समुद्र विज्ञान (Oceanography)
समुद्र विज्ञान पृथ्वी विज्ञान की वह शाखा है जो महासागरों, सागरों और उनसे संबंधित भौतिक, रासायनिक, भूवैज्ञानिक और जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन करती है। इसके अंतर्गत महासागरीय जल की गति (धाराएँ, ज्वार, लहरें), तापमान, लवणता, और समुद्री जीवन के साथ-
साथ महासागरों के तल (Ocean Floor) की संरचना का अध्ययन भी शामिल है।
महासागरों के तल की स्थलाकृति (Ocean Relief)
जिस प्रकार महाद्वीपों की सतह पर पर्वत, पठार, मैदान और घाटियाँ जैसी विभिन्न स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं, उसी प्रकार महासागरों का तल भी समतल नहीं है, बल्कि उस पर भी अत्यंत जटिल और विविध स्थलाकृतियाँ मौजूद हैं। इन स्थलाकृतियों को सामूहिक रूप से उच्चावच (Relief) कहा जाता है।
महासागरों के तल को गहराई और ढाल के आधार पर मुख्य रूप से चार प्रमुख प्रभागों (Major Divisions) में विभाजित किया जाता है।
[आरेख: महाद्वीपीय तट से गहरे समुद्र की ओर का एक क्रॉस-
सेक्शनल प्रोफ़ाइल। इसमें क्रमशः महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf) को मंद ढाल, महाद्वीपीय ढाल (Continental Slope) को तीव्र ढाल, महाद्वीपीय उभार (Continental Rise) को ढाल में कमी, और फिर विस्तृत गभीर सागरीय मैदान (Abyssal Plain) को दर्शाया गया हो।]
1. महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)
- परिभाषा:
महाद्वीपीय मग्नतट महाद्वीप का वह किनारा है जो समुद्र के जल में डूबा होता है। यह महाद्वीपीय भूभाग का ही एक विस्तारित भाग है। यह महासागरीय बेसिन का सबसे उथला हिस्सा होता है। - विशेषताएँ:
- ढाल (Slope): इसका ढाल अत्यंत मंद होता है (लगभग 1° या उससे भी कम)।
- गहराई: यह आमतौर पर सतह से 150-
200 मीटर की गहराई तक पाया जाता है। - चौड़ाई: इसकी चौड़ाई बहुत भिन्न होती है। जिन तटों पर ऊँचे पर्वत होते हैं, वहाँ यह संकरा होता है (जैसे चिली तट), और जहाँ विस्तृत मैदान होते हैं, वहाँ यह चौड़ा होता है (जैसे साइबेरिया का आर्कटिक तट, जो विश्व का सबसे चौड़ा मग्नतट है)।
- आर्थिक महत्व: ⋆ यह क्षेत्र मानवीय गतिविधियों के लिए आर्थिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है।
- मत्स्यन (Fishing): सूर्य के प्रकाश की पर्याप्त पहुँच के कारण यहाँ प्लैंकटन बहुतायत में उगते हैं, जो मछलियों का मुख्य भोजन हैं। विश्व के सबसे समृद्ध मत्स्यन क्षेत्र (जैसे ग्रैंड बैंक, डोगर बैंक) मग्नतटों पर ही स्थित हैं। [UPSC/State PSC]
- खनिज और ऊर्जा संसाधन: विश्व के 20% से अधिक पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के भंडार इन्हीं क्षेत्रों में पाए जाते हैं (जैसे मुंबई हाई, उत्तरी सागर)। [UPPSC]
- अन्य खनिज: यहाँ रेत, बजरी, और फॉस्फेट के भंडार भी मिलते हैं।
- निर्माण: इनका निर्माण नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के जमाव या समुद्री लहरों के अपरदन से होता है।
2. महाद्वीपीय ढाल (Continental Slope)
- परिभाषा:
जहाँ महाद्वीपीय मग्नतट समाप्त होता है, वहाँ से एक तीव्र ढाल वाला क्षेत्र शुरू होता है, जिसे महाद्वीपीय ढाल कहते हैं। यह मग्नतट और गभीर सागरीय मैदान के बीच की कड़ी है। - विशेषताएँ:
- ढाल (Slope): इसका ढाल अपेक्षाकृत बहुत तीव्र होता है (आमतौर पर 2° से 5° तक)।
- गहराई: यह लगभग 200 मीटर से 3,000 मीटर की गहराई तक फैला होता है।
- कैनियन (Canyons): ⋆ इस ढाल पर अक्सर गहरी, खड़ी घाटियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें अंतःसागरीय कैनियन (Submarine Canyons) कहते हैं (जैसे हडसन कैनियन)। ये नदियों या टर्बिडिटी धाराओं (Turbidity currents) द्वारा बनाए जाते हैं।
- महत्व: यह महाद्वीप और महासागरीय पर्पटी के बीच की वास्तविक सीमा को चिह्नित करता है।
3. महाद्वीपीय उभार (Continental Rise)
- परिभाषा:
महाद्वीपीय ढाल के आधार पर, जहाँ ढाल फिर से मंद होने लगता है, एक हल्का ढाल वाला निक्षेपित क्षेत्र पाया जाता है, जिसे महाद्वीपीय उभार कहते हैं। - विशेषताएँ:
- ढाल (Slope): इसका ढाल बहुत मंद होता है (0.5° से 1°)।
- निर्माण: यह ढाल से नीचे बहकर आए अवसादों (Sediments) के जमाव से बनता है, जो पंखे जैसी आकृति (गहरे समुद्री पंखे – Deep Sea Fans) में जमा हो जाते हैं।
- यह धीरे-
धीरे गभीर सागरीय मैदान में विलीन हो जाता है। - ⋆ अपवाद: यह स्थलाकृति सक्रिय प्लेट सीमाओं (Active Margins) पर नहीं पाई जाती, जहाँ गर्त (Trenches) होते हैं।
4. गभीर सागरीय मैदान या नितलीय मैदान (Abyssal Plain or Deep Sea Plain)
- परिभाषा:
महाद्वीपीय उभार के बाद विस्तृत, लगभग समतल और मंद ढाल वाले मैदान शुरू होते हैं, जिन्हें गभीर सागरीय मैदान कहा जाता है। - विशेषताएँ:
- विस्तार: यह महासागरीय तल का सर्वाधिक विस्तृत भाग है, जो कुल समुद्री तल के लगभग 40% हिस्से को कवर करता है।
- समतलता: ये पृथ्वी की सतह के सबसे समतल क्षेत्रों में से हैं।
- गहराई: इनकी औसत गहराई 3,000 से 6,000 मीटर होती है।
- आवरण: ये महाद्वीपों से लाए गए अत्यंत महीन अवसादों (जैसे लाल पंका या Red Clay) और समुद्री जीवों के अवशेषों (Ooze) से ढके होते हैं।
लघु उच्चावचीय स्थलाकृतियाँ (Minor Relief Features)
महासागरों के तल पर चार प्रमुख प्रभागों (मग्नतट, ढाल, उभार, मैदान) के अतिरिक्त, कई अन्य छोटी लेकिन भूवैज्ञानिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं। इनका निर्माण विवर्तनिक (Tectonic), ज्वालामुखीय (Volcanic) और निक्षेपणात्मक (Depositional) प्रक्रियाओं द्वारा होता है।
1. मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge – MOR)
- परिभाषा:
मध्य-महासागरीय कटक महासागरों के भीतर स्थित एक विशाल, जलमग्न (Submerged) पर्वत श्रृंखला है। यह पृथ्वी पर पाई जाने वाली सबसे लंबी और सबसे व्यापक पर्वत प्रणाली है, जो सभी प्रमुख महासागरों में लगभग 70,000 किलोमीटर की लंबाई में फैली हुई है। - उत्पत्ति और प्रक्रिया:
- ⋆ इसका निर्माण अपसारी प्लेट सीमाओं (Divergent Plate Boundaries) पर होता है, जहाँ दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे से दूर जा रही होती हैं।
- इस प्रक्रिया को समुद्र तल प्रसरण (Sea-Floor Spreading) कहते हैं। प्लेटों के अलग होने से नीचे से गर्म मैग्मा ऊपर आता है और ठंडा होकर नई महासागरीय पर्पटी का निर्माण करता है, जिससे यह कटक बनता है।
- [UPSC Mains – Core Concept]
- विशेषताएँ:
- इसके केंद्र में एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) पाई जाती है।
- यह उथले भूकंपों और दरारी प्रकार के ज्वालामुखी उद्गारों का एक प्रमुख क्षेत्र है।
- यह ट्रांसफॉर्म भ्रंशों (Transform Faults) द्वारा कई खंडों में विस्थापित होती है।
- उदाहरण:
- मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge): अटलांटिक महासागर में ‘S’ आकार में फैली हुई यह सबसे प्रसिद्ध कटक है।
- पूर्वी प्रशांत उभार (East Pacific Rise)
- कार्ल्सबर्ग कटक (Carlsberg Ridge): अरब सागर में स्थित।
2. समुद्री टीला या सीमाउंट (Seamount)
- परिभाषा:
यह महासागरीय तल पर स्थित एक नुकीले शिखर वाला पर्वत है जो ज्वालामुखी क्रिया द्वारा बनता है। यह समुद्र की सतह के नीचे ही रहता है, अर्थात यह एक द्वीप नहीं बनता। - विशेषताएँ:
- सीमाउंट माने जाने के लिए, इसकी ऊँचाई आसपास के समुद्री तल से कम से कम 1,000 मीटर होनी चाहिए।
- ये अक्सर हॉटस्पॉट (Hotspots) या मध्य-महासागरीय कटकों के पास पाए जाते हैं।
- ये समुद्री जैव विविधता के केंद्र होते हैं, क्योंकि ये समुद्री जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं।
3. गुयोट (Guyot)
- परिभाषा:
गुयोट एक सपाट शीर्ष वाला (Flat-topped) समुद्री टीला है। इसे ‘टेबलमाउंट’ (Tablemount) भी कहा जाता है। - उत्पत्ति:
- माना जाता है कि गुयोट कभी एक ज्वालामुखी द्वीप या सीमाउंट था जिसका शिखर समुद्र की सतह के ऊपर था।
- समुद्री लहरों के अपरदन ने इसके शिखर को काटकर सपाट बना दिया, और बाद में प्लेटों की गति या समुद्र तल में परिवर्तन के कारण यह फिर से जलमग्न हो गया।
- ⋆ इसका सपाट शीर्ष लहर अपरदन का एक स्पष्ट प्रमाण है। [UPSC/State PSC – Conceptual]
4. महासागरीय गर्त या खाई (Oceanic Trench)
- परिभाषा:
गर्त महासागरीय नितल पर स्थित अत्यंत गहरी, लंबी और संकरी खाइयाँ हैं। ये पृथ्वी की सतह के सबसे गहरे स्थान हैं। - उत्पत्ति:
- ⋆ इनका निर्माण अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Plate Boundaries) पर क्षेपण की प्रक्रिया (Process of Subduction) द्वारा होता है।
- जब एक भारी महासागरीय प्लेट, दूसरी प्लेट (महाद्वीपीय या महासागरीय) के नीचे धँसती है, तो इस झुकाव के स्थान पर एक गहरी खाई बन जाती है।
- विशेषताएँ:
- ये तीव्र और गहरे भूकंपों तथा विस्फोटक ज्वालामुखियों (द्वीप चाप) के क्षेत्र होते हैं।
- ये प्रशांत महासागर में सबसे अधिक पाए जाते हैं, विशेषकर ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire) के साथ-साथ।
- उदाहरण:
- ⋆ मेरियाना गर्त (Mariana Trench): पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित यह विश्व का सबसे गहरा ज्ञात गर्त है। इसका सबसे गहरा बिंदु ‘चैलेंजर डीप’ (Challenger Deep) है, जिसकी गहराई लगभग 11,000 मीटर (11 किलोमीटर) है। [लगभग सभी परीक्षाओं में पूछा जाता है]
- टोंगा गर्त (Tonga Trench): विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त।
- प्यूर्टो रिको गर्त (Puerto Rico Trench): अटलांटिक महासागर का सबसे गहरा स्थान।
- जावा (सुंडा) गर्त (Java/Sunda Trench): हिंद महासागर का सबसे गहरा स्थान।
5. अंतःसागरीय कैनियन (Submarine Canyon)
- परिभाषा:
ये महाद्वीपीय मग्नतट और विशेषकर महाद्वीपीय ढाल को काटने वाली गहरी, ‘V’ आकार की घाटियाँ हैं, जो स्थलीय कैनियन (जैसे ग्रैंड कैन्यन) के समान दिखती हैं। - उत्पत्ति:
- माना जाता है कि इनका निर्माण मुख्य रूप से पंक प्रवाह या टर्बिडिटी धाराओं (Turbidity Currents) द्वारा होता है। टर्बिडिटी धाराएँ पानी और अवसाद का एक घना, तेज बहने वाला मिश्रण होती हैं जो ढलान के सहारे नीचे की ओर बहते हुए सतह को अपरदित करती हैं।
- कुछ कैनियन बड़ी नदियों के मुहाने का जलमग्न विस्तार भी हो सकते हैं (जैसे हडसन नदी का कैनियन)।
- उदाहरण:
- हडसन कैनियन (Hudson Canyon): उत्तरी अमेरिका के तट पर।
- ज़ैरे (कांगो) कैनियन (Zaire/Congo Canyon): अफ्रीका के तट पर।
लघु स्थलाकृतियों का सारांश
| स्थलाकृति | निर्माण प्रक्रिया | संबद्ध प्लेट सीमा | मुख्य पहचान |
| मध्य-महासागरीय कटक | समुद्र तल प्रसरण (ज्वालामुखी) | अपसारी (Divergent) | सबसे लंबी जलमग्न पर्वत श्रृंखला |
| सीमाउंट (Seamount) | ज्वालामुखी | – | नुकीला शिखर, जल के नीचे |
| गुयोट (Guyot) | ज्वालामुखी + लहर अपरदन | – | सपाट शिखर, जल के नीचे |
| गर्त (Trench) | क्षेपण (Subduction) | अभिसारी (Convergent) | पृथ्वी का सबसे गहरा भाग |
| अंतःसागरीय कैनियन | टर्बिडिटी धाराएँ / अपरदन | – | महाद्वीपीय ढाल पर ‘V’ आकार की घाटी |
| स्थलाकृति | विवरण | उदाहरण |
| मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge) | ⋆ अपसारी प्लेट सीमाओं (Divergent Boundaries) पर बनने वाली एक विशाल, जलमग्न पर्वत श्रृंखला। यह पृथ्वी की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला (~70,000 किमी) है। | मध्य-अटलांटिक कटक |
| समुद्री टीला (Seamount) | महासागरीय तल पर स्थित एक नुकीले शिखर वाला ज्वालामुखी पर्वत, जो समुद्र की सतह तक नहीं पहुँच पाता। | |
| गुयोट (Guyot) | एक सपाट शीर्ष वाला समुद्री टीला। इसका सपाट शीर्ष लहरों द्वारा हुए अपरदन का परिणाम होता है, जो यह दर्शाता है कि यह कभी समुद्र की सतह के ऊपर था। | |
| महासागरीय गर्त (Oceanic Trench) | ⋆ अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Boundaries) पर बनने वाली पृथ्वी की सबसे गहरी, लंबी और संकरी खाइयाँ। ये क्षेपण क्षेत्रों (Subduction Zones) से संबंधित हैं। | ⋆ मेरियाना गर्त (Mariana Trench) – प्रशांत महासागर में स्थित विश्व का सबसे गहरा स्थान। |
| अंतःसागरीय कैनियन (Submarine Canyon) | महाद्वीपीय मग्नतट और ढाल पर नदियों या टर्बिडिटी धाराओं द्वारा बनाई गई गहरी, ‘V’ आकार की घाटियाँ। | हडसन कैनियन, ज़ैरे कैनियन |
समुद्री जल का तापमान (Temperature of Ocean Water)
महासागरीय जल का तापमान समुद्र विज्ञान का एक महत्वपूर्ण गुण है। यह समुद्री जल के घनत्व, लवणता, और उसमें घुली गैसों की मात्रा को प्रभावित करता है। इसके अलावा, यह समुद्री धाराओं की गति और दिशा, समुद्री जीवों के वितरण और पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने में एक निर्णायक भूमिका निभाता है।
महासागरीय जल के तापन का मुख्य स्रोत सूर्यातप (Insolation) यानी सूर्य से आने वाली लघु तरंग विकिरण है।
I. समुद्री जल के तापमान का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Temperature)
क्षैतिज वितरण का तात्पर्य महासागरों की सतह (Surface) के तापमान में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पाए जाने वाले अंतर से है, विशेषकर अक्षांशों के साथ।
समुद्री जल के तापमान का क्षैतिज वितरण: प्रभावित करने वाले कारक
(Horizontal Distribution of Ocean Temperature: Controlling Factors)
महासागरों की सतह का तापमान एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न होता है। इस क्षैतिज भिन्नता को कई कारक नियंत्रित करते हैं, जिनमें से कुछ वैश्विक स्तर पर और कुछ स्थानीय स्तर पर कार्य करते हैं।
1. अक्षांश (Latitude)
- विवरण: ⋆ यह सतही जल के तापमान के वितरण को नियंत्रित करने वाला सबसे मौलिक और महत्वपूर्ण कारक है।
- प्रक्रिया: पृथ्वी की गोलाकार आकृति के कारण, सूर्य से प्राप्त होने वाले सूर्यातप (Insolation) की मात्रा भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर लगातार घटती जाती है। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लगभग लंबवत पड़ती हैं, जिससे प्रति इकाई क्षेत्रफल पर अधिक ऊष्मा प्राप्त होती है, जबकि ध्रुवों की ओर किरणें तिरछी होती जाती हैं, जिससे ऊष्मा कम प्राप्त होती है।
- परिणाम: इसी के अनुरूप, महासागरों का औसत सतही तापमान भी भूमध्य रेखा पर उच्चतम (लगभग 27°C) होता है और ध्रुवों की ओर न्यूनतम (लगभग -2°C) हो जाता है। सामान्यतः प्रति अक्षांश पर तापमान में लगभग 0.5°F (या 0.28°C) की गिरावट आती है।
2. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)
- विवरण: पवनें घर्षण के माध्यम से अपने साथ समुद्र की सतह के पानी को धकेलती हैं। इस प्रक्रिया से स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर तापमान में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकता है।
- प्रक्रिया और परिणाम:
- अपतटीय पवनें और उद्वेलन (Offshore Winds and Upwelling):
- जब पवनें तट से समुद्र की ओर (अपतटीय) बहती हैं, तो वे सतह के गर्म पानी को तट से दूर धकेल देती हैं। इस खाली जगह को भरने के लिए, महासागर की गहराई से ठंडा, सघन और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर की ओर उठता है। इस प्रक्रिया को उद्वेलन या अपवेलिंग (Upwelling) कहते हैं।
- ⋆ प्रभाव: उद्वेलन तटीय क्षेत्रों के सतही जल के तापमान को काफी कम कर देता है। पोषक तत्वों की प्रचुरता के कारण, ये क्षेत्र विश्व के सबसे उत्पादक मत्स्यन क्षेत्रों (Rich Fishing Grounds) में से होते हैं। [UPSC Prelims – Conceptual]
- उदाहरण: पेरू, कैलिफोर्निया और पश्चिमी अफ्रीका के तट।
- अभितटीय पवनें और अधोगमन (Onshore Winds and Downwelling):
- जब पवनें समुद्र से तट की ओर (अभितटीय) चलती हैं, तो वे सतह के गर्म पानी को तट के पास जमा कर देती हैं, जिससे पानी नीचे की ओर धँसता है। इस प्रक्रिया को अधोगमन (Downwelling) कहते हैं। इससे तटीय जल का तापमान बढ़ जाता है।
- अपतटीय पवनें और उद्वेलन (Offshore Winds and Upwelling):
3. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)
- विवरण: ⋆ महासागरीय धाराएँ ऊष्मा के वैश्विक पुनर्वितरण में एक “कन्वेयर बेल्ट” की तरह काम करती हैं और तापमान के सामान्य अक्षांशीय पैटर्न को बहुत हद तक संशोधित (modify) करती हैं।
- प्रक्रिया और परिणाम:
- गर्म धाराएँ (Warm Currents):
- ये भूमध्यरेखीय और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से उत्पन्न होकर ध्रुवों की ओर बहती हैं। ये अपने साथ गर्म पानी ले जाती हैं, जिससे ये उच्च अक्षांशों के तापमान को उनकी अपेक्षा से अधिक गर्म कर देती हैं।
- ⋆ उदाहरण: गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream), एक गर्म धारा है, जो उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट और पश्चिमी यूरोप (विशेषकर नॉर्वे और ब्रिटेन) के तटों को सर्दियों में भी अपेक्षाकृत गर्म और बर्फ मुक्त रखती है। [UPPSC/State PSC]
- ठंडी धाराएँ (Cold Currents):
- ये ध्रुवीय और उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों से उत्पन्न होकर भूमध्य रेखा की ओर बहती हैं। ये अपने साथ ठंडा पानी लाती हैं, जिससे ये निम्न अक्षांशों के तापमान को उनकी अपेक्षा से अधिक ठंडा कर देती हैं।
- ⋆ उदाहरण: लैब्राडोर धारा (Labrador Current) न्यूफाउंडलैंड के पास के क्षेत्र को ठंडा रखती है, जबकि पेरू (हम्बोल्ट) धारा (Peru/Humboldt Current) दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट को ठंडा रखती है। ये धाराएँ अक्सर मरुस्थलों के निर्माण में भी योगदान देती हैं।
- गर्म धाराएँ (Warm Currents):
4. स्थल और जल का वितरण (Distribution of Land and Water)
- विवरण: महाद्वीपों की उपस्थिति समुद्री जल के परिसंचरण को बाधित करती है और तापीय गुणों में भिन्नता के कारण महासागरों के तापमान को प्रभावित करती है।
- प्रक्रिया और परिणाम:
- गोलार्धों में भिन्नता: उत्तरी गोलार्ध में स्थल की अधिकता के कारण, वहाँ के महासागर भूमि के प्रभाव से अधिक गर्म हो जाते हैं। इसके विपरीत, दक्षिणी गोलार्ध में महासागरों का विशाल विस्तार है, इसलिए वहाँ तापमान का वितरण अधिक नियमित और समरूप होता है। उत्तरी गोलार्ध के महासागरों का औसत तापमान दक्षिणी गोलार्ध से थोड़ा अधिक है।
- बंद और खुले समुद्र:
- निम्न अक्षांशों में स्थित आंशिक रूप से बंद समुद्र (जैसे लाल सागर, फारस की खाड़ी) खुले महासागरों की तुलना में अधिक गर्म होते हैं क्योंकि उनका परिसंचरण सीमित होता है।
- उच्च अक्षांशों में स्थित बंद समुद्र (जैसे बाल्टिक सागर) अधिक ठंडे होते हैं।
5. स्थानीय मौसम की दशाएँ (Local Weather Conditions)
- विवरण: अल्पकालिक और स्थानीय मौसम की घटनाएँ भी सतही जल के तापमान को प्रभावित करती हैं।
- उदाहरण:
- मेघाच्छन्नता (Cloud Cover): बादल दिन में सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके सतह को ठंडा रखते हैं।
- तूफान और चक्रवात: ये तूफान गहरे ठंडे पानी को सतह के गर्म पानी के साथ मिला देते हैं, जिससे तूफान के गुजरने के बाद समुद्र की सतह का तापमान अचानक कम हो जाता है।
निष्कर्ष:
समुद्री जल के तापमान का क्षैतिज वितरण एक जटिल प्रक्रिया है। यद्यपि अक्षांश इसका मूल नियंत्रक है, लेकिन प्रचलित पवनें, महासागरीय धाराएँ, और स्थल-जल का वितरण मिलकर एक जटिल वैश्विक पैटर्न का निर्माण करते हैं, जो पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समताप रेखाएँ (Isotherms):
महासागरों के सतही तापमान को मानचित्र पर समताप रेखाओं (Isotherms) द्वारा दर्शाया जाता है। ये रेखाएँ अक्षांशों के लगभग समानांतर होती हैं, लेकिन महासागरीय धाराओं और पवनों के प्रभाव में विक्षेपित हो जाती हैं।
II. समुद्री जल के तापमान का लंबवत वितरण (Vertical Distribution of Ocean Temperature)
समुद्री जल के तापमान का लंबवत वितरण का तात्पर्य महासागरों में गहराई बढ़ने के साथ तापमान में होने वाले परिवर्तन के अध्ययन से है। यह क्षैतिज वितरण से बिल्कुल भिन्न होता है क्योंकि सूर्य की ऊष्मा महासागर की गहराई में प्रवेश नहीं कर पाती, जिससे तापमान की एक स्पष्ट परतदार संरचना (Stratified Structure) विकसित होती है।
महासागरीय जल का लगभग 90% आयतन गहरे, ठंडे और सूर्य के प्रकाश से अप्रभावित क्षेत्र में पाया जाता है।
तापमान की लंबवत संरचना: तीन प्रमुख परतें
गहराई के साथ तापमान के प्रोफाइल के आधार पर, महासागरों को तीन स्पष्ट परतों या मंडलों में विभाजित किया जा सकता है:
[आरेख: एक ग्राफ जिसमें Y-अक्ष पर गहराई (Depth, सतह पर 0 से शुरू होकर नीचे की ओर बढ़ती हुई) और X-अक्ष पर तापमान (Temperature) दिखाया गया हो। सतह के पास उच्च और लगभग स्थिर तापमान वाली सतही परत, उसके नीचे तापमान में एक तीव्र गिरावट वाली थर्मोकलाइन परत, और फिर बहुत अधिक गहराई पर लगभग स्थिर और ठंडे तापमान वाली गहरी परत को वक्र (Curve) के माध्यम से स्पष्ट रूप से दर्शाया जाए।]
1. पहली परत: सतही परत या ऊपरी परत (Surface Layer or Upper Layer)
- परिभाषा:
यह महासागर की सबसे ऊपरी परत है जो सूर्य के प्रकाश और वायुमंडल के सीधे संपर्क में होती है। इसे प्रकाशित मंडल (Photic Zone) या मिश्रित परत (Mixed Layer) भी कहा जाता है। - गहराई:
इसकी मोटाई औसतन 200 मीटर तक होती है, लेकिन यह मौसम और स्थान के अनुसार 50 मीटर से 500 मीटर तक भी हो सकती है। - तापमान और विशेषताएँ:
- सूर्य की ऊष्मा: यह परत सीधे सूर्यातप (Insolation) को अवशोषित करती है, इसलिए यह महासागर का सबसे गर्म हिस्सा होती है।
- मिश्रण (Mixing): पवनें, लहरें और धाराएँ इस परत के पानी को लगातार मिश्रित करती रहती हैं, जिसके कारण इस परत में ऊपर से नीचे तक तापमान लगभग एक समान बना रहता है।
- मौसमी परिवर्तन: इस परत का तापमान मौसम के अनुसार बदलता है (गर्मियों में गर्म और सर्दियों में ठंडा)।
- जैव विविधता: सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति के कारण, यह परत समुद्री जीवन और जैव विविधता (Marine life and Biodiversity) की दृष्टि से सबसे समृद्ध है, क्योंकि यहीं पर पादप प्लवक (Phytoplankton) प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं।
2. दूसरी परत: ताप प्रवणता या थर्मोकलाइन (Thermocline)
- परिभाषा:
⋆ थर्मोकलाइन वह संक्रमणकालीन परत है जो ऊपर की गर्म, मिश्रित सतही परत को नीचे की ठंडी, गहरी परत से अलग करती है। इस परत की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें गहराई बढ़ने के साथ तापमान में बहुत तेजी से गिरावट आती है। - गहराई:
यह आमतौर पर 200 मीटर से 1,000 मीटर की गहराई के बीच स्थित होती है। इसकी मोटाई और गहराई स्थान और मौसम के अनुसार बदलती रहती है। - महत्व और विशेषताएँ:
- तापीय अवरोध (Thermal Barrier): यह एक स्थायी घनत्व प्रवणता (पिक्नोक्लाइन – Pycnocline) का निर्माण करती है, जो एक अवरोधक की तरह काम करती है और सतही जल तथा गहरे जल के बीच पोषक तत्वों और ऑक्सीजन के मिश्रण को सीमित करती है।
- अक्षांशीय भिन्नता:
- उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह परत स्थायी (Permanent) और बहुत स्पष्ट होती है क्योंकि सतह का पानी हमेशा गर्म रहता है।
- मध्य अक्षांशों में यह मौसमी (Seasonal) होती है – गर्मियों में विकसित होती है और सर्दियों में कमजोर पड़ जाती है या गायब हो जाती है।
- ⋆ ध्रुवीय क्षेत्रों में सतह का पानी ही बहुत ठंडा होता है, इसलिए यहाँ थर्मोकलाइन लगभग अनुपस्थित होती है। [UPSC Prelims – Statement Based]
3. तीसरी परत: गहरी परत या गंभीर मंडल (Deep Layer)
- परिभाषा:
यह थर्मोकलाइन के नीचे से लेकर महासागरीय नितल (Ocean Floor) तक फैली महासागर की सबसे विशाल परत है। - गहराई:
यह 1,000 मीटर से लेकर महासागरों की अधिकतम गहराई तक फैली हुई है। - तापमान और विशेषताएँ:
- स्थायी शीतलता: यह परत सूर्य के प्रकाश से पूरी तरह से अप्रभावित रहती है, इसलिए यह अत्यंत ठंडी होती है।
- तापमान की स्थिरता: इस परत में तापमान गहराई के साथ बहुत कम बदलता है और लगभग स्थिर (0°C से 4°C) बना रहता है।
- जल का स्रोत: इस परत का ठंडा जल मुख्य रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों से आता है। ध्रुवों पर ठंडा और सघन सतह का पानी नीचे डूबता है और धीरे-धीरे थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation) के माध्यम से विश्व के सभी महासागरीय बेसिनों की गहराइयों में फैल जाता है।
निष्कर्ष:
महासागरों का लंबवत तापमान प्रोफाइल एक त्रि-स्तरीय संरचना दिखाता है। ऊपरी परत (सतही परत) गर्म और मिश्रित होती है। मध्य परत (थर्मोकलाइन) तापमान में तीव्र गिरावट का क्षेत्र है। और निचली परत (गहरी परत) महासागरों का सबसे बड़ा, स्थायी रूप से ठंडा और लगभग स्थिर तापमान वाला हिस्सा है। यह परतदार संरचना समुद्री परिसंचरण, जलवायु और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में एक मौलिक भूमिका निभाती है।
निष्कर्ष:
क्षैतिज रूप से, महासागरों का तापमान मुख्य रूप से अक्षांश (Insolation) द्वारा नियंत्रित होता है, जिसे पवनें और धाराएँ संशोधित करती हैं। लंबवत रूप से, तापमान की संरचना तीन परतों में विभाजित है – एक गर्म सतही परत, एक मध्यवर्ती थर्मोकलाइन परत जिसमें तापमान तेजी से गिरता है, और एक विशाल, स्थायी रूप से ठंडी गहरी परत। यह त्रि-स्तरीय संरचना समुद्री परिसंचरण और पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
महासागर (The Oceans)
परिभाषा:
महासागर पृथ्वी की सतह पर मौजूद विशाल, लवणीय (खारे) जल के आपस में जुड़े हुए वृहत निकायों को कहते हैं। ये जलमंडल (Hydrosphere) का सबसे बड़ा और प्रमुख हिस्सा हैं, जो पृथ्वी की सतह का लगभग 71% हिस्सा कवर करते हैं। महासागर पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने, ऑक्सीजन का उत्पादन करने, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने और अरबों लोगों को भोजन तथा आजीविका प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विश्व के सभी महासागर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिसे सामूहिक रूप से “वैश्विक महासागर” (Global Ocean) कहा जाता है। हालांकि, भौगोलिक सुविधा के लिए, इसे पांच प्रमुख महासागरों में विभाजित किया गया है।
विश्व के प्रमुख महासागर (Major Oceans of the World)
विश्व को पाँच प्रमुख महासागरों में बांटा गया है। क्षेत्रफल और औसत गहराई के घटते क्रम में वे इस प्रकार हैं:
- प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)
- अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)
- हिंद महासागर (Indian Ocean)
- दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) (अंटार्कटिक महासागर)
- आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean)
1. प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)
प्रशांत महासागर, जिसका नाम पुर्तगाली खोजकर्ता फर्डिनेंड मैगलन ने “शांत सागर” (‘Mar Pacifico’) रखा था, क्षेत्रफल और गहराई दोनों की दृष्टि से पृथ्वी का सबसे बड़ा और सबसे गहरा महासागर है। यह इतना विशाल है कि यह पृथ्वी के कुल सतह क्षेत्रफल का लगभग एक-तिहाई हिस्सा और पृथ्वी के कुल जलीय क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा कवर करता है।
भौगोलिक स्थिति और विस्तार (Geographical Location and Extent)
- आकार और क्षेत्रफल:
- इसका आकार मोटे तौर पर त्रिभुजाकार (Triangular) है।
- क्षेत्रफल लगभग 16.52 करोड़ वर्ग किलोमीटर है।
- सीमाएँ (Boundaries):
- पश्चिम में: एशिया और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप।
- पूर्व में: उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका महाद्वीप।
- उत्तर में: आर्कटिक महासागर, जिससे यह संकरे बेरिंग जलडमरूमध्य (Bering Strait) द्वारा जुड़ा हुआ है।
- दक्षिण में: दक्षिणी महासागर (अंटार्कटिका)।
महासागरीय नितल की स्थलाकृति (Ocean Bottom Relief)
प्रशांत महासागर का नितल अत्यंत जटिल और विविधतापूर्ण है, जो इसकी सक्रिय विवर्तनिक प्रकृति को दर्शाता है।
- महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf):
- प्रशांत महासागर का मग्नतट अपेक्षाकृत संकरा है, विशेषकर अमेरिका के पश्चिमी तट और एशिया के पूर्वी तट के साथ जहाँ युवा वलित पर्वत श्रृंखलाएँ हैं।
- प्रमुख कटकें (Major Ridges):
- इसके मध्य में एक विशाल मध्य-महासागरीय कटक नहीं है जैसा कि अटलांटिक में है। इसके बजाय, इसकी कटक प्रणाली अधिक जटिल और किनारों पर स्थित है।
- पूर्वी प्रशांत उभार (East Pacific Rise): यह इसकी मुख्य कटक प्रणाली है जो दक्षिण-पूर्व में स्थित है।
- द्वीप (Islands):
- ⋆ प्रशांत महासागर को “द्वीपों का महासागर” कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें 20,000 से 25,000 से अधिक द्वीप हैं, जो किसी भी अन्य महासागर से कहीं अधिक हैं।
- इन द्वीपों को तीन मुख्य समूहों में बांटा गया है:
- मेलानेशिया (Melanesia): “काले द्वीप”, जैसे फिजी, न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप।
- माइक्रोनेशिया (Micronesia): “छोटे द्वीप”, जैसे मार्शल द्वीप, गुआम।
- पॉलिनेशिया (Polynesia): “बहुत सारे द्वीप”, एक विशाल त्रिभुज में फैले हुए, जिसमें हवाई द्वीप, न्यूजीलैंड, और ईस्टर द्वीप शामिल हैं।
- इनमें से कई द्वीप या तो ज्वालामुखी (Volcanic) मूल के हैं या प्रवाल (Coral) मूल के हैं (जिन्हें एटोल (Atoll) कहा जाता है)।
विवर्तनिक गतिविधियाँ और ‘रिंग ऑफ फायर’ (Tectonic Activities and the ‘Ring of Fire’)
- सबसे महत्वपूर्ण विशेषता: प्रशांत महासागर के किनारे पृथ्वी के सबसे सक्रिय भूवैज्ञानिक क्षेत्र हैं, जिसे ‘अग्नि वलय’ या ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire) कहा जाता है।
- प्रक्रिया:
- यहाँ प्रशांत प्लेट अपने चारों ओर स्थित महाद्वीपीय प्लेटों (जैसे यूरेशियन, उत्तरी अमेरिकी) के नीचे क्षेपित (Subducted) हो रही है।
- इस तीव्र अभिसारी प्लेट सीमा के कारण, यह क्षेत्र अत्यधिक अस्थिर है।
- परिणाम:
- विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी: ⋆ विश्व के लगभग 75% सक्रिय और प्रसुप्त ज्वालामुखी इसी रिंग ऑफ फायर में स्थित हैं। [UPSC/State PSC]
- विश्व के अधिकांश भूकंप: ⋆ विश्व के लगभग 80-90% भूकंप इसी क्षेत्र में आते हैं, जिनमें से कई बहुत विनाशकारी होते हैं।
- महासागरीय गर्त (Oceanic Trenches): इस क्षेपण के कारण प्रशांत महासागर के किनारों पर विश्व की सबसे गहरी खाइयाँ पाई जाती हैं।
प्रमुख गर्त और सबसे गहरा बिंदु (Major Trenches and the Deepest Point)
- मेरियाना गर्त (Mariana Trench):
- ⋆ यह फिलीपींस के पास स्थित विश्व का सबसे गहरा ज्ञात स्थान है।
- इसका सबसे गहरा बिंदु ‘चैलेंजर डीप’ (Challenger Deep) है, जिसकी गहराई लगभग 11,034 मीटर (11 किलोमीटर) है। यह माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई से भी अधिक गहरा है। [लगभग सभी परीक्षाओं में पूछा जाता है]
- अन्य प्रमुख गर्त:
- टोंगा गर्त (Tonga Trench): दूसरा सबसे गहरा।
- जापान गर्त (Japan Trench)
- पेरू-चिली गर्त (Peru-Chile Trench)
प्रमुख महासागरीय धाराएँ (Major Ocean Currents)
| गर्म धाराएँ (Warm Currents) | ठंडी धाराएँ (Cold Currents) |
| ∙ क्यूरोशियो धारा (Kuroshio Current): “जापान की काली धारा”, एशिया के तट पर। | ∙ ओयाशियो धारा (Oyashio Current): उत्तर से आती है और क्यूरोशियो से मिलती है, जिससे समृद्ध मत्स्य क्षेत्र बनता है। |
| ∙ पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा (East Australian Current) | ∙ कैलिफोर्निया धारा (California Current): उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर। |
| ∙ उत्तरी और दक्षिणी भूमध्यरेखीय धारा | ∙ पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru or Humboldt Current): दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर; अल नीनो घटना से संबंधित है। [UPSC] |
| ∙ अल नीनो (El Niño): एक आवधिक गर्म धारा। | ∙ पश्चिमी पवन प्रवाह (अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा) |
आर्थिक और सामरिक महत्व:
- यह एशिया और अमेरिका के बीच एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग है।
- मत्स्यन (विशेषकर जापान, पेरू के तट) और खनिज संसाधनों की दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- दक्षिण चीन सागर जैसे इसके सीमांत सागर भू-राजनीतिक (Geopolitical) दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र हैं।
2. अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)
अटलांटिक महासागर, जिसे ‘अंध महासागर’ भी कहा जाता है, क्षेत्रफल और विस्तार की दृष्टि से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा महासागर है। यह पृथ्वी के कुल सतह क्षेत्रफल का लगभग 20% और कुल जलीय क्षेत्र का लगभग 29% हिस्सा कवर करता है। इसका नाम ग्रीक पौराणिक कथाओं के देवता ‘एटलस’ के नाम पर रखा गया है।
भौगोलिक स्थिति और विस्तार (Geographical Location and Extent)
- आकार और क्षेत्रफल:
- ⋆ इसका आकार अंग्रेजी के अक्षर ‘S’ के समान है, जो इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है।
- क्षेत्रफल लगभग 10.64 करोड़ वर्ग किलोमीटर है।
- सीमाएँ (Boundaries):
- पश्चिम में: उत्तरी अमेरिका और दक्षिण अमेरिका महाद्वीप।
- पूर्व में: यूरोप और अफ्रीका महाद्वीप।
- उत्तर में: आर्कटिक महासागर (ग्रीनलैंड, आइसलैंड और नॉर्वे के बीच की रेखा द्वारा अलग)।
- दक्षिण में: दक्षिणी महासागर से जुड़ा हुआ है।
महासागरीय नितल की स्थलाकृति (Ocean Bottom Relief)
अटलांटिक महासागर की नितल स्थलाकृति इसकी मध्य-महासागरीय कटक द्वारा प्रमुख रूप से परिभाषित होती है।
- महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf):
- अटलांटिक महासागर का मग्नतट काफी चौड़ा है, विशेषकर उत्तरी अमेरिका (जैसे ग्रैंड बैंक) और उत्तर-पश्चिमी यूरोप (जैसे डोगर बैंक) के पास।
- ⋆ ये चौड़े मग्नतट विश्व के सबसे समृद्ध मत्स्यन क्षेत्रों (Richest Fishing Grounds) में से हैं।
- मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge – MAR):
- ⋆ यह अटलांटिक महासागर की सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख स्थलाकृति है।
- यह उत्तर में आइसलैंड से लेकर दक्षिण में बोवेट द्वीप तक लगभग 14,000 किलोमीटर की लंबाई में फैली एक विशाल ‘S’ आकार की जलमग्न पर्वत श्रृंखला है।
- उत्पत्ति: यह अपसारी प्लेट सीमा (Divergent Plate Boundary) पर स्थित है, जहाँ यूरेशियन-उत्तरी अमेरिकी प्लेटें और अफ्रीकी-दक्षिण अमेरिकी प्लेटें एक-दूसरे से दूर जा रही हैं। यह समुद्र तल प्रसरण (Sea-Floor Spreading) का एक क्लासिक उदाहरण है। [UPSC – Core Concept]
- विशेषता: इस कटक के कई शिखर पानी की सतह से ऊपर निकल आए हैं, जिन्होंने ज्वालामुखीय द्वीपों (Volcanic Islands) का निर्माण किया है, जैसे आइसलैंड और अज़ोरेस द्वीप (Azores)।
- कटक के केंद्र में एक गहरी भ्रंश घाटी (Rift Valley) भी मौजूद है।
- प्रमुख गर्त और सबसे गहरा बिंदु (Major Trenches and the Deepest Point):
- अटलांटिक महासागर में प्रशांत की तरह बहुत अधिक और गहरी गर्तें नहीं हैं।
- इसका सबसे गहरा बिंदु कैरेबियन सागर के उत्तर में स्थित प्यूर्टो रिको गर्त (Puerto Rico Trench) है, जिसकी गहराई लगभग 8,376 मीटर है।
प्रमुख विशेषताएँ और तथ्य
- सबसे व्यस्त व्यापारिक महासागर (Busiest Commercial Ocean):
- ⋆ यह पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के दो सबसे विकसित और औद्योगिक क्षेत्रों को जोड़ता है। इस कारण, यह समुद्री परिवहन और व्यापार की दृष्टि से विश्व का सबसे व्यस्त महासागर है।
- सर्वाधिक कटी-फटी तटरेखा (Most Indented Coastline):
- अटलांटिक महासागर की तटरेखा बहुत अधिक कटी-फटी और दंतुरित (Indented) है।
- इस विशेषता ने प्राकृतिक बंदरगाहों (Natural Harbours and Ports) के विकास के लिए उत्कृष्ट दशाएँ प्रदान की हैं, जिसने समुद्री व्यापार को और बढ़ावा दिया है।
- सीमांत सागर (Marginal Seas):
- इसमें कई महत्वपूर्ण और बड़े सीमांत सागर हैं, जैसे भूमध्य सागर (Mediterranean Sea), कैरेबियन सागर (Caribbean Sea), उत्तरी सागर (North Sea), बाल्टिक सागर (Baltic Sea), और मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico)।
प्रमुख महासागरीय धाराएँ (Major Ocean Currents)
अटलांटिक महासागर में एक बहुत ही सुव्यवस्थित धारा प्रणाली है:
| गर्म धाराएँ (Warm Currents) | ठंडी धाराएँ (Cold Currents) |
| ∙ उत्तरी भूमध्यरेखीय धारा (North Equatorial Current) | ∙ लैब्राडोर धारा (Labrador Current): उत्तर से आने वाली ठंडी धारा। |
| ∙ गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream): ⋆ यह एक शक्तिशाली, तेज और गर्म धारा है। यह उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट को गर्म रखती है और आगे चलकर उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट का रूप लेती है। | ∙ कनारी धारा (Canary Current): अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी तट पर बहने वाली ठंडी धारा, जो सहारा मरुस्थल के निर्माण में सहायक है। |
| ∙ उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift): ⋆ गल्फ स्ट्रीम का विस्तार, जो पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिमी यूरोप के तट को गर्म और बर्फ मुक्त रखता है। इसे “यूरोप का गर्म कंबल” भी कहते हैं। [UPPSC/State PSC] | ∙ बेंगुएला धारा (Benguela Current): अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी तट पर बहने वाली ठंडी धारा, जो नामीब और कालाहारी मरुस्थल के निर्माण में सहायक है। |
| ∙ ब्राजील धारा (Brazil Current): दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट पर बहने वाली गर्म धारा। | ∙ फाल्कलैंड धारा (Falkland Current): दक्षिण से आने वाली ठंडी धारा। |
| ∙ दक्षिणी भूमध्यरेखीय धारा (South Equatorial Current) | ∙ पश्चिमी पवन प्रवाह (अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा) |
मत्स्यन क्षेत्र का निर्माण: ⋆ न्यूफाउंडलैंड (कनाडा) के पास, जब गर्म गल्फ स्ट्रीम ठंडी लैब्राडोर धारा से मिलती है, तो वहाँ घना कोहरा छा जाता है और प्लैंकटन की प्रचुरता के कारण विश्व का सबसे प्रसिद्ध मत्स्यन क्षेत्र ‘ग्रैंड बैंक’ (Grand Bank) बनता है। [UPSC/BPSC]- सारगैसो सागर (Sargasso Sea):
- यह उत्तरी अटलांटिक महासागर में गल्फ स्ट्रीम, कनारी धारा और उत्तरी भूमध्यरेखीय धारा के चक्र के बीच स्थित एक शांत और स्थिर जल का क्षेत्र है। इसकी कोई तटरेखा नहीं है, बल्कि यह धाराओं से घिरा है। यह सारगैसम (Sargassum) नामक मोटी समुद्री घास के लिए प्रसिद्ध है।
3. हिंद महासागर (Indian Ocean)
हिंद महासागर क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। यह पृथ्वी के कुल जलीय क्षेत्र का लगभग 20% हिस्सा कवर करता है। इसका नामकरण भारत (Hindustan) के नाम पर किया गया है, जो इसके उत्तरी किनारे पर एक प्रमुख प्रायद्वीपीय देश के रूप में स्थित है। यह एकमात्र महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है।
भौगोलिक स्थिति और विस्तार (Geographical Location and Extent)
- आकार और क्षेत्रफल:
- इसका आकार मोटे तौर पर त्रिभुजाकार (Triangular) या अंग्रेजी के अक्षर ‘M’ जैसा दिखता है।
- क्षेत्रफल लगभग 7.35 करोड़ वर्ग किलोमीटर है।
- सीमाएँ (Boundaries):
- उत्तर में: एशिया महाद्वीप (विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप)।
- पश्चिम में: अफ्रीका महाद्वीप।
- पूर्व में: ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशियाई द्वीप समूह।
- दक्षिण में: दक्षिणी महासागर से जुड़ा हुआ है।
- अर्ध-महासागर (Half an Ocean): ⋆ हिंद महासागर को अक्सर ‘अर्ध-महासागर’ कहा जाता है, क्योंकि अटलांटिक और प्रशांत महासागरों के विपरीत, यह उत्तर में भूमि से पूरी तरह से घिरा हुआ है और आर्कटिक महासागर तक नहीं फैलता है। इस भौगोलिक सीमा का इसकी जलवायु और धाराओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। [UPSC – Conceptual]
महासागरीय नितल की स्थलाकृति (Ocean Bottom Relief)
हिंद महासागर के नितल में कई कटकें, बेसिन और गर्तें पाई जाती हैं।
- महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf):
- इसकी चौड़ाई में काफी भिन्नता है। भारत के पश्चिमी तट (अरब सागर) पर यह चौड़ा है, जबकि पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी) पर यह संकरा है। अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तटों पर भी यह संकरा है।
- मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge):
- हिंद महासागर की मध्यवर्ती कटक एक उल्टे ‘Y’ अक्षर (inverted Y-shape) के रूप में फैली हुई है।
- इसकी मुख्य शाखा को मध्य-हिंद महासागरीय कटक (Mid-Indian Oceanic Ridge) कहते हैं।
- यह दक्षिण में दो शाखाओं में बँट जाती है:
- दक्षिण-पश्चिमी भारतीय कटक (Southwest Indian Ridge): अफ्रीका की ओर।
- दक्षिण-पूर्वी भारतीय कटक (Southeast Indian Ridge): ऑस्ट्रेलिया की ओर।
- इसकी एक शाखा उत्तर की ओर कार्ल्सबर्ग कटक (Carlsberg Ridge) के नाम से अरब सागर में फैली है।
- अन्य प्रमुख कटकें (Other Major Ridges):
- 90 ईस्ट रिज (Ninety East Ridge): यह बंगाल की खाड़ी में उत्तर से दक्षिण तक 90° पूर्वी देशांतर के सहारे फैली एक लंबी, सीधी और अनूठी कटक है।
- चैगोस-लक्षद्वीप कटक (Chagos-Laccadive Ridge): लक्षद्वीप और मालदीव जैसे द्वीप इसी कटक पर स्थित हैं।
- सबसे गहरा बिंदु (Deepest Point):
- हिंद महासागर का सबसे गहरा स्थान इंडोनेशिया के पास स्थित सुंडा गर्त या जावा गर्त (Sunda or Java Trench) है। इसकी अधिकतम गहराई लगभग 7,725 मीटर है।
प्रमुख विशेषताएँ और तथ्य
- मानसूनी पवनों का प्रभाव (Influence of Monsoon Winds):
- ⋆ यह हिंद महासागर की सबसे अनूठी विशेषता है। यह विश्व का एकमात्र महासागर है जहाँ मौसमी पवनें (मानसूनी पवनें) अपनी दिशा पूरी तरह से उलट लेती हैं।
- परिणाम: इस दिशा परिवर्तन के कारण, हिंद महासागर के उत्तरी भाग में बहने वाली महासागरीय धाराएँ भी अपनी दिशा ऋतु के अनुसार बदल लेती हैं। ग्रीष्मकाल में वे दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर और शीतकाल में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हैं। [UPSC Prelims]
- उष्ण महासागर (Warm Ocean):
- चूँकि यह उत्तर में भूमि से घिरा है और ठंडी आर्कटिक हवाओं से प्रभावित नहीं होता, यह अटलांटिक और प्रशांत महासागरों की तुलना में औसतन एक गर्म महासागर है।
- सीमांत सागर (Marginal Seas):
- इसके दो प्रमुख सीमांत सागर अरब सागर (Arabian Sea) और बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) हैं, जो भारतीय प्रायद्वीप द्वारा अलग होते हैं।
- अन्य महत्वपूर्ण सागरों में लाल सागर (Red Sea) और फारस की खाड़ी (Persian Gulf) शामिल हैं, जो अपनी उच्च लवणता के लिए जाने जाते हैं।
- सामरिक महत्व (Strategic Importance):
- हिंद महासागर विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों (Sea Lanes of Communication – SLOCs) में से एक है। यह मध्य पूर्व के तेल क्षेत्रों को एशिया और यूरोप से जोड़ता है।
- स्वेज नहर और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे ‘चोक पॉइंट्स’ (Choke Points) इसे भू-राजनीतिक (Geopolitical) रूप से अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं।
प्रमुख महासागरीय धाराएँ (Major Ocean Currents)
(उत्तरी हिंद महासागर की धाराएँ मौसमी हैं, जबकि दक्षिणी धाराएँ स्थायी हैं)
| गर्म धाराएँ (Warm Currents) | ठंडी धाराएँ (Cold Currents) |
| ∙ उत्तर-पूर्वी मानसून ड्रिफ्ट (शीतकाल)<br>∙ दक्षिण-पश्चिमी मानसून ड्रिफ्ट (ग्रीष्मकाल) | |
| ∙ दक्षिणी भूमध्यरेखीय धारा (South Equatorial Current) | ∙ पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा (West Australian Current): ⋆ यह एक ठंडी धारा है। [State PSC] |
| ∙ मोजाम्बिक धारा (Mozambique Current) | |
| ∙ मेडागास्कर धारा (Madagascar Current) | |
| ∙ अगुलहास धारा (Agulhas Current): ⋆ यह एक शक्तिशाली गर्म धारा है। | |
| ∙ पश्चिमी पवन प्रवाह (अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा) |
4. दक्षिणी महासागर (Southern Ocean)
दक्षिणी महासागर, जिसे अंटार्कटिक महासागर (Antarctic Ocean) के नाम से भी जाना जाता है, विश्व के महासागरीय विभाजन में सबसे नवीन सदस्य है। यह अंटार्कटिका महाद्वीप को चारों ओर से घेरने वाली विशाल जलराशि है। इसकी अद्वितीय विशेषताओं के कारण, इसे अन्य महासागरों से अलग एक স্বতন্ত্র महासागर के रूप में मान्यता दी गई है।
भौगोलिक स्थिति और मान्यता (Geographical Location and Recognition)
- आधिकारिक मान्यता:
- अंतर्राष्ट्रीय जल सर्वेक्षण संगठन (International Hydrographic Organization – IHO) ने सन् 2000 में इसे एक अलग महासागरीय निकाय के रूप में आधिकारिक तौर पर परिभाषित और मान्यता दी, जिससे यह विश्व का पाँचवाँ महासागर बन गया।
- सीमाएँ (Boundaries):
- ⋆ इसकी सीमा किसी महाद्वीप या भू-भाग से नहीं, बल्कि एक अक्षांश रेखा द्वारा परिभाषित की गई है।
- इसकी उत्तरी सीमा 60° दक्षिणी अक्षांश (60th parallel south) है, जो अटलांटिक, प्रशांत और हिंद महासागरों की दक्षिणी सीमाओं से मिलती है।
- इसकी दक्षिणी सीमा अंटार्कटिका महाद्वीप की तटरेखा है।
- क्षेत्रफल:
- यह चौथा सबसे बड़ा महासागर है, जो आर्कटिक महासागर से बड़ा लेकिन हिंद, अटलांटिक और प्रशांत महासागरों से छोटा है।
प्रमुख विशेषताएँ और तथ्य
- अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current – ACC):
- ⋆ यह दक्षिणी महासागर की सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण विशेषता है।
- विवरण: ACC एक अत्यंत शक्तिशाली, गहरी और ठंडी महासागरीय धारा है जो पश्चिम से पूर्व की ओर, अंटार्कटिका के चारों ओर, बिना किसी भू-भाग की बाधा के लगातार बहती है। इसे “पश्चिमी पवन प्रवाह” (West Wind Drift) भी कहा जाता है, क्योंकि यह प्रचंड पछुआ पवनों (Roaring Forties, etc.) द्वारा संचालित होती है।
- महत्व:
- यह विश्व की सबसे विशाल महासागरीय धारा (आयतन की दृष्टि से) है।
- यह एकमात्र ऐसी धारा है जो तीनों प्रमुख महासागरों – अटलांटिक, प्रशांत और हिंद – को जोड़ती है।
- यह एक “तापीय अवरोधक” (Thermal Barrier) के रूप में कार्य करती है, जो गर्म उष्णकटिबंधीय जल को अंटार्कटिका तक पहुँचने से रोकती है, जिससे अंटार्कटिका ठंडा बना रहता है।
- यह वैश्विक थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation) में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- PYQ Link: ACC की दिशा, अवस्थिति और महत्व से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। [UPSC/CDS]
- समुद्री बर्फ (Sea Ice) का निर्माण:
- यह महासागर अत्यधिक ठंडा है। शीतकाल (मार्च से सितंबर) के दौरान, इसकी सतह का एक विशाल हिस्सा (लगभग 1.8 करोड़ वर्ग किमी तक) समुद्री बर्फ की मोटी परत से ढक जाता है। गर्मियों में यह बर्फ काफी हद तक पिघल जाती है।
- यह मौसमी जमना और पिघलना पृथ्वी के एल्बिडो (Albedo) को बहुत प्रभावित करता है और वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करता है।
- पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance):
- ठंडा और ऑक्सीजन युक्त होने के बावजूद, यह महासागर अत्यंत उत्पादक है।
- उद्वेलन (Upwelling) की प्रक्रिया यहाँ गहरे, पोषक तत्वों से भरपूर पानी को सतह पर लाती है, जो पादप प्लवक (Phytoplankton) के विकास को बढ़ावा देता है।
- ⋆ यह प्लवक अंटार्कटिक क्रिल (Antarctic Krill) नामक छोटे क्रस्टेशियंस का मुख्य भोजन है, जो इस महासागर की खाद्य श्रृंखला का आधार है।
- यह क्रिल पेंगुइन, सील, समुद्री पक्षियों और दुनिया की सबसे बड़ी व्हेल (जैसे ब्लू व्हेल, फिन व्हेल) का मुख्य भोजन स्रोत है। [UPSC Prelims – Environment Section]
- गहरे जल का निर्माण (Formation of Deep Water):
- दक्षिणी महासागर विश्व के सबसे घने और ठंडे गहरे जल (Deep Water) के निर्माण का एक प्रमुख स्थल है, जिसे अंटार्कटिक बॉटम वॉटर (Antarctic Bottom Water – AABW) कहते हैं।
- जब समुद्री बर्फ बनती है, तो नमक पीछे छूट जाता है, जिससे आसपास का पानी अधिक खारा और सघन हो जाता है। यह सघन पानी डूबकर महासागरीय तल पर बैठ जाता है और फिर विश्व के अन्य महासागरीय बेसिनों में प्रवाहित होता है।
- महासागरीय नितल:
- इसका नितल अपेक्षाकृत गहरा और संकरा है। महाद्वीपीय मग्नतट सामान्य से अधिक गहरे हैं क्योंकि वे अतीत में बर्फ की मोटी चादरों के भार से दब गए थे।
- दक्षिणी सैंडविच गर्त (South Sandwich Trench) इस महासागर का सबसे गहरा बिंदु है।
निष्कर्ष:
दक्षिणी महासागर केवल एक जलराशि नहीं, बल्कि एक अनूठा और गतिशील जलवायु और पारिस्थितिक तंत्र है। इसकी अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा, मौसमी समुद्री बर्फ और समृद्ध जैव विविधता इसे वैश्विक जलवायु प्रणाली का एक महत्वपूर्ण नियामक बनाती है। इसकी अद्वितीयता के कारण ही इसे एक अलग महासागर का दर्जा दिया गया है।
5. आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean)
आर्कटिक महासागर क्षेत्रफल और गहराई दोनों की दृष्टि से विश्व के पांचों महासागरों में सबसे छोटा और सबसे उथला है। यह पृथ्वी के सबसे उत्तरी भाग में स्थित है और उत्तरी ध्रुव (North Pole) के चारों ओर फैला हुआ है। इसका अधिकांश भाग वर्ष भर समुद्री बर्फ (Sea Ice) से ढका रहता है, जो इसकी सबसे प्रमुख विशेषता है।
भौगोलिक स्थिति और विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति:
- यह पूरी तरह से उत्तरी गोलार्ध में स्थित है और लगभग पूरी तरह से यूरेशिया और उत्तरी अमेरिका के महाद्वीपीय भू-भागों से घिरा हुआ है, जिससे यह लगभग एक स्थलरुद्ध (Landlocked) महासागर जैसा प्रतीत होता है।
- क्षेत्रफल:
- लगभग 1.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर।
- जुड़ाव (Connections):
- यह बेरिंग जलडमरूमध्य (Bering Strait), एक संकरे और उथले मार्ग, के द्वारा प्रशांत महासागर से जुड़ा है।
- यह ग्रीनलैंड सागर (Greenland Sea) और लैब्राडोर सागर (Labrador Sea) के माध्यम से अटलांटिक महासागर से जुड़ा है, जो इसका मुख्य जल विनिमय मार्ग है।
- प्रमुख सीमांत सागर:
- ब्यूफोर्ट सागर, कारा सागर, लैप्टेव सागर, पूर्वी साइबेरियन सागर।
महासागरीय नितल की स्थलाकृति (Ocean Bottom Relief)
- उथलापन (Shallowness):
- इसकी औसत गहराई लगभग 1,200 मीटर है, जो इसे सबसे उथला महासागर बनाती है।
- इसमें एक अत्यंत चौड़ा महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf) है, विशेषकर यूरेशियन (साइबेरियन) तट के सहारे, जो विश्व के सबसे चौड़े मग्नतटों में से एक है। यह कुल समुद्री तल के 50% से अधिक हिस्से को कवर करता है।
- प्रमुख कटकें और बेसिन:
- लोमोनोसोव कटक (Lomonosov Ridge): यह एक विशाल जलमग्न कटक है जो आर्कटिक महासागर को दो प्रमुख बेसिनों में विभाजित करती है:
- यूरेशियन बेसिन
- एमिरेसिअन बेसिन
- गैकेल कटक (Gakkel Ridge): यह मध्य-अटलांटिक कटक का सबसे उत्तरी विस्तार है और एक धीमी गति से फैलने वाली अपसारी प्लेट सीमा है।
- लोमोनोसोव कटक (Lomonosov Ridge): यह एक विशाल जलमग्न कटक है जो आर्कटिक महासागर को दो प्रमुख बेसिनों में विभाजित करती है:
- सबसे गहरा बिंदु:
- इसका सबसे गहरा स्थान फ्राम जलडमरूमध्य (Fram Strait) में स्थित ‘मोलोय डीप’ (Molloy Deep) है, जिसकी गहराई लगभग 5,600 मीटर है।
प्रमुख विशेषताएँ और तथ्य
- समुद्री बर्फ का आवरण (Sea Ice Cover):
- ⋆ आर्कटिक महासागर की सबसे परिभाषित विशेषता इसकी समुद्री बर्फ की चादर है।
- मौसमी परिवर्तन: यह बर्फ शीतकाल में फैलती है और ग्रीष्मकाल में सिकुड़ती है।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: ⋆ ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक क्षेत्र पृथ्वी के बाकी हिस्सों की तुलना में दोगुनी से भी अधिक तेजी से गर्म हो रहा है (इस घटना को ‘आर्कटिक प्रवर्धन’ – Arctic Amplification कहते हैं)। इसके परिणामस्वरूप, गर्मियों की समुद्री बर्फ की सीमा और मोटाई में तेजी से गिरावट आ रही है। [UPSC Mains – Environment/Geopolitics]
- यह गिरावट पृथ्वी के एल्बिडो (Albedo) को कम कर रही है, जो ग्लोबल वार्मिंग को और तेज कर रही है (आइस-एल्बिडो फीडबैक)।
- न्यूनतम लवणता (Lowest Salinity):
- ⋆ आर्कटिक महासागर की सतह की लवणता (Salinity) सभी महासागरों में सबसे कम है।
- कारण:
- कम वाष्पीकरण: ठंडे तापमान के कारण।
- नदियों का मीठा पानी: साइबेरिया और उत्तरी कनाडा की विशाल नदियाँ (जैसे लेना, येनिसी, ओब, मैकेंज़ी) बड़ी मात्रा में मीठा पानी इस महासागर में डालती हैं।
- बर्फ का पिघलना: गर्मियों में बर्फ के पिघलने से भी मीठा पानी मिलता है।
- [UPPSC/SSC – Fact-Based Question]
- बढ़ता सामरिक और आर्थिक महत्व (Growing Strategic and Economic Importance):
- बर्फ के पिघलने से नए अवसर और चुनौतियाँ पैदा हो रही हैं:
- नए नौवहन मार्ग (New Shipping Routes):
- उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route – NSR): रूस के तट के सहारे।
- नॉर्थवेस्ट पैसेज (Northwest Passage): कनाडाई द्वीपसमूह के माध्यम से।
- ये मार्ग एशिया और यूरोप/उत्तरी अमेरिका के बीच की दूरी को काफी कम कर सकते हैं।
- प्राकृतिक संसाधन: माना जाता है कि आर्कटिक महासागर के मग्नतट पर पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के विशाल अज्ञात भंडार हैं। इसके अलावा, मत्स्यन और खनिजों के दोहन की संभावनाएं भी हैं।
- भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा: इन संसाधनों और मार्गों पर नियंत्रण के लिए आर्कटिक देशों (रूस, USA, कनाडा, नॉर्वे, डेनमार्क) के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।
- नए नौवहन मार्ग (New Shipping Routes):
- बर्फ के पिघलने से नए अवसर और चुनौतियाँ पैदा हो रही हैं:
- पारिस्थितिकी तंत्र:
- यह एक अद्वितीय लेकिन नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र का घर है जो समुद्री बर्फ पर निर्भर है। ध्रुवीय भालू, वालरस, सील और कुछ व्हेल प्रजातियाँ इसके प्रमुख जीव हैं, जो बर्फ के पिघलने से गंभीर रूप से खतरे में हैं।
विश्व के प्रमुख महासागर: एक त्वरित तुलनात्मक सारणी (बड़े से छोटे क्रम में)
| क्रम | महासागर (Ocean) | क्षेत्रफल की दृष्टि से रैंक | मुख्य पहचान / उपनाम | सबसे गहरा बिंदु | महत्वपूर्ण विशेषताएँ |
| 1. | प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) | सबसे बड़ा (1st) | त्रिभुजाकार; “रिंग ऑफ फायर” (अग्नि वलय) | मेरियाना गर्त (विश्व का सबसे गहरा) | ∙ सबसे बड़ा और सबसे गहरा।<br> ∙ सर्वाधिक ज्वालामुखी और भूकंप।<br> ∙ सर्वाधिक द्वीप। |
| 2. | अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean) | दूसरा सबसे बड़ा (2nd) | ‘S’ आकार; “अंध महासागर” | प्यूर्टो रिको गर्त | ∙ मध्य-अटलांटिक कटक (S-आकार की)।<br>∙ सबसे व्यस्त व्यापारिक महासागर।<br>∙ सबसे कटी-फटी तटरेखा, आदर्श बंदरगाह। |
| 3. | हिंद महासागर (Indian Ocean) | तीसरा सबसे बड़ा (3rd) | ‘M’ या त्रिभुजाकार; “अर्ध-महासागर” | सुंडा (जावा) गर्त | ∙ एकमात्र महासागर जिसका नाम देश पर है।<br>∙ मानसूनी पवनों से प्रभावित; धाराएँ दिशा बदलती हैं।<br>∙ गर्म महासागर। |
| **4. ** | दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) | चौथा सबसे बड़ा (4th) | “अंटार्कटिक महासागर” (अक्षांशीय सीमा) | दक्षिणी सैंडविच गर्त | ∙ 60°S अक्षांश के दक्षिण में स्थित।<br>∙ अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (ACC) – विश्व की सबसे शक्तिशाली ठंडी धारा। |
| 5. | आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean) | सबसे छोटा (5th) | लगभग स्थलरुद्ध; उत्तरी ध्रुव पर स्थित | मोलोय डीप | ∙ सबसे छोटा और सबसे उथला महासागर।<br>∙ वर्ष भर समुद्री बर्फ से ढका रहता है।<br>∙ सबसे कम लवणता। |
महासागरों का महत्व (Importance of Oceans)
महासागर केवल विशाल जलराशियाँ नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं जो ग्रह के पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु, अर्थव्यवस्था और स्वयं मानव जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। इनका महत्व बहुआयामी है, जिसे निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है:
1. जलवायु और मौसम के नियामक के रूप में (As Regulators of Climate and Weather)
- तापमान का संतुलन:
- ⋆ महासागर सौर ऊर्जा के एक विशाल “भंडार (Reservoir)” के रूप में कार्य करते हैं। वे सूर्य की ऊष्मा को धीरे-धीरे सोखते हैं और धीरे-धीरे ही छोड़ते हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान स्थिर बना रहता है।
- महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents) एक वैश्विक कन्वेयर बेल्ट (Global Conveyor Belt) की तरह काम करती हैं, जो भूमध्य रेखा से अतिरिक्त ऊष्मा को ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर और ध्रुवों से ठंडे जल को भूमध्य रेखा की ओर ले जाती हैं। यह प्रक्रिया वैश्विक तापमान का पुनर्वितरण करती है। [UPSC Mains]
- उदाहरण: गर्म गल्फ स्ट्रीम पश्चिमी यूरोप को रहने योग्य बनाती है।
- वर्षा और जल चक्र:
- ⋆ महासागर जल चक्र (Hydrological Cycle) का मूल स्रोत हैं। पृथ्वी पर होने वाला लगभग 85% वाष्पीकरण महासागरों से ही होता है, जो बादलों का निर्माण करता है और अंततः वर्षा के रूप में मीठे पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करता है।
2. ऑक्सीजन उत्पादन और कार्बन सिंक के रूप में (Oxygen Production and as a Carbon Sink)
- पृथ्वी के फेफड़े:
- ⋆ यह एक आम गलत धारणा है कि अधिकांश ऑक्सीजन जंगलों से आती है। वास्तव में, पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद 50% से 80% ऑक्सीजन महासागरों में पाए जाने वाले सूक्ष्म समुद्री पौधों, जिन्हें पादप प्लवक (Phytoplankton) कहते हैं, द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से उत्पन्न होती है। [UPSC Prelims – Environment]
- कार्बन सिंक (Carbon Sink):
- महासागर वायुमंडल के लिए एक विशाल “कार्बन सिंक” का काम करते हैं। वे मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली लगभग एक-चौथाई (25-30%) कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को सोख लेते हैं।
- यह प्रक्रिया ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने में मदद करती है। हालांकि, अत्यधिक CO₂ के अवशोषण से समुद्री अम्लीकरण (Ocean Acidification) की समस्या उत्पन्न हो रही है, जो प्रवाल भित्तियों और समुद्री जीवों के लिए घातक है। [UPPSC Mains]
3. आर्थिक महत्व (Economic Importance)
- भोजन का स्रोत:
- महासागर प्रोटीन का एक प्रमुख स्रोत हैं। विश्व भर में अरबों लोग अपने भोजन और पोषण के लिए मछली और अन्य समुद्री जीवों पर निर्भर हैं।
- मत्स्यन (Fishing) उद्योग लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
- ऊर्जा और खनिज संसाधन:
- पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस: विश्व के लगभग 30% तेल और गैस का उत्पादन अपतटीय क्षेत्रों (Offshore areas), विशेषकर महाद्वीपीय मग्नतटों से होता है। [State PSC]
- नवीकरणीय ऊर्जा: ज्वार, तरंगों और अपतटीय पवनों से ऊर्जा (Tidal energy, Wave energy, Offshore wind energy) उत्पन्न करने की अपार क्षमता है।
- खनिज: समुद्री नितल पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स (Polymetallic Nodules) (मैंगनीज, निकल, तांबा, कोबाल्ट युक्त), रेत, और बजरी जैसे खनिजों से समृद्ध है।
- व्यापार और परिवहन:
- ⋆ विश्व का 90% से अधिक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार (by volume) समुद्री मार्गों से होता है। महासागर वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा हैं।
- प्रमुख शिपिंग लेन और बंदरगाह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) के केंद्र हैं।
4. जैव विविधता का भंडार (Storehouse of Biodiversity)
- महासागर पृथ्वी पर सबसे बड़े जीवमंडल (Biosphere) का निर्माण करते हैं, जिसमें जीवन की एक विशाल और विविध श्रृंखला पाई जाती है – सूक्ष्म प्लवक से लेकर पृथ्वी के सबसे बड़े जीव, ब्लू व्हेल तक।
- प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs): इन्हें “समुद्र का वर्षावन” (Rainforests of the Sea) कहा जाता है। ये विश्व की सबसे विविध पारिस्थितिक तंत्रों में से हैं, जो लाखों प्रजातियों को आश्रय प्रदान करती हैं।
- इनसे कई ऐसे यौगिक प्राप्त होते हैं जिनका उपयोग औषधि निर्माण (Medicine) में किया जाता है।
5. सामरिक और भू-राजनीतिक महत्व (Strategic and Geopolitical Importance)
- राष्ट्रीय सुरक्षा:
- किसी देश की तटरेखा और उसका विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone – EEZ) उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। नौसेनाएँ समुद्री सीमाओं की रक्षा करती हैं।
- वैश्विक शक्ति का प्रदर्शन:
- समुद्री मार्गों, चोक पॉइंट्स (जैसे मलक्का जलडमरूमध्य, स्वेज नहर) और समुद्री संसाधनों पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है, जो वैश्विक भू-राजनीति को आकार देती है।
निष्कर्ष:
महासागर केवल पृथ्वी पर जल का भंडार नहीं हैं, बल्कि वे हमारी जलवायु के नियामक, हमारे वायु के स्रोत, हमारी अर्थव्यवस्था के चालक और जीवन की विविधता के संरक्षक हैं। उनका संरक्षण न केवल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए, बल्कि संपूर्ण मानवता के सतत भविष्य के लिए भी अनिवार्य है।
विश्व के प्रमुख सागर (Major Seas of the World)
सागर (Sea) महासागर का वह हिस्सा है जो आंशिक या पूर्ण रूप से भूमि से घिरा होता है। ये महासागरों के सीमांत (Marginal) भाग होते हैं और अक्सर महाद्वीपों और द्वीपों के बीच स्थित होते हैं। इनका अपना विशिष्ट तापमान, लवणता और परिसंचरण पैटर्न हो सकता है।
यहाँ महासागरों के अनुसार विश्व के प्रमुख सागरों की सूची और उनका महत्व दिया गया है।
1. प्रशांत महासागर से जुड़े सागर (Seas associated with the Pacific Ocean)
प्रशांत महासागर विश्व का सबसे बड़ा महासागर है और इसके साथ कई महत्वपूर्ण सीमांत सागर जुड़े हैं।
| सागर का नाम | भौगोलिक स्थिति / सीमावर्ती देश | महत्वपूर्ण तथ्य और PYQ लिंक |
| दक्षिण चीन सागर (South China Sea) | दक्षिण-पूर्व एशिया (चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया) | ⋆ विश्व का सबसे बड़ा सीमांत सागर।<br>⋆ अत्यंत व्यस्त शिपिंग मार्ग; मलक्का जलडमरूमध्य इसी से जुड़ता है।<br>⋆ संसाधन संपन्न और विवादित क्षेत्र (जैसे स्प्रैटली और पारसेल द्वीप)। [UPSC Mains – Geopolitics] |
| बेरिंग सागर (Bering Sea) | एशिया और उत्तरी अमेरिका के बीच | ⋆ बेरिंग जलडमरूमध्य (Bering Strait) इसे आर्कटिक महासागर से जोड़ता है।<br>⋆ अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा इससे होकर गुजरती है। |
| जापान सागर (Sea of Japan) | जापान, रूस, कोरियाई प्रायद्वीप | एक लगभग बंद सागर; समृद्ध मत्स्यन क्षेत्र। |
| ओखोत्स्क सागर (Sea of Okhotsk) | पूर्वी रूस, जापान का होक्काइडो द्वीप | सर्दियों में बर्फ से जम जाता है; सखालिन द्वीप पर तेल और गैस के भंडार। |
| पूर्वी चीन सागर (East China Sea) | चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान | सेनकाकू/दियाओयू द्वीपों पर चीन और जापान के बीच विवाद। |
| पीला सागर (Yellow Sea) | चीन और कोरियाई प्रायद्वीप के बीच | ह्वांग-हो (पीली नदी) द्वारा लाए गए पीले अवसादों के कारण इसका नाम पड़ा। |
| तस्मान सागर (Tasman Sea) | ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच | |
| कोरल सागर (Coral Sea) | उत्तर-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया | ⋆ ग्रेट बैरियर रीफ, विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति, यहीं स्थित है। [UPSC/State PSC] |
2. अटलांटिक महासागर से जुड़े सागर (Seas associated with the Atlantic Ocean)
| सागर का नाम | भौगोलिक स्थिति / सीमावर्ती देश | महत्वपूर्ण तथ्य और PYQ लिंक |
| भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) | यूरोप, अफ्रीका और एशिया के बीच | ⋆ जिब्राल्टर जलडमरूमध्य (Strait of Gibraltar) द्वारा अटलांटिक महासागर से जुड़ा है।<br>⋆ यह 20 से अधिक देशों को छूता है; भूमध्यसागरीय जलवायु का स्रोत। [UPPSC]<br>⋆ स्वेज नहर इसे लाल सागर से जोड़ती है। |
| कैरेबियन सागर (Caribbean Sea) | उत्तरी और दक्षिण अमेरिका के बीच (मध्य अमेरिका) | हरीकेन (Hurricane) की उत्पत्ति का प्रमुख क्षेत्र; वेस्टइंडीज द्वीप समूह यहीं स्थित हैं। |
| उत्तरी सागर (North Sea) | उत्तर-पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, नॉर्वे, डेनमार्क) | ⋆ पेट्रोलियम (ब्रेंट क्रूड) और प्राकृतिक गैस के महत्वपूर्ण भंडार; डोगर बैंक मत्स्यन क्षेत्र। [State PSC] |
| बाल्टिक सागर (Baltic Sea) | उत्तरी यूरोप | कम लवणता वाला एक लगभग भू-आबद्ध सागर। |
| सारगैसो सागर (Sargasso Sea) | उत्तरी अटलांटिक महासागर का मध्य भाग | ⋆ यह विश्व का एकमात्र ऐसा सागर है जिसकी कोई तटरेखा नहीं है। यह चार महासागरीय धाराओं (गल्फ स्ट्रीम, उत्तरी अटलांटिक, कनारी, उत्तरी भूमध्यरेखीय) से घिरा है। यह सारगैसम घास के लिए प्रसिद्ध है। [UPSC 2017] |
| आयरिश सागर (Irish Sea) | ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड के बीच | |
| एड्रियाटिक सागर (Adriatic Sea) | इतालवी प्रायद्वीप और बाल्कन प्रायद्वीप के बीच | यहाँ ठंडी ‘बोरा’ पवन चलती है। |
| एजियन सागर (Aegean Sea) | ग्रीस और तुर्की के बीच | भूमध्य सागर का हिस्सा। |
| काला सागर (Black Sea) | यूरोप और एशिया के बीच | कम लवणता और एनोक्सिक (Anoxic) गहरे जल (ऑक्सीजन की कमी) के लिए जाना जाता है। |
3. हिंद महासागर से जुड़े सागर (Seas associated with the Indian Ocean)
| सागर का नाम | भौगोलिक स्थिति / सीमावर्ती देश | महत्वपूर्ण तथ्य और PYQ लिंक |
| अरब सागर (Arabian Sea) | भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिम में | भारत के पश्चिमी तट और अरब प्रायद्वीप से घिरा है। |
| बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) | भारतीय प्रायद्वीप के पूर्व में | ⋆ विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Bay)। चक्रवातों के निर्माण का प्रमुख केंद्र। |
| लाल सागर (Red Sea) | अफ्रीका और एशिया (अरब प्रायद्वीप) के बीच | स्वेज नहर इसे भूमध्य सागर से और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य इसे अदन की खाड़ी से जोड़ता है।<br>⋆ उच्च लवणता के लिए जाना जाता है। |
| फारस की खाड़ी (Persian Gulf) | ईरान और अरब प्रायद्वीप के बीच | होरमुज़ जलडमरूमध्य द्वारा ओमान की खाड़ी से जुड़ता है। विश्व का प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र। |
| अंडमान सागर (Andaman Sea) | म्यांमार, थाईलैंड और अंडमान द्वीप समूह के बीच | भारत का सक्रिय ज्वालामुखी बैरन द्वीप यहीं स्थित है। |
| तिमोर सागर (Timor Sea) | ऑस्ट्रेलिया और तिमोर द्वीप के बीच |
4. आर्कटिक महासागर से जुड़े सागर (Seas associated with the Arctic Ocean)
| सागर का नाम | भौगोलिक स्थिति / सीमावर्ती देश | महत्वपूर्ण तथ्य |
| बैरेंट्स सागर (Barents Sea) | नॉर्वे और रूस के उत्तर में | अपेक्षाकृत गर्म (उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट के कारण) और उत्पादक मत्स्यन क्षेत्र। |
| कारा सागर (Kara Sea) | रूस के उत्तर में | उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) का हिस्सा। |
| लैप्टेव सागर (Laptev Sea) | रूस (साइबेरिया) के उत्तर में | सर्दियों में जम जाता है। |
| ब्यूफोर्ट सागर (Beaufort Sea) | कनाडा और अलास्का (USA) के उत्तर में | |
| चुक्ची सागर (Chukchi Sea) | रूस और अलास्का (USA) के बीच, बेरिंग जलडमरूमध्य के उत्तर में। |
विशेष उल्लेख:
- कैस्पियन सागर (Caspian Sea): ⋆ यह क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व की सबसे बड़ी झील है, सागर नहीं। यह एक भू-आबद्ध खारे पानी का निकाय है।
- अरल सागर (Aral Sea): यह भी एक झील है जो सिंचाई के लिए नदियों के पानी के अत्यधिक दोहन के कारण लगभग सूख चुकी है।
विश्व के महासागर और सागर: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
महासागर (Oceans) से संबंधित तथ्य
- सबसे बड़ा और सबसे गहरा महासागर: प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)। यह पृथ्वी का एक-तिहाई हिस्सा कवर करता है।
- दूसरा सबसे बड़ा और ‘S’ आकार का महासागर: अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)।
- देश के नाम पर एकमात्र महासागर: हिंद महासागर (Indian Ocean)।
- सबसे छोटा और सबसे उथला महासागर: आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean)।
- सबसे नया मान्यता प्राप्त महासागर: दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) (60°S अक्षांश के दक्षिण में)।
- “रिंग ऑफ फायर” (अग्नि वलय): यह प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित है और विश्व के अधिकांश भूकंप और ज्वालामुखी यहीं आते हैं। [UPSC/State PSC]
- विश्व का सबसे गहरा स्थान: मेरियाना गर्त (Mariana Trench) का ‘चैलेंजर डीप’, प्रशांत महासागर में स्थित है।
- सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला: मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge), जो सभी महासागरों में फैली है। इसकी सबसे प्रसिद्ध शाखा मध्य-अटलांटिक कटक है।
- सबसे व्यस्त व्यापारिक महासागर: अटलांटिक महासागर, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच स्थित होने के कारण।
- धाराओं की दिशा उलटने वाला महासागर: हिंद महासागर (उत्तरी भाग), मानसूनी पवनों के प्रभाव के कारण।
- सबसे कम लवणता वाला महासागर: आर्कटिक महासागर, कम वाष्पीकरण और नदियों से मीठे पानी की आपूर्ति के कारण।
- विश्व की सबसे शक्तिशाली ठंडी धारा: अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (ACC) या पश्चिमी पवन प्रवाह, जो दक्षिणी महासागर में बहती है।
सागर (Seas) और खाड़ी (Bays/Gulfs) से संबंधित तथ्य
- विश्व का सबसे बड़ा सागर: दक्षिण चीन सागर (South China Sea)। कुछ स्रोत फिलीपीन सागर को भी मानते हैं, लेकिन सामान्यतः दक्षिण चीन सागर स्वीकार्य है।
- बिना तटरेखा वाला एकमात्र सागर: सारगैसो सागर (Sargasso Sea), उत्तरी अटलांटिक महासागर में चार धाराओं से घिरा हुआ है। [UPSC 2017]
- विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Bay): बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal)।
- विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Gulf): मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico)।
- सबसे खारा (लवणीय) सागर: मृत सागर (Dead Sea), जो वास्तव में एक अत्यधिक खारी झील है। खुले सागरों में लाल सागर (Red Sea) की लवणता बहुत अधिक है।
- ग्रेट बैरियर रीफ: विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति, ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में कोरल सागर (Coral Sea) में स्थित है। [UPSC/State PSC]
- स्वेज नहर: भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है।
- पनामा नहर: अटलांटिक महासागर (कैरेबियन सागर) को प्रशांत महासागर से जोड़ती है।
जलडमरूमध्य (Straits) से संबंधित तथ्य
- जिब्राल्टर जलडमरूमध्य: भूमध्य सागर को अटलांटिक महासागर से जोड़ता है। इसे “भूमध्य सागर की कुंजी” (Key to the Mediterranean) कहा जाता है।
- बेरिंग जलडमरूमध्य: आर्कटिक महासागर को प्रशांत महासागर (बेरिंग सागर) से जोड़ता है। यह अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के समानांतर है। [UPPSC]
- होरमुज़ जलडमरूमध्य: फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी (अरब सागर) से जोड़ता है। यह तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण ‘चोक पॉइंट’ है।
- बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य: लाल सागर को अदन की खाड़ी (अरब सागर) से जोड़ता है। इसे “आंसुओं का द्वार” (Gate of Tears) कहते हैं।
- मलक्का जलडमरूमध्य: अंडमान सागर (हिंद महासागर) को दक्षिण चीन सागर (प्रशांत महासागर) से जोड़ता है। यह विश्व के सबसे व्यस्त शिपिंग मार्गों में से एक है।
- पाक जलडमरूमध्य: बंगाल की खाड़ी को मन्नार की खाड़ी से जोड़ता है (भारत और श्रीलंका के बीच)। [State PSC]
- सुंडा जलडमरूमध्य: जावा सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है (इंडोनेशिया के सुमात्रा और जावा द्वीपों के बीच)।
खाड़ियाँ (Bays and Gulfs)
परिभाषा:
खाड़ी समुद्र या महासागर का वह हिस्सा है जो तीन ओर से भूमि से घिरा होता है। यह तटीय जल का एक ऐसा निकाय है जो सीधे मुख्य समुद्र या महासागर से जुड़ा होता है। हालांकि ‘Bay’ और ‘Gulf’ दोनों शब्दों का हिंदी में अर्थ ‘खाड़ी’ ही होता है, लेकिन भौगोलिक रूप से इनमें कुछ सूक्ष्म अंतर होते हैं।
‘बे’ (Bay) और ‘गल्फ’ (Gulf) में अंतर:
| विशेषता | बे (Bay) | गल्फ (Gulf) |
| आकार | आमतौर पर छोटी होती हैं। | आमतौर पर बहुत बड़ी और गहरी होती हैं। |
| मुहाना (Opening) | इनका मुहाना (खुला हुआ हिस्सा) अपेक्षाकृत अधिक चौड़ा होता है। | इनका मुहाना अपेक्षाकृत अधिक संकरा होता है, जिससे ये अधिक भू-आबद्ध (Enclosed) लगती हैं। |
| उदाहरण | हडसन की खाड़ी (Hudson Bay), बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) | मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico), फारस की खाड़ी (Persian Gulf) |
| अपवाद: यह अंतर हमेशा कठोर नहीं होता। बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) और हडसन की खाड़ी (Hudson Bay) आकार में कई गल्फ से भी बड़ी हैं, जो इस नियम के अपवाद हैं। |
विश्व की प्रमुख खाड़ियाँ (Major Bays and Gulfs of the World)
यहाँ महाद्वीपों और देशों के अनुसार विश्व की प्रमुख खाड़ियों की एक सूची दी गई है, जिसमें उनकी अवस्थिति और महत्व शामिल हैं।
एशिया
| खाड़ी का नाम | प्रकार | संबंधित देश/जलराशि | महत्वपूर्ण तथ्य |
| बंगाल की खाड़ी | Bay | भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका | ⋆ विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Bay)। उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के निर्माण का प्रमुख केंद्र। गंगा-ब्रह्मपुत्र का विशाल डेल्टा यहीं बनता है। |
| फारस की खाड़ी | Gulf | ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब, कतर, UAE | होरमुज़ जलडमरूमध्य से ओमान की खाड़ी से जुड़ती है। विश्व का प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र। [UPPSC] |
| अदन की खाड़ी | Gulf | यमन, सोमालिया | बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य द्वारा लाल सागर से जुड़ती है। समुद्री डकैती के लिए कुख्यात रही है। |
| ओमान की खाड़ी | Gulf | ओमान, ईरान, UAE | अरब सागर का हिस्सा; फारस की खाड़ी के लिए प्रवेश द्वार। |
| खंभात की खाड़ी | Gulf | भारत (गुजरात) | नर्मदा और तापी नदियाँ यहीं गिरती हैं। ज्वारीय ऊर्जा की उच्च क्षमता। |
| कच्छ की खाड़ी | Gulf | भारत (गुजरात) | भारत का पहला समुद्री राष्ट्रीय उद्यान (Marine National Park) यहीं स्थित है। |
| मन्नार की खाड़ी | Gulf | भारत (तमिलनाडु) और श्रीलंका | समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध; एक बायोस्फीयर रिजर्व। पाक जलडमरूमध्य द्वारा बंगाल की खाड़ी से जुड़ी है। |
| थाईलैंड की खाड़ी | Gulf | थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम | दक्षिण चीन सागर का हिस्सा। |
उत्तरी अमेरिका
| खाड़ी का नाम | प्रकार | संबंधित देश/जलराशि | महत्वपूर्ण तथ्य |
| मैक्सिको की खाड़ी | Gulf | USA, मेक्सिको, क्यूबा | ⋆ विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Gulf)। मिसीसिपी-मिसौरी नदी यहीं डेल्टा बनाती है। तेल और गैस के विशाल भंडार। |
| हडसन की खाड़ी | Bay | कनाडा | क्षेत्रफल की दृष्टि से दूसरी सबसे बड़ी खाड़ी। इसका बड़ा हिस्सा सर्दियों में जम जाता है। |
| कैलिफोर्निया की खाड़ी | Gulf | मेक्सिको | इसे “कोर्टेज का सागर” (Sea of Cortez) भी कहते हैं। यह प्रशांत महासागर का हिस्सा है। |
| फंडी की खाड़ी (Bay of Fundy) | Bay | कनाडा | ⋆ विश्व में सबसे ऊँचा ज्वार (Highest tides in the world) यहीं आता है। [UPSC/SSC] |
| अलास्का की खाड़ी | Gulf | USA (अलास्का) | प्रशांत महासागर का उत्तरी भाग। |
| सेंट लॉरेंस की खाड़ी | Gulf | कनाडा | अटलांटिक महासागर में स्थित; सेंट लॉरेंस नदी यहीं गिरती है। |
यूरोप
| खाड़ी का नाम | प्रकार | संबंधित देश/जलराशि | महत्वपूर्ण तथ्य |
| बिस्के की खाड़ी | Bay | फ्रांस, स्पेन | अटलांटिक महासागर का हिस्सा; अपने तूफानी मौसम के लिए जानी जाती है। |
| बोथनिया की खाड़ी | Gulf | स्वीडन, फिनलैंड | बाल्टिक सागर का उत्तरी भाग; सबसे कम लवणता वाली खाड़ियों में से एक। |
| फिनलैंड की खाड़ी | Gulf | फिनलैंड, रूस, एस्टोनिया | बाल्टिक सागर का पूर्वी भाग। |
ऑस्ट्रेलिया
| खाड़ी का नाम | प्रकार | संबंधित देश/जलराशि | महत्वपूर्ण तथ्य |
| कारपेंटरिया की खाड़ी | Gulf | उत्तरी ऑस्ट्रेलिया | एक बड़ी और उथली खाड़ी, जो अराफुरा सागर का हिस्सा है। |
| ग्रेट ऑस्ट्रेलियन बाइट | Bight | दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया | यह एक बहुत बड़ी खुली खाड़ी (Bight) है, जो हिंद महासागर का हिस्सा है। |
अफ्रीका
| खाड़ी का नाम | प्रकार | संबंधित देश/जलराशि | महत्वपूर्ण तथ्य |
| गिनी की खाड़ी | Gulf | पश्चिमी अफ्रीका | अटलांटिक महासागर का हिस्सा; भूमध्य रेखा और प्रमुख मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) का प्रतिच्छेदन बिंदु यहीं स्थित है। |
| क्रम संख्या | खाड़ी/गल्फ का नाम | महत्वपूर्ण तथ्य/विशेषताएँ (परीक्षा उपयोगी) |
| 1. | बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) | विश्व की सबसे बड़ी ‘बे’ (Bay)। गंगा-ब्रह्मपुत्र और महानदी जैसे नदियों का डेल्टा क्षेत्र। भारत के पूर्वी तट पर उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति का केंद्र। |
| 2. | मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico) | विश्व का सबसे बड़ा ‘गल्फ’ (Gulf)। विश्व के महत्वपूर्ण तेल और गैस भंडारों में से एक। क्यूबा और युकाटन प्रायद्वीप द्वारा कैरिबियन सागर से अलग। |
| 3. | फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf) | सर्वाधिक रणनीतिक महत्व। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का प्रमुख वैश्विक स्रोत। यह जलमार्ग होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) के माध्यम से ओमान की खाड़ी से जुड़ा है। |
| 4. | होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) | फ़ारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और फिर अरब सागर से जोड़ती है। दुनिया के सबसे व्यस्त और सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन बिंदुओं में से एक। |
| 5. | एडन की खाड़ी (Gulf of Aden) | अरब सागर से होते हुए बाब-अल-मंदेब जलसंधि के माध्यम से लाल सागर से जुड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय समुद्री डकैती (Piracy) के कारण चर्चा में रहा है। |
| 6. | फंडी की खाड़ी (Bay of Fundy) | विश्व में सबसे ऊंचे ज्वार-भाटे (Highest Tides) के लिए प्रसिद्ध। कनाडा (नोवा स्कोटिया) और यूएसए के बीच स्थित। |
| 7. | कारपेंटेरिया की खाड़ी (Gulf of Carpentaria) | ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी तट पर स्थित। इस क्षेत्र में मछली और मोती उद्योग (Pearl Industry) महत्वपूर्ण है। |
| 8. | अलास्का की खाड़ी (Gulf of Alaska) | उत्तरी प्रशांत महासागर का हिस्सा। एक महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र जो टेक्टोनिक प्लेटों की सीमा पर स्थित है, इसलिए भूकंप के प्रति संवेदनशील है। |
| 9. | ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) | यह होर्मुज जलसंधि द्वारा फारस की खाड़ी से जुड़ा हुआ है। सामरिक (Strategic) रूप से बहुत महत्वपूर्ण। |
| 10. | अटलांटिक महासागर में खाड़ियाँ | अटलांटिक के कुछ प्रमुख जल निकाय जैसे: गिनी की खाड़ी (Gulf of Guinea – तेल संसाधन के लिए प्रसिद्ध) और सेंट लॉरेंस की खाड़ी (Gulf of St. Lawrence)। |
| 11. | ग्रेट ऑस्ट्रेलियन बाइट (Great Australian Bight) | दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के विशाल, खुले तटीय क्षेत्र में स्थित खाड़ी। अत्यधिक लहरों और विवर्तनिकी (Tectonics) गतिविधियों से सम्बंधित। |
💡 महत्वपूर्ण सूचना: यूपीएससी/पीएससी की परीक्षाओं में खाड़ी, जलसंधि और भौगोलिक स्थलों से सम्बंधित प्रश्न मैपिंग और करंट अफेयर्स के साथ जोड़कर पूछे जाते हैं। इसलिए, इनकी अवस्थिति (Location) मानचित्र पर अवश्य देखें।
समुद्री जल की लवणता
समुद्री जल की लवणता (Ocean Salinity)
समुद्री जल की लवणता से तात्पर्य उसमें घुले हुए कुल ठोस पदार्थों की मात्रा से है। मुख्य रूप से यह साधारण नमक (सोडियम क्लोराइड – (NaCl) होती है, लेकिन इसमें मैग्नीशियम क्लोराइड, कैल्शियम क्लोराइड और पोटेशियम ब्रोमाइड सहित कई अन्य खनिज भी शामिल होते हैं।
1. लवणता को व्यक्त करने की इकाई (Unit of Expression)
समुद्री जल की लवणता को व्यक्त करने की इकाई (Unit of Expression) को समझने के लिए, निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को ध्यान में रखें:
1. प्रति हजार भाग (Parts Per Thousand – ppt)
यह लवणता को मापने की सबसे पारंपरिक और सरल विधि है।
- संकेत: इसे ppt या ‰ (per mille) से दर्शाया जाता है।
- परिभाषा: इसका शाब्दिक अर्थ है “हजार ग्राम में कितने ग्राम”।
- उदाहरण: यदि समुद्री जल की लवणता 35 ppt है, तो इसका मतलब है कि 1000 ग्राम (या 1 किलोग्राम) समुद्री जल में 35 ग्राम घुले हुए लवण (नमक) मौजूद हैं।
- 1000 ग्राम समुद्री जल = 965 ग्राम शुद्ध जल + 35 ग्राम लवण
यह विधि समझने में आसान है और अक्सर सामान्य भौगोलिक अध्ययन में उपयोग की जाती है।
2. व्यावहारिक लवणता इकाई (Practical Salinity Unit – PSU)
यह लवणता को मापने की आधुनिक और अधिक वैज्ञानिक विधि है।
- संकेत: इसे PSU के रूप में लिखा जाता है।
- आधार: PSU पानी में नमक को सीधे तौलने के बजाय, समुद्री जल की विद्युत चालकता (Electrical Conductivity) पर आधारित है।
- सिद्धांत: जिस पानी में जितना अधिक नमक घुला होगा, वह बिजली का उतना ही अच्छा सुचालक होगा।
- परिभाषा: PSU एक आयामहीन (Dimensionless) अनुपात है। इसे एक मानक पोटेशियम क्लोराइड (
- KCl
- KCl
- ) समाधान की चालकता के साथ समुद्री जल के नमूने की चालकता की तुलना करके मापा जाता है।
- समानता: संख्यात्मक रूप से, 1 PSU लगभग 1 ppt के बराबर ही होता है। इसलिए, 35 ppt लवणता को 35 PSU भी कहा जा सकता है।
निष्कर्ष:
| इकाई | पूरा नाम | आधार | उपयोग |
| ppt (‰) | Parts Per Thousand | घुले हुए नमक का भार/द्रव्यमान | सामान्य और शैक्षिक कार्यों में |
| PSU | Practical Salinity Unit | विद्युत चालकता (Conductivity) | वैज्ञानिक अनुसंधान और समुद्र विज्ञान (Oceanography) में |
आज के समय में, वैज्ञानिक अध्ययनों और डेटा में लवणता को व्यक्त करने के लिए PSU का उपयोग मानक माना जाता है क्योंकि यह अधिक सटीक और मानकीकृत (standardized) है।
औसत लवणता (Average Salinity)
औसत लवणता का तात्पर्य दुनिया के सभी महासागरों के समुद्री जल में घुले नमक की औसत मात्रा से है।
मानक औसत मान (Standard Average Value)
- विश्व के महासागरों की औसत लवणता लगभग 35 भाग प्रति हजार (ppt) मानी जाती है।
- अर्थ: इसका मतलब है कि प्रत्येक 1 किलोग्राम (1000 ग्राम) समुद्री जल में लगभग 35 ग्राम घुले हुए लवण होते हैं।
- अन्य इकाइयाँ: इसे 3.5% (प्रति सौ भाग) या 35 PSU (व्यावहारिक लवणता इकाई) के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है।
लवणता में भिन्नता (Variations in Salinity)
हालांकि औसत 35 ppt है, लेकिन यह मान भौगोलिक स्थिति के आधार पर काफी भिन्न होता है। अधिकांश खुले महासागर की सतह की लवणता 33 ppt से 38 ppt के बीच रहती है।
- उच्च लवणता वाले क्षेत्र:
- उपोष्णकटिबंधीय (Sub-tropics): लगभग 20° से 30° अक्षांशों के बीच, जहाँ उच्च तापमान और वाष्पीकरण होता है तथा वर्षा कम होती है, वहां लवणता सबसे अधिक पाई जाती है।
- अर्ध-संलग्न समुद्र (Semi-enclosed seas): लाल सागर और भूमध्य सागर जैसे क्षेत्रों में उच्च वाष्पीकरण और मीठे पानी के कम प्रवाह के कारण लवणता 40 ppt से भी अधिक हो सकती है।
- कम लवणता वाले क्षेत्र:
- ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions): यहाँ बर्फ के पिघलने से ताजे पानी का प्रवाह होता है, जिससे सतह की लवणता कम हो जाती है।
- भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Regions): उच्च तापमान के बावजूद, इस क्षेत्र में भारी वर्षा के कारण लवणता औसत से थोड़ी कम रहती है।
- नदियों के मुहाने: जहाँ बड़ी नदियाँ समुद्र में मिलती हैं (जैसे बंगाल की खाड़ी में गंगा का डेल्टा), वहां मीठे पानी की भारी मात्रा के कारण लवणता बहुत कम हो जाती है।
विभिन्न महासागरों में औसत लवणता
- अटलांटिक महासागर: इसकी औसत लवणता सबसे अधिक, लगभग 36-37 ppt है।
- प्रशांत महासागर: औसत लवणता लगभग 35 ppt है।
- हिंद महासागर: औसत लवणता भी लगभग 35 ppt है।
अत्यंत खारे और कम खारे जल निकाय
- अत्यधिक खारे: तुर्की की वॉन झील, मृत सागर, और अमेरिका की ग्रेट साल्ट लेक जैसे अंतर्देशीय जल निकायों में लवणता बहुत अधिक होती है।
- कम खारे (Brackish Water): बाल्टिक सागर में नदियों से भारी मात्रा में ताजे पानी के प्रवाह के कारण लवणता बहुत कम (लगभग 10 ppt) है।
Note-यह मान स्थान और मौसम के साथ बदलता रहता है।
लवणता का स्रोत (Source of Salinity)
समुद्री जल की लवणता का एक स्रोत नहीं है, बल्कि यह लाखों वर्षों में कई प्रक्रियाओं का परिणाम है। इसके दो मुख्य स्रोत हैं:
1. स्थलीय अपवाह और नदियाँ (Runoff from the Land and Rivers)
यह समुद्री लवणता का सबसे प्रमुख स्रोत है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है:
- चट्टानों का अपरदन: पृथ्वी की सतह पर मौजूद चट्टानों में विभिन्न प्रकार के खनिज लवण होते हैं।
- वर्षा जल की भूमिका: जब बारिश होती है, तो वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड (
- CO2
- CO
- 2
-
- ) पानी में घुलकर हल्का अम्लीय (कार्बोनिक एसिड) हो जाती है।
- लवणों का घुलना: यह अम्लीय वर्षा जल जब चट्टानों पर पड़ता है, तो यह चट्टानों का क्षरण (Erosion) करता है और उनमें मौजूद लवणों को घोल लेता है।
- नदियों द्वारा परिवहन: ये घुले हुए आयन और लवण छोटी धाराओं से होते हुए नदियों में पहुँचते हैं और अंततः नदियाँ उन्हें समुद्र में ले जाकर जमा कर देती हैं।
यह प्रक्रिया लाखों वर्षों से लगातार चल रही है, जिससे समुद्र में धीरे-धीरे लवण जमा होते गए हैं।
2. समुद्र तल से निक्षेप (Deposits from the Ocean Floor)
समुद्र की लवणता का दूसरा महत्वपूर्ण स्रोत समुद्र का तल है।
- हाइड्रोथर्मल वेंट (Hydrothermal Vents): ये समुद्र तल में मौजूद दरारें होती हैं, जो पृथ्वी के आंतरिक भाग से जुड़ी होती हैं।
- खनिजों का उत्सर्जन: समुद्री जल इन दरारों के माध्यम से पृथ्वी के मैग्मा के संपर्क में आता है, जहाँ यह गर्म हो जाता है। गर्म होने पर यह पानी चट्टानों से खनिजों (जैसे लोहा, जस्ता, तांबा और क्लोराइड) को घोल लेता है।
- समुद्र में मिश्रण: यह अत्यधिक गर्म और खनिज युक्त पानी इन वेंट्स के माध्यम से वापस समुद्र में छोड़ दिया जाता है, जिससे समुद्र की रासायनिक संरचना और लवणता में वृद्धि होती है।
- पनडुब्बी ज्वालामुखी (Submarine Volcanoes): समुद्र के नीचे स्थित ज्वालामुखी जब फटते हैं, तो वे भी सीधे समुद्र में विभिन्न प्रकार के लवण और खनिज मिलाते हैं।
निष्कर्ष:
समुद्र में लवणता का निर्माण एक गतिशील प्रक्रिया है। एक तरफ नदियाँ लगातार समुद्र में लवण मिलाती रहती हैं, तो वहीं दूसरी ओर हाइड्रोथर्मल वेंट और ज्वालामुखी भी इसमें योगदान करते हैं। वाष्पीकरण की प्रक्रिया के कारण केवल शुद्ध जल ही वाष्पित होता है और लवण समुद्र में ही रह जाते हैं, जिससे धीरे-धीरे समुद्र की लवणता बढ़ती गई और आज के स्तर पर स्थिर हो गई है।
समुद्र में पाए जाने वाले प्रमुख लवणों का कुल लवणता में प्रतिशत योगदान निम्नलिखित तालिका में दिया गया है:
| क्रम संख्या | लवण का नाम (Chemical Name) | रासायनिक सूत्र (Chemical Formula) | कुल लवणता में प्रतिशत (%) |
| 1. | सोडियम क्लोराइड (Sodium Chloride) | NaCl | 77.8% |
| 2. | मैग्नीशियम क्लोराइड (Magnesium Chloride) | MgCl₂ | 10.9% |
| 3. | मैग्नीशियम सल्फेट (Magnesium Sulfate) | MgSO₄ | 4.7% |
| 4. | कैल्शियम सल्फेट (Calcium Sulfate) | CaSO₄ | 3.6% |
| 5. | पोटेशियम सल्फेट (Potassium Sulfate) | K₂SO₄ | 2.5% |
| 6. | कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) | CaCO₃ | 0.3% |
| 7. | मैग्नीशियम ब्रोमाइड (Magnesium Bromide) | MgBr₂ | 0.2% |
मुख्य बिंदु:
- सोडियम क्लोराइड (साधारण नमक) समुद्री जल में पाया जाने वाला सबसे प्रमुख लवण है, जो कुल लवणता का 77% से भी अधिक हिस्सा बनाता है। यही कारण है कि समुद्र का पानी मुख्य रूप से नमकीन लगता है।
- सोडियम क्लोराइड के बाद दूसरा सबसे प्रमुख लवण मैग्नीशियम क्लोराइड है।
- ये कुछ प्रमुख लवण मिलकर ही समुद्री जल के कुल घुले हुए लवणों का 99% से अधिक हिस्सा बनाते हैं।
4. लवणता का लंबवत वितरण (Vertical Distribution of Salinity)
समुद्र में गहराई के साथ लवणता का वितरण समान नहीं होता है। सतह से तल तक जाने पर लवणता में परिवर्तन होता है, जिसे तीन प्रमुख परतों में विभाजित किया जा सकता है:
1. सतही परत (Surface Zone or Mixed Layer)
- विवरण: यह महासागर की सबसे ऊपरी परत है, जिसकी गहराई लगभग 100 से 400 मीटर तक होती है। यह परत सीधे वायुमंडल के संपर्क में रहती है।
- लवणता की विशेषता: इस परत की लवणता क्षेत्र और मौसम के अनुसार बदलती रहती है।
- कम लवणता: भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में भारी वर्षा और ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के पिघलने से ताजे पानी की आपूर्ति के कारण इस परत में लवणता कम हो जाती है।
- उच्च लवणता: उपोष्णकटिबंधीय (कर्क और मकर रेखा के पास) क्षेत्रों में उच्च वाष्पीकरण और कम वर्षा के कारण इस परत में लवणता अधिक होती है।
- प्रभाव: हवा और लहरों की क्रिया के कारण यह परत अच्छी तरह से मिश्रित (mixed) रहती है, जिससे यहाँ लवणता और तापमान लगभग एक समान रहता है।
2. हैलोक्लाइन (Halocline)
- विवरण: यह सतही परत के ठीक नीचे स्थित एक संक्रमणकालीन (transitional) परत है। यह लगभग 300-400 मीटर से शुरू होकर 1000 मीटर की गहराई तक पाई जाती है।
- लवणता की विशेषता: इस परत की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यहाँ गहराई बढ़ने के साथ लवणता में बहुत तेजी से वृद्धि होती है।
- घनत्व अवरोध: लवणता में यह तीव्र परिवर्तन पानी के घनत्व (density) को भी तेजी से बढ़ाता है, जिससे हैलोक्लाइन एक मजबूत घनत्व अवरोध (density barrier) के रूप में कार्य करता है। यह ऊपरी परत के हल्के पानी को निचली परत के भारी पानी के साथ मिलने से रोकता है।
- उपस्थिति: हैलोक्लाइन परत मुख्य रूप से निम्न और मध्य अक्षांशों (low and middle latitudes) में प्रमुख होती है, जबकि उच्च अक्षांशों या ध्रुवीय क्षेत्रों में यह या तो बहुत कमजोर होती है या अनुपस्थित होती है।
3. गहरी परत (Deep Zone)
- विवरण: यह महासागर का सबसे निचला और सबसे विशाल हिस्सा है, जो लगभग 1000 मीटर से शुरू होकर समुद्र के तल तक फैला होता है।
- लवणता की विशेषता: इस परत में लवणता लगभग स्थिर और एक समान रहती है।
- कारण: यह परत सतही मौसमी परिवर्तनों (जैसे वर्षा या वाष्पीकरण) से अप्रभावित रहती है। यहाँ का पानी ठंडा, सघन और अधिक खारा होता है, और इसमें लवणता का मान औसतन 34.5 ppt से 35 ppt के बीच बना रहता है। इस गहरे पानी का घनत्व अधिक होने के कारण यह सतह के पानी के साथ आसानी से मिश्रित नहीं होता।
निष्कर्ष:
समुद्र की सतह पर लवणता में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भिन्नताएँ पाई जाती हैं, लेकिन गहराई में जाने पर हैलोक्लाइन परत के बाद लवणता लगभग स्थिर हो जाती है।
लवणता का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Salinity)
लवणता का क्षैतिज वितरण महासागरों की सतह पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर लवणता में पाई जाने वाली भिन्नता को संदर्भित करता है। यह वितरण विश्व भर में असमान है और मुख्य रूप से वाष्पीकरण (Evaporation) और वर्षा (Precipitation) के बीच के संतुलन पर निर्भर करता है।
सतही लवणता का क्षैतिज वितरण अक्षांशों (Latitudes) के अनुसार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है:
1. भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Region: 0° – 10° N/S)
- लवणता: मध्यम या औसत से कम (लगभग 34-35 ppt)।
- कारण: इस क्षेत्र में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जिससे वाष्पीकरण तो उच्च होता है, लेकिन यहाँ प्रतिदिन भारी संवहनीय वर्षा (Heavy Convectional Rainfall) भी होती है। वर्षा से मिलने वाला ताजा पानी समुद्री जल को पतला कर देता है, जिससे उच्च तापमान के बावजूद लवणता बहुत अधिक नहीं हो पाती है।
2. उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical and Sub-tropical Regions: 20° – 40° N/S)
- लवणता: सर्वाधिक (36 ppt से अधिक)।
- कारण: यह क्षेत्र उच्च दाब पेटियों (High-Pressure Belts) के अंतर्गत आता है, जहाँ आसमान साफ रहता है, सूर्य का ताप तेज होता है और वर्षा बहुत कम होती है। इस कारण यहाँ वाष्पीकरण की दर वर्षा की दर से बहुत अधिक होती है। पानी तो भाप बन जाता है, लेकिन नमक पीछे रह जाता है, जिससे सतह की लवणता विश्व में सबसे अधिक हो जाती है। उत्तरी अटलांटिक में सारगैसो सागर (Sargasso Sea) इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
3. शीतोष्ण क्षेत्र (Temperate Regions: 40° – 60° N/S)
- लवणता: कम होने लगती है।
- कारण: इन अक्षांशों में तापमान कम होने लगता है, जिससे वाष्पीकरण की दर घट जाती है। इसके अलावा, पछुआ पवनों (Westerlies) के प्रभाव से यहाँ वर्षा अधिक होती है, जिससे लवणता में कमी आती है।
4. ध्रुवीय और उप-ध्रुवीय क्षेत्र (Polar and Sub-polar Regions: 60° – 90° N/S)
- लवणता: सबसे कम (20-32 ppt)।
- कारण: यहाँ तापमान बहुत कम होता है, इसलिए वाष्पीकरण लगभग नगण्य होता है। इसके विपरीत, गर्मियों में ग्लेशियर और समुद्री बर्फ के पिघलने से भारी मात्रा में ताजा पानी समुद्र में मिलता है। इस मीठे पानी के कारण यहाँ की सतही लवणता बहुत कम हो जाती है।
अन्य प्रभावित करने वाले कारक:
- अर्ध-संलग्न समुद्र (Semi-enclosed Seas): वे समुद्र जो भूमि से घिरे होते हैं और खुले महासागर से कम जुड़े होते हैं, उनकी लवणता बहुत भिन्न होती है।
- उच्च लवणता: लाल सागर और भूमध्य सागर जैसे क्षेत्रों में वाष्पीकरण बहुत अधिक होता है और ताजे पानी का स्रोत कम होता है, इसलिए इनकी लवणता (39-41 ppt) औसत से बहुत अधिक है।
- कम लवणता: बाल्टिक सागर में कई नदियाँ गिरती हैं और वाष्पीकरण कम होता है, इसलिए इसकी लवणता बहुत कम (लगभग 10 ppt) है।
- नदियों के मुहाने (River Mouths): जहाँ बड़ी नदियाँ (जैसे अमेज़ॅन, गंगा, कांगो) समुद्र में मिलती हैं, वहाँ भारी मात्रा में मीठा पानी आने के कारण स्थानीय रूप से लवणता बहुत कम हो जाती है।
- महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents): धाराएँ पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं, जिससे लवणता का पुनर्वितरण होता है। गर्म धाराएँ (जैसे गल्फ स्ट्रीम) अपने साथ उच्च लवणता वाला पानी लाती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ अक्सर कम लवणता वाले पानी को लाती हैं।
निष्कर्ष:
महासागरों की सतह पर लवणता का क्षैतिज वितरण एक जटिल प्रणाली है, जो मुख्य रूप से वाष्पीकरण, वर्षा, नदी जल और बर्फ के पिघलने जैसे कारकों से नियंत्रित होती है, जिससे अक्षांशों के अनुसार लवणता में एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है।
1. विभिन्न अक्षांशों पर लवणता का वितरण
यह तालिका दर्शाती है कि सतह की औसत लवणता अलग-अलग अक्षांशीय क्षेत्रों में कैसे बदलती है।
| अक्षांशीय क्षेत्र (Latitudinal Zone) | औसत लवणता (ppt में) | मुख्य कारण |
| भूमध्यरेखीय क्षेत्र (0° – 10° N/S) | 34 – 35 ppt | उच्च वाष्पीकरण के बावजूद भारी वर्षा के कारण ताजे पानी की अधिकता। |
| उष्णकटिबंधीय / उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र (20° – 40° N/S) | 36 – 38 ppt (सर्वाधिक) | उच्च वाष्पीकरण और बहुत कम वर्षा के कारण लवणता विश्व में सबसे अधिक होती है। |
| शीतोष्ण क्षेत्र (40° – 60° N/S) | 33 – 35 ppt | तापमान में कमी से वाष्पीकरण घटता है और पछुआ पवनों से वर्षा होती है। |
| ध्रुवीय क्षेत्र (60° – 90° N/S) | 20 – 32 ppt (न्यूनतम) | वाष्पीकरण नगण्य होता है और बर्फ के पिघलने से भारी मात्रा में ताजा पानी मिलता है। |
2. प्रमुख सागरों एवं खाड़ियों में लवणता का वितरण
यह तालिका दर्शाती है कि कैसे संलग्नता, वाष्पीकरण और नदियों का प्रभाव विशिष्ट जल निकायों की लवणता को बदल देता है।
उच्च लवणता वाले सागर (High Salinity Seas)
| सागर / खाड़ी (Sea / Bay) | औसत लवणता (ppt में) | लवणता का स्तर एवं कारण |
| लाल सागर (Red Sea) | 39 – 41 ppt | अत्यधिक उच्च: उच्च वाष्पीकरण, कम वर्षा और किसी बड़ी नदी का न मिलना। |
| फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf) | 37 – 40 ppt | उच्च: अर्ध-संलग्न, उथला पानी और तीव्र वाष्पीकरण। |
| भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) | 37 – 39 ppt | उच्च: वाष्पीकरण की दर, वर्षा और नदियों से मिलने वाले ताजे पानी से अधिक है। |
| अरब सागर (Arabian Sea) | 36 ppt | औसत से अधिक: उच्च वाष्पीकरण और बंगाल की खाड़ी की तुलना में कम नदियों का प्रवाह। |
कम लवणता वाले सागर (Low Salinity Seas)
| सागर / खाड़ी (Sea / Bay) | औसत लवणता (ppt में) | लवणता का स्तर एवं कारण |
| बाल्टिक सागर (Baltic Sea) | 5 – 15 ppt | अत्यधिक कम: कई नदियों से भारी मात्रा में ताजे पानी का प्रवाह और कम वाष्पीकरण। |
| काला सागर (Black Sea) | 17 – 19 ppt | बहुत कम: डेन्यूब जैसी बड़ी नदियों से मीठे पानी का अधिक प्रवाह। |
| हडसन की खाड़ी (Hudson Bay) | 23 – 30 ppt | कम: नदियों और बर्फ के पिघलने से ताजे पानी का प्रवाह और कम वाष्पीकरण। |
| बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) | 30 – 34 ppt | औसत से कम: गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी जैसी विशाल नदियों द्वारा ताजे पानी की आपूर्ति। |
झीलों में लवणता (Salinity in Lakes)
महासागरों के विपरीत, झीलें मीठे पानी की या खारे पानी की हो सकती हैं। झीलों की लवणता उनके स्थान, भूगोल और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, उनके जल संतुलन (Water Balance) पर निर्भर करती है।
झीलों के प्रकार (लवणता के आधार पर)
- मीठे पानी की झीलें (Freshwater Lakes)
- विशेषता: इनमें लवणता बहुत कम होती है (आमतौर पर 1 ppt से भी कम)। दुनिया की अधिकांश झीलें इसी श्रेणी में आती हैं।
- मीठे रहने का कारण: इन झीलों में नदियों के माध्यम से पानी आता है और निकास (Outflow) भी होता है। यानी, एक या एक से अधिक नदियाँ इन झीलों से पानी बाहर भी ले जाती हैं। यह निकास अपने साथ घुले हुए खनिज लवणों को भी बहा ले जाता है, जिससे लवणता जमा नहीं हो पाती।
- उदाहरण:
- उत्तरी अमेरिका की महान झीलें (Great Lakes)
- बैकाल झील (Lake Baikal), रूस
- वूलर झील (Wular Lake), भारत
- खारे पानी की झीलें (Saline Lakes)
- विशेषता: इनकी लवणता महासागरों (35 ppt) के बराबर या उससे कहीं अधिक होती है। जिन झीलों की लवणता महासागरों से अधिक होती है, उन्हें अति-लवणीय या हाइपरसलाइन (Hypersaline) झीलें कहा जाता है।
- खारे होने का कारण: ये झीलें आमतौर पर बंद जल निकासी प्रणालियों (Endorheic Basins) में स्थित होती हैं।
- कोई निकास नहीं: इनमें नदियाँ पानी लाती तो हैं, लेकिन पानी के बाहर जाने का कोई प्राकृतिक रास्ता (नदी) नहीं होता।
- वाष्पीकरण (Evaporation): पानी केवल वाष्पीकरण के माध्यम से ही बाहर निकलता है।
- लवणों का जमाव: जब पानी वाष्पित होता है, तो वह अपने पीछे घुले हुए लवणों को छोड़ जाता है। लाखों वर्षों तक यह प्रक्रिया चलने से इन झीलों में लवण की मात्रा लगातार बढ़ती जाती है और पानी अत्यधिक खारा हो जाता है।
- यह प्रक्रिया शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में अधिक प्रभावी होती है जहाँ वाष्पीकरण की दर बहुत अधिक होती है।
विश्व की प्रमुख खारे पानी की झीलें और उनकी लवणता
यह तालिका दुनिया की कुछ सबसे खारी झीलों को उनकी लवणता के साथ दर्शाती है:
| क्रम संख्या | झील का नाम | स्थान | औसत लवणता (ppt में) | मुख्य तथ्य |
| 1. | डॉन जुआन तालाब (Don Juan Pond) | अंटार्कटिका | **~ 440 ppt** | पृथ्वी पर मौजूद सबसे खारा जल निकाय माना जाता है। |
| 2. | वान झील (Lake Van) | तुर्की | **~ 330 ppt** | दुनिया की सबसे बड़ी क्षारीय (Alkaline) झीलों में से एक। |
| 3. | मृत सागर (Dead Sea) | इज़राइल और जॉर्डन | **~ 340 ppt** | अत्यधिक घनत्व के कारण इसमें इंसान आसानी से तैर सकता है। |
| 4. | ग्रेट साल्ट लेक (Great Salt Lake) | संयुक्त राज्य अमेरिका (उटा) | 50 – 270 ppt (परिवर्तनशील) | इसकी लवणता जल स्तर के आधार पर बहुत बदलती रहती है। |
| 5. | कैस्पियन सागर (Caspian Sea) | मध्य एशिया / यूरोप | **~ 12 ppt** | क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी झील। यह हल्की खारी (Brackish) है। |
झीलों का महत्व
- मीठे पानी की झीलें पीने के पानी, सिंचाई, मछली पकड़ने और परिवहन का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
- खारे पानी की झीलें नमक और अन्य खनिजों (जैसे पोटाश) के निष्कर्षण के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होती हैं।
- दोनों प्रकार की झीलें जैव विविधता का समर्थन करती हैं और पर्यटन के लिए आकर्षण का केंद्र होती हैं।
5. लवणता का महत्व (Significance of Salinity)
समुद्री जल की लवणता केवल उसके खारेपन का माप नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की जलवायु प्रणाली, महासागरीय परिसंचरण और समुद्री जीवन को नियंत्रित करने वाला एक मौलिक कारक है। इसका महत्व निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. घनत्व और महासागरीय परिसंचरण (Density and Ocean Circulation)
- घनत्व पर प्रभाव: समुद्री जल का घनत्व दो मुख्य कारकों पर निर्भर करता है: तापमान (Thermo) और लवणता (Haline)।
- जब पानी की लवणता बढ़ती है, तो उसका घनत्व भी बढ़ जाता है, जिससे पानी भारी हो जाता है।
- इसी प्रकार, जब पानी ठंडा होता है, तो उसका घनत्व बढ़ता है।
- थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation): घनत्व में यह भिन्नता “थर्मोहेलाइन परिसंचरण” नामक एक वैश्विक महासागरीय धारा प्रणाली को संचालित करती है, जिसे “वैश्विक कन्वेयर बेल्ट” (Global Conveyor Belt) भी कहा जाता है।
- प्रक्रिया: ध्रुवीय क्षेत्रों में, जब समुद्री जल ठंडा होता है और बर्फ के जमने के कारण उसकी लवणता बढ़ जाती है, तो वह बहुत सघन और भारी हो जाता है। यह भारी पानी नीचे की ओर डूबता है और गहरे महासागर में धाराओं को जन्म देता है। यह डूबा हुआ पानी फिर भूमध्य रेखा की ओर बहता है, जहाँ यह गर्म होकर सतह पर वापस आता है।
- महत्व: यह परिसंचरण दुनिया भर में ऊष्मा (Heat) को वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे पृथ्वी का मौसम और जलवायु नियंत्रित होती है।
2. हिमांक बिंदु पर प्रभाव (Effect on Freezing Point)
- हिमांक में कमी: लवणता समुद्री जल के हिमांक (Freezing Point) को कम कर देती है।
- शुद्ध जल 0°C (32°F) पर जमता है, जबकि औसत लवणता (35 ppt) वाला समुद्री जल लगभग -1.8°C (28.4°F) पर जमता है।
- ध्रुवीय क्षेत्रों में महत्व: इस गुण के कारण, ध्रुवीय क्षेत्रों में महासागरों का पानी तरल अवस्था में बना रहता है, भले ही तापमान शून्य से नीचे चला जाए। यह समुद्री बर्फ (Sea Ice) के निर्माण की दर और सीमा को भी प्रभावित करता है। जब समुद्री जल जमता है, तो नमक बाहर निकल जाता है, जिससे आसपास के पानी की लवणता और बढ़ जाती है, जो गहरे पानी के निर्माण को प्रोत्साहित करती है।
3. समुद्री जीवन पर प्रभाव (Impact on Marine Life)
- परासरण दाब का नियंत्रण (Osmoregulation): समुद्री जीवों को अपने शरीर की कोशिकाओं के अंदर पानी और नमक के संतुलन को बनाए रखना होता है, जिसे ऑस्मोरेग्यूलेशन कहा जाता है।
- लवणता में परिवर्तन जीवों के लिए एक बड़ा तनाव हो सकता है, क्योंकि उन्हें इस संतुलन को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।
- प्रजातियों का वितरण: विभिन्न समुद्री प्रजातियों की लवणता सहन करने की अपनी एक विशिष्ट सीमा होती है।
- स्टेनोहेलाइन (Stenohaline): वे जीव जो लवणता में केवल एक संकीर्ण (कम) उतार-चढ़ाव को ही सहन कर सकते हैं, जैसे कि खुले महासागर में रहने वाले जीव।
- यूरोहेलाइन (Euryhaline): वे जीव जो लवणता में व्यापक (अधिक) उतार-चढ़ाव को सहन कर सकते हैं, जैसे कि ज्वारनदमुख (Estuaries) में रहने वाले जीव।
- जैव विविधता और आवास: लवणता समुद्री प्रजातियों के भौगोलिक वितरण, प्रजनन और व्यवहार को सीधे तौर पर प्रभावित करती है, जिससे यह निर्धारित होता है कि कौन सी प्रजाति कहाँ रह सकती है।
निष्कर्ष:
लवणता महासागरों का केवल एक रासायनिक गुण नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी के जलवायु इंजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो महासागरीय धाराओं, वैश्विक ऊष्मा वितरण और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना को आकार देती है। लवणता में छोटे परिवर्तन भी वैश्विक जलवायु और समुद्री जीवन पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।
समुद्री जल की लवणता के वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक (Factors Affecting Ocean Salinity Distribution) निम्नलिखित हैं, जो परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
| क्रम संख्या | कारक का नाम | लवणता पर प्रभाव | उदाहरण और स्पष्टीकरण |
| 1. | वाष्पीकरण (Evaporation) | बढ़ाता है (लवणता उच्च होती है)। | गर्म और शुष्क क्षेत्रों में पानी भाप बन जाता है, जबकि नमक पीछे रह जाता है। इस कारण, उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (Sub-tropics – लगभग 20° से 40° अक्षांशों के बीच) में लवणता सबसे अधिक होती है, जहाँ अधिक वाष्पीकरण होता है और बादल कम बनते हैं। |
| 2. | वर्षा (Precipitation) | घटाता है (लवणता कम होती है)। | वर्षा समुद्री जल में ताजा पानी (Freshwater) जोड़ती है, जिससे पानी पतला (Dilute) हो जाता है और लवणता कम हो जाती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों (Equator) में भारी वर्षा के कारण, उच्च वाष्पीकरण के बावजूद भी लवणता मध्यम रहती है। |
| 3. | नदी जल का अन्तर्वाह (River Runoff) | घटाता है (लवणता कम होती है)। | जहाँ बड़ी नदियाँ महासागर में मिलती हैं, जैसे कि डेल्टा क्षेत्र या बड़े खाड़ी के मुहाने (बंगाल की खाड़ी में गंगा/ब्रह्मपुत्र डेल्टा), वहाँ ताज़े पानी की अत्यधिक मात्रा से सतह की लवणता काफी कम हो जाती है। |
| 4. | बर्फ़ का पिघलना और जमना (Melting and Freezing of Ice) | – पिघलना: लवणता घटाता है। – जमना: लवणता बढ़ाता है। | बर्फ़ का पिघलना: ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Regions) में बर्फ़ पिघलने से ठंडा और मीठा पानी (Freshwater) समुद्र में मिलता है, जिससे लवणता कम हो जाती है। बर्फ़ का जमना: जब समुद्र का पानी जमता है, तो नमक बर्फ में नहीं घुलता (बर्फ ताजा होती है), जिससे आसपास का पानी अधिक नमकीन हो जाता है। |
| 5. | पवन और समुद्री धाराएँ (Wind and Ocean Currents) | वितरण को प्रभावित करता है। | पवनें सतही जल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं, जिससे कम लवणता वाला पानी अधिक लवणता वाले क्षेत्र में या इसका उल्टा हो सकता है। उदाहरण के लिए, अटलांटिक महासागर में गल्फ स्ट्रीम लवणता के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। |
| 6. | जल परिसंचरण की डिग्री (Degree of Water Circulation) | बढ़ा/घटा सकता है। | संलग्न (Enclosed) समुद्री निकाय जैसे कि लाल सागर (Red Sea) और भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में खुले महासागरों की तुलना में बहुत अधिक वाष्पीकरण होता है और नदियों से कम ताज़ा पानी मिलता है, इसलिए इनकी लवणता अधिक होती है। इसके विपरीत, जहां ताजा पानी आ रहा हो और संचलन धीमा हो तो लवणता कम होगी। |
| 7. | वातावरण का दबाव (Atmospheric Pressure) | परोक्ष रूप से प्रभावित करता है। | वायुदाब पवन परिसंचरण को प्रभावित करता है, जो वर्षा के पैटर्न को बदलता है और परिणामस्वरूप लवणता के स्तर पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। |
निष्कर्ष:
आमतौर पर, महासागरीय सतह की अधिकतम लवणता उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (20°-40° अक्षांश) में पाई जाती है। भूमध्य रेखा पर, उच्च वर्षा के कारण लवणता मध्यम रहती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में, बर्फ पिघलने के कारण सतह पर लवणता कम पाई जाती है।
महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)
महासागरीय धाराएँ महासागरों में एक निश्चित दिशा में बहने वाले पानी की विशाल “नदियों” के समान होती हैं। ये धाराएँ पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने, समुद्री जीवन को प्रभावित करने और वैश्विक ऊष्मा (Heat) को वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति के कारण (Causes of Ocean Currents)
महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति और दिशा को कई कारक मिलकर नियंत्रित करते हैं, जिन्हें दो मुख्य समूहों में बांटा जा सकता है:
1. प्राथमिक बल (Primary Forces) – जो धाराओं को गति प्रदान करते हैं:
प्राथमिक बल वे मौलिक प्राकृतिक शक्तियाँ हैं जो रुके हुए महासागरीय जल को गति प्रदान करती हैं और धाराओं को जन्म देती हैं। ये बल धाराओं की शुरुआत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार होते हैं।
इनमें निम्नलिखित चार बल शामिल हैं:
क. सौर ऊर्जा से तापन (Heating by Solar Energy)
यह प्रक्रिया धाराओं के लिए एक अप्रत्यक्ष लेकिन मूलभूत शुरुआती बिंदु है।
- प्रक्रिया: सूर्य भूमध्य रेखा (Equator) के पास के समुद्री जल को ध्रुवों (Poles) की तुलना में अधिक गर्म करता है। गर्म होने पर पानी फैलता है (Thermal Expansion)।
- परिणाम: इस फैलाव के कारण भूमध्य रेखा पर समुद्र का स्तर ध्रुवों की तुलना में कुछ सेंटीमीटर ऊँचा हो जाता है। इससे एक बहुत ही हल्की ढलान (Gentle Slope) बन जाती है। गुरुत्वाकर्षण (Gravity) इस ढलान पर पानी को भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर बहने के लिए प्रेरित करता है।
ख. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)
सतही धाराओं को उत्पन्न करने वाला यह सबसे प्रमुख और शक्तिशाली कारक है।
- प्रक्रिया: जब स्थायी पवनें (जैसे व्यापारिक पवनें और पछुआ पवनें) लगातार समुद्र की सतह पर बहती हैं, तो वे घर्षण (Friction) के माध्यम से पानी को अपने साथ खींचती या धकेलती हैं।
- परिणाम: पानी की ऊपरी परत हवा की दिशा में बहने लगती है। यह गति फिर नीचे की परतों में स्थानांतरित होती है, जिससे एक विशाल जल राशि एक निश्चित दिशा में बहने लगती है, जिसे धारा कहते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी पानी से भरे टब की सतह पर फूंक मारते हैं और पानी आगे बढ़ने लगता है।
ग. कोरिओलिस बल (Coriolis Force)
यह बल धाराओं को शुरू नहीं करता, बल्कि पहले से बह रही धाराओं की दिशा को मोड़ता (Deflect) है।
- प्रक्रिया: पृथ्वी के अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमने के कारण यह एक आभासी बल उत्पन्न होता है। यह बल किसी भी गतिमान वस्तु (जैसे हवा और पानी) को उसके पथ से विक्षेपित कर देता है।
- परिणाम:
- उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में, यह धाराओं को उनकी गति की दिशा में दाईं ओर (Right) मोड़ देता है।
- दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) में, यह धाराओं को उनकी गति की दिशा में बाईं ओर (Left) मोड़ देता है।
- महत्व: इसी बल के कारण महासागरीय धाराएँ सीधी न बहकर वृत्ताकार पथ (Circular Path) में बहती हैं, जिन्हें गायर (Gyre) कहते हैं।
घ. गुरुत्वाकर्षण (Gravity)
गुरुत्वाकर्षण बल पानी के ढेर को समतल करने का काम करता है, जिससे धाराएँ उत्पन्न होती हैं।
- प्रक्रिया: जैसा कि सौर तापन में बताया गया ہے, गुरुत्वाकर्षण ऊँचे जल स्तर (भूमध्य रेखा) से नीचे जल स्तर (ध्रुवों) की ओर पानी को खींचता है।
- परिणाम: यह बल ढलान के कारण पानी को गतिमान करता है, जिससे धाराओं का प्रवाह बना रहता है। यह सघन (denser) पानी को नीचे की ओर डुबोने में भी मदद करता है।
ये सभी प्राथमिक बल एक साथ मिलकर काम करते हैं और महासागरों में धाराओं की एक जटिल और गतिशील प्रणाली का निर्माण करते हैं।
2. द्वितीयक बल (Secondary Forces) – जो धाराओं की दिशा और गति को बदलते हैं:
द्वितीयक बल वे कारक हैं जो प्राथमिक बलों द्वारा शुरू की गई धाराओं के मार्ग, गति और स्वरूप को परिमार्जित (modify) करते हैं। ये बल धाराओं को उनका अंतिम, जटिल और वृत्ताकार रूप प्रदान करते हैं।
इनमें मुख्य रूप से दो कारक शामिल हैं:
क. तापमान और लवणता में अंतर (Differences in Temperature and Salinity)
यह कारक घनत्व (Density) पर आधारित है और विशेष रूप से गहरी महासागरीय धाराओं (Deep Ocean Currents) को जन्म देता है।
- मूल सिद्धांत (The Basic Principle):
- ठंडा पानी गर्म पानी की तुलना में अधिक सघन (denser) और भारी होता है।
- अधिक खारा (salty) पानी कम खारे पानी की तुलना में अधिक सघन (denser) और भारी होता है।
- प्रक्रिया:
- पानी का डूबना (Sinking of Water): ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Regions) में, समुद्री जल बहुत ठंडा हो जाता है। जब समुद्री बर्फ जमती है, तो वह अपने पीछे नमक छोड़ देती है, जिससे आसपास के पानी की लवणता बढ़ जाती है। यह अत्यधिक ठंडा और अत्यधिक खारा पानी बहुत सघन और भारी हो जाता है और महासागर की गहराई में डूबने लगता है।
- गहरी धाराओं का निर्माण: यह डूबा हुआ पानी फिर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में समुद्र के तल के साथ-साथ धीरे-धीरे भूमध्य रेखा की ओर बहना शुरू कर देता है। यह धीमी गति से बहने वाला पानी ही गहरी महासागरीय धारा का निर्माण करता है।
- थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation): तापमान (थर्मो) और लवणता (हैलाइन) के कारण घनत्व में आए इसी अंतर से संचालित होने वाली धाराओं की इस वैश्विक प्रणाली को “थर्मोहेलाइन परिसंचरण” या “वैश्विक कन्वेयर बेल्ट” (Global Conveyor Belt) कहा जाता है।
ख. महाद्वीपों का आकार और समुद्र तल की स्थलाकृति (Shape of Continents and Ocean Floor Topography)
यह कारक धाराओं के लिए एक भौतिक बाधा (Physical Barrier) के रूप में कार्य करता है, जो उनकी दिशा को मजबूरन बदल देता है।
- महाद्वीपों का प्रभाव (Impact of Continents):
- दिशा परिवर्तन: जब कोई महासागरीय धारा बहते हुए किसी महाद्वीप के तट से टकराती है, तो वह रुक नहीं सकती। इसके बजाय, वह तट के साथ-साथ मुड़ जाती है या दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है।
- उदाहरण: जब दक्षिणी विषुवतीय धारा (South Equatorial Current) अटलांटिक महासागर में पश्चिम की ओर बहते हुए दक्षिण अमेरिका के ब्राजील तट से टकराती है, तो यह दो भागों में बँट जाती है: एक शाखा उत्तर की ओर (कैरिबियन धारा) और दूसरी शाखा दक्षिण की ओर (ब्राजील धारा) मुड़ जाती है।
- गायर का निर्माण: महाद्वीपों द्वारा धाराओं को मोड़ने की यह प्रक्रिया कोरिओलिस बल के साथ मिलकर महासागरों में विशाल वृत्ताकार धाराओं के लूप बनाने में मदद करती है, जिन्हें गायर (Gyre) कहा जाता है।
- समुद्र तल का प्रभाव (Impact of the Ocean Floor):
- समुद्र का तल समतल नहीं है। इसमें पर्वत श्रृंखलाएँ (मध्य-महासागरीय कटक), खाइयाँ और पठार हैं।
- जब गहरी धाराएँ इन पनडुब्बी बाधाओं से टकराती हैं, तो उनकी दिशा बदल जाती है, उनकी गति धीमी हो जाती है या उन्हें ऊपर की ओर उठने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, यदि प्राथमिक बल धाराओं के “इंजन” हैं जो उन्हें गति देते हैं, तो द्वितीयक बल “स्टीयरिंग व्हील” और “सड़क के अवरोधक” हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि वे कहाँ और कैसे बहेंगी।
धाराओं के प्रकार (Types of Currents)
1. तापमान के आधार पर:
तापमान के आधार पर महासागरीय धाराओं को दो मुख्य प्रकारों में बांटा जा सकता है: गर्म धाराएँ और ठंडी धाराएँ। ये धाराएँ अपने गुणों के कारण जिन क्षेत्रों से गुजरती हैं, वहाँ के मौसम और जलवायु पर गहरा प्रभाव डालती हैं।
क. गर्म धाराएँ (Warm Currents)
ये वे धाराएँ हैं जिनका तापमान उनके मार्ग में आने वाले जल के तापमान से अधिक होता है।
- उत्पत्ति और दिशा (Origin and Direction):
- ये धाराएँ आमतौर पर भूमध्य रेखा (निम्न अक्षांश) से ध्रुवों (उच्च अक्षांश) की ओर बहती हैं।
- विशेषताएँ और प्रभाव (Characteristics and Effects):
- तापमान में वृद्धि: ये जिन तटीय क्षेत्रों से गुजरती हैं, वहाँ का तापमान बढ़ा देती हैं।
- वर्षा: ये अपने साथ गर्म और नम हवा लाती हैं, जिससे इनके प्रभाव वाले तटीय क्षेत्रों में वर्षा की संभावना बढ़ जाती है।
- बंदरगाहों को खुला रखना: ये ठंडे क्षेत्रों की बर्फ को पिघलाकर बंदरगाहों को साल भर नेविगेशन के लिए खुला रखने में मदद करती हैं (जैसे उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट पश्चिमी यूरोप के बंदरगाहों को खुला रखती है)।
- प्रमुख उदाहरण (Examples):
- गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream) – अटलांटिक महासागर
- कुरोशियो धारा (Kuroshio Current) – प्रशांत महासागर (“जापान की गर्म धारा” भी कहते हैं)
- ब्राजील धारा (Brazil Current) – अटलांटिक महासागर
- अगुलहास धारा (Agulhas Current) – हिंद महासागर
- उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift)
ख. ठंडी धाराएँ (Cold Currents)
ये वे धाराएँ हैं जिनका तापमान उनके मार्ग में आने वाले जल के तापमान से कम होता है।
- उत्पत्ति और दिशा (Origin and Direction):
- ये धाराएँ आमतौर पर ध्रुवीय क्षेत्रों (उच्च अक्षांश) से भूमध्य रेखा (निम्न अक्षांश) की ओर बहती हैं।
- विशेषताएँ और प्रभाव (Characteristics and Effects):
- तापमान में कमी: ये जिन तटीय क्षेत्रों से गुजरती हैं, वहाँ का तापमान सामान्य से कम कर देती हैं।
- मरुस्थलों का निर्माण: इनके कारण हवा ठंडी और शुष्क हो जाती है, जिससे वर्षा की संभावना कम हो जाती है। यही कारण है कि महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर कई प्रमुख मरुस्थल ठंडी धाराओं के प्रभाव से बने हैं (जैसे पेरू धारा और अटाकामा मरुस्थल)।
- हिमखंड (Icebergs): ये अपने साथ ध्रुवीय क्षेत्रों से बड़े-बड़े हिमखंड बहाकर ला सकती हैं, जो समुद्री यातायात के लिए खतरा बनते हैं (जैसे लैब्राडोर धारा)।
- कोहरा: जब एक ठंडी धारा किसी गर्म धारा से मिलती है, तो घना कोहरा (Fog) उत्पन्न होता है।
- प्रमुख उदाहरण (Examples):
- लैब्राडोर धारा (Labrador Current) – अटलांटिक महासागर
- पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru or Humboldt Current) – प्रशांत महासागर
- कैलिफोर्निया धारा (California Current) – प्रशांत महासागर
- कैनरी धारा (Canary Current) – अटलांटिक महासागर
- बेंगुएला धारा (Benguela Current) – अटलांटिक महासागर
- ओयाशियो धारा (Oyashio Current) – प्रशांत महासागर (“जापान की ठंडी धारा”)
तुलनात्मक सारांश
| विशेषता | गर्म धारा (Warm Current) | ठंडी धारा (Cold Current) |
| उत्पत्ति | भूमध्यरेखीय क्षेत्र (निम्न अक्षांश) | ध्रुवीय क्षेत्र (उच्च अक्षांश) |
| प्रवाह की दिशा | ध्रुवों की ओर | भूमध्य रेखा की ओर |
| तापमान | आस-पास के जल से गर्म | आस-पास के जल से ठंडा |
| तटीय प्रभाव | तापमान बढ़ाती है, वर्षा लाती है | तापमान घटाती है, शुष्कता व मरुस्थल बनाती है |
| उदाहरण | गल्फ स्ट्रीम, कुरोशियो | लैब्राडोर, पेरू (हम्बोल्ट) |
2. गहराई के आधार पर:
गहराई के आधार पर महासागरीय धाराओं को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया जाता है: सतही धाराएँ और गहरी धाराएँ। ये दोनों प्रणालियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और मिलकर वैश्विक ऊष्मा और पोषक तत्वों का परिसंचरण करती हैं।
क. सतही धाराएँ (Surface Currents)
ये वे धाराएँ हैं जो महासागर की ऊपरी सतह पर बहती हैं और जिनका हम आमतौर पर धाराओं के रूप में अध्ययन करते हैं।
- स्थान और गहराई (Location and Depth):
- ये महासागर के ऊपरी 400 मीटर (लगभग 1300 फीट) में पाई जाती हैं।
- ये वायुमंडल के साथ सीधे संपर्क में होती हैं।
- संचालक बल (Driving Force):
- इनका मुख्य चालक बल प्रचलित पवनें (Prevailing Winds) होती हैं, जैसे व्यापारिक पवनें और पछुआ पवनें। हवा के घर्षण से यह पानी को अपने साथ बहाती हैं।
- इनकी दिशा कोरिओलिस बल और महाद्वीपों के आकार से निर्धारित होती है, जिससे ये वृत्ताकार पथों में बहती हैं जिन्हें गायर (Gyres) कहा जाता है।
- जल का आयतन (Volume of Water):
- ये महासागर के कुल जल का लगभग 10% हिस्सा हैं।
- गति (Speed):
- ये गहरी धाराओं की तुलना में अपेक्षाकृत तेज होती हैं। इनकी गति कुछ किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है।
- उदाहरण (Examples):
- गल्फ स्ट्रीम, कुरोशियो, उत्तरी विषुवतीय धारा, कैलिफोर्निया धारा।
ख. गहरी धाराएँ (Deep Water Currents)
ये महासागर की गहराइयों में बहती हैं और वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- स्थान और गहराई (Location and Depth):
- ये सतही परत के नीचे, समुद्र के तल तक पाई जाती हैं।
- संचालक बल (Driving Force):
- इनका मुख्य चालक बल पानी के घनत्व (Density) में अंतर होता है। घनत्व दो कारकों से बदलता है:
- तापमान (Temperature): ठंडा पानी अधिक सघन होता है।
- लवणता (Salinity): खारा पानी अधिक सघन होता है।
- इस प्रणाली को थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation) कहा जाता है। ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडा और अधिक खारा पानी भारी होकर नीचे डूबता है और इन धाराओं को जन्म देता है।
- इनका मुख्य चालक बल पानी के घनत्व (Density) में अंतर होता है। घनत्व दो कारकों से बदलता है:
- जल का आयतन (Volume of Water):
- ये महासागर के कुल जल का लगभग 90% हिस्सा हैं।
- गति (Speed):
- ये अत्यधिक धीमी गति से बहती हैं, जिन्हें पूरा एक चक्कर लगाने में सैकड़ों या हजारों वर्ष लग सकते हैं। इन्हें “महासागरीय कन्वेयर बेल्ट” (Ocean Conveyor Belt) भी कहा जाता है।
- महत्व (Significance):
- ये वैश्विक स्तर पर ऊष्मा का वितरण करती हैं और पोषक तत्वों को समुद्र की गहराइयों से सतह की ओर (अपवेलिंग के माध्यम से) लाती हैं, जो समुद्री जीवन के लिए आवश्यक है।
तुलनात्मक सारांश
| विशेषता | सतही धाराएँ (Surface Currents) | गहरी धाराएँ (Deep Water Currents) |
| स्थान | महासागर का ऊपरी 400 मीटर | महासागर की गहराइयों में (तल तक) |
| मुख्य चालक बल | पवनें (Winds) | घनत्व (तापमान और लवणता का अंतर) |
| जल का आयतन | कुल जल का 10% | कुल जल का 90% |
| गति | तेज | बहुत धीमी |
| वैज्ञानिक अवधारणा | गायर (Gyre) प्रणाली | थर्मोहेलाइन परिसंचरण (कन्वेयर बेल्ट) |
| जलवायु में भूमिका | क्षेत्रीय जलवायु और मौसम को प्रभावित करती हैं | वैश्विक ऊष्मा का वितरण और दीर्घकालिक जलवायु को नियंत्रित करती हैं |
विश्व की प्रमुख महासागरीय धाराएँ
नीचे विश्व के प्रमुख महासागरों (अटलांटिक, प्रशांत और हिंद महासागर) में बहने वाली गर्म और ठंडी धाराओं को सारणीबद्ध किया गया है।
| महासागर | गर्म धाराएँ (Warm Currents) | ठंडी धाराएँ (Cold Currents) |
अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean) | • गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream): दुनिया की सबसे तेज और प्रसिद्ध धाराओं में से एक।<br>• उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift): गल्फ स्ट्रीम का ही विस्तार, जो पश्चिमी यूरोप को गर्म रखता है।<br>• ब्राजील धारा (Brazil Current): दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट पर बहती है।<br>• उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराएँ (North & South Equatorial Currents): भूमध्य रेखा के पास बहती हैं।<br>• गिनी धारा (Guinea Current): अफ्रीका के पश्चिमी तट पर। | • लैब्राडोर धारा (Labrador Current): आर्कटिक से ठंडा पानी और हिमखंड लाती है।<br>• कैनरी धारा (Canary Current): अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी तट पर बहती है।<br>• बेंगुएला धारा (Benguela Current): अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी तट पर।<br>• फ़ॉकलैंड धारा (Falkland Current): दक्षिण अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर। |
| प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) | • कुरोशियो धारा (Kuroshio Current): जापान के तट पर बहती है, इसे “जापान की गर्म धारा” भी कहते हैं।<br>• पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा (East Australian Current): ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर।<br>• अलास्का धारा (Alaska Current): उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर।<br>• उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराएँ (North & South Equatorial Currents): | • ओयाशियो धारा (Oyashio Current): इसे “जापान की ठंडी धारा” कहते हैं, जो उत्तर से आती है।<br>• कैलिफोर्निया धारा (California Current): उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर बहती है।<br>• पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru or Humboldt Current): दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर, एल नीनो से संबंधित। |
| हिंद महासागर (Indian Ocean) | • अगुलहास धारा (Agulhas Current): अफ्रीका के पूर्वी तट पर बहने वाली एक बहुत शक्तिशाली धारा।<br>• मोजाम्बिक धारा (Mozambique Current): अफ्रीका और मेडागास्कर के बीच।<br>• दक्षिणी-पश्चिमी मानसून ड्रिफ्ट (South-West Monsoon Drift): यह एक मौसमी धारा है जो गर्मियों में बनती है। | • पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा (West Australian Current): ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट पर।<br>• सोमाली धारा (Somali Current): अफ्रीका के हॉर्न के पास बहती है। यह एक अनूठी धारा है जो गर्मियों के मानसून के दौरान ठंडी हो जाती है (अपवेलिंग के कारण)। |
अटलांटिक महासागर की धाराएँ (Currents of the Atlantic Ocean)
अटलांटिक महासागर की धाराओं की प्रणाली सबसे व्यवस्थित और स्पष्ट है। इसका आकार ‘S’ अक्षर जैसा है, और धाराएँ इसी के अनुरूप उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में दो विशाल वृत्ताकार प्रणालियों (गायर) का निर्माण करती हैं।
उत्तरी अटलांटिक महासागर की धाराएँ (Currents of the North Atlantic Ocean)
यह एक दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घूमने वाला गायर (Gyre) है। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:
गर्म धाराएँ (Warm Currents):
- उत्तरी विषुवतीय धारा (North Equatorial Current):
- यह व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और कैरिबियन सागर तक पहुँचती है।
- गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream):
- यह दुनिया की सबसे प्रसिद्ध, शक्तिशाली और तेज धाराओं में से एक है।
- यह मैक्सिको की खाड़ी से उत्पन्न होती है और उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट (फ्लोरिडा) के समानांतर उत्तर-पूर्व की ओर बहती है।
- उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift):
- यह गल्फ स्ट्रीम का ही आगे का विस्तार है, जो पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए पश्चिमी यूरोप तक पहुँचती है।
- प्रभाव: इसी धारा के कारण पश्चिमी यूरोप का मौसम सर्दियों में भी हल्का गर्म रहता है और वहां के बंदरगाह साल भर खुले रहते हैं।
ठंडी धाराएँ (Cold Currents):
- कैनरी धारा (Canary Current):
- यह उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट का ठंडा पानी है जो दक्षिण की ओर मुड़कर अफ्रीका के पश्चिमी तट (स्पेन, पुर्तगाल और सहारा मरुस्थल के पास) के साथ-साथ बहता है।
- प्रभाव: इसके कारण सहारा मरुस्थल के तटीय क्षेत्र में शुष्कता बढ़ जाती है। यह धारा उत्तरी अटलांटिक गायर को पूरा करती है।
- लैब्राडोर धारा (Labrador Current):
- यह आर्कटिक महासागर से ठंडा पानी और अपने साथ हिमखंड (Icebergs) लेकर ग्रीनलैंड और कनाडा के बीच से दक्षिण की ओर बहती है।
- विशेषता: न्यूफ़ाउंडलैंड (कनाडा) के पास इसका गर्म गल्फ स्ट्रीम से मिलन होता है, जिससे वहां घना कोहरा छा जाता है और यह दुनिया का सबसे प्रसिद्ध मछली पकड़ने का क्षेत्र बन जाता है।
दक्षिणी अटलांटिक महासागर की धाराएँ (Currents of the South Atlantic Ocean)
यह एक वामावर्त (Counter-clockwise) दिशा में घूमने वाला गायर है। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:
गर्म धाराएँ (Warm Currents):
- दक्षिणी विषुवतीय धारा (South Equatorial Current):
- यह भी व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और ब्राजील के तट से टकराकर मुड़ जाती है।
- ब्राजील धारा (Brazil Current):
- यह दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा है जो दक्षिण अमेरिका (ब्राजील) के पूर्वी तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है।
ठंडी धाराएँ (Cold Currents):
- दक्षिण अटलांटिक प्रवाह (South Atlantic Drift):
- यह विशाल अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current) का ही हिस्सा है जो पश्चिम से पूर्व की ओर बहता है।
- बेंगुएला धारा (Benguela Current):
- यह दक्षिण अटलांटिक प्रवाह की एक शाखा है जो उत्तर की ओर मुड़कर अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी तट (नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका) के साथ-साथ बहती है।
- प्रभाव: इसके कारण नामीब मरुस्थल का निर्माण हुआ है। यह अपवेलिंग (Upwelling – नीचे से ठंडे पोषक तत्वों का ऊपर आना) के कारण मछली पकड़ने का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र भी है। यह दक्षिणी अटलांटिक गायर को पूरा करती है।
- फ़ॉकलैंड धारा (Falkland Current):
- यह अंटार्कटिका से उत्तर की ओर बहते हुए अर्जेंटीना के तट तक पहुँचती है। इसका गर्म ब्राजील धारा से मिलन होता है।
अटलांटिक महासागर की धाराओं की विशिष्टताएँ:
- सारगैसो सागर (Sargasso Sea): उत्तरी अटलांटिक गायर के केंद्र में एक शांत और स्थिर जल का क्षेत्र है, जहाँ गल्फ स्ट्रीम, कैनरी धारा और उत्तरी विषुवतीय धारा बहती हैं। यहाँ सारगैसम नामक समुद्री घास तैरती रहती है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा समुद्र है जिसका कोई तट नहीं है।
- धाराओं का मिलन: अटलांटिक महासागर में दो प्रमुख मिलन स्थल हैं—न्यूफ़ाउंडलैंड के पास गल्फ स्ट्रीम और लैब्राडोर धारा का और दक्षिण में ब्राजील और फ़ॉकलैंड धाराओं का। ये दोनों ही स्थान मत्स्य उद्योग के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
प्रशांत महासागर की धाराएँ (Currents of the Pacific Ocean)
प्रशांत महासागर दुनिया का सबसे बड़ा और गहरा महासागर है। अटलांटिक महासागर की तरह, यहाँ भी उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में दो विशाल वृत्ताकार धारा प्रणालियाँ (गायर) पाई जाती हैं।
उत्तरी प्रशांत महासागर की धाराएँ (Currents of the North Pacific Ocean)
यह एक दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घूमने वाला गायर है। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:
गर्म धाराएँ (Warm Currents):
- उत्तरी विषुवतीय धारा (North Equatorial Current):
- यह व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और फिलीपींस के तट तक पहुँचती है।
- कुरोशियो धारा (Kuroshio Current):
- इसे “जापान की गर्म धारा” या “ब्लैक स्ट्रीम” (इसके गहरे नीले रंग के कारण) भी कहा जाता है।
- यह उत्तरी विषुवतीय धारा का ही विस्तार है जो फिलीपींस और ताइवान के तट से मुड़कर उत्तर की ओर जापान के तट के साथ बहती है। यह अटलांटिक की गल्फ स्ट्रीम के बराबर है।
- प्रभाव: यह जापान के मौसम को गर्म और नम बनाती है।
- उत्तरी प्रशांत प्रवाह (North Pacific Drift):
- यह कुरोशियो धारा का ही पूर्वी विस्तार है, जो पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए उत्तरी अमेरिका के तट तक पहुँचती है।
ठंडी धाराएँ (Cold Currents):
- कैलिफोर्निया धारा (California Current):
- यह उत्तरी प्रशांत प्रवाह की दक्षिणी शाखा है जो उत्तरी अमेरिका (विशेष रूप से कैलिफोर्निया) के पश्चिमी तट के साथ-साथ दक्षिण की ओर बहती है।
- प्रभाव: यह तट के तापमान को कम करती है, जिससे शुष्क मौसम और कोहरे की स्थिति बनती है (जैसे सैन फ्रांसिस्को में)। यह उत्तरी प्रशांत गायर को पूरा करती है।
- ओयाशियो धारा (Oyashio Current):
- इसे “जापान की ठंडी धारा” या “कुरिल धारा” भी कहते हैं।
- यह आर्कटिक क्षेत्र से ठंडा पानी लेकर दक्षिण की ओर बहती है और जापान के पूर्वी तट पर गर्म कुरोशियो धारा से मिलती है।
- प्रभाव: इस मिलन स्थल पर घना कोहरा बनता है और यह प्लैंकटन की अधिकता के कारण दुनिया के सबसे अच्छे मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों में से एक है।
दक्षिणी प्रशांत महासागर की धाराएँ (Currents of the South Pacific Ocean)
यह एक वामावर्त (Counter-clockwise) दिशा में घूमने वाला गायर है। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:
गर्म धाराएँ (Warm Currents):
- दक्षिणी विषुवतीय धारा (South Equatorial Current):
- यह व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और ऑस्ट्रेलिया के तट से टकराकर मुड़ जाती है।
- पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा (East Australian Current – EAC):
- यह दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा है जो ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है। यह इस क्षेत्र की सबसे बड़ी महासागरीय धारा है।
ठंडी धाराएँ (Cold Currents):
- दक्षिण प्रशांत प्रवाह (South Pacific Drift):
- यह अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा का ही हिस्सा है जो विशाल जलराशि के रूप में पश्चिम से पूर्व की ओर बहता है।
- पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru or Humboldt Current):
- यह दक्षिण प्रशांत प्रवाह की एक शाखा है जो उत्तर की ओर मुड़कर दक्षिण अमेरिका (चिली और पेरू) के पश्चिमी तट के साथ-साथ बहती है।
- प्रभाव:
- यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ठंडी धाराओं में से एक है, जिसके कारण अटाकामा मरुस्थल (दुनिया का सबसे शुष्क मरुस्थल) का निर्माण हुआ है।
- यह अपवेलिंग (Upwelling – गहरे समुद्र से ठंडे, पोषक तत्वों से भरपूर पानी का सतह पर आना) के लिए प्रसिद्ध है, जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा मछली उत्पादक क्षेत्र (विशेषकर एंकोवी मछली) बनाता है।
- यह धारा एल नीनो (El Niño) की घटना से सीधे तौर पर संबंधित है।
प्रशांत महासागर की अन्य महत्वपूर्ण धाराएँ और घटनाएँ:
- विषुवतीय प्रतिवर्ती धारा (Equatorial Counter Current):
- यह एक गर्म धारा है जो उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराओं के बीच, पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। यह पश्चिमी प्रशांत में हवाओं द्वारा जमा किए गए पानी के गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस बहने से बनती है।
- एल नीनो और ला नीना (El Niño and La Niña – ENSO):
- यह प्रशांत महासागर की सबसे महत्वपूर्ण मौसमी घटना है।
- सामान्य स्थिति में, ठंडी पेरू धारा शक्तिशाली होती है।
- एल नीनो के दौरान, पेरू धारा कमजोर पड़ जाती है और उसके स्थान पर गर्म पानी बहने लगता है। इससे पेरू के तट पर भारी वर्षा होती है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। इसका प्रभाव वैश्विक मौसम पर पड़ता है।
- ला नीना इसके विपरीत की स्थिति है, जिसमें पेरू धारा और भी अधिक ठंडी और शक्तिशाली हो जाती है।
हिंद महासागर की धाराएँ (Currents of the Indian Ocean)
हिंद महासागर की धाराओं की प्रणाली अटलांटिक और प्रशांत महासागर से बहुत अलग और अनूठी है। इसका मुख्य कारण मानसूनी पवनों का मौसमी उत्क्रमण (Seasonal Reversal) है, जिसका प्रभाव विशेष रूप से भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित उत्तरी हिंद महासागर पर पड़ता है। दक्षिणी हिंद महासागर में एक स्थायी और स्थिर धारा प्रणाली पाई जाती है।
इसलिए, हिंद महासागर की धाराओं को दो भागों में बांटा जाता है:
- उत्तरी हिंद महासागर की धाराएँ (मौसमी धाराएँ)
- दक्षिणी हिंद महासागर की धाराएँ (स्थिर धाराएँ)
1. उत्तरी हिंद महासागर की धाराएँ (मौसमी धारा प्रणाली)
यहाँ धाराओं की दिशा साल में दो बार मानसूनी पवनों के साथ पूरी तरह से बदल जाती है।
क. ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान (दक्षिण-पश्चिम मानसून)
- समय: मई से सितंबर तक।
- पवन की दिशा: दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व।
- धारा की दिशा: हवा के साथ, धाराएँ दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में बहती हैं।
- प्रमुख धाराएँ:
- दक्षिण-पश्चिम मानसून ड्रिफ्ट (South-West Monsoon Drift): यह एक गर्म धारा है जो अफ्रीका के तट से शुरू होकर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से होते हुए पूर्व की ओर बहती है।
- सोमाली धारा (Somali Current): यह एक अनूठी धारा है। ग्रीष्मकाल में, यह एक शक्तिशाली, तेज और ठंडी धारा बन जाती है।
- ठंडी क्यों? क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मानसून की तेज हवाएं तट के समानांतर बहती हैं, जिससे अपवेलिंग (Upwelling) की प्रक्रिया होती है, यानी गहरे समुद्र का ठंडा, पोषक तत्वों से भरपूर पानी सतह पर आ जाता है।
ख. शीतकालीन मानसून के दौरान (उत्तर-पूर्व मानसून)
- समय: दिसंबर से फरवरी तक।
- पवन की दिशा: उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम।
- धारा की दिशा: हवा के साथ, धाराएँ वामावर्त (Counter-clockwise) दिशा में बहती हैं।
- प्रमुख धाराएँ:
- उत्तर-पूर्व मानसून ड्रिफ्ट (North-East Monsoon Drift): यह धारा दक्षिण-पश्चिम मानसून ड्रिफ्ट की दिशा को पूरी तरह से उलट देती है और अब यह पूर्व से पश्चिम की ओर (मलेशिया से अरब सागर की ओर) बहती है।
- सोमाली धारा (Somali Current): इस मौसम में यह भी अपनी दिशा बदलकर दक्षिण की ओर बहती है और एक धीमी, कमजोर और गर्म धारा होती है।
2. दक्षिणी हिंद महासागर की धाराएँ (स्थिर धारा प्रणाली)
दक्षिणी हिंद महासागर में एक स्थायी, वामावर्त (Counter-clockwise) गायर (Gyre) बनता है, जो अटलांटिक और प्रशांत महासागर के दक्षिणी गायर के समान है।
गर्म धाराएँ (Warm Currents):
- दक्षिणी विषुवतीय धारा (South Equatorial Current):
- यह व्यापारिक पवनों के प्रभाव में पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। मेडागास्कर द्वीप के पास पहुँचकर यह दो शाखाओं में बँट जाती है।
- मोजाम्बिक धारा (Mozambique Current):
- यह दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा है जो अफ्रीका और मेडागास्कर के बीच मोजाम्बिक चैनल में दक्षिण की ओर बहती है।
- अगुलहास धारा (Agulhas Current):
- यह मेडागास्कर के पूर्व से आने वाली धारा और मोजाम्बिक धारा के मिलने से बनती है। यह अफ्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट के साथ बहती है और दुनिया की सबसे तेज और शक्तिशाली गर्म धाराओं में से एक है।
ठंडी धाराएँ (Cold Currents):
- दक्षिण हिंद महासागरीय प्रवाह (South Indian Ocean Drift):
- यह विशाल अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा का ही हिस्सा है जो पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व की ओर बहता है।
- पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा (West Australian Current):
- यह दक्षिण हिंद महासागरीय प्रवाह की एक शाखा है जो उत्तर की ओर मुड़कर ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के साथ-साथ बहती है। यह एक ठंडी धारा है जो दक्षिणी हिंद महासागर के गायर को पूरा करती है।
हिंद महासागर की धाराओं की मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | हिंद महासागर में स्थिति |
| उत्तरी भाग | धाराओं की दिशा वर्ष में दो बार मानसून पवनों के साथ बदल जाती है। |
| दक्षिणी भाग | एक स्थायी, वामावर्त (Counter-clockwise) गायर बनता है। |
| सोमाली धारा | यह एक अनूठी धारा है जो मौसमी रूप से अपनी दिशा और तापमान (गर्म/ठंडी) दोनों बदलती है। |
| अगुलहास धारा | यह दुनिया की सबसे शक्तिशाली गर्म धाराओं में से एक है। |
| कोई स्पष्ट मिलन स्थल नहीं | अटलांटिक और प्रशांत के विपरीत, यहाँ गर्म और ठंडी धाराओं का कोई प्रमुख मिलन स्थल नहीं है जो बड़े मत्स्य क्षेत्रों का निर्माण करे। |
महत्वपूर्ण तथ्य और अवधारणाएँ (Important Facts and Concepts)
- गायर (Gyres): महासागरों में धाराएँ एक वृत्ताकार पथ में बहती हैं जिसे “गायर” कहा जाता है। उत्तरी गोलार्ध में ये दक्षिणावर्त (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्ध में वामावर्त (Counter-clockwise) घूमती हैं।
- धाराओं का मिलन (Meeting Points of Currents):
- जहाँ गर्म और ठंडी धाराएँ मिलती हैं, वहाँ घना कोहरा (Fog) बनता है और प्लैंकटन (मछलियों का भोजन) की भारी मात्रा उत्पन्न होती है।
- इस कारण ये क्षेत्र दुनिया के सबसे अच्छे मछली पकड़ने वाले क्षेत्र बन जाते हैं।
- उदाहरण:
- न्यूफ़ाउंडलैंड (कनाडा) के पास: गर्म गल्फ स्ट्रीम और ठंडी लैब्राडोर धारा मिलती हैं।
- जापान के पास: गर्म कुरोशियो और ठंडी ओयाशियो धारा मिलती हैं।
- हिन्द महासागर का विशेष स्वरूप (Unique Nature of the Indian Ocean):
- यह एकमात्र महासागर है जहाँ उत्तरी भाग में धाराओं की दिशा मानसून पवनों के साथ बदल जाती है। सर्दियों में धाराएँ एक दिशा में और गर्मियों में विपरीत दिशा में बहती हैं।
- मरुस्थलों से संबंध (Relation with Deserts):
- अधिकांश ठंडी धाराएँ महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर बहती हैं। ये धाराएँ अपने ऊपर की हवा को ठंडा और शुष्क कर देती हैं, जिससे वर्षा नहीं होती। यही कारण है कि दुनिया के कई बड़े मरुस्थल (जैसे अटाकामा, नामीब, सहारा का पश्चिमी भाग) इन ठंडी धाराओं के प्रभाव क्षेत्र में स्थित हैं।
महासागरीय धाराओं के प्रभाव (Effects of Ocean Currents)
- जलवायु पर प्रभाव: धाराएँ वैश्विक ऊष्मा का पुनर्वितरण करती हैं। गर्म धाराएँ ठंडे तटीय क्षेत्रों को गर्म और नम बनाती हैं (जैसे गल्फ स्ट्रीम पश्चिमी यूरोप को गर्म रखती है), जबकि ठंडी धाराएँ तटीय क्षेत्रों को ठंडा और शुष्क बनाती हैं।
- मरुस्थलों का निर्माण: उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर बहने वाली ठंडी धाराएँ वायु को स्थिर कर देती हैं, जिससे वर्षा नहीं होती और मरुस्थलों का निर्माण होता है (जैसे पेरू धारा के कारण अटाकामा मरुस्थल)।
- मत्स्य उद्योग पर प्रभाव: जहाँ गर्म और ठंडी धाराएँ मिलती हैं, वहाँ प्लैंकटन (मछलियों का भोजन) की भरमार होती है, जिससे यह क्षेत्र मछली पकड़ने के लिए दुनिया का सबसे समृद्ध केंद्र बन जाता है।
- उदाहरण: जापान के पास कुरोशियो (गर्म) और ओयाशियो (ठंडी) धारा का मिलन। न्यूफ़ाउंडलैंड के पास गल्फ स्ट्रीम (गर्म) और लैब्राडोर (ठंडी) धारा का मिलन।
- नौसंचालन (Navigation): जहाजों की गति धाराओं की दिशा में तेज हो जाती है, जिससे समय और ईंधन की बचत होती है। ठंडी धाराएँ अपने साथ हिमखंड (icebergs) ला सकती हैं, जो जहाजों के लिए खतरा पैदा करते हैं।
- वर्षा: गर्म धाराओं के ऊपर की हवा नमी ग्रहण कर लेती है और जब यह तट पर पहुँचती है तो वर्षा करती है। ठंडी धाराओं के ऊपर की हवा शुष्क होती है।
सारगैसो सागर (Sargasso Sea)
सारगैसो सागर उत्तरी अटलांटिक महासागर के मध्य में स्थित एक विशाल, शांत और अद्वितीय समुद्री क्षेत्र है। इसकी सबसे बड़ी और प्रसिद्ध विशेषता यह है कि यह दुनिया का एकमात्र ऐसा समुद्र है जिसकी कोई तटरेखा (Coastline) नहीं है। यह वास्तव में एक “महासागर के भीतर महासागर” (An ocean within an ocean) है।
सारगैसो सागर क्या है?
यह भूमि से घिरा नहीं है, बल्कि चार प्रमुख महासागरीय धाराओं से घिरा हुआ है, जो एक विशाल वृत्ताकार प्रणाली (उत्तरी अटलांटिक गायर – North Atlantic Gyre) का निर्माण करती हैं। इन धाराओं की सीमाओं के भीतर का शांत जल ही सारगैसो सागर कहलाता है।
नामकरण (Naming)
- इसका नाम “सारगैसम” (Sargassum) नामक एक विशेष प्रकार की भूरी समुद्री शैवाल (Seaweed) के नाम पर रखा गया है।
- यह शैवाल स्वतंत्र रूप से तैरती है और समुद्र की सतह पर विशाल सुनहरे-भूरे रंग के तैरते हुए मैट (mats) या द्वीप बना लेती है।
- पुर्तगाली खोजकर्ताओं ने इस शैवाल को “सरगाको” (sargaço) नाम दिया था, जिससे बाद में “सारगैसो” नाम पड़ा।
भौगोलिक स्थिति और निर्माण (Geographical Location and Formation)
सारगैसो सागर चार शक्तिशाली महासागरीय धाराओं द्वारा अपनी सीमाओं के भीतर सीमित है:
- पश्चिम में: गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream)
- उत्तर में: उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift)
- पूर्व में: कैनरी धारा (Canary Current)
- दक्षिण में: उत्तरी विषुवतीय धारा (North Atlantic Equatorial Current)
ये धाराएँ दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में घूमती हैं, जिससे बीच का पानी शांत, स्थिर और गर्म बना रहता है।
विशेषताएँ (Characteristics)
- शांत जल (Calm Water): धाराओं के केंद्र में होने के कारण, यहाँ हवाएँ बहुत कमजोर होती हैं और पानी लगभग स्थिर रहता है। इसी क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से “हॉर्स लैटीट्यूड्स” (Horse Latitudes) भी कहा जाता था, क्योंकि यहाँ शांत हवाओं के कारण पाल वाले जहाज अक्सर फंस जाते थे।
- गर्म और उच्च लवणता (Warm and High Salinity): यहाँ उच्च वाष्पीकरण और कम वर्षा के कारण पानी की लवणता (खारापन) अटलांटिक के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक होती है।
- अत्यधिक स्वच्छ जल (Exceptionally Clear Water): यहाँ का पानी पोषक तत्वों की कमी के कारण बहुत साफ और गहरे नीले रंग का होता है। पानी की स्पष्टता (visibility) 200 फीट (लगभग 60 मीटर) तक हो सकती है। पोषक तत्वों की कमी के कारण इसे कभी-कभी “समुद्री मरुस्थल” (oceanic desert) भी कहा जाता है, लेकिन सारगैसम शैवाल के कारण यह जीवन से भरपूर है।
पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance)
सारगैसो सागर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र है।
- स्वर्ण वर्षावन (Golden Rainforest): तैरती हुई सारगैसम शैवाल को “समुद्र का सुनहरा तैरता वर्षावन” कहा जाता है। यह अनगिनत समुद्री जीवों के लिए आवास, भोजन और छिपने की जगह प्रदान करती है।
- नर्सरी और प्रजनन स्थल (Nursery and Spawning Ground): यह कई महत्वपूर्ण और लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण नर्सरी क्षेत्र है।
- अमेरिकी और यूरोपीय ईल (Eels): ये मछलियाँ प्रजनन के लिए हजारों मील की यात्रा करके सारगैसो सागर में आती हैं।
- लॉगरहेड समुद्री कछुए (Loggerhead Sea Turtles): जन्म के बाद छोटे कछुए अपने जीवन के शुरुआती वर्ष (“lost years”) इन शैवाल के बीच सुरक्षा में बिताते हैं।
- अद्वितीय जैव विविधता (Unique Biodiversity): यहाँ 10 से अधिक ऐसी प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलतीं। ये जीव विशेष रूप से सारगैसम के तैरते हुए मैट पर रहने के लिए अनुकूलित हैं, जैसे सारगैसम फिश (Sargassum fish)।
आधुनिक चुनौतियाँ और खतरे (Modern Challenges and Threats)
- प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution): धाराओं की वृत्ताकार गति के कारण, यह क्षेत्र प्लास्टिक और अन्य समुद्री मलबे के लिए एक संग्रह बिंदु बन गया है। उत्तरी अटलांटिक गारबेज पैच (North Atlantic Garbage Patch) का एक बड़ा हिस्सा सारगैसो सागर में ही स्थित है। सूक्ष्म प्लास्टिक (Microplastics) यहाँ के समुद्री जीवन के लिए एक बड़ा खतरा हैं।
- जलवायु परिवर्तन: समुद्र के तापमान में वृद्धि और धाराओं के पैटर्न में बदलाव सारगैसम के विकास और इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
जलराशियाँ (Water Masses)
परिभाषा:
जैसे वायुमंडल में वायुराशियाँ (Air Masses) होती हैं, वैसे ही महासागरों में जलराशियाँ (Water Masses) होती हैं। एक जलराशि, महासागरीय जल का एक बहुत बड़ा और विशिष्ट निकाय (Body) है जिसकी पहचान उसके लगभग समान तापमान (Temperature) और लवणता (Salinity) के घनत्व (Density) से होती है।
यह एक प्रकार से जलराशि का ‘फिंगरप्रिंट’ या ‘पहचान पत्र’ होता है। जब कोई जलराशि एक बार बन जाती है और गहराई में डूब जाती है, तो वह हजारों किलोमीटर तक यात्रा करते हुए भी अपने इन मूल गुणों को बहुत धीरे-धीरे बदलती है।
जलराशियों का निर्माण (Formation of Water Masses)
महासागरीय जलराशियों (Water Masses) का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसका “जन्म स्थान” महासागर की सतह होती है। सतह पर ही पानी वायुमंडल के साथ सीधे संपर्क में आता है और अपने विशिष्ट तापमान (Temperature) और लवणता (Salinity) के गुण प्राप्त करता है। ये दोनों गुण मिलकर जल के घनत्व (Density) को निर्धारित करते हैं, जो जलराशि के निर्माण और उसके डूबने का मुख्य कारण है।
निर्माण की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:
1. स्थान: महासागर की सतह (The Location: Ocean Surface)
जलराशियाँ महासागर की गहराइयों में नहीं बनतीं, बल्कि हमेशा सतह पर बनती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सतह पर ही निम्नलिखित प्रक्रियाएँ होती हैं:
- ऊष्मा का आदान-प्रदान: सूर्य से गर्मी मिलना या वायुमंडल में गर्मी खोना।
- ताजे पानी का आदान-प्रदान: वर्षा का होना, वाष्पीकरण होना या नदियों से मीठा पानी मिलना।
2. दो मुख्य अवयवों का निर्धारण (The Two Key Ingredients are Set)
क. तापमान का निर्धारण (Determination of Temperature)
- पानी का ठंडा होना: ध्रुवीय और उप-ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar and Sub-polar regions) में, हवाएँ बहुत ठंडी होती हैं। समुद्र का पानी अपनी ऊष्मा को वायुमंडल में खो देता है, जिससे उसका तापमान बहुत गिर जाता है (हिमांक के करीब)। ठंडा पानी अधिक सघन (dense) होता है।
- पानी का गर्म होना: भूमध्यरेखीय और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (Equatorial and Tropical regions) में, सूर्य की तीव्र किरणें पानी को गर्म करती हैं। गर्म पानी कम सघन होता है।
ख. लवणता का निर्धारण (Determination of Salinity)
- लवणता का बढ़ना (पानी अधिक खारा होना):
- वाष्पीकरण (Evaporation): उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (Sub-tropics) में, जहाँ आसमान साफ रहता है और तापमान अधिक होता है, पानी तेजी से भाप बनता है। वाष्पीकरण के दौरान केवल शुद्ध पानी उड़ता है, जबकि नमक पीछे रह जाता है, जिससे सतह की लवणता बढ़ जाती है।
- बर्फ का जमना (Formation of Sea Ice): ध्रुवीय क्षेत्रों में, जब समुद्री जल जमता है, तो वह अपने भीतर से नमक को बाहर निकाल देता है। इससे बर्फ तो ताजे पानी की बनती है, लेकिन उसके नीचे का बचा हुआ पानी अत्यधिक खारा और सघन हो जाता है।
- लवणता का घटना (पानी कम खारा होना):
- वर्षा (Precipitation): भूमध्य रेखा के पास जैसे क्षेत्रों में भारी वर्षा होने से समुद्र की सतह पर ताजा पानी मिलता है, जिससे लवणता कम हो जाती है।
- बर्फ का पिघलना (Melting of Ice): ध्रुवीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों या समुद्री बर्फ के पिघलने से ताजे पानी की आपूर्ति होती है, जो लवणता को घटा देती है।
3. घनत्व का निर्धारण: निर्णायक कारक (The Decisive Factor: Density)
तापमान और लवणता मिलकर पानी का घनत्व (Density) तय करते हैं, जो जलराशि के व्यवहार को निर्धारित करता है।
घनत्व का नियम:
- पानी जितना ठंडा होगा, उतना ही अधिक सघन (भारी) होगा।
- पानी जितना अधिक खारा होगा, उतना ही अधिक सघन (भारी) होगा।
सबसे सघन (heaviest) पानी वह होगा जो बहुत ठंडा और बहुत खारा दोनों हो।
4. निर्माण का अंतिम चरण: डूबना (निमज्जन) (The Final Step: Sinking)
यह जलराशि के “जन्म” का निर्णायक क्षण है।
- प्रक्रिया: जब महासागर की सतह पर किसी क्षेत्र का पानी (ठंडा होने या अधिक खारा होने के कारण) अपने नीचे स्थित पानी की तुलना में अधिक सघन (भारी) हो जाता है, तो वह गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर डूबना (Sink) शुरू कर देता है।
- गंतव्य: यह पानी तब तक नीचे डूबता रहता है जब तक कि वह उस गहराई तक न पहुँच जाए जहाँ उसके आसपास के पानी का घनत्व उसके बराबर हो।
- पृथक्करण: एक बार जब जलराशि गहराई में डूब जाती है, तो वह सतह और वायुमंडल से अलग हो जाती है। अब वह अपने तापमान और लवणता के विशिष्ट गुणों (अपने ‘फिंगरप्रिंट’) को संरक्षित रखती है और महासागरीय धाराओं के हिस्से के रूप में हजारों किलोमीटर तक अपनी धीमी यात्रा शुरू करती है।
उदाहरण:
उत्तरी अटलांटिक गहरे जल (NADW) का निर्माण तब होता है जब गल्फ स्ट्रीम का गर्म और खारा पानी उत्तर की ओर बहता है, ग्रीनलैंड के पास ठंडा होता है, और फिर अत्यधिक सघन होकर महासागर की गहराइयों में डूब जाता है।
T-S डायग्राम क्या है?
T-S डायग्राम एक ग्राफ या चार्ट है जो महासागरीय जल के दो सबसे महत्वपूर्ण गुणों के बीच संबंध को दर्शाता है: तापमान (Temperature – T) और लवणता (Salinity – S)। इसे एक प्रकार से जलराशि का “फिंगरप्रिंट चार्ट” माना जा सकता है।
- खड़ी अक्ष (Y-axis): इस पर तापमान (T) को दर्शाया जाता है (ऊपर की ओर गर्म, नीचे की ओर ठंडा)।
- क्षैतिज अक्ष (X-axis): इस पर लवणता (S) को दर्शाया जाता है (बाईं ओर कम खारा, दाईं ओर अधिक खारा)।
जब समुद्र के किसी नमूने (sample) का तापमान और लवणता मापा जाता है, तो उसे इस ग्राफ पर एक बिंदु (dot) के रूप में प्लॉट किया जा सकता है।
तीसरा महत्वपूर्ण पैरामीटर: घनत्व (The Third Key Parameter: Density)
T-S डायग्राम की असली शक्ति यह है कि यह सीधे तौर पर जल के घनत्व (Density) को भी दर्शाता है, भले ही घनत्व के लिए कोई अलग अक्ष न हो।
- सम-घनत्व रेखाएँ (Iso-pycnals): ग्राफ पर तिरछी, घुमावदार रेखाएँ (curved lines) बनी होती हैं। इन रेखाओं पर स्थित सभी बिंदुओं का घनत्व एक समान होता है। इन्हें ही सम-घनत्व रेखाएँ (Iso-pycnals) कहते हैं।
- घनत्व का पैटर्न: घनत्व ग्राफ में ऊपर-बाएँ कोने से नीचे-दाएँ कोने की ओर बढ़ता है।
- सबसे हल्का (कम घनत्व वाला) पानी: गर्म और कम खारा होता है (ग्राफ का ऊपरी-बायाँ हिस्सा)।
- सबसे भारी (अधिक घनत्व वाला) पानी: ठंडा और अधिक खारा होता है (ग्राफ का निचला-दायाँ हिस्सा)।
यह कैसे काम करता है? – जलराशियों का “फिंगरप्रिंट”
- एकल बिंदु: समुद्र से लिया गया पानी का एक नमूना (जैसे 1 लीटर) ग्राफ पर एक एकल बिंदु के रूप में दिखाई देगा।
- बिंदुओं का समूह (Cluster of Points): एक जलराशि (Water Mass) हजारों घन किलोमीटर पानी का एक विशाल निकाय है। जब इस पूरी जलराशि के कई नमूने लिए जाते हैं, तो उनके T और S मान लगभग एक जैसे होते हैं। ग्राफ पर ये सभी बिंदु एक-दूसरे के बहुत करीब, एक समूह (cluster) के रूप में दिखाई देते हैं।
- पहचान: यही बिंदुओं का समूह उस जलराशि का अद्वितीय “T-S फिंगरप्रिंट” या “T-S Signature” होता है। दुनिया की हर प्रमुख जलराशि का अपना एक विशिष्ट फिंगरप्रिंट होता है।
उदाहरण:
- अंटार्कटिक तलीय जल (AABW): T-S डायग्राम पर यह बहुत नीचे (अत्यधिक ठंडा) और दाईं ओर (खारा) एक समूह के रूप में दिखाई देगा।
- भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जल (MIW): यह डायग्राम पर काफी ऊपर (अपेक्षाकृत गर्म) और बहुत दाईं ओर (अत्यधिक खारा) दिखाई देगा।
T-S डायग्राम का उपयोग (Applications of T-S Diagram)
- जलराशियों की पहचान करना (Identifying Water Masses): किसी भी अज्ञात जल नमूने को T-S डायग्राम पर प्लॉट करके यह पता लगाया जा सकता है कि वह किस प्रमुख जलराशि का हिस्सा है।
- जलराशियों के मिश्रण का अध्ययन (Studying the Mixing of Water Masses):
- यह इसका सबसे शक्तिशाली उपयोग है। जब दो अलग-अलग जलराशियाँ (जैसे A और B) आपस में मिलती हैं, तो जो नया पानी बनता है, उसका T-S मान ग्राफ पर उन दोनों जलराशियों को जोड़ने वाली सीधी रेखा पर कहीं स्थित होगा।
- इससे वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि किसी विशेष स्थान पर पानी किन-किन जलराशियों का और किस अनुपात में मिश्रण है।
- महासागरीय स्थिरता का विश्लेषण (Analyzing Ocean Stability):
- T-S डायग्राम से यह पता लगाया जा सकता है कि जल स्तंभ (Water Column) स्थिर है या अस्थिर।
- यदि ऊपरी पानी का नमूना निचले पानी के नमूने की तुलना में कम घनत्व वाली रेखा (isopycnal) पर है, तो पानी स्थिर (Stable) है।
- यदि ऊपरी पानी निचले पानी की तुलना में अधिक सघन है, तो यह अस्थिर (Unstable) है और डूब जाएगा, जिससे मिश्रण (mixing) या संवहन (convection) होगा।
संक्षेप में, T-S डायग्राम एक सरल लेकिन अत्यंत जानकारीपूर्ण उपकरण है जो समुद्र विज्ञानियों को महासागरों की जटिल संरचना, परतों और परिसंचरण को एक ही नज़र में समझने में मदद करता है।
जलराशियों की विशेषताएँ (Characteristics of Water Masses)
महासागरीय जलराशियाँ (Water Masses) अपने विशिष्ट गुणों और व्यवहार के कारण महासागरों की संरचना और परिसंचरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. विशिष्ट तापमान और लवणता (Distinct Temperature and Salinity)
यह एक जलराशि की सबसे मौलिक विशेषता है। प्रत्येक जलराशि का अपना एक अद्वितीय तापमान-लवणता (T-S) संयोजन होता है, जिसे उसका “T-S फिंगरप्रिंट” या हस्ताक्षर (Signature) कहा जाता है।
- उदाहरण:
- AABW की पहचान अत्यधिक ठंडे और खारे पानी से होती है।
- MIW की पहचान अत्यधिक खारे और अपेक्षाकृत गर्म पानी से होती है।
- AAIW की पहचान कम लवणता (ताजा) और ठंडे पानी से होती है।
2. समरूपता (Homogeneity)
एक जलराशि अपने विशाल विस्तार में आंतरिक रूप से लगभग समान (Homogeneous) होती है। इसका मतलब है कि यदि आप उस जलराशि के भीतर अलग-अलग स्थानों से पानी के नमूने लेंगे, तो उन सभी के तापमान और लवणता के गुण लगभग एक जैसे होंगे।
3. घनत्व-आधारित परतों का निर्माण (Density-Driven Layering)
जलराशियाँ महासागर में अपने घनत्व (Density) के अनुसार परतों (Layers) में व्यवस्थित होती हैं।
- सबसे सघन (भारी) जलराशि, जैसे AABW, समुद्र के तल पर बैठ जाती है।
- उससे कम सघन जलराशि, जैसे NADW, उसके ऊपर एक परत बनाती है।
- सबसे हल्की जलराशियाँ सतह के पास रहती हैं।
यह परतदार संरचना महासागर को एक-दूसरे पर रखी विभिन्न तरल परतों की तरह बनाती है, जो आसानी से मिश्रित नहीं होतीं।
4. निर्माण का विशिष्ट स्रोत क्षेत्र (Specific Source Region of Formation)
प्रत्येक प्रमुख जलराशि का निर्माण एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में होता है, जहाँ सतह पर अद्वितीय वायुमंडलीय और समुद्री परिस्थितियाँ होती हैं।
- ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions): यहाँ ठंडी और सघन जलराशियों (जैसे AABW, NADW) का निर्माण होता है।
- उप-ध्रुवीय क्षेत्र (Sub-polar Regions): यहाँ कम लवणता वाली जलराशियों (जैसे AAIW) का निर्माण होता है।
- संलग्न समुद्र (Enclosed Seas): उच्च वाष्पीकरण वाले संलग्न समुद्रों में अत्यधिक खारी जलराशियों (जैसे MIW) का निर्माण होता है।
5. गुणों का संरक्षण और धीमी गति (Conservation of Properties and Slow Movement)
- गुणों का संरक्षण: एक बार जब कोई जलराशि बनकर समुद्र की गहराइयों में डूब जाती है, तो वह सतह से अलग हो जाती है। इस कारण वह अपने मूल तापमान और लवणता के गुणों को बहुत लंबे समय तक (सैकड़ों या हजारों वर्षों तक) और हजारों किलोमीटर की यात्रा के दौरान भी संरक्षित (conserve) रखती है।
- धीमी गति: गहरी जलराशियाँ बहुत धीमी गति से बहती हैं, जिन्हें वैश्विक परिसंचरण का एक चक्कर पूरा करने में लगभग 1000 वर्ष लग सकते हैं।
6. विशाल आयतन और वैश्विक प्रभाव (Large Volume and Global Impact)
प्रमुख जलराशियाँ बहुत विशाल होती हैं और महासागरों के एक बड़े हिस्से को घेरती हैं।
- वैश्विक परिसंचरण: ये जलराशियाँ मिलकर थर्मोहेलाइन परिसंचरण (वैश्विक कन्वेयर बेल्ट) का निर्माण करती हैं, जो पृथ्वी की ऊष्मा को एक स्थान से दूसरे स्थान पर वितरित करता है।
- जलवायु विनियमन: इस ऊष्मा वितरण के माध्यम से, ये वैश्विक और क्षेत्रीय जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
7. रासायनिक हस्ताक्षर (Chemical Signature)
तापमान और लवणता के अलावा, प्रत्येक जलराशि का अपना एक विशिष्ट रासायनिक हस्ताक्षर भी होता है। इसमें घुली हुई ऑक्सीजन, पोषक तत्व (जैसे सिलिकेट, फॉस्फेट, नाइट्रेट) और अन्य ट्रेस तत्वों की मात्रा शामिल होती है।
- ऑक्सीजन: सतह पर बनी जलराशियाँ ऑक्सीजन से भरपूर होती हैं और इस ऑक्सीजन को समुद्र की गहराइयों तक पहुँचाती हैं।
- पोषक तत्व: पुरानी, गहरी जलराशियाँ समय के साथ जैविक पदार्थों के अपघटन से पोषक तत्वों से समृद्ध हो जाती हैं।
जलराशियों के प्रकार (Types of Water Masses)
महासागरीय जलराशियों को मुख्य रूप से उनकी गहराई और घनत्व (Density) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। ये प्रकार महासागर की एक परतदार संरचना (Layered Structure) को दर्शाते हैं, जहाँ सबसे हल्की जलराशि सबसे ऊपर और सबसे भारी (सघन) जलराशि सबसे नीचे होती है।
जलराशियों के चार मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:
सतही जलराशियाँ और मध्य जल (Surface and Central Water Masses)
सतही जलराशियाँ (Surface Water Masses) महासागर की सबसे ऊपरी परत बनाती हैं। इनमें से एक बहुत ही महत्वपूर्ण और व्यापक प्रकार “मध्य जल” (Central Waters) है, जो दुनिया के अधिकांश महासागरों में पाया जाता है।
1. सतही जलराशियों की सामान्य विशेषताएँ (General Characteristics of Surface Water Masses)
सतही जल महासागर की वह परत है जो सीधे वायुमंडल के संपर्क में आती है, इसलिए इसके गुण वायुमंडलीय परिस्थितियों से गहरे रूप से प्रभावित होते हैं।
- स्थान और गहराई: यह महासागर की सबसे ऊपरी परत है, जो लगभग 0 से 200 मीटर की गहराई तक होती है। इस परत को “मिश्रित परत” (Mixed Layer) भी कहा जाता है, क्योंकि हवा और लहरें इसके पानी को लगातार मिश्रित करती रहती हैं।
- वायुमंडल से सीधा संपर्क: यह सूर्य की गर्मी, वर्षा, वाष्पीकरण और पवनों से सीधे प्रभावित होती है।
- सबसे अधिक परिवर्तनशील: इसका तापमान और लवणता मौसम और दिन-रात के अनुसार सबसे अधिक बदलता रहता है। सर्दियों में यह ठंडी और गर्मियों में गर्म हो जाती है।
- सबसे गर्म और कम सघन: सौर ऊर्जा को सीधे अवशोषित करने के कारण, यह महासागर की सबसे गर्म परत होती है। गर्म और अक्सर कम खारा होने के कारण यह सबसे कम सघन (lightest) होती है, और इसीलिए यह गहरे, सघन पानी के ऊपर तैरती है।
- प्रकाश-संश्लेषण का क्षेत्र: सूर्य का प्रकाश केवल इसी परत में प्रवेश कर पाता है (Photic Zone)। इसलिए, महासागर का लगभग सारा जीवन और प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis), जो समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार है, इसी परत में होता है।
2. “मध्य जल” क्या हैं? (What are Central Waters?)
मध्य जल (Central Waters) एक विशिष्ट प्रकार की सतही जलराशि है जो दुनिया के प्रमुख उप-उष्णकटिबंधीय गायरों (Subtropical Gyres) के केंद्र में बनती है। ये उत्तरी और दक्षिणी अटलांटिक, उत्तरी और दक्षिणी प्रशांत और हिंद महासागरों की सतह पर एक विशाल क्षेत्र को कवर करती हैं।
निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)
मध्य जल का निर्माण एक विशेष प्रक्रिया के माध्यम से होता है जिसे अभिसरण (Convergence) और अधोगमन (Downwelling) कहते हैं:
- उप-उष्णकटिबंधीय गायर: महासागरों में पवनें धाराओं को एक विशाल वृत्ताकार पैटर्न (गायर) में चलाती हैं। उत्तरी गोलार्ध में यह दक्षिणावर्त (clockwise) और दक्षिणी गोलार्ध में वामावर्त (counter-clockwise) होता है।
- जल का अभिसरण: धाराओं का यह वृत्ताकार प्रवाह सतह के पानी को धीरे-धीरे गायर के केंद्र की ओर धकेलता है। इससे केंद्र में पानी जमा होने लगता है और समुद्र का स्तर थोड़ा सा (कुछ सेंटीमीटर) ऊँचा हो जाता है।
- अधोगमन (Downwelling): जब केंद्र में पानी जमा हो जाता है, तो गुरुत्वाकर्षण के कारण वह नीचे की ओर डूबने (sink) लगता है। इस प्रक्रिया को अधोगमन या डाउनवेलिंग कहते हैं।
- उच्च तापमान और उच्च लवणता: गायर के केंद्र उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (Subtropics – Horse Latitudes) में स्थित होते हैं, जहाँ:
- सूर्य की किरणें तेज होती हैं, जिससे पानी गर्म हो जाता है।
- वर्षा बहुत कम होती है और वाष्पीकरण बहुत अधिक होता है, जिससे पानी की लवणता बढ़ जाती है।
इस प्रकार, उप-उष्णकटिबंधीय गायर के केंद्र में बनने वाला यह गर्म, खारा और नीचे की ओर डूबता हुआ पानी ही मध्य जल (Central Waters) कहलाता है।
प्रमुख उदाहरण (Major Examples)
- उत्तरी अटलांटिक मध्य जल (North Atlantic Central Water): यह सारगैसो सागर (Sargasso Sea) क्षेत्र में बनता है।
- दक्षिणी अटलांटिक मध्य जल (South Atlantic Central Water)
- उत्तरी प्रशांत मध्य जल (North Pacific Central Water)
- दक्षिणी प्रशांत मध्य जल (South Pacific Central Water)
- हिंद महासागर मध्य जल (Indian Ocean Central Water)
सारांश तालिका
| विशेषता | सतही जल (सामान्य) | मध्य जल (विशिष्ट प्रकार) |
| स्थान | महासागर की ऊपरी परत (0-200 मीटर) | उप-उष्णकटिबंधीय गायरों के केंद्र में |
| निर्माण | सामान्य वायुमंडलीय संपर्क से | धाराओं के अभिसरण (Convergence) और अधोगमन (Downwelling) से |
| मुख्य गुण | सबसे गर्म, सबसे हल्की, परिवर्तनशील | गर्म और खारा (उच्च लवणता) |
| स्थिरता | हवा से मिश्रित (Mixed) | अभिसरण के कारण अपेक्षाकृत स्थिर और गहरी |
मध्यवर्ती जलराशियाँ (Intermediate Water Masses)
मध्यवर्ती जलराशियाँ महासागर की परतदार संरचना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। ये सतही जल (Surface Water) के नीचे और गहरी जलराशियों (Deep Water Masses) के ऊपर पाई जाती हैं। ये एक तरह से महासागर के “मध्यम वर्ग” का निर्माण करती हैं।
- स्थान: आमतौर पर लगभग 200 से 1,500 मीटर की गहराई तक।
- घनत्व: ये सतही जल से अधिक सघन (भारी) होती हैं, लेकिन गहरे जल से कम सघन (हल्की) होती हैं।
निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)
इनका निर्माण सतही और गहरी जलराशियों से थोड़ा अलग होता है। ये भी सतह पर ही बनती हैं, लेकिन इनका घनत्व इतना अधिक नहीं होता कि ये समुद्र के तल तक डूब सकें।
- स्रोत क्षेत्र (Source Regions): इनका निर्माण मुख्य रूप से ध्रुवीय मोर्चों (Polar Fronts) या उप-ध्रुवीय क्षेत्रों (Sub-polar Regions) में होता है, जैसे अंटार्कटिक कन्वर्जेंस क्षेत्र (Antarctic Convergence Zone)।
- प्रक्रिया: इन क्षेत्रों में, ठंडा और अपेक्षाकृत कम खारा (fresh) सतही जल अपने आसपास के गर्म, अधिक खारे उपोष्णकटिबंधीय जल (Subtropical Water) की तुलना में अधिक सघन हो जाता है।
- मध्यम गहराई तक डूबना (Sinking to Intermediate Depths):
- यह सघन पानी नीचे की ओर डूबना शुरू कर देता है।
- लेकिन, यह गहरे समुद्र में पहले से मौजूद अत्यधिक सघन गहरे जल (Deep Water) की तुलना में हल्का होता है।
- इसलिए, यह समुद्र के तल तक नहीं पहुँच पाता और एक मध्यवर्ती गहराई पर रुक जाता है, जहाँ इसका घनत्व आसपास के पानी के बराबर हो जाता है। वहाँ से यह क्षैतिज रूप से (horizontally) फैलना शुरू कर देता है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
मध्यवर्ती जलराशियों की पहचान अक्सर उनकी लवणता (Salinity) की अनूठी विशेषताओं से होती है:
- न्यूनतम लवणता परत (Salinity Minimum Layer):
- कई मध्यवर्ती जलराशियाँ (जैसे AAIW) अपने ऊपर (सतही जल) और नीचे (गहरा जल) की परतों की तुलना में कम खारी होती हैं। यदि आप गहराई के साथ लवणता को मापें, तो यह एक “गिरावट” या न्यूनतम बिंदु के रूप में दिखाई देगी।
- उच्चतम लवणता परत (Salinity Maximum Layer):
- कुछ विशेष मामलों में (जैसे MIW), मध्यवर्ती जलराशि अपने ऊपर और नीचे की परतों से अधिक खारी हो सकती है, जो एक “चरम” या अधिकतम बिंदु के रूप में दिखाई देती है।
विश्व की प्रमुख मध्यवर्ती जलराशियाँ (Major Intermediate Water Masses of the World)
मध्यवर्ती जलराशियाँ (Intermediate Water Masses) महासागरों के परिसंचरण और संरचना में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये सतही और गहरे पानी के बीच स्थित होती हैं। दुनिया भर में कई प्रकार की मध्यवर्ती जलराशियाँ हैं, लेकिन दो सबसे प्रमुख और प्रभावशाली हैं: अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल (AAIW) और भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जल (MIW)।
1. अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल (Antarctic Intermediate Water – AAIW)
यह दुनिया की सबसे व्यापक (most widespread) और सबसे महत्वपूर्ण मध्यवर्ती जलराशि है, जो सभी तीन प्रमुख महासागरों—अटलांटिक, प्रशांत और हिंद—में पाई जाती है।
- प्रमुख पहचान: इसकी मुख्य पहचान इसकी न्यूनतम लवणता (Salinity Minimum) है। यह अपने ऊपर और नीचे की जलराशियों की तुलना में कम खारी होती है।
- निर्माण क्षेत्र (Formation Region):
- इसका निर्माण अंटार्कटिक ध्रुवीय मोर्चे (Antarctic Polar Front) या अंटार्कटिक कन्वर्जेंस क्षेत्र के पास होता है, जो लगभग 50° से 60° दक्षिणी अक्षांश पर स्थित है।
- इस क्षेत्र में, ठंडा, कम लवणता वाला (भारी वर्षा और बर्फ पिघलने के कारण) ध्रुवीय सतही जल, गर्म और अधिक खारे उपोष्णकटिबंधीय जल से मिलता है और उसके नीचे डूब जाता है।
- गहराई और वितरण (Depth and Distribution):
- यह लगभग 700 से 1,200 मीटर की मध्यवर्ती गहराई तक डूबता है।
- डूबने के बाद, यह उत्तर की ओर बहता है और दुनिया के सभी प्रमुख महासागरों में एक विशाल परत के रूप में फैल जाता है, जो गहरे और तलीय जल के ऊपर स्थित होता है।
2. भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जल (Mediterranean Intermediate Water – MIW)
यह एक बहुत ही अनूठी और प्रभावशाली जलराशि है, जो विशेष रूप से उत्तरी अटलांटिक महासागर को प्रभावित करती है।
- प्रमुख पहचान: इसकी मुख्य पहचान इसका अत्यधिक उच्च लवणता (Very High Salinity) और अपेक्षाकृत उच्च तापमान (High Temperature) है।
- निर्माण क्षेत्र (Formation Region):
- इसका निर्माण भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में होता है। भूमध्य सागर एक लगभग बंद बेसिन है जहाँ नदियों से आने वाले ताजे पानी की तुलना में वाष्पीकरण बहुत अधिक होता है।
- इस तीव्र वाष्पीकरण के कारण यहाँ का पानी बहुत अधिक खारा और सघन हो जाता है।
- गहराई और वितरण (Depth and Distribution):
- यह अत्यधिक सघन, गर्म और खारा पानी जिब्राल्टर जलसंधि (Strait of Gibraltar) के माध्यम से अटलांटिक महासागर में बहता है।
- यह एक “पानी के नीचे के झरने” (Underwater Waterfall) की तरह बाहर निकलता है और अपनी अनूठी घनत्व के कारण लगभग 1,000 से 1,500 मीटर की मध्यवर्ती गहराई पर स्थिर हो जाता है।
- वहाँ से यह अटलांटिक में पश्चिम की ओर एक गर्म, नमकीन “जीभ” (Salty Tongue) के रूप में फैलता है, जो उत्तरी अटलांटिक की लवणता और तापमान को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है।
अन्य प्रमुख मध्यवर्ती जलराशियाँ
- उत्तरी प्रशांत मध्यवर्ती जल (North Pacific Intermediate Water – NPIW): यह उत्तरी प्रशांत महासागर में, विशेष रूप से ओयाशियो धारा के क्षेत्र में बनता है। इसकी पहचान भी कम लवणता से होती है।
- लाल सागर मध्यवर्ती जल (Red Sea Intermediate Water – RSIW): यह MIW की तरह ही लाल सागर के उच्च वाष्पीकरण के कारण बनता है। यह गर्म और अत्यधिक खारा होता है और बाब-अल-मंदेब जलसंधि के माध्यम से हिंद महासागर में प्रवेश करता है।
सारांश तालिका
| जलराशि का नाम | संक्षेप (Abbr.) | निर्माण क्षेत्र | प्रमुख पहचान (Fingerprint) | वैश्विक प्रभाव |
| अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल | AAIW | अंटार्कटिक कन्वर्जेंस | कम लवणता (Low Salinity) | तीनों प्रमुख महासागरों में मौजूद (सबसे व्यापक)। |
| भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जल | MIW | भूमध्य सागर | उच्च लवणता, उच्च तापमान | उत्तरी अटलांटिक की संरचना को प्रभावित करती है। |
| उत्तरी प्रशांत मध्यवर्ती जल | NPIW | उत्तरी प्रशांत | कम लवणता | उत्तरी प्रशांत महासागर के लिए महत्वपूर्ण। |
| लाल सागर मध्यवर्ती जल | RSIW | लाल सागर | उच्च लवणता, उच्च तापमान | हिंद महासागर की लवणता को प्रभावित करती है। |
3. गहरी जलराशियाँ (Deep Water Masses)
गहरी जलराशियाँ महासागर की मध्यवर्ती परत (Intermediate Layer) के नीचे और तलीय परत (Bottom Layer) के ऊपर एक विशाल क्षेत्र को भरती हैं। ये पृथ्वी की जलवायु प्रणाली और महासागरीय परिसंचरण में एक केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।
- स्थान: आमतौर पर लगभग 1,500 से 4,000 मीटर की गहराई तक।
- घनत्व: ये मध्यवर्ती जल से अधिक सघन होती हैं, लेकिन तलीय जल (Bottom Water) से थोड़ी कम सघन होती हैं।
निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)
गहरी जलराशियों का निर्माण केवल दुनिया के कुछ विशिष्ट उच्च-अक्षांशीय क्षेत्रों (High-Latitude Regions) में ही होता है, जहाँ सतह का पानी इतना सघन हो जाता है कि वह हजारों मीटर नीचे डूब सकता है।
- स्रोत क्षेत्र: इनका सबसे प्रमुख निर्माण क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक महासागर है, विशेष रूप से ग्रीनलैंड, आइसलैंड और नॉर्वे के आसपास के समुद्र (जैसे ग्रीनलैंड सागर, लैब्राडोर सागर)।
- प्रक्रिया: कहानी गल्फ स्ट्रीम से शुरू होती है
- गल्फ स्ट्रीम का गर्म और अत्यधिक खारा पानी उत्तर की ओर बहता है।
- जब यह ध्रुवीय क्षेत्रों के पास पहुँचता है, तो यह अपनी ऊष्मा को ठंडी आर्कटिक हवा में खो देता है, जिससे पानी बहुत ठंडा हो जाता है।
- अब यह पानी ठंडा भी है और खारा भी, जिससे इसका घनत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है।
- यह अत्यधिक सघन (भारी) पानी अपने नीचे के कम सघन पानी की तुलना में भारी हो जाता है और महासागर की गहराइयों में डूबना (Sink) शुरू कर देता है। यही प्रक्रिया गहरी जलराशि को जन्म देती है।
विश्व की सबसे प्रमुख गहरी जलराशि
उत्तरी अटलांटिक गहरा जल (North Atlantic Deep Water – NADW)
यह दुनिया की सबसे प्रभावशाली और सबसे अधिक अध्ययन की जाने वाली गहरी जलराशि है।
- निर्माण क्षेत्र: इसका निर्माण ग्रीनलैंड सागर, लैब्राडोर सागर और नॉर्वेजियन सागर में होता है।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- तापमान: यह ठंडा होता है (लगभग 2-4°C), लेकिन सबसे ठंडी जलराशि (AABW) नहीं है।
- लवणता: इसकी पहचान इसकी उच्च लवणता (High Salinity) से होती है, जो इसे डूबने के लिए आवश्यक घनत्व प्रदान करती है।
- घनत्व: यह अत्यधिक सघन होता है, जिससे यह हजारों मीटर नीचे डूबता है और अंटार्कटिक तलीय जल (AABW) के ऊपर एक मोटी परत बनाता है।
- ऑक्सीजन की प्रचुरता: चूँकि इसका निर्माण सतह पर होता है, जहाँ यह वायुमंडल के संपर्क में रहता है, यह अपने साथ ऑक्सीजन की भरपूर मात्रा को समुद्र की गहराइयों तक ले जाता है।
- पोषक तत्वों का स्तर: शुरुआत में इसमें पोषक तत्व कम होते हैं, लेकिन जैसे-जैसे यह बहता है, सतह से गिरने वाले जैविक पदार्थों के अपघटन से यह पोषक तत्वों से भरपूर हो जाता है।
गहरी जलराशियों का वैश्विक महत्व
NADW जैसी गहरी जलराशियाँ केवल पानी की एक गहरी परत नहीं हैं; वे पूरी पृथ्वी प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- वैश्विक कन्वेयर बेल्ट का इंजन (Engine of the Global Conveyor Belt):
- NADW का डूबना ही थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation) या वैश्विक कन्वेयर बेल्ट को चलाने वाली मुख्य शक्ति है।
- जब NADW डूबता है, तो यह सतह के पानी को अपनी जगह लेने के लिए खींचता है, जिससे धाराओं का एक वैश्विक चक्र शुरू होता है जो लगभग 1000 वर्षों तक चलता है।
- जलवायु का विनियमन (Climate Regulation):
- यह कन्वेयर बेल्ट उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्मी को ध्रुवों की ओर ले जाकर दुनिया भर में ऊष्मा का पुनर्वितरण करती है। यह प्रक्रिया वैश्विक जलवायु को रहने योग्य बनाए रखने में मदद करती है।
- गहरे समुद्र के जीवन का समर्थन (Supporting Deep-Sea Life):
- NADW द्वारा लाई गई ऑक्सीजन समुद्र की गहराइयों में रहने वाले जीवों के लिए जीवनदायिनी है, जहाँ प्रकाश-संश्लेषण संभव नहीं है।
अन्य गहरी जलराशियाँ
- सर्कमपोलर डीप वाटर (Circumpolar Deep Water – CDW): यह दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) की एक प्रमुख जलराशि है, जो वास्तव में NADW, AABW और अन्य जलराशियों का एक जटिल मिश्रण है।
- प्रशांत और हिंद महासागरों में गहरी जल का निर्माण बहुत कम या न के बराबर होता है, क्योंकि वहाँ की सतह का पानी उतना खारा नहीं होता कि ठंडा होने पर डूब सके। इसलिए, इन महासागरों का गहरा पानी मुख्य रूप से दक्षिणी महासागर से आता है।
4. तलीय जलराशियाँ (Bottom Water Masses)
तलीय जलराशियाँ महासागर की सबसे निचली, सबसे गहरी और सबसे सघन परत का निर्माण करती हैं। ये पृथ्वी पर सबसे चरम समुद्री परिस्थितियों में बनती हैं और दुनिया के सभी प्रमुख महासागरों के गहरे बेसिन को भर देती हैं।
- स्थान: आमतौर पर 4,000 मीटर से लेकर समुद्र के तल तक।
- घनत्व: ये महासागर में मौजूद सबसे भारी और सबसे सघन जलराशियाँ हैं।
निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)
इनका निर्माण केवल अंटार्कटिका के आसपास के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में होता है, जहाँ परिस्थितियाँ इतनी चरम होती हैं कि पानी को अधिकतम संभव घनत्व तक पहुँचाया जा सकता है।
- स्रोत क्षेत्र (Source Regions): इनका प्रमुख निर्माण स्थल अंटार्कटिका की महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelves) है, विशेष रूप से वेडेल सागर (Weddell Sea) और रॉस सागर (Ross Sea) में।
- प्रक्रिया: समुद्री बर्फ और नमक का खेल
- पॉलीनिया (Polynya): इन क्षेत्रों में, तेज और ठंडी कैटाबैटिक पवनें (Katabatic winds) अंटार्कटिका के ग्लेशियरों से नीचे की ओर बहती हैं। ये पवनें समुद्र की सतह पर ताज़ी बनी बर्फ को लगातार दूर धकेलती रहती हैं, जिससे पानी का एक खुला क्षेत्र बन जाता है जिसे पॉलीनिया कहते हैं।
- अत्यधिक शीतलन और बर्फ निर्माण: यह खुला पानी अब सीधे तौर पर अत्यधिक ठंडी हवा के संपर्क में आता है, जिससे बहुत तेजी से नई समुद्री बर्फ बनती है।
- ब्राइन रिजेक्शन (Brine Rejection – नमक का बाहर निकलना): जब समुद्री जल जमता है, तो यह अपने क्रिस्टल संरचना से नमक को बाहर निकाल देता है। यह अत्यधिक खारा और ठंडा पानी (जिसे ब्राइन कहते हैं) बर्फ के नीचे बच जाता है।
- घनत्व में चरम वृद्धि: यह ब्राइन पानी अत्यधिक ठंडा (हिमांक के करीब, लगभग -1.9°C) और अत्यधिक खारा होता है। इन दो कारकों का संयोजन इसे पृथ्वी पर बनने वाला सबसे सघन समुद्री जल बना देता है।
- महाद्वीपीय शेल्फ से नीचे की ओर बहाव:
- यह सुपर-डेंस (अति-सघन) पानी महाद्वीपीय शेल्फ के तल पर जमा हो जाता है और फिर गुरुत्वाकर्षण के कारण ढलान से नीचे की ओर एक “अंडरवाटर कैस्केड” (पानी के नीचे का झरना) के रूप में गहरे समुद्री बेसिन में गिरना शुरू कर देता है।
विश्व की सबसे प्रमुख तलीय जलराशि
अंटार्कटिक तलीय जल (Antarctic Bottom Water – AABW)
यह दुनिया की एकमात्र महत्वपूर्ण और सबसे प्रभावशाली तलीय जलराशि है।
- निर्माण क्षेत्र: मुख्य रूप से वेडेल और रॉस सागर (अंटार्कटिका)।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- तापमान: यह पृथ्वी की सबसे ठंडी जलराशि है, जिसका तापमान -0.5°C से -1.9°C के बीच होता है (यह खारेपन के कारण तरल रहती है)।
- लवणता: यह बहुत खारी होती है, लेकिन उत्तरी अटलांटिक गहरे जल (NADW) जितनी खारी नहीं होती। इसका अत्यधिक घनत्व मुख्य रूप से इसके चरम ठंडे तापमान के कारण होता है।
- घनत्व: यह पृथ्वी की सबसे सघन (heaviest) जलराशि है।
- ऑक्सीजन की मात्रा: चूँकि यह सतह पर बनती है, यह ऑक्सीजन से भरपूर होती है और गहरे समुद्र में जीवन के लिए ऑक्सीजन पहुँचाती है।
तलीय जलराशियों का वैश्विक महत्व
- महासागरीय बेसिन को भरना (Filling the Ocean Basins):
- AABW इतनी सघन होती है कि यह समुद्र के तल पर बैठ जाती है और दुनिया के सभी प्रमुख महासागरों—अटलांटिक, प्रशांत और हिंद—के सबसे गहरे हिस्सों को धीरे-धीरे भर देती है।
- यह बहुत धीमी गति से उत्तर की ओर बहती है, जिसमें हजारों वर्ष लग सकते हैं।
- गहरे परिसंचरण को चलाना (Driving Deep Circulation):
- AABW का बनना और डूबना थर्मोहेलाइन परिसंचरण (वैश्विक कन्वेयर बेल्ट) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह NADW जैसी गहरी जलराशियों को ऊपर की ओर उठने के लिए मजबूर करती है, जिससे एक वैश्विक परिसंचरण चक्र पूरा होता है।
- समुद्री जीवन और रसायन विज्ञान पर प्रभाव (Impact on Marine Life and Chemistry):
- AABW अपने साथ ऑक्सीजन को समुद्र के सबसे गहरे हिस्सों तक ले जाती है, जिससे वहाँ भी जीवन संभव हो पाता है।
- यह अपने निर्माण क्षेत्र से पोषक तत्वों (विशेष रूप से सिलिकेट्स) को भी गहरे समुद्र में वितरित करती है, जो कुछ समुद्री जीवों के लिए आवश्यक हैं।
संक्षेप में, अंटार्कटिक तलीय जल पृथ्वी पर सबसे चरम परिस्थितियों में बनता है और महासागरों के सबसे गहरे, अंधेरे कोनों को भरकर वैश्विक जलवायु और समुद्री जीवन में एक मौलिक भूमिका निभाता है।
सारांश तालिका
| प्रकार (Type) | प्रमुख उदाहरण (Key Example) | निर्माण क्षेत्र (Formation Region) | मुख्य पहचान (Key Characteristic) |
| सतही जल (Surface) | मध्य जल (Central Waters) | उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय | सबसे गर्म, सबसे हल्की, परिवर्तनशील |
| मध्यवर्ती जल (Intermediate) | अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल (AAIW) | उप-ध्रुवीय क्षेत्र (Sub-polar regions) | कम लवणता (Low Salinity) |
| गहरा जल (Deep) | उत्तरी अटलांटिक गहरा जल (NADW) | उत्तरी अटलांटिक | बहुत ठंडा और सघन |
| तलीय जल (Bottom) | अंटार्कटिक तलीय जल (AABW) | अंटार्कटिका | सबसे ठंडा, सबसे खारा, सबसे सघन |
विश्व की प्रमुख जलराशियाँ (Major Water Masses of the World)
महासागरों में जलराशियाँ गहराई के अनुसार परतों में व्यवस्थित होती हैं। सबसे हल्की सतह पर और सबसे भारी (सघन) तल पर। यहाँ कुछ प्रमुख वैश्विक जलराशियाँ हैं:
| जलराशि का प्रकार | प्रमुख जलराशि का नाम | संक्षेप (Abbr.) | निर्माण क्षेत्र | विशेषताएँ (तापमान/लवणता/घनत्व) |
| मध्यवर्ती जल (Intermediate) | अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल (Antarctic Intermediate Water) | AAIW | अंटार्कटिक कन्वर्जेंस क्षेत्र | ठंडा, कम लवणता, मध्यम घनत्व। यह सभी महासागरों में पाया जाता है। |
| भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जल (Mediterranean Intermediate Water) | MIW | भूमध्य सागर | गर्म, अत्यधिक खारा, सघन। यह अटलांटिक महासागर में बहता है। | |
| गहरा जल (Deep Water) | उत्तरी अटलांटिक गहरा जल (North Atlantic Deep Water) | NADW | उत्तरी अटलांटिक (ग्रीनलैंड, लैब्राडोर सागर) | अपेक्षाकृत गर्म लेकिन खारा, अत्यधिक सघन। वैश्विक कन्वेयर बेल्ट का मुख्य चालक। |
| तलीय जल (Bottom Water) | अंटार्कटिक तलीय जल (Antarctic Bottom Water) | AABW | अंटार्कटिका (वेडेल और रॉस सागर) | अत्यधिक ठंडा ( हिमांक के पास), खारा। दुनिया की सबसे सघन जलराशि। |
जलराशियों का महत्व (Significance of Water Masses)
- वैश्विक महासागरीय परिसंचरण (Global Ocean Circulation): विभिन्न घनत्व वाली ये जलराशियाँ ही थर्मोहेलाइन परिसंचरण या “महासागरीय कन्वेयर बेल्ट” को चलाती हैं। सघन पानी ध्रुवों पर डूबता है और भूमध्य रेखा की ओर बहता है, जो वैश्विक धाराओं की एक धीमी लेकिन शक्तिशाली प्रणाली बनाता है।
- जलवायु का विनियमन (Climate Regulation): यह कन्वेयर बेल्ट दुनिया भर में गर्मी का पुनर्वितरण करती है, जिससे पृथ्वी का मौसम और जलवायु संतुलित रहती है।
- पोषक तत्वों का वितरण (Nutrient Distribution): गहरी जलराशियाँ पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं। जब यह पानी अपवेलिंग (Upwelling) की प्रक्रिया द्वारा सतह पर आता है, तो यह समुद्री जीवन (विशेषकर प्लैंकटन) के लिए भोजन प्रदान करता है, जिससे प्रमुख मत्स्य क्षेत्र बनते हैं।
- ऑक्सीजन का परिवहन (Oxygen Transport): ध्रुवों पर डूबने वाला ठंडा पानी अपने साथ ऑक्सीजन को महासागर की गहराइयों तक ले जाता है, जो गहरे समुद्री जीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
संक्षेप में, Water Masses महासागरों की परतदार संरचना और वैश्विक परिसंचरण की मूलभूत इकाइयाँ हैं, जो पृथ्वी की जलवायु और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को गहराई से प्रभावित करती हैं।
लहरें / तरंगें (Waves)
महासागरीय लहरें, जिन्हें तरंगें भी कहा जाता है, समुद्र की सतह पर होने वाली हलचल या उतार-चढ़ाव हैं। यह महासागरों की सबसे सामान्य और प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाली गति है।
सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा: लहरें ऊर्जा का स्थानांतरण (transfer of energy) हैं, पानी का स्थानांतरण नहीं। पानी के कण लहर के साथ आगे नहीं बढ़ते, बल्कि वे एक वृत्ताकार गति में घूमते हुए ऊर्जा को आगे बढ़ाते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे आप एक रस्सी के एक छोर को ऊपर-नीचे हिलाते हैं; लहर रस्सी के साथ आगे बढ़ती है, लेकिन रस्सी का कोई भी हिस्सा अपनी जगह से आगे नहीं जाता।
तरंग की संरचना (Anatomy of a Wave)
किसी भी लहर के निम्नलिखित प्रमुख भाग होते हैं:
- शिखर या श्रृंग (Crest): लहर का सबसे ऊँचा बिंदु।
- गर्त (Trough): दो शिखरों के बीच का सबसे निचला बिंदु।
- तरंग की ऊँचाई (Wave Height): शिखर (Crest) और गर्त (Trough) के बीच की ऊर्ध्वाधर (vertical) दूरी।
- तरंगदैर्ध्य (Wavelength): दो लगातार शिखरों (crests) या गर्तों (troughs) के बीच की क्षैतिज (horizontal) दूरी।
- तरंग अवधि (Wave Period): किसी एक बिंदु से दो लगातार शिखरों के गुजरने में लगने वाला समय।
लहरों का निर्माण और उत्पत्ति के कारण (Formation and Causes of Waves)
महासागरीय लहरों की उत्पत्ति विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों द्वारा होती है। इनमें सबसे प्रमुख और सामान्य कारण पवन है, लेकिन अन्य शक्तिशाली घटनाएँ भी विशाल और विनाशकारी लहरों को जन्म दे सकती हैं।
1. पवन (Wind) – सबसे सामान्य कारण
अधिकांश समुद्री लहरों का निर्माण पवन के समुद्र की सतह के साथ घर्षण के कारण होता है। यह एक चरणबद्ध प्रक्रिया है:
- प्रारंभिक घर्षण: जब हवा पानी की शांत सतह पर बहना शुरू करती है, तो घर्षण के कारण सतह पर छोटी-छोटी लहरदार आकृतियाँ (Ripples or Capillary Waves) बनती हैं।
- ऊर्जा का स्थानांतरण: यदि हवा लगातार बहती रहती है, तो वह इन छोटी लहरों के ऊँचे उठे हिस्से पर अधिक दबाव डालती है। इससे हवा अपनी ऊर्जा को पानी में स्थानांतरित करती है।
- लहर का विकास: जैसे-जैसे अधिक ऊर्जा स्थानांतरित होती है, छोटी लहरें गुरुत्वाकर्षण तरंगों (Gravity Waves) में बदलने लगती हैं – यानी, वे बड़ी और अधिक संगठित होने लगती हैं।
- पूर्ण विकसित समुद्र (Fully Developed Sea): जब लहरें हवा से और अधिक ऊर्जा प्राप्त नहीं कर पाती हैं (क्योंकि वे हवा की गति से चलने लगती हैं), तो वे अपनी अधिकतम संभावित ऊँचाई तक पहुँच जाती हैं।
एक पवन-चालित लहर का आकार और शक्ति तीन मुख्य कारकों पर निर्भर करती है:
- पवन की गति (Wind Speed): हवा जितनी तेज चलेगी, लहरें उतनी ही शक्तिशाली और ऊँची होंगी।
- पवन की अवधि (Duration of Wind): हवा जितने लंबे समय तक एक ही दिशा में बहेगी, लहरों को ऊर्जा इकट्ठा करने का उतना ही अधिक समय मिलेगा।
- फ़ेच (Fetch): यह समुद्र के उस विशाल, खुले क्षेत्र की लंबाई है जिस पर हवा बिना किसी बाधा के बहती है। फ़ेच जितना लंबा होगा, लहरों के पास बड़ा होने का उतना ही अधिक अवसर होगा। दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) में विशाल फ़ेच के कारण ही दुनिया की कुछ सबसे बड़ी लहरें बनती हैं।
2. भूवैज्ञानिक घटनाएँ (Geological Events) – सबसे विनाशकारी लहरों का कारण
कुछ सबसे बड़ी और सबसे खतरनाक लहरें समुद्र के तल पर होने वाली अचानक और शक्तिशाली घटनाओं से उत्पन्न होती हैं।
- भूकंप (Earthquakes):
- जब समुद्र तल के नीचे की टेक्टोनिक प्लेटें खिसकती हैं और भूकंप आता है, तो वे अपने ऊपर स्थित पानी की एक विशाल मात्रा को अचानक विस्थापित (displace) कर देती हैं।
- यह विस्थापित पानी सुनामी (Tsunami) को जन्म देता है। सुनामी की तरंगदैर्ध्य बहुत लंबी होती है (सैकड़ों किलोमीटर) और यह गहरे समुद्र में बहुत तेज गति (जेट प्लेन की गति तक) से यात्रा करती है। गहरे समुद्र में इसकी ऊँचाई कम होती है, लेकिन तट पर पहुँचते ही यह एक विशालकाय दीवार का रूप ले लेती है।
- पनडुब्बी ज्वालामुखी विस्फोट (Submarine Volcanic Eruptions):
- समुद्र के नीचे ज्वालामुखी विस्फोट से भी भारी मात्रा में पानी विस्थापित होता है और सुनामी उत्पन्न हो सकती है।
- पनडुब्बी भूस्खलन (Submarine Landslides):
- जब महाद्वीपीय ढलानों (Continental Slopes) पर या पनडुब्बी पहाड़ों पर तलछट का एक बड़ा हिस्सा अचानक खिसक जाता है, तो यह भी सुनामी पैदा कर सकता है।
3. गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Forces)
- ज्वार-भाटा (Tides):
- चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी के महासागरों पर खिंचाव डालता है, जिससे ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है।
- ज्वार वास्तव में बहुत लंबी तरंगदैर्ध्य (पृथ्वी की परिधि की आधी) वाली एक विशाल ज्वारीय तरंग (Tidal Wave) है जो महासागरों में घूमती है।
- आमतौर पर, हम इसे समुद्र के स्तर के धीमे उतार-चढ़ाव के रूप में देखते हैं, लेकिन कुछ संकरी खाड़ियों या नदियों (जैसे चीन की कियानतांग नदी) में यह एक दिखाई देने वाली लहर के रूप में आगे बढ़ती है, जिसे ज्वारीय बोर (Tidal Bore) कहते हैं।
4. अन्य कारण (Other Causes)
- मौसम संबंधी घटनाएँ (Meteorological Events):
- तूफानों (जैसे हरिकेन और चक्रवात) के दौरान निम्न वायुदाब और तेज हवाएं समुद्र के स्तर को सामान्य से बहुत ऊपर उठा देती हैं। जब यह ऊँचा उठा पानी तट से टकराता है, तो उसे तूफानी लहर (Storm Surge) कहते हैं। यह ज्वार-भाटे के साथ मिलकर और भी विनाशकारी हो सकता है।
- हिमखंडों का गिरना या ग्लेशियरों का टूटना (Calving of Icebergs):
- जब ग्लेशियरों या बर्फ की चट्टानों से बड़े-बड़े हिमखंड टूटकर समुद्र में गिरते हैं, तो वे भी स्थानीय रूप से बड़ी लहरें पैदा कर सकते हैं।
- मानव गतिविधियाँ (Human Activities):
- जहाजों और नावों के चलने से भी उनके पीछे छोटी-छोटी लहरें (Wake) बनती हैं।
संक्षेप में, जबकि दैनिक समुद्री लहरों का मुख्य स्रोत पवन है, सबसे असाधारण और खतरनाक लहरें पृथ्वी के नीचे (भूकंप) या आकाश में (गुरुत्वाकर्षण) होने वाली शक्तिशाली घटनाओं से उत्पन्न होती हैं।
लहर का आकार तीन मुख्य कारकों पर निर्भर करता है:
- पवन की गति (Wind Speed): हवा जितनी तेज होगी, लहरें उतनी ही बड़ी होंगी।
- पवन की अवधि (Wind Duration): हवा जितने अधिक समय तक चलेगी, लहरें उतनी ही अधिक ऊर्जा संचित करेंगी और बड़ी होंगी।
- फ़ेच (Fetch): यह समुद्र के उस विशाल क्षेत्र की दूरी है जिस पर हवा बिना किसी रुकावट के एक ही दिशा में बहती है। फ़ेच जितना लंबा होगा, लहरें उतनी ही बड़ी होंगी।
तरंगों की गति: ऊर्जा का स्थानांतरण (Wave Motion: The Transfer of Energy)
यह लहरों के व्यवहार की सबसे मूलभूत और अक्सर गलत समझी जाने वाली अवधारणा है। लहरों को देखकर ऐसा लगता है कि पानी खुद एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहा है, लेकिन वास्तविकता इससे बहुत अलग है।
मुख्य सिद्धांत:
एक लहर पानी के माध्यम से गति करती ऊर्जा (Energy travelling through the water) है, न कि स्वयं गति करता हुआ पानी (Water travelling itself)। लहर के गुजरने पर पानी के कण मुख्य रूप से अपनी जगह पर ही रहते हैं।
जल कणों की वास्तविक गति: वृत्ताकार कक्षा (The Real Motion of Water Particles: Circular Orbit)
जब एक लहर गहरे, खुले समुद्र में यात्रा करती है, तो उसके नीचे का प्रत्येक जल कण एक स्थिर वृत्ताकार पथ (Circular Orbital Path) पर चलता है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है:
- जैसे ही लहर का शिखर (Crest) आता है: पानी का कण लहर की दिशा में ऊपर और आगे की ओर धकेला जाता है।
- जैसे ही लहर का शिखर गुजर जाता है: कण अपनी कक्षा में नीचे और आगे की ओर जाता है।
- जैसे ही गर्त (Trough) आता है: कण अपने पथ के सबसे निचले बिंदु पर होता है और नीचे और पीछे की ओर जाता है।
- जैसे ही गर्त गुजर जाता है: कण वापस अपनी मूल स्थिति में ऊपर और पीछे की ओर जाता है।
यह वृत्ताकार नृत्य पूरा होने के बाद, जल कण लगभग वहीं समाप्त होता है जहाँ से उसने शुरू किया था। आगे जो बढ़ा है, वह केवल ऊर्जा का “आकार” या “रूप” (the wave form) है, पानी का ढेर नहीं।
रोजमर्रा के जीवन से एक उदाहरण:
यह एक स्टेडियम में होने वाले “मैक्सिकन वेव” (Mexican Wave) की तरह है। लोग अपनी सीटों पर खड़े होते हैं और फिर बैठ जाते हैं, जिससे एक लहर बनती है जो स्टेडियम में घूमती है। यहाँ, लहर (ऊर्जा) ने तो स्टेडियम का चक्कर लगा लिया, लेकिन कोई भी व्यक्ति अपनी सीट से आगे नहीं बढ़ा।
ऊर्जा का स्थानांतरण कैसे होता है?
पवन द्वारा (या किसी अन्य स्रोत द्वारा) प्रदान की गई ऊर्जा एक जल कण से दूसरे में स्थानांतरित होती है। प्रत्येक कण अपने पड़ोसियों को धक्का देकर अपनी वृत्ताकार गति में शामिल कर लेता है, और इस तरह ऊर्जा लहर के रूप में आगे बढ़ती जाती है।
गहराई के साथ गति में परिवर्तन (Change in Motion with Depth)
- जल कणों की यह वृत्ताकार गति सतह पर सबसे बड़ी होती है।
- जैसे-जैसे हम गहराई में जाते हैं, वृत्ताकार कक्षा का आकार (diameter) तेजी से छोटा होता जाता है।
- एक निश्चित गहराई के बाद, लहर का प्रभाव लगभग शून्य हो जाता है। यह गहराई लगभग लहर के तरंगदैर्ध्य की आधी (Half of its Wavelength) होती है। इस गहराई को वेव बेस (Wave Base) कहते हैं।
महत्व:
इसका मतलब है कि तूफानी मौसम में भी, एक पनडुब्बी (Submarine) शांत पानी का अनुभव कर सकती है यदि वह वेव बेस के नीचे पर्याप्त गहराई पर हो, क्योंकि सतह की हलचल वहाँ तक नहीं पहुँचती है।
उथले पानी में व्यवहार का बदलना (Change of Behaviour in Shallow Water)
यह पूरी तरह से बदल जाता है जब लहर उथले पानी (तट के पास) में पहुँचती है।
- जब पानी की गहराई वेव बेस से कम हो जाती है, तो वृत्ताकार गति का निचला हिस्सा समुद्र तल से टकराने लगता है।
- इस घर्षण के कारण:
- जल कणों की वृत्ताकार गति अण्डाकार (Elliptical) हो जाती है।
- लहर की ऊर्जा आगे तो बढ़ती है, लेकिन अब पानी का भी कुछ शुद्ध आगे की ओर विस्थापन (Net forward displacement) होता है।
- लहर का टूटना: अंत में, लहर टूट जाती है, और ऊर्जा का स्थानांतरण समाप्त हो जाता है। अब, पानी और ऊर्जा दोनों एक साथ समुद्र तट पर स्वैश (Swash) के रूप में चढ़ते हैं। तट पर हमें जो पानी की वास्तविक गति दिखाई देती है, वह लहर के टूटने का ही परिणाम है, न कि गहरे समुद्र की तरंग गति का।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, गहरे समुद्र में लहरें पानी के माध्यम से यात्रा करती ऊर्जा का एक सुंदर उदाहरण हैं, जहाँ पानी के कण वृत्ताकार नृत्य करते हुए ऊर्जा को आगे भेजते हैं। केवल जब ये लहरें तट पर पहुँचकर टूटती हैं, तभी ऊर्जा के साथ-साथ पानी का भी बड़े पैमाने पर स्थानांतरण होता है।
जब लहरें तट पर पहुँचती हैं: तरंग का टूटना (When Waves Reach the Shore: Breaking of a Wave)
जब एक लहर गहरे पानी से उथले पानी (तट के पास) में प्रवेश करती है, तो उसका व्यवहार बदल जाता है।
- “महसूस करना”: जब पानी की गहराई लहर के तरंगदैर्ध्य (wavelength) के आधे से कम हो जाती है, तो लहर का निचला हिस्सा समुद्र तल से घर्षण करना शुरू कर देता है।
- गति में परिवर्तन: इस घर्षण के कारण लहर का निचला हिस्सा धीमा हो जाता है, जबकि ऊपरी हिस्सा (शिखर) अभी भी तेज गति से चलता रहता है।
- आकार में परिवर्तन:
- लहर की गति (speed) कम हो जाती है।
- उसका तरंगदैर्ध्य (wavelength) छोटा हो जाता है।
- उसकी ऊँचाई (height) बढ़ जाती है।
- टूटना (Breaking): अंततः, लहर का शिखर इतना ऊँचा और अस्थिर हो जाता है कि वह आगे की ओर गिर जाता है, जिसे “लहर का टूटना” (Breaking of a Wave) कहते हैं। तट पर हम जो झागदार लहरें देखते हैं, वे यही टूटी हुई लहरें होती हैं।
- स्वैश और बैकवॉश (Swash and Backwash):
- स्वैश (Swash): लहर टूटने के बाद जो पानी समुद्र तट पर ऊपर की ओर चढ़ता है।
- बैकवॉश (Backwash): गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस समुद्र की ओर लौटने वाला पानी।
लहरों के प्रकार (Types of Waves)
| प्रकार का आधार | प्रकार | विवरण |
| निर्माण के आधार पर | पवन-चालित लहरें (Wind Waves) | सबसे आम, हवा के घर्षण से बनती हैं। |
| सुनामी (Tsunami) | समुद्र तल पर भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट या भूस्खलन के कारण बनने वाली अत्यधिक लंबी तरंगदैर्ध्य वाली विनाशकारी लहरें। इन्हें ज्वारीय तरंग कहना गलत है। | |
| ज्वारीय तरंगें (Tidal Waves) | चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न ज्वार-भाटे से संबंधित। ये वास्तव में बहुत लंबी लहरें हैं। कुछ संकरी नदियों में ज्वारीय बोर (Tidal Bore) के रूप में दिखाई देती हैं। | |
| टूटने के आधार पर | स्पिलिंग ब्रेकर्स (Spilling Breakers) | ये धीरे-धीरे और झाग के साथ टूटती हैं। आमतौर पर कोमल ढलान वाले समुद्र तटों पर बनती हैं। |
| प्लंजनिंग ब्रेकर्स (Plunging Breakers) | ये तेजी से टूटती हैं और एक “बैरल” या “ट्यूब” बनाती हैं। ये खड़ी ढलान वाले तटों पर बनती हैं (सर्फिंग के लिए प्रसिद्ध)। |
लहरों का महत्व और प्रभाव (Importance and Effects of Waves)
महासागरीय लहरें केवल पानी का उतार-चढ़ाव नहीं हैं, बल्कि ये एक शक्तिशाली प्राकृतिक शक्ति हैं जिनका तटीय भू-आकृतियों, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव गतिविधियों पर गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ता है।
1. तटीय भू-आकृतियों का निर्माण और परिवर्तन (Formation and Modification of Coastal Landforms)
लहरें तटीय क्षेत्रों को आकार देने वाली सबसे प्रमुख एजेंट हैं। यह कार्य दो मुख्य प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है: अपरदन (Erosion) और निक्षेपण (Deposition)।
क. अपरदनात्मक प्रभाव (Erosional Effects):
- समुद्री क्लिफ (Sea Cliffs): लगातार चट्टानी तटों से टकराकर, लहरें उनके आधार को कमजोर करती हैं (हाइड्रोलिक एक्शन और घर्षण द्वारा), जिससे खड़ी चट्टानी दीवारें बनती हैं जिन्हें क्लिफ कहा जाता है।
- समुद्री गुफाएँ, मेहराब और स्टैक (Sea Caves, Arches, and Stacks): लहरें कमजोर चट्टानों को काटकर पहले गुफाएँ बनाती हैं। जब गुफा आर-पार हो जाती है, तो मेहराब (Arch) बनता है। जब मेहराब की छत गिर जाती है, तो चट्टान का बचा हुआ खंभा स्टैक (Stack) कहलाता है।
- वेव-कट प्लेटफॉर्म (Wave-cut Platforms): जैसे-जैसे क्लिफ पीछे हटता है, उसके सामने एक सपाट, चट्टानी सतह का निर्माण होता है, जिसे वेव-कट प्लेटफॉर्म कहते हैं।
ख. निक्षेपात्मक प्रभाव (Depositional Effects):
- पुलिन (Beaches): लहरें अपने साथ लाई गई रेत, बजरी और कंकड़ को तटों पर जमा करती हैं, जिससे पुलिन या समुद्र तट (बीच) का निर्माण होता है।
- स्पिट और बार (Spits and Bars): जब लहरें तट के साथ एक कोण पर चलती हैं, तो वे अपने साथ तलछट (sediment) भी ले जाती हैं। जब तट मुड़ता है, तो यह तलछट आगे जमा होकर एक संकरी भू-आकृति बनाती है जिसे स्पिट कहते हैं। जब एक स्पिट एक खाड़ी (Bay) के मुँह को पूरी तरह से बंद कर देता है, तो उसे बार (Bar) कहा जाता है।
- रोधिका द्वीप (Barrier Islands): ये तट के समानांतर रेत के लंबे, संकरे द्वीप होते हैं जो लहरों द्वारा तलछट के निक्षेपण से बनते हैं। ये मुख्य भूमि को तूफानी लहरों से बचाते हैं।
2. पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance)
- ऑक्सीजन का मिश्रण (Mixing of Oxygen): लहरों की गति समुद्र की सतह पर ऑक्सीजन को पानी में घोलने में मदद करती है, जो समुद्री जीवन के लिए आवश्यक है।
- पोषक तत्वों का वितरण (Distribution of Nutrients): तटीय क्षेत्रों में, लहरें पानी को हिलाती हैं, जिससे पोषक तत्व और छोटे जीव (जैसे प्लैंकटन) वितरित होते हैं, जो समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं।
- अंतर्ज्वारीय क्षेत्र का निर्माण (Creation of Intertidal Zones): लहरें उस क्षेत्र को प्रभावित करती हैं जो उच्च और निम्न ज्वार के बीच में होता है। यह एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है जहाँ जीव पानी और हवा दोनों में रहने के लिए अनुकूलित होते हैं।
- प्रवाल भित्तियों पर प्रभाव (Impact on Coral Reefs): सामान्य लहरें प्रवाल भित्तियों को साफ रखने और पोषक तत्व लाने में मदद करती हैं, लेकिन अत्यधिक शक्तिशाली तूफानी लहरें उन्हें नष्ट भी कर सकती हैं।
3. मानव जीवन पर प्रभाव (Impact on Human Life)
क. सकारात्मक प्रभाव (Positive Impacts):
- मनोरंजन और पर्यटन (Recreation and Tourism): लहरें सर्फिंग, बॉडीबोर्डिंग और अन्य जल क्रीड़ाओं के लिए आधार प्रदान करती हैं, जो दुनिया भर में तटीय पर्यटन का एक बड़ा आकर्षण हैं।
- नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy): लहरों में निहित गतिज ऊर्जा का उपयोग बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है, जिसे तरंग ऊर्जा (Wave Energy) कहते हैं। यह ऊर्जा का एक स्वच्छ और नवीकरणीय स्रोत है।
- बंदरगाहों और नेविगेशन पर प्रभाव: लहरों का पैटर्न बंदरगाहों के डिजाइन और जहाजों के नेविगेशन को प्रभावित करता है। शांत क्षेत्रों में प्राकृतिक बंदरगाह अधिक सफल होते हैं।
ख. नकारात्मक प्रभाव (Negative Impacts):
- तटीय अपरदन और संपत्ति का नुकसान (Coastal Erosion and Property Damage): लगातार अपरदन के कारण तटीय भूमि का क्षय होता है, जिससे तट के पास बने घरों, सड़कों और बुनियादी ढाँचे को खतरा होता है।
- तूफानी लहरें (Storm Surges): तूफानों (जैसे चक्रवात या हरिकेन) के दौरान, शक्तिशाली हवाएं और निम्न वायुदाब समुद्र के स्तर को सामान्य से बहुत अधिक बढ़ा देते हैं। ये विशाल लहरें तटीय क्षेत्रों में भारी बाढ़ और विनाश का कारण बन सकती हैं।
- सुनामी (Tsunamis): समुद्र तल पर भूकंप जैसी घटनाओं से उत्पन्न होने वाली विनाशकारी लहरें तटों पर भारी तबाही मचा सकती हैं, जैसा कि 2004 में हिंद महासागर में और 2011 में जापान में देखा गया।
- जहाजों के लिए खतरा: अत्यधिक ऊँची और शक्तिशाली लहरें (“Rogue Waves”) खुले समुद्र में बड़े से बड़े जहाजों के लिए भी खतरा पैदा कर सकती हैं।
संक्षेप में, लहरें एक दोधारी तलवार की तरह हैं: वे रचनात्मक और विनाशकारी दोनों हैं। वे हमारे ग्रह के तटों को लगातार आकार देती हैं, समुद्री जीवन का समर्थन करती हैं और मानव समाज के लिए अवसर और खतरे दोनों प्रस्तुत करती हैं।
ज्वार-भाटा (Tides)
ज्वार-भाटा समुद्र के जल स्तर का एक नियमित और पूर्वानुमानित (predictable) उतार-चढ़ाव है, जो मुख्य रूप से चंद्रमा (Moon) और कुछ हद तक सूर्य (Sun) के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव (Gravitational Pull) के कारण होता है। यह पृथ्वी के महासागरों की सबसे लंबी लहर है, जिसकी तरंगदैर्ध्य (wavelength) पृथ्वी की परिधि की आधी होती है।
- ज्वार (Tide / High Tide): समुद्र के जल स्तर का ऊपर उठना और तट की ओर आगे बढ़ना।
- भाटा (Ebb / Low Tide): समुद्र के जल स्तर का नीचे गिरना और तट से पीछे हटना।
ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के कारण (Causes for the Origin of Tides)
ज्वार-भाटा की उत्पत्ति पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के बीच कार्य करने वाले जटिल गुरुत्वाकर्षण बलों और गति का परिणाम है। इसे समझने के लिए तीन मुख्य बलों को जानना आवश्यक है:
1. चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force of the Moon)
यह ज्वार-भाटा उत्पन्न करने वाला सबसे प्रमुख और शक्तिशाली कारक है।
- मूल सिद्धांत: न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम के अनुसार, कोई भी दो वस्तुएँ एक-दूसरे को आकर्षित करती हैं। यह आकर्षण बल वस्तुओं के द्रव्यमान के समानुपाती और उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- प्रभाव:
- चंद्रमा अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से पृथ्वी को अपनी ओर खींचता है।
- चूंकि पृथ्वी ठोस है, इसलिए वह ज्यादा प्रभावित नहीं होती। लेकिन पृथ्वी पर मौजूद तरल महासागरीय जल आसानी से खिंच जाता है।
- पृथ्वी का जो हिस्सा सीधे चंद्रमा के सामने होता है, वहाँ का पानी चंद्रमा की ओर सबसे अधिक आकर्षित होता है। इस खिंचाव के कारण वहाँ जल का एक उभार (Bulge) बन जाता है।
- यह जल उभार ही प्रत्यक्ष उच्च ज्वार (Direct High Tide) कहलाता है।
- चंद्रमा का प्रभाव सूर्य से अधिक क्यों?
- हालांकि सूर्य चंद्रमा से लाखों गुना अधिक विशाल है, लेकिन वह चंद्रमा की तुलना में लगभग 400 गुना अधिक दूर है।
- चूंकि गुरुत्वाकर्षण बल दूरी के साथ तेजी से घटता है, इसलिए निकटता के कारण चंद्रमा का ज्वार उत्पन्न करने वाला बल (ज्वारीय बल – Tidal Force) सूर्य की तुलना में लगभग दोगुने से भी अधिक (2.2 गुना) होता है।
2. पृथ्वी का अपकेंद्री बल (Centrifugal Force of the Earth)
यह दूसरा उच्च ज्वार (अप्रत्यक्ष ज्वार) बनाने के लिए जिम्मेदार बल है।
- अवधारणा: जब कोई वस्तु घूर्णन (rotate) करती है, तो उस पर केंद्र से बाहर की ओर एक बल लगता है, जिसे अपकेंद्री बल कहते हैं।
- पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली: पृथ्वी और चंद्रमा केवल पृथ्वी के केंद्र के चारों ओर नहीं घूमते, बल्कि वे दोनों अपने एक साझा द्रव्यमान केंद्र (Common Center of Mass) या बैरीसेंटर (Barycenter) के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। यह केंद्र पृथ्वी के भीतर ही स्थित है (पृथ्वी के केंद्र से लगभग 4,700 किमी दूर)।
- प्रभाव:
- इस साझा केंद्र के चारों ओर घूमने के कारण पृथ्वी के हर हिस्से पर बाहर की ओर एक अपकेंद्री बल लगता है।
- यह बल पृथ्वी के उस हिस्से पर सबसे अधिक प्रभावी होता है जो चंद्रमा से विपरीत दिशा में होता है।
- इस बल के कारण, विपरीत दिशा में मौजूद महासागरीय जल भी बाहर की ओर उभर जाता है, जिससे एक दूसरा जल उभार बनता है।
- यह उभार अप्रत्यक्ष उच्च ज्वार (Indirect High Tide) कहलाता है।
3. सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force of the Sun)
यह एक सहायक या संशोधित करने वाला बल है, जो ज्वार की ऊँचाई को प्रभावित करता है।
- प्रभाव: सूर्य भी पृथ्वी के पानी पर चंद्रमा की तरह ही गुरुत्वाकर्षण खिंचाव डालता है।
- संशोधन:
- जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में होते हैं (पूर्णिमा और अमावस्या के दिन), तो सूर्य और चंद्रमा का संयुक्त गुरुत्वाकर्षण बल ज्वार को बहुत ऊँचा बना देता है (बृहत ज्वार – Spring Tide)।
- जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के साथ समकोण (90°) बनाते हैं (चतुर्थांश के दिन), तो उनके गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे के प्रभाव को कम करते हैं, जिससे सामान्य से छोटे ज्वार आते हैं (लघु ज्वार – Neap Tide)।
निष्कर्ष: ज्वारीय उभार का संतुलन (Conclusion: The Balance of Tidal Bulges)
इस प्रकार, एक ही समय में पृथ्वी पर हमेशा दो ज्वारीय उभार (Tidal Bulges) मौजूद होते हैं:
- प्रत्यक्ष उभार: चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण, चंद्रमा की ओर।
- अप्रत्यक्ष उभार: पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न अपकेंद्री बल के कारण, चंद्रमा से विपरीत दिशा में।
पृथ्वी अपने अक्ष पर 24 घंटे में एक बार घूम जाती है, इसलिए पृथ्वी का प्रत्येक हिस्सा दिन में एक बार इन दोनों उभारों के नीचे से गुजरता है। यही कारण है कि अधिकांश स्थानों पर दिन में दो बार उच्च ज्वार और दो बार निम्न ज्वार आते हैं। (यह चक्र वास्तव में 24 घंटे 50 मिनट का होता है, क्योंकि पृथ्वी के घूमने के दौरान चंद्रमा भी अपनी कक्षा में थोड़ा आगे बढ़ जाता है)।
ज्वार-भाटा के प्रकार (Types of Tides)
ज्वार-भाटा को मुख्य रूप से दो आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
- उनकी आवृत्ति (Frequency) या एक दिन में आने की संख्या के आधार पर।
- सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की सापेक्ष स्थिति (Relative Position) के आधार पर।
1. आवृत्ति के आधार पर (Based on Frequency)
यह वर्गीकरण इस बात पर आधारित है कि 24 घंटे 50 मिनट की अवधि में किसी स्थान पर कितनी बार उच्च और निम्न ज्वार आते हैं।
क. अर्ध-दैनिक ज्वार (Semi-diurnal Tide):
- परिभाषा: इस प्रकार के ज्वार में एक दिन में दो उच्च ज्वार (High Tides) और दो निम्न ज्वार (Low Tides) आते हैं।
- विशेषता: दोनों उच्च ज्वार की ऊँचाई लगभग समान होती है, और इसी तरह दोनों निम्न ज्वार की गहराई भी लगभग समान होती है।
- अवधि: प्रत्येक उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच लगभग 6 घंटे 12 मिनट का अंतराल होता है।
- प्रमुख क्षेत्र: यह दुनिया में सबसे आम प्रकार का ज्वार है। यह संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी तट और अटलांटिक महासागर के अधिकांश तटों पर पाया जाता है।
ख. दैनिक ज्वार (Diurnal Tide):
- परिभाषा: इस प्रकार के ज्वार में एक दिन में केवल एक उच्च ज्वार और एक निम्न ज्वार आता है।
- विशेषता: उच्च और निम्न ज्वार के बीच लगभग 12 घंटे 25 मिनट का अंतराल होता है।
- प्रमुख क्षेत्र: यह अपेक्षाकृत दुर्लभ है। यह मुख्य रूप से मैक्सिको की खाड़ी, चीन सागर और वियतनाम के तटों पर पाया जाता है।
ग. मिश्रित ज्वार (Mixed Tide):
- परिभाषा: इसमें भी एक दिन में दो उच्च ज्वार और दो निम्न ज्वार आते हैं, लेकिन उनकी ऊँचाई में काफी असमानता (Inequality) होती है।
- विशेषता: यानी, दिन का एक उच्च ज्वार (Higher High Water) दूसरे उच्च ज्वार (Lower High Water) से बहुत ऊँचा होता है। इसी तरह, एक निम्न ज्वार (Lower Low Water) दूसरे निम्न ज्वार (Higher Low Water) से बहुत नीचा होता है।
- प्रमुख क्षेत्र: यह संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी तट, कनाडा और प्रशांत महासागर के कई द्वीपों पर आम है।
2. सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की स्थिति के आधार पर (Based on Sun, Moon, and Earth’s Position)
यह वर्गीकरण ज्वार की ऊँचाई या ज्वारीय परास (Tidal Range – उच्च और निम्न ज्वार के बीच का अंतर) पर आधारित है, जो सूर्य और चंद्रमा के संयुक्त गुरुत्वाकर्षण बल से निर्धारित होता है।
क. बृहत ज्वार या उच्च ज्वार (Spring Tide):
- कब आता है? यह महीने में दो बार आता है—पूर्णिमा (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) के दिन।
- कारण: इन दिनों सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा (Syzygy) में होते हैं। इस स्थिति में, सूर्य और चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल एक साथ मिलकर काम करता है, जिससे एक अत्यधिक शक्तिशाली खिंचाव उत्पन्न होता है।
- परिणाम: इसके परिणामस्वरूप सामान्य से बहुत ऊँचा उच्च ज्वार और सामान्य से बहुत नीचा निम्न ज्वार आता है। इस समय ज्वारीय परास अधिकतम (Maximum) होता है।
ख. लघु ज्वार या निम्न ज्वार (Neap Tide):
- कब आता है? यह भी महीने में दो बार आता है—प्रथम और तृतीय चतुर्थांश (First and Third Quarter Moon) के दिन, जब आधा चाँद दिखाई देता है।
- कारण: इन दिनों सूर्य और चंद्रमा, पृथ्वी के साथ एक समकोण (90° का कोण) बनाते हैं। इस स्थिति में, सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध कार्य करता है, जिससे दोनों एक-दूसरे के प्रभाव को कम कर देते हैं।
- परिणाम: इसके परिणामस्वरूप सामान्य से कम ऊँचा उच्च ज्वार और सामान्य से कम नीचा निम्न ज्वार आता है। इस समय ज्वारीय परास न्यूनतम (Minimum) होता है।
संक्षेप में: Spring Tides = Strong Tides; Neap Tides = Weak Tides.
एपोजी और पेरिजी (Apogee and Perigee)
एपोजी और पेरिजी वे खगोलीय शब्द हैं जिनका उपयोग पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करने वाले किसी भी प्राकृतिक या कृत्रिम उपग्रह (जैसे चंद्रमा या एक सैटेलाइट) की कक्षा (orbit) के दो विशेष बिंदुओं का वर्णन करने के लिए किया जाता है। चूंकि अधिकांश कक्षाएँ पूर्ण वृत्त (perfect circle) नहीं होती हैं, बल्कि अण्डाकार (elliptical) होती हैं, इसलिए उपग्रह की पृथ्वी से दूरी लगातार बदलती रहती है।
1. पेरिजी (Perigee)
- परिभाषा: यह किसी उपग्रह की अण्डाकार कक्षा का वह बिंदु है जहाँ वह पृथ्वी के सबसे निकट (closest) होता है।
- “Peri” का अर्थ है “निकट” (Near)।
- पेरिजी पर क्या होता है?
- दूरी: उपग्रह पृथ्वी के सबसे पास होता है।
- गति: गुरुत्वाकर्षण खिंचाव सबसे मजबूत होने के कारण, उपग्रह अपनी कक्षा में सबसे तेज गति (fastest speed) से चलता है।
- ज्वारीय प्रभाव: जब चंद्रमा अपनी पेरिजी स्थिति में होता है, तो उसका गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी पर सबसे अधिक होता है। यदि इस समय पूर्णिमा या अमावस्या (यानी बृहत ज्वार की स्थिति) भी हो, तो ज्वार सामान्य बृहत ज्वार से भी बहुत अधिक ऊँचा होता है। इसे “पेरिजियन स्प्रिंग टाइड” (Perigean Spring Tide) या लोकप्रिय भाषा में “सुपरमून” (Supermoon) से जुड़ा ज्वार कहते हैं।
2. एपोजी (Apogee)
- परिभाषा: यह किसी उपग्रह की अण्डाकार कक्षा का वह बिंदु है जहाँ वह पृथ्वी से सबसे दूर (farthest) होता है।
- “Apo” का अर्थ है “दूर” (Away)।
- एपोजी पर क्या होता है?
- दूरी: उपग्रह पृथ्वी से सबसे दूर होता है।
- गति: गुरुत्वाकर्षण खिंचाव सबसे कमजोर होने के कारण, उपग्रह अपनी कक्षा में सबसे धीमी गति (slowest speed) से चलता है।
- ज्वारीय प्रभाव: जब चंद्रमा अपनी एपोजी स्थिति में होता है, तो उसका गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी पर सबसे कम होता है। यदि इस समय पूर्णिमा या अमावस्या भी हो, तो बृहत ज्वार सामान्य से कम ऊँचा होता है।
सूर्य के संदर्भ में समान अवधारणाएँ: एप्सिस (Aphelion) और पेरिहेलियन (Perihelion)
जिस प्रकार एपोजी और पेरिजी का उपयोग पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा के लिए किया जाता है, उसी प्रकार एप्सिस और पेरिहेलियन का उपयोग सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने वाली किसी भी वस्तु (जैसे पृथ्वी या कोई अन्य ग्रह) के लिए किया जाता है।
- पेरिहेलियन (Perihelion): वह बिंदु जब कोई ग्रह (जैसे पृथ्वी) अपनी कक्षा में सूर्य के सबसे निकट होता है।
- एप्सिस या एपहेलियन (Aphelion): वह बिंदु जब कोई ग्रह (जैसे पृथ्वी) अपनी कक्षा में सूर्य से सबसे दूर होता है।
यह एक आम गलतफहमी है कि पृथ्वी पर मौसम उसकी सूर्य से दूरी के कारण बदलते हैं। वास्तव में, उत्तरी गोलार्ध में सर्दियाँ तब होती हैं जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (पेरिहेलियन) होती है, और गर्मियाँ तब होती हैं जब वह सबसे दूर (एपहेलियन) होती है। मौसम का कारण पृथ्वी का अपनी धुरी पर झुकाव (axial tilt) है, न कि उसकी दूरी।
सारांश तालिका
| शब्द (Term) | केंद्रीय पिंड (Central Body) | कक्षा में स्थिति | दूरी | गति | ज्वारीय प्रभाव (चंद्रमा के लिए) |
| पेरिजी (Perigee) | पृथ्वी (Earth) | सबसे निकट | न्यूनतम | सबसे तेज | अधिकतम |
| एपोजी (Apogee) | पृथ्वी (Earth) | सबसे दूर | अधिकतम | सबसे धीमी | न्यूनतम |
| पेरिहेलियन (Perihelion) | सूर्य (Sun) | सबसे निकट | न्यूनतम | सबसे तेज | — |
| एपहेलियन (Aphelion) | सूर्य (Sun) | सबसे दूर | अधिकतम | सबसे धीमी | — |
ज्वारीय परास / सीमा (Tidal Range)
परिभाषा:
ज्वारीय परास (Tidal Range) किसी निश्चित स्थान पर उच्च ज्वार (High Tide) और उसके तुरंत बाद आने वाले निम्न ज्वार (Low Tide) के बीच के ऊर्ध्वाधर अंतर (vertical difference) को कहते हैं।
सरल शब्दों में, यह वह माप है कि समुद्र का जल स्तर उच्च ज्वार के समय कितना ऊपर चढ़ता है और निम्न ज्वार के समय कितना नीचे उतरता है। यदि आप किसी घाट पर एक खंभे को देखें, तो उच्च ज्वार में पानी के उच्चतम निशान और निम्न ज्वार में पानी के सबसे निचले निशान के बीच की दूरी ही ज्वारीय परास है।
यह परास स्थिर नहीं होता है; यह हर दिन और महीने भर में बदलता रहता है।
ज्वारीय परास को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting the Tidal Range)
ज्वारीय परास का आकार दुनिया भर में बहुत भिन्न होता है – कुछ सेंटीमीटर से लेकर कई मीटर तक। यह मुख्य रूप से दो प्रकार के कारकों से प्रभावित होता है:
1. खगोलीय कारक (Astronomical Factors):
ये कारक ज्वार की मूल शक्ति को निर्धारित करते हैं।
- बृहत ज्वार और लघु ज्वार (Spring and Neap Tides): यह सबसे बड़ा प्रभाव डालता है।
- अधिकतम परास (Maximum Range): बृहत ज्वार (Spring Tide) के दौरान (पूर्णिमा और अमावस्या), सूर्य और चंद्रमा एक सीध में होते हैं, जिससे उनका संयुक्त गुरुत्वाकर्षण बल एक शक्तिशाली ज्वार बनाता है। इस समय उच्च ज्वार बहुत ऊँचा और निम्न ज्वार बहुत नीचा होता है, जिससे ज्वारीय परास सबसे अधिक होता है।
- न्यूनतम परास (Minimum Range): लघु ज्वार (Neap Tide) के दौरान (चतुर्थांश), सूर्य और चंद्रमा समकोण पर होते हैं, जिससे उनके बल एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। इस समय उच्च ज्वार कम ऊँचा और निम्न ज्वार कम नीचा होता है, जिससे ज्वारीय परास सबसे कम होता है।
- चंद्रमा की कक्षा (Moon’s Orbit) – पेरिजी और एपोजी:
- पेरिजी (Perigee): जब चंद्रमा अपनी अण्डाकार कक्षा में पृथ्वी के सबसे निकट होता है, तो उसका गुरुत्वाकर्षण बल सबसे मजबूत होता है। इससे ज्वारीय परास सामान्य से बड़ा होता है।
- एपोजी (Apogee): जब चंद्रमा पृथ्वी से सबसे दूर होता है, तो उसका बल कमजोर होता है, जिससे ज्वारीय परास सामान्य से छोटा होता है।
- पृथ्वी की कक्षा (Earth’s Orbit) – पेरिहेलियन और एपहेलियन:
- पेरिहेलियन (Perihelion): जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है (जनवरी में), तो सूर्य का ज्वारीय प्रभाव थोड़ा बढ़ जाता है।
- एपहेलियन (Aphelion): जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है (जुलाई में), तो प्रभाव थोड़ा कम हो जाता है। यह एक मामूली कारक है।
2. भौगोलिक कारक (Geographical Factors):
ये कारक स्थानीय रूप से ज्वार की ऊँचाई को बहुत अधिक बढ़ा या घटा सकते हैं।
- तटरेखा का आकार (Shape of the Coastline): यह सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक कारक है।
- संकरी और कीप के आकार की खाड़ियाँ (Narrow and Funnel-shaped Bays): जब ज्वारीय लहर (Tidal Wave) एक चौड़े समुद्र से एक संकरी, V-आकार की खाड़ी (जैसे एक ज्वारनदमुख) में प्रवेश करती है, तो पानी एक सीमित स्थान में संकुचित हो जाता है। इस “कीप प्रभाव” (Funneling Effect) के कारण पानी की ऊँचाई नाटकीय रूप से बढ़ जाती है, जिससे ज्वारीय परास बहुत अधिक हो जाता है।
- खुले और सीधे तट (Open and Straight Coasts): सीधे तटों पर ज्वारीय लहर बिना किसी बाधा के फैल जाती है, इसलिए ज्वारीय परास आमतौर पर छोटा होता है।
- महासागर की गहराई (Depth of the Ocean):
- खुले, गहरे महासागरों में, ज्वारीय परास बहुत छोटा होता है (लगभग 1 मीटर)।
- जैसे ही ज्वारीय लहर उथले महाद्वीपीय शेल्फ पर चढ़ती है, इसकी गति धीमी हो जाती है और ऊँचाई बढ़ जाती है, जिससे ज्वारीय परास बढ़ जाता है।
- ज्वारीय अनुनाद (Tidal Resonance):
- कभी-कभी, एक खाड़ी या बेसिन का आकार और गहराई ऐसी होती है कि ज्वारीय लहर की प्राकृतिक आवृत्ति (frequency) उस बेसिन में पानी के “झूलने” (sloshing) की प्राकृतिक आवृत्ति से मेल खा जाती है। जब ऐसा होता है, तो ज्वार की ऊँचाई बहुत अधिक बढ़ जाती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी झूले को सही समय पर धक्का देकर उसे और ऊँचा करते हैं।
विश्व के कुछ उदाहरण (Examples from around the World)
- विश्व का उच्चतम ज्वारीय परास:
- फंडी की खाड़ी (Bay of Fundy), कनाडा: यहाँ दुनिया का सबसे ऊँचा ज्वारीय परास दर्ज किया गया है, जो 16 मीटर (53 फीट) तक पहुँच सकता है। इसका कारण इसकी अद्वितीय कीप-जैसी आकृति और ज्वारीय अनुनाद है।
- उच्च ज्वारीय परास के अन्य क्षेत्र:
- सेवर्न ज्वारनदमुख (Severn Estuary), यूके
- अनगावा खाड़ी (Ungava Bay), कनाडा
- न्यूनतम ज्वारीय परास:
- संलग्न समुद्र (Enclosed Seas): भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) और बाल्टिक सागर (Baltic Sea) जैसे लगभग पूरी तरह से भूमि से घिरे समुद्रों में ज्वारीय परास बहुत कम होता है (अक्सर 1 मीटर से भी कम), क्योंकि ज्वारीय लहरें खुले महासागर से इनमें प्रवेश नहीं कर पाती हैं।
ज्वारीय परास का महत्व (Importance of Tidal Range)
- ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy): जिन क्षेत्रों में ज्वारीय परास अधिक होता है, वे ज्वारीय ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए आदर्श होते हैं।
- नौसंचालन (Navigation): जहाजों को बंदरगाह में प्रवेश करने के लिए उच्च ज्वार का ध्यान रखना पड़ता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ परास अधिक होता है।
- पारिस्थितिकी (Ecology): एक बड़ा ज्वारीय परास एक विशाल अंतर्ज्वारीय क्षेत्र (Intertidal Zone) का निर्माण करता है, जो कई विशेष प्रकार के पौधों और जानवरों का घर होता है।
1. ज्वारीय धारा (Tidal Current)
परिभाषा:
ज्वारीय धारा, ज्वार-भाटा (Tides) के कारण समुद्र के पानी का क्षैतिज (horizontal) बहाव है। जबकि ज्वार-भाटा जल स्तर का ऊर्ध्वाधर (vertical) उतार-चढ़ाव है, ज्वारीय धाराएँ उसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप पानी की वास्तविक गति हैं।
इसे इस तरह समझें:
- ज्वार (Tide): पानी का स्तर ऊपर उठ रहा है।
- ज्वारीय धारा (Tidal Current): उस उठे हुए पानी को तट की ओर धकेलने वाली धारा।
ज्वारीय धाराओं के प्रकार (Types of Tidal Currents):
- बाढ़ धारा या प्रवाह धारा (Flood Current / Flow):
- यह वह धारा है जो निम्न ज्वार (Low Tide) से उच्च ज्वार (High Tide) के दौरान तट की ओर या एक संकरी खाड़ी/नदी के अंदर की ओर बहती है।
- यह तट को “बाढ़” की तरह पानी से भर देती है।
- भाटा धारा या पश्च प्रवाह धारा (Ebb Current / Ebb):
- यह वह धारा है जो उच्च ज्वार से निम्न ज्वार के दौरान तट से दूर या एक खाड़ी/नदी से बाहर समुद्र की ओर बहती है।
- यह तट से पानी को वापस खींचती है।
- शिथिल जल (Slack Water):
- यह एक छोटी अवधि होती है जब ज्वार अपनी उच्चतम या निम्नतम सीमा पर पहुँच जाता है और अपनी दिशा बदलने वाला होता है।
- इस समय, पानी लगभग स्थिर होता है और कोई ज्वारीय धारा नहीं होती है। यह अवधि गोताखोरों और नाविकों के लिए महत्वपूर्ण होती है।
ज्वारीय धाराओं की विशेषताएँ:
- पूर्वानुमेयता (Predictability): ज्वार-भाटा की तरह, ज्वारीय धाराएँ भी अत्यधिक पूर्वानुमानित होती हैं।
- शक्ति: खुले महासागरों में ये कमजोर हो सकती हैं, लेकिन संकीर्ण जलमार्गों, जलडमरूमध्यों (Straits) और खाड़ियों के मुहाने पर ये बहुत शक्तिशाली और तेज हो सकती हैं। कुछ स्थानों पर इनकी गति जहाजों को भी बहा ले जाने के लिए पर्याप्त होती है।
- दिशा: खुले महासागर में ज्वारीय धाराएँ वृत्ताकार या अण्डाकार पथ में घूम सकती हैं, लेकिन तटीय क्षेत्रों में वे मुख्य रूप से तट के अंदर और बाहर की ओर बहती हैं।
2. भित्ति (Reef)
परिभाषा:
भित्ति पानी की सतह के नीचे स्थित किसी भी चट्टानी या ठोस संरचना (Ridge of rock, coral, or similar solid material) को कहते हैं। यह प्राकृतिक या कृत्रिम हो सकती है। भित्तियाँ आमतौर पर उथले पानी में पाई जाती हैं और समुद्री जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आवास होती हैं।
भित्तियों के प्रकार (Types of Reefs):
क. प्राकृतिक भित्तियाँ (Natural Reefs):
- प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs):
- यह सबसे प्रसिद्ध और जैविक रूप से विविध प्रकार की भित्ति हैं।
- निर्माण: इनका निर्माण लाखों छोटे समुद्री जीवों, जिन्हें कोरल पॉलीप्स (Coral Polyps) कहा जाता है, के कंकालों (मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट) से होता है। ये पॉलीप्स कॉलोनियों में रहते हैं और समय के साथ एक विशाल संरचना का निर्माण करते हैं।
- आवश्यकताएँ: इन्हें गर्म, साफ और उथले उष्णकटिबंधीय पानी की आवश्यकता होती है जहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँच सके।
- महत्व: इन्हें “समुद्र का वर्षावन” (Rainforest of the Sea) कहा जाता है क्योंकि ये अत्यधिक जैव विविधता का समर्थन करती हैं। ये तटीय क्षेत्रों को तूफानी लहरों से भी बचाती हैं।
- प्रकार:
- तटीय भित्ति (Fringing Reef): तट से सटी हुई।
- अवरोधक भित्ति (Barrier Reef): तट से कुछ दूरी पर उसके समानांतर स्थित। ग्रेट बैरियर रीफ (ऑस्ट्रेलिया) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
- एटॉल या वलयाकार भित्ति (Atoll): एक लैगून (उथली झील) के चारों ओर एक गोलाकार या अंडाकार भित्ति।
- चट्टानी भित्तियाँ (Rocky Reefs):
- ये चट्टानों के पानी के नीचे के उभार या विस्तार से बनती हैं।
- ये प्रवाल भित्तियों की तुलना में कम विविध होती हैं लेकिन फिर भी समुद्री शैवाल, मछली और अन्य अकशेरुकीय जीवों के लिए एक महत्वपूर्ण आवास प्रदान करती हैं। ये ठंडे और गर्म दोनों प्रकार के पानी में पाई जा सकती हैं।
ख. कृत्रिम भित्तियाँ (Artificial Reefs):
- निर्माण: इन्हें जानबूझकर मानव द्वारा बनाया जाता है। इन्हें बनाने के लिए जहाजों, मेट्रो कारों, कंक्रीट ब्लॉकों या अन्य ठोस सामग्रियों को समुद्र में डुबोया जाता है।
- उद्देश्य:
- मछलियों और अन्य समुद्री जीवों के लिए एक नया आवास बनाना, जिससे मछली पकड़ने में सुधार हो।
- मनोरंजक गोताखोरी (Recreational Diving) के लिए स्थान बनाना।
- तटीय अपरदन को नियंत्रित करने में मदद करना।
- प्राकृतिक भित्तियों पर से दबाव कम करना।
ज्वार-भाटा का महत्व और प्रभाव (Importance and Effects of Tides)
- बंदरगाह और नौसंचालन (Ports and Navigation): उच्च ज्वार जहाजों को उथले बंदरगाहों में प्रवेश करने और बाहर निकलने में मदद करता है। लंदन और कोलकाता जैसे कई बंदरगाह ज्वारीय बंदरगाह हैं।
- मछली पकड़ना (Fishing): ज्वार के साथ कई मछलियाँ तट के पास आ जाती हैं, जिससे मछुआरों को मछली पकड़ने में आसानी होती है।
- तटीय पारिस्थितिकी तंत्र (Coastal Ecosystems): ज्वार-भाटा अंतर्ज्वारीय क्षेत्रों (Intertidal Zones) का निर्माण करता है, जो कई अनूठे जीवों (जैसे केकड़े, सीप) का निवास स्थान है। यह ज्वारनदमुखों (Estuaries) में खारे और मीठे पानी को मिलाने में भी मदद करता है।
- ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy): उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच पानी के स्तर में अंतर का उपयोग टरबाइन चलाकर बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है। यह ऊर्जा का एक स्वच्छ और पूर्वानुमानित स्रोत है।
- अपरदन और निक्षेपण (Erosion and Deposition): ज्वारीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों, विशेषकर ज्वारनदमुखों और डेल्टा में तलछट को हटाने और जमा करने का काम करती हैं, जिससे तटीय भू-आकृतियों का निर्माण होता है।
- तटीय सफाई (Coastal Cleansing): ज्वार का पानी तटों पर जमा कचरे और प्रदूषकों को समुद्र में बहा ले जाता है, जिससे तटों की सफाई होती है।
महासागरीय संसाधन (Oceanic Resources)
महासागर संसाधनों का एक विशाल और अमूल्य भंडार है, जो मानव जीवन के लिए भोजन, ऊर्जा, खनिज और आर्थिक अवसरों का एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रदान करता है। पृथ्वी की सतह का लगभग 71% हिस्सा कवर करने वाले ये विशाल जल निकाय विभिन्न प्रकार के संसाधनों को संजोए हुए हैं।
महासागरीय संसाधनों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
- जैविक संसाधन (Biological Resources)
- अजैविक / खनिज संसाधन (Abiotic / Mineral Resources)
- ऊर्जा संसाधन (Energy Resources)
1. जैविक संसाधन (Biological Resources)
ये महासागरों में मौजूद जीवित वनस्पतियों और जीवों से प्राप्त होते हैं।
क. मत्स्य संसाधन (Fisheries Resources):
- यह महासागरों का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला जैविक संसाधन है।
- प्रकार: इसमें मछलियाँ (जैसे टूना, कॉड, सार्डिन), क्रस्टेशियन (झींगा, केकड़ा), और मोलस्क (सीप, मसल्स, स्क्विड) शामिल हैं।
- महत्व: यह दुनिया भर में करोड़ों लोगों के लिए प्रोटीन का एक प्रमुख स्रोत और आजीविका का साधन है।
- प्रमुख क्षेत्र: दुनिया के सबसे समृद्ध मछली पकड़ने वाले क्षेत्र वे हैं जहाँ गर्म और ठंडी महासागरीय धाराएँ मिलती हैं (जैसे जापान और न्यूफ़ाउंडलैंड के पास), क्योंकि यहाँ मछलियों का भोजन प्लैंकटन प्रचुर मात्रा में होता है।
ख. समुद्री वनस्पति (Marine Flora):
- प्रकार: इसमें शैवाल (Algae), समुद्री घास (Seaweeds), केल्प (Kelp) और सूक्ष्म प्लैंकटन (Plankton) शामिल हैं। प्लैंकटन समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं।
- उपयोग:
- भोजन: जापान, चीन जैसे देशों में समुद्री शैवाल का भोजन के रूप में उपयोग होता है।
- औषधि: इससे अगार-अगार, आयोडीन और अन्य औषधीय उत्पाद प्राप्त होते हैं।
- उद्योग: इनका उपयोग उर्वरक (Fertilizers), सौंदर्य प्रसाधन और जैव ईंधन (Biofuels) बनाने में भी किया जाता है।
ग. अन्य जीव (Other Organisms):
- मोती (Pearls): सीप (Oysters) से प्राप्त होते हैं।
- प्रवाल (Corals): आभूषण और सजावटी वस्तुओं के लिए।
- स्पंज (Sponges): विभिन्न घरेलू उपयोगों के लिए।
2. अजैविक / खनिज संसाधन (Abiotic / Mineral Resources)
ये महासागर के जल, समुद्र तल और उसके नीचे की चट्टानों से प्राप्त होने वाले गैर-जीवित संसाधन हैं।
| संसाधन का प्रकार | कहाँ पाए जाते हैं? | प्रमुख खनिज / संसाधन |
| महासागरीय जल से (From Sea Water) | घुली हुई अवस्था में | • साधारण नमक (NaCl) – सबसे प्रमुख<br>• मैग्नीशियम (Magnesium)<br>• ब्रोमीन (Bromine) |
| महाद्वीपीय शेल्फ और ढलान से (From Continental Shelves & Slopes) | उथले समुद्र तल और उसके नीचे | • पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस – सबसे महत्वपूर्ण<br>• रेत और बजरी (निर्माण के लिए)<br>• सल्फर (Sulphur), फॉस्फोराइट (Phosphorite) |
| गहरे समुद्र के तल से (From Deep Sea Floor) | गहरे समुद्री मैदान (Abyssal Plains) | • पॉलीमेटेलिक नोड्यूल (Polymetallic Nodules): आलू के आकार के पिंड जिनमें मैंगनीज, निकल, तांबा, कोबाल्ट होता है।<br>• कोबाल्ट-समृद्ध क्रस्ट (Cobalt-rich crusts): पनडुब्बी पहाड़ों पर पाए जाते हैं।<br>• पॉलीमेटेलिक सल्फाइड (Polymetallic Sulphides): हाइड्रोथर्मल वेंट्स के पास। |
विशेष बिंदु: पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
- विश्व के अधिकांश अपतटीय (Offshore) तेल और गैस का उत्पादन महाद्वीपीय शेल्फ से होता है। भारत में बॉम्बे हाई इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
3. ऊर्जा संसाधन (Energy Resources)
महासागर ऊर्जा का एक विशाल नवीकरणीय स्रोत है, जिसे विभिन्न तरीकों से उपयोग में लाया जा सकता है।
क. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy):
- स्रोत: उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच जल स्तर में अंतर।
- प्रक्रिया: ज्वार के आने और जाने से पानी की गति का उपयोग टरबाइन चलाकर बिजली पैदा करने के लिए किया जाता है।
- आवश्यकता: इसके लिए उच्च ज्वारीय परास (High Tidal Range) की आवश्यकता होती है।
ख. तरंग ऊर्जा (Wave Energy):
- स्रोत: समुद्री लहरों की निरंतर गति।
- प्रक्रिया: लहरों के ऊपर-नीचे होने की गतिज ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित किया जाता है। यह तकनीक अभी भी विकास के प्रारंभिक चरण में है।
ग. महासागरीय तापीय ऊर्जा रूपांतरण (Ocean Thermal Energy Conversion – OTEC):
- स्रोत: महासागर की गर्म सतही जल और ठंडे गहरे जल के बीच तापमान का अंतर।
- प्रक्रिया: इस तापांतर का उपयोग अमोनिया जैसे कम क्वथनांक वाले तरल को उबालने के लिए किया जाता है, जिसकी भाप से टरबाइन चलाई जाती है।
- आवश्यकता: सतह और गहरे पानी के बीच कम से कम 20°C का तापांतर आवश्यक है, जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में संभव है।
महासागरीय संसाधनों का प्रबंधन और चुनौतियाँ
- अत्यधिक दोहन (Over-exploitation): अत्यधिक मछली पकड़ने (Overfishing) से कई मछली प्रजातियों की आबादी खतरे में है।
- समुद्री प्रदूषण (Marine Pollution): प्लास्टिक, तेल रिसाव, औद्योगिक और कृषि अपशिष्ट समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहे हैं और संसाधनों की गुणवत्ता को कम कर रहे हैं।
- गहरे समुद्र में खनन का प्रभाव (Impact of Deep-Sea Mining): पॉलीमेटेलिक नोड्यूल जैसे संसाधनों के खनन से गहरे समुद्र के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी नुकसान हो सकता है।
- सतत विकास की आवश्यकता: भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन अमूल्य संसाधनों को संरक्षित करने के लिए एक सतत प्रबंधन (Sustainable Management) और नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) के सिद्धांतों को अपनाना आवश्यक है।
प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs)
प्रवाल भित्तियाँ समुद्र के भीतर स्थित कैल्शियम कार्बोनेट (चूना पत्थर) की विशाल और जटिल संरचनाएँ हैं, जिनका निर्माण कोरल नामक छोटे समुद्री जीवों द्वारा किया जाता है। अपनी अत्यधिक जैव विविधता और पारिस्थितिक महत्व के कारण इन्हें “समुद्र का वर्षावन” (Rainforests of the Sea) कहा जाता है।
प्रवाल (Coral) क्या हैं?
प्रवाल, जिन्हें कोरल भी कहा जाता है, समुद्री अकशेरुकीय जीव (Marine Invertebrates) होते हैं। ये कोई पौधे या चट्टानें नहीं हैं, बल्कि जीवित प्राणी हैं। इनकी संरचना और जीवन चक्र बहुत ही अनूठा और आकर्षक है।
1. व्यक्तिगत जीव: कोरल पॉलीप (The Individual Animal: The Coral Polyp)
एक प्रवाल कॉलोनी की मूल इकाई एक छोटा, नरम शरीर वाला जीव होता है जिसे पॉलीप (Polyp) कहते हैं। एक पॉलीप की संरचना बहुत सरल होती है:
- आकार: यह एक छोटे, खोखले, बेलनाकार (cylindrical) थैली जैसा होता है, जिसका आकार कुछ मिलीमीटर से लेकर कुछ सेंटीमीटर तक हो सकता है।
- संरचना:
- मुँह (Mouth): इसके शीर्ष पर एक केंद्रीय मुँह होता है, जो भोजन ग्रहण करने और अपशिष्ट को बाहर निकालने, दोनों का काम करता है।
- टेंटेकल्स (Tentacles): मुँह के चारों ओर डंक मारने वाली कोशिकाओं (stinging cells) से युक्त स्पर्शकों या टेंटेकल्स का एक घेरा होता है। ये टेंटेकल्स प्लैंकटन और छोटे जीवों को पकड़कर अपने मुँह तक लाने में मदद करते हैं।
- पेट (Stomach): इसका शरीर मूल रूप से एक पेट की थैली (stomach sac) ही है।
- वर्गीकरण: कोरल पॉलीप्स निडेरिया (Cnidaria) नामक जीव संघ से संबंधित हैं। इसी संघ में जेलीफिश, समुद्री एनीमोन और हाइड्रा जैसे अन्य जीव भी आते हैं।
2. कठोर कंकाल का निर्माण (Building the Hard Skeleton)
कोरल पॉलीप्स की सबसे विशिष्ट विशेषता उनका कठोर बाहरी कंकाल बनाने की क्षमता है।
- कैल्शियम कार्बोनेट: पॉलीप समुद्री जल से कैल्शियम और कार्बोनेट आयनों को अवशोषित करता है और उन्हें मिलाकर कैल्शियम कार्बोनेट (
- CaCO3
- CaCO
- 3
-
- ), यानी चूना पत्थर का एक कप के आकार का कठोर कंकाल बनाता है, जिसे कोरेलाइट (Corallite) कहते हैं।
- सुरक्षा: यह कंकाल पॉलीप के नरम शरीर के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है। खतरा महसूस होने पर पॉलीप इस कंकाल के अंदर सिकुड़ सकता है।
3. कॉलोनियों का निर्माण (Building the Colonies)
अधिकांश कोरल अकेले नहीं रहते, बल्कि विशाल कॉलोनियों (Colonies) में रहते हैं।
- प्रक्रिया: एक कोरल कॉलोनी एक संस्थापक पॉलीप से शुरू होती है जो किसी ठोस सतह पर बस जाता है। यह पॉलीप फिर मुकुलन (Budding) नामक एक अलैंगिक प्रजनन प्रक्रिया के माध्यम से अपनी हजारों आनुवंशिक रूप से समान प्रतियाँ (clones) बनाता है।
- एकजुट संरचना: ये सभी क्लोन पॉलीप्स एक-दूसरे से जीवित ऊतकों की एक परत से जुड़े रहते हैं, और ये सभी मिलकर एक संयुक्त कंकाल संरचना का निर्माण करते हैं।
- परिणाम: हजारों और लाखों वर्षों तक, ये कॉलोनियाँ बढ़ती रहती हैं। जब पुराने पॉलीप्स मर जाते हैं, तो उनके कठोर कंकाल पीछे रह जाते हैं, और नए पॉलीप्स उन पर बढ़ते हैं। इसी प्रक्रिया से विशाल और जटिल प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs) का निर्माण होता है।
4. सहजीवी संबंध: ज़ूजैन्थेली (Symbiotic Relationship: Zooxanthellae)
लगभग सभी चट्टान-निर्माता कोरल का ज़ूजैन्थेली (Zooxanthellae) नामक सूक्ष्म शैवाल के साथ एक महत्वपूर्ण सहजीवी संबंध होता है।
- जीवन का आधार: यह शैवाल कोरल पॉलीप के ऊतकों के अंदर रहता है।
- पारस्परिक लाभ:
- शैवाल प्रकाश-संश्लेषण (photosynthesis) करके कोरल को भोजन (लगभग 90% तक) और ऑक्सीजन प्रदान करता है। यही शैवाल कोरल को उनके सुंदर, चमकीले रंग भी देता है।
- कोरल बदले में शैवाल को रहने के लिए एक सुरक्षित, सूर्य के प्रकाश वाला वातावरण और प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक पोषक तत्व (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड) प्रदान करता है।
यह संबंध कोरल के जीवित रहने और विशाल भित्तियों का निर्माण करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब कोरल तनाव में होते हैं (जैसे पानी गर्म होने पर), तो वे इन शैवाल को बाहर निकाल देते हैं, जिससे वे सफेद हो जाते हैं (जिसे प्रवाल विरंजन कहते हैं) और मरने का खतरा होता है।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, प्रवाल (कोरल) छोटे-छोटे पॉलीप्स नामक जीवों की कॉलोनियाँ हैं, जो अपने चारों ओर एक कठोर कैल्शियम कार्बोनेट का कंकाल बनाते हैं और अपने ऊतकों में रहने वाले शैवाल के साथ सहजीवन में रहते हैं। इन्हीं कॉलोनियों के लाखों वर्षों के विकास से समुद्र के सबसे विविध और महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से एक—प्रवाल भित्तियों—का निर्माण होता है।
प्रवाल भित्तियों के विकास के लिए आवश्यक दशाएँ (Ideal Conditions for Coral Reef Growth)
प्रवाल भित्तियाँ बहुत ही नाजुक और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र हैं। वे केवल उन्हीं स्थानों पर पनप सकती हैं जहाँ पर्यावरण की कुछ विशिष्ट और स्थिर परिस्थितियाँ मौजूद हों। यदि इनमें से किसी भी स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव होता है, तो प्रवालों का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है।
प्रवाल भित्तियों के स्वस्थ विकास के लिए निम्नलिखित आवश्यक दशाएँ हैं:
1. गर्म और स्थिर तापमान (Warm and Stable Temperature)
- आदर्श तापमान: प्रवाल भित्तियों के विकास के लिए सबसे आदर्श समुद्री तापमान 20°C से 28°C (68°F से 82°F) के बीच माना जाता है।
- न्यूनतम सीमा: ये 18°C से कम तापमान में लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकतीं। इसी कारण ये ठंडे ध्रुवीय क्षेत्रों या गहरे ठंडे पानी में नहीं पाई जातीं।
- अधिकतम सीमा: यदि तापमान 30°C से अधिक हो जाता है, तो प्रवाल तनाव में आ जाते हैं और अपने सहजीवी शैवाल (ज़ूजैन्थेली) को बाहर निकाल देते हैं, जिससे प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) होता है। तापमान में मामूली वृद्धि भी इनके लिए घातक हो सकती है।
2. उथला पानी और सूर्य का प्रकाश (Shallow Water and Sunlight)
- गहराई: प्रवाल भित्तियाँ आमतौर पर 50 मीटर (लगभग 165 फीट) से अधिक गहरे पानी में नहीं पाई जाती हैं। अधिकांश भित्तियाँ 30 मीटर से कम गहरे पानी में ही मिलती हैं।
- कारण: प्रवाल पॉलीप्स के ऊतकों में रहने वाले ज़ूजैन्थेली शैवाल को जीवित रहने और भोजन बनाने के लिए प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) की आवश्यकता होती है। सूर्य का प्रकाश केवल समुद्र की ऊपरी परतों (Photic Zone) तक ही पहुँच पाता है।
3. स्वच्छ और अवसाद-मुक्त जल (Clear and Sediment-Free Water)
- स्वच्छता: पानी का साफ होना अत्यंत आवश्यक है। यदि पानी में मिट्टी, गाद या अन्य तलछट (sediments) की मात्रा अधिक होती है, तो इसके दो हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं:
- प्रकाश अवरुद्ध होना: गंदला पानी सूर्य के प्रकाश को प्रवाल तक पहुँचने से रोकता है, जिससे प्रकाश-संश्लेषण बाधित होता है।
- पॉलीप्स का दम घुटना: तलछट के कण कोरल पॉलीप्स के मुँह में जमा हो सकते हैं, जिससे वे भोजन नहीं कर पाते और उनका दम घुट सकता है। इसी कारण, ये बड़ी नदियों के मुहाने के पास नहीं पनप पातीं, क्योंकि नदियाँ अपने साथ भारी मात्रा में तलछट लाती हैं।
4. पूर्ण महासागरीय लवणता (Full Oceanic Salinity)
- आदर्श लवणता: प्रवाल भित्तियों को स्थिर और पूर्ण खारेपन वाले पानी की आवश्यकता होती है, जिसका स्तर लगभग 32 से 40 ppt (parts per thousand) के बीच हो।
- कम लवणता से हानि: ताजे पानी की अधिक मात्रा इनके लिए हानिकारक होती है। यही कारण है कि ये उन क्षेत्रों में नहीं पाई जातीं जहाँ बड़ी नदियाँ समुद्र में मिलती हैं या जहाँ बहुत अधिक वर्षा होती है, क्योंकि इससे पानी की लवणता कम हो जाती है।
5. पोषक तत्वों का निम्न स्तर (Low Nutrient Levels)
- स्वच्छता का प्रतीक: प्रवाल भित्तियाँ आमतौर पर ऐसे पानी में पनपती हैं जहाँ पोषक तत्वों (जैसे नाइट्रेट और फॉस्फेट) का स्तर बहुत कम हो।
- उच्च पोषक तत्वों से हानि: यदि पानी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है (जैसे कृषि अपवाह या सीवेज से), तो यह शैवाल (Algae) और अन्य समुद्री पौधों की अत्यधिक वृद्धि को बढ़ावा देता है। ये शैवाल प्रवाल के ऊपर उग सकते हैं, उनके लिए सूर्य का प्रकाश और स्थान अवरुद्ध कर सकते हैं, और अंततः उन्हें मार सकते हैं।
6. मध्यम जल गति (Moderate Water Motion)
- आवश्यकता: प्रवाल को जीवित रहने के लिए पानी की हल्की या मध्यम गति (लहरें और धाराएँ) की आवश्यकता होती है।
- लाभ: यह गति दो महत्वपूर्ण कार्य करती है:
- यह प्रवाल तक ऑक्सीजन और प्लैंकटन (भोजन) पहुँचाती है।
- यह किसी भी जमा होने वाले तलछट को साफ करती है।
- हानि: हालांकि, अत्यधिक शक्तिशाली लहरें या तूफान इन नाजुक कंकाल संरचनाओं को भौतिक रूप से तोड़कर नष्ट कर सकते हैं।
संक्षेप में, प्रवाल भित्तियाँ केवल उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के गर्म, साफ, उथले और स्थिर समुद्री वातावरण में ही फल-फूल सकती हैं, जो उन्हें पृथ्वी पर सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों में से एक बनाता है।
प्रवाल भित्तियों के प्रकार (Types of Coral Reefs)
प्रवाल भित्तियों को उनकी आकृति, आकार और निकटवर्ती भूभाग (landmass) के साथ उनके संबंध के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। चार्ल्स डार्विन ने अपने अध्ययन के आधार पर इनका सबसे स्वीकृत वर्गीकरण प्रस्तुत किया, जिसमें तीन मुख्य प्रकार शामिल हैं। ये तीनों प्रकार अक्सर एक-दूसरे के विकास के चरण माने जाते हैं।
1. तटीय भित्ति (Fringing Reef)
यह सबसे सामान्य और सबसे सरल प्रकार की प्रवाल भित्ति है।
- परिभाषा: यह एक ऐसी भित्ति है जो किसी महाद्वीप या द्वीप के तट के बिल्कुल किनारे या उससे सटी हुई विकसित होती है।
- विशेषताएँ:
- इनके और तट के बीच या तो कोई लैगून (उथली झील) नहीं होता, या फिर एक बहुत ही संकरा और उथला चैनल होता है, जिसे “बोट चैनल” (Boat Channel) कहते हैं।
- इनकी चौड़ाई कम होती है और ये समुद्र की ओर धीरे-धीरे ढलान वाली होती हैं।
- संरचना: इसके तीन भाग होते हैं:
- रीफ फ्लैट (Reef Flat): तट के सबसे निकट का उथला हिस्सा, जो निम्न ज्वार के समय अक्सर पानी से बाहर आ जाता है।
- रीफ क्रेस्ट (Reef Crest): भित्ति का सबसे ऊँचा हिस्सा, जहाँ लहरें टूटती हैं।
- रीफ स्लोप (Reef Slope): भित्ति का बाहरी हिस्सा, जो गहरे समुद्र की ओर ढलान वाला होता है।
- उदाहरण:
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
- मन्नार की खाड़ी (भारत)
- दक्षिणी फ्लोरिडा (यूएसए)
2. अवरोधक भित्ति (Barrier Reef)
यह सबसे विशाल और प्रभावशाली प्रवाल भित्तियाँ होती हैं।
- परिभाषा: यह एक ऐसी भित्ति है जो तटरेखा के समानांतर लेकिन उससे काफी दूरी पर स्थित होती है।
- विशेषताएँ:
- इनके और तट के बीच एक चौड़ा और गहरा लैगून (Lagoon) होता है, जिसकी गहराई अक्सर 30 से 70 मीटर तक होती है। यह लैगून नौसंचालन (Navigation) के लिए उपयुक्त होता है।
- ये तटीय भित्तियों की तुलना में बहुत अधिक लंबी और चौड़ी होती हैं।
- ये तट को सीधे समुद्री लहरों के प्रभाव से बचाती हैं, एक “अवरोधक” (Barrier) का काम करती हैं।
- विश्व प्रसिद्ध उदाहरण:
- ऑस्ट्रेलिया का ग्रेट बैरियर रीफ (Great Barrier Reef): यह दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध अवरोधक भित्ति है, जो लगभग 2,000 किलोमीटर लंबी है।
3. एटॉल या वलयाकार प्रवाल भित्ति (Atoll)
यह एक बहुत ही अनूठी और सुंदर संरचना होती है जो आमतौर पर खुले समुद्र में पाई जाती है।
- परिभाषा: यह एक अंगूठी (Ring) या घोड़े की नाल (Horseshoe) के आकार की प्रवाल भित्ति है जो एक केंद्रीय लैगून को पूरी तरह या आंशिक रूप से घेरे रहती है।
- विशेषताएँ:
- आमतौर पर इनके साथ कोई मुख्य भूभाग (जैसे द्वीप) दिखाई नहीं देता है।
- लैगून उथला या गहरा हो सकता है और अक्सर कुछ चैनलों के माध्यम से खुले समुद्र से जुड़ा होता है।
- इस अंगूठी के ऊपर रेत के जमाव से छोटे, कम ऊँचाई वाले द्वीप (जिन्हें ‘के’ (Cay) कहते हैं) बन सकते हैं।
- उदाहरण:
- लक्षद्वीप द्वीप समूह (भारत): यह मुख्य रूप से एटॉल से बना है।
- मालदीव द्वीप समूह: यह दुनिया के सबसे बड़े एटॉल समूहों में से एक है।
- सुवाडिवा एटॉल (भूमध्य रेखा के पास)
डार्विन का निमज्जन सिद्धांत (Darwin’s Subsidence Theory) – तीनों प्रकारों में संबंध
चार्ल्स डार्विन ने यह सिद्धांत दिया कि ये तीनों प्रकार की भित्तियाँ वास्तव में एक ही भित्ति के विकास के विभिन्न चरण हैं, जो किसी डूबते हुए ज्वालामुखी द्वीप (Sinking Volcanic Island) के चारों ओर बनती है।
- चरण 1: तटीय भित्ति (Fringing Reef)
- समुद्र में एक नया ज्वालामुखी द्वीप बनता है। उसके तट के चारों ओर प्रवाल उगना शुरू करते हैं और एक तटीय भित्ति का निर्माण करते हैं।
- चरण 2: अवरोधक भित्ति (Barrier Reef)
- धीरे-धीरे, ज्वालामुखी द्वीप नीचे की ओर धँसने (Subsidence) लगता है या समुद्र का स्तर ऊपर उठ जाता है।
- प्रवाल, जो सूर्य के प्रकाश में रहने के लिए ऊपर की ओर बढ़ते रहते हैं, अपनी वृद्धि जारी रखते हैं। द्वीप के डूबने से, भित्ति और तट के बीच की दूरी बढ़ जाती है और एक गहरा लैगून बन जाता है, जिससे यह एक अवरोधक भित्ति में बदल जाती है।
- चरण 3: एटॉल (Atoll)
- अंततः, ज्वालामुखी द्वीप पूरी तरह से समुद्र की सतह के नीचे डूब जाता है।
- अब केवल प्रवाल की अंगूठी ही बची रहती है, जो एक केंद्रीय लैगून को घेरे होती है। यह अंतिम चरण ही एटॉल कहलाता है।
प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching)
प्रवाल विरंजन एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है, जो दुनिया भर में प्रवाल भित्तियों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है। यह प्रवालों की मृत्यु का संकेत है और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ते स्वास्थ्य का एक स्पष्ट सूचक है।
प्रवाल विरंजन क्या है?
परिभाषा:
प्रवाल विरंजन वह प्रक्रिया है जब तनावग्रस्त प्रवाल (Coral) अपने ऊतकों (tissues) के भीतर रहने वाले सहजीवी शैवाल (ज़ूजैन्थेली – Zooxanthellae) को बाहर निकाल देते हैं।
- परिणाम:
- रंग खोना: ज़ूजैन्थेली ही प्रवाल को उनके चमकीले और विविध रंग प्रदान करते हैं। जब ये शैवाल बाहर निकल जाते हैं, तो प्रवाल का पारदर्शी ऊतक नीचे के सफेद कैल्शियम कार्बोनेट कंकाल को प्रकट कर देता है, जिससे प्रवाल पूरी तरह सफेद या “ब्लीच” जैसा दिखने लगता है।
- भोजन का स्रोत खोना: ज़ूजैन्थेली प्रकाश-संश्लेषण के माध्यम से प्रवाल को उसके भोजन का लगभग 90% हिस्सा प्रदान करते हैं। इन शैवाल के बिना, प्रवाल भूखा रहने लगता है और कमजोर हो जाता है।
क्या विरंजित प्रवाल मर चुका है?
नहीं, तुरंत नहीं। एक विरंजित प्रवाल अभी भी जीवित है। यदि तनावपूर्ण परिस्थितियाँ कम हो जाती हैं और पानी सामान्य हो जाता है, तो प्रवाल धीरे-धीरे ज़ूजैन्थेली को फिर से ग्रहण कर सकता है और ठीक (recover) हो सकता है।
लेकिन, यदि तनाव की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भूखा प्रवाल अंततः मर जाएगा। मरने के बाद, उसका कंकाल शैवाल (Algae) से ढक जाता है और वह भित्ति का हिस्सा फिर कभी वापस नहीं आ पाता।
प्रवाल विरंजन के मुख्य कारण (Primary Causes of Coral Bleaching)
प्रवाल किसी भी प्रकार के पर्यावरणीय तनाव के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। विरंजन का मुख्य कारण वे कारक हैं जो ज़ूजैन्थेली और प्रवाल के सहजीवी संबंध को तोड़ देते हैं।
1. समुद्री तापमान में वृद्धि (Increase in Sea Water Temperature):
- यह प्रवाल विरंजन का सबसे प्रमुख और व्यापक कारण है।
- ग्लोबल वार्मिंग के कारण महासागरों का औसत तापमान बढ़ रहा है। यदि पानी का तापमान सामान्य से केवल 1-2°C भी अधिक हो जाता है और कुछ हफ्तों तक बना रहता है, तो यह बड़े पैमाने पर विरंजन (Mass Bleaching Event) को जन्म दे सकता है।
- एल नीनो (El Niño) जैसी घटनाएँ भी क्षेत्रीय रूप से समुद्री तापमान को बढ़ाती हैं, जिससे गंभीर विरंजन होता है।
2. समुद्री अम्लीकरण (Ocean Acidification):
- वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (
- CO2
- CO
- 2
-
- ) की बढ़ती मात्रा समुद्र द्वारा अवशोषित की जा रही है, जिससे समुद्र का पानी अधिक अम्लीय (acidic) हो रहा है (pH का स्तर कम हो रहा है)।
- यह अम्लीकरण प्रवाल के लिए कैल्शियम कार्बोनेट का कंकाल बनाना और उसे बनाए रखना कठिन बना देता है, जिससे वे कमजोर और तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
3. प्रदूषण (Pollution):
- भूमि-आधारित अपवाह (Land-based Runoff): खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक और कीटनाशक, या शहरों से आने वाला अनुपचारित सीवेज पानी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ा देते हैं। इससे शैवाल की वृद्धि होती है जो प्रवाल को ढककर मार सकते हैं।
- तलछट (Sedimentation): निर्माण या वनों की कटाई से बहकर आने वाली मिट्टी और गाद पानी को गंदला कर देती है, जिससे सूर्य का प्रकाश अवरुद्ध होता है और प्रवाल के पॉलीप्स का दम घुटता है।
4. सूर्य के प्रकाश का अत्यधिक संपर्क (Overexposure to Sunlight):
- निम्न ज्वार के समय, यदि प्रवाल लंबे समय तक सीधे तीव्र सूर्य के प्रकाश के संपर्क में रहते हैं, तो इससे भी विरंजन हो सकता है, खासकर जब पानी असामान्य रूप से शांत और साफ हो।
5. बीमारियाँ (Diseases):
- प्रदूषण और बढ़ते तापमान से प्रवाल कमजोर हो जाते हैं, जिससे वे बैक्टीरिया और कवक से होने वाली बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं, जो विरंजन का कारण बन सकती हैं।
प्रभाव और परिणाम (Impacts and Consequences)
- पारिस्थितिकी तंत्र का पतन (Ecosystem Collapse): चूँकि प्रवाल भित्तियाँ 25% समुद्री जीवन का समर्थन करती हैं, उनके नष्ट होने से पूरी खाद्य श्रृंखला बाधित हो जाती है और उन पर निर्भर हजारों प्रजातियों का आवास छिन जाता है।
- आर्थिक नुकसान (Economic Losses):
- मत्स्य पालन में गिरावट: मछली की आबादी कम हो जाती है, जिससे मछुआरों की आजीविका प्रभावित होती है।
- पर्यटन का पतन: स्कूबा डाइविंग और स्नॉर्कलिंग जैसे पर्यटन आकर्षण समाप्त हो जाते हैं।
- तटीय सुरक्षा में कमी (Reduced Coastal Protection): मृत प्रवाल भित्तियाँ कमजोर हो जाती हैं और टूट जाती हैं, जिससे वे तूफानी लहरों और सुनामी के खिलाफ एक प्रभावी अवरोधक के रूप में काम नहीं कर पातीं। इससे तटीय समुदायों के लिए बाढ़ और अपरदन का खतरा बढ़ जाता है।
निष्कर्ष:
प्रवाल विरंजन एक स्पष्ट चेतावनी है कि मानव गतिविधियाँ और जलवायु परिवर्तन समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को अपरिवर्तनीय रूप से नुकसान पहुँचा रहे हैं। इस संकट से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और स्थानीय स्तर पर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है।
प्रवाल भित्तियों का भौगोलिक वितरण (Geographical Distribution of Coral Reefs)
प्रवाल भित्तियों का वितरण दुनिया भर में बहुत विशिष्ट है और यह सीधे तौर पर उन पर्यावरणीय दशाओं से निर्धारित होता है जिनकी उन्हें जीवित रहने और पनपने के लिए आवश्यकता होती है। ये मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के गर्म, उथले और साफ समुद्री जल में पाई जाती हैं।
मुख्य वितरण क्षेत्र: “प्रवाल पट्टी” (The Coral Belt)
विश्व की लगभग सभी प्रवाल भित्तियाँ कर्क रेखा (Tropic of Cancer) और मकर रेखा (Tropic of Capricorn) के बीच, यानी 30° उत्तर और 30° दक्षिण अक्षांशों के बीच स्थित हैं। इस क्षेत्र को अक्सर “प्रवाल पट्टी” (The Coral Belt) कहा जाता है।
इसका कारण यह है कि केवल इसी क्षेत्र में प्रवाल के विकास के लिए आवश्यक दशाएँ पूरी होती हैं:
- गर्म पानी: यहाँ का समुद्री तापमान साल भर 20°C – 28°C के आदर्श दायरे में रहता है।
- सूर्य का प्रकाश: यहाँ सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जो उथले पानी में मौजूद ज़ूजैन्थेली शैवाल के लिए प्रकाश-संश्लेषण हेतु आवश्यक हैं।
विश्व के प्रमुख प्रवाल भित्ति क्षेत्र
प्रवाल भित्तियों का वितरण दो प्रमुख क्षेत्रों में केंद्रित है:
1. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र (Indo-Pacific Region):
यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध प्रवाल भित्ति क्षेत्र है। यह लाल सागर, पूर्वी अफ्रीका और हिंद महासागर से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया और प्रशांत महासागर तक फैला हुआ है।
- प्रवाल त्रिभुज (The Coral Triangle):
- यह इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया, पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप और तिमोर-लेस्ते को कवर करने वाला क्षेत्र है।
- इसे “समुद्र का अमेज़न” (Amazon of the Seas) कहा जाता है क्योंकि यह दुनिया में समुद्री जैव विविधता का केंद्र है। यहाँ दुनिया की 76% से अधिक प्रवाल प्रजातियाँ और 37% से अधिक भित्ति मछली प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- ऑस्ट्रेलिया (Australia):
- यहाँ ग्रेट बैरियर रीफ (Great Barrier Reef) स्थित है, जो दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध प्रवाल भित्ति प्रणाली है।
- लाल सागर (Red Sea):
- यह उच्च तापमान और उच्च लवणता वाले वातावरण में भी पनपने वाली प्रवाल भित्तियों के लिए जाना जाता है।
- प्रशांत महासागर के द्वीप (Pacific Ocean Islands):
- फ़िजी, फ्रेंच पोलिनेशिया, माइक्रोनेशिया और हवाई जैसे द्वीपों के चारों ओर व्यापक प्रवाल भित्तियाँ पाई जाती हैं, जिनमें कई एटॉल (Atolls) शामिल हैं।
2. अटलांटिक महासागर क्षेत्र (Atlantic Ocean Region):
यह इंडो-पैसिफिक की तुलना में छोटा क्षेत्र है और यहाँ प्रजातियों की विविधता भी कम है।
- कैरिबियन सागर (Caribbean Sea):
- यह अटलांटिक में प्रवाल भित्तियों का मुख्य केंद्र है। फ्लोरिडा (USA), बहामास और मध्य अमेरिका के तटों पर भित्तियाँ पाई जाती हैं।
- बेलीज बैरियर रीफ (Belize Barrier Reef) दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अवरोधक भित्ति प्रणाली है।
वितरण को सीमित करने वाले कारक (Limiting Factors of Distribution)
प्रवाल भित्तियाँ कुछ विशिष्ट स्थानों पर क्यों नहीं पाई जातीं, यह समझना भी महत्वपूर्ण है:
- महाद्वीपों के पश्चिमी तट (Western Coasts of Continents):
- उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी, महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर प्रवाल भित्तियाँ लगभग अनुपस्थित हैं।
- कारण: इन तटों पर ठंडी महासागरीय धाराओं (Cold Ocean Currents) का प्रवाह होता है (जैसे पेरू की हम्बोल्ट धारा और अफ्रीका की बेंगुएला धारा), जो पानी के तापमान को प्रवाल के लिए आवश्यक स्तर से नीचे ले जाती हैं।
- बड़ी नदियों के मुहाने (Mouths of Large Rivers):
- प्रवाल भित्तियाँ अमेज़न (दक्षिण अमेरिका) या कांगो (अफ्रीका) जैसी बड़ी नदियों के मुहाने के पास नहीं पाई जातीं।
- कारण:
- ताजा पानी: नदियाँ भारी मात्रा में ताजा पानी लाती हैं, जो लवणता को कम कर देता है।
- अवसाद (Sediment): नदियाँ अपने साथ बहुत अधिक मिट्टी और गाद लाती हैं, जो पानी को गंदला कर देती है, सूर्य के प्रकाश को रोकती है और कोरल पॉलीप्स का दम घोंट देती है।
भारत में प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs in India)
भारत में चार प्रमुख प्रवाल भित्ति क्षेत्र हैं:
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह: भारत का सबसे समृद्ध और विविध प्रवाल भित्ति क्षेत्र।
- लक्षद्वीप द्वीप समूह: यह पूरी तरह से एटॉल से बना है।
- मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु तट): यहाँ तटीय भित्तियाँ पाई जाती हैं।
- कच्छ की खाड़ी (गुजरात तट): यह उच्च तापमान और तलछट के प्रति सहनशील प्रवालों का एक अनूठा उदाहरण है।
प्रवाल भित्तियों का महत्व (Importance of Coral Reefs)
प्रवाल भित्तियाँ केवल सुंदर पानी के नीचे की संरचनाएँ नहीं हैं; वे पृथ्वी पर सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं। इनका महत्व पारिस्थितिक, आर्थिक और भौतिक, सभी दृष्टिकोणों से अत्यधिक है। अपनी विशाल जैव विविधता के कारण इन्हें справедливо ही “समुद्र का वर्षावन” (Rainforests of the Sea) कहा जाता है।
1. पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance)
- जैव विविधता का केंद्र (Center of Biodiversity):
- यह प्रवाल भित्तियों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। यद्यपि ये समुद्री तल का 1% से भी कम हिस्सा घेरती हैं, फिर भी ये दुनिया के लगभग 25% समुद्री जीवन को आवास, भोजन और प्रजनन के लिए आश्रय प्रदान करती हैं।
- इन पर हजारों प्रजातियों की मछलियाँ, मोलस्क, केकड़े, समुद्री कछुए, स्पंज और शैवाल निर्भर हैं।
- समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार (Base of the Marine Food Chain):
- प्रवाल भित्तियों में रहने वाले सूक्ष्म शैवाल और छोटे जीव एक विशाल खाद्य श्रृंखला का आधार बनते हैं। छोटे जीव इन्हें खाते हैं, जिन्हें फिर बड़ी मछलियाँ खाती हैं, और यह श्रृंखला शार्क और डॉल्फ़िन जैसे शीर्ष शिकारियों तक जाती है।
- समुद्री प्रजातियों के लिए नर्सरी (Nursery for Marine Species):
- प्रवाल भित्तियों की जटिल संरचना छोटे और किशोर जीवों को शिकारियों से छिपने के लिए एक सुरक्षित स्थान प्रदान करती है। कई महत्वपूर्ण मछली प्रजातियाँ अपने जीवन के शुरुआती चरण इन्हीं भित्तियों में बिताती हैं, जिससे उनकी आबादी को बढ़ने में मदद मिलती है।
2. आर्थिक महत्व (Economic Importance)
- मत्स्य पालन और आजीविका (Fishing and Livelihood):
- दुनिया भर में करोड़ों लोग अपनी आजीविका और भोजन (प्रोटीन) के लिए प्रवाल भित्तियों पर निर्भर मछली पकड़ने के उद्योग से जुड़े हुए हैं। एक स्वस्थ प्रवाल भित्ति स्थानीय समुदायों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
- पर्यटन और मनोरंजन (Tourism and Recreation):
- प्रवाल भित्तियाँ दुनिया भर में एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण हैं। स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग, ग्लास-बॉटम बोट और अन्य मनोरंजक गतिविधियाँ हर साल करोड़ों पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।
- इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का राजस्व प्राप्त होता है और होटल, गोताखोरी ऑपरेटरों और टूर गाइड के रूप में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- औषधीय खोजें (Medical Discoveries):
- वैज्ञानिक प्रवाल भित्तियों में पाए जाने वाले जीवों से नए यौगिकों की खोज कर रहे हैं जिनका उपयोग नई दवाएँ बनाने में किया जा सकता है।
- इनसे कैंसर, गठिया, हृदय रोग और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए यौगिक प्राप्त किए गए हैं।
3. तटीय सुरक्षा (Coastal Protection)
- प्राकृतिक अवरोधक (Natural Barrier):
- प्रवाल भित्तियाँ समुद्र और तट के बीच एक प्राकृतिक, जीवित दीवार के रूप में कार्य करती हैं।
- वे 97% तक लहर ऊर्जा को अवशोषित कर लेती हैं, जिससे लहरों की शक्ति और गति कम हो जाती है।
- तूफान और सुनामी से बचाव (Protection from Storms and Tsunamis):
- यह ऊर्जा अवशोषण तटीय समुदायों को तूफानों, हरिकेन और यहाँ तक कि सुनामी के विनाशकारी प्रभाव से बचाने में मदद करता है।
- स्वस्थ प्रवाल भित्तियाँ बाढ़ को कम करती हैं, तटीय अपरदन को रोकती हैं और मानव जीवन तथा संपत्ति की रक्षा करती हैं। एक अध्ययन के अनुसार, प्रवाल भित्तियों के बिना तटीय बाढ़ से होने वाला वार्षिक नुकसान दोगुना हो जाएगा।
4. वैज्ञानिक और संकेतक महत्व (Scientific and Indicator Importance)
- जलवायु परिवर्तन के संकेतक (Indicators of Climate Change):
- प्रवाल पर्यावरणीय तनाव, विशेष रूप से बढ़ते समुद्री तापमान के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) की घटनाएँ समुद्री स्वास्थ्य में गिरावट और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का एक स्पष्ट और दृश्यमान संकेत हैं।
- इन्हें अक्सर “महासागरों के लिए कोयले की खान में कैनरी पक्षी” (Canary in the Coal Mine for Oceans) कहा जाता है, जो हमें आसन्न खतरे की चेतावनी देते हैं।
- वैज्ञानिक अनुसंधान (Scientific Research):
- प्रवाल के कंकाल विकास के छल्ले (growth rings) बनाते हैं, जिनका अध्ययन करके वैज्ञानिक सैकड़ों वर्षों तक के पिछले जलवायु और समुद्री परिस्थितियों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
निष्कर्ष:
प्रवाल भित्तियाँ केवल एक सुंदर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र नहीं हैं, बल्कि वे तटीय जीवन, वैश्विक अर्थव्यवस्था और पृथ्वी के स्वास्थ्य के लिए অপরিहार্য हैं। उनका संरक्षण न केवल समुद्री जीवन के भविष्य के लिए, बल्कि मानव समाज के कल्याण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सुनामी (Tsunami)
सुनामी जापानी भाषा का शब्द है (त्सु 津 = बंदरगाह, नामि 波 = लहर), जिसका शाब्दिक अर्थ है “बंदरगाह की लहर”। यह पानी के नीचे होने वाली किसी बड़ी हलचल के कारण उत्पन्न होने वाली अत्यधिक लंबी तरंगदैर्ध्य (wavelength) वाली समुद्री लहरों की एक श्रृंखला है।
यह एक आम गलतफहमी है कि सुनामी एक अकेली विशाल लहर होती है। वास्तव में, यह कई लहरों का एक समूह (wave train) है, जिनके बीच घंटों का अंतर हो सकता है, और पहली लहर अक्सर सबसे बड़ी नहीं होती।
सुनामी की उत्पत्ति के कारण (Causes for the Origin of Tsunami)
सुनामी का मूल कारण महासागर के पानी की एक विशाल मात्रा का अचानक और बड़े पैमाने पर विस्थापन (sudden and large-scale displacement) है। यह विस्थापन पानी के नीचे या उसके निकट होने वाली शक्तिशाली भूवैज्ञानिक घटनाओं के परिणामस्वरूप होता है। सुनामी की उत्पत्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. पनडुब्बी भूकंप (Submarine Earthquakes) – सबसे प्रमुख कारण
यह सुनामी उत्पन्न करने वाला सबसे आम और शक्तिशाली कारण है, जो लगभग 80-90% सुनामी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है।
- प्रक्रिया:
- टेक्टोनिक प्लेटों की गति: पृथ्वी की सतह कई बड़ी टेक्टोनिक प्लेटों में विभाजित है, जो लगातार गति कर रही हैं।
- सबडक्शन जोन (Subduction Zones): सुनामी उत्पन्न करने वाले अधिकांश भूकंप सबडक्शन जोन में होते हैं। इन क्षेत्रों में, एक भारी महासागरीय प्लेट (Oceanic Plate) एक हल्की महाद्वीपीय प्लेट (Continental Plate) के नीचे खिसकती है।
- तनाव का निर्माण: खिसकने की यह प्रक्रिया सुचारू नहीं होती। प्लेटें आपस में फंस जाती हैं, और दशकों या सदियों तक तनाव (stress) जमा होता रहता है। इस तनाव के कारण, ऊपर की महाद्वीपीय प्लेट विकृत होने लगती है और नीचे की ओर झुक जाती है।
- अचानक रिहाई (Sudden Release): जब तनाव इतना अधिक हो जाता है कि प्लेटें उसे और सहन नहीं कर पातीं, तो वे अचानक अपनी जगह से फिसल जाती हैं, जिससे एक शक्तिशाली भूकंप आता है।
- समुद्र तल का ऊर्ध्वाधर विस्थापन: इस फिसलन के दौरान, नीचे की ओर झुकी हुई महाद्वीपीय प्लेट “स्प्रिंग” की तरह वापस ऊपर उछलती है। यह समुद्र तल के एक विशाल हिस्से को अचानक कई मीटर ऊपर उठा देती है।
- पानी का विस्थापन: समुद्र तल का यह अचानक ऊपर उठना अपने ऊपर मौजूद पानी के पूरे स्तंभ (Column of water) को ऊपर धकेल देता है, जिससे सतह पर ऊर्जा की एक विशाल लहर बनती है जो चारों दिशाओं में फैल जाती है। यही सुनामी है।
- आवश्यक शर्त: सुनामी उत्पन्न करने के लिए, भूकंप का तीव्रता (Magnitude) में शक्तिशाली होना (आमतौर पर 7.0 से अधिक) और समुद्र तल में एक महत्वपूर्ण ऊर्ध्वाधर (vertical) हलचल पैदा करना आवश्यक है। क्षैतिज (horizontal) गति वाले भूकंप आमतौर पर सुनामी पैदा नहीं करते।
2. पनडुब्बी भूस्खलन (Submarine Landslides)
- प्रक्रिया: जब महाद्वीपीय ढलानों (Continental Slopes), पानी के नीचे की घाटियों (Submarine Canyons) या ज्वालामुखी द्वीपों के किनारों पर बड़ी मात्रा में तलछट, मिट्टी और चट्टानें अस्थिर हो जाती हैं, तो वे अचानक नीचे की ओर खिसक सकती हैं।
- प्रभाव: यह विशाल भूस्खलन अपने रास्ते में आने वाले पानी को तेजी से धकेलता और विस्थापित करता है, जिससे सुनामी उत्पन्न होती है। ये सुनामी अक्सर स्थानीय होती हैं लेकिन बहुत विनाशकारी हो सकती हैं।
3. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruptions)
ज्वालामुखी विस्फोट दो मुख्य तरीकों से सुनामी उत्पन्न कर सकते हैं:
- शक्तिशाली पनडुब्बी विस्फोट: जब समुद्र के नीचे एक ज्वालामुखी में अत्यधिक शक्तिशाली विस्फोट होता है, तो वह अपने ऊपर के पानी को तेजी से ऊपर की ओर धकेलता है।
- ज्वालामुखी का ढहना (Flank Collapse): किसी तटीय या द्वीपीय ज्वालामुखी का एक बड़ा हिस्सा (Flank) विस्फोट या अस्थिरता के कारण टूटकर समुद्र में गिर सकता है। पानी में अचानक गिरने वाली यह विशाल चट्टान और मलबा एक विनाशकारी सुनामी को जन्म दे सकता है। 1883 में इंडोनेशिया के क्राकाटोआ (Krakatoa) ज्वालामुखी के विस्फोट ने इसी तरह एक भयानक सुनामी उत्पन्न की थी।
4. उल्कापिंड का प्रभाव (Meteorite/Asteroid Impact)
- प्रक्रिया: यद्यपि यह अत्यंत दुर्लभ घटना है, यदि कोई बड़ा क्षुद्रग्रह या उल्कापिंड महासागर में गिरता है, तो उसकी प्रभाव ऊर्जा एक विशाल गड्ढा (Crater) बनाएगी और पानी की एक अविश्वसनीय मात्रा को विस्थापित करेगी।
- प्रभाव: इसके परिणामस्वरूप एक मेगा-सुनामी (Mega-Tsunami) उत्पन्न होगी, जिसकी ऊँचाई सैकड़ों या हजारों मीटर हो सकती है, और जिसका प्रभाव वैश्विक होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि डायनासोर के विलुप्त होने का कारण बने Chicxulub क्षुद्रग्रह के प्रभाव ने भी एक ऐसी ही मेगा-सुनामी उत्पन्न की थी।
निष्कर्ष:
सुनामी की उत्पत्ति के लिए आवश्यक मूल तत्व ऊर्जा का एक विशाल और अचानक विमोचन (release) है, जो पानी के एक बड़े स्तंभ को उसकी स्थिर स्थिति से विस्थापित कर सके। भूकंप इसके लिए सबसे आम तंत्र है, लेकिन कोई भी घटना जो यह कार्य कर सकती है, वह विनाशकारी सुनामी को जन्म दे सकती है।
सुनामी की विशेषताएँ (Characteristics of a Tsunami)
सुनामी साधारण समुद्री लहरों से बहुत अलग और कहीं अधिक विनाशकारी होती है। इसका व्यवहार गहरे और उथले पानी में नाटकीय रूप से बदल जाता है, जो इसे विशेष रूप से खतरनाक बनाता है। सुनामी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. गहरे समुद्र में विशेषताएँ (In the Deep Ocean)
जब सुनामी खुले, गहरे समुद्र में यात्रा करती है, तो इसकी विशेषताएँ भ्रामक रूप से कम खतरनाक लगती हैं:
- अत्यधिक लंबी तरंगदैर्ध्य (Extremely Long Wavelength):
- यह सुनामी की सबसे विशिष्ट पहचान है। इसकी तरंगदैर्ध्य (दो लगातार शिखरों के बीच की दूरी) 100 किलोमीटर से लेकर 500 किलोमीटर तक हो सकती है। इसकी तुलना में, एक सामान्य समुद्री लहर की तरंगदैर्ध्य कुछ सौ मीटर ही होती है।
- बहुत तेज गति (Very High Speed):
- अपनी लंबी तरंगदैर्ध्य के कारण, सुनामी गहरे समुद्र में अविश्वसनीय रूप से तेज गति से यात्रा करती है। इसकी गति पानी की गहराई पर निर्भर करती है और यह 800 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक हो सकती है, जो एक वाणिज्यिक जेट विमान की गति के बराबर है।
- बहुत कम ऊँचाई (Very Low Wave Height):
- गहरे समुद्र में, सुनामी की ऊँचाई (Amplitude) बहुत कम होती है, आमतौर पर एक मीटर (3 फीट) से भी कम।
- इस कम ऊँचाई और अत्यधिक लंबी तरंगदैर्ध्य के कारण, गहरे समुद्र में किसी जहाज के नीचे से सुनामी गुजर जाने पर भी उस पर सवार लोगों को इसका बिल्कुल भी पता नहीं चलता है।
- लंबी तरंग अवधि (Long Wave Period):
- सुनामी श्रृंखला में लहरों के आने के बीच का समय (Period) बहुत लंबा होता है, जो 10 मिनट से लेकर एक घंटे तक हो सकता है।
2. तट के पास की विशेषताएँ (Near the Coast)
जैसे ही सुनामी गहरे समुद्र से उथले तटीय जल में प्रवेश करती है, इसका पूरा चरित्र नाटकीय रूप से बदल जाता है:
- गति का कम होना (Decreased Speed):
- जब पानी की गहराई कम होती है, तो लहर का निचला हिस्सा समुद्र तल से घर्षण करना शुरू कर देता है। इस घर्षण के कारण सुनामी की गति धीमी हो जाती है।
- तरंगदैर्ध्य का छोटा होना (Decreased Wavelength):
- जैसे ही लहर धीमी होती है, पीछे से आने वाली लहरें आगे वाली लहरों के करीब आने लगती हैं, जिससे तरंगदैर्ध्य बहुत कम हो जाती है। पानी “संपीड़ित” (compressed) होने लगता है।
- ऊँचाई में नाटकीय वृद्धि (Dramatic Increase in Height) – “शोलिंग प्रभाव” (Shoaling Effect):
- यह सबसे विनाशकारी परिवर्तन है। चूँकि लहर की ऊर्जा उसकी गति कम होने के कारण अब आगे नहीं जा पाती, वह ऊर्जा लहर को ऊपर की ओर धकेलती है।
- इससे सुनामी की ऊँचाई तेजी से बढ़ती है और यह कुछ फीट से बढ़कर कई मीटर ऊँची (10, 20, या 30 मीटर से भी अधिक) हो सकती है। यह एक लगभग अदृश्य लहर से एक विशालकाय, विनाशकारी पानी की दीवार में बदल जाती है।
अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएँ
- लहरों की श्रृंखला (A Series of Waves):
- सुनामी कभी भी एक अकेली लहर नहीं होती है। यह हमेशा कई लहरों (“वेव ट्रेन” – Wave Train) की एक श्रृंखला के रूप में आती है, जिनके बीच घंटों का अंतर हो सकता है।
- अक्सर, पहली लहर सबसे बड़ी नहीं होती है। बाद में आने वाली लहरें (जैसे दूसरी या तीसरी) कहीं अधिक विनाशकारी हो सकती हैं।
- समुद्र का पीछे हटना (Drawback / Drawdown):
- यह सुनामी का एक प्रमुख चेतावनी संकेत है। अक्सर लहर के शिखर (crest) के आने से पहले, उसका गर्त (trough) तट पर पहुँचता है।
- इसके कारण समुद्र का पानी अचानक और नाटकीय रूप से तट से बहुत दूर पीछे हट जाता है, और समुद्र तल दिखाई देने लगता है। यह घटना आगामी विनाशकारी लहर का स्पष्ट संकेत है।
- विनाशकारी शक्ति (Destructive Power):
- सुनामी की शक्ति केवल उसकी ऊँचाई में नहीं, बल्कि उसके पानी की भारी मात्रा और गति में होती है। यह एक लहर की तरह नहीं, बल्कि एक तेजी से बढ़ती हुई बाढ़ या नदी की तरह तट पर चढ़ती है, जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज—पेड़, इमारतें, कारें—को नष्ट कर देती है।
- लहर के वापस समुद्र में लौटने की प्रक्रिया (बैकवॉश – Backwash) भी उतनी ही विनाशकारी होती है, जो अपने साथ भारी मलबा खींचकर ले जाती है।
भारत में सुनामी प्रभावित क्षेत्र (Tsunami-Prone Areas in India)
भारत की लंबी तटरेखा (लगभग 7,500 किमी) इसे सुनामी के प्रति संवेदनशील बनाती है, हालांकि सभी तटीय क्षेत्र समान रूप से जोखिम में नहीं हैं। 26 दिसंबर 2004 की हिंद महासागर सुनामी के विनाशकारी अनुभव ने भारत की संवेदनशीलता को स्पष्ट रूप से उजागर किया, जिसके बाद सुनामी की तैयारी और चेतावनी प्रणालियों पर गंभीरता से ध्यान दिया गया।
भारत में सुनामी प्रभावित क्षेत्रों को उनकी संवेदनशीलता के स्तर के आधार पर मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है:
1. अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र (Highly Vulnerable Areas)
ये वे क्षेत्र हैं जो सुनामी उत्पन्न करने वाले प्रमुख भूवैज्ञानिक स्रोतों के सीधे रास्ते में आते हैं और ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
क. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (Andaman & Nicobar Islands):
- कारण: यह भारत का सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र है। इसका मुख्य कारण इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह द्वीप समूह इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के बहुत निकट स्थित है, जहाँ इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट और यूरेशियन प्लेट (बर्मीज माइनर प्लेट) का मिलन होता है। यह एक अत्यधिक सक्रिय सबडक्शन जोन (Subduction Zone) है, जो शक्तिशाली भूकंपों और सुनामी का प्रमुख स्रोत है।
- 2004 का प्रभाव: 2004 की सुनामी का केंद्र इसी क्षेत्र के पास था, जिसके कारण ये द्वीप सबसे पहले और सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए थे। कई द्वीपों में लहरों की ऊँचाई 10 मीटर से भी अधिक थी, जिससे भारी विनाश हुआ।
ख. पूर्वी तट (East Coast of India):
- राज्य: तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी।
- कारण: भारत का पूर्वी तट बंगाल की खाड़ी के साथ लगा हुआ है, जो इंडोनेशिया और अंडमान के भूकंपीय क्षेत्र के लिए सीधे तौर पर खुला है। यदि इस क्षेत्र में सुनामी उत्पन्न होती है, तो लहरों को भारतीय पूर्वी तट तक पहुँचने के लिए कोई बड़ी भौगोलिक बाधा नहीं मिलती।
- 2004 का प्रभाव:
- तमिलनाडु: यह मुख्य भूमि पर सबसे अधिक प्रभावित राज्य था, विशेष रूप से नागपट्टिनम, कन्याकुमारी और चेन्नई के तटीय जिले।
- आंध्र प्रदेश: इसके तटीय जिलों में भी भारी जान-माल का नुकसान हुआ।
- पुडुचेरी और केरल: केरल, जो पश्चिमी तट पर है, का दक्षिणी भाग भी प्रभावित हुआ क्योंकि सुनामी की लहरें श्रीलंका के चारों ओर घूमकर वहाँ पहुँची थीं।
2. कम संवेदनशील लेकिन जोखिम वाले क्षेत्र (Less Vulnerable but At-Risk Areas)
ये क्षेत्र भौगोलिक रूप से अधिक सुरक्षित हैं, लेकिन वे पूरी तरह से खतरे से बाहर नहीं हैं।
क. पश्चिमी तट (West Coast of India):
- राज्य: गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और केरल।
- कम संवेदनशीलता का कारण: भारत का पश्चिमी तट अरब सागर के साथ स्थित है। यह भारतीय प्रायद्वीप द्वारा बंगाल की खाड़ी के मुख्य सुनामी स्रोत से भौगोलिक रूप से परिरक्षित (Geographically Shielded) है। 2004 की सुनामी की लहरें भारत और श्रीलंका के चारों ओर घूमकर यहाँ तक पहुँचीं, जिससे उनकी अधिकांश ऊर्जा समाप्त हो गई थी।
- जोखिम का कारण: पश्चिमी तट के लिए सुनामी का एक अलग संभावित स्रोत है – मकरान सबडक्शन जोन (Makran Subduction Zone), जो अरब सागर में पाकिस्तान और ईरान के तट के पास स्थित है।
- ऐतिहासिक प्रमाण: 1945 में इस क्षेत्र में आए भूकंप के कारण एक शक्तिशाली सुनामी उत्पन्न हुई थी, जिसने पाकिस्तान के साथ-साथ गुजरात के तटों को भी प्रभावित किया था। यदि भविष्य में मकरान क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप आता है, तो यह भारत के पश्चिमी तट के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर सकता है।
सारांश तालिका
| संवेदनशीलता स्तर | क्षेत्र | सुनामी का मुख्य स्रोत |
| अत्यधिक संवेदनशील | अंडमान और निकोबार द्वीप समूह | सुमात्रा-अंडमान सबडक्शन जोन |
| अत्यधिक संवेदनशील | पूर्वी तट (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा) | सुमात्रा-अंडमान सबडक्शन जोन |
| कम संवेदनशील | पश्चिमी तट (गुजरात, महाराष्ट्र, केरल) | मकरान सबडक्शन जोन |
भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम
2004 की सुनामी के बाद, भारत ने सुनामी से निपटने के लिए एक मजबूत प्रणाली विकसित की है।
- भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Indian Tsunami Early Warning System – ITEWC):
- स्थान: हैदराबाद में स्थित INCOIS (Indian National Centre for Ocean Information Services) में स्थापित।
- कार्य: यह प्रणाली भूकंपीय सेंसर, गहरे समुद्र में स्थित बॉटम प्रेशर रिकॉर्डर (BPRs), और ज्वार गेज के एक नेटवर्क का उपयोग करके सुनामी का पता लगाती है।
- यह हिंद महासागर क्षेत्र में सुनामी की चेतावनी कुछ ही मिनटों में जारी करने में सक्षम है और न केवल भारत को, बल्कि हिंद महासागर के अन्य देशों को भी यह सेवा प्रदान करती है।
चेतावनी प्रणाली के प्रमुख घटक (Key Components of a Warning System)
एक प्रभावी सुनामी चेतावनी प्रणाली तीन मुख्य घटकों पर काम करती है: मूल्यांकन (Assessment), पहचान (Detection), और प्रसार (Dissemination)।
1. भूकंपीय निगरानी और मूल्यांकन (Seismic Monitoring and Assessment)
यह चेतावनी प्रणाली का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
- नेटवर्क: दुनिया भर में हजारों भूकंपीय स्टेशन (Seismometers) का एक नेटवर्क है जो 24/7 पृथ्वी की गति की निगरानी करता है।
- प्रक्रिया:
- जब कहीं भूकंप आता है, तो ये स्टेशन तुरंत भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves) का पता लगाते हैं।
- इन डेटा का उपयोग करके, वैज्ञानिक कुछ ही मिनटों में भूकंप के स्थान (Location), समय (Time), तीव्रता (Magnitude) और गहराई (Depth) का निर्धारण करते हैं।
- मूल्यांकन: यदि भूकंप समुद्र के नीचे, उथली गहराई पर है और उसकी तीव्रता (आमतौर पर 7.0 से अधिक) इतनी शक्तिशाली है कि वह सुनामी उत्पन्न कर सके, तो एक प्रारंभिक सुनामी चेतावनी (Tsunami Watch) या सूचना (Information Bulletin) जारी की जाती है।
2. सुनामी का पता लगाना और पुष्टि करना (Tsunami Detection and Confirmation)
केवल भूकंप का आना सुनामी की गारंटी नहीं है। यह पुष्टि करना आवश्यक है कि सुनामी वास्तव में उत्पन्न हुई है या नहीं। इसके लिए दो मुख्य तकनीकों का उपयोग किया जाता है:
क. डीप-ओशन असेसमेंट एंड रिपोर्टिंग ऑफ़ सुनामीज़ (DART) बुआई सिस्टम:
- संरचना: यह एक अत्याधुनिक प्रणाली है जिसमें दो भाग होते हैं:
- बॉटम प्रेशर रिकॉर्डर (Bottom Pressure Recorder – BPR): यह समुद्र तल पर स्थित एक उच्च-संवेदनशील दबाव सेंसर होता है।
- सतही बुआई (Surface Buoy): BPR सतह पर तैरती बुआई को ध्वनिक संकेतों (acoustic signals) के माध्यम से डेटा भेजता है।
- प्रक्रिया: जब एक सुनामी की लहर BPR के ऊपर से गुजरती है, तो पानी का दबाव थोड़ा बढ़ जाता है। BPR इस सूक्ष्म परिवर्तन को भी माप लेता है और सतह की बुआई को संकेत भेजता है।
- डेटा प्रसारण: सतही बुआई फिर इस डेटा को उपग्रह (Satellite) के माध्यम से तुरंत सुनामी चेतावनी केंद्रों को भेज देती है।
- महत्व: DART प्रणाली ही सुनामी की वास्तविक पुष्टि (real-time confirmation) करने का एकमात्र विश्वसनीय तरीका है। इससे झूठी चेतावनियों (false alarms) को कम करने में मदद मिलती है।
ख. तटीय ज्वार गेज (Coastal Tide Gauges):
- ये तटों और बंदरगाहों पर स्थित जल स्तर मापने के उपकरण होते हैं।
- जब सुनामी की लहर तट के पास पहुँचती है, तो ये उपकरण जल स्तर में असामान्य वृद्धि या गिरावट को मापते हैं और चेतावनी केंद्रों को डेटा भेजते हैं। यह सुनामी की पुष्टि करने में भी मदद करता है और उसके प्रभाव का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण है।
3. चेतावनी का प्रसार (Warning Dissemination)
यह प्रणाली का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है: जानकारी को आम जनता तक पहुँचाना।
- चेतावनी केंद्र (Warning Centers): डेटा का विश्लेषण करने के बाद, प्रशांत सुनामी चेतावनी केंद्र (PTWC) जैसे क्षेत्रीय केंद्र संबंधित देशों की सरकारी एजेंसियों को चेतावनी जारी करते हैं।
- प्रसार के माध्यम:
- आपातकालीन सायरन (Emergency Sirens): तटीय क्षेत्रों में लगे लाउडस्पीकर।
- मोबाइल अलर्ट (Mobile Alerts): SMS या सेल ब्रॉडकास्ट संदेश।
- टेलीविजन और रेडियो प्रसारण।
- वेबसाइट और सोशल मीडिया।
- पुलिस, सेना और स्थानीय अधिकारियों के माध्यम से प्रत्यक्ष घोषणाएं।
- समुदाय की तैयारी (Community Preparedness): प्रौद्योगिकी के अलावा, प्रभावी चेतावनी के लिए जनता का शिक्षित और जागरूक होना भी आवश्यक है। लोगों को पता होना चाहिए कि चेतावनी का क्या मतलब है, सुनामी के प्राकृतिक संकेत क्या हैं (भूकंप, समुद्र का पीछे हटना), और निकासी मार्ग (evacuation routes) कहाँ हैं।
भारत की सुनामी चेतावनी प्रणाली
- नाम: भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Indian Tsunami Early Warning System – ITEWC)
- संचालक: INCOIS (Indian National Centre for Ocean Information Services), हैदराबाद।
- स्थापना: 2004 की सुनामी के बाद 2007 में स्थापित।
- विशेषताएँ:
- यह भारत की पूरी तटरेखा और द्वीपों को कवर करती है।
- यह भूकंपीय स्टेशनों, DART बुआई और ज्वार गेज के एक मजबूत नेटवर्क से सुसज्जित है।
- यह भूकंप आने के 10-20 मिनट के भीतर हिंद महासागर क्षेत्र के लिए सुनामी की चेतावनी जारी करने में सक्षम है।
- यह “क्षेत्रीय सुनामी सेवा प्रदाता” (Regional Tsunami Service Provider) के रूप में हिंद महासागर रिम के 25 से अधिक देशों को सुनामी सलाह भी प्रदान करता है।
यह प्रणाली दुनिया की सबसे उन्नत और विश्वसनीय सुनामी चेतावनी प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
सुनामी बनाम ज्वारीय लहर (Tsunami vs. Tidal Wave)
अक्सर सुनामी को गलती से “ज्वारीय लहर” (Tidal Wave) कह दिया जाता है, जो गलत है।
- सुनामी भूवैज्ञानिक घटनाओं (भूकंप, भूस्खलन) से उत्पन्न होती है।
- ज्वारीय लहरें चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न होने वाले ज्वार-भाटे से संबंधित हैं।
इतिहास की प्रमुख सुनामी घटनाएँ
- 2004 हिंद महासागर सुनामी: सुमात्रा (इंडोनेशिया) के तट पर 9.1 तीव्रता के भूकंप के कारण आई इस सुनामी ने 14 देशों में 2,30,000 से अधिक लोगों की जान ली। यह इतिहास की सबसे घातक प्राकृतिक आपदाओं में से एक थी।
- 2011 तोहोकू (जापान) सुनामी: 9.0 तीव्रता के भूकंप के बाद आई इस सुनामी ने जापान के पूर्वी तट पर भारी तबाही मचाई और फुकुशिमा दाइची परमाणु आपदा (Fukushima Daiichi Nuclear Disaster) का कारण बनी।
- 1883 क्राकाटोआ सुनामी: क्राकाटोआ ज्वालामुखी विस्फोट ने 100 फीट से अधिक ऊँची लहरें पैदा कीं, जिससे हजारों लोग मारे गए।
सुनामी के प्रभाव और सुरक्षा उपाय
- प्रभाव: सुनामी से बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान होता है, बुनियादी ढाँचा (सड़कें, पुल, घर) नष्ट हो जाता है, और तटीय क्षेत्रों में पीने का पानी और खेत खारे पानी से दूषित हो जाते हैं।
- सुरक्षा उपाय:
- आधिकारिक चेतावनियों पर ध्यान दें।
- यदि भूकंप महसूस हो या समुद्र पीछे हटे, तो बिना किसी चेतावनी का इंतजार किए तुरंत ऊँचे स्थान (High Ground) और तट से दूर अंदर की ओर (Inland) भागें।
- याद रखें कि सुनामी कई लहरों की एक श्रृंखला है, इसलिए जब तक अधिकारी सुरक्षित घोषित न कर दें, तब तक सुरक्षित स्थान पर ही रहें।
महासागरीय निक्षेप (Oceanic Deposits)
महासागरीय निक्षेप समुद्र के तल पर जमा हुए असंगठित तलछटों (sediments) को कहते हैं। ये निक्षेप लाखों वर्षों में धीरे-धीरे जमा हुए हैं और इनमें पृथ्वी के भूवैज्ञानिक और जलवायु इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी छिपी होती है। इनकी मोटाई अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग होती है—महाद्वीपीय शेल्फ पर सबसे मोटी और मध्य-महासागरीय कटकों (Mid-Oceanic Ridges) पर सबसे पतली।
महासागरीय निक्षेपों को उनके स्रोत (Source) या उत्पत्ति (Origin) के आधार पर मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
- भूमि-जनित निक्षेप (Terrigenous Deposits) – भूमि से प्राप्त
- समुद्र-जनित निक्षेप (Pelagic Deposits) – महासागरों से प्राप्त
1. भूमि-जनित निक्षेप (Terrigenous Deposits)
जैसा कि नाम से पता चलता है, ये निक्षेप भूमि (continents) पर स्थित चट्टानों के अपरदन (erosion) और अपक्षय (weathering) से उत्पन्न होते हैं। इन्हें नदियों, हिमनदों, हवा और ज्वालामुखियों द्वारा बहाकर समुद्र में लाया जाता है। ये मुख्य रूप से महाद्वीपीय शेल्फ, ढलान और राइज़ पर पाए जाते हैं।
इनके प्रमुख प्रकार हैं:
क. स्थलीय निक्षेप (Land-derived Sediments):
- नदियों द्वारा लाए गए (Fluvial):
- स्रोत: नदियाँ चट्टानों को काटकर रेत, सिल्ट (गाद) और चिकनी मिट्टी (clay) अपने साथ बहाकर लाती हैं और डेल्टा तथा महाद्वीपीय शेल्फ पर जमा कर देती हैं।
- प्रमुख पदार्थ: क्वार्ट्ज, फेल्डस्पार। मोटे कण (रेत) तट के पास जमा होते हैं और महीन कण (मिट्टी) गहरे पानी में जाते हैं।
- हिमानीय निक्षेप (Glacial):
- स्रोत: हिमनद (Glaciers) और हिमखंड (Icebergs) अपने साथ बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े (बोल्डर) और बारीक तलछट बहाकर लाते हैं और ध्रुवीय क्षेत्रों के समुद्र तल पर जमा कर देते हैं।
ख. ज्वालामुखी निक्षेप (Volcanic Sediments):
- स्रोत: ज्वालामुखियों से निकलने वाली राख (Ash), धूल और लावा। ये पदार्थ हवा द्वारा या सीधे समुद्री ज्वालामुखियों से समुद्र में जमा होते हैं।
- उदाहरण: प्रशांत महासागर में “ज्वालामुखी कीचड़” (Volcanic mud) का पाया जाना।
ग. पवन-जनित निक्षेप (Aeolian Sediments):
- स्रोत: हवा रेगिस्तानों और शुष्क क्षेत्रों से बारीक रेत और धूल के कणों को उड़ाकर समुद्रों में जमा करती है।
- उदाहरण: सहारा मरुस्थल से उड़ी धूल अटलांटिक महासागर में जमा होती है।
2. समुद्र-जनित या पेलैजिक निक्षेप (Pelagic Deposits)
“पेलैजिक” का अर्थ है खुले, गहरे समुद्र से संबंधित। ये निक्षेप मुख्य रूप से गहरे समुद्र के तल (Abyssal plains) पर पाए जाते हैं। ये बहुत ही महीन कणों से बने होते हैं और इनके जमा होने की दर बहुत धीमी होती है (प्रति 1000 वर्ष में कुछ मिलीमीटर)।
इनके दो मुख्य उप-प्रकार हैं:
क. जैविक निक्षेप या ऊज (Biogenous Deposits or Ooze):
- ये निक्षेप समुद्री जीवों और पौधों के कंकालों और अवशेषों से बनते हैं, विशेष रूप से सूक्ष्म प्लैंकटन से।
- जब ये जीव मर जाते हैं, तो उनके कठोर हिस्से (कंकाल, खोल) धीरे-धीरे समुद्र के तल पर जमा हो जाते हैं।
- यदि किसी निक्षेप में 30% से अधिक जैविक अवशेष हों, तो उसे ऊज (Ooze) कहा जाता है। ऊज दो प्रकार के होते हैं:
| ऊज का प्रकार | निर्माण सामग्री | बनाने वाले जीव | प्रमुखता |
| कैल्शियम युक्त ऊज (Calcareous Ooze) | कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO3CaCO3) से बने खोल। | • टेरोपोड (Pteropods)<br>• ग्लोबिजेरिना (Globigerina) – सबसे महत्वपूर्ण | यह गर्म और अपेक्षाकृत कम गहरे पानी में पाया जाता है (4000 मीटर से कम), क्योंकि इससे अधिक गहराई पर दबाव और ठंडक के कारण कैल्शियम कार्बोनेट घुल जाता है (इसे CCD – Carbonate Compensation Depth कहते हैं)। |
| सिलिका युक्त ऊज (Siliceous Ooze) | सिलिका (SiO2SiO2) से बने कंकाल। | • रेडियोलेरिया (Radiolarians)<br>• डाइएटम (Diatoms) | यह गहरे, ठंडे पानी में पाया जाता है जहाँ कैल्शियम कार्बोनेट घुल जाता है। यह मुख्य रूप से अंटार्कटिक और प्रशांत महासागरों में अधिक मिलता है। |
ख. अजैविक निक्षेप (Inorganic Pelagic Sediments):
- लाल मिट्टी (Red Clay):
- यह गहरे समुद्र का सबसे व्यापक निक्षेप है। यह ज्वालामुखी धूल और अंतरिक्षीय धूल (cosmic dust) के बहुत ही महीन कणों से बनता है।
- रंग: इसमें लोहे के ऑक्साइड की अधिकता के कारण इसका रंग लाल या भूरा होता है।
- वितरण: यह उन सबसे गहरे क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ जैविक निक्षेप (ऊज) कम होते हैं क्योंकि प्लैंकटन की उत्पादकता कम होती है या कैल्शियम कार्बोनेट घुल जाता है।
- हाइड्रोजेनस निक्षेप (Hydrogenous Deposits):
- ये वे पदार्थ हैं जो सीधे समुद्री जल में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से अवक्षेपित (precipitated) होते हैं।
- प्रमुख उदाहरण:
- पॉलीमेटेलिक नोड्यूल (Polymetallic Nodules) या मैंगनीज नोड्यूल: आलू के आकार के ये पिंड समुद्र तल पर बिखरे होते हैं। ये लोहे और मैंगनीज के ऑक्साइड से बने होते हैं और इनमें निकल, तांबा और कोबाल्ट जैसी मूल्यवान धातुएँ भी होती हैं, जो इन्हें भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन बनाती हैं।