भू-आकृतियों का विकास:

Page Contents

 अंतर्जनित बल (Evolution of Landforms: Endogenic Forces)

पृथ्वी की सतह लगातार बदल रही है। जिन प्रक्रियाओं के कारण पृथ्वी की सतह पर विभिन्न स्थलाकृतियों (Landforms) का निर्माण, विनाश और पुनर्रचना होती है, उन्हें भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ (Geomorphic Processes) कहते हैं। इन प्रक्रियाओं को ऊर्जा प्रदान करने वाले बलों को उनके स्रोत के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: अंतर्जनित बल और बहिर्जनिक बल

इस अध्याय में हम अंतर्जनित बलों और उनसे निर्मित भू-आकृतियों का अध्ययन करेंगे।

अंतर्जनित बल क्या हैं? (What are Endogenic Forces?)

अंतर्जनित (Endo = अंदर, Genic = उत्पन्न) बल वे बल हैं जो पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होते हैं। इन बलों की ऊर्जा का मुख्य स्रोत पृथ्वी के भीतर मौजूद रेडियोधर्मी पदार्थों का विखंडन (Radioactive Decay), घूर्णन, और पृथ्वी के निर्माण के समय से बची हुई अवशिष्ट ऊष्मा है।

💡 ये बल पृथ्वी की सतह पर विषमताओं (Inequalities) को जन्म देते हैं, अर्थात वे कहीं भूमि को ऊपर उठाते हैं तो कहीं नीचे धँसाते हैं। इसी कारण इन्हें ‘निर्माणकारी बल’ (Constructive Forces) भी कहा जाता है। पर्वत, पठार, घाटियाँ और महाद्वीपों का निर्माण इन्हीं बलों का परिणाम है।

अंतर्जनित बलों को उनकी तीव्रता के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

  1. पटल विरूपणी बल (Diastrophic Forces)
  2. आकस्मिक बल (Sudden Forces)

1. पटल विरूपणी बल (Diastrophic Forces)

डायस्ट्रोफिज्म का अर्थ है ‘विरूपण’। ये बल अत्यंत धीमी गति से कार्य करते हैं और इनका प्रभाव हजारों या लाखों वर्षों में दिखाई देता है। ये बल पृथ्वी की पर्पटी (Crust) को बड़े पैमाने पर मोड़ने, उठाने, झुकाने और तोड़ने (भ्रंशन) के लिए जिम्मेदार हैं।

पटल विरूपणी बलों को उनकी दिशा के आधार पर दो भागों में बांटा गया है:

A. महादेशजनक संचलन (Epeirogenic Movements)
(“Epeiros” = महाद्वीप)

ये बल ऊर्ध्वाधर (Vertical) रूप से कार्य करते हैं। इनका प्रभाव बहुत बड़े क्षेत्र पर पड़ता है और इनसे महाद्वीपों का निर्माण होता है।

B. पर्वत निर्माणकारी संचलन (Orogenic Movements)
(“Oros” = पर्वत)

ये बल क्षैतिज (Horizontal) रूप से कार्य करते हैं। ये बल मुख्य रूप से पर्वतों के निर्माण के लिए जिम्मेदार हैं। जब ये बल दो विपरीत दिशाओं से एक-दूसरे की ओर कार्य करते हैं तो संपीड़न (Compression) उत्पन्न होता है और जब वे एक-दूसरे से विपरीत दिशा में कार्य करते हैं तो तनाव (Tension) उत्पन्न होता है।


2. आकस्मिक बल (Sudden Forces)

ये बल पृथ्वी के आंतरिक भाग से अचानक और विनाशकारी रूप से प्रकट होते हैं। इनका प्रभाव अल्प समय में ही दिखाई देता है और ये अक्सर बड़े पैमाने पर विनाश का कारण बनते हैं।

A. ज्वालामुखी (Volcanism)

ज्वालामुखी (अंग्रेजी: Volcano, लैटिन शब्द ‘Vulcan’ – अग्नि का देवता) वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के गहरे आंतरिक भाग में स्थित पिघली हुई चट्टानें, जिन्हें मैग्मा (Magma) कहते हैं, गैसों, राख और जलवाष्प के साथ अत्यधिक दबाव के कारण भू-पटल को तोड़कर सतह पर आ जाती हैं। जिस छिद्र या दरार से यह पदार्थ बाहर निकलता है, उसे ज्वालामुखी निकास (Vent) कहते हैं, और सतह पर आए हुए मैग्मा को लावा (Lava) कहा जाता है।

ज्वालामुखी एक अंतर्जनित आकस्मिक बल (Endogenic Sudden Force) का परिणाम है और यह पृथ्वी पर नई भू-आकृतियों का निर्माण करने वाली एक प्रमुख निर्माणकारी प्रक्रिया है।

ज्वालामुखी विस्फोट के कारण (Causes of Volcanic Eruption)

  1. अत्यधिक ताप और प्लेट विवर्तनिकी (High Temperature and Plate Tectonics): पृथ्वी के मेंटल में रेडियोधर्मी पदार्थों के विखंडन और अवशिष्ट ऊष्मा के कारण तापमान बहुत अधिक होता है, जिससे चट्टानें पिघलकर मैग्मा बनाती हैं। विवर्तनिक प्लेटों के क्षेपण (Subduction) क्षेत्रों में, नीचे जाने वाली प्लेट पिघलकर मैग्मा का निर्माण करती है। [UPSC Mains]
  2. गैसों और जलवाष्प का निर्माण: मैग्मा में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और जलवाष्प जैसी गैसें घुली होती हैं। जब ऊपर का दबाव कम होता है, तो ये गैसें तेजी से फैलती हैं, जैसे सोडा की बोतल खोलने पर होता है, और मैग्मा को विस्फोटक रूप से सतह की ओर धकेलती हैं।
  3. कमजोर भू-पटल: जहाँ पृथ्वी की पर्पटी (Crust) कमजोर होती है, जैसे भ्रंश (Faults) या प्लेटों के किनारों पर, मैग्मा को सतह तक आने का रास्ता आसानी से मिल जाता है।

ज्वालामुखी से निःसृत पदार्थ (Materials Ejected from Volcanoes)

  1. गैसें तथा जलवाष्प: ज्वालामुखी उद्गार में जलवाष्प (Water Vapour) की मात्रा सर्वाधिक (60-90%) होती है। अन्य प्रमुख गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन और हाइड्रोजन सल्फाइड शामिल हैं।
  2. विखंडित पदार्थ (Pyroclastic Materials): ये विस्फोट के साथ निकले ठोस चट्टानी टुकड़े होते हैं।
    • ज्वालामुखी धूल (Volcanic Dust): अत्यंत महीन कण।
    • राख (Ash): धूल से बड़े कण।
    • लैपिली (Lapilli): मटर के दाने या अखरोट के आकार के टुकड़े।
    • ज्वालामुखी बम (Volcanic Bombs): बड़े आकार के टुकड़े जो हवा में ही ठंडे होकर जम जाते हैं।
  3. लावा (Lava): सतह पर निकला हुआ पिघला हुआ मैग्मा लावा कहलाता है। इसकी चिपचिपाहट (Viscosity) सिलिका (Silica) की मात्रा पर निर्भर करती है।
    • अम्लीय लावा (Acidic Lava): इसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। यह गाढ़ा, चिपचिपा होता है और धीरे-धीरे बहता है। यह विस्फोटक उद्गार के साथ तीव्र ढाल वाले शंकुओं का निर्माण करता है।
    • क्षारीय लावा (Basic Lava): इसमें सिलिका की मात्रा कम होती है। यह पतला और तरल होता है और तेजी से लंबी दूरी तक बहता है। यह शांत उद्गार के साथ कम ढाल वाले शील्ड ज्वालामुखी या लावा पठार बनाता है। [State PSC]

ज्वालामुखी के प्रकार (Types of Volcanoes)

ज्वालामुखी द्वारा निर्मित स्थलाकृतियाँ (Landforms formed by Volcanoes)

जब मैग्मा सतह तक पहुँचने से पहले ही भू-पटल की दरारों में जम जाता है, तो विभिन्न आकृतियाँ बनती हैं।

आकृतिविवरण
बैथोलिथ (Batholith)सबसे बड़ा अंतर्वेधी पिंड, गुंबदाकार आकृति। यह पर्वतों का आधार बनाता है।
लैकोलिथ (Laccolith)क्षैतिज रूप से परतदार चट्टानों में मैग्मा का गुंबदाकार जमाव।
लैपोलिथ (Lapolith)तश्तरी (Saucer) के आकार का अवतल (Concave) जमाव।
फैकोलिथ (Phacolith)वलित पर्वतों की अपनति और अभिनति में लावा का जमाव।
सिल (Sill)चट्टानों की परतों के बीच क्षैतिज (Horizontal) रूप से लावा का जमाव। [UPPSC 2021]
डाइक (Dyke)चट्टानों की परतों के बीच लंबवत (Vertical) रूप से लावा का जमाव।

ज्वालामुखी का विश्व वितरण (World Distribution of Volcanoes)

विश्व के लगभग 80% ज्वालामुखी विवर्तनिक प्लेटों के किनारों पर पाए जाते हैं।

  1. परि-प्रशांत मेखला (Circum-Pacific Belt): इसे ‘अग्नि वलय’ या ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire) कहते हैं। यहाँ विश्व के दो-तिहाई से अधिक ज्वालामुखी पाए जाते हैं। यह क्षेत्र प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित है और अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Plate Boundaries) से संबंधित है।
  2. मध्य-महाद्वीपीय मेखला (Mid-Continental Belt): यह भूमध्यसागर से लेकर हिमालय तक फैली है। इटली का विसुवियस और स्ट्राम्बोली इसी मेखला में हैं।
  3. मध्य-अटलांटिक मेखला (Mid-Atlantic Belt): यह मध्य-अटलांटिक कटक के सहारे स्थित है और अपसारी प्लेट सीमाओं (Divergent Plate Boundaries) से संबंधित है। यहाँ लावा का शांत दरारी उद्भेदन होता है। (उदा. आइसलैंड के ज्वालामुखी)।

विश्व के प्रमुख ज्वालामुखी: एक विस्तृत सूची

यह तालिका UPSC, State PCS और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें ज्वालामुखियों को उनकी भौगोलिक स्थिति और सक्रियता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।

1. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcanoes)

ये वे ज्वालामुखी हैं जिनसे वर्तमान में या हाल के इतिहास में लावा, गैस या राख का उद्गार होता रहा है।

ज्वालामुखी का नामदेश/क्षेत्रप्रकार/विशेष तथ्यPYQ संदर्भ/महत्व
स्ट्राम्बोली (Stromboli)इटली (लिपारी द्वीप)मिश्रित शंकु (स्ट्राम्बोलियन उद्गार)“भूमध्यसागर का प्रकाश स्तंभ” कहलाता है क्योंकि इससे लगातार प्रज्वलित गैसें निकलती रहती हैं। [UPPSC/SSC]
एटना (Etna)इटली (सिसली द्वीप)शील्ड/मिश्रित ज्वालामुखीयूरोप का सबसे ऊँचा और सबसे सक्रिय ज्वालामुखी।
माउंट इरेबस (Mount Erebus)अंटार्कटिका (रॉस द्वीप)स्ट्रैटोवोलकैनोपृथ्वी का सबसे दक्षिणी सक्रिय ज्वालामुखी।
मौना लोआ (Mauna Loa)संयुक्त राज्य अमेरिका (हवाई द्वीप)शील्ड ज्वालामुखी⋆ क्षेत्रफल और आयतन की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय ज्वालामुखी।
किलाउआ (Kīlauea)संयुक्त राज्य अमेरिका (हवाई द्वीप)शील्ड ज्वालामुखीविश्व के सबसे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक; लगभग निरंतर उद्गार।
कोटोपैक्सी (Cotopaxi)इक्वाडोरमिश्रित शंकु (स्ट्रैटोवोलकैनो)⋆ विश्व के सबसे ऊँचे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक। [State PSC]
माउंट फूजी (माउंट फ्यूजीयामा)जापानमिश्रित शंकुजापान का सबसे ऊँचा पर्वत और पवित्र ज्वालामुखी; तकनीकी रूप से सक्रिय माना जाता है।
माउंट सेंट हेलेंस (Mt. St. Helens)संयुक्त राज्य अमेरिकामिश्रित शंकु1980 के विनाशकारी विस्फोट के लिए प्रसिद्ध है।
बैरन द्वीप (Barren Island)भारत (अंडमान और निकोबार)मिश्रित शंकुभारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी। [UPSC 2018, BPSC]
माउंट मेरापी (Mount Merapi)इंडोनेशियामिश्रित शंकुइंडोनेशिया का सबसे सक्रिय और खतरनाक ज्वालामुखी।

2. प्रसुप्त (सुषुप्त) ज्वालामुखी (Dormant Volcanoes)

ये वे ज्वालामुखी हैं जो लंबे समय से शांत हैं, लेकिन भविष्य में कभी भी सक्रिय हो सकते हैं।

ज्वालामुखी का नामदेश/क्षेत्रप्रकार/विशेष तथ्यPYQ संदर्भ/महत्व
विसुवियस (Vesuvius)इटली (नेपल्स की खाड़ी)मिश्रित शंकु (सोमा-स्ट्रैटोवोलकैनो)⋆ इसके विनाशकारी विस्फोट (79 ईस्वी) ने पोम्पेई और हरकुलेनियम शहरों को नष्ट कर दिया था। [World History/Geog. Link]
क्राकाटोआ (Krakatoa)इंडोनेशियाकाल्डेरा1883 में हुए इसके ऐतिहासिक विस्फोट को अब तक के सबसे विनाशकारी विस्फोटों में गिना जाता है।
माउंट किलिमंजारो (Mt. Kilimanjaro)तंजानियास्ट्रैटोवोलकैनो⋆ अफ्रीका का सबसे ऊँचा पर्वत। इसके शिखर पर ग्लेशियर पाए जाते हैं। [UPSC Prelims]
मौना किया (Mauna Kea)संयुक्त राज्य अमेरिका (हवाई द्वीप)शील्ड ज्वालामुखीखगोलीय वेधशालाओं के लिए प्रसिद्ध; अपने समुद्री आधार से मापने पर यह विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत है।
नारकोंडम द्वीप (Narcondam Island)भारत (अंडमान और निकोbar)स्ट्रैटोवोलकैनोभारत का एकमात्र प्रसुप्त ज्वालामुखी माना जाता है। [UPSC Prelims]

3. शांत (विलुप्त) ज्वालामुखी (Extinct Volcanoes)

ये वे ज्वालामुखी हैं जिनके ऐतिहासिक काल में उद्गार का कोई रिकॉर्ड नहीं है और भविष्य में भी इसकी कोई संभावना नहीं है।

ज्वालामुखी का नामदेश/क्षेत्रप्रकार/विशेष तथ्यPYQ संदर्भ/महत्व
ओजोस डेल सलाडो (Ojos del Salado)अर्जेंटीना-चिली सीमास्ट्रैटोवोलकैनो⋆ यह एंडीज पर्वतमाला पर स्थित विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी है। (इसे कभी-कभी प्रसुप्त भी माना जाता है)। [SSC/Railways]
चिम्बोरोजो (Chimborazo)इक्वाडोरस्ट्रैटोवोलकैनोइक्वाडोर का सबसे ऊँचा पर्वत; इसका शिखर पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर स्थित बिंदु है।
माउंट पोपा (Mount Popa)म्यांमारस्ट्रैटोवोलकैनोइसके ऊपर एक बौद्ध मठ स्थित होने के कारण यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है।
माउंट केन्या (Mount Kenya)केन्यास्ट्रैटोवोलकैनोअफ्रीका का दूसरा सबसे ऊँचा पर्वत।
देवबंद (Damavand)ईरानस्ट्रैटोवोलकैनोईरान का सबसे ऊँचा शिखर और एशिया का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी।

विशेष मामलों का सारांश

यह तालिका आपको “Match the Following” और सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए अच्छी तरह से तैयार करेगी।


भारतीय परिप्रेक्ष्य में ज्वालामुखी और संबंधित स्थलाकृतियाँ

भारत सीधे तौर पर किसी सक्रिय प्लेट सीमा, जैसे कि ‘रिंग ऑफ फायर’, पर स्थित नहीं है। इस कारण, मुख्य भूमि भारत में वर्तमान में कोई सक्रिय ज्वालामुखी नहीं है। हालांकि, भारत का भूवैज्ञानिक इतिहास ज्वालामुखी गतिविधियों से गहराई से जुड़ा रहा है और इसके प्रमाण आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

भारतीय ज्वालामुखी परिदृश्य को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:

  1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ज्वालामुखी।
  2. दक्कन के पठार पर प्राचीन ज्वालामुखी क्रिया।

1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ज्वालामुखी

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एक ज्वालामुखीय द्वीप चाप (Volcanic Island Arc) का हिस्सा है, जो इंडो-बर्मीज प्लेट सीमा के पास स्थित है। यहाँ भारतीय प्लेट, बर्मी प्लेट के नीचे क्षेपित (Subduct) हो रही है। इसी क्षेपण के कारण उत्पन्न मैग्मा ने यहाँ ज्वालामुखियों को जन्म दिया है।

2. दक्कन ट्रैप (The Deccan Traps) – भारत का प्राचीन ज्वालामुखीय प्रदेश

यह भारत की मुख्य भूमि पर हुई सबसे विशाल और प्रभावशाली ज्वालामुखीय घटना का प्रमाण है।

भारत में अन्य ज्वालामुखीय संरचनाएँ

हालांकि दक्कन ट्रैप सबसे प्रसिद्ध है, भारत के अन्य हिस्सों में भी प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधि के प्रमाण मिलते हैं:

भारतीय ज्वालामुखी परिदृश्य का सारांश

स्थलाकृति/ज्वालामुखीस्थानप्रकारभूवैज्ञानिक कालप्रमुख विशेषता और PYQ तथ्य
बैरन द्वीपअंडमान सागरसक्रिय ज्वालामुखीवर्तमानभारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी।
नारकोंडम द्वीपअंडमान सागरप्रसुप्त ज्वालामुखीहोलोसीननारकोंडम हॉर्नबिल का निवास।
दक्कन ट्रैपप्रायद्वीपीय भारतलावा पठार (दरारी उद्भेदन)क्रिटेशियस-पैलियोजीनबेसाल्टिक लावा से निर्मित, काली मिट्टी का स्रोत।
धोसी हिलहरियाणाविलुप्त ज्वालामुखी (संभावित)प्रीकैम्ब्रियनअरावली श्रृंखला का हिस्सा।

B. भूकंप (Earthquake)

भूकंप (Earth = भूमि, Quake = कंपन) का शाब्दिक अर्थ है पृथ्वी का काँपना। भूविज्ञान में, भूकंप से तात्पर्य पृथ्वी की सतह पर अचानक होने वाले उस कंपन से है जो भू-पर्पटी (Cr’ust) में ऊर्जा के आकस्मिक रूप से मुक्त होने के कारण उत्पन्न होता है। यह ऊर्जा भ्रंश रेखाओं (Fault Lines) के सहारे तरंगों के रूप में फैलती है, जिससे सतह पर कंपन महसूस होता है।

भूकंप एक अंतर्जनित आकस्मिक बल (Endogenic Sudden Force) है जो अत्यंत विनाशकारी हो सकता है और अल्प समय में ही बड़े पैमाने पर भू-सतह पर परिवर्तन ला सकता है।

भूकंप से संबंधित शब्दावली (Terminology related to Earthquakes)

[आरेख: पृथ्वी की सतह के नीचे उद्गम केंद्र (Focus) और ठीक उसके ऊपर सतह पर अधिकेंद्र (Epicenter) को दर्शाने वाला एक सरल 3D ब्लॉक चित्र। उद्गम केंद्र से सभी दिशाओं में निकलती भूकम्पीय तरंगों को भी दिखाया जाए।]

भूकंप के कारण (Causes of Earthquakes)

  1. विवर्तनिक गतिविधियाँ (Tectonic Activities):
    • यह भूकंपों का सबसे प्रमुख और आम कारण है। विश्व के लगभग 90% भूकंप प्लेट विवर्तनिकी से जुड़े हैं।
    • अभिसारी सीमा (Convergent Boundary): जब दो प्लेटें टकराती हैं, तो भारी प्लेट हल्की प्लेट के नीचे क्षेपित (Subduct) होती है, जिससे अत्यधिक ऊर्जा संचित होती है और भूकंप आते हैं। (उदा. प्रशांत महासागर का ‘रिंग ऑफ फायर’)।
    • अपसारी सीमा (Divergent Boundary): जब प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं, तो भ्रंश के सहारे उथले भूकंप आते हैं। (उदा. मध्य-अटलांटिक कटक)।
    • रूपांतरित सीमा (Transform Boundary): जब प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर क्षैतिज रूप से खिसकती हैं। (उदा. कैलिफोर्निया का सैन एंड्रियास भ्रंश)। [UPSC Prelims]
  2. ज्वालामुखी क्रिया (Volcanic Activity):
    • ज्वालामुखी विस्फोट से पहले या उसके दौरान मैग्मा की तीव्र गति और गैसों के दबाव के कारण स्थानीय, कम तीव्रता वाले भूकंप आ सकते हैं।
  3. अन्य कारण (Other Causes):
    • मानव-जनित कारण (Anthropogenic Causes): बड़े बांधों के जलग्रहण क्षेत्रों में जल के अत्यधिक भार से संतुलन बिगड़ना (इसे जलाशय प्रेरित भूकंप – Reservoir Induced Seismicity कहते हैं), खनन गतिविधियों, और परमाणु विस्फोटों से भी भूकंप आ सकते हैं। [UPSC Mains]
      • उदाहरण: महाराष्ट्र का कोयना बांध क्षेत्र जलाशय प्रेरित भूकंप का एक प्रसिद्ध उदाहरण है।
    • भूस्खलन (Landslides): बड़े पैमाने पर भूस्खलन होने से भी स्थानीय स्तर पर कंपन हो सकता है।

भूकंपीय तरंगों का मापन (Measurement of Earthquakes)

भूकंपीय तरंगों और उनके प्रभावों का मापन दो अलग-अलग गुणों के आधार पर किया जाता है: परिमाण (Magnitude) और तीव्रता (Intensity)। ये दोनों शब्द अक्सर एक दूसरे के स्थान पर उपयोग कर लिए जाते हैं, लेकिन भूविज्ञान में इनके अर्थ बिल्कुल भिन्न हैं और परीक्षाओं में इसी अंतर से प्रश्न बनाए जाते हैं। इन दोनों गुणों को मापने के लिए अलग-अलग पैमानों का उपयोग किया जाता है।

1. परिमाण का मापन: रिक्टर पैमाना (Measuring Magnitude: The Richter Scale)

परिमाण (Magnitude) भूकंप के स्रोत (उद्गम केंद्र) पर मुक्त हुई कुल ऊर्जा (Total Energy Released) का एक माप है। यह एक निरपेक्ष (Absolute) मान है और यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि भूकंप का प्रभाव कहाँ या कैसा महसूस किया गया।

2. तीव्रता का मापन: संशोधित मरकेली पैमाना (Measuring Intensity: The Modified Mercalli Scale)

तीव्रता (Intensity) किसी विशिष्ट स्थान पर भूकंप के प्रभाव (Effects) और उससे हुए विनाश (Damage) का एक माप है। यह इस बात का वर्णन करता है कि भूकंप को मनुष्यों द्वारा कितना शक्तिशाली महसूस किया गया और उसने सतह, इमारतों और अन्य संरचनाओं को कितना नुकसान पहुँचाया।

परिमाण (Magnitude) बनाम तीव्रता (Intensity) – एक तुलनात्मक तालिका

यह तालिका परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दोनों अवधारणाओं के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है।

तुलना का आधारपरिमाण (Magnitude)तीव्रता (Intensity)
क्या मापता है?भूकंप के स्रोत पर मुक्त हुई ऊर्जाकिसी स्थान पर भूकंप का प्रभाव और विनाश
पैमानारिक्टर पैमानासंशोधित मरकेली पैमाना
मानएक भूकंप का केवल एक परिमाण होता है। (जैसे 7.2)एक भूकंप की कई तीव्रताएँ हो सकती हैं (स्थान के अनुसार बदलती हैं)। (जैसे IV, VII, IX)
पैमाने का प्रकारमात्रात्मक (Quantitative), उपकरण आधारित।गुणात्मक (Qualtive), अवलोकन आधारित।
स्केल की प्रकृतिलघुगणकीय (Logarithmic) (0 से 10…)वर्णनात्मक (Roman I से XII)।
प्रभावित करने वाले कारककेवल स्रोत पर मुक्त ऊर्जा।मुक्त ऊर्जा, अधिकेंद्र से दूरी, स्थानीय भूविज्ञान, इमारतों की गुणवत्ता।
PYQ कीवर्डऊर्जा <br> ⋆ लघुगणकीयविनाश/प्रभाव <br> ⋆ अवलोकन

निष्कर्ष:

संक्षेप में, परिमाण (Magnitude) बताता है कि भूकंप स्रोत पर कितना ‘बड़ा’ था, जबकि तीव्रता (Intensity) बताती है कि किसी विशेष स्थान पर कंपन कितना ‘शक्तिशाली’ महसूस हुआ और उसने कितनी ‘तबाही’ मचाई। एक बड़ा भूकंप (उच्च परिमाण) यदि किसी निर्जन क्षेत्र में आता है, तो उसकी तीव्रता कम दर्ज की जा सकती है, जबकि एक मध्यम परिमाण का भूकंप यदि घनी आबादी वाले क्षेत्र में आता है, तो उसकी तीव्रता बहुत अधिक हो सकती है।


सिस्मोग्राफ (Seismograph)

सिस्मोग्राफ (Seismograph) (ग्रीक शब्द ‘Seismos’ अर्थात ‘कंपन’ और ‘Grapho’ अर्थात ‘लिखना’) वह वैज्ञानिक उपकरण है जिसका उपयोग भूकम्पीय तरंगों का पता लगाने, उन्हें मापने और उनका रिकॉर्ड (अभिलेख) दर्ज करने के लिए किया जाता है। यह उपकरण भूकम्प विज्ञान (Seismology) का एक मूलभूत आधार है, क्योंकि इसी के द्वारा प्राप्त आंकड़ों से वैज्ञानिक भूकंप के परिमाण (Magnitude), स्थान (Location), और गहराई का निर्धारण करते हैं।

इस उपकरण द्वारा उत्पन्न ग्राफिकल रिकॉर्ड को सिस्मोग्राम (Seismogram) कहा जाता है।

सिस्मोग्राफ का मूल सिद्धांत (Basic Principle of Seismograph)

सिस्मोग्राफ का मूल सिद्धांत जड़त्व (Inertia) के नियम पर आधारित है। जड़त्व किसी वस्तु का वह गुण है जिसके कारण वह अपनी विरामावस्था या गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती है।

[आरेख: एक सरल सिस्मोग्राफ का चित्र जिसमें जमीन से जुड़ा एक फ्रेम, उससे लटका हुआ एक भारी भार, उस भार से जुड़ा एक पेन, और घूमता हुआ एक ड्रम दिखाया गया हो। ड्रम पर भूकम्पीय तरंगों को एक सिस्मोग्राम के रूप में दर्ज होते हुए दिखाया जाए।]

आधुनिक सिस्मोग्राफ

पुराने यांत्रिक सिस्मोग्राफों की जगह अब आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्मोग्राफ ने ले ली है।

सिस्मोग्राम की व्याख्या (Interpreting a Seismogram)

सिस्मोग्राम वैज्ञानिकों को भूकंप के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ देता है:

  1. तरंगों के आगमन का समय (Arrival Time of Waves):
    • सिस्मोग्राम पर सबसे पहले P-तरंगें (Primary Waves) दर्ज होती हैं, क्योंकि वे सबसे तेज चलती हैं।
    • उनके बाद S-तरंगें (Secondary Waves) दर्ज होती हैं।
    • सबसे अंत में सतही तरंगें (Surface Waves) दर्ज होती हैं, जिनका आयाम (Amplitude) सबसे अधिक होता है और वे सबसे विनाशकारी होती हैं।
  2. भूकंप के अधिकेंद्र का निर्धारण (Locating the Epicenter):
    • ⋆ P-तरंगों और S-तरंगों के बीच का समयांतराल (Time Gap) यह बताता है कि भूकंप सिस्मोग्राफ स्टेशन से कितनी दूर है। यह अंतराल जितना अधिक होगा, भूकंप उतना ही दूर होगा।
    • एक स्टेशन केवल दूरी बता सकता है, दिशा नहीं। इसलिए, भूकंप के अधिकेंद्र का सटीक स्थान निर्धारित करने के लिए कम से कम तीन (3) सिस्मोग्राफ स्टेशनों के डेटा की आवश्यकता होती है।
    • प्रत्येक स्टेशन अपनी दूरी को त्रिज्या (Radius) मानकर एक वृत्त खींचता है। तीनों वृत्तों का प्रतिच्छेदन बिंदु (Intersection Point) ही भूकंप का अधिकेंद्र (Epicenter) होता है। इस प्रक्रिया को त्रिअंकन (Triangulation) कहते हैं। [UPSC Prelims – Conceptual]
  3. परिमाण का निर्धारण (Determining the Magnitude):
    • सिस्मोग्राम पर दर्ज की गई तरंगों के आयाम (Amplitude), विशेष रूप से सबसे बड़ी तरंग के आयाम, का उपयोग रिक्टर पैमाने (Richter Scale) पर भूकंप का परिमाण निर्धारित करने के लिए किया जाता है।

परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बिंदु:

यह उपकरण न केवल भूकंपों का अध्ययन करने में मदद करता है, बल्कि यह पृथ्वी की आंतरिक संरचना (जैसे तरल बाहरी क्रोड) को समझने और परमाणु परीक्षणों की निगरानी करने में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


भूकंप का विश्व वितरण (World Distribution of Earthquakes)

विश्व में भूकंप का वितरण ज्वालामुखियों के वितरण से काफी मिलता-जुलता है। प्रमुख भूकंपीय क्षेत्र विवर्तनिक प्लेटों की सीमाओं के साथ स्थित हैं।

  1. परि-प्रशांत मेखला (Circum-Pacific Belt) – रिंग ऑफ फायर:
    • यह विश्व की सबसे विस्तृत और सक्रिय भूकंपीय पेटी है। विश्व के लगभग 68% भूकंप इसी क्षेत्र में आते हैं।
    • यह क्षेत्र अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Plate Boundaries) के साथ स्थित है। जापान, फिलीपींस, चिली, अलास्का इसी पेटी में आते हैं।
  2. मध्य-महाद्वीपीय मेखला (Mid-Continental Belt):
    • यह विश्व की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण पेटी है, जहाँ लगभग 21% भूकंप आते हैं।
    • यह यूरेशियन प्लेट और अफ्रीकी-भारतीय प्लेटों के टकराव वाले क्षेत्र में फैली है। भूमध्य सागर, आल्प्स, काकेशस पर्वत से लेकर हिमालय तक यह विस्तृत है। भारत का भूकंपीय क्षेत्र इसी मेखला का हिस्सा है।
  3. मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge):
    • यह अपसारी प्लेट सीमाओं के साथ स्थित है और यहाँ सामान्यतः उथले और कम तीव्रता वाले भूकंप आते हैं।

भूकंप के प्रभाव (Effects of Earthquakes)

सकारात्मक प्रभाव (Positive Effects)नकारात्मक प्रभाव (Negative Effects)
नई भू-आकृतियों का निर्माण (जैसे भ्रंश)।<br> बहुमूल्य खनिजों का सतह के निकट आना।<br> तटीय क्षेत्रों का उत्थान, जिससे नए बंदरगाह बन सकते हैं।<br> भूजल स्तर में परिवर्तन।सुनामी (Tsunami): जब समुद्र तल पर भूकंप आता है, तो विनाशकारी समुद्री लहरें उत्पन्न होती हैं। [UPSC 2018 Mains]<br>द्रवीकरण (Liquefaction): रेत या गाद जैसी ढीली मिट्टी में पानी के दबाव से भूमि ठोस की बजाय तरल जैसा व्यवहार करने लगती है, जिससे इमारतें धँस जाती हैं। [UPSC Prelims]<br> जन-धन की हानि।<br> भूस्खलन और हिमस्खलन।<br> आग लगना (गैस पाइपलाइन टूटने से)।<br> बांधों और पुलों का टूटना।

भारत का भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र (Seismic Zoning Map of India)

भारत को भूकंपीयता के आधार पर चार मुख्य ज़ोनों में बांटा गया है (पहले पाँच थे, ज़ोन I को II में मिला दिया गया है)।

निष्कर्ष: भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है जिसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन उचित तैयारी, भूकंपरोधी भवनों का निर्माण, और पूर्व चेतावनी प्रणालियों के विकास से इसके विनाशकारी प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


भूकंप द्वारा निर्मित या प्रभावित स्थलाकृतियाँ

भूकंपीय गतिविधियाँ सीधे तौर पर प्रमुख स्थलाकृतियों (जैसे पर्वत) का निर्माण नहीं करतीं, बल्कि वे पृथ्वी की सतह पर विध्वंसक और संशोधक (Destructive and Modificatory) प्रभाव डालती हैं। भूकंप के कारण होने वाले कंपन, भूमि के खिसकने, और सतह के टूटने से कई छोटी और बड़ी भू-आकृतियाँ अप्रत्यक्ष रूप से उत्पन्न या प्रभावित होती हैं।

1. भ्रंश और संबंधित स्थलाकृतियाँ (Faults and Related Landforms)

2. उत्थान और निमज्जन (Uplift and Subsidence)

भूकंप के कारण पृथ्वी की पर्पटी के बड़े हिस्से का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे ऊर्ध्वाधर (Vertical) परिवर्तन होते हैं।

3. द्रवीकरण से संबंधित आकृतियाँ (Landforms related to Liquefaction)

द्रवीकरण (Liquefaction) वह प्रक्रिया है जब भूकंपीय कंपन के कारण संतृप्त (Saturated) रेतीली या गादयुक्त भूमि अपनी मजबूती खो देती है और एक तरल पदार्थ की तरह व्यवहार करने लगती है।

4. भूस्खलन और संबंधित आकृतियाँ (Landslides and Related Landforms)

पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में भूकंप भूस्खलन (Landslides) का एक प्रमुख कारण है।

5. सुनामी (Tsunami)

हालांकि सुनामी स्वयं में एक स्थलाकृति नहीं है, लेकिन यह तटीय स्थलाकृतियों में भारी परिवर्तन लाती है।

निष्कर्ष:

संक्षेप में, भूकंप मुख्य रूप से एक विध्वंसक और संशोधक (Destructive and Modificatory) भू-आकृतिक एजेंट है। यह सीधे तौर पर पर्वत नहीं बनाता, बल्कि सतह को तोड़कर, भूमि को ऊपर-नीचे खिसकाकर, और ढीली सामग्री को द्रवीकृत करके पहले से मौजूद भू-दृश्य को एक नया, और अक्सर खतरनाक, स्वरूप प्रदान करता है।

परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बिंदु:


अंतर्जनित बलों का सारांश

बल का प्रकारउप-प्रकारगतिदिशामुख्य निर्मित भू-आकृतिउदाहरण
पटल विरूपणी (Diastrophic)महादेशजनकधीमीऊर्ध्वाधरमहाद्वीप, तटीय मैदानभारत का कोरोमंडल तट (उत्थान)
पर्वत निर्माणकारीधीमीक्षैतिजवलित पर्वत, भ्रंश घाटी, ब्लॉक पर्वतहिमालय, नर्मदा घाटी, सतपुड़ा पर्वत
आकस्मिक (Sudden)ज्वालामुखीतीव्रआकस्मिकज्वालामुखी पर्वत, लावा पठारदक्कन का पठार
भूकंपतीव्रआकस्मिक(अप्रत्यक्ष रूप से) भूस्खलन, दरारें

बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ (Evolution of Landforms: Exogenic Processes)

जबकि अंतर्जनित बल पृथ्वी की सतह पर विषमताओं (जैसे पर्वत, पठार) का निर्माण करते हैं, वहीं बहिर्जनिक बल इन विषमताओं को खत्म करके सतह को समतल करने का प्रयास करते हैं। ये दोनों बल पृथ्वी की सतह को आकार देने के लिए लगातार एक-दूसरे के विपरीत कार्य करते रहते हैं।

बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ क्या हैं? (What are Exogenic Processes?)

बहिर्जनिक (Exo = बाहर, Genic = उत्पन्न) प्रक्रियाएँ वे होती हैं जो अपनी ऊर्जा पृथ्वी की सतह के ऊपर से, मुख्य रूप से सौर ऊर्जा (Solar Energy) और गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) से प्राप्त करती हैं।

💡 इन प्रक्रियाओं का मुख्य कार्य पृथ्वी की सतह पर मौजूद उभरी हुई स्थलाकृतियों का अपरदन (Erosion) करना और निचले क्षेत्रों या गर्तों में उस अपरदित सामग्री का निक्षेपण (Deposition) करना है। इसी कारण, बहिर्जनिक प्रक्रियाओं को सामूहिक रूप से अनाच्छादन (Denudation) कहा जाता है और इन्हें ‘विनाशकारी बल’ (Destructive Forces) भी माना जाता है, क्योंकि ये स्थलाकृतियों को नीचा करने का काम करती हैं।

अनाच्छादन की प्रक्रिया में निम्नलिखित तीन क्रियाएँ शामिल हैं:

  1. अपक्षय (Weathering)
  2. वृहत् संचलन (Mass Movement)
  3. अपरदन और निक्षेपण (Erosion and Deposition)

1. अपक्षय (Weathering)

अपक्षय वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा चट्टानें अपने ही स्थान पर (in-situ) यांत्रिक (भौतिक) रूप से टूटती हैं या रासायनिक रूप से विघटित होती हैं।

मुख्य अंतर: अपक्षय में चट्टानी पदार्थों का परिवहन (transportation) शामिल नहीं होता है, जबकि अपरदन में परिवहन आवश्यक है। [UPSC/State PSC Conceptual Question]

अपक्षय को तीन मुख्य प्रकारों में बांटा गया है:


2. वृहत् संचलन (Mass Movement or Mass Wasting)

वृहत् संचलन वह प्रक्रिया है जिसमें चट्टान, मलबा या मिट्टी गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव के कारण ढलान के सहारे नीचे की ओर खिसकती है। इसमें अपरदन के कारकों (नदी, हवा) की कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं होती; गुरुत्वाकर्षण ही मुख्य चालक बल है


3. अपरदन और निक्षेपण (Erosion and Deposition)

अपरदन वह प्रक्रिया है जिसमें गतिशील प्राकृतिक कारक (जैसे बहता जल, हवा, हिमनद, समुद्री लहरें) चट्टानों को तोड़कर या खुरचकर उनके पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं।

निक्षेपण वह प्रक्रिया है जिसमें इन कारकों का वेग कम होने पर वे अपने साथ लाए गए अपरदित पदार्थों को जमा कर देते हैं।

अपरदन के कारक (Agent of Erosion)अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ (Erosional Landforms)निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ (Depositional Landforms)
नदी (बहता जल)‘V’ आकार की घाटी, गॉर्ज, कैनियन, जलप्रपात, जलगर्तिकाजलोढ़ पंख, जलोढ़ शंकु, बाढ़ के मैदान, प्राकृतिक तटबंध, डेल्टा
भूमिगत जललैपीज, घोल रंध्र (सिंकहोल), गुफाएँ, कंदराएँस्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट, कंदरा स्तंभ
हिमनद (ग्लेशियर)‘U’ आकार की घाटी, सर्क, हॉर्न, नुनाटकहिमोढ़ (मोरेन), ड्रमलिन, एस्कर
पवन (हवा)वातगर्त (Blowout), छत्रक शिला (Mushroom Rock), ज्यूजेन, यारदांगबालूका स्तूप (Sand Dunes), लोएस का मैदान
समुद्री लहरेंसमुद्री क्लिफ, समुद्री गुफा, स्टैक, वेव-कट प्लेटफॉर्मपुलीन (Beaches), रोधिका (Bars), स्पिट, लैगून

निष्कर्ष: बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ लगातार अंतर्जनित बलों द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों को संशोधित करती रहती हैं। अपक्षय चट्टानों को कमजोर करता है, वृहत् संचelen गुरुत्वाकर्षण के कारण मलबे को नीचे लाता है, और अपरदन के कारक इस मलबे को दूर तक ले जाकर सतह को समतल करने का प्रयास करते हैं, जिससे पृथ्वी का भू-दृश्य एक गतिशील और कभी न खत्म होने वाले संतुलन की स्थिति में बना रहता है।


इस यूनिट के लिए अतिरिक्त महत्वपूर्ण परीक्षा-केंद्रित टॉपिक्स

1. डेविस और पेंक के भू-आकृतिक चक्र (Geomorphic Cycles of Davis and Penck)

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवधारणा है जो पूरी यूनिट को एक साथ जोड़ती है। यह बताती है कि समय के साथ स्थलाकृतियों का विकास कैसे होता है।

2. भू-संतुलन की अवधारणा (Concept of Isostasy)

यह अवधारणा बताती है कि पृथ्वी की पर्पटी (Crust) के विभिन्न खंड (जैसे ऊँचे पर्वत और गहरी समुद्री खाइयाँ) दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) के ऊपर एक संतुलन की स्थिति में कैसे रहते हैं।

3. भू-चुंबकत्व और समुद्र तल प्रसरण (Paleomagnetism and Sea-Floor Spreading)

यह टॉपिक सीधे तौर पर अंतर्जनित बलों (विशेषकर प्लेट विवर्तनिकी) के प्रमाण से जुड़ा है।

4. कार्स्ट और हिमनद स्थलाकृतियों पर विशेष ध्यान

ये दो टॉपिक्स बहिर्जनिक प्रक्रियाओं में सबसे अधिक पूछे जाते हैं क्योंकि इनकी स्थलाकृतियाँ बहुत विशिष्ट होती हैं।

5. मानव और भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ (Humans and Geomorphic Processes)

यह एक अनुप्रयुक्त (Applied) विषय है और UPSC Mains के लिए बहुत प्रासंगिक है।

इन टॉपिक्स को अपनी तैयारी में शामिल करने से आपकी इस यूनिट पर पकड़ बहुत मजबूत हो जाएगी और आप किसी भी प्रकार के प्रश्न का सामना करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होंगे।



महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory)

महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत एक क्रांतिकारी भूवैज्ञानिक अवधारणा है जो यह प्रस्तावित करती है कि पृथ्वी के महाद्वीप स्थिर नहीं हैं, बल्कि वे भूवैज्ञानिक समय के दौरान पृथ्वी की सतह पर एक-दूसरे के सापेक्ष गतिमान रहे हैं। यह सिद्धांत इस बात की व्याख्या करने का पहला व्यापक प्रयास था कि क्यों विश्व के विभिन्न महाद्वीपों की तटरेखाएँ एक-दूसरे से मेल खाती हैं और क्यों एक जैसे जीवाश्म और चट्टानें हजारों किलोमीटर दूर स्थित महाद्वीपों पर पाए जाते हैं।

इस सिद्धांत का व्यवस्थित प्रतिपादन 1912 में एक जर्मन मौसम विज्ञानी और भूभौतिकीविद् अल्फ्रेड वेगेनर (Alfred Wegener) द्वारा किया गया था। यद्यपि उनके समय में इस सिद्धांत को व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन इसने भविष्य के प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory) के लिए एक ठोस आधार तैयार किया।

वेगेनर की मूल परिकल्पना

वेगेनर के अनुसार, लगभग 30 करोड़ वर्ष पहले, कार्बोनिफेरस युग (Carboniferous Period) में, पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक साथ जुड़े हुए थे और उन्होंने एक विशाल एकल भूखंड (Supercontinent) का निर्माण किया था।

लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले, ट्राइएसिक युग (Triassic Period) में, पैंजिया टूटना शुरू हुआ। यह सबसे पहले दो बड़े भूखंडों में विभाजित हुआ:

  1. लॉरेशिया (Laurasia) / अंगारालैंड (Angaraland): उत्तरी भाग, जिसमें वर्तमान उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया शामिल थे।
  2. गोंडवानालैंड (Gondwanaland): दक्षिणी भाग, जिसमें वर्तमान दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका शामिल थे। [BPSC 2022]

इन दोनों भूखंडों के बीच एक उथला समुद्र खुला, जिसे टेथिस सागर (Tethys Sea) कहा गया।

बाद के युगों में, ये दोनों भूखंड भी टूटकर और अधिक छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गए, जो धीरे-धीरे अपनी वर्तमान स्थिति तक विस्थापित हो गए।

[आरेख: तीन चरणों में विश्व का मानचित्र। पहला, पैंजिया का एक एकल भूखंड। दूसरा, लॉरेशिया और गोंडवानालैंड में विभाजन, बीच में टेथिस सागर। तीसरा, महाद्वीपों की वर्तमान स्थिति।]

सिद्धांत के पक्ष में प्रमाण (Evidence in Support of the Theory)

वेगेनर ने अपने सिद्धांत को सिद्ध करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से कई महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत किए:

  1. महाद्वीपों की तटरेखाओं में साम्य (The Jigsaw-Fit of Continents):
    • अटलांटिक महासागर के दोनों किनारों की तटरेखाओं को एक साथ जोड़ने पर वे आश्चर्यजनक रूप से एक-दूसरे से मेल खाती हैं, विशेषकर दक्षिण अमेरिका का पूर्वी तट और अफ्रीका का पश्चिमी तट। यह ऐसा है जैसे एक पहेली (Jigsaw) के दो टुकड़े हों।
  2. भूवैज्ञानिक प्रमाण (Geological Evidence):
    • चट्टानों की आयु और संरचना में समानता: अटलांटिक के दोनों किनारों पर पाई जाने वाली पर्वत श्रृंखलाओं की आयु और भूवैज्ञानिक संरचना में उल्लेखनीय समानता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के तटों पर पाई जाने वाली चट्टानों का काल-निर्धारण (Dating) उन्हें एक ही समय का बताता है।
    • उदाहरण: अप्लेशियन पर्वत (उत्तरी अमेरिका) और स्कैंडिनेवियन हाइलैंड्स (यूरोप) एक ही प्राचीन पर्वत श्रृंखला का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
  3. जीवाश्मों का वितरण (Fossil Evidence):
    • एक जैसे पौधों और जानवरों के जीवाश्म उन महाद्वीपों पर पाए गए हैं जो वर्तमान में एक-दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर हैं और जिनके बीच विशाल महासागर हैं।
    • मेसोसॉरस (Mesosaurus): एक छोटे रेंगने वाले जीव के जीवाश्म केवल दक्षिणी अफ्रीका और ब्राजील (दक्षिण अमेरिका) में पाए गए हैं। यह छोटा जीव विशाल अटलांटिक महासागर को तैरकर पार नहीं कर सकता था, जो यह इंगित करता है कि ये दोनों भूखंड कभी जुड़े हुए थे।
    • ग्लोसोप्टेरिस (Glossopteris): एक फर्न पौधे के जीवाश्म भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका में पाए गए हैं, जो गोंडवानालैंड की परिकल्पना को मजबूत करते हैं।
  4. पुरा-जलवायु प्रमाण (Paleoclimatic Evidence):
    • टिलाइट (Tillite): ये हिमनदों द्वारा निक्षेपित अवसादी चट्टानें हैं। भारत के प्रायद्वीपीय पठार, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में कार्बोनिफेरस युग की टिलाइट चट्टानें पाई गई हैं। इन क्षेत्रों की वर्तमान गर्म जलवायु में हिमनदों का अस्तित्व असंभव है, जो यह दर्शाता है कि ये सभी भूखंड कभी एक साथ दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित थे।
    • कोयले का जमाव: यूरोप और उत्तरी अमेरिका के ठंडे क्षेत्रों में कोयले के बड़े भंडार पाए जाते हैं, जबकि कोयला गर्म और आर्द्र जलवायु में बनता है। यह इंगित करता है कि ये भूखंड कभी भूमध्य रेखा के पास स्थित थे।

विस्थापन के लिए उत्तरदायी बल (Forces responsible for Drifting)

वेगेनर ने महाद्वीपों के विस्थापन के लिए दो बलों को जिम्मेदार ठहराया, हालांकि यही उनके सिद्धांत का सबसे कमजोर बिंदु साबित हुआ:

  1. ध्रुवीय फ्लीइंग बल (Polar Fleeing Force): पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित बल, जिसके कारण महाद्वीप भूमध्य रेखा की ओर खिसके।
  2. ज्वारीय बल (Tidal Force): सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण उत्पन्न ज्वारीय बल, जिसके कारण महाद्वीप पश्चिम की ओर खिसके।

आलोचना: वैज्ञानिकों ने इन दोनों बलों को महाद्वीपों जैसे विशाल भूखंडों को हिलाने के लिए अत्यधिक कमजोर और अपर्याप्त माना, और इसी आधार पर वेगेनर के सिद्धांत को उस समय खारिज कर दिया गया था।

सिद्धांत की आलोचना और महत्व (Criticism and Importance)

निष्कर्ष: वेगेनर यह तो बता पाए कि ‘क्या’ हुआ (महाद्वीप विस्थापित हुए), लेकिन यह नहीं बता पाए कि ‘कैसे’ हुआ। इसका उत्तर बाद में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने दिया।


एफ. बी. टेलर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (F. B. Taylor’s Displacement Theory)

एफ. बी. टेलर (F. B. Taylor) एक अमेरिकी भूविज्ञानी थे, जिन्होंने अल्फ्रेड वेगेनर से भी पहले (1908 में, प्रकाशित 1910 में) महाद्वीपीय विस्थापन की परिकल्पना प्रस्तुत की थी। हालांकि वेगेनर का सिद्धांत अधिक व्यापक और प्रसिद्ध हुआ, लेकिन टेलर को महाद्वीपीय प्रवाह की अवधारणा को वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत करने वाले शुरुआती विचारकों में से एक माना जाता है।

टेलर का मुख्य उद्देश्य वेगेनर की तरह पृथ्वी के समग्र भूवैज्ञानिक इतिहास की व्याख्या करना नहीं था। उनका ध्यान मुख्य रूप से टर्शियरी (तृतीयक) युग के वलित पर्वतों (Fold Mountains), जैसे हिमालय, आल्प्स और रॉकीज, के निर्माण की समस्या को सुलझाने पर केंद्रित था।

टेलर की मूल परिकल्पना

टेलर के अनुसार, महाद्वीप हमेशा से स्थिर नहीं थे, बल्कि उन्होंने क्षैतिज (Horizontal) रूप से गति की है। उन्होंने माना कि क्रिटेशियस युग (Cretaceous Period) के दौरान पृथ्वी पर दो विशाल भूखंड मौजूद थे:

  1. लॉरेशिया (Laurasia): उत्तरी ध्रुव के पास स्थित एक विशाल महाद्वीप।
  2. गोंडवानालैंड (Gondwanaland): दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित एक विशाल महाद्वीप।

विस्थापन की प्रक्रिया और दिशा

टेलर का मानना था कि इन महाद्वीपों ने मुख्य रूप से दो दिशाओं में गति की:

  1. भूमध्य रेखा की ओर (Towards the Equator): दोनों महाद्वीपों (लॉरेशिया और गोंडवानालैंड) ने ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होना शुरू किया।
  2. पश्चिम की ओर (Towards the West): यह गति भी हुई, लेकिन भूमध्य रेखा की ओर होने वाली गति अधिक प्रभावशाली थी।

विस्थापन का कारण: ज्वारीय बल (Tidal Force)

पर्वत निर्माण की व्याख्या

टेलर ने अपने सिद्धांत से टर्शियरी वलित पर्वतों के निर्माण की व्याख्या इस प्रकार की:

वेगेनर और टेलर के सिद्धांतों की तुलना

तुलना का आधारएफ. बी. टेलर (1908)अल्फ्रेड वेगेनर (1912)
मुख्य उद्देश्यटर्शियरी वलित पर्वतों के निर्माण की व्याख्या करना।पृथ्वी के पुरा-जलवायु (Paleoclimatic) और भूवैज्ञानिक इतिहास की समग्र व्याख्या करना।
विस्थापन का कालक्रिटेशियस युग से शुरू हुआ।कार्बोनिफेरस युग (पैंजिया के समय) से शुरू हुआ।
प्रारंभिक भूखंडदो भूखंड माने: लॉरेशिया और गोंडवानालैंडएक ही भूखंड माना: पैंजिया
विस्थापन की दिशाध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर (मुख्य)।भूमध्य रेखा की ओर और पश्चिम की ओर
उत्तरदायी बलकेवल ज्वारीय बल (Tidal Force)ध्रुवीय फ्लीइंग बल और ज्वारीय बल
प्रसिद्धिकम प्रसिद्ध और सीमित।अधिक व्यापक, विस्तृत प्रमाण और अधिक प्रसिद्ध।

टेलर के सिद्धांत की आलोचना और महत्व

निष्कर्ष: टेलर के सिद्धांत को एक ‘अग्रदूत’ के रूप में देखा जा सकता है जिसने महाद्वीपों की गतिशीलता के विचार को वैज्ञानिक मंच पर लाने में मदद की, भले ही यह वेगेनर के सिद्धांत की तुलना में कम विकसित और कम प्रमाणित था।


प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत एक वैज्ञानिक सिद्धांत है जो यह बताता है कि पृथ्वी का बाहरी कठोर कवच, जिसे स्थलमंडल (Lithosphere) कहा जाता है, कई बड़े और छोटे टुकड़ों या “प्लेटों” में विभाजित है। ये प्लेटें स्थिर नहीं हैं, बल्कि ये पृथ्वी के आंतरिक भाग में मौजूद अर्ध-तरल दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) के ऊपर अत्यंत धीमी गति से लगातार गतिमान रहती हैं।

यह सिद्धांत 1960 के दशक के अंत में विकसित हुआ और यह महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) और समुद्र तल प्रसरण सिद्धांत (Sea-Floor Spreading Theory) का एक एकीकृत और उन्नत रूप है। यह पृथ्वी पर होने वाली अधिकांश प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाओं — जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, और पर्वत निर्माण — की व्याख्या करने के लिए एक सार्वभौमिक और व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।

सिद्धांत के प्रमुख तत्व

  1. स्थलमंडल और प्लेटें (Lithosphere and Plates):
    • पृथ्वी का स्थलमंडल (पर्पटी + ऊपरी मैंटल का कठोर भाग) एक सतत परत नहीं है। यह लगभग सात (7) प्रमुख प्लेटों और कई छोटी (Minor) प्लेटों में टूटा हुआ है।
    • प्लेटों में महाद्वीपीय और महासागरीय दोनों प्रकार की पर्पटी शामिल हो सकती है।
  2. दुर्बलतामंडल (Asthenosphere):
    • यह स्थलमंडल के नीचे स्थित मैंटल का ऊपरी, प्लास्टिक और आंशिक रूप से पिघला हुआ भाग है।
    • स्थलमंडलीय प्लेटें इसी कमजोर परत के ऊपर तैरती हैं और गति करती हैं।
  3. संवहन धाराएँ (Convection Currents) – प्लेटों की गति का कारण:
    • ⋆ सिद्धांत के अनुसार, प्लेटों की गति का मुख्य कारण मेंटल में चलने वाली संवहन धाराएँ हैं।
    • पृथ्वी के क्रोड से उत्पन्न ऊष्मा के कारण मेंटल का गर्म मैग्मा ऊपर उठता है, फैलता है, ठंडा होता है और फिर नीचे डूब जाता है। यह चक्रीय गति (Cyclical Movement) अपने ऊपर स्थित स्थलमंडलीय प्लेटों को खींचती या धकेलती है। [UPSC Mains]

[आरेख: पृथ्वी का क्रॉस-सेक्शन जिसमें मेंटल में चलती हुई संवहन धाराओं को दिखाया गया हो। ऊपर उठती धाराएँ प्लेटों को अलग (अपसारी) और नीचे डूबती धाराएँ प्लेटों को एक-दूसरे की ओर (अभिसारी) धकेल रही हों।]

प्रमुख और छोटी प्लेटें (Major and Minor Plates)

सात प्रमुख प्लेटें:

  1. प्रशांत प्लेट (Pacific Plate) – पूरी तरह से महासागरीय।
  2. उत्तरी अमेरिकी प्लेट (North American Plate)
  3. दक्षिण अमेरिकी प्लेट (South American Plate)
  4. यूरेशियन प्लेट (Eurasian Plate)
  5. अफ्रीकी प्लेट (African Plate)
  6. इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट (Indo-Australian Plate)
  7. अंटार्कटिक प्लेट (Antarctic Plate)

कुछ महत्वपूर्ण छोटी प्लेटें: नाज़्का प्लेट, कोकोस प्लेट, अरेबियन प्लेट, फिलीपीन प्लेट।

प्लेटों के किनारे और उनकी गतियाँ (Plate Margins and their Movements)

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी का स्थलमंडल (Lithosphere) विभिन्न टुकड़ों या प्लेटों में विभाजित है, जो दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) के ऊपर गतिमान हैं। इन प्लेटों के किनारे (Margins) ही वे क्षेत्र हैं जहाँ पृथ्वी की अधिकांश महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक घटनाएँ, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी और पर्वत निर्माण, घटित होती हैं। प्लेटों के किनारे एक-दूसरे के सापेक्ष तीन प्रकार से गति करते हैं, जिन्हें अपसारी (Divergent), अभिसारी (Convergent), और रूपांतरण (Transform) गति कहा जाता है।

1. अपसारी किनारा (Divergent Boundary)

अवधारणा: जब दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में दूर जाती हैं, तो उनके बीच के किनारे को अपसारी किनारा कहते हैं।

2. अभिसारी किनारा (Convergent Boundary)

अवधारणा: जब दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं और आपस में टकराती हैं, तो उनके किनारे को अभिसारी किनारा कहते हैं।

टकराव का प्रकारप्रक्रियानिर्मित स्थलाकृतियाँसंबंधित घटनाएँउदाहरण और PYQ तथ्य
महासागरीय-महाद्वीपीय<br>(Oceanic-Continental)भारी महासागरीय प्लेट हल्की महाद्वीपीय प्लेट के नीचे क्षेपित होती है।∙ महासागरीय गर्त (Trenches)<br>∙ महाद्वीपीय ज्वालामुखीय चाप (Volcanic Arcs on Continents)<br>∙ वलित पर्वत (Fold Mountains)∙ विस्फोटक ज्वालामुखी<br>∙ तीव्र और गहरे भूकंप∙ पेरू-चिली गर्त और एंडीज पर्वतमाला<br>∙ रॉकीज पर्वतमाला<br>⋆ ‘रिंग ऑफ फायर’ का अधिकांश भाग इसी प्रकार के किनारों से बना है। [UPSC]
महासागरीय-महासागरीय<br>(Oceanic-Oceanic)एक महासागरीय प्लेट दूसरी (अपेक्षाकृत भारी) के नीचे क्षेपित होती है।∙ गहरे महासागरीय गर्त<br>∙ ज्वालामुखीय द्वीप चाप (Volcanic Island Arcs)∙ विस्फोटक ज्वालामुखी<br>∙ तीव्र और गहरे भूकंप<br>∙ सुनामी∙ मेरियाना गर्त (विश्व की सबसे गहरी)<br>∙ जापान, फिलीपींस, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
महाद्वीपीय-महाद्वीपीय<br>(Continental-Continental)दोनों प्लेटें हल्की होने के कारण कोई भी आसानी से क्षेपित नहीं होती। किनारे मुड़कर ऊपर उठ जाते हैं।∙ विशाल वलित पर्वत<br>(Non-volcanic Fold Mountains)∙ ज्वालामुखी क्रिया नगण्य<br>∙ तीव्र और उथले भूकंप∙ हिमालय पर्वतमाला (भारतीय और यूरेशियन प्लेट)<br>∙ आल्प्स पर्वत (अफ्रीकी और यूरेशियन प्लेट)<br>⋆ यह अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है कि हिमालय में ज्वालामुखी क्यों नहीं हैं। [UPSC Mains]

3. रूपांतरण या संरक्षी किनारा (Transform or Conservative Boundary)

अवधारणा: जब दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर क्षैतिज रूप से विपरीत दिशाओं में खिसकती (slide past) हैं।


तीनों किनारों का तुलनात्मक सारांश

विशेषताअपसारी किनारा (Divergent)अभिसारी किनारा (Convergent)रूपांतरण किनारा (Transform)
गतिएक-दूसरे से दूरएक-दूसरे की ओरसमानांतर खिसकना
परिणामनई पर्पटी का निर्माणपुरानी पर्पटी का विनाशपर्पटी संरक्षित रहती है
उपनामरचनात्मक (Constructive)विनाशात्मक (Destructive)संरक्षी (Conservative)
ज्वालामुखीहाँ, शांत (बेसाल्टिक)हाँ, विस्फोटक (विशेषकर क्षेपण क्षेत्रों में)नहीं
भूकंपहाँ, कम तीव्रता केहाँ, तीव्र और गहरेहाँ, तीव्र और उथले
प्रमुख उदाहरणमध्य-अटलांटिक कटकहिमालय पर्वत, एंडीज पर्वतसैन एंड्रियास भ्रंश

सिद्धांत का महत्व और प्रमाण


संबंधित परिघटनाएँ: ज्वालामुखी, भूकंप और पर्वत निर्माण

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत यह स्थापित करता है कि पृथ्वी पर अधिकांश प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाएँ विवर्तनिक प्लेटों के किनारों (Plate Margins) पर केंद्रित होती हैं, जहाँ प्लेटें एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया करती हैं। ज्वालामुखी, भूकंप और पर्वत निर्माण, ये तीनों परिघटनाएँ प्लेटों की गतियों (अभिसारी, अपसारी, रूपांतरण) का प्रत्यक्ष परिणाम हैं।

1. ज्वालामुखी और प्लेट विवर्तनिकी (Volcanism and Plate Tectonics)

ज्वालामुखी क्रिया उन स्थानों पर होती है जहाँ मैग्मा को सतह तक पहुँचने का अवसर मिलता है। प्लेट विवर्तनिकी यह अवसर तीन प्रमुख सेटिंग्स में प्रदान करती है:

2. भूकंप और प्लेट विवर्तनिकी (Earthquakes and Plate Tectonics)

भूकंप प्लेटों की गति के दौरान चट्टानों में उत्पन्न होने वाले तनाव (Stress) और घर्षण (Friction) का परिणाम हैं। विश्व के 95% से अधिक भूकंप प्लेट किनारों पर ही आते हैं।

3. पर्वत निर्माण और प्लेट विवर्तनिकी (Mountain Building and Plate Tectonics)

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पर्वत-निर्माण (Orogenesis) की सबसे व्यापक व्याख्या प्रस्तुत करता है। अधिकांश प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएँ अभिसारी प्लेट किनारों पर स्थित हैं।


पर्वत, पठार और मैदान: उत्पत्ति और वर्गीकरण (Mountains, Plateaus, and Plains: Origin and Classification)

पर्वत, पठार और मैदान पृथ्वी की सतह पर पाई जाने वाली तीन प्रमुख स्थलाकृतियाँ हैं। इनका वर्गीकरण मुख्य रूप से उनकी ऊँचाई और ढाल (Slope) के आधार पर किया जाता है।

स्थलाकृति (Landform)सामान्य ऊँचाई (Average Height)ढाल (Slope) और शिखर (Summit)
पर्वत (Mountain)आस-पास के क्षेत्र से 900 मीटर से अधिकतीव्र ढाल (Steep Slopes) और नुकीला या संकरा शिखर
पठार (Plateau)सामान्यतः 300 से 1000 मीटरकम से कम एक किनारा तीव्र ढाल वाला और विस्तृत, सपाट या ऊबड़-खाबड़ शीर्ष
मैदान (Plain)सामान्यतः 200 मीटर से कममंद ढाल (Gentle Slope) और सपाट भू-भाग

1. पर्वत (Mountains)

पर्वत पृथ्वी की सतह के वे प्राकृतिक उभार हैं जिनका शिखर छोटा और आधार चौड़ा होता है। ये अपने आस-पास के क्षेत्र से एकदम स्पष्ट रूप से ऊँचे होते हैं। जब कई पर्वत एक रेखा में विस्तृत होते हैं तो उसे पर्वत श्रृंखला (Mountain Range) कहते हैं (जैसे हिमालय)।

उत्पत्ति के आधार पर पर्वतों का वर्गीकरण (Classification based on Origin)

पर्वतों का वर्गीकरण: एक विस्तृत तुलनात्मक तालिका

वर्गीकरण का आधारपर्वत का प्रकारनिर्माण प्रक्रिया (उत्पत्ति)प्रमुख विशेषताएँविश्व प्रसिद्ध उदाहरणभारतीय उदाहरणसंबंधित PYQ/महत्वपूर्ण तथ्य
निर्माण प्रक्रिया<br>(Mode of Origin)वलित पर्वत (Fold Mountains)संपीड़न (Compression): दो विवर्तनिक प्लेटों के टकराने से चट्टानों में वलन पड़ना। लहरदार या मुड़ी हुई परतें (अपनति, अभिनति)।<br> विश्व की सबसे ऊँची और विस्तृत पर्वत श्रृंखलाएँ।<br> अवसादी चट्टानों की प्रधानता।नवीन: हिमालय (एशिया), आल्प्स (यूरोप), रॉकीज (उत्तरी अमेरिका), एंडीज (दक्षिण अमेरिका)नवीन: हिमालय<br>प्राचीन: अरावली, सतपुड़ा (संरचनात्मक रूप से वलित)नवीन वलित पर्वत प्लेट विवर्तनिकी के अभिसारी किनारों (Convergent Boundaries) पर पाए जाते हैं। [UPSC Mains]
ब्लॉक पर्वत (Block Mountains)तनाव या संपीड़न: भू-पर्पटी में भ्रंशन (Faulting) के कारण किसी भूखंड का ऊपर उठना (हॉर्स्ट) या आस-पास के खंडों का नीचे धँसना (ग्रैबेन)। तीव्र, खड़ी ढलान और समतल शिखर।<br> इनके साथ अक्सर भ्रंश घाटियाँ (Rift Valleys) जुड़ी होती हैं। ब्लैक फॉरेस्ट (जर्मनी)<br> वॉस्जेस (फ्रांस)<br> सिएरा नेवादा (USA)विंध्य और सतपुड़ा⋆ नर्मदा और तापी नदियाँ सतपुड़ा और विंध्य ब्लॉक पर्वतों द्वारा निर्मित भ्रंश घाटियों से होकर बहती हैं। [MPPSC/UPSC]
ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic Mountains)ज्वालामुखी क्रिया: ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा, राख और अन्य पदार्थों का एक शंकु के रूप में जमा होना। आमतौर पर शंक्वाकार आकृति।<br> शिखर पर क्रेटर (Crater) या काल्डेरा (Caldera) पाया जाता है। माउंट फूजी (जापान)<br> किलिमंजारो (तंजानिया)<br> मौना लोआ (हवाई, USA)<br> कोटोपैक्सी (इक्वाडोर)बैरन द्वीप और नारकोंडम द्वीप⋆ अधिकांश सक्रिय ज्वालामुखी ‘रिंग ऑफ फायर’ (परि-प्रशांत मेखला) पर स्थित हैं।
गुंबदाकार पर्वत (Dome Mountains)अंतर्जात बल: मैग्मा के जमाव से सतह का ऊपर की ओर गुंबद के आकार में उठ जाना, या किसी क्षेत्र का वलन या उत्थान। गोलाकार या गुंबदाकार आकृति।<br> परतें केंद्र से बाहर की ओर झुकी होती हैं। ब्लैक हिल्स (USA)<br> सिनसिनाटी डोम (USA)छोटानागपुर पठार का हजारीबाग क्षेत्र (गुंबदाकार उत्थान)यह वलित पर्वतों से भिन्न हैं क्योंकि इनमें बड़े पैमाने पर चट्टानों का मुड़ना नहीं होता।
मिश्रित या जटिल पर्वत (Complex Mountains)विविध प्रक्रियाएँ: वलन, भ्रंशन, ज्वालामुखी क्रिया और कायांतरण जैसी कई भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का संयुक्त परिणाम। अत्यंत जटिल और मिश्रित भूवैज्ञानिक संरचना।<br> विभिन्न प्रकार की चट्टानें (आग्नेय, अवसादी, रूपांतरित) पाई जाती हैं। सिएरा नेवादा (USA)<br> रॉकीज का अधिकांश भाग<br> एंडीज का अधिकांश भागहिमालय (मुख्य रूप से वलित, लेकिन संरचना जटिल है)विश्व की अधिकांश प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएँ वास्तव में जटिल या मिश्रित प्रकार की होती हैं।
अपरदन की अवस्था<br>(Stage of Erosion)अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains)अपरदन (Erosion): प्राचीन पर्वतों या पठारों के लंबे समय तक अपरदन के बाद बचे हुए कठोर चट्टानी भाग। यह कोई मूल निर्माण प्रक्रिया नहीं है। कम ऊँचाई और गोल शिखर।<br> कठोर चट्टानों से निर्मित होते हैं क्योंकि नरम चट्टानें अपरदित हो चुकी होती हैं। स्कॉटिश हाइलैंड्स<br> हाइलैंड्स ऑफ स्कैंडिनेवियाअरावली, विंध्य, सतपुड़ा, पश्चिमी और पूर्वी घाटअरावली संरचनात्मक रूप से एक प्राचीन वलित पर्वत है, लेकिन वर्तमान में यह एक अवशिष्ट पर्वत का उत्कृष्ट उदाहरण है। [UPSC/RAS]


2. पठार (Plateaus)

पठार ऊँची भूमि का एक विस्तृत क्षेत्र होता है जिसका शीर्ष मेज की तरह सपाट (Tableland) होता है और जिसका कम से कम एक किनारा तीव्र ढाल वाला होता है।

उत्पत्ति के आधार पर पठारों का वर्गीकरण (Classification based on Origin)


पठारों का वर्गीकरण: एक विस्तृत तुलनात्मक तालिका

वर्गीकरण का आधारपठार का प्रकारनिर्माण प्रक्रिया (उत्पत्ति)प्रमुख विशेषताएँविश्व प्रसिद्ध उदाहरणभारतीय उदाहरणसंबंधित PYQ/महत्वपूर्ण तथ्य
अवस्थिति (Location)अंतरापर्वतीय पठार (Intermontane Plateau)दो या अधिक पर्वत श्रृंखलाओं के बीच प्लेटों के टकराने (संपीड़न) और उत्थान से निर्मित। चारों ओर से ऊँचे पर्वतों से घिरे होते हैं।<br> विश्व के सबसे ऊँचे और विस्तृत पठार हैं।∙ तिब्बत का पठार (हिमालय और कुनलुन के बीच)<br>∙ बोलीविया का पठार (एंडीज के बीच)<br>∙ कोलंबिया-स्नेक पठार (रॉकीज के बीच)लद्दाख का पठार (काराकोरम और हिमालय के बीच)तिब्बत के पठार को “विश्व की छत” (Roof of the World) कहा जाता है। [SSC/State PSC]
गिरिपद पठार (Piedmont Plateau)पर्वतों के अपरदन से प्राप्त अवसादों का पर्वत के आधार (पाद) पर जमाव, या किसी पर्वतीय क्षेत्र का आंशिक उत्थान। एक ओर पर्वत श्रृंखला और दूसरी ओर मैदान या समुद्र से घिरे होते हैं।∙ पेटागोनिया का पठार (एंडीज के पूर्व में)<br>∙ पीडमांट पठार (अप्लेशियन पर्वत के पूर्व में, USA)मालवा का पठार (अरावली और विंध्य के बीच गिरिपद जैसा)यह पठार अंतरापर्वतीय पठारों की तुलना में कम ऊँचे होते हैं।
निर्माण प्रक्रिया<br>(Mode of Origin)ज्वालामुखी पठार (Volcanic Plateau)दरारी उद्भेदन (Fissure Eruption): दरारों से निकले अत्यधिक तरल बेसाल्टिक लावा की परतों का एक विस्तृत क्षेत्र में फैलकर जमना। लावा की सीढ़ीदार (Trap) संरचना।<br> अपक्षय से काली मिट्टी (Regur Soil) का निर्माण होता है जो बहुत उपजाऊ होती है।∙ कोलंबिया-स्नेक पठार (USA)<br>∙ पराना ट्रैप (ब्राजील)दक्कन ट्रैप (Deccan Traps)दक्कन का पठार कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है। इसका निर्माण रियूनियन हॉटस्पॉट के कारण हुआ। [MPPSC/UPSC]
गुंबदाकार पठार (Domed Plateau)पटल विरूपणी उत्थान: पृथ्वी के अंतर्जात बलों के कारण एक विस्तृत भूखंड का धीमी गति से गुंबद के आकार में ऊपर उठना। आसपास के क्षेत्रों की तुलना में गोलाकार या अंडाकार उत्थान।∙ ओजार्क पठार (Ozark Plateau) (USA)छोटानागपुर का पठार (विशेषकर हजारीबाग और रांची पठार)इन पठारों में अपरदन से ‘पाट भूमि’ (Pat Lands) जैसी स्थलाकृतियाँ बन सकती हैं।
अपरदन की अवस्था<br>(Stage of Erosion)अपरदित पठार या शील्ड (Dissected Plateau or Shield)प्राचीन पठारों का नदियों, हवा और हिमनदों द्वारा लंबे समय तक अपरदन, जिससे सतह ऊबड़-खाबड़ और विच्छेदित हो जाती है। सतह समतल न होकर घाटियों और पहाड़ियों में विभाजित होती है।<br> ये प्राचीन, कठोर चट्टानों से बने होते हैं।<br> धात्विक खनिजों के भंडार पाए जाते हैं।∙ कनाडियन शील्ड<br>∙ बाल्टिक शील्ड (यूरोप)<br>∙ ब्राजीलियन हाइलैंड्सप्रायद्वीपीय भारत का अधिकांश भाग (जैसे बुंदेलखंड, कर्नाटक पठार)⋆ भारत का छोटानागपुर का पठार खनिजों के भंडार के कारण “भारत का रूर” (Ruhr of India) कहलाता है। [JPSC/BPSC]
जलवायुशुष्क पठार (Arid Plateau)वे पठार जो शुष्क या अर्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्रों में स्थित होते हैं और अक्सर वृष्टि-छाया प्रदेश (Rain-shadow Area) में होते हैं। वनस्पति विरल होती है।<br> यांत्रिक अपक्षय अधिक होता है।∙ पेटागोनिया का पठार (अर्जेंटीना)<br>∙ गोबी का पठार (मंगोलिया-चीन)<br>∙ कोलोराडो पठार (USA)लद्दाख का पठारलद्दाख भारत का शीत मरुस्थल है, जो वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित है। [UPSC Prelims]


3. मैदान (Plains)

मैदान पृथ्वी की सतह के लगभग समतल और निचले क्षेत्र होते हैं, जिनका ढाल बहुत मंद होता है। विश्व की अधिकांश जनसंख्या और कृषि कार्य मैदानों में ही केंद्रित है।

उत्पत्ति के आधार पर मैदानों का वर्गीकरण (Classification based on Origin)


मैदानों का वर्गीकरण: एक विस्तृत तुलनात्मक तालिका

वर्गीकरण का आधारमैदान का प्रकारनिर्माण प्रक्रिया (उत्पत्ति)प्रमुख विशेषताएँविश्व प्रसिद्ध उदाहरणभारतीय उदाहरणसंबंधित PYQ/महत्वपूर्ण तथ्य
निर्माण प्रक्रिया (Mode of Origin)संरचनात्मक मैदान (Structural Plains)पटल विरूपणी उत्थान: पृथ्वी के अंतर्जात बलों द्वारा महाद्वीपीय शेल्फ या क्षैतिज रूप से स्तरित चट्टानों वाले भूभाग का धीमी गति से ऊपर उठना। लगभग समतल या बहुत मंद ढाल वाले विस्तृत मैदान।<br> ये पृथ्वी के सबसे बड़े मैदानों में से हैं।∙ संयुक्त राज्य अमेरिका का ग्रेट प्लेन्स<br>∙ रूस का मैदान (साइबेरियन प्लेन)<br>∙ ऑस्ट्रेलियाई मैदानकोरोमंडल तट और मालाबार तट का तटीय मैदान (समुद्री निमज्जन और उन्मज्जन का परिणाम)इन मैदानों की संरचना में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होता, केवल भूभाग का उत्थान होता है।
बहिर्जनिक बल (Exogenic Forces)अपरदनात्मक मैदान (Erosional Plains)अपरदन (Erosion): ऊँचे भूभागों (पर्वत, पठार) का बहिर्जनिक कारकों (नदी, पवन, हिमनद) द्वारा लंबे समय तक अपरदित होकर समतल हो जाना। ये समतल न होकर थोड़े ऊबड़-खाबड़ या लहरदार (Undulating) हो सकते हैं।<br> कठोर चट्टानों के अवशेष ‘मोनाडनॉक’ (Monadnock) के रूप में देखे जा सकते हैं।∙ पेनीप्लेन (नदी अपरदन): अप्लेशियन क्षेत्र (USA)<br>∙ पेडीप्लेन (पवन अपरदन): सहारा मरुस्थल के कुछ हिस्से<br>∙ हिमानी मैदान (हिमनद अपरदन): कनाडियन शील्ड का कुछ भागअरावली पर्वतमाला का पश्चिमी भाग (पेनीप्लेन का उदाहरण)यह प्रक्रिया स्थलाकृति को “आधार तल” (Base Level) तक लाने का प्रयास करती है।
बहिर्जनिक बल (Exogenic Forces)निक्षेपणात्मक मैदान (Depositional Plains)निक्षेपण (Deposition): अपरदन के कारकों द्वारा लाए गए अवसादों (Sediments) का निचले क्षेत्रों, झीलों या समुद्रों में जमा होना। अत्यधिक उपजाऊ होते हैं क्योंकि ये नई मिट्टी और खनिजों से बने होते हैं।<br> विश्व की अधिकांश कृषि और जनसंख्या इन्हीं मैदानों में केंद्रित है।विभिन्न निक्षेपण के कारकों के आधार पर:विभिन्न निक्षेपण के कारकों के आधार पर:⋆ ये मैदान मानव सभ्यता के विकास के केंद्र रहे हैं। इन्हें “सभ्यता का पालना” (Cradle of Civilization) कहा जाता है।
(निक्षेपण के उप-प्रकार)1. जलोढ़ मैदान (Alluvial Plain)नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी (Alluvium) का बाढ़ के दौरान या नदी घाटियों में जमाव। अत्यंत उपजाऊ; कृषि के लिए सर्वश्रेष्ठ।<br> डेल्टा, बाढ़ के मैदान, भाबर, तराई, खादर, बांगर जैसी स्थलाकृतियाँ।∙ नील नदी का मैदान (मिस्र)<br>∙ ह्वांग-हो का मैदान (चीन)<br>∙ मिसिसिपी-मिसौरी का मैदान (USA)उत्तर भारत का विशाल मैदान (सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान)खादर (नई जलोढ़) और बांगर (पुरानी जलोढ़) के बीच का अंतर अक्सर पूछा जाता है। [UPPSC/BPSC]
2. लोएस का मैदान (Loess Plain)पवन (Wind) द्वारा रेगिस्तानी या हिमनदों के किनारों से उड़ाई गई बारीक धूल (Loess) का दूर तक जमाव। परतहीन (Non-stratified) और बहुत महीन कणों वाली मिट्टी।<br> अत्यधिक उपजाऊ लेकिन अपरदन के प्रति संवेदनशील।∙ उत्तरी चीन का लोएस मैदान<br>∙ पम्पास (अर्जेंटीना) के कुछ हिस्सेकश्मीर घाटी में लोएस के जमाव को ‘करेवा’ (Karewa) कहा जाता है, जो केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। [UPSC 2021]
3. हिमानी निक्षेपित मैदान (Glacial Depositional Plain)हिमनदों (Glaciers) द्वारा लाए गए मलबे (हिमोढ़ या Till) के पिघलने पर जमाव। इन्हें टिल मैदान (Till Plains) या आउटवॉश प्लेन (Outwash Plains) भी कहते हैं।<br> इसमें ड्रमलिन, एस्कर जैसी स्थलाकृतियाँ हो सकती हैं।∙ उत्तरी अमेरिका के प्रेयरीज (Prairies)<br>∙ उत्तरी यूरोपीय मैदानये मैदान गेहूं की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं।
4. तटीय मैदान (Coastal Plain)समुद्री लहरों द्वारा अवसादों का जमाव, या महाद्वीपीय शेल्फ के उन्मज्जन (Emergence) से। ये संकरे या चौड़े हो सकते हैं।<br> लैगून, पुलीन (Beach), और बालू रोधिका (Sandbars) जैसी आकृतियाँ।∙ अटलांटिक तटीय मैदान (USA)<br>∙ उत्तरी सागर के तटीय मैदान (यूरोप)पूर्वी और पश्चिमी तटीय मैदान (भारत)भारत का पूर्वी तटीय मैदान अधिक चौड़ा और उभरा (emergent) हुआ है, जबकि पश्चिमी तट संकरा और डूबा (submergent) हुआ है। [UPSC]
5. सरोवरीय मैदान (Lacustrine Plain)प्राचीन झीलों की तली में अवसादों के भर जाने से झील का समतल भूमि में बदलना। अत्यधिक समतल और उपजाऊ होते हैं।∙ ग्रेट लेक्स का मैदान (USA/कनाडा)<br>∙ हंगरी का मैदानइम्फाल घाटी (मणिपुर), कश्मीर घाटीकश्मीर घाटी का निर्माण एक विशाल प्रागैतिहासिक झील के तलछट से हुआ है।

पर्वत, पठार और मैदान: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Latest Data and Facts)

पर्वत (Mountains)

महाद्वीपसर्वोच्च शिखरऊँचाई (मीटर)पर्वत श्रृंखला
एशियामाउंट एवरेस्ट8,848.86हिमालय
दक्षिण अमेरिकामाउंट एकांकागुआ6,961एंडीज
उत्तरी अमेरिकाडेनाली (पुराना नाम: माउंट मैकिन्ले)6,190अलास्का रेंज
अफ्रीकामाउंट किलिमंजारो5,895(ज्वालामुखी)
यूरोपमाउंट एल्ब्रस5,642काकेशस पर्वत
अंटार्कटिकाविंसन मैसिफ4,892एल्सवर्थ पर्वत
ऑस्ट्रेलिया (ओशिनिया)पुuncak जया (कार्स्टेन्स पिरामिड)4,884सुदिरमन रेंज (इंडोनेशिया)

पठार (Plateaus)

मैदान (Plains)

भारत के संदर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य


घाटियाँ (Valleys)

घाटी दो या दो से अधिक पहाड़ों या पहाड़ियों के बीच स्थित एक लम्बी, निचली भू-आकृति होती है। यह आमतौर पर एक नदी (River) या हिमनद (Glacier) की अपरदनात्मक क्रिया द्वारा निर्मित होती है, हालांकि कुछ घाटियाँ भ्रंशन (Faulting) जैसी भू-विवर्तनिक गतिविधियों से भी बन सकती हैं। घाटियाँ जल प्रवाह और मानवीय बसावट के लिए प्राकृतिक मार्ग प्रदान करती हैं और अक्सर उपजाऊ भूमि का केंद्र होती हैं।

उत्पत्ति के आधार पर घाटियों का वर्गीकरण (Classification based on Origin)

घाटियों को उनके आकार और निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर मुख्य रूप से वर्गीकृत किया जाता है।

नदी अपने मार्ग में चट्टानों को काटकर घाटियों का निर्माण करती है। नदी घाटी का आकार उसकी युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था पर निर्भर करता है।

जब विशाल हिमनद (Glaciers) घाटियों से होकर गुजरते हैं, तो वे अपनी अपरदनात्मक शक्ति से मौजूदा नदी घाटियों को चौड़ा और गहरा कर देते हैं।

ये घाटियाँ सीधे तौर पर अपरदन से नहीं, बल्कि पृथ्वी के अंतर्जात बलों से बनती हैं।

अन्य महत्वपूर्ण घाटियाँ (Other Important Valleys)

घाटी का नामदेश/स्थानविशेषताएँ और महत्व
कश्मीर घाटीभारत (जम्मू और कश्मीर)पीर पंजाल और महान हिमालय के बीच स्थित एक उपजाऊ घाटी; करेवा (Karewa) मिट्टी और केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध।
साइलेंट वैली (शांत घाटी)भारत (केरल)पश्चिमी घाट में स्थित; अपनी जैव विविधता (Biodiversity) और सदाबहार वर्षावनों के लिए प्रसिद्ध। [UPSC Prelims]
फूलों की घाटी (Valley of Flowers)भारत (उत्तराखंड)नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा; अपने अल्पाइन फूलों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल।
डेथ वैली (मृतक घाटी)संयुक्त राज्य अमेरिका (कैलिफोर्निया)पश्चिमी गोलार्ध का सबसे निचला, सबसे गर्म और सबसे शुष्क स्थान; एक भ्रंश घाटी का उदाहरण।
किंग्स कैनियनऑस्ट्रेलियाऑस्ट्रेलिया का सबसे गहरा कैनियन।
नुब्रा घाटीभारत (लद्दाख)श्योक और नुब्रा नदियों द्वारा निर्मित; सियाचिन ग्लेशियर के पास स्थित; अपनी प्राकृतिक सुंदरता और दो-कूबड़ वाले ऊँटों के लिए प्रसिद्ध।

मरुस्थल/शुष्क प्रदेश (Deserts and Arid Lands)

मरुस्थल (Desert) एक ऐसा भू-भाग या प्रदेश होता है जहाँ वर्षण (Precipitation) की तुलना में वाष्पीकरण (Evaporation) की दर बहुत अधिक होती है, जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक शुष्कता (Aridity), जल का अभाव और विरल वनस्पति पाई जाती है। सामान्य तौर पर, जिन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 25 सेंटीमीटर (10 इंच) से कम होती है, उन्हें मरुस्थल की श्रेणी में रखा जाता है।

मरुस्थल केवल गर्म, रेतीले टीलों वाले क्षेत्र नहीं होते; वे ठंडे भी हो सकते हैं और चट्टानी या बर्फीले भी हो सकते हैं।

मरुस्थलों के निर्माण के कारण (Causes of Desert Formation)

  1. उप-उष्णकटिबंधीय उच्च दाब पेटी (Sub-Tropical High-Pressure Belt):
    • ⋆ यह मरुस्थलों के निर्माण का सबसे प्रमुख कारण है। लगभग 20° से 30° अक्षांशों के बीच (दोनों गोलार्धों में), वायु ऊपर से नीचे की ओर उतरती है। नीचे उतरती हुई वायु गर्म और शुष्क हो जाती है, जिससे वहाँ वर्षा नहीं हो पाती और उच्च दाब का क्षेत्र बनता है।
    • परिणाम: विश्व के अधिकांश गर्म मरुस्थल (जैसे सहारा, कालाहारी, ऑस्ट्रेलियाई मरुस्थल) इसी पेटी में महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर स्थित हैं। [UPSC Mains]
  2. ठंडी महासागरीय धाराएँ (Cold Ocean Currents):
    • जब हवा ठंडी महासागरीय धाराओं के ऊपर से गुजरती है, तो वह भी ठंडी और शुष्क हो जाती है और अपनी नमी खो देती है। जब यह ठंडी और शुष्क हवा तटीय क्षेत्रों में पहुँचती है, तो वह वर्षा नहीं करती।
    • उदाहरण:
      • अटाकामा मरुस्थल (दक्षिण अमेरिका) के निर्माण में पेरू/हम्बोल्ट धारा (Peru/Humboldt Current) का योगदान है।
      • नामीब मरुस्थल (अफ्रीका) के निर्माण में बेंगुएला धारा (Benguela Current) का योगदान है।
      • सहारा मरुस्थल (अफ्रीका) के निर्माण में कनारी धारा (Canary Current) का योगदान है।
      • कैलिफोर्नियाई मरुस्थल के निर्माण में कैलिफोर्निया धारा (California Current) का योगदान है।
    • PYQ Link: यह “Match the Following” में अक्सर पूछा जाने वाला टॉपिक है। [UPSC/State PSC]
  3. वृष्टि-छाया प्रदेश (Rain-shadow Area):
    • जब आर्द्र हवाएँ किसी ऊँचे पर्वत से टकराती हैं, तो वे पर्वत के पवनमुखी ढाल (Windward side) पर अपनी सारी नमी वर्षा के रूप में गिरा देती हैं। जब ये हवाएँ पर्वत के दूसरी ओर पवनविमुखी ढाल (Leeward side) पर उतरती हैं, तो वे शुष्क हो चुकी होती हैं और वर्षा नहीं करतीं। इस क्षेत्र को वृष्टि-छाया प्रदेश कहते हैं।
    • उदाहरण:
      • दक्षिण अमेरिका का पेटागोनिया मरुस्थल एंडीज पर्वत के वृष्टि-छाया क्षेत्र में है।
      • भारत में लद्दाख हिमालय के वृष्टि-छाया क्षेत्र में होने के कारण एक शीत मरुस्थल है। [UPSC Prelims]
  4. महाद्वीपीयता या समुद्र से दूरी (Continentality or Distance from Sea):
    • जो क्षेत्र समुद्र से बहुत दूर महाद्वीपों के आंतरिक भागों में स्थित होते हैं, वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते समुद्री हवाएँ अपनी सारी नमी खो देती हैं, जिससे वे क्षेत्र शुष्क रह जाते हैं।
    • उदाहरण: मध्य एशिया के गोबी मरुस्थल और तकलामकान मरुस्थल का निर्माण इसी कारण से हुआ है।

मरुस्थलों का वर्गीकरण (Classification of Deserts)

मरुस्थलीय स्थलाकृतियाँ (Desert Landforms)

मरुस्थलीय क्षेत्रों में भू-आकृतियों का निर्माण मुख्य रूप से यांत्रिक अपक्षय (Mechanical Weathering) और दो प्रमुख अपरदन कारकों – पवन (Wind or Aeolian processes) और अचानक आने वाली अल्पकालिक वर्षा के जल (Fluvial processes) की संयुक्त क्रिया द्वारा होता है। इन प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप विशिष्ट प्रकार की अपरदनात्मक और निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ बनती हैं।

I. अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ (Erosional Landforms)

ये स्थलाकृतियाँ पवन या जल द्वारा चट्टानों और मिट्टी को हटाने या खुरचने से बनती हैं।

पवन तीन तरीकों से अपरदन करती है: अपवाहन (Deflation) – ढीले कणों को उड़ाना, अपघर्षण (Abrasion) – रेत कणों से चट्टानों को घिसना, और सन्निघर्षण (Attrition) – रेत कणों का आपस में टकराकर टूटना।

मरुस्थलों में वर्षा दुर्लभ लेकिन तीव्र होती है, जिससे अचानक बाढ़ आती है जो अपरदन का एक शक्तिशाली कारक है।


II. निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ (Depositional Landforms)

ये स्थलाकृतियाँ पवन या जल द्वारा लाए गए अवसादों (रेत, गाद, बजरी) के जमाव से बनती हैं।

जब पवन का वेग कम हो जाता है, तो वह अपने साथ उड़ाकर लाए गए रेत कणों को जमा कर देती है।

मरुस्थलीय भू-दृश्य का एक मॉडल

एक आदर्श मरुस्थलीय बेसिन में स्थलाकृतियों का क्रम इस प्रकार होता है:
पर्वत (Mountain)पेडिमेंट (Pediment – अपरदित आधार)बाजदा (Bajada – निक्षेपित ढाल)प्लाया (Playa – केंद्रीय झील)


स्थलाकृति का प्रकारस्थलाकृति का नामनिर्माण प्रक्रिया (पवन या जल द्वारा)
अपरदनात्मक (Erosional)वातगर्त (Blowout)पवन द्वारा रेत और ढीली मिट्टी को उड़ा ले जाने से बना गड्ढा।
छत्रक शिला (Mushroom Rock)पवन द्वारा चट्टान के निचले, नरम हिस्से को अधिक अपरदित करने से बनी छाते जैसी आकृति।
इन्सेलबर्ग (Inselberg)कठोर चट्टानों के वे अवशेष जो आसपास के नरम क्षेत्र के अपरदित हो जाने के बाद एक द्वीप की तरह खड़े रह जाते हैं।
ज्यूजेन (Zeugen)कठोर और नरम चट्टानों की क्षैतिज परतों वाले क्षेत्र में पवन के अपरदन से बनी दावात जैसी आकृति।
यारदांग (Yardang)कठोर और नरम चट्टानों की लंबवत परतों वाले क्षेत्र में पवन के अपरदन से बनी नाव जैसी आकृति।
जालक शिला (Stone Lattice)पवन द्वारा चट्टान के कमजोर हिस्सों को अपरदित करने से बनी जालीनुमा आकृति।
निक्षेपणात्मक (Depositional)बालूका स्तूप (Sand Dunes)पवन द्वारा रेत के टीलों के रूप में जमाव। इनके कई प्रकार हैं – बरखान (अर्धचंद्राकार), अनुदैर्ध्य (सीफ), अनुप्रस्थ। [UPSC Prelims]
लोएस (Loess)पवन द्वारा उड़ाई गई बहुत बारीक धूल का विस्तृत क्षेत्र में जमाव, जो बहुत उपजाऊ मैदान बनाता है। (उदा. उत्तरी चीन का मैदान)।
बाजदा (Bajada)पर्वतीय क्षेत्रों के आधार पर जलोढ़ पंखों (Alluvial Fans) के आपस में मिल जाने से बना मैदान।
प्लाया (Playa)मरुस्थलीय घाटियों के मध्य में बनी एक अस्थायी, उथली और खारी झील। जब यह सूख जाती है, तो नमक की एक सफेद परत रह जाती है, जिसे क्षारीय भूमि (Alkali Flat) कहते हैं।

विश्व के प्रमुख मरुस्थल: एक त्वरित सूची

मरुस्थल का नाममहाद्वीपप्रकार/तथ्य
सहारा मरुस्थलअफ्रीकाविश्व का सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल
अंटार्कटिक मरुस्थलअंटार्कटिकाविश्व का सबसे बड़ा ठंडा मरुस्थल (और कुल मिलाकर सबसे बड़ा मरुस्थल)।
गोबी मरुस्थलएशिया (चीन-मंगोलिया)एशिया का सबसे बड़ा शीत मरुस्थल।
कालाहारी मरुस्थलअफ्रीका (बोत्सवाना, नामीबिया)बुशमैन जनजाति का निवास स्थान।
थार मरुस्थलएशिया (भारत-पाकिस्तान)विश्व का सबसे सघन आबादी वाला मरुस्थल।
ग्रेट विक्टोरियाऑस्ट्रेलियाऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा मरुस्थल।
अटाकामा मरुस्थलदक्षिण अमेरिका (चिली-पेरू)विश्व का सबसे शुष्क मरुस्थल।
पेटागोनिया मरुस्थलदक्षिण अमेरिका (अर्जेंटीना)वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित एक शीत मरुस्थल।

विश्व के प्रमुख मरुस्थल: महाद्वीप और देशवार सूची

महाद्वीपमरुस्थल का नामदेश/क्षेत्रप्रकार/महत्वपूर्ण तथ्य
एशियागोबी मरुस्थलमंगोलिया, चीनशीत मरुस्थल; तकलामकान से सटा हुआ।
थार मरुस्थल (ग्रेट इंडियन डेजर्ट)भारत, पाकिस्तानगर्म मरुस्थल; विश्व का सबसे सघन आबादी वाला
अरेबियन मरुस्थलसऊदी अरब, यमन, ओमान, UAEगर्म मरुस्थल; रुब अल-खाली (विश्व का सबसे बड़ा रेतीला क्षेत्र) इसी का हिस्सा है।
कराकुम मरुस्थलतुर्कमेनिस्तानगर्म मरुस्थल; “काला रेत”।
किज़िलकुम मरुस्थलउज़्बेकिस्तान, कजाखस्तानगर्म मरुस्थल; “लाल रेत”।
तकलामकान मरुस्थलचीन (झिंजियांग प्रांत)शीत मरुस्थल।
अफ्रीकासहारा मरुस्थलउत्तरी अफ्रीका (11 देश)विश्व का सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल।
कालाहारी मरुस्थलबोत्सवाना, नामीबिया, दक्षिण अफ्रीकाअर्ध-शुष्क; बुशमैन (सान) जनजाति का निवास।
नामीब मरुस्थलनामीबिया, अंगोलातटीय मरुस्थल; विश्व के सबसे पुराने मरुस्थलों में से एक।
नूबियन मरुस्थलसूडान, मिस्रसहारा का पूर्वी विस्तार; चट्टानी मरुस्थल।
उत्तरी अमेरिकामोजावे मरुस्थल (Mojave)संयुक्त राज्य अमेरिका (कैलिफोर्निया, नेवादा)गर्म मरुस्थल; डेथ वैली यहीं स्थित है।
सोनोरन मरुस्थलसंयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिकोगर्म मरुस्थल; अपनी कैक्टस विविधता के लिए प्रसिद्ध।
चिहुआहुआन मरुस्थल (Chihuahuan)मेक्सिको, संयुक्त राज्य अमेरिकागर्म मरुस्थल; उत्तरी अमेरिका का सबसे बड़ा।
ग्रेट बेसिन मरुस्थलसंयुक्त राज्य अमेरिकाशीत मरुस्थल; USA का सबसे बड़ा।
दक्षिण अमेरिकाअटाकामा मरुस्थलचिली, पेरूविश्व का सबसे शुष्क मरुस्थल।
पेटागोनिया मरुस्थलअर्जेंटीना, चिलीशीत मरुस्थल; एंडीज का वृष्टि-छाया क्षेत्र।
ऑस्ट्रेलियाग्रेट विक्टोरिया मरुस्थलपश्चिमी और दक्षिणी ऑस्ट्रेलियाऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा मरुस्थल।
ग्रेट सैंडी मरुस्थलपश्चिमी ऑस्ट्रेलियागर्म मरुस्थल।
सिम्पसन मरुस्थलमध्य ऑस्ट्रेलियागर्म मरुस्थल; अपने लाल रेत के टीलों के लिए प्रसिद्ध।
गिब्सन मरुस्थलपश्चिमी ऑस्ट्रेलियागर्म मरुस्थल।
अंटार्कटिकाअंटार्कटिक पोलर डेजर्टअंटार्कटिका महाद्वीपविश्व का सबसे बड़ा ठंडा मरुस्थल और समग्र रूप से विश्व का सबसे बड़ा मरुस्थल।
यूरोपटैबरनास मरुस्थलस्पेनयूरोप का एकमात्र वास्तविक अर्ध-शुष्क मरुस्थल। (यह एक छोटा क्षेत्र है)।

परीक्षा के लिए त्वरित तथ्य:


घास के मैदान (Grasslands)

घास के मैदान वे विस्तृत भू-भाग हैं जहाँ वनस्पतियों में मुख्य रूप से घास (Grasses) की प्रधानता होती है और वृक्ष या तो नगण्य होते हैं या बहुत बिखरे हुए पाए जाते हैं। ये पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystems) आमतौर पर उन क्षेत्रों में विकसित होते हैं जहाँ वर्षा वनों के लिए बहुत कम होती है, लेकिन मरुस्थलों की तुलना में अधिक होती है। इस प्रकार, घास के मैदान वनों और मरुस्थलों के बीच एक संक्रमणकालीन (Transitional) बायोम का निर्माण करते हैं।

घास के मैदानों की प्रमुख विशेषताएँ

घास के मैदानों का वर्गीकरण (Classification of Grasslands)

जलवायु और अक्षांशीय स्थिति के आधार पर घास के मैदानों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

1. उष्णकटिबंधीय घास के मैदान (Tropical Grasslands)

2. शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदान (Temperate Grasslands)


विश्व के प्रमुख घास के मैदान: एक विस्तृत तालिका

⋆ यह तालिका “Match the Following” और सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। [UPSC Prelims/State PSC – Multiple Times]

महाद्वीपघास के मैदान का स्थानीय नामदेश/क्षेत्रप्रकार (Type)महत्वपूर्ण तथ्य
एशिया-यूरोप (यूरेशिया)स्टेपीज (Steppes)मध्य एशिया, पूर्वी यूरोप (रूस, यूक्रेन)शीतोष्णवृक्ष रहित, विशाल मैदान; गेहूँ की खेती और घुड़सवारी के लिए प्रसिद्ध।
यूरोपपुस्टाज (Pustaz)हंगरीशीतोष्णस्टेपीज का ही एक भाग।
उत्तरी अमेरिकाप्रेयरीज (Prairies)संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडाशीतोष्ण“विश्व का अन्न भंडार”; मक्का और गेहूँ के व्यापक उत्पादन के लिए प्रसिद्ध। चेर्नोजम मिट्टी पाई जाती है।
दक्षिण अमेरिकापम्पास (Pampas)अर्जेंटीना, उरुग्वे, ब्राजीलशीतोष्णअत्यंत उपजाऊ; गेहूँ की खेती और पशुपालन (Ranching) के लिए विश्व प्रसिद्ध। अल्फाल्फा नामक पौष्टिक घास।
लानोस (Llanos)वेनेजुएला, कोलंबियाउष्णकटिबंधीय (सवाना)ओरिनोको नदी बेसिन में स्थित।
कैम्पोस (Campos)ब्राजीलउष्णकटिबंधीय (सवाना)ब्राजीलियन हाइलैंड्स में स्थित।
अफ्रीकासवाना (Savanna)मध्य और पूर्वी अफ्रीका (सूडान, केन्या, तंजानिया)उष्णकटिबंधीय⋆ विश्व का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध उष्णकटिबंधीय घास का मैदान; बड़े स्तनधारी जीवों (हाथी, जिराफ, जेब्रा) के लिए प्रसिद्ध।
वेल्ड (Veld)दक्षिण अफ्रीकाशीतोष्णमक्का की खेती और मेरिनो भेड़ पालन (ऊन उद्योग) के लिए प्रसिद्ध।
ऑस्ट्रेलियाडाउन्स (Downs)मरे-डार्लिंग बेसिन (पूर्वी ऑस्ट्रेलिया)शीतोष्णमेरिनो भेड़ पालन और ऊन उद्योग का प्रमुख केंद्र।
सवाना (Savanna)उत्तरी ऑस्ट्रेलियाउष्णकटिबंधीय
न्यूजीलैंडकैंटरबरी (Canterbury)न्यूजीलैंड (दक्षिणी द्वीप)शीतोष्णडाउन्स के समान।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में घास के मैदान

भारत में विशाल शीतोष्ण घास के मैदान (जैसे प्रेयरीज) नहीं पाए जाते हैं, लेकिन यहाँ कई प्रकार के छोटे और विशिष्ट घास के मैदान हैं:

घास के मैदानों का महत्व और खतरे