polar radius) से अधिक होती है। [NDA]
6. समय की अवधारणा (Concept of Time)
- पृथ्वी के घूर्णन ने ही घंटे, मिनट और सेकंड जैसी समय की इकाइयों की अवधारणा को जन्म दिया है। 24 घंटे की अवधि सीधे तौर पर पृथ्वी की एक घूर्णन अवधि से संबंधित है।
2. परिक्रमण या वार्षिक गति (Revolution or Annual Motion): परीक्षा की दृष्टि से
परिक्रमण, पृथ्वी की वह गति है जिसमें वह अपनी धुरी पर घूमते हुए एक निश्चित अंडाकार पथ पर सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। चूँकि इस गति को पूरा करने में लगभग एक वर्ष का समय लगता है, इसे वार्षिक गति भी कहा जाता है। यह गति पृथ्वी पर जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं, यानी ऋतु परिवर्तन, का मुख्य कारण है।
मूल अवधारणाएँ
| विशेषता | विवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| परिभाषा | पृथ्वी का एक दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) कक्षा में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना। |
| परिक्रमण की दिशा | पश्चिम से पूर्व (घूर्णन की दिशा के समान)। |
| अवधि | 365 दिन, 6 घंटे, 9 मिनट (लगभग 365.25 दिन)। यह एक सौर वर्ष है। |
| लीप वर्ष (Leap Year) | एक वर्ष 365.25 दिन का होता है। गणना की सुविधा के लिए हम एक वर्ष 365 दिन का मानते हैं। बचे हुए 6 घंटे हर चार साल में जुड़कर 24 घंटे (एक दिन) बन जाते हैं। इस अतिरिक्त दिन को हर चौथे वर्ष में फरवरी माह (29 फरवरी) में जोड़ दिया जाता है, और उस वर्ष को लीप वर्ष कहते हैं। [SSC, Railway – यह एक सामान्य ज्ञान का प्रश्न है।] |
| गति | औसत गति लगभग 29.8 किलोमीटर प्रति सेकंड या 1,07,000 किलोमीटर प्रति घंटा है। |
परिक्रमण गति के प्रभाव और परिणाम (Effects of Revolution)
1. ऋतु परिवर्तन (Change of Seasons) – सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव
- मूल कारण: ऋतु परिवर्तन का एकमात्र कारण पृथ्वी का परिक्रमण नहीं है, बल्कि परिक्रमण के साथ-साथ पृथ्वी का अपने अक्ष पर 23.5° झुके रहना है। यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी हुई नहीं होती, तो पृथ्वी पर कोई ऋतु परिवर्तन नहीं होता। [यह UPSC, CDS, NDA और SSC CGL की परीक्षाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है।]
- प्रक्रिया: जैसे ही झुकी हुई पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, वर्ष के अलग-अलग समय पर दोनों गोलार्धों (उत्तरी और दक्षिणी) की सूर्य के सापेक्ष स्थिति बदलती रहती है।
- ग्रीष्म ऋतु (Summer): जब कोई गोलार्ध सूर्य की ओर झुका होता है, तो उसे अधिक सीधी सौर किरणें और लंबे दिन मिलते हैं, जिससे गर्मी होती है।
- शीत ऋतु (Winter): जब वही गोलार्ध सूर्य से दूर झुका होता है, तो उसे अधिक तिरछी सौर किरणें और छोटे दिन मिलते हैं, जिससे सर्दी होती है।
2. अयनांत और विषुव की स्थिति (Solstices and Equinoxes)
पृथ्वी के अक्षीय झुकाव और परिक्रमण के कारण वर्ष में चार विशेष खगोलीय स्थितियाँ बनती हैं:
| घटना | तिथि (लगभग) | उत्तरी गोलार्ध की स्थिति | दक्षिणी गोलार्ध की स्थिति |
| ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice) | 21 जून | सबसे लंबा दिन, सबसे छोटी रात; सूर्य कर्क रेखा (23.5° N) के ऊपर लंबवत। | सबसे छोटा दिन, सबसे लंबी रात। |
| शीत अयनांत (Winter Solstice) | 22 दिसंबर | सबसे छोटा दिन, सबसे लंबी रात। | सबसे लंबा दिन, सबसे छोटी रात; सूर्य मकर रेखा (23.5° S) के ऊपर लंबवत। |
| वसंत विषुव (Spring Equinox) | 21 मार्च | दिन और रात बराबर; सूर्य भूमध्य रेखा (0°) के ऊपर लंबवत। | दिन और रात बराबर। |
| शरद विषुव (Autumn Equinox) | 23 सितंबर | दिन और रात बराबर; सूर्य भूमध्य रेखा (0°) के ऊपर लंबवत। | दिन और रात बराबर। |
3. दिन और रात की लंबाई में भिन्नता (Variation in the Length of Day and Night)
- भूमध्य रेखा को छोड़कर, पृथ्वी पर सभी स्थानों पर वर्ष भर दिन और रात की लंबाई बदलती रहती है। गर्मियों में दिन लंबे होते हैं और सर्दियों में छोटे।
- यह भिन्नता भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर बढ़ती जाती है। ध्रुवों पर 6 महीने का दिन और 6 महीने की रात होती है, जो परिक्रमण और अक्षीय झुकाव का चरम परिणाम है। [SSC, State PSC]
4. उपसौर और अपसौर की स्थिति (Perihelion and Aphelion)
पृथ्वी की अंडाकार कक्षा के कारण, सूर्य से इसकी दूरी साल भर बदलती है।
- उपसौर (Perihelion): लगभग 3 जनवरी। इस दिन पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (लगभग 147 मिलियन किमी) होती है। [CDS, NDA]
- अपसौर (Aphelion): लगभग 4 जुलाई। इस दिन पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर (लगभग 152 मिलियन किमी) होती है।
महत्वपूर्ण अवधारणा: उपसौर और अपसौर की स्थिति का पृथ्वी पर ऋतुओं के निर्धारण में नगण्य प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (उपसौर) होती है, तब उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु होती है। यह सिद्ध करता है कि ऋतुओं का मुख्य कारण पृथ्वी का अक्षीय झुकाव है, न कि सूर्य से दूरी।
3. अयन चलन या विषुव अयन (Precession of the Equinoxes)
यह एक कम ज्ञात लेकिन महत्वपूर्ण तीसरी गति है।
- अवधारणा: पृथ्वी का घूर्णन अक्ष स्थिर नहीं है, बल्कि यह एक लट्टू की तरह बहुत धीमी गति से डगमगाता (wobbles) है।
- अवधि: यह एक बहुत धीमी गति है और एक पूरा चक्र लगभग 26,000 वर्षों में पूरा होता है।
- प्रभाव: इस गति के कारण, ध्रुव तारे की स्थिति और विषुव तथा अयनांत की तिथियाँ धीरे-धीरे समय के साथ बदलती रहती हैं। आज हमारा ध्रुव तारा ‘पोलारिस’ है, लेकिन 13,000 वर्षों के बाद ‘वेगा’ हमारा ध्रुव तारा होगा।
पृथ्वी की ऋतुएँ (Seasons of the Earth): परीक्षा की दृष्टि से
पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन एक महत्वपूर्ण भौगोलिक और खगोलीय घटना है जो जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र को गहराई से प्रभावित करती है। यह प्रतियोगी परीक्षाओं का एक पसंदीदा विषय है क्योंकि यह पृथ्वी की दो प्रमुख गतियों और उसके अक्षीय झुकाव की संयुक्त समझ पर आधारित है।
ऋतु परिवर्तन का मुख्य कारण: एक भ्रांति और वास्तविकता
- सामान्य भ्रांति: बहुत से लोग मानते हैं कि जब पृथ्वी सूर्य के करीब होती है तो गर्मियाँ होती हैं और जब दूर होती है तो सर्दियाँ। यह पूरी तरह से गलत है। वास्तव में, जब उत्तरी गोलार्ध में सर्दियाँ होती हैं (जनवरी में), तब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (उपसौर) होती है।
- वैज्ञानिक वास्तविकता: पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन का एकमात्र और सबसे महत्वपूर्ण कारण पृथ्वी का अपनी कक्षा के तल पर 23.5° के अक्षीय झुकाव के साथ सूर्य की परिक्रमा (परिक्रमण) करना है। [यह UPSC, SSC CGL, CDS की परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है।]
यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी हुई नहीं होती, तो हर जगह वर्ष भर एक जैसा मौसम रहता।
ऋतु चक्र की प्रक्रिया (The Process of Seasonal Cycle)
जैसे-जैसे झुकी हुई पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, विभिन्न महीनों में गोलार्धों की सूर्य के सापेक्ष स्थिति बदलती है, जिससे सौर ऊर्जा के वितरण में अंतर आता है और ऋतुएँ बनती हैं। इस चक्र में चार प्रमुख स्थितियाँ होती हैं:
1. ग्रीष्म अयनांत / कर्क संक्रांति (Summer Solstice)
- तिथि: लगभग 21 जून।
- पृथ्वी की स्थिति: उत्तरी ध्रुव सूर्य की ओर अधिकतम झुका होता है।
- सूर्य की किरणें: सूर्य की किरणें सीधे कर्क रेखा (23.5° N) पर लंबवत पड़ती हैं।
- प्रभाव (उत्तरी गोलार्ध):
- सबसे लंबा दिन और सबसे छोटी रात।
- सौर ऊर्जा की अधिकतम प्राप्ति होती है।
- यह ग्रीष्म ऋतु का चरम होता है।
- प्रभाव (दक्षिणी गोलार्ध):
- यहाँ शीत ऋतु होती है।
- सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात होती है।
2. शरद विषुव (Autumnal Equinox)
- तिथि: लगभग 23 सितंबर।
- पृथ्वी की स्थिति: पृथ्वी का झुकाव न तो सूर्य की ओर होता है और न ही उससे दूर।
- सूर्य की किरणें: सूर्य की किरणें सीधे भूमध्य रेखा (0°) पर लंबवत पड़ती हैं।
- प्रभाव (पूरी पृथ्वी पर):
- दिन और रात की अवधि लगभग बराबर (12-12 घंटे) होती है।
- प्रभाव (गोलार्ध):
- उत्तरी गोलार्ध में शरद ऋतु की शुरुआत होती है।
- दक्षिणी गोलार्ध में वसंत ऋतु की शुरुआत होती है।
3. शीत अयनांत / मकर संक्रांति (Winter Solstice)
- तिथि: लगभग 22 दिसंबर।
- पृथ्वी की स्थिति: दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर अधिकतम झुका होता है, और उत्तरी ध्रुव सूर्य से दूर होता है।
- सूर्य की किरणें: सूर्य की किरणें सीधे मकर रेखा (23.5° S) पर लंबवत पड़ती हैं।
- प्रभाव (उत्तरी गोलार्ध):
- सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात।
- सौर ऊर्जा की न्यूनतम प्राप्ति होती है।
- यह शीत ऋतु का चरम होता है।
- प्रभाव (दक्षिणी गोलार्ध):
- यहाँ ग्रीष्म ऋतु होती है।
- सबसे लंबा दिन और सबसे छोटी रात होती है।
4. वसंत विषुव (Spring/Vernal Equinox)
- तिथि: लगभग 21 मार्च।
- पृथ्वी की स्थिति: पृथ्वी का झुकाव फिर से न तो सूर्य की ओर होता है और न ही उससे दूर।
- सूर्य की किरणें: सूर्य की किरणें एक बार फिर सीधे भूमध्य रेखा (0°) पर लंबवत पड़ती हैं।
- प्रभाव (पूरी पृथ्वी पर):
- दिन और रात की अवधि फिर से लगभग बराबर होती है।
- प्रभाव (गोलार्ध):
- उत्तरी गोलार्ध में वसंत ऋतु की शुरुआत होती है।
- दक्षिणी गोलार्ध में शरद ऋतु की शुरुआत होती है।
परीक्षा हेतु विशेष तथ्य और अवधारणाएँ
| तथ्य/अवधारणा | विवरण |
| भूमध्य रेखा पर ऋतुएँ | भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें वर्ष भर लगभग सीधी पड़ती हैं और दिन की लंबाई में कोई खास अंतर नहीं होता। इसलिए, यहाँ कोई स्पष्ट ऋतु परिवर्तन नहीं होता, बल्कि गर्म और आर्द्र जलवायु बनी रहती है। |
| ध्रुवों पर ऋतुएँ | ध्रुवों पर ऋतु परिवर्तन अपने चरम पर होता है: 6 महीने का दिन (ग्रीष्मकाल) और 6 महीने की रात (शीतकाल)। |
| उपसौर और अपसौर | उपसौर (Perihelion) (~3 जनवरी, पृथ्वी सूर्य के निकटतम) और अपसौर (Aphelion) (~4 जुलाई, पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर) का ऋतुओं पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता है। [यह एक सामान्य भ्रांति है, जिसे परीक्षाओं में जांचा जाता है।] |
| उत्तरायण और दक्षिणायन | * उत्तरायण: शीत अयनांत (22 दिसंबर) से ग्रीष्म अयनांत (21 जून) तक सूर्य की आभासी गति उत्तर की ओर होती है।<br> * दक्षिणायन: ग्रीष्म अयनांत (21 जून) से शीत अयनांत (22 दिसंबर) तक सूर्य की आभासी गति दक्षिण की ओर होती है। |
| तापमान का पिछड़ना (Lag of Temperature) | सबसे अधिक सौर ऊर्जा 21 जून को मिलती है, लेकिन उत्तरी गोलार्ध में सबसे गर्म महीने जुलाई-अगस्त होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पृथ्वी के वायुमंडल और महासागरों को गर्म होने में समय लगता है। इसे Seasonal Lag कहते हैं। |