जलवायु विज्ञान (Climatology)

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जलवायु विज्ञान वह विज्ञान है जो पृथ्वी की जलवायु, उसके घटकों, उसे नियंत्रित करने वाले कारकों और लंबी अवधि (आमतौर पर 30-35 वर्ष) में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करता है। यह वायुमंडलीय विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है।

वायुमंडल: संघटन और संरचना (Atmosphere: Composition and Structure)

वायुमंडल पृथ्वी के चारों ओर फैले गैसों के विशाल आवरण या लिफाफे को कहते हैं, जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उससे जुड़ा हुआ है। यह वायुमंडल ही पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक दशाओं (जैसे तापमान का संतुलन, हानिकारक विकिरण से सुरक्षा) को बनाए रखता है।


I. वायुमंडल का संघटन (Composition of the Atmosphere)

वायुमंडल कई गैसों, जलवाष्प और धूलकणों का मिश्रण है।

A. वायुमंडल की गैसें (Gases of the Atmosphere)

वायुमंडल की गैसों को उनकी मात्रा और स्थिरता के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

गैस का नामरासायनिक सूत्रआयतन (%)प्रमुख तथ्य
नाइट्रोजनN₂78.08%⋆ वायुमंडल में सर्वाधिक मात्रा में पाई जाने वाली गैस। [SSC/Railways]<br>✓ यह प्रत्यक्ष रूप से जीवन के लिए उपयोगी नहीं है, लेकिन पौधे इसे नाइट्रेट के रूप में ग्रहण करते हैं।<br>✓ यह आग को नियंत्रित करने में सहायक है।
ऑक्सीजनO₂20.95%⋆ यह प्राणवायु है; श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक।<br>✓ वस्तुओं के जलने (दहन) के लिए आवश्यक है।
ऑर्गनAr0.93%⋆ वायुमंडल में पाई जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी गैस और सबसे प्रचुर अक्रिय (Inert) गैस।
अन्यनिऑन, हीलियम, क्रिप्टन, हाइड्रोजन< 0.01%ये बहुत कम मात्रा में पाई जाने वाली अक्रिय गैसें हैं।
गैस का नामरासायनिक सूत्रआयतन (%)प्रमुख तथ्य और PYQ लिंक
कार्बन डाइऑक्साइडCO₂~0.04% (लगातार बढ़ रही है)⋆ यह ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।<br>✓ यह सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है, लेकिन पार्थिव विकिरण (पृथ्वी से निकली गर्मी) को अवशोषित करती है, जिससे वायुमंडल गर्म होता है।<br>✓ पौधे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के लिए इसका उपयोग करते हैं। [UPSC 2017]
ओजोनO₃बहुत कम⋆ यह मुख्य रूप से समतापमंडल (Stratosphere) में 15-35 किमी की ऊँचाई पर पाई जाती है।<br>✓ यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (Ultraviolet – UV) विकिरण को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।<br>✓ इसकी परत का क्षरण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) से होता है। [UPPSC/State PSC]

B. जलवाष्प (Water Vapour)

C. धूलकण (Dust Particles/Aerosols)


II. वायुमंडल की संरचना (Structure of the Atmosphere)

वायुमंडल को तापमान और घनत्व में ऊर्ध्वाधर (Vertical) परिवर्तन के आधार पर पाँच प्रमुख परतों में विभाजित किया गया है।

[आरेख: पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर पाँचों परतों (क्षोभमंडल, समतापमंडल, मध्यमंडल, तापमंडल, बहिर्मंडल) को क्रम से दर्शाने वाला एक चित्र। प्रत्येक परत की ऊँचाई और तापमान की प्रवृत्ति (घटता/बढ़ता) को एक ग्राफ के माध्यम से दिखाया जाए।]

परत का नाम (Name of the Layer)औसत ऊँचाई (Altitude)तापमान की प्रवृत्ति (Temperature Trend)प्रमुख विशेषताएँ और PYQ लिंक
1. क्षोभमंडल (Troposphere)0 से 13 किमी (ध्रुवों पर ~8 किमी, भूमध्य रेखा पर ~18 किमी)ऊँचाई के साथ घटता है (लगभग 6.5°C प्रति किमी की दर से, जिसे ‘सामान्य ह्रास दर’ कहते हैं)⋆ यह वायुमंडल की सबसे निचली और सबसे सघन परत है। ✓ मौसम संबंधी सभी घटनाएँ (जैसे बादल बनना, वर्षा, तूफान, बिजली चमकना) इसी परत में होती हैं। ✓ वायुमंडल के कुल द्रव्यमान का लगभग 75% इसी परत में है। [UPSC Prelims]
2. समतापमंडल (Stratosphere)13 से 50 किमीऊँचाई के साथ बढ़ता है⋆ इस परत में तापमान बढ़ने का मुख्य कारण ओजोन परत (Ozone Layer) की उपस्थिति है, जो पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है। ✓ यहाँ बादल और मौसम संबंधी घटनाएँ लगभग नहीं होतीं, इसलिए यह वायुयान उड़ाने के लिए आदर्श परत है। [State PSC]
3. मध्यमंडल (Mesosphere)50 से 80 किमीऊँचाई के साथ घटता है⋆ यह वायुमंडल की सबसे ठंडी परत है; यहाँ तापमान -100°C तक पहुँच जाता है। ✓ अंतरिक्ष से आने वाले उल्कापिंड (Meteors) इसी परत में जलकर नष्ट हो जाते हैं।
4. तापमंडल या आयनमंडल (Thermosphere / Ionosphere)80 से 400 किमीऊँचाई के साथ तेजी से बढ़ता है⋆ यहाँ मौजूद गैसों के कण सूर्य से आने वाली X-किरणों और UV-किरणों के कारण आयनित (Ionized) हो जाते हैं। ✓ आयनों की उपस्थिति के कारण यह परत रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है, जिससे रेडियो संचार संभव हो पाता है। [UPSC 2015] ✓ यहाँ औरोरा (Aurora Borealis / Australis) जैसी घटनाएँ होती हैं।
5. बहिर्मंडल (Exosphere)400 किमी से ऊपरलगातार बढ़ता है⋆ यह वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है। ✓ यहाँ वायु बहुत विरल होती है और हल्की गैसें (जैसे हाइड्रोजन और हीलियम) पाई जाती हैं। ✓ अंततः यह परत अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है।

1. क्षोभमंडल (Troposphere)

क्षोभमंडल (ग्रीक शब्द ‘Tropos’ अर्थात ‘परिवर्तन’ या ‘मिश्रण’ और ‘sphaira’ अर्थात ‘गोला’) पृथ्वी के वायुमंडल की सबसे निचली, सबसे घनी और सबसे महत्वपूर्ण परत है। यह पृथ्वी की सतह से सीधे संपर्क में होती है और इसी परत में हम सभी जीव रहते हैं और साँस लेते हैं। “क्षोभ” का अर्थ विक्षोभ या परिवर्तन होता है, और यह नाम इस परत के लिए उपयुक्त है क्योंकि लगभग सभी मौसम संबंधी घटनाएँ यहीं घटित होती हैं।

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

क्षोभसीमा (Tropopause)

क्षोभमंडल का महत्व (Importance of Troposphere)

  1. जीवन का आधार:
    • यह पृथ्वी पर सभी जीवों (मनुष्य, जानवर, पौधे) के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
    • जीवन के लिए आवश्यक गैसें, जैसे ऑक्सीजन (श्वसन के लिए) और कार्बन डाइऑक्साइड (प्रकाश संश्लेषण के लिए), इसी परत में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती हैं।
  2. जल चक्र (Water Cycle):
    • वायुमंडल की लगभग संपूर्ण जलवाष्प इसी परत में होती है, जिससे जल चक्र की सभी प्रक्रियाएँ (वाष्पीकरण, संघनन, वर्षण) यहीं संपन्न होती हैं, जो पृथ्वी पर मीठे पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करती हैं।
  3. मौसम और जलवायु का नियंत्रक:
    • यह परत पृथ्वी के मौसम और जलवायु को नियंत्रित करती है। सौर ऊर्जा का वितरण और ऊष्मा का संतुलन यहीं होता है।
  4. ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect):
    • क्षोभमंडल में मौजूद ग्रीनहाउस गैसें (जलवाष्प, CO₂) पृथ्वी से उत्सर्जित ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को रात में अत्यधिक ठंडा होने से बचाती हैं और एक औसत तापमान बनाए रखती हैं।

निष्कर्ष: क्षोभमंडल एक अत्यंत गतिशील परत है, जो निरंतर परिवर्तन और मिश्रण की स्थिति में रहती है। पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने और हमारे दैनिक मौसम को आकार देने में इसकी भूमिका सर्वोपरि है।


2. समतापमंडल (Stratosphere)

समतापमंडल (अंग्रेजी: Stratosphere, लैटिन शब्द ‘Stratus’ अर्थात ‘फैलाव’ या ‘परत’) पृथ्वी के वायुमंडल की वह परत है जो क्षोभमंडल (Troposphere) के ठीक ऊपर और मध्यमंडल (Mesosphere) के नीचे स्थित होती है। “समताप” का अर्थ है ‘समान ताप’, हालांकि इस परत में तापमान समान नहीं रहता, बल्कि ऊँचाई के साथ बढ़ता है। यह परत शांत वायुमंडलीय दशाओं और जीवन-रक्षक ओजोन परत की उपस्थिति के लिए जानी जाती है।

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

समतापमंडल की महत्वपूर्ण परतें और घटनाएँ

समतापसीमा (Stratopause)

समतापमंडल का महत्व (Importance of Stratosphere)

  1. जीवन की रक्षा: ओजोन परत के माध्यम से हानिकारक UV विकिरण से पृथ्वी पर जीवन (मनुष्यों, जानवरों और पौधों) की रक्षा करना।
  2. सुरक्षित हवाई यात्रा: वायुयानों के लिए एक स्थिर और सुरक्षित उड़ान मार्ग प्रदान करना।
  3. ऊष्मा का संतुलन: UV विकिरण को अवशोषित करके यह पृथ्वी के ऊर्जा बजट को प्रभावित करता है और वायुमंडल की तापीय संरचना को बनाए रखने में मदद करता है।

निष्कर्ष: समतापमंडल, हालांकि मौसम की दृष्टि से शांत है, पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी ओजोन परत एक अदृश्य लेकिन अनिवार्य ढाल है, जिसका संरक्षण वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौती है।


3. मध्यमंडल (Mesosphere)

मध्यमंडल (ग्रीक शब्द ‘Mesos’ अर्थात ‘मध्य’) पृथ्वी के वायुमंडल की वह परत है जो समतापमंडल (Stratosphere) के ठीक ऊपर और तापमंडल (Thermosphere) के नीचे स्थित होती है। यह वायुमंडल की संरचना में एक महत्वपूर्ण मध्यवर्ती परत का काम करती है।

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

मध्यमंडल की सबसे महत्वपूर्ण परिघटना

मध्यमंडल की अन्य घटनाएँ

मध्यसीमा (Mesopause)

परीक्षा के दृष्टिकोण से मध्यमंडल के टॉप 3 तथ्य

  1. उल्काओं का जलना: अधिकांश उल्कापिंड इसी परत में जलते हैं। यह सबसे ज्यादा बार पूछा जाने वाला प्रश्न है।
  2. सबसे ठंडी परत: मध्यमंडल की ऊपरी सीमा (मध्यसीमा) वायुमंडल का सबसे ठंडा स्थान है।
  3. सबसे ऊँचे बादल: निशादीप्त मेघ (Noctilucent Clouds) इसी परत में बनते हैं।

4. तापमंडल या आयनमंडल (Thermosphere or Ionosphere)

तापमंडल (ग्रीक शब्द ‘Thermos’ अर्थात ‘ऊष्मा’) पृथ्वी के वायुमंडल की वह परत है जो मध्यमंडल (Mesosphere) के ठीक ऊपर और बहिर्मंडल (Exosphere) के नीचे स्थित होती है। इस परत का नाम इसके अत्यधिक उच्च तापमान के कारण रखा गया है। तापमंडल का निचला हिस्सा आयनमंडल (Ionosphere) कहलाता है, जो रेडियो संचार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

आयनमंडल (Ionosphere): तापमंडल का एक महत्वपूर्ण उप-भाग

आयनमंडल कोई अलग परत नहीं है, बल्कि यह मध्यमंडल के ऊपरी भाग, संपूर्ण तापमंडल और बहिर्मंडल के निचले भाग में फैली एक आवेशित परत है। हालांकि, इसका अधिकांश और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा तापमंडल में ही होता है।

आयनमंडल की परतऊँचाई (किमी)विशेषता
D परत~ 60-90निम्न आवृत्ति की रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है, लेकिन मध्यम और उच्च को अवशोषित कर लेती है।
E परत (केनेली-हेविसाइड परत)~ 90-150मध्यम और उच्च आवृत्ति की तरंगों को परावर्तित करती है।
F परत (एपेलटन परत)~ 150-400यह F1 और F2 में विभाजित होती है; यह लघु तरंग (Shortwave) रेडियो के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

मध्यमंडल की अन्य महत्वपूर्ण परिघटनाएँ

निष्कर्ष: तापमंडल और इसका आयनित हिस्सा (आयनमंडल) तापमान और घनत्व के मामले में एक चरम वातावरण प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इनकी भूमिका आधुनिक संचार प्रणालियों और पृथ्वी को सौर विकिरण से बचाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वह परत है जहाँ अंतरिक्ष और पृथ्वी का वायुमंडल एक-दूसरे से मिलते हैं।


5. बहिर्मंडल (Exosphere)

बहिर्मंडल (ग्रीक शब्द ‘Exo’ अर्थात ‘बाहर’) पृथ्वी के वायुमंडल की सबसे बाहरी और सबसे पतली परत है। यह तापमंडल (Thermosphere) के ऊपर स्थित है और धीरे-धीरे अंतरिक्ष (Outer Space) के निर्वात (Vacuum) में विलीन हो जाती है। इसकी कोई स्पष्ट ऊपरी सीमा नहीं है, लेकिन इसे आमतौर पर पृथ्वी की सतह से हजारों किलोमीटर तक फैला हुआ माना जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

बहिर्मंडल की सबसे महत्वपूर्ण परिघटनाएँ

बहिर्मंडल और आयनमंडल का संबंध

परीक्षा के दृष्टिकोण से बहिर्मंडल के प्रमुख तथ्य

  1. सबसे बाहरी परत: यह वायुमंडल की सबसे ऊपरी परत है, जो अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है। [SSC CHSL 2019]
  2. प्रमुख गैसें: यहाँ मुख्य रूप से हाइड्रोजन (Hydrogen) और हीलियम (Helium) जैसी हल्की गैसें पाई जाती हैं। [BPSC Prelims]
  3. कणों का पलायन: यह एकमात्र परत है जहाँ से गैस के कण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पलायन (Escape) कर सकते हैं। यह अवधारणा UPSC के लिए महत्वपूर्ण है।
  4. अत्यधिक विरलता: वायु इतनी विरल होती है कि यह एक पारंपरिक गैस की तरह व्यवहार नहीं करती।

निष्कर्ष: बहिर्मंडल पृथ्वी के वायुमंडलीय आवरण और बाहरी अंतरिक्ष के बीच का एक विशाल, लगभग खाली संक्रमण क्षेत्र है। इसकी मुख्य पहचान कणों की अत्यधिक कम सघनता और उनका गुरुत्वाकर्षण से पलायन करने की क्षमता है। यह हमारे ग्रह के वायुमंडल का अंतिम छोर है।


वायुमंडलीय संक्रमणकालीन सीमाएँ (Atmospheric Transition Boundaries)

वायुमंडल की परतें एक-दूसरे से अचानक अलग नहीं होतीं, बल्कि उनके बीच कुछ किलोमीटर मोटे संक्रमणकालीन क्षेत्र होते हैं। इन क्षेत्रों में, एक परत की तापीय विशेषता (तापमान की प्रवृत्ति) समाप्त होती है और दूसरी परत की विशेषता शुरू होती है। इन सीमाओं का नाम निचली परत के नाम पर रखा जाता है और उनके अंत को दर्शाने के लिए ‘-पॉज’ (-pause) प्रत्यय का उपयोग किया जाता है, जिसका अर्थ है ‘रुकना’ या ‘ठहराव’।

1. क्षोभसीमा (Tropopause)

2. समतापसीमा (Stratopause)

3. मध्यसीमा (Mesopause)

सीमाओं का तुलनात्मक सारांश

संक्रमणकालीन सीमानिचली परतऊपरी परतअवस्थिति (किमी)तापमान की घटनासंबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
क्षोभसीमा (Tropopause)क्षोभमंडलसमतापमंडल~8 से 18तापमान का गिरना बंद हो जाता है।जेट स्ट्रीम यहीं चलती हैं; मौसम पर ढक्कन।
समतापसीमा (Stratopause)समतापमंडलमध्यमंडल~50तापमान का बढ़ना बंद हो जाता है; यहाँ अधिकतम होता है (~0°C)।ओजोन परत के प्रभाव का चरम बिंदु।
मध्यसीमा (Mesopause)मध्यमंडलतापमंडल~80 – 85तापमान अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँचता है।⋆ वायुमंडल का सबसे ठंडा स्थान।

इन सीमाओं को समझना वायुमंडल की पूरी संरचना और प्रत्येक परत की अद्वितीय विशेषताओं को समझने की कुंजी है।


वायुमंडल: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts for Exams)

संघटन (Composition) से संबंधित तथ्य

संरचना (Structure) से संबंधित तथ्य

यह क्विक फैक्ट्स लिस्ट आपको अंतिम समय में रिवीजन करने और सीधे पूछे जाने वाले वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करने में बहुत मदद करेगी।


सूर्यातप और ताप बजट: वितरण, कारक और महत्व

पृथ्वी पर जीवन और ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य है। पृथ्वी और उसके वायुमंडल के तापमान का संतुलन सूर्य से प्राप्त ऊर्जा और पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा के बीच एक जटिल संतुलन पर निर्भर करता है।

1. सूर्यातप (Insolation)

सूर्यातप (अंग्रेजी: Insolation, ‘Incoming Solar Radiation’ का संक्षिप्त रूप) का अर्थ है सूर्य से पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली सौर विकिरण ऊर्जा। यह ऊर्जा लघु तरंगों (Short Waves) के रूप में पृथ्वी तक पहुँचती है।

सूर्यातप का स्रोत: सूर्य (The Sun as the Source of Insolation)

पृथ्वी पर सूर्यातप और जीवन के लिए आवश्यक लगभग समस्त ऊर्जा का एकमात्र और परम स्रोत सूर्य है। सूर्य हमारे सौर मंडल के केंद्र में स्थित एक विशाल, धधकता हुआ गैस का गोला है, जिसे तारा (Star) कहते हैं।

1. सूर्य की संरचना और ऊर्जा का स्रोत (Sun’s Structure and Source of Energy)

2. ऊर्जा का स्थानांतरण और विकिरण (Energy Transfer and Radiation)

3. सूर्यातप: ऊर्जा का पृथ्वी तक पहुँचना (Insolation: Reaching the Earth)

अतिरिक्त महत्वपूर्ण अवधारणाएँ

निष्कर्ष:

संक्षेप में, सूर्यातप का स्रोत है सूर्य का केंद्र, जहाँ नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया द्वारा हाइड्रोजन हीलियम में परिवर्तित होती है, जिससे ऊर्जा की अपार मात्रा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा लघु तरंग विद्युत चुम्बकीय विकिरण (Shortwave Electromagnetic Radiation) के रूप में सूर्य की सतह (प्रकाशमंडल) से निकलकर अंतरिक्ष में यात्रा करती है और पृथ्वी तक पहुँचती है। यह प्रक्रिया ही पृथ्वी पर सभी जीवन और जलवायु प्रणालियों को संचालित करती है।


सूर्यातप का वितरण (Distribution of Insolation)

सूर्यातप (Insolation), यानी सूर्य से पृथ्वी की सतह तक पहुँचने वाली सौर ऊर्जा, पूरे ग्रह पर समान रूप से वितरित नहीं होती है। यह असमान वितरण ही पृथ्वी पर विभिन्न तापमान क्षेत्रों (Temperature Zones), वायुदाब पेटियों (Pressure Belts), पवनों (Winds) और अंततः विविध जलवायु प्रदेशों का मूल कारण है। सूर्यातप का वितरण मुख्य रूप से अक्षांशीय (Latitudinal), मौसमी (Seasonal) और स्थानीय कारकों से नियंत्रित होता है।

सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

सूर्यातप का अक्षांशीय वितरण (Latitudinal Distribution of Insolation)

अतिरिक्त महत्वपूर्ण अवधारणा: ऊष्मा अधिशेष और ऊष्मा घाटा (Heat Surplus and Heat Deficit)

Note-अधिकतम सुर्यताप प्राप्त करने वाली तापीय अक्षांश रेखा भूमध्य रेखा पर न होकर 20 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर होता है.


2. पृथ्वी का ऊष्मा बजट (Heat Budget of the Earth)

ऊष्मा बजट पृथ्वी और उसके वायुमंडल द्वारा प्राप्त ऊष्मा और उत्सर्जित ऊष्मा का लेखा-जोखा है। पृथ्वी एक स्थिर तापमान बनाए रखती है क्योंकि यह लघु तरंगों के रूप में जितनी ऊर्जा सूर्य से प्राप्त करती है, उतनी ही ऊर्जा दीर्घ तरंगों (पार्थिव विकिरण) के रूप में अंतरिक्ष में वापस उत्सर्जित कर देती है।

मान लीजिए कि वायुमंडल के शीर्ष पर प्राप्त कुल सौर ऊर्जा 100 इकाई है:

पृथ्वी जो 51 इकाइयाँ अवशोषित करती है, उसे वह दीर्घ तरंगों के रूप में वापस उत्सर्जित करती है।

ऊष्मा का अंतिम संतुलन:

आने वाली ऊर्जा (Shortwave)जाने वाली ऊर्जा (Longwave)
पृथ्वी की सतह पर 51 इकाइयाँपृथ्वी से उत्सर्जन: 17 इकाइयाँ (अंतरिक्ष में)
वायुमंडल में 14 इकाइयाँवायुमंडल से उत्सर्जन: 48 इकाइयाँ (अंतरिक्ष में)
कुल आने वाली प्रभावी ऊर्जा = 65कुल जाने वाली ऊर्जा = 17 + 48 = 65

इस प्रकार, 65 इकाइयाँ आईं और 65 इकाइयाँ चली गईं, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान स्थिर बना रहता है।

महत्व (Importance)

  1. जीवन के लिए ऊर्जा: सूर्यातप ही पृथ्वी पर जीवन (पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण) और ऊर्जा का एकमात्र स्रोत है।
  2. जलवायु और मौसम का चालक: सूर्यातप में भिन्नता के कारण ही वायुदाब में अंतर, पवनों का चलना, महासागरीय धाराओं का प्रवाह और संपूर्ण जल चक्र संचालित होता है।
  3. तापमान का संतुलन: ऊष्मा बजट यह सुनिश्चित करता है कि पृथ्वी न तो लगातार गर्म हो रही है और न ही लगातार ठंडी, जिससे जीवन के लिए एक स्थिर वातावरण बना रहता है।
  4. जलवायु परिवर्तन का संदर्भ: मानव गतिविधियों (ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन) के कारण ऊष्मा बजट का संतुलन बिगड़ रहा है, क्योंकि पार्थिव विकिरण (Outgoing radiation) वायुमंडल में अधिक मात्रा में फंस रही है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग हो रही है। [UPSC Mains]

[आरेख: एक सरल चित्र जिसमें 100 इकाई सौर ऊर्जा का आगमन, बादलों और सतह से 35 इकाई का परावर्तन (एल्बिडो), 14 इकाई का वायुमंडल द्वारा और 51 इकाई का सतह द्वारा अवशोषण दिखाया जाए। फिर 51 इकाई पार्थिव विकिरण और अंत में कुल 65 इकाई के उत्सर्जन को तीरों के माध्यम से दर्शाया जाए।]



एल्बिडो (Albedo)

परिभाषा:
एल्बिडो किसी भी सतह की सौर विकिरण को परावर्तित करने की क्षमता का माप है। सरल शब्दों में, यह बताता है कि किसी सतह पर पड़ने वाली कुल सूर्य की रोशनी का कितना प्रतिशत हिस्सा वह बिना अवशोषित (Absorb) किए वापस अंतरिक्ष में भेज देती है।

इसे आमतौर पर प्रतिशत (%) या दशमलव (Decimal) में व्यक्त किया जाता है।

उदाहरण:

पृथ्वी का एल्बिडो (Earth’s Albedo)

पृथ्वी का औसत एल्बिडो लगभग 30% से 35% है। ऊष्मा बजट के मानक मॉडल में, इसे अक्सर 35 इकाई (100 में से) माना जाता है, जिसका अर्थ है कि पृथ्वी को गर्म करने से पहले ही सूर्य की कुल ऊर्जा का लगभग एक-तिहाई हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाता है।

यह 35% योगदान तीन मुख्य स्रोतों से आता है:

  1. बादलों से परावर्तन: लगभग 27%
  2. धूलकणों द्वारा प्रकीर्णन: लगभग 6%
  3. पृथ्वी की सतह (बर्फ, भूमि, जल) से परावर्तन: लगभग 2%

विभिन्न सतहों का एल्बिडो (Albedo of Different Surfaces)

विभिन्न सतहों की परावर्तन क्षमता बहुत भिन्न होती है, जो पृथ्वी के स्थानीय और वैश्विक तापमान को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है।

सतह का प्रकारएल्बिडो (%)विशेषताएँ और महत्व
ताजा बर्फ (Fresh Snow)80 – 95%⋆ प्राकृतिक सतहों में सर्वाधिक एल्बिडो। यह लगभग सारी धूप को परावर्तित कर देती है, जिससे ध्रुवीय क्षेत्र ठंडे बने रहते हैं। [UPSC Prelims – Conceptual]
पुराना हिम (Old/Melting Snow)40 – 70%जैसे-जैसे बर्फ पुरानी और मैली होती है, उसका एल्बिडो घटता है और वह अधिक गर्मी सोखने लगती है।
बादल (Clouds)40 – 90% (मोटाई के अनुसार)घने, मोटे बादल अधिक परावर्तक होते हैं (दिन में सतह को ठंडा रखते हैं)। पतले बादल कम परावर्तक होते हैं।
मरुस्थल (रेत) (Desert Sand)35 – 45%हल्की रंग की रेत सौर विकिरण को काफी हद तक परावर्तित करती है।
घास के मैदान (Grasslands)25 – 30%
फसलें (Crops)15 – 25%
जंगल (Forest)10 – 20%⋆ कम एल्बिडो। गहरे रंग की वनस्पति और ऊबड़-खाबड़ सतह के कारण जंगल सौर ऊर्जा के बहुत अच्छे अवशोषक होते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक है।
जल (महासागर, झीलें)10% से कम (जब सूर्य सीधे ऊपर हो)⋆ प्राकृतिक सतहों में सबसे कम एल्बिडो में से एक। गहरे रंग का पानी अधिकांश सौर ऊर्जा को सोख लेता है। [UPPSC]
डामर/एस्फाल्ट (Asphalt)5 – 10%अत्यंत कम एल्बिडो। शहरी क्षेत्र (सड़कें, इमारतें) बहुत अधिक ऊष्मा सोखते हैं, जो ‘शहरी ऊष्मा द्वीप’ (Urban Heat Island) प्रभाव का एक मुख्य कारण है।
काली मिट्टी (Black Soil)8 – 12%कम एल्बिडो के कारण यह जल्दी गर्म होती है।

एल्बिडो का महत्व (Importance of Albedo)

  1. पृथ्वी के ऊष्मा बजट और तापमान का नियंत्रक:
    • एल्बिडो यह निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि पृथ्वी की सतह और वायुमंडल कितना गर्म होगा। यदि पृथ्वी का एल्बिडो बढ़ता है (जैसे ध्रुवीय बर्फ के विस्तार से), तो पृथ्वी ठंडी हो जाएगी। यदि एल्बिडो घटता है (जैसे बर्फ के पिघलने से), तो पृथ्वी अधिक गर्म होगी।
  2. सकारात्मक प्रतिक्रिया तंत्र (Positive Feedback Loops):
    • ⋆ जलवायु परिवर्तन में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
    • आइस-एल्बिडो फीडबैक (Ice-Albedo Feedback): ग्लोबल वार्मिंग के कारण ध्रुवीय बर्फ पिघल रही है। बर्फ (उच्च एल्बिडो) की जगह गहरा महासागरीय जल (निम्न एल्बिडो) ले रहा है। यह गहरा जल अधिक सौर ऊर्जा सोखता है, जिससे और अधिक वार्मिंग होती है, और इससे और अधिक बर्फ पिघलती है। यह एक खतरनाक सकारात्मक प्रतिक्रिया चक्र (Positive Feedback Loop) है जो ग्लोबल वार्मिंग को तेज करता है। [UPSC Mains – Environment Section]
  3. स्थानीय जलवायु पर प्रभाव:
    • जंगलों की कटाई (Deforestation) से भूमि का एल्बिडो बढ़ जाता है (क्योंकि मिट्टी जंगल से अधिक परावर्तक होती है), जिससे स्थानीय शीतलन हो सकता है लेकिन वर्षा के पैटर्न में भी बदलाव आ सकता है।
    • शहरीकरण (Urbanization) से सड़कों और इमारतों के निर्माण के कारण क्षेत्र का औसत एल्बिडो कम हो जाता है, जिससे ‘शहरी ऊष्मा द्वीप’ (Urban Heat Island) बनते हैं, जहाँ शहर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक गर्म होते हैं।
  4. कृषि में भूमिका:
    • खेतों में लगी फसलों का एल्बिडो भी ऊर्जा संतुलन को प्रभावित करता है। हल्की रंग की मिट्टी (उच्च एल्बिडो) पौधों की जड़ों को ठंडा रख सकती है, जबकि गहरी मिट्टी (कम एल्बिडो) बीजों के अंकुरण के लिए अधिक ऊष्मा प्रदान कर सकती है।

निष्कर्ष: एल्बिडो एक साधारण सी लगने वाली अवधारणा है, लेकिन यह पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को नियंत्रित करने वाले सबसे शक्तिशाली कारकों में से एक है। यह पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन, जलवायु परिवर्तन के फीडबैक तंत्र और स्थानीय मौसम पैटर्न को गहराई से प्रभावित करता है।


प्रसिद्ध जलवायु विज्ञानी ग्लेन टी. त्रेवार्था (Glenn T. Trewartha) के ऊष्मा बजट के विश्लेषण का उल्लेख कर रहे हैं। त्रेवार्था का ऊष्मा बजट का विवरण मानक ऊष्मा बजट मॉडल का ही एक सरलीकृत और स्पष्ट संस्करण है, जिसे समझने में आसानी होती है। यह अक्सर अकादमिक भूगोल की किताबों में छात्रों को अवधारणा समझाने के लिए उपयोग किया जाता है।

यहाँ जी. टी. त्रेवार्था के दृष्टिकोण के अनुसार पृथ्वी के ऊष्मा बजट का चरण-दर-चरण विश्लेषण प्रस्तुत है।


जी. टी. त्रेवार्था के अनुसार पृथ्वी का ऊष्मा बजट (Heat Budget according to G. T. Trewartha)

त्रेवार्था का मॉडल भी यह मानकर चलता है कि वायुमंडल के शीर्ष पर सूर्य से प्राप्त कुल सौर ऊर्जा 100 इकाई (Units) है। इस 100 इकाई ऊर्जा का पृथ्वी के वायुमंडल और सतह के साथ क्या होता है, इसका लेखा-जोखा ही ऊष्मा बजट है।

भाग 1: आने वाली सौर ऊर्जा (सूर्यातप) का लेखा-जोखा (Incoming Solar Radiation – Shortwave)

वायुमंडल में प्रवेश करने वाली 100 इकाई ऊर्जा पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से पहले ही विभाजित हो जाती है:

सारांश (इनकमिंग):


भाग 2: बाहर जाने वाली ऊर्जा (पार्थिव विकिरण) का लेखा-जोखा (Outgoing Terrestrial Radiation – Longwave)

अब पृथ्वी और वायुमंडल इन 65 इकाइयों को वापस अंतरिक्ष में उत्सर्जित करके ऊष्मा का संतुलन बनाते हैं। यह उत्सर्जन दीर्घ तरंग विकिरण (Longwave Radiation) के रूप में होता है।


ऊष्मा बजट का अंतिम संतुलन (Final Balance)

त्रेवार्था के मॉडल के अनुसार:

कुल बाहर जाने वाली ऊर्जा = 17 + 48 = 65 इकाइयाँ

प्राप्त ऊर्जा (IN)वापस गई ऊर्जा (OUT)
कुल 65 इकाइयाँकुल 65 इकाइयाँ

संतुलन: प्राप्त ऊर्जा (65) = वापस गई ऊर्जा (65)

इस प्रकार, पृथ्वी के ऊष्मा बजट में एक पूर्ण संतुलन बना रहता है, जिसके कारण पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान स्थिर रहता है।

त्रेवार्था के मॉडल का महत्व

त्रेवार्था का मॉडल इस बात पर विशेष जोर देता है:

  1. वायुमंडल की भूमिका: यह स्पष्ट करता है कि वायुमंडल सूर्य से सीधे गर्म होने की बजाय नीचे से, यानी पृथ्वी की सतह से निकलने वाली दीर्घ तरंग विकिरण से अधिक गर्म होता है। (वायुमंडल ने सूर्य से केवल 14 इकाइयाँ लीं, जबकि पृथ्वी से 34 इकाइयाँ)।
  2. ग्रीनहाउस प्रभाव: यह मॉडल ग्रीनहाउस प्रभाव के तंत्र को दिखाता है – कैसे वायुमंडल पृथ्वी की ऊष्मा (34 इकाइयों) को सोखता है और उसे गर्म रखता है।
  3. गुप्त ऊष्मा का महत्व: यह संघनन (बादल बनने) की प्रक्रिया में गुप्त ऊष्मा के रूप में ऊर्जा के स्थानांतरण की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है, जो वायुमंडल के तापन का एक प्रमुख स्रोत है (19 इकाइयाँ)।

सूर्यातप और ताप बजट: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts for Exams)

सूर्यातप (Insolation) से संबंधित तथ्य

  1. ऊर्जा का स्रोत: पृथ्वी पर लगभग समस्त ऊर्जा का स्रोत सूर्य है।
  2. सूर्य की ऊर्जा का स्रोत: सूर्य के केंद्र में होने वाली नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया, जिसमें हाइड्रोजन हीलियम में बदलता है। [UPSC, BPSC, SSC]
  3. ऊर्जा का स्वरूप: सूर्य से आने वाली ऊर्जा लघु तरंग विकिरण (Shortwave Radiation) के रूप में होती है।
  4. सर्वाधिक सूर्यातप वाला क्षेत्र: सर्वाधिक सूर्यातप उष्णकटिबंधीय मरुस्थलों में प्राप्त होता है, क्योंकि वहाँ आसमान साफ रहता है, न कि भूमध्य रेखा पर (जहाँ बादल छाए रहते हैं)। [UPSC – Conceptual Fact]
  5. न्यूनतम सूर्यातप वाला क्षेत्र: ध्रुवीय क्षेत्रों में न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त होता है।
  6. मुख्य नियंत्रक कारक: किसी स्थान पर सूर्यातप की मात्रा को नियंत्रित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक सूर्य की किरणों का आपतन कोण (Angle of Incidence) है।
  7. उपसौर (Perihelion): 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है, जिससे उसे थोड़ा अधिक सूर्यातप मिलता है।
  8. अपसौर (Aphelion): 4 जुलाई को पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है, जिससे उसे थोड़ा कम सूर्यातप मिलता है।
  9. सौर स्थिरांक (Solar Constant): वायुमंडल के शीर्ष पर प्रति इकाई क्षेत्रफल प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा (लगभग 1.94 कैलोरी/सेमी²/मिनट)।
  10. समताप रेखाएँ (Isotherms): मानचित्र पर समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाएँ।

ताप बजट (Heat Budget) और एल्बिडो (Albedo) से संबंधित तथ्य

  1. पृथ्वी का ऊष्मा स्रोत: पृथ्वी की सतह मुख्य रूप से लघु तरंग सौर विकिरण से गर्म होती है, जबकि वायुमंडल मुख्य रूप से दीर्घ तरंग पार्थिव विकिरण (Longwave Terrestrial Radiation) से गर्म होता है (यानी नीचे से गर्म होता है)। [UPSC/State PSC – Core Concept]
  2. पृथ्वी का एल्बिडो: पृथ्वी का औसत एल्बिडो लगभग 30-35% है, जिसका अर्थ है कि लगभग एक-तिहाई सौर ऊर्जा बिना पृथ्वी को गर्म किए वापस अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती है। [UPPSC]
  3. सर्वाधिक एल्बिडो: प्राकृतिक सतहों में सबसे अधिक एल्बिडो ताजा बर्फ (Fresh Snow) का होता है (~90%)।
  4. न्यूनतम एल्बिडो: सबसे कम एल्बिडो गहरे महासागरीय जल का होता है (~10% से कम)।
  5. बादलों का योगदान: पृथ्वी के कुल एल्बिडो में सर्वाधिक योगदान बादलों का है।
  6. आइस-एल्बिडो फीडबैक: ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ का पिघलना, जिससे एल्बिडो कम होता है और पृथ्वी और अधिक गर्म होती है—यह एक सकारात्मक प्रतिक्रिया चक्र (Positive Feedback Loop) है। [UPSC Mains – Environment]
  7. गुप्त ऊष्मा (Latent Heat): वाष्पीकरण द्वारा जल ऊर्जा सोखता है और संघनन (बादल बनने) के दौरान वायुमंडल में उस ऊष्मा को मुक्त कर देता है। यह ऊष्मा बजट में ऊर्जा स्थानांतरण का एक प्रमुख तरीका है।
  8. ऊष्मा अधिशेष क्षेत्र: मोटे तौर पर, 35°N से 35°S अक्षांशों के बीच पृथ्वी ऊष्मा अधिशेष (Heat Surplus) की स्थिति में रहती है।
  9. ऊष्मा घाटा क्षेत्र: 35° अक्षांशों से ध्रुवों की ओर पृथ्वी ऊष्मा घाटे (Heat Deficit) की स्थिति में रहती है।
  10. ऊष्मा का संतुलन: ऊष्मा अधिशेष और घाटे के बीच के इस असंतुलन को पवनें (Winds) और महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents) संतुलित करती हैं। [UPSC Mains]

तापमान व्युत्क्रमण (Temperature Inversion) से संबंधित तथ्य

  1. परिभाषा: क्षोभमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटने के बजाय बढ़ने की स्थिति।
  2. प्रमुख प्रभाव: इसके कारण वायुमंडलीय स्थिरता बढ़ती है और कोहरे (Fog) तथा स्मॉग (Smog) की स्थिति उत्पन्न होती है।
  3. आदर्श दशाएँ: लंबी और ठंडी रातें, साफ आसमान, और शांत वायु।

यह क्विक फैक्ट्स लिस्ट आपको अंतिम समय में रिवीजन करने और सीधे पूछे जाने वाले वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करने में बहुत मदद करेगी।


वायुमंडल का तापन और शीतलन (Heating and Cooling of the Atmosphere)

वायुमंडल सूर्य से सीधे आने वाली ऊर्जा (सूर्यातप) से बहुत कम गर्म होता है। वास्तव में, वायुमंडल मुख्य रूप से अप्रत्यक्ष रूप से और नीचे से ऊपर की ओर गर्म होता है। ऊष्मा का यह स्थानांतरण चार प्रमुख प्रक्रियाओं द्वारा संपन्न होता है: विकिरण, चालन, संवहन, और अभिवहन।

1. विकिरण (Radiation)

परिभाषा:
विकिरण ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया है जिसमें ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय तरंगों (Electromagnetic Waves) के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना किसी माध्यम के भी यात्रा कर सकती है। सूर्य से पृथ्वी तक ऊर्जा इसी प्रक्रिया से पहुँचती है।

2. चालन (Conduction)

परिभाषा:
चालन ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया है जिसमें ऊष्मा एक वस्तु के कणों से दूसरे कणों में सीधे संपर्क (Direct Contact) द्वारा स्थानांतरित होती है, बिना कणों के स्वयं स्थानांतरित हुए।

3. संवहन (Convection)

परिभाषा:
संवहन ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया है जो तरल पदार्थों और गैसों में होती है, जिसमें पदार्थ के कण स्वयं ऊर्ध्वाधर (Vertical) रूप से स्थानांतरित होकर ऊष्मा का परिवहन करते हैं।

[आरेख: एक सरल चित्र जिसमें पृथ्वी की सतह को दिखाया गया हो। सतह के पास चालन, फिर गर्म हवा का ऊपर उठना और ठंडी हवा का नीचे आना (संवहन), और हवा का समानांतर बहना (अभिवहन) तीरों के माध्यम से दर्शाया गया हो।]

4. अभिवहन (Advection)

परिभाषा:
अभिवहन ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया है जिसमें वायु के क्षैतिज (Horizontal) संचलन द्वारा ऊष्मा का एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानांतरण होता है।


चारों प्रक्रियाओं का तुलनात्मक सारांश

प्रक्रियाऊष्मा स्थानांतरण की दिशामाध्यमवायुमंडल में भूमिका और महत्वउदाहरण
विकिरण (Radiation)तरंगों के रूप में (सभी दिशाओं में)बिना माध्यम के भी संभववायुमंडल को गर्म करने का मूल आधार। पार्थिव विकिरण से वायुमंडल का मुख्य तापन।सूर्य से ऊर्जा का आना, पृथ्वी से ऊष्मा का उत्सर्जन।
चालन (Conduction)संपर्क द्वारा कण-से-कणमुख्य रूप से ठोस (गैसों में बहुत कम)नगण्य। केवल सतह के संपर्क वाली वायु की निचली परत को गर्म करता है।गर्म तवे को छूने से हाथ का जलना।
संवहन (Convection)ऊर्ध्वाधर (Vertical)तरल और गैसक्षोभमंडल में ऊष्मा के लंबवत वितरण का मुख्य तरीका। बादल निर्माण, वर्षा।पानी का उबलना।
अभिवहन (Advection)क्षैतिज (Horizontal)तरल और गैसमौसम में दैनिक परिवर्तन का मुख्य कारण। तापमान का क्षैतिज वितरण।लू, शीतलहर, समुद्री धाराएँ।

निष्कर्ष:
वायुमंडल का तापन एक जटिल प्रक्रिया है। इसकी शुरुआत विकिरण से होती है जब सतह गर्म होती है। चालन इस ऊष्मा को सतह से वायु की पहली परत में भेजता है। संवहन इस ऊष्मा को ऊपर की ओर वितरित करता है और अभिवहन इसे क्षैतिज रूप से पूरे ग्रह पर फैलाता है, जिससे पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों का मौसम और जलवायु निर्धारित होता है।


वायुमंडलीय दबाव और पवनें: वायुदाब पेटियाँ (Atmospheric Pressure and Winds: Pressure Belts)

वायुमंडलीय दबाव या वायुदाब पृथ्वी की सतह पर उसके ऊपर स्थित वायु के स्तंभ के भार के कारण पड़ने वाला दबाव है। वायुदाब स्थान और समय के साथ बदलता रहता है और यह पवनों के चलने तथा मौसम प्रणालियों के विकास का मूल कारण है। पवनें हमेशा उच्च वायुदाब (High Pressure) वाले क्षेत्रों से निम्न वायुदाब (Low Pressure) वाले क्षेत्रों की ओर चलती हैं।

वायुदाब का मापन और वितरण


वायुदाब का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Atmospheric Pressure)

वायुदाब का क्षैतिज वितरण से तात्पर्य पृथ्वी की सतह पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर, विशेषकर अक्षांशों के साथ, वायुदाब में पाए जाने वाले अंतर से है। यह वितरण स्थिर नहीं है, बल्कि समय और स्थान के साथ बदलता रहता है। वायुदाब का यही क्षैतिज अंतर पवनों की उत्पत्ति और दिशा का मूल कारण है।

वायुदाब के क्षैतिज वितरण का अध्ययन समदाब रेखाओं (Isobars) के माध्यम से किया जाता है।

समदाब रेखाएँ (Isobars)

वायुदाब के क्षैतिज वितरण को नियंत्रित करने वाले कारक

  1. तापमान (Temperature):
    • ⋆ यह वायुदाब के वितरण को नियंत्रित करने वाला सबसे प्रमुख कारक है। तापमान और वायुदाब के बीच व्युत्क्रमानुपाती (Inverse) संबंध होता है।
    • गर्म क्षेत्र: हवा गर्म होकर फैलती है और ऊपर उठती है, जिससे निम्न वायुदाब (Low Pressure) बनता है (जैसे भूमध्य रेखा)।
    • ठंडे क्षेत्र: हवा ठंडी होकर सिकुड़ती है और नीचे बैठती है, जिससे उच्च वायुदाब (High Pressure) बनता है (जैसे ध्रुव)।
  2. पृथ्वी का घूर्णन (Earth’s Rotation):
    • पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न गत्यात्मक प्रभाव (Dynamic effects) भी वायुदाब पेटियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, खासकर उपोष्ण और उपध्रुवीय क्षेत्रों में। घूर्णन हवा को विक्षेपित करता है, जिससे कुछ अक्षांशों पर हवा जमा होती है (उच्च दाब) और कुछ से हट जाती है (निम्न दाब)।
  3. जलवाष्प (Water Vapour):
    • आर्द्र हवा (जिसमें जलवाष्प होती है) शुष्क हवा की तुलना में हल्की होती है, क्योंकि जल (H₂O) का अणु भार नाइट्रोजन (N₂) और ऑक्सीजन (O₂) के औसत अणु भार से कम होता है।
    • इसलिए, जिन क्षेत्रों में आर्द्रता अधिक होती है, वहाँ वायुदाब कम होता है (जैसे भूमध्यरेखीय क्षेत्र)।
  4. जल और स्थल का असमान वितरण (Uneven Distribution of Land and Water):
    • स्थल की तुलना में जल देर से गर्म होता है और देर से ठंडा होता है। इस तापीय भिन्नता के कारण महाद्वीपों और महासागरों पर वायुदाब का वितरण अलग-अलग होता है।
    • उत्तरी गोलार्ध: यहाँ स्थल भाग अधिक है, इसलिए वायुदाब पेटियाँ एक सतत (Continuous) बेल्ट के रूप में नहीं पाई जातीं। ये अलग-अलग उच्च और निम्न दाब के केंद्रों (Cells) में टूट जाती हैं।
      • सर्दियों में: महाद्वीप महासागरों से अधिक ठंडे होते हैं, इसलिए महाद्वीपों पर उच्च दाब (जैसे साइबेरियन हाई) और महासागरों पर निम्न दाब (जैसे आइसलैंडिक लो) का निर्माण होता है।
      • गर्मियों में: इसका विपरीत होता है; महाद्वीपों पर निम्न दाब और महासागरों पर उच्च दाब।
    • दक्षिणी गोलार्ध: यहाँ जल भाग अधिक है, इसलिए वायुदाब पेटियाँ अधिक नियमित और सतत होती हैं।

वायुदाब का वैश्विक क्षैतिज वितरण: वायुदाब पेटियाँ

वैश्विक स्तर पर, वायुदाब का क्षैतिज वितरण सात प्रमुख पेटियों (Belts) में संगठित है। यह एक आदर्श और सरलीकृत मॉडल है जो यह मानता है कि पृथ्वी की सतह पूरी तरह से समान है।

यह आदर्श पैटर्न वायुदाब पेटियों के मौसमी खिसकाव और स्थल-जल के वितरण के कारण वास्तविक दुनिया में संशोधित हो जाता है, जिससे मौसम और जलवायु में जटिलता आती है।

परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु:


विश्व की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ (Major Pressure Belts of the World)

पृथ्वी पर वायुदाब का वितरण एक व्यवस्थित पैटर्न का अनुसरण करता है, जो अक्षांशों के साथ बदलता है। इस पैटर्न के परिणामस्वरूप, ग्लोब पर कुल सात (7) वायुदाब पेटियों का विकास हुआ है, जो भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक फैली हैं।

इन पेटियों का निर्माण तापमान (Thermal Factors) और पृथ्वी के घूर्णन (Dynamic Factors) के संयुक्त प्रभाव से होता है।

[आरेख: पृथ्वी का एक ग्लोब जिसमें भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक सभी सात वायुदाब पेटियों (निम्न-उच्च-निम्न-उच्च) और उनसे संबंधित पवनों (व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय) की दिशाओं को दर्शाया गया हो।]

A. तापीय पेटियाँ (Thermally Induced Belts)

इनका निर्माण सीधे तौर पर सूर्य के ताप से होता है।

B. गत्यात्मक पेटियाँ (Dynamically Induced Belts)

इनका निर्माण मुख्य रूप से पृथ्वी के घूर्णन (Rotation of Earth) और उससे उत्पन्न होने वाले अभिकेन्द्रीय बल तथा वायु के अवरोहण (उतरने) या आरोहण (उठने) के कारण होता है, न कि सीधे तापमान से।

C. तापीय पेटियाँ (Thermally Induced Belts)

सभी वायुदाब पेटियों का सारांश

पेटी का नामगोलार्धअक्षांशनिर्माण का कारणउपनाम/महत्वपूर्ण तथ्य
भूमध्यरेखीय निम्न0° – 5°तापीय (Thermal)डोलड्रम्स / शांत पेटी
उपोष्ण उच्चउत्तरी & दक्षिणी30° – 35°गत्यात्मक (Dynamic)अश्व अक्षांश / मरुस्थलों का क्षेत्र
उपध्रुवीय निम्नउत्तरी & दक्षिणी60° – 65°गत्यात्मक (Dynamic)तूफानी मौसम / वाताग्र निर्माण का क्षेत्र
ध्रुवीय उच्चउत्तरी & दक्षिणी80° – 90°तापीय (Thermal)बर्फीला क्षेत्र / स्थायी उच्च दाब

वायुदाब पेटियों का खिसकाव (Shifting of Pressure Belts):
ये वायुदाब पेटियाँ स्थिर नहीं हैं। वे सूर्य के उत्तरायण (Summer Solstice) और दक्षिणायन (Winter Solstice) की स्थिति के साथ-साथ लगभग 5° से 10° अक्षांश तक उत्तर और दक्षिण की ओर खिसकती हैं। इसी खिसकाव के कारण भूमध्यसागरीय जलवायु (Mediterranean Climate) जैसी मौसमी जलवायु का निर्माण होता है। [UPSC Mains]


बैरोमीटर (Barometer)

परिभाषा:
बैरोमीटर (ग्रीक शब्द ‘Baros’ अर्थात ‘भार’ और ‘Metron’ अर्थात ‘माप’) वह वैज्ञानिक उपकरण है जिसका उपयोग किसी विशेष स्थान पर वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) या वायुदाब को मापने के लिए किया जाता है। वायुदाब वह बल है जो पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा उसके नीचे की सतह पर लगाया जाता है।

यह उपकरण मौसम विज्ञान (Meteorology) में एक मूलभूत और अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि वायुदाब में होने वाले परिवर्तन मौसम में आने वाले बदलावों का एक प्रमुख संकेतक होते हैं।

आविष्कार और मूल सिद्धांत

बैरोमीटर के प्रकार (Types of Barometer)

मौसम पूर्वानुमान में बैरोमीटर का उपयोग

वायुदाब में होने वाले परिवर्तन आगामी मौसम का एक महत्वपूर्ण पूर्वानुमान देते हैं।

बैरोमीटर का पाठ्यांक (Reading)मौसम का पूर्वानुमानकारण
पारा तेजी से गिरता है (दाब कम होता है)तूफानी मौसम (Stormy Weather) का संकेत; आँधी और वर्षा की संभावना।निम्न दाब चक्रवातीय दशाओं और हवा के ऊपर उठने का सूचक है, जिससे बादल बनते हैं।
पारा धीरे-धीरे गिरता हैलंबी अवधि तक वर्षा की संभावना।निम्न दाब प्रणाली धीरे-धीरे क्षेत्र में स्थापित हो रही है।
पारा तेजी से बढ़ता है (दाब बढ़ता है)तूफानी मौसम के बाद साफ मौसम का संकेत, लेकिन हवाएँ तेज रह सकती हैं।उच्च दाब प्रणाली तेजी से आ रही है।
पारा धीरे-धीरे बढ़ता है या स्थिर रहता हैशांत, शुष्क और साफ मौसम (Calm & Fair Weather) की लंबी अवधि।उच्च दाब (प्रतिचक्रवातीय दशाएँ) का अर्थ है हवा का नीचे उतरना, जो बादलों के निर्माण को रोकता है।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य (Other Important Facts)


वायुदाब (Atmospheric Pressure) से संबंधित तथ्य

  1. मापन यंत्र: वायुमंडलीय दबाव बैरोमीटर (Barometer) से मापा जाता है।
  2. आविष्कारक: बैरोमीटर का आविष्कार इवेंजेलिस्टा टोरिसेली (Evangelista Torricelli) ने किया था।
  3. मापन की इकाई: वायुदाब की मानक इकाई मिलीबार (mb) या हेक्टोपास्कल (hPa) है।
  4. मानक वायुदाब: समुद्र तल पर औसत वायुदाब 1013.25 mb या 760 mm (76 cm) पारा स्तंभ के बराबर होता है।
  5. ऊँचाई के साथ संबंध: ऊँचाई बढ़ने पर वायुदाब हमेशा घटता है।
  6. तापमान के साथ संबंध: तापमान और वायुदाब में विपरीत/उल्टा (Inverse) संबंध होता है। (गर्म हवा = निम्न दाब, ठंडी हवा = उच्च दाब)।
  7. आर्द्रता के साथ संबंध: आर्द्र हवा (नम) शुष्क हवा से हल्की होती है, इसलिए आर्द्रता बढ़ने पर वायुदाब कम होता है।
  8. समदाब रेखा (Isobar): मानचित्र पर समान वायुदाब वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा।
  9. दाब प्रवणता (Pressure Gradient): जब समदाब रेखाएँ पास-पास होती हैं, तो दाब प्रवणता तीव्र होती है, जिससे तेज हवाएँ चलती हैं।

वायुदाब पेटियों (Pressure Belts) से संबंधित तथ्य

  1. कुल पेटियों की संख्या: पृथ्वी पर कुल सात (7) वायुदाब पेटियाँ हैं।
  2. तापीय रूप से प्रेरित पेटियाँ: भूमध्यरेखीय निम्न दाब पेटी और ध्रुवीय उच्च दाब पेटियाँ सीधे तौर पर तापमान से संबंधित हैं।
  3. गत्यात्मक रूप से प्रेरित पेटियाँ: उपोष्ण उच्च दाब पेटी और उपध्रुवीय निम्न दाब पेटियाँ पृथ्वी के घूर्णन और वायु के संचलन के कारण बनती हैं।
  4. डोलड्रम्स (Doldrums): भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब पेटी को ‘शांत पेटी’ या ‘डोलड्रम्स’ कहा जाता है। [UPPSC/BPSC]
  5. अश्व अक्षांश (Horse Latitudes): उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी (30°-35° अक्षांश) को ‘अश्व अक्षांश’ कहते हैं। [UPSC 2021, SSC]
  6. मरुस्थलों की अवस्थिति: विश्व के अधिकांश गर्म मरुस्थल उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी में महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर स्थित हैं।
  7. पेटियों का खिसकाव: सभी वायुदाब पेटियाँ सूर्य की स्थिति के साथ उत्तर और दक्षिण की ओर खिसकती हैं, जिससे भूमध्यसागरीय जैसी मौसमी जलवायु उत्पन्न होती है।

वायुमंडलीय पवनें: विश्व की पवनें (Atmospheric Winds: Winds of the World)

पवन उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों से निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों की ओर बहने वाली वायु की क्षैतिज गति है। पवनों का नाम उस दिशा के आधार पर रखा जाता है जहाँ से वे आती हैं, न कि जहाँ वे जाती हैं (जैसे, पछुआ पवनें पश्चिम से आती हैं)। पवनें पृथ्वी की सतह पर तापमान और आर्द्रता के पुनर्वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

पवनों की दिशा और गति को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors Controlling the Direction and Velocity of Winds)

पवन का प्रवाह कभी भी सीधा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर एक सरल रेखा में नहीं होता। पृथ्वी की सतह पर बहने वाली पवनों की दिशा और गति कई बलों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम होती है। मुख्य रूप से तीन बल पवनों को नियंत्रित करते हैं:

  1. दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force)
  2. कोरिओलिस बल (Coriolis Force)
  3. घर्षण बल (Frictional Force)

1. दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force – PGF)

2. कोरिओलिस बल (Coriolis Force)

3. घर्षण बल (Frictional Force)

बलों का संयुक्त प्रभाव: भूविक्षेपी पवनें (Geostrophic Winds)

[आरेख: एक चित्र जिसमें उच्च दाब से निम्न दाब की ओर PGF, उसके समकोण पर कोरिओलिस बल और इन दोनों के संतुलन से बहती भूविक्षेपी पवन को समदाब रेखाओं के समानांतर दिखाया गया हो।]

निष्कर्ष:
पृथ्वी पर पवनों का प्रवाह एक साधारण सीधी रेखा में नहीं होता, बल्कि यह एक जटिल नृत्य की तरह है जिसे तीन प्रमुख नर्तक – दाब प्रवणता, कोरिओलिस और घर्षण – नियंत्रित करते हैं। दाब प्रवणता पवनों को जन्म देती है, कोरिओलिस उनकी दिशा को मोड़ता है, और घर्षण उनकी गति को धीमा करता है, जिससे हमारे ग्रह पर पवनों का एक जटिल और गतिशील पैटर्न बनता है।


फेरेल का नियम (Ferrel’s Law)

फेरेल का नियम (Ferrel’s Law), जिसे 1856 में अमेरिकी मौसम विज्ञानी विलियम फेरेल (William Ferrel) द्वारा प्रतिपादित किया गया था, पृथ्वी की सतह पर गतिमान वस्तुओं (जैसे पवनें और महासागरीय धाराएँ) की दिशा में होने वाले विक्षेपण (Deflection) का वर्णन करता है। यह नियम मूल रूप से कोरिओलिस बल (Coriolis Force) के प्रभाव का एक व्यावहारिक अनुप्रयोग और कथन है।

नियम का कथन (Statement of the Law)

फेरेल के नियम के अनुसार:

“पृथ्वी के घूर्णन के कारण, कोई भी गतिमान वस्तु (जैसे पवन), उत्तरी गोलार्ध में अपनी गति की दिशा के दाईं ओर (to the right) और दक्षिणी गोलार्ध में अपनी गति की दिशा के बाईं ओर (to the left) विक्षेपित हो जाती है।”

सरल शब्दों में:

[आरेख: पृथ्वी के दो गोलार्ध दिखाए गए हों। उत्तरी गोलार्ध में एक सीधी रेखा के तीर को दाईं ओर मुड़ते हुए और दक्षिणी गोलार्ध में एक सीधी रेखा के तीर کو बाईं ओर मुड़ते हुए दर्शाया जाए। नीचे ‘कोरिओलिस बल / फेरेल का नियम’ लिखा हो।]

फेरेल के नियम का कारण: कोरिओलिस बल (The Cause: Coriolis Force)

फेरेल के नियम के पीछे का मूल कारण कोरिओलिस बल है, जो पृथ्वी के अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करने के कारण उत्पन्न होता है।

फेरेल के नियम के प्रभाव और उदाहरण (Effects and Examples of Ferrel’s Law)

यह नियम वैश्विक पवन प्रणालियों और महासागरीय धाराओं के पैटर्न को समझने के लिए मौलिक है।

  1. स्थायी पवनों का पैटर्न (Pattern of Planetary Winds):
    • व्यापारिक पवनें (Trade Winds): उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर सीधी जाने के बजाय, फेरेल के नियम के कारण ये उत्तर-पूर्वी (उत्तरी गोलार्ध में) और दक्षिण-पूर्वी (दक्षिणी गोलार्ध में) हो जाती हैं।
    • पछुआ पवनें (Westerlies): ये उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर सीधी न जाकर दक्षिण-पश्चिमी (उत्तरी गोलार्ध में) और उत्तर-पश्चिमी (दक्षिणी गोलार्ध में) हो जाती हैं।
  2. चक्रवातों और प्रतिचक्रवातों का परिसंचरण (Circulation of Cyclones and Anticyclones):
    • ⋆ चक्रवात (Cyclone – निम्न दाब केंद्र): कोरिओलिस बल के कारण, चक्रवात में हवाएँ सीधी केंद्र की ओर न जाकर:
      • उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के विपरीत (Anti-clockwise) घूमती हैं।
      • दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों की दिशा में (Clockwise) घूमती हैं।
    • ⋆ प्रतिचक्रवात (Anticyclone – उच्च दाब केंद्र): प्रतिचक्रवात में हवाएँ केंद्र से बाहर की ओर जाती हैं और उनका परिसंचरण चक्रवात के ठीक विपरीत होता है।
    • PYQ Link: “उत्तरी गोलार्ध में चक्रवातों में पवन परिसंचरण की दिशा क्या होती है?” [UPSC/BPSC Prelims]
  3. महासागरीय धाराओं का घूर्णन (Oceanic Gyres):
    • प्रमुख महासागरीय धाराएँ भी फेरेल के नियम से प्रभावित होती हैं। वे बंद लूप बनाती हैं जिन्हें गायर (Gyre) कहते हैं। ये गायर उत्तरी गोलार्ध में दक्षिणावर्त (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्ध में वामावर्त (Anti-clockwise) घूमते हैं।

फेरेल के नियम की सीमाएँ

निष्कर्ष:
फेरेल का नियम पृथ्वी पर बड़े पैमाने की गति (पवनें, धाराएँ) के व्यवहार को समझने के लिए एक सरल और शक्तिशाली नियम है। यह कोरिओलिस बल के प्रभाव को एक आसानी से याद रखने वाले प्रारूप में प्रस्तुत करता है, जो हमें वैश्विक पवन और महासागरीय परिसंचरण के पैटर्न की व्याख्या करने में मदद करता है।


पवनों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. स्थायी या भूमंडलीय पवनें (Permanent or Planetary Winds)

स्थायी या भूमंडलीय पवनें वे पवनें हैं जो पृथ्वी के विस्तृत क्षेत्र पर वर्ष भर लगभग एक ही दिशा में, एक निश्चित वायुदाब पेटी से दूसरी निश्चित वायुदाब पेटी की ओर चलती हैं। इनका नाम “भूमंडलीय (Planetary)” इसलिए है क्योंकि ये पूरे ग्लोब को घेरती हैं और इनका निर्माण पृथ्वी के घूर्णन और सूर्य के ताप के वैश्विक वितरण के कारण होता है। ये पवनें पृथ्वी पर ऊष्मा और आर्द्रता के स्थानांतरण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

स्थायी पवनें तीन प्रकार की होती हैं:

  1. व्यापारिक पवनें (Trade Winds)
  2. पछुआ पवनें (Westerlies)
  3. ध्रुवीय पूर्वी पवनें (Polar Easterlies)

[आरेख: पृथ्वी का एक ग्लोब जिसमें सभी सात वायुदाब पेटियों को दर्शाया गया हो। उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर चलती व्यापारिक पवनें, उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलती पछुआ पवनें, और ध्रुवीय उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलती ध्रुवीय पूर्वी पवनों को उनकी सही विक्षेपित दिशाओं के साथ तीरों से दिखाया जाए।]


A. व्यापारिक पवनें या सन्मार्गी पवनें (Trade Winds or Easterlies)


B. पछुआ पवनें (Westerlies)


C. ध्रुवीय पूर्वी पवनें (Polar Easterlies)


2. मौसमी पवनें (Seasonal Winds)

मौसमी पवनें वे पवनें होती हैं जो वर्ष की अलग-अलग ऋतुओं के अनुसार अपनी दिशा को उलट (Reverse) लेती हैं। इन पवनों का निर्माण बड़े भू-भागों (महाद्वीपों) और विशाल जलराशियों (महासागरों) के बीच विभेदी तापन (Differential Heating and Cooling) के कारण होता है। चूँकि स्थल और जल के गर्म और ठंडा होने की दर अलग-अलग होती है, इसलिए ऋतु परिवर्तन के साथ उनके ऊपर मौजूद वायुदाब की स्थिति भी बदल जाती है, जिससे पवनों की दिशा में बड़े पैमाने पर मौसमी उलटफेर होता है।

इस प्रकार की पवन प्रणाली का सबसे उत्कृष्ट और बड़े पैमाने का उदाहरण मानसूनी पवनें (Monsoon Winds) हैं।

मानसूनी पवनें (Monsoon Winds)

‘मॉनसून’ शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ (Mausim) से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘ऋतु’ (Season)। ऐतिहासिक रूप से, यह उन पवनों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया गया था जो हिंद महासागर और अरब सागर पर चलती हैं और वर्ष में दो बार अपनी दिशा पूरी तरह से उलट लेती हैं।

मानसून की उत्पत्ति एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई कारक शामिल होते हैं, लेकिन इसका मूल आधार स्थल और जल का विभेदी तापन है।

[आरेख: भारत के दो मानचित्र। पहला ग्रीष्मकालीन मानसून को दर्शाए, जिसमें हिंद महासागर (उच्च दाब) से दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थल (निम्न दाब) की ओर जाती नमी भरी हवाएँ दिखाई गई हों। दूसरा शीतकालीन मानसून को दर्शाए, जिसमें स्थल (उच्च दाब) से उत्तर-पूर्व दिशा में समुद्र (निम्न दाब) की ओर जाती शुष्क हवाएँ और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर तमिलनाडु में वर्षा करते हुए दिखाया गया हो।]

हालांकि भारतीय मानसून सबसे प्रसिद्ध है, मानसून-प्रकार की पवनें विश्व के अन्य हिस्सों में भी पाई जाती हैं, जहाँ बड़े स्थल और जल निकायों के बीच मौसमी तापमान में महत्वपूर्ण अंतर होता है।

निष्कर्ष:
मौसमी पवनें एक बड़े पैमाने की समीर प्रणाली (Land and Sea Breeze on a large scale) की तरह हैं, जो ऋतुओं के अनुसार अपनी दिशा बदलती हैं। मानसूनी पवनें इस प्रणाली का सबसे प्रभावशाली उदाहरण हैं, जो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की जलवायु, कृषि, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को गहराई से प्रभावित करती हैं।


3. स्थानीय पवनें (Local Winds)

स्थानीय पवनें वे पवनें होती हैं जो छोटे क्षेत्रों में तापमान और वायुदाब के स्थानीय अंतर के कारण उत्पन्न होती हैं। ये स्थायी या भूमंडलीय पवनों की तरह विशाल क्षेत्रों को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि इनका प्रभाव कुछ सौ किलोमीटर के क्षेत्र तक ही सीमित रहता है। ये पवनें किसी स्थान के मौसम पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं।

स्थानीय पवनों को उनकी प्रकृति, उत्पत्ति के समय और विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

I. दैनिक या सामयिक पवनें (Diurnal or Periodic Winds)

ये पवनें दिन और रात के चक्र के अनुसार अपनी दिशा बदलती हैं। इनका मुख्य कारण स्थल-जल या पर्वत-घाटी का विभेदी तापन है। (इन्हें पिछले अध्याय में विस्तृत रूप से कवर किया जा चुका है)।

स्थानीय दैनिक पवनें (Local Diurnal Winds)

ये पवनें दैनिक (Diurnal) होती हैं, अर्थात वे 24 घंटे के चक्र में अपनी दिशा उलट देती हैं। इनका निर्माण स्थल और जल या पर्वत और घाटी जैसे आस-पास के क्षेत्रों के विभेदी तापन और शीतलन (Differential Heating and Cooling) के कारण होता है।

1. समुद्री समीर और स्थलीय समीर (Sea Breeze and Land Breeze)

यह पवन प्रणाली तटीय क्षेत्रों में दिन और रात के तापमान में अंतर के कारण विकसित होती है।

[आरेख 1: दिन का दृश्य जिसमें समुद्र (उच्च दाब) से स्थल (निम्न दाब) की ओर ‘समुद्री समीर’ चलती हुई दिखाई गई हो। स्थल के ऊपर गर्म हवा को ऊपर उठते हुए भी दिखाया जाए।]

[आरेख 2: रात का दृश्य जिसमें स्थल (उच्च दाब) से समुद्र (निम्न दाब) की ओर ‘स्थलीय समीर’ चलती हुई दिखाई गई हो।]


2. घाटी समीर और पर्वतीय समीर (Valley Breeze and Mountain Breeze)

यह पवन प्रणाली पर्वतीय क्षेत्रों में ढलानों और घाटियों के बीच दिन और रात के तापमान में अंतर के कारण विकसित होती है।

[आरेख 3: दिन का दृश्य जिसमें घाटी से गर्म हवा ‘घाटी समीर’ के रूप में ढलानों के सहारे ऊपर की ओर चढ़ती हुई दिखाई गई हो।]

[आरेख 4: रात का दृश्य जिसमें पर्वतीय ढलानों से ठंडी हवा ‘पर्वतीय समीर’ के रूप में नीचे घाटी की ओर उतरती हुई दिखाई गई हो।]


II. अनिश्चित या गैर-आवधिक पवनें (Non-Periodic Winds)

ये पवनें किसी दैनिक चक्र का पालन नहीं करतीं, बल्कि विशेष मौसमी या वायुमंडलीय दशाओं के कारण वर्ष के किसी विशेष समय में ही चलती हैं। इन्हें मुख्य रूप से गर्म (Warm) और ठंडी (Cold) पवनों में विभाजित किया जाता है।

⋆ यह खंड “Match the Following” और सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे महत्वपूर्ण भागों में से एक है।

ये पवनें या तो गर्म क्षेत्रों (जैसे मरुस्थल) से आती हैं या किसी पर्वत के पवनविमुखी ढाल (Leeward Slope) पर उतरते समय संपीडन (Compression) के कारण गर्म हो जाती हैं।

पवन का नामस्थान/क्षेत्रविशेषताएँ और महत्वपूर्ण तथ्यPYQ Link
चिनूक (Chinook)रॉकी पर्वत (पूर्वी ढलान), USA और कनाडायह एक गर्म और शुष्क पवन है। जब यह पर्वत से नीचे उतरती है, तो एडियाबैटिक प्रक्रिया से गर्म हो जाती है।<br>⋆ इसे “हिमभक्षी” (Snow Eater) कहते हैं क्योंकि यह सर्दियों में बर्फ को तेजी से पिघला देती है, जिससे चारागाह खुल जाते हैं।[UPSC/State PSC]
फोन (Foehn/Föhn)आल्प्स पर्वत (उत्तरी ढलान), स्विट्जरलैंडयह चिनूक के समान ही एक गर्म और शुष्क पवन है।<br>⋆ यह अंगूर की फसल को समय से पहले पकने में मदद करती है और बर्फ पिघलाकर वसंत का आभास कराती है।[UPPSC]
सिराको (Sirocco)सहारा मरुस्थल से भूमध्य सागर की ओर (इटली, स्पेन)यह एक गर्म, शुष्क और रेत से भरी पवन है। भूमध्य सागर को पार करते समय यह नमी ग्रहण कर लेती है।<br>⋆ जब यह इटली पहुँचती है, तो यह लाल रेत के कणों के साथ वर्षा करती है, जिसे “रक्त वर्षा” (Blood Rain) कहा जाता है।[BPSC]
खमसिन (Khamsin)मिस्रसिराको का ही स्थानीय नाम। गर्म, शुष्क और धूल भरी।
गिबली (Ghibli)लीबियासिराको का ही स्थानीय नाम।
हरमट्टन (Harmattan)सहारा मरुस्थल से पश्चिमी अफ्रीका के गिनी तट की ओरएक अत्यंत गर्म और शुष्क, धूल भरी पवन।<br>⋆ जब यह गिनी के आर्द्र और चिपचिपे तट पर पहुँचती है, तो वहाँ के अस्वस्थ मौसम से राहत देती है, इसलिए इसे “डॉक्टर पवन” (The Doctor Wind) कहा जाता है।[UPPSC 2021, SSC]
लू (Loo)उत्तरी भारत और पाकिस्तान का मैदान (थार मरुस्थल से)मई और जून के महीने में चलने वाली एक अत्यंत गर्म, शुष्क और पीड़ादायक पवन। इसके संपर्क में आने से लू लगना (Heatstroke) हो सकता है।[State PSC/General Knowledge]
सिमूम (Simoom)सहारा और अरब के मरुस्थलएक प्रचंड, गर्म और शुष्क पवन जो अपने साथ रेत के बड़े-बड़े तूफ़ान लाती है, जिससे दृश्यता (visibility) शून्य हो जाती है।
सांता एना (Santa Ana)दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया (USA)गर्म, शुष्क और तेज़ पवन जो पहाड़ों से तटीय मैदानों की ओर बहती है। यह क्षेत्र के जंगलों में आग (Wildfires) के लिए कुख्यात है।[CDS]

ये पवनें ठंडे उच्च दाब वाले क्षेत्रों (जैसे बर्फीले पठार या ध्रुवीय क्षेत्र) से उत्पन्न होती हैं और निचले गर्म क्षेत्रों की ओर बहती हैं।

पवन का नामस्थान/क्षेत्रविशेषताएँ और महत्वपूर्ण तथ्यPYQ Link
मिस्ट्रल (Mistral)फ्रांस (रोन नदी घाटी) से भूमध्य सागर की ओरयह आल्प्स से आने वाली एक अत्यंत ठंडी, शुष्क और तीव्र पवन है, जो फ्रांस के दक्षिणी तट के मौसम को ठंडा कर देती है।[UPPSC]
बोरा (Bora)एड्रियाटिक सागर का पूर्वी तट (इटली, स्लोवेनिया, क्रोएशिया)मिस्ट्रल के समान ही एक अत्यंत ठंडी, शुष्क और प्रचंड पवन। इसकी गति 150 किमी/घंटा से भी अधिक हो सकती है।[SSC]
ब्लिजार्ड (Blizzard)कनाडा, USA, साइबेरिया (ध्रुवीय क्षेत्र)यह एक बर्फीला तूफ़ान है जिसमें प्रचंड ठंडी हवा के साथ उड़ती हुई बर्फ के कारण दृश्यता लगभग शून्य हो जाती है।
पुर्गा (Purga)रूस (टुंड्रा और साइबेरियाई क्षेत्र)ब्लिजार्ड का ही स्थानीय नाम।
नार्दर (Norther)USA का दक्षिणी भाग (विशेषकर टेक्सास)सर्दियों में उत्तर से आने वाली एक अचानक और तीव्र ठंडी पवन, जिससे तापमान तेजी से गिरता है।
पैम्परो (Pampero)अर्जेंटीना और उरुग्वे के पम्पास घास के मैदानएंडीज से आने वाली एक अचानक और ठंडी ध्रुवीय पवन, जो अपने साथ धूल के तूफान और फिर तीव्र वर्षा लाती है।

निष्कर्ष: स्थानीय पवनें छोटे पैमाने पर भी वायुमंडलीय गति की जटिलता को दर्शाती हैं। ये किसी क्षेत्र विशेष की कृषि, अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन को बहुत हद तक प्रभावित करती हैं, और इसलिए भूगोल के अध्ययन में इनका विशेष महत्व है।


विश्व की प्रमुख गर्म और ठंडी स्थानीय पवनें

A. गर्म स्थानीय पवनें (Warm Local Winds)

पवन का नामसंबंधित स्थान/क्षेत्रमुख्य विशेषताएँ/उपनाम
चिनूक (Chinook)रॉकी पर्वत (USA, कनाडा)⋆ “हिमभक्षी” (Snow Eater), बर्फ पिघलाती है।
फोन (Foehn)आल्प्स पर्वत (स्विट्जरलैंड, यूरोप)अंगूर की फसल को पकने में मदद करती है।
लू (Loo)उत्तरी भारत और पाकिस्तानअत्यंत गर्म और शुष्क; हीटस्ट्रोक का कारण बनती है।
सिराको (Sirocco)सहारा मरुस्थल से इटली/स्पेन⋆ “रक्त वर्षा” (Blood Rain) का कारण।
हरमट्टन (Harmattan)पश्चिमी अफ्रीका (गिनी तट)⋆ “डॉक्टर पवन” (The Doctor Wind), नमी से राहत देती है।
खमसिन (Khamsin)मिस्रगर्म, शुष्क और धूल भरी (सिराको का ही रूप)।
सांता एना (Santa Ana)दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया (USA)गर्म और शुष्क; जंगलों में आग के लिए कुख्यात।
सिमूम (Simoom)अरब और सहारा मरुस्थलप्रचंड, रेत का तूफान लाती है।
गिबली (Ghibli)लीबियासिराको का स्थानीय नाम।

B. ठंडी स्थानीय पवनें (Cold Local Winds)

पवन का नामसंबंधित स्थान/क्षेत्रमुख्य विशेषताएँ
मिस्ट्रल (Mistral)फ्रांस (रोन घाटी)प्रचंड, ठंडी और शुष्क।
बोरा (Bora)एड्रियाटिक सागर का तट (पूर्वी यूरोप)अत्यंत ठंडी, शुष्क और तूफानी।
ब्लिजार्ड (Blizzard)कनाडा, USA, साइबेरियाबर्फीला तूफान; दृश्यता शून्य।
पैम्परो (Pampero)पम्पास (अर्जेंटीना, उरुग्वे)प्रचंड, ठंडी; अपने साथ तूफान और वर्षा लाती है।
पुर्गा (Purga)साइबेरिया (रूस)ब्लिजार्ड का रूसी नाम।
नार्दर (Norther)USA (दक्षिणी राज्य, विशेषकर टेक्सास)अचानक तापमान गिराने वाली ठंडी हवा।
बाइज (Bise)फ्रांस, स्विट्जरलैंडठंडी, शुष्क हवा।
लिवेंटर (Levanter)स्पेन (जिब्राल्टर)पूर्वी, नम और ठंडी हवा।

1. जेट स्ट्रीम (Jet Streams)

परिभाषा (Definition)

जेट स्ट्रीम ऊपरी क्षोभमंडल (धरातल से लगभग 9-13 किलोमीटर की ऊँचाई पर) में अत्यधिक तेज गति से बहने वाली एक संकरी, विसर्पी (लहरदार) और शक्तिशाली पवन धारा है। ये पवनें मुख्य रूप से पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं। “जेट” शब्द का उपयोग इनकी अत्यधिक तीव्र गति (जेट विमानों जैसी) के कारण किया गया था, जिसका पता द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पायलटों ने लगाया था।1. उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ जेट स्ट्रीम 2. ध्रुवीय वाताग्री पछुआ जेट स्ट्रीम (उपोष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम सिर्फ गर्मी में, भारत में पाया जाता है)।

इनकी गति सामान्यतः 150 से 250 किलोमीटर प्रति घंटा होती है, लेकिन सर्दियों में यह 400-500 किमी/घंटा तक भी पहुँच सकती है।

उत्पत्ति और विशेषताएँ (Origin and Characteristics)

जेट स्ट्रीम के प्रकार (Types of Jet Streams)

  1. उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet Stream):
    • अवस्थिति: दोनों गोलार्धों में लगभग 25°-35° अक्षांशों के बीच।
    • निर्माण: भूमध्यरेखीय क्षेत्र से उठी गर्म हवा का उपोष्ण उच्च दाब पेटी में नीचे उतरने और पृथ्वी के कोरिओलिस बल से विक्षेपित होने से।
    • भारत पर प्रभाव: ⋆ सर्दियों में, यह जेट स्ट्रीम हिमालय के दक्षिण में चली आती है और भारत में पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) को लाने में सहायक होती है, जिससे उत्तर-पश्चिम भारत में शीतकालीन वर्षा और हिमपात होता है। [UPSC/State PSC]
  2. ध्रुवीय वाताग्री जेट स्ट्रीम (Polar Front Jet Stream):
    • अवस्थिति: मध्य अक्षांशों (लगभग 45°-65°) के पास, जहाँ ध्रुवीय ठंडी और उष्णकटिबंधीय गर्म वायुराशियाँ मिलती हैं (ध्रुवीय वाताग्र)।
    • महत्व: यह शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की गति, दिशा और तीव्रता को नियंत्रित करती है।
  3. उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet Stream):
    • प्रकृति: यह एक मौसमी (Seasonal) जेट स्ट्रीम है।
    • अवस्थिति: यह केवल उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्मकाल (Summer) में विकसित होती है और एशिया तथा अफ्रीका के ऊपर (पूर्व से पश्चिम) बहती है।
    • भारत पर प्रभाव: ⋆ इसका संबंध सीधे तौर पर भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की तीव्रता से है। यह तिब्बत के पठार के गर्म होने से उत्पन्न होती है और भारत में मानसूनी पवनों को गति प्रदान करती है तथा बंगाल की खाड़ी में बनने वाले उष्णकटिबंधीय अवदाबों (Tropical Depressions) को भारत की ओर धकेलती है। [UPSC Mains]

2. रॉस्बी तरंगें (Rossby Waves)

परिभाषा (Definition)

रॉस्बी तरंगें, जिन्हें ‘ग्रहीय तरंगें’ (Planetary Waves) भी कहा जाता है, ऊपरी वायुमंडल में (विशेषकर मध्य अक्षांशों में) जेट स्ट्रीम के विशाल, लहरदार या विसर्पी (Meandering) पैटर्न हैं। इनका नामकरण प्रसिद्ध मौसम विज्ञानी कार्ल-गुस्ताव रॉस्बी के नाम पर किया गया है।

ये स्वयं पवन नहीं हैं, बल्कि ये ऊर्जा और वायुमंडलीय दाब के तरंग पैटर्न हैं जिनके भीतर जेट स्ट्रीम बहती है।

उत्पत्ति का कारण (Cause of Formation)

रॉस्बी तरंगों का निर्माण दो मुख्य कारकों के संयोजन से होता है:

  1. पृथ्वी का घूर्णन: विशेष रूप से कोरिओलिस बल का अक्षांशों के साथ मान में परिवर्तन।
  2. भू-आकृतियाँ: विशाल पर्वत श्रृंखलाएँ (जैसे रॉकीज, हिमालय) और स्थल-महासागर का तापीय अंतर जेट स्ट्रीम के प्रवाह में बाधा डालकर उसे मोड़ देते हैं, जिससे ये विशाल तरंगें उत्पन्न होती हैं।

[आरेख: ध्रुव को केंद्र मानकर उत्तरी गोलार्ध का एक नक्शा। इस पर एक जेट स्ट्रीम को सरल रेखा में न दिखाकर एक विशाल लहरदार (साँप जैसी) आकृति में दिखाया जाए, जिसके मोड़ों को ‘कटक’ और ‘गर्त’ के रूप में लेबल किया गया हो।]

विशेषताएँ (Characteristics)

रॉस्बी तरंगों का मौसम पर प्रभाव

निष्कर्ष:
जेट स्ट्रीम और रॉस्बी तरंगें एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई हैं। रॉस्बी तरंगें वह विशाल “मार्ग” हैं जिस पर जेट स्ट्रीम नामक “सुपरहाइवे” की पवनें बहती हैं। इन तरंगों की स्थिति और व्यवहार का अध्ययन करके मौसम विज्ञानी एक सप्ताह या उससे अधिक समय के लिए मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगा सकते हैं।



आर्द्रता (Humidity)

परिभाषा:
आर्द्रता वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प (Water Vapour) की मात्रा का माप है। जलवाष्प जल की गैसीय अवस्था है और यह वायु का एक अत्यधिक परिवर्तनशील लेकिन महत्वपूर्ण घटक है, जो मौसम और जलवायु की कई घटनाओं (जैसे संघनन, वर्षण, ऊष्मा संतुलन) को नियंत्रित करता है।

आर्द्रता को व्यक्त करने के तरीके (Ways of Expressing Humidity)

आर्द्रता को मापने और व्यक्त करने के तीन मुख्य तरीके हैं, और इनके बीच का अंतर समझना परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

आर्द्रता का महत्व (Importance of Humidity)

  1. मौसम और जलवायु का नियंत्रक: आर्द्रता संघनन (बादल, कोहरा) और वर्षण (वर्षा, हिमपात) की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है।
  2. मानव स्वास्थ्य और आराम:
    • उच्च आर्द्रता में पसीना आसानी से नहीं सूखता, जिससे हमें उमस और बेचैनी महसूस होती है।
    • कम आर्द्रता में त्वचा और होंठ सूखने लगते हैं।
  3. गुप्त ऊष्मा का वाहक: जलवाष्प अपने साथ वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Vaporization) को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, जो वायुमंडल में ऊर्जा स्थानांतरण का एक प्रमुख तरीका है।
  4. पारिस्थितिकी: आर्द्रता पौधों की वृद्धि और वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करती है।
  5. कृषि: फसलों के लिए आवश्यक नमी का स्तर बनाए रखने में महत्वपूर्ण।

तुलनात्मक सारांश

माप का प्रकारपरिभाषाइकाईतापमान/दबाव से संबंध
निरपेक्ष आर्द्रताप्रति आयतन में जलवाष्प का वास्तविक द्रव्यमानg/m³अस्थिर (बदलता है)
विशिष्ट आर्द्रताप्रति द्रव्यमान में जलवाष्प का द्रव्यमानg/kgस्थिर (नहीं बदलता)
सापेक्षिक आर्द्रतामौजूद नमी और नमी धारण करने की क्षमता का अनुपात%विपरीत संबंध (तापमान के साथ)

आर्द्रता का अक्षांशीय वितरण (Latitudinal Distribution of Humidity)

वायुमंडल में आर्द्रता (विशेषकर निरपेक्ष और सापेक्षिक) का वितरण पूरे ग्लोब पर एक समान नहीं है। इसका वितरण मुख्य रूप से अक्षांश (Latitude) के साथ बदलता है, क्योंकि अक्षांश तापमान और वाष्पीकरण की दरों को सीधे तौर पर नियंत्रित करता है।

1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity) का अक्षांशीय वितरण

सिद्धांत:
निरपेक्ष आर्द्रता वायु में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा (ग्राम प्रति घन मीटर) का माप है। जलवाष्प वायुमंडल में मुख्य रूप से सतह पर मौजूद जल (महासागरों, झीलों) के वाष्पीकरण (Evaporation) से आती है, और वाष्पीकरण की दर तापमान पर निर्भर करती है।

अक्षांशीय पैटर्न:

  1. भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Region: ~10°N – 10°S):
    • ⋆ यहाँ वर्ष भर उच्च तापमान और विशाल महासागरीय सतह की उपलब्धता के कारण वाष्पीकरण की दर सर्वाधिक होती है।
    • परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र में विश्व की सर्वोच्च निरपेक्ष आर्द्रता पाई जाती है। हवा में जलवाष्प की वास्तविक मात्रा बहुत अधिक होती है।
  2. उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical Regions: ~10° – 30°N/S):
    • निरपेक्ष आर्द्रता अधिक बनी रहती है, लेकिन यह धीरे-धीरे भूमध्य रेखा से दूर जाने पर कम होने लगती है।
    • हालांकि, उपोष्ण कटिबंधीय महाद्वीपीय मरुस्थलों में, उच्च तापमान के बावजूद जल स्रोतों की कमी के कारण वाष्पीकरण कम होता है, इसलिए यहाँ की हवा में निरपेक्ष आर्द्रता बहुत कम होती है।
  3. मध्य अक्षांश या शीतोष्ण क्षेत्र (Mid-latitudes or Temperate Regions: ~30° – 60°N/S):
    • तापमान कम होने लगता है, जिससे वाष्पीकरण की दर भी घट जाती है।
    • परिणामस्वरूप, यहाँ निरपेक्ष आर्द्रता मध्यम स्तर की होती है। सर्दियों में यह और भी कम हो जाती है।
  4. ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions: ~60° – 90°N/S):
    • ⋆ यहाँ तापमान अत्यंत कम (हिमांक से नीचे) होता है, जिससे वाष्पीकरण लगभग नगण्य होता है।
    • ठंडी हवा की नमी धारण करने की क्षमता भी बहुत कम होती है।
    • परिणामस्वरूप, ध्रुवीय क्षेत्रों में विश्व की न्यूनतम निरपेक्ष आर्द्रता पाई जाती है। यहाँ की हवा पृथ्वी पर सबसे शुष्क हवाओं में से एक होती है।

निष्कर्ष (निरपेक्ष आर्द्रता): ⋆ निरपेक्ष आर्द्रता का सामान्य पैटर्न भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर लगातार घटता जाता है।

2. सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) का अक्षांशीय वितरण

सिद्धांत:
सापेक्षिक आर्द्रता वायु में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा और उसी तापमान पर हवा की अधिकतम नमी धारण करने की क्षमता के बीच का अनुपात है। यह तापमान पर बहुत अधिक निर्भर करती है।

अक्षांशीय पैटर्न (यह निरपेक्ष आर्द्रता से थोड़ा अलग है):

  1. भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Region):
    • यहाँ निरपेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक होती है। हालांकि, तापमान भी अधिक होता है, जिससे हवा की नमी धारण करने की क्षमता भी बहुत अधिक होती है।
    • परिणामस्वरूप, यहाँ सापेक्षिक आर्द्रता भी बहुत अधिक होती है (आमतौर पर 80% से ऊपर), क्योंकि हवा अपनी क्षमता के करीब नमी से भरी होती है।
  2. उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र (Tropical and Sub-tropical Regions):
    • यहाँ सापेक्षिक आर्द्रता कम होती है, विशेषकर महाद्वीपों के आंतरिक और पश्चिमी भागों (मरुस्थलों) में।
    • ⋆ कारण: उपोष्ण उच्च दाब पेटी में हवा ऊपर से नीचे उतरती है, जिससे वह गर्म और शुष्क हो जाती है। उच्च तापमान के कारण हवा की नमी धारण करने की क्षमता बहुत बढ़ जाती है, लेकिन नमी की आपूर्ति कम होती है। इसलिए, मरुस्थलों में सापेक्षिक आर्द्रता विश्व में सबसे कम पाई जाती है, भले ही वे गर्म हों।
  3. मध्य अक्षांश या शीतोष्ण क्षेत्र (Mid-latitudes):
    • तापमान कम होने के कारण हवा की नमी धारण करने की क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे यहाँ सापेक्षिक आर्द्रता फिर से बढ़ने लगती है।
  4. ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions):
    • ⋆ यहाँ विश्व की उच्चतम सापेक्षिक आर्द्रता पाई जाती है, जो अक्सर संतृप्ति (100%) के करीब होती है।
    • कारण: यहाँ तापमान अत्यंत कम होता है, जिससे हवा की नमी धारण करने की क्षमता लगभग शून्य हो जाती है। हवा में थोड़ी सी भी नमी (जो निरपेक्ष रूप से बहुत कम होती है) उसे संतृप्त करने के लिए पर्याप्त होती है।
    • [UPSC Prelims – Statement Based Question]: “ध्रुवीय क्षेत्रों में निरपेक्ष आर्द्रता न्यूनतम होती है, लेकिन सापेक्षिक आर्द्रता अधिकतम होती है।” – यह कथन सत्य है।

दोनों का तुलनात्मक सारांश (अक्षांशीय वितरण)

अक्षांशीय क्षेत्रनिरपेक्ष आर्द्रता (वास्तविक नमी)सापेक्षिक आर्द्रता (क्षमता का %)कारण
भूमध्य रेखा (Equator)उच्चतम (Highest)बहुत उच्च (Very High)उच्च तापमान से उच्च वाष्पीकरण, हवा लगभग संतृप्त।
उपोष्णकटिबंधीय मरुस्थल (Sub-tropical Deserts)बहुत निम्न (Very Low)न्यूनतम (Lowest)उच्च तापमान से उच्च क्षमता, लेकिन जल स्रोत की कमी।
मध्य अक्षांश (Mid-latitudes)मध्यम (Moderate)मध्यम से उच्चतापमान कम होता है, क्षमता घटती है।
ध्रुव (Poles)न्यूनतम (Lowest)उच्चतम (Highest)अत्यंत कम तापमान से अत्यंत कम क्षमता, थोड़ी सी नमी भी संतृप्त कर देती है।

1. तापमान और हवा की ‘जलवाष्प धारण करने की क्षमता’ का संबंध

यह संबंध पूरी अवधारणा को समझने की कुंजी है।

2. तापमान और सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity – RH) का संबंध

यह सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक पूछा जाने वाला संबंध है।

ग्राफिकल प्रस्तुति:
[आरेख: एक साधारण ग्राफ जिसमें दिन के 24 घंटों को X-अक्ष पर और तापमान तथा सापेक्षिक आर्द्रता को Y-अक्ष पर दिखाया गया हो। तापमान का वक्र (Curve) दोपहर में अपने चरम पर और सुबह न्यूनतम हो। सापेक्षिक आर्द्रता का वक्र ठीक इसके विपरीत हो – सुबह अधिकतम और दोपहर में न्यूनतम।]

3. तापमान और निरपेक्ष/विशिष्ट आर्द्रता का संबंध

सारांश और परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

आर्द्रता का प्रकारतापमान के साथ संबंधमुख्य बिंदु
जलवाष्प धारण करने की क्षमतासीधा/समानुपाती (Direct)गर्म हवा अधिक नमी धारण कर सकती है, ठंडी हवा कम।
सापेक्षिक आर्द्रता (RH)विपरीत/व्युत्क्रमानुपाती (Inverse)⋆ (सबसे महत्वपूर्ण) तापमान बढ़ने पर RH घटती है, तापमान घटने पर RH बढ़ती है।
निरपेक्ष आर्द्रताअप्रत्यक्ष (वाष्पीकरण पर निर्भर)गर्म क्षेत्रों में अधिक वाष्पीकरण से निरपेक्ष आर्द्रता अधिक होती है।
विशिष्ट आर्द्रतास्वतंत्र (Independent)तापमान बदलने पर यह नहीं बदलती।

कांसेप्चुअल प्रश्न जो बनते हैं:

  1. “रेगिस्तानी इलाकों में दिन के समय सापेक्षिक आर्द्रता बहुत कम क्यों होती है?”
    • उत्तर: उच्च तापमान के कारण हवा की नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक हो जाती है, जबकि वाष्पीकरण के लिए नमी की आपूर्ति कम होती है।
  2. “सर्दियों की सुबह में कोहरा क्यों बनता है?”
    • उत्तर: रात भर तापमान गिरने से हवा की नमी धारण करने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे उसकी सापेक्षिक आर्द्रता 100% (ओसांक) तक पहुँच जाती है और जलवाष्प संघनित हो जाता है।
  3. “एक बंद कमरे में हीटर चलाने पर हवा शुष्क क्यों महसूस होती है?”
    • उत्तर: हीटर हवा का तापमान बढ़ा देता है। कमरे में नमी की वास्तविक मात्रा (विशिष्ट आर्द्रता) वही रहती है, लेकिन तापमान बढ़ने से हवा की क्षमता बढ़ जाती है और उसकी सापेक्षिक आर्द्रता घट जाती है, जिससे वह शुष्क लगती है।

वाताग्र (Fronts)

परिभाषा:
वाताग्र (अंग्रेजी: Front, सैन्य शब्द ‘Frontline’ से लिया गया) वह संक्रमणकालीन ढलुआ सीमा (Sloping transitional boundary) है जो दो भिन्न घनत्व और तापमान वाली वायुराशियों (Air Masses) को अलग करती है। सरल शब्दों में, जब एक ठंडी और शुष्क वायुराशि (जो भारी होती है) एक गर्म और आर्द्र वायुराशि (जो हल्की होती है) से मिलती है, तो वे तुरंत मिश्रित नहीं होतीं, बल्कि उनके बीच एक स्पष्ट सीमा बन जाती है, जिसे वाताग्र कहते हैं।

इस सीमा के सहारे ही अधिकांश महत्वपूर्ण मौसमी घटनाएँ, विशेषकर शीतोष्ण कटिबंध में, घटित होती हैं।

वाताग्र के निर्माण के लिए आवश्यक दशाएँ (Conditions for Frontogenesis)

वाताग्रों के निर्माण की प्रक्रिया को वाताग्र जनन (Frontogenesis) कहते हैं। इसके लिए दो मुख्य शर्तें हैं:

  1. दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियों की उपस्थिति: एक वायुराशि गर्म, हल्की और नम होनी चाहिए, जबकि दूसरी ठंडी, भारी और शुष्क होनी चाहिए।
  2. अभिसारी वायु प्रवाह (Convergent Air Flow): दोनों वायुराशियों को एक-दूसरे की ओर प्रवाहित होना चाहिए ताकि वे आपस में मिल सकें। यह स्थिति मुख्य रूप से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी (Sub-polar low-pressure belts) में बनती है, जहाँ ध्रुवीय पूर्वी पवनें और पछुआ पवनें मिलती हैं। [UPSC – Conceptual]

वाताग्रों के प्रकार (Types of Fronts)

गति की प्रकृति और कौन सी वायुराशि आक्रामक (Active) है, इस आधार पर वाताग्रों को चार मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:

1. शीत वाताग्र (Cold Front)

2. उष्ण वाताग्र (Warm Front)

3. स्थायी या अचर वाताग्र (Stationary Front)

4. अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)


वाताग्रों का तुलनात्मक सारांश

वाताग्र का प्रकारआक्रामक वायुराशिढालसंबंधित बादलवर्षा का प्रकारमौसम का परिवर्तन (बाद में)
शीत वाताग्रठंडी वायुतीव्र (Steep)कपासी-वर्षी (Cumulonimbus)तीव्र, मूसलाधार, कम समय के लिए (तड़ित-झंझा)साफ, ठंडा और शुष्क
उष्ण वाताग्रगर्म वायुमंद (Gentle)स्तरी और पक्षाभ श्रृंखला (Ns, As, Cs, Ci)धीमी, लगातार, विस्तृत क्षेत्र मेंगर्म और आर्द्र
स्थायी वाताग्रकोई नहींस्थिरस्तरी (Stratus)हल्की बूंदाबाँदी, लंबे समय तककोई विशेष परिवर्तन नहीं
अधिविष्ट वाताग्रशीत वाताग्र उष्ण वाताग्र से आगेजटिलमिश्रितमिश्रित और जटिल वर्षाचक्रवात का अंत, धीरे-धीरे साफ

वाताग्रों का महत्व: वाताग्र केवल मौसम की घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि ये शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों (Temperate Cyclones) की उत्पत्ति, विकास और क्षय की पूरी प्रक्रिया को संचालित करते हैं, जो मध्य-अक्षांशीय क्षेत्रों की जलवायु का एक प्रमुख निर्धारक है।


वायुराशियाँ (Air Masses)

परिभाषा:
वायुराशि वायुमंडल के क्षोभमंडल (Troposphere) में वायु का एक विशाल और विस्तृत पिंड होती है, जिसकी क्षैतिज (Horizontal) दिशा में तापमान (Temperature) और आर्द्रता (Humidity) की विशेषताएँ लगभग एक समान (Homogeneous) होती हैं।

एक वायुराशि हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हो सकती है और इसकी ऊँचाई कई किलोमीटर तक हो सकती है। इसका निर्माण तब होता है जब वायु एक विशाल, समरूप सतह (जैसे बर्फीला ध्रुवीय क्षेत्र, उष्णकटिबंधीय महासागर, या विशाल मरुस्थल) पर लंबे समय तक स्थिर रहती है और उस सतह के तापमान और आर्द्रता के गुणों को धारण कर लेती है।

जिस क्षेत्र में वायुराशि अपने गुणों को ग्रहण करती है, उसे “उत्पत्ति क्षेत्र” (Source Region) कहा जाता है।

वायुराशि के उत्पत्ति क्षेत्र की आदर्श दशाएँ (Ideal Conditions for a Source Region)

  1. विस्तृत और समरूप सतह: क्षेत्र बहुत बड़ा और समतल होना चाहिए ताकि वायु समान गुण धारण कर सके (जैसे विशाल महासागर, बर्फीले मैदान, या रेतीले मरुस्थल)।
  2. वायुमंडलीय स्थिरता: उस क्षेत्र पर उच्च वायुदाब (High Pressure) की स्थिति होनी चाहिए, ताकि हवा लंबे समय तक स्थिर रह सके और सतह के गुणों को ग्रहण करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
  3. मंद वायु संचलन (Light Air Circulation): हवा का प्रवाह धीमा होना चाहिए।

⋆ इसी कारण, मध्य-अक्षांशीय क्षेत्र, जहाँ पछुआ पवनें तेज चलती हैं और वायु प्रणालियाँ तेजी से बदलती हैं, वायुराशियों के निर्माण के लिए अच्छे स्रोत क्षेत्र नहीं माने जाते हैं। [UPSC – Conceptual]

वायुराशियों का वर्गीकरण (Classification of Air Masses)

वायुराशियों का वर्गीकरण उनके उत्पत्ति क्षेत्र के अक्षांशीय स्थान (तापमान के लिए) और सतह की प्रकृति (आर्द्रता के लिए) के आधार पर किया जाता है।

I. तापमान के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on Temperature)

वायुराशियों के वर्गीकरण का यह आधार उनके उत्पत्ति क्षेत्र (Source Region) के अक्षांश (Latitude) और वहाँ की सतही गर्मी या ठंडक की मात्रा से निर्धारित होता है। इस आधार पर वायुराशियों को मुख्य रूप से चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

1. उष्णकटिबंधीय वायुराशि (Tropical Air Mass – T)

2. ध्रुवीय वायुराशि (Polar Air Mass – P)

3. आर्कटिक/अंटार्कटिक वायुराशि (Arctic/Antarctic Air Mass – A)

4. भूमध्यरेखीय वायुराशि (Equatorial Air Mass – E)


ऊष्मागतिक वर्गीकरण (Thermodynamic Classification)

तापमान के आधार पर एक और वर्गीकरण यह है कि वायुराशि जिस सतह पर जा रही है, उससे वह ठंडी है या गर्म।

  1. ठंडी वायुराशि (Cold Air Mass – k):
    जब कोई वायुराशि अपने नीचे की सतह से अधिक ठंडी हो। उदाहरण के लिए, जब एक ध्रुवीय वायुराशि (cP) गर्मियों में किसी गर्म महाद्वीप पर आती है।
    • परिणाम: यह नीचे से गर्म होने लगती है, जिससे वायु में अस्थिरता (Instability) आती है और कपासी बादल, बौछारें और तड़ित झंझा बन सकते हैं।
  2. गर्म वायुराशि (Warm Air Mass – w):
    जब कोई वायुराशि अपने नीचे की सतह से अधिक गर्म हो। उदाहरण के लिए, जब एक उष्णकटिबंधीय वायुराशि (mT) सर्दियों में किसी ठंडे महाद्वीप या ठंडे समुद्र पर आती है।
    • परिणाम: यह नीचे से ठंडी होने लगती है, जिससे वायु में स्थिरता (Stability) आती है और कोहरा (Fog), स्तरी बादल (Stratus Clouds) और हल्की बूंदाबाँदी हो सकती है।

यह द्वितीयक वर्गीकरण वायुराशि के आने पर मौसम कैसा होगा, इसका अधिक सटीक पूर्वानुमान लगाने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, एक cPk वायुराशि (महाद्वीपीय ध्रुवीय, जो अपने नीचे की सतह से ठंडी है) अस्थिर मौसम लाएगी।

II. आर्द्रता (सतह की प्रकृति) के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on Humidity/Surface Nature)

वायुराशियों के वर्गीकरण का यह आधार उनके उत्पत्ति क्षेत्र (Source Region) की सतही प्रकृति पर निर्भर करता है, अर्थात वह क्षेत्र स्थलीय है या जलीय। यह गुण वायुराशि की आर्द्रता (Humidity) की मात्रा को निर्धारित करता है। इस आधार पर वायुराशियों को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

1. महाद्वीपीय वायुराशि (Continental Air Mass – c)

2. महासागरीय वायुराशि (Maritime Air Mass – m)


संयुक्त वर्गीकरण का महत्व (Importance of Combined Classification)

वायुराशि का सही और पूर्ण वर्णन करने के लिए, तापमान और आर्द्रता दोनों आधारों को एक साथ मिलाया जाता है।

संयुक्त प्रकारपूरा नामउत्पत्ति का उदाहरणगुण (Temperature & Humidity)
cPमहाद्वीपीय ध्रुवीयसाइबेरिया (सर्दियों में)ठंडी और शुष्क (Cold & Dry)
cTमहाद्वीपीय उष्णकटिबंधीयसहारा मरुस्थलगर्म और शुष्क (Hot & Dry)
mPमहासागरीय ध्रुवीयउत्तरी अटलांटिक महासागरठंडी और आर्द्र (Cold & Moist)
mTमहासागरीय उष्णकटिबंधीयमैक्सिको की खाड़ीगर्म और आर्द्र (Warm & Moist)

यह संयुक्त वर्गीकरण मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है। उदाहरण के लिए, यदि मौसम विज्ञानी यह अनुमान लगाते हैं कि किसी क्षेत्र पर ‘mT’ वायुराशि आने वाली है, तो वे गर्म, उमस भरे और वर्षा वाले मौसम की भविष्यवाणी कर सकते हैं।


प्रमुख वायुराशि प्रकार (Major Types of Air Masses)

वायुराशियों का पूर्ण वर्गीकरण उनके तापमान (Temperature) और आर्द्रता (Humidity) दोनों गुणों को एक साथ मिलाकर किया जाता है। पहला अक्षर आर्द्रता (c = महाद्वीपीय/शुष्क, m = महासागरीय/आर्द्र) और दूसरा अक्षर तापमान (T = उष्णकटिबंधीय/गर्म, P = ध्रुवीय/ठंडा, A = आर्कटिक/अत्यंत ठंडा) को दर्शाता है।

इस आधार पर, विश्व की प्रमुख वायुराशियों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:


1. महाद्वीपीय ध्रुवीय वायुराशि (Continental Polar Air Mass – cP)


2. महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि (Maritime Polar Air Mass – mP)


3. महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय वायुराशि (Continental Tropical Air Mass – cT)


4. महासागरीय उष्णकटिबंधीय वायुराशि (Maritime Tropical Air Mass – mT)


5. महाद्वीपीय आर्कटिक वायुराशि (Continental Arctic Air Mass – cA)

सारांश तालिका

वायुराशि का प्रकार (संकेत)पूरा नामउत्पत्ति क्षेत्रतापमान की प्रकृतिआर्द्रता की प्रकृतिसंबंधित मौसम
c Aमहाद्वीपीय आर्कटिकआर्कटिक/अंटार्कटिका के बर्फीले क्षेत्रअत्यधिक ठंडीअत्यंत शुष्कअत्यंत शीतलहर, साफ आकाश।
c Pमहाद्वीपीय ध्रुवीयउप-ध्रुवीय महाद्वीप (साइबेरिया, कनाडा)ठंडीशुष्क (Dry)शीत लहर, साफ और ठंडा मौसम।
m Pमहासागरीय ध्रुवीयउप-ध्रुवीय महासागर (उत्तरी अटलांटिक, उत्तरी प्रशांत)ठंडीआर्द्र (Moist)शीतल, आर्द्र, मेघाच्छादित मौसम, वर्षा या हिमपात।
c Tमहाद्वीपीय उष्णकटिबंधीयउप-उष्णकटिबंधीय मरुस्थल (सहारा, थार)गर्म या तप्तशुष्क (Dry)⋆ भीषण गर्मी, सूखा, साफ आकाश, लू जैसी पवनें।
m Tमहासागरीय उष्णकटिबंधीयउप-उष्णकटिबंधीय महासागर (मैक्सिको की खाड़ी, अटलांटिक)गर्म या उष्णअत्यधिक आर्द्र⋆ गर्म, उमस भरा मौसम, भारी वर्षा, तड़ित झंझा। भारत का ग्रीष्मकालीन मानसून इसी का एक रूप है। [UPSC]
m Eमहासागरीय भूमध्यरेखीयभूमध्यरेखीय महासागरबहुत गर्मबहुत आर्द्रसंवहनीय वर्षा, तड़ित झंझा।

वायुराशि रूपांतरण (Air Mass Modification)

जब कोई वायुराशि अपने उत्पत्ति क्षेत्र से दूर जाती है और किसी भिन्न सतह के ऊपर से गुजरती है, तो उसके मूल गुणों (तापमान और आर्द्रता) में परिवर्तन होने लगता है। इस प्रक्रिया को वायुराशि रूपांतरण (Air Mass Modification) कहते हैं।

वायुराशियों का महत्व (Importance of Air Masses)

  1. मौसम का निर्धारक: किसी क्षेत्र का मौसम इस बात पर बहुत अधिक निर्भर करता है कि वह किस प्रकार की वायुराशि के प्रभाव में है। उदाहरण के लिए, cP वायुराशि के आने से मौसम ठंडा और शुष्क हो जाता है, जबकि mT वायुराशि के आने से गर्म और उमस भरा हो जाता है।
  2. वाताग्रों का निर्माण: दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियों के मिलने से ही वाताग्रों (Fronts) का निर्माण होता है।
  3. चक्रवातों और तूफानों की उत्पत्ति: वाताग्रों के निर्माण से शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों (Temperate Cyclones) का जन्म होता है। इसी प्रकार, गर्म और आर्द्र mT वायुराशियों में अस्थिरता के कारण तड़ित झंझा (Thunderstorms) और बवंडर (Tornadoes) का निर्माण होता है।
  4. ऊर्जा का स्थानांतरण: वायुराशियाँ पृथ्वी पर ऊष्मा और आर्द्रता का पुनर्वितरण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। वे उष्ण कटिबंध से ध्रुवों की ओर गर्मी और ध्रुवों से उष्ण कटिबंध की ओर ठंडक का परिवहन करती हैं।

विश्व के जलवायु क्षेत्र: कोपेन का वर्गीकरण (Climate Regions of the World: Köppen’s Classification)

विश्व की जलवायु में बहुत अधिक विविधता पाई जाती है। इस विविधता को व्यवस्थित रूप से समझने और वर्गीकृत करने के लिए कई प्रणालियाँ विकसित की गई हैं, जिनमें व्लादिमीर कोपेन (Wladimir Köppen) द्वारा विकसित की गई प्रणाली सबसे प्रसिद्ध, व्यापक रूप से स्वीकृत और उपयोग की जाने वाली प्रणाली है।

कोपेन वर्गीकरण का आधार:
कोपेन का वर्गीकरण आनुभविक (Empirical) है, जिसका अर्थ है कि यह अवलोकन किए गए डेटा पर आधारित है। उन्होंने जलवायु क्षेत्रों को परिभाषित करने के लिए दो मुख्य चरों (Variables) का उपयोग किया:

  1. औसत मासिक और वार्षिक तापमान (Average Monthly and Annual Temperature)
  2. औसत मासिक और वार्षिक वर्षण (Average Monthly and Annual Precipitation)

उन्होंने यह भी माना कि प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation) जलवायु का सबसे अच्छा संकेतक है, इसलिए उनके द्वारा परिभाषित जलवायु क्षेत्रों की सीमाएँ मोटे तौर पर वनस्पति क्षेत्रों की सीमाओं से मेल खाती हैं।

कोपेन की वर्गीकरण योजना (Köppen’s Scheme)

कोपेन ने जलवायु को पाँच प्रमुख समूहों में विभाजित करने के लिए बड़े अक्षरों (Capital Letters) का उपयोग किया, जिनमें से चार तापमान पर और एक वर्षण पर आधारित हैं। इन प्रमुख समूहों को वर्षण और तापमान की मौसमी विशेषताओं के आधार पर छोटे अक्षरों (Small Letters) का उपयोग करके और उप-विभाजित किया गया है।

पाँच प्रमुख जलवायु समूह:

समूह (Group)अक्षर (Code)विवरण और विशेषता
A. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Tropical Humid)Aयहाँ सभी महीनों का औसत तापमान 18°C से अधिक रहता है। कोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं होती।
B. शुष्क जलवायु (Dry Climate)Bयहाँ वर्षण (वर्षा) की तुलना में संभावित वाष्पीकरण (Potential Evaporation) अधिक होता है।
C. उष्ण शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Warm Temperate Mid-latitude)Cसबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18°C से नीचे लेकिन -3°C से ऊपर रहता है। स्पष्ट ग्रीष्म और शीत ऋतु होती है।
D. शीत शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Cold Temperate Mid-latitude)Dसबसे ठंडे महीने का औसत तापमान -3°C से नीचे और सबसे गर्म महीने का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है। लंबी, ठंडी सर्दियाँ होती हैं।
E. ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)Eसबसे गर्म महीने का औसत तापमान भी 10°C से नीचे रहता है। कोई वास्तविक ग्रीष्म ऋतु नहीं होती।
H. उच्चभूमि जलवायु (Highland Climate)Hऊँचाई के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली विशेष जलवायु।

प्रमुख जलवायु प्रकारों का विस्तृत विवरण (Detailed Description of Major Climate Types)

A – उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Tropical Humid Climate)

कोडजलवायु का नामस्थान/क्षेत्रविशेषताएँ और वनस्पति
Afउष्णकटिबंधीय वर्षावन (Tropical Rainforest)भूमध्य रेखा के पास (अमेज़न बेसिन, कांगो बेसिन, दक्षिण-पूर्व एशिया)⋆ वर्ष भर भारी वर्षा, कोई शुष्क मौसम नहीं।<br>⋆ उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता।<br>⋆ वनस्पति: सदाबहार उष्णकटिबंधीय वर्षावन। [UPSC]
Amउष्णकटिबंधीय मानसून (Tropical Monsoon)भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण-पूर्व एशिया, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया⋆ एक छोटी शुष्क ऋतु होती है।<br>⋆ ग्रीष्मकाल में मानसूनी पवनों से अत्यधिक वर्षा होती है।<br>⋆ वनस्पति: मानसूनी या पर्णपाती वन। [State PSC]
Awउष्णकटिबंधीय सवाना (Tropical Savanna)अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के वर्षावनों और मरुस्थलों के बीच⋆ स्पष्ट आर्द्र (ग्रीष्म) और शुष्क (शीत) ऋतु होती है।<br>⋆ वनस्पति: लंबी, मोटी घास के मैदान (सवाना) और बिखरे हुए पेड़। [UPPSC]

B – शुष्क जलवायु (Dry Climate)

कोडजलवायु का नामस्थान/क्षेत्रविशेषताएँ और वनस्पति
BWhउष्ण मरुस्थल (Subtropical Desert – Hot)उपोष्ण उच्च दाब पेटी में (सहारा, थार, अटाकामा)⋆ वर्ष भर उच्च तापमान, बहुत कम और अनिश्चित वर्षा।<br>⋆ दैनिक तापांतर बहुत अधिक।<br>⋆ वनस्पति: मरुद्भिद (Xerophytes) जैसे कैक्टस।
BWkशीत मरुस्थल (Mid-latitude Desert – Cold)महाद्वीपों के आंतरिक भाग, वृष्टि-छाया क्षेत्र (गोबी, पेटागोनिया)⋆ गर्मियाँ गर्म, सर्दियाँ बहुत ठंडी।<br>⋆ वनस्पति: छोटी झाड़ियाँ।
BShउष्ण स्टेपी (Subtropical Steppe – Hot)गर्म मरुस्थलों के किनारे।⋆ गर्म मरुस्थलों की तुलना में थोड़ी अधिक वर्षा होती है।<br>⋆ वनस्पति: छोटी घास।
BSkशीत स्टेपी (Mid-latitude Steppe – Cold)शीत मरुस्थलों के किनारे (यूरेशियन स्टेपीज, प्रेयरीज)⋆ गर्मियाँ गर्म, सर्दियाँ ठंडी।<br>⋆ वनस्पति: पौष्टिक छोटी घास (स्टेपी घास)। गेहूँ की खेती के लिए प्रसिद्ध। [SSC]

C – उष्ण शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Warm Temperate Climate)

कोडजलवायु का नामस्थान/क्षेत्रविशेषताएँ और वनस्पति
Cfa/Cwaआर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय (Humid Subtropical)महाद्वीपों के पूर्वी तट, 30°-40° अक्षांश (दक्षिण-पूर्वी चीन, दक्षिण-पूर्वी USA)⋆ गर्मियाँ गर्म और आर्द्र, सर्दियाँ हल्की।<br>⋆ चीन तुल्य (China Type) जलवायु।
Csb/Csaभूमध्यसागरीय (Mediterranean)महाद्वीपों के पश्चिमी तट, 30°-40° अक्षांश (भूमध्य सागर के आसपास, कैलिफोर्निया, मध्य चिली)⋆ गर्म, शुष्क ग्रीष्मकाल और हल्की, आर्द्र शीतकाल।<br>⋆ “खट्टे/रसदार फलों (Citrus Fruits)” की खेती के लिए प्रसिद्ध (अंगूर, जैतून, संतरा)। [UPSC 2021]
Cfb/Cfcसमुद्री पश्चिम तटीय (Marine West Coast)महाद्वीपों के पश्चिमी तट, 40°-60° अक्षांश (पश्चिमी यूरोप, ब्रिटिश कोलंबिया)⋆ सर्दियाँ हल्की, गर्मियाँ शीतल।<br>⋆ पछुआ पवनों से वर्ष भर वर्षा।

D – शीत शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Cold Temperate Climate)

कोडजलवायु का नामस्थान/क्षेत्रविशेषताएँ और वनस्पति
Df/Dwआर्द्र महाद्वीपीय (Humid Continental)उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों के आंतरिक भाग (पूर्वी USA, उत्तरी चीन, पूर्वी यूरोप)⋆ गर्मियाँ गर्म से शीतल, सर्दियाँ लंबी और ठंडी (बर्फबारी)।<br>⋆ स्पष्ट चार ऋतुएँ।
Dfc/Dwcउप-आर्कटिक (टैगा) (Subarctic – Taiga)यूरेशिया और उत्तरी अमेरिका में 50°-70° अक्षांशों के बीच का विशाल बेल्ट (साइबेरिया, कनाडा)⋆ गर्मियाँ छोटी और ठंडी, सर्दियाँ अत्यंत लंबी और कठोर।<br>⋆ वार्षिक तापांतर विश्व में सर्वाधिक।<br>⋆ वनस्पति: शंकुधारी (Coniferous) वन (टैगा), जैसे पाइन, स्प्रूस, फर। [BPSC]

E – ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)

कोडजलवायु का नामस्थान/क्षेत्रविशेषताएँ और वनस्पति
ETटुंड्रा (Tundra)आर्कटिक तट के किनारे (उत्तरी कनाडा, उत्तरी रूस, ग्रीनलैंड तट)⋆ कोई वास्तविक गर्मी नहीं; सबसे गर्म महीने का तापमान 0°C और 10°C के बीच।<br>⋆ जमीन स्थायी रूप से जमी रहती है (पर्माफ्रॉस्ट)।<br>⋆ वनस्पति: काई, लाइकेन, छोटी झाड़ियाँ।
EFहिम टोपी (Ice Cap)ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के आंतरिक भाग⋆ वर्ष भर हिमांक से नीचे तापमान।<br>⋆ स्थायी बर्फ और हिम की मोटी चादर।<br>⋆ कोई वनस्पति नहीं।

प्रमुख जलवायु प्रकारों का विस्तृत विवरण (Detailed Description of Major Climate Types)

A – उष्णकट उष्णकटिबंधीय जलवायु (Tropical Humid Climate)

(मुख्य विशेषता: सभी महीनों का औसत तापमान 18°C से अधिक)

B – शुष्क जलवायु (Dry Climate)

(मुख्य विशेषता: वर्षण की तुलना में वाष्पीकरण अधिक)

C – उष्ण शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Warm Temperate Mid-latitude Climate)

(मुख्य विशेषता: हल्की सर्दियाँ)

D – शीत शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Cold Temperate Mid-latitude Climate)

(मुख्य विशेषता: ठंडी और बर्फीली सर्दियाँ; यह जलवायु दक्षिणी गोलार्ध में लगभग अनुपस्थित है)

E – ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)

(मुख्य विशेषता: कोई वास्तविक गर्मी नहीं, सबसे गर्म महीने का तापमान भी 10°C से नीचे)

विश्व के जलवायु क्षेत्र: त्रेवार्था का वर्गीकरण (Climate Regions of the World: Trewartha’s Classification)

ग्लेन टी. त्रेवार्था (Glenn T. Trewartha), एक अमेरिकी भूगोलवेत्ता, ने 1968 में कोपेन की जलवायु वर्गीकरण प्रणाली में कुछ संशोधन करके अपनी एक नई प्रणाली प्रस्तुत की। त्रेवार्था का मानना था कि कोपेन का वर्गीकरण बहुत अधिक जटिल है और कुछ प्रमुख जलवायु सीमाओं को, विशेषकर मध्य-अक्षांशों में, सही ढंग से परिभाषित नहीं करता है।

त्रेवार्था की प्रणाली को कोपेन का “संशोधित (Modified)” या “सरलीकृत (Simplified)” संस्करण माना जाता है। इसका उद्देश्य जलवायु वर्गीकरण को अधिक वास्तविक, तार्किक और क्षेत्रीय भूगोल के अध्ययन के लिए अधिक उपयुक्त बनाना था।

त्रेवार्था के वर्गीकरण का आधार (Basis of Trewartha’s Classification)

त्रेवार्था का वर्गीकरण भी आनुभविक (Empirical) है और कोपेन की तरह ही तापमान (Temperature) और वर्षण (Precipitation) के डेटा पर आधारित है। हालांकि, उन्होंने सीमाओं और समूहों को पुनर्परिभाषित किया।

त्रेवार्था की वर्गीकरण योजना (Trewartha’s Scheme)

छह प्रमुख जलवायु समूह:

समूह (Group)अक्षर (Code)विवरण और विशेषता (त्रेवार्था के अनुसार)
A. उष्णकटिबंधीय जलवायु (Tropical)Aयहाँ कोई शीत ऋतु नहीं होती। सभी 12 महीनों का औसत तापमान 18°C से ऊपर रहता है।
B. शुष्क जलवायु (Dry)Bयहाँ वर्षण कम होता है और संभावित वाष्पीकरण से भी कम होता है।
C. उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु (Subtropical)C8 या अधिक महीनों का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है। सर्दियाँ हल्की होती हैं।
D. शीतोष्ण जलवायु (Temperate)D4 से 7 महीनों का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है। स्पष्ट गर्म और ठंडी ऋतुएँ होती हैं।
E. बोरियल या उप-आर्कटिक जलवायु (Boreal)E1 से 3 महीनों का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है। गर्मियाँ बहुत छोटी और सर्दियाँ अत्यंत लंबी होती हैं। (कोपेन के Dfc/Dwc के समान)।
F. ध्रुवीय जलवायु (Polar)Fकिसी भी महीने का औसत तापमान 10°C से ऊपर नहीं जाता।
H. उच्चभूमि जलवायु (Highland)Hऊँचाई के कारण पर्वतीय क्षेत्रों की विशेष जलवायु।

प्रमुख जलवायु प्रकारों का विस्तृत विवरण (त्रेवार्था के अनुसार)

(ध्यान दें कि कई प्रकार कोपेन से मिलते-जुलते हैं, लेकिन उनकी सीमाएँ भिन्न हो सकती हैं।)

A – उष्णकटिबंधीय जलवायु (Tropical Climate – Ar, Aw)

B – शुष्क जलवायु (Dry Climate – BW, BS)

यह समूह कोपेन के वर्गीकरण के लगभग समान है।

C – उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु (Subtropical Climate – Cf, Cs)

यह त्रेवार्था का एक महत्वपूर्ण संशोधन है।

D – शीतोष्ण जलवायु (Temperate Climate – Do, Dc)

इसे “महाद्वीपीय (Continental)” जलवायु भी कहा जाता है। यह उत्तरी गोलार्ध में ही प्रमुखता से पाया जाता है।

E – बोरियल या उप-आर्कटिक जलवायु (Boreal Climate – E)

यह कोपेन के टैगा (Taiga) जलवायु क्षेत्र के समान है।

F – ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate – FT, Fi)

यह समूह कोपेन के E समूह के लगभग समान है।

त्रेवार्था बनाम कोपेन: मुख्य अंतर का सारांश

  1. C और D समूहों का पुनर्गठन: त्रेवार्था ने कोपेन के C और D समूहों को पुनर्परिभाषित करके तीन नए समूह बनाए: उपोष्ण (C), शीतोष्ण (D), और बोरियल (E)। यह मध्य-अक्षांशों की जलवायु का अधिक तार्किक विभाजन प्रस्तुत करता है।
  2. उपोष्ण की सीमा: त्रेवार्था ने उपोष्ण जलवायु की सीमा को 8 महीने के 10°C तापमान से परिभाषित किया, जो इसे एक अलग पहचान देता है।
  3. D और E का विभाजन: कोपेन की D जलवायु (महाद्वीपीय) को त्रेवार्था ने दो भागों में बाँट दिया: वास्तविक शीतोष्ण (D) और बोरियल/टैगा (E), जो वनस्पति और जलवायु की दृष्टि से अधिक सटीक है।

निष्कर्ष: त्रेवार्था का वर्गीकरण कोपेन प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सुधार माना जाता है। यह उपयोग में सरल है और विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप की जलवायु सीमाओं को अधिक सटीकता से चित्रित करता है, जिससे यह क्षेत्रीय भौगोलिक अध्ययन के लिए बहुत उपयोगी हो जाता है।


कोपेन बनाम त्रेवार्था: जलवायु वर्गीकरण की तुलना

तुलना का आधारव्लादिमीर कोपेन का वर्गीकरण (Köppen’s Classification)ग्लेन टी. त्रेवार्था का वर्गीकरण (Trewartha’s Classification)प्रमुख अंतर और निष्कर्ष
मूल दर्शनआनुभविक, मुख्य रूप से तापमान और वर्षण पर आधारित। प्राकृतिक वनस्पति एक प्रमुख संकेतक है।आनुभविक, कोपेन का संशोधित और सरलीकृत संस्करण। अधिक तार्किक और वास्तविक सीमाओं पर केंद्रित।दोनों का आधार समान है, लेकिन त्रेवार्था ने कोपेन की कमियों को दूर करने का प्रयास किया।
प्रमुख जलवायु समूहपाँच प्रमुख समूह: <br>A (उष्णकटिबंधीय)<br>B (शुष्क)<br>C (उष्ण शीतोष्ण)<br>D (शीत शीतोष्ण/महाद्वीपीय)<br>E (ध्रुवीय)छह प्रमुख समूह: <br>A (उष्णकटिबंधीय)<br>C (उपोष्ण)<br>D (शीतोष्ण)<br>E (बोरियल/उप-आर्कटिक)<br>F (ध्रुवीय)<br>(समूह ⋆ सबसे बड़ा अंतर: त्रेवार्था ने कोपेन के C और D समूहों को तोड़कर तीन नए, अधिक विशिष्ट समूह (C, D, E) बनाए।
A – उष्णकटिबंधीय जलवायुसभी महीनों का औसत तापमान ≥ 18°C।सभी 12 महीनों का औसत तापमान ≥ 18°C।यह परिभाषा लगभग समान है। दोनों में कोई खास अंतर नहीं है।
(Af, Am, Aw)(Ar, Aw – त्रेवार्THA ने Am को Ar/Aw में मिला दिया)
B – शुष्क जलवायुवर्षण < संभावित वाष्पीकरण।<br>(BWh, BWk, BSh, BSk)वर्षण < संभावित वाष्पीकरण।<br>(BW, BS – h और k का उपयोग होता है)यह परिभाषा और इसके उप-प्रकार दोनों प्रणालियों में लगभग समान हैं।
मध्य-अक्षांशीय जलवायु (The Mid-Latitudes)इसे दो बड़े समूहों में बांटा गया है:<br>C (उष्ण शीतोष्ण): सबसे ठंडे महीने का तापमान -3°C और 18°C के बीच।<br>D (शीत शीतोष्ण): सबसे ठंडे महीने का तापमान < -3°C।इसे तीन तार्किक समूहों में बांटा गया है:<br>C (उपोष्ण): 8 से 12 महीने का तापमान ≥ 10°C।<br>D (शीतोष्ण): 4 से 7 महीने का तापमान ≥ 10°C।<br>E (बोरियल): 1 से 3 महीने का तापमान ≥ 10°C।⋆ यह सबसे महत्वपूर्ण अंतर है। त्रेवार्था ने तापमान की अवधि (महीनों की संख्या) को आधार बनाया, जो जलवायु को बेहतर ढंग से परिभाषित करता है। कोपेन का -3°C का मापदंड बहुत मनमाना माना गया।
Cs – भूमध्यसागरीय जलवायुसमूह C के अंतर्गत वर्गीकृत।समूह C (उपोष्ण) के अंतर्गत वर्गीकृत।दोनों में है, लेकिन त्रेवार्था के ‘उपोष्ण’ समूह में यह अधिक तार्किक लगता है।
टैगा/साइबेरियन जलवायुसमूह D के अंतर्गत आता है (Dfc, Dwc, Dwd)।एक अलग प्रमुख समूह E (बोरियल) के रूप में वर्गीकृत।त्रेवार्था का वर्गीकरण टैगा को एक अलग प्रमुख जलवायु प्रकार के रूप में मान्यता देता है, जो इसकी विशिष्टता को देखते हुए अधिक उपयुक्त है।
D – शीतोष्ण/महाद्वीपीयD समूह में कठोर सर्दियों वाली सभी महाद्वीपीय जलवायु शामिल हैं।D समूह में केवल वे क्षेत्र शामिल हैं जहाँ 4 से 7 महीने गर्मियाँ होती हैं, यह वास्तविक “शीतोष्ण” या “मध्य-अक्षांशीय” जलवायु है।त्रेवार्था का ‘D’ समूह कोपेन की तुलना में अधिक संकीर्ण और विशिष्ट है।
E / F – ध्रुवीय जलवायुसमूह E: सबसे गर्म महीने का तापमान < 10°C।समूह F: सबसे गर्म महीने का तापमान < 10°C।परिभाषा समान है, केवल अक्षर का उपयोग भिन्न है (कोपेन का E = त्रेवार्था का F)।
(ET – टुंड्रा, EF – हिम टोपी)(FT – टुंड्रा, Fi – हिम टोपी)
उपयोगिता और जटिलताविश्व स्तर पर अधिक प्रसिद्ध और व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, लेकिन अधिक जटिल और कुछ सीमाएँ (जैसे -3°C) विवादास्पद हैं।समझने और लागू करने में सरल। विशेष रूप से शैक्षिक उद्देश्यों और क्षेत्रीय भूगोल के लिए अधिक तार्किक माना जाता है, लेकिन कोपेन की तुलना में कम प्रसिद्ध है।त्रेवार्था ने सुधार का प्रयास किया, लेकिन कोपेन प्रणाली पहले से ही इतनी स्थापित हो चुकी थी कि उसे प्रतिस्थापित नहीं कर सकी।

निष्कर्ष:

संक्षेप में, त्रेवार्था का वर्गीकरण कोपेन की प्रणाली का एक सुधारवादी और तार्किक सरलीकरण है। इसका सबसे बड़ा योगदान मध्य-अक्षांशों की जलवायु (कोपेन के C और D समूह) को एक अधिक यथार्थवादी और सार्थक तरीके से उपोष्ण (C), शीतोष्ण (D), और बोरियल (E) समूहों में पुनर्व्यवस्थित करना है। हालांकि अकादमिक और वैज्ञानिक जगत में कोपेन का वर्गीकरण अभी भी अधिक प्रचलित है, त्रेवार्था का मॉडल जलवायु प्रदेशों की सीमाओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए एक उत्कृष्ट वैकल्पिक ढाँचा प्रदान करता है।


वाष्पीकरण, संघनन और वर्षा (Evaporation, Condensation, and Precipitation)

ये तीनों प्रक्रियाएँ मिलकर जल चक्र का निर्माण करती हैं, जो पृथ्वी पर जल के निरंतर परिसंचरण और पुनर्वितरण के लिए उत्तरदायी है।


1. वाष्पीकरण (Evaporation)

परिभाषा:
वाष्पीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई तरल पदार्थ, विशेषकर जल (Liquid), ऊष्मा ग्रहण करके गैसीय अवस्था (Gas – जलवाष्प) में परिवर्तित हो जाता है। यह जल चक्र का प्रारंभिक चरण है, जहाँ पृथ्वी की सतह (महासागरों, झीलों, नदियों) का जल वायुमंडल में पहुँचता है।

वाष्पीकरण को प्रभावित करने वाले कारक:

  1. तापमान (Temperature):
    • ⋆ तापमान और वाष्पीकरण में सीधा संबंध है। तापमान जितना अधिक होगा, कणों की गतिज ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी और वाष्पीकरण की दर भी उतनी ही तेज होगी। यही कारण है कि गर्मियों में कपड़े जल्दी सूखते हैं।
  2. सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity):
    • ⋆ सापेक्षिक आर्द्रता और वाष्पीकरण में विपरीत संबंध है। सापेक्षिक आर्द्रता हवा में पहले से मौजूद नमी की मात्रा का माप है। यदि हवा पहले से ही नम (उच्च आर्द्रता) है, तो वह और अधिक नमी ग्रहण नहीं कर पाएगी, जिससे वाष्पीकरण की दर धीमी हो जाएगी। शुष्क हवा में वाष्पीकरण तेज होता है।
  3. पवन की गति (Wind Speed):
    • ⋆ पवन की गति और वाष्पीकरण में सीधा संबंध है। तेज हवा अपने साथ नम हवा को हटाकर उसकी जगह शुष्क हवा लाती रहती है, जिससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
  4. सतह का क्षेत्रफल (Surface Area):
    • जितना अधिक सतह क्षेत्र खुला होता है, वाष्पीकरण उतना ही तेज होता है।

गुप्त ऊष्मा (Latent Heat):


2. संघनन (Condensation)

परिभाषा:
संघनन वाष्पीकरण के ठीक विपरीत प्रक्रिया है। यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जलवाष्प (गैस) ठंडा होने पर वापस जल की बूंदों या बर्फ के कणों (तरल/ठोस) में परिवर्तित हो जाता है। संघनन के कारण ही बादलों, कोहरे, ओस और पाले का निर्माण होता है।

संघनन के लिए आवश्यक दशाएँ:

  1. वायु का संतृप्त होना (Saturation of Air):
    • हवा का ठंडा होना आवश्यक है ताकि उसकी सापेक्षिक आर्द्रता 100% तक पहुँच जाए। जिस तापमान पर हवा संतृप्त हो जाती है, उसे ओसांक बिंदु (Dew Point) कहते हैं।
    • ⋆ ओसांक बिंदु वह तापमान है जिस पर संघनन शुरू होता है।
  2. आर्द्रताग्राही नाभिक की उपस्थिति (Presence of Hygroscopic Nuclei):
    • वायुमंडल में जलवाष्प को संघनित होने और जल की बूंदों में बदलने के लिए एक सतह (Surface) की आवश्यकता होती है। वायुमंडल में मौजूद धूलकण, धुआँ और नमक के कण यही आधार प्रदान करते हैं। इन्हें आर्द्रताग्राही नाभिक कहते हैं। [State PSC]

संघनन के रूप (Forms of Condensation):

रूपनिर्माण प्रक्रियाअवस्थिति
ओस (Dew)जब ठंडी सतह (जैसे घास, पत्तियाँ) का तापमान ओसांक से नीचे चला जाता है, तो हवा में मौजूद नमी उस पर जल की बूंदों के रूप में जमा हो जाती है।धरातल की सतहों पर
पाला या तुषार (Frost)जब ओसांक बिंदु हिमांक (0°C) से नीचे होता है, तो नमी सीधे बर्फ के कणों (Ice crystals) में बदल जाती है।धरातल की सतहों पर
कोहरा (Fog) और कुहासा (Mist)जब सतह के निकट वायु की एक मोटी परत का तापमान ओसांक से नीचे चला जाता है, तो हवा में मौजूद जलवाष्प छोटे-छोटे जल कणों के रूप में संघनित होकर हवा में तैरने लगती है। कोहरे में दृश्यता 1 किमी से कम होती है, जबकि कुहासे में अधिक।धरातल के निकट वायु में
बादल (Clouds)जब हवा ऊपर उठती है और ठंडी होती है (एडियाबैटिक कूलिंग), तो पर्याप्त ऊँचाई पर संघनन से बने जल कणों या हिम कणों के समूह को बादल कहते हैं।वायुमंडल की ऊँचाई पर

3. वर्षण (Precipitation)

परिभाषा:
जब संघनन से बनी जल की बूंदें या हिम कण इतने भारी हो जाते हैं कि हवा उन्हें और रोक कर नहीं रख सकती, तो वे गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के कारण पृथ्वी की सतह पर गिरने लगते हैं। इसी प्रक्रिया को वर्षण (Precipitation) कहते हैं।

वर्षण के रूप (Forms of Precipitation):

वर्षा के प्रकार (Types of Rainfall)

वर्षण का सबसे आम रूप वर्षा है। हवा के ऊपर उठने और ठंडे होने के तरीके के आधार पर वर्षा को तीन मुख्य प्रकारों में बांटा गया है:


चक्रवात और प्रतिचक्रवात (Cyclones and Anticyclones)

चक्रवात और प्रतिचक्रवात वृहत पैमाने की वायुमंडलीय परिसंचरण प्रणालियाँ हैं जो वायुदाब के अंतर के कारण उत्पन्न होती हैं। ये किसी क्षेत्र के मौसम को नाटकीय रूप से प्रभावित करते हैं।


I. चक्रवात (Cyclones)

परिभाषा:
चक्रवात निम्न वायुदाब (Low Pressure) का एक ऐसा तंत्र होता है जिसके केंद्र में निम्न दाब और बाहर की ओर उच्च दाब होता है। इस कारण, पवनें परिधि से केंद्र की ओर प्रवाहित होती हैं। कोरिओलिस बल के प्रभाव के कारण, इन पवनों का परिसंचरण (Circulation) बंद और चक्राकार होता है:

चक्रवात अक्सर खराब, तूफानी और आर्द्र मौसम से जुड़े होते हैं क्योंकि केंद्र में हवाएँ अभिसरित (converge) होकर ऊपर उठती हैं, ठंडी होती हैं, और बादलों तथा वर्षा का निर्माण करती हैं।

उत्पत्ति के क्षेत्र के आधार पर चक्रवात दो मुख्य प्रकार के होते हैं:

A. उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)

नामक्षेत्र/देश
हरीकेन (Hurricane)अटलांटिक महासागर (कैरेबियन सागर, मैक्सिको की खाड़ी), पूर्वी प्रशांत
टाइफून (Typhoon)पश्चिमी प्रशांत महासागर (चीन सागर, जापान, फिलीपींस)
चक्रवात (Cyclone)हिंद महासागर (बंगाल की खाड़ी, अरब सागर), ऑस्ट्रेलिया (उत्तरी)
विली-विली (Willy-Willy)ऑस्ट्रेलिया (पश्चिमी)

B. शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात या बहि-उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Temperate or Extra-Tropical Cyclones)


II. प्रतिचक्रवात (Anticyclones)

परिभाषा:
प्रतिचक्रवात उच्च वायुदाब (High Pressure) का एक ऐसा तंत्र होता है जिसके केंद्र में उच्च दाब और बाहर की ओर निम्न दाब होता है।


चक्रवात और प्रतिचक्रवात का तुलनात्मक सारांश

विशेषताचक्रवात (Cyclone)प्रतिचक्रवात (Anticyclone)
केंद्र में दाबनिम्न (Low)उच्च (High)
हवा का प्रवाहपरिधि से केंद्र की ओर (अभिसरण)केंद्र से परिधि की ओर (अपसरण)
परिसंचरण (उत्तरी गोलार्ध)घड़ी के विपरीत (Anti-clockwise)घड़ी की दिशा में (Clockwise)
ऊर्ध्वाधर गतिहवा ऊपर उठती हैहवा नीचे उतरती है
संबंधित मौसमअस्थिर, तूफानी, वर्षा वालास्थिर, साफ, शांत
आकारछोटा (उष्णकटिबंधीय) से बड़ा (शीतोष्ण)आमतौर पर बहुत बड़े

चक्रवातों का नामकरण (Naming of Cyclones)

नामकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी?

चक्रवातों का नामकरण करने के कई उद्देश्य हैं:

नामकरण की प्रक्रिया

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization – WMO) और संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (United Nations Economic and Social Commission) इस प्रक्रिया का समन्वय करते हैं। विश्व भर में चक्रवातों के नामकरण के लिए विभिन्न क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र (Regional Specialised Meteorological Centres – RSMCs) और उष्णकटिबंधीय चक्रवात चेतावनी केंद्र (TCWCs) जिम्मेदार हैं।


हाल के और महत्वपूर्ण चक्रवातों के नाम (Names of Recent and Important Cyclones)

यह सूची भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित करने वाले चक्रवातों पर केंद्रित है।

चक्रवात का नामवर्षप्रभावित क्षेत्रनामकरण करने वाला देशनाम का अर्थ (यदि उपलब्ध है)
रेमल (Remal)2024पश्चिम बंगाल, बांग्लादेशओमानरेत
मिचौंग (Michaung)2023आंध्र प्रदेश, तमिलनाडुम्यांमारताकत, लचीलापन
मिधिली (Midhili)2023बांग्लादेश, पश्चिम बंगालमालदीवएक विशाल वृक्ष
हामून (Hamoon)2023बांग्लादेशईरानएक रेगिस्तानी झील
तेज (Tej)2023यमन, ओमान (अरब सागर)भारतगति
बिपारजॉय (Biparjoy)2023गुजरात (भारत), पाकिस्तान (अरब सागर)बांग्लादेशआपदा, विपत्ति
मोचा (Mocha)2023म्यांमार, बांग्लादेशयमनयमन का एक प्रसिद्ध कॉफी उत्पादक शहर
मैंडूस (Mandous)2022तमिलनाडुUAEखजाने का पिटारा
सितरंग (Sitrang)2022बांग्लादेश, पश्चिम बंगालथाईलैंड(एक वियतनामी उपनाम)
असानी (Asani)2022आंध्र प्रदेश, ओडिशा तटश्रीलंकाक्रोध (सिंहली भाषा में)
जवाद (Jawad)2021ओडिशा तटसऊदी अरबउदार, दयालु
गुलाब (Gulab)2021ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्रपाकिस्तानएक फूल
यास (Yaas)2021ओडिशा, पश्चिम बंगालओमाननिराशा (फारसी में जैस्मिन जैसा फूल)
तौकते (Tauktae)2021गुजरात, महाराष्ट्र (अरब सागर)म्यांमारएक शोर करने वाली छिपकली (गेको)
निसर्ग (Nisarga)2020महाराष्ट्रबांग्लादेशप्रकृति
अम्फान (Amphan)2020पश्चिम बंगाल, ओडिशाथाईलैंडआकाश

अटलांटिक महासागर क्षेत्र के कुछ प्रसिद्ध विनाशकारी चक्रवात (हरीकेन):

यह तालिका आपको करेंट अफेयर्स और भूगोल से संबंधित प्रश्नों के लिए तैयार करने में मदद करेगी। याद रखें कि हर साल आने वाले नए चक्रवातों के नाम और उनके नामकरणकर्ता देशों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण है।


उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के क्षेत्रीय नाम

स्थानीय नाम (Local Name)संबंधित महासागर/समुद्र/क्षेत्रप्रभावित होने वाले प्रमुख देश
हरीकेन (Hurricane)⋆ उत्तरी अटलांटिक महासागर<br>⋆ कैरेबियन सागर<br>⋆ मैक्सिको की खाड़ी<br>⋆ पूर्वी उत्तरी प्रशांत महासागरUSA, मेक्सिको, क्यूबा, जमैका, मध्य अमेरिका के देश
टाइफून (Typhoon)⋆ पश्चिमी उत्तरी प्रशांत महासागर<br>⋆ चीन सागर (दक्षिण और पूर्व)चीन, जापान, फिलीपींस, ताइवान, वियतनाम, कोरिया
चक्रवात (Cyclone)⋆ हिंद महासागर<br> – बंगाल की खाड़ी<br> – अरब सागर<br>⋆ दक्षिणी प्रशांत महासागरभारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, ओमान, यमन<br>ऑस्ट्रेलिया (उत्तरी और पूर्वी), फिजी, टोंगा
विली-विली (Willy-Willy)⋆ तिमोर सागर और ऑस्ट्रेलिया का उत्तर-पश्चिमी तटऑस्ट्रेलिया (विशेषकर पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया)
बागियो (Baguio)फिलीपींस (टाइफून का एक और स्थानीय नाम)
टायफू (Taifu)जापान (टाइफून का जापानी उच्चारण)

याद रखने के लिए मुख्य बिंदु:

यह सब एक ही मौसमी परिघटना के अलग-अलग क्षेत्रीय नाम हैं। उनकी संरचना और उत्पत्ति की प्रक्रिया मूल रूप से समान होती है।


बादल/मेघ (Clouds)

परिभाषा:
बादल वायुमंडल में पर्याप्त ऊँचाई पर जलवाष्प के संघनन (Condensation) के परिणामस्वरूप बने जल की अत्यंत सूक्ष्म बूंदों (Water Droplets) या बर्फ के महीन कणों (Ice Crystals) का एक दृश्यमान (Visible) समूह होता है। बादल संघनन के सबसे महत्वपूर्ण रूपों में से एक हैं और ये पृथ्वी के मौसम, जलवायु और ऊष्मा बजट को गहराई से प्रभावित करते हैं।

बादलों का निर्माण (Formation of Clouds)

बादलों का निर्माण एक विशिष्ट प्रक्रिया के तहत होता है जिसके लिए कुछ आवश्यक दशाएँ होती हैं:

  1. वायु का ऊपर उठना और ठंडा होना (Lifting and Cooling of Air):
    • जब हवा ऊपर की ओर उठती है, तो वायुदाब कम होने के कारण वह फैलती है। इस फैलाव की प्रक्रिया में, हवा अपनी आंतरिक ऊर्जा का उपयोग करती है और ठंडी हो जाती है। इस प्रक्रिया को “रुद्धोष्म शीतलन” (Adiabatic Cooling) कहते हैं।
    • हवा कई कारणों से ऊपर उठ सकती है: संवहन (सतह का गर्म होना), पर्वतों से टकराकर (पर्वतीय), या वाताग्रों (Fronts) के सहारे।
  2. संतृप्ति और ओसांक (Saturation and Dew Point):
    • जैसे-जैसे हवा रुद्धोष्म प्रक्रिया से ठंडी होती है, उसकी सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) बढ़ती जाती है।
    • जब हवा ठंडी होकर अपने ओसांक बिंदु (Dew Point) पर पहुँच जाती है, तो उसकी सापेक्षिक आर्द्रता 100% हो जाती है और वह संतृप्त (Saturated) हो जाती है।
  3. संघनन (Condensation):
    • संतृप्त होने के बाद, जलवाष्प को संघनित होकर जल की बूंदों में बदलने के लिए एक ठोस सतह की आवश्यकता होती है। वायुमंडल में मौजूद धूलकण, नमक और धुएँ के कण, जिन्हें आर्द्रताग्राही नाभिक (Hygroscopic Nuclei) कहते हैं, यह आधार प्रदान करते हैं।
    • जलवाष्प इन्हीं नाभिकों के चारों ओर जमा होकर जल की सूक्ष्म बूंदों या हिम कणों का निर्माण करती है, जिनके विशाल समूह को हम बादल के रूप में देखते हैं।

बादलों का वर्गीकरण (Classification of Clouds)

बादलों का वर्गीकरण मुख्य रूप से उनकी ऊँचाई (Altitude), स्वरूप (Appearance – आकार) और पारदर्शिता (Transparency) के आधार पर किया जाता है।

I. ऊँचाई के आधार पर वर्गीकरण (Based on Altitude)

I. उच्च मेघ (High Clouds)

(ऊँचाई: 6,000 – 12,000 मीटर / 20,000 – 40,000 फीट)
ये बादल पूरी तरह से बर्फ के सूक्ष्म कणों (Ice Crystals) से बने होते हैं। ये पतले, सफेद होते हैं और वर्षा नहीं करते।

1. पक्षाभ मेघ (Cirrus – Ci)

2. पक्षाभ-स्तरी मेघ (Cirrostratus – Cs)

3. पक्षाभ-कपासी मेघ (Cirrocumulus – Cc)


II. मध्य मेघ (Middle Clouds)

(ऊँचाई: 2,000 – 6,000 मीटर / 6,500 – 20,000 फीट)
ये बादल मुख्य रूप से जल की बूंदों से बने होते हैं, लेकिन ठंडे तापमान में इनमें बर्फ के कण भी हो सकते हैं। এদের নামের সাথে উপসর্গ 

4. उच्च-स्तरी मेघ (Altostratus – As)

5. उच्च-कपासी मेघ (Altocumulus – Ac)


III. निम्न मेघ (Low Clouds)

(ऊँचाई: धरातल से 2,000 मीटर / 6,500 फीट तक)
ये बादल मुख्य रूप से जल की बूंदों से बने होते हैं और धरातल के काफी निकट होते हैं।

6. स्तरी मेघ (Stratus – St)

7. स्तरी-कपासी मेघ (Stratocumulus – Sc)

8. वर्षा-स्तरी मेघ (Nimbostratus – Ns)


IV. ऊर्ध्वाधर विकास वाले मेघ (Clouds with Vertical Development)

ये बादल नीचे से लेकर बहुत ऊँचाई तक (क्षोभमंडल की ऊपरी सीमा तक) फैले हो सकते हैं। इनका निर्माण तीव्र संवहन धाराओं से होता है।

9. कपासी मेघ (Cumulus – Cu)

10. कपासी-वर्षी मेघ (Cumulonimbus – Cb)

बादलों का महत्व (Importance of Clouds)

  1. वर्षण का स्रोत: बादल ही पृथ्वी पर वर्षा और हिमपात का एकमात्र स्रोत हैं, जो जल चक्र और मीठे पानी की आपूर्ति के लिए अनिवार्य हैं।
  2. ऊष्मा बजट और एल्बिडो:
    • बादल सूर्य की लघु तरंग विकिरण को परावर्तित करके पृथ्वी को ठंडा रखने में मदद करते हैं (उच्च एल्बिडो)।
    • वे पृथ्वी से निकलने वाली दीर्घ तरंग विकिरण को सोखकर और वापस सतह की ओर उत्सर्जित करके उसे गर्म भी रखते हैं (ग्रीनहाउस प्रभाव)। बादलों से ढकी रातें साफ रातों की तुलना में गर्म होती हैं।
  3. ऊर्जा का स्थानांतरण: वे संघनन की प्रक्रिया के दौरान गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) को मुक्त करके वायुमंडल में ऊर्जा का पुनर्वितरण करते हैं।
  4. मौसम पूर्वानुमान: विभिन्न प्रकार के बादलों का अवलोकन मौसम में आने वाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाने में मदद करता है।

बादलों का वर्गीकरण: एक त्वरित सारांश तालिका

ऊँचाईबादल का प्रकार (संक्षिप्त नाम)मुख्य पहचानसंबंधित मौसम और वर्षण
उच्च मेघ (High)<br>(> 6,000 मीटर)<br>(बर्फ के कणों से निर्मित)पक्षाभ (Cirrus – Ci)पतला, सफेद, रेशेदार, पंख जैसाआमतौर पर साफ मौसम।
पक्षाभ-स्तरी (Cirrostratus – Cs)दूधिया चादर, सूर्य/चंद्रमा के चारों ओर प्रभामंडल (Halo)⋆ तूफान आने का अग्रिम संकेत।
पक्षाभ-कपासी (Cirrocumulus – Cc)छोटी सफेद लहरें, “मैकेरल स्काई”मौसम में बदलाव का संकेत।
मध्य मेघ (Middle)<br>(2,000 – 6,000 मी)उच्च-स्तरी (Altostratus – As)धूसर/नीली चादर, सूर्य धुंधला दिखता हैहल्की वर्षा या हिमपात संभव।
उच्च-कपासी (Altocumulus – Ac)सफेद/भूरे पैच, “भेड़ की ऊन” जैसेबाद में गरज-चमक हो सकती है।
निम्न मेघ (Low)<br>(< 2,000 मीटर)स्तरी (Stratus – St)धुंध जैसी भूरी परत, नीरस आकाशहल्की बूंदाबाँदी (Drizzle) या फुहार।
स्तरी-कपासी (Stratocumulus – Sc)लहरदार, गोलाकार समूहआमतौर पर वर्षण नहीं।
वर्षा-स्तरी (Nimbostratus – Ns)गहरी, मोटी, आकारहीन परत⋆ लगातार, लंबे समय तक हल्की से मध्यम वर्षा या हिमपात।
ऊर्ध्वाधर विकास (Vertical)<br>(सभी ऊँचाइयों पर)कपासी (Cumulus – Cu)रुई का ढेर, फूला हुआ, चपटा आधारआमतौर पर साफ मौसम (Fair Weather)।
कपासी-वर्षी (Cumulonimbus – Cb)विशाल, ऊँचा टॉवर, निहाई (Anvil) जैसा शीर्ष⋆ तड़ित-झंझा, मूसलाधार वर्षा, ओलावृष्टि, बवंडर। (चरम मौसम)

परीक्षा के लिए शीर्ष 5 तथ्य:

  1. प्रभामंडल (Halo): पक्षाभ-स्तरी (Cirrostratus) बादलों की पहचान है।
  2. लगातार वर्षा: वर्षा-स्तरी (Nimbostratus) बादलों से होती है।
  3. तड़ित-झंझा और ओलावृष्टि: कपासी-वर्षी (Cumulonimbus) बादलों से संबंधित हैं।
  4. साफ मौसम का बादल: आमतौर पर कपासी (Cumulus) बादल।
  5. मैकेरल स्काई: पक्षाभ-कपासी (Cirrocumulus) बादलों से बनता है।

मेघ गर्जन और तड़ित झंझा (Thunder and Thunderstorm)

मेघ गर्जन (Thunder) और उससे जुड़ी परिघटना तड़ित झंझा (Thunderstorm), वायुमंडल में होने वाली सबसे प्रभावशाली और शक्तिशाली मौसमी घटनाओं में से एक है। ये दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई हैं और इनका निर्माण कपासी-वर्षी मेघों (Cumulonimbus Clouds) के भीतर होता है।

1. तड़ित झंझा (Thunderstorm): निर्माण प्रक्रिया

तड़ित झंझा एक ऐसा तूफान है जिसमें बिजली का चमकना (Lightning) और बादलों का गरजना (Thunder) दोनों शामिल होते हैं। यह तीव्र ऊर्ध्वाधर (Vertical) वायु गतियों का परिणाम है।

निर्माण के लिए आवश्यक दशाएँ:

  1. गर्म और अत्यधिक आर्द्र हवा: सतह पर गर्म और नमी से भरी हवा की उपस्थिति, जो अस्थिरता (Instability) पैदा करती है।
  2. तीव्र संवहन (Strong Convection): किसी भी कारक (जैसे तीव्र सौर तापन, पर्वतीय ढलान, या वाताग्र) द्वारा इस गर्म, नम हवा का तेजी से ऊपर की ओर उठना।
  3. वायुमंडलीय अस्थिरता: क्षोभमंडल में ऐसी स्थिति जहाँ ऊपर की हवा नीचे की हवा की तुलना में ठंडी हो, ताकि ऊपर उठती हवा को लगातार Auftrieb (buoyancy) मिलती रहे।

तड़ित झंझा के विकास के चरण (Stages of Thunderstorm Development):


2. तड़ित (Lightning): बिजली का चमकना


3. मेघ गर्जन (Thunder): बादलों का गरजना

लाइटनिंग और थंडर: एक साथ, पर दिखते और सुनते अलग-अलग

निष्कर्ष:
मेघ गर्जन और तड़ित झंझा प्रकृति की सबसे ऊर्जावान घटनाओं में से हैं, जो कपासी-वर्षी मेघों की अस्थिरता और शक्तिशाली गतिकी का परिणाम हैं। बिजली चमकना आवेशों के पृथक्करण से उत्पन्न विद्युत विसर्जन है, और उसी बिजली द्वारा हवा के अत्यधिक गर्म होने और विस्फोटक रूप से फैलने से उत्पन्न ध्वनि को मेघ गर्जन कहते हैं।


बादल और वर्षा (Clouds and Precipitation) से संबंधित तथ्य

  1. रुद्धोष्म शीतलन (Adiabatic Cooling): बादलों के निर्माण का मुख्य कारण ऊपर उठती हवा का बिना बाहरी ऊष्मा के आदान-प्रदान के फैलकर ठंडा होना है।
  2. वर्षा लाने वाले बादल: जिन बादलों के नाम में “निंबस” (Nimbus) या “निंबो” शब्द जुड़ा हो, वे वर्षा करते हैं (जैसे निंबोस्ट्रेटस, क्यूम्युलोनिम्बस)।
  3. लगातार और हल्की वर्षा: वर्षा-स्तरी मेघ (Nimbostratus) से लंबे समय तक हल्की से मध्यम वर्षा होती है।
  4. तड़ित-झंझा और ओलावृष्टि: ⋆ कपासी-वर्षी मेघ (Cumulonimbus) गरज-चमक, मूसलाधार वर्षा, ओलावृष्टि और बवंडर जैसी चरम मौसमी घटनाओं से संबंधित हैं। [UPSC, BPSC, UPPSC]
  5. सूर्य/चंद्रमा का प्रभामंडल (Halo): यह पक्षाभ-स्तरी मेघों (Cirrostratus) द्वारा बनाया जाता है, जो बर्फ के क्रिस्टलों से बने होते हैं। [State PSC]
  6. “मैकेरल स्काई”: पक्षाभ-कपासी मेघों (Cirrocumulus) द्वारा बनने वाली लहरदार संरचना।
  7. साफ मौसम का बादल: आमतौर पर कपासी मेघ (Cumulus) को सुंदर और साफ मौसम का प्रतीक माना जाता है।
  8. संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall): भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में आम है और अक्सर दोपहर बाद होती है।
  9. पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall):
    • पवनमुखी ढाल (Windward side): भारी वर्षा होती है।
    • पवनविमुखी ढाल (Leeward side): वृष्टि-छाया प्रदेश (Rain-shadow Area) कहलाता है, जहाँ बहुत कम वर्षा होती है। (उदाहरण: पश्चिमी घाट का पूर्वी ढलान)।
  10. मेघ गर्जन का कारण: ⋆ बिजली (तड़ित) द्वारा हवा के अचानक और विस्फोटक रूप से गर्म होकर फैलने से उत्पन्न ध्वनि तरंग।
  11. बिजली और गरज का समय: बिजली का चमकना और गरज का होना एक ही समय पर होता है, लेकिन प्रकाश की गति ध्वनि से तेज होने के कारण हमें बिजली पहले दिखाई देती है।
  12. बादलों से ढकी रातें गर्म क्यों होती हैं? बादल पृथ्वी से निकलने वाली दीर्घ तरंग पार्थिव विकिरण (Longwave Terrestrial Radiation) को वापस सतह की ओर परावर्तित कर देते हैं (ग्रीनहाउस प्रभाव), जिससे ऊष्मा फंसी रहती है।
  13. अम्लीय वर्षा (Acid Rain): वायुमंडल में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) जब वर्षा के जल से क्रिया करते हैं, तो सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड बनाते हैं, जिससे अम्लीय वर्षा होती है।