समुद्र विज्ञान (Oceanography)

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समुद्र विज्ञान पृथ्वी विज्ञान की वह शाखा है जो महासागरों, सागरों और उनसे संबंधित भौतिक, रासायनिक, भूवैज्ञानिक और जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन करती है। इसके अंतर्गत महासागरीय जल की गति (धाराएँ, ज्वार, लहरें), तापमान, लवणता, और समुद्री जीवन के साथ-
साथ महासागरों के तल (Ocean Floor) की संरचना का अध्ययन भी शामिल है।

महासागरों के तल की स्थलाकृति (Ocean Relief)

जिस प्रकार महाद्वीपों की सतह पर पर्वत, पठार, मैदान और घाटियाँ जैसी विभिन्न स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं, उसी प्रकार महासागरों का तल भी समतल नहीं है, बल्कि उस पर भी अत्यंत जटिल और विविध स्थलाकृतियाँ मौजूद हैं। इन स्थलाकृतियों को सामूहिक रूप से उच्चावच (Relief) कहा जाता है।

महासागरों के तल को गहराई और ढाल के आधार पर मुख्य रूप से चार प्रमुख प्रभागों (Major Divisions) में विभाजित किया जाता है।

[आरेख: महाद्वीपीय तट से गहरे समुद्र की ओर का एक क्रॉस-
सेक्शनल प्रोफ़ाइल। इसमें क्रमशः महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf) को मंद ढाल, महाद्वीपीय ढाल (Continental Slope) को तीव्र ढाल, महाद्वीपीय उभार (Continental Rise) को ढाल में कमी, और फिर विस्तृत गभीर सागरीय मैदान (Abyssal Plain) को दर्शाया गया हो।]


1. महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)

2. महाद्वीपीय ढाल (Continental Slope)

3. महाद्वीपीय उभार (Continental Rise)

4. गभीर सागरीय मैदान या नितलीय मैदान (Abyssal Plain or Deep Sea Plain)


लघु उच्चावचीय स्थलाकृतियाँ (Minor Relief Features)

महासागरों के तल पर चार प्रमुख प्रभागों (मग्नतट, ढाल, उभार, मैदान) के अतिरिक्त, कई अन्य छोटी लेकिन भूवैज्ञानिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं। इनका निर्माण विवर्तनिक (Tectonic), ज्वालामुखीय (Volcanic) और निक्षेपणात्मक (Depositional) प्रक्रियाओं द्वारा होता है।

1. मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge – MOR)

2. समुद्री टीला या सीमाउंट (Seamount)

3. गुयोट (Guyot)

4. महासागरीय गर्त या खाई (Oceanic Trench)

5. अंतःसागरीय कैनियन (Submarine Canyon)

लघु स्थलाकृतियों का सारांश

स्थलाकृतिनिर्माण प्रक्रियासंबद्ध प्लेट सीमामुख्य पहचान
मध्य-महासागरीय कटकसमुद्र तल प्रसरण (ज्वालामुखी)अपसारी (Divergent)सबसे लंबी जलमग्न पर्वत श्रृंखला
सीमाउंट (Seamount)ज्वालामुखीनुकीला शिखर, जल के नीचे
गुयोट (Guyot)ज्वालामुखी + लहर अपरदनसपाट शिखर, जल के नीचे
गर्त (Trench)क्षेपण (Subduction)अभिसारी (Convergent)पृथ्वी का सबसे गहरा भाग
अंतःसागरीय कैनियनटर्बिडिटी धाराएँ / अपरदनमहाद्वीपीय ढाल पर ‘V’ आकार की घाटी
स्थलाकृतिविवरणउदाहरण
मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge)⋆ अपसारी प्लेट सीमाओं (Divergent Boundaries) पर बनने वाली एक विशाल, जलमग्न पर्वत श्रृंखला। यह पृथ्वी की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला (~70,000 किमी) है।मध्य-अटलांटिक कटक
समुद्री टीला (Seamount)महासागरीय तल पर स्थित एक नुकीले शिखर वाला ज्वालामुखी पर्वत, जो समुद्र की सतह तक नहीं पहुँच पाता।
गुयोट (Guyot)एक सपाट शीर्ष वाला समुद्री टीला। इसका सपाट शीर्ष लहरों द्वारा हुए अपरदन का परिणाम होता है, जो यह दर्शाता है कि यह कभी समुद्र की सतह के ऊपर था।
महासागरीय गर्त (Oceanic Trench)⋆ अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Boundaries) पर बनने वाली पृथ्वी की सबसे गहरी, लंबी और संकरी खाइयाँ। ये क्षेपण क्षेत्रों (Subduction Zones) से संबंधित हैं।⋆ मेरियाना गर्त (Mariana Trench) – प्रशांत महासागर में स्थित विश्व का सबसे गहरा स्थान।
अंतःसागरीय कैनियन (Submarine Canyon)महाद्वीपीय मग्नतट और ढाल पर नदियों या टर्बिडिटी धाराओं द्वारा बनाई गई गहरी, ‘V’ आकार की घाटियाँ।हडसन कैनियन, ज़ैरे कैनियन

समुद्री जल का तापमान (Temperature of Ocean Water)

महासागरीय जल का तापमान समुद्र विज्ञान का एक महत्वपूर्ण गुण है। यह समुद्री जल के घनत्व, लवणता, और उसमें घुली गैसों की मात्रा को प्रभावित करता है। इसके अलावा, यह समुद्री धाराओं की गति और दिशा, समुद्री जीवों के वितरण और पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने में एक निर्णायक भूमिका निभाता है।

महासागरीय जल के तापन का मुख्य स्रोत सूर्यातप (Insolation) यानी सूर्य से आने वाली लघु तरंग विकिरण है।


I. समुद्री जल के तापमान का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Temperature)

क्षैतिज वितरण का तात्पर्य महासागरों की सतह (Surface) के तापमान में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पाए जाने वाले अंतर से है, विशेषकर अक्षांशों के साथ।

समुद्री जल के तापमान का क्षैतिज वितरण: प्रभावित करने वाले कारक

(Horizontal Distribution of Ocean Temperature: Controlling Factors)

महासागरों की सतह का तापमान एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न होता है। इस क्षैतिज भिन्नता को कई कारक नियंत्रित करते हैं, जिनमें से कुछ वैश्विक स्तर पर और कुछ स्थानीय स्तर पर कार्य करते हैं।

1. अक्षांश (Latitude)

2. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)

3. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)

4. स्थल और जल का वितरण (Distribution of Land and Water)

5. स्थानीय मौसम की दशाएँ (Local Weather Conditions)

निष्कर्ष:
समुद्री जल के तापमान का क्षैतिज वितरण एक जटिल प्रक्रिया है। यद्यपि अक्षांश इसका मूल नियंत्रक है, लेकिन प्रचलित पवनें, महासागरीय धाराएँ, और स्थल-जल का वितरण मिलकर एक जटिल वैश्विक पैटर्न का निर्माण करते हैं, जो पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

समताप रेखाएँ (Isotherms):
महासागरों के सतही तापमान को मानचित्र पर समताप रेखाओं (Isotherms) द्वारा दर्शाया जाता है। ये रेखाएँ अक्षांशों के लगभग समानांतर होती हैं, लेकिन महासागरीय धाराओं और पवनों के प्रभाव में विक्षेपित हो जाती हैं।


II. समुद्री जल के तापमान का लंबवत वितरण (Vertical Distribution of Ocean Temperature)

समुद्री जल के तापमान का लंबवत वितरण का तात्पर्य महासागरों में गहराई बढ़ने के साथ तापमान में होने वाले परिवर्तन के अध्ययन से है। यह क्षैतिज वितरण से बिल्कुल भिन्न होता है क्योंकि सूर्य की ऊष्मा महासागर की गहराई में प्रवेश नहीं कर पाती, जिससे तापमान की एक स्पष्ट परतदार संरचना (Stratified Structure) विकसित होती है।

महासागरीय जल का लगभग 90% आयतन गहरे, ठंडे और सूर्य के प्रकाश से अप्रभावित क्षेत्र में पाया जाता है।

तापमान की लंबवत संरचना: तीन प्रमुख परतें

गहराई के साथ तापमान के प्रोफाइल के आधार पर, महासागरों को तीन स्पष्ट परतों या मंडलों में विभाजित किया जा सकता है:

[आरेख: एक ग्राफ जिसमें Y-अक्ष पर गहराई (Depth, सतह पर 0 से शुरू होकर नीचे की ओर बढ़ती हुई) और X-अक्ष पर तापमान (Temperature) दिखाया गया हो। सतह के पास उच्च और लगभग स्थिर तापमान वाली सतही परत, उसके नीचे तापमान में एक तीव्र गिरावट वाली थर्मोकलाइन परत, और फिर बहुत अधिक गहराई पर लगभग स्थिर और ठंडे तापमान वाली गहरी परत को वक्र (Curve) के माध्यम से स्पष्ट रूप से दर्शाया जाए।]

1. पहली परत: सतही परत या ऊपरी परत (Surface Layer or Upper Layer)

2. दूसरी परत: ताप प्रवणता या थर्मोकलाइन (Thermocline)

3. तीसरी परत: गहरी परत या गंभीर मंडल (Deep Layer)

निष्कर्ष:
महासागरों का लंबवत तापमान प्रोफाइल एक त्रि-स्तरीय संरचना दिखाता है। ऊपरी परत (सतही परत) गर्म और मिश्रित होती है। मध्य परत (थर्मोकलाइन) तापमान में तीव्र गिरावट का क्षेत्र है। और निचली परत (गहरी परत) महासागरों का सबसे बड़ा, स्थायी रूप से ठंडा और लगभग स्थिर तापमान वाला हिस्सा है। यह परतदार संरचना समुद्री परिसंचरण, जलवायु और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में एक मौलिक भूमिका निभाती है।


निष्कर्ष:
क्षैतिज रूप से, महासागरों का तापमान मुख्य रूप से अक्षांश (Insolation) द्वारा नियंत्रित होता है, जिसे पवनें और धाराएँ संशोधित करती हैं। लंबवत रूप से, तापमान की संरचना तीन परतों में विभाजित है – एक गर्म सतही परत, एक मध्यवर्ती थर्मोकलाइन परत जिसमें तापमान तेजी से गिरता है, और एक विशाल, स्थायी रूप से ठंडी गहरी परत। यह त्रि-स्तरीय संरचना समुद्री परिसंचरण और पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


महासागर (The Oceans)

परिभाषा:
महासागर पृथ्वी की सतह पर मौजूद विशाल, लवणीय (खारे) जल के आपस में जुड़े हुए वृहत निकायों को कहते हैं। ये जलमंडल (Hydrosphere) का सबसे बड़ा और प्रमुख हिस्सा हैं, जो पृथ्वी की सतह का लगभग 71% हिस्सा कवर करते हैं। महासागर पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने, ऑक्सीजन का उत्पादन करने, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने और अरबों लोगों को भोजन तथा आजीविका प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विश्व के सभी महासागर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, जिसे सामूहिक रूप से “वैश्विक महासागर” (Global Ocean) कहा जाता है। हालांकि, भौगोलिक सुविधा के लिए, इसे पांच प्रमुख महासागरों में विभाजित किया गया है।

विश्व के प्रमुख महासागर (Major Oceans of the World)

विश्व को पाँच प्रमुख महासागरों में बांटा गया है। क्षेत्रफल और औसत गहराई के घटते क्रम में वे इस प्रकार हैं:

  1. प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)
  2. अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)
  3. हिंद महासागर (Indian Ocean)
  4. दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) (अंटार्कटिक महासागर)
  5. आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean)

1. प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)

प्रशांत महासागर, जिसका नाम पुर्तगाली खोजकर्ता फर्डिनेंड मैगलन ने “शांत सागर” (‘Mar Pacifico’) रखा था, क्षेत्रफल और गहराई दोनों की दृष्टि से पृथ्वी का सबसे बड़ा और सबसे गहरा महासागर है। यह इतना विशाल है कि यह पृथ्वी के कुल सतह क्षेत्रफल का लगभग एक-तिहाई हिस्सा और पृथ्वी के कुल जलीय क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा कवर करता है।

भौगोलिक स्थिति और विस्तार (Geographical Location and Extent)

महासागरीय नितल की स्थलाकृति (Ocean Bottom Relief)

प्रशांत महासागर का नितल अत्यंत जटिल और विविधतापूर्ण है, जो इसकी सक्रिय विवर्तनिक प्रकृति को दर्शाता है।

विवर्तनिक गतिविधियाँ और ‘रिंग ऑफ फायर’ (Tectonic Activities and the ‘Ring of Fire’)

प्रमुख गर्त और सबसे गहरा बिंदु (Major Trenches and the Deepest Point)

प्रमुख महासागरीय धाराएँ (Major Ocean Currents)

गर्म धाराएँ (Warm Currents)ठंडी धाराएँ (Cold Currents)
∙ क्यूरोशियो धारा (Kuroshio Current): “जापान की काली धारा”, एशिया के तट पर।∙ ओयाशियो धारा (Oyashio Current): उत्तर से आती है और क्यूरोशियो से मिलती है, जिससे समृद्ध मत्स्य क्षेत्र बनता है।
∙ पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा (East Australian Current)∙ कैलिफोर्निया धारा (California Current): उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर।
∙ उत्तरी और दक्षिणी भूमध्यरेखीय धारा∙ पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru or Humboldt Current): दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर; अल नीनो घटना से संबंधित है। [UPSC]
∙ अल नीनो (El Niño): एक आवधिक गर्म धारा।∙ पश्चिमी पवन प्रवाह (अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा)

आर्थिक और सामरिक महत्व:


2. अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)

अटलांटिक महासागर, जिसे ‘अंध महासागर’ भी कहा जाता है, क्षेत्रफल और विस्तार की दृष्टि से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा महासागर है। यह पृथ्वी के कुल सतह क्षेत्रफल का लगभग 20% और कुल जलीय क्षेत्र का लगभग 29% हिस्सा कवर करता है। इसका नाम ग्रीक पौराणिक कथाओं के देवता ‘एटलस’ के नाम पर रखा गया है।

भौगोलिक स्थिति और विस्तार (Geographical Location and Extent)

महासागरीय नितल की स्थलाकृति (Ocean Bottom Relief)

अटलांटिक महासागर की नितल स्थलाकृति इसकी मध्य-महासागरीय कटक द्वारा प्रमुख रूप से परिभाषित होती है।

प्रमुख विशेषताएँ और तथ्य

  1. सबसे व्यस्त व्यापारिक महासागर (Busiest Commercial Ocean):
    • ⋆ यह पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के दो सबसे विकसित और औद्योगिक क्षेत्रों को जोड़ता है। इस कारण, यह समुद्री परिवहन और व्यापार की दृष्टि से विश्व का सबसे व्यस्त महासागर है।
  2. सर्वाधिक कटी-फटी तटरेखा (Most Indented Coastline):
    • अटलांटिक महासागर की तटरेखा बहुत अधिक कटी-फटी और दंतुरित (Indented) है।
    • इस विशेषता ने प्राकृतिक बंदरगाहों (Natural Harbours and Ports) के विकास के लिए उत्कृष्ट दशाएँ प्रदान की हैं, जिसने समुद्री व्यापार को और बढ़ावा दिया है।
  3. सीमांत सागर (Marginal Seas):
    • इसमें कई महत्वपूर्ण और बड़े सीमांत सागर हैं, जैसे भूमध्य सागर (Mediterranean Sea), कैरेबियन सागर (Caribbean Sea), उत्तरी सागर (North Sea), बाल्टिक सागर (Baltic Sea), और मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico)।

प्रमुख महासागरीय धाराएँ (Major Ocean Currents)

अटलांटिक महासागर में एक बहुत ही सुव्यवस्थित धारा प्रणाली है:

गर्म धाराएँ (Warm Currents)ठंडी धाराएँ (Cold Currents)
∙ उत्तरी भूमध्यरेखीय धारा (North Equatorial Current)∙ लैब्राडोर धारा (Labrador Current): उत्तर से आने वाली ठंडी धारा।
∙ गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream): ⋆ यह एक शक्तिशाली, तेज और गर्म धारा है। यह उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट को गर्म रखती है और आगे चलकर उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट का रूप लेती है।∙ कनारी धारा (Canary Current): अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी तट पर बहने वाली ठंडी धारा, जो सहारा मरुस्थल के निर्माण में सहायक है।
∙ उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift): ⋆ गल्फ स्ट्रीम का विस्तार, जो पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिमी यूरोप के तट को गर्म और बर्फ मुक्त रखता है। इसे “यूरोप का गर्म कंबल” भी कहते हैं। [UPPSC/State PSC]∙ बेंगुएला धारा (Benguela Current): अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी तट पर बहने वाली ठंडी धारा, जो नामीब और कालाहारी मरुस्थल के निर्माण में सहायक है।
∙ ब्राजील धारा (Brazil Current): दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट पर बहने वाली गर्म धारा।∙ फाल्कलैंड धारा (Falkland Current): दक्षिण से आने वाली ठंडी धारा।
∙ दक्षिणी भूमध्यरेखीय धारा (South Equatorial Current)∙ पश्चिमी पवन प्रवाह (अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा)

3. हिंद महासागर (Indian Ocean)

हिंद महासागर क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। यह पृथ्वी के कुल जलीय क्षेत्र का लगभग 20% हिस्सा कवर करता है। इसका नामकरण भारत (Hindustan) के नाम पर किया गया है, जो इसके उत्तरी किनारे पर एक प्रमुख प्रायद्वीपीय देश के रूप में स्थित है। यह एकमात्र महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है।

भौगोलिक स्थिति और विस्तार (Geographical Location and Extent)

महासागरीय नितल की स्थलाकृति (Ocean Bottom Relief)

हिंद महासागर के नितल में कई कटकें, बेसिन और गर्तें पाई जाती हैं।

प्रमुख विशेषताएँ और तथ्य

  1. मानसूनी पवनों का प्रभाव (Influence of Monsoon Winds):
    • ⋆ यह हिंद महासागर की सबसे अनूठी विशेषता है। यह विश्व का एकमात्र महासागर है जहाँ मौसमी पवनें (मानसूनी पवनें) अपनी दिशा पूरी तरह से उलट लेती हैं।
    • परिणाम: इस दिशा परिवर्तन के कारण, हिंद महासागर के उत्तरी भाग में बहने वाली महासागरीय धाराएँ भी अपनी दिशा ऋतु के अनुसार बदल लेती हैं। ग्रीष्मकाल में वे दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर और शीतकाल में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हैं। [UPSC Prelims]
  2. उष्ण महासागर (Warm Ocean):
    • चूँकि यह उत्तर में भूमि से घिरा है और ठंडी आर्कटिक हवाओं से प्रभावित नहीं होता, यह अटलांटिक और प्रशांत महासागरों की तुलना में औसतन एक गर्म महासागर है।
  3. सीमांत सागर (Marginal Seas):
    • इसके दो प्रमुख सीमांत सागर अरब सागर (Arabian Sea) और बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) हैं, जो भारतीय प्रायद्वीप द्वारा अलग होते हैं।
    • अन्य महत्वपूर्ण सागरों में लाल सागर (Red Sea) और फारस की खाड़ी (Persian Gulf) शामिल हैं, जो अपनी उच्च लवणता के लिए जाने जाते हैं।
  4. सामरिक महत्व (Strategic Importance):
    • हिंद महासागर विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों (Sea Lanes of Communication – SLOCs) में से एक है। यह मध्य पूर्व के तेल क्षेत्रों को एशिया और यूरोप से जोड़ता है।
    • स्वेज नहर और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे ‘चोक पॉइंट्स’ (Choke Points) इसे भू-राजनीतिक (Geopolitical) रूप से अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं।

प्रमुख महासागरीय धाराएँ (Major Ocean Currents)

(उत्तरी हिंद महासागर की धाराएँ मौसमी हैं, जबकि दक्षिणी धाराएँ स्थायी हैं)

गर्म धाराएँ (Warm Currents)ठंडी धाराएँ (Cold Currents)
∙ उत्तर-पूर्वी मानसून ड्रिफ्ट (शीतकाल)<br>∙ दक्षिण-पश्चिमी मानसून ड्रिफ्ट (ग्रीष्मकाल)
∙ दक्षिणी भूमध्यरेखीय धारा (South Equatorial Current)∙ पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा (West Australian Current): ⋆ यह एक ठंडी धारा है। [State PSC]
∙ मोजाम्बिक धारा (Mozambique Current)
∙ मेडागास्कर धारा (Madagascar Current)
∙ अगुलहास धारा (Agulhas Current): ⋆ यह एक शक्तिशाली गर्म धारा है।
∙ पश्चिमी पवन प्रवाह (अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा)

4. दक्षिणी महासागर (Southern Ocean)

दक्षिणी महासागर, जिसे अंटार्कटिक महासागर (Antarctic Ocean) के नाम से भी जाना जाता है, विश्व के महासागरीय विभाजन में सबसे नवीन सदस्य है। यह अंटार्कटिका महाद्वीप को चारों ओर से घेरने वाली विशाल जलराशि है। इसकी अद्वितीय विशेषताओं के कारण, इसे अन्य महासागरों से अलग एक স্বতন্ত্র महासागर के रूप में मान्यता दी गई है।

भौगोलिक स्थिति और मान्यता (Geographical Location and Recognition)

प्रमुख विशेषताएँ और तथ्य

  1. अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current – ACC):
    • ⋆ यह दक्षिणी महासागर की सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण विशेषता है।
    • विवरण: ACC एक अत्यंत शक्तिशाली, गहरी और ठंडी महासागरीय धारा है जो पश्चिम से पूर्व की ओर, अंटार्कटिका के चारों ओर, बिना किसी भू-भाग की बाधा के लगातार बहती है। इसे “पश्चिमी पवन प्रवाह” (West Wind Drift) भी कहा जाता है, क्योंकि यह प्रचंड पछुआ पवनों (Roaring Forties, etc.) द्वारा संचालित होती है।
    • महत्व:
      1. यह विश्व की सबसे विशाल महासागरीय धारा (आयतन की दृष्टि से) है।
      2. यह एकमात्र ऐसी धारा है जो तीनों प्रमुख महासागरों – अटलांटिक, प्रशांत और हिंद – को जोड़ती है।
      3. यह एक “तापीय अवरोधक” (Thermal Barrier) के रूप में कार्य करती है, जो गर्म उष्णकटिबंधीय जल को अंटार्कटिका तक पहुँचने से रोकती है, जिससे अंटार्कटिका ठंडा बना रहता है।
      4. यह वैश्विक थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation) में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
    • PYQ Link: ACC की दिशा, अवस्थिति और महत्व से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। [UPSC/CDS]
  2. समुद्री बर्फ (Sea Ice) का निर्माण:
    • यह महासागर अत्यधिक ठंडा है। शीतकाल (मार्च से सितंबर) के दौरान, इसकी सतह का एक विशाल हिस्सा (लगभग 1.8 करोड़ वर्ग किमी तक) समुद्री बर्फ की मोटी परत से ढक जाता है। गर्मियों में यह बर्फ काफी हद तक पिघल जाती है।
    • यह मौसमी जमना और पिघलना पृथ्वी के एल्बिडो (Albedo) को बहुत प्रभावित करता है और वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करता है।
  3. पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance):
    • ठंडा और ऑक्सीजन युक्त होने के बावजूद, यह महासागर अत्यंत उत्पादक है।
    • उद्वेलन (Upwelling) की प्रक्रिया यहाँ गहरे, पोषक तत्वों से भरपूर पानी को सतह पर लाती है, जो पादप प्लवक (Phytoplankton) के विकास को बढ़ावा देता है।
    • ⋆ यह प्लवक अंटार्कटिक क्रिल (Antarctic Krill) नामक छोटे क्रस्टेशियंस का मुख्य भोजन है, जो इस महासागर की खाद्य श्रृंखला का आधार है।
    • यह क्रिल पेंगुइन, सील, समुद्री पक्षियों और दुनिया की सबसे बड़ी व्हेल (जैसे ब्लू व्हेल, फिन व्हेल) का मुख्य भोजन स्रोत है। [UPSC Prelims – Environment Section]
  4. गहरे जल का निर्माण (Formation of Deep Water):
    • दक्षिणी महासागर विश्व के सबसे घने और ठंडे गहरे जल (Deep Water) के निर्माण का एक प्रमुख स्थल है, जिसे अंटार्कटिक बॉटम वॉटर (Antarctic Bottom Water – AABW) कहते हैं।
    • जब समुद्री बर्फ बनती है, तो नमक पीछे छूट जाता है, जिससे आसपास का पानी अधिक खारा और सघन हो जाता है। यह सघन पानी डूबकर महासागरीय तल पर बैठ जाता है और फिर विश्व के अन्य महासागरीय बेसिनों में प्रवाहित होता है।
  5. महासागरीय नितल:
    • इसका नितल अपेक्षाकृत गहरा और संकरा है। महाद्वीपीय मग्नतट सामान्य से अधिक गहरे हैं क्योंकि वे अतीत में बर्फ की मोटी चादरों के भार से दब गए थे।
    • दक्षिणी सैंडविच गर्त (South Sandwich Trench) इस महासागर का सबसे गहरा बिंदु है।

निष्कर्ष:
दक्षिणी महासागर केवल एक जलराशि नहीं, बल्कि एक अनूठा और गतिशील जलवायु और पारिस्थितिक तंत्र है। इसकी अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा, मौसमी समुद्री बर्फ और समृद्ध जैव विविधता इसे वैश्विक जलवायु प्रणाली का एक महत्वपूर्ण नियामक बनाती है। इसकी अद्वितीयता के कारण ही इसे एक अलग महासागर का दर्जा दिया गया है।


5. आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean)

आर्कटिक महासागर क्षेत्रफल और गहराई दोनों की दृष्टि से विश्व के पांचों महासागरों में सबसे छोटा और सबसे उथला है। यह पृथ्वी के सबसे उत्तरी भाग में स्थित है और उत्तरी ध्रुव (North Pole) के चारों ओर फैला हुआ है। इसका अधिकांश भाग वर्ष भर समुद्री बर्फ (Sea Ice) से ढका रहता है, जो इसकी सबसे प्रमुख विशेषता है।

भौगोलिक स्थिति और विस्तार (Geographical Location and Extent)

महासागरीय नितल की स्थलाकृति (Ocean Bottom Relief)

प्रमुख विशेषताएँ और तथ्य

  1. समुद्री बर्फ का आवरण (Sea Ice Cover):
    • ⋆ आर्कटिक महासागर की सबसे परिभाषित विशेषता इसकी समुद्री बर्फ की चादर है।
    • मौसमी परिवर्तन: यह बर्फ शीतकाल में फैलती है और ग्रीष्मकाल में सिकुड़ती है।
    • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: ⋆ ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक क्षेत्र पृथ्वी के बाकी हिस्सों की तुलना में दोगुनी से भी अधिक तेजी से गर्म हो रहा है (इस घटना को ‘आर्कटिक प्रवर्धन’ – Arctic Amplification कहते हैं)। इसके परिणामस्वरूप, गर्मियों की समुद्री बर्फ की सीमा और मोटाई में तेजी से गिरावट आ रही है। [UPSC Mains – Environment/Geopolitics]
    • यह गिरावट पृथ्वी के एल्बिडो (Albedo) को कम कर रही है, जो ग्लोबल वार्मिंग को और तेज कर रही है (आइस-एल्बिडो फीडबैक)।
  2. न्यूनतम लवणता (Lowest Salinity):
    • ⋆ आर्कटिक महासागर की सतह की लवणता (Salinity) सभी महासागरों में सबसे कम है।
    • कारण:
      • कम वाष्पीकरण: ठंडे तापमान के कारण।
      • नदियों का मीठा पानी: साइबेरिया और उत्तरी कनाडा की विशाल नदियाँ (जैसे लेना, येनिसी, ओब, मैकेंज़ी) बड़ी मात्रा में मीठा पानी इस महासागर में डालती हैं।
      • बर्फ का पिघलना: गर्मियों में बर्फ के पिघलने से भी मीठा पानी मिलता है।
    • [UPPSC/SSC – Fact-Based Question]
  3. बढ़ता सामरिक और आर्थिक महत्व (Growing Strategic and Economic Importance):
    • बर्फ के पिघलने से नए अवसर और चुनौतियाँ पैदा हो रही हैं:
      • नए नौवहन मार्ग (New Shipping Routes):
        • उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route – NSR): रूस के तट के सहारे।
        • नॉर्थवेस्ट पैसेज (Northwest Passage): कनाडाई द्वीपसमूह के माध्यम से।
        • ये मार्ग एशिया और यूरोप/उत्तरी अमेरिका के बीच की दूरी को काफी कम कर सकते हैं।
      • प्राकृतिक संसाधन: माना जाता है कि आर्कटिक महासागर के मग्नतट पर पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के विशाल अज्ञात भंडार हैं। इसके अलावा, मत्स्यन और खनिजों के दोहन की संभावनाएं भी हैं।
      • भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा: इन संसाधनों और मार्गों पर नियंत्रण के लिए आर्कटिक देशों (रूस, USA, कनाडा, नॉर्वे, डेनमार्क) के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।
  4. पारिस्थितिकी तंत्र:
    • यह एक अद्वितीय लेकिन नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र का घर है जो समुद्री बर्फ पर निर्भर है। ध्रुवीय भालू, वालरस, सील और कुछ व्हेल प्रजातियाँ इसके प्रमुख जीव हैं, जो बर्फ के पिघलने से गंभीर रूप से खतरे में हैं।

विश्व के प्रमुख महासागर: एक त्वरित तुलनात्मक सारणी (बड़े से छोटे क्रम में)

क्रममहासागर (Ocean)क्षेत्रफल की दृष्टि से रैंकमुख्य पहचान / उपनामसबसे गहरा बिंदुमहत्वपूर्ण विशेषताएँ
1.प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)सबसे बड़ा (1st)त्रिभुजाकार; “रिंग ऑफ फायर” (अग्नि वलय)मेरियाना गर्त (विश्व का सबसे गहरा)∙ सबसे बड़ा और सबसे गहरा।<br> ∙ सर्वाधिक ज्वालामुखी और भूकंप।<br> ∙ सर्वाधिक द्वीप।
2.अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)दूसरा सबसे बड़ा (2nd)‘S’ आकार; “अंध महासागर”प्यूर्टो रिको गर्त∙ मध्य-अटलांटिक कटक (S-आकार की)।<br>∙ सबसे व्यस्त व्यापारिक महासागर।<br>∙ सबसे कटी-फटी तटरेखा, आदर्श बंदरगाह।
3.हिंद महासागर (Indian Ocean)तीसरा सबसे बड़ा (3rd)‘M’ या त्रिभुजाकार; “अर्ध-महासागर”सुंडा (जावा) गर्त∙ एकमात्र महासागर जिसका नाम देश पर है।<br>∙ मानसूनी पवनों से प्रभावित; धाराएँ दिशा बदलती हैं।<br>∙ गर्म महासागर।
**4. **दक्षिणी महासागर (Southern Ocean)चौथा सबसे बड़ा (4th)“अंटार्कटिक महासागर” (अक्षांशीय सीमा)दक्षिणी सैंडविच गर्त∙ 60°S अक्षांश के दक्षिण में स्थित।<br>∙ अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (ACC) – विश्व की सबसे शक्तिशाली ठंडी धारा।
5.आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean)सबसे छोटा (5th)लगभग स्थलरुद्ध; उत्तरी ध्रुव पर स्थितमोलोय डीप∙ सबसे छोटा और सबसे उथला महासागर।<br>∙ वर्ष भर समुद्री बर्फ से ढका रहता है।<br>∙ सबसे कम लवणता।

महासागरों का महत्व (Importance of Oceans)

महासागर केवल विशाल जलराशियाँ नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं जो ग्रह के पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु, अर्थव्यवस्था और स्वयं मानव जीवन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। इनका महत्व बहुआयामी है, जिसे निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है:

1. जलवायु और मौसम के नियामक के रूप में (As Regulators of Climate and Weather)

2. ऑक्सीजन उत्पादन और कार्बन सिंक के रूप में (Oxygen Production and as a Carbon Sink)

3. आर्थिक महत्व (Economic Importance)

4. जैव विविधता का भंडार (Storehouse of Biodiversity)

5. सामरिक और भू-राजनीतिक महत्व (Strategic and Geopolitical Importance)

निष्कर्ष:
महासागर केवल पृथ्वी पर जल का भंडार नहीं हैं, बल्कि वे हमारी जलवायु के नियामक, हमारे वायु के स्रोत, हमारी अर्थव्यवस्था के चालक और जीवन की विविधता के संरक्षक हैं। उनका संरक्षण न केवल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए, बल्कि संपूर्ण मानवता के सतत भविष्य के लिए भी अनिवार्य है।


विश्व के प्रमुख सागर (Major Seas of the World)

सागर (Sea) महासागर का वह हिस्सा है जो आंशिक या पूर्ण रूप से भूमि से घिरा होता है। ये महासागरों के सीमांत (Marginal) भाग होते हैं और अक्सर महाद्वीपों और द्वीपों के बीच स्थित होते हैं। इनका अपना विशिष्ट तापमान, लवणता और परिसंचरण पैटर्न हो सकता है।

यहाँ महासागरों के अनुसार विश्व के प्रमुख सागरों की सूची और उनका महत्व दिया गया है।


1. प्रशांत महासागर से जुड़े सागर (Seas associated with the Pacific Ocean)

प्रशांत महासागर विश्व का सबसे बड़ा महासागर है और इसके साथ कई महत्वपूर्ण सीमांत सागर जुड़े हैं।

सागर का नामभौगोलिक स्थिति / सीमावर्ती देशमहत्वपूर्ण तथ्य और PYQ लिंक
दक्षिण चीन सागर (South China Sea)दक्षिण-पूर्व एशिया (चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया)⋆ विश्व का सबसे बड़ा सीमांत सागर।<br>⋆ अत्यंत व्यस्त शिपिंग मार्ग; मलक्का जलडमरूमध्य इसी से जुड़ता है।<br>⋆ संसाधन संपन्न और विवादित क्षेत्र (जैसे स्प्रैटली और पारसेल द्वीप)। [UPSC Mains – Geopolitics]
बेरिंग सागर (Bering Sea)एशिया और उत्तरी अमेरिका के बीच⋆ बेरिंग जलडमरूमध्य (Bering Strait) इसे आर्कटिक महासागर से जोड़ता है।<br>⋆ अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा इससे होकर गुजरती है।
जापान सागर (Sea of Japan)जापान, रूस, कोरियाई प्रायद्वीपएक लगभग बंद सागर; समृद्ध मत्स्यन क्षेत्र।
ओखोत्स्क सागर (Sea of Okhotsk)पूर्वी रूस, जापान का होक्काइडो द्वीपसर्दियों में बर्फ से जम जाता है; सखालिन द्वीप पर तेल और गैस के भंडार।
पूर्वी चीन सागर (East China Sea)चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवानसेनकाकू/दियाओयू द्वीपों पर चीन और जापान के बीच विवाद।
पीला सागर (Yellow Sea)चीन और कोरियाई प्रायद्वीप के बीचह्वांग-हो (पीली नदी) द्वारा लाए गए पीले अवसादों के कारण इसका नाम पड़ा।
तस्मान सागर (Tasman Sea)ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच
कोरल सागर (Coral Sea)उत्तर-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया⋆ ग्रेट बैरियर रीफ, विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति, यहीं स्थित है। [UPSC/State PSC]

2. अटलांटिक महासागर से जुड़े सागर (Seas associated with the Atlantic Ocean)

सागर का नामभौगोलिक स्थिति / सीमावर्ती देशमहत्वपूर्ण तथ्य और PYQ लिंक
भूमध्य सागर (Mediterranean Sea)यूरोप, अफ्रीका और एशिया के बीच⋆ जिब्राल्टर जलडमरूमध्य (Strait of Gibraltar) द्वारा अटलांटिक महासागर से जुड़ा है।<br>⋆ यह 20 से अधिक देशों को छूता है; भूमध्यसागरीय जलवायु का स्रोत। [UPPSC]<br>⋆ स्वेज नहर इसे लाल सागर से जोड़ती है।
कैरेबियन सागर (Caribbean Sea)उत्तरी और दक्षिण अमेरिका के बीच (मध्य अमेरिका)हरीकेन (Hurricane) की उत्पत्ति का प्रमुख क्षेत्र; वेस्टइंडीज द्वीप समूह यहीं स्थित हैं।
उत्तरी सागर (North Sea)उत्तर-पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, नॉर्वे, डेनमार्क)⋆ पेट्रोलियम (ब्रेंट क्रूड) और प्राकृतिक गैस के महत्वपूर्ण भंडार; डोगर बैंक मत्स्यन क्षेत्र। [State PSC]
बाल्टिक सागर (Baltic Sea)उत्तरी यूरोपकम लवणता वाला एक लगभग भू-आबद्ध सागर।
सारगैसो सागर (Sargasso Sea)उत्तरी अटलांटिक महासागर का मध्य भाग⋆ यह विश्व का एकमात्र ऐसा सागर है जिसकी कोई तटरेखा नहीं है। यह चार महासागरीय धाराओं (गल्फ स्ट्रीम, उत्तरी अटलांटिक, कनारी, उत्तरी भूमध्यरेखीय) से घिरा है। यह सारगैसम घास के लिए प्रसिद्ध है। [UPSC 2017]
आयरिश सागर (Irish Sea)ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड के बीच
एड्रियाटिक सागर (Adriatic Sea)इतालवी प्रायद्वीप और बाल्कन प्रायद्वीप के बीचयहाँ ठंडी ‘बोरा’ पवन चलती है।
एजियन सागर (Aegean Sea)ग्रीस और तुर्की के बीचभूमध्य सागर का हिस्सा।
काला सागर (Black Sea)यूरोप और एशिया के बीचकम लवणता और एनोक्सिक (Anoxic) गहरे जल (ऑक्सीजन की कमी) के लिए जाना जाता है।

3. हिंद महासागर से जुड़े सागर (Seas associated with the Indian Ocean)

सागर का नामभौगोलिक स्थिति / सीमावर्ती देशमहत्वपूर्ण तथ्य और PYQ लिंक
अरब सागर (Arabian Sea)भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिम मेंभारत के पश्चिमी तट और अरब प्रायद्वीप से घिरा है।
बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal)भारतीय प्रायद्वीप के पूर्व में⋆ विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Bay)। चक्रवातों के निर्माण का प्रमुख केंद्र।
लाल सागर (Red Sea)अफ्रीका और एशिया (अरब प्रायद्वीप) के बीचस्वेज नहर इसे भूमध्य सागर से और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य इसे अदन की खाड़ी से जोड़ता है।<br>⋆ उच्च लवणता के लिए जाना जाता है।
फारस की खाड़ी (Persian Gulf)ईरान और अरब प्रायद्वीप के बीचहोरमुज़ जलडमरूमध्य द्वारा ओमान की खाड़ी से जुड़ता है। विश्व का प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र।
अंडमान सागर (Andaman Sea)म्यांमार, थाईलैंड और अंडमान द्वीप समूह के बीचभारत का सक्रिय ज्वालामुखी बैरन द्वीप यहीं स्थित है।
तिमोर सागर (Timor Sea)ऑस्ट्रेलिया और तिमोर द्वीप के बीच

4. आर्कटिक महासागर से जुड़े सागर (Seas associated with the Arctic Ocean)

सागर का नामभौगोलिक स्थिति / सीमावर्ती देशमहत्वपूर्ण तथ्य
बैरेंट्स सागर (Barents Sea)नॉर्वे और रूस के उत्तर मेंअपेक्षाकृत गर्म (उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट के कारण) और उत्पादक मत्स्यन क्षेत्र।
कारा सागर (Kara Sea)रूस के उत्तर मेंउत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) का हिस्सा।
लैप्टेव सागर (Laptev Sea)रूस (साइबेरिया) के उत्तर मेंसर्दियों में जम जाता है।
ब्यूफोर्ट सागर (Beaufort Sea)कनाडा और अलास्का (USA) के उत्तर में
चुक्ची सागर (Chukchi Sea)रूस और अलास्का (USA) के बीच, बेरिंग जलडमरूमध्य के उत्तर में।

विशेष उल्लेख:


विश्व के महासागर और सागर: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

महासागर (Oceans) से संबंधित तथ्य

  1. सबसे बड़ा और सबसे गहरा महासागर: प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)। यह पृथ्वी का एक-तिहाई हिस्सा कवर करता है।
  2. दूसरा सबसे बड़ा और ‘S’ आकार का महासागर: अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)।
  3. देश के नाम पर एकमात्र महासागर: हिंद महासागर (Indian Ocean)।
  4. सबसे छोटा और सबसे उथला महासागर: आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean)।
  5. सबसे नया मान्यता प्राप्त महासागर: दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) (60°S अक्षांश के दक्षिण में)।
  6. “रिंग ऑफ फायर” (अग्नि वलय): यह प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित है और विश्व के अधिकांश भूकंप और ज्वालामुखी यहीं आते हैं। [UPSC/State PSC]
  7. विश्व का सबसे गहरा स्थान: मेरियाना गर्त (Mariana Trench) का ‘चैलेंजर डीप’, प्रशांत महासागर में स्थित है।
  8. सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला: मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge), जो सभी महासागरों में फैली है। इसकी सबसे प्रसिद्ध शाखा मध्य-अटलांटिक कटक है।
  9. सबसे व्यस्त व्यापारिक महासागर: अटलांटिक महासागर, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच स्थित होने के कारण।
  10. धाराओं की दिशा उलटने वाला महासागर: हिंद महासागर (उत्तरी भाग), मानसूनी पवनों के प्रभाव के कारण।
  11. सबसे कम लवणता वाला महासागर: आर्कटिक महासागर, कम वाष्पीकरण और नदियों से मीठे पानी की आपूर्ति के कारण।
  12. विश्व की सबसे शक्तिशाली ठंडी धारा: अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (ACC) या पश्चिमी पवन प्रवाह, जो दक्षिणी महासागर में बहती है।

सागर (Seas) और खाड़ी (Bays/Gulfs) से संबंधित तथ्य

  1. विश्व का सबसे बड़ा सागर: दक्षिण चीन सागर (South China Sea)। कुछ स्रोत फिलीपीन सागर को भी मानते हैं, लेकिन सामान्यतः दक्षिण चीन सागर स्वीकार्य है।
  2. बिना तटरेखा वाला एकमात्र सागर: सारगैसो सागर (Sargasso Sea), उत्तरी अटलांटिक महासागर में चार धाराओं से घिरा हुआ है। [UPSC 2017]
  3. विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Bay): बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal)।
  4. विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Gulf): मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico)।
  5. सबसे खारा (लवणीय) सागर: मृत सागर (Dead Sea), जो वास्तव में एक अत्यधिक खारी झील है। खुले सागरों में लाल सागर (Red Sea) की लवणता बहुत अधिक है।
  6. ग्रेट बैरियर रीफ: विश्व की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति, ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्व में कोरल सागर (Coral Sea) में स्थित है। [UPSC/State PSC]
  7. स्वेज नहर: भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है।
  8. पनामा नहर: अटलांटिक महासागर (कैरेबियन सागर) को प्रशांत महासागर से जोड़ती है।

जलडमरूमध्य (Straits) से संबंधित तथ्य

  1. जिब्राल्टर जलडमरूमध्य: भूमध्य सागर को अटलांटिक महासागर से जोड़ता है। इसे “भूमध्य सागर की कुंजी” (Key to the Mediterranean) कहा जाता है।
  2. बेरिंग जलडमरूमध्य: आर्कटिक महासागर को प्रशांत महासागर (बेरिंग सागर) से जोड़ता है। यह अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के समानांतर है। [UPPSC]
  3. होरमुज़ जलडमरूमध्य: फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी (अरब सागर) से जोड़ता है। यह तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण ‘चोक पॉइंट’ है।
  4. बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य: लाल सागर को अदन की खाड़ी (अरब सागर) से जोड़ता है। इसे “आंसुओं का द्वार” (Gate of Tears) कहते हैं।
  5. मलक्का जलडमरूमध्य: अंडमान सागर (हिंद महासागर) को दक्षिण चीन सागर (प्रशांत महासागर) से जोड़ता है। यह विश्व के सबसे व्यस्त शिपिंग मार्गों में से एक है।
  6. पाक जलडमरूमध्य: बंगाल की खाड़ी को मन्नार की खाड़ी से जोड़ता है (भारत और श्रीलंका के बीच)। [State PSC]
  7. सुंडा जलडमरूमध्य: जावा सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है (इंडोनेशिया के सुमात्रा और जावा द्वीपों के बीच)।

खाड़ियाँ (Bays and Gulfs)

परिभाषा:
खाड़ी समुद्र या महासागर का वह हिस्सा है जो तीन ओर से भूमि से घिरा होता है। यह तटीय जल का एक ऐसा निकाय है जो सीधे मुख्य समुद्र या महासागर से जुड़ा होता है। हालांकि ‘Bay’ और ‘Gulf’ दोनों शब्दों का हिंदी में अर्थ ‘खाड़ी’ ही होता है, लेकिन भौगोलिक रूप से इनमें कुछ सूक्ष्म अंतर होते हैं।

‘बे’ (Bay) और ‘गल्फ’ (Gulf) में अंतर:

विशेषताबे (Bay)गल्फ (Gulf)
आकारआमतौर पर छोटी होती हैं।आमतौर पर बहुत बड़ी और गहरी होती हैं।
मुहाना (Opening)इनका मुहाना (खुला हुआ हिस्सा) अपेक्षाकृत अधिक चौड़ा होता है।इनका मुहाना अपेक्षाकृत अधिक संकरा होता है, जिससे ये अधिक भू-आबद्ध (Enclosed) लगती हैं।
उदाहरणहडसन की खाड़ी (Hudson Bay), बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal)मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico), फारस की खाड़ी (Persian Gulf)
अपवाद: यह अंतर हमेशा कठोर नहीं होता। बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) और हडसन की खाड़ी (Hudson Bay) आकार में कई गल्फ से भी बड़ी हैं, जो इस नियम के अपवाद हैं।

विश्व की प्रमुख खाड़ियाँ (Major Bays and Gulfs of the World)

यहाँ महाद्वीपों और देशों के अनुसार विश्व की प्रमुख खाड़ियों की एक सूची दी गई है, जिसमें उनकी अवस्थिति और महत्व शामिल हैं।

एशिया

खाड़ी का नामप्रकारसंबंधित देश/जलराशिमहत्वपूर्ण तथ्य
बंगाल की खाड़ीBayभारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका⋆ विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Bay)। उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के निर्माण का प्रमुख केंद्र। गंगा-ब्रह्मपुत्र का विशाल डेल्टा यहीं बनता है।
फारस की खाड़ीGulfईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब, कतर, UAEहोरमुज़ जलडमरूमध्य से ओमान की खाड़ी से जुड़ती है। विश्व का प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र। [UPPSC]
अदन की खाड़ीGulfयमन, सोमालियाबाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य द्वारा लाल सागर से जुड़ती है। समुद्री डकैती के लिए कुख्यात रही है।
ओमान की खाड़ीGulfओमान, ईरान, UAEअरब सागर का हिस्सा; फारस की खाड़ी के लिए प्रवेश द्वार।
खंभात की खाड़ीGulfभारत (गुजरात)नर्मदा और तापी नदियाँ यहीं गिरती हैं। ज्वारीय ऊर्जा की उच्च क्षमता।
कच्छ की खाड़ीGulfभारत (गुजरात)भारत का पहला समुद्री राष्ट्रीय उद्यान (Marine National Park) यहीं स्थित है।
मन्नार की खाड़ीGulfभारत (तमिलनाडु) और श्रीलंकासमुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध; एक बायोस्फीयर रिजर्व। पाक जलडमरूमध्य द्वारा बंगाल की खाड़ी से जुड़ी है।
थाईलैंड की खाड़ीGulfथाईलैंड, कंबोडिया, वियतनामदक्षिण चीन सागर का हिस्सा।

उत्तरी अमेरिका

खाड़ी का नामप्रकारसंबंधित देश/जलराशिमहत्वपूर्ण तथ्य
मैक्सिको की खाड़ीGulfUSA, मेक्सिको, क्यूबा⋆ विश्व की सबसे बड़ी खाड़ी (Gulf)। मिसीसिपी-मिसौरी नदी यहीं डेल्टा बनाती है। तेल और गैस के विशाल भंडार।
हडसन की खाड़ीBayकनाडाक्षेत्रफल की दृष्टि से दूसरी सबसे बड़ी खाड़ी। इसका बड़ा हिस्सा सर्दियों में जम जाता है।
कैलिफोर्निया की खाड़ीGulfमेक्सिकोइसे “कोर्टेज का सागर” (Sea of Cortez) भी कहते हैं। यह प्रशांत महासागर का हिस्सा है।
फंडी की खाड़ी (Bay of Fundy)Bayकनाडा⋆ विश्व में सबसे ऊँचा ज्वार (Highest tides in the world) यहीं आता है। [UPSC/SSC]
अलास्का की खाड़ीGulfUSA (अलास्का)प्रशांत महासागर का उत्तरी भाग।
सेंट लॉरेंस की खाड़ीGulfकनाडाअटलांटिक महासागर में स्थित; सेंट लॉरेंस नदी यहीं गिरती है।

यूरोप

खाड़ी का नामप्रकारसंबंधित देश/जलराशिमहत्वपूर्ण तथ्य
बिस्के की खाड़ीBayफ्रांस, स्पेनअटलांटिक महासागर का हिस्सा; अपने तूफानी मौसम के लिए जानी जाती है।
बोथनिया की खाड़ीGulfस्वीडन, फिनलैंडबाल्टिक सागर का उत्तरी भाग; सबसे कम लवणता वाली खाड़ियों में से एक।
फिनलैंड की खाड़ीGulfफिनलैंड, रूस, एस्टोनियाबाल्टिक सागर का पूर्वी भाग।

ऑस्ट्रेलिया

खाड़ी का नामप्रकारसंबंधित देश/जलराशिमहत्वपूर्ण तथ्य
कारपेंटरिया की खाड़ीGulfउत्तरी ऑस्ट्रेलियाएक बड़ी और उथली खाड़ी, जो अराफुरा सागर का हिस्सा है।
ग्रेट ऑस्ट्रेलियन बाइटBightदक्षिणी ऑस्ट्रेलियायह एक बहुत बड़ी खुली खाड़ी (Bight) है, जो हिंद महासागर का हिस्सा है।

अफ्रीका

खाड़ी का नामप्रकारसंबंधित देश/जलराशिमहत्वपूर्ण तथ्य
गिनी की खाड़ीGulfपश्चिमी अफ्रीकाअटलांटिक महासागर का हिस्सा; भूमध्य रेखा और प्रमुख मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) का प्रतिच्छेदन बिंदु यहीं स्थित है।

क्रम संख्याखाड़ी/गल्फ का नाममहत्वपूर्ण तथ्य/विशेषताएँ (परीक्षा उपयोगी)
1.बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal)विश्व की सबसे बड़ी ‘बे’ (Bay)। गंगा-ब्रह्मपुत्र और महानदी जैसे नदियों का डेल्टा क्षेत्र। भारत के पूर्वी तट पर उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति का केंद्र।
2.मैक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico)विश्व का सबसे बड़ा ‘गल्फ’ (Gulf)। विश्व के महत्वपूर्ण तेल और गैस भंडारों में से एक। क्यूबा और युकाटन प्रायद्वीप द्वारा कैरिबियन सागर से अलग।
3.फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf)सर्वाधिक रणनीतिक महत्व। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का प्रमुख वैश्विक स्रोत। यह जलमार्ग होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) के माध्यम से ओमान की खाड़ी से जुड़ा है।
4.होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz)फ़ारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और फिर अरब सागर से जोड़ती है। दुनिया के सबसे व्यस्त और सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन बिंदुओं में से एक।
5.एडन की खाड़ी (Gulf of Aden)अरब सागर से होते हुए बाब-अल-मंदेब जलसंधि के माध्यम से लाल सागर से जुड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय समुद्री डकैती (Piracy) के कारण चर्चा में रहा है।
6.फंडी की खाड़ी (Bay of Fundy)विश्व में सबसे ऊंचे ज्वार-भाटे (Highest Tides) के लिए प्रसिद्ध। कनाडा (नोवा स्कोटिया) और यूएसए के बीच स्थित।
7.कारपेंटेरिया की खाड़ी (Gulf of Carpentaria)ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी तट पर स्थित। इस क्षेत्र में मछली और मोती उद्योग (Pearl Industry) महत्वपूर्ण है।
8.अलास्का की खाड़ी (Gulf of Alaska)उत्तरी प्रशांत महासागर का हिस्सा। एक महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र जो टेक्टोनिक प्लेटों की सीमा पर स्थित है, इसलिए भूकंप के प्रति संवेदनशील है।
9.ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman)यह होर्मुज जलसंधि द्वारा फारस की खाड़ी से जुड़ा हुआ है। सामरिक (Strategic) रूप से बहुत महत्वपूर्ण।
10.अटलांटिक महासागर में खाड़ियाँअटलांटिक के कुछ प्रमुख जल निकाय जैसे: गिनी की खाड़ी (Gulf of Guinea – तेल संसाधन के लिए प्रसिद्ध) और सेंट लॉरेंस की खाड़ी (Gulf of St. Lawrence)।
11.ग्रेट ऑस्ट्रेलियन बाइट (Great Australian Bight)दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के विशाल, खुले तटीय क्षेत्र में स्थित खाड़ी। अत्यधिक लहरों और विवर्तनिकी (Tectonics) गतिविधियों से सम्बंधित।

💡 महत्वपूर्ण सूचना: यूपीएससी/पीएससी की परीक्षाओं में खाड़ी, जलसंधि और भौगोलिक स्थलों से सम्बंधित प्रश्न मैपिंग और करंट अफेयर्स के साथ जोड़कर पूछे जाते हैं। इसलिए, इनकी अवस्थिति (Location) मानचित्र पर अवश्य देखें।


समुद्री जल की लवणता

समुद्री जल की लवणता (Ocean Salinity)

समुद्री जल की लवणता से तात्पर्य उसमें घुले हुए कुल ठोस पदार्थों की मात्रा से है। मुख्य रूप से यह साधारण नमक (सोडियम क्लोराइड – (NaCl) होती है, लेकिन इसमें मैग्नीशियम क्लोराइड, कैल्शियम क्लोराइड और पोटेशियम ब्रोमाइड सहित कई अन्य खनिज भी शामिल होते हैं।


1. लवणता को व्यक्त करने की इकाई (Unit of Expression)

समुद्री जल की लवणता को व्यक्त करने की इकाई (Unit of Expression) को समझने के लिए, निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को ध्यान में रखें:

1. प्रति हजार भाग (Parts Per Thousand – ppt)

यह लवणता को मापने की सबसे पारंपरिक और सरल विधि है।

यह विधि समझने में आसान है और अक्सर सामान्य भौगोलिक अध्ययन में उपयोग की जाती है।


2. व्यावहारिक लवणता इकाई (Practical Salinity Unit – PSU)

यह लवणता को मापने की आधुनिक और अधिक वैज्ञानिक विधि है।

निष्कर्ष:

इकाईपूरा नामआधारउपयोग
ppt (‰)Parts Per Thousandघुले हुए नमक का भार/द्रव्यमानसामान्य और शैक्षिक कार्यों में
PSUPractical Salinity Unitविद्युत चालकता (Conductivity)वैज्ञानिक अनुसंधान और समुद्र विज्ञान (Oceanography) में

आज के समय में, वैज्ञानिक अध्ययनों और डेटा में लवणता को व्यक्त करने के लिए PSU का उपयोग मानक माना जाता है क्योंकि यह अधिक सटीक और मानकीकृत (standardized) है।


औसत लवणता (Average Salinity)

औसत लवणता का तात्पर्य दुनिया के सभी महासागरों के समुद्री जल में घुले नमक की औसत मात्रा से है।

मानक औसत मान (Standard Average Value)

लवणता में भिन्नता (Variations in Salinity)

हालांकि औसत 35 ppt है, लेकिन यह मान भौगोलिक स्थिति के आधार पर काफी भिन्न होता है। अधिकांश खुले महासागर की सतह की लवणता 33 ppt से 38 ppt के बीच रहती है।

विभिन्न महासागरों में औसत लवणता

अत्यंत खारे और कम खारे जल निकाय

Note-यह मान स्थान और मौसम के साथ बदलता रहता है।

लवणता का स्रोत (Source of Salinity)

समुद्री जल की लवणता का एक स्रोत नहीं है, बल्कि यह लाखों वर्षों में कई प्रक्रियाओं का परिणाम है। इसके दो मुख्य स्रोत हैं:

1. स्थलीय अपवाह और नदियाँ (Runoff from the Land and Rivers)

यह समुद्री लवणता का सबसे प्रमुख स्रोत है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है:

यह प्रक्रिया लाखों वर्षों से लगातार चल रही है, जिससे समुद्र में धीरे-धीरे लवण जमा होते गए हैं।

2. समुद्र तल से निक्षेप (Deposits from the Ocean Floor)

समुद्र की लवणता का दूसरा महत्वपूर्ण स्रोत समुद्र का तल है।

निष्कर्ष:

समुद्र में लवणता का निर्माण एक गतिशील प्रक्रिया है। एक तरफ नदियाँ लगातार समुद्र में लवण मिलाती रहती हैं, तो वहीं दूसरी ओर हाइड्रोथर्मल वेंट और ज्वालामुखी भी इसमें योगदान करते हैं। वाष्पीकरण की प्रक्रिया के कारण केवल शुद्ध जल ही वाष्पित होता है और लवण समुद्र में ही रह जाते हैं, जिससे धीरे-धीरे समुद्र की लवणता बढ़ती गई और आज के स्तर पर स्थिर हो गई है।

समुद्र में पाए जाने वाले प्रमुख लवणों का कुल लवणता में प्रतिशत योगदान निम्नलिखित तालिका में दिया गया है:

क्रम संख्यालवण का नाम (Chemical Name)रासायनिक सूत्र (Chemical Formula)कुल लवणता में प्रतिशत (%)
1.सोडियम क्लोराइड (Sodium Chloride)NaCl77.8%
2.मैग्नीशियम क्लोराइड (Magnesium Chloride)MgCl₂10.9%
3.मैग्नीशियम सल्फेट (Magnesium Sulfate)MgSO₄4.7%
4.कैल्शियम सल्फेट (Calcium Sulfate)CaSO₄3.6%
5.पोटेशियम सल्फेट (Potassium Sulfate)K₂SO₄2.5%
6.कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate)CaCO₃0.3%
7.मैग्नीशियम ब्रोमाइड (Magnesium Bromide)MgBr₂0.2%

मुख्य बिंदु:


4. लवणता का लंबवत वितरण (Vertical Distribution of Salinity)

समुद्र में गहराई के साथ लवणता का वितरण समान नहीं होता है। सतह से तल तक जाने पर लवणता में परिवर्तन होता है, जिसे तीन प्रमुख परतों में विभाजित किया जा सकता है:

1. सतही परत (Surface Zone or Mixed Layer)

2. हैलोक्लाइन (Halocline)

3. गहरी परत (Deep Zone)

निष्कर्ष:
समुद्र की सतह पर लवणता में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भिन्नताएँ पाई जाती हैं, लेकिन गहराई में जाने पर हैलोक्लाइन परत के बाद लवणता लगभग स्थिर हो जाती है।


लवणता का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Salinity)

लवणता का क्षैतिज वितरण महासागरों की सतह पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर लवणता में पाई जाने वाली भिन्नता को संदर्भित करता है। यह वितरण विश्व भर में असमान है और मुख्य रूप से वाष्पीकरण (Evaporation) और वर्षा (Precipitation) के बीच के संतुलन पर निर्भर करता है।

सतही लवणता का क्षैतिज वितरण अक्षांशों (Latitudes) के अनुसार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है:

1. भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Region: 0° – 10° N/S)

2. उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical and Sub-tropical Regions: 20° – 40° N/S)

3. शीतोष्ण क्षेत्र (Temperate Regions: 40° – 60° N/S)

4. ध्रुवीय और उप-ध्रुवीय क्षेत्र (Polar and Sub-polar Regions: 60° – 90° N/S)


अन्य प्रभावित करने वाले कारक:

निष्कर्ष:
महासागरों की सतह पर लवणता का क्षैतिज वितरण एक जटिल प्रणाली है, जो मुख्य रूप से वाष्पीकरण, वर्षा, नदी जल और बर्फ के पिघलने जैसे कारकों से नियंत्रित होती है, जिससे अक्षांशों के अनुसार लवणता में एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है।


1. विभिन्न अक्षांशों पर लवणता का वितरण

यह तालिका दर्शाती है कि सतह की औसत लवणता अलग-अलग अक्षांशीय क्षेत्रों में कैसे बदलती है।

अक्षांशीय क्षेत्र (Latitudinal Zone)औसत लवणता (ppt में)मुख्य कारण
भूमध्यरेखीय क्षेत्र (0° – 10° N/S)34 – 35 pptउच्च वाष्पीकरण के बावजूद भारी वर्षा के कारण ताजे पानी की अधिकता।
उष्णकटिबंधीय / उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र (20° – 40° N/S)36 – 38 ppt (सर्वाधिक)उच्च वाष्पीकरण और बहुत कम वर्षा के कारण लवणता विश्व में सबसे अधिक होती है।
शीतोष्ण क्षेत्र (40° – 60° N/S)33 – 35 pptतापमान में कमी से वाष्पीकरण घटता है और पछुआ पवनों से वर्षा होती है।
ध्रुवीय क्षेत्र (60° – 90° N/S)20 – 32 ppt (न्यूनतम)वाष्पीकरण नगण्य होता है और बर्फ के पिघलने से भारी मात्रा में ताजा पानी मिलता है।

2. प्रमुख सागरों एवं खाड़ियों में लवणता का वितरण

यह तालिका दर्शाती है कि कैसे संलग्नता, वाष्पीकरण और नदियों का प्रभाव विशिष्ट जल निकायों की लवणता को बदल देता है।

उच्च लवणता वाले सागर (High Salinity Seas)

सागर / खाड़ी (Sea / Bay)औसत लवणता (ppt में)लवणता का स्तर एवं कारण
लाल सागर (Red Sea)39 – 41 pptअत्यधिक उच्च: उच्च वाष्पीकरण, कम वर्षा और किसी बड़ी नदी का न मिलना।
फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf)37 – 40 pptउच्च: अर्ध-संलग्न, उथला पानी और तीव्र वाष्पीकरण।
भूमध्य सागर (Mediterranean Sea)37 – 39 pptउच्च: वाष्पीकरण की दर, वर्षा और नदियों से मिलने वाले ताजे पानी से अधिक है।
अरब सागर (Arabian Sea)36 pptऔसत से अधिक: उच्च वाष्पीकरण और बंगाल की खाड़ी की तुलना में कम नदियों का प्रवाह।

कम लवणता वाले सागर (Low Salinity Seas)

सागर / खाड़ी (Sea / Bay)औसत लवणता (ppt में)लवणता का स्तर एवं कारण
बाल्टिक सागर (Baltic Sea)5 – 15 pptअत्यधिक कम: कई नदियों से भारी मात्रा में ताजे पानी का प्रवाह और कम वाष्पीकरण।
काला सागर (Black Sea)17 – 19 pptबहुत कम: डेन्यूब जैसी बड़ी नदियों से मीठे पानी का अधिक प्रवाह।
हडसन की खाड़ी (Hudson Bay)23 – 30 pptकम: नदियों और बर्फ के पिघलने से ताजे पानी का प्रवाह और कम वाष्पीकरण।
बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal)30 – 34 pptऔसत से कम: गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी जैसी विशाल नदियों द्वारा ताजे पानी की आपूर्ति।

झीलों में लवणता (Salinity in Lakes)

महासागरों के विपरीत, झीलें मीठे पानी की या खारे पानी की हो सकती हैं। झीलों की लवणता उनके स्थान, भूगोल और सबसे महत्वपूर्ण रूप से, उनके जल संतुलन (Water Balance) पर निर्भर करती है।

झीलों के प्रकार (लवणता के आधार पर)

  1. मीठे पानी की झीलें (Freshwater Lakes)
    • विशेषता: इनमें लवणता बहुत कम होती है (आमतौर पर 1 ppt से भी कम)। दुनिया की अधिकांश झीलें इसी श्रेणी में आती हैं।
    • मीठे रहने का कारण: इन झीलों में नदियों के माध्यम से पानी आता है और निकास (Outflow) भी होता है। यानी, एक या एक से अधिक नदियाँ इन झीलों से पानी बाहर भी ले जाती हैं। यह निकास अपने साथ घुले हुए खनिज लवणों को भी बहा ले जाता है, जिससे लवणता जमा नहीं हो पाती।
    • उदाहरण:
      1. उत्तरी अमेरिका की महान झीलें (Great Lakes)
      2. बैकाल झील (Lake Baikal), रूस
      3. वूलर झील (Wular Lake), भारत
  2. खारे पानी की झीलें (Saline Lakes)
    • विशेषता: इनकी लवणता महासागरों (35 ppt) के बराबर या उससे कहीं अधिक होती है। जिन झीलों की लवणता महासागरों से अधिक होती है, उन्हें अति-लवणीय या हाइपरसलाइन (Hypersaline) झीलें कहा जाता है।
    • खारे होने का कारण: ये झीलें आमतौर पर बंद जल निकासी प्रणालियों (Endorheic Basins) में स्थित होती हैं।
      1. कोई निकास नहीं: इनमें नदियाँ पानी लाती तो हैं, लेकिन पानी के बाहर जाने का कोई प्राकृतिक रास्ता (नदी) नहीं होता।
      2. वाष्पीकरण (Evaporation): पानी केवल वाष्पीकरण के माध्यम से ही बाहर निकलता है।
      3. लवणों का जमाव: जब पानी वाष्पित होता है, तो वह अपने पीछे घुले हुए लवणों को छोड़ जाता है। लाखों वर्षों तक यह प्रक्रिया चलने से इन झीलों में लवण की मात्रा लगातार बढ़ती जाती है और पानी अत्यधिक खारा हो जाता है।
      4. यह प्रक्रिया शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में अधिक प्रभावी होती है जहाँ वाष्पीकरण की दर बहुत अधिक होती है।

विश्व की प्रमुख खारे पानी की झीलें और उनकी लवणता

यह तालिका दुनिया की कुछ सबसे खारी झीलों को उनकी लवणता के साथ दर्शाती है:

क्रम संख्याझील का नामस्थानऔसत लवणता (ppt में)मुख्य तथ्य
1.डॉन जुआन तालाब (Don Juan Pond)अंटार्कटिका**~ 440 ppt**पृथ्वी पर मौजूद सबसे खारा जल निकाय माना जाता है।
2.वान झील (Lake Van)तुर्की**~ 330 ppt**दुनिया की सबसे बड़ी क्षारीय (Alkaline) झीलों में से एक।
3.मृत सागर (Dead Sea)इज़राइल और जॉर्डन**~ 340 ppt**अत्यधिक घनत्व के कारण इसमें इंसान आसानी से तैर सकता है।
4.ग्रेट साल्ट लेक (Great Salt Lake)संयुक्त राज्य अमेरिका (उटा)50 – 270 ppt (परिवर्तनशील)इसकी लवणता जल स्तर के आधार पर बहुत बदलती रहती है।
5.कैस्पियन सागर (Caspian Sea)मध्य एशिया / यूरोप**~ 12 ppt**क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी झील। यह हल्की खारी (Brackish) है।

झीलों का महत्व



5. लवणता का महत्व (Significance of Salinity)

समुद्री जल की लवणता केवल उसके खारेपन का माप नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की जलवायु प्रणाली, महासागरीय परिसंचरण और समुद्री जीवन को नियंत्रित करने वाला एक मौलिक कारक है। इसका महत्व निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है:

1. घनत्व और महासागरीय परिसंचरण (Density and Ocean Circulation)

2. हिमांक बिंदु पर प्रभाव (Effect on Freezing Point)

3. समुद्री जीवन पर प्रभाव (Impact on Marine Life)

निष्कर्ष:
लवणता महासागरों का केवल एक रासायनिक गुण नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी के जलवायु इंजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो महासागरीय धाराओं, वैश्विक ऊष्मा वितरण और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना को आकार देती है। लवणता में छोटे परिवर्तन भी वैश्विक जलवायु और समुद्री जीवन पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।


समुद्री जल की लवणता के वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक (Factors Affecting Ocean Salinity Distribution) निम्नलिखित हैं, जो परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

क्रम संख्याकारक का नामलवणता पर प्रभावउदाहरण और स्पष्टीकरण
1.वाष्पीकरण (Evaporation)बढ़ाता है (लवणता उच्च होती है)।गर्म और शुष्क क्षेत्रों में पानी भाप बन जाता है, जबकि नमक पीछे रह जाता है। इस कारण, उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (Sub-tropics – लगभग 20° से 40° अक्षांशों के बीच) में लवणता सबसे अधिक होती है, जहाँ अधिक वाष्पीकरण होता है और बादल कम बनते हैं।
2.वर्षा (Precipitation)घटाता है (लवणता कम होती है)।वर्षा समुद्री जल में ताजा पानी (Freshwater) जोड़ती है, जिससे पानी पतला (Dilute) हो जाता है और लवणता कम हो जाती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों (Equator) में भारी वर्षा के कारण, उच्च वाष्पीकरण के बावजूद भी लवणता मध्यम रहती है।
3.नदी जल का अन्तर्वाह (River Runoff)घटाता है (लवणता कम होती है)।जहाँ बड़ी नदियाँ महासागर में मिलती हैं, जैसे कि डेल्टा क्षेत्र या बड़े खाड़ी के मुहाने (बंगाल की खाड़ी में गंगा/ब्रह्मपुत्र डेल्टा), वहाँ ताज़े पानी की अत्यधिक मात्रा से सतह की लवणता काफी कम हो जाती है।
4.बर्फ़ का पिघलना और जमना (Melting and Freezing of Ice)– पिघलना: लवणता घटाता है। – जमना: लवणता बढ़ाता है।बर्फ़ का पिघलना: ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Regions) में बर्फ़ पिघलने से ठंडा और मीठा पानी (Freshwater) समुद्र में मिलता है, जिससे लवणता कम हो जाती है। बर्फ़ का जमना: जब समुद्र का पानी जमता है, तो नमक बर्फ में नहीं घुलता (बर्फ ताजा होती है), जिससे आसपास का पानी अधिक नमकीन हो जाता है।
5.पवन और समुद्री धाराएँ (Wind and Ocean Currents)वितरण को प्रभावित करता है।पवनें सतही जल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं, जिससे कम लवणता वाला पानी अधिक लवणता वाले क्षेत्र में या इसका उल्टा हो सकता है। उदाहरण के लिए, अटलांटिक महासागर में गल्फ स्ट्रीम लवणता के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
6.जल परिसंचरण की डिग्री (Degree of Water Circulation)बढ़ा/घटा सकता है।संलग्न (Enclosed) समुद्री निकाय जैसे कि लाल सागर (Red Sea) और भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में खुले महासागरों की तुलना में बहुत अधिक वाष्पीकरण होता है और नदियों से कम ताज़ा पानी मिलता है, इसलिए इनकी लवणता अधिक होती है। इसके विपरीत, जहां ताजा पानी आ रहा हो और संचलन धीमा हो तो लवणता कम होगी।
7.वातावरण का दबाव (Atmospheric Pressure)परोक्ष रूप से प्रभावित करता है।वायुदाब पवन परिसंचरण को प्रभावित करता है, जो वर्षा के पैटर्न को बदलता है और परिणामस्वरूप लवणता के स्तर पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालता है।

निष्कर्ष:
आमतौर पर, महासागरीय सतह की अधिकतम लवणता उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (20°-40° अक्षांश) में पाई जाती है। भूमध्य रेखा पर, उच्च वर्षा के कारण लवणता मध्यम रहती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में, बर्फ पिघलने के कारण सतह पर लवणता कम पाई जाती है।


महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)

महासागरीय धाराएँ महासागरों में एक निश्चित दिशा में बहने वाले पानी की विशाल “नदियों” के समान होती हैं। ये धाराएँ पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने, समुद्री जीवन को प्रभावित करने और वैश्विक ऊष्मा (Heat) को वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति के कारण (Causes of Ocean Currents)

महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति और दिशा को कई कारक मिलकर नियंत्रित करते हैं, जिन्हें दो मुख्य समूहों में बांटा जा सकता है:

1. प्राथमिक बल (Primary Forces) – जो धाराओं को गति प्रदान करते हैं:

प्राथमिक बल वे मौलिक प्राकृतिक शक्तियाँ हैं जो रुके हुए महासागरीय जल को गति प्रदान करती हैं और धाराओं को जन्म देती हैं। ये बल धाराओं की शुरुआत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार होते हैं।

इनमें निम्नलिखित चार बल शामिल हैं:

क. सौर ऊर्जा से तापन (Heating by Solar Energy)

यह प्रक्रिया धाराओं के लिए एक अप्रत्यक्ष लेकिन मूलभूत शुरुआती बिंदु है।

ख. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)

सतही धाराओं को उत्पन्न करने वाला यह सबसे प्रमुख और शक्तिशाली कारक है।

ग. कोरिओलिस बल (Coriolis Force)

यह बल धाराओं को शुरू नहीं करता, बल्कि पहले से बह रही धाराओं की दिशा को मोड़ता (Deflect) है।

घ. गुरुत्वाकर्षण (Gravity)

गुरुत्वाकर्षण बल पानी के ढेर को समतल करने का काम करता है, जिससे धाराएँ उत्पन्न होती हैं।

ये सभी प्राथमिक बल एक साथ मिलकर काम करते हैं और महासागरों में धाराओं की एक जटिल और गतिशील प्रणाली का निर्माण करते हैं।


2. द्वितीयक बल (Secondary Forces) – जो धाराओं की दिशा और गति को बदलते हैं:

द्वितीयक बल वे कारक हैं जो प्राथमिक बलों द्वारा शुरू की गई धाराओं के मार्ग, गति और स्वरूप को परिमार्जित (modify) करते हैं। ये बल धाराओं को उनका अंतिम, जटिल और वृत्ताकार रूप प्रदान करते हैं।

इनमें मुख्य रूप से दो कारक शामिल हैं:

क. तापमान और लवणता में अंतर (Differences in Temperature and Salinity)

यह कारक घनत्व (Density) पर आधारित है और विशेष रूप से गहरी महासागरीय धाराओं (Deep Ocean Currents) को जन्म देता है।

ख. महाद्वीपों का आकार और समुद्र तल की स्थलाकृति (Shape of Continents and Ocean Floor Topography)

यह कारक धाराओं के लिए एक भौतिक बाधा (Physical Barrier) के रूप में कार्य करता है, जो उनकी दिशा को मजबूरन बदल देता है।

निष्कर्ष:
संक्षेप में, यदि प्राथमिक बल धाराओं के “इंजन” हैं जो उन्हें गति देते हैं, तो द्वितीयक बल “स्टीयरिंग व्हील” और “सड़क के अवरोधक” हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि वे कहाँ और कैसे बहेंगी।


धाराओं के प्रकार (Types of Currents)

1. तापमान के आधार पर:

तापमान के आधार पर महासागरीय धाराओं को दो मुख्य प्रकारों में बांटा जा सकता है: गर्म धाराएँ और ठंडी धाराएँ। ये धाराएँ अपने गुणों के कारण जिन क्षेत्रों से गुजरती हैं, वहाँ के मौसम और जलवायु पर गहरा प्रभाव डालती हैं।


क. गर्म धाराएँ (Warm Currents)

ये वे धाराएँ हैं जिनका तापमान उनके मार्ग में आने वाले जल के तापमान से अधिक होता है।


ख. ठंडी धाराएँ (Cold Currents)

ये वे धाराएँ हैं जिनका तापमान उनके मार्ग में आने वाले जल के तापमान से कम होता है।


तुलनात्मक सारांश

विशेषतागर्म धारा (Warm Current)ठंडी धारा (Cold Current)
उत्पत्तिभूमध्यरेखीय क्षेत्र (निम्न अक्षांश)ध्रुवीय क्षेत्र (उच्च अक्षांश)
प्रवाह की दिशाध्रुवों की ओरभूमध्य रेखा की ओर
तापमानआस-पास के जल से गर्मआस-पास के जल से ठंडा
तटीय प्रभावतापमान बढ़ाती है, वर्षा लाती हैतापमान घटाती है, शुष्कता व मरुस्थल बनाती है
उदाहरणगल्फ स्ट्रीम, कुरोशियोलैब्राडोर, पेरू (हम्बोल्ट)

2. गहराई के आधार पर:

गहराई के आधार पर महासागरीय धाराओं को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया जाता है: सतही धाराएँ और गहरी धाराएँ। ये दोनों प्रणालियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और मिलकर वैश्विक ऊष्मा और पोषक तत्वों का परिसंचरण करती हैं।


क. सतही धाराएँ (Surface Currents)

ये वे धाराएँ हैं जो महासागर की ऊपरी सतह पर बहती हैं और जिनका हम आमतौर पर धाराओं के रूप में अध्ययन करते हैं।


ख. गहरी धाराएँ (Deep Water Currents)

ये महासागर की गहराइयों में बहती हैं और वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


तुलनात्मक सारांश

विशेषतासतही धाराएँ (Surface Currents)गहरी धाराएँ (Deep Water Currents)
स्थानमहासागर का ऊपरी 400 मीटरमहासागर की गहराइयों में (तल तक)
मुख्य चालक बलपवनें (Winds)घनत्व (तापमान और लवणता का अंतर)
जल का आयतनकुल जल का 10%कुल जल का 90%
गतितेजबहुत धीमी
वैज्ञानिक अवधारणागायर (Gyre) प्रणालीथर्मोहेलाइन परिसंचरण (कन्वेयर बेल्ट)
जलवायु में भूमिकाक्षेत्रीय जलवायु और मौसम को प्रभावित करती हैंवैश्विक ऊष्मा का वितरण और दीर्घकालिक जलवायु को नियंत्रित करती हैं

विश्व की प्रमुख महासागरीय धाराएँ

नीचे विश्व के प्रमुख महासागरों (अटलांटिक, प्रशांत और हिंद महासागर) में बहने वाली गर्म और ठंडी धाराओं को सारणीबद्ध किया गया है।

महासागरगर्म धाराएँ (Warm Currents)ठंडी धाराएँ (Cold Currents)

अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)
• गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream): दुनिया की सबसे तेज और प्रसिद्ध धाराओं में से एक।<br>• उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift): गल्फ स्ट्रीम का ही विस्तार, जो पश्चिमी यूरोप को गर्म रखता है।<br>• ब्राजील धारा (Brazil Current): दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट पर बहती है।<br>• उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराएँ (North & South Equatorial Currents): भूमध्य रेखा के पास बहती हैं।<br>• गिनी धारा (Guinea Current): अफ्रीका के पश्चिमी तट पर।• लैब्राडोर धारा (Labrador Current): आर्कटिक से ठंडा पानी और हिमखंड लाती है।<br>• कैनरी धारा (Canary Current): अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी तट पर बहती है।<br>• बेंगुएला धारा (Benguela Current): अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी तट पर।<br>• फ़ॉकलैंड धारा (Falkland Current): दक्षिण अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर।
प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)• कुरोशियो धारा (Kuroshio Current): जापान के तट पर बहती है, इसे “जापान की गर्म धारा” भी कहते हैं।<br>• पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा (East Australian Current): ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर।<br>• अलास्का धारा (Alaska Current): उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर।<br>• उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराएँ (North & South Equatorial Currents):• ओयाशियो धारा (Oyashio Current): इसे “जापान की ठंडी धारा” कहते हैं, जो उत्तर से आती है।<br>• कैलिफोर्निया धारा (California Current): उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर बहती है।<br>• पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru or Humboldt Current): दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर, एल नीनो से संबंधित।
हिंद महासागर (Indian Ocean)• अगुलहास धारा (Agulhas Current): अफ्रीका के पूर्वी तट पर बहने वाली एक बहुत शक्तिशाली धारा।<br>• मोजाम्बिक धारा (Mozambique Current): अफ्रीका और मेडागास्कर के बीच।<br>• दक्षिणी-पश्चिमी मानसून ड्रिफ्ट (South-West Monsoon Drift): यह एक मौसमी धारा है जो गर्मियों में बनती है।• पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा (West Australian Current): ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट पर।<br>• सोमाली धारा (Somali Current): अफ्रीका के हॉर्न के पास बहती है। यह एक अनूठी धारा है जो गर्मियों के मानसून के दौरान ठंडी हो जाती है (अपवेलिंग के कारण)।

अटलांटिक महासागर की धाराएँ (Currents of the Atlantic Ocean)

अटलांटिक महासागर की धाराओं की प्रणाली सबसे व्यवस्थित और स्पष्ट है। इसका आकार ‘S’ अक्षर जैसा है, और धाराएँ इसी के अनुरूप उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में दो विशाल वृत्ताकार प्रणालियों (गायर) का निर्माण करती हैं।


उत्तरी अटलांटिक महासागर की धाराएँ (Currents of the North Atlantic Ocean)

यह एक दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घूमने वाला गायर (Gyre) है। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:

गर्म धाराएँ (Warm Currents):

  1. उत्तरी विषुवतीय धारा (North Equatorial Current):
    • यह व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और कैरिबियन सागर तक पहुँचती है।
  2. गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream):
    • यह दुनिया की सबसे प्रसिद्ध, शक्तिशाली और तेज धाराओं में से एक है।
    • यह मैक्सिको की खाड़ी से उत्पन्न होती है और उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट (फ्लोरिडा) के समानांतर उत्तर-पूर्व की ओर बहती है।
  3. उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift):
    • यह गल्फ स्ट्रीम का ही आगे का विस्तार है, जो पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए पश्चिमी यूरोप तक पहुँचती है।
    • प्रभाव: इसी धारा के कारण पश्चिमी यूरोप का मौसम सर्दियों में भी हल्का गर्म रहता है और वहां के बंदरगाह साल भर खुले रहते हैं।

ठंडी धाराएँ (Cold Currents):

  1. कैनरी धारा (Canary Current):
    • यह उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट का ठंडा पानी है जो दक्षिण की ओर मुड़कर अफ्रीका के पश्चिमी तट (स्पेन, पुर्तगाल और सहारा मरुस्थल के पास) के साथ-साथ बहता है।
    • प्रभाव: इसके कारण सहारा मरुस्थल के तटीय क्षेत्र में शुष्कता बढ़ जाती है। यह धारा उत्तरी अटलांटिक गायर को पूरा करती है।
  2. लैब्राडोर धारा (Labrador Current):
    • यह आर्कटिक महासागर से ठंडा पानी और अपने साथ हिमखंड (Icebergs) लेकर ग्रीनलैंड और कनाडा के बीच से दक्षिण की ओर बहती है।
    • विशेषता: न्यूफ़ाउंडलैंड (कनाडा) के पास इसका गर्म गल्फ स्ट्रीम से मिलन होता है, जिससे वहां घना कोहरा छा जाता है और यह दुनिया का सबसे प्रसिद्ध मछली पकड़ने का क्षेत्र बन जाता है।

दक्षिणी अटलांटिक महासागर की धाराएँ (Currents of the South Atlantic Ocean)

यह एक वामावर्त (Counter-clockwise) दिशा में घूमने वाला गायर है। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:

गर्म धाराएँ (Warm Currents):

  1. दक्षिणी विषुवतीय धारा (South Equatorial Current):
    • यह भी व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और ब्राजील के तट से टकराकर मुड़ जाती है।
  2. ब्राजील धारा (Brazil Current):
    • यह दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा है जो दक्षिण अमेरिका (ब्राजील) के पूर्वी तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है।

ठंडी धाराएँ (Cold Currents):

  1. दक्षिण अटलांटिक प्रवाह (South Atlantic Drift):
    • यह विशाल अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current) का ही हिस्सा है जो पश्चिम से पूर्व की ओर बहता है।
  2. बेंगुएला धारा (Benguela Current):
    • यह दक्षिण अटलांटिक प्रवाह की एक शाखा है जो उत्तर की ओर मुड़कर अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी तट (नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका) के साथ-साथ बहती है।
    • प्रभाव: इसके कारण नामीब मरुस्थल का निर्माण हुआ है। यह अपवेलिंग (Upwelling – नीचे से ठंडे पोषक तत्वों का ऊपर आना) के कारण मछली पकड़ने का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र भी है। यह दक्षिणी अटलांटिक गायर को पूरा करती है।
  3. फ़ॉकलैंड धारा (Falkland Current):
    • यह अंटार्कटिका से उत्तर की ओर बहते हुए अर्जेंटीना के तट तक पहुँचती है। इसका गर्म ब्राजील धारा से मिलन होता है।

अटलांटिक महासागर की धाराओं की विशिष्टताएँ:


प्रशांत महासागर की धाराएँ (Currents of the Pacific Ocean)

प्रशांत महासागर दुनिया का सबसे बड़ा और गहरा महासागर है। अटलांटिक महासागर की तरह, यहाँ भी उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में दो विशाल वृत्ताकार धारा प्रणालियाँ (गायर) पाई जाती हैं।


उत्तरी प्रशांत महासागर की धाराएँ (Currents of the North Pacific Ocean)

यह एक दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घूमने वाला गायर है। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:

गर्म धाराएँ (Warm Currents):

  1. उत्तरी विषुवतीय धारा (North Equatorial Current):
    • यह व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और फिलीपींस के तट तक पहुँचती है।
  2. कुरोशियो धारा (Kuroshio Current):
    • इसे “जापान की गर्म धारा” या “ब्लैक स्ट्रीम” (इसके गहरे नीले रंग के कारण) भी कहा जाता है।
    • यह उत्तरी विषुवतीय धारा का ही विस्तार है जो फिलीपींस और ताइवान के तट से मुड़कर उत्तर की ओर जापान के तट के साथ बहती है। यह अटलांटिक की गल्फ स्ट्रीम के बराबर है।
    • प्रभाव: यह जापान के मौसम को गर्म और नम बनाती है।
  3. उत्तरी प्रशांत प्रवाह (North Pacific Drift):
    • यह कुरोशियो धारा का ही पूर्वी विस्तार है, जो पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए उत्तरी अमेरिका के तट तक पहुँचती है।

ठंडी धाराएँ (Cold Currents):

  1. कैलिफोर्निया धारा (California Current):
    • यह उत्तरी प्रशांत प्रवाह की दक्षिणी शाखा है जो उत्तरी अमेरिका (विशेष रूप से कैलिफोर्निया) के पश्चिमी तट के साथ-साथ दक्षिण की ओर बहती है।
    • प्रभाव: यह तट के तापमान को कम करती है, जिससे शुष्क मौसम और कोहरे की स्थिति बनती है (जैसे सैन फ्रांसिस्को में)। यह उत्तरी प्रशांत गायर को पूरा करती है।
  2. ओयाशियो धारा (Oyashio Current):
    • इसे “जापान की ठंडी धारा” या “कुरिल धारा” भी कहते हैं।
    • यह आर्कटिक क्षेत्र से ठंडा पानी लेकर दक्षिण की ओर बहती है और जापान के पूर्वी तट पर गर्म कुरोशियो धारा से मिलती है।
    • प्रभाव: इस मिलन स्थल पर घना कोहरा बनता है और यह प्लैंकटन की अधिकता के कारण दुनिया के सबसे अच्छे मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों में से एक है।

दक्षिणी प्रशांत महासागर की धाराएँ (Currents of the South Pacific Ocean)

यह एक वामावर्त (Counter-clockwise) दिशा में घूमने वाला गायर है। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित हैं:

गर्म धाराएँ (Warm Currents):

  1. दक्षिणी विषुवतीय धारा (South Equatorial Current):
    • यह व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और ऑस्ट्रेलिया के तट से टकराकर मुड़ जाती है।
  2. पूर्वी ऑस्ट्रेलियाई धारा (East Australian Current – EAC):
    • यह दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा है जो ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के साथ दक्षिण की ओर बहती है। यह इस क्षेत्र की सबसे बड़ी महासागरीय धारा है।

ठंडी धाराएँ (Cold Currents):

  1. दक्षिण प्रशांत प्रवाह (South Pacific Drift):
    • यह अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा का ही हिस्सा है जो विशाल जलराशि के रूप में पश्चिम से पूर्व की ओर बहता है।
  2. पेरू या हम्बोल्ट धारा (Peru or Humboldt Current):
    • यह दक्षिण प्रशांत प्रवाह की एक शाखा है जो उत्तर की ओर मुड़कर दक्षिण अमेरिका (चिली और पेरू) के पश्चिमी तट के साथ-साथ बहती है।
    • प्रभाव:
      • यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ठंडी धाराओं में से एक है, जिसके कारण अटाकामा मरुस्थल (दुनिया का सबसे शुष्क मरुस्थल) का निर्माण हुआ है।
      • यह अपवेलिंग (Upwelling – गहरे समुद्र से ठंडे, पोषक तत्वों से भरपूर पानी का सतह पर आना) के लिए प्रसिद्ध है, जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा मछली उत्पादक क्षेत्र (विशेषकर एंकोवी मछली) बनाता है।
      • यह धारा एल नीनो (El Niño) की घटना से सीधे तौर पर संबंधित है।

प्रशांत महासागर की अन्य महत्वपूर्ण धाराएँ और घटनाएँ:


हिंद महासागर की धाराएँ (Currents of the Indian Ocean)

हिंद महासागर की धाराओं की प्रणाली अटलांटिक और प्रशांत महासागर से बहुत अलग और अनूठी है। इसका मुख्य कारण मानसूनी पवनों का मौसमी उत्क्रमण (Seasonal Reversal) है, जिसका प्रभाव विशेष रूप से भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित उत्तरी हिंद महासागर पर पड़ता है। दक्षिणी हिंद महासागर में एक स्थायी और स्थिर धारा प्रणाली पाई जाती है।

इसलिए, हिंद महासागर की धाराओं को दो भागों में बांटा जाता है:

  1. उत्तरी हिंद महासागर की धाराएँ (मौसमी धाराएँ)
  2. दक्षिणी हिंद महासागर की धाराएँ (स्थिर धाराएँ)

1. उत्तरी हिंद महासागर की धाराएँ (मौसमी धारा प्रणाली)

यहाँ धाराओं की दिशा साल में दो बार मानसूनी पवनों के साथ पूरी तरह से बदल जाती है।

क. ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान (दक्षिण-पश्चिम मानसून)

ख. शीतकालीन मानसून के दौरान (उत्तर-पूर्व मानसून)


2. दक्षिणी हिंद महासागर की धाराएँ (स्थिर धारा प्रणाली)

दक्षिणी हिंद महासागर में एक स्थायी, वामावर्त (Counter-clockwise) गायर (Gyre) बनता है, जो अटलांटिक और प्रशांत महासागर के दक्षिणी गायर के समान है।

गर्म धाराएँ (Warm Currents):

  1. दक्षिणी विषुवतीय धारा (South Equatorial Current):
    • यह व्यापारिक पवनों के प्रभाव में पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। मेडागास्कर द्वीप के पास पहुँचकर यह दो शाखाओं में बँट जाती है।
  2. मोजाम्बिक धारा (Mozambique Current):
    • यह दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा है जो अफ्रीका और मेडागास्कर के बीच मोजाम्बिक चैनल में दक्षिण की ओर बहती है।
  3. अगुलहास धारा (Agulhas Current):
    • यह मेडागास्कर के पूर्व से आने वाली धारा और मोजाम्बिक धारा के मिलने से बनती है। यह अफ्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट के साथ बहती है और दुनिया की सबसे तेज और शक्तिशाली गर्म धाराओं में से एक है।

ठंडी धाराएँ (Cold Currents):

  1. दक्षिण हिंद महासागरीय प्रवाह (South Indian Ocean Drift):
    • यह विशाल अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा का ही हिस्सा है जो पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व की ओर बहता है।
  2. पश्चिमी ऑस्ट्रेलियाई धारा (West Australian Current):
    • यह दक्षिण हिंद महासागरीय प्रवाह की एक शाखा है जो उत्तर की ओर मुड़कर ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के साथ-साथ बहती है। यह एक ठंडी धारा है जो दक्षिणी हिंद महासागर के गायर को पूरा करती है।

हिंद महासागर की धाराओं की मुख्य विशेषताएँ

विशेषताहिंद महासागर में स्थिति
उत्तरी भागधाराओं की दिशा वर्ष में दो बार मानसून पवनों के साथ बदल जाती है।
दक्षिणी भागएक स्थायी, वामावर्त (Counter-clockwise) गायर बनता है।
सोमाली धारायह एक अनूठी धारा है जो मौसमी रूप से अपनी दिशा और तापमान (गर्म/ठंडी) दोनों बदलती है।
अगुलहास धारायह दुनिया की सबसे शक्तिशाली गर्म धाराओं में से एक है।
कोई स्पष्ट मिलन स्थल नहींअटलांटिक और प्रशांत के विपरीत, यहाँ गर्म और ठंडी धाराओं का कोई प्रमुख मिलन स्थल नहीं है जो बड़े मत्स्य क्षेत्रों का निर्माण करे।


महत्वपूर्ण तथ्य और अवधारणाएँ (Important Facts and Concepts)

  1. गायर (Gyres): महासागरों में धाराएँ एक वृत्ताकार पथ में बहती हैं जिसे “गायर” कहा जाता है। उत्तरी गोलार्ध में ये दक्षिणावर्त (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्ध में वामावर्त (Counter-clockwise) घूमती हैं।
  2. धाराओं का मिलन (Meeting Points of Currents):
    • जहाँ गर्म और ठंडी धाराएँ मिलती हैं, वहाँ घना कोहरा (Fog) बनता है और प्लैंकटन (मछलियों का भोजन) की भारी मात्रा उत्पन्न होती है।
    • इस कारण ये क्षेत्र दुनिया के सबसे अच्छे मछली पकड़ने वाले क्षेत्र बन जाते हैं।
    • उदाहरण:
      • न्यूफ़ाउंडलैंड (कनाडा) के पास: गर्म गल्फ स्ट्रीम और ठंडी लैब्राडोर धारा मिलती हैं।
      • जापान के पास: गर्म कुरोशियो और ठंडी ओयाशियो धारा मिलती हैं।
  3. हिन्द महासागर का विशेष स्वरूप (Unique Nature of the Indian Ocean):
    • यह एकमात्र महासागर है जहाँ उत्तरी भाग में धाराओं की दिशा मानसून पवनों के साथ बदल जाती है। सर्दियों में धाराएँ एक दिशा में और गर्मियों में विपरीत दिशा में बहती हैं।
  4. मरुस्थलों से संबंध (Relation with Deserts):
    • अधिकांश ठंडी धाराएँ महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर बहती हैं। ये धाराएँ अपने ऊपर की हवा को ठंडा और शुष्क कर देती हैं, जिससे वर्षा नहीं होती। यही कारण है कि दुनिया के कई बड़े मरुस्थल (जैसे अटाकामा, नामीब, सहारा का पश्चिमी भाग) इन ठंडी धाराओं के प्रभाव क्षेत्र में स्थित हैं।

महासागरीय धाराओं के प्रभाव (Effects of Ocean Currents)

  1. जलवायु पर प्रभाव: धाराएँ वैश्विक ऊष्मा का पुनर्वितरण करती हैं। गर्म धाराएँ ठंडे तटीय क्षेत्रों को गर्म और नम बनाती हैं (जैसे गल्फ स्ट्रीम पश्चिमी यूरोप को गर्म रखती है), जबकि ठंडी धाराएँ तटीय क्षेत्रों को ठंडा और शुष्क बनाती हैं।
  2. मरुस्थलों का निर्माण: उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर बहने वाली ठंडी धाराएँ वायु को स्थिर कर देती हैं, जिससे वर्षा नहीं होती और मरुस्थलों का निर्माण होता है (जैसे पेरू धारा के कारण अटाकामा मरुस्थल)।
  3. मत्स्य उद्योग पर प्रभाव: जहाँ गर्म और ठंडी धाराएँ मिलती हैं, वहाँ प्लैंकटन (मछलियों का भोजन) की भरमार होती है, जिससे यह क्षेत्र मछली पकड़ने के लिए दुनिया का सबसे समृद्ध केंद्र बन जाता है।
    • उदाहरण: जापान के पास कुरोशियो (गर्म) और ओयाशियो (ठंडी) धारा का मिलन। न्यूफ़ाउंडलैंड के पास गल्फ स्ट्रीम (गर्म) और लैब्राडोर (ठंडी) धारा का मिलन।
  4. नौसंचालन (Navigation): जहाजों की गति धाराओं की दिशा में तेज हो जाती है, जिससे समय और ईंधन की बचत होती है। ठंडी धाराएँ अपने साथ हिमखंड (icebergs) ला सकती हैं, जो जहाजों के लिए खतरा पैदा करते हैं।
  5. वर्षा: गर्म धाराओं के ऊपर की हवा नमी ग्रहण कर लेती है और जब यह तट पर पहुँचती है तो वर्षा करती है। ठंडी धाराओं के ऊपर की हवा शुष्क होती है।

सारगैसो सागर (Sargasso Sea)

सारगैसो सागर उत्तरी अटलांटिक महासागर के मध्य में स्थित एक विशाल, शांत और अद्वितीय समुद्री क्षेत्र है। इसकी सबसे बड़ी और प्रसिद्ध विशेषता यह है कि यह दुनिया का एकमात्र ऐसा समुद्र है जिसकी कोई तटरेखा (Coastline) नहीं है। यह वास्तव में एक “महासागर के भीतर महासागर” (An ocean within an ocean) है।


सारगैसो सागर क्या है?

यह भूमि से घिरा नहीं है, बल्कि चार प्रमुख महासागरीय धाराओं से घिरा हुआ है, जो एक विशाल वृत्ताकार प्रणाली (उत्तरी अटलांटिक गायर – North Atlantic Gyre) का निर्माण करती हैं। इन धाराओं की सीमाओं के भीतर का शांत जल ही सारगैसो सागर कहलाता है।


नामकरण (Naming)


भौगोलिक स्थिति और निर्माण (Geographical Location and Formation)

सारगैसो सागर चार शक्तिशाली महासागरीय धाराओं द्वारा अपनी सीमाओं के भीतर सीमित है:

  1. पश्चिम में: गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream)
  2. उत्तर में: उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट (North Atlantic Drift)
  3. पूर्व में: कैनरी धारा (Canary Current)
  4. दक्षिण में: उत्तरी विषुवतीय धारा (North Atlantic Equatorial Current)

ये धाराएँ दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में घूमती हैं, जिससे बीच का पानी शांत, स्थिर और गर्म बना रहता है।


विशेषताएँ (Characteristics)

  1. शांत जल (Calm Water): धाराओं के केंद्र में होने के कारण, यहाँ हवाएँ बहुत कमजोर होती हैं और पानी लगभग स्थिर रहता है। इसी क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से “हॉर्स लैटीट्यूड्स” (Horse Latitudes) भी कहा जाता था, क्योंकि यहाँ शांत हवाओं के कारण पाल वाले जहाज अक्सर फंस जाते थे।
  2. गर्म और उच्च लवणता (Warm and High Salinity): यहाँ उच्च वाष्पीकरण और कम वर्षा के कारण पानी की लवणता (खारापन) अटलांटिक के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक होती है।
  3. अत्यधिक स्वच्छ जल (Exceptionally Clear Water): यहाँ का पानी पोषक तत्वों की कमी के कारण बहुत साफ और गहरे नीले रंग का होता है। पानी की स्पष्टता (visibility) 200 फीट (लगभग 60 मीटर) तक हो सकती है। पोषक तत्वों की कमी के कारण इसे कभी-कभी “समुद्री मरुस्थल” (oceanic desert) भी कहा जाता है, लेकिन सारगैसम शैवाल के कारण यह जीवन से भरपूर है।

पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance)

सारगैसो सागर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र है।

  1. स्वर्ण वर्षावन (Golden Rainforest): तैरती हुई सारगैसम शैवाल को “समुद्र का सुनहरा तैरता वर्षावन” कहा जाता है। यह अनगिनत समुद्री जीवों के लिए आवास, भोजन और छिपने की जगह प्रदान करती है।
  2. नर्सरी और प्रजनन स्थल (Nursery and Spawning Ground): यह कई महत्वपूर्ण और लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण नर्सरी क्षेत्र है।
    • अमेरिकी और यूरोपीय ईल (Eels): ये मछलियाँ प्रजनन के लिए हजारों मील की यात्रा करके सारगैसो सागर में आती हैं।
    • लॉगरहेड समुद्री कछुए (Loggerhead Sea Turtles): जन्म के बाद छोटे कछुए अपने जीवन के शुरुआती वर्ष (“lost years”) इन शैवाल के बीच सुरक्षा में बिताते हैं।
  3. अद्वितीय जैव विविधता (Unique Biodiversity): यहाँ 10 से अधिक ऐसी प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलतीं। ये जीव विशेष रूप से सारगैसम के तैरते हुए मैट पर रहने के लिए अनुकूलित हैं, जैसे सारगैसम फिश (Sargassum fish)।

आधुनिक चुनौतियाँ और खतरे (Modern Challenges and Threats)

  1. प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution): धाराओं की वृत्ताकार गति के कारण, यह क्षेत्र प्लास्टिक और अन्य समुद्री मलबे के लिए एक संग्रह बिंदु बन गया है। उत्तरी अटलांटिक गारबेज पैच (North Atlantic Garbage Patch) का एक बड़ा हिस्सा सारगैसो सागर में ही स्थित है। सूक्ष्म प्लास्टिक (Microplastics) यहाँ के समुद्री जीवन के लिए एक बड़ा खतरा हैं।
  2. जलवायु परिवर्तन: समुद्र के तापमान में वृद्धि और धाराओं के पैटर्न में बदलाव सारगैसम के विकास और इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।


जलराशियाँ (Water Masses)

परिभाषा:
जैसे वायुमंडल में वायुराशियाँ (Air Masses) होती हैं, वैसे ही महासागरों में जलराशियाँ (Water Masses) होती हैं। एक जलराशि, महासागरीय जल का एक बहुत बड़ा और विशिष्ट निकाय (Body) है जिसकी पहचान उसके लगभग समान तापमान (Temperature) और लवणता (Salinity) के घनत्व (Density) से होती है।

यह एक प्रकार से जलराशि का ‘फिंगरप्रिंट’ या ‘पहचान पत्र’ होता है। जब कोई जलराशि एक बार बन जाती है और गहराई में डूब जाती है, तो वह हजारों किलोमीटर तक यात्रा करते हुए भी अपने इन मूल गुणों को बहुत धीरे-धीरे बदलती है।


जलराशियों का निर्माण (Formation of Water Masses)

महासागरीय जलराशियों (Water Masses) का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसका “जन्म स्थान” महासागर की सतह होती है। सतह पर ही पानी वायुमंडल के साथ सीधे संपर्क में आता है और अपने विशिष्ट तापमान (Temperature) और लवणता (Salinity) के गुण प्राप्त करता है। ये दोनों गुण मिलकर जल के घनत्व (Density) को निर्धारित करते हैं, जो जलराशि के निर्माण और उसके डूबने का मुख्य कारण है।

निर्माण की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:

1. स्थान: महासागर की सतह (The Location: Ocean Surface)

जलराशियाँ महासागर की गहराइयों में नहीं बनतीं, बल्कि हमेशा सतह पर बनती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सतह पर ही निम्नलिखित प्रक्रियाएँ होती हैं:


2. दो मुख्य अवयवों का निर्धारण (The Two Key Ingredients are Set)

क. तापमान का निर्धारण (Determination of Temperature)

ख. लवणता का निर्धारण (Determination of Salinity)


3. घनत्व का निर्धारण: निर्णायक कारक (The Decisive Factor: Density)

तापमान और लवणता मिलकर पानी का घनत्व (Density) तय करते हैं, जो जलराशि के व्यवहार को निर्धारित करता है।

घनत्व का नियम:

सबसे सघन (heaviest) पानी वह होगा जो बहुत ठंडा और बहुत खारा दोनों हो।


4. निर्माण का अंतिम चरण: डूबना (निमज्जन) (The Final Step: Sinking)

यह जलराशि के “जन्म” का निर्णायक क्षण है।

उदाहरण:
उत्तरी अटलांटिक गहरे जल (NADW) का निर्माण तब होता है जब गल्फ स्ट्रीम का गर्म और खारा पानी उत्तर की ओर बहता है, ग्रीनलैंड के पास ठंडा होता है, और फिर अत्यधिक सघन होकर महासागर की गहराइयों में डूब जाता है।


T-S डायग्राम क्या है?

T-S डायग्राम एक ग्राफ या चार्ट है जो महासागरीय जल के दो सबसे महत्वपूर्ण गुणों के बीच संबंध को दर्शाता है: तापमान (Temperature – T) और लवणता (Salinity – S)। इसे एक प्रकार से जलराशि का “फिंगरप्रिंट चार्ट” माना जा सकता है।

जब समुद्र के किसी नमूने (sample) का तापमान और लवणता मापा जाता है, तो उसे इस ग्राफ पर एक बिंदु (dot) के रूप में प्लॉट किया जा सकता है।


तीसरा महत्वपूर्ण पैरामीटर: घनत्व (The Third Key Parameter: Density)

T-S डायग्राम की असली शक्ति यह है कि यह सीधे तौर पर जल के घनत्व (Density) को भी दर्शाता है, भले ही घनत्व के लिए कोई अलग अक्ष न हो।


यह कैसे काम करता है? – जलराशियों का “फिंगरप्रिंट”

  1. एकल बिंदु: समुद्र से लिया गया पानी का एक नमूना (जैसे 1 लीटर) ग्राफ पर एक एकल बिंदु के रूप में दिखाई देगा।
  2. बिंदुओं का समूह (Cluster of Points): एक जलराशि (Water Mass) हजारों घन किलोमीटर पानी का एक विशाल निकाय है। जब इस पूरी जलराशि के कई नमूने लिए जाते हैं, तो उनके T और S मान लगभग एक जैसे होते हैं। ग्राफ पर ये सभी बिंदु एक-दूसरे के बहुत करीब, एक समूह (cluster) के रूप में दिखाई देते हैं।
  3. पहचान: यही बिंदुओं का समूह उस जलराशि का अद्वितीय “T-S फिंगरप्रिंट” या “T-S Signature” होता है। दुनिया की हर प्रमुख जलराशि का अपना एक विशिष्ट फिंगरप्रिंट होता है।

उदाहरण:


T-S डायग्राम का उपयोग (Applications of T-S Diagram)

  1. जलराशियों की पहचान करना (Identifying Water Masses): किसी भी अज्ञात जल नमूने को T-S डायग्राम पर प्लॉट करके यह पता लगाया जा सकता है कि वह किस प्रमुख जलराशि का हिस्सा है।
  2. जलराशियों के मिश्रण का अध्ययन (Studying the Mixing of Water Masses):
    • यह इसका सबसे शक्तिशाली उपयोग है। जब दो अलग-अलग जलराशियाँ (जैसे A और B) आपस में मिलती हैं, तो जो नया पानी बनता है, उसका T-S मान ग्राफ पर उन दोनों जलराशियों को जोड़ने वाली सीधी रेखा पर कहीं स्थित होगा।
    • इससे वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि किसी विशेष स्थान पर पानी किन-किन जलराशियों का और किस अनुपात में मिश्रण है।
  3. महासागरीय स्थिरता का विश्लेषण (Analyzing Ocean Stability):
    • T-S डायग्राम से यह पता लगाया जा सकता है कि जल स्तंभ (Water Column) स्थिर है या अस्थिर।
    • यदि ऊपरी पानी का नमूना निचले पानी के नमूने की तुलना में कम घनत्व वाली रेखा (isopycnal) पर है, तो पानी स्थिर (Stable) है।
    • यदि ऊपरी पानी निचले पानी की तुलना में अधिक सघन है, तो यह अस्थिर (Unstable) है और डूब जाएगा, जिससे मिश्रण (mixing) या संवहन (convection) होगा।

संक्षेप में, T-S डायग्राम एक सरल लेकिन अत्यंत जानकारीपूर्ण उपकरण है जो समुद्र विज्ञानियों को महासागरों की जटिल संरचना, परतों और परिसंचरण को एक ही नज़र में समझने में मदद करता है।


जलराशियों की विशेषताएँ (Characteristics of Water Masses)

महासागरीय जलराशियाँ (Water Masses) अपने विशिष्ट गुणों और व्यवहार के कारण महासागरों की संरचना और परिसंचरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. विशिष्ट तापमान और लवणता (Distinct Temperature and Salinity)

यह एक जलराशि की सबसे मौलिक विशेषता है। प्रत्येक जलराशि का अपना एक अद्वितीय तापमान-लवणता (T-S) संयोजन होता है, जिसे उसका “T-S फिंगरप्रिंट” या हस्ताक्षर (Signature) कहा जाता है।

2. समरूपता (Homogeneity)

एक जलराशि अपने विशाल विस्तार में आंतरिक रूप से लगभग समान (Homogeneous) होती है। इसका मतलब है कि यदि आप उस जलराशि के भीतर अलग-अलग स्थानों से पानी के नमूने लेंगे, तो उन सभी के तापमान और लवणता के गुण लगभग एक जैसे होंगे।

3. घनत्व-आधारित परतों का निर्माण (Density-Driven Layering)

जलराशियाँ महासागर में अपने घनत्व (Density) के अनुसार परतों (Layers) में व्यवस्थित होती हैं।

4. निर्माण का विशिष्ट स्रोत क्षेत्र (Specific Source Region of Formation)

प्रत्येक प्रमुख जलराशि का निर्माण एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में होता है, जहाँ सतह पर अद्वितीय वायुमंडलीय और समुद्री परिस्थितियाँ होती हैं।

5. गुणों का संरक्षण और धीमी गति (Conservation of Properties and Slow Movement)

6. विशाल आयतन और वैश्विक प्रभाव (Large Volume and Global Impact)

प्रमुख जलराशियाँ बहुत विशाल होती हैं और महासागरों के एक बड़े हिस्से को घेरती हैं।

7. रासायनिक हस्ताक्षर (Chemical Signature)

तापमान और लवणता के अलावा, प्रत्येक जलराशि का अपना एक विशिष्ट रासायनिक हस्ताक्षर भी होता है। इसमें घुली हुई ऑक्सीजन, पोषक तत्व (जैसे सिलिकेट, फॉस्फेट, नाइट्रेट) और अन्य ट्रेस तत्वों की मात्रा शामिल होती है।


जलराशियों के प्रकार (Types of Water Masses)

महासागरीय जलराशियों को मुख्य रूप से उनकी गहराई और घनत्व (Density) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। ये प्रकार महासागर की एक परतदार संरचना (Layered Structure) को दर्शाते हैं, जहाँ सबसे हल्की जलराशि सबसे ऊपर और सबसे भारी (सघन) जलराशि सबसे नीचे होती है।

जलराशियों के चार मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:


सतही जलराशियाँ और मध्य जल (Surface and Central Water Masses)

सतही जलराशियाँ (Surface Water Masses) महासागर की सबसे ऊपरी परत बनाती हैं। इनमें से एक बहुत ही महत्वपूर्ण और व्यापक प्रकार “मध्य जल” (Central Waters) है, जो दुनिया के अधिकांश महासागरों में पाया जाता है।


1. सतही जलराशियों की सामान्य विशेषताएँ (General Characteristics of Surface Water Masses)

सतही जल महासागर की वह परत है जो सीधे वायुमंडल के संपर्क में आती है, इसलिए इसके गुण वायुमंडलीय परिस्थितियों से गहरे रूप से प्रभावित होते हैं।


2. “मध्य जल” क्या हैं? (What are Central Waters?)

मध्य जल (Central Waters) एक विशिष्ट प्रकार की सतही जलराशि है जो दुनिया के प्रमुख उप-उष्णकटिबंधीय गायरों (Subtropical Gyres) के केंद्र में बनती है। ये उत्तरी और दक्षिणी अटलांटिक, उत्तरी और दक्षिणी प्रशांत और हिंद महासागरों की सतह पर एक विशाल क्षेत्र को कवर करती हैं।

निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)

मध्य जल का निर्माण एक विशेष प्रक्रिया के माध्यम से होता है जिसे अभिसरण (Convergence) और अधोगमन (Downwelling) कहते हैं:

  1. उप-उष्णकटिबंधीय गायर: महासागरों में पवनें धाराओं को एक विशाल वृत्ताकार पैटर्न (गायर) में चलाती हैं। उत्तरी गोलार्ध में यह दक्षिणावर्त (clockwise) और दक्षिणी गोलार्ध में वामावर्त (counter-clockwise) होता है।
  2. जल का अभिसरण: धाराओं का यह वृत्ताकार प्रवाह सतह के पानी को धीरे-धीरे गायर के केंद्र की ओर धकेलता है। इससे केंद्र में पानी जमा होने लगता है और समुद्र का स्तर थोड़ा सा (कुछ सेंटीमीटर) ऊँचा हो जाता है।
  3. अधोगमन (Downwelling): जब केंद्र में पानी जमा हो जाता है, तो गुरुत्वाकर्षण के कारण वह नीचे की ओर डूबने (sink) लगता है। इस प्रक्रिया को अधोगमन या डाउनवेलिंग कहते हैं।
  4. उच्च तापमान और उच्च लवणता: गायर के केंद्र उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (Subtropics – Horse Latitudes) में स्थित होते हैं, जहाँ:
    • सूर्य की किरणें तेज होती हैं, जिससे पानी गर्म हो जाता है।
    • वर्षा बहुत कम होती है और वाष्पीकरण बहुत अधिक होता है, जिससे पानी की लवणता बढ़ जाती है।

इस प्रकार, उप-उष्णकटिबंधीय गायर के केंद्र में बनने वाला यह गर्म, खारा और नीचे की ओर डूबता हुआ पानी ही मध्य जल (Central Waters) कहलाता है।

प्रमुख उदाहरण (Major Examples)


सारांश तालिका

विशेषतासतही जल (सामान्य)मध्य जल (विशिष्ट प्रकार)
स्थानमहासागर की ऊपरी परत (0-200 मीटर)उप-उष्णकटिबंधीय गायरों के केंद्र में
निर्माणसामान्य वायुमंडलीय संपर्क सेधाराओं के अभिसरण (Convergence) और अधोगमन (Downwelling) से
मुख्य गुणसबसे गर्म, सबसे हल्की, परिवर्तनशीलगर्म और खारा (उच्च लवणता)
स्थिरताहवा से मिश्रित (Mixed)अभिसरण के कारण अपेक्षाकृत स्थिर और गहरी

मध्यवर्ती जलराशियाँ (Intermediate Water Masses)

मध्यवर्ती जलराशियाँ महासागर की परतदार संरचना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। ये सतही जल (Surface Water) के नीचे और गहरी जलराशियों (Deep Water Masses) के ऊपर पाई जाती हैं। ये एक तरह से महासागर के “मध्यम वर्ग” का निर्माण करती हैं।


निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)

इनका निर्माण सतही और गहरी जलराशियों से थोड़ा अलग होता है। ये भी सतह पर ही बनती हैं, लेकिन इनका घनत्व इतना अधिक नहीं होता कि ये समुद्र के तल तक डूब सकें।

  1. स्रोत क्षेत्र (Source Regions): इनका निर्माण मुख्य रूप से ध्रुवीय मोर्चों (Polar Fronts) या उप-ध्रुवीय क्षेत्रों (Sub-polar Regions) में होता है, जैसे अंटार्कटिक कन्वर्जेंस क्षेत्र (Antarctic Convergence Zone)।
  2. प्रक्रिया: इन क्षेत्रों में, ठंडा और अपेक्षाकृत कम खारा (fresh) सतही जल अपने आसपास के गर्म, अधिक खारे उपोष्णकटिबंधीय जल (Subtropical Water) की तुलना में अधिक सघन हो जाता है।
  3. मध्यम गहराई तक डूबना (Sinking to Intermediate Depths):
    • यह सघन पानी नीचे की ओर डूबना शुरू कर देता है।
    • लेकिन, यह गहरे समुद्र में पहले से मौजूद अत्यधिक सघन गहरे जल (Deep Water) की तुलना में हल्का होता है।
    • इसलिए, यह समुद्र के तल तक नहीं पहुँच पाता और एक मध्यवर्ती गहराई पर रुक जाता है, जहाँ इसका घनत्व आसपास के पानी के बराबर हो जाता है। वहाँ से यह क्षैतिज रूप से (horizontally) फैलना शुरू कर देता है।

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

मध्यवर्ती जलराशियों की पहचान अक्सर उनकी लवणता (Salinity) की अनूठी विशेषताओं से होती है:

  1. न्यूनतम लवणता परत (Salinity Minimum Layer):
    • कई मध्यवर्ती जलराशियाँ (जैसे AAIW) अपने ऊपर (सतही जल) और नीचे (गहरा जल) की परतों की तुलना में कम खारी होती हैं। यदि आप गहराई के साथ लवणता को मापें, तो यह एक “गिरावट” या न्यूनतम बिंदु के रूप में दिखाई देगी।
  2. उच्चतम लवणता परत (Salinity Maximum Layer):
    • कुछ विशेष मामलों में (जैसे MIW), मध्यवर्ती जलराशि अपने ऊपर और नीचे की परतों से अधिक खारी हो सकती है, जो एक “चरम” या अधिकतम बिंदु के रूप में दिखाई देती है।

विश्व की प्रमुख मध्यवर्ती जलराशियाँ (Major Intermediate Water Masses of the World)

मध्यवर्ती जलराशियाँ (Intermediate Water Masses) महासागरों के परिसंचरण और संरचना में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये सतही और गहरे पानी के बीच स्थित होती हैं। दुनिया भर में कई प्रकार की मध्यवर्ती जलराशियाँ हैं, लेकिन दो सबसे प्रमुख और प्रभावशाली हैं: अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल (AAIW) और भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जल (MIW)।


1. अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल (Antarctic Intermediate Water – AAIW)

यह दुनिया की सबसे व्यापक (most widespread) और सबसे महत्वपूर्ण मध्यवर्ती जलराशि है, जो सभी तीन प्रमुख महासागरों—अटलांटिक, प्रशांत और हिंद—में पाई जाती है।


2. भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जल (Mediterranean Intermediate Water – MIW)

यह एक बहुत ही अनूठी और प्रभावशाली जलराशि है, जो विशेष रूप से उत्तरी अटलांटिक महासागर को प्रभावित करती है।


अन्य प्रमुख मध्यवर्ती जलराशियाँ


सारांश तालिका

जलराशि का नामसंक्षेप (Abbr.)निर्माण क्षेत्रप्रमुख पहचान (Fingerprint)वैश्विक प्रभाव
अंटार्कटिक मध्यवर्ती जलAAIWअंटार्कटिक कन्वर्जेंसकम लवणता (Low Salinity)तीनों प्रमुख महासागरों में मौजूद (सबसे व्यापक)।
भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जलMIWभूमध्य सागरउच्च लवणता, उच्च तापमानउत्तरी अटलांटिक की संरचना को प्रभावित करती है।
उत्तरी प्रशांत मध्यवर्ती जलNPIWउत्तरी प्रशांतकम लवणताउत्तरी प्रशांत महासागर के लिए महत्वपूर्ण।
लाल सागर मध्यवर्ती जलRSIWलाल सागरउच्च लवणता, उच्च तापमानहिंद महासागर की लवणता को प्रभावित करती है।

3. गहरी जलराशियाँ (Deep Water Masses)

गहरी जलराशियाँ महासागर की मध्यवर्ती परत (Intermediate Layer) के नीचे और तलीय परत (Bottom Layer) के ऊपर एक विशाल क्षेत्र को भरती हैं। ये पृथ्वी की जलवायु प्रणाली और महासागरीय परिसंचरण में एक केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।


निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)

गहरी जलराशियों का निर्माण केवल दुनिया के कुछ विशिष्ट उच्च-अक्षांशीय क्षेत्रों (High-Latitude Regions) में ही होता है, जहाँ सतह का पानी इतना सघन हो जाता है कि वह हजारों मीटर नीचे डूब सकता है।

  1. स्रोत क्षेत्र: इनका सबसे प्रमुख निर्माण क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक महासागर है, विशेष रूप से ग्रीनलैंड, आइसलैंड और नॉर्वे के आसपास के समुद्र (जैसे ग्रीनलैंड सागर, लैब्राडोर सागर)।
  2. प्रक्रिया: कहानी गल्फ स्ट्रीम से शुरू होती है
    • गल्फ स्ट्रीम का गर्म और अत्यधिक खारा पानी उत्तर की ओर बहता है।
    • जब यह ध्रुवीय क्षेत्रों के पास पहुँचता है, तो यह अपनी ऊष्मा को ठंडी आर्कटिक हवा में खो देता है, जिससे पानी बहुत ठंडा हो जाता है।
    • अब यह पानी ठंडा भी है और खारा भी, जिससे इसका घनत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है।
    • यह अत्यधिक सघन (भारी) पानी अपने नीचे के कम सघन पानी की तुलना में भारी हो जाता है और महासागर की गहराइयों में डूबना (Sink) शुरू कर देता है। यही प्रक्रिया गहरी जलराशि को जन्म देती है।

विश्व की सबसे प्रमुख गहरी जलराशि

उत्तरी अटलांटिक गहरा जल (North Atlantic Deep Water – NADW)

यह दुनिया की सबसे प्रभावशाली और सबसे अधिक अध्ययन की जाने वाली गहरी जलराशि है।


गहरी जलराशियों का वैश्विक महत्व

NADW जैसी गहरी जलराशियाँ केवल पानी की एक गहरी परत नहीं हैं; वे पूरी पृथ्वी प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण हैं।

  1. वैश्विक कन्वेयर बेल्ट का इंजन (Engine of the Global Conveyor Belt):
    • NADW का डूबना ही थर्मोहेलाइन परिसंचरण (Thermohaline Circulation) या वैश्विक कन्वेयर बेल्ट को चलाने वाली मुख्य शक्ति है।
    • जब NADW डूबता है, तो यह सतह के पानी को अपनी जगह लेने के लिए खींचता है, जिससे धाराओं का एक वैश्विक चक्र शुरू होता है जो लगभग 1000 वर्षों तक चलता है।
  2. जलवायु का विनियमन (Climate Regulation):
    • यह कन्वेयर बेल्ट उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्मी को ध्रुवों की ओर ले जाकर दुनिया भर में ऊष्मा का पुनर्वितरण करती है। यह प्रक्रिया वैश्विक जलवायु को रहने योग्य बनाए रखने में मदद करती है।
  3. गहरे समुद्र के जीवन का समर्थन (Supporting Deep-Sea Life):
    • NADW द्वारा लाई गई ऑक्सीजन समुद्र की गहराइयों में रहने वाले जीवों के लिए जीवनदायिनी है, जहाँ प्रकाश-संश्लेषण संभव नहीं है।

अन्य गहरी जलराशियाँ


4. तलीय जलराशियाँ (Bottom Water Masses)

तलीय जलराशियाँ महासागर की सबसे निचली, सबसे गहरी और सबसे सघन परत का निर्माण करती हैं। ये पृथ्वी पर सबसे चरम समुद्री परिस्थितियों में बनती हैं और दुनिया के सभी प्रमुख महासागरों के गहरे बेसिन को भर देती हैं।


निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)

इनका निर्माण केवल अंटार्कटिका के आसपास के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में होता है, जहाँ परिस्थितियाँ इतनी चरम होती हैं कि पानी को अधिकतम संभव घनत्व तक पहुँचाया जा सकता है।

  1. स्रोत क्षेत्र (Source Regions): इनका प्रमुख निर्माण स्थल अंटार्कटिका की महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelves) है, विशेष रूप से वेडेल सागर (Weddell Sea) और रॉस सागर (Ross Sea) में।
  2. प्रक्रिया: समुद्री बर्फ और नमक का खेल
    • पॉलीनिया (Polynya): इन क्षेत्रों में, तेज और ठंडी कैटाबैटिक पवनें (Katabatic winds) अंटार्कटिका के ग्लेशियरों से नीचे की ओर बहती हैं। ये पवनें समुद्र की सतह पर ताज़ी बनी बर्फ को लगातार दूर धकेलती रहती हैं, जिससे पानी का एक खुला क्षेत्र बन जाता है जिसे पॉलीनिया कहते हैं।
    • अत्यधिक शीतलन और बर्फ निर्माण: यह खुला पानी अब सीधे तौर पर अत्यधिक ठंडी हवा के संपर्क में आता है, जिससे बहुत तेजी से नई समुद्री बर्फ बनती है।
    • ब्राइन रिजेक्शन (Brine Rejection – नमक का बाहर निकलना): जब समुद्री जल जमता है, तो यह अपने क्रिस्टल संरचना से नमक को बाहर निकाल देता है। यह अत्यधिक खारा और ठंडा पानी (जिसे ब्राइन कहते हैं) बर्फ के नीचे बच जाता है।
    • घनत्व में चरम वृद्धि: यह ब्राइन पानी अत्यधिक ठंडा (हिमांक के करीब, लगभग -1.9°C) और अत्यधिक खारा होता है। इन दो कारकों का संयोजन इसे पृथ्वी पर बनने वाला सबसे सघन समुद्री जल बना देता है।
  3. महाद्वीपीय शेल्फ से नीचे की ओर बहाव:
    • यह सुपर-डेंस (अति-सघन) पानी महाद्वीपीय शेल्फ के तल पर जमा हो जाता है और फिर गुरुत्वाकर्षण के कारण ढलान से नीचे की ओर एक “अंडरवाटर कैस्केड” (पानी के नीचे का झरना) के रूप में गहरे समुद्री बेसिन में गिरना शुरू कर देता है।

विश्व की सबसे प्रमुख तलीय जलराशि

अंटार्कटिक तलीय जल (Antarctic Bottom Water – AABW)

यह दुनिया की एकमात्र महत्वपूर्ण और सबसे प्रभावशाली तलीय जलराशि है।


तलीय जलराशियों का वैश्विक महत्व

  1. महासागरीय बेसिन को भरना (Filling the Ocean Basins):
    • AABW इतनी सघन होती है कि यह समुद्र के तल पर बैठ जाती है और दुनिया के सभी प्रमुख महासागरों—अटलांटिक, प्रशांत और हिंद—के सबसे गहरे हिस्सों को धीरे-धीरे भर देती है।
    • यह बहुत धीमी गति से उत्तर की ओर बहती है, जिसमें हजारों वर्ष लग सकते हैं।
  2. गहरे परिसंचरण को चलाना (Driving Deep Circulation):
    • AABW का बनना और डूबना थर्मोहेलाइन परिसंचरण (वैश्विक कन्वेयर बेल्ट) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह NADW जैसी गहरी जलराशियों को ऊपर की ओर उठने के लिए मजबूर करती है, जिससे एक वैश्विक परिसंचरण चक्र पूरा होता है।
  3. समुद्री जीवन और रसायन विज्ञान पर प्रभाव (Impact on Marine Life and Chemistry):
    • AABW अपने साथ ऑक्सीजन को समुद्र के सबसे गहरे हिस्सों तक ले जाती है, जिससे वहाँ भी जीवन संभव हो पाता है।
    • यह अपने निर्माण क्षेत्र से पोषक तत्वों (विशेष रूप से सिलिकेट्स) को भी गहरे समुद्र में वितरित करती है, जो कुछ समुद्री जीवों के लिए आवश्यक हैं।

संक्षेप में, अंटार्कटिक तलीय जल पृथ्वी पर सबसे चरम परिस्थितियों में बनता है और महासागरों के सबसे गहरे, अंधेरे कोनों को भरकर वैश्विक जलवायु और समुद्री जीवन में एक मौलिक भूमिका निभाता है।


सारांश तालिका

प्रकार (Type)प्रमुख उदाहरण (Key Example)निर्माण क्षेत्र (Formation Region)मुख्य पहचान (Key Characteristic)
सतही जल (Surface)मध्य जल (Central Waters)उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीयसबसे गर्म, सबसे हल्की, परिवर्तनशील
मध्यवर्ती जल (Intermediate)अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल (AAIW)उप-ध्रुवीय क्षेत्र (Sub-polar regions)कम लवणता (Low Salinity)
गहरा जल (Deep)उत्तरी अटलांटिक गहरा जल (NADW)उत्तरी अटलांटिकबहुत ठंडा और सघन
तलीय जल (Bottom)अंटार्कटिक तलीय जल (AABW)अंटार्कटिकासबसे ठंडा, सबसे खारा, सबसे सघन

विश्व की प्रमुख जलराशियाँ (Major Water Masses of the World)

महासागरों में जलराशियाँ गहराई के अनुसार परतों में व्यवस्थित होती हैं। सबसे हल्की सतह पर और सबसे भारी (सघन) तल पर। यहाँ कुछ प्रमुख वैश्विक जलराशियाँ हैं:

जलराशि का प्रकारप्रमुख जलराशि का नामसंक्षेप (Abbr.)निर्माण क्षेत्रविशेषताएँ (तापमान/लवणता/घनत्व)
मध्यवर्ती जल (Intermediate)अंटार्कटिक मध्यवर्ती जल (Antarctic Intermediate Water)AAIWअंटार्कटिक कन्वर्जेंस क्षेत्रठंडा, कम लवणता, मध्यम घनत्व। यह सभी महासागरों में पाया जाता है।
भूमध्यसागरीय मध्यवर्ती जल (Mediterranean Intermediate Water)MIWभूमध्य सागरगर्म, अत्यधिक खारा, सघन। यह अटलांटिक महासागर में बहता है।
गहरा जल (Deep Water)उत्तरी अटलांटिक गहरा जल (North Atlantic Deep Water)NADWउत्तरी अटलांटिक (ग्रीनलैंड, लैब्राडोर सागर)अपेक्षाकृत गर्म लेकिन खारा, अत्यधिक सघन। वैश्विक कन्वेयर बेल्ट का मुख्य चालक।
तलीय जल (Bottom Water)अंटार्कटिक तलीय जल (Antarctic Bottom Water)AABWअंटार्कटिका (वेडेल और रॉस सागर)अत्यधिक ठंडा ( हिमांक के पास), खारा। दुनिया की सबसे सघन जलराशि।

जलराशियों का महत्व (Significance of Water Masses)

  1. वैश्विक महासागरीय परिसंचरण (Global Ocean Circulation): विभिन्न घनत्व वाली ये जलराशियाँ ही थर्मोहेलाइन परिसंचरण या “महासागरीय कन्वेयर बेल्ट” को चलाती हैं। सघन पानी ध्रुवों पर डूबता है और भूमध्य रेखा की ओर बहता है, जो वैश्विक धाराओं की एक धीमी लेकिन शक्तिशाली प्रणाली बनाता है।
  2. जलवायु का विनियमन (Climate Regulation): यह कन्वेयर बेल्ट दुनिया भर में गर्मी का पुनर्वितरण करती है, जिससे पृथ्वी का मौसम और जलवायु संतुलित रहती है।
  3. पोषक तत्वों का वितरण (Nutrient Distribution): गहरी जलराशियाँ पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं। जब यह पानी अपवेलिंग (Upwelling) की प्रक्रिया द्वारा सतह पर आता है, तो यह समुद्री जीवन (विशेषकर प्लैंकटन) के लिए भोजन प्रदान करता है, जिससे प्रमुख मत्स्य क्षेत्र बनते हैं।
  4. ऑक्सीजन का परिवहन (Oxygen Transport): ध्रुवों पर डूबने वाला ठंडा पानी अपने साथ ऑक्सीजन को महासागर की गहराइयों तक ले जाता है, जो गहरे समुद्री जीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

संक्षेप में, Water Masses महासागरों की परतदार संरचना और वैश्विक परिसंचरण की मूलभूत इकाइयाँ हैं, जो पृथ्वी की जलवायु और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को गहराई से प्रभावित करती हैं।


लहरें / तरंगें (Waves)

महासागरीय लहरें, जिन्हें तरंगें भी कहा जाता है, समुद्र की सतह पर होने वाली हलचल या उतार-चढ़ाव हैं। यह महासागरों की सबसे सामान्य और प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाली गति है।

सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा: लहरें ऊर्जा का स्थानांतरण (transfer of energy) हैं, पानी का स्थानांतरण नहीं। पानी के कण लहर के साथ आगे नहीं बढ़ते, बल्कि वे एक वृत्ताकार गति में घूमते हुए ऊर्जा को आगे बढ़ाते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे आप एक रस्सी के एक छोर को ऊपर-नीचे हिलाते हैं; लहर रस्सी के साथ आगे बढ़ती है, लेकिन रस्सी का कोई भी हिस्सा अपनी जगह से आगे नहीं जाता।


तरंग की संरचना (Anatomy of a Wave)

किसी भी लहर के निम्नलिखित प्रमुख भाग होते हैं:

  1. शिखर या श्रृंग (Crest): लहर का सबसे ऊँचा बिंदु।
  2. गर्त (Trough): दो शिखरों के बीच का सबसे निचला बिंदु।
  3. तरंग की ऊँचाई (Wave Height): शिखर (Crest) और गर्त (Trough) के बीच की ऊर्ध्वाधर (vertical) दूरी।
  4. तरंगदैर्ध्य (Wavelength): दो लगातार शिखरों (crests) या गर्तों (troughs) के बीच की क्षैतिज (horizontal) दूरी।
  5. तरंग अवधि (Wave Period): किसी एक बिंदु से दो लगातार शिखरों के गुजरने में लगने वाला समय।

लहरों का निर्माण और उत्पत्ति के कारण (Formation and Causes of Waves)

महासागरीय लहरों की उत्पत्ति विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों द्वारा होती है। इनमें सबसे प्रमुख और सामान्य कारण पवन है, लेकिन अन्य शक्तिशाली घटनाएँ भी विशाल और विनाशकारी लहरों को जन्म दे सकती हैं।


1. पवन (Wind) – सबसे सामान्य कारण

अधिकांश समुद्री लहरों का निर्माण पवन के समुद्र की सतह के साथ घर्षण के कारण होता है। यह एक चरणबद्ध प्रक्रिया है:

  1. प्रारंभिक घर्षण: जब हवा पानी की शांत सतह पर बहना शुरू करती है, तो घर्षण के कारण सतह पर छोटी-छोटी लहरदार आकृतियाँ (Ripples or Capillary Waves) बनती हैं।
  2. ऊर्जा का स्थानांतरण: यदि हवा लगातार बहती रहती है, तो वह इन छोटी लहरों के ऊँचे उठे हिस्से पर अधिक दबाव डालती है। इससे हवा अपनी ऊर्जा को पानी में स्थानांतरित करती है।
  3. लहर का विकास: जैसे-जैसे अधिक ऊर्जा स्थानांतरित होती है, छोटी लहरें गुरुत्वाकर्षण तरंगों (Gravity Waves) में बदलने लगती हैं – यानी, वे बड़ी और अधिक संगठित होने लगती हैं।
  4. पूर्ण विकसित समुद्र (Fully Developed Sea): जब लहरें हवा से और अधिक ऊर्जा प्राप्त नहीं कर पाती हैं (क्योंकि वे हवा की गति से चलने लगती हैं), तो वे अपनी अधिकतम संभावित ऊँचाई तक पहुँच जाती हैं।

एक पवन-चालित लहर का आकार और शक्ति तीन मुख्य कारकों पर निर्भर करती है:


2. भूवैज्ञानिक घटनाएँ (Geological Events) – सबसे विनाशकारी लहरों का कारण

कुछ सबसे बड़ी और सबसे खतरनाक लहरें समुद्र के तल पर होने वाली अचानक और शक्तिशाली घटनाओं से उत्पन्न होती हैं।


3. गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Forces)


4. अन्य कारण (Other Causes)

संक्षेप में, जबकि दैनिक समुद्री लहरों का मुख्य स्रोत पवन है, सबसे असाधारण और खतरनाक लहरें पृथ्वी के नीचे (भूकंप) या आकाश में (गुरुत्वाकर्षण) होने वाली शक्तिशाली घटनाओं से उत्पन्न होती हैं।


लहर का आकार तीन मुख्य कारकों पर निर्भर करता है:

  1. पवन की गति (Wind Speed): हवा जितनी तेज होगी, लहरें उतनी ही बड़ी होंगी।
  2. पवन की अवधि (Wind Duration): हवा जितने अधिक समय तक चलेगी, लहरें उतनी ही अधिक ऊर्जा संचित करेंगी और बड़ी होंगी।
  3. फ़ेच (Fetch): यह समुद्र के उस विशाल क्षेत्र की दूरी है जिस पर हवा बिना किसी रुकावट के एक ही दिशा में बहती है। फ़ेच जितना लंबा होगा, लहरें उतनी ही बड़ी होंगी।

तरंगों की गति: ऊर्जा का स्थानांतरण (Wave Motion: The Transfer of Energy)

यह लहरों के व्यवहार की सबसे मूलभूत और अक्सर गलत समझी जाने वाली अवधारणा है। लहरों को देखकर ऐसा लगता है कि पानी खुद एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहा है, लेकिन वास्तविकता इससे बहुत अलग है।

मुख्य सिद्धांत:
एक लहर पानी के माध्यम से गति करती ऊर्जा (Energy travelling through the water) है, न कि स्वयं गति करता हुआ पानी (Water travelling itself)। लहर के गुजरने पर पानी के कण मुख्य रूप से अपनी जगह पर ही रहते हैं।


जल कणों की वास्तविक गति: वृत्ताकार कक्षा (The Real Motion of Water Particles: Circular Orbit)

जब एक लहर गहरे, खुले समुद्र में यात्रा करती है, तो उसके नीचे का प्रत्येक जल कण एक स्थिर वृत्ताकार पथ (Circular Orbital Path) पर चलता है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है:

  1. जैसे ही लहर का शिखर (Crest) आता है: पानी का कण लहर की दिशा में ऊपर और आगे की ओर धकेला जाता है।
  2. जैसे ही लहर का शिखर गुजर जाता है: कण अपनी कक्षा में नीचे और आगे की ओर जाता है।
  3. जैसे ही गर्त (Trough) आता है: कण अपने पथ के सबसे निचले बिंदु पर होता है और नीचे और पीछे की ओर जाता है।
  4. जैसे ही गर्त गुजर जाता है: कण वापस अपनी मूल स्थिति में ऊपर और पीछे की ओर जाता है।

यह वृत्ताकार नृत्य पूरा होने के बाद, जल कण लगभग वहीं समाप्त होता है जहाँ से उसने शुरू किया था। आगे जो बढ़ा है, वह केवल ऊर्जा का “आकार” या “रूप” (the wave form) है, पानी का ढेर नहीं।

रोजमर्रा के जीवन से एक उदाहरण:
यह एक स्टेडियम में होने वाले “मैक्सिकन वेव” (Mexican Wave) की तरह है। लोग अपनी सीटों पर खड़े होते हैं और फिर बैठ जाते हैं, जिससे एक लहर बनती है जो स्टेडियम में घूमती है। यहाँ, लहर (ऊर्जा) ने तो स्टेडियम का चक्कर लगा लिया, लेकिन कोई भी व्यक्ति अपनी सीट से आगे नहीं बढ़ा।


ऊर्जा का स्थानांतरण कैसे होता है?

पवन द्वारा (या किसी अन्य स्रोत द्वारा) प्रदान की गई ऊर्जा एक जल कण से दूसरे में स्थानांतरित होती है। प्रत्येक कण अपने पड़ोसियों को धक्का देकर अपनी वृत्ताकार गति में शामिल कर लेता है, और इस तरह ऊर्जा लहर के रूप में आगे बढ़ती जाती है।


गहराई के साथ गति में परिवर्तन (Change in Motion with Depth)

महत्व:
इसका मतलब है कि तूफानी मौसम में भी, एक पनडुब्बी (Submarine) शांत पानी का अनुभव कर सकती है यदि वह वेव बेस के नीचे पर्याप्त गहराई पर हो, क्योंकि सतह की हलचल वहाँ तक नहीं पहुँचती है।


उथले पानी में व्यवहार का बदलना (Change of Behaviour in Shallow Water)

यह पूरी तरह से बदल जाता है जब लहर उथले पानी (तट के पास) में पहुँचती है।

निष्कर्ष:
संक्षेप में, गहरे समुद्र में लहरें पानी के माध्यम से यात्रा करती ऊर्जा का एक सुंदर उदाहरण हैं, जहाँ पानी के कण वृत्ताकार नृत्य करते हुए ऊर्जा को आगे भेजते हैं। केवल जब ये लहरें तट पर पहुँचकर टूटती हैं, तभी ऊर्जा के साथ-साथ पानी का भी बड़े पैमाने पर स्थानांतरण होता है।


जब लहरें तट पर पहुँचती हैं: तरंग का टूटना (When Waves Reach the Shore: Breaking of a Wave)

जब एक लहर गहरे पानी से उथले पानी (तट के पास) में प्रवेश करती है, तो उसका व्यवहार बदल जाता है।

  1. “महसूस करना”: जब पानी की गहराई लहर के तरंगदैर्ध्य (wavelength) के आधे से कम हो जाती है, तो लहर का निचला हिस्सा समुद्र तल से घर्षण करना शुरू कर देता है।
  2. गति में परिवर्तन: इस घर्षण के कारण लहर का निचला हिस्सा धीमा हो जाता है, जबकि ऊपरी हिस्सा (शिखर) अभी भी तेज गति से चलता रहता है।
  3. आकार में परिवर्तन:
    • लहर की गति (speed) कम हो जाती है।
    • उसका तरंगदैर्ध्य (wavelength) छोटा हो जाता है।
    • उसकी ऊँचाई (height) बढ़ जाती है।
  4. टूटना (Breaking): अंततः, लहर का शिखर इतना ऊँचा और अस्थिर हो जाता है कि वह आगे की ओर गिर जाता है, जिसे “लहर का टूटना” (Breaking of a Wave) कहते हैं। तट पर हम जो झागदार लहरें देखते हैं, वे यही टूटी हुई लहरें होती हैं।
  5. स्वैश और बैकवॉश (Swash and Backwash):
    • स्वैश (Swash): लहर टूटने के बाद जो पानी समुद्र तट पर ऊपर की ओर चढ़ता है।
    • बैकवॉश (Backwash): गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस समुद्र की ओर लौटने वाला पानी।

लहरों के प्रकार (Types of Waves)

प्रकार का आधारप्रकारविवरण
निर्माण के आधार परपवन-चालित लहरें (Wind Waves)सबसे आम, हवा के घर्षण से बनती हैं।
सुनामी (Tsunami)समुद्र तल पर भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट या भूस्खलन के कारण बनने वाली अत्यधिक लंबी तरंगदैर्ध्य वाली विनाशकारी लहरें। इन्हें ज्वारीय तरंग कहना गलत है।
ज्वारीय तरंगें (Tidal Waves)चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न ज्वार-भाटे से संबंधित। ये वास्तव में बहुत लंबी लहरें हैं। कुछ संकरी नदियों में ज्वारीय बोर (Tidal Bore) के रूप में दिखाई देती हैं।
टूटने के आधार परस्पिलिंग ब्रेकर्स (Spilling Breakers)ये धीरे-धीरे और झाग के साथ टूटती हैं। आमतौर पर कोमल ढलान वाले समुद्र तटों पर बनती हैं।
प्लंजनिंग ब्रेकर्स (Plunging Breakers)ये तेजी से टूटती हैं और एक “बैरल” या “ट्यूब” बनाती हैं। ये खड़ी ढलान वाले तटों पर बनती हैं (सर्फिंग के लिए प्रसिद्ध)।

लहरों का महत्व और प्रभाव (Importance and Effects of Waves)

महासागरीय लहरें केवल पानी का उतार-चढ़ाव नहीं हैं, बल्कि ये एक शक्तिशाली प्राकृतिक शक्ति हैं जिनका तटीय भू-आकृतियों, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव गतिविधियों पर गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ता है।


1. तटीय भू-आकृतियों का निर्माण और परिवर्तन (Formation and Modification of Coastal Landforms)

लहरें तटीय क्षेत्रों को आकार देने वाली सबसे प्रमुख एजेंट हैं। यह कार्य दो मुख्य प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है: अपरदन (Erosion) और निक्षेपण (Deposition)।

क. अपरदनात्मक प्रभाव (Erosional Effects):

ख. निक्षेपात्मक प्रभाव (Depositional Effects):


2. पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance)


3. मानव जीवन पर प्रभाव (Impact on Human Life)

क. सकारात्मक प्रभाव (Positive Impacts):

ख. नकारात्मक प्रभाव (Negative Impacts):

संक्षेप में, लहरें एक दोधारी तलवार की तरह हैं: वे रचनात्मक और विनाशकारी दोनों हैं। वे हमारे ग्रह के तटों को लगातार आकार देती हैं, समुद्री जीवन का समर्थन करती हैं और मानव समाज के लिए अवसर और खतरे दोनों प्रस्तुत करती हैं।


ज्वार-भाटा (Tides)

ज्वार-भाटा समुद्र के जल स्तर का एक नियमित और पूर्वानुमानित (predictable) उतार-चढ़ाव है, जो मुख्य रूप से चंद्रमा (Moon) और कुछ हद तक सूर्य (Sun) के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव (Gravitational Pull) के कारण होता है। यह पृथ्वी के महासागरों की सबसे लंबी लहर है, जिसकी तरंगदैर्ध्य (wavelength) पृथ्वी की परिधि की आधी होती है।


ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के कारण (Causes for the Origin of Tides)

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के बीच कार्य करने वाले जटिल गुरुत्वाकर्षण बलों और गति का परिणाम है। इसे समझने के लिए तीन मुख्य बलों को जानना आवश्यक है:


1. चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force of the Moon)

यह ज्वार-भाटा उत्पन्न करने वाला सबसे प्रमुख और शक्तिशाली कारक है।


2. पृथ्वी का अपकेंद्री बल (Centrifugal Force of the Earth)

यह दूसरा उच्च ज्वार (अप्रत्यक्ष ज्वार) बनाने के लिए जिम्मेदार बल है।


3. सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force of the Sun)

यह एक सहायक या संशोधित करने वाला बल है, जो ज्वार की ऊँचाई को प्रभावित करता है।


निष्कर्ष: ज्वारीय उभार का संतुलन (Conclusion: The Balance of Tidal Bulges)

इस प्रकार, एक ही समय में पृथ्वी पर हमेशा दो ज्वारीय उभार (Tidal Bulges) मौजूद होते हैं:

  1. प्रत्यक्ष उभार: चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण, चंद्रमा की ओर।
  2. अप्रत्यक्ष उभार: पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न अपकेंद्री बल के कारण, चंद्रमा से विपरीत दिशा में।

पृथ्वी अपने अक्ष पर 24 घंटे में एक बार घूम जाती है, इसलिए पृथ्वी का प्रत्येक हिस्सा दिन में एक बार इन दोनों उभारों के नीचे से गुजरता है। यही कारण है कि अधिकांश स्थानों पर दिन में दो बार उच्च ज्वार और दो बार निम्न ज्वार आते हैं। (यह चक्र वास्तव में 24 घंटे 50 मिनट का होता है, क्योंकि पृथ्वी के घूमने के दौरान चंद्रमा भी अपनी कक्षा में थोड़ा आगे बढ़ जाता है)।


ज्वार-भाटा के प्रकार (Types of Tides)

ज्वार-भाटा को मुख्य रूप से दो आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. उनकी आवृत्ति (Frequency) या एक दिन में आने की संख्या के आधार पर।
  2. सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की सापेक्ष स्थिति (Relative Position) के आधार पर।

1. आवृत्ति के आधार पर (Based on Frequency)

यह वर्गीकरण इस बात पर आधारित है कि 24 घंटे 50 मिनट की अवधि में किसी स्थान पर कितनी बार उच्च और निम्न ज्वार आते हैं।

क. अर्ध-दैनिक ज्वार (Semi-diurnal Tide):

ख. दैनिक ज्वार (Diurnal Tide):

ग. मिश्रित ज्वार (Mixed Tide):


2. सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की स्थिति के आधार पर (Based on Sun, Moon, and Earth’s Position)

यह वर्गीकरण ज्वार की ऊँचाई या ज्वारीय परास (Tidal Range – उच्च और निम्न ज्वार के बीच का अंतर) पर आधारित है, जो सूर्य और चंद्रमा के संयुक्त गुरुत्वाकर्षण बल से निर्धारित होता है।

क. बृहत ज्वार या उच्च ज्वार (Spring Tide):

ख. लघु ज्वार या निम्न ज्वार (Neap Tide):

संक्षेप में: Spring Tides = Strong Tides; Neap Tides = Weak Tides.


एपोजी और पेरिजी (Apogee and Perigee)

एपोजी और पेरिजी वे खगोलीय शब्द हैं जिनका उपयोग पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करने वाले किसी भी प्राकृतिक या कृत्रिम उपग्रह (जैसे चंद्रमा या एक सैटेलाइट) की कक्षा (orbit) के दो विशेष बिंदुओं का वर्णन करने के लिए किया जाता है। चूंकि अधिकांश कक्षाएँ पूर्ण वृत्त (perfect circle) नहीं होती हैं, बल्कि अण्डाकार (elliptical) होती हैं, इसलिए उपग्रह की पृथ्वी से दूरी लगातार बदलती रहती है।


1. पेरिजी (Perigee)


2. एपोजी (Apogee)


सूर्य के संदर्भ में समान अवधारणाएँ: एप्सिस (Aphelion) और पेरिहेलियन (Perihelion)

जिस प्रकार एपोजी और पेरिजी का उपयोग पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा के लिए किया जाता है, उसी प्रकार एप्सिस और पेरिहेलियन का उपयोग सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने वाली किसी भी वस्तु (जैसे पृथ्वी या कोई अन्य ग्रह) के लिए किया जाता है।

यह एक आम गलतफहमी है कि पृथ्वी पर मौसम उसकी सूर्य से दूरी के कारण बदलते हैं। वास्तव में, उत्तरी गोलार्ध में सर्दियाँ तब होती हैं जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (पेरिहेलियन) होती है, और गर्मियाँ तब होती हैं जब वह सबसे दूर (एपहेलियन) होती है। मौसम का कारण पृथ्वी का अपनी धुरी पर झुकाव (axial tilt) है, न कि उसकी दूरी।


सारांश तालिका

शब्द (Term)केंद्रीय पिंड (Central Body)कक्षा में स्थितिदूरीगतिज्वारीय प्रभाव (चंद्रमा के लिए)
पेरिजी (Perigee)पृथ्वी (Earth)सबसे निकटन्यूनतमसबसे तेजअधिकतम
एपोजी (Apogee)पृथ्वी (Earth)सबसे दूरअधिकतमसबसे धीमीन्यूनतम
पेरिहेलियन (Perihelion)सूर्य (Sun)सबसे निकटन्यूनतमसबसे तेज
एपहेलियन (Aphelion)सूर्य (Sun)सबसे दूरअधिकतमसबसे धीमी

ज्वारीय परास / सीमा (Tidal Range)

परिभाषा:
ज्वारीय परास (Tidal Range) किसी निश्चित स्थान पर उच्च ज्वार (High Tide) और उसके तुरंत बाद आने वाले निम्न ज्वार (Low Tide) के बीच के ऊर्ध्वाधर अंतर (vertical difference) को कहते हैं।

सरल शब्दों में, यह वह माप है कि समुद्र का जल स्तर उच्च ज्वार के समय कितना ऊपर चढ़ता है और निम्न ज्वार के समय कितना नीचे उतरता है। यदि आप किसी घाट पर एक खंभे को देखें, तो उच्च ज्वार में पानी के उच्चतम निशान और निम्न ज्वार में पानी के सबसे निचले निशान के बीच की दूरी ही ज्वारीय परास है।

यह परास स्थिर नहीं होता है; यह हर दिन और महीने भर में बदलता रहता है।


ज्वारीय परास को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting the Tidal Range)

ज्वारीय परास का आकार दुनिया भर में बहुत भिन्न होता है – कुछ सेंटीमीटर से लेकर कई मीटर तक। यह मुख्य रूप से दो प्रकार के कारकों से प्रभावित होता है:

1. खगोलीय कारक (Astronomical Factors):

ये कारक ज्वार की मूल शक्ति को निर्धारित करते हैं।

2. भौगोलिक कारक (Geographical Factors):

ये कारक स्थानीय रूप से ज्वार की ऊँचाई को बहुत अधिक बढ़ा या घटा सकते हैं।


विश्व के कुछ उदाहरण (Examples from around the World)


ज्वारीय परास का महत्व (Importance of Tidal Range)

  1. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy): जिन क्षेत्रों में ज्वारीय परास अधिक होता है, वे ज्वारीय ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए आदर्श होते हैं।
  2. नौसंचालन (Navigation): जहाजों को बंदरगाह में प्रवेश करने के लिए उच्च ज्वार का ध्यान रखना पड़ता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ परास अधिक होता है।
  3. पारिस्थितिकी (Ecology): एक बड़ा ज्वारीय परास एक विशाल अंतर्ज्वारीय क्षेत्र (Intertidal Zone) का निर्माण करता है, जो कई विशेष प्रकार के पौधों और जानवरों का घर होता है।

1. ज्वारीय धारा (Tidal Current)

परिभाषा:
ज्वारीय धारा, ज्वार-भाटा (Tides) के कारण समुद्र के पानी का क्षैतिज (horizontal) बहाव है। जबकि ज्वार-भाटा जल स्तर का ऊर्ध्वाधर (vertical) उतार-चढ़ाव है, ज्वारीय धाराएँ उसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप पानी की वास्तविक गति हैं।

इसे इस तरह समझें:

ज्वारीय धाराओं के प्रकार (Types of Tidal Currents):

  1. बाढ़ धारा या प्रवाह धारा (Flood Current / Flow):
    • यह वह धारा है जो निम्न ज्वार (Low Tide) से उच्च ज्वार (High Tide) के दौरान तट की ओर या एक संकरी खाड़ी/नदी के अंदर की ओर बहती है।
    • यह तट को “बाढ़” की तरह पानी से भर देती है।
  2. भाटा धारा या पश्च प्रवाह धारा (Ebb Current / Ebb):
    • यह वह धारा है जो उच्च ज्वार से निम्न ज्वार के दौरान तट से दूर या एक खाड़ी/नदी से बाहर समुद्र की ओर बहती है।
    • यह तट से पानी को वापस खींचती है।
  3. शिथिल जल (Slack Water):
    • यह एक छोटी अवधि होती है जब ज्वार अपनी उच्चतम या निम्नतम सीमा पर पहुँच जाता है और अपनी दिशा बदलने वाला होता है।
    • इस समय, पानी लगभग स्थिर होता है और कोई ज्वारीय धारा नहीं होती है। यह अवधि गोताखोरों और नाविकों के लिए महत्वपूर्ण होती है।

ज्वारीय धाराओं की विशेषताएँ:


2. भित्ति (Reef)

परिभाषा:
भित्ति पानी की सतह के नीचे स्थित किसी भी चट्टानी या ठोस संरचना (Ridge of rock, coral, or similar solid material) को कहते हैं। यह प्राकृतिक या कृत्रिम हो सकती है। भित्तियाँ आमतौर पर उथले पानी में पाई जाती हैं और समुद्री जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आवास होती हैं।

भित्तियों के प्रकार (Types of Reefs):

क. प्राकृतिक भित्तियाँ (Natural Reefs):

  1. प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs):
    • यह सबसे प्रसिद्ध और जैविक रूप से विविध प्रकार की भित्ति हैं।
    • निर्माण: इनका निर्माण लाखों छोटे समुद्री जीवों, जिन्हें कोरल पॉलीप्स (Coral Polyps) कहा जाता है, के कंकालों (मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट) से होता है। ये पॉलीप्स कॉलोनियों में रहते हैं और समय के साथ एक विशाल संरचना का निर्माण करते हैं।
    • आवश्यकताएँ: इन्हें गर्म, साफ और उथले उष्णकटिबंधीय पानी की आवश्यकता होती है जहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँच सके।
    • महत्व: इन्हें “समुद्र का वर्षावन” (Rainforest of the Sea) कहा जाता है क्योंकि ये अत्यधिक जैव विविधता का समर्थन करती हैं। ये तटीय क्षेत्रों को तूफानी लहरों से भी बचाती हैं।
    • प्रकार:
      • तटीय भित्ति (Fringing Reef): तट से सटी हुई।
      • अवरोधक भित्ति (Barrier Reef): तट से कुछ दूरी पर उसके समानांतर स्थित। ग्रेट बैरियर रीफ (ऑस्ट्रेलिया) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
      • एटॉल या वलयाकार भित्ति (Atoll): एक लैगून (उथली झील) के चारों ओर एक गोलाकार या अंडाकार भित्ति।
  2. चट्टानी भित्तियाँ (Rocky Reefs):
    • ये चट्टानों के पानी के नीचे के उभार या विस्तार से बनती हैं।
    • ये प्रवाल भित्तियों की तुलना में कम विविध होती हैं लेकिन फिर भी समुद्री शैवाल, मछली और अन्य अकशेरुकीय जीवों के लिए एक महत्वपूर्ण आवास प्रदान करती हैं। ये ठंडे और गर्म दोनों प्रकार के पानी में पाई जा सकती हैं।

ख. कृत्रिम भित्तियाँ (Artificial Reefs):



ज्वार-भाटा का महत्व और प्रभाव (Importance and Effects of Tides)

  1. बंदरगाह और नौसंचालन (Ports and Navigation): उच्च ज्वार जहाजों को उथले बंदरगाहों में प्रवेश करने और बाहर निकलने में मदद करता है। लंदन और कोलकाता जैसे कई बंदरगाह ज्वारीय बंदरगाह हैं।
  2. मछली पकड़ना (Fishing): ज्वार के साथ कई मछलियाँ तट के पास आ जाती हैं, जिससे मछुआरों को मछली पकड़ने में आसानी होती है।
  3. तटीय पारिस्थितिकी तंत्र (Coastal Ecosystems): ज्वार-भाटा अंतर्ज्वारीय क्षेत्रों (Intertidal Zones) का निर्माण करता है, जो कई अनूठे जीवों (जैसे केकड़े, सीप) का निवास स्थान है। यह ज्वारनदमुखों (Estuaries) में खारे और मीठे पानी को मिलाने में भी मदद करता है।
  4. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy): उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच पानी के स्तर में अंतर का उपयोग टरबाइन चलाकर बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है। यह ऊर्जा का एक स्वच्छ और पूर्वानुमानित स्रोत है।
  5. अपरदन और निक्षेपण (Erosion and Deposition): ज्वारीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों, विशेषकर ज्वारनदमुखों और डेल्टा में तलछट को हटाने और जमा करने का काम करती हैं, जिससे तटीय भू-आकृतियों का निर्माण होता है।
  6. तटीय सफाई (Coastal Cleansing): ज्वार का पानी तटों पर जमा कचरे और प्रदूषकों को समुद्र में बहा ले जाता है, जिससे तटों की सफाई होती है।

महासागरीय संसाधन (Oceanic Resources)

महासागर संसाधनों का एक विशाल और अमूल्य भंडार है, जो मानव जीवन के लिए भोजन, ऊर्जा, खनिज और आर्थिक अवसरों का एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रदान करता है। पृथ्वी की सतह का लगभग 71% हिस्सा कवर करने वाले ये विशाल जल निकाय विभिन्न प्रकार के संसाधनों को संजोए हुए हैं।

महासागरीय संसाधनों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. जैविक संसाधन (Biological Resources)
  2. अजैविक / खनिज संसाधन (Abiotic / Mineral Resources)
  3. ऊर्जा संसाधन (Energy Resources)

1. जैविक संसाधन (Biological Resources)

ये महासागरों में मौजूद जीवित वनस्पतियों और जीवों से प्राप्त होते हैं।

क. मत्स्य संसाधन (Fisheries Resources):

ख. समुद्री वनस्पति (Marine Flora):

ग. अन्य जीव (Other Organisms):


2. अजैविक / खनिज संसाधन (Abiotic / Mineral Resources)

ये महासागर के जल, समुद्र तल और उसके नीचे की चट्टानों से प्राप्त होने वाले गैर-जीवित संसाधन हैं।

संसाधन का प्रकारकहाँ पाए जाते हैं?प्रमुख खनिज / संसाधन
महासागरीय जल से (From Sea Water)घुली हुई अवस्था में• साधारण नमक (NaCl) – सबसे प्रमुख<br>• मैग्नीशियम (Magnesium)<br>• ब्रोमीन (Bromine)
महाद्वीपीय शेल्फ और ढलान से (From Continental Shelves & Slopes)उथले समुद्र तल और उसके नीचे• पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस – सबसे महत्वपूर्ण<br>• रेत और बजरी (निर्माण के लिए)<br>• सल्फर (Sulphur), फॉस्फोराइट (Phosphorite)
गहरे समुद्र के तल से (From Deep Sea Floor)गहरे समुद्री मैदान (Abyssal Plains)• पॉलीमेटेलिक नोड्यूल (Polymetallic Nodules): आलू के आकार के पिंड जिनमें मैंगनीज, निकल, तांबा, कोबाल्ट होता है।<br>• कोबाल्ट-समृद्ध क्रस्ट (Cobalt-rich crusts): पनडुब्बी पहाड़ों पर पाए जाते हैं।<br>• पॉलीमेटेलिक सल्फाइड (Polymetallic Sulphides): हाइड्रोथर्मल वेंट्स के पास।

विशेष बिंदु: पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस


3. ऊर्जा संसाधन (Energy Resources)

महासागर ऊर्जा का एक विशाल नवीकरणीय स्रोत है, जिसे विभिन्न तरीकों से उपयोग में लाया जा सकता है।

क. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy):

ख. तरंग ऊर्जा (Wave Energy):

ग. महासागरीय तापीय ऊर्जा रूपांतरण (Ocean Thermal Energy Conversion – OTEC):


महासागरीय संसाधनों का प्रबंधन और चुनौतियाँ

  1. अत्यधिक दोहन (Over-exploitation): अत्यधिक मछली पकड़ने (Overfishing) से कई मछली प्रजातियों की आबादी खतरे में है।
  2. समुद्री प्रदूषण (Marine Pollution): प्लास्टिक, तेल रिसाव, औद्योगिक और कृषि अपशिष्ट समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहे हैं और संसाधनों की गुणवत्ता को कम कर रहे हैं।
  3. गहरे समुद्र में खनन का प्रभाव (Impact of Deep-Sea Mining): पॉलीमेटेलिक नोड्यूल जैसे संसाधनों के खनन से गहरे समुद्र के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी नुकसान हो सकता है।
  4. सतत विकास की आवश्यकता: भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन अमूल्य संसाधनों को संरक्षित करने के लिए एक सतत प्रबंधन (Sustainable Management) और नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) के सिद्धांतों को अपनाना आवश्यक है।


प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs)

प्रवाल भित्तियाँ समुद्र के भीतर स्थित कैल्शियम कार्बोनेट (चूना पत्थर) की विशाल और जटिल संरचनाएँ हैं, जिनका निर्माण कोरल नामक छोटे समुद्री जीवों द्वारा किया जाता है। अपनी अत्यधिक जैव विविधता और पारिस्थितिक महत्व के कारण इन्हें “समुद्र का वर्षावन” (Rainforests of the Sea) कहा जाता है।


प्रवाल (Coral) क्या हैं?

प्रवाल, जिन्हें कोरल भी कहा जाता है, समुद्री अकशेरुकीय जीव (Marine Invertebrates) होते हैं। ये कोई पौधे या चट्टानें नहीं हैं, बल्कि जीवित प्राणी हैं। इनकी संरचना और जीवन चक्र बहुत ही अनूठा और आकर्षक है।


1. व्यक्तिगत जीव: कोरल पॉलीप (The Individual Animal: The Coral Polyp)

एक प्रवाल कॉलोनी की मूल इकाई एक छोटा, नरम शरीर वाला जीव होता है जिसे पॉलीप (Polyp) कहते हैं। एक पॉलीप की संरचना बहुत सरल होती है:


2. कठोर कंकाल का निर्माण (Building the Hard Skeleton)

कोरल पॉलीप्स की सबसे विशिष्ट विशेषता उनका कठोर बाहरी कंकाल बनाने की क्षमता है।


3. कॉलोनियों का निर्माण (Building the Colonies)

अधिकांश कोरल अकेले नहीं रहते, बल्कि विशाल कॉलोनियों (Colonies) में रहते हैं।


4. सहजीवी संबंध: ज़ूजैन्थेली (Symbiotic Relationship: Zooxanthellae)

लगभग सभी चट्टान-निर्माता कोरल का ज़ूजैन्थेली (Zooxanthellae) नामक सूक्ष्म शैवाल के साथ एक महत्वपूर्ण सहजीवी संबंध होता है।

यह संबंध कोरल के जीवित रहने और विशाल भित्तियों का निर्माण करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब कोरल तनाव में होते हैं (जैसे पानी गर्म होने पर), तो वे इन शैवाल को बाहर निकाल देते हैं, जिससे वे सफेद हो जाते हैं (जिसे प्रवाल विरंजन कहते हैं) और मरने का खतरा होता है।

निष्कर्ष:
संक्षेप में, प्रवाल (कोरल) छोटे-छोटे पॉलीप्स नामक जीवों की कॉलोनियाँ हैं, जो अपने चारों ओर एक कठोर कैल्शियम कार्बोनेट का कंकाल बनाते हैं और अपने ऊतकों में रहने वाले शैवाल के साथ सहजीवन में रहते हैं। इन्हीं कॉलोनियों के लाखों वर्षों के विकास से समुद्र के सबसे विविध और महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों में से एक—प्रवाल भित्तियों—का निर्माण होता है।


प्रवाल भित्तियों के विकास के लिए आवश्यक दशाएँ (Ideal Conditions for Coral Reef Growth)

प्रवाल भित्तियाँ बहुत ही नाजुक और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र हैं। वे केवल उन्हीं स्थानों पर पनप सकती हैं जहाँ पर्यावरण की कुछ विशिष्ट और स्थिर परिस्थितियाँ मौजूद हों। यदि इनमें से किसी भी स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव होता है, तो प्रवालों का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है।

प्रवाल भित्तियों के स्वस्थ विकास के लिए निम्नलिखित आवश्यक दशाएँ हैं:


1. गर्म और स्थिर तापमान (Warm and Stable Temperature)


2. उथला पानी और सूर्य का प्रकाश (Shallow Water and Sunlight)


3. स्वच्छ और अवसाद-मुक्त जल (Clear and Sediment-Free Water)


4. पूर्ण महासागरीय लवणता (Full Oceanic Salinity)


5. पोषक तत्वों का निम्न स्तर (Low Nutrient Levels)


6. मध्यम जल गति (Moderate Water Motion)

संक्षेप में, प्रवाल भित्तियाँ केवल उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के गर्म, साफ, उथले और स्थिर समुद्री वातावरण में ही फल-फूल सकती हैं, जो उन्हें पृथ्वी पर सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों में से एक बनाता है।


प्रवाल भित्तियों के प्रकार (Types of Coral Reefs)

प्रवाल भित्तियों को उनकी आकृति, आकार और निकटवर्ती भूभाग (landmass) के साथ उनके संबंध के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। चार्ल्स डार्विन ने अपने अध्ययन के आधार पर इनका सबसे स्वीकृत वर्गीकरण प्रस्तुत किया, जिसमें तीन मुख्य प्रकार शामिल हैं। ये तीनों प्रकार अक्सर एक-दूसरे के विकास के चरण माने जाते हैं।


1. तटीय भित्ति (Fringing Reef)

यह सबसे सामान्य और सबसे सरल प्रकार की प्रवाल भित्ति है।


2. अवरोधक भित्ति (Barrier Reef)

यह सबसे विशाल और प्रभावशाली प्रवाल भित्तियाँ होती हैं।


3. एटॉल या वलयाकार प्रवाल भित्ति (Atoll)

यह एक बहुत ही अनूठी और सुंदर संरचना होती है जो आमतौर पर खुले समुद्र में पाई जाती है।


डार्विन का निमज्जन सिद्धांत (Darwin’s Subsidence Theory) – तीनों प्रकारों में संबंध

चार्ल्स डार्विन ने यह सिद्धांत दिया कि ये तीनों प्रकार की भित्तियाँ वास्तव में एक ही भित्ति के विकास के विभिन्न चरण हैं, जो किसी डूबते हुए ज्वालामुखी द्वीप (Sinking Volcanic Island) के चारों ओर बनती है।

  1. चरण 1: तटीय भित्ति (Fringing Reef)
    • समुद्र में एक नया ज्वालामुखी द्वीप बनता है। उसके तट के चारों ओर प्रवाल उगना शुरू करते हैं और एक तटीय भित्ति का निर्माण करते हैं।
  2. चरण 2: अवरोधक भित्ति (Barrier Reef)
    • धीरे-धीरे, ज्वालामुखी द्वीप नीचे की ओर धँसने (Subsidence) लगता है या समुद्र का स्तर ऊपर उठ जाता है।
    • प्रवाल, जो सूर्य के प्रकाश में रहने के लिए ऊपर की ओर बढ़ते रहते हैं, अपनी वृद्धि जारी रखते हैं। द्वीप के डूबने से, भित्ति और तट के बीच की दूरी बढ़ जाती है और एक गहरा लैगून बन जाता है, जिससे यह एक अवरोधक भित्ति में बदल जाती है।
  3. चरण 3: एटॉल (Atoll)
    • अंततः, ज्वालामुखी द्वीप पूरी तरह से समुद्र की सतह के नीचे डूब जाता है।
    • अब केवल प्रवाल की अंगूठी ही बची रहती है, जो एक केंद्रीय लैगून को घेरे होती है। यह अंतिम चरण ही एटॉल कहलाता है।

प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching)

प्रवाल विरंजन एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है, जो दुनिया भर में प्रवाल भित्तियों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है। यह प्रवालों की मृत्यु का संकेत है और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ते स्वास्थ्य का एक स्पष्ट सूचक है।


प्रवाल विरंजन क्या है?

परिभाषा:
प्रवाल विरंजन वह प्रक्रिया है जब तनावग्रस्त प्रवाल (Coral) अपने ऊतकों (tissues) के भीतर रहने वाले सहजीवी शैवाल (ज़ूजैन्थेली – Zooxanthellae) को बाहर निकाल देते हैं।

क्या विरंजित प्रवाल मर चुका है?
नहीं, तुरंत नहीं। एक विरंजित प्रवाल अभी भी जीवित है। यदि तनावपूर्ण परिस्थितियाँ कम हो जाती हैं और पानी सामान्य हो जाता है, तो प्रवाल धीरे-धीरे ज़ूजैन्थेली को फिर से ग्रहण कर सकता है और ठीक (recover) हो सकता है।

लेकिन, यदि तनाव की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो भूखा प्रवाल अंततः मर जाएगा। मरने के बाद, उसका कंकाल शैवाल (Algae) से ढक जाता है और वह भित्ति का हिस्सा फिर कभी वापस नहीं आ पाता।


प्रवाल विरंजन के मुख्य कारण (Primary Causes of Coral Bleaching)

प्रवाल किसी भी प्रकार के पर्यावरणीय तनाव के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। विरंजन का मुख्य कारण वे कारक हैं जो ज़ूजैन्थेली और प्रवाल के सहजीवी संबंध को तोड़ देते हैं।

1. समुद्री तापमान में वृद्धि (Increase in Sea Water Temperature):

2. समुद्री अम्लीकरण (Ocean Acidification):

3. प्रदूषण (Pollution):

4. सूर्य के प्रकाश का अत्यधिक संपर्क (Overexposure to Sunlight):

5. बीमारियाँ (Diseases):


प्रभाव और परिणाम (Impacts and Consequences)

निष्कर्ष:
प्रवाल विरंजन एक स्पष्ट चेतावनी है कि मानव गतिविधियाँ और जलवायु परिवर्तन समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को अपरिवर्तनीय रूप से नुकसान पहुँचा रहे हैं। इस संकट से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और स्थानीय स्तर पर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है।


प्रवाल भित्तियों का भौगोलिक वितरण (Geographical Distribution of Coral Reefs)

प्रवाल भित्तियों का वितरण दुनिया भर में बहुत विशिष्ट है और यह सीधे तौर पर उन पर्यावरणीय दशाओं से निर्धारित होता है जिनकी उन्हें जीवित रहने और पनपने के लिए आवश्यकता होती है। ये मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के गर्म, उथले और साफ समुद्री जल में पाई जाती हैं।


मुख्य वितरण क्षेत्र: “प्रवाल पट्टी” (The Coral Belt)

विश्व की लगभग सभी प्रवाल भित्तियाँ कर्क रेखा (Tropic of Cancer) और मकर रेखा (Tropic of Capricorn) के बीच, यानी 30° उत्तर और 30° दक्षिण अक्षांशों के बीच स्थित हैं। इस क्षेत्र को अक्सर “प्रवाल पट्टी” (The Coral Belt) कहा जाता है।

इसका कारण यह है कि केवल इसी क्षेत्र में प्रवाल के विकास के लिए आवश्यक दशाएँ पूरी होती हैं:


विश्व के प्रमुख प्रवाल भित्ति क्षेत्र

प्रवाल भित्तियों का वितरण दो प्रमुख क्षेत्रों में केंद्रित है:

1. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र (Indo-Pacific Region):
यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध प्रवाल भित्ति क्षेत्र है। यह लाल सागर, पूर्वी अफ्रीका और हिंद महासागर से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया और प्रशांत महासागर तक फैला हुआ है।

2. अटलांटिक महासागर क्षेत्र (Atlantic Ocean Region):
यह इंडो-पैसिफिक की तुलना में छोटा क्षेत्र है और यहाँ प्रजातियों की विविधता भी कम है।


वितरण को सीमित करने वाले कारक (Limiting Factors of Distribution)

प्रवाल भित्तियाँ कुछ विशिष्ट स्थानों पर क्यों नहीं पाई जातीं, यह समझना भी महत्वपूर्ण है:

  1. महाद्वीपों के पश्चिमी तट (Western Coasts of Continents):
    • उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी, महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर प्रवाल भित्तियाँ लगभग अनुपस्थित हैं।
    • कारण: इन तटों पर ठंडी महासागरीय धाराओं (Cold Ocean Currents) का प्रवाह होता है (जैसे पेरू की हम्बोल्ट धारा और अफ्रीका की बेंगुएला धारा), जो पानी के तापमान को प्रवाल के लिए आवश्यक स्तर से नीचे ले जाती हैं।
  2. बड़ी नदियों के मुहाने (Mouths of Large Rivers):
    • प्रवाल भित्तियाँ अमेज़न (दक्षिण अमेरिका) या कांगो (अफ्रीका) जैसी बड़ी नदियों के मुहाने के पास नहीं पाई जातीं।
    • कारण:
      • ताजा पानी: नदियाँ भारी मात्रा में ताजा पानी लाती हैं, जो लवणता को कम कर देता है।
      • अवसाद (Sediment): नदियाँ अपने साथ बहुत अधिक मिट्टी और गाद लाती हैं, जो पानी को गंदला कर देती है, सूर्य के प्रकाश को रोकती है और कोरल पॉलीप्स का दम घोंट देती है।

भारत में प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs in India)

भारत में चार प्रमुख प्रवाल भित्ति क्षेत्र हैं:

  1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह: भारत का सबसे समृद्ध और विविध प्रवाल भित्ति क्षेत्र।
  2. लक्षद्वीप द्वीप समूह: यह पूरी तरह से एटॉल से बना है।
  3. मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु तट): यहाँ तटीय भित्तियाँ पाई जाती हैं।
  4. कच्छ की खाड़ी (गुजरात तट): यह उच्च तापमान और तलछट के प्रति सहनशील प्रवालों का एक अनूठा उदाहरण है।

प्रवाल भित्तियों का महत्व (Importance of Coral Reefs)

प्रवाल भित्तियाँ केवल सुंदर पानी के नीचे की संरचनाएँ नहीं हैं; वे पृथ्वी पर सबसे महत्वपूर्ण और मूल्यवान पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं। इनका महत्व पारिस्थितिक, आर्थिक और भौतिक, सभी दृष्टिकोणों से अत्यधिक है। अपनी विशाल जैव विविधता के कारण इन्हें справедливо ही “समुद्र का वर्षावन” (Rainforests of the Sea) कहा जाता है।


1. पारिस्थितिक महत्व (Ecological Importance)

  1. जैव विविधता का केंद्र (Center of Biodiversity):
    • यह प्रवाल भित्तियों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। यद्यपि ये समुद्री तल का 1% से भी कम हिस्सा घेरती हैं, फिर भी ये दुनिया के लगभग 25% समुद्री जीवन को आवास, भोजन और प्रजनन के लिए आश्रय प्रदान करती हैं।
    • इन पर हजारों प्रजातियों की मछलियाँ, मोलस्क, केकड़े, समुद्री कछुए, स्पंज और शैवाल निर्भर हैं।
  2. समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार (Base of the Marine Food Chain):
    • प्रवाल भित्तियों में रहने वाले सूक्ष्म शैवाल और छोटे जीव एक विशाल खाद्य श्रृंखला का आधार बनते हैं। छोटे जीव इन्हें खाते हैं, जिन्हें फिर बड़ी मछलियाँ खाती हैं, और यह श्रृंखला शार्क और डॉल्फ़िन जैसे शीर्ष शिकारियों तक जाती है।
  3. समुद्री प्रजातियों के लिए नर्सरी (Nursery for Marine Species):
    • प्रवाल भित्तियों की जटिल संरचना छोटे और किशोर जीवों को शिकारियों से छिपने के लिए एक सुरक्षित स्थान प्रदान करती है। कई महत्वपूर्ण मछली प्रजातियाँ अपने जीवन के शुरुआती चरण इन्हीं भित्तियों में बिताती हैं, जिससे उनकी आबादी को बढ़ने में मदद मिलती है।

2. आर्थिक महत्व (Economic Importance)

  1. मत्स्य पालन और आजीविका (Fishing and Livelihood):
    • दुनिया भर में करोड़ों लोग अपनी आजीविका और भोजन (प्रोटीन) के लिए प्रवाल भित्तियों पर निर्भर मछली पकड़ने के उद्योग से जुड़े हुए हैं। एक स्वस्थ प्रवाल भित्ति स्थानीय समुदायों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
  2. पर्यटन और मनोरंजन (Tourism and Recreation):
    • प्रवाल भित्तियाँ दुनिया भर में एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण हैं। स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग, ग्लास-बॉटम बोट और अन्य मनोरंजक गतिविधियाँ हर साल करोड़ों पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।
    • इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का राजस्व प्राप्त होता है और होटल, गोताखोरी ऑपरेटरों और टूर गाइड के रूप में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  3. औषधीय खोजें (Medical Discoveries):
    • वैज्ञानिक प्रवाल भित्तियों में पाए जाने वाले जीवों से नए यौगिकों की खोज कर रहे हैं जिनका उपयोग नई दवाएँ बनाने में किया जा सकता है।
    • इनसे कैंसर, गठिया, हृदय रोग और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए यौगिक प्राप्त किए गए हैं।

3. तटीय सुरक्षा (Coastal Protection)

  1. प्राकृतिक अवरोधक (Natural Barrier):
    • प्रवाल भित्तियाँ समुद्र और तट के बीच एक प्राकृतिक, जीवित दीवार के रूप में कार्य करती हैं।
    • वे 97% तक लहर ऊर्जा को अवशोषित कर लेती हैं, जिससे लहरों की शक्ति और गति कम हो जाती है।
  2. तूफान और सुनामी से बचाव (Protection from Storms and Tsunamis):
    • यह ऊर्जा अवशोषण तटीय समुदायों को तूफानों, हरिकेन और यहाँ तक कि सुनामी के विनाशकारी प्रभाव से बचाने में मदद करता है।
    • स्वस्थ प्रवाल भित्तियाँ बाढ़ को कम करती हैं, तटीय अपरदन को रोकती हैं और मानव जीवन तथा संपत्ति की रक्षा करती हैं। एक अध्ययन के अनुसार, प्रवाल भित्तियों के बिना तटीय बाढ़ से होने वाला वार्षिक नुकसान दोगुना हो जाएगा।

4. वैज्ञानिक और संकेतक महत्व (Scientific and Indicator Importance)

  1. जलवायु परिवर्तन के संकेतक (Indicators of Climate Change):
    • प्रवाल पर्यावरणीय तनाव, विशेष रूप से बढ़ते समुद्री तापमान के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। प्रवाल विरंजन (Coral Bleaching) की घटनाएँ समुद्री स्वास्थ्य में गिरावट और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का एक स्पष्ट और दृश्यमान संकेत हैं।
    • इन्हें अक्सर “महासागरों के लिए कोयले की खान में कैनरी पक्षी” (Canary in the Coal Mine for Oceans) कहा जाता है, जो हमें आसन्न खतरे की चेतावनी देते हैं।
  2. वैज्ञानिक अनुसंधान (Scientific Research):
    • प्रवाल के कंकाल विकास के छल्ले (growth rings) बनाते हैं, जिनका अध्ययन करके वैज्ञानिक सैकड़ों वर्षों तक के पिछले जलवायु और समुद्री परिस्थितियों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

निष्कर्ष:
प्रवाल भित्तियाँ केवल एक सुंदर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र नहीं हैं, बल्कि वे तटीय जीवन, वैश्विक अर्थव्यवस्था और पृथ्वी के स्वास्थ्य के लिए অপরিहार্য हैं। उनका संरक्षण न केवल समुद्री जीवन के भविष्य के लिए, बल्कि मानव समाज के कल्याण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।


सुनामी (Tsunami)

सुनामी जापानी भाषा का शब्द है (त्सु 津 = बंदरगाह, नामि 波 = लहर), जिसका शाब्दिक अर्थ है “बंदरगाह की लहर”। यह पानी के नीचे होने वाली किसी बड़ी हलचल के कारण उत्पन्न होने वाली अत्यधिक लंबी तरंगदैर्ध्य (wavelength) वाली समुद्री लहरों की एक श्रृंखला है।

यह एक आम गलतफहमी है कि सुनामी एक अकेली विशाल लहर होती है। वास्तव में, यह कई लहरों का एक समूह (wave train) है, जिनके बीच घंटों का अंतर हो सकता है, और पहली लहर अक्सर सबसे बड़ी नहीं होती।


सुनामी की उत्पत्ति के कारण (Causes for the Origin of Tsunami)

सुनामी का मूल कारण महासागर के पानी की एक विशाल मात्रा का अचानक और बड़े पैमाने पर विस्थापन (sudden and large-scale displacement) है। यह विस्थापन पानी के नीचे या उसके निकट होने वाली शक्तिशाली भूवैज्ञानिक घटनाओं के परिणामस्वरूप होता है। सुनामी की उत्पत्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:


1. पनडुब्बी भूकंप (Submarine Earthquakes) – सबसे प्रमुख कारण

यह सुनामी उत्पन्न करने वाला सबसे आम और शक्तिशाली कारण है, जो लगभग 80-90% सुनामी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है।


2. पनडुब्बी भूस्खलन (Submarine Landslides)


3. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruptions)

ज्वालामुखी विस्फोट दो मुख्य तरीकों से सुनामी उत्पन्न कर सकते हैं:

  1. शक्तिशाली पनडुब्बी विस्फोट: जब समुद्र के नीचे एक ज्वालामुखी में अत्यधिक शक्तिशाली विस्फोट होता है, तो वह अपने ऊपर के पानी को तेजी से ऊपर की ओर धकेलता है।
  2. ज्वालामुखी का ढहना (Flank Collapse): किसी तटीय या द्वीपीय ज्वालामुखी का एक बड़ा हिस्सा (Flank) विस्फोट या अस्थिरता के कारण टूटकर समुद्र में गिर सकता है। पानी में अचानक गिरने वाली यह विशाल चट्टान और मलबा एक विनाशकारी सुनामी को जन्म दे सकता है। 1883 में इंडोनेशिया के क्राकाटोआ (Krakatoa) ज्वालामुखी के विस्फोट ने इसी तरह एक भयानक सुनामी उत्पन्न की थी।

4. उल्कापिंड का प्रभाव (Meteorite/Asteroid Impact)

निष्कर्ष:
सुनामी की उत्पत्ति के लिए आवश्यक मूल तत्व ऊर्जा का एक विशाल और अचानक विमोचन (release) है, जो पानी के एक बड़े स्तंभ को उसकी स्थिर स्थिति से विस्थापित कर सके। भूकंप इसके लिए सबसे आम तंत्र है, लेकिन कोई भी घटना जो यह कार्य कर सकती है, वह विनाशकारी सुनामी को जन्म दे सकती है।


सुनामी की विशेषताएँ (Characteristics of a Tsunami)

सुनामी साधारण समुद्री लहरों से बहुत अलग और कहीं अधिक विनाशकारी होती है। इसका व्यवहार गहरे और उथले पानी में नाटकीय रूप से बदल जाता है, जो इसे विशेष रूप से खतरनाक बनाता है। सुनामी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


1. गहरे समुद्र में विशेषताएँ (In the Deep Ocean)

जब सुनामी खुले, गहरे समुद्र में यात्रा करती है, तो इसकी विशेषताएँ भ्रामक रूप से कम खतरनाक लगती हैं:


2. तट के पास की विशेषताएँ (Near the Coast)

जैसे ही सुनामी गहरे समुद्र से उथले तटीय जल में प्रवेश करती है, इसका पूरा चरित्र नाटकीय रूप से बदल जाता है:


अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएँ


भारत में सुनामी प्रभावित क्षेत्र (Tsunami-Prone Areas in India)

भारत की लंबी तटरेखा (लगभग 7,500 किमी) इसे सुनामी के प्रति संवेदनशील बनाती है, हालांकि सभी तटीय क्षेत्र समान रूप से जोखिम में नहीं हैं। 26 दिसंबर 2004 की हिंद महासागर सुनामी के विनाशकारी अनुभव ने भारत की संवेदनशीलता को स्पष्ट रूप से उजागर किया, जिसके बाद सुनामी की तैयारी और चेतावनी प्रणालियों पर गंभीरता से ध्यान दिया गया।

भारत में सुनामी प्रभावित क्षेत्रों को उनकी संवेदनशीलता के स्तर के आधार पर मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है:


1. अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र (Highly Vulnerable Areas)

ये वे क्षेत्र हैं जो सुनामी उत्पन्न करने वाले प्रमुख भूवैज्ञानिक स्रोतों के सीधे रास्ते में आते हैं और ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।

क. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (Andaman & Nicobar Islands):

ख. पूर्वी तट (East Coast of India):


2. कम संवेदनशील लेकिन जोखिम वाले क्षेत्र (Less Vulnerable but At-Risk Areas)

ये क्षेत्र भौगोलिक रूप से अधिक सुरक्षित हैं, लेकिन वे पूरी तरह से खतरे से बाहर नहीं हैं।

क. पश्चिमी तट (West Coast of India):


सारांश तालिका

संवेदनशीलता स्तरक्षेत्रसुनामी का मुख्य स्रोत
अत्यधिक संवेदनशीलअंडमान और निकोबार द्वीप समूहसुमात्रा-अंडमान सबडक्शन जोन
अत्यधिक संवेदनशीलपूर्वी तट (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा)सुमात्रा-अंडमान सबडक्शन जोन
कम संवेदनशीलपश्चिमी तट (गुजरात, महाराष्ट्र, केरल)मकरान सबडक्शन जोन

भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम

2004 की सुनामी के बाद, भारत ने सुनामी से निपटने के लिए एक मजबूत प्रणाली विकसित की है।


चेतावनी प्रणाली के प्रमुख घटक (Key Components of a Warning System)

एक प्रभावी सुनामी चेतावनी प्रणाली तीन मुख्य घटकों पर काम करती है: मूल्यांकन (Assessment), पहचान (Detection), और प्रसार (Dissemination)।

1. भूकंपीय निगरानी और मूल्यांकन (Seismic Monitoring and Assessment)

यह चेतावनी प्रणाली का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

2. सुनामी का पता लगाना और पुष्टि करना (Tsunami Detection and Confirmation)

केवल भूकंप का आना सुनामी की गारंटी नहीं है। यह पुष्टि करना आवश्यक है कि सुनामी वास्तव में उत्पन्न हुई है या नहीं। इसके लिए दो मुख्य तकनीकों का उपयोग किया जाता है:

क. डीप-ओशन असेसमेंट एंड रिपोर्टिंग ऑफ़ सुनामीज़ (DART) बुआई सिस्टम:

ख. तटीय ज्वार गेज (Coastal Tide Gauges):

3. चेतावनी का प्रसार (Warning Dissemination)

यह प्रणाली का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है: जानकारी को आम जनता तक पहुँचाना।


भारत की सुनामी चेतावनी प्रणाली

यह प्रणाली दुनिया की सबसे उन्नत और विश्वसनीय सुनामी चेतावनी प्रणालियों में से एक मानी जाती है।


सुनामी बनाम ज्वारीय लहर (Tsunami vs. Tidal Wave)

अक्सर सुनामी को गलती से “ज्वारीय लहर” (Tidal Wave) कह दिया जाता है, जो गलत है।


इतिहास की प्रमुख सुनामी घटनाएँ


सुनामी के प्रभाव और सुरक्षा उपाय



महासागरीय निक्षेप (Oceanic Deposits)

महासागरीय निक्षेप समुद्र के तल पर जमा हुए असंगठित तलछटों (sediments) को कहते हैं। ये निक्षेप लाखों वर्षों में धीरे-धीरे जमा हुए हैं और इनमें पृथ्वी के भूवैज्ञानिक और जलवायु इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी छिपी होती है। इनकी मोटाई अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग होती है—महाद्वीपीय शेल्फ पर सबसे मोटी और मध्य-महासागरीय कटकों (Mid-Oceanic Ridges) पर सबसे पतली।

महासागरीय निक्षेपों को उनके स्रोत (Source) या उत्पत्ति (Origin) के आधार पर मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. भूमि-जनित निक्षेप (Terrigenous Deposits) – भूमि से प्राप्त
  2. समुद्र-जनित निक्षेप (Pelagic Deposits) – महासागरों से प्राप्त

1. भूमि-जनित निक्षेप (Terrigenous Deposits)

जैसा कि नाम से पता चलता है, ये निक्षेप भूमि (continents) पर स्थित चट्टानों के अपरदन (erosion) और अपक्षय (weathering) से उत्पन्न होते हैं। इन्हें नदियों, हिमनदों, हवा और ज्वालामुखियों द्वारा बहाकर समुद्र में लाया जाता है। ये मुख्य रूप से महाद्वीपीय शेल्फ, ढलान और राइज़ पर पाए जाते हैं।

इनके प्रमुख प्रकार हैं:

क. स्थलीय निक्षेप (Land-derived Sediments):

ख. ज्वालामुखी निक्षेप (Volcanic Sediments):

ग. पवन-जनित निक्षेप (Aeolian Sediments):


2. समुद्र-जनित या पेलैजिक निक्षेप (Pelagic Deposits)

“पेलैजिक” का अर्थ है खुले, गहरे समुद्र से संबंधित। ये निक्षेप मुख्य रूप से गहरे समुद्र के तल (Abyssal plains) पर पाए जाते हैं। ये बहुत ही महीन कणों से बने होते हैं और इनके जमा होने की दर बहुत धीमी होती है (प्रति 1000 वर्ष में कुछ मिलीमीटर)।

इनके दो मुख्य उप-प्रकार हैं:

क. जैविक निक्षेप या ऊज (Biogenous Deposits or Ooze):

ऊज का प्रकारनिर्माण सामग्रीबनाने वाले जीवप्रमुखता
कैल्शियम युक्त ऊज (Calcareous Ooze)कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO3CaCO3) से बने खोल।• टेरोपोड (Pteropods)<br>• ग्लोबिजेरिना (Globigerina) – सबसे महत्वपूर्णयह गर्म और अपेक्षाकृत कम गहरे पानी में पाया जाता है (4000 मीटर से कम), क्योंकि इससे अधिक गहराई पर दबाव और ठंडक के कारण कैल्शियम कार्बोनेट घुल जाता है (इसे CCD – Carbonate Compensation Depth कहते हैं)।
सिलिका युक्त ऊज (Siliceous Ooze)सिलिका (SiO2SiO2) से बने कंकाल।• रेडियोलेरिया (Radiolarians)<br>• डाइएटम (Diatoms)यह गहरे, ठंडे पानी में पाया जाता है जहाँ कैल्शियम कार्बोनेट घुल जाता है। यह मुख्य रूप से अंटार्कटिक और प्रशांत महासागरों में अधिक मिलता है।

ख. अजैविक निक्षेप (Inorganic Pelagic Sediments):

  1. लाल मिट्टी (Red Clay):
    • यह गहरे समुद्र का सबसे व्यापक निक्षेप है। यह ज्वालामुखी धूल और अंतरिक्षीय धूल (cosmic dust) के बहुत ही महीन कणों से बनता है।
    • रंग: इसमें लोहे के ऑक्साइड की अधिकता के कारण इसका रंग लाल या भूरा होता है।
    • वितरण: यह उन सबसे गहरे क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ जैविक निक्षेप (ऊज) कम होते हैं क्योंकि प्लैंकटन की उत्पादकता कम होती है या कैल्शियम कार्बोनेट घुल जाता है।
  2. हाइड्रोजेनस निक्षेप (Hydrogenous Deposits):
    • ये वे पदार्थ हैं जो सीधे समुद्री जल में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से अवक्षेपित (precipitated) होते हैं।
    • प्रमुख उदाहरण:
      • पॉलीमेटेलिक नोड्यूल (Polymetallic Nodules) या मैंगनीज नोड्यूल: आलू के आकार के ये पिंड समुद्र तल पर बिखरे होते हैं। ये लोहे और मैंगनीज के ऑक्साइड से बने होते हैं और इनमें निकल, तांबा और कोबाल्ट जैसी मूल्यवान धातुएँ भी होती हैं, जो इन्हें भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन बनाती हैं।