भू-आकृतियों का विकास:
अंतर्जनित बल (Evolution of Landforms: Endogenic Forces)
पृथ्वी की सतह लगातार बदल रही है। जिन प्रक्रियाओं के कारण पृथ्वी की सतह पर विभिन्न स्थलाकृतियों (Landforms) का निर्माण, विनाश और पुनर्रचना होती है, उन्हें भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ (Geomorphic Processes) कहते हैं। इन प्रक्रियाओं को ऊर्जा प्रदान करने वाले बलों को उनके स्रोत के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: अंतर्जनित बल और बहिर्जनिक बल।
इस अध्याय में हम अंतर्जनित बलों और उनसे निर्मित भू-आकृतियों का अध्ययन करेंगे।
अंतर्जनित बल क्या हैं? (What are Endogenic Forces?)
अंतर्जनित (Endo = अंदर, Genic = उत्पन्न) बल वे बल हैं जो पृथ्वी के आंतरिक भाग से उत्पन्न होते हैं। इन बलों की ऊर्जा का मुख्य स्रोत पृथ्वी के भीतर मौजूद रेडियोधर्मी पदार्थों का विखंडन (Radioactive Decay), घूर्णन, और पृथ्वी के निर्माण के समय से बची हुई अवशिष्ट ऊष्मा है।
💡 ये बल पृथ्वी की सतह पर विषमताओं (Inequalities) को जन्म देते हैं, अर्थात वे कहीं भूमि को ऊपर उठाते हैं तो कहीं नीचे धँसाते हैं। इसी कारण इन्हें ‘निर्माणकारी बल’ (Constructive Forces) भी कहा जाता है। पर्वत, पठार, घाटियाँ और महाद्वीपों का निर्माण इन्हीं बलों का परिणाम है।
अंतर्जनित बलों को उनकी तीव्रता के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
- पटल विरूपणी बल (Diastrophic Forces)
- आकस्मिक बल (Sudden Forces)
1. पटल विरूपणी बल (Diastrophic Forces)
डायस्ट्रोफिज्म का अर्थ है ‘विरूपण’। ये बल अत्यंत धीमी गति से कार्य करते हैं और इनका प्रभाव हजारों या लाखों वर्षों में दिखाई देता है। ये बल पृथ्वी की पर्पटी (Crust) को बड़े पैमाने पर मोड़ने, उठाने, झुकाने और तोड़ने (भ्रंशन) के लिए जिम्मेदार हैं।
पटल विरूपणी बलों को उनकी दिशा के आधार पर दो भागों में बांटा गया है:
A. महादेशजनक संचलन (Epeirogenic Movements)
(“Epeiros” = महाद्वीप)
ये बल ऊर्ध्वाधर (Vertical) रूप से कार्य करते हैं। इनका प्रभाव बहुत बड़े क्षेत्र पर पड़ता है और इनसे महाद्वीपों का निर्माण होता है।
- ऊपरमुखी संचलन (Upward Movement/Uplift):
- इसमें महाद्वीप का कोई बड़ा भाग ऊपर की ओर उठता है या समुद्री तट का उत्थान होता है।
- ⋆ उदाहरण: भारत का कच्छ प्रायद्वीप और कोरोमंडल तट (तमिलनाडु) ऊपरमुखी संचलन के उदाहरण हैं, जिन्हें उन्मज्जन (Emergence) भी कहते हैं।
- अधोमुखी संचलन (Downward Movement/Subsidence):
- इसमें महाद्वीप का कोई बड़ा हिस्सा नीचे की ओर धँस जाता है या समुद्री तट जलमग्न हो जाता है।
- ⋆ उदाहरण: मुंबई तट के पास समुद्र में डूबा हुआ जंगल और द्वारका नगरी का जलमग्न होना अधोमुखी संचलन के प्रमाण हैं, जिसे निमज्जन (Submergence) भी कहते हैं। [UPSC Prelims]
B. पर्वत निर्माणकारी संचलन (Orogenic Movements)
(“Oros” = पर्वत)
ये बल क्षैतिज (Horizontal) रूप से कार्य करते हैं। ये बल मुख्य रूप से पर्वतों के निर्माण के लिए जिम्मेदार हैं। जब ये बल दो विपरीत दिशाओं से एक-दूसरे की ओर कार्य करते हैं तो संपीड़न (Compression) उत्पन्न होता है और जब वे एक-दूसरे से विपरीत दिशा में कार्य करते हैं तो तनाव (Tension) उत्पन्न होता है।
- 1. संपीड़न बल (Compressional Force) – वलन (Folding)
जब क्षैतिज बल आमने-सामने कार्य करते हैं, तो चट्टानों की परतें मुड़ जाती हैं, जिससे वलन (Folds) का निर्माण होता है।- वलन के ऊपर उठे हुए भाग को अपनति (Anticline) और नीचे धँसे हुए भाग को अभिनति (Syncline) कहते हैं। [State PSC]
- इससे वलित पर्वतों (Fold Mountains) का निर्माण होता है।
- ⋆ उदाहरण: हिमालय, आल्प्स, रॉकीज और एंडीज़ विश्व के प्रमुख नवीन वलित पर्वत हैं। इनका निर्माण विवर्तनिक प्लेटों के टकराने (संपीड़न) से हुआ है। [UPSC 2017]
- [आरेख: एक सरल चित्र जिसमें अपनति (Anticline) को ‘A’ आकार की पहाड़ी और अभिनति (Syncline) को ‘U’ आकार की घाटी के रूप में दिखाया गया हो।]
- 2. तनाव बल (Tensional Force) – भ्रंशन (Faulting)
जब क्षैतिज बल एक-दूसरे से विपरीत दिशा में खींचते हैं, तो चट्टानों में तनाव उत्पन्न होता है, जिससे वे टूट जाती हैं या चटक जाती हैं। इस दरार को भ्रंश (Fault) कहते हैं।- भ्रंशन से कई महत्वपूर्ण स्थलाकृतियों का निर्माण होता है:
- भ्रंश घाटी (Rift Valley): जब दो समानांतर भ्रंशों के बीच का भू-भाग नीचे धँस जाता है।
- ⋆ उदाहरण: पूर्वी अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी (Great Rift Valley of Africa), जॉर्डन की भ्रंश घाटी, और भारत में नर्मदा और तापी नदियों की घाटियाँ। [UPSC 2018, MPPSC]
- ब्लॉक पर्वत या हॉर्स्ट पर्वत (Block or Horst Mountain): जब दो भ्रंशों के बीच का भू-भाग ऊपर उठ जाता है या आसपास का क्षेत्र नीचे धँस जाता है।
- उदाहरण: जर्मनी का ब्लैक फॉरेस्ट पर्वत, फ्रांस का वॉस्जेस पर्वत, और भारत में सतपुड़ा पर्वत।
- भ्रंश घाटी (Rift Valley): जब दो समानांतर भ्रंशों के बीच का भू-भाग नीचे धँस जाता है।
- [आरेख: एक ब्लॉक चित्र जिसमें दो भ्रंश रेखाओं के बीच नीचे धँसे भाग को भ्रंश घाटी और ऊपर उठे भाग को ब्लॉक पर्वत के रूप में लेबल किया गया हो।]
- भ्रंशन से कई महत्वपूर्ण स्थलाकृतियों का निर्माण होता है:
2. आकस्मिक बल (Sudden Forces)
ये बल पृथ्वी के आंतरिक भाग से अचानक और विनाशकारी रूप से प्रकट होते हैं। इनका प्रभाव अल्प समय में ही दिखाई देता है और ये अक्सर बड़े पैमाने पर विनाश का कारण बनते हैं।
A. ज्वालामुखी (Volcanism)
ज्वालामुखी (अंग्रेजी: Volcano, लैटिन शब्द ‘Vulcan’ – अग्नि का देवता) वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के गहरे आंतरिक भाग में स्थित पिघली हुई चट्टानें, जिन्हें मैग्मा (Magma) कहते हैं, गैसों, राख और जलवाष्प के साथ अत्यधिक दबाव के कारण भू-पटल को तोड़कर सतह पर आ जाती हैं। जिस छिद्र या दरार से यह पदार्थ बाहर निकलता है, उसे ज्वालामुखी निकास (Vent) कहते हैं, और सतह पर आए हुए मैग्मा को लावा (Lava) कहा जाता है।
ज्वालामुखी एक अंतर्जनित आकस्मिक बल (Endogenic Sudden Force) का परिणाम है और यह पृथ्वी पर नई भू-आकृतियों का निर्माण करने वाली एक प्रमुख निर्माणकारी प्रक्रिया है।
ज्वालामुखी विस्फोट के कारण (Causes of Volcanic Eruption)
- अत्यधिक ताप और प्लेट विवर्तनिकी (High Temperature and Plate Tectonics): पृथ्वी के मेंटल में रेडियोधर्मी पदार्थों के विखंडन और अवशिष्ट ऊष्मा के कारण तापमान बहुत अधिक होता है, जिससे चट्टानें पिघलकर मैग्मा बनाती हैं। विवर्तनिक प्लेटों के क्षेपण (Subduction) क्षेत्रों में, नीचे जाने वाली प्लेट पिघलकर मैग्मा का निर्माण करती है। [UPSC Mains]
- गैसों और जलवाष्प का निर्माण: मैग्मा में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और जलवाष्प जैसी गैसें घुली होती हैं। जब ऊपर का दबाव कम होता है, तो ये गैसें तेजी से फैलती हैं, जैसे सोडा की बोतल खोलने पर होता है, और मैग्मा को विस्फोटक रूप से सतह की ओर धकेलती हैं।
- कमजोर भू-पटल: जहाँ पृथ्वी की पर्पटी (Crust) कमजोर होती है, जैसे भ्रंश (Faults) या प्लेटों के किनारों पर, मैग्मा को सतह तक आने का रास्ता आसानी से मिल जाता है।
ज्वालामुखी से निःसृत पदार्थ (Materials Ejected from Volcanoes)
- गैसें तथा जलवाष्प: ज्वालामुखी उद्गार में जलवाष्प (Water Vapour) की मात्रा सर्वाधिक (60-90%) होती है। अन्य प्रमुख गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन और हाइड्रोजन सल्फाइड शामिल हैं।
- विखंडित पदार्थ (Pyroclastic Materials): ये विस्फोट के साथ निकले ठोस चट्टानी टुकड़े होते हैं।
- ज्वालामुखी धूल (Volcanic Dust): अत्यंत महीन कण।
- राख (Ash): धूल से बड़े कण।
- लैपिली (Lapilli): मटर के दाने या अखरोट के आकार के टुकड़े।
- ज्वालामुखी बम (Volcanic Bombs): बड़े आकार के टुकड़े जो हवा में ही ठंडे होकर जम जाते हैं।
- लावा (Lava): सतह पर निकला हुआ पिघला हुआ मैग्मा लावा कहलाता है। इसकी चिपचिपाहट (Viscosity) सिलिका (Silica) की मात्रा पर निर्भर करती है।
- अम्लीय लावा (Acidic Lava): इसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। यह गाढ़ा, चिपचिपा होता है और धीरे-धीरे बहता है। यह विस्फोटक उद्गार के साथ तीव्र ढाल वाले शंकुओं का निर्माण करता है।
- क्षारीय लावा (Basic Lava): इसमें सिलिका की मात्रा कम होती है। यह पतला और तरल होता है और तेजी से लंबी दूरी तक बहता है। यह शांत उद्गार के साथ कम ढाल वाले शील्ड ज्वालामुखी या लावा पठार बनाता है। [State PSC]
ज्वालामुखी के प्रकार (Types of Volcanoes)
- सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano): वे ज्वालामुखी जिनसे लगातार या थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर लावा, गैस और राख निकलती रहती है।
- ⋆ उदाहरण: इटली का एटना (Etna) और स्ट्राम्बोली (Stromboli) – (स्ट्राम्बोली को ‘भूमध्यसागर का प्रकाश स्तंभ’ – Lighthouse of the Mediterranean कहा जाता है), हवाई द्वीप का मौना लोआ (Mauna Loa)। [UPSC Prelims, UPPSC]
- प्रसुप्त (सुषुप्त) ज्वालामुखी (Dormant Volcano): वे ज्वालामुखी जो लंबे समय से शांत हैं, लेकिन भविष्य में कभी भी फट सकते हैं।
- उदाहरण: इटली का विसुवियस (Vesuvius), जापान का फ्यूजीयामा (Fujiyama), भारत का नारकोंडम द्वीप (Narcondam Island)।
- शांत या विलुप्त ज्वालामुखी (Extinct Volcano): वे ज्वालामुखी जिनमें ऐतिहासिक काल में कोई उद्गार नहीं हुआ है और भविष्य में भी उद्गार की कोई संभावना नहीं है।
- उदाहरण: म्यांमार का माउंट पोपा (Mt. Popa), तंजानिया का किलीमंजारो (Kilimanjaro)।
- केंद्रीय उद्गार (Central Eruption): जब लावा एक संकरे निकास मार्ग या छिद्र (Vent) से बाहर आता है। यह अक्सर विस्फोटक होता है और शंकु (Cone) जैसी आकृतियों का निर्माण करता है।
- दरारी उद्गार (Fissure Eruption): जब लावा एक लंबी दरार या भ्रंश से शांत रूप से बाहर निकलकर एक विस्तृत क्षेत्र में फैल जाता है। यह विस्फोटक नहीं होता।
- ⋆ उदाहरण: भारत का दक्कन ट्रैप (Deccan Traps) इसी प्रकार के उद्गार का परिणाम है, जहाँ क्षारीय (बेसाल्टिक) लावा की मोटी परतें जमा हो गईं। [MPPSC 2020]
ज्वालामुखी द्वारा निर्मित स्थलाकृतियाँ (Landforms formed by Volcanoes)
- ज्वालामुखी शंकु (Volcanic Cones): लावा और विखंडित पदार्थों के जमाव से बने शंक्वाकार पर्वत। (जैसे: सिंडर शंकु, मिश्रित शंकु)।
- क्रेटर (Crater): ज्वालामुखी के शीर्ष पर स्थित कीप (Funnel) के आकार का गड्ढा।
- काल्डेरा (Caldera): जब क्रेटर का आकार धँसाव या विस्फोटक उद्गार के कारण बहुत बड़ा हो जाता है। [UPSC Prelims]
- क्रेटर झील (Crater Lake): जब क्रेटर में पानी भर जाता है। (उदा. महाराष्ट्र की लोनार झील, ओरेगन, USA की क्रेटर लेक)।
- लावा पठार या ट्रैप (Lava Plateau or Traps): दरारी उद्गार से निकले तरल लावा के व्यापक क्षेत्र में फैलकर जमने से निर्मित पठार। (उदा. दक्कन ट्रैप, कोलंबिया का पठार)।
- गीजर (Geysers) और गर्म झरने (Hot Springs): जब भूमिगत जल मैग्मा के संपर्क में आने से गर्म होकर फव्वारे के रूप में या झरने के रूप में सतह पर आता है। (उदा. Yellowstone National Park का Old Faithful Geyser)।
जब मैग्मा सतह तक पहुँचने से पहले ही भू-पटल की दरारों में जम जाता है, तो विभिन्न आकृतियाँ बनती हैं।
| आकृति | विवरण |
| बैथोलिथ (Batholith) | सबसे बड़ा अंतर्वेधी पिंड, गुंबदाकार आकृति। यह पर्वतों का आधार बनाता है। |
| लैकोलिथ (Laccolith) | क्षैतिज रूप से परतदार चट्टानों में मैग्मा का गुंबदाकार जमाव। |
| लैपोलिथ (Lapolith) | तश्तरी (Saucer) के आकार का अवतल (Concave) जमाव। |
| फैकोलिथ (Phacolith) | वलित पर्वतों की अपनति और अभिनति में लावा का जमाव। |
| सिल (Sill) | चट्टानों की परतों के बीच क्षैतिज (Horizontal) रूप से लावा का जमाव। [UPPSC 2021] |
| डाइक (Dyke) | चट्टानों की परतों के बीच लंबवत (Vertical) रूप से लावा का जमाव। |
ज्वालामुखी का विश्व वितरण (World Distribution of Volcanoes)
विश्व के लगभग 80% ज्वालामुखी विवर्तनिक प्लेटों के किनारों पर पाए जाते हैं।
- परि-प्रशांत मेखला (Circum-Pacific Belt): इसे ‘अग्नि वलय’ या ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire) कहते हैं। यहाँ विश्व के दो-तिहाई से अधिक ज्वालामुखी पाए जाते हैं। यह क्षेत्र प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित है और अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Plate Boundaries) से संबंधित है।
- मध्य-महाद्वीपीय मेखला (Mid-Continental Belt): यह भूमध्यसागर से लेकर हिमालय तक फैली है। इटली का विसुवियस और स्ट्राम्बोली इसी मेखला में हैं।
- मध्य-अटलांटिक मेखला (Mid-Atlantic Belt): यह मध्य-अटलांटिक कटक के सहारे स्थित है और अपसारी प्लेट सीमाओं (Divergent Plate Boundaries) से संबंधित है। यहाँ लावा का शांत दरारी उद्भेदन होता है। (उदा. आइसलैंड के ज्वालामुखी)।
विश्व के प्रमुख ज्वालामुखी: एक विस्तृत सूची
यह तालिका UPSC, State PCS और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें ज्वालामुखियों को उनकी भौगोलिक स्थिति और सक्रियता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।
1. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcanoes)
ये वे ज्वालामुखी हैं जिनसे वर्तमान में या हाल के इतिहास में लावा, गैस या राख का उद्गार होता रहा है।
| ज्वालामुखी का नाम | देश/क्षेत्र | प्रकार/विशेष तथ्य | PYQ संदर्भ/महत्व |
| स्ट्राम्बोली (Stromboli) | इटली (लिपारी द्वीप) | मिश्रित शंकु (स्ट्राम्बोलियन उद्गार) | ⋆ “भूमध्यसागर का प्रकाश स्तंभ” कहलाता है क्योंकि इससे लगातार प्रज्वलित गैसें निकलती रहती हैं। [UPPSC/SSC] |
| एटना (Etna) | इटली (सिसली द्वीप) | शील्ड/मिश्रित ज्वालामुखी | यूरोप का सबसे ऊँचा और सबसे सक्रिय ज्वालामुखी। |
| माउंट इरेबस (Mount Erebus) | अंटार्कटिका (रॉस द्वीप) | स्ट्रैटोवोलकैनो | पृथ्वी का सबसे दक्षिणी सक्रिय ज्वालामुखी। |
| मौना लोआ (Mauna Loa) | संयुक्त राज्य अमेरिका (हवाई द्वीप) | शील्ड ज्वालामुखी | ⋆ क्षेत्रफल और आयतन की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय ज्वालामुखी। |
| किलाउआ (Kīlauea) | संयुक्त राज्य अमेरिका (हवाई द्वीप) | शील्ड ज्वालामुखी | विश्व के सबसे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक; लगभग निरंतर उद्गार। |
| कोटोपैक्सी (Cotopaxi) | इक्वाडोर | मिश्रित शंकु (स्ट्रैटोवोलकैनो) | ⋆ विश्व के सबसे ऊँचे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक। [State PSC] |
| माउंट फूजी (माउंट फ्यूजीयामा) | जापान | मिश्रित शंकु | जापान का सबसे ऊँचा पर्वत और पवित्र ज्वालामुखी; तकनीकी रूप से सक्रिय माना जाता है। |
| माउंट सेंट हेलेंस (Mt. St. Helens) | संयुक्त राज्य अमेरिका | मिश्रित शंकु | 1980 के विनाशकारी विस्फोट के लिए प्रसिद्ध है। |
| बैरन द्वीप (Barren Island) | भारत (अंडमान और निकोबार) | मिश्रित शंकु | ⋆ भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी। [UPSC 2018, BPSC] |
| माउंट मेरापी (Mount Merapi) | इंडोनेशिया | मिश्रित शंकु | इंडोनेशिया का सबसे सक्रिय और खतरनाक ज्वालामुखी। |
2. प्रसुप्त (सुषुप्त) ज्वालामुखी (Dormant Volcanoes)
ये वे ज्वालामुखी हैं जो लंबे समय से शांत हैं, लेकिन भविष्य में कभी भी सक्रिय हो सकते हैं।
| ज्वालामुखी का नाम | देश/क्षेत्र | प्रकार/विशेष तथ्य | PYQ संदर्भ/महत्व |
| विसुवियस (Vesuvius) | इटली (नेपल्स की खाड़ी) | मिश्रित शंकु (सोमा-स्ट्रैटोवोलकैनो) | ⋆ इसके विनाशकारी विस्फोट (79 ईस्वी) ने पोम्पेई और हरकुलेनियम शहरों को नष्ट कर दिया था। [World History/Geog. Link] |
| क्राकाटोआ (Krakatoa) | इंडोनेशिया | काल्डेरा | 1883 में हुए इसके ऐतिहासिक विस्फोट को अब तक के सबसे विनाशकारी विस्फोटों में गिना जाता है। |
| माउंट किलिमंजारो (Mt. Kilimanjaro) | तंजानिया | स्ट्रैटोवोलकैनो | ⋆ अफ्रीका का सबसे ऊँचा पर्वत। इसके शिखर पर ग्लेशियर पाए जाते हैं। [UPSC Prelims] |
| मौना किया (Mauna Kea) | संयुक्त राज्य अमेरिका (हवाई द्वीप) | शील्ड ज्वालामुखी | खगोलीय वेधशालाओं के लिए प्रसिद्ध; अपने समुद्री आधार से मापने पर यह विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत है। |
| नारकोंडम द्वीप (Narcondam Island) | भारत (अंडमान और निकोbar) | स्ट्रैटोवोलकैनो | भारत का एकमात्र प्रसुप्त ज्वालामुखी माना जाता है। [UPSC Prelims] |
3. शांत (विलुप्त) ज्वालामुखी (Extinct Volcanoes)
ये वे ज्वालामुखी हैं जिनके ऐतिहासिक काल में उद्गार का कोई रिकॉर्ड नहीं है और भविष्य में भी इसकी कोई संभावना नहीं है।
| ज्वालामुखी का नाम | देश/क्षेत्र | प्रकार/विशेष तथ्य | PYQ संदर्भ/महत्व |
| ओजोस डेल सलाडो (Ojos del Salado) | अर्जेंटीना-चिली सीमा | स्ट्रैटोवोलकैनो | ⋆ यह एंडीज पर्वतमाला पर स्थित विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी है। (इसे कभी-कभी प्रसुप्त भी माना जाता है)। [SSC/Railways] |
| चिम्बोरोजो (Chimborazo) | इक्वाडोर | स्ट्रैटोवोलकैनो | इक्वाडोर का सबसे ऊँचा पर्वत; इसका शिखर पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर स्थित बिंदु है। |
| माउंट पोपा (Mount Popa) | म्यांमार | स्ट्रैटोवोलकैनो | इसके ऊपर एक बौद्ध मठ स्थित होने के कारण यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। |
| माउंट केन्या (Mount Kenya) | केन्या | स्ट्रैटोवोलकैनो | अफ्रीका का दूसरा सबसे ऊँचा पर्वत। |
| देवबंद (Damavand) | ईरान | स्ट्रैटोवोलकैनो | ईरान का सबसे ऊँचा शिखर और एशिया का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी। |
विशेष मामलों का सारांश
- विश्व का सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी: ओजोस डेल सलाडो (यदि सक्रिय माना जाए) या कोटोपैक्सी।
- विश्व का सबसे बड़ा सक्रिय ज्वालामुखी: मौना लोआ (हवाई)।
- भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी: बैरन द्वीप (अंडमान)।
- “भूमध्यसागर का प्रकाश स्तंभ”: स्ट्राम्बोली (इटली)।
- ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire): परि-प्रशांत मेखला, जहाँ विश्व के अधिकांश (लगभग 75%) ज्वालामुखी और भूकंप आते हैं।
यह तालिका आपको “Match the Following” और सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए अच्छी तरह से तैयार करेगी।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में ज्वालामुखी और संबंधित स्थलाकृतियाँ
भारत सीधे तौर पर किसी सक्रिय प्लेट सीमा, जैसे कि ‘रिंग ऑफ फायर’, पर स्थित नहीं है। इस कारण, मुख्य भूमि भारत में वर्तमान में कोई सक्रिय ज्वालामुखी नहीं है। हालांकि, भारत का भूवैज्ञानिक इतिहास ज्वालामुखी गतिविधियों से गहराई से जुड़ा रहा है और इसके प्रमाण आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
भारतीय ज्वालामुखी परिदृश्य को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ज्वालामुखी।
- दक्कन के पठार पर प्राचीन ज्वालामुखी क्रिया।
1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ज्वालामुखी
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एक ज्वालामुखीय द्वीप चाप (Volcanic Island Arc) का हिस्सा है, जो इंडो-बर्मीज प्लेट सीमा के पास स्थित है। यहाँ भारतीय प्लेट, बर्मी प्लेट के नीचे क्षेपित (Subduct) हो रही है। इसी क्षेपण के कारण उत्पन्न मैग्मा ने यहाँ ज्वालामुखियों को जन्म दिया है।
- बैरन द्वीप (Barren Island)
- स्थान: मध्य अंडमान के पूर्व में स्थित।
- स्थिति: सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcano)।
- ⋆ महत्व: यह भारत और दक्षिण एशिया का एकमात्र प्रमाणित सक्रिय ज्वालामुखी है।
- PYQ संदर्भ: “भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी कहाँ स्थित है?” – [UPSC 2018, BPSC]
- गतिविधि: यह ज्वालामुखी लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद 1991 में फिर से सक्रिय हुआ। तब से, इसमें 2017-18 सहित कई बार छोटे-बड़े उद्गार हो चुके हैं। इसका उद्गार मुख्य रूप से स्ट्रोम्बोलियन प्रकार का होता है, जिसमें राख, गैसें और ज्वालामुखी बम निकलते हैं।
- नारकोंडम द्वीप (Narcondam Island)
- स्थान: उत्तरी अंडमान के उत्तर-पूर्व में स्थित।
- स्थिति: प्रसुप्त (सुषुप्त) ज्वालामुखी (Dormant Volcano)।
- महत्व: भूवैज्ञानिकों के अनुसार, इसमें हाल के ऐतिहासिक काल में कोई उद्गार नहीं हुआ है, लेकिन इसमें भविष्य में विस्फोट की क्षमता मौजूद है।
- PYQ संदर्भ: नारकोंडम और बैरन द्वीपों की अवस्थिति से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
- पारिस्थितिक महत्व: यह द्वीप नारकोंडम हॉर्नबिल नामक एक संकटग्रस्त पक्षी प्रजाति का एकमात्र निवास स्थान होने के कारण प्रसिद्ध है और इसे एक अभयारण्य के रूप में संरक्षित किया गया है।
2. दक्कन ट्रैप (The Deccan Traps) – भारत का प्राचीन ज्वालामुखीय प्रदेश
यह भारत की मुख्य भूमि पर हुई सबसे विशाल और प्रभावशाली ज्वालामुखीय घटना का प्रमाण है।
- निर्माण काल: क्रिटेशियस युग (Cretaceous Period) के अंत में, लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले।
- निर्माण प्रक्रिया:
- इसका निर्माण किसी एक ज्वालामुखी शंकु से नहीं, बल्कि दरारी उद्भेदन (Fissure Eruption) से हुआ।
- भारतीय प्लेट जब रियूनियन हॉटस्पॉट (Reunion Hotspot) के ऊपर से गुजर रही थी, तो भू-पटल में बनी लंबी दरारों से अत्यधिक तरल बेसाल्टिक लावा (Basic Basaltic Lava) का शांत प्रवाह हुआ।
- यह लावा की परतें एक के ऊपर एक सीढ़ीदार (Trap) संरचना में जम गईं, जिससे एक विशाल लावा पठार का निर्माण हुआ।
- ⋆ PYQ संदर्भ: “दक्कन ट्रैप का निर्माण किस प्रकार की ज्वालामुखीय प्रक्रिया से हुआ है?” (उत्तर: दरारी उद्भेदन)। [MPPSC 2020]
- भौगोलिक विस्तार:
- यह विश्व के सबसे बड़े ज्वालामुखीय प्रांतों में से एक है, जो लगभग 5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है।
- यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, और कर्नाटक के कुछ हिस्सों को कवर करता है। महाराष्ट्र का अधिकांश भाग इसी पठार पर स्थित है।
- आर्थिक और कृषि महत्व:
- ⋆ काली मिट्टी (Regur Soil): दक्कन ट्रैप की बेसाल्ट चट्टानों के अपक्षय और अपरदन से काली मिट्टी का निर्माण हुआ है। यह मिट्टी नमी धारण करने की उच्च क्षमता और उपजाऊपन के लिए जानी जाती है, और यह कपास की खेती के लिए सर्वथा उपयुक्त है। इसी कारण इसे ‘काली कपासी मिट्टी’ भी कहते हैं। [UPSC, UPPSC]
- खनिज: यहाँ बॉक्साइट और कुछ अर्द्ध-कीमती पत्थरों के भंडार पाए जाते हैं।
भारत में अन्य ज्वालामुखीय संरचनाएँ
हालांकि दक्कन ट्रैप सबसे प्रसिद्ध है, भारत के अन्य हिस्सों में भी प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधि के प्रमाण मिलते हैं:
- मालेनी और गिरनार हिल्स (गुजरात): ये दक्कन ज्वालामुखीय प्रांत के ही हिस्से माने जाते हैं।
- धोसी हिल (हरियाणा): अरावली पर्वतमाला में स्थित यह एक विलुप्त ज्वालामुखी का क्रेटर माना जाता है।
- तोशाम हिल्स (हरियाणा): यहाँ भी प्राचीन ज्वालामुखी गतिविधि के संकेत मिलते हैं।
- लोनार झील (महाराष्ट्र): हालांकि इसे लंबे समय तक एक क्रेटर झील माना जाता था, हाल के अध्ययनों ने इसे उल्कापिंड के प्रभाव से बनी झील (Impact Crater Lake) के रूप में अधिक प्रमाणित किया है। फिर भी, यह बेसाल्ट चट्टानों से घिरी होने के कारण अक्सर ज्वालामुखीय स्थलाकृतियों के साथ पढ़ा जाता है।
भारतीय ज्वालामुखी परिदृश्य का सारांश
| स्थलाकृति/ज्वालामुखी | स्थान | प्रकार | भूवैज्ञानिक काल | प्रमुख विशेषता और PYQ तथ्य |
| बैरन द्वीप | अंडमान सागर | सक्रिय ज्वालामुखी | वर्तमान | भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी। |
| नारकोंडम द्वीप | अंडमान सागर | प्रसुप्त ज्वालामुखी | होलोसीन | नारकोंडम हॉर्नबिल का निवास। |
| दक्कन ट्रैप | प्रायद्वीपीय भारत | लावा पठार (दरारी उद्भेदन) | क्रिटेशियस-पैलियोजीन | बेसाल्टिक लावा से निर्मित, काली मिट्टी का स्रोत। |
| धोसी हिल | हरियाणा | विलुप्त ज्वालामुखी (संभावित) | प्रीकैम्ब्रियन | अरावली श्रृंखला का हिस्सा। |
B. भूकंप (Earthquake)
भूकंप (Earth = भूमि, Quake = कंपन) का शाब्दिक अर्थ है पृथ्वी का काँपना। भूविज्ञान में, भूकंप से तात्पर्य पृथ्वी की सतह पर अचानक होने वाले उस कंपन से है जो भू-पर्पटी (Cr’ust) में ऊर्जा के आकस्मिक रूप से मुक्त होने के कारण उत्पन्न होता है। यह ऊर्जा भ्रंश रेखाओं (Fault Lines) के सहारे तरंगों के रूप में फैलती है, जिससे सतह पर कंपन महसूस होता है।
भूकंप एक अंतर्जनित आकस्मिक बल (Endogenic Sudden Force) है जो अत्यंत विनाशकारी हो सकता है और अल्प समय में ही बड़े पैमाने पर भू-सतह पर परिवर्तन ला सकता है।
भूकंप से संबंधित शब्दावली (Terminology related to Earthquakes)
[आरेख: पृथ्वी की सतह के नीचे उद्गम केंद्र (Focus) और ठीक उसके ऊपर सतह पर अधिकेंद्र (Epicenter) को दर्शाने वाला एक सरल 3D ब्लॉक चित्र। उद्गम केंद्र से सभी दिशाओं में निकलती भूकम्पीय तरंगों को भी दिखाया जाए।]
- उद्गम केंद्र या अवकेंद्र (Focus or Hypocenter):
- भू-पर्पटी के भीतर वह स्थान जहाँ ऊर्जा सबसे पहले मुक्त होती है और भूकंप की शुरुआत होती है। यहीं से भूकम्पीय तरंगें सभी दिशाओं में फैलना शुरू करती हैं।
- अधिकेंद्र (Epicenter):
- पृथ्वी की सतह पर वह बिंदु जो उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (लंबवत) स्थित होता है।
- ⋆ अधिकेंद्र पर ही भूकंपीय तरंगें सबसे पहले पहुँचती हैं, इसलिए यहाँ कंपन की तीव्रता सर्वाधिक होती है। विनाश भी सबसे अधिक अधिकेंद्र के पास ही होता है। [UPSC/State PSC Prelims]
- भूकम्पीय तरंगें (Seismic Waves):
- वे ऊर्जा तरंगें जो उद्गम केंद्र से उत्पन्न होकर पृथ्वी के माध्यम से यात्रा करती हैं। इनके बारे में हम पहले ही पढ़ चुके हैं (P-तरंगें, S-तरंगें और सतही तरंगें)।
- सिस्मोग्राफ (Seismograph):
- वह उपकरण जो भूकम्पीय तरंगों का पता लगाता है और उन्हें रिकॉर्ड करता है। इससे प्राप्त ग्राफ को सिस्मोग्राम (Seismogram) कहते हैं।
भूकंप के कारण (Causes of Earthquakes)
- विवर्तनिक गतिविधियाँ (Tectonic Activities):
- ⋆ यह भूकंपों का सबसे प्रमुख और आम कारण है। विश्व के लगभग 90% भूकंप प्लेट विवर्तनिकी से जुड़े हैं।
- अभिसारी सीमा (Convergent Boundary): जब दो प्लेटें टकराती हैं, तो भारी प्लेट हल्की प्लेट के नीचे क्षेपित (Subduct) होती है, जिससे अत्यधिक ऊर्जा संचित होती है और भूकंप आते हैं। (उदा. प्रशांत महासागर का ‘रिंग ऑफ फायर’)।
- अपसारी सीमा (Divergent Boundary): जब प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं, तो भ्रंश के सहारे उथले भूकंप आते हैं। (उदा. मध्य-अटलांटिक कटक)।
- रूपांतरित सीमा (Transform Boundary): जब प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर क्षैतिज रूप से खिसकती हैं। (उदा. कैलिफोर्निया का सैन एंड्रियास भ्रंश)। [UPSC Prelims]
- ज्वालामुखी क्रिया (Volcanic Activity):
- ज्वालामुखी विस्फोट से पहले या उसके दौरान मैग्मा की तीव्र गति और गैसों के दबाव के कारण स्थानीय, कम तीव्रता वाले भूकंप आ सकते हैं।
- अन्य कारण (Other Causes):
- मानव-जनित कारण (Anthropogenic Causes): बड़े बांधों के जलग्रहण क्षेत्रों में जल के अत्यधिक भार से संतुलन बिगड़ना (इसे जलाशय प्रेरित भूकंप – Reservoir Induced Seismicity कहते हैं), खनन गतिविधियों, और परमाणु विस्फोटों से भी भूकंप आ सकते हैं। [UPSC Mains]
- ⋆ उदाहरण: महाराष्ट्र का कोयना बांध क्षेत्र जलाशय प्रेरित भूकंप का एक प्रसिद्ध उदाहरण है।
- भूस्खलन (Landslides): बड़े पैमाने पर भूस्खलन होने से भी स्थानीय स्तर पर कंपन हो सकता है।
- मानव-जनित कारण (Anthropogenic Causes): बड़े बांधों के जलग्रहण क्षेत्रों में जल के अत्यधिक भार से संतुलन बिगड़ना (इसे जलाशय प्रेरित भूकंप – Reservoir Induced Seismicity कहते हैं), खनन गतिविधियों, और परमाणु विस्फोटों से भी भूकंप आ सकते हैं। [UPSC Mains]
भूकंपीय तरंगों का मापन (Measurement of Earthquakes)
भूकंपीय तरंगों और उनके प्रभावों का मापन दो अलग-अलग गुणों के आधार पर किया जाता है: परिमाण (Magnitude) और तीव्रता (Intensity)। ये दोनों शब्द अक्सर एक दूसरे के स्थान पर उपयोग कर लिए जाते हैं, लेकिन भूविज्ञान में इनके अर्थ बिल्कुल भिन्न हैं और परीक्षाओं में इसी अंतर से प्रश्न बनाए जाते हैं। इन दोनों गुणों को मापने के लिए अलग-अलग पैमानों का उपयोग किया जाता है।
1. परिमाण का मापन: रिक्टर पैमाना (Measuring Magnitude: The Richter Scale)
परिमाण (Magnitude) भूकंप के स्रोत (उद्गम केंद्र) पर मुक्त हुई कुल ऊर्जा (Total Energy Released) का एक माप है। यह एक निरपेक्ष (Absolute) मान है और यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि भूकंप का प्रभाव कहाँ या कैसा महसूस किया गया।
- पैमाना: रिक्टर पैमाना (Richter Scale)
- आविष्कारक: 1935 में चार्ल्स एफ. रिक्टर (Charles F. Richter) द्वारा विकसित।
- मापन का आधार:
- यह सिस्मोग्राफ (Seismograph) द्वारा दर्ज की गई भूकम्पीय तरंगों के आयाम (Amplitude) पर आधारित है। आयाम जितना अधिक होगा, परिमाण उतना ही अधिक होगा।
- पैमाने की प्रकृति: लघुगणकीय (Logarithmic)
- ⋆ यह रिक्टर पैमाने की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। यह एक 10-आधारित लघुगणकीय पैमाना है।
- इसका अर्थ है: पैमाने पर प्रत्येक अगली पूर्ण संख्या (जैसे 5 से 6) पिछली संख्या की तुलना में भूकम्पीय तरंगों के आयाम में 10 गुना वृद्धि दर्शाती है।
- ⋆ ऊर्जा में वृद्धि: परिमाण में 1 अंक की वृद्धि मुक्त हुई ऊर्जा में लगभग 31.6 (लगभग 32) गुना वृद्धि के बराबर होती है।
- उदाहरण: रिक्टर 6 का भूकंप रिक्टर 5 के भूकंप की तुलना में 32 गुना अधिक ऊर्जावान होता है, और रिक्टर 7 का भूकंप रिक्टर 5 की तुलना में लगभग 1000 (32×32) गुना अधिक ऊर्जावान होता है। [UPSC/State PSC Conceptual Question]
- माप की सीमा:
- सैद्धांतिक रूप से इस पैमाने की कोई ऊपरी या निचली सीमा नहीं है, लेकिन 9.5 से अधिक परिमाण का भूकंप अब तक दर्ज नहीं किया गया है (1960 का चिली भूकंप)।
- विशेषता: यह एक मात्रात्मक (Quantitative) पैमाना है जो एक वस्तुनिष्ठ माप प्रस्तुत करता है।
2. तीव्रता का मापन: संशोधित मरकेली पैमाना (Measuring Intensity: The Modified Mercalli Scale)
तीव्रता (Intensity) किसी विशिष्ट स्थान पर भूकंप के प्रभाव (Effects) और उससे हुए विनाश (Damage) का एक माप है। यह इस बात का वर्णन करता है कि भूकंप को मनुष्यों द्वारा कितना शक्तिशाली महसूस किया गया और उसने सतह, इमारतों और अन्य संरचनाओं को कितना नुकसान पहुँचाया।
- पैमाना: संशोधित मरकेली पैमाना (Modified Mercalli Intensity – MMI Scale)
- आविष्कारक: ज्यूसेपे मरकेली (Giuseppe Mercalli) द्वारा विकसित और बाद में अन्य वैज्ञानिकों द्वारा संशोधित।
- मापन का आधार:
- यह अवलोकन (Observation) पर आधारित है। इसमें प्रत्यक्षदर्शियों के अनुभवों, इमारतों को हुई क्षति, और सतह पर देखे गए प्रभावों का आकलन किया जाता है।
- पैमाने की प्रकृति:
- इसे रोमन अंकों (I से XII) में व्यक्त किया जाता है।
- I (एक) का अर्थ है ‘महसूस नहीं किया गया’ (Not felt), जबकि XII (बारह) का अर्थ है ‘प्रलयंकारी विनाश’ (Catastrophic Destruction)।
- विशेषता:
- यह एक गुणात्मक (Qualitative) और व्यक्तिपरक (Subjective) पैमाना है।
- ⋆ एक ही भूकंप की तीव्रता अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग हो सकती है। अधिकेंद्र (Epicenter) के पास तीव्रता सबसे अधिक होगी, और उससे दूर जाने पर यह घटती जाएगी। यह उस क्षेत्र की भूवैज्ञानिक संरचना और निर्माण की गुणवत्ता पर भी निर्भर करती है। [UPSC Prelims – Statement Based Question]
परिमाण (Magnitude) बनाम तीव्रता (Intensity) – एक तुलनात्मक तालिका
यह तालिका परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दोनों अवधारणाओं के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है।
| तुलना का आधार | परिमाण (Magnitude) | तीव्रता (Intensity) |
| क्या मापता है? | भूकंप के स्रोत पर मुक्त हुई ऊर्जा। | किसी स्थान पर भूकंप का प्रभाव और विनाश। |
| पैमाना | रिक्टर पैमाना | संशोधित मरकेली पैमाना |
| मान | एक भूकंप का केवल एक परिमाण होता है। (जैसे 7.2) | एक भूकंप की कई तीव्रताएँ हो सकती हैं (स्थान के अनुसार बदलती हैं)। (जैसे IV, VII, IX) |
| पैमाने का प्रकार | मात्रात्मक (Quantitative), उपकरण आधारित। | गुणात्मक (Qualtive), अवलोकन आधारित। |
| स्केल की प्रकृति | लघुगणकीय (Logarithmic) (0 से 10…) | वर्णनात्मक (Roman I से XII)। |
| प्रभावित करने वाले कारक | केवल स्रोत पर मुक्त ऊर्जा। | मुक्त ऊर्जा, अधिकेंद्र से दूरी, स्थानीय भूविज्ञान, इमारतों की गुणवत्ता। |
| PYQ कीवर्ड | ⋆ ऊर्जा <br> ⋆ लघुगणकीय | ⋆ विनाश/प्रभाव <br> ⋆ अवलोकन |
निष्कर्ष:
संक्षेप में, परिमाण (Magnitude) बताता है कि भूकंप स्रोत पर कितना ‘बड़ा’ था, जबकि तीव्रता (Intensity) बताती है कि किसी विशेष स्थान पर कंपन कितना ‘शक्तिशाली’ महसूस हुआ और उसने कितनी ‘तबाही’ मचाई। एक बड़ा भूकंप (उच्च परिमाण) यदि किसी निर्जन क्षेत्र में आता है, तो उसकी तीव्रता कम दर्ज की जा सकती है, जबकि एक मध्यम परिमाण का भूकंप यदि घनी आबादी वाले क्षेत्र में आता है, तो उसकी तीव्रता बहुत अधिक हो सकती है।
सिस्मोग्राफ (Seismograph)
सिस्मोग्राफ (Seismograph) (ग्रीक शब्द ‘Seismos’ अर्थात ‘कंपन’ और ‘Grapho’ अर्थात ‘लिखना’) वह वैज्ञानिक उपकरण है जिसका उपयोग भूकम्पीय तरंगों का पता लगाने, उन्हें मापने और उनका रिकॉर्ड (अभिलेख) दर्ज करने के लिए किया जाता है। यह उपकरण भूकम्प विज्ञान (Seismology) का एक मूलभूत आधार है, क्योंकि इसी के द्वारा प्राप्त आंकड़ों से वैज्ञानिक भूकंप के परिमाण (Magnitude), स्थान (Location), और गहराई का निर्धारण करते हैं।
इस उपकरण द्वारा उत्पन्न ग्राफिकल रिकॉर्ड को सिस्मोग्राम (Seismogram) कहा जाता है।
सिस्मोग्राफ का मूल सिद्धांत (Basic Principle of Seismograph)
सिस्मोग्राफ का मूल सिद्धांत जड़त्व (Inertia) के नियम पर आधारित है। जड़त्व किसी वस्तु का वह गुण है जिसके कारण वह अपनी विरामावस्था या गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती है।
- कार्यप्रणाली का सरलीकरण:
- एक सिस्मोग्राफ में एक भारी भार (Weight) होता है जो एक फ्रेम से स्प्रिंग या तार के माध्यम से लटका होता है। यह भार जड़त्व के कारण स्थिर रहने की प्रवृत्ति रखता है।
- यह फ्रेम मजबूती से जमीन से जुड़ा होता है।
- जब भूकंप आता है, तो जमीन और उसके साथ जुड़ा हुआ फ्रेम कांपने लगता है।
- लेकिन जड़त्व के कारण, लटका हुआ भारी भार अपनी जगह पर स्थिर बना रहता है।
- इस स्थिर भार से एक पेन (Stylus) जुड़ा होता है, जो घूमते हुए ड्रम (Rotating Drum) पर लगे कागज पर लगातार एक रेखा बनाता रहता है।
- जब फ्रेम कांपता है, तो ड्रम भी उसके साथ कांपता है, लेकिन पेन स्थिर रहता है। इस सापेक्ष गति (Relative Motion) के कारण, कागज पर एक टेढ़ी-मेढ़ी (zig-zag) रेखा दर्ज हो जाती है।
- यही टेढ़ी-मेढ़ी रेखा या ग्राफ सिस्मोग्राम कहलाता है, जो भूकम्पीय तरंगों के आने और उनकी तीव्रता को दर्शाता है।
[आरेख: एक सरल सिस्मोग्राफ का चित्र जिसमें जमीन से जुड़ा एक फ्रेम, उससे लटका हुआ एक भारी भार, उस भार से जुड़ा एक पेन, और घूमता हुआ एक ड्रम दिखाया गया हो। ड्रम पर भूकम्पीय तरंगों को एक सिस्मोग्राम के रूप में दर्ज होते हुए दिखाया जाए।]
आधुनिक सिस्मोग्राफ
पुराने यांत्रिक सिस्मोग्राफों की जगह अब आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सिस्मोग्राफ ने ले ली है।
- कार्यप्रणाली: ये उपकरण जमीन की गति को सीधे यांत्रिक रूप से दर्ज करने के बजाय, उसे एक इलेक्ट्रिकल सिग्नल (Electrical Signal) में बदल देते हैं।
- सेंसर: इनमें भारी भार की जगह अत्यंत संवेदनशील सेंसर (Geophones या Seismometers) का उपयोग किया जाता है जो जमीन के बहुत सूक्ष्म कंपन को भी माप सकते हैं।
- डेटा रिकॉर्डिंग: इलेक्ट्रिकल सिग्नल को एम्प्लीफाई (बढ़ाया) किया जाता है और फिर उसे डिजिटल रूप में कंप्यूटर पर संग्रहीत कर लिया जाता है।
- लाभ:
- ये बहुत अधिक संवेदनशील होते हैं।
- डेटा का विश्लेषण करना और उसे दुनिया भर में भेजना आसान होता है।
- ये भूकंप की त्रि-आयामी (3-D) गति (उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, और ऊर्ध्वाधर) को दर्ज कर सकते हैं।
सिस्मोग्राम की व्याख्या (Interpreting a Seismogram)
सिस्मोग्राम वैज्ञानिकों को भूकंप के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ देता है:
- तरंगों के आगमन का समय (Arrival Time of Waves):
- सिस्मोग्राम पर सबसे पहले P-तरंगें (Primary Waves) दर्ज होती हैं, क्योंकि वे सबसे तेज चलती हैं।
- उनके बाद S-तरंगें (Secondary Waves) दर्ज होती हैं।
- सबसे अंत में सतही तरंगें (Surface Waves) दर्ज होती हैं, जिनका आयाम (Amplitude) सबसे अधिक होता है और वे सबसे विनाशकारी होती हैं।
- भूकंप के अधिकेंद्र का निर्धारण (Locating the Epicenter):
- ⋆ P-तरंगों और S-तरंगों के बीच का समयांतराल (Time Gap) यह बताता है कि भूकंप सिस्मोग्राफ स्टेशन से कितनी दूर है। यह अंतराल जितना अधिक होगा, भूकंप उतना ही दूर होगा।
- एक स्टेशन केवल दूरी बता सकता है, दिशा नहीं। इसलिए, भूकंप के अधिकेंद्र का सटीक स्थान निर्धारित करने के लिए कम से कम तीन (3) सिस्मोग्राफ स्टेशनों के डेटा की आवश्यकता होती है।
- प्रत्येक स्टेशन अपनी दूरी को त्रिज्या (Radius) मानकर एक वृत्त खींचता है। तीनों वृत्तों का प्रतिच्छेदन बिंदु (Intersection Point) ही भूकंप का अधिकेंद्र (Epicenter) होता है। इस प्रक्रिया को त्रिअंकन (Triangulation) कहते हैं। [UPSC Prelims – Conceptual]
- परिमाण का निर्धारण (Determining the Magnitude):
- सिस्मोग्राम पर दर्ज की गई तरंगों के आयाम (Amplitude), विशेष रूप से सबसे बड़ी तरंग के आयाम, का उपयोग रिक्टर पैमाने (Richter Scale) पर भूकंप का परिमाण निर्धारित करने के लिए किया जाता है।
परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बिंदु:
- सिद्धांत: सिस्मोग्राफ जड़त्व (Inertia) के सिद्धांत पर कार्य करता है।
- उत्पाद: सिस्मोग्राफ से प्राप्त रिकॉर्ड को सिस्मोग्राम (Seismogram) कहते हैं।
- विश्लेषण:
- P और S तरंगों के बीच का समयांतराल अधिकेंद्र की दूरी बताता है।
- अधिकेंद्र का सटीक स्थान पता करने के लिए कम से कम तीन स्टेशनों की आवश्यकता होती है (त्रिअंकन)।
- तरंगों का आयाम भूकंप का परिमाण निर्धारित करता है।
- उपकरण: आधुनिक उपकरण जमीन की गति को इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदलते हैं।
यह उपकरण न केवल भूकंपों का अध्ययन करने में मदद करता है, बल्कि यह पृथ्वी की आंतरिक संरचना (जैसे तरल बाहरी क्रोड) को समझने और परमाणु परीक्षणों की निगरानी करने में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भूकंप का विश्व वितरण (World Distribution of Earthquakes)
विश्व में भूकंप का वितरण ज्वालामुखियों के वितरण से काफी मिलता-जुलता है। प्रमुख भूकंपीय क्षेत्र विवर्तनिक प्लेटों की सीमाओं के साथ स्थित हैं।
- परि-प्रशांत मेखला (Circum-Pacific Belt) – रिंग ऑफ फायर:
- यह विश्व की सबसे विस्तृत और सक्रिय भूकंपीय पेटी है। विश्व के लगभग 68% भूकंप इसी क्षेत्र में आते हैं।
- यह क्षेत्र अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Plate Boundaries) के साथ स्थित है। जापान, फिलीपींस, चिली, अलास्का इसी पेटी में आते हैं।
- मध्य-महाद्वीपीय मेखला (Mid-Continental Belt):
- यह विश्व की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण पेटी है, जहाँ लगभग 21% भूकंप आते हैं।
- यह यूरेशियन प्लेट और अफ्रीकी-भारतीय प्लेटों के टकराव वाले क्षेत्र में फैली है। भूमध्य सागर, आल्प्स, काकेशस पर्वत से लेकर हिमालय तक यह विस्तृत है। भारत का भूकंपीय क्षेत्र इसी मेखला का हिस्सा है।
- मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge):
- यह अपसारी प्लेट सीमाओं के साथ स्थित है और यहाँ सामान्यतः उथले और कम तीव्रता वाले भूकंप आते हैं।
भूकंप के प्रभाव (Effects of Earthquakes)
| सकारात्मक प्रभाव (Positive Effects) | नकारात्मक प्रभाव (Negative Effects) |
| ∙ नई भू-आकृतियों का निर्माण (जैसे भ्रंश)।<br>∙ बहुमूल्य खनिजों का सतह के निकट आना।<br>∙ तटीय क्षेत्रों का उत्थान, जिससे नए बंदरगाह बन सकते हैं।<br>∙ भूजल स्तर में परिवर्तन। | ∙ ⋆ सुनामी (Tsunami): जब समुद्र तल पर भूकंप आता है, तो विनाशकारी समुद्री लहरें उत्पन्न होती हैं। [UPSC 2018 Mains]<br>∙ ⋆ द्रवीकरण (Liquefaction): रेत या गाद जैसी ढीली मिट्टी में पानी के दबाव से भूमि ठोस की बजाय तरल जैसा व्यवहार करने लगती है, जिससे इमारतें धँस जाती हैं। [UPSC Prelims]<br>∙ जन-धन की हानि।<br>∙ भूस्खलन और हिमस्खलन।<br>∙ आग लगना (गैस पाइपलाइन टूटने से)।<br>∙ बांधों और पुलों का टूटना। |
भारत का भूकंपीय ज़ोनिंग मानचित्र (Seismic Zoning Map of India)
भारत को भूकंपीयता के आधार पर चार मुख्य ज़ोनों में बांटा गया है (पहले पाँच थे, ज़ोन I को II में मिला दिया गया है)।
- ज़ोन V (बहुत अधिक जोखिम): संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत, जम्मू और कश्मीर के कुछ हिस्से, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात का कच्छ, उत्तरी बिहार।
- ज़ोन IV (अधिक जोखिम): दिल्ली, सिक्किम, उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग, बिहार और पश्चिम बंगाल का शेष भाग, गुजरात के कुछ हिस्से, पश्चिमी तट के पास महाराष्ट्र का कुछ हिस्सा।
- ज़ोन III (मध्यम जोखिम): केरल, गोवा, लक्षद्वीप, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल के शेष हिस्से, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश।
- ज़ोन II (कम जोखिम): प्रायद्वीपीय पठार का अधिकांश हिस्सा।
निष्कर्ष: भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है जिसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन उचित तैयारी, भूकंपरोधी भवनों का निर्माण, और पूर्व चेतावनी प्रणालियों के विकास से इसके विनाशकारी प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
भूकंप द्वारा निर्मित या प्रभावित स्थलाकृतियाँ
भूकंपीय गतिविधियाँ सीधे तौर पर प्रमुख स्थलाकृतियों (जैसे पर्वत) का निर्माण नहीं करतीं, बल्कि वे पृथ्वी की सतह पर विध्वंसक और संशोधक (Destructive and Modificatory) प्रभाव डालती हैं। भूकंप के कारण होने वाले कंपन, भूमि के खिसकने, और सतह के टूटने से कई छोटी और बड़ी भू-आकृतियाँ अप्रत्यक्ष रूप से उत्पन्न या प्रभावित होती हैं।
1. भ्रंश और संबंधित स्थलाकृतियाँ (Faults and Related Landforms)
- भ्रंश कगार (Fault Scarp):
- यह भूकंप का सबसे प्रत्यक्ष और स्पष्ट स्थलाकृतिक परिणाम है। जब भूकंप के दौरान भ्रंश (Fault) के एक तरफ की भूमि दूसरी तरफ की भूमि की तुलना में ऊपर या नीचे खिसक जाती है, तो एक खड़ी ढलान या ‘कगार’ का निर्माण होता है।
- उदाहरण: 1897 के असम भूकंप के दौरान लगभग 11 मीटर ऊँचा भ्रंश कगार बन गया था।
- दरारें और विदर (Cracks and Fissures):
- तीव्र कंपन के कारण सतह पर सैकड़ों मीटर लंबी और कई मीटर चौड़ी दरारें खुल सकती हैं। ये दरारें सड़कों, खेतों और इमारतों को फाड़ सकती हैं। कभी-कभी इन दरारों से पानी या कीचड़ भी बाहर आने लगता है।
2. उत्थान और निमज्जन (Uplift and Subsidence)
भूकंप के कारण पृथ्वी की पर्पटी के बड़े हिस्से का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे ऊर्ध्वाधर (Vertical) परिवर्तन होते हैं।
- तटीय क्षेत्रों का उत्थान (Uplift of Coastal Areas):
- शक्तिशाली भूकंप समुद्र तल को या तटीय भूमि को स्थायी रूप से ऊपर उठा सकते हैं। इससे समुद्री तटरेखा (Coastline) समुद्र की ओर खिसक जाती है, और पहले जो क्षेत्र पानी के नीचे थे, वे बाहर आ जाते हैं।
- उदाहरण: 1899 के अलास्का भूकंप के दौरान कुछ तटीय क्षेत्रों में 15 मीटर तक का उत्थान दर्ज किया गया था।
- तटीय क्षेत्रों का निमज्जन (Subsidence of Coastal Areas):
- इसी प्रकार, भूकंप के कारण तटीय क्षेत्र स्थायी रूप से नीचे धँस सकते हैं, जिससे भूमि जलमग्न हो जाती है और तटरेखा भूमि की ओर खिसक जाती है।
- ⋆ PYQ Link: 2004 के हिंद महासागर भूकंप के दौरान, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी बिंदु ‘इंदिरा पॉइंट’ (Indira Point) आंशिक रूप से समुद्र में डूब गया था। यह निमज्जन का एक प्रमुख उदाहरण है। [UPSC/State PSC]
3. द्रवीकरण से संबंधित आकृतियाँ (Landforms related to Liquefaction)
द्रवीकरण (Liquefaction) वह प्रक्रिया है जब भूकंपीय कंपन के कारण संतृप्त (Saturated) रेतीली या गादयुक्त भूमि अपनी मजबूती खो देती है और एक तरल पदार्थ की तरह व्यवहार करने लगती है।
- रेत के फोड़े (Sand Boils) और बालू के ज्वालामुखी (Sand Volcanoes):
- द्रवीकरण के दौरान, दबाव के कारण पानी और रेत सतह पर बनी दरारों से फव्वारे की तरह बाहर निकलते हैं और सतह पर छोटे-छोटे टीलों (Mounds) के रूप में जमा हो जाते हैं। इन्हें बालू के ज्वालामुखी (Sand Volcanoes) कहा जाता है।
- पार्श्विक फैलाव (Lateral Spreading):
- हल्की ढलान वाले क्षेत्रों में, द्रवीकृत परत के ऊपर की ठोस मिट्टी की परतें गुरुत्वाकर्षण के कारण टूटने और क्षैतिज रूप से फैलने लगती हैं।
4. भूस्खलन और संबंधित आकृतियाँ (Landslides and Related Landforms)
पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में भूकंप भूस्खलन (Landslides) का एक प्रमुख कारण है।
- भूस्खलन से बनी झीलें (Landslide-dammed Lakes):
- जब एक बड़ा भूस्खलन नदी की घाटी में गिरता है, तो वह नदी के प्रवाह को अवरुद्ध कर देता है, जिससे उसके पीछे पानी जमा होने लगता है और एक अस्थायी झील का निर्माण हो जाता है।
- खतरा: ये झीलें बहुत खतरनाक होती हैं क्योंकि यह प्राकृतिक बाँध कभी भी टूट सकता है, जिससे下游 (downstream) में अचानक और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
- ⋆ उदाहरण: 1950 के असम भूकंप के बाद सुबनसिरी नदी में कई ऐसी झीलें बन गई थीं।
5. सुनामी (Tsunami)
हालांकि सुनामी स्वयं में एक स्थलाकृति नहीं है, लेकिन यह तटीय स्थलाकृतियों में भारी परिवर्तन लाती है।
- प्रभाव: शक्तिशाली सुनामी लहरें तटीय क्षेत्रों में भारी अपरदन करती हैं, समुद्र तटों (Beaches) को नष्ट कर सकती हैं, रेत के टीलों को समतल कर सकती हैं और बड़ी मात्रा में अवसाद को भूमि के आंतरिक भागों में जमा कर सकती हैं। 2004 की सुनामी ने अंडमान और निकोबार तथा तमिलनाडु के तटीय भूगोल को स्थायी रूप से बदल दिया।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, भूकंप मुख्य रूप से एक विध्वंसक और संशोधक (Destructive and Modificatory) भू-आकृतिक एजेंट है। यह सीधे तौर पर पर्वत नहीं बनाता, बल्कि सतह को तोड़कर, भूमि को ऊपर-नीचे खिसकाकर, और ढीली सामग्री को द्रवीकृत करके पहले से मौजूद भू-दृश्य को एक नया, और अक्सर खतरनाक, स्वरूप प्रदान करता है।
परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बिंदु:
- भ्रंश कगार (Fault Scarp): भूकंप का सीधा स्थलाकृतिक प्रमाण।
- उत्थान और निमज्जन (Uplift and Subsidence): तटीय भूगोल पर स्थायी प्रभाव। इंदिरा पॉइंट का डूबना एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- द्रवीकरण (Liquefaction): शहरी क्षेत्रों में विनाश का एक प्रमुख कारण।
- भूस्खलन से बनी झीलें: एक खतरनाक द्वितीयक प्रभाव।
- सुनामी: समुद्र के नीचे आने वाले भूकंप का सबसे विनाशकारी परिणाम।
अंतर्जनित बलों का सारांश
| बल का प्रकार | उप-प्रकार | गति | दिशा | मुख्य निर्मित भू-आकृति | उदाहरण |
| पटल विरूपणी (Diastrophic) | महादेशजनक | धीमी | ऊर्ध्वाधर | महाद्वीप, तटीय मैदान | भारत का कोरोमंडल तट (उत्थान) |
| पर्वत निर्माणकारी | धीमी | क्षैतिज | वलित पर्वत, भ्रंश घाटी, ब्लॉक पर्वत | हिमालय, नर्मदा घाटी, सतपुड़ा पर्वत | |
| आकस्मिक (Sudden) | ज्वालामुखी | तीव्र | आकस्मिक | ज्वालामुखी पर्वत, लावा पठार | दक्कन का पठार |
| भूकंप | तीव्र | आकस्मिक | (अप्रत्यक्ष रूप से) भूस्खलन, दरारें | – |
बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ (Evolution of Landforms: Exogenic Processes)
जबकि अंतर्जनित बल पृथ्वी की सतह पर विषमताओं (जैसे पर्वत, पठार) का निर्माण करते हैं, वहीं बहिर्जनिक बल इन विषमताओं को खत्म करके सतह को समतल करने का प्रयास करते हैं। ये दोनों बल पृथ्वी की सतह को आकार देने के लिए लगातार एक-दूसरे के विपरीत कार्य करते रहते हैं।
बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ क्या हैं? (What are Exogenic Processes?)
बहिर्जनिक (Exo = बाहर, Genic = उत्पन्न) प्रक्रियाएँ वे होती हैं जो अपनी ऊर्जा पृथ्वी की सतह के ऊपर से, मुख्य रूप से सौर ऊर्जा (Solar Energy) और गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) से प्राप्त करती हैं।
💡 इन प्रक्रियाओं का मुख्य कार्य पृथ्वी की सतह पर मौजूद उभरी हुई स्थलाकृतियों का अपरदन (Erosion) करना और निचले क्षेत्रों या गर्तों में उस अपरदित सामग्री का निक्षेपण (Deposition) करना है। इसी कारण, बहिर्जनिक प्रक्रियाओं को सामूहिक रूप से अनाच्छादन (Denudation) कहा जाता है और इन्हें ‘विनाशकारी बल’ (Destructive Forces) भी माना जाता है, क्योंकि ये स्थलाकृतियों को नीचा करने का काम करती हैं।
अनाच्छादन की प्रक्रिया में निम्नलिखित तीन क्रियाएँ शामिल हैं:
- अपक्षय (Weathering)
- वृहत् संचलन (Mass Movement)
- अपरदन और निक्षेपण (Erosion and Deposition)
1. अपक्षय (Weathering)
अपक्षय वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा चट्टानें अपने ही स्थान पर (in-situ) यांत्रिक (भौतिक) रूप से टूटती हैं या रासायनिक रूप से विघटित होती हैं।
⋆ मुख्य अंतर: अपक्षय में चट्टानी पदार्थों का परिवहन (transportation) शामिल नहीं होता है, जबकि अपरदन में परिवहन आवश्यक है। [UPSC/State PSC Conceptual Question]
अपक्षय को तीन मुख्य प्रकारों में बांटा गया है:
- A. भौतिक या यांत्रिक अपक्षय (Physical or Mechanical Weathering)
इसमें चट्टानें बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के भौतिक बलों के कारण छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती हैं। यह शुष्क और ठंडे प्रदेशों में अधिक प्रभावी होता है।- तापमान परिवर्तन (Temperature Changes): दिन में चट्टानें गर्म होकर फैलती हैं और रात में ठंडी होकर सिकुड़ती हैं। इस निरंतर फैलने-सिकुड़ने से चट्टानों में तनाव पैदा होता है और वे टूट जाती हैं (विशेषकर मरुस्थलीय क्षेत्रों में)।
- तुषार क्रिया (Frost Action): ठंडे प्रदेशों में, चट्टानों की दरारों में भरा पानी रात में जम जाता है। जमने पर पानी का आयतन बढ़ता है, जिससे वह दरारों पर अत्यधिक दबाव डालता है और उन्हें चौड़ा कर देता है। इस प्रक्रिया को तुषार वेजिंग (Frost Wedging) कहते हैं।
- नमक क्रिस्टलीकरण (Salt Crystallization): शुष्क क्षेत्रों में, चट्टानों की दरारों में नमक के घोल के वाष्पीकृत होने से नमक के क्रिस्टल बनते हैं, जो फैलकर चट्टान पर दबाव डालते हैं।
- B. रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering)
इसमें वायुमंडलीय गैसों (ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड) और जल की रासायनिक क्रियाओं के कारण चट्टानों के खनिज विघटित या परिवर्तित हो जाते हैं। यह गर्म और आर्द्र (गर्म और नम) जलवायु में सबसे अधिक प्रभावी होता है।- विलयन (Solution): जब चट्टानों में मौजूद घुलनशील खनिज (जैसे सेंधा नमक, जिप्सम) पानी में घुल जाते हैं।
- कार्बोनेशन (Carbonation): जब वर्षा का जल वायुमंडल की कार्बन डाइऑक्साइड से मिलकर कमजोर कार्बोनिक एसिड बनाता है, तो यह चूना पत्थर (Limestone) जैसी चट्टानों को आसानी से घोल देता है, जिससे कार्स्ट स्थलाकृति (जैसे गुफाएँ) बनती है। [UPSC Prelims]
- जलयोजन (Hydration): जब चट्टानों के खनिज पानी को सोखकर फैल जाते हैं, जिससे चट्टान कमजोर होकर टूट जाती है।
- ऑक्सीकरण (Oxidation): जब लौह युक्त खनिजों का संपर्क ऑक्सीजन से होता है, तो उनमें जंग (Rust) लग जाता है, जिससे चट्टान का रंग लाल-भूरा हो जाता है और वह कमजोर पड़ जाती है (जैसे लेटराइट मिट्टी का निर्माण)।
- C. जैविक अपक्षय (Biological Weathering)
जीव-जंतुओं और वनस्पतियों द्वारा चट्टानों के टूटने की प्रक्रिया।- वनस्पतियाँ: पौधों की जड़ें चट्टानों की दरारों में प्रवेश करके उन्हें चौड़ा करती हैं।
- जीव-जंतु: केंचुए, दीमक, चूहे जैसे बिल बनाने वाले जीव चट्टानों को कमजोर करते हैं।
- मानव: खनन, सड़क निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियाँ भी अपक्षय को तेज करती हैं।
2. वृहत् संचलन (Mass Movement or Mass Wasting)
वृहत् संचलन वह प्रक्रिया है जिसमें चट्टान, मलबा या मिट्टी गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव के कारण ढलान के सहारे नीचे की ओर खिसकती है। इसमें अपरदन के कारकों (नदी, हवा) की कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं होती; गुरुत्वाकर्षण ही मुख्य चालक बल है।
- धीमी गति से संचलन (Slow Movements):
- मृदा सर्पण (Soil Creep): मिट्टी और मलबे का ढलान के सहारे अत्यंत धीमी गति से खिसकना। यह प्रक्रिया नंगी आँखों से दिखाई नहीं देती, लेकिन झुके हुए पेड़ और बिजली के खंभे इसके प्रमाण होते हैं।
- तीव्र गति से संचलन (Rapid Movements):
- भूस्खलन (Landslide): चट्टानों और मलबे का ढलान के सहारे तेजी से नीचे खिसकना। यह अक्सर भूकंप, भारी वर्षा या मानवीय गतिविधियों (जैसे सड़क निर्माण) द्वारा शुरू होता है। हिमालय क्षेत्र भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। [UPSC Mains]
- पंक प्रवाह (Mudflow): जब भारी वर्षा के कारण मिट्टी और मलबा पानी में संतृप्त होकर एक गाढ़ी नदी की तरह ढलान से नीचे बहता है। यह ज्वालामुखी क्षेत्रों में भी होता है (जिन्हें लाहर – Lahar कहते हैं)।
- अवपतन (Slump): जब चट्टान या मिट्टी का एक बड़ा हिस्सा एक घुमावदार सतह के साथ नीचे की ओर खिसकता है।
3. अपरदन और निक्षेपण (Erosion and Deposition)
अपरदन वह प्रक्रिया है जिसमें गतिशील प्राकृतिक कारक (जैसे बहता जल, हवा, हिमनद, समुद्री लहरें) चट्टानों को तोड़कर या खुरचकर उनके पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं।
निक्षेपण वह प्रक्रिया है जिसमें इन कारकों का वेग कम होने पर वे अपने साथ लाए गए अपरदित पदार्थों को जमा कर देते हैं।
| अपरदन के कारक (Agent of Erosion) | अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ (Erosional Landforms) | निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ (Depositional Landforms) |
| नदी (बहता जल) | ‘V’ आकार की घाटी, गॉर्ज, कैनियन, जलप्रपात, जलगर्तिका | जलोढ़ पंख, जलोढ़ शंकु, बाढ़ के मैदान, प्राकृतिक तटबंध, डेल्टा |
| भूमिगत जल | लैपीज, घोल रंध्र (सिंकहोल), गुफाएँ, कंदराएँ | स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट, कंदरा स्तंभ |
| हिमनद (ग्लेशियर) | ‘U’ आकार की घाटी, सर्क, हॉर्न, नुनाटक | हिमोढ़ (मोरेन), ड्रमलिन, एस्कर |
| पवन (हवा) | वातगर्त (Blowout), छत्रक शिला (Mushroom Rock), ज्यूजेन, यारदांग | बालूका स्तूप (Sand Dunes), लोएस का मैदान |
| समुद्री लहरें | समुद्री क्लिफ, समुद्री गुफा, स्टैक, वेव-कट प्लेटफॉर्म | पुलीन (Beaches), रोधिका (Bars), स्पिट, लैगून |
निष्कर्ष: बहिर्जनिक प्रक्रियाएँ लगातार अंतर्जनित बलों द्वारा निर्मित स्थलाकृतियों को संशोधित करती रहती हैं। अपक्षय चट्टानों को कमजोर करता है, वृहत् संचelen गुरुत्वाकर्षण के कारण मलबे को नीचे लाता है, और अपरदन के कारक इस मलबे को दूर तक ले जाकर सतह को समतल करने का प्रयास करते हैं, जिससे पृथ्वी का भू-दृश्य एक गतिशील और कभी न खत्म होने वाले संतुलन की स्थिति में बना रहता है।
इस यूनिट के लिए अतिरिक्त महत्वपूर्ण परीक्षा-केंद्रित टॉपिक्स
1. डेविस और पेंक के भू-आकृतिक चक्र (Geomorphic Cycles of Davis and Penck)
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवधारणा है जो पूरी यूनिट को एक साथ जोड़ती है। यह बताती है कि समय के साथ स्थलाकृतियों का विकास कैसे होता है।
- डेविस का अपरदन चक्र (Davis’s Cycle of Erosion):
- सिद्धांत: “स्थलाकृति, संरचना, प्रक्रम और अवस्था (समय) का प्रतिफल होती है” (Landscape is a function of Structure, Process, and Stage)।
- अवस्थाएँ: डेविस ने स्थलाकृति के विकास की तीन अवस्थाएँ बताई हैं – युवावस्था (Youth), प्रौढ़ावस्था (Maturity), और वृद्धावस्था (Old Age)। अंत में एक लगभग समतल मैदान बनता है जिसे पेनीप्लेन (Peneplain) कहते हैं।
- महत्व: यह स्थलाकृति के क्रमिक विकास को समझने का एक सरल और मौलिक मॉडल है। [UPSC Mains – Geography Optional]
- ⋆ GS के लिए: आपको अवस्थाओं (जैसे युवावस्था में ‘V’ घाटी, वृद्धावस्था में डेल्टा) और अंतिम उत्पाद (पेनीप्लेन) को समझना होगा।
- वाल्थर पेंक का मॉडल (Penck’s Model):
- सिद्धांत: पेंक का मॉडल डेविस से अधिक जटिल है। यह बताता है कि स्थलाकृति का विकास उत्थान (Uplift) और अपरदन (Erosion) की दरों के बीच के संबंध पर निर्भर करता है।
- अंतिम उत्पाद: पेंक के चक्र के अंत में बनने वाले समतल मैदान को एंड्रम्फ (Endrumpf) कहते हैं।
- GS के लिए: बस डेविस और पेंक के मॉडलों के बीच मूल अंतर (डेविस समय-निर्भर है, पेंक उत्थान-अपरदन दर पर निर्भर है) और उनके अंतिम उत्पादों (पेनीप्लेन बनाम एंड्रम्फ) को याद रखें।
2. भू-संतुलन की अवधारणा (Concept of Isostasy)
यह अवधारणा बताती है कि पृथ्वी की पर्पटी (Crust) के विभिन्न खंड (जैसे ऊँचे पर्वत और गहरी समुद्री खाइयाँ) दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) के ऊपर एक संतुलन की स्थिति में कैसे रहते हैं।
- सिद्धांत: इसका मूल विचार है ‘तैरने का सिद्धांत’। जैसे एक नाव पानी में उतना ही डूबती है जितना उसके वजन के बराबर पानी हटाने के लिए आवश्यक हो, उसी तरह ऊँचे पर्वत मेंटल में अधिक गहराई तक धँसे होते हैं।
- महत्व: यह समझाता है कि ऊँचे पर्वत क्यों मौजूद हैं और अपरदन के बावजूद उनका संतुलन कैसे बना रहता है। जब पहाड़ों का अपरदन होता है, तो वे धीरे-धीरे ऊपर उठते हैं ताकि संतुलन बना रहे।
- ⋆ परीक्षा के लिए: “भू-संतुलन” क्या है, इसकी एक सरल परिभाषा और यह स्थलमंडल और दुर्बलतामंडल के बीच के संतुलन को कैसे दर्शाता है, यह समझना महत्वपूर्ण है।
3. भू-चुंबकत्व और समुद्र तल प्रसरण (Paleomagnetism and Sea-Floor Spreading)
यह टॉपिक सीधे तौर पर अंतर्जनित बलों (विशेषकर प्लेट विवर्तनिकी) के प्रमाण से जुड़ा है।
- भू-चुंबकत्व (Paleomagnetism): चट्टानों में संग्रहीत प्राचीन चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन। जब लावा ठंडा होता है, तो उसमें मौजूद चुंबकीय खनिज उस समय के पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में संरेखित हो जाते हैं।
- समुद्र तल प्रसरण (Sea-Floor Spreading):
- सिद्धांत: हैरी हेस द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धांत बताता है कि मध्य-महासागरीय कटकों (Mid-Oceanic Ridges) पर नया समुद्री तल (लावा से) बनता है और यह दोनों दिशाओं में फैलता है।
- सबूत: कटकों के दोनों ओर चट्टानों में चुंबकीय विसंगतियों की सममित पट्टियाँ (Symmetrical stripes of magnetic anomalies) पाई जाती हैं। यह पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के उत्क्रमण (Reversal) का प्रमाण है और समुद्र तल प्रसरण की पुष्टि करता है।
- ⋆ PYQ Link: “मध्य-महासागरीय कटकों के सहारे पाई जाने वाली चट्टानों की चुंबकीय पट्टियाँ किस भूवैज्ञानिक प्रक्रिया का सबसे मजबूत प्रमाण हैं?” (उत्तर: समुद्र तल प्रसरण)। [UPSC Prelims]
4. कार्स्ट और हिमनद स्थलाकृतियों पर विशेष ध्यान
ये दो टॉपिक्स बहिर्जनिक प्रक्रियाओं में सबसे अधिक पूछे जाते हैं क्योंकि इनकी स्थलाकृतियाँ बहुत विशिष्ट होती हैं।
- कार्स्ट स्थलाकृति (Karst Topography):
- निर्माण: चूना पत्थर (Limestone) जैसी घुलनशील चट्टानों पर भूमिगत जल की क्रिया द्वारा।
- प्रमुख स्थलाकृतियाँ: लैपीज, घोल रंध्र (Sinkholes), डोलाइन, युवाला, पोल्ये (अपरदनात्मक) और स्टैलेक्टाइट, स्टैलेग्माइट, कंदरा स्तंभ (निक्षेपणात्मक)।
- ⋆ परीक्षा के लिए: इन विशिष्ट शब्दावलियों का अर्थ और वे अपरदनात्मक हैं या निक्षेपणात्मक, यह याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है। [UPSC 2021]
- हिमनद स्थलाकृति (Glacial Landforms):
- निर्माण: गतिशील बर्फ (हिमनद) की क्रिया द्वारा।
- प्रमुख स्थलाकृतियाँ: U-आकार की घाटी, सर्क, हॉर्न, नुनाटक (अपरदनात्मक) और हिमोढ़/मोरेन, ड्रमलिन, एस्कर, केम (निक्षेपणात्मक)।
- ⋆ परीक्षा के लिए: कार्स्ट की तरह ही, इन शब्दावलियों का अर्थ और उनका वर्गीकरण (अपरदनात्मक बनाम निक्षेपणात्मक) बहुत महत्वपूर्ण है।
5. मानव और भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ (Humans and Geomorphic Processes)
यह एक अनुप्रयुक्त (Applied) विषय है और UPSC Mains के लिए बहुत प्रासंगिक है।
- मानवीय हस्तक्षेप: मानव अपनी गतिविधियों (जैसे खनन, वनों की कटाई, शहरीकरण, बांध निर्माण) से प्राकृतिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को कैसे तेज या संशोधित कर रहा है।
- उदाहरण:
- वनों की कटाई से अपरदन और भूस्खलन का खतरा बढ़ना।
- अंधाधुंध रेत खनन से नदी के डेल्टाओं का सिकुड़ना।
- बांध निर्माण से जलाशय प्रेरित भूकंप आना।
- उदाहरण:
- परीक्षा के लिए: यह टॉपिक GS Paper 1 (Geography) और Paper 3 (Environment & Disaster Management) दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
इन टॉपिक्स को अपनी तैयारी में शामिल करने से आपकी इस यूनिट पर पकड़ बहुत मजबूत हो जाएगी और आप किसी भी प्रकार के प्रश्न का सामना करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होंगे।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory)
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत एक क्रांतिकारी भूवैज्ञानिक अवधारणा है जो यह प्रस्तावित करती है कि पृथ्वी के महाद्वीप स्थिर नहीं हैं, बल्कि वे भूवैज्ञानिक समय के दौरान पृथ्वी की सतह पर एक-दूसरे के सापेक्ष गतिमान रहे हैं। यह सिद्धांत इस बात की व्याख्या करने का पहला व्यापक प्रयास था कि क्यों विश्व के विभिन्न महाद्वीपों की तटरेखाएँ एक-दूसरे से मेल खाती हैं और क्यों एक जैसे जीवाश्म और चट्टानें हजारों किलोमीटर दूर स्थित महाद्वीपों पर पाए जाते हैं।
इस सिद्धांत का व्यवस्थित प्रतिपादन 1912 में एक जर्मन मौसम विज्ञानी और भूभौतिकीविद् अल्फ्रेड वेगेनर (Alfred Wegener) द्वारा किया गया था। यद्यपि उनके समय में इस सिद्धांत को व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन इसने भविष्य के प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory) के लिए एक ठोस आधार तैयार किया।
वेगेनर की मूल परिकल्पना
वेगेनर के अनुसार, लगभग 30 करोड़ वर्ष पहले, कार्बोनिफेरस युग (Carboniferous Period) में, पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक साथ जुड़े हुए थे और उन्होंने एक विशाल एकल भूखंड (Supercontinent) का निर्माण किया था।
- पैंजिया (Pangaea):
- इस विशाल एकल महाद्वीप को वेगेनर ने “पैंजिया” (Pangaea) नाम दिया (ग्रीक में ‘संपूर्ण पृथ्वी’)।
- पैंथालासा (Panthalassa):
- पैंजिया के चारों ओर एक विशाल महासागर था, जिसे उन्होंने “पैंथालासा” (Panthalassa) नाम दिया (ग्रीक में ‘संपूर्ण जल’)।
लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले, ट्राइएसिक युग (Triassic Period) में, पैंजिया टूटना शुरू हुआ। यह सबसे पहले दो बड़े भूखंडों में विभाजित हुआ:
- लॉरेशिया (Laurasia) / अंगारालैंड (Angaraland): उत्तरी भाग, जिसमें वर्तमान उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया शामिल थे।
- गोंडवानालैंड (Gondwanaland): दक्षिणी भाग, जिसमें वर्तमान दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका शामिल थे। [BPSC 2022]
इन दोनों भूखंडों के बीच एक उथला समुद्र खुला, जिसे टेथिस सागर (Tethys Sea) कहा गया।
बाद के युगों में, ये दोनों भूखंड भी टूटकर और अधिक छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गए, जो धीरे-धीरे अपनी वर्तमान स्थिति तक विस्थापित हो गए।
[आरेख: तीन चरणों में विश्व का मानचित्र। पहला, पैंजिया का एक एकल भूखंड। दूसरा, लॉरेशिया और गोंडवानालैंड में विभाजन, बीच में टेथिस सागर। तीसरा, महाद्वीपों की वर्तमान स्थिति।]
सिद्धांत के पक्ष में प्रमाण (Evidence in Support of the Theory)
वेगेनर ने अपने सिद्धांत को सिद्ध करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से कई महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत किए:
- महाद्वीपों की तटरेखाओं में साम्य (The Jigsaw-Fit of Continents):
- अटलांटिक महासागर के दोनों किनारों की तटरेखाओं को एक साथ जोड़ने पर वे आश्चर्यजनक रूप से एक-दूसरे से मेल खाती हैं, विशेषकर दक्षिण अमेरिका का पूर्वी तट और अफ्रीका का पश्चिमी तट। यह ऐसा है जैसे एक पहेली (Jigsaw) के दो टुकड़े हों।
- भूवैज्ञानिक प्रमाण (Geological Evidence):
- चट्टानों की आयु और संरचना में समानता: अटलांटिक के दोनों किनारों पर पाई जाने वाली पर्वत श्रृंखलाओं की आयु और भूवैज्ञानिक संरचना में उल्लेखनीय समानता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के तटों पर पाई जाने वाली चट्टानों का काल-निर्धारण (Dating) उन्हें एक ही समय का बताता है।
- ⋆ उदाहरण: अप्लेशियन पर्वत (उत्तरी अमेरिका) और स्कैंडिनेवियन हाइलैंड्स (यूरोप) एक ही प्राचीन पर्वत श्रृंखला का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
- जीवाश्मों का वितरण (Fossil Evidence):
- एक जैसे पौधों और जानवरों के जीवाश्म उन महाद्वीपों पर पाए गए हैं जो वर्तमान में एक-दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर हैं और जिनके बीच विशाल महासागर हैं।
- मेसोसॉरस (Mesosaurus): एक छोटे रेंगने वाले जीव के जीवाश्म केवल दक्षिणी अफ्रीका और ब्राजील (दक्षिण अमेरिका) में पाए गए हैं। यह छोटा जीव विशाल अटलांटिक महासागर को तैरकर पार नहीं कर सकता था, जो यह इंगित करता है कि ये दोनों भूखंड कभी जुड़े हुए थे।
- ग्लोसोप्टेरिस (Glossopteris): एक फर्न पौधे के जीवाश्म भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका में पाए गए हैं, जो गोंडवानालैंड की परिकल्पना को मजबूत करते हैं।
- पुरा-जलवायु प्रमाण (Paleoclimatic Evidence):
- टिलाइट (Tillite): ये हिमनदों द्वारा निक्षेपित अवसादी चट्टानें हैं। भारत के प्रायद्वीपीय पठार, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में कार्बोनिफेरस युग की टिलाइट चट्टानें पाई गई हैं। इन क्षेत्रों की वर्तमान गर्म जलवायु में हिमनदों का अस्तित्व असंभव है, जो यह दर्शाता है कि ये सभी भूखंड कभी एक साथ दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित थे।
- कोयले का जमाव: यूरोप और उत्तरी अमेरिका के ठंडे क्षेत्रों में कोयले के बड़े भंडार पाए जाते हैं, जबकि कोयला गर्म और आर्द्र जलवायु में बनता है। यह इंगित करता है कि ये भूखंड कभी भूमध्य रेखा के पास स्थित थे।
विस्थापन के लिए उत्तरदायी बल (Forces responsible for Drifting)
वेगेनर ने महाद्वीपों के विस्थापन के लिए दो बलों को जिम्मेदार ठहराया, हालांकि यही उनके सिद्धांत का सबसे कमजोर बिंदु साबित हुआ:
- ध्रुवीय फ्लीइंग बल (Polar Fleeing Force): पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित बल, जिसके कारण महाद्वीप भूमध्य रेखा की ओर खिसके।
- ज्वारीय बल (Tidal Force): सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण उत्पन्न ज्वारीय बल, जिसके कारण महाद्वीप पश्चिम की ओर खिसके।
⋆ आलोचना: वैज्ञानिकों ने इन दोनों बलों को महाद्वीपों जैसे विशाल भूखंडों को हिलाने के लिए अत्यधिक कमजोर और अपर्याप्त माना, और इसी आधार पर वेगेनर के सिद्धांत को उस समय खारिज कर दिया गया था।
सिद्धांत की आलोचना और महत्व (Criticism and Importance)
- आलोचना:
- विस्थापन के लिए सुझाए गए बल अपर्याप्त थे।
- वेगेनर यह नहीं बता पाए कि विस्थापन की प्रक्रिया वास्तव में कैसे हुई (What was the mechanism?)।
- उन्होंने केवल महाद्वीपों के विस्थापन की बात की, महासागरीय पर्पटी के बारे में नहीं।
- महत्व:
- ⋆ तमाम आलोचनाओं के बावजूद, वेगेनर का सिद्धांत एक मील का पत्थर था।
- यह पहला सिद्धांत था जिसने स्थिर महाद्वीपों की पारंपरिक अवधारणा को चुनौती दी और महाद्वीपों के गतिशील होने की धारणा को वैज्ञानिक चर्चा के केंद्र में लाया।
- उनके द्वारा दिए गए प्रमाण (जीवाश्म, भूविज्ञान, जलवायु) आज भी मान्य हैं।
- इस सिद्धांत ने समुद्र तल प्रसरण (Sea-Floor Spreading) और अंततः प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory) के विकास का मार्ग प्रशस्त किया, जो आज महाद्वीपीय विस्थापन के पीछे के वास्तविक तंत्र की व्याख्या करता है।
निष्कर्ष: वेगेनर यह तो बता पाए कि ‘क्या’ हुआ (महाद्वीप विस्थापित हुए), लेकिन यह नहीं बता पाए कि ‘कैसे’ हुआ। इसका उत्तर बाद में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने दिया।
एफ. बी. टेलर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (F. B. Taylor’s Displacement Theory)
एफ. बी. टेलर (F. B. Taylor) एक अमेरिकी भूविज्ञानी थे, जिन्होंने अल्फ्रेड वेगेनर से भी पहले (1908 में, प्रकाशित 1910 में) महाद्वीपीय विस्थापन की परिकल्पना प्रस्तुत की थी। हालांकि वेगेनर का सिद्धांत अधिक व्यापक और प्रसिद्ध हुआ, लेकिन टेलर को महाद्वीपीय प्रवाह की अवधारणा को वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत करने वाले शुरुआती विचारकों में से एक माना जाता है।
टेलर का मुख्य उद्देश्य वेगेनर की तरह पृथ्वी के समग्र भूवैज्ञानिक इतिहास की व्याख्या करना नहीं था। उनका ध्यान मुख्य रूप से टर्शियरी (तृतीयक) युग के वलित पर्वतों (Fold Mountains), जैसे हिमालय, आल्प्स और रॉकीज, के निर्माण की समस्या को सुलझाने पर केंद्रित था।
टेलर की मूल परिकल्पना
टेलर के अनुसार, महाद्वीप हमेशा से स्थिर नहीं थे, बल्कि उन्होंने क्षैतिज (Horizontal) रूप से गति की है। उन्होंने माना कि क्रिटेशियस युग (Cretaceous Period) के दौरान पृथ्वी पर दो विशाल भूखंड मौजूद थे:
- लॉरेशिया (Laurasia): उत्तरी ध्रुव के पास स्थित एक विशाल महाद्वीप।
- गोंडवानालैंड (Gondwanaland): दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित एक विशाल महाद्वीप।
विस्थापन की प्रक्रिया और दिशा
टेलर का मानना था कि इन महाद्वीपों ने मुख्य रूप से दो दिशाओं में गति की:
- भूमध्य रेखा की ओर (Towards the Equator): दोनों महाद्वीपों (लॉरेशिया और गोंडवानालैंड) ने ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर प्रवाहित होना शुरू किया।
- पश्चिम की ओर (Towards the West): यह गति भी हुई, लेकिन भूमध्य रेखा की ओर होने वाली गति अधिक प्रभावशाली थी।
विस्थापन का कारण: ज्वारीय बल (Tidal Force)
- टेलर ने महाद्वीपों के इस विस्थापन के लिए एकमात्र बल को जिम्मेदार ठहराया – ज्वारीय बल (Tidal Force)।
- उनकी परिकल्पना थी कि क्रिटेशियस युग के दौरान, चंद्रमा पृथ्वी के बहुत करीब आ गया था, या शायद पृथ्वी ने उसे अपने गुरुत्वाकर्षण से पकड़ा था।
- इस निकटता के कारण चंद्रमा का ज्वारीय खिंचाव बहुत अधिक शक्तिशाली हो गया था। यह बल इतना शक्तिशाली था कि इसने पृथ्वी की पर्पटी (Crust) को मेंटल के ऊपर खींचना शुरू कर दिया, जिससे महाद्वीपों का प्रवाह हुआ।
- इस खिंचाव ने पृथ्वी के घूर्णन की गति को भी कम कर दिया और अंततः चंद्रमा को उसकी वर्तमान कक्षा में स्थिर कर दिया।
पर्वत निर्माण की व्याख्या
टेलर ने अपने सिद्धांत से टर्शियरी वलित पर्वतों के निर्माण की व्याख्या इस प्रकार की:
- हिमालय और आल्प्स का निर्माण:
- जब लॉरेशिया और गोंडवानालैंड भूमध्य रेखा की ओर बढ़े, तो उनके अग्र भागों (Leading edges) में प्रतिरोध के कारण अत्यधिक संपीड़न (Compression) हुआ।
- इस संपीड़न से भू-अभिनतियों (Geosynclines) में जमा अवसाद मुड़ गए, जिससे हिमालय, आल्प्स, और काकेशस जैसी पर्वत श्रृंखलाओं का निर्माण हुआ।
- रॉकीज और एंडीज का निर्माण:
- महाद्वीपों की पश्चिम की ओर होने वाली गति के कारण उनके पश्चिमी किनारों पर रॉकीज और एंडीज जैसे पर्वतों का निर्माण हुआ।
वेगेनर और टेलर के सिद्धांतों की तुलना
| तुलना का आधार | एफ. बी. टेलर (1908) | अल्फ्रेड वेगेनर (1912) |
| मुख्य उद्देश्य | टर्शियरी वलित पर्वतों के निर्माण की व्याख्या करना। | पृथ्वी के पुरा-जलवायु (Paleoclimatic) और भूवैज्ञानिक इतिहास की समग्र व्याख्या करना। |
| विस्थापन का काल | क्रिटेशियस युग से शुरू हुआ। | कार्बोनिफेरस युग (पैंजिया के समय) से शुरू हुआ। |
| प्रारंभिक भूखंड | दो भूखंड माने: लॉरेशिया और गोंडवानालैंड। | एक ही भूखंड माना: पैंजिया। |
| विस्थापन की दिशा | ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर (मुख्य)। | भूमध्य रेखा की ओर और पश्चिम की ओर। |
| उत्तरदायी बल | केवल ज्वारीय बल (Tidal Force)। | ध्रुवीय फ्लीइंग बल और ज्वारीय बल। |
| प्रसिद्धि | कम प्रसिद्ध और सीमित। | अधिक व्यापक, विस्तृत प्रमाण और अधिक प्रसिद्ध। |
टेलर के सिद्धांत की आलोचना और महत्व
- आलोचना:
- अपर्याप्त बल: वेगेनर की तरह ही, टेलर द्वारा सुझाया गया ज्वारीय बल महाद्वीपों जैसे विशाल भूखंडों को स्थानांतरित करने के लिए पूरी तरह से अपर्याFÁŠत था। यदि ज्वारीय बल इतना शक्तिशाली होता कि महाद्वीपों को खिसका सकता, तो वह पृथ्वी के घूर्णन को भी पूरी तरह से रोक देता।
- सीमित उद्देश्य: उनका सिद्धांत केवल वलित पर्वतों की उत्पत्ति तक ही सीमित था और वेगेनर की तरह व्यापक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता था।
- महत्व:
- टेलर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महाद्वीपीय प्रवाह की अवधारणा को एक सुविचारित वैज्ञानिक परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया।
- उन्होंने क्षैतिज विस्थापन (Horizontal Displacement) के विचार को जन्म दिया, जो उस समय की प्रचलित ऊर्ध्वाधर (Vertical) गति की अवधारणाओं के विरुद्ध था।
- भले ही उनका तंत्र (Mechanism) गलत था, लेकिन उनकी मूल अवधारणा (“Mobilism” – गतिशीलता) सही दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसने वेगेनर के काम के लिए एक वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार की।
निष्कर्ष: टेलर के सिद्धांत को एक ‘अग्रदूत’ के रूप में देखा जा सकता है जिसने महाद्वीपों की गतिशीलता के विचार को वैज्ञानिक मंच पर लाने में मदद की, भले ही यह वेगेनर के सिद्धांत की तुलना में कम विकसित और कम प्रमाणित था।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत एक वैज्ञानिक सिद्धांत है जो यह बताता है कि पृथ्वी का बाहरी कठोर कवच, जिसे स्थलमंडल (Lithosphere) कहा जाता है, कई बड़े और छोटे टुकड़ों या “प्लेटों” में विभाजित है। ये प्लेटें स्थिर नहीं हैं, बल्कि ये पृथ्वी के आंतरिक भाग में मौजूद अर्ध-तरल दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) के ऊपर अत्यंत धीमी गति से लगातार गतिमान रहती हैं।
यह सिद्धांत 1960 के दशक के अंत में विकसित हुआ और यह महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) और समुद्र तल प्रसरण सिद्धांत (Sea-Floor Spreading Theory) का एक एकीकृत और उन्नत रूप है। यह पृथ्वी पर होने वाली अधिकांश प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाओं — जैसे भूकंप, ज्वालामुखी, और पर्वत निर्माण — की व्याख्या करने के लिए एक सार्वभौमिक और व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।
सिद्धांत के प्रमुख तत्व
- स्थलमंडल और प्लेटें (Lithosphere and Plates):
- पृथ्वी का स्थलमंडल (पर्पटी + ऊपरी मैंटल का कठोर भाग) एक सतत परत नहीं है। यह लगभग सात (7) प्रमुख प्लेटों और कई छोटी (Minor) प्लेटों में टूटा हुआ है।
- प्लेटों में महाद्वीपीय और महासागरीय दोनों प्रकार की पर्पटी शामिल हो सकती है।
- दुर्बलतामंडल (Asthenosphere):
- यह स्थलमंडल के नीचे स्थित मैंटल का ऊपरी, प्लास्टिक और आंशिक रूप से पिघला हुआ भाग है।
- स्थलमंडलीय प्लेटें इसी कमजोर परत के ऊपर तैरती हैं और गति करती हैं।
- संवहन धाराएँ (Convection Currents) – प्लेटों की गति का कारण:
- ⋆ सिद्धांत के अनुसार, प्लेटों की गति का मुख्य कारण मेंटल में चलने वाली संवहन धाराएँ हैं।
- पृथ्वी के क्रोड से उत्पन्न ऊष्मा के कारण मेंटल का गर्म मैग्मा ऊपर उठता है, फैलता है, ठंडा होता है और फिर नीचे डूब जाता है। यह चक्रीय गति (Cyclical Movement) अपने ऊपर स्थित स्थलमंडलीय प्लेटों को खींचती या धकेलती है। [UPSC Mains]
[आरेख: पृथ्वी का क्रॉस-सेक्शन जिसमें मेंटल में चलती हुई संवहन धाराओं को दिखाया गया हो। ऊपर उठती धाराएँ प्लेटों को अलग (अपसारी) और नीचे डूबती धाराएँ प्लेटों को एक-दूसरे की ओर (अभिसारी) धकेल रही हों।]
प्रमुख और छोटी प्लेटें (Major and Minor Plates)
सात प्रमुख प्लेटें:
- प्रशांत प्लेट (Pacific Plate) – पूरी तरह से महासागरीय।
- उत्तरी अमेरिकी प्लेट (North American Plate)
- दक्षिण अमेरिकी प्लेट (South American Plate)
- यूरेशियन प्लेट (Eurasian Plate)
- अफ्रीकी प्लेट (African Plate)
- इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट (Indo-Australian Plate)
- अंटार्कटिक प्लेट (Antarctic Plate)
कुछ महत्वपूर्ण छोटी प्लेटें: नाज़्का प्लेट, कोकोस प्लेट, अरेबियन प्लेट, फिलीपीन प्लेट।
प्लेटों के किनारे और उनकी गतियाँ (Plate Margins and their Movements)
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी का स्थलमंडल (Lithosphere) विभिन्न टुकड़ों या प्लेटों में विभाजित है, जो दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) के ऊपर गतिमान हैं। इन प्लेटों के किनारे (Margins) ही वे क्षेत्र हैं जहाँ पृथ्वी की अधिकांश महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक घटनाएँ, जैसे भूकंप, ज्वालामुखी और पर्वत निर्माण, घटित होती हैं। प्लेटों के किनारे एक-दूसरे के सापेक्ष तीन प्रकार से गति करते हैं, जिन्हें अपसारी (Divergent), अभिसारी (Convergent), और रूपांतरण (Transform) गति कहा जाता है।
1. अपसारी किनारा (Divergent Boundary)
अवधारणा: जब दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में दूर जाती हैं, तो उनके बीच के किनारे को अपसारी किनारा कहते हैं।
- उपनाम: “रचनात्मक किनारा” (Constructive Margin)
- कारण: इसे ‘रचनात्मक’ कहा जाता है क्योंकि जब प्लेटें अलग होती हैं, तो नीचे से गर्म मैग्मा ऊपर आकर ठंडा होता है और नई महासागरीय पर्पटी (New Oceanic Crust) का निर्माण करता है।
- प्रमुख प्रक्रिया: समुद्र तल प्रसरण (Sea-Floor Spreading)
- निर्मित स्थलाकृतियाँ:
- मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge): समुद्र के नीचे स्थित यह एक विशाल पर्वत श्रृंखला है, जो प्लेटों के अलग होने के स्थान पर बनती है।
- ⋆ उदाहरण: मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge), जो अटलांटिक महासागर के बीच में ‘S’ आकार में फैली है।
- भ्रंश घाटी (Rift Valley): जब यह प्रक्रिया महाद्वीपीय भू-भाग पर होती है, तो महाद्वीप टूटने लगता है और एक लंबी, गहरी घाटी का निर्माण होता है।
- ⋆ उदाहरण: पूर्वी अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी (Great Rift Valley of Africa), जो भविष्य में एक नए महासागर का निर्माण कर सकती है। [UPSC Prelims]
- मध्य-महासागरीय कटक (Mid-Oceanic Ridge): समुद्र के नीचे स्थित यह एक विशाल पर्वत श्रृंखला है, जो प्लेटों के अलग होने के स्थान पर बनती है।
- संबंधित घटनाएँ:
- ज्वालामुखी: यहाँ शांत प्रकार के दरारी उद्भेदन (Fissure Eruptions) होते हैं, जिनसे बेसाल्टिक लावा निकलता है।
- भूकंप: यहाँ अक्सर उथले उद्गम केंद्र (Shallow Focus) वाले और कम तीव्रता के भूकंप आते हैं।
2. अभिसारी किनारा (Convergent Boundary)
अवधारणा: जब दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं और आपस में टकराती हैं, तो उनके किनारे को अभिसारी किनारा कहते हैं।
- उपनाम: “विनाशात्मक किनारा” (Destructive Margin)
- कारण: इसे ‘विनाशात्मक’ कहा जाता है क्योंकि इस प्रक्रिया में प्लेट का घनत्व अधिक होने पर वह दूसरी प्लेट के नीचे क्षेपित (Subduct) हो जाती है और मेंटल में जाकर नष्ट हो जाती है।
- टकराव के प्रकार और परिणाम:
| टकराव का प्रकार | प्रक्रिया | निर्मित स्थलाकृतियाँ | संबंधित घटनाएँ | उदाहरण और PYQ तथ्य |
| महासागरीय-महाद्वीपीय<br>(Oceanic-Continental) | भारी महासागरीय प्लेट हल्की महाद्वीपीय प्लेट के नीचे क्षेपित होती है। | ∙ महासागरीय गर्त (Trenches)<br>∙ महाद्वीपीय ज्वालामुखीय चाप (Volcanic Arcs on Continents)<br>∙ वलित पर्वत (Fold Mountains) | ∙ विस्फोटक ज्वालामुखी<br>∙ तीव्र और गहरे भूकंप | ∙ पेरू-चिली गर्त और एंडीज पर्वतमाला<br>∙ रॉकीज पर्वतमाला<br>⋆ ‘रिंग ऑफ फायर’ का अधिकांश भाग इसी प्रकार के किनारों से बना है। [UPSC] |
| महासागरीय-महासागरीय<br>(Oceanic-Oceanic) | एक महासागरीय प्लेट दूसरी (अपेक्षाकृत भारी) के नीचे क्षेपित होती है। | ∙ गहरे महासागरीय गर्त<br>∙ ज्वालामुखीय द्वीप चाप (Volcanic Island Arcs) | ∙ विस्फोटक ज्वालामुखी<br>∙ तीव्र और गहरे भूकंप<br>∙ सुनामी | ∙ मेरियाना गर्त (विश्व की सबसे गहरी)<br>∙ जापान, फिलीपींस, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह |
| महाद्वीपीय-महाद्वीपीय<br>(Continental-Continental) | दोनों प्लेटें हल्की होने के कारण कोई भी आसानी से क्षेपित नहीं होती। किनारे मुड़कर ऊपर उठ जाते हैं। | ∙ विशाल वलित पर्वत<br>(Non-volcanic Fold Mountains) | ∙ ज्वालामुखी क्रिया नगण्य<br>∙ तीव्र और उथले भूकंप | ∙ हिमालय पर्वतमाला (भारतीय और यूरेशियन प्लेट)<br>∙ आल्प्स पर्वत (अफ्रीकी और यूरेशियन प्लेट)<br>⋆ यह अक्सर परीक्षाओं में पूछा जाता है कि हिमालय में ज्वालामुखी क्यों नहीं हैं। [UPSC Mains] |
3. रूपांतरण या संरक्षी किनारा (Transform or Conservative Boundary)
अवधारणा: जब दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर क्षैतिज रूप से विपरीत दिशाओं में खिसकती (slide past) हैं।
- उपनाम: “संरक्षी किनारा” (Conservative Margin)
- कारण: इसे ‘संरक्षी’ कहा जाता है क्योंकि इस किनारे पर न तो पर्पटी का निर्माण होता है और न ही विनाश होता है। केवल प्लेटों के किनारे रूपांतरित या स्थानांतरित होते हैं।
- प्रमुख प्रक्रिया: घर्षण और भ्रंशन (Friction and Faulting)
- निर्मित स्थलाकृतियाँ:
- रूपांतरित भ्रंश (Transform Fault): एक लंबी, सीधी भ्रंश रेखा जो अक्सर मध्य-महासागरीय कटकों को खंडों में विस्थापित करती है।
- ⋆ उदाहरण: कैलिफोर्निया (USA) का सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault), जो उत्तरी अमेरिकी प्लेट और प्रशांत प्लेट को अलग करता है।
- रूपांतरित भ्रंश (Transform Fault): एक लंबी, सीधी भ्रंश रेखा जो अक्सर मध्य-महासागरीय कटकों को खंडों में विस्थापित करती है।
- संबंधित घटनाएँ:
- ज्वालामुखी: यहाँ ज्वालामुखी क्रिया नहीं होती है।
- भूकंप: प्लेटों के किनारों के आपस में अटकने और फिर अचानक खिसकने से अत्यधिक ऊर्जा मुक्त होती है, जिससे उथले लेकिन अत्यंत विनाशकारी भूकंप आते हैं। [State PSC]
तीनों किनारों का तुलनात्मक सारांश
| विशेषता | अपसारी किनारा (Divergent) | अभिसारी किनारा (Convergent) | रूपांतरण किनारा (Transform) |
| गति | एक-दूसरे से दूर | एक-दूसरे की ओर | समानांतर खिसकना |
| परिणाम | नई पर्पटी का निर्माण | पुरानी पर्पटी का विनाश | पर्पटी संरक्षित रहती है |
| उपनाम | रचनात्मक (Constructive) | विनाशात्मक (Destructive) | संरक्षी (Conservative) |
| ज्वालामुखी | हाँ, शांत (बेसाल्टिक) | हाँ, विस्फोटक (विशेषकर क्षेपण क्षेत्रों में) | नहीं |
| भूकंप | हाँ, कम तीव्रता के | हाँ, तीव्र और गहरे | हाँ, तीव्र और उथले |
| प्रमुख उदाहरण | मध्य-अटलांटिक कटक | हिमालय पर्वत, एंडीज पर्वत | सैन एंड्रियास भ्रंश |
सिद्धांत का महत्व और प्रमाण
- महत्व:
- यह भू-आकृति विज्ञान का एकमात्र सार्वभौमिक सिद्धांत है जो लगभग सभी प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाओं की व्याख्या करता है।
- यह महाद्वीपीय विस्थापन के ‘कैसे’ (Mechanism) का उत्तर देता है।
- यह खनिजों और जीवाश्म ईंधनों के वितरण को समझने में मदद करता है।
- प्रमाण:
- समुद्र तल का चुंबकीय सर्वेक्षण (Paleomagnetism): मध्य-महासागरीय कटकों के दोनों ओर सममित चुंबकीय पट्टियाँ।
- महासागरों में गहरी खाइयाँ (Trenches) का मिलना।
- ज्वालामुखी और भूकंपों का प्लेट किनारों पर केंद्रित होना (रिंग ऑफ फायर)।
- GPS डेटा से प्लेटों की गति का प्रत्यक्ष मापन।
संबंधित परिघटनाएँ: ज्वालामुखी, भूकंप और पर्वत निर्माण
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत यह स्थापित करता है कि पृथ्वी पर अधिकांश प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाएँ विवर्तनिक प्लेटों के किनारों (Plate Margins) पर केंद्रित होती हैं, जहाँ प्लेटें एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया करती हैं। ज्वालामुखी, भूकंप और पर्वत निर्माण, ये तीनों परिघटनाएँ प्लेटों की गतियों (अभिसारी, अपसारी, रूपांतरण) का प्रत्यक्ष परिणाम हैं।
1. ज्वालामुखी और प्लेट विवर्तनिकी (Volcanism and Plate Tectonics)
ज्वालामुखी क्रिया उन स्थानों पर होती है जहाँ मैग्मा को सतह तक पहुँचने का अवसर मिलता है। प्लेट विवर्तनिकी यह अवसर तीन प्रमुख सेटिंग्स में प्रदान करती है:
- अपसारी प्लेट किनारों पर (At Divergent Boundaries):
- प्रक्रिया: जब दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं, तो स्थलमंडल पतला हो जाता है, जिससे नीचे का दबाव कम हो जाता है। इस कम दबाव के कारण मेंटल की चट्टानें पिघलकर मैग्मा बनाती हैं। यह मैग्मा दरारों से होकर सतह पर शांत रूप से बहता है।
- परिणाम: यहाँ शांत दरारी उद्भेदन (Fissure Eruption) होता है, जिससे बेसाल्टिक लावा निकलता है और नई महासागरीय पर्पटी का निर्माण होता है।
- उदाहरण: मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge) और आइसलैंड के ज्वालामुखी।
- अभिसारी प्लेट किनारों पर (At Convergent Boundaries):
- प्रक्रिया: यह सबसे विस्फोटक ज्वालामुखियों का क्षेत्र है। जब एक भारी महासागरीय प्लेट हल्की महाद्वीपीय या अन्य महासागरीय प्लेट के नीचे क्षेपित (Subducted) होती है, तो वह गहराई में जाकर उच्च तापमान के कारण पिघलने लगती है। इस प्रक्रिया में समुद्री जल भी नीचे जाता है, जो चट्टानों के गलनांक को और कम कर देता है, जिससे अधिक मात्रा में चिपचिपा, गैस युक्त अम्लीय मैग्मा (Acidic Magma) बनता है। यह मैग्मा अत्यधिक दबाव के साथ सतह पर विस्फोटक रूप से बाहर आता है।
- परिणाम: तीव्र ढाल वाले मिश्रित ज्वालामुखी (Composite Volcanoes) और ज्वालामुखीय चाप (Volcanic Arcs) का निर्माण।
- ⋆ उदाहरण: परि-प्रशांत मेखला (‘रिंग ऑफ फायर’) के अधिकांश ज्वालामुखी (जैसे जापान, फिलीपींस, एंडीज)।
- ⚠️ अपवाद: महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण (Continental-Continental Convergence) में क्षेपण न होने के कारण ज्वालामुखी क्रिया लगभग अनुपस्थित होती है (जैसे हिमालय)।
- हॉटस्पॉट (Hotspots):
- यह प्लेट किनारों से दूर, प्लेट के मध्य में होने वाली ज्वालामुखी क्रिया है। यहाँ मेंटल के गहरे भाग से गर्म मैग्मा का एक स्तंभ (Plume) ऊपर उठता है और प्लेट को भेदकर सतह पर ज्वालामुखी का निर्माण करता है।
- ⋆ उदाहरण: हवाई द्वीप (Hawaiian Islands), जो प्रशांत प्लेट के एक हॉटस्पॉट के ऊपर से गुजरने से बने हैं। भारत का दक्कन ट्रैप भी रियूनियन हॉटस्पॉट का परिणाम माना जाता है। [UPSC Prelims]
2. भूकंप और प्लेट विवर्तनिकी (Earthquakes and Plate Tectonics)
भूकंप प्लेटों की गति के दौरान चट्टानों में उत्पन्न होने वाले तनाव (Stress) और घर्षण (Friction) का परिणाम हैं। विश्व के 95% से अधिक भूकंप प्लेट किनारों पर ही आते हैं।
- अभिसारी प्लेट किनारों पर (At Convergent Boundaries):
- प्रक्रिया: यह सबसे शक्तिशाली और गहरे भूकंपों का क्षेत्र है। जब एक प्लेट दूसरी के नीचे क्षेपित होती है, तो दोनों प्लेटों के बीच अत्यधिक घर्षण होता है, जिससे ऊर्जा संचित होती है। यह ऊर्जा अचानक मुक्त होने पर विनाशकारी भूकंप आते हैं। क्षेपित हो रही प्लेट जैसे-जैसे गहराई में जाती है, भूकंपों का उद्गम केंद्र (Focus) भी उतना ही गहरा होता जाता है।
- परिणाम: उथले, मध्यम और गहरे (700 किमी तक) तीनों प्रकार के भूकंप आते हैं। सुनामी भी अक्सर इन्हीं भूकंपों का परिणाम होती है।
- उदाहरण: जापान (2011), चिली (1960), और हिंद महासागर (2004) के विनाशकारी भूकंप।
- रूपांतरण प्लेट किनारों पर (At Transform Boundaries):
- प्रक्रिया: जब दो प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर खिसकती हैं, तो उनके किनारे अनियमित होने के कारण आपस में अटक जाते हैं। गति जारी रहती है, जिससे तनाव बढ़ता है, और जब चट्टानें टूटती हैं, तो ऊर्जा मुक्त होती है।
- परिणाम: यहाँ उथले लेकिन अत्यंत शक्तिशाली और विनाशकारी भूकंप आते हैं।
- उदाहरण: कैलिफोर्निया का सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault)।
- अपसारी प्लेट किनारों पर (At Divergent Boundaries):
- प्रक्रिया: जब प्लेटें अलग होती हैं, तो उत्पन्न तनाव के कारण भ्रंशन होता है, जिससे ऊर्जा मुक्त होती है।
- परिणाम: यहाँ केवल उथले और अपेक्षाकृत कम तीव्रता वाले भूकंप आते हैं।
3. पर्वत निर्माण और प्लेट विवर्तनिकी (Mountain Building and Plate Tectonics)
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत पर्वत-निर्माण (Orogenesis) की सबसे व्यापक व्याख्या प्रस्तुत करता है। अधिकांश प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएँ अभिसारी प्लेट किनारों पर स्थित हैं।
- वलित पर्वत (Fold Mountains):
- प्रक्रिया: ये पर्वत संपीड़न बलों (Compressional Forces) का परिणाम हैं जो अभिसारी किनारों पर उत्पन्न होते हैं।
- महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण: यह सबसे ऊँचे और विशाल वलित पर्वतों का निर्माण करता है। जब दो महाद्वीपीय प्लेटें टकराती हैं, तो उनके बीच स्थित भू-अभिनति (Geosyncline) में जमा अवसाद (Sediments) और प्लेटों के किनारे मुड़कर और ऊपर उठकर विशाल पर्वत श्रृंखलाएँ बनाते हैं।
- ⋆ उदाहरण: हिमालय पर्वतमाला (भारतीय और यूरेशियन प्लेट के टकराव से), आल्प्स पर्वत (अफ्रीकी और यूरेशian प्लेट के टकराव से)। [UPSC Mains]
- महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण: यहाँ क्षेपण के कारण महाद्वीपीय प्लेट का किनारा मुड़ जाता है और ऊपर उठता है। साथ ही, ज्वालामुखीय क्रिया भी पर्वतों की ऊँचाई को बढ़ाती है।
- उदाहरण: दक्षिण अमेरिका की एंडीज पर्वतमाला (नाज़्का और दक्षिण अमेरिकी प्लेट का टकराव)।
- ब्लॉक पर्वत (Block Mountains):
- ये तनाव बलों (Tensional Forces) के कारण हुए भ्रंशन (Faulting) का परिणाम होते हैं। ये मुख्य रूप से महाद्वीपीय विखंडन (Continental Rifting) के क्षेत्रों में पाए जाते हैं (जो एक प्रकार की अपसारी गति है)।
- उदाहरण: पूर्वी अफ्रीका की भ्रंश घाटी के किनारे स्थित पर्वत।
- ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic Mountains):
- इनका निर्माण ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा और राख के जमाव से होता है। ये मुख्य रूप से अभिसारी किनारों (क्षेपण क्षेत्रों) और हॉटस्पॉट पर पाए जाते हैं।
- उदाहरण: माउंट फूजी (जापान), माउंट रेनियर (USA)।
पर्वत, पठार और मैदान: उत्पत्ति और वर्गीकरण (Mountains, Plateaus, and Plains: Origin and Classification)
पर्वत, पठार और मैदान पृथ्वी की सतह पर पाई जाने वाली तीन प्रमुख स्थलाकृतियाँ हैं। इनका वर्गीकरण मुख्य रूप से उनकी ऊँचाई और ढाल (Slope) के आधार पर किया जाता है।
| स्थलाकृति (Landform) | सामान्य ऊँचाई (Average Height) | ढाल (Slope) और शिखर (Summit) |
| पर्वत (Mountain) | आस-पास के क्षेत्र से 900 मीटर से अधिक | तीव्र ढाल (Steep Slopes) और नुकीला या संकरा शिखर |
| पठार (Plateau) | सामान्यतः 300 से 1000 मीटर | कम से कम एक किनारा तीव्र ढाल वाला और विस्तृत, सपाट या ऊबड़-खाबड़ शीर्ष |
| मैदान (Plain) | सामान्यतः 200 मीटर से कम | मंद ढाल (Gentle Slope) और सपाट भू-भाग |
1. पर्वत (Mountains)
पर्वत पृथ्वी की सतह के वे प्राकृतिक उभार हैं जिनका शिखर छोटा और आधार चौड़ा होता है। ये अपने आस-पास के क्षेत्र से एकदम स्पष्ट रूप से ऊँचे होते हैं। जब कई पर्वत एक रेखा में विस्तृत होते हैं तो उसे पर्वत श्रृंखला (Mountain Range) कहते हैं (जैसे हिमालय)।
उत्पत्ति के आधार पर पर्वतों का वर्गीकरण (Classification based on Origin)
- A. वलित पर्वत (Fold Mountains)
- उत्पत्ति: इनका निर्माण पृथ्वी की विवर्तनिक प्लेटों के बीच संपीड़न बलों (Compressional Forces) के कारण चट्टानों में वलन (Folding) पड़ने से होता है। ये मुख्य रूप से अभिसारी प्लेट किनारों (Convergent Plate Boundaries) पर पाए जाते हैं।
- विशेषताएँ:
- ये विश्व की सबसे ऊँची और सबसे विस्तृत पर्वत श्रृंखलाएँ हैं।
- इनमें अपनति (Anticlines) और अभिनति (Synclines) जैसी संरचनाएँ पाई जाती हैं।
- ये अवसादी चट्टानों से बने होते हैं।
- उप-विभाजन (आयु के आधार पर):
- नवीन/अल्पाइन वलित पर्वत: ये युवा पर्वत हैं जिनका निर्माण हाल के टर्शियरी युग में हुआ है। (जैसे हिमालय, आल्प्स, रॉकीज, एंडीज)।
- प्राचीन वलित पर्वत: ये पुराने पर्वत हैं जिनका निर्माण बहुत पहले हुआ था और अपरदन के कारण काफी घिस गए हैं। (जैसे भारत का अरावली, रूस का यूराल, और उत्तरी अमेरिका के अप्लेशियन पर्वत)।
- PYQ संदर्भ: ⋆ विश्व की प्रमुख वलित पर्वत श्रृंखलाओं की अवस्थिति अक्सर पूछी जाती है। [UPSC/State PSC]
- B. ब्लॉक या भ्रंशोत्थ पर्वत (Block Mountains)
- उत्पत्ति: इनका निर्माण तनाव (Tension) या संपीड़न बलों के कारण भू-पर्पटी में भ्रंशन (Faulting) से होता है। जब दो भ्रंशों के बीच का भूखंड (Horst) ऊपर उठ जाता है या आसपास के भूखंड (Graben) नीचे धँस जाते हैं, तो ब्लॉक पर्वत बनते हैं।
- विशेषताएँ: इनके ढाल तीव्र और शिखर सपाट होते हैं।
- उदाहरण: जर्मनी का ब्लैक फॉरेस्ट, फ्रांस का वॉस्जेस, पाकिस्तान की सॉल्ट रेंज, और भारत में सतपुड़ा और विंध्य पर्वत।
- C. ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic Mountains)
- उत्पत्ति: इनका निर्माण ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा, राख और अन्य विखंडित पदार्थों के ज्वालामुखी निकास (Vent) के चारों ओर जमा होने से होता है।
- विशेषताएँ: ये आमतौर पर शंक्वाकार (Conical) होते हैं और इनके शीर्ष पर एक क्रेटर (गड्ढा) पाया जाता है।
- उदाहरण: जापान का माउंट फूजी, इक्वाडोर का कोटोपैक्सी, तंजानिया का किलीमंजारो, और हवाई द्वीप का मौना लोआ।
- D. अवशिष्ट या अपरदित पर्वत (Residual or Dissected Mountains)
- उत्पत्ति: ये मूल पर्वत नहीं होते, बल्कि ये प्राचीन पर्वतों या पठारों के अपरदन (Erosion) के बाद बचे हुए कठोर चट्टानी भाग होते हैं। बहिर्जनिक कारकों (नदी, हवा) ने इनके आसपास की नरम चट्टानों को अपरदित कर दिया है।
- उदाहरण: भारत के अरावली, विंध्य, और सतपुड़ा (जो संरचनात्मक रूप से क्रमशः वलित और ब्लॉक हैं, लेकिन अब अत्यधिक अपरदित हो चुके हैं), और पूर्वी घाट तथा पश्चिमी घाट।
पर्वतों का वर्गीकरण: एक विस्तृत तुलनात्मक तालिका
| वर्गीकरण का आधार | पर्वत का प्रकार | निर्माण प्रक्रिया (उत्पत्ति) | प्रमुख विशेषताएँ | विश्व प्रसिद्ध उदाहरण | भारतीय उदाहरण | संबंधित PYQ/महत्वपूर्ण तथ्य |
| निर्माण प्रक्रिया<br>(Mode of Origin) | वलित पर्वत (Fold Mountains) | संपीड़न (Compression): दो विवर्तनिक प्लेटों के टकराने से चट्टानों में वलन पड़ना। | ∙ लहरदार या मुड़ी हुई परतें (अपनति, अभिनति)।<br>∙ विश्व की सबसे ऊँची और विस्तृत पर्वत श्रृंखलाएँ।<br>∙ अवसादी चट्टानों की प्रधानता। | नवीन: हिमालय (एशिया), आल्प्स (यूरोप), रॉकीज (उत्तरी अमेरिका), एंडीज (दक्षिण अमेरिका) | नवीन: हिमालय<br>प्राचीन: अरावली, सतपुड़ा (संरचनात्मक रूप से वलित) | ⋆ नवीन वलित पर्वत प्लेट विवर्तनिकी के अभिसारी किनारों (Convergent Boundaries) पर पाए जाते हैं। [UPSC Mains] |
| ब्लॉक पर्वत (Block Mountains) | तनाव या संपीड़न: भू-पर्पटी में भ्रंशन (Faulting) के कारण किसी भूखंड का ऊपर उठना (हॉर्स्ट) या आस-पास के खंडों का नीचे धँसना (ग्रैबेन)। | ∙ तीव्र, खड़ी ढलान और समतल शिखर।<br>∙ इनके साथ अक्सर भ्रंश घाटियाँ (Rift Valleys) जुड़ी होती हैं। | ∙ ब्लैक फॉरेस्ट (जर्मनी)<br>∙ वॉस्जेस (फ्रांस)<br>∙ सिएरा नेवादा (USA) | विंध्य और सतपुड़ा | ⋆ नर्मदा और तापी नदियाँ सतपुड़ा और विंध्य ब्लॉक पर्वतों द्वारा निर्मित भ्रंश घाटियों से होकर बहती हैं। [MPPSC/UPSC] | |
| ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic Mountains) | ज्वालामुखी क्रिया: ज्वालामुखी उद्गार से निकले लावा, राख और अन्य पदार्थों का एक शंकु के रूप में जमा होना। | ∙ आमतौर पर शंक्वाकार आकृति।<br>∙ शिखर पर क्रेटर (Crater) या काल्डेरा (Caldera) पाया जाता है। | ∙ माउंट फूजी (जापान)<br>∙ किलिमंजारो (तंजानिया)<br>∙ मौना लोआ (हवाई, USA)<br>∙ कोटोपैक्सी (इक्वाडोर) | बैरन द्वीप और नारकोंडम द्वीप | ⋆ अधिकांश सक्रिय ज्वालामुखी ‘रिंग ऑफ फायर’ (परि-प्रशांत मेखला) पर स्थित हैं। | |
| गुंबदाकार पर्वत (Dome Mountains) | अंतर्जात बल: मैग्मा के जमाव से सतह का ऊपर की ओर गुंबद के आकार में उठ जाना, या किसी क्षेत्र का वलन या उत्थान। | ∙ गोलाकार या गुंबदाकार आकृति।<br>∙ परतें केंद्र से बाहर की ओर झुकी होती हैं। | ∙ ब्लैक हिल्स (USA)<br>∙ सिनसिनाटी डोम (USA) | छोटानागपुर पठार का हजारीबाग क्षेत्र (गुंबदाकार उत्थान) | यह वलित पर्वतों से भिन्न हैं क्योंकि इनमें बड़े पैमाने पर चट्टानों का मुड़ना नहीं होता। | |
| मिश्रित या जटिल पर्वत (Complex Mountains) | विविध प्रक्रियाएँ: वलन, भ्रंशन, ज्वालामुखी क्रिया और कायांतरण जैसी कई भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का संयुक्त परिणाम। | ∙ अत्यंत जटिल और मिश्रित भूवैज्ञानिक संरचना।<br>∙ विभिन्न प्रकार की चट्टानें (आग्नेय, अवसादी, रूपांतरित) पाई जाती हैं। | ∙ सिएरा नेवादा (USA)<br>∙ रॉकीज का अधिकांश भाग<br>∙ एंडीज का अधिकांश भाग | हिमालय (मुख्य रूप से वलित, लेकिन संरचना जटिल है) | विश्व की अधिकांश प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएँ वास्तव में जटिल या मिश्रित प्रकार की होती हैं। | |
| अपरदन की अवस्था<br>(Stage of Erosion) | अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) | अपरदन (Erosion): प्राचीन पर्वतों या पठारों के लंबे समय तक अपरदन के बाद बचे हुए कठोर चट्टानी भाग। यह कोई मूल निर्माण प्रक्रिया नहीं है। | ∙ कम ऊँचाई और गोल शिखर।<br>∙ कठोर चट्टानों से निर्मित होते हैं क्योंकि नरम चट्टानें अपरदित हो चुकी होती हैं। | ∙ स्कॉटिश हाइलैंड्स<br>∙ हाइलैंड्स ऑफ स्कैंडिनेविया | अरावली, विंध्य, सतपुड़ा, पश्चिमी और पूर्वी घाट | ⋆ अरावली संरचनात्मक रूप से एक प्राचीन वलित पर्वत है, लेकिन वर्तमान में यह एक अवशिष्ट पर्वत का उत्कृष्ट उदाहरण है। [UPSC/RAS] |
2. पठार (Plateaus)
पठार ऊँची भूमि का एक विस्तृत क्षेत्र होता है जिसका शीर्ष मेज की तरह सपाट (Tableland) होता है और जिसका कम से कम एक किनारा तीव्र ढाल वाला होता है।
उत्पत्ति के आधार पर पठारों का वर्गीकरण (Classification based on Origin)
- A. अंतरापर्वतीय पठार (Intermontane Plateau)
- उत्पत्ति: ये पठार चारों ओर से ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरे होते हैं। इनका निर्माण पर्वतों के निर्माण के साथ-साथ होता है।
- विशेषताएँ: ये विश्व के सबसे ऊँचे और सबसे विस्तृत पठार हैं।
- उदाहरण: ⋆ तिब्बत का पठार (हिमालय और कुनलुन शान के बीच), बोलीविया का पठार (एंडीज के बीच)।
- B. गिरिपद पठार (Piedmont Plateau)
- उत्पत्ति: ये पठार पर्वतों के आधार (Foot) पर स्थित होते हैं, जिनके एक ओर पर्वत और दूसरी ओर मैदान या समुद्र होता है।
- उदाहरण: उत्तरी अमेरिका का पीडमांट पठार, दक्षिण अमेरिका का पेटागोनिया पठार।
- C. महाद्वीपीय पठार या शील्ड (Continental Plateau or Shield)
- उत्पत्ति: ये पठार विशाल भूखंडों के धीमी गति से ऊपर उठने या प्राचीन शील्ड क्षेत्रों के अपरदन से बनते हैं। ये चारों ओर से मैदानों या समुद्रों से घिरे हो सकते हैं।
- विशेषताएँ: ये प्राचीन, कठोर चट्टानों से बने होते हैं और धात्विक खनिजों के भंडार होते हैं।
- उदाहरण: भारत का दक्कन का पठार (Deccan Plateau), छोटानागपुर का पठार, ब्राजील का पठार, और कनाडियन शील्ड।
- D. ज्वालामुखी पठार (Volcanic Plateau)
- उत्पत्ति: इनका निर्माण दरारी उद्भेदन से निकले बेसाल्टिक लावा के एक के ऊपर एक परत के रूप में फैलने और जमने से होता है।
- विशेषताएँ: लावा के अपक्षय से यहाँ काली मिट्टी का निर्माण होता है।
- उदाहरण: ⋆ भारत का दक्कन ट्रैप, संयुक्त राज्य अमेरिका का कोलंबिया-स्नेक पठार। [State PSC]
पठारों का वर्गीकरण: एक विस्तृत तुलनात्मक तालिका
| वर्गीकरण का आधार | पठार का प्रकार | निर्माण प्रक्रिया (उत्पत्ति) | प्रमुख विशेषताएँ | विश्व प्रसिद्ध उदाहरण | भारतीय उदाहरण | संबंधित PYQ/महत्वपूर्ण तथ्य |
| अवस्थिति (Location) | अंतरापर्वतीय पठार (Intermontane Plateau) | दो या अधिक पर्वत श्रृंखलाओं के बीच प्लेटों के टकराने (संपीड़न) और उत्थान से निर्मित। | ∙ चारों ओर से ऊँचे पर्वतों से घिरे होते हैं।<br>∙ विश्व के सबसे ऊँचे और विस्तृत पठार हैं। | ∙ तिब्बत का पठार (हिमालय और कुनलुन के बीच)<br>∙ बोलीविया का पठार (एंडीज के बीच)<br>∙ कोलंबिया-स्नेक पठार (रॉकीज के बीच) | लद्दाख का पठार (काराकोरम और हिमालय के बीच) | ⋆ तिब्बत के पठार को “विश्व की छत” (Roof of the World) कहा जाता है। [SSC/State PSC] |
| गिरिपद पठार (Piedmont Plateau) | पर्वतों के अपरदन से प्राप्त अवसादों का पर्वत के आधार (पाद) पर जमाव, या किसी पर्वतीय क्षेत्र का आंशिक उत्थान। | ∙ एक ओर पर्वत श्रृंखला और दूसरी ओर मैदान या समुद्र से घिरे होते हैं। | ∙ पेटागोनिया का पठार (एंडीज के पूर्व में)<br>∙ पीडमांट पठार (अप्लेशियन पर्वत के पूर्व में, USA) | मालवा का पठार (अरावली और विंध्य के बीच गिरिपद जैसा) | यह पठार अंतरापर्वतीय पठारों की तुलना में कम ऊँचे होते हैं। | |
| निर्माण प्रक्रिया<br>(Mode of Origin) | ज्वालामुखी पठार (Volcanic Plateau) | दरारी उद्भेदन (Fissure Eruption): दरारों से निकले अत्यधिक तरल बेसाल्टिक लावा की परतों का एक विस्तृत क्षेत्र में फैलकर जमना। | ∙ लावा की सीढ़ीदार (Trap) संरचना।<br>∙ अपक्षय से काली मिट्टी (Regur Soil) का निर्माण होता है जो बहुत उपजाऊ होती है। | ∙ कोलंबिया-स्नेक पठार (USA)<br>∙ पराना ट्रैप (ब्राजील) | दक्कन ट्रैप (Deccan Traps) | ⋆ दक्कन का पठार कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है। इसका निर्माण रियूनियन हॉटस्पॉट के कारण हुआ। [MPPSC/UPSC] |
| गुंबदाकार पठार (Domed Plateau) | पटल विरूपणी उत्थान: पृथ्वी के अंतर्जात बलों के कारण एक विस्तृत भूखंड का धीमी गति से गुंबद के आकार में ऊपर उठना। | ∙ आसपास के क्षेत्रों की तुलना में गोलाकार या अंडाकार उत्थान। | ∙ ओजार्क पठार (Ozark Plateau) (USA) | छोटानागपुर का पठार (विशेषकर हजारीबाग और रांची पठार) | इन पठारों में अपरदन से ‘पाट भूमि’ (Pat Lands) जैसी स्थलाकृतियाँ बन सकती हैं। | |
| अपरदन की अवस्था<br>(Stage of Erosion) | अपरदित पठार या शील्ड (Dissected Plateau or Shield) | प्राचीन पठारों का नदियों, हवा और हिमनदों द्वारा लंबे समय तक अपरदन, जिससे सतह ऊबड़-खाबड़ और विच्छेदित हो जाती है। | ∙ सतह समतल न होकर घाटियों और पहाड़ियों में विभाजित होती है।<br>∙ ये प्राचीन, कठोर चट्टानों से बने होते हैं।<br>∙ धात्विक खनिजों के भंडार पाए जाते हैं। | ∙ कनाडियन शील्ड<br>∙ बाल्टिक शील्ड (यूरोप)<br>∙ ब्राजीलियन हाइलैंड्स | प्रायद्वीपीय भारत का अधिकांश भाग (जैसे बुंदेलखंड, कर्नाटक पठार) | ⋆ भारत का छोटानागपुर का पठार खनिजों के भंडार के कारण “भारत का रूर” (Ruhr of India) कहलाता है। [JPSC/BPSC] |
| जलवायु | शुष्क पठार (Arid Plateau) | वे पठार जो शुष्क या अर्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्रों में स्थित होते हैं और अक्सर वृष्टि-छाया प्रदेश (Rain-shadow Area) में होते हैं। | ∙ वनस्पति विरल होती है।<br>∙ यांत्रिक अपक्षय अधिक होता है। | ∙ पेटागोनिया का पठार (अर्जेंटीना)<br>∙ गोबी का पठार (मंगोलिया-चीन)<br>∙ कोलोराडो पठार (USA) | लद्दाख का पठार | लद्दाख भारत का शीत मरुस्थल है, जो वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित है। [UPSC Prelims] |
3. मैदान (Plains)
मैदान पृथ्वी की सतह के लगभग समतल और निचले क्षेत्र होते हैं, जिनका ढाल बहुत मंद होता है। विश्व की अधिकांश जनसंख्या और कृषि कार्य मैदानों में ही केंद्रित है।
उत्पत्ति के आधार पर मैदानों का वर्गीकरण (Classification based on Origin)
- A. संरचनात्मक मैदान (Structural Plains)
- उत्पत्ति: इनका निर्माण भू-पर्पटी के क्षैतिज रूप से स्तरित (Horizontally Bedded) चट्टानों के धीमी गति से उत्थान (Uplift) के कारण होता है। ये समुद्र तल से ऊपर उठे महाद्वीपीय शेल्फ हो सकते हैं।
- उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका का ग्रेट प्लेन्स (Great Plains), रूस का मैदान।
- B. अपरदनात्मक मैदान (Erosional Plains)
- उत्पत्ति: इनका निर्माण अपरदन के कारकों (नदी, हवा, हिमनद) द्वारा ऊँची भूमियों को काटकर और घिसकर समतल करने से होता है।
- पेनीप्लेन (Peneplain): नदी के अपरदन से बनी लगभग समतल आकृति।
- पेडीप्लेन (Pediplain): शुष्क क्षेत्रों में पवन और जलधाराओं की संयुक्त क्रिया से बना मैदान।
- हिमानी मैदान (Glacial Plains): हिमनद द्वारा भूमि को घिसकर समतल करने से बना मैदान।
- C. निक्षेपणात्मक मैदान (Depositional Plains)
- उत्पत्ति: इनका निर्माण अपरदन के कारकों द्वारा लाए गए अवसादों के जमाव (निक्षेपण) से होता है। ये अत्यधिक उपजाऊ होते हैं।
- जलोढ़ मैदान (Alluvial Plain): नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी (Alluvium) के जमाव से बनते हैं। (जैसे उत्तर भारत का गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान)। [UPSC]
- लोएस का मैदान (Loess Plain): पवन द्वारा उड़ाई गई बारीक धूल के जमाव से बनते हैं। (जैसे उत्तरी चीन का लोएस मैदान)।
- डेल्टा मैदान (Deltaic Plain): नदी के मुहाने पर अवसादों के जमाव से बनते हैं। (जैसे सुंदरबन डेल्टा)।
- हिमानी निक्षेपित मैदान (Glacial Depositional Plain): हिमनद द्वारा लाए गए हिमोढ़ (Moraine) के जमाव से बनते हैं। (जैसे उत्तरी अमेरिका और यूरोप के मैदान)।
मैदानों का वर्गीकरण: एक विस्तृत तुलनात्मक तालिका
| वर्गीकरण का आधार | मैदान का प्रकार | निर्माण प्रक्रिया (उत्पत्ति) | प्रमुख विशेषताएँ | विश्व प्रसिद्ध उदाहरण | भारतीय उदाहरण | संबंधित PYQ/महत्वपूर्ण तथ्य |
| निर्माण प्रक्रिया (Mode of Origin) | संरचनात्मक मैदान (Structural Plains) | पटल विरूपणी उत्थान: पृथ्वी के अंतर्जात बलों द्वारा महाद्वीपीय शेल्फ या क्षैतिज रूप से स्तरित चट्टानों वाले भूभाग का धीमी गति से ऊपर उठना। | ∙ लगभग समतल या बहुत मंद ढाल वाले विस्तृत मैदान।<br>∙ ये पृथ्वी के सबसे बड़े मैदानों में से हैं। | ∙ संयुक्त राज्य अमेरिका का ग्रेट प्लेन्स<br>∙ रूस का मैदान (साइबेरियन प्लेन)<br>∙ ऑस्ट्रेलियाई मैदान | कोरोमंडल तट और मालाबार तट का तटीय मैदान (समुद्री निमज्जन और उन्मज्जन का परिणाम) | इन मैदानों की संरचना में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होता, केवल भूभाग का उत्थान होता है। |
| बहिर्जनिक बल (Exogenic Forces) | अपरदनात्मक मैदान (Erosional Plains) | अपरदन (Erosion): ऊँचे भूभागों (पर्वत, पठार) का बहिर्जनिक कारकों (नदी, पवन, हिमनद) द्वारा लंबे समय तक अपरदित होकर समतल हो जाना। | ∙ ये समतल न होकर थोड़े ऊबड़-खाबड़ या लहरदार (Undulating) हो सकते हैं।<br>∙ कठोर चट्टानों के अवशेष ‘मोनाडनॉक’ (Monadnock) के रूप में देखे जा सकते हैं। | ∙ पेनीप्लेन (नदी अपरदन): अप्लेशियन क्षेत्र (USA)<br>∙ पेडीप्लेन (पवन अपरदन): सहारा मरुस्थल के कुछ हिस्से<br>∙ हिमानी मैदान (हिमनद अपरदन): कनाडियन शील्ड का कुछ भाग | अरावली पर्वतमाला का पश्चिमी भाग (पेनीप्लेन का उदाहरण) | यह प्रक्रिया स्थलाकृति को “आधार तल” (Base Level) तक लाने का प्रयास करती है। |
| बहिर्जनिक बल (Exogenic Forces) | निक्षेपणात्मक मैदान (Depositional Plains) | निक्षेपण (Deposition): अपरदन के कारकों द्वारा लाए गए अवसादों (Sediments) का निचले क्षेत्रों, झीलों या समुद्रों में जमा होना। | ∙ अत्यधिक उपजाऊ होते हैं क्योंकि ये नई मिट्टी और खनिजों से बने होते हैं।<br>∙ विश्व की अधिकांश कृषि और जनसंख्या इन्हीं मैदानों में केंद्रित है। | विभिन्न निक्षेपण के कारकों के आधार पर: | विभिन्न निक्षेपण के कारकों के आधार पर: | ⋆ ये मैदान मानव सभ्यता के विकास के केंद्र रहे हैं। इन्हें “सभ्यता का पालना” (Cradle of Civilization) कहा जाता है। |
| (निक्षेपण के उप-प्रकार) | 1. जलोढ़ मैदान (Alluvial Plain) | नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी (Alluvium) का बाढ़ के दौरान या नदी घाटियों में जमाव। | ∙ अत्यंत उपजाऊ; कृषि के लिए सर्वश्रेष्ठ।<br>∙ डेल्टा, बाढ़ के मैदान, भाबर, तराई, खादर, बांगर जैसी स्थलाकृतियाँ। | ∙ नील नदी का मैदान (मिस्र)<br>∙ ह्वांग-हो का मैदान (चीन)<br>∙ मिसिसिपी-मिसौरी का मैदान (USA) | उत्तर भारत का विशाल मैदान (सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान) | ⋆ खादर (नई जलोढ़) और बांगर (पुरानी जलोढ़) के बीच का अंतर अक्सर पूछा जाता है। [UPPSC/BPSC] |
| 2. लोएस का मैदान (Loess Plain) | पवन (Wind) द्वारा रेगिस्तानी या हिमनदों के किनारों से उड़ाई गई बारीक धूल (Loess) का दूर तक जमाव। | ∙ परतहीन (Non-stratified) और बहुत महीन कणों वाली मिट्टी।<br>∙ अत्यधिक उपजाऊ लेकिन अपरदन के प्रति संवेदनशील। | ∙ उत्तरी चीन का लोएस मैदान<br>∙ पम्पास (अर्जेंटीना) के कुछ हिस्से | कश्मीर घाटी में लोएस के जमाव को ‘करेवा’ (Karewa) कहा जाता है, जो केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। [UPSC 2021] | ||
| 3. हिमानी निक्षेपित मैदान (Glacial Depositional Plain) | हिमनदों (Glaciers) द्वारा लाए गए मलबे (हिमोढ़ या Till) के पिघलने पर जमाव। | ∙ इन्हें टिल मैदान (Till Plains) या आउटवॉश प्लेन (Outwash Plains) भी कहते हैं।<br>∙ इसमें ड्रमलिन, एस्कर जैसी स्थलाकृतियाँ हो सकती हैं। | ∙ उत्तरी अमेरिका के प्रेयरीज (Prairies)<br>∙ उत्तरी यूरोपीय मैदान | — | ये मैदान गेहूं की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं। | |
| 4. तटीय मैदान (Coastal Plain) | समुद्री लहरों द्वारा अवसादों का जमाव, या महाद्वीपीय शेल्फ के उन्मज्जन (Emergence) से। | ∙ ये संकरे या चौड़े हो सकते हैं।<br>∙ लैगून, पुलीन (Beach), और बालू रोधिका (Sandbars) जैसी आकृतियाँ। | ∙ अटलांटिक तटीय मैदान (USA)<br>∙ उत्तरी सागर के तटीय मैदान (यूरोप) | पूर्वी और पश्चिमी तटीय मैदान (भारत) | भारत का पूर्वी तटीय मैदान अधिक चौड़ा और उभरा (emergent) हुआ है, जबकि पश्चिमी तट संकरा और डूबा (submergent) हुआ है। [UPSC] | |
| 5. सरोवरीय मैदान (Lacustrine Plain) | प्राचीन झीलों की तली में अवसादों के भर जाने से झील का समतल भूमि में बदलना। | ∙ अत्यधिक समतल और उपजाऊ होते हैं। | ∙ ग्रेट लेक्स का मैदान (USA/कनाडा)<br>∙ हंगरी का मैदान | इम्फाल घाटी (मणिपुर), कश्मीर घाटी | कश्मीर घाटी का निर्माण एक विशाल प्रागैतिहासिक झील के तलछट से हुआ है। |
पर्वत, पठार और मैदान: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Latest Data and Facts)
पर्वत (Mountains)
- विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर:
- माउंट एवरेस्ट (Mount Everest)
- ऊँचाई: 8,848.86 मीटर (29,031.7 फीट) – यह 2020 में नेपाल और चीन द्वारा संयुक्त रूप से घोषित की गई नवीनतम और आधिकारिक ऊँचाई है। [UPSC/State PSC Current Affairs]
- स्थिति: नेपाल और चीन (तिब्बत) की सीमा पर, हिमालय पर्वत श्रृंखला में।
- विश्व की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला:
- एंडीज पर्वतमाला (Andes Mountains)
- लंबाई: लगभग 7,000 किलोमीटर (4,300 मील)।
- स्थिति: दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के सहारे फैली हुई।
- समुद्र तल के आधार से विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत:
- मौना किया (Mauna Kea)
- विशेषता: यह हवाई (USA) में स्थित एक ज्वालामुखी है। हालांकि समुद्र तल से इसकी ऊँचाई केवल 4,207 मीटर है, लेकिन प्रशांत महासागर के तल से मापने पर इसकी कुल ऊँचाई 10,000 मीटर (33,000 फीट) से भी अधिक है, जो माउंट एवरेस्ट से भी ज्यादा है।
- पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर स्थित बिंदु (शिखर):
- माउंट चिम्बोरोजो (Mount Chimborazo)
- स्थिति: इक्वाडोर।
- कारण: यह भूमध्य रेखा के पास स्थित है, और पृथ्वी भूमध्य रेखा पर थोड़ी उभरी हुई (Bulged) है। इस कारण, इसका शिखर पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर का बिंदु है, भले ही यह एंडीज का सबसे ऊँचा शिखर नहीं है।
- महाद्वीपों के सर्वोच्च शिखर (The Seven Summits):
| महाद्वीप | सर्वोच्च शिखर | ऊँचाई (मीटर) | पर्वत श्रृंखला |
| एशिया | माउंट एवरेस्ट | 8,848.86 | हिमालय |
| दक्षिण अमेरिका | माउंट एकांकागुआ | 6,961 | एंडीज |
| उत्तरी अमेरिका | डेनाली (पुराना नाम: माउंट मैकिन्ले) | 6,190 | अलास्का रेंज |
| अफ्रीका | माउंट किलिमंजारो | 5,895 | (ज्वालामुखी) |
| यूरोप | माउंट एल्ब्रस | 5,642 | काकेशस पर्वत |
| अंटार्कटिका | विंसन मैसिफ | 4,892 | एल्सवर्थ पर्वत |
| ऑस्ट्रेलिया (ओशिनिया) | पुuncak जया (कार्स्टेन्स पिरामिड) | 4,884 | सुदिरमन रेंज (इंडोनेशिया) |
पठार (Plateaus)
- विश्व का सबसे ऊँचा और सबसे बड़ा पठार:
- तिब्बत का पठार (Tibetan Plateau)
- विशेषता: इसे “विश्व की छत” (Roof of the World) कहा जाता है। इसका औसत क्षेत्रफल 25 लाख वर्ग किलोमीटर और औसत ऊँचाई 4,500 मीटर से अधिक है। [SSC/State PSC]
- विश्व का सबसे बड़ा ज्वालामुखी पठार:
- दक्कन ट्रैप (Deccan Traps), भारत (लगभग 5 लाख वर्ग किमी)। कुछ स्रोत साइबेरियन ट्रैप्स को भी बड़ा मानते हैं, लेकिन वे अब काफी अपरदित हो चुके हैं।
- खनिजों का भंडार:
- भारत का छोटानागपुर का पठार अपने विशाल खनिज भंडारों (लोहा, कोयला, अभ्रक) के कारण “भारत का रूर” (Ruhr of India) कहलाता है।
- विश्व का सबसे शुष्क पठार:
- अटाकामा पठार (Atacama Plateau), जो एंडीज पर्वतमाला के वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित है, विश्व के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक है।
मैदान (Plains)
- विश्व का सबसे बड़ा मैदान:
- पश्चिम साइबेरियाई मैदान (West Siberian Plain), रूस।
- विशेषता: यह विश्व का सबसे बड़ा समतल और अबाध (unbroken) तराई क्षेत्र है।
- विश्व का सबसे बड़ा जलोढ़ मैदान:
- सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (Indo-Gangetic Plain)
- विशेषता: यह विश्व के सबसे उपजाऊ और सघन आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है। इसे “उत्तर भारत का विशाल मैदान” भी कहते हैं।
- विश्व का सबसे बड़ा लोएस का मैदान:
- लोएस पठार/मैदान (Loess Plateau), चीन
- विशेषता: पवन द्वारा लाई गई बारीक पीली धूल के जमाव से बना यह क्षेत्र ह्वांग-हो (पीली नदी) का स्रोत है।
- विश्व के प्रमुख घास के मैदान (Temperate Grasslands):
- प्रेयरीज (Prairies): उत्तरी अमेरिका
- पम्पास (Pampas): दक्षिण अमेरिका (अर्जेंटीना)
- स्टेपीज (Steppes): यूरेशिया (यूरोप और मध्य एशिया)
- वेल्ड (Veld): दक्षिण अफ्रीका
- डाउन्स (Downs): ऑस्ट्रेलिया
- ⋆ PYQ Link: यह “Match the Following” में पूछे जाने वाला एक बहुत ही आम प्रश्न है। [UPSC/UPPSC]
भारत के संदर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत की सबसे ऊँची पर्वत चोटी:
- कंचनजंगा (Kanchenjunga)
- ऊँचाई: 8,586 मीटर।
- स्थिति: सिक्किम। यह भारत में स्थित और निर्विवाद रूप से भारत के नियंत्रण में सबसे ऊँची चोटी है।
- (नोट: K2/गॉडविन ऑस्टिन (8,611 मीटर) पाक-अधिकृत कश्मीर (POK) में स्थित है, लेकिन भारत इसे अपना अभिन्न अंग मानता है।)
- भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला:
- अरावली पर्वतमाला (Aravalli Range), यह एक प्राचीन वलित पर्वत है जो अब एक अवशिष्ट पर्वत का उदाहरण है।
- दक्षिण भारत की सबसे ऊँची चोटी:
- अनाइमुडी (Anaimudi), केरल, पश्चिमी घाट की अन्नामलाई पहाड़ियों में स्थित है।
- भारत का सबसे बड़ा पठार:
- दक्कन का पठार (Deccan Plateau)।
- भारत का सबसे ऊँचा पठार:
- लद्दाख का पठार, जिसे शीत मरुस्थल भी कहा जाता है।
घाटियाँ (Valleys)
घाटी दो या दो से अधिक पहाड़ों या पहाड़ियों के बीच स्थित एक लम्बी, निचली भू-आकृति होती है। यह आमतौर पर एक नदी (River) या हिमनद (Glacier) की अपरदनात्मक क्रिया द्वारा निर्मित होती है, हालांकि कुछ घाटियाँ भ्रंशन (Faulting) जैसी भू-विवर्तनिक गतिविधियों से भी बन सकती हैं। घाटियाँ जल प्रवाह और मानवीय बसावट के लिए प्राकृतिक मार्ग प्रदान करती हैं और अक्सर उपजाऊ भूमि का केंद्र होती हैं।
उत्पत्ति के आधार पर घाटियों का वर्गीकरण (Classification based on Origin)
घाटियों को उनके आकार और निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर मुख्य रूप से वर्गीकृत किया जाता है।
नदी अपने मार्ग में चट्टानों को काटकर घाटियों का निर्माण करती है। नदी घाटी का आकार उसकी युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था पर निर्भर करता है।
- ‘V’ आकार की घाटी (V-shaped Valley)
- निर्माण: यह युवा नदी (Youthful River) की सबसे प्रमुख स्थलाकृति है, जो पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है। नदी तीव्र ढाल और तेज बहाव के कारण अपनी तली का लंबवत अपरदन (Vertical Erosion) बहुत तेजी से करती है, जबकि किनारों का अपरदन (Lateral Erosion) कम होता है। इससे एक गहरी, संकरी घाटी बनती है जिसका क्रॉस-सेक्शन अंग्रेजी के ‘V’ अक्षर जैसा दिखता है।
- उदाहरण: हिमालय क्षेत्र में बहने वाली अधिकांश नदियाँ (जैसे गंगा, अलकनंदा) अपनी ऊपरी पहुँच में ‘V’ आकार की घाटियों का निर्माण करती हैं।
- गॉर्ज (Gorge)
- यह ‘V’ आकार की घाटी का ही एक अत्यंत गहरा और संकरा रूप है, जिसके किनारे लगभग खड़ी चट्टानी दीवारों जैसे होते हैं।
- निर्माण: यह अक्सर कठोर चट्टानों वाले क्षेत्रों में बनता है, जहाँ नदी केवल नीचे की ओर ही काट पाती है।
- ⋆ उदाहरण: सिंधु गॉर्ज, ब्रह्मपुत्र गॉर्ज, और ग्रैंड कैन्यन का आंतरिक गॉर्ज।
- कैनियन (Canyon)
- यह गॉर्ज का ही एक विस्तृत रूप है, जिसकी विशेषता खड़ी, सीढ़ीदार ढलानें होती हैं।
- निर्माण: यह शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में बनता है, जहाँ वर्षा कम होने के कारण किनारों का अपरदन न्यूनतम होता है और नदी मुख्य रूप से तली को ही गहरा करती है।
- ⋆ उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका में कोलोराडो नदी द्वारा निर्मित ग्रैंड कैन्यन (Grand Canyon) विश्व का सबसे प्रसिद्ध कैनियन है। [UPSC/State PSC]
जब विशाल हिमनद (Glaciers) घाटियों से होकर गुजरते हैं, तो वे अपनी अपरदनात्मक शक्ति से मौजूदा नदी घाटियों को चौड़ा और गहरा कर देते हैं।
- ‘U’ आकार की घाटी (U-shaped Valley)
- निर्माण: हिमनद घाटी में मौजूद चट्टानों और मलबे को खुरचता और उखाड़ता (Plucking and Abrasion) है, जिससे ‘V’ आकार की घाटी के किनारे चौड़े और समतल हो जाते हैं और उसकी तली सपाट हो जाती है। इसका क्रॉस-सेक्शन अंग्रेजी के ‘U’ अक्षर जैसा दिखता है।
- विशेषताएँ: इसमें खड़ी भुजाएँ और चौड़ी, सपाट तली होती है।
- उदाहरण: नॉर्वे, स्विट्जरलैंड और हिमालय के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में कई ‘U’ आकार की घाटियाँ पाई जाती हैं।
- लटकती घाटी (Hanging Valley)
- निर्माण: जब एक छोटी सहायक हिमनदी एक बड़ी मुख्य हिमनदी में मिलती है, तो बड़ी हिमनदी अपनी घाटी को अधिक गहरा काटती है। हिमनदों के पिघलने के बाद, छोटी हिमनदी की घाटी मुख्य घाटी के ऊपर “लटकती हुई” दिखाई देती है।
- विशेषता: लटकती घाटियों के मुहाने पर अक्सर जलप्रपात (Waterfalls) बनते हैं।
- उदाहरण: कैलिफोर्निया का योसेमाइट नेशनल पार्क (Yosemite National Park) लटकती घाटियों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
ये घाटियाँ सीधे तौर पर अपरदन से नहीं, बल्कि पृथ्वी के अंतर्जात बलों से बनती हैं।
- भ्रंश घाटी या रिफ्ट वैली (Rift Valley)
- निर्माण: इसका निर्माण तब होता है जब भू-पर्पटी में तनाव (Tension) के कारण दो समानांतर भ्रंश रेखाओं (Fault Lines) के बीच का भूभाग नीचे धँस जाता है। इस धँसे हुए भूभाग को ग्रैबेन (Graben) कहते हैं।
- विशेषताएँ: ये लंबी, गहरी और संकरी होती हैं और इनके किनारे भ्रंश कगारों (Fault Scarps) द्वारा चिह्नित होते हैं।
- ⋆ उदाहरण:
- पूर्वी अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी (Great Rift Valley of Africa) – यह विश्व की सबसे लंबी भ्रंश घाटी है।
- जर्मनी की राइन घाटी (Rhine Valley)।
- भारत में नर्मदा, तापी और दामोदर नदियों की घाटियाँ भ्रंश घाटियाँ हैं। नर्मदा और तापी नदियाँ ब्लॉक पर्वतों (विंध्य और सतपुड़ा) के बीच बहती हैं। [UPSC, MPPSC]
अन्य महत्वपूर्ण घाटियाँ (Other Important Valleys)
| घाटी का नाम | देश/स्थान | विशेषताएँ और महत्व |
| कश्मीर घाटी | भारत (जम्मू और कश्मीर) | पीर पंजाल और महान हिमालय के बीच स्थित एक उपजाऊ घाटी; करेवा (Karewa) मिट्टी और केसर की खेती के लिए प्रसिद्ध। |
| साइलेंट वैली (शांत घाटी) | भारत (केरल) | पश्चिमी घाट में स्थित; अपनी जैव विविधता (Biodiversity) और सदाबहार वर्षावनों के लिए प्रसिद्ध। [UPSC Prelims] |
| फूलों की घाटी (Valley of Flowers) | भारत (उत्तराखंड) | नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा; अपने अल्पाइन फूलों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल। |
| डेथ वैली (मृतक घाटी) | संयुक्त राज्य अमेरिका (कैलिफोर्निया) | पश्चिमी गोलार्ध का सबसे निचला, सबसे गर्म और सबसे शुष्क स्थान; एक भ्रंश घाटी का उदाहरण। |
| किंग्स कैनियन | ऑस्ट्रेलिया | ऑस्ट्रेलिया का सबसे गहरा कैनियन। |
| नुब्रा घाटी | भारत (लद्दाख) | श्योक और नुब्रा नदियों द्वारा निर्मित; सियाचिन ग्लेशियर के पास स्थित; अपनी प्राकृतिक सुंदरता और दो-कूबड़ वाले ऊँटों के लिए प्रसिद्ध। |
मरुस्थल/शुष्क प्रदेश (Deserts and Arid Lands)
मरुस्थल (Desert) एक ऐसा भू-भाग या प्रदेश होता है जहाँ वर्षण (Precipitation) की तुलना में वाष्पीकरण (Evaporation) की दर बहुत अधिक होती है, जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक शुष्कता (Aridity), जल का अभाव और विरल वनस्पति पाई जाती है। सामान्य तौर पर, जिन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 25 सेंटीमीटर (10 इंच) से कम होती है, उन्हें मरुस्थल की श्रेणी में रखा जाता है।
मरुस्थल केवल गर्म, रेतीले टीलों वाले क्षेत्र नहीं होते; वे ठंडे भी हो सकते हैं और चट्टानी या बर्फीले भी हो सकते हैं।
मरुस्थलों के निर्माण के कारण (Causes of Desert Formation)
- उप-उष्णकटिबंधीय उच्च दाब पेटी (Sub-Tropical High-Pressure Belt):
- ⋆ यह मरुस्थलों के निर्माण का सबसे प्रमुख कारण है। लगभग 20° से 30° अक्षांशों के बीच (दोनों गोलार्धों में), वायु ऊपर से नीचे की ओर उतरती है। नीचे उतरती हुई वायु गर्म और शुष्क हो जाती है, जिससे वहाँ वर्षा नहीं हो पाती और उच्च दाब का क्षेत्र बनता है।
- परिणाम: विश्व के अधिकांश गर्म मरुस्थल (जैसे सहारा, कालाहारी, ऑस्ट्रेलियाई मरुस्थल) इसी पेटी में महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर स्थित हैं। [UPSC Mains]
- ठंडी महासागरीय धाराएँ (Cold Ocean Currents):
- जब हवा ठंडी महासागरीय धाराओं के ऊपर से गुजरती है, तो वह भी ठंडी और शुष्क हो जाती है और अपनी नमी खो देती है। जब यह ठंडी और शुष्क हवा तटीय क्षेत्रों में पहुँचती है, तो वह वर्षा नहीं करती।
- ⋆ उदाहरण:
- अटाकामा मरुस्थल (दक्षिण अमेरिका) के निर्माण में पेरू/हम्बोल्ट धारा (Peru/Humboldt Current) का योगदान है।
- नामीब मरुस्थल (अफ्रीका) के निर्माण में बेंगुएला धारा (Benguela Current) का योगदान है।
- सहारा मरुस्थल (अफ्रीका) के निर्माण में कनारी धारा (Canary Current) का योगदान है।
- कैलिफोर्नियाई मरुस्थल के निर्माण में कैलिफोर्निया धारा (California Current) का योगदान है।
- PYQ Link: यह “Match the Following” में अक्सर पूछा जाने वाला टॉपिक है। [UPSC/State PSC]
- वृष्टि-छाया प्रदेश (Rain-shadow Area):
- जब आर्द्र हवाएँ किसी ऊँचे पर्वत से टकराती हैं, तो वे पर्वत के पवनमुखी ढाल (Windward side) पर अपनी सारी नमी वर्षा के रूप में गिरा देती हैं। जब ये हवाएँ पर्वत के दूसरी ओर पवनविमुखी ढाल (Leeward side) पर उतरती हैं, तो वे शुष्क हो चुकी होती हैं और वर्षा नहीं करतीं। इस क्षेत्र को वृष्टि-छाया प्रदेश कहते हैं।
- उदाहरण:
- दक्षिण अमेरिका का पेटागोनिया मरुस्थल एंडीज पर्वत के वृष्टि-छाया क्षेत्र में है।
- भारत में लद्दाख हिमालय के वृष्टि-छाया क्षेत्र में होने के कारण एक शीत मरुस्थल है। [UPSC Prelims]
- महाद्वीपीयता या समुद्र से दूरी (Continentality or Distance from Sea):
- जो क्षेत्र समुद्र से बहुत दूर महाद्वीपों के आंतरिक भागों में स्थित होते हैं, वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते समुद्री हवाएँ अपनी सारी नमी खो देती हैं, जिससे वे क्षेत्र शुष्क रह जाते हैं।
- उदाहरण: मध्य एशिया के गोबी मरुस्थल और तकलामकान मरुस्थल का निर्माण इसी कारण से हुआ है।
मरुस्थलों का वर्गीकरण (Classification of Deserts)
- गर्म मरुस्थल (Hot Deserts):
- अवस्थिति: ये उप-उष्णकटिबंधीय उच्च दाब पेटी (20°-30° अक्षांश) में पाए जाते हैं।
- विशेषताएँ: यहाँ ग्रीष्मकाल अत्यंत गर्म और सर्दियाँ हल्की होती हैं। दैनिक तापांतर (Diurnal range of temperature) बहुत अधिक होता है, अर्थात दिन बहुत गर्म और रातें ठंडी होती हैं।
- उदाहरण: सहारा (अफ्रीका), थार (भारत-पाकिस्तान), अरेबियन मरुस्थल, कालाहारी (अफ्रीका), ऑस्ट्रेलियाई मरुस्थल।
- शीत मरुस्थल (Cold Deserts):
- अवस्थिति: ये उच्च अक्षांशों (शीतोष्ण क्षेत्रों) या उच्च ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- विशेषताएँ: यहाँ सर्दियाँ अत्यंत ठंडी और बर्फीली होती हैं। शुष्कता का कारण कम तापमान के कारण नमी का बर्फ के रूप में जम जाना होता है।
- उदाहरण: गोबी (चीन-मंगोलिया), पेटागोनिया (अर्जेंटीना), लद्दाख (भारत), अंटार्कटिका (विश्व का सबसे बड़ा ठंडा मरुस्थल) और आर्कटिक।
- तटीय मरुस्थल (Coastal Deserts):
- ये ठंडी महासागरीय धाराओं से प्रभावित होते हैं।
- उदाहरण: अटाकामा (चिली-पेरू), नामीब (नामीबिया)।
- ⋆ अटाकामा मरुस्थल को विश्व का सबसे शुष्क मरुस्थल (Driest desert) माना जाता है।
मरुस्थलीय स्थलाकृतियाँ (Desert Landforms)
मरुस्थलीय क्षेत्रों में भू-आकृतियों का निर्माण मुख्य रूप से यांत्रिक अपक्षय (Mechanical Weathering) और दो प्रमुख अपरदन कारकों – पवन (Wind or Aeolian processes) और अचानक आने वाली अल्पकालिक वर्षा के जल (Fluvial processes) की संयुक्त क्रिया द्वारा होता है। इन प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप विशिष्ट प्रकार की अपरदनात्मक और निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ बनती हैं।
I. अपरदनात्मक स्थलाकृतियाँ (Erosional Landforms)
ये स्थलाकृतियाँ पवन या जल द्वारा चट्टानों और मिट्टी को हटाने या खुरचने से बनती हैं।
पवन तीन तरीकों से अपरदन करती है: अपवाहन (Deflation) – ढीले कणों को उड़ाना, अपघर्षण (Abrasion) – रेत कणों से चट्टानों को घिसना, और सन्निघर्षण (Attrition) – रेत कणों का आपस में टकराकर टूटना।
- वातगर्त या अपवाहन गर्त (Blowout or Deflation Hollow)
- निर्माण: जब पवन एक क्षेत्र से ढीली और असंगठित रेत और धूल को लगातार उड़ाकर ले जाती है, तो वहाँ एक गड्ढा या गर्त बन जाता है। यदि यह गर्त भूमिगत जल स्तर तक पहुँच जाता है, तो वहाँ एक मरुद्यान (Oasis) विकसित हो सकता है।
- उदाहरण: मिस्र का कतारा गर्त (Qattara Depression)।
- छत्रक शिला या गारा (Mushroom Rock or Gara)
- निर्माण: यह एक मशरूम के आकार की चट्टानी आकृति है। पवन अपने साथ रेत के भारी कणों को सतह के करीब ही उड़ा पाती है, जिससे चट्टान के निचले हिस्से का अपघर्षण (Abrasion) अधिक और ऊपरी हिस्से का कम होता है।
- ⋆ यह पवन अपघर्षण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- भू-स्तंभ या डेमोइसेल्स (Demoiselles)
- यह छत्रक शिला का ही एक रूप है, जिसमें एक कठोर चट्टान का टुकड़ा नीचे की नरम चट्टान को अपरदन से बचाता है, जिससे एक स्तंभ जैसी आकृति बनती है।
- इन्सेलबर्ग या द्वीपीय पर्वत (Inselberg or Island Mountain)
- निर्माण: यह एक कठोर चट्टान (जैसे ग्रेनाइट या नाइस) का अवशेष होता है जो आसपास की नरम चट्टानों के अपरदित हो जाने के बाद एक समतल मरुस्थलीय सतह पर एक द्वीप की तरह अकेला खड़ा रह जाता है।
- उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया में उलुरु (Uluru) या आयर्स रॉक (Ayers Rock)।
- ज्यूजेन (Zeugen)
- निर्माण: यह उन क्षेत्रों में बनता है जहाँ कठोर और नरम चट्टानों की परतें क्षैतिज (Horizontal) रूप में एक-दूसरे के ऊपर स्थित होती हैं। पवन कमजोर परतों को अधिक काटती है, जिससे एक दवात (Inkpot) या मेज जैसी आकृति बनती है जिसका ऊपरी हिस्सा कठोर चट्टान का होता है।
- यारदांग (Yardang)
- निर्माण: यह उन क्षेत्रों में बनता है जहाँ कठोर और नरम चट्टानों की परतें लंबवत (Vertical) रूप में और पवन की दिशा के समानांतर स्थित होती हैं। पवन नरम चट्टानों को काटकर लंबी, गहरी नालियाँ बना देती है, जिनके बीच कठोर चट्टानों के कटक (Ridge) खड़े रह जाते हैं।
- ⋆ PYQ Link: यारदांग और ज्यूजेन के बीच का अंतर अक्सर पूछा जाता है। यारदांग में परतें लंबवत होती हैं, ज्यूजेन में क्षैतिज।
- जालक शिला या अश्म जालक (Stone Lattice or Stone Trellis)
- निर्माण: पवन के अपघर्षण द्वारा चट्टान के कमजोर और नरम भागों को खोद निकालने से चट्टान की सतह पर एक जाली जैसी संरचना बन जाती है।
मरुस्थलों में वर्षा दुर्लभ लेकिन तीव्र होती है, जिससे अचानक बाढ़ आती है जो अपरदन का एक शक्तिशाली कारक है।
- मरुस्थलीय घाटियाँ और वादियाँ (Wadis): मरुस्थलों में सूखी नदी घाटियों को वादी (Wadi) कहते हैं। ये केवल तीव्र वर्षा के दौरान ही प्रवाहित होती हैं।
- पेडिमेंट (Pediment): यह पर्वतों के आधार पर स्थित एक निम्न ढाल वाला, अपरदित चट्टानी मैदान होता है।
II. निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ (Depositional Landforms)
ये स्थलाकृतियाँ पवन या जल द्वारा लाए गए अवसादों (रेत, गाद, बजरी) के जमाव से बनती हैं।
जब पवन का वेग कम हो जाता है, तो वह अपने साथ उड़ाकर लाए गए रेत कणों को जमा कर देती है।
- बालूका स्तूप या टिब्बे (Sand Dunes)
- निर्माण: ये पवन द्वारा रेत के जमाव से बने टीले हैं।
- प्रकार:
- बरखान (Barchan): ⋆ यह एक अर्धचंद्राकार (Crescent-shaped) स्तूप होता है जिसके सिरे (Horns) पवन की दिशा में आगे निकले होते हैं। इसका पवनमुखी ढाल मंद और पवनविमुखी ढाल तीव्र होता है। ये गतिशील होते हैं। [UPSC Prelims]
- अनुप्रस्थ स्तूप (Transverse Dunes): ये प्रचलित पवन की दिशा के समकोण पर बनते हैं और लहरदार कटक बनाते हैं।
- अनुदैर्ध्य या सीफ स्तूप (Longitudinal or Seif Dunes): ये प्रचलित पवन की दिशा के समानांतर बनने वाले लंबे और संकरे कटक होते हैं।
- परवलयिक स्तूप (Parabolic Dunes): ये बरखान के विपरीत होते हैं, जिनके सिरे पवन की दिशा के विपरीत होते हैं।
- लोएस (Loess)
- निर्माण: पवन द्वारा रेगिस्तान से बहुत दूर तक उड़ाई गई बारीक धूल (गाद) का एक विस्तृत क्षेत्र में परतहीन (unstratified) जमाव।
- विशेषता: लोएस के मैदान अत्यधिक उपजाऊ होते हैं।
- उदाहरण: उत्तरी चीन का विशाल लोएस मैदान।
- जलोढ़ पंख (Alluvial Fans): जब पर्वतों से आने वाली धाराएँ मैदान में प्रवेश करती हैं, तो वेग कम होने से वे अपने साथ लाए गए मलबे को पंखे के आकार में जमा कर देती हैं।
- बाजदा (Bajada)
- निर्माण: जब किसी पर्वत श्रेणी के सहारे कई जलोढ़ पंख आपस में मिल जाते हैं, तो एक विस्तृत, मंद ढाल वाले निक्षेपित मैदान का निर्माण होता है जिसे बाजदा कहते हैं।
- प्लाया (Playa)
- निर्माण: बाजदा से घिरी हुई मरुस्थलीय द्रोणी (Basin) के सबसे निचले भाग को प्लाया कहते हैं। वर्षा का जल यहाँ एकत्र होकर एक अस्थायी और उथली झील बनाता है।
- विशेषता: वाष्पीकरण के बाद, झील की सतह पर नमक, जिप्सम और अन्य लवणों की एक सफेद परत बन जाती है, जिसे क्षारीय समतल (Alkali Flat) या सालिनास (Salinas) भी कहा जाता है।
मरुस्थलीय भू-दृश्य का एक मॉडल
एक आदर्श मरुस्थलीय बेसिन में स्थलाकृतियों का क्रम इस प्रकार होता है:
पर्वत (Mountain) → पेडिमेंट (Pediment – अपरदित आधार) → बाजदा (Bajada – निक्षेपित ढाल) → प्लाया (Playa – केंद्रीय झील)।
| स्थलाकृति का प्रकार | स्थलाकृति का नाम | निर्माण प्रक्रिया (पवन या जल द्वारा) |
| अपरदनात्मक (Erosional) | वातगर्त (Blowout) | पवन द्वारा रेत और ढीली मिट्टी को उड़ा ले जाने से बना गड्ढा। |
| छत्रक शिला (Mushroom Rock) | पवन द्वारा चट्टान के निचले, नरम हिस्से को अधिक अपरदित करने से बनी छाते जैसी आकृति। | |
| इन्सेलबर्ग (Inselberg) | कठोर चट्टानों के वे अवशेष जो आसपास के नरम क्षेत्र के अपरदित हो जाने के बाद एक द्वीप की तरह खड़े रह जाते हैं। | |
| ज्यूजेन (Zeugen) | कठोर और नरम चट्टानों की क्षैतिज परतों वाले क्षेत्र में पवन के अपरदन से बनी दावात जैसी आकृति। | |
| यारदांग (Yardang) | कठोर और नरम चट्टानों की लंबवत परतों वाले क्षेत्र में पवन के अपरदन से बनी नाव जैसी आकृति। | |
| जालक शिला (Stone Lattice) | पवन द्वारा चट्टान के कमजोर हिस्सों को अपरदित करने से बनी जालीनुमा आकृति। | |
| निक्षेपणात्मक (Depositional) | बालूका स्तूप (Sand Dunes) | पवन द्वारा रेत के टीलों के रूप में जमाव। इनके कई प्रकार हैं – बरखान (अर्धचंद्राकार), अनुदैर्ध्य (सीफ), अनुप्रस्थ। [UPSC Prelims] |
| लोएस (Loess) | पवन द्वारा उड़ाई गई बहुत बारीक धूल का विस्तृत क्षेत्र में जमाव, जो बहुत उपजाऊ मैदान बनाता है। (उदा. उत्तरी चीन का मैदान)। | |
| बाजदा (Bajada) | पर्वतीय क्षेत्रों के आधार पर जलोढ़ पंखों (Alluvial Fans) के आपस में मिल जाने से बना मैदान। | |
| प्लाया (Playa) | मरुस्थलीय घाटियों के मध्य में बनी एक अस्थायी, उथली और खारी झील। जब यह सूख जाती है, तो नमक की एक सफेद परत रह जाती है, जिसे क्षारीय भूमि (Alkali Flat) कहते हैं। |
विश्व के प्रमुख मरुस्थल: एक त्वरित सूची
| मरुस्थल का नाम | महाद्वीप | प्रकार/तथ्य |
| सहारा मरुस्थल | अफ्रीका | विश्व का सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल। |
| अंटार्कटिक मरुस्थल | अंटार्कटिका | विश्व का सबसे बड़ा ठंडा मरुस्थल (और कुल मिलाकर सबसे बड़ा मरुस्थल)। |
| गोबी मरुस्थल | एशिया (चीन-मंगोलिया) | एशिया का सबसे बड़ा शीत मरुस्थल। |
| कालाहारी मरुस्थल | अफ्रीका (बोत्सवाना, नामीबिया) | बुशमैन जनजाति का निवास स्थान। |
| थार मरुस्थल | एशिया (भारत-पाकिस्तान) | विश्व का सबसे सघन आबादी वाला मरुस्थल। |
| ग्रेट विक्टोरिया | ऑस्ट्रेलिया | ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा मरुस्थल। |
| अटाकामा मरुस्थल | दक्षिण अमेरिका (चिली-पेरू) | विश्व का सबसे शुष्क मरुस्थल। |
| पेटागोनिया मरुस्थल | दक्षिण अमेरिका (अर्जेंटीना) | वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित एक शीत मरुस्थल। |
विश्व के प्रमुख मरुस्थल: महाद्वीप और देशवार सूची
| महाद्वीप | मरुस्थल का नाम | देश/क्षेत्र | प्रकार/महत्वपूर्ण तथ्य |
| एशिया | गोबी मरुस्थल | मंगोलिया, चीन | शीत मरुस्थल; तकलामकान से सटा हुआ। |
| थार मरुस्थल (ग्रेट इंडियन डेजर्ट) | भारत, पाकिस्तान | गर्म मरुस्थल; विश्व का सबसे सघन आबादी वाला। | |
| अरेबियन मरुस्थल | सऊदी अरब, यमन, ओमान, UAE | गर्म मरुस्थल; रुब अल-खाली (विश्व का सबसे बड़ा रेतीला क्षेत्र) इसी का हिस्सा है। | |
| कराकुम मरुस्थल | तुर्कमेनिस्तान | गर्म मरुस्थल; “काला रेत”। | |
| किज़िलकुम मरुस्थल | उज़्बेकिस्तान, कजाखस्तान | गर्म मरुस्थल; “लाल रेत”। | |
| तकलामकान मरुस्थल | चीन (झिंजियांग प्रांत) | शीत मरुस्थल। | |
| अफ्रीका | सहारा मरुस्थल | उत्तरी अफ्रीका (11 देश) | ⋆ विश्व का सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल। |
| कालाहारी मरुस्थल | बोत्सवाना, नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका | अर्ध-शुष्क; बुशमैन (सान) जनजाति का निवास। | |
| नामीब मरुस्थल | नामीबिया, अंगोला | तटीय मरुस्थल; विश्व के सबसे पुराने मरुस्थलों में से एक। | |
| नूबियन मरुस्थल | सूडान, मिस्र | सहारा का पूर्वी विस्तार; चट्टानी मरुस्थल। | |
| उत्तरी अमेरिका | मोजावे मरुस्थल (Mojave) | संयुक्त राज्य अमेरिका (कैलिफोर्निया, नेवादा) | गर्म मरुस्थल; डेथ वैली यहीं स्थित है। |
| सोनोरन मरुस्थल | संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको | गर्म मरुस्थल; अपनी कैक्टस विविधता के लिए प्रसिद्ध। | |
| चिहुआहुआन मरुस्थल (Chihuahuan) | मेक्सिको, संयुक्त राज्य अमेरिका | गर्म मरुस्थल; उत्तरी अमेरिका का सबसे बड़ा। | |
| ग्रेट बेसिन मरुस्थल | संयुक्त राज्य अमेरिका | शीत मरुस्थल; USA का सबसे बड़ा। | |
| दक्षिण अमेरिका | अटाकामा मरुस्थल | चिली, पेरू | ⋆ विश्व का सबसे शुष्क मरुस्थल। |
| पेटागोनिया मरुस्थल | अर्जेंटीना, चिली | शीत मरुस्थल; एंडीज का वृष्टि-छाया क्षेत्र। | |
| ऑस्ट्रेलिया | ग्रेट विक्टोरिया मरुस्थल | पश्चिमी और दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया | ⋆ ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा मरुस्थल। |
| ग्रेट सैंडी मरुस्थल | पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया | गर्म मरुस्थल। | |
| सिम्पसन मरुस्थल | मध्य ऑस्ट्रेलिया | गर्म मरुस्थल; अपने लाल रेत के टीलों के लिए प्रसिद्ध। | |
| गिब्सन मरुस्थल | पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया | गर्म मरुस्थल। | |
| अंटार्कटिका | अंटार्कटिक पोलर डेजर्ट | अंटार्कटिका महाद्वीप | ⋆ विश्व का सबसे बड़ा ठंडा मरुस्थल और समग्र रूप से विश्व का सबसे बड़ा मरुस्थल। |
| यूरोप | टैबरनास मरुस्थल | स्पेन | यूरोप का एकमात्र वास्तविक अर्ध-शुष्क मरुस्थल। (यह एक छोटा क्षेत्र है)। |
परीक्षा के लिए त्वरित तथ्य:
- सबसे बड़ा गर्म मरुस्थल: सहारा
- सबसे बड़ा शीत मरुस्थल: अंटार्कटिक
- सबसे बड़ा (कुल मिलाकर): अंटार्कटिक
- सबसे शुष्क मरुस्थल: अटाकामा
- सबसे सघन आबादी वाला: थार
- भारत का शीत मरुस्थल: लद्दाख
घास के मैदान (Grasslands)
घास के मैदान वे विस्तृत भू-भाग हैं जहाँ वनस्पतियों में मुख्य रूप से घास (Grasses) की प्रधानता होती है और वृक्ष या तो नगण्य होते हैं या बहुत बिखरे हुए पाए जाते हैं। ये पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystems) आमतौर पर उन क्षेत्रों में विकसित होते हैं जहाँ वर्षा वनों के लिए बहुत कम होती है, लेकिन मरुस्थलों की तुलना में अधिक होती है। इस प्रकार, घास के मैदान वनों और मरुस्थलों के बीच एक संक्रमणकालीन (Transitional) बायोम का निर्माण करते हैं।
घास के मैदानों की प्रमुख विशेषताएँ
- वर्षा: यहाँ वर्षा की मात्रा मध्यम होती है (आमतौर पर 25 से 75 सेंटीमीटर के बीच)।
- वनस्पति: वृक्षों का अभाव और घासों की बहुतायत।
- मिट्टी: यहाँ की मिट्टी पोषक तत्वों से भरपूर और बहुत उपजाऊ होती है, जिसे चेर्नोजम (Chernozem) या प्रेयरी मिट्टी कहा जाता है।
- जलवायु: अक्सर महाद्वीपीय जलवायु (गर्म ग्रीष्मकाल और ठंडा शीतकाल) पाई जाती है।
घास के मैदानों का वर्गीकरण (Classification of Grasslands)
जलवायु और अक्षांशीय स्थिति के आधार पर घास के मैदानों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
1. उष्णकटिबंधीय घास के मैदान (Tropical Grasslands)
- अवस्थिति: ये मैदान भूमध्य रेखा के दोनों ओर लगभग 10° से 25° अक्षांशों के बीच पाए जाते हैं।
- जलवायु: यहाँ वर्ष भर तापमान ऊँचा रहता है और जलवायु में एक स्पष्ट शुष्क और आर्द्र ऋतु (Dry and Wet Season) होती है।
- वनस्पति:
- यहाँ की घास लंबी, मोटी और मोटी (लगभग 3 से 4 मीटर ऊँची) होती है, जिसे “हाथी घास” (Elephant Grass) भी कहा जाता है।
- यह घास शीतोष्ण घास के मैदानों की तरह पौष्टिक नहीं होती।
- इन मैदानों में कहीं-कहीं बिखरे हुए, छोटे और सूखा-प्रतिरोधी पेड़ पाए जाते हैं।
- स्थानीय नाम: इन मैदानों को अफ्रीका में सवाना (Savanna) के नाम से जाना जाता है, जो इनका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
2. शीतोष्ण कटिबंधीय घास के मैदान (Temperate Grasslands)
- अवस्थिति: ये मैदान महाद्वीपों के आंतरिक भागों में मध्य अक्षांशों (लगभग 30° से 50°) में पाए जाते हैं।
- जलवायु: यहाँ महाद्वीपीय प्रकार की जलवायु होती है, जिसमें ग्रीष्मकाल गर्म और शीतकाल ठंडा तथा बर्फीला होता है।
- वनस्पति:
- यहाँ की घास छोटी, मुलायम और अत्यधिक पौष्टिक होती है।
- ये मैदान आमतौर पर वृक्ष रहित (Treeless) होते हैं।
- आर्थिक महत्व: अपनी उपजाऊ मिट्टी और पौष्टिक घास के कारण, ये मैदान व्यापक अनाज की खेती (Extensive Grain Farming) और पशुपालन (Ranching) के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। इन्हें “विश्व का अन्न भंडार” (Granaries of the World) भी कहा जाता है।
विश्व के प्रमुख घास के मैदान: एक विस्तृत तालिका
⋆ यह तालिका “Match the Following” और सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। [UPSC Prelims/State PSC – Multiple Times]
| महाद्वीप | घास के मैदान का स्थानीय नाम | देश/क्षेत्र | प्रकार (Type) | महत्वपूर्ण तथ्य |
| एशिया-यूरोप (यूरेशिया) | स्टेपीज (Steppes) | मध्य एशिया, पूर्वी यूरोप (रूस, यूक्रेन) | शीतोष्ण | वृक्ष रहित, विशाल मैदान; गेहूँ की खेती और घुड़सवारी के लिए प्रसिद्ध। |
| यूरोप | पुस्टाज (Pustaz) | हंगरी | शीतोष्ण | स्टेपीज का ही एक भाग। |
| उत्तरी अमेरिका | प्रेयरीज (Prairies) | संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा | शीतोष्ण | ⋆ “विश्व का अन्न भंडार”; मक्का और गेहूँ के व्यापक उत्पादन के लिए प्रसिद्ध। चेर्नोजम मिट्टी पाई जाती है। |
| दक्षिण अमेरिका | पम्पास (Pampas) | अर्जेंटीना, उरुग्वे, ब्राजील | शीतोष्ण | अत्यंत उपजाऊ; गेहूँ की खेती और पशुपालन (Ranching) के लिए विश्व प्रसिद्ध। अल्फाल्फा नामक पौष्टिक घास। |
| लानोस (Llanos) | वेनेजुएला, कोलंबिया | उष्णकटिबंधीय (सवाना) | ओरिनोको नदी बेसिन में स्थित। | |
| कैम्पोस (Campos) | ब्राजील | उष्णकटिबंधीय (सवाना) | ब्राजीलियन हाइलैंड्स में स्थित। | |
| अफ्रीका | सवाना (Savanna) | मध्य और पूर्वी अफ्रीका (सूडान, केन्या, तंजानिया) | उष्णकटिबंधीय | ⋆ विश्व का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध उष्णकटिबंधीय घास का मैदान; बड़े स्तनधारी जीवों (हाथी, जिराफ, जेब्रा) के लिए प्रसिद्ध। |
| वेल्ड (Veld) | दक्षिण अफ्रीका | शीतोष्ण | मक्का की खेती और मेरिनो भेड़ पालन (ऊन उद्योग) के लिए प्रसिद्ध। | |
| ऑस्ट्रेलिया | डाउन्स (Downs) | मरे-डार्लिंग बेसिन (पूर्वी ऑस्ट्रेलिया) | शीतोष्ण | मेरिनो भेड़ पालन और ऊन उद्योग का प्रमुख केंद्र। |
| सवाना (Savanna) | उत्तरी ऑस्ट्रेलिया | उष्णकटिबंधीय | — | |
| न्यूजीलैंड | कैंटरबरी (Canterbury) | न्यूजीलैंड (दक्षिणी द्वीप) | शीतोष्ण | डाउन्स के समान। |
भारतीय परिप्रेक्ष्य में घास के मैदान
भारत में विशाल शीतोष्ण घास के मैदान (जैसे प्रेयरीज) नहीं पाए जाते हैं, लेकिन यहाँ कई प्रकार के छोटे और विशिष्ट घास के मैदान हैं:
- तराई के घास के मैदान: हिमालय की तलहटी में पाए जाने वाले लंबे और घने घास के मैदान। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (असम) इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो एक सींग वाले गैंडे का निवास स्थान है।
- उच्च हिमालयी चारागाह:
- ⋆ हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में, वृक्ष रेखा के ऊपर पाए जाने वाले अल्पाइन घास के मैदानों को “बुग्याल” या “पयार” (Bugyal/Payar) (उत्तराखंड में) और “मर्ग” (Marg) (कश्मीर में, जैसे सोनमर्ग, गुलमर्ग) कहा जाता है। ये ग्रीष्मकाल में पशु चराने के लिए महत्वपूर्ण हैं। [UPSC/UKPSC Prelims]
- शोला घास के मैदान (Shola Grasslands):
- यह पश्चिमी घाट की घाटियों में पाए जाने वाले उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वनों और पहाड़ियों की ढलानों पर पाए जाने वाले घास के मैदानों का एक अनूठा मोज़ेक है। ये अपनी उच्च जैव विविधता और स्थानिक प्रजातियों के लिए जाने जाते हैं।
घास के मैदानों का महत्व और खतरे
- महत्व:
- कृषि और खाद्य सुरक्षा: गेहूँ, मक्का जैसे प्रमुख अनाजों का उत्पादन।
- पशुपालन: डेयरी और मांस उद्योग का आधार।
- जैव विविधता: विविध प्रकार के शाकाहारी और मांसाहारी जीवों का निवास स्थान।
- मृदा संरक्षण: घास की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं और अपरदन को रोकती हैं।
- खतरे:
- कृषि के लिए रूपांतरण: उपजाऊ मिट्टी के कारण अधिकांश घास के मैदानों को कृषि भूमि में बदल दिया गया है।
- अति-चराई (Overgrazing): पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से भूमि का क्षरण और मरुस्थलीकरण होता है।
- जलवायु परिवर्तन: वर्षा के पैटर्न में बदलाव से इन पारिस्थितिक तंत्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।