जलवायु विज्ञान (Climatology)
जलवायु विज्ञान वह विज्ञान है जो पृथ्वी की जलवायु, उसके घटकों, उसे नियंत्रित करने वाले कारकों और लंबी अवधि (आमतौर पर 30-35 वर्ष) में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करता है। यह वायुमंडलीय विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है।
वायुमंडल: संघटन और संरचना (Atmosphere: Composition and Structure)
वायुमंडल पृथ्वी के चारों ओर फैले गैसों के विशाल आवरण या लिफाफे को कहते हैं, जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उससे जुड़ा हुआ है। यह वायुमंडल ही पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक दशाओं (जैसे तापमान का संतुलन, हानिकारक विकिरण से सुरक्षा) को बनाए रखता है।
I. वायुमंडल का संघटन (Composition of the Atmosphere)
वायुमंडल कई गैसों, जलवाष्प और धूलकणों का मिश्रण है।
A. वायुमंडल की गैसें (Gases of the Atmosphere)
वायुमंडल की गैसों को उनकी मात्रा और स्थिरता के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
- स्थिर या स्थायी गैसें (Stable/Permanent Gases):
- ये वे गैसें हैं जिनकी मात्रा वायुमंडल में लगभग स्थिर रहती है।
- प्रमुख गैसें:
| गैस का नाम | रासायनिक सूत्र | आयतन (%) | प्रमुख तथ्य |
| नाइट्रोजन | N₂ | 78.08% | ⋆ वायुमंडल में सर्वाधिक मात्रा में पाई जाने वाली गैस। [SSC/Railways]<br>✓ यह प्रत्यक्ष रूप से जीवन के लिए उपयोगी नहीं है, लेकिन पौधे इसे नाइट्रेट के रूप में ग्रहण करते हैं।<br>✓ यह आग को नियंत्रित करने में सहायक है। |
| ऑक्सीजन | O₂ | 20.95% | ⋆ यह प्राणवायु है; श्वसन क्रिया के लिए आवश्यक।<br>✓ वस्तुओं के जलने (दहन) के लिए आवश्यक है। |
| ऑर्गन | Ar | 0.93% | ⋆ वायुमंडल में पाई जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी गैस और सबसे प्रचुर अक्रिय (Inert) गैस। |
| अन्य | निऑन, हीलियम, क्रिप्टन, हाइड्रोजन | < 0.01% | ये बहुत कम मात्रा में पाई जाने वाली अक्रिय गैसें हैं। |
अस्थिर या परिवर्तनशील गैसें (Variable Gases):- ये वे गैसें हैं जिनकी मात्रा स्थान और समय के साथ बदलती रहती है। ये जलवायु और मौसम की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- प्रमुख गैसें:
| गैस का नाम | रासायनिक सूत्र | आयतन (%) | प्रमुख तथ्य और PYQ लिंक |
| कार्बन डाइऑक्साइड | CO₂ | ~0.04% (लगातार बढ़ रही है) | ⋆ यह ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।<br>✓ यह सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है, लेकिन पार्थिव विकिरण (पृथ्वी से निकली गर्मी) को अवशोषित करती है, जिससे वायुमंडल गर्म होता है।<br>✓ पौधे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के लिए इसका उपयोग करते हैं। [UPSC 2017] |
| ओजोन | O₃ | बहुत कम | ⋆ यह मुख्य रूप से समतापमंडल (Stratosphere) में 15-35 किमी की ऊँचाई पर पाई जाती है।<br>✓ यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (Ultraviolet – UV) विकिरण को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।<br>✓ इसकी परत का क्षरण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) से होता है। [UPPSC/State PSC] |
B. जलवाष्प (Water Vapour)
- स्रोत: महासागरों, झीलों और वनस्पतियों से वाष्पीकरण द्वारा वायुमंडल में पहुँचती है।
- वितरण: इसकी मात्रा भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर घटती जाती है। गर्म और आर्द्र क्षेत्रों में यह 4% तक, जबकि शुष्क मरुस्थलों में 1% से भी कम हो सकती है।
- महत्व:
- ⋆ यह एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है और कार्बन डाइऑक्साइड से भी अधिक ऊष्मा अवशोषित करती है।
- ✓ सभी प्रकार के संघनन (Condensation) (जैसे बादल, कोहरा, ओस) और वर्षण (Precipitation) (वर्षा, हिमपात) के लिए जलवाष्प ही उत्तरदायी है।
C. धूलकण (Dust Particles/Aerosols)
- स्रोत: धूल, समुद्री नमक, राख, धुआँ, परागकण आदि।
- महत्व:
- ✓ आर्द्रताग्राही नाभिक (Hygroscopic Nuclei): ये धूलकण जलवाष्प के संघनन के लिए आधार प्रदान करते हैं। इनके बिना बादलों का निर्माण नहीं हो सकता।
- ✓ ये सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आकाश के लाल और नारंगी रंगों के लिए उत्तरदायी होते हैं (प्रकाश का प्रकीर्णन – Scattering of Light)।
- ✓ ये सौर विकिरण को परावर्तित और अवशोषित करके पृथ्वी के ताप बजट को प्रभावित करते हैं।
II. वायुमंडल की संरचना (Structure of the Atmosphere)
वायुमंडल को तापमान और घनत्व में ऊर्ध्वाधर (Vertical) परिवर्तन के आधार पर पाँच प्रमुख परतों में विभाजित किया गया है।
[आरेख: पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर पाँचों परतों (क्षोभमंडल, समतापमंडल, मध्यमंडल, तापमंडल, बहिर्मंडल) को क्रम से दर्शाने वाला एक चित्र। प्रत्येक परत की ऊँचाई और तापमान की प्रवृत्ति (घटता/बढ़ता) को एक ग्राफ के माध्यम से दिखाया जाए।]
| परत का नाम (Name of the Layer) | औसत ऊँचाई (Altitude) | तापमान की प्रवृत्ति (Temperature Trend) | प्रमुख विशेषताएँ और PYQ लिंक |
| 1. क्षोभमंडल (Troposphere) | 0 से 13 किमी (ध्रुवों पर ~8 किमी, भूमध्य रेखा पर ~18 किमी) | ऊँचाई के साथ घटता है (लगभग 6.5°C प्रति किमी की दर से, जिसे ‘सामान्य ह्रास दर’ कहते हैं) | ⋆ यह वायुमंडल की सबसे निचली और सबसे सघन परत है। ✓ मौसम संबंधी सभी घटनाएँ (जैसे बादल बनना, वर्षा, तूफान, बिजली चमकना) इसी परत में होती हैं। ✓ वायुमंडल के कुल द्रव्यमान का लगभग 75% इसी परत में है। [UPSC Prelims] |
| 2. समतापमंडल (Stratosphere) | 13 से 50 किमी | ऊँचाई के साथ बढ़ता है | ⋆ इस परत में तापमान बढ़ने का मुख्य कारण ओजोन परत (Ozone Layer) की उपस्थिति है, जो पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है। ✓ यहाँ बादल और मौसम संबंधी घटनाएँ लगभग नहीं होतीं, इसलिए यह वायुयान उड़ाने के लिए आदर्श परत है। [State PSC] |
| 3. मध्यमंडल (Mesosphere) | 50 से 80 किमी | ऊँचाई के साथ घटता है | ⋆ यह वायुमंडल की सबसे ठंडी परत है; यहाँ तापमान -100°C तक पहुँच जाता है। ✓ अंतरिक्ष से आने वाले उल्कापिंड (Meteors) इसी परत में जलकर नष्ट हो जाते हैं। |
| 4. तापमंडल या आयनमंडल (Thermosphere / Ionosphere) | 80 से 400 किमी | ऊँचाई के साथ तेजी से बढ़ता है | ⋆ यहाँ मौजूद गैसों के कण सूर्य से आने वाली X-किरणों और UV-किरणों के कारण आयनित (Ionized) हो जाते हैं। ✓ आयनों की उपस्थिति के कारण यह परत रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है, जिससे रेडियो संचार संभव हो पाता है। [UPSC 2015] ✓ यहाँ औरोरा (Aurora Borealis / Australis) जैसी घटनाएँ होती हैं। |
| 5. बहिर्मंडल (Exosphere) | 400 किमी से ऊपर | लगातार बढ़ता है | ⋆ यह वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है। ✓ यहाँ वायु बहुत विरल होती है और हल्की गैसें (जैसे हाइड्रोजन और हीलियम) पाई जाती हैं। ✓ अंततः यह परत अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है। |
1. क्षोभमंडल (Troposphere)
क्षोभमंडल (ग्रीक शब्द ‘Tropos’ अर्थात ‘परिवर्तन’ या ‘मिश्रण’ और ‘sphaira’ अर्थात ‘गोला’) पृथ्वी के वायुमंडल की सबसे निचली, सबसे घनी और सबसे महत्वपूर्ण परत है। यह पृथ्वी की सतह से सीधे संपर्क में होती है और इसी परत में हम सभी जीव रहते हैं और साँस लेते हैं। “क्षोभ” का अर्थ विक्षोभ या परिवर्तन होता है, और यह नाम इस परत के लिए उपयुक्त है क्योंकि लगभग सभी मौसम संबंधी घटनाएँ यहीं घटित होती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- ऊँचाई (Altitude):
- इस परत की औसत ऊँचाई पृथ्वी की सतह से लगभग 13 किलोमीटर है।
- हालांकि, इसकी ऊँचाई भूमध्य रेखा और ध्रुवों पर भिन्न होती है:
- भूमध्य रेखा पर: लगभग 18 किलोमीटर। इसका कारण यह है कि भूमध्य रेखा पर तीव्र संवहन धाराओं (Convection Currents) के कारण गर्म हवा अधिक ऊँचाई तक उठती है।
- ध्रुवों पर: लगभग 8 किलोमीटर। यहाँ ठंडी हवा के कारण संवहन कमजोर होता है, जिससे परत की ऊँचाई कम होती है।
- ग्रीष्मकाल में इसकी ऊँचाई शीतकाल की तुलना में थोड़ी अधिक हो जाती है।
- तापमान की प्रवृत्ति (Temperature Trend):
- ⋆ क्षोभमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है।
- यह गिरावट एक औसत दर से होती है, जिसे सामान्य ह्रास दर या सामान्य ताप पतन दर (Normal Lapse Rate) कहा जाता है।
- सामान्य ह्रास दर: लगभग 6.5°C प्रति 1000 मीटर (या 1 किलोमीटर) की ऊँचाई पर। [UPPSC/State PSC]
- कारण: क्षोभमंडल मुख्य रूप से सूर्य की सीधी किरणों से गर्म नहीं होता, बल्कि यह नीचे से, पृथ्वी की सतह से निकलने वाले पार्थिव विकिरण (Terrestrial Radiation) द्वारा गर्म होता है। जैसे-जैसे हम सतह से ऊपर जाते हैं, इस ऊष्मा का प्रभाव कम होता जाता है और तापमान गिरता जाता है।
- घनत्व और वायुदाब (Density and Air Pressure):
- गुरुत्वाकर्षण के कारण, वायुमंडल के कुल द्रव्यमान का लगभग 75% से 80% हिस्सा इसी परत में केंद्रित है।
- यह वायुमंडल की सबसे घनी (Densest) परत है।
- ऊँचाई बढ़ने के साथ वायु का घनत्व और वायुदाब तेजी से घटता है।
- मौसम संबंधी घटनाएँ (Weather Phenomena):
- ⋆ मौसम और जलवायु से संबंधित लगभग सभी घटनाएँ क्षोभमंडल में ही घटित होती हैं।
- कारण: वायुमंडल की लगभग सारी जलवाष्प (Water Vapour) और धूलकण (Dust Particles) इसी परत में पाए जाते हैं, जो बादलों के निर्माण, संघनन और वर्षण के लिए आवश्यक हैं।
- प्रमुख घटनाएँ: बादल बनना, वर्षा, कोहरा, ओस, पाला, हिमपात, आँधी, तूफान, तड़ित झंझा (Thunderstorms), और चक्रवात। [UPSC Prelims – Conceptual]
क्षोभसीमा (Tropopause)
- परिभाषा: यह क्षोभमंडल और उसके ऊपर स्थित समतापमंडल के बीच की एक संक्रमणकालीन (Transitional) सीमा है। यह लगभग 1.5 किलोमीटर मोटी होती है।
- विशेषताएँ:
- यह वह ऊँचाई है जहाँ तापमान का गिरना बंद हो जाता है। इस सीमा पर तापमान लगभग स्थिर रहता है (भूमध्य रेखा पर लगभग -80°C और ध्रुवों पर लगभग -45°C)।
- यह एक “ढक्कन” की तरह काम करती है जो क्षोभमंडल की अधिकांश संवहन धाराओं और मौसम प्रणालियों को समतापमंडल में जाने से रोकती है।
- जेट स्ट्रीम (Jet Streams): ⋆ शक्तिशाली और तीव्र गति वाली पवन धाराएँ, जिन्हें जेट स्ट्रीम कहते हैं, इसी क्षोभसीमा के पास चलती हैं। [UPSC 2017]
क्षोभमंडल का महत्व (Importance of Troposphere)
- जीवन का आधार:
- यह पृथ्वी पर सभी जीवों (मनुष्य, जानवर, पौधे) के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
- जीवन के लिए आवश्यक गैसें, जैसे ऑक्सीजन (श्वसन के लिए) और कार्बन डाइऑक्साइड (प्रकाश संश्लेषण के लिए), इसी परत में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती हैं।
- जल चक्र (Water Cycle):
- वायुमंडल की लगभग संपूर्ण जलवाष्प इसी परत में होती है, जिससे जल चक्र की सभी प्रक्रियाएँ (वाष्पीकरण, संघनन, वर्षण) यहीं संपन्न होती हैं, जो पृथ्वी पर मीठे पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करती हैं।
- मौसम और जलवायु का नियंत्रक:
- यह परत पृथ्वी के मौसम और जलवायु को नियंत्रित करती है। सौर ऊर्जा का वितरण और ऊष्मा का संतुलन यहीं होता है।
- ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect):
- क्षोभमंडल में मौजूद ग्रीनहाउस गैसें (जलवाष्प, CO₂) पृथ्वी से उत्सर्जित ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को रात में अत्यधिक ठंडा होने से बचाती हैं और एक औसत तापमान बनाए रखती हैं।
निष्कर्ष: क्षोभमंडल एक अत्यंत गतिशील परत है, जो निरंतर परिवर्तन और मिश्रण की स्थिति में रहती है। पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने और हमारे दैनिक मौसम को आकार देने में इसकी भूमिका सर्वोपरि है।
2. समतापमंडल (Stratosphere)
समतापमंडल (अंग्रेजी: Stratosphere, लैटिन शब्द ‘Stratus’ अर्थात ‘फैलाव’ या ‘परत’) पृथ्वी के वायुमंडल की वह परत है जो क्षोभमंडल (Troposphere) के ठीक ऊपर और मध्यमंडल (Mesosphere) के नीचे स्थित होती है। “समताप” का अर्थ है ‘समान ताप’, हालांकि इस परत में तापमान समान नहीं रहता, बल्कि ऊँचाई के साथ बढ़ता है। यह परत शांत वायुमंडलीय दशाओं और जीवन-रक्षक ओजोन परत की उपस्थिति के लिए जानी जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- ऊँचाई (Altitude):
- यह क्षोभसीमा (Tropopause) से शुरू होकर लगभग 50 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैली हुई है। इसकी निचली सीमा की ऊँचाई अक्षांशों के अनुसार बदलती रहती है (भूमध्य रेखा पर ~18 किमी से शुरू, ध्रुवों पर ~8 किमी से)।
- तापमान की प्रवृत्ति (Temperature Trend):
- ⋆ समतापमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान बढ़ता है। यह क्षोभमंडल के ठीक विपरीत प्रवृत्ति है।
- तापमान क्षोभसीमा पर लगभग -60°C (स्थान के अनुसार) से बढ़कर समतापमंडल की ऊपरी सीमा (समतापसीमा) पर लगभग 0°C तक पहुँच जाता है।
- कारण: ⋆ इस परत में तापमान बढ़ने का मुख्य कारण यहाँ मौजूद ओजोन परत (Ozone Layer) है। ओजोन गैस सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (Ultraviolet – UV) विकिरण को अवशोषित करती है। इस ऊर्जा के अवशोषण से यह परत गर्म हो जाती है। [UPSC/State PSC]
- वायुमंडलीय दशाएँ (Atmospheric Conditions):
- शांत परत: क्षोभमंडल के विपरीत, यह एक अत्यंत शांत परत है। इसमें संवहन धाराएँ और ऊर्ध्वाधर (vertical) वायु मिश्रण लगभग अनुपस्थित होता है।
- शुष्कता: यह परत बहुत शुष्क होती है और इसमें जलवाष्प लगभग नहीं पाई जाती।
- बादलों का अभाव: जलवाष्प की कमी के कारण यहाँ सामान्य बादलों (जैसे कपासी, स्तरी) का निर्माण नहीं होता है। हालांकि, कभी-कभी ध्रुवीय क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान बहुत ऊँचाई पर पतले बादल दिखाई देते हैं, जिन्हें ‘मुक्ताभ मेघ’ (Nacreous Clouds or Mother-of-pearl clouds) कहा जाता है।
समतापमंडल की महत्वपूर्ण परतें और घटनाएँ
- 1. ओजोन परत (Ozone Layer) या ओजोनमंडल (Ozonosphere):
- ⋆ यह समतापमंडल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
- अवस्थिति: ओजोन (O₃) गैस का सर्वाधिक सांद्रण (Concentration) इसी परत में, मुख्य रूप से 15 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई के बीच, पाया जाता है।
- कार्य: यह परत पृथ्वी के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों (UV-B and UV-C) का 97-99% हिस्सा अवशोषित कर लेती है, जो पृथ्वी पर जीवन के लिए घातक हो सकती हैं। UV किरणें मनुष्यों में त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करने का कारण बन सकती हैं।
- ओजोन क्षरण (Ozone Depletion): ⋆ मानव-जनित रसायनों, विशेषकर क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हैलोन और नाइट्रस ऑक्साइड, के कारण ओजोन परत का क्षरण हो रहा है, जिसे ‘ओजोन छिद्र’ (Ozone Hole) कहा जाता है। यह छिद्र मुख्य रूप से अंटार्कटिका के ऊपर पाया गया है। [UPPSC/BPSC]
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol, 1987) ओजोन परत के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
- 2. वायुयान का परिचालन (Aviation):
- ⋆ समतापमंडल की शांत वायुमंडलीय दशाओं, बादलों और मौसमी गड़बड़ी की अनुपस्थिति के कारण, वाणिज्यिक जेट विमान (Jet Aircraft) लंबी दूरी की यात्रा के लिए अक्सर इसी परत के निचले हिस्से में उड़ान भरना पसंद करते हैं। इससे उन्हें बेहतर ईंधन दक्षता मिलती है और यात्रा आरामदायक होती है। [State PSC]
समतापसीमा (Stratopause)
- परिभाषा: यह समतापमंडल और उसके ऊपर स्थित मध्यमंडल के बीच की संक्रमणकालीन सीमा है।
- विशेषता: यह वह ऊँचाई (~50 किमी) है जहाँ तापमान का बढ़ना बंद हो जाता है और यह अपने अधिकतम (~0°C) पर पहुँच जाता है। इसके बाद, मध्यमंडल में तापमान फिर से घटने लगता है।
समतापमंडल का महत्व (Importance of Stratosphere)
- जीवन की रक्षा: ओजोन परत के माध्यम से हानिकारक UV विकिरण से पृथ्वी पर जीवन (मनुष्यों, जानवरों और पौधों) की रक्षा करना।
- सुरक्षित हवाई यात्रा: वायुयानों के लिए एक स्थिर और सुरक्षित उड़ान मार्ग प्रदान करना।
- ऊष्मा का संतुलन: UV विकिरण को अवशोषित करके यह पृथ्वी के ऊर्जा बजट को प्रभावित करता है और वायुमंडल की तापीय संरचना को बनाए रखने में मदद करता है।
निष्कर्ष: समतापमंडल, हालांकि मौसम की दृष्टि से शांत है, पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी ओजोन परत एक अदृश्य लेकिन अनिवार्य ढाल है, जिसका संरक्षण वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौती है।
3. मध्यमंडल (Mesosphere)
मध्यमंडल (ग्रीक शब्द ‘Mesos’ अर्थात ‘मध्य’) पृथ्वी के वायुमंडल की वह परत है जो समतापमंडल (Stratosphere) के ठीक ऊपर और तापमंडल (Thermosphere) के नीचे स्थित होती है। यह वायुमंडल की संरचना में एक महत्वपूर्ण मध्यवर्ती परत का काम करती है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- ऊँचाई (Altitude):
- यह समतापसीमा (Stratopause) से, जो लगभग 50 किलोमीटर की ऊँचाई पर है, शुरू होकर लगभग 80 से 85 किलोमीटर की ऊँचाई तक फैली हुई है।
- तापमान की प्रवृत्ति (Temperature Trend):
- ⋆ मध्यमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान तेजी से घटता है। यह क्षोभमंडल के समान लेकिन अधिक तीव्र प्रवृत्ति है।
- समतापसीमा पर तापमान लगभग 0°C से गिरकर मध्यमंडल की ऊपरी सीमा, यानी मध्यसीमा (Mesopause) पर, वायुमंडल के न्यूनतम तापमान तक पहुँच जाता है।
- ⋆ मध्यसीमा पर तापमान -90°C से -100°C (-130°F से -148°F) तक गिर सकता है, जो इसे पृथ्वी के वायुमंडल का सबसे ठंडा स्थान बनाता है। [SSC, Railways – Fact-Based Question]
- कारण: इस परत में ओजोन जैसी कोई गैस नहीं होती है जो सौर विकिरण को अवशोषित कर सके। साथ ही, यहाँ वायु अत्यंत विरल होती है, लेकिन इतनी सघन होती है कि कार्बन डाइऑक्साइड द्वारा ऊष्मा के विकिरण (Radiative Cooling) से यह परत ठंडी हो जाती है।
- वायुमंडलीय दशाएँ (Atmospheric Conditions):
- अत्यंत विरल वायु: इस परत में वायु का घनत्व बहुत कम होता है। यहाँ का वायुदाब समुद्री सतह की तुलना में लगभग एक हजार से दस हजार गुना कम होता है।
- मनुष्यों के लिए साँस लेना असंभव है और बिना विशेष सूट के रक्त उबलने लगेगा।
मध्यमंडल की सबसे महत्वपूर्ण परिघटना
- उल्काओं का जलना (Burning of Meteors):
- ⋆ अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने वाले अधिकांश उल्कापिंड (Meteoroids) या “टूटते तारे” (Shooting Stars) इसी मध्यमंडल में जलकर नष्ट हो जाते हैं। [UPSC 2011 Prelims, BPSC, UPPSC – Multiple Times]
- कारण: जब उल्कापिंड अत्यधिक तीव्र गति से (लगभग 30,000 मील प्रति घंटे) इस परत में प्रवेश करते हैं, तो यहाँ मौजूद गैस के कणों के साथ उनके घर्षण (Friction) से अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिससे वे जल उठते हैं और एक चमकदार धारी बनाते हुए भस्म हो जाते हैं।
- महत्व: यह परत एक प्रकार से पृथ्वी के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती है, जो हमें अंतरिक्ष के मलबे से बचाती है।
मध्यमंडल की अन्य घटनाएँ
- निशादीप्त मेघ या नॉक्टिल्यूसेंट क्लाउड (Noctilucent Clouds – NLCs):
- ⋆ ये पृथ्वी के वायुमंडल में बनने वाले सबसे ऊँचे बादल हैं।
- निर्माण: ये बादल मध्यसीमा के पास, बहुत ठंडे तापमान में, छोटे धूल कणों (अक्सर उल्काओं से आए हुए) पर जमे हुए पानी के बर्फ के क्रिस्टल से बनते हैं।
- दिखना: ये केवल गर्मियों में, उच्च अक्षांशों (ध्रुवों के पास) पर, सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले दिखाई देते हैं, जब सूर्य क्षितिज के नीचे होता है लेकिन इन बादलों को प्रकाशित करने के लिए पर्याप्त ऊँचा होता है। इन्हें “रात में चमकने वाले बादल” (Night-shining clouds) भी कहा जाता है। [UPSC Prelims – Advanced Concept]
- वायुदीप्ति (Airglow): यह मध्यमंडल और तापमंडल में होने वाली एक बहुत हल्की और स्थायी प्रकाश की घटना है, जो सूर्य के विकिरण द्वारा परमाणुओं और अणुओं के उत्तेजित होने के कारण होती है।
मध्यसीमा (Mesopause)
- परिभाषा: यह मध्यमंडल और उसके ऊपर स्थित तापमंडल (आयनमंडल) के बीच की संक्रमणकालीन सीमा है।
- विशेषता:
- ⋆ यह पृथ्वी के वायुमंडल का सबसे ठंडा क्षेत्र है, जहाँ तापमान अपने न्यूनतम स्तर पर होता है। [CGPSC, SSC]
- इस सीमा के ऊपर, तापमंडल में, तापमान फिर से तेजी से बढ़ने लगता है।
परीक्षा के दृष्टिकोण से मध्यमंडल के टॉप 3 तथ्य
- उल्काओं का जलना: अधिकांश उल्कापिंड इसी परत में जलते हैं। यह सबसे ज्यादा बार पूछा जाने वाला प्रश्न है।
- सबसे ठंडी परत: मध्यमंडल की ऊपरी सीमा (मध्यसीमा) वायुमंडल का सबसे ठंडा स्थान है।
- सबसे ऊँचे बादल: निशादीप्त मेघ (Noctilucent Clouds) इसी परत में बनते हैं।
4. तापमंडल या आयनमंडल (Thermosphere or Ionosphere)
तापमंडल (ग्रीक शब्द ‘Thermos’ अर्थात ‘ऊष्मा’) पृथ्वी के वायुमंडल की वह परत है जो मध्यमंडल (Mesosphere) के ठीक ऊपर और बहिर्मंडल (Exosphere) के नीचे स्थित होती है। इस परत का नाम इसके अत्यधिक उच्च तापमान के कारण रखा गया है। तापमंडल का निचला हिस्सा आयनमंडल (Ionosphere) कहलाता है, जो रेडियो संचार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- ऊँचाई (Altitude):
- यह मध्यसीमा (Mesopause) से, जो लगभग 80 किलोमीटर की ऊँचाई पर है, शुरू होकर लगभग 400 से 600 किलोमीटर (या उससे भी अधिक) की ऊँचाई तक फैली हुई है। इसकी ऊपरी सीमा स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है।
- तापमान की प्रवृत्ति (Temperature Trend):
- ⋆ तापमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान बहुत तेजी से बढ़ता है।
- मध्यसीमा पर तापमान लगभग -90°C से बढ़कर इस परत के ऊपरी हिस्सों में 1500°C से 2000°C या उससे भी अधिक हो सकता है।
- कारण:
- सौर विकिरण का अवशोषण: इस परत में मौजूद बहुत विरल गैसों के अणु और परमाणु (जैसे ऑक्सीजन और नाइट्रोजन) सूर्य से आने वाली अत्यधिक ऊर्जा वाली छोटी तरंग दैर्ध्य की विकिरण, जैसे एक्स-किरणें (X-rays) और पराबैंगनी किरणें (Ultraviolet rays), को सीधे अवशोषित करते हैं। इस ऊर्जा के अवशोषण से कणों की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) बहुत बढ़ जाती है, जिसे हम उच्च तापमान के रूप में मापते हैं।
- महसूस होने वाली गर्मी: ⋆ हालांकि यहाँ तापमान बहुत अधिक होता है, लेकिन एक सामान्य थर्मामीटर इसे माप नहीं पाएगा और न ही किसी व्यक्ति को यहाँ गर्मी महसूस होगी। इसका कारण यह है कि इस परत में वायु अत्यंत विरल (extremely thin) होती है। कण एक-दूसरे से बहुत दूर होते हैं, इसलिए वे पर्याप्त मात्रा में ऊष्मा को किसी वस्तु (जैसे अंतरिक्ष यात्री) तक स्थानांतरित (transfer) नहीं कर पाते। [UPSC – Conceptual Clarity Question]
आयनमंडल (Ionosphere): तापमंडल का एक महत्वपूर्ण उप-भाग
आयनमंडल कोई अलग परत नहीं है, बल्कि यह मध्यमंडल के ऊपरी भाग, संपूर्ण तापमंडल और बहिर्मंडल के निचले भाग में फैली एक आवेशित परत है। हालांकि, इसका अधिकांश और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा तापमंडल में ही होता है।
- निर्माण:
- ⋆ सूर्य से आने वाली उच्च ऊर्जा वाली एक्स-किरणों और UV किरणों की बमबारी से इस परत में मौजूद गैसों के परमाणु और अणु अपने इलेक्ट्रॉन खो देते हैं और विद्युत आवेशित कणों या ‘आयनों’ (Ions) में बदल जाते हैं। इसी प्रक्रिया को आयनन (Ionization) कहते हैं।
- रेडियो संचार में भूमिका (Role in Radio Communication):
- ⋆ यह आयनमंडल की सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक उपयोगिता है।
- आयनमंडल की विभिन्न परतें (मुख्य रूप से D, E, और F परतें) पृथ्वी से प्रसारित की जाने वाली कम आवृत्ति (Low Frequency) की रेडियो तरंगों को परावर्तित (Reflect) करके वापस पृथ्वी पर भेज देती हैं।
- इसी परावर्तन के कारण लंबी दूरी का रेडियो संचार (Radio Communication) और प्रसारण (Broadcasting) संभव हो पाता है। इसके बिना, रेडियो सिग्नल सीधे अंतरिक्ष में चले जाते। [UPSC 2015 Prelims, BPSC, UPPSC]
| आयनमंडल की परत | ऊँचाई (किमी) | विशेषता |
| D परत | ~ 60-90 | निम्न आवृत्ति की रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है, लेकिन मध्यम और उच्च को अवशोषित कर लेती है। |
| E परत (केनेली-हेविसाइड परत) | ~ 90-150 | मध्यम और उच्च आवृत्ति की तरंगों को परावर्तित करती है। |
| F परत (एपेलटन परत) | ~ 150-400 | यह F1 और F2 में विभाजित होती है; यह लघु तरंग (Shortwave) रेडियो के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। |
अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station – ISS):- ⋆ ISS और कई अन्य उपग्रह (Satellites) इसी तापमंडल में पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। [General Science/SSC]
मध्यमंडल की अन्य महत्वपूर्ण परिघटनाएँ
- औरोरा (Aurora Borealis and Aurora Australis):
- ⋆ यह ध्रुवीय क्षेत्रों के आकाश में दिखाई देने वाला एक अद्भुत, रंगीन और गतिशील प्रकाश है, जिसे ‘ध्रुवीय ज्योति’ भी कहते हैं।
- कारण: जब सूर्य से आने वाले आवेशित कण (सौर पवन – Solar Wind) पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराते हैं, तो वे तापमंडल में मौजूद ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के परमाणुओं से क्रिया करते हैं। इस क्रिया से ये परमाणु ऊर्जावान हो जाते हैं और प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं।
- उत्तरी गोलार्ध में इसे ‘औरोरा बोरेलिस’ (Aurora Borealis) या उत्तरी ज्योति कहा जाता है।
- दक्षिणी गोलार्ध में इसे ‘औरोरा ऑस्ट्रेलिस’ (Aurora Australis) या दक्षिणी ज्योति कहा जाता है।
- [UPSC Prelims, CGL – Fact-Based Question]
निष्कर्ष: तापमंडल और इसका आयनित हिस्सा (आयनमंडल) तापमान और घनत्व के मामले में एक चरम वातावरण प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इनकी भूमिका आधुनिक संचार प्रणालियों और पृथ्वी को सौर विकिरण से बचाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वह परत है जहाँ अंतरिक्ष और पृथ्वी का वायुमंडल एक-दूसरे से मिलते हैं।
5. बहिर्मंडल (Exosphere)
बहिर्मंडल (ग्रीक शब्द ‘Exo’ अर्थात ‘बाहर’) पृथ्वी के वायुमंडल की सबसे बाहरी और सबसे पतली परत है। यह तापमंडल (Thermosphere) के ऊपर स्थित है और धीरे-धीरे अंतरिक्ष (Outer Space) के निर्वात (Vacuum) में विलीन हो जाती है। इसकी कोई स्पष्ट ऊपरी सीमा नहीं है, लेकिन इसे आमतौर पर पृथ्वी की सतह से हजारों किलोमीटर तक फैला हुआ माना जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- ऊँचाई (Altitude):
- यह तापसीमा (Thermopause), जो लगभग 400 से 600 किलोमीटर की ऊँचाई पर होती है, से शुरू होकर लगभग 10,000 किलोमीटर (6,200 मील) या उससे भी अधिक ऊँचाई तक विस्तृत है। कुछ वैज्ञानिक इसकी ऊपरी सीमा 1,90,000 किमी (चंद्रमा की आधी दूरी) तक मानते हैं।
- तापमान की प्रवृत्ति (Temperature Trend):
- इस परत में भी तापमान बहुत अधिक होता है, जो दिन के समय 1,500°C से भी ऊपर जा सकता है।
- हालांकि, तापमंडल की तरह ही, यहाँ की वायु अत्यधिक विरल (Extremely Tenuous/Thin) होती है। गैस के कण एक-दूसरे से सैकड़ों किलोमीटर दूर होते हैं।
- ⋆ अवधारणा: कणों की अत्यधिक दूरी के कारण ऊष्मा का स्थानांतरण लगभग नगण्य होता है। इसलिए, किसी भी वस्तु (जैसे अंतरिक्ष यान) को यहाँ की गर्मी महसूस नहीं होगी; वास्तव में, वह बहुत ठंडा महसूस करेगी। [UPSC – Conceptual Clarity Based Question]
- संघटन (Composition):
- यह परत मुख्य रूप से अत्यंत हल्की गैसों से बनी है।
- इसके निचले हिस्सों में हीलियम (Helium) और ऑक्सीजन (Atomic Oxygen) के परमाणु पाए जाते हैं।
- जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती है, केवल सबसे हल्की गैस हाइड्रोजन (Hydrogen) ही प्रमुखता से पाई जाती है।
- ⋆ इस परत में मौजूद कण इतने दूर-दूर होते हैं कि वे शायद ही कभी आपस में टकराते हैं और एक गैस की तरह व्यवहार नहीं करते।
बहिर्मंडल की सबसे महत्वपूर्ण परिघटनाएँ
- वायुमंडल का पलायन (Escape of Atmospheric Particles):
- ⋆ यह बहिर्मंडल की परिभाषित विशेषता है।
- इस ऊँचाई पर पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Pull) बहुत कमजोर हो जाता है।
- गैस के कणों (विशेषकर हल्के हाइड्रोजन और हीलियम) की गति इतनी अधिक होती है कि वे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पलायन (Escape) कर जाते हैं और हमेशा के लिए अंतरिक्ष में खो जाते हैं।
- इसी प्रक्रिया के कारण पृथ्वी के वायुमंडल ने अपनी अधिकांश प्रारंभिक हाइड्रोजन और हीलियम खो दी है।
- उपग्रहों की कक्षा (Orbit of Satellites):
- ⋆ मौसम और संचार के लिए उपयोग किए जाने वाले अधिकांश उपग्रह (Satellites) वास्तव में तापमंडल में परिक्रमा करते हैं।
- हालांकि, उच्च पृथ्वी कक्षा (High Earth Orbit) में स्थित कुछ वैज्ञानिक और निगरानी उपग्रह बहिर्मंडल से होकर गुजरते हैं।
- यह परत एक तरह से उपग्रहों की “ऊपरी सीमा” मानी जा सकती है, जिसके पार अंतरिक्ष शुरू हो जाता है। [General Science/SSC CGL 2018]
- जियोकोरोना (Geocorona):
- यह बहिर्मंडल का सबसे दूर तक फैला हुआ क्षेत्र है, जो मुख्य रूप से हाइड्रोजन के तटस्थ परमाणुओं (Neutral Hydrogen atoms) से बना है।
- यह पृथ्वी के चारों ओर एक ‘ प्रभामंडल’ (Halo) बनाता है, जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी प्रकाश को बिखेरता है और इसे केवल अंतरिक्ष से ही देखा जा सकता है।
बहिर्मंडल और आयनमंडल का संबंध
- प्लाज्मास्फीयर (Plasmasphere): आयनमंडल का सबसे ऊपरी हिस्सा बहिर्मंडल तक फैला होता है। यह क्षेत्र प्लाज्मा (आयन और इलेक्ट्रॉन का मिश्रण) से भरा होता है, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Magnetosphere) के साथ सह-घूर्णन करता है।
परीक्षा के दृष्टिकोण से बहिर्मंडल के प्रमुख तथ्य
- सबसे बाहरी परत: यह वायुमंडल की सबसे ऊपरी परत है, जो अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है। [SSC CHSL 2019]
- प्रमुख गैसें: यहाँ मुख्य रूप से हाइड्रोजन (Hydrogen) और हीलियम (Helium) जैसी हल्की गैसें पाई जाती हैं। [BPSC Prelims]
- कणों का पलायन: यह एकमात्र परत है जहाँ से गैस के कण पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पलायन (Escape) कर सकते हैं। यह अवधारणा UPSC के लिए महत्वपूर्ण है।
- अत्यधिक विरलता: वायु इतनी विरल होती है कि यह एक पारंपरिक गैस की तरह व्यवहार नहीं करती।
निष्कर्ष: बहिर्मंडल पृथ्वी के वायुमंडलीय आवरण और बाहरी अंतरिक्ष के बीच का एक विशाल, लगभग खाली संक्रमण क्षेत्र है। इसकी मुख्य पहचान कणों की अत्यधिक कम सघनता और उनका गुरुत्वाकर्षण से पलायन करने की क्षमता है। यह हमारे ग्रह के वायुमंडल का अंतिम छोर है।
वायुमंडलीय संक्रमणकालीन सीमाएँ (Atmospheric Transition Boundaries)
वायुमंडल की परतें एक-दूसरे से अचानक अलग नहीं होतीं, बल्कि उनके बीच कुछ किलोमीटर मोटे संक्रमणकालीन क्षेत्र होते हैं। इन क्षेत्रों में, एक परत की तापीय विशेषता (तापमान की प्रवृत्ति) समाप्त होती है और दूसरी परत की विशेषता शुरू होती है। इन सीमाओं का नाम निचली परत के नाम पर रखा जाता है और उनके अंत को दर्शाने के लिए ‘-पॉज’ (-pause) प्रत्यय का उपयोग किया जाता है, जिसका अर्थ है ‘रुकना’ या ‘ठहराव’।
1. क्षोभसीमा (Tropopause)
- परिभाषा: यह क्षोभमंडल (Troposphere) की ऊपरी सीमा और समतापमंडल (Stratosphere) की निचली सीमा के बीच का संक्रमण क्षेत्र है।
- अवस्थिति:
- इसकी औसत ऊँचाई सतह से लगभग 13 किमी है।
- इसकी ऊँचाई भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक (लगभग 18 किमी) और ध्रुवों पर न्यूनतम (लगभग 8 किमी) होती है। [UPSC/State PSC – Conceptual]
- यह मौसमी रूप से भी बदलती है; गर्मियों में ऊँची और सर्दियों में नीची होती है।
- तापमान की विशेषता:
- ⋆ यह वह ऊँचाई है जहाँ क्षोभमंडल में ऊँचाई के साथ तापमान का गिरना बंद हो जाता है।
- इस क्षेत्र में तापमान कुछ दूरी तक लगभग स्थिर (Isothermal) रहता है और यह बहुत ठंडा होता है (भूमध्य रेखा पर -80°C तक और ध्रुवों पर -45°C तक)।
- महत्व और घटनाएँ:
- मौसम पर ढक्कन (Lid on Weather): क्षोभसीमा एक अदृश्य अवरोधक की तरह काम करती है जो क्षोभमंडल की अधिकांश संवहन धाराओं, बादलों और मौसमी गड़बड़ियों को ऊपर समतापमंडल में जाने से रोकती है। कभी-कभी शक्तिशाली तूफानों के बादल (जैसे क्यूम्यलोनिम्बस) इसे भेदकर ऊपर निकल जाते हैं।
- जेट स्ट्रीम (Jet Streams): ⋆ वायुमंडल में तेज गति से चलने वाली शक्तिशाली और संकरी पवन धाराएँ, जिन्हें जेट स्ट्रीम कहते हैं, इसी क्षोभसीमा के पास ही प्रवाहित होती हैं। ये विमानन और वैश्विक मौसम प्रणालियों को बहुत प्रभावित करती हैं। [UPSC 2017 Prelims]
2. समतापसीमा (Stratopause)
- परिभाषा: यह समतापमंडल (Stratosphere) और उसके ऊपर स्थित मध्यमंडल (Mesosphere) के बीच का संक्रमण क्षेत्र है।
- अवस्थिति: यह सतह से लगभग 50 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित होती है।
- तापमान की विशेषता:
- ⋆ यह वह ऊँचाई है जहाँ समतापमंडल में ऊँचाई के साथ तापमान का बढ़ना बंद हो जाता है और यह अपने अधिकतम (~0°C) पर पहुँच जाता है।
- इस बिंदु के बाद, मध्यमंडल में प्रवेश करते ही तापमान फिर से घटने लगता है।
- कारण: यहाँ तापमान का चरम ओजोन परत द्वारा UV विकिरण के अवशोषण के कारण होता है, जो इसी परत के नीचे केंद्रित है।
- महत्व:
- यह वायुमंडल की तापीय संरचना में एक महत्वपूर्ण मोड़ को चिह्नित करती है, जहाँ तापमान की प्रवृत्ति उलट जाती है (बढ़ने से घटने लगती है)।
3. मध्यसीमा (Mesopause)
- परिभाषा: यह मध्यमंडल (Mesosphere) और उसके ऊपर स्थित तापमंडल (Thermosphere) के बीच का संक्रमण क्षेत्र है।
- अवस्थिति: यह सतह से लगभग 80 से 85 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
- तापमान की विशेषता:
- ⋆ यह वह ऊँचाई है जहाँ मध्यमंडल में ऊँचाई के साथ तापमान का गिरना बंद हो जाता है और यह वायुमंडल के सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाता है।
- यह पृथ्वी के वायुमंडल का सबसे ठंडा स्थान है, जहाँ तापमान -100°C तक या उससे भी नीचे गिर सकता है। [SSC CGL, BPSC Prelims]
- इस सीमा के ठीक ऊपर, तापमंडल में, सौर विकिरण के सीधे अवशोषण के कारण तापमान फिर से तेजी से बढ़ना शुरू हो जाता है।
- महत्व और घटनाएँ:
- निशादीप्त मेघ (Noctilucent Clouds): विश्व के सबसे ऊँचे बादल इसी मध्यसीमा के आसपास ही बनते हैं।
- यह मध्यमंडल के ठंडे और सघन (सापेक्षिक) हिस्से को तापमंडल के अत्यंत गर्म और विरल हिस्से से अलग करती है।
सीमाओं का तुलनात्मक सारांश
| संक्रमणकालीन सीमा | निचली परत | ऊपरी परत | अवस्थिति (किमी) | तापमान की घटना | संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य |
| क्षोभसीमा (Tropopause) | क्षोभमंडल | समतापमंडल | ~8 से 18 | तापमान का गिरना बंद हो जाता है। | जेट स्ट्रीम यहीं चलती हैं; मौसम पर ढक्कन। |
| समतापसीमा (Stratopause) | समतापमंडल | मध्यमंडल | ~50 | तापमान का बढ़ना बंद हो जाता है; यहाँ अधिकतम होता है (~0°C)। | ओजोन परत के प्रभाव का चरम बिंदु। |
| मध्यसीमा (Mesopause) | मध्यमंडल | तापमंडल | ~80 – 85 | तापमान अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँचता है। | ⋆ वायुमंडल का सबसे ठंडा स्थान। |
इन सीमाओं को समझना वायुमंडल की पूरी संरचना और प्रत्येक परत की अद्वितीय विशेषताओं को समझने की कुंजी है।
वायुमंडल: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts for Exams)
संघटन (Composition) से संबंधित तथ्य
- सर्वाधिक प्रचुर गैस: वायुमंडल में सबसे अधिक मात्रा में पाई जाने वाली गैस नाइट्रोजन (Nitrogen) है (~78%)। [लगभग सभी परीक्षाओं में पूछा जाता है]
- तीसरी सबसे प्रचुर गैस: ऑर्गन (Argon) (~0.93%) वायुमंडल में तीसरी सबसे अधिक मात्रा में पाई जाने वाली गैस है।
- सबसे प्रचुर अक्रिय गैस: ऑर्गन (Argon) ही वायुमंडल में सबसे प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली अक्रिय (Inert) गैस है।
- जीवनदायिनी गैस: ऑक्सीजन (Oxygen) (~21%) श्वसन और दहन (जलने) के लिए आवश्यक है।
- ग्रीनहाउस प्रभाव की मुख्य गैस: मानवीय गतिविधियों के संदर्भ में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) ग्रीनहाउस प्रभाव के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
- सबसे शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस: प्राकृतिक रूप से जलवाष्प (Water Vapour) सबसे शक्तिशाली और प्रचुर ग्रीनहाउस गैस है।
- पराबैंगनी किरणों से रक्षा: ओजोन परत (Ozone Layer) सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) विकिरण को अवशोषित करती है। [UPPSC/BPSC]
- बादलों का आधार: धूलकण (Dust Particles) जलवाष्प के संघनन के लिए आर्द्रताग्राही नाभिक (Hygroscopic Nuclei) का काम करते हैं, जिनके बिना बादल नहीं बन सकते।
- आकाश का रंग: सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आकाश का लाल/नारंगी रंग धूलकणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन (Scattering of Light) के कारण होता है।
संरचना (Structure) से संबंधित तथ्य
- सबसे निचली और घनी परत: क्षोभमंडल (Troposphere) वायुमंडल की सबसे निचली, सबसे घनी परत है और इसमें वायुमंडल के द्रव्यमान का लगभग 75-80% हिस्सा होता है।
- सभी मौसम संबंधी घटनाएँ: बादल, वर्षा, तूफान, आँधी, बिजली चमकना – ये सभी घटनाएँ क्षोभमंडल (Troposphere) में होती हैं। [UPSC Prelims]
- सामान्य ह्रास दर (Normal Lapse Rate): क्षोभमंडल में प्रति 1 किलोमीटर की ऊँचाई पर औसतन 6.5°C तापमान कम होता है।
- वायुयान उड़ाने के लिए आदर्श परत: समतापमंडल (Stratosphere), क्योंकि यहाँ बादल और मौसमी गड़बड़ियाँ नहीं होती हैं। [State PSC]
- ओजोन परत की अवस्थिति: ओजोन परत मुख्य रूप से समतापमंडल (Stratosphere) में पाई जाती है। [UPSC 2011]
- उल्कापिंडों का जलना: अंतरिक्ष से आने वाले अधिकांश उल्कापिंड मध्यमंडल (Mesosphere) में घर्षण के कारण जलकर नष्ट हो जाते हैं। [UPPSC, SSC CGL]
- वायुमंडल की सबसे ठंडी परत: मध्यमंडल (Mesosphere) की ऊपरी सीमा, जिसे मध्यसीमा (Mesopause) कहते हैं, वायुमंडल का सबसे ठंडा स्थान (~ -100°C) है। [SSC]
- रेडियो तरंगों का परावर्तन: आयनमंडल (Ionosphere) (जो मुख्य रूप से तापमंडल में स्थित है) रेडियो तरंगों को परावर्तित करता है, जिससे लंबी दूरी का रेडियो संचार संभव होता है। [UPSC 2015, BPSC]
- ध्रुवीय ज्योति (Aurora): औरोरा बोरेलिस और औरोरा ऑस्ट्रेलिस की घटना तापमंडल/आयनमंडल (Thermosphere/Ionosphere) में होती है।
- उपग्रहों की कक्षा: अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) और अधिकांश उपग्रह तापमंडल (Thermosphere) में परिक्रमा करते हैं।
- सबसे बाहरी परत: वायुमंडल की सबसे बाहरी परत बहिर्मंडल (Exosphere) है।
- गैसों का पलायन: बहिर्मंडल (Exosphere) वह एकमात्र परत है जहाँ से हल्की गैसें (हाइड्रोजन, हीलियम) पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पलायन कर अंतरिक्ष में जा सकती हैं।
- जेट स्ट्रीम का प्रवाह: शक्तिशाली जेट स्ट्रीम हवाएँ क्षोभसीमा (Tropopause) के पास चलती हैं। [UPSC]
- ऊँचाई के साथ तापमान का पैटर्न:
- घटता है: क्षोभमंडल, मध्यमंडल
- बढ़ता है: समतापमंडल, तापमंडल, बहिर्मंडल
यह क्विक फैक्ट्स लिस्ट आपको अंतिम समय में रिवीजन करने और सीधे पूछे जाने वाले वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करने में बहुत मदद करेगी।
सूर्यातप और ताप बजट: वितरण, कारक और महत्व
पृथ्वी पर जीवन और ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य है। पृथ्वी और उसके वायुमंडल के तापमान का संतुलन सूर्य से प्राप्त ऊर्जा और पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा के बीच एक जटिल संतुलन पर निर्भर करता है।
1. सूर्यातप (Insolation)
सूर्यातप (अंग्रेजी: Insolation, ‘Incoming Solar Radiation’ का संक्षिप्त रूप) का अर्थ है सूर्य से पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली सौर विकिरण ऊर्जा। यह ऊर्जा लघु तरंगों (Short Waves) के रूप में पृथ्वी तक पहुँचती है।
- सौर स्थिरांक (Solar Constant): पृथ्वी के वायुमंडल के बाहरी किनारे पर सूर्य की किरणों के लंबवत स्थित खुले क्षेत्र के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर प्रति मिनट प्राप्त होने वाली ऊर्जा को सौर स्थिरांक कहते हैं। इसका औसत मान लगभग 1.94 कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट है।
सूर्यातप का स्रोत: सूर्य (The Sun as the Source of Insolation)
पृथ्वी पर सूर्यातप और जीवन के लिए आवश्यक लगभग समस्त ऊर्जा का एकमात्र और परम स्रोत सूर्य है। सूर्य हमारे सौर मंडल के केंद्र में स्थित एक विशाल, धधकता हुआ गैस का गोला है, जिसे तारा (Star) कहते हैं।
1. सूर्य की संरचना और ऊर्जा का स्रोत (Sun’s Structure and Source of Energy)
- संरचना: सूर्य मुख्य रूप से दो गैसों से बना है:
- हाइड्रोजन (Hydrogen): लगभग 71%
- हीलियम (Helium): लगभग 27%
- अन्य तत्व: 2%
- ऊर्जा उत्पादन की प्रक्रिया: नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)
- ⋆ सूर्य के केंद्र (Core) में अत्यधिक उच्च तापमान (लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस) और अत्यधिक उच्च दाब की स्थितियाँ होती हैं।
- इन चरम परिस्थितियों में, नाभिकीय संलयन नामक एक प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में, चार हाइड्रोजन (H) के नाभिक मिलकर एक हीलियम (He) के नाभिक का निर्माण करते हैं।
- द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण (Mass-Energy Equivalence): इस संलयन प्रक्रिया के दौरान, बनने वाले हीलियम नाभिक का द्रव्यमान मूल चार हाइड्रोजन नाभिकों के कुल द्रव्यमान से थोड़ा कम होता है। यह खोया हुआ द्रव्यमान अल्बर्ट आइंस्टीन के प्रसिद्ध समीकरण E=mc² के अनुसार, ऊर्जा (Energy) की विशाल मात्रा में परिवर्तित हो जाता है।
- E = ऊर्जा, m = खोया हुआ द्रव्यमान, c = प्रकाश का वेग।
- ⋆ PYQ Link: “सूर्य की ऊर्जा का मुख्य स्रोत क्या है?” – उत्तर: नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)। यह भौतिकी और भूगोल दोनों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। [UPSC, BPSC, SSC – Multiple Times]
2. ऊर्जा का स्थानांतरण और विकिरण (Energy Transfer and Radiation)
- ऊर्जा का बाहर आना: सूर्य के केंद्र में उत्पन्न यह ऊर्जा कई लाख वर्षों तक विभिन्न प्रक्रियाओं (विकिरण और संवहन) द्वारा धीरे-धीरे सूर्य की बाहरी सतह तक पहुँचती है।
- प्रकाशमंडल (Photosphere):
- यह सूर्य की दिखाई देने वाली सतह है। इसका तापमान लगभग 6,000°C होता है।
- यहीं से ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय विकिरण (Electromagnetic Radiation) के रूप में अंतरिक्ष में चारों ओर फैलती है।
3. सूर्यातप: ऊर्जा का पृथ्वी तक पहुँचना (Insolation: Reaching the Earth)
- विकिरण का स्वरूप: सूर्य से निकलने वाली यह ऊर्जा एक व्यापक विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम (Electromagnetic Spectrum) का हिस्सा है, जिसमें गामा किरणें, एक्स-किरणें, पराबैंगनी (UV) किरणें, दृश्य प्रकाश (Visible Light), और अवरक्त (Infrared) किरणें शामिल हैं।
- लघु तरंग विकिरण (Shortwave Radiation):
- सूर्य का तापमान बहुत अधिक होने के कारण, वह जो ऊर्जा विकीर्णित करता है, वह मुख्य रूप
से छोटी तरंग दैर्ध्य (Short Wavelength) वाली होती है। - यही लघु तरंग सौर विकिरण पृथ्वी तक पहुँचकर सूर्यातप कहलाता है।
- पृथ्वी का वायुमंडल लघु तरंग विकिरण के लिए काफी हद तक पारदर्शी (Transparent) होता है, जिससे यह ऊर्जा सतह तक पहुँच पाती है।
- सूर्य का तापमान बहुत अधिक होने के कारण, वह जो ऊर्जा विकीर्णित करता है, वह मुख्य रूप
- सौर स्थिरांक (Solar Constant):
- यह इस बात का माप है कि सूर्य से पृथ्वी के वायुमंडल के शीर्ष पर कितनी ऊर्जा पहुँच रही है। इसकी परिभाषा है – “वायुमंडल के बाहरी किनारे पर, पृथ्वी-सूर्य की औसत दूरी पर, सूर्य की किरणों के लंबवत स्थित क्षेत्र द्वारा प्रति मिनट, प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्राप्त की गई सौर ऊर्जा”।
- इसका मान लगभग 1367 वाट प्रति वर्ग मीटर या 1.94 कैलोरी प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति मिनट है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण अवधारणाएँ
- पार्थिव विकिरण (Terrestrial Radiation):
- इसके विपरीत, पृथ्वी सूर्य की तुलना में बहुत ठंडी है। इसलिए, पृथ्वी जो ऊर्जा अंतरिक्ष में वापस उत्सर्जित करती है, वह लंबी तरंग दैर्ध्य (Long Wavelength) वाली होती है, जिसे अवरक्त विकिरण (Infrared Radiation) या पार्थिव विकिरण कहते हैं।
- पृथ्वी का वायुमंडल (विशेषकर ग्रीनहाउस गैसें) इस दीर्घ तरंग विकिरण के लिए अपारदर्शी होता है और इसे सोख लेता है, जिससे वायुमंडल गर्म होता है।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, सूर्यातप का स्रोत है सूर्य का केंद्र, जहाँ नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया द्वारा हाइड्रोजन हीलियम में परिवर्तित होती है, जिससे ऊर्जा की अपार मात्रा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा लघु तरंग विद्युत चुम्बकीय विकिरण (Shortwave Electromagnetic Radiation) के रूप में सूर्य की सतह (प्रकाशमंडल) से निकलकर अंतरिक्ष में यात्रा करती है और पृथ्वी तक पहुँचती है। यह प्रक्रिया ही पृथ्वी पर सभी जीवन और जलवायु प्रणालियों को संचालित करती है।
सूर्यातप का वितरण (Distribution of Insolation)
सूर्यातप (Insolation), यानी सूर्य से पृथ्वी की सतह तक पहुँचने वाली सौर ऊर्जा, पूरे ग्रह पर समान रूप से वितरित नहीं होती है। यह असमान वितरण ही पृथ्वी पर विभिन्न तापमान क्षेत्रों (Temperature Zones), वायुदाब पेटियों (Pressure Belts), पवनों (Winds) और अंततः विविध जलवायु प्रदेशों का मूल कारण है। सूर्यातप का वितरण मुख्य रूप से अक्षांशीय (Latitudinal), मौसमी (Seasonal) और स्थानीय कारकों से नियंत्रित होता है।
सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
- 1. सूर्य की किरणों का आपतन कोण या झुकाव (Angle of Incidence or Inclination of Sun’s Rays)
- ⋆ यह सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाला सर्वोपरि और सबसे महत्वपूर्ण कारक है।
- सिद्धांत: पृथ्वी की गोलाकार आकृति (Spherical Shape) के कारण, सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर लगभग लंबवत (90°) पड़ती हैं, जबकि ध्रुवों की ओर वे increasingly तिरछी (Oblique) होती जाती हैं।
- लंबवत किरणें: ये कम क्षेत्र पर केंद्रित होती हैं, जिससे प्रति इकाई क्षेत्रफल पर अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इन्हें वायुमंडल की कम दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे ऊर्जा का क्षय कम होता है।
- तिरछी किरणें: ये समान ऊर्जा को एक बड़े क्षेत्र में फैला देती हैं, जिससे प्रति इकाई क्षेत्रफल पर कम ऊर्जा प्राप्त होती है। इन्हें वायुमंडल की मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, जिससे परावर्तन, प्रकीर्णन और अवशोषण द्वारा ऊर्जा का अधिक क्षय होता है।
- परिणाम: ⋆ भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक सूर्यातप और ध्रुवों पर न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त होता है। [UPSC/State PSC – Core Concept]
- 2. दिन की अवधि या धूप की अवधि (Duration of the Day or Period of Sunshine)
- दिन की अवधि जितनी लंबी होगी, किसी स्थान को सूर्य की रोशनी प्राप्त करने के लिए उतना ही अधिक समय मिलेगा, जिससे सूर्यातप की कुल मात्रा बढ़ जाएगी।
- प्रभाव:
- भूमध्य रेखा पर, दिन और रात की अवधि लगभग हमेशा 12-12 घंटे की होती है।
- भूमध्य रेखा से दूर जाने पर, दिन की अवधि में मौसमी भिन्नता बढ़ती है। ग्रीष्मकाल में ध्रुवों की ओर दिन लंबे होते हैं (ध्रुवों पर 6 महीने तक) और शीतकाल में छोटे (ध्रुवों पर 6 महीने की रात)।
- ⋆ रोचक तथ्य: ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice) के दौरान ध्रुवों पर 24 घंटे की धूप होने के बावजूद, उन्हें उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की तुलना में कम सूर्यातप मिलता है, क्योंकि वहाँ सूर्य की किरणें अत्यंत तिरछी होती हैं।
- 3. वायुमंडल की पारदर्शिता (Transparency of the Atmosphere)
- वायुमंडल सूर्यातप के लिए पूरी तरह से पारदर्शी नहीं है। बादल, जलवाष्प, धूलकण और कुछ गैसें सौर विकिरण को परावर्तित (Reflect), प्रकीर्णित (Scatter) और अवशोषित (Absorb) कर लेती हैं, जिससे सतह तक पहुँचने वाली ऊर्जा कम हो जाती है।
- प्रभाव:
- बादल: बादलों का आवरण सौर विकिरण का सबसे बड़ा परावर्तक है। घने बादलों वाले क्षेत्र (जैसे भूमध्यरेखीय वर्षावन) में साफ आसमान वाले क्षेत्रों की तुलना में कम सूर्यातप पहुँचता है।
- धूल और प्रदूषण: औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के कारण सूर्यातप कम हो जाता है।
- ⋆ इसी कारण, उप-उष्णकटिबंधीय गर्म मरुस्थल (जहाँ आसमान लगभग हमेशा साफ रहता है) अक्सर भूमध्यरेखीय क्षेत्रों की तुलना में अधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं। [UPSC Prelims – Statement Based]
- 4. भूमि का विन्यास या स्थलाकृति (Land Configuration or Topography)
- स्थलाकृति का प्रभाव स्थानीय स्तर पर सूर्यातप की मात्रा को बदल सकता है।
- ढाल का उन्मुखीकरण (Aspect of Slope):
- उत्तरी गोलार्ध में, पर्वतों के दक्षिण-मुखी ढलान (South-facing slopes) सूर्य की किरणों को अधिक सीधे प्राप्त करते हैं, जिससे वे अधिक सूर्यातप प्राप्त करते हैं और गर्म होते हैं।
- उत्तर-मुखी ढलान (North-facing slopes) ठंडे और नम रहते हैं क्योंकि वे सूर्य से छाया में रहते हैं। दक्षिणी गोलार्ध में इसका विपरीत होता है।
- पर्वतों की ऊँचाई भी सूर्यातप को प्रभावित करती है, क्योंकि अधिक ऊँचाई पर वायु विरल और स्वच्छ होती है।
- 5. पृथ्वी की सूर्य से दूरी (Distance of Earth from the Sun)
- पृथ्वी अपनी दीर्घवृत्ताकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करते हुए साल में एक बार उसके सबसे निकट (उपसौर – Perihelion, 3 जनवरी) और एक बार सबसे दूर (अपसौर – Aphelion, 4 जुलाई) होती है।
- उपसौर के समय पृथ्वी को अपसौर की तुलना में लगभग 7% अधिक सूर्यातप मिलता है।
- हालांकि, यह कारक किरणों के झुकाव की तुलना में पृथ्वी पर तापमान के वितरण में बहुत कम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी कारण उत्तरी गोलार्ध में सर्दियाँ तब होती हैं जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है।
सूर्यातप का अक्षांशीय वितरण (Latitudinal Distribution of Insolation)
- उष्ण कटिबंध (Tropics: 23.5°N – 23.5°S): यहाँ सूर्य की किरणें वर्ष भर लगभग लंबवत रहती हैं, इसलिए इस क्षेत्र को सर्वाधिक सूर्यातप प्राप्त होता है।
- शीतोष्ण कटिबंध (Temperate Zones: 23.5° – 66.5°): यहाँ सूर्य की किरणें हमेशा तिरछी होती हैं और दिन की अवधि में बहुत अधिक मौसमी भिन्नता होती है, जिससे मध्यम सूर्यातप प्राप्त होता है।
- ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions: 66.5° – 90°): यहाँ सूर्य की किरणें अत्यंत तिरछी होती हैं और वर्ष के 6 महीने तक सूर्य क्षितिज से नीचे रहता है, इसलिए इस क्षेत्र को न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त होता है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण अवधारणा: ऊष्मा अधिशेष और ऊष्मा घाटा (Heat Surplus and Heat Deficit)
- लगभग 35° उत्तर और 35° दक्षिण अक्षांशों के बीच के क्षेत्र में, आने वाला सूर्यातप (Incoming Insolation) बाहर जाने वाले पार्थिव विकिरण (Outgoing Radiation) से अधिक होता है। इसलिए, यह क्षेत्र ऊष्मा अधिशेष (Heat Surplus) का क्षेत्र है।
- 35° अक्षांशों से ध्रुवों की ओर, बाहर जाने वाला विकिरण आने वाले सूर्यातप से अधिक होता है। इसलिए, यह क्षेत्र ऊष्मा घाटा (Heat Deficit) का क्षेत्र है।
- ⋆ इस ऊष्मा के असंतुलन को ही पवनें और महासागरीय धाराएँ उष्ण कटिबंध से ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर ऊष्मा का परिवहन करके संतुलित करती हैं, जिससे ध्रुव बहुत अधिक ठंडे और उष्ण कटिबंध बहुत अधिक गर्म होने से बच जाते हैं। [UPSC Mains]
Note-अधिकतम सुर्यताप प्राप्त करने वाली तापीय अक्षांश रेखा भूमध्य रेखा पर न होकर 20 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर होता है.
2. पृथ्वी का ऊष्मा बजट (Heat Budget of the Earth)
ऊष्मा बजट पृथ्वी और उसके वायुमंडल द्वारा प्राप्त ऊष्मा और उत्सर्जित ऊष्मा का लेखा-जोखा है। पृथ्वी एक स्थिर तापमान बनाए रखती है क्योंकि यह लघु तरंगों के रूप में जितनी ऊर्जा सूर्य से प्राप्त करती है, उतनी ही ऊर्जा दीर्घ तरंगों (पार्थिव विकिरण) के रूप में अंतरिक्ष में वापस उत्सर्जित कर देती है।
मान लीजिए कि वायुमंडल के शीर्ष पर प्राप्त कुल सौर ऊर्जा 100 इकाई है:
- परावर्तन और प्रकीर्णन (Loss before reaching Earth’s surface): 35 इकाइयाँ
- बादलों से परावर्तन: 27 इकाइयाँ
- धूलकणों द्वारा प्रकीर्णन: 6 इकाइयाँ
- पृथ्वी की सतह (बर्फ, जल) से परावर्तन: 2 इकाइयाँ
- ⋆ ये 35 इकाइयाँ पृथ्वी को बिना गर्म किए ही वापस अंतरिक्ष में चली जाती हैं। इसी को पृथ्वी का एल्बिडो (Albedo) कहते हैं। [UPSC Prelims]
- अवशोषण (Absorption): 65 इकाइयाँ
- वायुमंडल द्वारा अवशोषण: 14 इकाइयाँ (ओजोन, जलवाष्प द्वारा)
- पृथ्वी की सतह द्वारा अवशोषण: 51 इकाइयाँ (इसमें प्रत्यक्ष और विसरित दोनों विकिरण शामिल हैं)।
पृथ्वी जो 51 इकाइयाँ अवशोषित करती है, उसे वह दीर्घ तरंगों के रूप में वापस उत्सर्जित करती है।
- कुल उत्सर्जन: 51 इकाइयाँ
- सीधे अंतरिक्ष में उत्सर्जन: 17 इकाइयाँ
- वायुमंडल द्वारा अवशोषण: 34 इकाइयाँ
- वायुमंडल इस 34 इकाई को अवशोषित करता है। साथ ही, वायुमंडल ने 14 इकाइयाँ पहले ही सूर्य से प्राप्त की थीं।
- अब वायुमंडल के पास कुल 48 इकाइयाँ (34+14) हो जाती हैं।
- वायुमंडल द्वारा अंतिम उत्सर्जन:
- यह 48 इकाइयाँ भी वायुमंडल द्वारा अंततः अंतरिक्ष में वापस उत्सर्जित कर दी जाती हैं।
ऊष्मा का अंतिम संतुलन:
| आने वाली ऊर्जा (Shortwave) | जाने वाली ऊर्जा (Longwave) |
| पृथ्वी की सतह पर 51 इकाइयाँ | पृथ्वी से उत्सर्जन: 17 इकाइयाँ (अंतरिक्ष में) |
| वायुमंडल में 14 इकाइयाँ | वायुमंडल से उत्सर्जन: 48 इकाइयाँ (अंतरिक्ष में) |
| कुल आने वाली प्रभावी ऊर्जा = 65 | कुल जाने वाली ऊर्जा = 17 + 48 = 65 |
इस प्रकार, 65 इकाइयाँ आईं और 65 इकाइयाँ चली गईं, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान स्थिर बना रहता है।
महत्व (Importance)
- जीवन के लिए ऊर्जा: सूर्यातप ही पृथ्वी पर जीवन (पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण) और ऊर्जा का एकमात्र स्रोत है।
- जलवायु और मौसम का चालक: सूर्यातप में भिन्नता के कारण ही वायुदाब में अंतर, पवनों का चलना, महासागरीय धाराओं का प्रवाह और संपूर्ण जल चक्र संचालित होता है।
- तापमान का संतुलन: ऊष्मा बजट यह सुनिश्चित करता है कि पृथ्वी न तो लगातार गर्म हो रही है और न ही लगातार ठंडी, जिससे जीवन के लिए एक स्थिर वातावरण बना रहता है।
- जलवायु परिवर्तन का संदर्भ: मानव गतिविधियों (ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन) के कारण ऊष्मा बजट का संतुलन बिगड़ रहा है, क्योंकि पार्थिव विकिरण (Outgoing radiation) वायुमंडल में अधिक मात्रा में फंस रही है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग हो रही है। [UPSC Mains]
[आरेख: एक सरल चित्र जिसमें 100 इकाई सौर ऊर्जा का आगमन, बादलों और सतह से 35 इकाई का परावर्तन (एल्बिडो), 14 इकाई का वायुमंडल द्वारा और 51 इकाई का सतह द्वारा अवशोषण दिखाया जाए। फिर 51 इकाई पार्थिव विकिरण और अंत में कुल 65 इकाई के उत्सर्जन को तीरों के माध्यम से दर्शाया जाए।]
एल्बिडो (Albedo)
परिभाषा:
एल्बिडो किसी भी सतह की सौर विकिरण को परावर्तित करने की क्षमता का माप है। सरल शब्दों में, यह बताता है कि किसी सतह पर पड़ने वाली कुल सूर्य की रोशनी का कितना प्रतिशत हिस्सा वह बिना अवशोषित (Absorb) किए वापस अंतरिक्ष में भेज देती है।
इसे आमतौर पर प्रतिशत (%) या दशमलव (Decimal) में व्यक्त किया जाता है।
- उच्च एल्बिडो (High Albedo): का अर्थ है कि सतह अधिक परावर्तक (More Reflective) है और कम ऊष्मा सोखती है (जैसे ताजा बर्फ)।
- निम्न एल्बिडो (Low Albedo): का अर्थ है कि सतह कम परावर्तक है और अधिक ऊष्मा सोखती है (जैसे डामर की सड़क या गहरा सागर)।
उदाहरण:
- यदि किसी सतह का एल्बिडो 70% (या 0.7) है, तो इसका मतलब है कि वह अपने ऊपर पड़ने वाले सौर विकिरण का 70% हिस्सा परावर्तित कर देती है और केवल 30% अवशोषित करती है।
पृथ्वी का एल्बिडो (Earth’s Albedo)
पृथ्वी का औसत एल्बिडो लगभग 30% से 35% है। ऊष्मा बजट के मानक मॉडल में, इसे अक्सर 35 इकाई (100 में से) माना जाता है, जिसका अर्थ है कि पृथ्वी को गर्म करने से पहले ही सूर्य की कुल ऊर्जा का लगभग एक-तिहाई हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाता है।
यह 35% योगदान तीन मुख्य स्रोतों से आता है:
- बादलों से परावर्तन: लगभग 27%
- धूलकणों द्वारा प्रकीर्णन: लगभग 6%
- पृथ्वी की सतह (बर्फ, भूमि, जल) से परावर्तन: लगभग 2%
विभिन्न सतहों का एल्बिडो (Albedo of Different Surfaces)
विभिन्न सतहों की परावर्तन क्षमता बहुत भिन्न होती है, जो पृथ्वी के स्थानीय और वैश्विक तापमान को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है।
| सतह का प्रकार | एल्बिडो (%) | विशेषताएँ और महत्व |
| ताजा बर्फ (Fresh Snow) | 80 – 95% | ⋆ प्राकृतिक सतहों में सर्वाधिक एल्बिडो। यह लगभग सारी धूप को परावर्तित कर देती है, जिससे ध्रुवीय क्षेत्र ठंडे बने रहते हैं। [UPSC Prelims – Conceptual] |
| पुराना हिम (Old/Melting Snow) | 40 – 70% | जैसे-जैसे बर्फ पुरानी और मैली होती है, उसका एल्बिडो घटता है और वह अधिक गर्मी सोखने लगती है। |
| बादल (Clouds) | 40 – 90% (मोटाई के अनुसार) | घने, मोटे बादल अधिक परावर्तक होते हैं (दिन में सतह को ठंडा रखते हैं)। पतले बादल कम परावर्तक होते हैं। |
| मरुस्थल (रेत) (Desert Sand) | 35 – 45% | हल्की रंग की रेत सौर विकिरण को काफी हद तक परावर्तित करती है। |
| घास के मैदान (Grasslands) | 25 – 30% | |
| फसलें (Crops) | 15 – 25% | |
| जंगल (Forest) | 10 – 20% | ⋆ कम एल्बिडो। गहरे रंग की वनस्पति और ऊबड़-खाबड़ सतह के कारण जंगल सौर ऊर्जा के बहुत अच्छे अवशोषक होते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक है। |
| जल (महासागर, झीलें) | 10% से कम (जब सूर्य सीधे ऊपर हो) | ⋆ प्राकृतिक सतहों में सबसे कम एल्बिडो में से एक। गहरे रंग का पानी अधिकांश सौर ऊर्जा को सोख लेता है। [UPPSC] |
| डामर/एस्फाल्ट (Asphalt) | 5 – 10% | अत्यंत कम एल्बिडो। शहरी क्षेत्र (सड़कें, इमारतें) बहुत अधिक ऊष्मा सोखते हैं, जो ‘शहरी ऊष्मा द्वीप’ (Urban Heat Island) प्रभाव का एक मुख्य कारण है। |
| काली मिट्टी (Black Soil) | 8 – 12% | कम एल्बिडो के कारण यह जल्दी गर्म होती है। |
एल्बिडो का महत्व (Importance of Albedo)
- पृथ्वी के ऊष्मा बजट और तापमान का नियंत्रक:
- एल्बिडो यह निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि पृथ्वी की सतह और वायुमंडल कितना गर्म होगा। यदि पृथ्वी का एल्बिडो बढ़ता है (जैसे ध्रुवीय बर्फ के विस्तार से), तो पृथ्वी ठंडी हो जाएगी। यदि एल्बिडो घटता है (जैसे बर्फ के पिघलने से), तो पृथ्वी अधिक गर्म होगी।
- सकारात्मक प्रतिक्रिया तंत्र (Positive Feedback Loops):
- ⋆ जलवायु परिवर्तन में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
- आइस-एल्बिडो फीडबैक (Ice-Albedo Feedback): ग्लोबल वार्मिंग के कारण ध्रुवीय बर्फ पिघल रही है। बर्फ (उच्च एल्बिडो) की जगह गहरा महासागरीय जल (निम्न एल्बिडो) ले रहा है। यह गहरा जल अधिक सौर ऊर्जा सोखता है, जिससे और अधिक वार्मिंग होती है, और इससे और अधिक बर्फ पिघलती है। यह एक खतरनाक सकारात्मक प्रतिक्रिया चक्र (Positive Feedback Loop) है जो ग्लोबल वार्मिंग को तेज करता है। [UPSC Mains – Environment Section]
- स्थानीय जलवायु पर प्रभाव:
- जंगलों की कटाई (Deforestation) से भूमि का एल्बिडो बढ़ जाता है (क्योंकि मिट्टी जंगल से अधिक परावर्तक होती है), जिससे स्थानीय शीतलन हो सकता है लेकिन वर्षा के पैटर्न में भी बदलाव आ सकता है।
- शहरीकरण (Urbanization) से सड़कों और इमारतों के निर्माण के कारण क्षेत्र का औसत एल्बिडो कम हो जाता है, जिससे ‘शहरी ऊष्मा द्वीप’ (Urban Heat Island) बनते हैं, जहाँ शहर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक गर्म होते हैं।
- कृषि में भूमिका:
- खेतों में लगी फसलों का एल्बिडो भी ऊर्जा संतुलन को प्रभावित करता है। हल्की रंग की मिट्टी (उच्च एल्बिडो) पौधों की जड़ों को ठंडा रख सकती है, जबकि गहरी मिट्टी (कम एल्बिडो) बीजों के अंकुरण के लिए अधिक ऊष्मा प्रदान कर सकती है।
निष्कर्ष: एल्बिडो एक साधारण सी लगने वाली अवधारणा है, लेकिन यह पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को नियंत्रित करने वाले सबसे शक्तिशाली कारकों में से एक है। यह पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन, जलवायु परिवर्तन के फीडबैक तंत्र और स्थानीय मौसम पैटर्न को गहराई से प्रभावित करता है।
प्रसिद्ध जलवायु विज्ञानी ग्लेन टी. त्रेवार्था (Glenn T. Trewartha) के ऊष्मा बजट के विश्लेषण का उल्लेख कर रहे हैं। त्रेवार्था का ऊष्मा बजट का विवरण मानक ऊष्मा बजट मॉडल का ही एक सरलीकृत और स्पष्ट संस्करण है, जिसे समझने में आसानी होती है। यह अक्सर अकादमिक भूगोल की किताबों में छात्रों को अवधारणा समझाने के लिए उपयोग किया जाता है।
यहाँ जी. टी. त्रेवार्था के दृष्टिकोण के अनुसार पृथ्वी के ऊष्मा बजट का चरण-दर-चरण विश्लेषण प्रस्तुत है।
जी. टी. त्रेवार्था के अनुसार पृथ्वी का ऊष्मा बजट (Heat Budget according to G. T. Trewartha)
त्रेवार्था का मॉडल भी यह मानकर चलता है कि वायुमंडल के शीर्ष पर सूर्य से प्राप्त कुल सौर ऊर्जा 100 इकाई (Units) है। इस 100 इकाई ऊर्जा का पृथ्वी के वायुमंडल और सतह के साथ क्या होता है, इसका लेखा-जोखा ही ऊष्मा बजट है।
भाग 1: आने वाली सौर ऊर्जा (सूर्यातप) का लेखा-जोखा (Incoming Solar Radiation – Shortwave)
वायुमंडल में प्रवेश करने वाली 100 इकाई ऊर्जा पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से पहले ही विभाजित हो जाती है:
- 35 इकाइयाँ बिना गर्म किए वापस अंतरिक्ष में चली जाती हैं। इन्हें ‘पृथ्वी का एल्बिडो’ कहते हैं।
- 27 इकाइयाँ: बादलों के ऊपरी हिस्से से परावर्तित (Reflect) होकर।
- 6 इकाइयाँ: वायुमंडल में मौजूद धूलकणों द्वारा प्रकीर्णित (Scatter) होकर।
- 2 इकाइयाँ: पृथ्वी की सतह (विशेषकर बर्फ, हिम और जल) से परावर्तित होकर।
- निष्कर्ष: कुल 100 में से 35 इकाइयाँ पृथ्वी के तंत्र (System) को गर्म करने में कोई योगदान नहीं देती हैं। (100 – 35 = 65 इकाइयाँ बचीं)
- 14 इकाइयाँ वायुमंडल द्वारा सीधे अवशोषित कर ली जाती हैं।
- यह अवशोषण मुख्य रूप से ओजोन (पराबैंगनी किरणों का), जलवाष्प और अन्य गैसों द्वारा होता है।
- 51 इकाइयाँ पृथ्वी की सतह तक पहुँचती हैं और उसके द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं।
- यह ऊर्जा दो रूपों में सतह तक पहुँचती है:
- 34 इकाइयाँ: प्रत्यक्ष सौर विकिरण (Direct Solar Radiation) के रूप में।
- 17 इकाइयाँ: विसरित दिवा प्रकाश (Diffused Daylight) के रूप में, जो धूलकणों और बादलों द्वारा प्रकीर्णित (scattered) होकर सतह पर पहुँचती है।
- यह ऊर्जा दो रूपों में सतह तक पहुँचती है:
सारांश (इनकमिंग):
- पृथ्वी की सतह द्वारा अवशोषित: 51 इकाइयाँ
- वायुमंडल द्वारा अवशोषित: 14 इकाइयाँ
- पृथ्वी के तंत्र (सतह + वायुमंडल) द्वारा अवशोषित कुल ऊर्जा: 51 + 14 = 65 इकाइयाँ
भाग 2: बाहर जाने वाली ऊर्जा (पार्थिव विकिरण) का लेखा-जोखा (Outgoing Terrestrial Radiation – Longwave)
अब पृथ्वी और वायुमंडल इन 65 इकाइयों को वापस अंतरिक्ष में उत्सर्जित करके ऊष्मा का संतुलन बनाते हैं। यह उत्सर्जन दीर्घ तरंग विकिरण (Longwave Radiation) के रूप में होता है।
- पृथ्वी की सतह द्वारा ऊर्जा का उत्सर्जन (कुल 51 इकाइयाँ जो अवशोषित हुई थीं):
- 17 इकाइयाँ: सतह से सीधे अंतरिक्ष में विकिरण के रूप में चली जाती हैं (वायुमंडल इसे नहीं सोखता)।
- 34 इकाइयाँ: सतह से उत्सर्जित होती हैं लेकिन वायुमंडल द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। यह अवशोषण मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों (CO₂, जलवाष्प) द्वारा होता है।
- इस 34 इकाई का आगे क्या होता है?
- 9 इकाइयाँ: संवहन और विक्षोभ (Convection and Turbulence) के माध्यम से सीधे वायुमंडल को स्थानांतरित होती हैं।
- 19 इकाइयाँ: वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Condensation) के रूप में वायुमंडल को मिलती हैं। जब जलवाष्प संघनित होकर बादल बनता है, तो यह ऊष्मा वायुमंडल में मुक्त होती है। [UPSC – Conceptual]
- 6 इकाइयाँ: पार्थिव विकिरण के रूप में वायुमंडल द्वारा सोख ली जाती हैं (34 का शेष भाग)।
- वायुमंडल का अंतिम ऊष्मा बजट:
- वायुमंडल ने 14 इकाइयाँ सूर्य से लीं + 34 इकाइयाँ पृथ्वी से लीं = कुल 48 इकाइयाँ
- यह 48 इकाइयाँ भी वायुमंडल द्वारा अंततः अंतरिक्ष में वापस विकिरित कर दी जाती हैं।
ऊष्मा बजट का अंतिम संतुलन (Final Balance)
त्रेवार्था के मॉडल के अनुसार:
- पृथ्वी की सतह से सीधे अंतरिक्ष में गई ऊर्जा: 17 इकाइयाँ
- वायुमंडल द्वारा अंतरिक्ष में भेजी गई ऊर्जा: 48 इकाइयाँ
कुल बाहर जाने वाली ऊर्जा = 17 + 48 = 65 इकाइयाँ
| प्राप्त ऊर्जा (IN) | वापस गई ऊर्जा (OUT) |
| कुल 65 इकाइयाँ | कुल 65 इकाइयाँ |
संतुलन: प्राप्त ऊर्जा (65) = वापस गई ऊर्जा (65)
इस प्रकार, पृथ्वी के ऊष्मा बजट में एक पूर्ण संतुलन बना रहता है, जिसके कारण पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान स्थिर रहता है।
त्रेवार्था के मॉडल का महत्व
त्रेवार्था का मॉडल इस बात पर विशेष जोर देता है:
- वायुमंडल की भूमिका: यह स्पष्ट करता है कि वायुमंडल सूर्य से सीधे गर्म होने की बजाय नीचे से, यानी पृथ्वी की सतह से निकलने वाली दीर्घ तरंग विकिरण से अधिक गर्म होता है। (वायुमंडल ने सूर्य से केवल 14 इकाइयाँ लीं, जबकि पृथ्वी से 34 इकाइयाँ)।
- ग्रीनहाउस प्रभाव: यह मॉडल ग्रीनहाउस प्रभाव के तंत्र को दिखाता है – कैसे वायुमंडल पृथ्वी की ऊष्मा (34 इकाइयों) को सोखता है और उसे गर्म रखता है।
- गुप्त ऊष्मा का महत्व: यह संघनन (बादल बनने) की प्रक्रिया में गुप्त ऊष्मा के रूप में ऊर्जा के स्थानांतरण की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है, जो वायुमंडल के तापन का एक प्रमुख स्रोत है (19 इकाइयाँ)।
सूर्यातप और ताप बजट: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts for Exams)
सूर्यातप (Insolation) से संबंधित तथ्य
- ऊर्जा का स्रोत: पृथ्वी पर लगभग समस्त ऊर्जा का स्रोत सूर्य है।
- सूर्य की ऊर्जा का स्रोत: सूर्य के केंद्र में होने वाली नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया, जिसमें हाइड्रोजन हीलियम में बदलता है। [UPSC, BPSC, SSC]
- ऊर्जा का स्वरूप: सूर्य से आने वाली ऊर्जा लघु तरंग विकिरण (Shortwave Radiation) के रूप में होती है।
- सर्वाधिक सूर्यातप वाला क्षेत्र: सर्वाधिक सूर्यातप उष्णकटिबंधीय मरुस्थलों में प्राप्त होता है, क्योंकि वहाँ आसमान साफ रहता है, न कि भूमध्य रेखा पर (जहाँ बादल छाए रहते हैं)। [UPSC – Conceptual Fact]
- न्यूनतम सूर्यातप वाला क्षेत्र: ध्रुवीय क्षेत्रों में न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त होता है।
- मुख्य नियंत्रक कारक: किसी स्थान पर सूर्यातप की मात्रा को नियंत्रित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक सूर्य की किरणों का आपतन कोण (Angle of Incidence) है।
- उपसौर (Perihelion): 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है, जिससे उसे थोड़ा अधिक सूर्यातप मिलता है।
- अपसौर (Aphelion): 4 जुलाई को पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है, जिससे उसे थोड़ा कम सूर्यातप मिलता है।
- सौर स्थिरांक (Solar Constant): वायुमंडल के शीर्ष पर प्रति इकाई क्षेत्रफल प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा (लगभग 1.94 कैलोरी/सेमी²/मिनट)।
- समताप रेखाएँ (Isotherms): मानचित्र पर समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाएँ।
ताप बजट (Heat Budget) और एल्बिडो (Albedo) से संबंधित तथ्य
- पृथ्वी का ऊष्मा स्रोत: पृथ्वी की सतह मुख्य रूप से लघु तरंग सौर विकिरण से गर्म होती है, जबकि वायुमंडल मुख्य रूप से दीर्घ तरंग पार्थिव विकिरण (Longwave Terrestrial Radiation) से गर्म होता है (यानी नीचे से गर्म होता है)। [UPSC/State PSC – Core Concept]
- पृथ्वी का एल्बिडो: पृथ्वी का औसत एल्बिडो लगभग 30-35% है, जिसका अर्थ है कि लगभग एक-तिहाई सौर ऊर्जा बिना पृथ्वी को गर्म किए वापस अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती है। [UPPSC]
- सर्वाधिक एल्बिडो: प्राकृतिक सतहों में सबसे अधिक एल्बिडो ताजा बर्फ (Fresh Snow) का होता है (~90%)।
- न्यूनतम एल्बिडो: सबसे कम एल्बिडो गहरे महासागरीय जल का होता है (~10% से कम)।
- बादलों का योगदान: पृथ्वी के कुल एल्बिडो में सर्वाधिक योगदान बादलों का है।
- आइस-एल्बिडो फीडबैक: ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ का पिघलना, जिससे एल्बिडो कम होता है और पृथ्वी और अधिक गर्म होती है—यह एक सकारात्मक प्रतिक्रिया चक्र (Positive Feedback Loop) है। [UPSC Mains – Environment]
- गुप्त ऊष्मा (Latent Heat): वाष्पीकरण द्वारा जल ऊर्जा सोखता है और संघनन (बादल बनने) के दौरान वायुमंडल में उस ऊष्मा को मुक्त कर देता है। यह ऊष्मा बजट में ऊर्जा स्थानांतरण का एक प्रमुख तरीका है।
- ऊष्मा अधिशेष क्षेत्र: मोटे तौर पर, 35°N से 35°S अक्षांशों के बीच पृथ्वी ऊष्मा अधिशेष (Heat Surplus) की स्थिति में रहती है।
- ऊष्मा घाटा क्षेत्र: 35° अक्षांशों से ध्रुवों की ओर पृथ्वी ऊष्मा घाटे (Heat Deficit) की स्थिति में रहती है।
- ऊष्मा का संतुलन: ऊष्मा अधिशेष और घाटे के बीच के इस असंतुलन को पवनें (Winds) और महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents) संतुलित करती हैं। [UPSC Mains]
तापमान व्युत्क्रमण (Temperature Inversion) से संबंधित तथ्य
- परिभाषा: क्षोभमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटने के बजाय बढ़ने की स्थिति।
- प्रमुख प्रभाव: इसके कारण वायुमंडलीय स्थिरता बढ़ती है और कोहरे (Fog) तथा स्मॉग (Smog) की स्थिति उत्पन्न होती है।
- आदर्श दशाएँ: लंबी और ठंडी रातें, साफ आसमान, और शांत वायु।
यह क्विक फैक्ट्स लिस्ट आपको अंतिम समय में रिवीजन करने और सीधे पूछे जाने वाले वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को हल करने में बहुत मदद करेगी।
वायुमंडल का तापन और शीतलन (Heating and Cooling of the Atmosphere)
वायुमंडल सूर्य से सीधे आने वाली ऊर्जा (सूर्यातप) से बहुत कम गर्म होता है। वास्तव में, वायुमंडल मुख्य रूप से अप्रत्यक्ष रूप से और नीचे से ऊपर की ओर गर्म होता है। ऊष्मा का यह स्थानांतरण चार प्रमुख प्रक्रियाओं द्वारा संपन्न होता है: विकिरण, चालन, संवहन, और अभिवहन।
1. विकिरण (Radiation)
परिभाषा:
विकिरण ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया है जिसमें ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय तरंगों (Electromagnetic Waves) के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना किसी माध्यम के भी यात्रा कर सकती है। सूर्य से पृथ्वी तक ऊर्जा इसी प्रक्रिया से पहुँचती है।
- सौर विकिरण (Solar Radiation):
- सूर्य से आने वाली ऊर्जा लघु तरंगों (Shortwaves) के रूप में होती है।
- वायुमंडल लघु तरंगों के लिए काफी हद तक पारदर्शी (Transparent) होता है, इसलिए यह ऊर्जा सीधे सतह तक पहुँच जाती है।
- पार्थिव विकिरण (Terrestrial Radiation):
- ⋆ जब पृथ्वी की सतह सौर विकिरण को सोखकर गर्म हो जाती है, तो वह स्वयं ऊष्मा उत्सर्जित करने लगती है।
- पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित यह ऊर्जा दीर्घ तरंगों (Longwaves) या अवरक्त विकिरण (Infrared Radiation) के रूप में होती है।
- वायुमंडल में मौजूद ग्रीनहाउस गैसें (विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प) इस दीर्घ तरंग विकिरण के लिए अपारदर्शी (Opaque) होती हैं और इसे सोख लेती हैं।
- ⋆ निष्कर्ष: वायुमंडल मुख्य रूप से पार्थिव विकिरण को अवशोषित करके गर्म होता है। यह वायुमंडल के गर्म होने की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। [UPSC/State PSC – Core Concept]
2. चालन (Conduction)
परिभाषा:
चालन ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया है जिसमें ऊष्मा एक वस्तु के कणों से दूसरे कणों में सीधे संपर्क (Direct Contact) द्वारा स्थानांतरित होती है, बिना कणों के स्वयं स्थानांतरित हुए।
- वायुमंडल में भूमिका:
- यह प्रक्रिया ठोस पदार्थों (जैसे धातु) में सबसे अधिक प्रभावी होती है। वायु ऊष्मा की कुचालक (Bad Conductor) है, इसलिए चालन की भूमिका वायुमंडल को गर्म करने में बहुत सीमित होती है।
- प्रक्रिया:
- पृथ्वी की सतह पार्थिव विकिरण से गर्म हो जाती है।
- इस गर्म सतह के सीधे संपर्क में आने वाली वायु की सबसे निचली परत चालन द्वारा गर्म हो जाती है।
- महत्व: यह प्रक्रिया केवल वायुमंडल की कुछ सेंटीमीटर मोटी निचली परत को ही गर्म कर पाती है। इसका महत्व ऊष्मा को सतह से वायु में स्थानांतरित करने की शुरुआत करने तक ही सीमित है।
3. संवहन (Convection)
परिभाषा:
संवहन ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया है जो तरल पदार्थों और गैसों में होती है, जिसमें पदार्थ के कण स्वयं ऊर्ध्वाधर (Vertical) रूप से स्थानांतरित होकर ऊष्मा का परिवहन करते हैं।
- वायुमंडल में भूमिका:
- ⋆ यह क्षोभमंडल में ऊष्मा के लंबवत (Vertical) वितरण का मुख्य तंत्र है।
- प्रक्रिया:
- चालन द्वारा वायु की निचली परत गर्म होती है।
- गर्म हवा हल्की होकर ऊपर उठती है।
- ऊपर से ठंडी और भारी हवा उसका स्थान लेने के लिए नीचे आती है।
- यह चक्रीय प्रक्रिया, जिसे संवहन धारा (Convection Current) कहते हैं, ऊष्मा को सतह से वायुमंडल की ऊपरी परतों तक पहुँचाती है।
- परिणाम: इसी प्रक्रिया से बादल बनते हैं और संवहनीय वर्षा होती है। तड़ित झंझा (Thunderstorms) भी तीव्र संवहन का ही परिणाम हैं। [UPSC Prelims]
[आरेख: एक सरल चित्र जिसमें पृथ्वी की सतह को दिखाया गया हो। सतह के पास चालन, फिर गर्म हवा का ऊपर उठना और ठंडी हवा का नीचे आना (संवहन), और हवा का समानांतर बहना (अभिवहन) तीरों के माध्यम से दर्शाया गया हो।]
4. अभिवहन (Advection)
परिभाषा:
अभिवहन ऊष्मा स्थानांतरण की वह प्रक्रिया है जिसमें वायु के क्षैतिज (Horizontal) संचलन द्वारा ऊष्मा का एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानांतरण होता है।
- वायुमंडल में भूमिका:
- ⋆ यह मौसम में होने वाले दैनिक परिवर्तनों और तापमान के क्षैतिज वितरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
- संवहन जहाँ ऊष्मा का ऊर्ध्वाधर वितरण करता है, वहीं अभिवहन क्षैतिज वितरण करता है।
- उदाहरण:
- पवनें (Winds): उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म हवाओं का ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर बहना (जैसे पछुआ पवनें)।
- स्थानीय पवनें: गर्मियों में उत्तर भारत में बहने वाली ‘लू’ गर्म अभिवहन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो तापमान को अचानक बढ़ा देती है। इसी प्रकार, सर्दियों में ‘शीतलहर’ ठंडे अभिवहन का उदाहरण है। [State PSC]
- महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents): ये भी अभिवहन का एक रूप हैं, जो समुद्र के पानी के माध्यम से विशाल मात्रा में ऊष्मा का क्षैतिज स्थानांतरण करती हैं (जैसे गर्म गल्फ स्ट्रीम यूरोप के तट को गर्म रखती है)।
चारों प्रक्रियाओं का तुलनात्मक सारांश
| प्रक्रिया | ऊष्मा स्थानांतरण की दिशा | माध्यम | वायुमंडल में भूमिका और महत्व | उदाहरण |
| विकिरण (Radiation) | तरंगों के रूप में (सभी दिशाओं में) | बिना माध्यम के भी संभव | वायुमंडल को गर्म करने का मूल आधार। पार्थिव विकिरण से वायुमंडल का मुख्य तापन। | सूर्य से ऊर्जा का आना, पृथ्वी से ऊष्मा का उत्सर्जन। |
| चालन (Conduction) | संपर्क द्वारा कण-से-कण | मुख्य रूप से ठोस (गैसों में बहुत कम) | नगण्य। केवल सतह के संपर्क वाली वायु की निचली परत को गर्म करता है। | गर्म तवे को छूने से हाथ का जलना। |
| संवहन (Convection) | ऊर्ध्वाधर (Vertical) | तरल और गैस | क्षोभमंडल में ऊष्मा के लंबवत वितरण का मुख्य तरीका। बादल निर्माण, वर्षा। | पानी का उबलना। |
| अभिवहन (Advection) | क्षैतिज (Horizontal) | तरल और गैस | मौसम में दैनिक परिवर्तन का मुख्य कारण। तापमान का क्षैतिज वितरण। | लू, शीतलहर, समुद्री धाराएँ। |
निष्कर्ष:
वायुमंडल का तापन एक जटिल प्रक्रिया है। इसकी शुरुआत विकिरण से होती है जब सतह गर्म होती है। चालन इस ऊष्मा को सतह से वायु की पहली परत में भेजता है। संवहन इस ऊष्मा को ऊपर की ओर वितरित करता है और अभिवहन इसे क्षैतिज रूप से पूरे ग्रह पर फैलाता है, जिससे पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों का मौसम और जलवायु निर्धारित होता है।
वायुमंडलीय दबाव और पवनें: वायुदाब पेटियाँ (Atmospheric Pressure and Winds: Pressure Belts)
वायुमंडलीय दबाव या वायुदाब पृथ्वी की सतह पर उसके ऊपर स्थित वायु के स्तंभ के भार के कारण पड़ने वाला दबाव है। वायुदाब स्थान और समय के साथ बदलता रहता है और यह पवनों के चलने तथा मौसम प्रणालियों के विकास का मूल कारण है। पवनें हमेशा उच्च वायुदाब (High Pressure) वाले क्षेत्रों से निम्न वायुदाब (Low Pressure) वाले क्षेत्रों की ओर चलती हैं।
वायुदाब का मापन और वितरण
- मापन: वायुदाब को बैरोमीटर (Barometer) नामक यंत्र से मापा जाता है। इसकी इकाई मिलीबार (mb) है।
- समुद्र तल पर औसत वायुदाब: 1013.25 mb।
- ऊँचाई के साथ संबंध: ⋆ ऊँचाई बढ़ने पर वायु विरल होती जाती है, इसलिए वायुदाब घटता है। यह गिरावट लगभग 10 मीटर पर 1 mb की दर से होती है।
- तापमान के साथ संबंध: ⋆ तापमान और वायुदाब में विपरीत (Inverse) संबंध होता है।
- गर्म हवा: गर्म होकर फैलती है, हल्की होती है, और ऊपर उठती है, जिससे सतह पर निम्न वायुदाब (Low Pressure) का निर्माण होता है।
- ठंडी हवा: ठंडी होकर सिकुड़ती है, भारी होती है, और नीचे बैठती है, जिससे सतह पर उच्च वायुदाब (High Pressure) का निर्माण होता है।
- समदाब रेखाएँ (Isobars): मानचित्र पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाओं को समदाब रेखाएँ कहते हैं।
वायुदाब का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution of Atmospheric Pressure)
वायुदाब का क्षैतिज वितरण से तात्पर्य पृथ्वी की सतह पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर, विशेषकर अक्षांशों के साथ, वायुदाब में पाए जाने वाले अंतर से है। यह वितरण स्थिर नहीं है, बल्कि समय और स्थान के साथ बदलता रहता है। वायुदाब का यही क्षैतिज अंतर पवनों की उत्पत्ति और दिशा का मूल कारण है।
वायुदाब के क्षैतिज वितरण का अध्ययन समदाब रेखाओं (Isobars) के माध्यम से किया जाता है।
समदाब रेखाएँ (Isobars)
- परिभाषा: मानचित्र पर समान समुद्र-स्तरीय वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाओं को समदाब रेखाएँ कहते हैं।
- महत्व:
- वायुदाब प्रवणता (Pressure Gradient): समदाब रेखाओं के बीच की दूरी वायुदाब प्रवणता को दर्शाती है, अर्थात प्रति इकाई दूरी पर वायुदाब में होने वाले परिवर्तन की दर।
- ⋆ पास-पास समदाब रेखाएँ: उच्च/तीव्र दाब प्रवणता (Steep Pressure Gradient) को दर्शाती हैं, जिसका परिणाम तीव्र गति वाली पवनें होती हैं।
- ⋆ दूर-दूर समदाब रेखाएँ: मंद दाब प्रवणता (Gentle Pressure Gradient) को दर्शाती हैं, जिसका परिणाम हल्की/शांत पवनें होती हैं। [UPSC Prelims – Conceptual]
- पवनों की दिशा का अनुमान: पवनों की दिशा समदाब रेखाओं के लगभग समानांतर (कोरिओलिस बल के कारण मुड़कर) होती है।
- वायुदाब प्रवणता (Pressure Gradient): समदाब रेखाओं के बीच की दूरी वायुदाब प्रवणता को दर्शाती है, अर्थात प्रति इकाई दूरी पर वायुदाब में होने वाले परिवर्तन की दर।
वायुदाब के क्षैतिज वितरण को नियंत्रित करने वाले कारक
- तापमान (Temperature):
- ⋆ यह वायुदाब के वितरण को नियंत्रित करने वाला सबसे प्रमुख कारक है। तापमान और वायुदाब के बीच व्युत्क्रमानुपाती (Inverse) संबंध होता है।
- गर्म क्षेत्र: हवा गर्म होकर फैलती है और ऊपर उठती है, जिससे निम्न वायुदाब (Low Pressure) बनता है (जैसे भूमध्य रेखा)।
- ठंडे क्षेत्र: हवा ठंडी होकर सिकुड़ती है और नीचे बैठती है, जिससे उच्च वायुदाब (High Pressure) बनता है (जैसे ध्रुव)।
- पृथ्वी का घूर्णन (Earth’s Rotation):
- पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न गत्यात्मक प्रभाव (Dynamic effects) भी वायुदाब पेटियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, खासकर उपोष्ण और उपध्रुवीय क्षेत्रों में। घूर्णन हवा को विक्षेपित करता है, जिससे कुछ अक्षांशों पर हवा जमा होती है (उच्च दाब) और कुछ से हट जाती है (निम्न दाब)।
- जलवाष्प (Water Vapour):
- आर्द्र हवा (जिसमें जलवाष्प होती है) शुष्क हवा की तुलना में हल्की होती है, क्योंकि जल (H₂O) का अणु भार नाइट्रोजन (N₂) और ऑक्सीजन (O₂) के औसत अणु भार से कम होता है।
- इसलिए, जिन क्षेत्रों में आर्द्रता अधिक होती है, वहाँ वायुदाब कम होता है (जैसे भूमध्यरेखीय क्षेत्र)।
- जल और स्थल का असमान वितरण (Uneven Distribution of Land and Water):
- स्थल की तुलना में जल देर से गर्म होता है और देर से ठंडा होता है। इस तापीय भिन्नता के कारण महाद्वीपों और महासागरों पर वायुदाब का वितरण अलग-अलग होता है।
- उत्तरी गोलार्ध: यहाँ स्थल भाग अधिक है, इसलिए वायुदाब पेटियाँ एक सतत (Continuous) बेल्ट के रूप में नहीं पाई जातीं। ये अलग-अलग उच्च और निम्न दाब के केंद्रों (Cells) में टूट जाती हैं।
- सर्दियों में: महाद्वीप महासागरों से अधिक ठंडे होते हैं, इसलिए महाद्वीपों पर उच्च दाब (जैसे साइबेरियन हाई) और महासागरों पर निम्न दाब (जैसे आइसलैंडिक लो) का निर्माण होता है।
- गर्मियों में: इसका विपरीत होता है; महाद्वीपों पर निम्न दाब और महासागरों पर उच्च दाब।
- दक्षिणी गोलार्ध: यहाँ जल भाग अधिक है, इसलिए वायुदाब पेटियाँ अधिक नियमित और सतत होती हैं।
वायुदाब का वैश्विक क्षैतिज वितरण: वायुदाब पेटियाँ
वैश्विक स्तर पर, वायुदाब का क्षैतिज वितरण सात प्रमुख पेटियों (Belts) में संगठित है। यह एक आदर्श और सरलीकृत मॉडल है जो यह मानता है कि पृथ्वी की सतह पूरी तरह से समान है।
- 1. भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब पेटी (Equatorial Low-Pressure Belt / Doldrums):
- (5°N – 5°S) – तापीय रूप से प्रेरित, अत्यधिक गर्मी के कारण।
- 2. उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी (Sub-tropical High-Pressure Belt / Horse Latitudes):
- (30°-35° N/S) – गत्यात्मक रूप से प्रेरित, भूमध्य रेखा से उठी हवा के नीचे उतरने के कारण।
- 3. उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी (Sub-polar Low-Pressure Belt):
- (60°-65° N/S) – गत्यात्मक रूप से प्रेरित, ध्रुवीय और पछुआ पवनों के अभिसरण और ऊपर उठने के कारण।
- 4. ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटी (Polar High-Pressure Belt):
- (80°-90° N/S) – तापीय रूप से प्रेरित, अत्यधिक ठंड के कारण।
यह आदर्श पैटर्न वायुदाब पेटियों के मौसमी खिसकाव और स्थल-जल के वितरण के कारण वास्तविक दुनिया में संशोधित हो जाता है, जिससे मौसम और जलवायु में जटिलता आती है।
परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु:
- समदाब रेखाएँ (Isobars): समान दाब को जोड़ने वाली रेखाएँ। पास-पास होने पर तीव्र पवन, दूर-दूर होने पर शांत पवन।
- तापमान और वायुदाब का संबंध: विपरीत/व्युत्क्रमानुपाती।
- उत्तरी गोलार्ध: वायुदाब पेटियाँ सतत नहीं हैं, दाब केंद्र (Pressure Cells) के रूप में हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध: वायुदाब पेटियाँ अधिक नियमित और सतत हैं।
- वैश्विक पवन प्रणाली: पवनों का प्रवाह हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर होता है और इन वैश्विक वायुदाब पेटियों द्वारा ही नियंत्रित होता है।
विश्व की प्रमुख वायुदाब पेटियाँ (Major Pressure Belts of the World)
पृथ्वी पर वायुदाब का वितरण एक व्यवस्थित पैटर्न का अनुसरण करता है, जो अक्षांशों के साथ बदलता है। इस पैटर्न के परिणामस्वरूप, ग्लोब पर कुल सात (7) वायुदाब पेटियों का विकास हुआ है, जो भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक फैली हैं।
इन पेटियों का निर्माण तापमान (Thermal Factors) और पृथ्वी के घूर्णन (Dynamic Factors) के संयुक्त प्रभाव से होता है।
[आरेख: पृथ्वी का एक ग्लोब जिसमें भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक सभी सात वायुदाब पेटियों (निम्न-उच्च-निम्न-उच्च) और उनसे संबंधित पवनों (व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय) की दिशाओं को दर्शाया गया हो।]
A. तापीय पेटियाँ (Thermally Induced Belts)
इनका निर्माण सीधे तौर पर सूर्य के ताप से होता है।
- अक्षांश: भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5° उत्तर से 5° दक्षिण तक।
- निर्माण का कारण: तापीय (Thermal)।
- यहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणें लगभग लंबवत पड़ती हैं, जिससे सतह अत्यधिक गर्म हो जाती है।
- गर्म हवा हल्की होकर ऊपर उठती है (संवहन), जिससे यहाँ स्थायी रूप से निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है।
- विशेषताएँ:
- यहाँ वायुमंडलीय दशाएँ अत्यंत शांत होती हैं क्योंकि यहाँ क्षैतिज पवनें लगभग नहीं चलतीं। इसी कारण इस पेटी को “डोलड्रम्स” (Doldrums) या शांत पेटी (Belt of Calm) भी कहा जाता है। [UPSC/State PSC]
B. गत्यात्मक पेटियाँ (Dynamically Induced Belts)
इनका निर्माण मुख्य रूप से पृथ्वी के घूर्णन (Rotation of Earth) और उससे उत्पन्न होने वाले अभिकेन्द्रीय बल तथा वायु के अवरोहण (उतरने) या आरोहण (उठने) के कारण होता है, न कि सीधे तापमान से।
- अक्षांश: दोनों गोलार्धों में लगभग 30° से 35° के बीच।
- निर्माण का कारण: गत्यात्मक (Dynamic)।
- भूमध्यरेखीय क्षेत्र से उठी हुई गर्म हवा क्षोभसीमा पर पहुँचकर ध्रुवों की ओर मुड़ जाती है, लेकिन पृथ्वी के घूर्णन के कारण यह लगभग 30°-35° अक्षांशों पर नीचे उतरने (Subsidence) लगती है।
- नीचे उतरती हुई ठंडी और भारी हवा से यहाँ उच्च दाब का निर्माण होता है।
- विशेषताएँ:
- यहाँ भी शांत और स्थिर वायुमंडलीय दशाएँ पाई जाती हैं। इस पेटी को “अश्व अक्षांश” (Horse Latitudes) कहा जाता है। [UPPSC 2021, BPSC]
- ⋆ विश्व के अधिकांश गर्म मरुस्थल (Hot Deserts) इसी पेटी में स्थित हैं, क्योंकि नीचे उतरती हुई शुष्क हवा वर्षा नहीं करती।
- अक्षांश: दोनों गोलार्धों में लगभग 60° से 65° के बीच।
- निर्माण का कारण: गत्यात्मक (Dynamic)।
- इस क्षेत्र में, ध्रुवों से आने वाली ठंडी ध्रुवीय पवनें और उपोष्ण कटिबंध से आने वाली गर्म पछुआ पवनें आपस में टकराती हैं।
- इस टकराव (अभिसरण) के कारण गर्म हवा हल्की होने के कारण ऊपर उठ जाती है, जिससे यहाँ निम्न दाब का निर्माण होता है।
- पृथ्वी के घूर्णन का प्रभाव भी यहाँ हवा को ऊपर उठाने में मदद करता है।
- विशेषताएँ:
- यह क्षेत्र अस्थिर और तूफानी मौसम (चक्रवात और प्रतिचक्रवात) के लिए जाना जाता है।
C. तापीय पेटियाँ (Thermally Induced Belts)
- अक्षांश: दोनों गोलार्धों में ध्रुवों के पास (लगभग 80° से 90°)।
- निर्माण का कारण: तापीय (Thermal)।
- यहाँ वर्ष भर तापमान अत्यंत कम रहता है (बर्फ से ढका क्षेत्र)।
- अत्यधिक ठंड के कारण हवा भारी होकर नीचे बैठती है, जिससे यहाँ स्थायी रूप से उच्च दाब का क्षेत्र बन जाता है।
- विशेषताएँ:
- यहाँ से ठंडी ध्रुवीय पवनें उपध्रुवीय निम्न दाब पेटी की ओर चलती हैं।
सभी वायुदाब पेटियों का सारांश
| पेटी का नाम | गोलार्ध | अक्षांश | निर्माण का कारण | उपनाम/महत्वपूर्ण तथ्य |
| भूमध्यरेखीय निम्न | – | 0° – 5° | तापीय (Thermal) | डोलड्रम्स / शांत पेटी |
| उपोष्ण उच्च | उत्तरी & दक्षिणी | 30° – 35° | गत्यात्मक (Dynamic) | अश्व अक्षांश / मरुस्थलों का क्षेत्र |
| उपध्रुवीय निम्न | उत्तरी & दक्षिणी | 60° – 65° | गत्यात्मक (Dynamic) | तूफानी मौसम / वाताग्र निर्माण का क्षेत्र |
| ध्रुवीय उच्च | उत्तरी & दक्षिणी | 80° – 90° | तापीय (Thermal) | बर्फीला क्षेत्र / स्थायी उच्च दाब |
वायुदाब पेटियों का खिसकाव (Shifting of Pressure Belts):
ये वायुदाब पेटियाँ स्थिर नहीं हैं। वे सूर्य के उत्तरायण (Summer Solstice) और दक्षिणायन (Winter Solstice) की स्थिति के साथ-साथ लगभग 5° से 10° अक्षांश तक उत्तर और दक्षिण की ओर खिसकती हैं। इसी खिसकाव के कारण भूमध्यसागरीय जलवायु (Mediterranean Climate) जैसी मौसमी जलवायु का निर्माण होता है। [UPSC Mains]
बैरोमीटर (Barometer)
परिभाषा:
बैरोमीटर (ग्रीक शब्द ‘Baros’ अर्थात ‘भार’ और ‘Metron’ अर्थात ‘माप’) वह वैज्ञानिक उपकरण है जिसका उपयोग किसी विशेष स्थान पर वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) या वायुदाब को मापने के लिए किया जाता है। वायुदाब वह बल है जो पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा उसके नीचे की सतह पर लगाया जाता है।
यह उपकरण मौसम विज्ञान (Meteorology) में एक मूलभूत और अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि वायुदाब में होने वाले परिवर्तन मौसम में आने वाले बदलावों का एक प्रमुख संकेतक होते हैं।
आविष्कार और मूल सिद्धांत
- आविष्कारक: इसका आविष्कार 1643 में इतालवी भौतिक विज्ञानी इवेंजेलिस्टा टोरिसेली (Evangelista Torricelli) ने किया था।
- मूल सिद्धांत:
- टोरिसेली का प्रयोग सरल लेकिन क्रांतिकारी था। उन्होंने कांच की एक लगभग 1 मीटर लंबी, एक सिरे पर बंद नली को पारे (Mercury – Hg) से पूरी तरह भर दिया।
- फिर उन्होंने नली के खुले सिरे को अपने अंगूठे से बंद करके उसे पारे से भरे एक बर्तन में उल्टा खड़ा कर दिया।
- अंगूठा हटाने पर, नली में पारे का स्तंभ थोड़ा नीचे गिरा और एक निश्चित ऊँचाई (लगभग 76 सेंटीमीटर या 760 मिलीमीटर) पर आकर स्थिर हो गया। नली के ऊपरी बंद सिरे में एक खाली जगह बन गई, जिसे ‘टोरिसेली का निर्वात’ (Torricellian Vacuum) कहा जाता है।
- निष्कर्ष: टोरिसेली ने यह निष्कर्ष निकाला कि बर्तन में मौजूद पारे की सतह पर लगने वाला वायुमंडलीय दबाव ही नली के अंदर के पारे के स्तंभ के वजन को संतुलित कर रहा है। इसलिए, नली में पारे के स्तंभ की ऊँचाई सीधे तौर पर वायुमंडलीय दबाव का एक माप है।
- ⋆ मानक वायुदाब: समुद्र तल पर, मानक वायुमंडलीय दबाव पारे के 760 मिमी (या 76 सेमी) ऊँचे स्तंभ के बराबर होता है।
बैरोमीटर के प्रकार (Types of Barometer)
- 1. मरकरी बैरोमीटर (Mercury Barometer)
- विवरण: यह टोरिसेली के मूल डिजाइन पर आधारित है। यह सबसे सटीक प्रकार का बैरोमीटर माना जाता है और इसे अक्सर प्रयोगशालाओं और मौसम केंद्रों में मानक उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता है।
- कमियाँ:
- पारा एक विषाक्त (Toxic) धातु है।
- यह उपकरण बड़ा, भारी और नाजुक होता है, जिससे इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना मुश्किल होता है।
- 2. निर्द्रव या एनरॉयड बैरोमीटर (Aneroid Barometer)
- “एनरॉयड” का अर्थ है ‘बिना द्रव के’।
- आविष्कार: 1844 में ल्यूसियन विडी (Lucien Vidi) द्वारा।
- कार्यप्रणाली:
- इसमें एक छोटी, लचीली और हवाबंद धातु की डिब्बी (Metal box) होती है, जिसके अंदर से अधिकांश हवा निकाल दी जाती है, जिससे आंशिक निर्वात (Partial vacuum) बन जाता है।
- जब बाहरी वायुदाब बढ़ता है, तो यह डिब्बी थोड़ी पिचक जाती है। जब वायुदाब कम होता है, तो यह फैल जाती है।
- डिब्बी के इस सूक्ष्म फैलाव और संकुचन को उत्तोलकों (Levers) और स्प्रिंग्स की एक प्रणाली द्वारा बढ़ाकर एक संकेतक (Pointer) तक पहुँचाया जाता है, जो एक डायल पर वायुदाब का पाठ्यांक (Reading) दिखाता है।
- लाभ:
- यह हल्का, छोटा और अधिक मजबूत होता है, जिससे यह पोर्टेबल है।
- यह मरकरी बैरोमीटर की तुलना में कम महंगा और उपयोग करने में सुरक्षित है।
- ⋆ हवाई जहाजों में ऊँचाई मापने वाले यंत्र (Altimeter) और मौसम के पूर्वानुमान के लिए घरेलू उपकरणों में इसी का उपयोग होता है। [UPSC/State PSC – Application Based]
- 3. बैरोग्राफ (Barograph):
- यह एनरॉयड बैरोमीटर का ही एक संशोधित रूप है जो समय के साथ वायुदाब में होने वाले परिवर्तनों को स्वचालित रूप से एक ग्राफ पर रिकॉर्ड करता है। इसमें संकेतक की जगह एक पेन लगा होता है जो घूमते हुए ड्रम पर लगे कागज (बैरोग्राम) पर एक रेखा बनाता है।
मौसम पूर्वानुमान में बैरोमीटर का उपयोग
वायुदाब में होने वाले परिवर्तन आगामी मौसम का एक महत्वपूर्ण पूर्वानुमान देते हैं।
| बैरोमीटर का पाठ्यांक (Reading) | मौसम का पूर्वानुमान | कारण |
| पारा तेजी से गिरता है (दाब कम होता है) | तूफानी मौसम (Stormy Weather) का संकेत; आँधी और वर्षा की संभावना। | निम्न दाब चक्रवातीय दशाओं और हवा के ऊपर उठने का सूचक है, जिससे बादल बनते हैं। |
| पारा धीरे-धीरे गिरता है | लंबी अवधि तक वर्षा की संभावना। | निम्न दाब प्रणाली धीरे-धीरे क्षेत्र में स्थापित हो रही है। |
| पारा तेजी से बढ़ता है (दाब बढ़ता है) | तूफानी मौसम के बाद साफ मौसम का संकेत, लेकिन हवाएँ तेज रह सकती हैं। | उच्च दाब प्रणाली तेजी से आ रही है। |
| पारा धीरे-धीरे बढ़ता है या स्थिर रहता है | शांत, शुष्क और साफ मौसम (Calm & Fair Weather) की लंबी अवधि। | उच्च दाब (प्रतिचक्रवातीय दशाएँ) का अर्थ है हवा का नीचे उतरना, जो बादलों के निर्माण को रोकता है। |
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य (Other Important Facts)
- ऊँचाई का मापन: चूँकि ऊँचाई बढ़ने पर वायुदाब एक निश्चित दर से कम होता है, संशोधित एनरॉयड बैरोमीटर (जिसे अल्टीमीटर – Altimeter कहते हैं) का उपयोग विमानों में और पर्वतारोहियों द्वारा अपनी ऊँचाई मापने के लिए किया जाता है।
- वायुदाब की इकाइयाँ: वायुदाब को मिलीबार (mb), पास्कल (Pascal), इंच ऑफ मरकरी (inches of mercury), और टॉर (Torr) में मापा जाता है। मौसम विज्ञान में मिलीबार और हेक्टोपास्कल (hPa) सबसे आम हैं। (1 mb = 1 hPa)
- मानक समुद्र-स्तरीय दाब: 1013.25 mb या 760 mm Hg।
वायुदाब (Atmospheric Pressure) से संबंधित तथ्य
- मापन यंत्र: वायुमंडलीय दबाव बैरोमीटर (Barometer) से मापा जाता है।
- आविष्कारक: बैरोमीटर का आविष्कार इवेंजेलिस्टा टोरिसेली (Evangelista Torricelli) ने किया था।
- मापन की इकाई: वायुदाब की मानक इकाई मिलीबार (mb) या हेक्टोपास्कल (hPa) है।
- मानक वायुदाब: समुद्र तल पर औसत वायुदाब 1013.25 mb या 760 mm (76 cm) पारा स्तंभ के बराबर होता है।
- ऊँचाई के साथ संबंध: ऊँचाई बढ़ने पर वायुदाब हमेशा घटता है।
- तापमान के साथ संबंध: तापमान और वायुदाब में विपरीत/उल्टा (Inverse) संबंध होता है। (गर्म हवा = निम्न दाब, ठंडी हवा = उच्च दाब)।
- आर्द्रता के साथ संबंध: आर्द्र हवा (नम) शुष्क हवा से हल्की होती है, इसलिए आर्द्रता बढ़ने पर वायुदाब कम होता है।
- समदाब रेखा (Isobar): मानचित्र पर समान वायुदाब वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा।
- दाब प्रवणता (Pressure Gradient): जब समदाब रेखाएँ पास-पास होती हैं, तो दाब प्रवणता तीव्र होती है, जिससे तेज हवाएँ चलती हैं।
वायुदाब पेटियों (Pressure Belts) से संबंधित तथ्य
- कुल पेटियों की संख्या: पृथ्वी पर कुल सात (7) वायुदाब पेटियाँ हैं।
- तापीय रूप से प्रेरित पेटियाँ: भूमध्यरेखीय निम्न दाब पेटी और ध्रुवीय उच्च दाब पेटियाँ सीधे तौर पर तापमान से संबंधित हैं।
- गत्यात्मक रूप से प्रेरित पेटियाँ: उपोष्ण उच्च दाब पेटी और उपध्रुवीय निम्न दाब पेटियाँ पृथ्वी के घूर्णन और वायु के संचलन के कारण बनती हैं।
- डोलड्रम्स (Doldrums): भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब पेटी को ‘शांत पेटी’ या ‘डोलड्रम्स’ कहा जाता है। [UPPSC/BPSC]
- अश्व अक्षांश (Horse Latitudes): उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी (30°-35° अक्षांश) को ‘अश्व अक्षांश’ कहते हैं। [UPSC 2021, SSC]
- मरुस्थलों की अवस्थिति: विश्व के अधिकांश गर्म मरुस्थल उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी में महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर स्थित हैं।
- पेटियों का खिसकाव: सभी वायुदाब पेटियाँ सूर्य की स्थिति के साथ उत्तर और दक्षिण की ओर खिसकती हैं, जिससे भूमध्यसागरीय जैसी मौसमी जलवायु उत्पन्न होती है।
वायुमंडलीय पवनें: विश्व की पवनें (Atmospheric Winds: Winds of the World)
पवन उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों से निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों की ओर बहने वाली वायु की क्षैतिज गति है। पवनों का नाम उस दिशा के आधार पर रखा जाता है जहाँ से वे आती हैं, न कि जहाँ वे जाती हैं (जैसे, पछुआ पवनें पश्चिम से आती हैं)। पवनें पृथ्वी की सतह पर तापमान और आर्द्रता के पुनर्वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पवनों की दिशा और गति को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors Controlling the Direction and Velocity of Winds)
पवन का प्रवाह कभी भी सीधा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर एक सरल रेखा में नहीं होता। पृथ्वी की सतह पर बहने वाली पवनों की दिशा और गति कई बलों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम होती है। मुख्य रूप से तीन बल पवनों को नियंत्रित करते हैं:
- दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force)
- कोरिओलिस बल (Coriolis Force)
- घर्षण बल (Frictional Force)
1. दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force – PGF)
- परिभाषा: यह वायुदाब में क्षैतिज अंतर के कारण उत्पन्न होने वाला बल है। प्रवणता (Gradient) का अर्थ है प्रति इकाई दूरी पर दाब में होने वाला परिवर्तन।
- कार्यप्रणाली:
- ⋆ यह बल पवनों की उत्पत्ति का मूल कारण है। इसके बिना पवनें नहीं चलेंगी।
- इस बल की दिशा हमेशा उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर, समदाब रेखाओं (Isobars) के समकोण (Perpendicular) पर होती है।
- PGF की शक्ति: यह बल उतना ही शक्तिशाली होता है जितनी दाब प्रवणता तीव्र होती है।
- तीव्र प्रवणता (समदाब रेखाएँ पास-पास): PGF शक्तिशाली होता है और पवन की गति तेज होती है।
- मंद प्रवणता (समदाब रेखाएँ दूर-दूर): PGF कमजोर होता है और पवन की गति धीमी होती है। [UPSC Prelims – Statement Based]
- प्रभाव: यह पवनों को गति प्रदान करता है और उनकी प्रारंभिक दिशा निर्धारित करता है।
2. कोरिओलिस बल (Coriolis Force)
- परिभाषा: यह एक आभासी या छद्म बल (Apparent or Pseudo Force) है जो पृथ्वी के घूर्णन (Rotation of Earth) के कारण उत्पन्न होता है। यह बल गतिमान वस्तुओं (जैसे पवन, समुद्री धाराएँ, मिसाइलें) की दिशा को विक्षेपित (Deflect) कर देता है।
- आविष्कार: इसका वर्णन फ्रांसीसी वैज्ञानिक गैस्पार्ड-गुस्ताव डी कोरिओलिस ने किया था।
- कार्यप्रणाली:
- ⋆ यह बल पवन की उत्पत्ति नहीं करता, बल्कि उसकी दिशा को मोड़ता है।
- इस बल के कारण, पवनें अपनी मूल दिशा से:
- उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में दाईं ओर (to the right) मुड़ जाती हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) में बाईं ओर (to the left) मुड़ जाती हैं।
- इस प्रभाव को फेरेल का नियम (Ferrel’s Law) भी कहते हैं। [UPSC/State PSC]
- कोरिओलिस बल का मान:
- यह बल पवनों की गति के समानुपाती होता है (पवन जितनी तेज, विक्षेपण उतना अधिक)।
- ⋆ इसका प्रभाव अक्षांशों के साथ बदलता है:
- यह भूमध्य रेखा (Equator) पर शून्य (Zero) होता है।
- यह ध्रुवों (Poles) पर अधिकतम (Maximum) होता है।
- ⋆ PYQ Link: “भूमध्य रेखा के पास उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का निर्माण क्यों नहीं होता?” – उत्तर: क्योंकि भूमध्य रेखा पर कोरिओलिस बल लगभग शून्य होता है, जो चक्रवाती परिसंचरण (Cyclonic circulation) के लिए आवश्यक घूर्णन गति प्रदान नहीं कर पाता। [UPSC Mains, UPPSC Prelims 2021]
3. घर्षण बल (Frictional Force)
- परिभाषा: यह पृथ्वी की सतह की अनियमितताओं (जैसे पर्वत, पठार, जंगल, इमारतें) द्वारा पवन की गति के विरुद्ध लगाया गया प्रतिरोधक बल है।
- कार्यप्रणाली:
- यह बल पवन की गति को कम करता है।
- घर्षण का प्रभाव केवल पृथ्वी की सतह के निकट (लगभग 1 से 3 किलोमीटर की ऊँचाई तक) ही महत्वपूर्ण होता है।
- सतह पर प्रभाव:
- महासागरों पर घर्षण बहुत कम होता है, इसलिए वहाँ पवनें बहुत तेज चलती हैं।
- महाद्वीपों (विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों) पर घर्षण बहुत अधिक होता है, जिससे पवन की गति काफी कम हो जाती है।
- दिशा पर अप्रत्यक्ष प्रभाव: घर्षण बल पवन की गति को कम करता है। चूंकि कोरिओलिस बल गति पर निर्भर करता है, इसलिए घर्षण के कारण कोरिओलिस बल भी कमजोर हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि सतह के निकट पवनें दाब प्रवणता बल से अधिक प्रभावित होती हैं और समदाब रेखाओं को एक कोण पर पार करती हैं, जबकि ऊपरी वायुमंडल में वे लगभग समानांतर चलती हैं।
बलों का संयुक्त प्रभाव: भूविक्षेपी पवनें (Geostrophic Winds)
[आरेख: एक चित्र जिसमें उच्च दाब से निम्न दाब की ओर PGF, उसके समकोण पर कोरिओलिस बल और इन दोनों के संतुलन से बहती भूविक्षेपी पवन को समदाब रेखाओं के समानांतर दिखाया गया हो।]
- परिभाषा: ऊपरी वायुमंडल में (लगभग 2-3 किमी ऊपर), जहाँ घर्षण का प्रभाव नगण्य होता है, पवन की दिशा दो मुख्य बलों – दाब प्रवणता बल (PGF) और कोरिओलिस बल – के बीच संतुलन का परिणाम होती है।
- प्रक्रिया:
- पवन PGF के कारण उच्च से निम्न दाब की ओर चलना शुरू करती है।
- जैसे ही पवन गति पकड़ती है, कोरिओलिस बल उसे विक्षेपित करना शुरू कर देता है (उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर)।
- पवन तब तक मुड़ती रहती है जब तक कि कोरिओलिस बल की दिशा PGF की दिशा के ठीक विपरीत न हो जाए और दोनों बल एक-दूसरे को संतुलित न कर दें।
- परिणाम:
- ⋆ इस संतुलन की स्थिति में, पवन उच्च और निम्न दाब के बीच सीधी जाने के बजाय, समदाब रेखाओं के समानांतर (Parallel to the Isobars) बहने लगती है। इन पवनों को भूविक्षेपी पवनें (Geostrophic Winds) कहते हैं।
- जेट स्ट्रीम (Jet Streams) भूविक्षेपी पवनों का एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। [UPSC]
निष्कर्ष:
पृथ्वी पर पवनों का प्रवाह एक साधारण सीधी रेखा में नहीं होता, बल्कि यह एक जटिल नृत्य की तरह है जिसे तीन प्रमुख नर्तक – दाब प्रवणता, कोरिओलिस और घर्षण – नियंत्रित करते हैं। दाब प्रवणता पवनों को जन्म देती है, कोरिओलिस उनकी दिशा को मोड़ता है, और घर्षण उनकी गति को धीमा करता है, जिससे हमारे ग्रह पर पवनों का एक जटिल और गतिशील पैटर्न बनता है।
फेरेल का नियम (Ferrel’s Law)
फेरेल का नियम (Ferrel’s Law), जिसे 1856 में अमेरिकी मौसम विज्ञानी विलियम फेरेल (William Ferrel) द्वारा प्रतिपादित किया गया था, पृथ्वी की सतह पर गतिमान वस्तुओं (जैसे पवनें और महासागरीय धाराएँ) की दिशा में होने वाले विक्षेपण (Deflection) का वर्णन करता है। यह नियम मूल रूप से कोरिओलिस बल (Coriolis Force) के प्रभाव का एक व्यावहारिक अनुप्रयोग और कथन है।
नियम का कथन (Statement of the Law)
फेरेल के नियम के अनुसार:
“पृथ्वी के घूर्णन के कारण, कोई भी गतिमान वस्तु (जैसे पवन), उत्तरी गोलार्ध में अपनी गति की दिशा के दाईं ओर (to the right) और दक्षिणी गोलार्ध में अपनी गति की दिशा के बाईं ओर (to the left) विक्षेपित हो जाती है।”
सरल शब्दों में:
- अगर आप उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में पवन की दिशा में अपनी पीठ करके खड़े हों, तो हवा आपको आपके दाहिने हाथ (Right hand) की ओर विक्षेपित महसूस होगी।
- अगर आप दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) में पवन की दिशा में अपनी पीठ करके खड़े हों, तो हवा आपको आपके बाएँ हाथ (Left hand) की ओर विक्षेपित महसूस होगी।
[आरेख: पृथ्वी के दो गोलार्ध दिखाए गए हों। उत्तरी गोलार्ध में एक सीधी रेखा के तीर को दाईं ओर मुड़ते हुए और दक्षिणी गोलार्ध में एक सीधी रेखा के तीर کو बाईं ओर मुड़ते हुए दर्शाया जाए। नीचे ‘कोरिओलिस बल / फेरेल का नियम’ लिखा हो।]
फेरेल के नियम का कारण: कोरिओलिस बल (The Cause: Coriolis Force)
फेरेल के नियम के पीछे का मूल कारण कोरिओलिस बल है, जो पृथ्वी के अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करने के कारण उत्पन्न होता है।
- यह एक वास्तविक बल नहीं है, बल्कि एक आभासी या छद्म बल (Apparent/Pseudo Force) है, जो घूर्णन कर रहे एक निर्देश तंत्र (Rotating frame of reference) – यानी हमारी पृथ्वी – पर गतिमान वस्तुओं पर महसूस होता है।
- कार्यप्रणाली का सरलीकरण:
- पृथ्वी की घूर्णीय गति भूमध्य रेखा पर सबसे तेज और ध्रुवों की ओर धीमी होती जाती है।
- जब कोई वस्तु (जैसे हवा का एक पार्सल) भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाती है, तो वह पृथ्वी की तेज घूर्णीय गति वाले क्षेत्र से धीमी गति वाले क्षेत्र में पहुँचती है। अपनी जड़ता (Inertia) के कारण, वह उस अक्षांश की पृथ्वी की तुलना में तेजी से आगे बढ़ जाती है, जिससे वह घूर्णन की दिशा में (पूर्व की ओर) मुड़ जाती है, जो कि उसके मार्ग के दाईं ओर (उत्तरी गोलार्ध में) होता है।
- इसके विपरीत, जब वस्तु ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर आती है, तो वह धीमी गति वाले क्षेत्र से तेज गति वाले क्षेत्र में आती है, और पीछे रह जाती है, जिससे वह पश्चिम की ओर मुड़ जाती है, जो फिर से उसके मार्ग के दाईं ओर (उत्तरी गोलार्ध में) होता है।
फेरेल के नियम के प्रभाव और उदाहरण (Effects and Examples of Ferrel’s Law)
यह नियम वैश्विक पवन प्रणालियों और महासागरीय धाराओं के पैटर्न को समझने के लिए मौलिक है।
- स्थायी पवनों का पैटर्न (Pattern of Planetary Winds):
- व्यापारिक पवनें (Trade Winds): उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर सीधी जाने के बजाय, फेरेल के नियम के कारण ये उत्तर-पूर्वी (उत्तरी गोलार्ध में) और दक्षिण-पूर्वी (दक्षिणी गोलार्ध में) हो जाती हैं।
- पछुआ पवनें (Westerlies): ये उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर सीधी न जाकर दक्षिण-पश्चिमी (उत्तरी गोलार्ध में) और उत्तर-पश्चिमी (दक्षिणी गोलार्ध में) हो जाती हैं।
- चक्रवातों और प्रतिचक्रवातों का परिसंचरण (Circulation of Cyclones and Anticyclones):
- ⋆ चक्रवात (Cyclone – निम्न दाब केंद्र): कोरिओलिस बल के कारण, चक्रवात में हवाएँ सीधी केंद्र की ओर न जाकर:
- उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों के विपरीत (Anti-clockwise) घूमती हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की सुइयों की दिशा में (Clockwise) घूमती हैं।
- ⋆ प्रतिचक्रवात (Anticyclone – उच्च दाब केंद्र): प्रतिचक्रवात में हवाएँ केंद्र से बाहर की ओर जाती हैं और उनका परिसंचरण चक्रवात के ठीक विपरीत होता है।
- PYQ Link: “उत्तरी गोलार्ध में चक्रवातों में पवन परिसंचरण की दिशा क्या होती है?” [UPSC/BPSC Prelims]
- ⋆ चक्रवात (Cyclone – निम्न दाब केंद्र): कोरिओलिस बल के कारण, चक्रवात में हवाएँ सीधी केंद्र की ओर न जाकर:
- महासागरीय धाराओं का घूर्णन (Oceanic Gyres):
- प्रमुख महासागरीय धाराएँ भी फेरेल के नियम से प्रभावित होती हैं। वे बंद लूप बनाती हैं जिन्हें गायर (Gyre) कहते हैं। ये गायर उत्तरी गोलार्ध में दक्षिणावर्त (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्ध में वामावर्त (Anti-clockwise) घूमते हैं।
फेरेल के नियम की सीमाएँ
- कोरिओलिस बल पर निर्भरता: यह नियम केवल कोरिओलिस बल का एक वर्णनात्मक रूप है। इसलिए, यह भी:
- भूमध्य रेखा पर लागू नहीं होता, क्योंकि वहाँ कोरिओलिस बल शून्य होता है।
- छोटी दूरी या धीमी गति वाली वस्तुओं (जैसे बहती नदी, चलती कार) पर इसका प्रभाव नगण्य होता है।
निष्कर्ष:
फेरेल का नियम पृथ्वी पर बड़े पैमाने की गति (पवनें, धाराएँ) के व्यवहार को समझने के लिए एक सरल और शक्तिशाली नियम है। यह कोरिओलिस बल के प्रभाव को एक आसानी से याद रखने वाले प्रारूप में प्रस्तुत करता है, जो हमें वैश्विक पवन और महासागरीय परिसंचरण के पैटर्न की व्याख्या करने में मदद करता है।
पवनों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. स्थायी या भूमंडलीय पवनें (Permanent or Planetary Winds)
स्थायी या भूमंडलीय पवनें वे पवनें हैं जो पृथ्वी के विस्तृत क्षेत्र पर वर्ष भर लगभग एक ही दिशा में, एक निश्चित वायुदाब पेटी से दूसरी निश्चित वायुदाब पेटी की ओर चलती हैं। इनका नाम “भूमंडलीय (Planetary)” इसलिए है क्योंकि ये पूरे ग्लोब को घेरती हैं और इनका निर्माण पृथ्वी के घूर्णन और सूर्य के ताप के वैश्विक वितरण के कारण होता है। ये पवनें पृथ्वी पर ऊष्मा और आर्द्रता के स्थानांतरण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
स्थायी पवनें तीन प्रकार की होती हैं:
- व्यापारिक पवनें (Trade Winds)
- पछुआ पवनें (Westerlies)
- ध्रुवीय पूर्वी पवनें (Polar Easterlies)
[आरेख: पृथ्वी का एक ग्लोब जिसमें सभी सात वायुदाब पेटियों को दर्शाया गया हो। उपोष्ण उच्च दाब से भूमध्यरेखीय निम्न दाब की ओर चलती व्यापारिक पवनें, उपोष्ण उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलती पछुआ पवनें, और ध्रुवीय उच्च दाब से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलती ध्रुवीय पूर्वी पवनों को उनकी सही विक्षेपित दिशाओं के साथ तीरों से दिखाया जाए।]
A. व्यापारिक पवनें या सन्मार्गी पवनें (Trade Winds or Easterlies)
- परिभाषा: ये वे पवनें हैं जो दोनों गोलार्धों में उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटियों (Sub-tropical High-Pressure Belts, ~30°-35°) से भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब पेटी (Equatorial Low-Pressure Belt, ~0°-5°) की ओर बहती हैं।
- दिशा (Direction):
- कोरिओलिस बल/फेरेल के नियम के कारण, ये अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती हैं।
- उत्तरी गोलार्ध: ये अपनी दाईं ओर मुड़कर उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हैं, इसलिए इन्हें “उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें” (North-East Trade Winds) कहते हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध: ये अपनी बाईं ओर मुड़कर दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर बहती हैं, इसलिए इन्हें “दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें” (South-East Trade Winds) कहते हैं।
- विशेषताएँ और प्रभाव:
- नामकरण: प्राचीन काल में समुद्री व्यापारी अपने पाल वाले जहाजों को चलाने के लिए इन नियमित और भरोसेमंद पवनों का उपयोग करते थे, इसीलिए इन्हें “व्यापारिक पवनें” कहा जाता है।
- अभिसरण: दोनों गोलार्धों की व्यापारिक पवनें भूमध्यरेखीय निम्न दाब पेटी में आकर मिलती (अभिसरण करती) हैं, इस क्षेत्र को अंतः-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (Inter-Tropical Convergence Zone – ITCZ) कहते हैं। यहाँ हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और संवहनीय वर्षा करती है। [UPSC Prelims]
- वर्षा का पैटर्न: ⋆ ये पवनें महासागरों के ऊपर से गुजरते समय नमी ग्रहण कर लेती हैं। इसलिए, ये उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में महाद्वीपों के पूर्वी किनारों पर भारी वर्षा करती हैं, लेकिन पश्चिमी किनारों तक पहुँचते-पहुँचते शुष्क हो जाती हैं। इसी कारण विश्व के अधिकांश गर्म मरुस्थल महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर स्थित हैं। [UPSC Mains – Conceptual]
B. पछुआ पवनें (Westerlies)
- परिभाषा: ये वे पवनें हैं जो दोनों गोलार्धों में उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटियों (Sub-tropical High-Pressure Belts, ~30°-35°) से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटियों (Sub-polar Low-Pressure Belts, ~60°-65°) की ओर बहती हैं।
- दिशा (Direction):
- ये पश्चिम दिशा से आती हुई प्रतीत होती हैं।
- उत्तरी गोलार्ध: ये दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर बहती हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध: ये उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर बहती हैं।
- विशेषताएँ और प्रभाव:
- अनियमितता: उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों और महासागरों का वितरण असमान होने के कारण, यहाँ की पछुआ पवनें कम नियमित और परिवर्तनशील होती हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध की प्रचंडता: ⋆ दक्षिणी गोलार्ध में 40° से 65° अक्षांशों के बीच लगभग कोई बड़ा भू-भाग नहीं है (केवल जल ही जल है)। घर्षण के अभाव में, ये पवनें अत्यंत शक्तिशाली, तूफानी और निर्बाध रूप से चलती हैं।
- 40°S अक्षांश: “गरजता चालीसा” (Roaring Forties)
- 50°S अक्षांश: “प्रचंड/भयंकर पचासा” (Furious Fifties)
- 60°S अक्षांश: “चीखता साठा” (Shrieking Sixties)
- PYQ Link: यह वर्गीकरण विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछा गया है। [SSC, Railways, BPSC]
- वर्षा का पैटर्न: ये पवनें शीतोष्ण कटिबंध में महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर वर्ष भर वर्षा करती हैं।
C. ध्रुवीय पूर्वी पवनें (Polar Easterlies)
- परिभाषा: ये वे पवनें हैं जो दोनों गोलार्धों में ध्रुवीय उच्च वायुदाब पेटियों (Polar High-Pressure Belts, ~80°-90°) से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटियों (Sub-polar Low-Pressure Belts, ~60°-65°) की ओर बहती हैं।
- दिशा (Direction):
- ये पूर्व दिशा से आती हुई प्रतीत होती हैं।
- उत्तरी गोलार्ध: ये उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हैं।
- दक्षिणी गोलार्ध: ये दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की ओर बहती हैं।
- विशेषताएँ और प्रभाव:
- प्रकृति: ये अत्यंत ठंडी और शुष्क पवनें होती हैं क्योंकि ये बर्फीले ध्रुवीय क्षेत्रों से उत्पन्न होती हैं।
- वाताग्र का निर्माण: ⋆ जब ये ठंडी और भारी ध्रुवीय पवनें उपध्रुवीय क्षेत्र में गर्म और हल्की पछुआ पवनों से मिलती हैं, तो एक अस्थिर सीमा का निर्माण होता है जिसे ध्रुवीय वाताग्र (Polar Front) कहते हैं। इसी वाताग्र पर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों (Temperate Cyclones) की उत्पत्ति होती है, जो उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया के मौसम को बहुत प्रभावित करते हैं। [UPSC/State PSC Mains]
2. मौसमी पवनें (Seasonal Winds)
मौसमी पवनें वे पवनें होती हैं जो वर्ष की अलग-अलग ऋतुओं के अनुसार अपनी दिशा को उलट (Reverse) लेती हैं। इन पवनों का निर्माण बड़े भू-भागों (महाद्वीपों) और विशाल जलराशियों (महासागरों) के बीच विभेदी तापन (Differential Heating and Cooling) के कारण होता है। चूँकि स्थल और जल के गर्म और ठंडा होने की दर अलग-अलग होती है, इसलिए ऋतु परिवर्तन के साथ उनके ऊपर मौजूद वायुदाब की स्थिति भी बदल जाती है, जिससे पवनों की दिशा में बड़े पैमाने पर मौसमी उलटफेर होता है।
इस प्रकार की पवन प्रणाली का सबसे उत्कृष्ट और बड़े पैमाने का उदाहरण मानसूनी पवनें (Monsoon Winds) हैं।
मानसूनी पवनें (Monsoon Winds)
‘मॉनसून’ शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ (Mausim) से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘ऋतु’ (Season)। ऐतिहासिक रूप से, यह उन पवनों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया गया था जो हिंद महासागर और अरब सागर पर चलती हैं और वर्ष में दो बार अपनी दिशा पूरी तरह से उलट लेती हैं।
मानसून की उत्पत्ति एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई कारक शामिल होते हैं, लेकिन इसका मूल आधार स्थल और जल का विभेदी तापन है।
- 1. ग्रीष्मकालीन मानसून (Summer Monsoon) – (लगभग जून से सितंबर)
- प्रक्रिया:
- स्थल का तापन: ग्रीष्मकाल में सूर्य के उत्तरायण (Tropic of Cancer पर लंबवत) होने पर, मध्य और दक्षिण एशिया का विशाल भू-भाग (विशेषकर तिब्बत का पठार और उत्तर-पश्चिम भारत) तेजी से गर्म होता है।
- निम्न दाब का निर्माण: इस अत्यधिक गर्मी के कारण, स्थल पर एक तीव्र निम्न वायुदाब केंद्र (Intense Low-Pressure Zone) विकसित हो जाता है। इसी समय ITCZ (Inter-Tropical Convergence Zone) भी उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान पर स्थापित हो जाता है।
- समुद्र पर उच्च दाब: इस समय, दक्षिण में स्थित हिंद महासागर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, जिससे वहाँ एक उच्च वायुदाब केंद्र (High-Pressure Zone) बना रहता है (विशेषकर मेडागास्कर के पास)।
- पवन का प्रवाह: पवनें प्राकृतिक रूप से उच्च दाब (हिंद महासागर) से निम्न दाब (एशियाई भू-भाग) की ओर बहना शुरू कर देती हैं।
- दिशा का विक्षेपण: भूमध्य रेखा को पार करने के बाद, कोरिओलिस बल के प्रभाव से ये पवनें अपनी दाईं ओर मुड़ जाती हैं और दक्षिण-पश्चिम दिशा से भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करती हैं।
- विशेषता: ⋆ चूँकि ये पवनें एक विशाल महासागर के ऊपर से होकर आती हैं, वे अपने साथ अत्यधिक नमी लाती हैं, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक और भारी वर्षा होती है। इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून भी कहते हैं। [UPSC Mains, State PSC]
- प्रक्रिया:
- 2. शीतकालीन मानसून (Winter Monsoon) – (लगभग अक्टूबर से फरवरी)
- प्रक्रिया:
- स्थल का शीतलन: शीतकाल में सूर्य के दक्षिणायन (Tropic of Capricorn पर लंबवत) होने पर, एशियाई भू-भाग तेजी से ठंडा हो जाता है, विशेषकर साइबेरिया और मध्य एशिया।
- उच्च दाब का निर्माण: इस ठंड के कारण स्थल पर एक तीव्र उच्च वायुदाब केंद्र विकसित हो जाता है।
- समुद्र पर निम्न दाब: इस समय, हिंद महासागर अपेक्षाकृत गर्म रहता है, जिससे वहाँ तुलनात्मक रूप से निम्न दाब का क्षेत्र बनता है और ITCZ भी दक्षिण की ओर खिसक जाता है।
- पवन का प्रवाह: पवनें अब स्थल (उच्च दाब) से समुद्र (निम्न दाब) की ओर बहने लगती हैं।
- दिशा: भारत में, इन पवनों की दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है।
- विशेषता: ⋆ चूँकि ये पवनें स्थल से आती हैं, वे आम तौर पर शुष्क होती हैं और अधिकांश भारत में वर्षा नहीं करतीं। इसे उत्तर-पूर्व मानसून भी कहते हैं।
- अपवाद: जब उत्तर-पूर्व मानसून की पवनें बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं और तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर शीतकाल में वर्षा करती हैं। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है। [U-PSC 2021 Prelims, UPPSC]
- प्रक्रिया:
[आरेख: भारत के दो मानचित्र। पहला ग्रीष्मकालीन मानसून को दर्शाए, जिसमें हिंद महासागर (उच्च दाब) से दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थल (निम्न दाब) की ओर जाती नमी भरी हवाएँ दिखाई गई हों। दूसरा शीतकालीन मानसून को दर्शाए, जिसमें स्थल (उच्च दाब) से उत्तर-पूर्व दिशा में समुद्र (निम्न दाब) की ओर जाती शुष्क हवाएँ और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर तमिलनाडु में वर्षा करते हुए दिखाया गया हो।]
हालांकि भारतीय मानसून सबसे प्रसिद्ध है, मानसून-प्रकार की पवनें विश्व के अन्य हिस्सों में भी पाई जाती हैं, जहाँ बड़े स्थल और जल निकायों के बीच मौसमी तापमान में महत्वपूर्ण अंतर होता है।
- दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, फिलीपींस)
- उत्तरी ऑस्ट्रेलिया
- पश्चिमी और मध्य अफ्रीका के कुछ हिस्से
- उत्तरी अमेरिका के कुछ दक्षिणी हिस्से
निष्कर्ष:
मौसमी पवनें एक बड़े पैमाने की समीर प्रणाली (Land and Sea Breeze on a large scale) की तरह हैं, जो ऋतुओं के अनुसार अपनी दिशा बदलती हैं। मानसूनी पवनें इस प्रणाली का सबसे प्रभावशाली उदाहरण हैं, जो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की जलवायु, कृषि, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को गहराई से प्रभावित करती हैं।
3. स्थानीय पवनें (Local Winds)
स्थानीय पवनें वे पवनें होती हैं जो छोटे क्षेत्रों में तापमान और वायुदाब के स्थानीय अंतर के कारण उत्पन्न होती हैं। ये स्थायी या भूमंडलीय पवनों की तरह विशाल क्षेत्रों को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि इनका प्रभाव कुछ सौ किलोमीटर के क्षेत्र तक ही सीमित रहता है। ये पवनें किसी स्थान के मौसम पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं।
स्थानीय पवनों को उनकी प्रकृति, उत्पत्ति के समय और विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
I. दैनिक या सामयिक पवनें (Diurnal or Periodic Winds)
ये पवनें दिन और रात के चक्र के अनुसार अपनी दिशा बदलती हैं। इनका मुख्य कारण स्थल-जल या पर्वत-घाटी का विभेदी तापन है। (इन्हें पिछले अध्याय में विस्तृत रूप से कवर किया जा चुका है)।
- समुद्री समीर (Sea Breeze): दिन में समुद्र से स्थल की ओर।
- स्थलीय समीर (Land Breeze): रात में स्थल से समुद्र की ओर।
- घाटी समीर (Valley Breeze): दिन में घाटी से पर्वत की ओर।
- पर्वतीय समीर (Mountain Breeze): रात में पर्वत से घाटी की ओर।
स्थानीय दैनिक पवनें (Local Diurnal Winds)
ये पवनें दैनिक (Diurnal) होती हैं, अर्थात वे 24 घंटे के चक्र में अपनी दिशा उलट देती हैं। इनका निर्माण स्थल और जल या पर्वत और घाटी जैसे आस-पास के क्षेत्रों के विभेदी तापन और शीतलन (Differential Heating and Cooling) के कारण होता है।
1. समुद्री समीर और स्थलीय समीर (Sea Breeze and Land Breeze)
यह पवन प्रणाली तटीय क्षेत्रों में दिन और रात के तापमान में अंतर के कारण विकसित होती है।
- समय: दिन के समय (Daytime)
- निर्माण की प्रक्रिया:
- स्थल का तापन: दिन में सूर्य की गर्मी से स्थल (Land), जल (Sea) की तुलना में तेजी से और अधिक गर्म हो जाता है। (कारण: स्थल का एल्बिडो कम, अपारदर्शी होना)।
- दाब में अंतर: गर्म स्थल के ऊपर की हवा गर्म होकर फैलती है, हल्की हो जाती है और ऊपर उठती है। इससे स्थल पर निम्न वायुदाब (Low Pressure) का क्षेत्र बन जाता है।
- इसके विपरीत, समुद्र का पानी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, जिससे उसके ऊपर की हवा ठंडी और भारी बनी रहती है। इससे समुद्र पर उच्च वायुदाब (High Pressure) का क्षेत्र बनता है।
- पवन का प्रवाह: पवनें हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती हैं। इसलिए, दिन के समय हवा समुद्र से स्थल की ओर चलना शुरू कर देती है।
- प्रभाव:
- ⋆ समुद्री समीर ठंडी और नम होती है। यह तटीय क्षेत्रों के तापमान को कम कर देती है और गर्मी से राहत दिलाती है, जिससे वहाँ की जलवायु सम (Moderate) बनी रहती है। इसी कारण तटीय शहर आंतरिक शहरों की तुलना में गर्मियों में कम गर्म होते हैं।
- यह अपने साथ नमी लाती है, जिससे तटीय क्षेत्रों में दोपहर बाद वर्षा की संभावना बढ़ सकती है।
[आरेख 1: दिन का दृश्य जिसमें समुद्र (उच्च दाब) से स्थल (निम्न दाब) की ओर ‘समुद्री समीर’ चलती हुई दिखाई गई हो। स्थल के ऊपर गर्म हवा को ऊपर उठते हुए भी दिखाया जाए।]
- समय: रात के समय (Nighttime)
- निर्माण की प्रक्रिया:
- स्थल का शीतलन: रात में, स्थल (Land), जल (Sea) की तुलना में तेजी से ठंडा हो जाता है (क्योंकि यह ऊष्मा को तेजी से विकिरित करता है)।
- दाब में अंतर: ठंडे स्थल के ऊपर की हवा भी ठंडी, भारी होकर नीचे बैठती है। इससे स्थल पर उच्च वायुदा-ब (High Pressure) का क्षेत्र बन जाता है।
- इसके विपरीत, समुद्र का पानी अपनी ऊष्मा को धीरे-धीरे खोता है और स्थल की तुलना में गर्म बना रहता है। इससे समुद्र पर निम्न वायुदाब (Low Pressure) का क्षेत्र बनता है।
- पवन का प्रवाह: अब पवनें उच्च दाब (स्थल) से निम्न दाब (समुद्र) की ओर, यानी स्थल से समुद्र की ओर, चलना शुरू कर देती हैं।
- प्रभाव:
- स्थलीय समीर आमतौर पर समुद्री समीर की तुलना में कमजोर होती है।
- यह शुष्क होती है।
- यह अपतटीय (offshore) मत्स्य पालन में मछुआरों को अपनी नावों को समुद्र में ले जाने में मदद करती है।
[आरेख 2: रात का दृश्य जिसमें स्थल (उच्च दाब) से समुद्र (निम्न दाब) की ओर ‘स्थलीय समीर’ चलती हुई दिखाई गई हो।]
2. घाटी समीर और पर्वतीय समीर (Valley Breeze and Mountain Breeze)
यह पवन प्रणाली पर्वतीय क्षेत्रों में ढलानों और घाटियों के बीच दिन और रात के तापमान में अंतर के कारण विकसित होती है।
- समय: दिन के समय (Daytime)
- निर्माण की प्रक्रिया:
- ढलानों का तापन: दिन में, पर्वत की ढलानें (Slopes) घाटी की तली की तुलना में सूर्य की सीधी किरणों से अधिक तेजी से गर्म हो जाती हैं।
- निम्न दाब का निर्माण: ढलानों के संपर्क में आने वाली हवा गर्म होकर हल्की हो जाती है और ढलान के सहारे ऊपर की ओर चढ़ने लगती है। इससे घाटी के ऊपरी हिस्सों में निम्न दाब बनता है।
- पवन का प्रवाह: घाटी की ठंडी और भारी हवा इस खाली जगह को भरने के लिए ऊपर की ओर बहती है। हवा के इस घाटी से पर्वत की चोटी की ओर के प्रवाह को घाटी समीर कहते हैं।
- प्रभाव:
- यह गर्म और नम हो सकती है, जिससे दोपहर बाद पहाड़ों के ऊपरी ढलानों पर संवहनीय बादल और वर्षा हो सकती है।
- वनस्पतियों के विकास को प्रभावित करती है।
[आरेख 3: दिन का दृश्य जिसमें घाटी से गर्म हवा ‘घाटी समीर’ के रूप में ढलानों के सहारे ऊपर की ओर चढ़ती हुई दिखाई गई हो।]
- समय: रात के समय (Nighttime)
- निर्माण की प्रक्रिया:
- ढलानों का शीतलन: रात में, पर्वत की ऊँची ढलानें पार्थिव विकिरण द्वारा तेजी से ठंडी हो जाती हैं।
- उच्च दाब का निर्माण: ढलानों के संपर्क में आने वाली हवा भी ठंडी और भारी (सघन) हो जाती है।
- पवन का प्रवाह: गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में, यह ठंडी और भारी हवा ढलान के सहारे नीचे घाटी की तली की ओर उतरने लगती है। इस ठंडी हवा के पर्वत से घाटी की ओर के प्रवाह को पर्वतीय समीर कहते हैं।
- प्रभाव:
- ⋆ यह घाटी के निचले हिस्सों में ठंडी हवा को जमा कर देती है, जिससे घाटी का तापमान कई बार ढलानों से भी कम हो जाता है। यह तापमान व्युत्क्रमण (Temperature Inversion) की स्थिति पैदा करता है।
- इस ठंडी हवा के कारण घाटी के निचले हिस्सों में पाला (Frost) पड़ने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे यह क्षेत्र फसलों के लिए अनुपयुक्त हो सकता है। इसी कारण पर्वतीय क्षेत्रों में बस्तियाँ और बागान अक्सर घाटी की तली में न होकर, ढलानों के मध्य भाग (जिसे Thermal Belt कहते हैं) में स्थित होते हैं। [UPSC – Conceptual]
[आरेख 4: रात का दृश्य जिसमें पर्वतीय ढलानों से ठंडी हवा ‘पर्वतीय समीर’ के रूप में नीचे घाटी की ओर उतरती हुई दिखाई गई हो।]
II. अनिश्चित या गैर-आवधिक पवनें (Non-Periodic Winds)
ये पवनें किसी दैनिक चक्र का पालन नहीं करतीं, बल्कि विशेष मौसमी या वायुमंडलीय दशाओं के कारण वर्ष के किसी विशेष समय में ही चलती हैं। इन्हें मुख्य रूप से गर्म (Warm) और ठंडी (Cold) पवनों में विभाजित किया जाता है।
⋆ यह खंड “Match the Following” और सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे महत्वपूर्ण भागों में से एक है।
ये पवनें या तो गर्म क्षेत्रों (जैसे मरुस्थल) से आती हैं या किसी पर्वत के पवनविमुखी ढाल (Leeward Slope) पर उतरते समय संपीडन (Compression) के कारण गर्म हो जाती हैं।
| पवन का नाम | स्थान/क्षेत्र | विशेषताएँ और महत्वपूर्ण तथ्य | PYQ Link |
| चिनूक (Chinook) | रॉकी पर्वत (पूर्वी ढलान), USA और कनाडा | यह एक गर्म और शुष्क पवन है। जब यह पर्वत से नीचे उतरती है, तो एडियाबैटिक प्रक्रिया से गर्म हो जाती है।<br>⋆ इसे “हिमभक्षी” (Snow Eater) कहते हैं क्योंकि यह सर्दियों में बर्फ को तेजी से पिघला देती है, जिससे चारागाह खुल जाते हैं। | [UPSC/State PSC] |
| फोन (Foehn/Föhn) | आल्प्स पर्वत (उत्तरी ढलान), स्विट्जरलैंड | यह चिनूक के समान ही एक गर्म और शुष्क पवन है।<br>⋆ यह अंगूर की फसल को समय से पहले पकने में मदद करती है और बर्फ पिघलाकर वसंत का आभास कराती है। | [UPPSC] |
| सिराको (Sirocco) | सहारा मरुस्थल से भूमध्य सागर की ओर (इटली, स्पेन) | यह एक गर्म, शुष्क और रेत से भरी पवन है। भूमध्य सागर को पार करते समय यह नमी ग्रहण कर लेती है।<br>⋆ जब यह इटली पहुँचती है, तो यह लाल रेत के कणों के साथ वर्षा करती है, जिसे “रक्त वर्षा” (Blood Rain) कहा जाता है। | [BPSC] |
| खमसिन (Khamsin) | मिस्र | सिराको का ही स्थानीय नाम। गर्म, शुष्क और धूल भरी। | — |
| गिबली (Ghibli) | लीबिया | सिराको का ही स्थानीय नाम। | — |
| हरमट्टन (Harmattan) | सहारा मरुस्थल से पश्चिमी अफ्रीका के गिनी तट की ओर | एक अत्यंत गर्म और शुष्क, धूल भरी पवन।<br>⋆ जब यह गिनी के आर्द्र और चिपचिपे तट पर पहुँचती है, तो वहाँ के अस्वस्थ मौसम से राहत देती है, इसलिए इसे “डॉक्टर पवन” (The Doctor Wind) कहा जाता है। | [UPPSC 2021, SSC] |
| लू (Loo) | उत्तरी भारत और पाकिस्तान का मैदान (थार मरुस्थल से) | मई और जून के महीने में चलने वाली एक अत्यंत गर्म, शुष्क और पीड़ादायक पवन। इसके संपर्क में आने से लू लगना (Heatstroke) हो सकता है। | [State PSC/General Knowledge] |
| सिमूम (Simoom) | सहारा और अरब के मरुस्थल | एक प्रचंड, गर्म और शुष्क पवन जो अपने साथ रेत के बड़े-बड़े तूफ़ान लाती है, जिससे दृश्यता (visibility) शून्य हो जाती है। | — |
| सांता एना (Santa Ana) | दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया (USA) | गर्म, शुष्क और तेज़ पवन जो पहाड़ों से तटीय मैदानों की ओर बहती है। यह क्षेत्र के जंगलों में आग (Wildfires) के लिए कुख्यात है। | [CDS] |
ये पवनें ठंडे उच्च दाब वाले क्षेत्रों (जैसे बर्फीले पठार या ध्रुवीय क्षेत्र) से उत्पन्न होती हैं और निचले गर्म क्षेत्रों की ओर बहती हैं।
| पवन का नाम | स्थान/क्षेत्र | विशेषताएँ और महत्वपूर्ण तथ्य | PYQ Link |
| मिस्ट्रल (Mistral) | फ्रांस (रोन नदी घाटी) से भूमध्य सागर की ओर | यह आल्प्स से आने वाली एक अत्यंत ठंडी, शुष्क और तीव्र पवन है, जो फ्रांस के दक्षिणी तट के मौसम को ठंडा कर देती है। | [UPPSC] |
| बोरा (Bora) | एड्रियाटिक सागर का पूर्वी तट (इटली, स्लोवेनिया, क्रोएशिया) | मिस्ट्रल के समान ही एक अत्यंत ठंडी, शुष्क और प्रचंड पवन। इसकी गति 150 किमी/घंटा से भी अधिक हो सकती है। | [SSC] |
| ब्लिजार्ड (Blizzard) | कनाडा, USA, साइबेरिया (ध्रुवीय क्षेत्र) | यह एक बर्फीला तूफ़ान है जिसमें प्रचंड ठंडी हवा के साथ उड़ती हुई बर्फ के कारण दृश्यता लगभग शून्य हो जाती है। | — |
| पुर्गा (Purga) | रूस (टुंड्रा और साइबेरियाई क्षेत्र) | ब्लिजार्ड का ही स्थानीय नाम। | — |
| नार्दर (Norther) | USA का दक्षिणी भाग (विशेषकर टेक्सास) | सर्दियों में उत्तर से आने वाली एक अचानक और तीव्र ठंडी पवन, जिससे तापमान तेजी से गिरता है। | — |
| पैम्परो (Pampero) | अर्जेंटीना और उरुग्वे के पम्पास घास के मैदान | एंडीज से आने वाली एक अचानक और ठंडी ध्रुवीय पवन, जो अपने साथ धूल के तूफान और फिर तीव्र वर्षा लाती है। | — |
निष्कर्ष: स्थानीय पवनें छोटे पैमाने पर भी वायुमंडलीय गति की जटिलता को दर्शाती हैं। ये किसी क्षेत्र विशेष की कृषि, अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन को बहुत हद तक प्रभावित करती हैं, और इसलिए भूगोल के अध्ययन में इनका विशेष महत्व है।
विश्व की प्रमुख गर्म और ठंडी स्थानीय पवनें
A. गर्म स्थानीय पवनें (Warm Local Winds)
| पवन का नाम | संबंधित स्थान/क्षेत्र | मुख्य विशेषताएँ/उपनाम |
| चिनूक (Chinook) | रॉकी पर्वत (USA, कनाडा) | ⋆ “हिमभक्षी” (Snow Eater), बर्फ पिघलाती है। |
| फोन (Foehn) | आल्प्स पर्वत (स्विट्जरलैंड, यूरोप) | अंगूर की फसल को पकने में मदद करती है। |
| लू (Loo) | उत्तरी भारत और पाकिस्तान | अत्यंत गर्म और शुष्क; हीटस्ट्रोक का कारण बनती है। |
| सिराको (Sirocco) | सहारा मरुस्थल से इटली/स्पेन | ⋆ “रक्त वर्षा” (Blood Rain) का कारण। |
| हरमट्टन (Harmattan) | पश्चिमी अफ्रीका (गिनी तट) | ⋆ “डॉक्टर पवन” (The Doctor Wind), नमी से राहत देती है। |
| खमसिन (Khamsin) | मिस्र | गर्म, शुष्क और धूल भरी (सिराको का ही रूप)। |
| सांता एना (Santa Ana) | दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया (USA) | गर्म और शुष्क; जंगलों में आग के लिए कुख्यात। |
| सिमूम (Simoom) | अरब और सहारा मरुस्थल | प्रचंड, रेत का तूफान लाती है। |
| गिबली (Ghibli) | लीबिया | सिराको का स्थानीय नाम। |
B. ठंडी स्थानीय पवनें (Cold Local Winds)
| पवन का नाम | संबंधित स्थान/क्षेत्र | मुख्य विशेषताएँ |
| मिस्ट्रल (Mistral) | फ्रांस (रोन घाटी) | प्रचंड, ठंडी और शुष्क। |
| बोरा (Bora) | एड्रियाटिक सागर का तट (पूर्वी यूरोप) | अत्यंत ठंडी, शुष्क और तूफानी। |
| ब्लिजार्ड (Blizzard) | कनाडा, USA, साइबेरिया | बर्फीला तूफान; दृश्यता शून्य। |
| पैम्परो (Pampero) | पम्पास (अर्जेंटीना, उरुग्वे) | प्रचंड, ठंडी; अपने साथ तूफान और वर्षा लाती है। |
| पुर्गा (Purga) | साइबेरिया (रूस) | ब्लिजार्ड का रूसी नाम। |
| नार्दर (Norther) | USA (दक्षिणी राज्य, विशेषकर टेक्सास) | अचानक तापमान गिराने वाली ठंडी हवा। |
| बाइज (Bise) | फ्रांस, स्विट्जरलैंड | ठंडी, शुष्क हवा। |
| लिवेंटर (Levanter) | स्पेन (जिब्राल्टर) | पूर्वी, नम और ठंडी हवा। |
1. जेट स्ट्रीम (Jet Streams)
परिभाषा (Definition)
जेट स्ट्रीम ऊपरी क्षोभमंडल (धरातल से लगभग 9-13 किलोमीटर की ऊँचाई पर) में अत्यधिक तेज गति से बहने वाली एक संकरी, विसर्पी (लहरदार) और शक्तिशाली पवन धारा है। ये पवनें मुख्य रूप से पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं। “जेट” शब्द का उपयोग इनकी अत्यधिक तीव्र गति (जेट विमानों जैसी) के कारण किया गया था, जिसका पता द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पायलटों ने लगाया था।1. उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ जेट स्ट्रीम 2. ध्रुवीय वाताग्री पछुआ जेट स्ट्रीम (उपोष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम सिर्फ गर्मी में, भारत में पाया जाता है)।
इनकी गति सामान्यतः 150 से 250 किलोमीटर प्रति घंटा होती है, लेकिन सर्दियों में यह 400-500 किमी/घंटा तक भी पहुँच सकती है।
उत्पत्ति और विशेषताएँ (Origin and Characteristics)
- उत्पत्ति का कारण: जेट स्ट्रीम का निर्माण मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होता है जहाँ विभिन्न तापमान वाली विशाल वायुराशियाँ आपस में मिलती हैं, जिससे सतह से ऊपरी वायुमंडल तक एक तीव्र ताप प्रवणता (Temperature Gradient) और दाब प्रवणता (Pressure Gradient) उत्पन्न होती है। पृथ्वी का घूर्णन (कोरिओलिस बल) इस पवन को एक निश्चित दिशा और अत्यधिक गति प्रदान करता है।
- अवस्थिति: पृथ्वी पर स्थायी रूप से दो प्रमुख जेट स्ट्रीम पाई जाती हैं – एक उपोष्ण कटिबंध में और दूसरी ध्रुवीय क्षेत्र के पास। ये सीधी रेखा में न बहकर लहरदार मार्ग (विसर्पी) पर चलती हैं, जो मौसम के अनुसार बदलता रहता है।
- मौसमी प्रभाव: जेट स्ट्रीम सर्दियों में अधिक शक्तिशाली और भूमध्य रेखा के करीब होती हैं, जबकि गर्मियों में कमजोर होकर ध्रुवों की ओर खिसक जाती हैं।
- प्रकृति (Nature): ये पवनें भूविक्षेपी पवनों (Geostrophic Winds) का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
जेट स्ट्रीम के प्रकार (Types of Jet Streams)
- उपोष्ण कटिबंधीय पछुआ जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet Stream):
- अवस्थिति: दोनों गोलार्धों में लगभग 25°-35° अक्षांशों के बीच।
- निर्माण: भूमध्यरेखीय क्षेत्र से उठी गर्म हवा का उपोष्ण उच्च दाब पेटी में नीचे उतरने और पृथ्वी के कोरिओलिस बल से विक्षेपित होने से।
- भारत पर प्रभाव: ⋆ सर्दियों में, यह जेट स्ट्रीम हिमालय के दक्षिण में चली आती है और भारत में पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) को लाने में सहायक होती है, जिससे उत्तर-पश्चिम भारत में शीतकालीन वर्षा और हिमपात होता है। [UPSC/State PSC]
- ध्रुवीय वाताग्री जेट स्ट्रीम (Polar Front Jet Stream):
- अवस्थिति: मध्य अक्षांशों (लगभग 45°-65°) के पास, जहाँ ध्रुवीय ठंडी और उष्णकटिबंधीय गर्म वायुराशियाँ मिलती हैं (ध्रुवीय वाताग्र)।
- महत्व: यह शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की गति, दिशा और तीव्रता को नियंत्रित करती है।
- उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet Stream):
- प्रकृति: यह एक मौसमी (Seasonal) जेट स्ट्रीम है।
- अवस्थिति: यह केवल उत्तरी गोलार्ध में ग्रीष्मकाल (Summer) में विकसित होती है और एशिया तथा अफ्रीका के ऊपर (पूर्व से पश्चिम) बहती है।
- भारत पर प्रभाव: ⋆ इसका संबंध सीधे तौर पर भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की तीव्रता से है। यह तिब्बत के पठार के गर्म होने से उत्पन्न होती है और भारत में मानसूनी पवनों को गति प्रदान करती है तथा बंगाल की खाड़ी में बनने वाले उष्णकटिबंधीय अवदाबों (Tropical Depressions) को भारत की ओर धकेलती है। [UPSC Mains]
2. रॉस्बी तरंगें (Rossby Waves)
परिभाषा (Definition)
रॉस्बी तरंगें, जिन्हें ‘ग्रहीय तरंगें’ (Planetary Waves) भी कहा जाता है, ऊपरी वायुमंडल में (विशेषकर मध्य अक्षांशों में) जेट स्ट्रीम के विशाल, लहरदार या विसर्पी (Meandering) पैटर्न हैं। इनका नामकरण प्रसिद्ध मौसम विज्ञानी कार्ल-गुस्ताव रॉस्बी के नाम पर किया गया है।
ये स्वयं पवन नहीं हैं, बल्कि ये ऊर्जा और वायुमंडलीय दाब के तरंग पैटर्न हैं जिनके भीतर जेट स्ट्रीम बहती है।
उत्पत्ति का कारण (Cause of Formation)
रॉस्बी तरंगों का निर्माण दो मुख्य कारकों के संयोजन से होता है:
- पृथ्वी का घूर्णन: विशेष रूप से कोरिओलिस बल का अक्षांशों के साथ मान में परिवर्तन।
- भू-आकृतियाँ: विशाल पर्वत श्रृंखलाएँ (जैसे रॉकीज, हिमालय) और स्थल-महासागर का तापीय अंतर जेट स्ट्रीम के प्रवाह में बाधा डालकर उसे मोड़ देते हैं, जिससे ये विशाल तरंगें उत्पन्न होती हैं।
[आरेख: ध्रुव को केंद्र मानकर उत्तरी गोलार्ध का एक नक्शा। इस पर एक जेट स्ट्रीम को सरल रेखा में न दिखाकर एक विशाल लहरदार (साँप जैसी) आकृति में दिखाया जाए, जिसके मोड़ों को ‘कटक’ और ‘गर्त’ के रूप में लेबल किया गया हो।]
विशेषताएँ (Characteristics)
- संरचना: रॉस्बी तरंगों के मोड़ों के ऊपर की ओर उठे हुए हिस्से को ‘कटक’ या ‘रिज’ (Ridge) और नीचे की ओर धँसे हुए हिस्से को ‘गर्त’ या ‘ट्रफ’ (Trough) कहते हैं।
- कटक (Ridge): यहाँ आमतौर पर गर्म हवाएँ ध्रुवों की ओर जाती हैं और मौसम गर्म, शुष्क और स्थिर (प्रतिचक्रवातीय दशाएँ) होता है।
- गर्त (Trough): यहाँ ठंडी ध्रुवीय हवाएँ भूमध्य रेखा की ओर आती हैं और मौसम ठंडा, आर्द्र और अस्थिर (चक्रवातीय दशाएँ) होता है, जिससे वर्षा या तूफान की संभावना बनती है।
- गति: ये तरंगें बहुत धीमी गति से पश्चिम से पूर्व की ओर चलती हैं, और कभी-कभी ये एक ही स्थान पर कई दिनों या हफ्तों तक स्थिर भी हो सकती हैं।
रॉस्बी तरंगों का मौसम पर प्रभाव
- मौसम का निर्धारण: किसी स्थान का दैनिक मौसम इस बात पर निर्भर करता है कि वह रॉस्बी तरंग के ‘कटक’ के प्रभाव में है या ‘गर्त’ के।
- चरम मौसमी घटनाएँ (Extreme Weather Events):
- जब ये तरंगें बहुत बड़ी और धीमी हो जाती हैं या एक ही स्थान पर स्थिर हो जाती हैं, तो वे एक ही क्षेत्र में लंबे समय तक एक ही प्रकार का मौसम बनाए रखती हैं।
- ⋆ यदि कोई क्षेत्र लंबे समय तक ‘कटक’ के प्रभाव में रहता है, तो वहाँ भीषण गर्मी की लहर (Heatwave) और सूखा (Drought) पड़ सकता है।
- ⋆ यदि कोई क्षेत्र लंबे समय तक ‘गर्त’ के प्रभाव में रहता है, तो वहाँ अत्यधिक वर्षा, बाढ़ (Floods) और असामान्य शीत लहर (Cold spells) आ सकती है। [UPSC Mains – GS Paper 1 & 3]
- जेट स्ट्रीम का पथ नियंत्रक: रॉस्बी तरंगें ही जेट स्ट्रीम के रास्ते को नियंत्रित करती हैं, जो बदले में सतह की मौसम प्रणालियों (जैसे पश्चिमी विक्षोभ, चक्रवात) को दिशा देती हैं।
निष्कर्ष:
जेट स्ट्रीम और रॉस्बी तरंगें एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई हैं। रॉस्बी तरंगें वह विशाल “मार्ग” हैं जिस पर जेट स्ट्रीम नामक “सुपरहाइवे” की पवनें बहती हैं। इन तरंगों की स्थिति और व्यवहार का अध्ययन करके मौसम विज्ञानी एक सप्ताह या उससे अधिक समय के लिए मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगा सकते हैं।
आर्द्रता (Humidity)
परिभाषा:
आर्द्रता वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प (Water Vapour) की मात्रा का माप है। जलवाष्प जल की गैसीय अवस्था है और यह वायु का एक अत्यधिक परिवर्तनशील लेकिन महत्वपूर्ण घटक है, जो मौसम और जलवायु की कई घटनाओं (जैसे संघनन, वर्षण, ऊष्मा संतुलन) को नियंत्रित करता है।
आर्द्रता को व्यक्त करने के तरीके (Ways of Expressing Humidity)
आर्द्रता को मापने और व्यक्त करने के तीन मुख्य तरीके हैं, और इनके बीच का अंतर समझना परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
- परिभाषा: वायु के प्रति इकाई आयतन (per unit volume) में मौजूद जलवाष्प के वास्तविक भार या द्रव्यमान (actual mass) को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
- इकाई: इसे आमतौर पर ग्राम प्रति घन मीटर (grams per cubic meter – g/m³) में व्यक्त किया जाता है।
- उदाहरण: यदि 1 घन मीटर हवा में 10 ग्राम जलवाष्प है, तो निरपेक्ष आर्द्रता 10 g/m³ होगी।
- कमी:
- ⋆ यह माप तापमान या दबाव में परिवर्तन के साथ बदल जाता है।
- कारण: जब हवा फैलती है (गर्म होने पर या ऊपर उठने पर), तो उसका आयतन बढ़ जाता है, जिससे प्रति इकाई आयतन में जलवाष्प की मात्रा (निरपेक्ष आर्द्रता) कम हो जाती है, भले ही जलवाष्प की कुल मात्रा वही रहे। इसी कमी के कारण मौसम विज्ञान में इसका उपयोग कम होता है।
- परिभाषा: वायु के प्रति इकाई भार या द्रव्यमान में मौजूद जलवाष्प के भार या द्रव्यमान को विशिष्ट आर्द्रता कहते हैं।
- इकाई: इसे आमतौर पर ग्राम प्रति किलोग्राम (grams per kilogram – g/kg) में व्यक्त किया जाता है।
- उदाहरण: यदि 1 किलोग्राम हवा में 10 ग्राम जलवाष्प है, तो विशिष्ट आर्द्रता 10 g/kg होगी।
- विशेषता:
- ⋆ यह तापमान या दबाव में परिवर्तन से प्रभावित नहीं होती है।
- कारण: जब तक हवा में बाहर से नमी डाली या निकाली न जाए, प्रति किलोग्राम हवा में जलवाष्प की मात्रा स्थिर रहती है, चाहे हवा फैले या सिकुड़े। इसी स्थिरता के कारण यह मौसम विज्ञानियों के लिए एक बहुत उपयोगी माप है।
- परिभाषा: ⋆ यह आर्द्रता का सबसे आम और महत्वपूर्ण माप है। सापेक्षिक आर्द्रता किसी निश्चित तापमान पर हवा में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा और उसी तापमान पर हवा की अधिकतम जलवाष्प धारण करने की क्षमता के बीच का अनुपात (ratio) है।
- इकाई: इसे हमेशा प्रतिशत (%) में व्यक्त किया जाता है।
- सूत्र:
सापेक्षिक आर्द्रता (%) = (हवा में मौजूद जलवाष्प की मात्रा / हवा की जलवाष्प धारण करने की क्षमता) x 100 - प्रमुख अवधारणाएँ:
- जलवाष्प धारण करने की क्षमता (Water Vapour Holding Capacity): हवा की नमी धारण करने की क्षमता पूरी तरह से तापमान पर निर्भर करती है।
- ⋆ गर्म हवा फैलती है, इसलिए वह अधिक जलवाष्प धारण कर सकती है।
- ⋆ ठंडी हवा सिकुड़ती है, इसलिए वह कम जलवाष्प धारण कर सकती है।
- संतृप्त हवा (Saturated Air): जब किसी हवा में उसकी क्षमता के बराबर नमी मौजूद हो, तो उसकी सापेक्षिक आर्द्रता 100% होती है और उसे संतृप्त हवा कहते हैं। संघनन (Condensation) इसी अवस्था में शुरू होता है। [UPSC – Conceptual]
- ओसांक बिंदु (Dew Point): वह तापमान जिस पर हवा संतृप्त (100% RH) हो जाती है। यदि तापमान इससे नीचे गिरता है, तो अतिरिक्त जलवाष्प संघनित हो जाती है।
- जलवाष्प धारण करने की क्षमता (Water Vapour Holding Capacity): हवा की नमी धारण करने की क्षमता पूरी तरह से तापमान पर निर्भर करती है।
आर्द्रता का महत्व (Importance of Humidity)
- मौसम और जलवायु का नियंत्रक: आर्द्रता संघनन (बादल, कोहरा) और वर्षण (वर्षा, हिमपात) की प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है।
- मानव स्वास्थ्य और आराम:
- उच्च आर्द्रता में पसीना आसानी से नहीं सूखता, जिससे हमें उमस और बेचैनी महसूस होती है।
- कम आर्द्रता में त्वचा और होंठ सूखने लगते हैं।
- गुप्त ऊष्मा का वाहक: जलवाष्प अपने साथ वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Vaporization) को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, जो वायुमंडल में ऊर्जा स्थानांतरण का एक प्रमुख तरीका है।
- पारिस्थितिकी: आर्द्रता पौधों की वृद्धि और वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करती है।
- कृषि: फसलों के लिए आवश्यक नमी का स्तर बनाए रखने में महत्वपूर्ण।
तुलनात्मक सारांश
| माप का प्रकार | परिभाषा | इकाई | तापमान/दबाव से संबंध |
| निरपेक्ष आर्द्रता | प्रति आयतन में जलवाष्प का वास्तविक द्रव्यमान | g/m³ | अस्थिर (बदलता है) |
| विशिष्ट आर्द्रता | प्रति द्रव्यमान में जलवाष्प का द्रव्यमान | g/kg | स्थिर (नहीं बदलता) |
| सापेक्षिक आर्द्रता | मौजूद नमी और नमी धारण करने की क्षमता का अनुपात | % | विपरीत संबंध (तापमान के साथ) |
आर्द्रता का अक्षांशीय वितरण (Latitudinal Distribution of Humidity)
वायुमंडल में आर्द्रता (विशेषकर निरपेक्ष और सापेक्षिक) का वितरण पूरे ग्लोब पर एक समान नहीं है। इसका वितरण मुख्य रूप से अक्षांश (Latitude) के साथ बदलता है, क्योंकि अक्षांश तापमान और वाष्पीकरण की दरों को सीधे तौर पर नियंत्रित करता है।
1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity) का अक्षांशीय वितरण
सिद्धांत:
निरपेक्ष आर्द्रता वायु में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा (ग्राम प्रति घन मीटर) का माप है। जलवाष्प वायुमंडल में मुख्य रूप से सतह पर मौजूद जल (महासागरों, झीलों) के वाष्पीकरण (Evaporation) से आती है, और वाष्पीकरण की दर तापमान पर निर्भर करती है।
- उच्च तापमान = उच्च वाष्पीकरण = उच्च निरपेक्ष आर्द्रता
- निम्न तापमान = निम्न वाष्पीकरण = निम्न निरपेक्ष आर्द्रता
अक्षांशीय पैटर्न:
- भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Region: ~10°N – 10°S):
- ⋆ यहाँ वर्ष भर उच्च तापमान और विशाल महासागरीय सतह की उपलब्धता के कारण वाष्पीकरण की दर सर्वाधिक होती है।
- परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र में विश्व की सर्वोच्च निरपेक्ष आर्द्रता पाई जाती है। हवा में जलवाष्प की वास्तविक मात्रा बहुत अधिक होती है।
- उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical Regions: ~10° – 30°N/S):
- निरपेक्ष आर्द्रता अधिक बनी रहती है, लेकिन यह धीरे-धीरे भूमध्य रेखा से दूर जाने पर कम होने लगती है।
- हालांकि, उपोष्ण कटिबंधीय महाद्वीपीय मरुस्थलों में, उच्च तापमान के बावजूद जल स्रोतों की कमी के कारण वाष्पीकरण कम होता है, इसलिए यहाँ की हवा में निरपेक्ष आर्द्रता बहुत कम होती है।
- मध्य अक्षांश या शीतोष्ण क्षेत्र (Mid-latitudes or Temperate Regions: ~30° – 60°N/S):
- तापमान कम होने लगता है, जिससे वाष्पीकरण की दर भी घट जाती है।
- परिणामस्वरूप, यहाँ निरपेक्ष आर्द्रता मध्यम स्तर की होती है। सर्दियों में यह और भी कम हो जाती है।
- ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions: ~60° – 90°N/S):
- ⋆ यहाँ तापमान अत्यंत कम (हिमांक से नीचे) होता है, जिससे वाष्पीकरण लगभग नगण्य होता है।
- ठंडी हवा की नमी धारण करने की क्षमता भी बहुत कम होती है।
- परिणामस्वरूप, ध्रुवीय क्षेत्रों में विश्व की न्यूनतम निरपेक्ष आर्द्रता पाई जाती है। यहाँ की हवा पृथ्वी पर सबसे शुष्क हवाओं में से एक होती है।
निष्कर्ष (निरपेक्ष आर्द्रता): ⋆ निरपेक्ष आर्द्रता का सामान्य पैटर्न भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर लगातार घटता जाता है।
2. सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) का अक्षांशीय वितरण
सिद्धांत:
सापेक्षिक आर्द्रता वायु में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा और उसी तापमान पर हवा की अधिकतम नमी धारण करने की क्षमता के बीच का अनुपात है। यह तापमान पर बहुत अधिक निर्भर करती है।
- कम तापमान = कम क्षमता = उच्च सापेक्षिक आर्द्रता (थोड़ी सी नमी भी हवा को संतृप्त कर सकती है)
- उच्च तापमान = उच्च क्षमता = निम्न सापेक्षिक आर्द्रता (अधिक नमी होने पर भी हवा संतृप्त नहीं होती)
अक्षांशीय पैटर्न (यह निरपेक्ष आर्द्रता से थोड़ा अलग है):
- भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Region):
- यहाँ निरपेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक होती है। हालांकि, तापमान भी अधिक होता है, जिससे हवा की नमी धारण करने की क्षमता भी बहुत अधिक होती है।
- परिणामस्वरूप, यहाँ सापेक्षिक आर्द्रता भी बहुत अधिक होती है (आमतौर पर 80% से ऊपर), क्योंकि हवा अपनी क्षमता के करीब नमी से भरी होती है।
- उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र (Tropical and Sub-tropical Regions):
- यहाँ सापेक्षिक आर्द्रता कम होती है, विशेषकर महाद्वीपों के आंतरिक और पश्चिमी भागों (मरुस्थलों) में।
- ⋆ कारण: उपोष्ण उच्च दाब पेटी में हवा ऊपर से नीचे उतरती है, जिससे वह गर्म और शुष्क हो जाती है। उच्च तापमान के कारण हवा की नमी धारण करने की क्षमता बहुत बढ़ जाती है, लेकिन नमी की आपूर्ति कम होती है। इसलिए, मरुस्थलों में सापेक्षिक आर्द्रता विश्व में सबसे कम पाई जाती है, भले ही वे गर्म हों।
- मध्य अक्षांश या शीतोष्ण क्षेत्र (Mid-latitudes):
- तापमान कम होने के कारण हवा की नमी धारण करने की क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे यहाँ सापेक्षिक आर्द्रता फिर से बढ़ने लगती है।
- ध्रुवीय क्षेत्र (Polar Regions):
- ⋆ यहाँ विश्व की उच्चतम सापेक्षिक आर्द्रता पाई जाती है, जो अक्सर संतृप्ति (100%) के करीब होती है।
- कारण: यहाँ तापमान अत्यंत कम होता है, जिससे हवा की नमी धारण करने की क्षमता लगभग शून्य हो जाती है। हवा में थोड़ी सी भी नमी (जो निरपेक्ष रूप से बहुत कम होती है) उसे संतृप्त करने के लिए पर्याप्त होती है।
- [UPSC Prelims – Statement Based Question]: “ध्रुवीय क्षेत्रों में निरपेक्ष आर्द्रता न्यूनतम होती है, लेकिन सापेक्षिक आर्द्रता अधिकतम होती है।” – यह कथन सत्य है।
दोनों का तुलनात्मक सारांश (अक्षांशीय वितरण)
| अक्षांशीय क्षेत्र | निरपेक्ष आर्द्रता (वास्तविक नमी) | सापेक्षिक आर्द्रता (क्षमता का %) | कारण |
| भूमध्य रेखा (Equator) | उच्चतम (Highest) | बहुत उच्च (Very High) | उच्च तापमान से उच्च वाष्पीकरण, हवा लगभग संतृप्त। |
| उपोष्णकटिबंधीय मरुस्थल (Sub-tropical Deserts) | बहुत निम्न (Very Low) | न्यूनतम (Lowest) | उच्च तापमान से उच्च क्षमता, लेकिन जल स्रोत की कमी। |
| मध्य अक्षांश (Mid-latitudes) | मध्यम (Moderate) | मध्यम से उच्च | तापमान कम होता है, क्षमता घटती है। |
| ध्रुव (Poles) | न्यूनतम (Lowest) | उच्चतम (Highest) | अत्यंत कम तापमान से अत्यंत कम क्षमता, थोड़ी सी नमी भी संतृप्त कर देती है। |
1. तापमान और हवा की ‘जलवाष्प धारण करने की क्षमता’ का संबंध
यह संबंध पूरी अवधारणा को समझने की कुंजी है।
- मूल सिद्धांत: हवा की जलवाष्प धारण करने की क्षमता (Water Vapour Holding Capacity) सीधे तौर पर तापमान पर निर्भर करती है।
- गर्म हवा (High Temperature): गर्म हवा के अणु दूर-दूर होते हैं (हवा फैलती है)। उनके बीच अधिक जगह होने के कारण, वह अधिक जलवाष्प को धारण कर सकती है।
- ठंडी हवा (Low Temperature): ठंडी हवा के अणु पास-पास होते हैं (हवा सिकुड़ती है)। उनके बीच कम जगह होने के कारण, वह कम जलवाष्प ही धारण कर सकती है।
- ⋆ निष्कर्ष: जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, हवा की नमी सोखने की “क्षमता” भी बढ़ जाती है। जैसे-जैसे तापमान घटता है, “क्षमता” भी घट जाती है।
2. तापमान और सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity – RH) का संबंध
यह सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक पूछा जाने वाला संबंध है।
- संबंध का प्रकार: विपरीत या व्युत्क्रमानुपाती (Inverse Relationship), बशर्ते हवा में जलवाष्प की वास्तविक मात्रा (विशिष्ट आर्द्रता) स्थिर रहे।
- विस्तृत व्याख्या:
- जब तापमान बढ़ता है:
- हवा की नमी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है।
- लेकिन अगर हवा में नमी की वास्तविक मात्रा (ग्राम में) वही रहती है, तो अब वह हवा अपनी बढ़ी हुई क्षमता की तुलना में कम भरी हुई लगेगी।
- परिणाम: सापेक्षिक आर्द्रता (%) घट जाती है।
- ⋆ दैनिक उदाहरण: सुबह से दोपहर तक, जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है और तापमान बढ़ता है, सुबह की नमी भरी हवा भी शुष्क महसूस होने लगती है क्योंकि उसकी सापेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है। [UPPSC/BPSC – Conceptual]
- जब तापमान घटता है:
- हवा की नमी धारण करने की क्षमता घट जाती है।
- अब हवा में मौजूद नमी की वही मात्रा उस हवा को उसकी घटी हुई क्षमता की तुलना में अधिक भरा हुआ बना देती है।
- परिणाम: सापेक्षिक आर्द्रता (%) बढ़ जाती है।
- ⋆ दैनिक उदाहरण: शाम के बाद, जैसे-जैसे तापमान गिरता है, हवा अपनी संतृप्ति (Saturation) के करीब पहुँचने लगती है, जिससे सापेक्षिक आर्द्रता बढ़ जाती है। यदि तापमान ओसांक बिंदु (Dew Point) तक गिर जाता है, तो सापेक्षिक आर्द्रता 100% हो जाती है और ओस या कोहरे का निर्माण शुरू हो जाता है।
- जब तापमान बढ़ता है:
ग्राफिकल प्रस्तुति:
[आरेख: एक साधारण ग्राफ जिसमें दिन के 24 घंटों को X-अक्ष पर और तापमान तथा सापेक्षिक आर्द्रता को Y-अक्ष पर दिखाया गया हो। तापमान का वक्र (Curve) दोपहर में अपने चरम पर और सुबह न्यूनतम हो। सापेक्षिक आर्द्रता का वक्र ठीक इसके विपरीत हो – सुबह अधिकतम और दोपहर में न्यूनतम।]
3. तापमान और निरपेक्ष/विशिष्ट आर्द्रता का संबंध
- निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity – g/m³): यह तापमान से अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित है। उच्च तापमान सीधे निरपेक्ष आर्द्रता नहीं बढ़ाता, लेकिन यह वाष्पीकरण (Evaporation) की दर को बढ़ाता है।
- यदि जल स्रोत उपलब्ध है, तो उच्च तापमान से अधिक वाष्पीकरण होगा, जिससे हवा में जलवाष्प की वास्तविक मात्रा (निरपेक्ष आर्द्रता) बढ़ेगी।
- हालांकि, अगर सिर्फ एक बंद कमरे में हवा के पैकेट को गर्म किया जाए, तो उसका आयतन बढ़ने के कारण उसकी निरपेक्ष आर्द्रता कम हो जाएगी।
- विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity – g/kg): यह माप तापमान में परिवर्तन से स्वतंत्र होता है। जब तक उस हवा में बाहर से नमी डाली या निकाली न जाए, तापमान बदलने से प्रति किलोग्राम हवा में नमी की मात्रा नहीं बदलती। यह एक स्थिर माप है।
सारांश और परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| आर्द्रता का प्रकार | तापमान के साथ संबंध | मुख्य बिंदु |
| जलवाष्प धारण करने की क्षमता | सीधा/समानुपाती (Direct) | गर्म हवा अधिक नमी धारण कर सकती है, ठंडी हवा कम। |
| सापेक्षिक आर्द्रता (RH) | विपरीत/व्युत्क्रमानुपाती (Inverse) | ⋆ (सबसे महत्वपूर्ण) तापमान बढ़ने पर RH घटती है, तापमान घटने पर RH बढ़ती है। |
| निरपेक्ष आर्द्रता | अप्रत्यक्ष (वाष्पीकरण पर निर्भर) | गर्म क्षेत्रों में अधिक वाष्पीकरण से निरपेक्ष आर्द्रता अधिक होती है। |
| विशिष्ट आर्द्रता | स्वतंत्र (Independent) | तापमान बदलने पर यह नहीं बदलती। |
कांसेप्चुअल प्रश्न जो बनते हैं:
- “रेगिस्तानी इलाकों में दिन के समय सापेक्षिक आर्द्रता बहुत कम क्यों होती है?”
- उत्तर: उच्च तापमान के कारण हवा की नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक हो जाती है, जबकि वाष्पीकरण के लिए नमी की आपूर्ति कम होती है।
- “सर्दियों की सुबह में कोहरा क्यों बनता है?”
- उत्तर: रात भर तापमान गिरने से हवा की नमी धारण करने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे उसकी सापेक्षिक आर्द्रता 100% (ओसांक) तक पहुँच जाती है और जलवाष्प संघनित हो जाता है।
- “एक बंद कमरे में हीटर चलाने पर हवा शुष्क क्यों महसूस होती है?”
- उत्तर: हीटर हवा का तापमान बढ़ा देता है। कमरे में नमी की वास्तविक मात्रा (विशिष्ट आर्द्रता) वही रहती है, लेकिन तापमान बढ़ने से हवा की क्षमता बढ़ जाती है और उसकी सापेक्षिक आर्द्रता घट जाती है, जिससे वह शुष्क लगती है।
वाताग्र (Fronts)
परिभाषा:
वाताग्र (अंग्रेजी: Front, सैन्य शब्द ‘Frontline’ से लिया गया) वह संक्रमणकालीन ढलुआ सीमा (Sloping transitional boundary) है जो दो भिन्न घनत्व और तापमान वाली वायुराशियों (Air Masses) को अलग करती है। सरल शब्दों में, जब एक ठंडी और शुष्क वायुराशि (जो भारी होती है) एक गर्म और आर्द्र वायुराशि (जो हल्की होती है) से मिलती है, तो वे तुरंत मिश्रित नहीं होतीं, बल्कि उनके बीच एक स्पष्ट सीमा बन जाती है, जिसे वाताग्र कहते हैं।
इस सीमा के सहारे ही अधिकांश महत्वपूर्ण मौसमी घटनाएँ, विशेषकर शीतोष्ण कटिबंध में, घटित होती हैं।
वाताग्र के निर्माण के लिए आवश्यक दशाएँ (Conditions for Frontogenesis)
वाताग्रों के निर्माण की प्रक्रिया को वाताग्र जनन (Frontogenesis) कहते हैं। इसके लिए दो मुख्य शर्तें हैं:
- दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियों की उपस्थिति: एक वायुराशि गर्म, हल्की और नम होनी चाहिए, जबकि दूसरी ठंडी, भारी और शुष्क होनी चाहिए।
- अभिसारी वायु प्रवाह (Convergent Air Flow): दोनों वायुराशियों को एक-दूसरे की ओर प्रवाहित होना चाहिए ताकि वे आपस में मिल सकें। यह स्थिति मुख्य रूप से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी (Sub-polar low-pressure belts) में बनती है, जहाँ ध्रुवीय पूर्वी पवनें और पछुआ पवनें मिलती हैं। [UPSC – Conceptual]
वाताग्रों के प्रकार (Types of Fronts)
गति की प्रकृति और कौन सी वायुराशि आक्रामक (Active) है, इस आधार पर वाताग्रों को चार मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
1. शीत वाताग्र (Cold Front)
- परिभाषा:
जब एक सक्रिय और तीव्र गति वाली ठंडी वायुराशि, किसी गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रवेश करती है और उसे ऊपर धकेलती है, तो इस सीमा को शीत वाताग्र कहते हैं। - संरचना:
ठंडी हवा भारी होने के कारण जमीन के साथ सटी रहती है और एक तीव्र, उत्तल ढलान (Steep, Convex Slope) बनाते हुए गर्म हवा को बलपूर्वक और तेजी से ऊपर उठाती है। - संबंधित मौसम:
- गर्म हवा के अचानक और तेजी से ऊपर उठने के कारण, कपासी-वर्षी मेघ (Cumulonimbus Clouds) का निर्माण होता है।
- इसके परिणामस्वरूप मौसम में अचानक बदलाव आता है: कम समय के लिए, तीव्र और मूसलाधार वर्षा होती है, जिसके साथ अक्सर तड़ित झंझा (Thunderstorm), तेज तूफानी हवाएँ और कभी-कभी ओलावृष्टि (Hail) भी होती है।
- वाताग्र के गुजर जाने के बाद आसमान तेजी से साफ हो जाता है, तापमान में गिरावट आती है, आर्द्रता कम हो जाती है और वायुदाब बढ़ जाता है।
- मानचित्र पर प्रतीक:
एक नीली रेखा जिस पर त्रिभुज (spikes) बने होते हैं, जो वाताग्र की गति की दिशा को इंगित करते हैं।
2. उष्ण वाताग्र (Warm Front)
- परिभाषा:
जब एक सक्रिय गर्म वायुराशि किसी धीमी गति वाली या स्थिर ठंडी वायुराशि के ऊपर धीरे-धीरे चढ़ती है, तो इस सीमा को उष्ण वाताग्र कहते हैं। - संरचना:
गर्म हवा हल्की होने के कारण ठंडी, भारी हवा के ऊपर एक मंद, अवतल ढाल (Gentle, Concave Slope) बनाते हुए धीरे-धीरे सरकती है। - संबंधित मौसम:
- गर्म हवा के धीमे और विस्तृत क्षेत्र पर ऊपर उठने के कारण, विभिन्न ऊँचाइयों पर परतदार बादलों का निर्माण होता है, जिनकी एक निश्चित श्रृंखला होती है: सबसे पहले पक्षाभ (Cirrus), फिर पक्षाभ-स्तरी (Cirrostratus), उच्च-स्तरी (Altostratus), और अंत में वर्षा-स्तरी (Nimbostratus)।
- परिणामस्वरूप लंबे समय तक (कई घंटों या दिनों तक), धीमी गति से और एक विस्तृत क्षेत्र में वर्षा या हिमपात होता है।
- वाताग्र के गुजर जाने के बाद तापमान और आर्द्रता में धीरे-धीरे वृद्धि होती है।
- मानचित्र पर प्रतीक:
एक लाल रेखा जिस पर अर्धवृत्त (semi-circles) बने होते हैं, जो गति की दिशा को दर्शाते हैं।
3. स्थायी या अचर वाताग्र (Stationary Front)
- परिभाषा:
यह वह सीमा है जहाँ एक ठंडी और एक गर्म वायुराशि मिलती तो हैं, लेकिन कोई भी दूसरी को विस्थापित करने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली नहीं होती, जिससे वाताग्र की सीमा लगभग स्थिर हो जाती है। - संरचना:
दोनों वायुराशियाँ एक-दूसरे के समानांतर विपरीत दिशाओं में बहती हैं, जिससे सीमा पर कोई महत्वपूर्ण गति नहीं होती। - संबंधित मौसम:
मौसम आमतौर पर लंबे समय तक एक जैसा बना रहता है। आकाश मेघाच्छादित (Overcast) रहता है और कई दिनों तक रुक-रुक कर हल्की वर्षा या बूंदाबाँदी हो सकती है। यह तब तक बना रहता है जब तक कोई और वायु प्रणाली इसे गति प्रदान न कर दे। - मानचित्र पर प्रतीक:
एक रेखा जिस पर विपरीत दिशाओं में नीले त्रिभुज और लाल अर्धवृत्त बने होते हैं।
4. अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)
- परिभाषा:
यह एक जटिल वाताग्र है जो शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की परिपक्व और अंतिम अवस्था में बनता है, जब एक शीत वाताग्र एक उष्ण वाताग्र से आगे निकल जाता है। - निर्माण:
⋆ चूँकि शीत वाताग्र, उष्ण वाताग्र की तुलना में अधिक तेजी से चलता है, वह धीरे-धीरे उष्ण वाताग्र को पीछे से पकड़ लेता है। जब ऐसा होता है, तो दोनों वाताग्रों के बीच फंसी गर्म वायु (Warm Sector) पूरी तरह से सतह से ऊपर उठ जाती है। सतह पर केवल ठंडी हवा ही रह जाती है। - संबंधित मौसम:
- इसमें शीत और उष्ण दोनों प्रकार के वाताग्रों का मिला-जुला, जटिल और अस्थिर मौसम होता है।
- इसके बनने का अर्थ है कि चक्रवात अपनी अधिकतम ऊर्जा प्राप्त कर चुका है और अब धीरे-धीरे क्षीण होकर समाप्त होने लगता है, क्योंकि गर्म और नम हवा का सतह से संपर्क टूट जाता है, जिससे ऊर्जा की आपूर्ति बंद हो जाती है। [UPSC Mains – Geography Optional]
- मानचित्र पर प्रतीक:
एक बैंगनी रेखा जिस पर एक ही दिशा में त्रिभुज और अर्धवृत्त दोनों बने होते हैं।
वाताग्रों का तुलनात्मक सारांश
| वाताग्र का प्रकार | आक्रामक वायुराशि | ढाल | संबंधित बादल | वर्षा का प्रकार | मौसम का परिवर्तन (बाद में) |
| शीत वाताग्र | ठंडी वायु | तीव्र (Steep) | कपासी-वर्षी (Cumulonimbus) | तीव्र, मूसलाधार, कम समय के लिए (तड़ित-झंझा) | साफ, ठंडा और शुष्क |
| उष्ण वाताग्र | गर्म वायु | मंद (Gentle) | स्तरी और पक्षाभ श्रृंखला (Ns, As, Cs, Ci) | धीमी, लगातार, विस्तृत क्षेत्र में | गर्म और आर्द्र |
| स्थायी वाताग्र | कोई नहीं | स्थिर | स्तरी (Stratus) | हल्की बूंदाबाँदी, लंबे समय तक | कोई विशेष परिवर्तन नहीं |
| अधिविष्ट वाताग्र | शीत वाताग्र उष्ण वाताग्र से आगे | जटिल | मिश्रित | मिश्रित और जटिल वर्षा | चक्रवात का अंत, धीरे-धीरे साफ |
वाताग्रों का महत्व: वाताग्र केवल मौसम की घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि ये शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों (Temperate Cyclones) की उत्पत्ति, विकास और क्षय की पूरी प्रक्रिया को संचालित करते हैं, जो मध्य-अक्षांशीय क्षेत्रों की जलवायु का एक प्रमुख निर्धारक है।
वायुराशियाँ (Air Masses)
परिभाषा:
वायुराशि वायुमंडल के क्षोभमंडल (Troposphere) में वायु का एक विशाल और विस्तृत पिंड होती है, जिसकी क्षैतिज (Horizontal) दिशा में तापमान (Temperature) और आर्द्रता (Humidity) की विशेषताएँ लगभग एक समान (Homogeneous) होती हैं।
एक वायुराशि हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हो सकती है और इसकी ऊँचाई कई किलोमीटर तक हो सकती है। इसका निर्माण तब होता है जब वायु एक विशाल, समरूप सतह (जैसे बर्फीला ध्रुवीय क्षेत्र, उष्णकटिबंधीय महासागर, या विशाल मरुस्थल) पर लंबे समय तक स्थिर रहती है और उस सतह के तापमान और आर्द्रता के गुणों को धारण कर लेती है।
जिस क्षेत्र में वायुराशि अपने गुणों को ग्रहण करती है, उसे “उत्पत्ति क्षेत्र” (Source Region) कहा जाता है।
वायुराशि के उत्पत्ति क्षेत्र की आदर्श दशाएँ (Ideal Conditions for a Source Region)
- विस्तृत और समरूप सतह: क्षेत्र बहुत बड़ा और समतल होना चाहिए ताकि वायु समान गुण धारण कर सके (जैसे विशाल महासागर, बर्फीले मैदान, या रेतीले मरुस्थल)।
- वायुमंडलीय स्थिरता: उस क्षेत्र पर उच्च वायुदाब (High Pressure) की स्थिति होनी चाहिए, ताकि हवा लंबे समय तक स्थिर रह सके और सतह के गुणों को ग्रहण करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
- मंद वायु संचलन (Light Air Circulation): हवा का प्रवाह धीमा होना चाहिए।
⋆ इसी कारण, मध्य-अक्षांशीय क्षेत्र, जहाँ पछुआ पवनें तेज चलती हैं और वायु प्रणालियाँ तेजी से बदलती हैं, वायुराशियों के निर्माण के लिए अच्छे स्रोत क्षेत्र नहीं माने जाते हैं। [UPSC – Conceptual]
वायुराशियों का वर्गीकरण (Classification of Air Masses)
वायुराशियों का वर्गीकरण उनके उत्पत्ति क्षेत्र के अक्षांशीय स्थान (तापमान के लिए) और सतह की प्रकृति (आर्द्रता के लिए) के आधार पर किया जाता है।
I. तापमान के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on Temperature)
वायुराशियों के वर्गीकरण का यह आधार उनके उत्पत्ति क्षेत्र (Source Region) के अक्षांश (Latitude) और वहाँ की सतही गर्मी या ठंडक की मात्रा से निर्धारित होता है। इस आधार पर वायुराशियों को मुख्य रूप से चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
1. उष्णकटिबंधीय वायुराशि (Tropical Air Mass – T)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
ये वायुराशियाँ निम्न अक्षांशों (Low Latitudes), आमतौर पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटियों (Sub-tropical High-Pressure Belts) के आसपास, विकसित होती हैं। - तापमान की प्रकृति:
ये वायुराशियाँ गर्म या उष्ण (Warm/Hot) होती हैं। चूँकि इनके स्रोत क्षेत्रों में वर्ष भर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, ये काफी मात्रा में ऊष्मा ग्रहण कर लेती हैं। - प्रभाव:
जब यह वायुराशि किसी क्षेत्र में पहुँचती है, तो वहाँ का तापमान सामान्य से बढ़ जाता है, जिससे मौसम गर्म हो जाता है। - उप-प्रकार (आर्द्रता के आधार पर):
- महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय (cT): गर्म और शुष्क (मरुस्थलों पर बनती है)।
- महासागरीय उष्णकटिबंधीय (mT): गर्म और आर्द्र (उष्ण महासागरों पर बनती है)।
2. ध्रुवीय वायुराशि (Polar Air Mass – P)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
ये वायुराशियाँ उच्च अक्षांशों (High Latitudes), आमतौर पर ध्रुवों और 60° अक्षांशों के बीच, महाद्वीपों और महासागरों पर विकसित होती हैं। - तापमान की प्रकृति:
ये वायुराशियाँ ठंडी (Cold) होती हैं, क्योंकि इनके स्रोत क्षेत्रों में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं, जिससे उन्हें कम सूर्यातप मिलता है। - प्रभाव:
जब यह वायुराशि किसी क्षेत्र की ओर बढ़ती है, तो वहाँ के तापमान में तेजी से गिरावट आती है और मौसम शीतल हो जाता है। - उप-प्रकार (आर्द्रता के आधार पर):
- महाद्वीपीय ध्रुवीय (cP): ठंडी और शुष्क (साइबेरिया, कनाडा जैसे स्थलीय भागों पर बनती है)।
- महासागरीय ध्रुवीय (mP): ठंडी और आर्द्र (उत्तरी अटलांटिक/प्रशांत महासागर पर बनती है)।
3. आर्कटिक/अंटार्कटिक वायुराशि (Arctic/Antarctic Air Mass – A)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
ये वायुराशियाँ ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Regions) के बिल्कुल ऊपर, यानी आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव) और अंटार्कटिक (दक्षिणी ध्रुव) के स्थायी बर्फीले मैदानों पर विकसित होती हैं। - तापमान की प्रकृति:
ये पृथ्वी पर पाई जाने वाली सबसे ठंडी (Extremely Cold) वायुराशियाँ होती हैं। इनका तापमान बहुत कम होता है। - प्रभाव:
ये अपने साथ भीषण शीत लहर (Severe Cold Waves) लाती हैं और तापमान को हिमांक से बहुत नीचे गिरा देती हैं। - उप-प्रकार: चूँकि ये हमेशा बर्फीले भू-भागों पर ही बनती हैं, इन्हें मुख्य रूप से महाद्वीपीय आर्कटिक (cA) ही माना जाता है और ये अत्यंत शुष्क होती हैं (क्योंकि नमी बर्फ के रूप में जमी होती है)।
4. भूमध्यरेखीय वायुराशि (Equatorial Air Mass – E)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
ये वायुराशियाँ भूमध्य रेखा (Equator) के आसपास (विशेषकर ITCZ के भीतर) महासागरीय सतहों पर बनती हैं। - तापमान की प्रकृति:
ये वायुराशियाँ बहुत गर्म (Very Hot) होती हैं। - प्रभाव:
इनकी मुख्य पहचान इनका उच्च तापमान नहीं, बल्कि उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता का संयोजन है, जो वायुमंडल में अत्यधिक अस्थिरता पैदा करता है। ये अपने साथ गर्म, चिपचिपा और उमस भरा मौसम लाती हैं। - उप-प्रकार: चूँकि ये मुख्य रूप से महासागरों पर बनती हैं, इन्हें लगभग हमेशा महासागरीय भूमध्यरेखीय (mE) माना जाता है और ये बहुत आर्द्र होती हैं।
ऊष्मागतिक वर्गीकरण (Thermodynamic Classification)
तापमान के आधार पर एक और वर्गीकरण यह है कि वायुराशि जिस सतह पर जा रही है, उससे वह ठंडी है या गर्म।
- ठंडी वायुराशि (Cold Air Mass – k):
जब कोई वायुराशि अपने नीचे की सतह से अधिक ठंडी हो। उदाहरण के लिए, जब एक ध्रुवीय वायुराशि (cP) गर्मियों में किसी गर्म महाद्वीप पर आती है।- परिणाम: यह नीचे से गर्म होने लगती है, जिससे वायु में अस्थिरता (Instability) आती है और कपासी बादल, बौछारें और तड़ित झंझा बन सकते हैं।
- गर्म वायुराशि (Warm Air Mass – w):
जब कोई वायुराशि अपने नीचे की सतह से अधिक गर्म हो। उदाहरण के लिए, जब एक उष्णकटिबंधीय वायुराशि (mT) सर्दियों में किसी ठंडे महाद्वीप या ठंडे समुद्र पर आती है।- परिणाम: यह नीचे से ठंडी होने लगती है, जिससे वायु में स्थिरता (Stability) आती है और कोहरा (Fog), स्तरी बादल (Stratus Clouds) और हल्की बूंदाबाँदी हो सकती है।
यह द्वितीयक वर्गीकरण वायुराशि के आने पर मौसम कैसा होगा, इसका अधिक सटीक पूर्वानुमान लगाने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, एक cPk वायुराशि (महाद्वीपीय ध्रुवीय, जो अपने नीचे की सतह से ठंडी है) अस्थिर मौसम लाएगी।
II. आर्द्रता (सतह की प्रकृति) के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on Humidity/Surface Nature)
वायुराशियों के वर्गीकरण का यह आधार उनके उत्पत्ति क्षेत्र (Source Region) की सतही प्रकृति पर निर्भर करता है, अर्थात वह क्षेत्र स्थलीय है या जलीय। यह गुण वायुराशि की आर्द्रता (Humidity) की मात्रा को निर्धारित करता है। इस आधार पर वायुराशियों को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
1. महाद्वीपीय वायुराशि (Continental Air Mass – c)
- संकेत (Symbol): इसके वर्गीकरण के लिए अंग्रेजी के छोटे अक्षर ‘c’ का उपयोग किया जाता है।
- उत्पत्ति क्षेत्र:
इन वायुराशियों का निर्माण विशाल स्थलीय भू-भागों या महाद्वीपों (Continents) के आंतरिक हिस्सों पर होता है। ये क्षेत्र महासागरों और नमी के बड़े स्रोतों से बहुत दूर होते हैं। - आर्द्रता की प्रकृति:
चूँकि ये स्थल पर बनती हैं जहाँ वाष्पीकरण के लिए जल की सीमित उपलब्धता होती है, ये वायुराशियाँ शुष्क (Dry) होती हैं। इनमें जलवाष्प की मात्रा बहुत कम होती है, इसलिए इनकी विशिष्ट और निरपेक्ष आर्द्रता निम्न होती है। - संबंधित मौसम और प्रभाव:
- ये आमतौर पर साफ आसमान और शुष्क मौसम लाती हैं।
- चूँकि इनमें नमी कम होती है, इसलिए इनसे वर्षण (Precipitation) की संभावना बहुत कम होती है, जब तक कि ये किसी बड़े जल स्रोत के ऊपर से न गुजरें।
- इनकी प्रकृति के कारण, दैनिक तापांतर (दिन और रात के तापमान में अंतर) अधिक होता है।
- प्रमुख उदाहरण:
- महाद्वीपीय ध्रुवीय (cP): कनाडा या साइबेरिया के बर्फीले मैदानों पर बनती है, जो ठंडी और शुष्क होती है।
- महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय (cT): सहारा या थार जैसे गर्म मरुस्थलों पर बनती है, जो गर्म और शुष्क होती है।
2. महासागरीय वायुराशि (Maritime Air Mass – m)
- संकेत (Symbol): इसके वर्गीकरण के लिए अंग्रेजी के छोटे अक्षर ‘m’ का उपयोग किया जाता है।
- उत्पत्ति क्षेत्र:
इन वायुराशियों का निर्माण विशाल महासागरों या समुद्रों (Oceans or Seas) की सतह पर होता है। - आर्द्रता की प्रकृति:
महासागरों पर वाष्पीकरण की दर बहुत अधिक होने के कारण, ये वायुराशियाँ आर्द्र या नम (Moist/Humid) होती हैं। ये अपने साथ भारी मात्रा में जलवाष्प लेकर चलती हैं, इसलिए इनकी विशिष्ट और निरपेक्ष आर्द्रता उच्च होती है। - संबंधित मौसम और प्रभाव:
- ये आमतौर पर मेघाच्छादित (Cloudy) और आर्द्र मौसम लाती हैं।
- इनमें नमी की अधिकता के कारण वर्षा, हिमपात या कोहरे जैसी वर्षण की घटनाओं की उच्च संभावना होती है।
- इनकी प्रकृति के कारण, दैनिक तापांतर कम होता है, और मौसम अधिक सम (moderate) बना रहता है।
- प्रमुख उदाहरण:
- महासागरीय ध्रुवीय (mP): उत्तरी अटलांटिक या उत्तरी प्रशांत जैसे ठंडे महासागरों पर बनती है, जो ठंडी और आर्द्र होती है।
- महासागरीय उष्णकटिबंधीय (mT): मैक्सिको की खाड़ी या उष्णकटिबंधीय अटलांटिक जैसे गर्म महासागरों पर बनती है, जो गर्म और आर्द्र होती है। भारत का ग्रीष्मकालीन मानसून इसी प्रकार की वायुराशि का एक संशोधित रूप है।
संयुक्त वर्गीकरण का महत्व (Importance of Combined Classification)
वायुराशि का सही और पूर्ण वर्णन करने के लिए, तापमान और आर्द्रता दोनों आधारों को एक साथ मिलाया जाता है।
| संयुक्त प्रकार | पूरा नाम | उत्पत्ति का उदाहरण | गुण (Temperature & Humidity) |
| cP | महाद्वीपीय ध्रुवीय | साइबेरिया (सर्दियों में) | ठंडी और शुष्क (Cold & Dry) |
| cT | महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय | सहारा मरुस्थल | गर्म और शुष्क (Hot & Dry) |
| mP | महासागरीय ध्रुवीय | उत्तरी अटलांटिक महासागर | ठंडी और आर्द्र (Cold & Moist) |
| mT | महासागरीय उष्णकटिबंधीय | मैक्सिको की खाड़ी | गर्म और आर्द्र (Warm & Moist) |
यह संयुक्त वर्गीकरण मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है। उदाहरण के लिए, यदि मौसम विज्ञानी यह अनुमान लगाते हैं कि किसी क्षेत्र पर ‘mT’ वायुराशि आने वाली है, तो वे गर्म, उमस भरे और वर्षा वाले मौसम की भविष्यवाणी कर सकते हैं।
प्रमुख वायुराशि प्रकार (Major Types of Air Masses)
वायुराशियों का पूर्ण वर्गीकरण उनके तापमान (Temperature) और आर्द्रता (Humidity) दोनों गुणों को एक साथ मिलाकर किया जाता है। पहला अक्षर आर्द्रता (c = महाद्वीपीय/शुष्क, m = महासागरीय/आर्द्र) और दूसरा अक्षर तापमान (T = उष्णकटिबंधीय/गर्म, P = ध्रुवीय/ठंडा, A = आर्कटिक/अत्यंत ठंडा) को दर्शाता है।
इस आधार पर, विश्व की प्रमुख वायुराशियों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:
1. महाद्वीपीय ध्रुवीय वायुराशि (Continental Polar Air Mass – cP)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
उच्च अक्षांशों के विशाल महाद्वीपीय भू-भाग, विशेषकर सर्दियों में बर्फ से ढके क्षेत्र।- प्रमुख उदाहरण: कनाडा का उत्तरी भाग, साइबेरिया (रूस)।
- गुण:
- तापमान: ठंडा (Cold)।
- आर्द्रता: शुष्क (Dry)।
- संबंधित मौसम:
- ये वायुराशियाँ स्थिर (Stable) होती हैं।
- जब ये मध्य-अक्षांशों की ओर बढ़ती हैं, तो ये अपने साथ तीव्र शीत लहर (Cold Waves), पाला (Frost) और साफ, शुष्क मौसम लाती हैं।
- हालांकि, जब यह वायुराशि ग्रेट लेक्स (Great Lakes) जैसी बड़ी झीलों के ऊपर से गुजरती है, तो यह नमी ग्रहण कर लेती है और झीलों के दूसरी ओर भारी हिमपात (Lake-effect Snow) करती है।
2. महासागरीय ध्रुवीय वायुराशि (Maritime Polar Air Mass – mP)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
उच्च अक्षांशों के ठंडे महासागरीय क्षेत्र।- प्रमुख उदाहरण: उत्तरी अटलांटिक महासागर (आइसलैंड के पास) और उत्तरी प्रशांत महासागर।
- गुण:
- तापमान: ठंडा (Cold), लेकिन cP की तुलना में कम ठंडा (क्योंकि पानी स्थल की तरह ठंडा नहीं होता)।
- आर्द्रता: आर्द्र (Moist/Humid)।
- संबंधित मौसम:
- ये वायुराशियाँ अस्थिर (Unstable) होती हैं।
- ये अपने साथ ठंडा, आर्द्र और मेघाच्छादित (Cloudy) मौसम लाती हैं।
- इनसे अक्सर हल्की से मध्यम वर्षा या हिमपात होता है, खासकर तटीय और पर्वतीय क्षेत्रों में। (जैसे पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर सर्दियों की बारिश)।
3. महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय वायुराशि (Continental Tropical Air Mass – cT)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के विशाल और शुष्क मरुस्थल।- प्रमुख उदाहरण: सहारा मरुस्थल (उत्तरी अफ्रीका), थार मरुस्थल (भारत/पाकिस्तान), ऑस्ट्रेलियाई मरुस्थल। ये मुख्य रूप से गर्मियों में बनती हैं।
- गुण:
- तापमान: अत्यंत गर्म और तप्त (Very Hot)।
- आर्द्रता: अत्यंत शुष्क (Extremely Dry)।
- संबंधित मौसम:
- ये वायुराशिवान अत्यंत स्थिर होती हैं (ऊपर)।
- ये अपने साथ भीषण गर्मी (Heatwaves), सूखा (Drought) और साफ, बादल-रहित आकाश लाती हैं। इनसे वर्षा की संभावना न के बराबर होती है।
- भारत में गर्मियों में चलने वाली ‘लू’ इसी cT वायुराशि का प्रभाव है।
4. महासागरीय उष्णकटिबंधीय वायुराशि (Maritime Tropical Air Mass – mT)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
उष्ण और उपोष्ण कटिबंध के गर्म महासागरीय क्षेत्र।- प्रमुख उदाहरण: मैक्सिको की खाड़ी, कैरेबियन सागर, उष्णकटिबंधीय अटलांटिक और प्रशांत महासागर।
- गुण:
- तापमान: गर्म (Warm)।
- आर्द्रता: अत्यधिक आर्द्र और नम (Very Humid)।
- संबंधित मौसम:
- ⋆ यह वायुराशि अत्यधिक ऊर्जा और नमी से भरी होती है और वायुमंडलीय अस्थिरता (Instability) का एक प्रमुख स्रोत है।
- यह अपने साथ गर्म, चिपचिपा और उमस भरा (Muggy) मौसम लाती है।
- यह भारी संवहनीय वर्षा, तड़ित झंझा (Thunderstorms) और अक्सर बवंडर (Tornadoes) जैसी चरम मौसमी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है।
- ⋆ भारत का ग्रीष्मकालीन मानसून अनिवार्य रूप से एक संशोधित mT वायुराशि है जो हिंद महासागर से आती है। [UPSC/State PSC]
5. महाद्वीपीय आर्कटिक वायुराशि (Continental Arctic Air Mass – cA)
- उत्पत्ति क्षेत्र:
आर्कटिक क्षेत्र के बर्फ और हिम से ढके हुए स्रोत क्षेत्र (जैसे ग्रीनलैंड, उत्तरी साइबेरिया)। - गुण:
- तापमान: अत्यंत ठंडा (Extremely Cold), cP से भी अधिक ठंडा।
- आर्द्रता: अत्यंत शुष्क (Extremely Dry)।
- संबंधित मौसम:
- यह सर्दियों के मौसम में रिकॉर्ड तोड़ ठंड (Record-breaking cold) और भीषण शीत लहरों का कारण बनती है।
सारांश तालिका
| वायुराशि का प्रकार (संकेत) | पूरा नाम | उत्पत्ति क्षेत्र | तापमान की प्रकृति | आर्द्रता की प्रकृति | संबंधित मौसम |
| c A | महाद्वीपीय आर्कटिक | आर्कटिक/अंटार्कटिका के बर्फीले क्षेत्र | अत्यधिक ठंडी | अत्यंत शुष्क | अत्यंत शीतलहर, साफ आकाश। |
| c P | महाद्वीपीय ध्रुवीय | उप-ध्रुवीय महाद्वीप (साइबेरिया, कनाडा) | ठंडी | शुष्क (Dry) | शीत लहर, साफ और ठंडा मौसम। |
| m P | महासागरीय ध्रुवीय | उप-ध्रुवीय महासागर (उत्तरी अटलांटिक, उत्तरी प्रशांत) | ठंडी | आर्द्र (Moist) | शीतल, आर्द्र, मेघाच्छादित मौसम, वर्षा या हिमपात। |
| c T | महाद्वीपीय उष्णकटिबंधीय | उप-उष्णकटिबंधीय मरुस्थल (सहारा, थार) | गर्म या तप्त | शुष्क (Dry) | ⋆ भीषण गर्मी, सूखा, साफ आकाश, लू जैसी पवनें। |
| m T | महासागरीय उष्णकटिबंधीय | उप-उष्णकटिबंधीय महासागर (मैक्सिको की खाड़ी, अटलांटिक) | गर्म या उष्ण | अत्यधिक आर्द्र | ⋆ गर्म, उमस भरा मौसम, भारी वर्षा, तड़ित झंझा। भारत का ग्रीष्मकालीन मानसून इसी का एक रूप है। [UPSC] |
| m E | महासागरीय भूमध्यरेखीय | भूमध्यरेखीय महासागर | बहुत गर्म | बहुत आर्द्र | संवहनीय वर्षा, तड़ित झंझा। |
वायुराशि रूपांतरण (Air Mass Modification)
जब कोई वायुराशि अपने उत्पत्ति क्षेत्र से दूर जाती है और किसी भिन्न सतह के ऊपर से गुजरती है, तो उसके मूल गुणों (तापमान और आर्द्रता) में परिवर्तन होने लगता है। इस प्रक्रिया को वायुराशि रूपांतरण (Air Mass Modification) कहते हैं।
- उदाहरण:
- जब साइबेरिया से आने वाली एक ठंडी और शुष्क महाद्वीपीय ध्रुवीय (cP) वायुराशि उत्तरी अटलांटिक महासागर के गर्म पानी के ऊपर से गुजरती है, तो वह नीचे से गर्म हो जाती है और नमी ग्रहण कर लेती है, और एक अस्थिर महासागरीय ध्रुवीय (mP) वायुराशि में रूपांतरित हो जाती है। यह रूपांतरित वायुराशि पश्चिमी यूरोप में शीतलहर के साथ–साथ वर्षा और हिमपात भी करती है।
वायुराशियों का महत्व (Importance of Air Masses)
- मौसम का निर्धारक: किसी क्षेत्र का मौसम इस बात पर बहुत अधिक निर्भर करता है कि वह किस प्रकार की वायुराशि के प्रभाव में है। उदाहरण के लिए, cP वायुराशि के आने से मौसम ठंडा और शुष्क हो जाता है, जबकि mT वायुराशि के आने से गर्म और उमस भरा हो जाता है।
- वाताग्रों का निर्माण: दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियों के मिलने से ही वाताग्रों (Fronts) का निर्माण होता है।
- चक्रवातों और तूफानों की उत्पत्ति: वाताग्रों के निर्माण से शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों (Temperate Cyclones) का जन्म होता है। इसी प्रकार, गर्म और आर्द्र mT वायुराशियों में अस्थिरता के कारण तड़ित झंझा (Thunderstorms) और बवंडर (Tornadoes) का निर्माण होता है।
- ऊर्जा का स्थानांतरण: वायुराशियाँ पृथ्वी पर ऊष्मा और आर्द्रता का पुनर्वितरण करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। वे उष्ण कटिबंध से ध्रुवों की ओर गर्मी और ध्रुवों से उष्ण कटिबंध की ओर ठंडक का परिवहन करती हैं।
विश्व के जलवायु क्षेत्र: कोपेन का वर्गीकरण (Climate Regions of the World: Köppen’s Classification)
विश्व की जलवायु में बहुत अधिक विविधता पाई जाती है। इस विविधता को व्यवस्थित रूप से समझने और वर्गीकृत करने के लिए कई प्रणालियाँ विकसित की गई हैं, जिनमें व्लादिमीर कोपेन (Wladimir Köppen) द्वारा विकसित की गई प्रणाली सबसे प्रसिद्ध, व्यापक रूप से स्वीकृत और उपयोग की जाने वाली प्रणाली है।
कोपेन वर्गीकरण का आधार:
कोपेन का वर्गीकरण आनुभविक (Empirical) है, जिसका अर्थ है कि यह अवलोकन किए गए डेटा पर आधारित है। उन्होंने जलवायु क्षेत्रों को परिभाषित करने के लिए दो मुख्य चरों (Variables) का उपयोग किया:
- औसत मासिक और वार्षिक तापमान (Average Monthly and Annual Temperature)
- औसत मासिक और वार्षिक वर्षण (Average Monthly and Annual Precipitation)
उन्होंने यह भी माना कि प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation) जलवायु का सबसे अच्छा संकेतक है, इसलिए उनके द्वारा परिभाषित जलवायु क्षेत्रों की सीमाएँ मोटे तौर पर वनस्पति क्षेत्रों की सीमाओं से मेल खाती हैं।
कोपेन की वर्गीकरण योजना (Köppen’s Scheme)
कोपेन ने जलवायु को पाँच प्रमुख समूहों में विभाजित करने के लिए बड़े अक्षरों (Capital Letters) का उपयोग किया, जिनमें से चार तापमान पर और एक वर्षण पर आधारित हैं। इन प्रमुख समूहों को वर्षण और तापमान की मौसमी विशेषताओं के आधार पर छोटे अक्षरों (Small Letters) का उपयोग करके और उप-विभाजित किया गया है।
पाँच प्रमुख जलवायु समूह:
| समूह (Group) | अक्षर (Code) | विवरण और विशेषता |
| A. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Tropical Humid) | A | यहाँ सभी महीनों का औसत तापमान 18°C से अधिक रहता है। कोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं होती। |
| B. शुष्क जलवायु (Dry Climate) | B | यहाँ वर्षण (वर्षा) की तुलना में संभावित वाष्पीकरण (Potential Evaporation) अधिक होता है। |
| C. उष्ण शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Warm Temperate Mid-latitude) | C | सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18°C से नीचे लेकिन -3°C से ऊपर रहता है। स्पष्ट ग्रीष्म और शीत ऋतु होती है। |
| D. शीत शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Cold Temperate Mid-latitude) | D | सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान -3°C से नीचे और सबसे गर्म महीने का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है। लंबी, ठंडी सर्दियाँ होती हैं। |
| E. ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate) | E | सबसे गर्म महीने का औसत तापमान भी 10°C से नीचे रहता है। कोई वास्तविक ग्रीष्म ऋतु नहीं होती। |
| H. उच्चभूमि जलवायु (Highland Climate) | H | ऊँचाई के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली विशेष जलवायु। |
प्रमुख जलवायु प्रकारों का विस्तृत विवरण (Detailed Description of Major Climate Types)
A – उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Tropical Humid Climate)
| कोड | जलवायु का नाम | स्थान/क्षेत्र | विशेषताएँ और वनस्पति |
| Af | उष्णकटिबंधीय वर्षावन (Tropical Rainforest) | भूमध्य रेखा के पास (अमेज़न बेसिन, कांगो बेसिन, दक्षिण-पूर्व एशिया) | ⋆ वर्ष भर भारी वर्षा, कोई शुष्क मौसम नहीं।<br>⋆ उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता।<br>⋆ वनस्पति: सदाबहार उष्णकटिबंधीय वर्षावन। [UPSC] |
| Am | उष्णकटिबंधीय मानसून (Tropical Monsoon) | भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण-पूर्व एशिया, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया | ⋆ एक छोटी शुष्क ऋतु होती है।<br>⋆ ग्रीष्मकाल में मानसूनी पवनों से अत्यधिक वर्षा होती है।<br>⋆ वनस्पति: मानसूनी या पर्णपाती वन। [State PSC] |
| Aw | उष्णकटिबंधीय सवाना (Tropical Savanna) | अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के वर्षावनों और मरुस्थलों के बीच | ⋆ स्पष्ट आर्द्र (ग्रीष्म) और शुष्क (शीत) ऋतु होती है।<br>⋆ वनस्पति: लंबी, मोटी घास के मैदान (सवाना) और बिखरे हुए पेड़। [UPPSC] |
B – शुष्क जलवायु (Dry Climate)
| कोड | जलवायु का नाम | स्थान/क्षेत्र | विशेषताएँ और वनस्पति |
| BWh | उष्ण मरुस्थल (Subtropical Desert – Hot) | उपोष्ण उच्च दाब पेटी में (सहारा, थार, अटाकामा) | ⋆ वर्ष भर उच्च तापमान, बहुत कम और अनिश्चित वर्षा।<br>⋆ दैनिक तापांतर बहुत अधिक।<br>⋆ वनस्पति: मरुद्भिद (Xerophytes) जैसे कैक्टस। |
| BWk | शीत मरुस्थल (Mid-latitude Desert – Cold) | महाद्वीपों के आंतरिक भाग, वृष्टि-छाया क्षेत्र (गोबी, पेटागोनिया) | ⋆ गर्मियाँ गर्म, सर्दियाँ बहुत ठंडी।<br>⋆ वनस्पति: छोटी झाड़ियाँ। |
| BSh | उष्ण स्टेपी (Subtropical Steppe – Hot) | गर्म मरुस्थलों के किनारे। | ⋆ गर्म मरुस्थलों की तुलना में थोड़ी अधिक वर्षा होती है।<br>⋆ वनस्पति: छोटी घास। |
| BSk | शीत स्टेपी (Mid-latitude Steppe – Cold) | शीत मरुस्थलों के किनारे (यूरेशियन स्टेपीज, प्रेयरीज) | ⋆ गर्मियाँ गर्म, सर्दियाँ ठंडी।<br>⋆ वनस्पति: पौष्टिक छोटी घास (स्टेपी घास)। गेहूँ की खेती के लिए प्रसिद्ध। [SSC] |
C – उष्ण शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Warm Temperate Climate)
| कोड | जलवायु का नाम | स्थान/क्षेत्र | विशेषताएँ और वनस्पति |
| Cfa/Cwa | आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय (Humid Subtropical) | महाद्वीपों के पूर्वी तट, 30°-40° अक्षांश (दक्षिण-पूर्वी चीन, दक्षिण-पूर्वी USA) | ⋆ गर्मियाँ गर्म और आर्द्र, सर्दियाँ हल्की।<br>⋆ चीन तुल्य (China Type) जलवायु। |
| Csb/Csa | भूमध्यसागरीय (Mediterranean) | महाद्वीपों के पश्चिमी तट, 30°-40° अक्षांश (भूमध्य सागर के आसपास, कैलिफोर्निया, मध्य चिली) | ⋆ गर्म, शुष्क ग्रीष्मकाल और हल्की, आर्द्र शीतकाल।<br>⋆ “खट्टे/रसदार फलों (Citrus Fruits)” की खेती के लिए प्रसिद्ध (अंगूर, जैतून, संतरा)। [UPSC 2021] |
| Cfb/Cfc | समुद्री पश्चिम तटीय (Marine West Coast) | महाद्वीपों के पश्चिमी तट, 40°-60° अक्षांश (पश्चिमी यूरोप, ब्रिटिश कोलंबिया) | ⋆ सर्दियाँ हल्की, गर्मियाँ शीतल।<br>⋆ पछुआ पवनों से वर्ष भर वर्षा। |
D – शीत शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Cold Temperate Climate)
| कोड | जलवायु का नाम | स्थान/क्षेत्र | विशेषताएँ और वनस्पति |
| Df/Dw | आर्द्र महाद्वीपीय (Humid Continental) | उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों के आंतरिक भाग (पूर्वी USA, उत्तरी चीन, पूर्वी यूरोप) | ⋆ गर्मियाँ गर्म से शीतल, सर्दियाँ लंबी और ठंडी (बर्फबारी)।<br>⋆ स्पष्ट चार ऋतुएँ। |
| Dfc/Dwc | उप-आर्कटिक (टैगा) (Subarctic – Taiga) | यूरेशिया और उत्तरी अमेरिका में 50°-70° अक्षांशों के बीच का विशाल बेल्ट (साइबेरिया, कनाडा) | ⋆ गर्मियाँ छोटी और ठंडी, सर्दियाँ अत्यंत लंबी और कठोर।<br>⋆ वार्षिक तापांतर विश्व में सर्वाधिक।<br>⋆ वनस्पति: शंकुधारी (Coniferous) वन (टैगा), जैसे पाइन, स्प्रूस, फर। [BPSC] |
E – ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)
| कोड | जलवायु का नाम | स्थान/क्षेत्र | विशेषताएँ और वनस्पति |
| ET | टुंड्रा (Tundra) | आर्कटिक तट के किनारे (उत्तरी कनाडा, उत्तरी रूस, ग्रीनलैंड तट) | ⋆ कोई वास्तविक गर्मी नहीं; सबसे गर्म महीने का तापमान 0°C और 10°C के बीच।<br>⋆ जमीन स्थायी रूप से जमी रहती है (पर्माफ्रॉस्ट)।<br>⋆ वनस्पति: काई, लाइकेन, छोटी झाड़ियाँ। |
| EF | हिम टोपी (Ice Cap) | ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के आंतरिक भाग | ⋆ वर्ष भर हिमांक से नीचे तापमान।<br>⋆ स्थायी बर्फ और हिम की मोटी चादर।<br>⋆ कोई वनस्पति नहीं। |
प्रमुख जलवायु प्रकारों का विस्तृत विवरण (Detailed Description of Major Climate Types)
A – उष्णकट उष्णकटिबंधीय जलवायु (Tropical Humid Climate)
(मुख्य विशेषता: सभी महीनों का औसत तापमान 18°C से अधिक)
- Af – उष्णकटिबंधीय वर्षावन जलवायु (Tropical Rainforest Climate)
- स्थान: यह जलवायु भूमध्य रेखा के दोनों ओर लगभग 5° से 10° अक्षांशों के बीच पाई जाती है, जैसे अमेज़न नदी बेसिन (दक्षिण अमेरिका), कांगो नदी बेसिन (अफ्रीका), और इंडोनेशिया तथा मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई द्वीप समूह।
- विशेषताएँ: यहाँ वर्ष भर उच्च तापमान और अत्यधिक आर्द्रता बनी रहती है। कोई स्पष्ट शुष्क मौसम नहीं होता; प्रत्येक महीने में पर्याप्त वर्षा होती है, जो मुख्य रूप से दोपहर बाद होने वाली संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall) होती है। वार्षिक और दैनिक तापांतर बहुत कम होता है।
- वनस्पति: इन दशाओं के कारण यहाँ विश्व के सबसे घने सदाबहार उष्णकटिबंधीय वर्षावन (Evergreen Tropical Rainforests) पाए जाते हैं, जिनमें अत्यधिक जैव विविधता होती है।
- Am – उष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु (Tropical Monsoon Climate)
- स्थान: यह जलवायु मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम जैसे दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में तथा उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में पाई जाती है।
- विशेषताएँ: यहाँ उष्णकटिबंधीय वर्षावन जलवायु की तरह ही उच्च तापमान रहता है, लेकिन वर्षा का वितरण मौसमी होता है। एक स्पष्ट आर्द्र ग्रीष्मकाल (मानसूनी वर्षा) और एक छोटी शुष्क शीतकाल होती है। वर्षा की अधिकांश मात्रा कुछ ही महीनों में केंद्रित होती है, जो स्थल और जल के विभेदी तापन से उत्पन्न मानसूनी पवनों के कारण होती है।
- वनस्पति: यहाँ मानसूनी या उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Monsoon/Tropical Deciduous Forests) पाए जाते हैं, जो शुष्क मौसम में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं।
- Aw – उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु (Tropical Savanna Climate)
- स्थान: यह जलवायु उष्णकटिबंधीय वर्षावन क्षेत्रों और उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थलों के बीच एक संक्रमणकालीन पेटी के रूप में पाई जाती है, जैसे सूडान (अफ्रीका), ब्राजीलियन हाइलैंड्स और वेनेजुएला (दक्षिण अमेरिका)।
- विशेषताएँ: सवाना जलवायु की पहचान स्पष्ट आर्द्र और शुष्क ऋतुओं से होती है। ग्रीष्मकाल आर्द्र होता है जब ITCZ इस क्षेत्र पर होता है, जबकि शीतकाल लंबा और शुष्क होता है जब उपोष्ण उच्च दाब पेटी का प्रभाव होता है।
- वनस्पति: यहाँ लंबी और मोटी घास के मैदान (सवाना) पाए जाते हैं, जिनके बीच में कुछ बिखरे हुए, छोटे और सूखा-प्रतिरोधी पेड़ होते हैं।
B – शुष्क जलवायु (Dry Climate)
(मुख्य विशेषता: वर्षण की तुलना में वाष्पीकरण अधिक)
- BWh – उष्ण मरुस्थलीय जलवायु (Subtropical Hot Desert Climate)
- स्थान: यह जलवायु उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटी में, आमतौर पर महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर पाई जाती है, जैसे सहारा और कालाहारी (अफ्रीका), अरेबियन मरुस्थल, थार (एशिया), और ग्रेट ऑस्ट्रेलियन मरुस्थल।
- विशेषताएँ: यहाँ वर्षा बहुत कम और अविश्वसनीय होती है। वर्ष भर तापमान बहुत अधिक रहता है, और दैनिक तापांतर (Diurnal Temperature Range) विश्व में सर्वाधिक होता है (दिन अत्यधिक गर्म, रातें ठंडी)।
- वनस्पति: जल के अभाव के कारण यहाँ मरुद्भिद (Xerophytic) वनस्पति (जैसे कैक्टस, मोटी पत्तियां, लंबी जड़ें) पाई जाती है।
- BSk – मध्य-अक्षांशीय स्टेपी जलवायु (Mid-latitude Cold Steppe Climate)
- स्थान: यह जलवायु मध्य अक्षांशों में महाद्वीपों के आंतरिक भागों में पाई जाती है, जो अक्सर गर्म मरुस्थलों के किनारे या ऊँचे पहाड़ों के वृष्टि-छाया क्षेत्रों में होती है, जैसे यूरेशियन स्टेपीज, उत्तरी अमेरिकी प्रेयरीज।
- विशेषताएँ: यहाँ वर्षा कम होती है लेकिन यह मरुस्थलों से अधिक होती है। गर्मियाँ गर्म और सर्दियाँ ठंडी तथा बर्फीली होती हैं।
- वनस्पति: छोटी और पौष्टिक घास (स्टेपी) पाई जाती है जो व्यापक अनाज की खेती (गेहूँ) और पशुपालन के लिए आदर्श है।
C – उष्ण शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Warm Temperate Mid-latitude Climate)
(मुख्य विशेषता: हल्की सर्दियाँ)
- Csa/Csb – भूमध्यसागरीय जलवायु (Mediterranean Climate)
- स्थान: यह एक बहुत ही विशिष्ट जलवायु है जो महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर 30° से 40° अक्षांशों के बीच पाई जाती है, जैसे भूमध्य सागर के तटीय देश, कैलिफोर्निया (USA), मध्य चिली, केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका), और दक्षिण-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया।
- विशेषताएँ: इसकी अनूठी पहचान है गर्म और पूरी तरह से शुष्क ग्रीष्मकाल तथा हल्की और वर्षा वाली शीतकाल। यह वायुदाब पेटियों के मौसमी खिसकाव का परिणाम है।
- वनस्पति और कृषि: यह जलवायु खट्टे और रसदार फलों (Citrus Fruits) जैसे अंगूर, जैतून, संतरे और नींबू की खेती के लिए विश्व प्रसिद्ध है। [UPSC 2021]
- Cfa – आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु (Humid Subtropical Climate)
- स्थान: यह जलवायु महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर 30° से 40° अक्षांशों के बीच पाई जाती है, जैसे दक्षिण-पूर्वी चीन, दक्षिण-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्राजील का दक्षिणी भाग। इसे “चीन तुल्य जलवायु” भी कहते हैं।
- विशेषताएँ: यहाँ गर्मियाँ उष्ण और आर्द्र होती हैं (संवहनीय वर्षा के साथ), जबकि सर्दियाँ हल्की होती हैं। यहाँ वर्ष भर वर्षा होती है।
D – शीत शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Cold Temperate Mid-latitude Climate)
(मुख्य विशेषता: ठंडी और बर्फीली सर्दियाँ; यह जलवायु दक्षिणी गोलार्ध में लगभग अनुपस्थित है)
- Dfc/Dwc/Dwd – उप-आर्कटिक (टैगा) जलवायु (Subarctic or Taiga Climate)
- स्थान: यह उत्तरी गोलार्ध में एक विशाल पट्टी के रूप में फैली है, जो आर्कटिक टुंड्रा के दक्षिण में स्थित है, जैसे साइबेरिया (रूस) और उत्तरी कनाडा।
- विशेषताएँ: यहाँ गर्मियाँ बहुत छोटी और ठंडी होती हैं, जबकि सर्दियाँ अत्यंत लंबी, बर्फीली और कठोर होती हैं। यहाँ विश्व का सर्वाधिक वार्षिक तापांतर (Annual Temperature Range) पाया जाता है।
- वनस्पति: यहाँ विश्व के सबसे बड़े शंकुधारी या कोणधारी वन (Coniferous Forests) पाए जाते हैं, जिन्हें टैगा कहा जाता है। इन वनों में पाइन, स्प्रूस, लार्च और फर जैसे मुलायम लकड़ी के पेड़ होते हैं।
E – ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)
(मुख्य विशेषता: कोई वास्तविक गर्मी नहीं, सबसे गर्म महीने का तापमान भी 10°C से नीचे)
- ET – टुंड्रा जलवायु (Tundra Climate)
- स्थान: यह ध्रुवीय क्षेत्रों के किनारों पर स्थित है, जैसे आर्कटिक महासागर के तटीय क्षेत्र और यूरेशिया तथा उत्तरी अमेरिका के उत्तरी किनारे।
- विशेषताएँ: यहाँ सर्दियाँ लंबी और कठोर तथा गर्मियाँ बहुत छोटी और ठंडी होती हैं। धरातल की ऊपरी परत गर्मियों में पिघलती है, लेकिन नीचे की भूमि स्थायी रूप से जमी रहती है, जिसे पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) कहते हैं।
- वनस्पति: यहाँ वृक्ष नहीं उगते; केवल काई (Mosses), लाइकेन (Lichens), और छोटी-छोटी झाड़ियाँ ही उग पाती हैं।
- EF – हिम टोपी जलवायु (Ice Cap Climate)
- स्थान: यह अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड के आंतरिक भागों में पाई जाती है।
- विशेषताएँ: यहाँ का धरातल स्थायी रूप से बर्फ की मोटी चादर से ढका रहता है, और औसत मासिक तापमान हमेशा हिमांक (0°C) से नीचे रहता है।
- वनस्पति: कोई वनस्पति नहीं पाई जाती।
विश्व के जलवायु क्षेत्र: त्रेवार्था का वर्गीकरण (Climate Regions of the World: Trewartha’s Classification)
ग्लेन टी. त्रेवार्था (Glenn T. Trewartha), एक अमेरिकी भूगोलवेत्ता, ने 1968 में कोपेन की जलवायु वर्गीकरण प्रणाली में कुछ संशोधन करके अपनी एक नई प्रणाली प्रस्तुत की। त्रेवार्था का मानना था कि कोपेन का वर्गीकरण बहुत अधिक जटिल है और कुछ प्रमुख जलवायु सीमाओं को, विशेषकर मध्य-अक्षांशों में, सही ढंग से परिभाषित नहीं करता है।
त्रेवार्था की प्रणाली को कोपेन का “संशोधित (Modified)” या “सरलीकृत (Simplified)” संस्करण माना जाता है। इसका उद्देश्य जलवायु वर्गीकरण को अधिक वास्तविक, तार्किक और क्षेत्रीय भूगोल के अध्ययन के लिए अधिक उपयुक्त बनाना था।
त्रेवार्था के वर्गीकरण का आधार (Basis of Trewartha’s Classification)
त्रेवार्था का वर्गीकरण भी आनुभविक (Empirical) है और कोपेन की तरह ही तापमान (Temperature) और वर्षण (Precipitation) के डेटा पर आधारित है। हालांकि, उन्होंने सीमाओं और समूहों को पुनर्परिभाषित किया।
- प्रमुख संशोधन:
- उपोष्ण कटिबंध को पुनर्परिभाषित किया: त्रेवार्था ने उष्णकटिबंधीय (Tropical) और शीतोष्ण (Temperate) के बीच एक अलग “उपोष्ण कटिबंधीय (Subtropical)” समूह बनाया। उन्होंने यह तर्क दिया कि जिन महीनों का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है, उनकी संख्या जलवायु को परिभाषित करने में एक महत्वपूर्ण कारक है।
- समूहों का पुनर्गठन: उन्होंने कोपेन के पाँच प्रमुख समूहों को छह प्रमुख समूहों (A, C, D, E, F) में पुनर्गठित किया और समूह B (शुष्क जलवायु) को एक अलग सार्वभौमिक श्रेणी के रूप में रखा।
त्रेवार्था की वर्गीकरण योजना (Trewartha’s Scheme)
छह प्रमुख जलवायु समूह:
| समूह (Group) | अक्षर (Code) | विवरण और विशेषता (त्रेवार्था के अनुसार) |
| A. उष्णकटिबंधीय जलवायु (Tropical) | A | यहाँ कोई शीत ऋतु नहीं होती। सभी 12 महीनों का औसत तापमान 18°C से ऊपर रहता है। |
| B. शुष्क जलवायु (Dry) | B | यहाँ वर्षण कम होता है और संभावित वाष्पीकरण से भी कम होता है। |
| C. उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु (Subtropical) | C | 8 या अधिक महीनों का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है। सर्दियाँ हल्की होती हैं। |
| D. शीतोष्ण जलवायु (Temperate) | D | 4 से 7 महीनों का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है। स्पष्ट गर्म और ठंडी ऋतुएँ होती हैं। |
| E. बोरियल या उप-आर्कटिक जलवायु (Boreal) | E | 1 से 3 महीनों का औसत तापमान 10°C से ऊपर रहता है। गर्मियाँ बहुत छोटी और सर्दियाँ अत्यंत लंबी होती हैं। (कोपेन के Dfc/Dwc के समान)। |
| F. ध्रुवीय जलवायु (Polar) | F | किसी भी महीने का औसत तापमान 10°C से ऊपर नहीं जाता। |
| H. उच्चभूमि जलवायु (Highland) | H | ऊँचाई के कारण पर्वतीय क्षेत्रों की विशेष जलवायु। |
प्रमुख जलवायु प्रकारों का विस्तृत विवरण (त्रेवार्था के अनुसार)
(ध्यान दें कि कई प्रकार कोपेन से मिलते-जुलते हैं, लेकिन उनकी सीमाएँ भिन्न हो सकती हैं।)
A – उष्णकटिबंधीय जलवायु (Tropical Climate – Ar, Aw)
- Ar – उष्णकटिबंधीय आर्द्र (Tropical Wet): कोपेन के Af और Am के समान। यहाँ वर्ष भर भारी वर्षा होती है, और एक बहुत छोटी या कोई शुष्क ऋतु नहीं होती। उदाहरण: अमेज़न और कांगो बेसिन।
- Aw – उष्णकटिबंधीय आर्द्र-एवं-शुष्क (Tropical Wet-and-Dry): कोपेन के Aw के समान। यहाँ स्पष्ट रूप से गीली और सूखी ऋतुएँ होती हैं। उदाहरण: सवाना प्रदेश, भारतीय उपमहाद्वीप का बड़ा हिस्सा (मानसूनी)।
B – शुष्क जलवायु (Dry Climate – BW, BS)
यह समूह कोपेन के वर्गीकरण के लगभग समान है।
- BW – मरुस्थल (Desert): अत्यंत शुष्क।
- BS – स्टेपी (Steppe): अर्ध-शुष्क।
- दूसरे अक्षर (h, k) का उपयोग गर्म (h) और ठंडे (k) उप-प्रकारों को दर्शाने के लिए किया जाता है (जैसे BWh – गर्म मरुस्थल)।
C – उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु (Subtropical Climate – Cf, Cs)
यह त्रेवार्था का एक महत्वपूर्ण संशोधन है।
- Cf – उपोष्ण कटिबंधीय आर्द्र (Subtropical Humid): ये वे क्षेत्र हैं जहाँ वर्ष भर वर्षा होती है और गर्मियाँ लंबी तथा उष्ण होती हैं। उदाहरण: दक्षिण-पूर्वी USA, दक्षिण-पूर्वी चीन।
- Cs – उपोष्ण कटिबंधीय शुष्क-ग्रीष्म (Subtropical Dry-Summer): ⋆ यह भूमध्यसागरीय जलवायु (Mediterranean Climate) है। इसकी पहचान शुष्क ग्रीष्मकाल और आर्द्र शीतकाल से होती है। उदाहरण: कैलिफोर्निया, भूमध्यसागरीय तट।
D – शीतोष्ण जलवायु (Temperate Climate – Do, Dc)
इसे “महाद्वीपीय (Continental)” जलवायु भी कहा जाता है। यह उत्तरी गोलार्ध में ही प्रमुखता से पाया जाता है।
- Do – शीतोष्ण महासागरीय (Temperate Oceanic): यहाँ सर्दियाँ हल्की और वर्ष भर वर्षा होती है। महासागरों का प्रभाव स्पष्ट होता है। उदाहरण: पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, फ्रांस), प्रशांत उत्तर-पश्चिम (USA)।
- Dc – शीतोष्ण महाद्वीपीय (Temperate Continental): यहाँ गर्मियाँ गर्म और सर्दियाँ ठंडी होती हैं। वार्षिक तापांतर अधिक होता है। उदाहरण: उत्तर-पूर्वी USA, उत्तरी चीन।
E – बोरियल या उप-आर्कटिक जलवायु (Boreal Climate – E)
यह कोपेन के टैगा (Taiga) जलवायु क्षेत्र के समान है।
- विवरण: यहाँ गर्मियाँ बहुत छोटी और ठंडी होती हैं, जबकि सर्दियाँ अत्यंत लंबी, बर्फीली और कठोर होती हैं। यहाँ विश्व का सर्वाधिक वार्षिक तापांतर पाया जाता है।
- वनस्पति: विशाल शंकुधारी वन (टैगा)।
- स्थान: उत्तरी यूरेशिया और उत्तरी अमेरिका की एक विशाल पट्टी।
F – ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate – FT, Fi)
यह समूह कोपेन के E समूह के लगभग समान है।
- FT – टुंड्रा (Tundra): सबसे गर्म महीने का तापमान 0°C और 10°C के बीच रहता है। स्थायी तुषार भूमि (पर्माफ्रॉस्ट) पाई जाती है।
- Fi – हिम टोपी (Ice Cap): सभी महीनों का औसत तापमान 0°C से नीचे रहता है। स्थायी बर्फ से ढका रहता है।
त्रेवार्था बनाम कोपेन: मुख्य अंतर का सारांश
- C और D समूहों का पुनर्गठन: त्रेवार्था ने कोपेन के C और D समूहों को पुनर्परिभाषित करके तीन नए समूह बनाए: उपोष्ण (C), शीतोष्ण (D), और बोरियल (E)। यह मध्य-अक्षांशों की जलवायु का अधिक तार्किक विभाजन प्रस्तुत करता है।
- उपोष्ण की सीमा: त्रेवार्था ने उपोष्ण जलवायु की सीमा को 8 महीने के 10°C तापमान से परिभाषित किया, जो इसे एक अलग पहचान देता है।
- D और E का विभाजन: कोपेन की D जलवायु (महाद्वीपीय) को त्रेवार्था ने दो भागों में बाँट दिया: वास्तविक शीतोष्ण (D) और बोरियल/टैगा (E), जो वनस्पति और जलवायु की दृष्टि से अधिक सटीक है।
निष्कर्ष: त्रेवार्था का वर्गीकरण कोपेन प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सुधार माना जाता है। यह उपयोग में सरल है और विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप की जलवायु सीमाओं को अधिक सटीकता से चित्रित करता है, जिससे यह क्षेत्रीय भौगोलिक अध्ययन के लिए बहुत उपयोगी हो जाता है।
कोपेन बनाम त्रेवार्था: जलवायु वर्गीकरण की तुलना
| तुलना का आधार | व्लादिमीर कोपेन का वर्गीकरण (Köppen’s Classification) | ग्लेन टी. त्रेवार्था का वर्गीकरण (Trewartha’s Classification) | प्रमुख अंतर और निष्कर्ष |
| मूल दर्शन | आनुभविक, मुख्य रूप से तापमान और वर्षण पर आधारित। प्राकृतिक वनस्पति एक प्रमुख संकेतक है। | आनुभविक, कोपेन का संशोधित और सरलीकृत संस्करण। अधिक तार्किक और वास्तविक सीमाओं पर केंद्रित। | दोनों का आधार समान है, लेकिन त्रेवार्था ने कोपेन की कमियों को दूर करने का प्रयास किया। |
| प्रमुख जलवायु समूह | पाँच प्रमुख समूह: <br>A (उष्णकटिबंधीय)<br>B (शुष्क)<br>C (उष्ण शीतोष्ण)<br>D (शीत शीतोष्ण/महाद्वीपीय)<br>E (ध्रुवीय) | छह प्रमुख समूह: <br>A (उष्णकटिबंधीय)<br>C (उपोष्ण)<br>D (शीतोष्ण)<br>E (बोरियल/उप-आर्कटिक)<br>F (ध्रुवीय)<br>(समूह | ⋆ सबसे बड़ा अंतर: त्रेवार्था ने कोपेन के C और D समूहों को तोड़कर तीन नए, अधिक विशिष्ट समूह (C, D, E) बनाए। |
| A – उष्णकटिबंधीय जलवायु | सभी महीनों का औसत तापमान ≥ 18°C। | सभी 12 महीनों का औसत तापमान ≥ 18°C। | यह परिभाषा लगभग समान है। दोनों में कोई खास अंतर नहीं है। |
| (Af, Am, Aw) | (Ar, Aw – त्रेवार्THA ने Am को Ar/Aw में मिला दिया) | ||
| B – शुष्क जलवायु | वर्षण < संभावित वाष्पीकरण।<br>(BWh, BWk, BSh, BSk) | वर्षण < संभावित वाष्पीकरण।<br>(BW, BS – h और k का उपयोग होता है) | यह परिभाषा और इसके उप-प्रकार दोनों प्रणालियों में लगभग समान हैं। |
| मध्य-अक्षांशीय जलवायु (The Mid-Latitudes) | इसे दो बड़े समूहों में बांटा गया है:<br>C (उष्ण शीतोष्ण): सबसे ठंडे महीने का तापमान -3°C और 18°C के बीच।<br>D (शीत शीतोष्ण): सबसे ठंडे महीने का तापमान < -3°C। | इसे तीन तार्किक समूहों में बांटा गया है:<br>C (उपोष्ण): 8 से 12 महीने का तापमान ≥ 10°C।<br>D (शीतोष्ण): 4 से 7 महीने का तापमान ≥ 10°C।<br>E (बोरियल): 1 से 3 महीने का तापमान ≥ 10°C। | ⋆ यह सबसे महत्वपूर्ण अंतर है। त्रेवार्था ने तापमान की अवधि (महीनों की संख्या) को आधार बनाया, जो जलवायु को बेहतर ढंग से परिभाषित करता है। कोपेन का -3°C का मापदंड बहुत मनमाना माना गया। |
| Cs – भूमध्यसागरीय जलवायु | समूह C के अंतर्गत वर्गीकृत। | समूह C (उपोष्ण) के अंतर्गत वर्गीकृत। | दोनों में है, लेकिन त्रेवार्था के ‘उपोष्ण’ समूह में यह अधिक तार्किक लगता है। |
| टैगा/साइबेरियन जलवायु | समूह D के अंतर्गत आता है (Dfc, Dwc, Dwd)। | एक अलग प्रमुख समूह E (बोरियल) के रूप में वर्गीकृत। | त्रेवार्था का वर्गीकरण टैगा को एक अलग प्रमुख जलवायु प्रकार के रूप में मान्यता देता है, जो इसकी विशिष्टता को देखते हुए अधिक उपयुक्त है। |
| D – शीतोष्ण/महाद्वीपीय | D समूह में कठोर सर्दियों वाली सभी महाद्वीपीय जलवायु शामिल हैं। | D समूह में केवल वे क्षेत्र शामिल हैं जहाँ 4 से 7 महीने गर्मियाँ होती हैं, यह वास्तविक “शीतोष्ण” या “मध्य-अक्षांशीय” जलवायु है। | त्रेवार्था का ‘D’ समूह कोपेन की तुलना में अधिक संकीर्ण और विशिष्ट है। |
| E / F – ध्रुवीय जलवायु | समूह E: सबसे गर्म महीने का तापमान < 10°C। | समूह F: सबसे गर्म महीने का तापमान < 10°C। | परिभाषा समान है, केवल अक्षर का उपयोग भिन्न है (कोपेन का E = त्रेवार्था का F)। |
| (ET – टुंड्रा, EF – हिम टोपी) | (FT – टुंड्रा, Fi – हिम टोपी) | ||
| उपयोगिता और जटिलता | विश्व स्तर पर अधिक प्रसिद्ध और व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, लेकिन अधिक जटिल और कुछ सीमाएँ (जैसे -3°C) विवादास्पद हैं। | समझने और लागू करने में सरल। विशेष रूप से शैक्षिक उद्देश्यों और क्षेत्रीय भूगोल के लिए अधिक तार्किक माना जाता है, लेकिन कोपेन की तुलना में कम प्रसिद्ध है। | त्रेवार्था ने सुधार का प्रयास किया, लेकिन कोपेन प्रणाली पहले से ही इतनी स्थापित हो चुकी थी कि उसे प्रतिस्थापित नहीं कर सकी। |
निष्कर्ष:
संक्षेप में, त्रेवार्था का वर्गीकरण कोपेन की प्रणाली का एक सुधारवादी और तार्किक सरलीकरण है। इसका सबसे बड़ा योगदान मध्य-अक्षांशों की जलवायु (कोपेन के C और D समूह) को एक अधिक यथार्थवादी और सार्थक तरीके से उपोष्ण (C), शीतोष्ण (D), और बोरियल (E) समूहों में पुनर्व्यवस्थित करना है। हालांकि अकादमिक और वैज्ञानिक जगत में कोपेन का वर्गीकरण अभी भी अधिक प्रचलित है, त्रेवार्था का मॉडल जलवायु प्रदेशों की सीमाओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए एक उत्कृष्ट वैकल्पिक ढाँचा प्रदान करता है।
वाष्पीकरण, संघनन और वर्षा (Evaporation, Condensation, and Precipitation)
ये तीनों प्रक्रियाएँ मिलकर जल चक्र का निर्माण करती हैं, जो पृथ्वी पर जल के निरंतर परिसंचरण और पुनर्वितरण के लिए उत्तरदायी है।
1. वाष्पीकरण (Evaporation)
परिभाषा:
वाष्पीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई तरल पदार्थ, विशेषकर जल (Liquid), ऊष्मा ग्रहण करके गैसीय अवस्था (Gas – जलवाष्प) में परिवर्तित हो जाता है। यह जल चक्र का प्रारंभिक चरण है, जहाँ पृथ्वी की सतह (महासागरों, झीलों, नदियों) का जल वायुमंडल में पहुँचता है।
- वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): पौधों द्वारा अपने पत्तों से जल को जलवाष्प के रूप में छोड़ने की प्रक्रिया वाष्पोत्सर्जन कहलाती है।
वाष्पीकरण को प्रभावित करने वाले कारक:
- तापमान (Temperature):
- ⋆ तापमान और वाष्पीकरण में सीधा संबंध है। तापमान जितना अधिक होगा, कणों की गतिज ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी और वाष्पीकरण की दर भी उतनी ही तेज होगी। यही कारण है कि गर्मियों में कपड़े जल्दी सूखते हैं।
- सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity):
- ⋆ सापेक्षिक आर्द्रता और वाष्पीकरण में विपरीत संबंध है। सापेक्षिक आर्द्रता हवा में पहले से मौजूद नमी की मात्रा का माप है। यदि हवा पहले से ही नम (उच्च आर्द्रता) है, तो वह और अधिक नमी ग्रहण नहीं कर पाएगी, जिससे वाष्पीकरण की दर धीमी हो जाएगी। शुष्क हवा में वाष्पीकरण तेज होता है।
- पवन की गति (Wind Speed):
- ⋆ पवन की गति और वाष्पीकरण में सीधा संबंध है। तेज हवा अपने साथ नम हवा को हटाकर उसकी जगह शुष्क हवा लाती रहती है, जिससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
- सतह का क्षेत्रफल (Surface Area):
- जितना अधिक सतह क्षेत्र खुला होता है, वाष्पीकरण उतना ही तेज होता है।
गुप्त ऊष्मा (Latent Heat):
- वाष्पीकरण एक शीतलन प्रक्रिया (Cooling process) है। जब जल वाष्प में बदलता है, तो वह अपने परिवेश से ऊष्मा (ऊर्जा) सोखता है। यह सोखी हुई ऊर्जा जलवाष्प में “गुप्त ऊष्मा” (Latent Heat of Vaporization) के रूप में संग्रहीत हो जाती है। जब यही जलवाष्प बाद में संघनित होता है, तो यह ऊष्मा वायुमंडल में वापस मुक्त हो जाती है। [UPSC – Conceptual]
2. संघनन (Condensation)
परिभाषा:
संघनन वाष्पीकरण के ठीक विपरीत प्रक्रिया है। यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जलवाष्प (गैस) ठंडा होने पर वापस जल की बूंदों या बर्फ के कणों (तरल/ठोस) में परिवर्तित हो जाता है। संघनन के कारण ही बादलों, कोहरे, ओस और पाले का निर्माण होता है।
संघनन के लिए आवश्यक दशाएँ:
- वायु का संतृप्त होना (Saturation of Air):
- हवा का ठंडा होना आवश्यक है ताकि उसकी सापेक्षिक आर्द्रता 100% तक पहुँच जाए। जिस तापमान पर हवा संतृप्त हो जाती है, उसे ओसांक बिंदु (Dew Point) कहते हैं।
- ⋆ ओसांक बिंदु वह तापमान है जिस पर संघनन शुरू होता है।
- आर्द्रताग्राही नाभिक की उपस्थिति (Presence of Hygroscopic Nuclei):
- वायुमंडल में जलवाष्प को संघनित होने और जल की बूंदों में बदलने के लिए एक सतह (Surface) की आवश्यकता होती है। वायुमंडल में मौजूद धूलकण, धुआँ और नमक के कण यही आधार प्रदान करते हैं। इन्हें आर्द्रताग्राही नाभिक कहते हैं। [State PSC]
संघनन के रूप (Forms of Condensation):
| रूप | निर्माण प्रक्रिया | अवस्थिति |
| ओस (Dew) | जब ठंडी सतह (जैसे घास, पत्तियाँ) का तापमान ओसांक से नीचे चला जाता है, तो हवा में मौजूद नमी उस पर जल की बूंदों के रूप में जमा हो जाती है। | धरातल की सतहों पर |
| पाला या तुषार (Frost) | जब ओसांक बिंदु हिमांक (0°C) से नीचे होता है, तो नमी सीधे बर्फ के कणों (Ice crystals) में बदल जाती है। | धरातल की सतहों पर |
| कोहरा (Fog) और कुहासा (Mist) | जब सतह के निकट वायु की एक मोटी परत का तापमान ओसांक से नीचे चला जाता है, तो हवा में मौजूद जलवाष्प छोटे-छोटे जल कणों के रूप में संघनित होकर हवा में तैरने लगती है। कोहरे में दृश्यता 1 किमी से कम होती है, जबकि कुहासे में अधिक। | धरातल के निकट वायु में |
| बादल (Clouds) | जब हवा ऊपर उठती है और ठंडी होती है (एडियाबैटिक कूलिंग), तो पर्याप्त ऊँचाई पर संघनन से बने जल कणों या हिम कणों के समूह को बादल कहते हैं। | वायुमंडल की ऊँचाई पर |
3. वर्षण (Precipitation)
परिभाषा:
जब संघनन से बनी जल की बूंदें या हिम कण इतने भारी हो जाते हैं कि हवा उन्हें और रोक कर नहीं रख सकती, तो वे गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के कारण पृथ्वी की सतह पर गिरने लगते हैं। इसी प्रक्रिया को वर्षण (Precipitation) कहते हैं।
वर्षण के रूप (Forms of Precipitation):
- वर्षा (Rainfall): जब वर्षण जल की बूंदों के रूप में होता है।
- हिमपात (Snowfall): जब तापमान हिमांक (0°C) से कम होता है, तो वर्षण बर्फ के कणों (Snowflakes) के रूप में होता है।
- सहवृष्टि या स्लीट (Sleet): जब वर्षा की बूंदें ठंडी हवा की परत से गुजरते हुए जम जाती हैं और छोटी बर्फीली गोलियों के रूप में गिरती हैं।
- ओलावृष्टि (Hail): यह कपासी-वर्षी मेघों (Cumulonimbus clouds) में तीव्र ऊर्ध्वाधर संवहन के कारण बनती है। इसमें बर्फ की कई परतें जम जाती हैं, जिससे यह कठोर ओलों का रूप ले लेती है।
वर्षा के प्रकार (Types of Rainfall)
वर्षण का सबसे आम रूप वर्षा है। हवा के ऊपर उठने और ठंडे होने के तरीके के आधार पर वर्षा को तीन मुख्य प्रकारों में बांटा गया है:
- 1. संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall):
- प्रक्रिया: जब धरातल अत्यधिक गर्म हो जाता है, तो उसके संपर्क में आने वाली हवा गर्म होकर हल्की हो जाती है और एक संवहन धारा (Convection current) के रूप में तेजी से ऊपर उठती है। ऊपर जाकर यह ठंडी होती है, जिससे कपासी-वर्षी मेघ (Cumulonimbus clouds) का निर्माण होता है और फिर गरज-चमक के साथ मूसलाधार वर्षा होती है।
- विशेषताएँ: यह वर्षा अक्सर दोपहर बाद होती है, कम समय के लिए लेकिन तीव्र होती है, और छोटे क्षेत्र को प्रभावित करती है।
- ⋆ क्षेत्र: यह भूमध्यरेखीय क्षेत्रों (Equatorial regions) और महाद्वीपों के भीतरी भागों में गर्मियों के दौरान आम है। [UPSC/BPSC]
- 2. पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall)
- प्रक्रिया: जब नमी से भरी हवा किसी पर्वत या ऊँचे पठार से टकराती है, तो उसे ऊपर चढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ऊपर उठने पर यह हवा ठंडी होती है और संतृप्त होकर वर्षा करती है।
- विशेषताएँ:
- पर्वत के जिस ढाल पर वर्षा होती है, उसे पवनमुखी ढाल (Windward side) कहते हैं।
- जब हवा पर्वत के दूसरी ओर उतरती है, तो वह गर्म और शुष्क हो जाती है, इसलिए वहाँ वर्षा नहीं होती। इस क्षेत्र को वृष्टि-छाया प्रदेश (Rain-shadow Area) कहते हैं।
- ⋆ क्षेत्र: विश्व में अधिकांश वर्षा इसी प्रकार की होती है। भारत में पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढलान और हिमालय इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। [UPSC Mains, State PSC]
- 3. चक्रवातीय या वाताग्री वर्षा (Cyclonic or Frontal Rainfall):
- प्रक्रिया: यह वर्षा चक्रवातों के केंद्र में या वाताग्रों (Fronts) के सहारे होती है, जहाँ दो भिन्न तापमान और घनत्व वाली वायुराशियाँ (एक गर्म, एक ठंडी) मिलती हैं। जब गर्म और हल्की हवा, ठंडी और भारी हवा के ऊपर चढ़ती है, तो वह ठंडी होकर वर्षा करती है।
- विशेषताएँ: यह वर्षा लंबे समय तक धीमी गति से होती है और विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करती है।
- क्षेत्र: यह शीतोष्ण कटिबंध (Temperate regions) में आम है, जहाँ वाताग्रों का निर्माण होता है, और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के साथ भी होती है।
चक्रवात और प्रतिचक्रवात (Cyclones and Anticyclones)
चक्रवात और प्रतिचक्रवात वृहत पैमाने की वायुमंडलीय परिसंचरण प्रणालियाँ हैं जो वायुदाब के अंतर के कारण उत्पन्न होती हैं। ये किसी क्षेत्र के मौसम को नाटकीय रूप से प्रभावित करते हैं।
I. चक्रवात (Cyclones)
परिभाषा:
चक्रवात निम्न वायुदाब (Low Pressure) का एक ऐसा तंत्र होता है जिसके केंद्र में निम्न दाब और बाहर की ओर उच्च दाब होता है। इस कारण, पवनें परिधि से केंद्र की ओर प्रवाहित होती हैं। कोरिओलिस बल के प्रभाव के कारण, इन पवनों का परिसंचरण (Circulation) बंद और चक्राकार होता है:
- उत्तरी गोलार्ध: घड़ी की सुइयों के विपरीत (Anti-clockwise)
- दक्षिणी गोलार्ध: घड़ी की सुइयों की दिशा में (Clockwise)
- [UPSC/State PSC Prelims – Multiple Times]
चक्रवात अक्सर खराब, तूफानी और आर्द्र मौसम से जुड़े होते हैं क्योंकि केंद्र में हवाएँ अभिसरित (converge) होकर ऊपर उठती हैं, ठंडी होती हैं, और बादलों तथा वर्षा का निर्माण करती हैं।
उत्पत्ति के क्षेत्र के आधार पर चक्रवात दो मुख्य प्रकार के होते हैं:
A. उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)
- उत्पत्ति क्षेत्र: ये कर्क और मकर रेखाओं के बीच उष्णकटिबंधीय महासागरों पर उत्पन्न होते हैं।
- उत्पत्ति के लिए आवश्यक दशाएँ:
- विशाल और गर्म समुद्री सतह: समुद्र की सतह का तापमान 27°C से अधिक होना चाहिए।
- पर्याप्त कोरिओलिस बल: चक्रवाती परिसंचरण के लिए यह बल आवश्यक है। इसी कारण ये भूमध्य रेखा (Equator) पर (0°-5° अक्षांशों के बीच) नहीं बनते हैं। [UPSC 2021]
- ऊर्ध्वाधर पवन की गति में कम अंतर।
- पहले से मौजूद कमजोर निम्न दाब का क्षेत्र।
- ऊर्जा का स्रोत:
- ⋆ इनकी ऊर्जा का मुख्य स्रोत संघनन की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Condensation) है, जो गर्म समुद्र से वाष्पीकृत हुई जलवाष्प के संघनित होकर बादल बनने के दौरान मुक्त होती है।
- विशेषताएँ:
- आकार: ये शीतोष्ण चक्रवातों से छोटे होते हैं (व्यास 80-300 किमी)।
- चक्षु (Eye of the Cyclone): ⋆ चक्रवात के केंद्र में एक शांत, मेघ-रहित और निम्न दाब वाला क्षेत्र होता है, जिसे चक्षु (आँख) कहते हैं। यह उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की एक विशिष्ट पहचान है। [UPSC Prelims]
- दाब प्रवणता: दाब प्रवणता बहुत तीव्र होती है, जिससे पवन की गति अत्यंत विनाशकारी (120-250 किमी/घंटा या अधिक) होती है।
- वर्षा: मूसलाधार और तीव्र वर्षा होती है, जो अक्सर चक्रवात की आँख की दीवार (Eyewall) के आसपास केंद्रित होती है।
- स्थल पर प्रभाव: स्थल पर पहुँचते ही नमी की आपूर्ति बंद हो जाती है और घर्षण बढ़ जाता है, जिससे ये कमजोर पड़कर समाप्त हो जाते हैं।
- गति: ये पूर्व से पश्चिम (व्यापारिक पवनों के प्रभाव में) की ओर चलते हैं।
- विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय नाम:
| नाम | क्षेत्र/देश |
| हरीकेन (Hurricane) | अटलांटिक महासागर (कैरेबियन सागर, मैक्सिको की खाड़ी), पूर्वी प्रशांत |
| टाइफून (Typhoon) | पश्चिमी प्रशांत महासागर (चीन सागर, जापान, फिलीपींस) |
| चक्रवात (Cyclone) | हिंद महासागर (बंगाल की खाड़ी, अरब सागर), ऑस्ट्रेलिया (उत्तरी) |
| विली-विली (Willy-Willy) | ऑस्ट्रेलिया (पश्चिमी) |
B. शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात या बहि-उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Temperate or Extra-Tropical Cyclones)
- उत्पत्ति क्षेत्र: ये मध्य और उच्च अक्षांशों (35°-65° उत्तर और दक्षिण) में उत्पन्न होते हैं।
- ऊर्जा का स्रोत और उत्पत्ति:
- ⋆ इनका निर्माण वाताग्रों (Fronts) के सहारे होता है, जब दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियाँ – एक ठंडी और शुष्क (ध्रुवीय) तथा दूसरी गर्म और आर्द्र (उष्णकटिबंधीय) – आपस में मिलती हैं। इस प्रक्रिया को वाताग्र जनन (Frontogenesis) कहते हैं। इनकी ऊर्जा इन वायुराशियों के घनत्व और तापमान के अंतर में निहित होती है। [UPSC Mains]
- विशेषताएँ:
- आकार: ये उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की तुलना में बहुत बड़े होते हैं, जिनका व्यास 2000 किमी तक हो सकता है।
- चक्षु (Eye): इनमें आँख (चक्षु) नहीं होती है।
- दाब प्रवणता: दाब प्रवणता कम तीव्र होती है, इसलिए पवन की गति भी कम विनाशकारी होती है।
- वर्षा: वर्षा हल्की से मध्यम लेकिन लंबे समय तक होती है और यह एक विस्तृत क्षेत्र को प्रभावित करती है।
- जीवन चक्र: इनका एक स्पष्ट जीवन चक्र होता है (उत्पत्ति, परिपक्व अवस्था, और अवसान – Occlusion)।
- गति: ये पश्चिम से पूर्व (पछुआ पवनों के प्रभाव में) की ओर चलते हैं।
- भारत में प्रभाव: सर्दियों में भूमध्य सागर से उत्पन्न होकर पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) के रूप में भारत में पहुँचते हैं और उत्तर-पश्चिमी भारत में शीतकालीन वर्षा और हिमपात करते हैं। [UPPSC]
II. प्रतिचक्रवात (Anticyclones)
परिभाषा:
प्रतिचक्रवात उच्च वायुदाब (High Pressure) का एक ऐसा तंत्र होता है जिसके केंद्र में उच्च दाब और बाहर की ओर निम्न दाब होता है।
- पवनों का परिसंचरण: हवा केंद्र से बाहर (परिधि) की ओर बहती है और कोरिओलिस बल के कारण इसका परिसंचरण चक्रवात के ठीक विपरीत होता है:
- उत्तरी गोलार्ध: घड़ी की सुइयों की दिशा में (Clockwise)
- दक्षिणी गोलार्ध: घड़ी की सुइयों के विपरीत (Anti-clockwise)
- मौसम पर प्रभाव:
- ⋆ प्रतिचक्रवात में हवा केंद्र में ऊपर से नीचे की ओर उतरती (Subsidence) है।
- नीचे उतरती हुई हवा गर्म और शुष्क हो जाती है, जिससे बादलों का निर्माण रुक जाता है।
- इसलिए, प्रतिचक्रवात साफ, शांत और शुष्क मौसम (Fair and Calm Weather) का सूचक होता है। ये चक्रवातों की तरह विनाशकारी नहीं होते।
- उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटियों में स्थायी प्रतिचक्रवातीय दशाएँ ही मरुस्थलों के निर्माण के लिए उत्तरदायी हैं।
चक्रवात और प्रतिचक्रवात का तुलनात्मक सारांश
| विशेषता | चक्रवात (Cyclone) | प्रतिचक्रवात (Anticyclone) |
| केंद्र में दाब | निम्न (Low) | उच्च (High) |
| हवा का प्रवाह | परिधि से केंद्र की ओर (अभिसरण) | केंद्र से परिधि की ओर (अपसरण) |
| परिसंचरण (उत्तरी गोलार्ध) | घड़ी के विपरीत (Anti-clockwise) | घड़ी की दिशा में (Clockwise) |
| ऊर्ध्वाधर गति | हवा ऊपर उठती है | हवा नीचे उतरती है |
| संबंधित मौसम | अस्थिर, तूफानी, वर्षा वाला | स्थिर, साफ, शांत |
| आकार | छोटा (उष्णकटिबंधीय) से बड़ा (शीतोष्ण) | आमतौर पर बहुत बड़े |
चक्रवातों का नामकरण (Naming of Cyclones)
नामकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी?
चक्रवातों का नामकरण करने के कई उद्देश्य हैं:
- स्पष्ट पहचान: एक ही समय में एक से अधिक चक्रवात सक्रिय हो सकते हैं। नाम रखने से प्रत्येक को एक विशिष्ट पहचान मिलती है, जिससे भ्रम की स्थिति नहीं रहती।
- आसान संचार: वैज्ञानिक समुदाय, आपदा प्रबंधन टीमों, मीडिया और आम जनता के बीच संवाद करना आसान हो जाता है। तकनीकी नामों की तुलना में छोटे और सरल नाम याद रखने में आसान होते हैं।
- जागरूकता बढ़ाना: एक विशिष्ट नाम चक्रवात के प्रति गंभीरता और जागरूकता को बढ़ाता है, जिससे चेतावनियों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रसारित किया जा सकता है।
नामकरण की प्रक्रिया
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization – WMO) और संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (United Nations Economic and Social Commission) इस प्रक्रिया का समन्वय करते हैं। विश्व भर में चक्रवातों के नामकरण के लिए विभिन्न क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र (Regional Specialised Meteorological Centres – RSMCs) और उष्णकटिबंधीय चक्रवात चेतावनी केंद्र (TCWCs) जिम्मेदार हैं।
- हिंद महासागर क्षेत्र (बंगाल की खाड़ी और अरब सागर):
- ⋆ इस क्षेत्र में चक्रवातों का नामकरण RSMC, नई दिल्ली (भारत मौसम विज्ञान विभाग – IMD) द्वारा किया जाता है।
- 2004 में, WMO के नेतृत्व में 8 सदस्य देशों (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, श्रीलंका, थाईलैंड) के एक समूह ने नामों की एक सूची तैयार की। प्रत्येक देश ने 8 नाम दिए, जिससे कुल 64 नामों की सूची बनी।
- नई सूची (2020): 2018 में 5 और देश (ईरान, कतर, सऊदी अरब, UAE, यमन) इस समूह में शामिल हुए। अब कुल 13 सदस्य देश हैं। 2020 में, इन 13 देशों द्वारा दिए गए 13-13 नामों से मिलकर 169 नामों की एक नई सूची जारी की गई।
- नियम:
- नामों का चयन देशों द्वारा बारी-बारी से वर्णानुक्रम (Alphabetical Order) में किया जाता है।
- एक बार उपयोग किए गए नाम को दोबारा उपयोग नहीं किया जाता।
- यदि कोई चक्रवात बहुत अधिक विनाशकारी होता है, तो उसके नाम को सेवानिवृत्त (Retired) कर दिया जाता है (जैसे, अटलांटिक में कैटरीना, सैंडी)।
हाल के और महत्वपूर्ण चक्रवातों के नाम (Names of Recent and Important Cyclones)
यह सूची भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित करने वाले चक्रवातों पर केंद्रित है।
| चक्रवात का नाम | वर्ष | प्रभावित क्षेत्र | नामकरण करने वाला देश | नाम का अर्थ (यदि उपलब्ध है) |
| रेमल (Remal) | 2024 | पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश | ओमान | रेत |
| मिचौंग (Michaung) | 2023 | आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु | म्यांमार | ताकत, लचीलापन |
| मिधिली (Midhili) | 2023 | बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल | मालदीव | एक विशाल वृक्ष |
| हामून (Hamoon) | 2023 | बांग्लादेश | ईरान | एक रेगिस्तानी झील |
| तेज (Tej) | 2023 | यमन, ओमान (अरब सागर) | भारत | गति |
| बिपारजॉय (Biparjoy) | 2023 | गुजरात (भारत), पाकिस्तान (अरब सागर) | बांग्लादेश | आपदा, विपत्ति |
| मोचा (Mocha) | 2023 | म्यांमार, बांग्लादेश | यमन | यमन का एक प्रसिद्ध कॉफी उत्पादक शहर |
| मैंडूस (Mandous) | 2022 | तमिलनाडु | UAE | खजाने का पिटारा |
| सितरंग (Sitrang) | 2022 | बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल | थाईलैंड | (एक वियतनामी उपनाम) |
| असानी (Asani) | 2022 | आंध्र प्रदेश, ओडिशा तट | श्रीलंका | क्रोध (सिंहली भाषा में) |
| जवाद (Jawad) | 2021 | ओडिशा तट | सऊदी अरब | उदार, दयालु |
| गुलाब (Gulab) | 2021 | ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र | पाकिस्तान | एक फूल |
| यास (Yaas) | 2021 | ओडिशा, पश्चिम बंगाल | ओमान | निराशा (फारसी में जैस्मिन जैसा फूल) |
| तौकते (Tauktae) | 2021 | गुजरात, महाराष्ट्र (अरब सागर) | म्यांमार | एक शोर करने वाली छिपकली (गेको) |
| निसर्ग (Nisarga) | 2020 | महाराष्ट्र | बांग्लादेश | प्रकृति |
| अम्फान (Amphan) | 2020 | पश्चिम बंगाल, ओडिशा | थाईलैंड | आकाश |
अटलांटिक महासागर क्षेत्र के कुछ प्रसिद्ध विनाशकारी चक्रवात (हरीकेन):
- कैटरीना (Katrina) – 2005, USA
- सैंडी (Sandy) – 2012, USA
- इरमा (Irma) – 2017, कैरेबियन और USA
- हार्वे (Harvey) – 2017, USA
- इयान (Ian) – 2022, क्यूबा और USA
यह तालिका आपको करेंट अफेयर्स और भूगोल से संबंधित प्रश्नों के लिए तैयार करने में मदद करेगी। याद रखें कि हर साल आने वाले नए चक्रवातों के नाम और उनके नामकरणकर्ता देशों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण है।
उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के क्षेत्रीय नाम
| स्थानीय नाम (Local Name) | संबंधित महासागर/समुद्र/क्षेत्र | प्रभावित होने वाले प्रमुख देश |
| हरीकेन (Hurricane) | ⋆ उत्तरी अटलांटिक महासागर<br>⋆ कैरेबियन सागर<br>⋆ मैक्सिको की खाड़ी<br>⋆ पूर्वी उत्तरी प्रशांत महासागर | USA, मेक्सिको, क्यूबा, जमैका, मध्य अमेरिका के देश |
| टाइफून (Typhoon) | ⋆ पश्चिमी उत्तरी प्रशांत महासागर<br>⋆ चीन सागर (दक्षिण और पूर्व) | चीन, जापान, फिलीपींस, ताइवान, वियतनाम, कोरिया |
| चक्रवात (Cyclone) | ⋆ हिंद महासागर<br> – बंगाल की खाड़ी<br> – अरब सागर<br>⋆ दक्षिणी प्रशांत महासागर | भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, ओमान, यमन<br>ऑस्ट्रेलिया (उत्तरी और पूर्वी), फिजी, टोंगा |
| विली-विली (Willy-Willy) | ⋆ तिमोर सागर और ऑस्ट्रेलिया का उत्तर-पश्चिमी तट | ऑस्ट्रेलिया (विशेषकर पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया) |
| बागियो (Baguio) | – | फिलीपींस (टाइफून का एक और स्थानीय नाम) |
| टायफू (Taifu) | – | जापान (टाइफून का जापानी उच्चारण) |
याद रखने के लिए मुख्य बिंदु:
- अटलांटिक (USA/कैरेबियन) में: हरीकेन
- पश्चिमी प्रशांत (चीन/जापान) में: टाइफून
- हिंद महासागर (भारत/बांग्लादेश) में: चक्रवात
- ऑस्ट्रेलिया में: विली-विली
यह सब एक ही मौसमी परिघटना के अलग-अलग क्षेत्रीय नाम हैं। उनकी संरचना और उत्पत्ति की प्रक्रिया मूल रूप से समान होती है।
बादल/मेघ (Clouds)
परिभाषा:
बादल वायुमंडल में पर्याप्त ऊँचाई पर जलवाष्प के संघनन (Condensation) के परिणामस्वरूप बने जल की अत्यंत सूक्ष्म बूंदों (Water Droplets) या बर्फ के महीन कणों (Ice Crystals) का एक दृश्यमान (Visible) समूह होता है। बादल संघनन के सबसे महत्वपूर्ण रूपों में से एक हैं और ये पृथ्वी के मौसम, जलवायु और ऊष्मा बजट को गहराई से प्रभावित करते हैं।
बादलों का निर्माण (Formation of Clouds)
बादलों का निर्माण एक विशिष्ट प्रक्रिया के तहत होता है जिसके लिए कुछ आवश्यक दशाएँ होती हैं:
- वायु का ऊपर उठना और ठंडा होना (Lifting and Cooling of Air):
- जब हवा ऊपर की ओर उठती है, तो वायुदाब कम होने के कारण वह फैलती है। इस फैलाव की प्रक्रिया में, हवा अपनी आंतरिक ऊर्जा का उपयोग करती है और ठंडी हो जाती है। इस प्रक्रिया को “रुद्धोष्म शीतलन” (Adiabatic Cooling) कहते हैं।
- हवा कई कारणों से ऊपर उठ सकती है: संवहन (सतह का गर्म होना), पर्वतों से टकराकर (पर्वतीय), या वाताग्रों (Fronts) के सहारे।
- संतृप्ति और ओसांक (Saturation and Dew Point):
- जैसे-जैसे हवा रुद्धोष्म प्रक्रिया से ठंडी होती है, उसकी सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) बढ़ती जाती है।
- जब हवा ठंडी होकर अपने ओसांक बिंदु (Dew Point) पर पहुँच जाती है, तो उसकी सापेक्षिक आर्द्रता 100% हो जाती है और वह संतृप्त (Saturated) हो जाती है।
- संघनन (Condensation):
- संतृप्त होने के बाद, जलवाष्प को संघनित होकर जल की बूंदों में बदलने के लिए एक ठोस सतह की आवश्यकता होती है। वायुमंडल में मौजूद धूलकण, नमक और धुएँ के कण, जिन्हें आर्द्रताग्राही नाभिक (Hygroscopic Nuclei) कहते हैं, यह आधार प्रदान करते हैं।
- जलवाष्प इन्हीं नाभिकों के चारों ओर जमा होकर जल की सूक्ष्म बूंदों या हिम कणों का निर्माण करती है, जिनके विशाल समूह को हम बादल के रूप में देखते हैं।
बादलों का वर्गीकरण (Classification of Clouds)
बादलों का वर्गीकरण मुख्य रूप से उनकी ऊँचाई (Altitude), स्वरूप (Appearance – आकार) और पारदर्शिता (Transparency) के आधार पर किया जाता है।
I. ऊँचाई के आधार पर वर्गीकरण (Based on Altitude)
I. उच्च मेघ (High Clouds)
(ऊँचाई: 6,000 – 12,000 मीटर / 20,000 – 40,000 फीट)
ये बादल पूरी तरह से बर्फ के सूक्ष्म कणों (Ice Crystals) से बने होते हैं। ये पतले, सफेद होते हैं और वर्षा नहीं करते।
1. पक्षाभ मेघ (Cirrus – Ci)
- विवरण: ये पतले, कोमल, सफेद और रेशेदार बादल होते हैं, जो आकाश में पंखों या बालों के गुच्छों की तरह बिखरे हुए दिखाई देते हैं। तेज हवाओं के कारण इनकी आकृति अक्सर घोड़े की पूँछ (Mares’ tails) जैसी खिंची हुई दिखती है। आमतौर पर ये साफ मौसम का संकेत देते हैं, लेकिन अगर ये घने होकर फैलने लगें तो मौसम में बदलाव का पूर्व संकेत हो सकते हैं।
2. पक्षाभ-स्तरी मेघ (Cirrostratus – Cs)
- विवरण: ये दूधिया रंग के, पतले और लगभग पारदर्शी चादर जैसे बादल होते हैं जो आकाश के एक बड़े हिस्से में फैल जाते हैं। इनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि ये सूर्य और चंद्रमा के चारों ओर एक प्रभामंडल (Halo) का निर्माण करते हैं। यह प्रभामंडल बर्फ के क्रिस्टलों द्वारा प्रकाश के अपवर्तन के कारण बनता है। इनकी उपस्थिति अक्सर 24 घंटे के भीतर वर्षा या तूफान आने का संकेत होती है। [UPSC/State PSC]
3. पक्षाभ-कपासी मेघ (Cirrocumulus – Cc)
- विवरण: ये सफेद रंग के छोटे-छोटे गोल बादलों के समूह होते हैं, जो लहरों या जालियों के रूप में व्यवस्थित दिखाई देते हैं। इनकी बनावट के कारण आकाश को “मैकेरल स्काई” (Mackerel Sky) कहा जाता है। ये बादल कम ही दिखाई देते हैं और अस्थिर वायुमंडलीय दशाओं का संकेत हो सकते हैं।
II. मध्य मेघ (Middle Clouds)
(ऊँचाई: 2,000 – 6,000 मीटर / 6,500 – 20,000 फीट)
ये बादल मुख्य रूप से जल की बूंदों से बने होते हैं, लेकिन ठंडे तापमान में इनमें बर्फ के कण भी हो सकते हैं। এদের নামের সাথে উপসর্গ
4. उच्च-स्तरी मेघ (Altostratus – As)
- विवरण: ये नीले या भूरे रंग की एक समान चादर वाले बादल होते हैं जो आकाश के बड़े हिस्से को ढक लेते हैं। ये इतने मोटे हो सकते हैं कि सूर्य या चंद्रमा इनके पीछे से एक धुंधले धब्बे या पाले से ढके कांच के पीछे से चमकती रोशनी की तरह दिखाई देते हैं। इनसे हल्की-फुल्की वर्षा या हिमपात हो सकता है।
5. उच्च-कपासी मेघ (Altocumulus – Ac)
- विवरण: ये सफेद या भूरे रंग के परतदार बादल होते हैं, जो छोटे-छोटे गोलों, पट्टियों या लहरों के रूप में व्यवस्थित होते हैं। ये अक्सर “भेड़ की ऊन” जैसे दिखते हैं। यदि सुबह के समय ऐसे बादल दिखाई दें, तो दोपहर तक गरज के साथ बारिश की संभावना हो सकती है।
III. निम्न मेघ (Low Clouds)
(ऊँचाई: धरातल से 2,000 मीटर / 6,500 फीट तक)
ये बादल मुख्य रूप से जल की बूंदों से बने होते हैं और धरातल के काफी निकट होते हैं।
6. स्तरी मेघ (Stratus – St)
- विवरण: ये भूरे या धूसर रंग के, धुंध या कोहरे जैसी एक समान परत वाले बादल होते हैं। ये अक्सर पूरे आकाश को एक बेरंग चादर की तरह ढक लेते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में ये कोहरे के रूप में दिखाई देते हैं। इनसे बहुत हल्की बूंदाबाँदी (Drizzle) या हल्का हिमपात हो सकता है।
7. स्तरी-कपासी मेघ (Stratocumulus – Sc)
- विवरण: ये भूरे या सफेद रंग के बादल होते हैं जो एक परत में व्यवस्थित होते हैं लेकिन इनमें गोलाकार या लुढ़के हुए रूप भी दिखाई देते हैं। ये अक्सर समूहों या पंक्तियों में दिखते हैं जिनके बीच नीला आकाश दिखाई दे सकता है। इनसे आमतौर पर वर्षा नहीं होती।
8. वर्षा-स्तरी मेघ (Nimbostratus – Ns)
- विवरण: “निंबस” शब्द का अर्थ है ‘वर्षा’। ये गहरे भूरे या काले रंग के, मोटे, घने और आकारहीन बादल होते हैं जो सूर्य को पूरी तरह से ढक लेते हैं। ⋆ इनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि इनसे लंबे समय तक लगातार और मध्यम से हल्की वर्षा या हिमपात होता है। ये बादल साफ मौसम के बाद आने वाले बदलाव और व्यापक वर्षा का संकेत हैं। [UPPSC]
IV. ऊर्ध्वाधर विकास वाले मेघ (Clouds with Vertical Development)
ये बादल नीचे से लेकर बहुत ऊँचाई तक (क्षोभमंडल की ऊपरी सीमा तक) फैले हो सकते हैं। इनका निर्माण तीव्र संवहन धाराओं से होता है।
9. कपासी मेघ (Cumulus – Cu)
- विवरण: ये रुई के फूले हुए ढेरों की तरह दिखने वाले, चमकदार सफेद और घने बादल होते हैं जिनका आधार समतल (flat) होता है। ये आमतौर पर साफ और धूप वाले दिनों में बनते हैं और इन्हें “सुंदर मौसम का बादल” (Fair weather cloud) कहा जाता है। इनसे आमतौर पर वर्षा नहीं होती, लेकिन अगर ये ऊर्ध्वाधर रूप से अधिक विकसित हो जाएँ तो वर्षा कर सकते हैं।
10. कपासी-वर्षी मेघ (Cumulonimbus – Cb)
- विवरण: ये बादलों के “राजा” माने जाते हैं। ये बहुत विशाल, घने और ऊँचे बादल होते हैं जो निम्न स्तर से लेकर 12,000 मीटर या उससे भी अधिक ऊँचाई तक फैल सकते हैं। इनका ऊपरी हिस्सा फैलकर एक निहाई या छतरी (Anvil Shape) का आकार ले लेता है।
- महत्व: ⋆ ये बादल चरम मौसमी घटनाओं (Extreme Weather) से जुड़े हैं, जैसे:
- मूसलाधार वर्षा (Heavy Rainfall)
- तड़ित झंझा (Thunderstorm) – बिजली का चमकना और गरजना
- ओलावृष्टि (Hailstorm)
- तीव्र पवनें और बवंडर (Tornadoes)
- PYQ Link: यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि किस बादल से ओलावृष्टि और तड़ित झंझा जैसी घटनाएँ होती हैं। [UPSC/State PSC]
बादलों का महत्व (Importance of Clouds)
- वर्षण का स्रोत: बादल ही पृथ्वी पर वर्षा और हिमपात का एकमात्र स्रोत हैं, जो जल चक्र और मीठे पानी की आपूर्ति के लिए अनिवार्य हैं।
- ऊष्मा बजट और एल्बिडो:
- बादल सूर्य की लघु तरंग विकिरण को परावर्तित करके पृथ्वी को ठंडा रखने में मदद करते हैं (उच्च एल्बिडो)।
- वे पृथ्वी से निकलने वाली दीर्घ तरंग विकिरण को सोखकर और वापस सतह की ओर उत्सर्जित करके उसे गर्म भी रखते हैं (ग्रीनहाउस प्रभाव)। बादलों से ढकी रातें साफ रातों की तुलना में गर्म होती हैं।
- ऊर्जा का स्थानांतरण: वे संघनन की प्रक्रिया के दौरान गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) को मुक्त करके वायुमंडल में ऊर्जा का पुनर्वितरण करते हैं।
- मौसम पूर्वानुमान: विभिन्न प्रकार के बादलों का अवलोकन मौसम में आने वाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाने में मदद करता है।
बादलों का वर्गीकरण: एक त्वरित सारांश तालिका
| ऊँचाई | बादल का प्रकार (संक्षिप्त नाम) | मुख्य पहचान | संबंधित मौसम और वर्षण |
| उच्च मेघ (High)<br>(> 6,000 मीटर)<br>(बर्फ के कणों से निर्मित) | पक्षाभ (Cirrus – Ci) | पतला, सफेद, रेशेदार, पंख जैसा | आमतौर पर साफ मौसम। |
| पक्षाभ-स्तरी (Cirrostratus – Cs) | दूधिया चादर, सूर्य/चंद्रमा के चारों ओर प्रभामंडल (Halo) | ⋆ तूफान आने का अग्रिम संकेत। | |
| पक्षाभ-कपासी (Cirrocumulus – Cc) | छोटी सफेद लहरें, “मैकेरल स्काई” | मौसम में बदलाव का संकेत। | |
| मध्य मेघ (Middle)<br>(2,000 – 6,000 मी) | उच्च-स्तरी (Altostratus – As) | धूसर/नीली चादर, सूर्य धुंधला दिखता है | हल्की वर्षा या हिमपात संभव। |
| उच्च-कपासी (Altocumulus – Ac) | सफेद/भूरे पैच, “भेड़ की ऊन” जैसे | बाद में गरज-चमक हो सकती है। | |
| निम्न मेघ (Low)<br>(< 2,000 मीटर) | स्तरी (Stratus – St) | धुंध जैसी भूरी परत, नीरस आकाश | हल्की बूंदाबाँदी (Drizzle) या फुहार। |
| स्तरी-कपासी (Stratocumulus – Sc) | लहरदार, गोलाकार समूह | आमतौर पर वर्षण नहीं। | |
| वर्षा-स्तरी (Nimbostratus – Ns) | गहरी, मोटी, आकारहीन परत | ⋆ लगातार, लंबे समय तक हल्की से मध्यम वर्षा या हिमपात। | |
| ऊर्ध्वाधर विकास (Vertical)<br>(सभी ऊँचाइयों पर) | कपासी (Cumulus – Cu) | रुई का ढेर, फूला हुआ, चपटा आधार | आमतौर पर साफ मौसम (Fair Weather)। |
| कपासी-वर्षी (Cumulonimbus – Cb) | विशाल, ऊँचा टॉवर, निहाई (Anvil) जैसा शीर्ष | ⋆ तड़ित-झंझा, मूसलाधार वर्षा, ओलावृष्टि, बवंडर। (चरम मौसम) |
परीक्षा के लिए शीर्ष 5 तथ्य:
- प्रभामंडल (Halo): पक्षाभ-स्तरी (Cirrostratus) बादलों की पहचान है।
- लगातार वर्षा: वर्षा-स्तरी (Nimbostratus) बादलों से होती है।
- तड़ित-झंझा और ओलावृष्टि: कपासी-वर्षी (Cumulonimbus) बादलों से संबंधित हैं।
- साफ मौसम का बादल: आमतौर पर कपासी (Cumulus) बादल।
- मैकेरल स्काई: पक्षाभ-कपासी (Cirrocumulus) बादलों से बनता है।
मेघ गर्जन और तड़ित झंझा (Thunder and Thunderstorm)
मेघ गर्जन (Thunder) और उससे जुड़ी परिघटना तड़ित झंझा (Thunderstorm), वायुमंडल में होने वाली सबसे प्रभावशाली और शक्तिशाली मौसमी घटनाओं में से एक है। ये दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई हैं और इनका निर्माण कपासी-वर्षी मेघों (Cumulonimbus Clouds) के भीतर होता है।
1. तड़ित झंझा (Thunderstorm): निर्माण प्रक्रिया
तड़ित झंझा एक ऐसा तूफान है जिसमें बिजली का चमकना (Lightning) और बादलों का गरजना (Thunder) दोनों शामिल होते हैं। यह तीव्र ऊर्ध्वाधर (Vertical) वायु गतियों का परिणाम है।
निर्माण के लिए आवश्यक दशाएँ:
- गर्म और अत्यधिक आर्द्र हवा: सतह पर गर्म और नमी से भरी हवा की उपस्थिति, जो अस्थिरता (Instability) पैदा करती है।
- तीव्र संवहन (Strong Convection): किसी भी कारक (जैसे तीव्र सौर तापन, पर्वतीय ढलान, या वाताग्र) द्वारा इस गर्म, नम हवा का तेजी से ऊपर की ओर उठना।
- वायुमंडलीय अस्थिरता: क्षोभमंडल में ऐसी स्थिति जहाँ ऊपर की हवा नीचे की हवा की तुलना में ठंडी हो, ताकि ऊपर उठती हवा को लगातार Auftrieb (buoyancy) मिलती रहे।
तड़ित झंझा के विकास के चरण (Stages of Thunderstorm Development):
- चरण 1: कपासी अवस्था (Cumulus Stage):
- गर्म और नम हवा (Updraft) का एक तीव्र स्तंभ ऊपर की ओर उठना शुरू करता है।
- जैसे-जैसे हवा ऊपर उठती है, वह ठंडी होती है और संघनित होकर कपासी मेघ (Cumulus Cloud) का निर्माण करती है, जो ऊर्ध्वाधर रूप से बढ़ने लगता है। इस चरण में केवल ऊपर की ओर पवन प्रवाह (Updraft) होता है।
- चरण 2: परिपक्व अवस्था (Mature Stage):
- बादल क्षोभसीमा (Tropopause) तक पहुँच जाता है और ऊपर की ओर फैलकर निहाई या छतरी (Anvil Shape) का आकार ले लेता है।
- इस चरण में, वर्षा की बूंदें और बर्फ के क्रिस्टल इतने भारी हो जाते हैं कि वे नीचे की ओर गिरने लगते हैं, जिससे एक अधोप्रवाह (Downdraft) शुरू हो जाता है।
- ⋆ यह सबसे तीव्र और खतरनाक चरण होता है, क्योंकि इसमें ऊर्ध्वप्रवाह (Updraft) और अधोप्रवाह (Downdraft) दोनों एक साथ मौजूद होते हैं।
- इसी चरण में मूसलाधार वर्षा, तीव्र पवनें, ओलावृष्टि (Hail), बिजली का चमकना और बादलों का गरजना होता है। [UPSC/State PSC]
- चरण 3: क्षीण अवस्था (Dissipating Stage):
- ऊर्ध्वप्रवाह (Updraft) कमजोर पड़ जाता है और केवल अधोप्रवाह (Downdraft) ही प्रभावी रहता है, जो बादल में बची हुई नमी को वर्षा के रूप में गिरा देता है।
- धीरे-धीरे तूफान समाप्त हो जाता है और बादल बिखरने लगते हैं।
2. तड़ित (Lightning): बिजली का चमकना
- परिभाषा: तड़ित वायुमंडल में होने वाला एक विशाल विद्युत विसर्जन (Electrical Discharge) है।
- निर्माण प्रक्रिया (Theory of Charge Separation):
- आवेशों का पृथक्करण: कपासी-वर्षी मेघ के भीतर, जल की बूंदों और बर्फ के क्रिस्टलों के बीच तीव्र ऊर्ध्वाधर गति और टकराव के कारण स्थैतिक विद्युत (Static Electricity) उत्पन्न होती है।
- हल्के, सकारात्मक रूप से आवेशित बर्फ के क्रिस्टल (पॉजिटिव चार्ज, +) बादल के ऊपरी हिस्से में जमा हो जाते हैं।
- भारी, नकारात्मक रूप से आवेशित जल की बूंदें और ओले (नेगेटिव चार्ज, -) बादल के निचले हिस्से में जमा हो जाते हैं।
- पृथ्वी की सतह भी बादल के निचले हिस्से के प्रभाव में पॉजिटिव चार्ज प्रेरित कर लेती है।
- विद्युत विसर्जन: जब बादल के इन अलग-अलग आवेशित हिस्सों के बीच या बादल और जमीन के बीच विद्युत आवेश का अंतर (Potential Difference) बहुत अधिक हो जाता है, तो हवा के अवरोध को तोड़ते हुए एक विशाल चिंगारी के रूप में बिजली प्रवाहित होती है।
- तड़ित के प्रकार:
- अंतः-मेघ तड़ित (Intra-cloud Lightning): एक ही बादल के भीतर। (सबसे आम)
- मेघ-मेघ तड़ित (Cloud-to-cloud Lightning): दो बादलों के बीच।
- मेघ-भूमि तड़ित (Cloud-to-ground Lightning): बादल और जमीन के बीच। (सबसे खतरनाक)
3. मेघ गर्जन (Thunder): बादलों का गरजना
- परिभाषा: मेघ गर्जन तड़ित (बिजली) द्वारा उत्पन्न ध्वनि तरंग (Sound Wave) है।
- निर्माण प्रक्रिया:
- अत्यधिक तापन: बिजली की एक चमक अपने आसपास की हवा के चैनल को एक सेकंड के बहुत छोटे से हिस्से में सूर्य की सतह से भी अधिक, लगभग 30,000°C तक गर्म कर देती है।
- अचानक फैलाव: इस अत्यधिक गर्मी के कारण, हवा विस्फोटक रूप से अचानक और तेजी से फैलती है।
- ध्वनि तरंगों का निर्माण: हवा का यह विस्फोटक फैलाव एक शक्तिशाली शॉक वेव (Shock Wave) या ध्वनि तरंग उत्पन्न करता है, जिसे हम गर्जन (Thunder) के रूप में सुनते हैं।
- गड़गड़ाहट (Rumbling Sound): हमें गरज एक बार में न सुनाई देकर गड़गड़ाहट के रूप में इसलिए सुनाई देती है क्योंकि ध्वनि तरंग के विभिन्न हिस्से हम तक अलग-अलग समय पर पहुँचते हैं और वे बादलों तथा जमीन से परावर्तित होते रहते हैं।
लाइटनिंग और थंडर: एक साथ, पर दिखते और सुनते अलग-अलग
- ⋆ बिजली का चमकना और बादलों का गरजना एक ही समय पर होता है।
- लेकिन हमें बिजली पहले दिखाई देती है और गरज बाद में सुनाई देती है।
- कारण:
- प्रकाश की गति (Speed of Light): ~ 300,000 किलोमीटर प्रति सेकंड (लगभग तत्काल)।
- ध्वनि की गति (Speed of Sound): ~ 0.34 किलोमीटर प्रति सेकंड (बहुत धीमी)।
- दूरी का अनुमान: आप तड़ित झंझा की दूरी का अनुमान लगा सकते हैं। बिजली चमकने के बाद गिनना शुरू करें और जब तक गरज सुनाई दे, सेकंड की संख्या को 3 से भाग दें। परिणाम लगभग किलोमीटर में दूरी होगी (या 5 से भाग देने पर मील में)। [General Science Concept]
निष्कर्ष:
मेघ गर्जन और तड़ित झंझा प्रकृति की सबसे ऊर्जावान घटनाओं में से हैं, जो कपासी-वर्षी मेघों की अस्थिरता और शक्तिशाली गतिकी का परिणाम हैं। बिजली चमकना आवेशों के पृथक्करण से उत्पन्न विद्युत विसर्जन है, और उसी बिजली द्वारा हवा के अत्यधिक गर्म होने और विस्फोटक रूप से फैलने से उत्पन्न ध्वनि को मेघ गर्जन कहते हैं।
बादल और वर्षा (Clouds and Precipitation) से संबंधित तथ्य
- रुद्धोष्म शीतलन (Adiabatic Cooling): बादलों के निर्माण का मुख्य कारण ऊपर उठती हवा का बिना बाहरी ऊष्मा के आदान-प्रदान के फैलकर ठंडा होना है।
- वर्षा लाने वाले बादल: जिन बादलों के नाम में “निंबस” (Nimbus) या “निंबो” शब्द जुड़ा हो, वे वर्षा करते हैं (जैसे निंबोस्ट्रेटस, क्यूम्युलोनिम्बस)।
- लगातार और हल्की वर्षा: वर्षा-स्तरी मेघ (Nimbostratus) से लंबे समय तक हल्की से मध्यम वर्षा होती है।
- तड़ित-झंझा और ओलावृष्टि: ⋆ कपासी-वर्षी मेघ (Cumulonimbus) गरज-चमक, मूसलाधार वर्षा, ओलावृष्टि और बवंडर जैसी चरम मौसमी घटनाओं से संबंधित हैं। [UPSC, BPSC, UPPSC]
- सूर्य/चंद्रमा का प्रभामंडल (Halo): यह पक्षाभ-स्तरी मेघों (Cirrostratus) द्वारा बनाया जाता है, जो बर्फ के क्रिस्टलों से बने होते हैं। [State PSC]
- “मैकेरल स्काई”: पक्षाभ-कपासी मेघों (Cirrocumulus) द्वारा बनने वाली लहरदार संरचना।
- साफ मौसम का बादल: आमतौर पर कपासी मेघ (Cumulus) को सुंदर और साफ मौसम का प्रतीक माना जाता है।
- संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall): भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में आम है और अक्सर दोपहर बाद होती है।
- पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall):
- पवनमुखी ढाल (Windward side): भारी वर्षा होती है।
- पवनविमुखी ढाल (Leeward side): वृष्टि-छाया प्रदेश (Rain-shadow Area) कहलाता है, जहाँ बहुत कम वर्षा होती है। (उदाहरण: पश्चिमी घाट का पूर्वी ढलान)।
- मेघ गर्जन का कारण: ⋆ बिजली (तड़ित) द्वारा हवा के अचानक और विस्फोटक रूप से गर्म होकर फैलने से उत्पन्न ध्वनि तरंग।
- बिजली और गरज का समय: बिजली का चमकना और गरज का होना एक ही समय पर होता है, लेकिन प्रकाश की गति ध्वनि से तेज होने के कारण हमें बिजली पहले दिखाई देती है।
- बादलों से ढकी रातें गर्म क्यों होती हैं? बादल पृथ्वी से निकलने वाली दीर्घ तरंग पार्थिव विकिरण (Longwave Terrestrial Radiation) को वापस सतह की ओर परावर्तित कर देते हैं (ग्रीनहाउस प्रभाव), जिससे ऊष्मा फंसी रहती है।
- अम्लीय वर्षा (Acid Rain): वायुमंडल में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) जब वर्षा के जल से क्रिया करते हैं, तो सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड बनाते हैं, जिससे अम्लीय वर्षा होती है।