ब्रह्मांड (The Universe)

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परिभाषा:
ब्रह्मांड, अस्तित्व में मौजूद हर चीज का कुल योग है। इसमें समय (Time), अंतरिक्ष (Space), पदार्थ (Matter), और ऊर्जा (Energy) शामिल हैं। यह छोटे परमाणुओं से लेकर विशाल आकाशगंगाओं तक सब कुछ समाहित करता है। ब्रह्मांड का अध्ययन ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) कहलाता है।


ब्रह्मांड की उत्पत्ति: 

महाविस्फोट सिद्धांत (The Big Bang Theory)

ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संबंध में महाविस्फोट सिद्धांत सबसे अधिक मान्य सिद्धांत है। इसे विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना भी कहा जाता है। [R.A.S./R.T.S.(Pre) 2007] यह सिद्धांत बताता है कि ब्रह्मांड की शुरुआत कैसे हुई और यह आज के स्वरूप में कैसे विकसित हुआ।

इस सिद्धांत के अनुसार, लगभग 13.8 अरब वर्ष पहले, ब्रह्मांड का संपूर्ण पदार्थ और ऊर्जा एक अत्यधिक गर्म और घने बिंदु में केंद्रित था, जिसे ‘एकाकी परमाणु’ या ‘सिंगुलैरिटी’ (Singularity) कहा गया। इस बिंदु का आयतन अत्यंत सूक्ष्म और तापमान तथा घनत्व अनंत था।

वैज्ञानिकों का योगदान

वैज्ञानिकयोगदान
जॉर्ज लेमैत्रेबेल्जियम के खगोलशास्त्री और पादरी, जिन्होंने 1927 में सबसे पहले इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने इसे “आदिम परमाणु की परिकल्पना” कहा।
एडविन हबल1929 में, इन्होंने प्रमाण दिया कि आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से दूर जा रही हैं, जिससे ब्रह्मांड के विस्तार की पुष्टि हुई।
रॉबर्ट वैगनरइन्होंने 1967 में इस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की।

महाविस्फोट के प्रमुख चरण

समयघटना
घटना का आरंभ (t=0)एकाकी परमाणु में एक भीषण विस्फोट हुआ, जिसे महाविस्फोट कहा गया। इसी के साथ समय, स्थान और ऊर्जा का प्रादुर्भाव हुआ।
पहले कुछ सेकंड मेंब्रह्मांड का अत्यधिक तीव्रता से विस्तार हुआ (स्फीति)। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन जैसे मूलभूत कणों का निर्माण हुआ।
पहले 3 मिनट के भीतरब्रह्मांड ठंडा होने पर प्रोटॉन और न्यूट्रॉन मिलकर हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्वों के नाभिक बनाने लगे।
लगभग 3.8 लाख वर्ष बादब्रह्मांड और ठंडा हुआ, जिससे परमाणु नाभिक इलेक्ट्रॉनों को पकड़कर उदासीन परमाणु बना सके। ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया और प्रकाश पहली बार स्वतंत्र रूप से यात्रा करने लगा। इसी समय का अवशेष कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड विकिरण है।
30 करोड़ से 1 अरब वर्ष बादगुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में पदार्थ का जमावड़ा शुरू हुआ और पहली आकाशगंगाओं तथा तारों का निर्माण आरंभ हुआ।
लगभग 9 अरब वर्ष बाद (आज से 4.5 अरब वर्ष पूर्व)सौरमंडल का विकास हुआ, जिसमें सूर्य, ग्रहों और उपग्रहों का निर्माण हुआ।
वर्तमान (लगभग 13.8 अरब वर्ष बाद)ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। आकाशगंगाएँ एक दूसरे से दूर जा रही हैं।

सिद्धांत के पक्ष में साक्ष्य

PYQ:

प्रश्न: “बिग बैंग सिद्धांत” किसकी व्याख्या करता है?
(a) सौर मंडल का निर्माण
(b) आकाशगंगाओं का निर्माण
(c) ब्रह्मांड की उत्पत्ति
(d) तारों का जीवन चक्र
[UPSC Prelims 2018]

अवधारणाएं: ‘इवेंट होराइजन’, ‘सिंगुलैरिटी’, ‘स्ट्रिंग थ्योरी’ और ‘स्टैंडर्ड मॉडल’

ये अवधारणाएं आधुनिक भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान से संबंधित हैं तथा ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने का प्रयास करती हैं। ‘इवेंट होराइजन’, ‘सिंगुलैरिटी’, ‘स्ट्रिंग थ्योरी’ और ‘स्टैंडर्ड मॉडल’ जैसे शब्द अक्सर ब्रह्मांड की अवधारणा और समझ के संदर्भ में समाचारों में आते हैं। [UPSC Prelims 2017]

सिंगुलैरिटी (Singularity)

इवेंट होराइजन (Event Horizon)

स्ट्रिंग थ्योरी (String Theory)

स्टैंडर्ड मॉडल (Standard Model)


ब्रह्मांड के मॉडल: भू-केंद्रित और सूर्य-केंद्रित दृष्टिकोण

ब्रह्मांड की संरचना को समझने के लिए प्राचीन काल से दो प्रमुख और परस्पर विरोधी अवधारणाएं प्रचलित रही हैं। ये अवधारणाएं इस बात पर आधारित थीं कि ब्रह्मांड का केंद्र क्या है – पृथ्वी या सूर्य।

भू-केंद्रित अवधारणा (Geocentric Model)

यह एक प्राचीन अवधारणा है, जिसके अनुसार पृथ्वी को पूरे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता था।

सूर्य-केंद्रित अवधारणा (Heliocentric Model)

यह एक वैज्ञानिक क्रांति की शुरुआत थी, जिसने ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को पूरी तरह से बदल दिया।


दोनों अवधारणाओं की तुलना

विशेषताभू-केंद्रित मॉडल (टॉलेमी)सूर्य-केंद्रित मॉडल (कॉपरनिकस)
केंद्रपृथ्वीसूर्य
पृथ्वी की स्थितिस्थिर और केंद्र मेंगतिशील, सूर्य की परिक्रमा करती है
सूर्य की स्थितिपृथ्वी की परिक्रमा करता हैकेंद्र में स्थिर है
वैज्ञानिक आधारसामान्य अवलोकन पर आधारितगणितीय गणनाओं और दूरबीन के प्रेक्षणों पर आधारित
वर्तमान स्थितिऐतिहासिक और अमान्यवैज्ञानिक रूप से सिद्ध और मान्य


ब्रह्मांड के घटक (Components of the Universe)

ब्रह्मांड आश्चर्यजनक रूप से खाली है, लेकिन यह अविश्वसनीय संरचनाओं से भरा है।

घटक (Component)विवरण (Description)उदाहरण
आकाशगंगा (Galaxy)गुरुत्वाकर्षण द्वारा एक साथ बंधे अरबों तारों, गैस, धूल और डार्क मैटर का एक विशाल समूह।हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी (Milky Way) है। हमारी निकटतम बड़ी आकाशगंगा एंड्रोमेडा है। [SSC CGL 2017]
तारे (Stars)गर्म प्लाज्मा के विशाल, चमकदार गोले। इनकी ऊर्जा इनके केंद्र में होने वाली नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया से आती है।हमारा सूर्य एक तारा है। [BPSC 2018]
सौर मंडल (Solar System)एक तारे (जैसे सूर्य) और उसकी परिक्रमा करने वाले खगोलीय पिंडों (ग्रह, बौने ग्रह, क्षुद्रग्रह, धूमकेतु) का एक समूह।हमारा सौर मंडल।
नीहारिका (Nebula)गैस (मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम) और धूल के विशाल बादल। इन्हें “तारों की नर्सरी” भी कहा जाता है, क्योंकि यहीं नए तारे जन्म लेते हैं।ओरियन नेबुला।

ब्रह्मांड का रहस्यमयी पक्ष:

ब्रह्मांड का अधिकांश हिस्सा उस पदार्थ से नहीं बना है जिसे हम देख या छू सकते हैं।


आकाशगंगा (Galaxy)

आकाशगंगा, जिसे गैलेक्सी भी कहा जाता है, अरबों तारों, उनके सौरमंडलों, धूल के कणों और गैस के विशाल बादलों का एक विशाल संग्रह है जो गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा एक साथ बंधा होता है। ब्रह्मांड में अरबों आकाशगंगाएँ मौजूद हैं, और हमारा सौर मंडल भी एक ऐसी ही आकाशगंगा का हिस्सा है।

हमारी आकाशगंगा: मिल्की वे (The Milky Way)

हमारा सौर मंडल जिस आकाशगंगा में स्थित है, उसे मिल्की वे (Milky Way) या मंदाकिनी के नाम से जाना जाता है। रात के साफ आसमान में, यह एक छोर से दूसरे छोर तक फैली एक धुंधली, दूधिया रोशनी की पट्टी के रूप में दिखाई देती है, इसीलिए इसका नाम “मिल्की वे” पड़ा।

मिल्की वे की मुख्य विशेषताएँ


सौर मंडल की स्थिति


आकाशगंगा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यविवरण
सबसे नजदीकी बड़ी आकाशगंगाएंड्रोमेडा गैलेक्सी (Andromeda Galaxy) हमारी आकाशगंगा की सबसे निकटतम बड़ी आकाशगंगा है।
आकाशगंगा की खोजगैलीलियो गैलिली पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी दूरबीन से यह सिद्ध किया कि यह दूधिया पट्टी वास्तव में अनगिनत तारों का एक विशाल समूह है।
सूर्य का सबसे निकटतम ताराप्रॉक्सिमा सेंटॉरी (Proxima Centauri)
सौर मंडल के बाहर सबसे चमकीला तारासाइरस (Sirius), जिसे डॉग स्टार (Dog Star) भी कहा जाता है, रात के आकाश में दिखने वाला सबसे चमकीला तारा है।

तारे (Stars)

तारे अत्यधिक गर्म और चमकदार खगोलीय पिंड हैं जो गैस और प्लाज्मा से बने होते हैं। ये अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण द्वारा एक साथ बंधे रहते हैं। तारों के केंद्र में नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया होती है, जिसमें हाइड्रोजन के परमाणु मिलकर हीलियम बनाते हैं। इसी प्रक्रिया के कारण तारे भारी मात्रा में ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। हमारा सूर्य भी एक तारा है।

तारों का जीवन चक्र

किसी तारे का जीवन चक्र और उसका अंतिम भविष्य उसके प्रारंभिक द्रव्यमान (Mass) पर निर्भर करता है।

तारों के जन्म का सिद्धांत: गुरुत्वाकर्षण पतन मॉडल

तारों के जन्म की प्रक्रिया को समझाने वाला सबसे स्वीकृत वैज्ञानिक सिद्धांत गुरुत्वाकर्षण पतन (Gravitational Collapse) का मॉडल है। इस सिद्धांत के अनुसार, तारों का निर्माण सीधे तौर पर नहीं होता, बल्कि यह एक लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया का परिणाम है जो अरबों वर्षों तक चल सकती है।

सिद्धांत के मुख्य चरण

यह सिद्धांत बताता है कि तारों का जन्म विशाल, ठंडे और घने आणविक बादलों (Giant Molecular Clouds) के भीतर होता है। इन बादलों को तारकीय नेबुला (Stellar Nebula) या निहारिका भी कहा जाता है।

चरण 1: विशाल आणविक बादल और जीन्स अस्थिरता (Jeans Instability)

चरण 2: गुरुत्वाकर्षण पतन और विखंडन (Gravitational Collapse & Fragmentation)

चरण 3: आदि तारे का निर्माण (Formation of a Protostar)

चरण 4: एक्रिशन डिस्क और नाभिकीय संलयन की शुरुआत

चरण 5: एक स्थिर तारे का जन्म


प्रक्रिया का सारांश

चरणमुख्य प्रक्रियापरिणाम
नेबुलागैस और धूल का स्थिर बादलतारे के निर्माण के लिए कच्चा माल
गुरुत्वाकर्षण पतनबादल का अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़नाबादल का छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटना
आदि तारा (Protostar)केंद्र में पदार्थ का जमाव और तापमान में वृद्धिगर्म और घना कोर जो अभी तारा नहीं बना है
नाभिकीय संलयनकेंद्र में हाइड्रोजन का हीलियम में बदलनाऊर्जा का भारी मात्रा में उत्सर्जन
मुख्य अनुक्रम तारागुरुत्वाकर्षण और ऊर्जा के दबाव में संतुलनएक स्थिर और चमकदार तारे का जन्म

2. मुख्य अनुक्रम तारा (Main Sequence Star)

3. तारे का अंत: द्रव्यमान पर आधारित दो पथ

तारे का ईंधन (हाइड्रोजन) समाप्त होने के बाद उसका भविष्य उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है।

पथ A: औसत द्रव्यमान वाले तारे (जैसे सूर्य)

  1. लाल दानव (Red Giant): जब तारे के केंद्र में हाइड्रोजन खत्म हो जाती है, तो वह फूलकर बहुत बड़ा और ठंडा हो जाता है, जिसे लाल दानव कहते हैं। इसका रंग लाल दिखाई देता है।
  2. ग्रहीय नेबुला (Planetary Nebula): इसके बाद, तारे की बाहरी परतें अंतरिक्ष में फैल जाती हैं, जिससे गैस और धूल का एक चमकदार खोल बनता है, जिसे ग्रहीय नेबुला कहते हैं।
  3. श्वेत वामन (White Dwarf): बाहरी परतों के फैल जाने के बाद तारे का केवल अत्यधिक गर्म और सघन केंद्र ही बचता है। इस अवशेष को श्वेत वामन कहते हैं। यह धीरे-धीरे अरबों वर्षों में ठंडा होता जाता है।
  4. काला वामन (Black Dwarf): यह एक श्वेत वामन का सैद्धांतिक अंतिम चरण है, जब वह अपनी सारी ऊष्मा खोकर पूरी तरह से ठंडा और अंधकारमय हो जाता है।

पथ B: विशाल द्रव्यमान वाले तारे (सूर्य से कई गुना बड़े)

  1. लाल महादानव (Red Supergiant): ये तारे फूलकर लाल दानव से भी कई गुना बड़े हो जाते हैं।
  2. सुपरनोवा (Supernova): अंत में, तारे का केंद्र अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण ढह जाता है और एक भयंकर विस्फोट होता है, जिसे सुपरनोवा कहा जाता है। इस विस्फोट के दौरान भारी तत्वों का निर्माण होता है और immense ऊर्जा निकलती है।
  3. अवशेष: सुपरनोवा विस्फोट के बाद दो संभावनाएं होती हैं:
    • न्यूट्रॉन तारा (Neutron Star): यदि मूल तारे का द्रव्यमान बहुत अधिक नहीं था, तो एक अत्यधिक सघन पिंड बचता है, जिसे न्यूट्रॉन तारा कहते हैं। तेजी से घूमने वाले न्यूट्रॉन तारे पल्सर (Pulsar) कहलाते हैं।
    • ब्लैक होल (Black Hole): यदि मूल तारा बहुत विशाल था, तो गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि वह अपने केंद्र को असीमित घनत्व तक संकुचित कर देता है, जिससे एक ब्लैक होल का निर्माण होता है।

यूपीएससी परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यविवरण
तारे का रंगकिसी तारे का रंग उसकी सतह के तापमान का सूचक होता है। [UPSC Prelims] नीले रंग के तारे सबसे गर्म, जबकि लाल रंग के तारे सबसे ठंडे होते हैं।
चंद्रशेखर सीमा(Chandrasekhar Limit) यह किसी स्थिर श्वेत वामन तारे की अधिकतम संभव द्रव्यमान सीमा (लगभग 1.44 सौर द्रव्यमान) है। यदि किसी तारे का अवशेष इस सीमा से अधिक होता है, तो वह एक न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल में ढह जाएगा। इस सिद्धांत का प्रतिपादन भारतीय-अमेरिकी खगोलभौतिकविद् सुब्रह्मण्यन् चंद्रशेखर ने किया था। [UPPSC (Mains) 2014, UPSC Prelims]
सूर्य का भविष्यहमारा सूर्य अपने जीवन के अंत में एक श्वेत वामन (White Dwarf) बनेगा।
तारकीय ईंधनतारों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत हाइड्रोजन और हीलियम का नाभिकीय संलयन है।
निकटतम तारापृथ्वी का सबसे निकटतम तारा सूर्य है। सौर मंडल के सबसे निकट का तारा प्रॉक्सिमा सेंटॉरी (Proxima Centauri) है। [SSC]
सबसे चमकीला तारारात के आकाश में दिखाई देने वाला सबसे चमकीला तारा साइरस (Sirius) है, जिसे डॉग स्टार भी कहा जाता है। [RRB]
कृष्ण छिद्र (ब्लैक होल)यह एक ऐसा खगोलीय क्षेत्र है जिसका गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि प्रकाश सहित कुछ भी इसके खिंचाव से बच नहीं सकता। यह सिद्धांत अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत द्वारा दिया गया था। [CDS 2020]


ब्रह्मांड की संरचना और पैमाना (Structure and Scale of the Universe)

ब्रह्मांड एक विशाल पदानुक्रम में व्यवस्थित है:

ग्रह ➔ सौर मंडल ➔ आकाशगंगा ➔ स्थानीय समूह ➔ सुपरक्लस्टर ➔ अवलोकन योग्य ब्रह्मांड

PYQ:

प्रश्न: प्रकाश वर्ष (Light-year) किसकी माप की इकाई है?
(a) समय
(b) प्रकाश की गति
(c) दूरी
(d) ऊर्जा
[Railway NTPC 2021]


ब्रह्मांड का भविष्य (The Future of the Universe)

ब्रह्मांड के अंतिम भाग्य के बारे में कई सिद्धांत हैं, जो मुख्य रूप से डार्क ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण के बीच की लड़ाई पर निर्भर करते हैं:

  1. बिग फ्रीज (Big Freeze) या हीट डेथ: यह सबसे स्वीकृत सिद्धांत है। यदि डार्क ऊर्जा स्थिर रहती है, तो ब्रह्मांड हमेशा के लिए फैलता रहेगा। आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से बहुत दूर चली जाएँगी, तारे जलकर खत्म हो जाएंगे, और ब्रह्मांड ठंडा, अंधकारमय और निर्जीव हो जाएगा।
  2. बिग क्रंच (Big Crunch): यदि गुरुत्वाकर्षण अंततः डार्क ऊर्जा पर हावी हो जाता है, तो ब्रह्मांड का विस्तार धीमा हो जाएगा, रुक जाएगा, और फिर वापस अपने आप में ढहना शुरू कर देगा, अंततः एक और विलक्षणता में समाप्त हो जाएगा।
  3. बिग रिप (Big Rip): एक और संभावना है कि डार्क ऊर्जा समय के साथ और अधिक शक्तिशाली हो जाएगी। यदि ऐसा होता है, तो यह अंततः गुरुत्वाकर्षण पर इतना हावी हो जाएगी कि यह आकाशगंगाओं, तारों, ग्रहों और अंत में परमाणुओं को भी चीर कर अलग कर देगी।

तारामंडल (Constellation)

तारामंडल, जिसे नक्षत्रमंडल भी कहा जाता है, आकाश में दिखाई देने वाले तारों के एक ऐसे समूह को कहते हैं जो एक विशेष आकृति या पैटर्न बनाते हुए प्रतीत होते हैं। प्राचीन काल से ही विभिन्न सभ्यताओं ने इन आकृतियों की पहचान करने और उन्हें पौराणिक कथाओं के पात्रों, जानवरों या वस्तुओं का रूप देने के लिए अपनी कल्पना का उपयोग किया है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, एक तारामंडल के तारे आवश्यक रूप से एक-दूसरे के करीब नहीं होते हैं। वे पृथ्वी से देखने पर एक ही दिशा में स्थित होने के कारण एक समूह के रूप में दिखाई देते हैं, जबकि वास्तविकता में उनके बीच अरबों किलोमीटर की दूरी हो सकती है।

आधुनिक खगोल विज्ञान में, आकाश को 88 आधिकारिक तारामंडलों में विभाजित किया गया है। यह विभाजन अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) द्वारा किया गया है, ताकि खगोलशास्त्री आकाश के किसी भी हिस्से की स्थिति को सटीकता से बता सकें।

प्रमुख और आसानी से पहचाने जाने वाले तारामंडल

तारामंडल का नाम (अंतर्राष्ट्रीय)भारतीय नाममुख्य पहचान / आकृतिमहत्वपूर्ण तथ्य
Ursa Majorसप्तऋषि मंडलसात सबसे चमकीले तारे एक बड़ी करछुल या प्रश्न चिह्न की आकृति बनाते हैं।इसके दो संकेतक तारों की मदद से ध्रुव तारे (Pole Star) का पता लगाया जा सकता है। यह पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध से दिखाई देता है। [UPPSC Prelims]
Ursa Minorलघु सप्तऋषि मंडलयह भी एक छोटी करछुल जैसी आकृति बनाता है।ध्रुव तारा (Dhruva Tara) इसी तारामंडल का सबसे चमकीला सदस्य है और यह इसके हैंडल के सिरे पर स्थित है। [SSC CGL]
Orionमृग / कालपुरुषतीन चमकीले तारे एक सीधी रेखा में स्थित हैं, जो “शिकारी की बेल्ट” कहलाते हैं।यह सर्दियों के आकाश में दिखाई देने वाले सबसे प्रमुख तारामंडलों में से एक है। इसमें साइरस (Sirius), जो रात का सबसे चमकीला तारा है, को खोजने में मदद मिलती है। [RRB NTPC]
Cassiopeiaशर्मिष्ठाअंग्रेजी के अक्षर ‘M’ या ‘W’ जैसी आकृति।यह उत्तरी आकाश में सप्तऋषि के विपरीत दिशा में स्थित होता है और ध्रुव तारे के चारों ओर घूमता हुआ दिखाई देता है।
Scorpiusवृश्चिकएक बिच्छू जैसी आकृति।इसका सबसे चमकीला तारा अन्टारेस (Antares) है, जो एक लाल महादानव (Red Supergiant) तारा है और जिसे ज्येष्ठा नक्षत्र कहा जाता है।

राशि मंडल (Zodiac Constellations)

राशि मंडल उन 12 तारामंडलों का समूह है जो क्रांतिवृत्त (Ecliptic) पर स्थित हैं। क्रांतिवृत्त आकाश में सूर्य का वह काल्पनिक पथ है जिस पर वह पूरे वर्ष चलता हुआ प्रतीत होता है। ज्योतिष शास्त्र में इन राशियों का विशेष महत्व है, लेकिन खगोल विज्ञान में ये आकाश के 12 विशेष खंड हैं।


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यविवरण
कुल तारामंडलअंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने आकाश को 88 आधिकारिक तारामंडलों में बांटा है। [State PSC]
सबसे बड़ा तारामंडलक्षेत्रफल की दृष्टि से हाइड्रा (Hydra) सबसे बड़ा तारामंडल है।
ध्रुव तारा (Pole Star)यह हमेशा उत्तर दिशा को इंगित करता है। यह पृथ्वी के घूर्णन अक्ष की सीध में स्थित होने के कारण आकाश में लगभग स्थिर प्रतीत होता है।
नक्षत्र और तारामंडल में अंतरभारतीय ज्योतिष में नक्षत्र (Lunar Mansions) चंद्रमा के पथ को 27 भागों में बांटते हैं, जबकि तारामंडल (Constellations) तारों द्वारा बनाई गई एक व्यापक आकृति या आकाश का एक क्षेत्र है।

सौरमंडल (Solar System)

सौरमंडल, सूर्य और उन सभी खगोलीय पिंडों का एक गुरुत्वाकर्षण रूप से बंधा हुआ निकाय है जो सीधे या परोक्ष रूप से इसकी परिक्रमा करते हैं। इसमें केंद्र में सूर्य, आठ ग्रह, उनके 170 से अधिक ज्ञात उपग्रह, बौने ग्रह, और अरबों की संख्या में छोटे पिंड जैसे क्षुद्रग्रह, धूमकेतु और उल्कापिंड शामिल हैं।

सूर्य (The Sun)

ग्रह (Planets)

सौरमंडल में कुल आठ ग्रह हैं, जो सूर्य से दूरी के बढ़ते क्रम में इस प्रकार हैं: बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण। इन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. आंतरिक या पार्थिव ग्रह (Inner or Terrestrial Planets): ये सूर्य के निकटतम चार ग्रह (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल) हैं। ये मुख्य रूप से चट्टानों और धातुओं से बने हैं और इनका घनत्व अधिक होता है।
  2. बाह्य या जोवियन ग्रह (Outer or Jovian Planets): ये अंतिम चार ग्रह (बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण) हैं। ये विशाल गैस के गोले हैं, जिन्हें गैस दानव (Gas Giants) भी कहा जाता है। इनका आकार बहुत बड़ा है और घनत्व कम होता है। इन सभी के चारों ओर वलय (Rings) पाए जाते हैं।

सौरमंडल के ग्रहों का अवलोकन

ग्रह का नाम (Hindi/English)सूर्य से क्रमप्रमुख विशेषताएँ
बुध (Mercury)पहलासबसे छोटा और सूर्य के सबसे निकट का ग्रह। इसका कोई उपग्रह नहीं है।
शुक्र (Venus)दूसरापृथ्वी का “जुड़वां ग्रह” कहलाता है। यह सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है (घने वायुमंडल के कारण)। इसे “भोर का तारा” और “सांझ का तारा” भी कहते हैं। [UPPSC, SSC CGL]
पृथ्वी (Earth)तीसरानीला ग्रह कहलाता है (जल की उपस्थिति के कारण)। सौरमंडल का एकमात्र ग्रह जहाँ जीवन ज्ञात है।
मंगल (Mars)चौथालाल ग्रह कहलाता है (आयरन ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण)। इसके दो उपग्रह हैं- फोबोस और डीमोस। [SSC]
बृहस्पति (Jupiter)पाँचवाँसौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह। इस पर एक विशालकाय लाल धब्बा (Great Red Spot) है, जो एक सदियों पुराना तूफान है। [BPSC]
शनि (Saturn)छठाअपने शानदार वलयों (Rings) के लिए जाना जाता है जो बर्फ और चट्टान के कणों से बने हैं। इसका घनत्व पानी से भी कम है।
अरुण (Uranus)सातवाँअपने अक्ष पर अत्यधिक झुकाव के कारण इसे “लेटा हुआ ग्रह” कहते हैं। इसका रंग मीथेन गैस के कारण हरा-नीला है।
वरुण (Neptune)आठवाँसूर्य से सबसे दूर स्थित ग्रह। यह सबसे ठंडा ग्रह है और सूर्य की एक परिक्रमा करने में सबसे अधिक समय (लगभग 165 वर्ष) लेता है।

सौरमंडल के अन्य पिंड

पिंडविवरण
बौने ग्रह (Dwarf Planets)ये ग्रहों की तरह ही सूर्य की परिक्रमा करते हैं और लगभग गोलाकार होते हैं, लेकिन इन्होंने अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र को अन्य पिंडों से साफ नहीं किया होता है। प्लूटो (Pluto) इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
क्षुद्रग्रह (Asteroids)ये चट्टानी और धात्विक पिंड हैं जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं। अधिकांश क्षुद्रग्रह मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के बीच स्थित मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्ट (Main Asteroid Belt) में पाए जाते हैं। [UPSC Prelims, SSC]
धूमकेतु (Comets)ये धूल, बर्फ और गैसों के बने खगोलीय पिंड हैं। जब ये सूर्य के पास आते हैं, तो गर्म होकर गैस और धूल की एक पूंछ छोड़ते हैं जो हमेशा सूर्य से विपरीत दिशा में होती है। हैली का धूमकेतु (Halley’s Comet) हर 76 वर्ष में दिखाई देता है। [State PSC]
उल्का और उल्कापिंड (Meteor & Meteorite)जब कोई छोटा क्षुद्रग्रह (उल्कापिंड) पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो घर्षण से जलने लगता है और एक चमकदार धारी बनाता है, जिसे उल्का (Meteor) या “टूटता तारा” कहते हैं। यदि उसका कोई भाग बिना जले पृथ्वी की सतह तक पहुंचता है, तो उसे उल्कापिंड (Meteorite) कहते हैं।

सूर्य (The Sun)

सूर्य हमारे सौरमंडल के केंद्र में स्थित एक तारा है। यह अत्यधिक गर्म गैसों, मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम का एक विशाल, धधकता हुआ गोला है। सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल ही पूरे सौरमंडल को एक साथ बांधे रखता है, जिसके कारण ग्रह और अन्य पिंड इसकी परिक्रमा करते हैं। यह पृथ्वी पर जीवन के लिए ऊर्जा का अंतिम स्रोत है।

सूर्य की आंतरिक संरचना (Internal Structure)

सूर्य की आंतरिक संरचना को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:

  1. क्रोड (Core):
    • यह सूर्य का सबसे भीतरी और सबसे गर्म भाग है।
    • यहाँ का तापमान लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस और दबाव अत्यंत उच्च होता है।
    • इसी क्षेत्र में नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया होती है, जो सूर्य की ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। [SSC CGL, BPSC Prelims, RRB]
  2. विकिरण मेखला (Radiative Zone):
    • यह क्रोड के चारों ओर का क्षेत्र है।
    • क्रोड में उत्पन्न ऊर्जा इस क्षेत्र से फोटॉन (प्रकाश के कण) के रूप में बाहर की ओर यात्रा करती है।
    • इस क्षेत्र का घनत्व बहुत अधिक होने के कारण ऊर्जा को इससे बाहर निकलने में लाखों वर्ष लग सकते हैं।
  3. संवहन मेखला (Convective Zone):
    • यह सूर्य की सबसे बाहरी आंतरिक परत है।
    • इस क्षेत्र में ऊर्जा का स्थानांतरण संवहन धाराओं (Convection Currents) के माध्यम से होता है, ठीक वैसे ही जैसे पानी उबलता है। गर्म प्लाज्मा ऊपर उठता है, सतह पर ठंडा होता है, और फिर वापस नीचे धंस जाता है।

सूर्य का वायुमंडल (Atmosphere)

सूर्य की सतह के ऊपर के गैसीय आवरण को उसका वायुमंडल कहते हैं, जिसे तीन परतों में बांटा गया है:

  1. प्रकाशमंडल (Photosphere):
    • यह सूर्य की वह सतह है जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं।
    • इसका तापमान लगभग 5,500 डिग्री सेल्सियस होता है।
    • सौर कलंक (Sunspots) इसी परत में दिखाई देने वाले गहरे और ठंडे क्षेत्र हैं। [SSC, RRB NTPC]
  2. वर्णमंडल (Chromosphere):
    • यह प्रकाशमंडल के ऊपर स्थित एक पतली और लाल रंग की परत है।
    • यह सामान्यतः दिखाई नहीं देती, लेकिन पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान इसे देखा जा सकता है।
  3. कोरोना / किरीट (Corona):
    • यह सूर्य के वायुमंडल की सबसे बाहरी और सबसे विस्तृत परत है।
    • इसका तापमान आश्चर्यजनक रूप से लाखों डिग्री सेल्सियस तक होता है।
    • यह भी केवल पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय ही दिखाई देता है। [UPSC Prelims, CDS]

सूर्य से जुड़ी प्रमुख घटनाएं

घटनाविवरण
नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)सूर्य के क्रोड में हाइड्रोजन के परमाणु मिलकर हीलियम बनाते हैं, जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही सूर्य की ऊर्जा का स्रोत है। [UPPSC]
सौर कलंक (Sunspots)प्रकाशमंडल पर दिखाई देने वाले अपेक्षाकृत ठंडे (लगभग 4,000°C) और गहरे धब्बे जो तीव्र चुंबकीय गतिविधि के क्षेत्र होते हैं। इनका एक पूरा चक्र 11 वर्षों का होता है। [NDA, CDS]
सौर पवन (Solar Wind)सूर्य के कोरोना से निकलने वाले आवेशित कणों की एक धारा जो पूरे सौरमंडल में फैलती है। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराने पर यह ध्रुवीय ज्योति (Auroras) का निर्माण करती है।
सौर ज्वाला (Solar Flare)सौर कलंक के आसपास होने वाला एक शक्तिशाली ऊर्जा का विस्फोट, जो अंतरिक्ष में भारी मात्रा में विकिरण फेंकता है।

सूर्य से जुड़ी प्रमुख घटनाएं (विस्तृत विवरण)

सूर्य एक अत्यंत सक्रिय और गतिशील तारा है। इसकी सतह और वायुमंडल में लगातार ऐसी शक्तिशाली घटनाएं होती रहती हैं जो न केवल अद्भुत होती हैं बल्कि पूरे सौरमंडल पर, विशेषकर पृथ्वी पर, गहरा प्रभाव डालती हैं।

सौर कलंक (Sunspots)

परिभाषा:
सौर कलंक (या सनस्पॉट) सूर्य की दिखाई देने वाली सतह, यानी प्रकाशमंडल (Photosphere) पर मौजूद अस्थायी धब्बे हैं। ये अपने आसपास के क्षेत्र की तुलना में अधिक ठंडे और गहरे रंग के दिखाई देते हैं।

विस्तृत विवरण:
ये कोई स्थायी दाग नहीं हैं, बल्कि तीव्र चुंबकीय गतिविधि के क्षेत्र हैं। सूर्य के भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं कई बार उलझकर सतह पर आ जाती हैं। जब ऐसा होता है, तो यह शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र अपने नीचे से गर्म प्लाज्मा की संवहन धाराओं को सतह तक आने से रोक देता है। ऊर्जा का यह प्रवाह रुकने के कारण सतह का वह हिस्सा ठंडा हो जाता है (लगभग 4,000°C) और आसपास के गर्म क्षेत्र (लगभग 5,500°C) की तुलना में काला दिखाई देता है। इनका आकार पृथ्वी से भी कई गुना बड़ा हो सकता है। सौर कलंकों की संख्या एक लगभग 11-वर्षीय चक्र में घटती-बढ़ती है, जिसे सौर चक्र कहा जाता है। [NDA, CDS]

सौर ज्वाला (Solar Flare)

परिभाषा:
यह सूर्य के वायुमंडल में चुंबकीय ऊर्जा के अचानक मुक्त होने से होने वाला विकिरण का एक प्रचंड विस्फोट है। यह अक्सर सौर कलंकों के पास होता है।

विस्तृत विवरण:
जब सौर कलंकों के आसपास अत्यधिक उलझी हुई चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं अचानक टूटती हैं और पुनर्व्यवस्थित होती हैं, तो इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के लगभग हर हिस्से में (रेडियो तरंगों से लेकर एक्स-रे और गामा किरणों तक) एक विस्फोट के रूप में फैलती है। चूँकि यह विकिरण प्रकाश की गति से यात्रा करता है, इसलिए इसका प्रभाव पृथ्वी पर लगभग 8.2 मिनट में ही महसूस होता है। इसका सबसे प्रमुख प्रभाव पृथ्वी के आयनमंडल पर पड़ता है, जिससे उच्च-आवृत्ति वाले रेडियो संचार और जीपीएस सिग्नल बाधित हो सकते हैं।

कोरोनल मास इजेक्शन (Coronal Mass Ejection – CME)

परिभाषा:
यह सूर्य के कोरोना (सबसे बाहरी वायुमंडल) से प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के एक विशाल बादल का अंतरिक्ष में फेंका जाना है।

विस्तृत विवरण:
यह सौर ज्वाला से भिन्न है। सौर ज्वाला मुख्य रूप से ऊर्जा और विकिरण का विस्फोट है, जबकि CME अरबों टन आवेशित कणों और चुंबकीय क्षेत्र का वास्तविक निष्कासन है। यह एक विशाल चुंबकीय बुलबुले की तरह है जो सूर्य से दूर अंतरिक्ष में फैलता है। इसकी गति सौर ज्वाला से कम होती है और इसे पृथ्वी तक पहुंचने में 1 से 3 दिन लग सकते हैं। यदि इसकी दिशा पृथ्वी की ओर हो, तो यह पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराकर एक भू-चुंबकीय तूफान (Geomagnetic Storm) उत्पन्न कर सकता है। ऐसे तूफान उपग्रहों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, पावर ग्रिड को विफल कर सकते हैं और बहुत ही तीव्र ध्रुवीय ज्योति उत्पन्न कर सकते हैं।

सौर पवन (Solar Wind)

परिभाषा:
यह सूर्य के अत्यधिक गर्म कोरोना से सभी दिशाओं में लगातार बहने वाले आवेशित कणों (मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन) की एक सतत धारा है।

विस्तृत विवरण:
सूर्य का कोरोना इतना गर्म है कि सूर्य का गुरुत्वाकर्षण भी इन उच्च-ऊर्जा कणों को रोककर नहीं रख पाता, और ये लाखों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अंतरिक्ष में फैलते रहते हैं। यह एक सतत प्रक्रिया है। सौर पवन पूरे सौर मंडल को घेर लेती है और एक सुरक्षात्मक बुलबुला बनाती है जिसे “हेलियोस्फीयर” कहा जाता है। यह हेलियोस्फीयर सौरमंडल को बाहरी अंतरिक्ष से आने वाली हानिकारक ब्रह्मांडीय किरणों से बचाता है।

ध्रुवीय ज्योति (Aurora)

परिभाषा:
यह पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों के आकाश में रात के समय दिखाई देने वाला एक अद्भुत, रंगीन प्रकाश प्रदर्शन है। इसे उत्तरी गोलार्ध में सुमेरु ज्योति (Aurora Borealis) और दक्षिणी गोलार्ध में कुमेरु ज्योति (Aurora Australis) कहा जाता है।

विस्तृत विवरण:
इसका निर्माण सौर पवन या CME से आए आवेशित कणों द्वारा होता है। जब ये कण पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में फंस जाते हैं, तो वे चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के साथ यात्रा करते हुए ध्रुवों की ओर चले जाते हैं। यहां वे पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल (लगभग 100 से 400 किमी की ऊंचाई पर) में मौजूद ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के अणुओं से टकराते हैं। इस टक्कर से वायुमंडलीय गैस के अणु उत्तेजित हो जाते हैं और शांत होने पर विभिन्न रंगों में प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। ऑक्सीजन से हरा और लाल प्रकाश निकलता है, जबकि नाइट्रोजन से नीला और बैंगनी प्रकाश उत्पन्न होता है।

सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse)

परिभाषा:
यह एक खगोलीय घटना है जो तब होती है जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच एक सीधी रेखा में आ जाता है, जिससे वह पृथ्वी से देखने पर सूर्य के प्रकाश को आंशिक या पूर्ण रूप से अवरुद्ध कर देता है। यह घटना हमेशा अमावस्या को ही होती है। [State PSC]

विस्तृत विवरण:
पूर्ण सूर्य ग्रहण वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल इसी समय के दौरान सूर्य का रहस्यमयी और बेहद धुंधला बाहरी वायुमंडल, जिसे कोरोना (Corona) कहते हैं, पृथ्वी से नग्न आंखों से दिखाई देता है। सामान्य दिनों में सूर्य के प्रकाशमंडल की चकाचौंध के कारण कोरोना अदृश्य रहता है। यह घटना वैज्ञानिकों को कोरोना की संरचना, तापमान और गतिशीलता का अध्ययन करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है, जो यह समझने में मदद करता है कि सूर्य की सतह से लाखों गुना अधिक गर्म क्यों है। [UPSC Prelims]


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यविवरण
रासायनिक संरचनालगभग 74% हाइड्रोजन, 24% हीलियम, और शेष में अन्य भारी तत्व जैसे ऑक्सीजन, कार्बन, लोहा आदि शामिल हैं।
पृथ्वी से दूरीलगभग 14.96 करोड़ किलोमीटर।
प्रकाश की गतिसूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग 8 मिनट 20 सेकंड का समय लगता है। [RRB NTPC, SSC]
सूर्य का भविष्यलगभग 5 अरब वर्षों के बाद, सूर्य एक लाल दानव (Red Giant) में बदल जाएगा और अंत में एक श्वेत वामन (White Dwarf) के रूप में समाप्त होगा।
ऊर्जा उत्पादनसूर्य प्रति सेकंड लगभग 40 लाख टन पदार्थ को ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

सौरमंडल के ग्रह: एक विस्तृत अवलोकन

सौरमंडल में सूर्य की परिक्रमा करने वाले आठ ग्रह हैं। इन ग्रहों को उनकी संरचना और सूर्य से दूरी के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है: आंतरिक (पार्थिव) ग्रह और बाह्य (जोवियन) ग्रह।


आंतरिक या पार्थिव ग्रह (Inner or Terrestrial Planets)

ये सूर्य के सबसे निकट के चार ग्रह हैं। ये मुख्य रूप से चट्टान और धातु से बने हैं, इनका आकार छोटा, घनत्व अधिक और सतह ठोस होती है। इनके बहुत कम या कोई उपग्रह नहीं हैं।

बुध ग्रह (Mercury)

बुध हमारे सौरमंडल का सबसे छोटा और सूर्य के सबसे निकट स्थित ग्रह है। इसका नाम रोमन दूत देवता “मरकरी” के नाम पर रखा गया है, जो अपनी तेज गति के लिए जाने जाते थे, ठीक उसी तरह जैसे यह ग्रह सूर्य की परिक्रमा अत्यंत तीव्रता से करता है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
सूर्य से क्रमपहला
सूर्य की परिक्रमा88 पृथ्वी दिन (सभी ग्रहों में सबसे छोटा वर्ष)
अपने अक्ष पर घूर्णन59 पृथ्वी दिन
उपग्रहशून्य (0) [RRB, State PSC]
वलय (Rings)नहीं
वायुमंडललगभग न के बराबर (एक बहुत पतला बाह्यमंडल)
तापमानसौरमंडल में सबसे अधिक तापांतर (दिन में 430°C, रात में -180°C)

कक्षा और घूर्णन (Orbit and Rotation)

बुध की कक्षा और घूर्णन इसकी सबसे अनूठी विशेषताओं में से एक है।

सतह और भू-आकृति (Surface and Geology)

बुध की सतह पहली नजर में हमारे चंद्रमा के समान दिखती है, जो उल्कापिंडों के टकराव से बने गड्ढों (Craters) से भरी हुई है।

वायुमंडल और तापमान


2. शुक्र ग्रह (Venus)

शुक्र, सूर्य से दूसरा ग्रह है और सौरमंडल के सबसे दिलचस्प पिंडों में से एक है। आकार और संरचना में पृथ्वी से काफी समानता के कारण इसे “पृथ्वी की जुड़वां बहन” (Earth’s Twin Sister) कहा जाता है, लेकिन इसकी सतह की परिस्थितियाँ पृथ्वी से बिलकुल भिन्न और अत्यंत कठोर हैं।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
सूर्य से क्रमदूसरा
सूर्य की परिक्रमा225 पृथ्वी दिन
अपने अक्ष पर घूर्णन243 पृथ्वी दिन (धीमा और विपरीत दिशा में)
उपग्रहशून्य (0) [RRB]
वलय (Rings)नहीं
वायुमंडलअत्यधिक सघन, मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (96%)
उपनामपृथ्वी की जुड़वां बहन, भोर का तारा (Morning Star), सांझ का तारा (Evening Star) [UPPSC, SSC CGL]

कक्षा और घूर्णन: सौरमंडल का सबसे अनोखा ग्रह

शुक्र का घूर्णन (Rotation) सौरमंडल में इसे अद्वितीय बनाता है।

वायुमंडल और चरम ग्रीनहाउस प्रभाव

शुक्र सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है, जबकि यह सूर्य के सबसे निकट नहीं है। [BPSC Prelims]

सतह और भू-आकृति (Surface and Geology)

घने बादलों के कारण शुक्र की सतह को सीधे देखना असंभव है। अंतरिक्ष यानों द्वारा भेजे गए रडार डेटा से पता चलता है कि इसकी सतह सूखी, ऊबड़-खाबड़ और ज्वालामुखियों से भरी है।

“भोर का तारा” और “सांझ का तारा”

चूंकि शुक्र की कक्षा पृथ्वी की कक्षा के अंदर है, यह हमें कभी भी सूर्य से बहुत दूर दिखाई नहीं देता है। इसलिए, यह पृथ्वी से केवल सूर्योदय से कुछ घंटे पहले पूर्वी आकाश में, या सूर्यास्त के कुछ घंटे बाद पश्चिमी आकाश में ही दिखाई देता है। अपनी इसी दृश्यता और अत्यधिक चमक के कारण इसे “भोर का तारा (Morning Star)” और “सांझ का तारा (Evening Star)” कहा जाता है। [UPSC Prelims]

[UPSC Prelims, SSC CGL]


3. पृथ्वी ग्रह (Earth)

पृथ्वी, सूर्य से दूरी के क्रम में तीसरा और आकार में पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह है। यह सौरमंडल का एकमात्र ज्ञात खगोलीय पिंड है जिस पर जीवन का अस्तित्व है। इसकी सतह पर तरल पानी की प्रचुरता के कारण, अंतरिक्ष से देखने पर यह नीले रंग की दिखाई देती है, इसीलिए इसे “नीला ग्रह” (Blue Planet) भी कहा जाता है। [SSC, RRB]


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
सूर्य से क्रमतीसरा
परिक्रमण काल (एक वर्ष)365.25 दिन (या 365 दिन, 6 घंटे)
घूर्णन काल (एक दिन)23 घंटे, 56 मिनट और 4 सेकंड
अक्षीय झुकाव23.5 डिग्री [UPPSC, State PSC]
उपग्रहएक (चंद्रमा)
उपनामनीला ग्रह (Blue Planet), हरित ग्रह (Green Planet)

कक्षा और घूर्णन गतियाँ

पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ हैं जो इसके पर्यावरण और जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

  1. घूर्णन (Rotation):
    • पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है।
    • एक घूर्णन पूरा करने में यह लगभग 24 घंटे (23 घंटे, 56 मिनट) का समय लेती है।
    • पृथ्वी की इसी गति के कारण दिन और रात होते हैं।
  2. परिक्रमण (Revolution):
    • पृथ्वी अपनी अंडाकार कक्षा में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है।
    • एक परिक्रमा पूरी करने में यह 365 दिन और लगभग 6 घंटे का समय लेती है।
    • यही अतिरिक्त 6 घंटे हर चार साल में जुड़कर एक अतिरिक्त दिन (29 फरवरी) बनाते हैं, जिसे लीप वर्ष (Leap Year) कहा जाता है।

अक्षीय झुकाव और ऋतु परिवर्तन

उपसौर और अपसौर (Perihelion and Aphelion)

अपनी अंडाकार कक्षा के कारण पृथ्वी की सूर्य से दूरी वर्ष भर बदलती रहती है:

पृथ्वी की संरचना

आंतरिक रूप से, पृथ्वी तीन मुख्य परतों से बनी है:

  1. भूपर्पटी (Crust): सबसे बाहरी, पतली और ठोस परत।
  2. मैंटल (Mantle): भूपर्पटी के नीचे की मोटी, अर्ध-तरल परत।
  3. क्रोड (Core): सबसे भीतरी हिस्सा, जो मुख्य रूप से लोहे और निकल जैसी भारी धातुओं से बना है। इसका बाहरी हिस्सा तरल और आंतरिक हिस्सा ठोस है।

वायुमंडल (Atmosphere)

पृथ्वी एक गैसीय आवरण से घिरी हुई है जिसे वायुमंडल कहते हैं।

प्राकृतिक उपग्रह: चंद्रमा (The Moon)


4. मंगल ग्रह (Mars)

मंगल, सूर्य से दूरी के क्रम में चौथा ग्रह है और सौरमंडल में सबसे अधिक खोजे गए ग्रहों में से एक है। इसकी सतह पर मौजूद आयरन ऑक्साइड (Iron Oxide), यानी लोहे की जंग की प्रचुरता के कारण यह नारंगी-लाल रंग का दिखाई देता है, इसीलिए इसे “लाल ग्रह” (Red Planet) कहा जाता है। [SSC, RRB NTPC]


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
सूर्य से क्रमचौथा
परिक्रमण काल (एक वर्ष)687 पृथ्वी दिन
घूर्णन काल (एक दिन)24 घंटे 37 मिनट (पृथ्वी के लगभग बराबर)
अक्षीय झुकाव25.19 डिग्री (पृथ्वी के 23.5° के समान)
उपग्रहदो (फोबोस और डीमोस) [BPSC, SSC]
वलय (Rings)नहीं
उपनामलाल ग्रह (Red Planet)

कक्षा, घूर्णन और ऋतुएँ (Orbit, Rotation, and Seasons)

मंगल ग्रह की कई विशेषताएँ पृथ्वी से मिलती-जुलती हैं, जो इसे वैज्ञानिकों के लिए विशेष रूप से आकर्षक बनाती हैं।

सतह और भू-आकृति (Surface and Geology)

मंगल की सतह ठंडी, सूखी, चट्टानी और रेगिस्तानी है। यहाँ सौरमंडल की कुछ सबसे विशाल और अद्भुत भू-आकृतियाँ मौजूद हैं:

वायुमंडल (Atmosphere)

उपग्रह: फोबोस और डीमोस (Moons: Phobos and Deimos)

मंगल के दो छोटे और अनियमित आकार के चंद्रमा हैं:

  1. फोबोस (Phobos): यह दोनों में बड़ा और मंगल के अधिक निकट है।
  2. डीमोस (Deimos): यह छोटा है और मंगल से अधिक दूर है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये दोनों चंद्रमा मूल रूप से क्षुद्रग्रह (Asteroids) थे, जो मंगल के गुरुत्वाकर्षण द्वारा पकड़ लिए गए थे।

मंगल पर जीवन की खोज

मंगल वैज्ञानिकों के लिए विशेष रुचि का केंद्र है क्योंकि यहाँ अरबों साल पहले गर्म और नम वातावरण होने के प्रमाण मिले हैं। सूखी नदी घाटियों और डेल्टाओं जैसी संरचनाएं इस बात का संकेत देती हैं कि कभी इसकी सतह पर तरल पानी बहता था। इसी कारण, विभिन्न देशों द्वारा भेजे गए रोवर (जैसे नासा का क्यूरियोसिटी और पर्सिवियरेंस) मंगल पर प्राचीन सूक्ष्मजीवी जीवन के संकेतों (बायोसिग्नेचर) की खोज कर रहे हैं।


बाह्य या जोवियन ग्रह (Outer or Jovian Planets)

ये सूर्य से दूर स्थित अंतिम चार ग्रह हैं। इन्हें “गैस दानव” (Gas Giants) भी कहा जाता है क्योंकि ये मुख्य रूप से हाइड्रोजन, हीलियम और मीथेन जैसी गैसों से बने हैं। ये आकार में बहुत विशाल हैं और इन सभी के चारों ओर वलय (Rings) पाए जाते हैं। इनके उपग्रहों की संख्या बहुत अधिक है।


5. बृहस्पति ग्रह (Jupiter)

बृहस्पति, सूर्य से दूरी के क्रम में पाँचवाँ ग्रह है और हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा और सबसे विशाल ग्रह है। [BPSC Prelims] इसका द्रव्यमान सौरमंडल के अन्य सभी ग्रहों के कुल द्रव्यमान से भी लगभग ढाई गुना अधिक है। बृहस्पति एक “गैस दानव” (Gas Giant) है, जिसका अर्थ है कि इसकी कोई ठोस सतह नहीं है और यह मुख्य रूप से गैसों और तरल पदार्थों से बना है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
सूर्य से क्रमपाँचवाँ
परिक्रमण काल (एक वर्ष)11.9 पृथ्वी वर्ष
घूर्णन काल (एक दिन)9 घंटे 55 मिनट (सौरमंडल में सबसे छोटा दिन) [SSC CGL]
प्रमुख गैसेंहाइड्रोजन (लगभग 90%) और हीलियम
उपग्रह90 से अधिक (सौरमंडल में सबसे अधिक में से एक)
वलय (Rings)हाँ (एक धुंधली और पतली वलय प्रणाली)
उपनामसौरमंडल का राजा, सौरमंडल का वैक्यूम क्लीनर

सबसे तेज घूर्णन और सबसे छोटा दिन

वायुमंडल और संरचना (Atmosphere and Composition)

बृहस्पति का वायुमंडल बहुत गहरा और सघन है, जो इसकी सबसे प्रमुख विशेषता है।

“लघु सौरमंडल”: बृहस्पति के चंद्रमा

बृहस्पति के 90 से अधिक ज्ञात उपग्रह हैं, जो इसे एक “लघु सौरमंडल” (Mini Solar System) जैसा बनाते हैं। इसके चार सबसे बड़े उपग्रहों की खोज 1610 में गैलीलियो गैलिली ने की थी, इसलिए इन्हें गैलीलियन चंद्रमा (Galilean Moons) कहा जाता है।

  1. आयो (Io): यह सौरमंडल का सबसे अधिक ज्वालामुखीय रूप से सक्रिय पिंड है, जिसकी सतह पर सैकड़ों ज्वालामुखी हैं।
  2. यूरोपा (Europa): इसकी सतह बर्फीली है, और वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बर्फीली परत के नीचे एक विशाल खारे पानी का महासागर मौजूद हो सकता है, जिससे यह जीवन की संभावना के लिए एक प्रमुख स्थान बन जाता है। [UPSC Prelims]
  3. गैनिमीड (Ganymede): यह न केवल बृहस्पति का, बल्कि पूरे सौरमंडल का सबसे बड़ा उपग्रह है। यह बुध ग्रह से भी बड़ा है। [SSC, RRB NTPC]
  4. कैलिस्टो (Callisto): इसकी सतह सौरमंडल के सबसे पुराने और सबसे अधिक गड्ढों (क्रेटरों) वाली सतहों में से एक है।

सौरमंडल का वैक्यूम क्लीनर

बृहस्पति का गुरुत्वाकर्षण अत्यंत शक्तिशाली है। यह एक विशाल “वैक्यूम क्लीनर” की तरह काम करता है, जो बाहरी सौरमंडल से आने वाले क्षुद्रग्रहों (Asteroids) और धूमकेतुओं (Comets) को अपनी ओर खींच लेता है या उनकी दिशा बदल देता है। ऐसा करके यह पृथ्वी सहित आंतरिक ग्रहों को संभावित विनाशकारी प्रभावों से बचाता है।

6. शनि ग्रह (Saturn)

शनि, सूर्य से दूरी के क्रम में छठा और बृहस्पति के बाद सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। यह अपनी शानदार और विशाल वलय प्रणाली (Ring System) के लिए जाना जाता है, जो इसे सौरमंडल का सबसे सुंदर और आसानी से पहचाने जाने वाला ग्रह बनाती है। इसे “सौरमंडल का गहना” (Jewel of the Solar System) भी कहा जाता है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
सूर्य से क्रमछठा
परिक्रमण काल (एक वर्ष)29.5 पृथ्वी वर्ष
घूर्णन काल (एक दिन)10 घंटे 42 मिनट
प्रमुख गैसेंहाइड्रोजन और हीलियम
ज्ञात उपग्रह140 से अधिक
वलय (Rings)हाँ (एक जटिल और विशाल वलय प्रणाली)
घनत्वसौरमंडल में सबसे कम (पानी से भी कम) [SSC, RRB]
उपनामवलयों वाला ग्रह (The Ringed Planet), गैसों का गोला

शानदार वलय प्रणाली (The Spectacular Ring System)

शनि की सबसे आकर्षक विशेषता इसके चारों ओर मौजूद वलय हैं।

घनत्व: पानी में तैरने वाला ग्रह

वायुमंडल और संरचना (Atmosphere and Composition)

शनि भी बृहस्पति की तरह एक गैस दानव है।

शनि के महत्वपूर्ण चंद्रमा

शनि के 140 से अधिक चंद्रमा हैं, जिनमें से कुछ सौरमंडल में सबसे दिलचस्प पिंडों में से हैं।


7. अरुण ग्रह (Uranus)

अरुण, सूर्य से दूरी के क्रम में सातवाँ ग्रह है। यह सौरमंडल का तीसरा सबसे बड़ा ग्रह (त्रिज्या में) और चौथा सबसे विशाल ग्रह है। बृहस्पति और शनि की तरह गैस दानव होने के बजाय, इसे अपनी विशिष्ट संरचना के कारण “बर्फ़ीला दानव” (Ice Giant) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह पहला ग्रह था जिसे प्राचीन काल के बजाय आधुनिक समय में दूरबीन (Telescope) की सहायता से खोजा गया था।

मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
सूर्य से क्रमसातवाँ
परिक्रमण काल (एक वर्ष)84 पृथ्वी वर्ष
घूर्णन काल (एक दिन)17 घंटे 14 मिनट (विपरीत दिशा में)
अक्षीय झुकाव97.77 डिग्री (लगभग 98 डिग्री)
ज्ञात उपग्रह27
वलय (Rings)हाँ (13 ज्ञात धुंधले और पतले वलय)
प्रमुख गैसें/यौगिकहाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन, अमोनिया, जल
उपनामलेटा हुआ ग्रह (Sideways Planet), हरा ग्रह

सबसे अनूठा अक्षीय झुकाव: “लेटा हुआ ग्रह”

अरुण की सबसे असाधारण और परिभाषित विशेषता इसका अत्यधिक अक्षीय झुकाव है।

वायुमंडल और संरचना: “बर्फ़ीला दानव”

अरुण की संरचना बृहस्पति और शनि से भिन्न है।

वलय और उपग्रह (Rings and Moons)

खोज (Discovery)

अरुण को 1781 में विलियम हर्शेल (William Herschel) द्वारा खोजा गया था। यह दूरबीन का उपयोग करके खोजा जाने वाला पहला ग्रह थ

8. वरुण ग्रह (Neptune)

वरुण, सूर्य से दूरी के अनुसार आठवाँ और हमारे सौरमंडल का सबसे दूर स्थित ग्रह है। [RRB, State PSC] यह व्यास के अनुसार चौथा सबसे बड़ा ग्रह है लेकिन द्रव्यमान में तीसरा सबसे बड़ा है। अरुण (Uranus) की तरह, इसे भी अपनी संरचना के कारण एक “बर्फ़ीला दानव” (Ice Giant) के रूप of में वर्गीकृत किया गया है। यह एकमात्र ऐसा ग्रह है जिसे सीधे अवलोकन के बजाय गणितीय भविष्यवाणी (Mathematical Prediction) द्वारा खोजा गया था।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
सूर्य से क्रमआठवाँ
परिक्रमण काल (एक वर्ष)164.8 पृथ्वी वर्ष
घूर्णन काल (एक दिन)16 घंटे 6 मिनट
प्रमुख गैसें/यौगिकहाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन
ज्ञात उपग्रह14
वलय (Rings)हाँ (5 मुख्य धुंधले वलय)
मुख्य पहचानसौरमंडल की सबसे तेज हवाएँ, सबसे ठंडा ग्रह

गणित द्वारा खोजा गया ग्रह

वरुण की खोज खगोल विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। 19वीं सदी के मध्य में, खगोलविदों ने देखा कि अरुण (Uranus) की कक्षा उस पथ का अनुसरण नहीं कर रही थी जिसका अनुमान न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों के अनुसार लगाया गया था। इससे यह सिद्धांत सामने आया कि अरुण से परे एक और अज्ञात ग्रह मौजूद है जिसका गुरुत्वाकर्षण अरुण की कक्षा को प्रभावित कर रहा है।

फ्रांसीसी गणितज्ञ अर्बन ले वेरियर (Urbain Le Verrier) और ब्रिटिश गणितज्ञ जॉन काउच एडम्स (John Couch Adams) ने स्वतंत्र रूप से गणना करके इस अज्ञात ग्रह की स्थिति की भविष्यवाणी की। 1846 में, जर्मन खगोलशास्त्री जोहान गाले (Johann Galle) ने ले वेरियर की गणनाओं का उपयोग करके लगभग उसी स्थान पर वरुण ग्रह को खोज निकाला।

वायुमंडल और संरचना: नीला और तूफानी ग्रह

सबसे दूर और सबसे ठंडा ग्रह

वलय और उपग्रह (Rings and Moons)


कुइपर बेल्ट और प्लूटो (Kuiper Belt and Pluto)

कुइपर बेल्ट और प्लूटो सौरमंडल के सबसे बाहरी, ठंडे और रहस्यमयी क्षेत्रों में से हैं। प्लूटो की कहानी और उसका वर्गीकरण सीधे तौर पर कुइपर बेल्ट की खोज और समझ से जुड़ा हुआ है।


कुइपर बेल्ट (The Kuiper Belt)

परिभाषा:
कुइपर बेल्ट, नेप्च्यून (वरुण) ग्रह की कक्षा से परे, सौरमंडल के बाहरी किनारों पर स्थित बर्फीले और चट्टानी पिंडों की एक विशाल, तश्तरी के आकार की पट्टी (Disk-shaped region) है। इसे सौरमंडल के निर्माण के बाद बचे हुए अवशेषों का क्षेत्र माना जाता है।

विशेषताविवरण
स्थाननेप्च्यून की कक्षा (लगभग 30 AU) से शुरू होकर लगभग 50 AU तक। (AU = पृथ्वी-सूर्य की दूरी)
आकृतिएक मोटी, फूली हुई तश्तरी या डोनट जैसी।
संरचनाइसमें अरबों की संख्या में बर्फीले पिंड हैं, जिन्हें कुइपर बेल्ट ऑब्जेक्ट्स (KBOs) कहा जाता है। ये पानी, मीथेन और अमोनिया की बर्फ के साथ-साथ चट्टानों से बने हैं।
महत्वयह छोटे-आवधिक धूमकेतुओं (Short-period comets) का स्रोत माना जाता है (वे धूमकेतु जो 200 वर्ष से कम समय में सूर्य का चक्कर लगाते हैं)।
क्षुद्रग्रह बेल्ट से अंतरक्षुद्रग्रह बेल्ट (Asteroid Belt) मंगल और बृहस्पति के बीच है और इसमें मुख्य रूप से चट्टानी पिंड हैं, जबकि कुइपर बेल्ट नेप्च्यून से परे है और इसमें मुख्य रूप से बर्फीले पिंड हैं। [UPSC Prelims]

उत्पत्ति और महत्व:
वैज्ञानिकों का मानना है कि कुइपर बेल्ट में मौजूद पिंड सौरमंडल के प्रारंभिक काल में किसी ग्रह का हिस्सा नहीं बन पाए। बृहस्पति जैसे विशाल ग्रहों के शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण ने इन्हें बाहर की ओर धकेल दिया। यह क्षेत्र सौरमंडल के “डीप फ्रीज” की तरह है, जिसने 4.6 अरब साल पुरानी मौलिक सामग्री को संरक्षित रखा है। इसका अध्ययन करने से हमें सौरमंडल के गठन और विकास को समझने में मदद मिलती है।


प्लूटो (Pluto)

परिभाषा:
प्लूटो, कुइपर बेल्ट में स्थित एक जटिल और दिलचस्प बौना ग्रह (Dwarf Planet) है। यह कुइपर बेल्ट में खोजा गया पहला और अब तक का सबसे प्रसिद्ध पिंड है।

विशेषताविवरण
खोज1930 में अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉमबॉ (Clyde Tombaugh) द्वारा। [SSC]
वर्गीकरणबौना ग्रह (Dwarf Planet) – 2006 से।
स्थानकुइपर बेल्ट के भीतर।
कक्षाअत्यधिक अंडाकार और झुकी हुई (सूर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों के तल से 17 डिग्री पर झुकी हुई)।
उपग्रहपाँच (सबसे बड़ा – कैरन, जो प्लूटो के आधे आकार का है)।
सतहनाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड की बर्फ से ढकी है, साथ ही इसमें पर्वत, घाटियाँ और मैदान भी हैं।

अनोखी कक्षा:
प्लूटो की कक्षा बहुत ही विलक्षण (eccentric) है। अपनी 248 साल की लंबी परिक्रमा के दौरान, यह लगभग 20 वर्षों के लिए नेप्च्यून की कक्षा के अंदर आ जाता है। हालांकि, उनकी कक्षाओं के झुकाव के कारण, उनके आपस में टकराने की कोई संभावना नहीं है।

सतह और वायुमंडल:
2015 में नासा के न्यू होराइजंस (New Horizons) मिशन ने प्लूटो की पहली विस्तृत तस्वीरें भेजीं, जिसने एक जटिल दुनिया का खुलासा किया। इसकी सतह पर “टॉमबॉ रेगियो” नामक एक विशाल, हृदय के आकार का नाइट्रोजन बर्फ का ग्लेशियर है। प्लूटो का एक पतला वायुमंडल भी है जो मुख्य रूप से नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड से बना है। जब प्लूटो सूर्य से दूर जाता है, तो इसका वायुमंडल जम कर इसकी सतह पर बर्फ के रूप में गिर जाता है।

प्लूटो और कैरन: एक दोहरा निकाय
प्लूटो का सबसे बड़ा चंद्रमा कैरन (Charon) इतना बड़ा है कि कई खगोलशास्त्री प्लूटो-कैरन प्रणाली को एक “दोहरा बौना ग्रह” या “बाइनरी सिस्टम” (Binary System) मानते हैं। वे एक दूसरे की परिक्रमा एक ऐसे साझा गुरुत्वाकर्षण केंद्र (barycenter) के चारों ओर करते हैं जो प्लूटो के अंदर नहीं, बल्कि उसके बाहर अंतरिक्ष में स्थित है।

ग्रह से बौने ग्रह तक: वर्गीकरण क्यों बदला?

1930 में अपनी खोज के बाद से 2006 तक, प्लूटो को सौरमंडल का नौवाँ ग्रह माना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे दूरबीनें अधिक शक्तिशाली होती गईं, खगोलविदों ने कुइपर बेल्ट में प्लूटो के आकार के कई अन्य पिंडों की खोज शुरू कर दी, जैसे एरIS (Eris), जो प्लूटो से भी अधिक विशाल था।

इससे एक सवाल खड़ा हुआ: यदि प्लूटो एक ग्रह है, तो क्या एरिस और अन्य खोजे गए पिंडों को भी ग्रह माना जाना चाहिए?

इस समस्या को हल करने के लिए, 2006 में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने एक ग्रह को परिभाषित करने के लिए तीन मानदंड निर्धारित किए:

  1. यह सूर्य की परिक्रमा करता हो।
  2. यह लगभग गोलाकार होने के लिए पर्याप्त विशाल हो (अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण)।
  3. इसने अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र को अन्य पिंडों से “साफ” कर दिया हो।

प्लूटो पहले दो मानदंडों को पूरा करता है, लेकिन तीसरे मानदंड में विफल रहता है। [UPPSC Mains, CDS] यह अपनी कक्षा को “साफ” नहीं कर पाया है क्योंकि यह कुइपर बेल्ट के लाखों अन्य बर्फीले पिंडों के साथ अपनी कक्षा साझा करता है। इसी कारण, प्लूटो और उसके जैसे अन्य पिंडों (जैसे एरिस, सेरेस) के लिए “बौना ग्रह” नामक एक नई श्रेणी बनाई गई।


ग्रहों की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत

ग्रहों के निर्माण को समझाने के लिए कई सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं, जो बताते हैं कि हमारे सौरमंडल के ग्रह कैसे बने। इनमें से कुछ ऐतिहासिक हैं, जबकि एक सिद्धांत को वर्तमान में सबसे अधिक वैज्ञानिक मान्यता प्राप्त है।


1. नीहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis)

यह ग्रहों की उत्पत्ति से संबंधित सबसे पुराने और आधारभूत सिद्धांतों में से एक है।


2. ग्रहाणु परिकल्पना (Planetesimal Hypothesis)

यह नीहारिका परिकल्पना का ही आधुनिक और वैज्ञानिक रूप से सबसे स्वीकृत संस्करण है। इसे नाभिकीय अभिवृद्धि मॉडल (Core Accretion Model) भी कहा जाता है और यह वर्तमान में ग्रहों के निर्माण की सबसे प्रमुख व्याख्या है। [UPSC Mains, State PSC]

आंतरिक और बाह्य ग्रहों में अंतर का कारण: हिम रेखा (Frost Line)

यह मॉडल यह भी समझाता है कि आंतरिक ग्रह चट्टानी और बाह्य ग्रह गैसीय क्यों हैं:


3. द्वैतारक या ज्वारीय परिकल्पना (Binary or Tidal Hypothesis)

यह एक ऐतिहासिक सिद्धांत है जिसे अब वैज्ञानिक समुदाय द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है।


गैस-धूल परिकल्पना (Gas-Dust Hypothesis)

गैस-धूल परिकल्पना ग्रहों की उत्पत्ति से संबंधित एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत है, जिसने पुरानी नीहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis) की कमियों को दूर करते हुए एक अधिक तार्किक और विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की। यह सिद्धांत ग्रहाणु परिकल्पना (Planetesimal Hypothesis) का एक विकसित रूप माना जाता है और वर्तमान में ग्रहों के निर्माण की हमारी समझ का आधार है।

मुख्य प्रतिपादक:
इस सिद्धांत का प्रतिपादन 20वीं शताब्दी के मध्य में रूसी वैज्ञानिक ओटो श्मिट (Otto Schmidt) द्वारा किया गया था। बाद में अन्य वैज्ञानिकों ने इसमें और सुधार किए।


परिकल्पना के मूल सिद्धांत

ओटो श्मिट का सिद्धांत इस विचार से शुरू होता है कि ग्रहों का निर्माण सूर्य से नहीं, बल्कि सूर्य द्वारा पकड़े गए अंतरतारकीय (Interstellar) गैस और धूल के बादल से हुआ है।

सिद्धांत के चरण:

  1. प्रारंभिक अवस्था: विशाल और शीतल बादल:
    • इस सिद्धांत के अनुसार, जब हमारा सूर्य अंतरिक्ष में अपनी आकाशगंगा के चारों ओर घूम रहा था, तो उसके मार्ग में गैस (मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम) और धूल के कणों का एक विशाल, ठंडा और घना बादल आया।
    • यह पुरानी नीहारिका परिकल्पना से एक बड़ा अंतर था, जो एक गर्म और घूमते हुए बादल से शुरुआत करती थी।
  2. बादल का सूर्य द्वारा अधिग्रहण (Capture):
    • सूर्य ने अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल के कारण इस विशाल गैस-धूल के बादल को अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उसे अपने चारों ओर परिक्रमा करने के लिए मजबूर कर दिया।
    • यह बादल अब सूर्य के चारों ओर एक विशाल, चपटी तश्तरी (Disk) के रूप में घूमने लगा, जिसे आद्य-ग्रह तश्तरी (Protoplanetary Disk) कहा गया।
  3. कणों का संघनन और एकत्रीकरण (Condensation and Accretion):
    • इस ठंडी तश्तरी में, धूल और गैस के कण एक-दूसरे से टकराने और चिपकने लगे। धूल के कणों ने संघनन के लिए नाभिक (nucleus) के रूप में काम किया, जिसके चारों ओर पदार्थ जमा होने लगा।
    • गुरुत्वाकर्षण और tĩnhविद्युत (static electricity) बलों के कारण, ये छोटे कण मिलकर बड़े गुच्छे बनाने लगे।
  4. ग्रहाणुओं (Planetesimals) का निर्माण:
    • समय के साथ, ये गुच्छे बड़े होकर किलोमीटर के आकार के छोटे चट्टानी और बर्फीले पिंडों में बदल गए। इन्हीं पिंडों को ग्रहाणु (Planetesimals) कहा गया। ये ग्रह निर्माण की “ईंटें” थीं।
  5. ग्रहों का अंतिम निर्माण:
    • इन ग्रहाणुओं के बीच टकराव और विलय (collision and merger) की प्रक्रिया तेज हो गई। बड़े ग्रहाणु अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण से छोटे ग्रहाणुओं को अपनी ओर खींचकर अपने आकार को और बड़ा करने लगे।
    • अरबों वर्षों की इस प्रक्रिया के बाद, इन्हीं विशाल पिंडों ने अंततः ग्रहों और उनके उपग्रहों का रूप ले लिया।

इस सिद्धांत का महत्व और नीहारिका परिकल्पना से भिन्नता

इस सिद्धांत ने कांट और लाप्लास की पुरानी नीहारिका परिकल्पना की कई समस्याओं का समाधान किया:

  1. तापमान: पुरानी परिकल्पना एक गर्म नीहारिका से शुरू होती थी, जिसमें कणों का जुड़ना मुश्किल होता। श्मिट की ठंडी नीहारिका की अवधारणा ने कणों के आपस में चिपकने और संघनित होने की प्रक्रिया को अधिक संभव और तार्किक बना दिया।
  2. पदार्थ का स्रोत: इसने यह प्रस्तावित किया कि ग्रहों का पदार्थ सूर्य से नहीं, बल्कि बाहरी स्रोत से आया था, जिसे सूर्य ने बाद में पकड़ा। इसने कोणीय संवेग (Angular Momentum) की समस्या को हल करने में मदद की (अर्थात्, सूर्य में सौरमंडल का 99% से अधिक द्रव्यमान क्यों है, लेकिन ग्रहों में 98% से अधिक कोणीय संवेग क्यों है)।
  3. विभिन्न ग्रहों की संरचना: यह सिद्धांत “हिम रेखा” (Frost Line) की अवधारणा का समर्थन करता है, जो बताता है कि सूर्य के निकट केवल चट्टानी पदार्थ ठोस रह सकते थे (जिससे आंतरिक चट्टानी ग्रह बने), जबकि सूर्य से दूर बर्फ भी ठोस रह सकती थी (जिससे बाहरी विशाल गैसीय/बर्फीले ग्रह बने)।

निष्कर्ष:
हालांकि, “सूर्य द्वारा बादल को पकड़ने” की मूल अवधारणा को अब संशोधित कर दिया गया है और माना जाता है कि यह गैस-धूल की तश्तरी सूर्य के निर्माण के समय से ही बची हुई सामग्री थी, फिर भी गैस-धूल के कणों से अभिवृद्धि (Accretion) द्वारा ग्रहों के निर्माण का मूल विचार आज भी ग्रहों की उत्पत्ति के आधुनिक सिद्धांतों का केंद्र है।


नेब्युलर परिकल्पना का आधुनिक रूप: आद्य-ग्रह परिकल्पना (The Protoplanet Hypothesis)

आद्य-ग्रह परिकल्पना (Protoplanet Hypothesis) ग्रहों की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाला वर्तमान में सबसे स्वीकृत और वैज्ञानिक रूप से समर्थित मॉडल है। यह इमैनुएल कांट और लाप्लास द्वारा दी गई मूल नेब्युलर परिकल्पना का ही एक आधुनिक, परिष्कृत और विस्तृत रूप है। इसे नाभिकीय अभिवृद्धि मॉडल (Core Accretion Model) भी कहा जाता है। यह बताता है कि ग्रहों का निर्माण ऊपर से नीचे (Top-down) यानी किसी बादल के टूटने से नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर (Bottom-up) यानी छोटे कणों के जुड़ने से हुआ है।


मूल अवधारणा (Core Concept)

इस परिकल्पना के अनुसार, सूर्य और ग्रहों का निर्माण एक ही विशाल अंतरतारकीय गैस और धूल के बादल, जिसे सौर नीहारिका (Solar Nebula) कहा जाता है, से लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले हुआ। ग्रहों का निर्माण सूर्य के बनने के बाद बची हुई सामग्री की एक विशाल तश्तरी से धीरे-धीरे अभिवृद्धि (Accretion) की प्रक्रिया के माध्यम से हुआ।


निर्माण की चरणबद्ध प्रक्रिया (Step-by-Step Process)

  1. सौर नीहारिका का पतन (Collapse of the Solar Nebula):
    • एक विशाल और ठंडे गैस-धूल के बादल ने अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़ना शुरू किया।
    • जैसे-जैसे यह सिकुड़ता गया, इसके घूमने की गति तेज होती गई और यह एक चपटी, घूमती हुई तश्तरी के रूप में बन गया।
    • इस तश्तरी के केंद्र में अधिकांश पदार्थ जमा हो गया, जिससे अत्यधिक घनत्व और तापमान के कारण आद्य-सूर्य (Proto-sun) का निर्माण हुआ।
  2. आद्य-ग्रह तश्तरी का निर्माण (Formation of the Protoplanetary Disk):
    • आद्य-सूर्य के चारों ओर बची हुई गैस और धूल की विशाल, घूमती हुई तश्तरी को ही आद्य-ग्रह तश्तरी (Protoplanetary Disk) कहा जाता है। यही वह “कच्चा माल” था जिससे ग्रहों का निर्माण होना था।
  3. संघनन और अभिवृद्धि (Condensation and Accretion):
    • जैसे-जैसे तश्तरी ठंडी होने लगी, गैसें ठोस कणों के रूप में संघनित होने लगीं। धूल के छोटे-छोटे कण tĩnhविद्युत (static electricity) के कारण एक-दूसरे से चिपकने लगे, ठीक वैसे ही जैसे घर में धूल के कण मिलकर बड़े गुच्छे बना लेते हैं।
  4. ग्रहाणुओं का निर्माण (Formation of Planetesimals):
    • लाखों वर्षों के दौरान, ये कण आपस में जुड़कर कंकड़, पत्थर और फिर किलोमीटर के आकार के बड़े पिंडों में बदल गए। इन्हीं प्रारंभिक पिंडों को ग्रहाणु (Planetesimals) कहा जाता है। ये ग्रह निर्माण की “ईंटों” की तरह थे।
  5. आद्य-ग्रहों का उदय (Rise of the Protoplanets):
    • अब गुरुत्वाकर्षण की भूमिका प्रमुख हो गई। बड़े ग्रहाणु अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण से छोटे ग्रहाणुओं और अन्य मलबे को अपनी ओर खींचने लगे। यह एक हिंसक और टकरावों से भरा दौर था।
    • धीरे-धीरे, चंद्रमा से लेकर मंगल के आकार तक के विशाल पिंड बनने लगे, जिन्हें आद्य-ग्रह (Protoplanets) कहा गया।
  6. ग्रहों का अंतिम स्वरूप:
    • अंत में, प्रत्येक कक्षा में सबसे विशाल आद्य-ग्रह हावी हो गए। उन्होंने अपनी कक्षा के भीतर के लगभग सभी बचे हुए ग्रहाणुओं और मलबे को या तो अपने में समाहित कर लिया या अपनी कक्षा से बाहर फेंक दिया। इस प्रकार अरबों वर्षों की प्रक्रिया के बाद सौरमंडल के आठ ग्रहों का वर्तमान स्वरूप बना।

मुख्य अवधारणा: हिम रेखा (The Frost Line)

यह परिकल्पना यह भी स्पष्ट करती है कि आंतरिक ग्रह चट्टानी और बाह्य ग्रह गैसीय क्यों हैं। इसका कारण हिम रेखा (Frost Line) है:


यह पुरानी नेब्युलर परिकल्पना से बेहतर क्यों है?

आधारपुरानी नेब्युलर परिकल्पना (लाप्लास)आधुनिक आद्य-ग्रह परिकल्पना
प्रक्रियागर्म नीहारिका से पहले से बने-बनाए छल्लों का अलग होना (Top-down)।एक ठंडी तश्तरी में छोटे कणों का धीरे-धीरे जुड़कर ग्रह बनाना (Bottom-up)।
कोणीय संवेगयह समझाने में विफल रही कि सूर्य में अधिकांश द्रव्यमान क्यों है और ग्रहों में अधिकांश कोणीय संवेग क्यों।टकराव और गुरुत्वाकर्षण अंतःक्रिया के माध्यम से कोणीय संवेग के हस्तांतरण की व्याख्या करती है।
ग्रहों में भिन्नतायह चट्टानी और गैसीय ग्रहों के बीच के अंतर को स्पष्ट नहीं कर सकी।हिम रेखा (Frost Line) की अवधारणा से इस अंतर की सटीक और तार्किक व्याख्या करती है।
वैज्ञानिक आधारयह मुख्य रूप से दार्शनिक और गणितीय थी।यह आधुनिक खगोल-भौतिकी, कंप्यूटर सिमुलेशन और अन्य युवा तारों के चारों ओर आद्य-ग्रह तश्तरियों के वास्तविक अवलोकन द्वारा समर्थित है। [UPSC Prelims]

हमारे सौरमंडल के अन्य सदस्य

सूर्य और आठ मुख्य ग्रहों के अलावा, हमारा सौरमंडल अरबों अन्य छोटे-बड़े खगोलीय पिंडों का घर है। ये सभी पिंड भी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बंधे हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं। सौरमंडल के ये अन्य सदस्य हमें इसके निर्माण और विकास की कहानी बताते हैं।


1. बौने ग्रह (Dwarf Planets)

2006 में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने “बौना ग्रह” नामक एक नई श्रेणी बनाई। ये ऐसे पिंड हैं जो ग्रह होने के दो मानदंड तो पूरे करते हैं (सूर्य की परिक्रमा और लगभग गोलाकार होना), लेकिन तीसरा मानदंड पूरा नहीं कर पाते—अर्थात्, इन्होंने अपनी कक्षा के आसपास के क्षेत्र को अन्य छोटे पिंडों से साफ नहीं किया है।

प्रमुख बौना ग्रहस्थानमुख्य तथ्य
प्लूटो (Pluto)कुइपर बेल्टसबसे प्रसिद्ध बौना ग्रह, जिसे 2006 तक एक ग्रह माना जाता था। [CDS]
सेरेस (Ceres)मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्टयह क्षुद्रग्रह बेल्ट में स्थित सबसे बड़ा पिंड है।
एरIS (Eris)कुइपर बेल्ट से परेद्रव्यमान में प्लूटो से भी बड़ा, इसकी खोज ने ही ग्रहों की परिभाषा बदलने पर मजबूर किया।
मेकमेक (Makemake)कुइपर बेल्टप्लूटो के बाद कुइपर बेल्ट का दूसरा सबसे चमकीला पिंड।
हउमेया (Haumea)कुइपर बेल्टअपने तेज घूर्णन के कारण इसका आकार अंडे जैसा चपटा है।

2. क्षुद्रग्रह (Asteroids)

क्षुद्रग्रह चट्टानी और धात्विक पिंड हैं जिन्हें “लघु ग्रह” (Minor Planets) भी कहा जाता है। ये सौरमंडल के निर्माण के समय बचे हुए अवशेष हैं जो किसी ग्रह का हिस्सा नहीं बन पाए।


3. धूमकेतु (Comets)

धूमकेतुओं को अक्सर “गंदी बर्फीली गेंदें” (Dirty Snowballs) कहा जाता है। ये मुख्य रूप से धूल, चट्टान और जमी हुई गैसों (बर्फ, मीथेन, अमोनिया) से बने होते हैं।


4. उल्कापिंड, उल्का, और उल्कापिंड (Meteoroid, Meteor, Meteorite)

ये तीनों शब्द अक्सर भ्रमित करते हैं, लेकिन ये एक ही घटना के तीन अलग-अलग चरण हैं।

शब्दपरिभाषा और विवरण
उल्कापिंड (Meteoroid)अंतरिक्ष में मौजूद एक छोटा चट्टानी या धात्विक पिंड। यह किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु का टूटा हुआ टुकड़ा हो सकता है।
उल्का (Meteor)जब उल्कापिंड पृथ्वी के वायुमंडल में तेज गति से प्रवेश करता है, तो हवा के घर्षण से जलने लगता है और आकाश में प्रकाश की एक चमकदार धारी बनाता है। इसी घटना को उल्का या “टूटता तारा” (Shooting Star) कहते हैं।
उल्कापिंड (Meteorite)यदि उल्कापिंड का कोई टुकड़ा वायुमंडल में पूरी तरह से जलने से बच जाता है और पृथ्वी की सतह पर आ गिरता है, तो उस बचे हुए पिंड को उल्कापिंड (Meteorite) कहा जाता है।

5. कुइपर बेल्ट और ऊर्ट बादल (Kuiper Belt and Oort Cloud)

ये सौरमंडल के सबसे बाहरी और ठंडे क्षेत्र हैं जहाँ अरबों की संख्या में बर्फीले पिंड मौजूद हैं।


सौरमंडल की उत्पत्ति और विकास

हमारे सौरमंडल का जन्म किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि अरबों वर्षों तक चली एक लंबी और जटिल प्रक्रिया का फल है। इसकी कहानी लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले शुरू हुई और आज भी जारी है। सौरमंडल की उत्पत्ति और विकास की व्याख्या करने वाला सबसे स्वीकृत वैज्ञानिक सिद्धांत “सौर नीहारिका परिकल्पना” (Solar Nebula Hypothesis) का आधुनिक रूप है, जिसे आद्य-ग्रह परिकल्पना (Protoplanet Hypothesis) भी कहा जाता है।


चरण 1: उत्पत्ति – सौर नीहारिका का पतन

(लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व)


चरण 2: सूर्य का निर्माण – एक तारे का जन्म


चरण 3: ग्रहों का निर्माण – आद्य-ग्रह परिकल्पना

(सूर्य के जन्म के बाद)

सूर्य के निर्माण के बाद बची हुई गैस और धूल की विशाल, घूमती हुई तश्तरी को आद्य-ग्रह तश्तरी (Protoplanetary Disk) कहा जाता है। इसी तश्तरी से ग्रहों का निर्माण हुआ।

  1. अभिवृद्धि (Accretion): तश्तरी में मौजूद धूल के छोटे-छोटे कण tĩnhविद्युत बल के कारण आपस में चिपकने लगे, जिससे धीरे-धीरे बड़े गुच्छे बने।
  2. ग्रहाणुओं (Planetesimals) का निर्माण: जब ये गुच्छे लगभग एक किलोमीटर के आकार के हो गए, तो उनका अपना गुरुत्वाकर्षण प्रभावी हो गया। इन प्रारंभिक पिंडों को ग्रहाणु (Planetesimals) कहा गया, जो ग्रह निर्माण की “ईंटें” थीं।
  3. आद्य-ग्रहों (Protoplanets) का निर्माण: ये ग्रहाणु आपस में टकराते और जुड़ते रहे, जिससे चंद्रमा से लेकर मंगल के आकार तक के विशाल पिंडों का निर्माण हुआ। इन्हें आद्य-ग्रह (Protoplanets) कहा गया।

चरण 4: सौरमंडल का विकास और व्यवस्थापन

(पहले कुछ करोड़ वर्षों के दौरान)


चरण 5: आज का सौरमंडल

अरबों वर्षों के इस विकास के बाद, सौरमंडल एक अपेक्षाकृत स्थिर अवस्था में पहुँच गया है, जिसकी संरचना इस प्रकार है:

घटकविवरण
सूर्यकेंद्र में स्थित तारा, जो पूरे निकाय को ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण प्रदान करता है।
आंतरिक ग्रहबुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल – छोटे, घने और चट्टानी।
क्षुद्रग्रह बेल्टमंगल और बृहस्पति के बीच चट्टानी पिंडों की एक पट्टी; एक विफल ग्रह के अवशेष। [SSC CGL]
बाह्य ग्रहबृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण – विशाल, कम घनत्व वाले गैसीय और बर्फीले ग्रह।
कुइपर बेल्टनेप्च्यून से परे बर्फीले पिंडों की एक विशाल पट्टी, जिसमें प्लूटो जैसे बौने ग्रह और धूमकेतु शामिल हैं।
ऊर्ट बादलसौरमंडल को घेरे हुए बर्फीले पिंडों का एक विशाल गोलाकार खोल, जो लंबे-आवधिक धूमकेतुओं का स्रोत माना जाता है।

पृथ्वी का भूवैज्ञानिक विकास

पृथ्वी का जन्म एक गर्म, निर्जन और चट्टानी गोले के रूप में हुआ था और आज यह जीवन से भरपूर एक जटिल और गतिशील ग्रह है। इसका 4.6 अरब वर्षों का इतिहास ज्वालामुखियों, महाद्वीपों के निर्माण, महासागरों के जन्म, वायुमंडल में परिवर्तन और जीवन के उद्भव जैसी क्रांतिकारी घटनाओं से भरा है। पृथ्वी का भूवैज्ञानिक विकास एक सतत प्रक्रिया है, जिसे कई महाकल्पों (Eons) और कल्पों (Eras) में बांटा गया है।


चरण 1: निर्माण और विभेदन (Formation and Differentiation)

(लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व)


चरण 2: हेडियन महाकल्प – प्रारंभिक ‘नारकीय’ पृथ्वी

(Hadean Eon, ~4.6 से 4 अरब वर्ष पूर्व)

यह पृथ्वी के इतिहास का सबसे प्रारंभिक काल था, जिसका नाम ग्रीक देवता ‘हेडीस’ (नर्क) के नाम पर रखा गया है, क्योंकि इस समय पृथ्वी की परिस्थितियाँ अत्यंत कठोर थीं।


चरण 3: स्थलमंडल, वायुमंडल और जलमंडल का निर्माण

  1. प्रथम स्थलमंडल (Lithosphere):
    • जैसे-जैसे पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी होने लगी, इसकी पिघली हुई सतह पर एक पतली और अस्थायी भूपर्पटी जमने लगी। यह आज की महाद्वीपीय भूपर्पटी से बहुत अलग थी और बेसाल्टिक चट्टानों से बनी थी।
  2. द्वितीयक वायुमंडल (Secondary Atmosphere):
    • प्रारंभिक पृथ्वी का वायुमंडल नहीं था। आज हम जो वायुमंडल देखते हैं, उसका निर्माण मुख्य रूप से ज्वालामुखीय गैस उत्सर्जन (Volcanic Outgassing) से हुआ। ज्वालामुखियों से भारी मात्रा में जल वाष्प (H₂O), कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), नाइट्रोजन (N₂) और मीथेन (CH₄) जैसी गैसें निकलीं।
    • महत्वपूर्ण: इस प्रारंभिक वायुमंडल में स्वतंत्र ऑक्सीजन (Oxygen) न के बराबर थी। [UPSC Prelims]
  3. महासागरों का निर्माण (Formation of Oceans):
    • जब पृथ्वी का तापमान 100°C से नीचे गिर गया, तो वायुमंडल में मौजूद विशाल मात्रा में जल वाष्प संघनित होकर तरल पानी में बदल गई।
    • इसके बाद लाखों वर्षों तक लगातार मूसलाधार बारिश हुई, जिससे पृथ्वी के निचले हिस्से भर गए और विशाल महासागरों का निर्माण हुआ। धूमकेतुओं द्वारा लाई गई बर्फ ने भी इस प्रक्रिया में योगदान दिया।

चरण 4: महाद्वीपों का निर्माण और प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics)


चरण 5: जीवन का प्रभाव और वायुमंडल का महान परिवर्तन


भूवैज्ञानिक समय-सारणी का सारांश

महाकल्प (Eon)समयप्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाएँ
हेडियन~4.6 से 4 अरब वर्ष पूर्वपृथ्वी का निर्माण, विभेदन, चंद्रमा का निर्माण, महाबमबारी।
आर्कियन4 से 2.5 अरब वर्ष पूर्वप्रथम महाद्वीपीय भूपर्पटी का निर्माण, महासागरों का बनना, प्रारंभिक जीवन का उदय।
प्रोटरोज़ोइक2.5 अरब से 54 करोड़ वर्ष पूर्वग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट, महामहाद्वीपों का बनना और टूटना (रोडिनिया)।
फ़ैनरोज़ोइक54 करोड़ वर्ष पूर्व से आज तकजटिल जीवन का विस्फोट, पैंजिया का निर्माण और विखंडन, वर्तमान महाद्वीपों का स्वरूप।

आज भी, प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखी और कटाव जैसी ताकतें पृथ्वी को लगातार बदल रही हैं, यह साबित करते हुए कि पृथ्वी का भूवैज्ञानिक विकास एक निरंतर जारी रहने वाली कहानी है।


भूवैज्ञानिक समय-सारणी की संरचना

इस सारणी का एक पदानुक्रमित (hierarchical) ढाँचा है, जिसे समय की सबसे बड़ी अवधि से लेकर सबसे छोटी अवधि तक विभाजित किया गया है:

  1. महाकल्प (Eon): सबसे बड़ी समय इकाई, जो अरबों वर्षों तक फैली होती है।
  2. महायुग (Era): महाकल्प को महायुगों में बांटा जाता है, जो जीवन के विकास में प्रमुख परिवर्तनों को दर्शाते हैं।
  3. कल्प (Period): महायुगों को कल्पों में बांटा जाता है, जो महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक घटनाओं (जैसे बड़े पैमाने पर विलुप्ति या नए प्रकार के जीवन के उदय) द्वारा चिह्नित होते हैं।
  4. युग (Epoch): कल्पों को और भी छोटी समय-अवधि, यानी युगों में बांटा जाता है।

भूवैज्ञानिक ग्रिड/सारणी (Geological Grid/Time Scale)

यहाँ पृथ्वी के इतिहास की एक सरलीकृत लेकिन विस्तृत सारणी प्रस्तुत है:

महाकल्प (Eon)महायुग (Era)कल्प (Period)समय-अवधि (लगभग)प्रमुख भूवैज्ञानिक और जैविक घटनाएँ
फ़ैनरोज़ोइक <br/> (Phanerozoic) <br/> “दृश्य जीवन”नूतनजीवी <br/> (Cenozoic) <br/> “नवीन जीवन”<br/> (स्तनधारियों का युग)चतुर्थ (Quaternary)26 लाख वर्ष पूर्व से आज तकमानव का उदय (Age of Humans), बार-बार हिमयुग का आना-जाना।
नियोजीन (Neogene)2.3 करोड़ से 26 लाख वर्ष पूर्वप्रारंभिक होमिनिड्स (हमारे पूर्वजों) का विकास।
पैलियोजीन (Paleogene)6.6 करोड़ से 2.3 करोड़ वर्ष पूर्वडायनासोरों की विलुप्ति के बाद स्तनधारियों का विकास और प्रभुत्व।
मध्यजीवी <br/> (Mesozoic) <br/> “मध्य जीवन”<br/> (सरीसृपों/डायनासोर का युग)क्रेटेशियस (Cretaceous)14.5 करोड़ से 6.6 करोड़ वर्ष पूर्वपुष्पीय पौधों का उदय, डायनासोर अपने चरम पर, क्षुद्रग्रह के प्रभाव से डायनासोरों की विलुप्ति।
जुरैसिक (Jurassic)20.1 करोड़ से 14.5 करोड़ वर्ष पूर्वविशाल डायनासोरों का प्रभुत्व, प्रथम पक्षियों का विकास, पैंजिया का विखंडन।
ट्रायसिक (Triassic)25.2 करोड़ से 20.1 करोड़ वर्ष पूर्वप्रथम डायनासोर और प्रथम स्तनधारियों का उदय।
पुराजीवी <br/> (Paleozoic) <br/> “प्राचीन जीवन”पर्मियन (Permian)29.9 करोड़ से 25.2 करोड़ वर्ष पूर्वमहामहाद्वीप पैंजिया का निर्माण, पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी विलुप्ति घटना (“The Great Dying”)।
कार्बोनिफेरस (Carboniferous)35.9 करोड़ से 29.9 करोड़ वर्ष पूर्वविशाल दलदली वनों का निर्माण (जो आज के कोयले का स्रोत हैं), प्रथम सरीसृपों का उदय।
डेवोनियन (Devonian)41.9 करोड़ से 35.9 करोड़ वर्ष पूर्व“मछलियों का युग”, प्रथम उभयचरों का जमीन पर आना, प्रथम वनों का विकास।
सिल्यूरियन (Silurian)44.4 करोड़ से 41.9 करोड़ वर्ष पूर्वजीवन का जमीन पर पहला कदम (पौधे, कीड़े-मकौड़े)।
ऑर्डोविशियन (Ordovician)48.5 करोड़ से 44.4 करोड़ वर्ष पूर्वप्रथम कशेरुकी (Vertebrates) यानी बिना जबड़े वाली मछलियों का विकास।
कैम्ब्रियन (Cambrian)54.1 करोड़ से 48.5 करोड़ वर्ष पूर्व“कैम्ब्रियन विस्फोट”: अचानक से लगभग सभी प्रमुख प्राणी संघों का विकास, कठोर खोल वाले जीवों का उदय।
प्रोटरोज़ोइक<br/>(Proterozoic)2.5 अरब से 54.1 करोड़ वर्ष पूर्वग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट: वायुमंडल में ऑक्सीजन का निर्माण, प्रथम यूकेरियोटिक (जटिल) कोशिकाओं का उदय।
आर्कियन<br/>(Archean)4 अरब से 2.5 अरब वर्ष पूर्वप्रथम महाद्वीपों का निर्माण, प्रथम जीवन का उदय (सरल एक-कोशिकीय बैक्टीरिया)।
हेडियन<br/>(Hadean)4.6 अरब से 4 अरब वर्ष पूर्वपृथ्वी का निर्माण, पिघली हुई सतह, चंद्रमा का निर्माण, महासागरों का बनना शुरू।

यह सारणी कैसे बनाई गई?

वैज्ञानिकों ने इस समय-सारणी को दो मुख्य तरीकों का उपयोग करके बनाया है:

  1. सापेक्ष काल निर्धारण (Relative Dating): चट्टानों की परतों (Stratigraphy) का अध्ययन करके। सबसे पुराना नियम यह है कि निचली परतें ऊपरी परतों से अधिक पुरानी होती हैं। जीवाश्मों का उपयोग दुनिया भर में विभिन्न स्थानों की चट्टानों की परतों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए किया जाता है।
  2. निरपेक्ष काल निर्धारण (Absolute Dating): रेडियोमेट्रिक डेटिंग जैसी तकनीकों का उपयोग करके। इसमें चट्टानों में मौजूद रेडियोधर्मी समस्थानिकों (जैसे यूरेनियम, पोटेशियम) के क्षय की दर को मापा जाता है, जिससे चट्टान की आयु का सटीक पता वर्षों में लगाया जा सकता है।

यह ग्रिड या सारणी स्थिर नहीं है; नई खोजों के साथ इसमें लगातार सुधार और परिशोधन होता रहता है।


अक्षांश रेखाएँ (Lines of Latitude)

अक्षांश, पृथ्वी पर किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति को उत्तर-दक्षिण दिशा में बताने के लिए उपयोग होने वाला एक कोणीय माप है। ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गईं काल्पनिक क्षैतिज रेखाओं को अक्षांश रेखाएँ कहा जाता है। ये रेखाएँ पृथ्वी की सतह पर किसी भी बिंदु की भूमध्य रेखा (Equator) से उत्तर या दक्षिण की कोणीय दूरी को दर्शाती हैं।


अक्षांश रेखाओं की मुख्य विशेषताएँ

मापन (Measurement)


प्रमुख अक्षांश रेखाएँ और उनका महत्व

पृथ्वी पर कुछ अक्षांश रेखाएँ जलवायु और मौसम की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये सूर्य की किरणों के कोण और दिन-रात की अवधि को निर्धारित करती हैं।

भूमध्य रेखा (Equator): परीक्षा की दृष्टि से

भूमध्य रेखा, ग्लोब पर मौजूद सबसे महत्वपूर्ण काल्पनिक रेखा है और प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। यह भूगोल, जलवायु विज्ञान और भौतिकी की कई मौलिक अवधारणाओं का आधार है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
अक्षांश मान0° (शून्य डिग्री)
लंबाईलगभग 40,075 किलोमीटर
मुख्य कार्यपृथ्वी को उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) और दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) में विभाजित करती है।
दर्जायह एक बृहत् वृत्त (Great Circle) और सबसे लंबी अक्षांश रेखा है।
दिन-रात की अवधिवर्ष भर दिन और रात की अवधि लगभग 12-12 घंटे की होती है।
जलवायु कटिबंधयह उष्ण कटिबंध (Torrid Zone) के ठीक बीच में स्थित है।

भौगोलिक और वैज्ञानिक महत्व (Geographical and Scientific Significance)

1. जलवायु का निर्धारण

2. दिन और रात की समान अवधि

3. विषुव (Equinox)

4. पृथ्वी की घूर्णन गति और गुरुत्वाकर्षण

5. अंतरिक्ष प्रक्षेपण के लिए आदर्श स्थान

6. कोरिओलिस बल (Coriolis Effect)


भूमध्य रेखा पर स्थित प्रमुख देश, महाद्वीप और जल निकाय

यह परीक्षाओं में सबसे अधिक पूछे जाने वाले खंडों में से एक है।

महाद्वीपभूमध्य रेखा पर स्थित देश
दक्षिण अमेरिकाइक्वाडोर, कोलंबिया, ब्राजील
अफ्रीकासाओ टोमे और प्रिंसिपे, गैबॉन, कांगो गणराज्य, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, युगांडा, केन्या, सोमालिया
एशियामालदीव, इंडोनेशिया, किरिबाती
जल निकायअटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर, हिंद महासागर

महत्वपूर्ण नोट: भूमध्य रेखा भारत से होकर नहीं गुजरती है। कर्क रेखा (23.5° N) भारत के मध्य से होकर गुजरती है।


परीक्षा हेतु विशेष तथ्य

तथ्यविवरण
नदी जो दो बार काटती हैअफ्रीका की कांगो नदी (Zaire River) भूमध्य रेखा को दो बार काटती है। [SSC, State PSC]
उच्चतम बिंदुभूमध्य रेखा पर स्थित सबसे ऊंचा बिंदु इक्वाडोर में वोल्कैन कैयाम्बे (Volcán Cayambe) ज्वालामुखी की चोटी है।
शहरइक्वाडोर की राजधानी क्विटो (Quito), भूमध्य रेखा के सबसे निकट स्थित राजधानी शहर है।

कर्क रेखा (Tropic of Cancer): परीक्षा की दृष्टि से

कर्क रेखा (23.5° N) एक महत्वपूर्ण अक्षांश रेखा है जो भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित है। भूगोल, जलवायु और विशेष रूप से भारत के संदर्भ में इसका अत्यधिक महत्व है, जिस कारण यह प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
अक्षांश मान23.5° उत्तरी अक्षांश (23° 26′ N)
अन्य नामउत्तरी अयनांत रेखा
गोलार्धउत्तरी गोलार्ध
महत्वउष्ण कटिबंध (Torrid Zone) की उत्तरी सीमा निर्धारित करती है।
संबंधित घटनाग्रीष्म अयनांत / कर्क संक्रांति (Summer Solstice)

भौगोलिक और जलवायु संबंधी महत्व

1. सूर्य की स्थिति और ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice)

2. उष्ण कटिबंध की उत्तरी सीमा

3. दाब पेटियों का खिसकाव और भारतीय मानसून


कर्क रेखा और भारत (Tropic of Cancer and India)

यह परीक्षाओं का सबसे पसंदीदा खंड है।


कर्क रेखा पर स्थित प्रमुख देश (विश्व के संदर्भ में)

महाद्वीपप्रमुख देश
उत्तरी अमेरिकामेक्सिको, बहामास
अफ्रीकामिस्र, लीबिया, नाइजर, अल्जीरिया, माली, पश्चिमी सहारा, मॉरिटानिया
एशियाताइवान, चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भारत, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब

परीक्षा हेतु विशेष तथ्य

तथ्यविवरण
नदी जो दो बार काटती हैभारत की माही नदी (Mahi River) कर्क रेखा को दो बार काटती है। यह मध्य प्रदेश से निकलकर राजस्थान से गुजरती हुई गुजरात में प्रवेश करती है। [State PSC, SSC CGL]
निकटतम राजधानी शहरझारखंड की राजधानी रांची (Ranchi) और गुजरात की राजधानी गांधीनगर (Gandhinagar) कर्क रेखा के बहुत निकट स्थित हैं।
लंबाईकर्क रेखा की सर्वाधिक लंबाई भारत के मध्य प्रदेश राज्य में है, जबकि सबसे कम लंबाई राजस्थान में है।
सूर्योदयभारत में कर्क रेखा पर स्थित स्थानों में से मिजोरम में सूर्योदय सबसे पहले होगा (क्योंकि यह सबसे पूर्व में है)।

मकर रेखा (Tropic of Capricorn): परीक्षा की दृष्टि से

मकर रेखा (23.5° S) एक प्रमुख अक्षांश रेखा है जो भूमध्य रेखा के दक्षिण में स्थित है। यह कर्क रेखा की दक्षिणी समकक्ष है और वैश्विक जलवायु, मौसम और खगोलीय घटनाओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
अक्षांश मान23.5° दक्षिणी अक्षांश (23° 26′ S)
अन्य नामदक्षिणी अयनांत रेखा
गोलार्धदक्षिणी गोलार्ध
महत्वउष्ण कटिबंध (Torrid Zone) की दक्षिणी सीमा निर्धारित करती है।
संबंधित घटनाशीत अयनांत / मकर संक्रांति (Winter Solstice)

भौगोलिक और जलवायु संबंधी महत्व

1. सूर्य की स्थिति और शीत अयनांत (Winter Solstice)

2. उष्ण कटिबंध की दक्षिणी सीमा


मकर रेखा पर स्थित प्रमुख देश और महाद्वीप

यह जानना महत्वपूर्ण है कि मकर रेखा किन महाद्वीपों और देशों से होकर गुजरती है।

महाद्वीपप्रमुख देश
दक्षिण अमेरिकाचिली, अर्जेंटीना, पराग्वे, ब्राजील
अफ्रीकानामीबिया, बोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक, मेडागास्कर
ऑस्ट्रेलियाऑस्ट्रेलिया (महाद्वीप के लगभग मध्य से)
अन्यफ्रेंच पोलिनेशिया (फ्रांस) जैसे कुछ द्वीपीय क्षेत्रों से भी गुजरती है।

अति महत्वपूर्ण नोट: मकर रेखा भारत से होकर नहीं गुजरती है।


परीक्षा हेतु विशेष तथ्य

तथ्यविवरण
नदी जो दो बार काटती हैअफ्रीका की लिम्पोपो नदी (Limpopo River) मकर रेखा को दो बार काटती है। [State PSC, SSC]
मकर संक्रांति: त्यौहार बनाम खगोलीय घटनामकर संक्रांति का त्यौहार, जो भारत में 14 जनवरी के आसपास मनाया जाता है, सूर्य के मकर राशि (Zodiac Sign of Capricorn) में प्रवेश का प्रतीक है। यह खगोलीय मकर संक्रांति (22 दिसंबर) से अलग है। पृथ्वी के अयन चलन (Precession) के कारण इन दोनों घटनाओं की तिथियों में अंतर आ गया है। [UPSC Prelims के लिए महत्वपूर्ण अवधारणा]
निकटतम शहरब्राजील का साओ पाउलो (São Paulo) शहर मकर रेखा के बहुत निकट स्थित है। ऑस्ट्रेलिया में, रॉकहैम्प्टन (Rockhampton) शहर को अक्सर मकर रेखा का शहर कहा जाता है।

आर्कटिक वृत्त (Arctic Circle): परीक्षा की दृष्टि से

आर्कटिक वृत्त, पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में स्थित एक प्रमुख अक्षांश रेखा है। यह केवल एक काल्पनिक रेखा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण खगोलीय और जलवायु सीमा है जो आर्कटिक क्षेत्र को परिभाषित करती है। यह क्षेत्र अपनी चरम जलवायु, अद्वितीय प्राकृतिक घटनाओं और बढ़ते भू-राजनीतिक महत्व के लिए जाना जाता है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
अक्षांश मान66.5° उत्तरी अक्षांश (66° 33′ N)
गोलार्धउत्तरी गोलार्ध
मुख्य विशेषता“मध्यरात्रि के सूर्य” और “ध्रुवीय रात्रि” की घटनाओं का निर्धारण करती है।
जलवायु कटिबंधउत्तरी शीत कटिबंध (North Frigid Zone) की दक्षिणी सीमा है।
संबंधित घटनाएंसुमेरु ज्योति (Aurora Borealis), जलवायु परिवर्तन, परमाफ्रॉस्ट का पिघलना।

भौगोलिक और वैज्ञानिक महत्व

1. मध्यरात्रि का सूर्य (Midnight Sun)

2. ध्रुवीय रात्रि (Polar Night)

3. शीत कटिबंध की सीमा

4. सुमेरु ज्योति (Aurora Borealis)


आर्कटिक वृत्त पर स्थित देश (Countries on the Arctic Circle)

आर्कटिक वृत्त 8 देशों के भू-भाग से होकर गुजरता है। यह एक बहुत ही सामान्य परीक्षा प्रश्न है।

  1. नॉर्वे (Norway)
  2. स्वीडन (Sweden)
  3. फिनलैंड (Finland)
  4. रूस (Russia) (इसका सबसे बड़ा आर्कटिक क्षेत्र है)
  5. संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) (अलास्का राज्य के माध्यम से)
  6. कनाडा (Canada)
  7. डेनमार्क (Denmark) (ग्रीनलैंड के माध्यम से, जो एक स्वायत्त क्षेत्र है)
  8. आइसलैंड (Iceland) (मुख्य भूमि से थोड़ा उत्तर में स्थित इसके ग्रिम्सी द्वीप से गुजरती है)
    [State PSC, SSC CGL]

समसामयिक महत्व (परीक्षाओं के लिए विशेष)


अंटार्कटिक वृत्त (Antarctic Circle): परीक्षा की दृष्टि से

अंटार्कटिक वृत्त, पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध में स्थित एक प्रमुख अक्षांश रेखा है। यह आर्कटिक वृत्त का दक्षिणी समकक्ष है और यह अंटार्कटिका महाद्वीप के बर्फीले और चरम वातावरण को परिभाषित करने वाली एक महत्वपूर्ण खगोलीय सीमा है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
अक्षांश मान66.5° दक्षिणी अक्षांश (66° 33′ S)
गोलार्धदक्षिणी गोलार्ध
मुख्य विशेषता“मध्यरात्रि के सूर्य” और “ध्रुवीय रात्रि” की घटनाओं का निर्धारण करती है।
जलवायु कटिबंधदक्षिणी शीत कटिबंध (South Frigid Zone) की उत्तरी सीमा है।
संबंधित घटनाएंकुमेरु ज्योति (Aurora Australis), जलवायु परिवर्तन का अध्ययन, अंटार्कटिक संधि।

भौगोलिक और वैज्ञानिक महत्व

1. मध्यरात्रि का सूर्य (Midnight Sun)

2. ध्रुवीय रात्रि (Polar Night)

3. शीत कटिबंध की सीमा

4. कुमेरु ज्योति (Aurora Australis)


एक बर्फीला महाद्वीप (A Continent of Ice)

आर्कटिक वृत्त के विपरीत, जो कई देशों और एक महासागर से होकर गुजरता है, अंटार्कटिक वृत्त की भौगोलिक स्थिति अद्वितीय है:


समसामयिक महत्व और भारत (परीक्षाओं के लिए विशेष)


रेखा का नामडिग्रीमहत्व और विशेषताएँ
भूमध्य रेखा (Equator)सबसे बड़ी अक्षांश रेखा। यहाँ वर्ष भर दिन और रात लगभग बराबर होते हैं और सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जिससे यह क्षेत्र गर्म रहता है।
कर्क रेखा (Tropic of Cancer)23.5° Nयह उत्तरी गोलार्ध में वह अधिकतम सीमा है जहाँ तक सूर्य की किरणें सीधी चमक सकती हैं (ग्रीष्म संक्रांति के समय)। यह भारत के 8 राज्यों से होकर गुजरती है।
मकर रेखा (Tropic of Capricorn)23.5° Sयह दक्षिणी गोलार्ध में वह अधिकतम सीमा है जहाँ तक सूर्य की किरणें सीधी चमक सकती हैं (शीत संक्रांति के समय)।
आर्कटिक वृत्त (Arctic Circle)66.5° Nयह उत्तरी गोलार्ध की वह सीमा है जिसके उत्तर में गर्मियों में 24 घंटे का दिन और सर्दियों में 24 घंटे की रात अनुभव की जा सकती है।
अंटार्कटिक वृत्त (Antarctic Circle)66.5° Sयह दक्षिणी गोलार्ध की वह सीमा है जिसके दक्षिण में गर्मियों में 24 घंटे का दिन और सर्दियों में 24 घंटे की रात अनुभव की जा सकती है।

अक्षांश और जलवायु कटिबंध (Latitude and Climate Zones)

अक्षांश रेखाएँ पृथ्वी को तीन मुख्य जलवायु कटिबंधों (Climate Zones) में विभाजित करने का आधार हैं:

उष्ण कटिबंध (Torrid Zone): परीक्षा की दृष्टि से

उष्ण कटिबंध, जिसे ‘टोरिड ज़ोन’ भी कहा जाता है, पृथ्वी का सबसे गर्म और जैविक रूप से सबसे समृद्ध जलवायु कटिबंध है। यह कटिबंध कर्क रेखा (23.5° N) और मकर रेखा (23.5° S) के बीच, भूमध्य रेखा के दोनों ओर स्थित है। यह भूगोल की एक मौलिक अवधारणा है जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
अक्षांशीय विस्तार23.5° उत्तरी अक्षांश (कर्क रेखा) से 23.5° दक्षिणी अक्षांश (मकर रेखा) तक।
सीमाएँउत्तरी सीमा – कर्क रेखा, दक्षिणी सीमा – मकर रेखा। भूमध्य रेखा इसके ठीक बीच से गुजरती है।
सूर्य की स्थितिवर्ष में कम से कम एक बार सूर्य की किरणें सीधी (सिर के ऊपर) पड़ती हैं।
मुख्य विशेषतायह पृथ्वी का सबसे गर्म क्षेत्र है जहाँ कोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं होती है।

विस्तृत भौगोलिक और जलवायु विशेषताएँ

1. सूर्य की सीधी किरणें (Direct Sun Rays)

यह उष्ण कटिबंध की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है जो अन्य सभी विशेषताओं को जन्म देती है।

2. वर्ष भर उच्च तापमान (High Temperatures Year-Round)

3. प्रमुख जलवायु प्रकार (Major Climate Types)

उष्ण कटिबंध में मुख्य रूप से दो प्रमुख प्रकार की जलवायु पाई जाती है:

4. समृद्ध जैव-विविधता (Rich Biodiversity)

5. दिन-रात की अवधि में कम भिन्नता


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यविवरण
पृथ्वी का कवरेजउष्ण कटिबंध पृथ्वी के कुल सतह क्षेत्र का लगभग 40% हिस्सा कवर करता है।
विश्व जनसंख्यादुनिया की लगभग 40% आबादी इसी उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में निवास करती है।
मानसूनभारतीय मानसून जैसी महत्वपूर्ण मौसमी घटनाएँ प्रत्यक्ष रूप से उष्ण कटिबंध में होने वाले तापमान और दबाव परिवर्तनों से जुड़ी हैं। ITCZ का खिसकाव इसका प्रमुख उदाहरण है। [UPSC]
अद्वितीय घटनायह पृथ्वी का एकमात्र कटिबंध है जहाँ आप खड़े होकर देख सकते हैं कि सूर्य ठीक आपके सिर के ऊपर (Zenith पर) है।

शीतोष्ण कटिबंध (Temperate Zones): परीक्षा की दृष्टि से

शीतोष्ण कटिबंध, पृथ्वी पर उष्ण कटिबंध और शीत कटिबंध के बीच स्थित विशाल क्षेत्र हैं। ये अपनी मध्यम जलवायु और स्पष्ट रूप से परिभाषित चार ऋतुओं के लिए जाने जाते हैं। दुनिया के अधिकांश विकसित देश और एक बड़ी मानव आबादी इसी कटिबंध में निवास करती है, जो इसे भूगोल, अर्थशास्त्र और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
अक्षांशीय विस्तारउत्तरी गोलार्ध: 23.5° N (कर्क रेखा) से 66.5° N (आर्कटिक वृत्त) तक।<br>दक्षिणी गोलार्ध: 23.5° S (मकर रेखा) से 66.5° S (अंटार्कटिक वृत्त) तक।
सूर्य की स्थितिसूर्य की किरणें हमेशा तिरछी पड़ती हैं; सूर्य कभी भी सीधा सिर के ऊपर नहीं आता है।
प्रमुख विशेषताचार स्पष्ट ऋतुओं (वसंत, ग्रीष्म, शरद, शीत) की उपस्थिति। मध्यम तापमान और परिवर्तनशील मौसम।

विस्तृत भौगोलिक और जलवायु विशेषताएँ

1. सूर्य की तिरछी किरणें (Slanted Sun Rays)

2. चार स्पष्ट ऋतुएँ (Four Distinct Seasons)

यह शीतोष्ण कटिबंध की सबसे परिभाषित विशेषता है।

3. प्रमुख जलवायु और वनस्पति प्रकार (Major Climate and Vegetation Types)

शीतोष्ण कटिबंध में महाद्वीपों की स्थिति और समुद्र से दूरी के आधार पर कई प्रकार की जलवायु पाई जाती है:

4. पछुआ पवनों का प्रभाव (Westerlies’ Influence)


परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यविवरण
मानव जनसंख्यायह कटिबंध दुनिया का सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र है। विश्व के अधिकांश प्रमुख आर्थिक और औद्योगिक केंद्र (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, अधिकांश यूरोप, चीन, जापान) इसी कटिबंध में स्थित हैं।
कृषि महत्वयह विश्व का प्रमुख अनाज और खाद्यान्न उत्पादक क्षेत्र है।
जेट स्ट्रीमक्षोभमंडल के ऊपरी हिस्से में चलने वाली तेज गति की जेट स्ट्रीम पवनें भी शीतोष्ण कटिबंध के मौसम को अत्यधिक प्रभावित करती हैं, विशेषकर चक्रवातों की उत्पत्ति में। [CDS, NDA]
उत्तरी और दक्षिणी शीतोष्ण कटिबंध में अंतरउत्तरी गोलार्ध में भूमि का विशाल विस्तार होने के कारण, यहाँ के शीतोष्ण कटिबंध में जलवायु की चरम सीमाएं (बहुत गर्म ग्रीष्म और बहुत ठंडी सर्दियाँ) अधिक पाई जाती हैं। इसके विपरीत, दक्षिणी शीतोष्ण कटिबंध में महासागरों की अधिकता के कारण जलवायु अधिक समुद्री और समशीतोष्ण (maritime and moderate) रहती है।

शीत कटिबंध (Frigid Zones): परीक्षा की दृष्टि से

शीत कटिबंध, पृथ्वी के सबसे ठंडे, बर्फीले और चरम जलवायु वाले क्षेत्र हैं। ये पृथ्वी के ध्रुवों (Poles) के चारों ओर स्थित हैं और इनकी सीमा क्रमशः आर्कटिक और अंटार्कटिक वृत्त द्वारा निर्धारित होती है। इन क्षेत्रों का अध्ययन खगोल विज्ञान, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।


मुख्य तथ्य एक नजर में

विशेषताविवरण
अक्षांशीय विस्तारउत्तरी शीत कटिबंध: 66.5° N (आर्कटिक वृत्त) से 90° N (उत्तरी ध्रुव) तक।<br>दक्षिणी शीत कटिबंध: 66.5° S (अंटार्कटिक वृत्त) से 90° S (दक्षिणी ध्रुव) तक।
सूर्य की स्थितिसूर्य की किरणें वर्ष भर अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं। सूर्य कभी भी ऊँचाई पर नहीं चढ़ता।
प्रमुख विशेषतामध्यरात्रि का सूर्य (Midnight Sun) और ध्रुवीय रात्रि (Polar Night) की घटना। वर्ष भर अत्यधिक ठंड।
अन्य नामध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions), टुंड्रा प्रदेश।
जलवायुटुंड्रा जलवायु (Tundra Climate) और हिमटोप जलवायु (Ice Cap Climate)।

विस्तृत भौगोलिक और जलवायु विशेषताएँ

1. सूर्य की अत्यधिक तिरछी किरणें (Extremely Slanted Sun Rays)

यह शीत कटिबंध की सभी विशेषताओं का मूल कारण है।

2. मध्यरात्रि का सूर्य और ध्रुवीय रात्रि (Midnight Sun and Polar Night)

पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण इन क्षेत्रों में अद्वितीय खगोलीय घटनाएं होती हैं:

3. चरम शीत और स्थायी बर्फ (Extreme Cold and Permanent Ice)

4. अल्प वनस्पति और विशिष्ट जीव-जंतु (Sparse Vegetation and Specific Fauna)


उत्तरी और दक्षिणी शीत कटिबंध में अंतर

आधारउत्तरी शीत कटिबंध (Arctic)दक्षिणी शीत कटिबंध (Antarctic)
भौगोलिक स्वरूपकेंद्र में एक महासागर (आर्कटिक महासागर) है जो महाद्वीपों से घिरा है।केंद्र में एक महाद्वीप (अंटार्कटिका) है जो महासागरों से घिरा है।
मानव उपस्थितियहाँ स्वदेशी लोग (जैसे इनुइट) हजारों वर्षों से रहते आए हैं।कोई स्थायी मानव आबादी नहीं है, केवल वैज्ञानिक और सहायक कर्मचारी रहते हैं।
प्रमुख जीवध्रुवीय भालूपेंगुइन
राजनीतिक स्थिति8 देशों (रूस, USA, कनाडा आदि) के संप्रभु क्षेत्र में आता है।अंटार्कटिक संधि (1959) के तहत शासित है, जो इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और शांति के लिए समर्पित करती है।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यविवरण
परमाफ्रॉस्ट का पिघलनाग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्माफ्रॉस्ट पिघल रहा है, जिससे वायुमंडल में मीथेन जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें मुक्त हो रही हैं, जो जलवायु परिवर्तन को और तेज कर रही हैं। [UPSC Prelims]
अंटार्कटिक संधियह एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो अंटार्कटिका पर किसी भी सैन्य गतिविधि और खनिज खनन पर रोक लगाता है और वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देता है।
भारत के अनुसंधान केंद्रअंटार्कटिका में भारत के अनुसंधान केंद्र हैं – मैत्री और भारती (सक्रिय), तथा दक्षिण गंगोत्री (अब निष्क्रिय)। [BPSC, State PSC]
भू-राजनीतिक महत्वआर्कटिक में बर्फ पिघलने से नए शिपिंग मार्ग खुल रहे हैं और तेल व गैस के भंडारों तक पहुंच आसान हो रही है, जिससे इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।

कटिबंध (Zone)स्थान (Location)विशेषता (Characteristic)
उष्ण कटिबंध (Torrid Zone)कर्क रेखा (23.5°N) और मकर रेखा (23.5°S) के बीच।सबसे गर्म क्षेत्र। यहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं।
शीतोष्ण कटिबंध (Temperate Zones)कर्क रेखा से आर्कटिक वृत्त (23.5°N से 66.5°N) और मकर रेखा से अंटार्कटिक वृत्त (23.5°S से 66.5°S) के बीच।मध्यम तापमान। यहाँ सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं और चार स्पष्ट ऋतुएँ होती हैं।
शीत कटिबंध (Frigid Zones)आर्कटिक वृत्त से उत्तरी ध्रुव (66.5°N से 90°N) और अंटार्कटिक वृत्त से दक्षिणी ध्रुव (66.5°S से 90°S) के बीच।सबसे ठंडा क्षेत्र। यहाँ सूर्य की किरणें अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं, जिससे तापमान बहुत कम रहता है और बर्फ जमी रहती है।

महत्वपूर्ण तथ्य


देशांतर रेखाएँ (Lines of Longitude)

देशांतर, पृथ्वी पर किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति को पूर्व-पश्चिम दिशा में बताने के लिए उपयोग होने वाला एक कोणीय माप है। ग्लोब पर उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव से मिलाने वाली काल्पनिक ऊर्ध्वाधर (Vertical) रेखाओं को देशांतर रेखाएँ कहा जाता है। इन्हें याम्योत्तर (Meridians) के नाम से भी जाना जाता है।


देशांतर रेखाओं की मुख्य विशेषताएँ

मापन (Measurement)


प्रमुख याम्योत्तर (Prime Meridian – 0° Longitude)

प्रमुख याम्योत्तर निम्नलिखित देशों से होकर गुजरती है:

महाद्वीप (Continent)देश (Country)
यूरोपयूनाइटेड किंगडम (UK), फ्रांस, स्पेन
अफ्रीकाअल्जीरिया, माली, बुर्किना फासो, टोगो, घाना
अन्यअंटार्कटिका

देशांतर और समय (Longitude and Time): परीक्षा की दृष्टि से

देशांतर का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक उपयोग पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों के समय का निर्धारण करना है। यह विषय प्रतियोगी परीक्षाओं के संख्यात्मक और अवधारणा-आधारित दोनों प्रकार के प्रश्नों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


मूल सिद्धांत: पृथ्वी का घूर्णन (The Core Principle: Earth’s Rotation)

समय की गणना का पूरा आधार पृथ्वी की गति पर टिका है।


समय की गणना का आधार (The Basis of Time Calculation)

इसी घूर्णन गति से हम समय और देशांतर के बीच का गणितीय संबंध स्थापित करते हैं, जो सभी गणनाओं का आधार है।

यह दो मान परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं:

1 घंटा = 15° देशांतर
1° देशांतर = 4 मिनट
[UPSC, CDS, SSC CGL – इन पर आधारित गणना वाले प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं]


संदर्भ बिंदु: प्रमुख याम्योत्तर (Prime Meridian – 0°) और GMT


समय निर्धारण के नियम

किसी भी स्थान का समय निकालने के लिए दो सरल नियम हैं:

  1. पूर्व की ओर जाने पर: ग्रीनविच (0°) से पूर्व की ओर स्थित स्थानों का समय GMT से आगे (+) होता है, क्योंकि वहाँ सूर्योदय पहले होता है।
  2. पश्चिम की ओर जाने पर: ग्रीनविच (0°) से पश्चिम की ओर स्थित स्थानों का समय GMT से पीछे (-) होता है, क्योंकि वहाँ सूर्योदय बाद में होता है।

उदाहरण: भारतीय मानक समय (Indian Standard Time – IST)

यह सबसे सामान्य उदाहरण है जो परीक्षाओं में पूछा जाता है।


मानक समय और समय क्षेत्र (Standard Time and Time Zones)


अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line – IDL)


अक्षांश और देशांतर में मुख्य अंतर

आधारअक्षांश रेखाएँ (Latitude)देशांतर रेखाएँ (Longitude)
आकृतिपूर्ण वृत्तअर्ध-वृत्त
लंबाईभिन्न-भिन्न (भूमध्य रेखा सबसे लंबी)एक समान
समानांतरताएक-दूसरे के समानांतर होती हैंसमानांतर नहीं होतीं, ध्रुवों पर मिलती हैं
संख्या179 रेखाएँ (1° के अंतराल पर)360 रेखाएँ (1° के अंतराल पर)
मुख्य कार्यजलवायु कटिबंध का निर्धारणसमय का निर्धारण
प्रमुख रेखाभूमध्य रेखा (0°)प्रमुख याम्योत्तर (0°)

डेलाइट सेविंग टाइम (Daylight Saving Time – DST): परीक्षा की दृष्टि से

डेलाइट सेविंग टाइम (DST) एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें घड़ियों को निर्धारित समय से, आमतौर पर एक घंटा आगे, सेट कर दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य गर्मियों के महीनों के दौरान दिन की रोशनी (प्राकृतिक प्रकाश) का बेहतर उपयोग करना है। DST को “ग्रीष्मकालीन समय” (Summer Time) भी कहा जाता है।


मूल अवधारणा (Core Concept)

DST का आधार यह है कि गर्मियों में दिन लंबे होते हैं, यानी सूर्य जल्दी उगता है और देर से अस्त होता है। अगर हम अपनी घड़ियों को एक घंटा आगे कर दें, तो:

उदाहरण:
मान लीजिए किसी शहर में सामान्य समय (Standard Time) पर सूर्योदय सुबह 5 बजे और सूर्यास्त शाम 7 बजे होता है।


उद्देश्य और लाभ (Objectives and Benefits)

उद्देश्य/लाभविवरण
ऊर्जा की बचतयह DST का सबसे प्रमुख और पारंपरिक तर्क है। शाम को अतिरिक्त प्राकृतिक प्रकाश मिलने से लोग बिजली की लाइटें देर से जलाते हैं, जिससे बिजली की खपत कम होती है। [SSC, CDS]
मनोरंजन और पर्यटन को बढ़ावाशाम को एक घंटा अधिक उजाला मिलने से लोग काम के बाद शॉपिंग, खेलकूद और अन्य बाहरी गतिविधियों में अधिक समय बिता पाते हैं, जिससे पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
सड़क दुर्घटनाओं में कमीशाम के व्यस्त समय (Rush Hour) में बेहतर दृश्यता होने से सड़क दुर्घटनाओं में कमी आती है।
अपराध दर में कमीकुछ अध्ययनों के अनुसार, शाम को अधिक उजाला होने से सड़क पर होने वाले अपराधों में कमी आ सकती है।

प्रक्रिया (Process)


DST से संबंधित मुद्दे और आलोचनाएँ (Issues and Criticisms)

DST के कई नुकसान भी हैं, जिनके कारण इस पर लगातार बहस होती रहती है:

मुद्दाविवरण
स्वास्थ्य समस्याएंघड़ी के समय में अचानक बदलाव से शरीर की प्राकृतिक घड़ी (जैविक घड़ी या सर्कैडियन रिदम) बाधित होती है। इससे नींद की समस्या, हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
जटिलता और भ्रमDST के कारण समय-निर्धारण, बैठकों और यात्रा में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, खासकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब अलग-अलग देश अलग-अलग समय पर DST लागू करते हैं।
आधुनिक जीवनशैली में कम प्रासंगिकताकुछ आलोचकों का तर्क है कि आधुनिक समाज (24×7 अर्थव्यवस्था, एयर कंडीशनिंग) में ऊर्जा की बचत का पारंपरिक लाभ अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रहा।
किसानों के लिए असुविधापारंपरिक रूप से, किसान सूर्य के अनुसार काम करते हैं, न कि घड़ी के अनुसार। DST उनकी दिनचर्या में बाधा डालता है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य और भारत की स्थिति


पृथ्वी की विभिन्न गतियाँ: परीक्षा की दृष्टि से

पृथ्वी स्थिर नहीं है; यह अंतरिक्ष में लगातार गति कर रही है। इसकी विभिन्न गतियाँ पृथ्वी पर जीवन, मौसम, दिन-रात और समय जैसी मूलभूत अवधारणाओं को जन्म देती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ सबसे महत्वपूर्ण हैं: घूर्णन (Rotation) और परिक्रमण (Revolution)।


1. घूर्णन या दैनिक गति (Rotation or Diarunal Motion): परीक्षा की दृष्टि से

घूर्णन, पृथ्वी की अपने अक्ष पर होने वाली गति है, जिसे दैनिक गति भी कहा जाता है क्योंकि इसके कारण ही दिन और रात का चक्र पूरा होता है। यह पृथ्वी की सबसे मौलिक गतियों में से एक है जिसके प्रभाव हम हर दिन अनुभव करते हैं।


मूल अवधारणाएँ

विशेषताविवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य
परिभाषापृथ्वी का अपनी काल्पनिक धुरी (Axis) पर घूमना।
अक्षीय झुकावयह धुरी अपनी कक्षा के तल पर सीधी न होकर 23.5° झुकी हुई है।
घूर्णन की दिशापश्चिम से पूर्व। जब हम उत्तरी ध्रुव के ऊपर से देखते हैं तो यह वामावर्त (Anticlockwise) दिशा होती है।
घूर्णन की अवधि23 घंटे, 56 मिनट और 4 सेकंड। यह एक नाक्षत्र दिवस (Sidereal Day) कहलाता है, यानी पृथ्वी को किसी दूर स्थित तारे के सापेक्ष एक चक्कर पूरा करने में लगा समय।
सौर दिवस (Solar Day)ठीक 24 घंटे। यह पृथ्वी को सूर्य के सापेक्ष उसी स्थिति में वापस आने में लगा समय है। यह नाक्षत्र दिवस से लगभग 4 मिनट लंबा होता है क्योंकि इस दौरान पृथ्वी अपनी कक्षा में भी थोड़ा आगे बढ़ जाती है।
घूर्णन की गतिभूमध्य रेखा (Equator) पर सर्वाधिक (लगभग 1,670 किमी/घंटा)। ध्रुवों (Poles) पर शून्य (0)। [SSC, RRB]
प्रकाश वृत्तवह काल्पनिक वृत्त जो पृथ्वी के प्रकाशित (दिन वाले) और अप्रकाशित (रात वाले) हिस्से को अलग करता है, प्रदीप्ति वृत्त (Circle of Illumination) कहलाता है।

घूर्णन गति के प्रभाव और परिणाम (Effects of Rotation)

1. दिन और रात का होना (Occurrence of Day and Night)

2. कोरिओलिस बल का उत्पन्न होना (Generation of Coriolis Effect)

3. सूर्योदय और सूर्यास्त की दिशा (Direction of Sunrise and Sunset)

4. ज्वार-भाटा की आवृत्ति (Frequency of Tides)

5. पृथ्वी का भू-आभीय आकार (Oblate Spheroid Shape of Earth)

6. समय की अवधारणा (Concept of Time)


2. परिक्रमण या वार्षिक गति (Revolution or Annual Motion): परीक्षा की दृष्टि से

परिक्रमण, पृथ्वी की वह गति है जिसमें वह अपनी धुरी पर घूमते हुए एक निश्चित अंडाकार पथ पर सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। चूँकि इस गति को पूरा करने में लगभग एक वर्ष का समय लगता है, इसे वार्षिक गति भी कहा जाता है। यह गति पृथ्वी पर जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं, यानी ऋतु परिवर्तन, का मुख्य कारण है।


मूल अवधारणाएँ

विशेषताविवरण और परीक्षा उपयोगी तथ्य
परिभाषापृथ्वी का एक दीर्घवृत्ताकार (Elliptical) कक्षा में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना।
परिक्रमण की दिशापश्चिम से पूर्व (घूर्णन की दिशा के समान)।
अवधि365 दिन, 6 घंटे, 9 मिनट (लगभग 365.25 दिन)। यह एक सौर वर्ष है।
लीप वर्ष (Leap Year)एक वर्ष 365.25 दिन का होता है। गणना की सुविधा के लिए हम एक वर्ष 365 दिन का मानते हैं। बचे हुए 6 घंटे हर चार साल में जुड़कर 24 घंटे (एक दिन) बन जाते हैं। इस अतिरिक्त दिन को हर चौथे वर्ष में फरवरी माह (29 फरवरी) में जोड़ दिया जाता है, और उस वर्ष को लीप वर्ष कहते हैं। [SSC, Railway – यह एक सामान्य ज्ञान का प्रश्न है।]
गतिऔसत गति लगभग 29.8 किलोमीटर प्रति सेकंड या 1,07,000 किलोमीटर प्रति घंटा है।

परिक्रमण गति के प्रभाव और परिणाम (Effects of Revolution)

1. ऋतु परिवर्तन (Change of Seasons) – सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव

2. अयनांत और विषुव की स्थिति (Solstices and Equinoxes)

पृथ्वी के अक्षीय झुकाव और परिक्रमण के कारण वर्ष में चार विशेष खगोलीय स्थितियाँ बनती हैं:

घटनातिथि (लगभग)उत्तरी गोलार्ध की स्थितिदक्षिणी गोलार्ध की स्थिति
ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice)21 जूनसबसे लंबा दिन, सबसे छोटी रात; सूर्य कर्क रेखा (23.5° N) के ऊपर लंबवत।सबसे छोटा दिन, सबसे लंबी रात।
शीत अयनांत (Winter Solstice)22 दिसंबरसबसे छोटा दिन, सबसे लंबी रात।सबसे लंबा दिन, सबसे छोटी रात; सूर्य मकर रेखा (23.5° S) के ऊपर लंबवत।
वसंत विषुव (Spring Equinox)21 मार्चदिन और रात बराबर; सूर्य भूमध्य रेखा (0°) के ऊपर लंबवत।दिन और रात बराबर।
शरद विषुव (Autumn Equinox)23 सितंबरदिन और रात बराबर; सूर्य भूमध्य रेखा (0°) के ऊपर लंबवत।दिन और रात बराबर।

3. दिन और रात की लंबाई में भिन्नता (Variation in the Length of Day and Night)

4. उपसौर और अपसौर की स्थिति (Perihelion and Aphelion)

पृथ्वी की अंडाकार कक्षा के कारण, सूर्य से इसकी दूरी साल भर बदलती है।

महत्वपूर्ण अवधारणा: उपसौर और अपसौर की स्थिति का पृथ्वी पर ऋतुओं के निर्धारण में नगण्य प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (उपसौर) होती है, तब उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु होती है। यह सिद्ध करता है कि ऋतुओं का मुख्य कारण पृथ्वी का अक्षीय झुकाव है, न कि सूर्य से दूरी।


3. अयन चलन या विषुव अयन (Precession of the Equinoxes)

यह एक कम ज्ञात लेकिन महत्वपूर्ण तीसरी गति है।


पृथ्वी की ऋतुएँ (Seasons of the Earth): परीक्षा की दृष्टि से

पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन एक महत्वपूर्ण भौगोलिक और खगोलीय घटना है जो जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र को गहराई से प्रभावित करती है। यह प्रतियोगी परीक्षाओं का एक पसंदीदा विषय है क्योंकि यह पृथ्वी की दो प्रमुख गतियों और उसके अक्षीय झुकाव की संयुक्त समझ पर आधारित है।


ऋतु परिवर्तन का मुख्य कारण: एक भ्रांति और वास्तविकता

यदि पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी हुई नहीं होती, तो हर जगह वर्ष भर एक जैसा मौसम रहता।


ऋतु चक्र की प्रक्रिया (The Process of Seasonal Cycle)

जैसे-जैसे झुकी हुई पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है, विभिन्न महीनों में गोलार्धों की सूर्य के सापेक्ष स्थिति बदलती है, जिससे सौर ऊर्जा के वितरण में अंतर आता है और ऋतुएँ बनती हैं। इस चक्र में चार प्रमुख स्थितियाँ होती हैं:

1. ग्रीष्म अयनांत / कर्क संक्रांति (Summer Solstice)

2. शरद विषुव (Autumnal Equinox)

3. शीत अयनांत / मकर संक्रांति (Winter Solstice)

4. वसंत विषुव (Spring/Vernal Equinox)


परीक्षा हेतु विशेष तथ्य और अवधारणाएँ

तथ्य/अवधारणाविवरण
भूमध्य रेखा पर ऋतुएँभूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें वर्ष भर लगभग सीधी पड़ती हैं और दिन की लंबाई में कोई खास अंतर नहीं होता। इसलिए, यहाँ कोई स्पष्ट ऋतु परिवर्तन नहीं होता, बल्कि गर्म और आर्द्र जलवायु बनी रहती है।
ध्रुवों पर ऋतुएँध्रुवों पर ऋतु परिवर्तन अपने चरम पर होता है: 6 महीने का दिन (ग्रीष्मकाल) और 6 महीने की रात (शीतकाल)।
उपसौर और अपसौरउपसौर (Perihelion) (~3 जनवरी, पृथ्वी सूर्य के निकटतम) और अपसौर (Aphelion) (~4 जुलाई, पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर) का ऋतुओं पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता है। [यह एक सामान्य भ्रांति है, जिसे परीक्षाओं में जांचा जाता है।]
उत्तरायण और दक्षिणायन* उत्तरायण: शीत अयनांत (22 दिसंबर) से ग्रीष्म अयनांत (21 जून) तक सूर्य की आभासी गति उत्तर की ओर होती है।<br> * दक्षिणायन: ग्रीष्म अयनांत (21 जून) से शीत अयनांत (22 दिसंबर) तक सूर्य की आभासी गति दक्षिण की ओर होती है।
तापमान का पिछड़ना (Lag of Temperature)सबसे अधिक सौर ऊर्जा 21 जून को मिलती है, लेकिन उत्तरी गोलार्ध में सबसे गर्म महीने जुलाई-अगस्त होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पृथ्वी के वायुमंडल और महासागरों को गर्म होने में समय लगता है। इसे Seasonal Lag कहते हैं।