भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology)
पृथ्वी की आंतरिक संरचना: गहन, संरचित, एवं परीक्षा-केंद्रित अध्ययन
विस्तृत विषय-सूची (Detailed Table of Contents)
| मुख्य टॉपिक | विस्तृत उप-टॉपिक |
| I. आंतरिक संरचना की जानकारी के स्रोत | A. प्रत्यक्ष स्रोत |
| B. अप्रत्यक्ष स्रोत (भूकम्पीय तरंगों का महत्व) | |
| II. रासायनिक संरचना पर आधारित वर्गीकरण | A. पर्पटी (Crust) |
| B. मैंटल (Mantle) | |
| C. क्रोड (Core) | |
| III. भौतिक/यांत्रिक संरचना पर आधारित वर्गीकरण | A. स्थलमंडल और दुर्बलता मंडल (Lithosphere and Asthenosphere) |
| B. मध्यमंडल (Mesosphere) और क्रोड (Core) | |
| IV. पृथ्वी की प्रमुख असंबद्धताएँ (Discontinuities) |
आंतरिक संरचना की जानकारी के स्रोत
प्रत्यक्ष स्रोत (Direct Sources)
प्रत्यक्ष स्रोत वे माध्यम हैं जिनसे हमें पृथ्वी के आंतरिक भाग से सीधे भौतिक नमूने (Physical Samples) प्राप्त होते हैं या हम उन गहराइयों तक सीधे पहुँचकर अवलोकन कर सकते हैं। हालाँकि ये स्रोत पृथ्वी की विशाल त्रिज्या (लगभग 6,371 कि.मी.) की तुलना में बहुत सीमित गहराई तक ही जानकारी दे पाते हैं, फिर भी ये हमारे भूवैज्ञानिक मॉडलों को प्रमाणित करने के लिए मौलिक आधार प्रदान करते हैं।
1. सतही चट्टानें एवं ज्वालामुखी उद्गार (Surface Rocks & Volcanic Eruptions)
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- सतही चट्टानें (Surface Rocks): पृथ्वी की सतह पर पाई जाने वाली चट्टानें, पर्पटी (Crust) की संरचना का सबसे सुलभ और सीधा प्रमाण हैं।
- उदाहरण: महाद्वीपों पर पाई जाने वाली ग्रेनाइट (Granite) जैसी चट्टानें महाद्वीपीय पर्पटी की संरचना को समझने में मदद करती हैं, जबकि महासागरीय तल पर मिलने वाली बेसाल्ट (Basalt) चट्टानें महासागरीय पर्पटी के बारे में जानकारी देती हैं।
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- ज्वालामुखी उद्गार (Volcanic Eruptions): यह सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष स्रोतों में से एक है क्योंकि यह पृथ्वी की सतह के नीचे की सामग्री को बाहर लाता है।
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- ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान निकलने वाला गर्म, तरल पदार्थ जिसे मैग्मा (Magma) कहते हैं, ठंडा होने पर चट्टानों का निर्माण करता है।
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- इस मैग्मा का प्रयोगशाला में विश्लेषण करने से हमें पृथ्वी के आंतरिक भाग की रासायनिक संरचना और तापमान की स्थिति का पता चलता है।
- निष्कर्ष: चूँकि मैग्मा का मुख्य स्रोत दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) है, जो ऊपरी मैंटल का एक हिस्सा है, यह हमें पर्पटी के नीचे की परत, यानी मैंटल की संरचना के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी देता है। [UPSC/State PCS Conceptual Question]
2. खनन और वेधन परियोजनाएँ (Mining and Drilling Projects)
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- खनन (Mining): खनन गतिविधियाँ हमें कुछ किलोमीटर की गहराई तक सीधे देखने और चट्टानों के नमूने इकट्ठा करने का अवसर देती हैं।
- उदाहरण: दक्षिण अफ्रीका की सोने की खानें (जैसे Mponeng Gold Mine) लगभग 3 से 4 किलोमीटर तक गहरी हैं। इन खानों से यह स्पष्ट हुआ है कि गहराई के साथ तापमान और दबाव में तेजी से वृद्धि होती है।
- ⚠️ सीमा: अत्यधिक तापमान के कारण इस गहराई से नीचे खनन संभव नहीं हो पाता है।
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- वैज्ञानिक वेधन परियोजनाएँ (Scientific Drilling Projects): ये परियोजनाएँ पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के उद्देश्य से की गई हैं और अब तक के सबसे गहरे प्रत्यक्ष स्रोत हैं।
- उदाहरण:कोला सुपरडीप बोरहोल (Kola Superdeep Borehole), जो रूस के आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, मानव द्वारा खोदा गया सबसे गहरा बोरहोल है। इसकी गहराई 12.2 किलोमीटर से अधिक है। [BPSC 2019 – Related Concept]
- इससे प्राप्त जानकारी: इस परियोजना ने अप्रत्याशित रूप से यह दर्शाया कि इतनी गहराई पर भी चट्टानों में पानी मौजूद था और तापमान अनुमान से कहीं अधिक था।
- उदाहरण: एकीकृत महासागरीय वेधन परियोजना (IODP) जैसी परियोजनाएँ महासागरों के तल में ड्रिलिंग करती हैं, क्योंकि वहाँ पर्पटी की मोटाई (लगभग 5-7 कि.मी.) महाद्वीपों की तुलना में बहुत कम होती है, जिससे मैंटल तक पहुँचना अपेक्षाकृत आसान होता है।
- उदाहरण:कोला सुपरडीप बोरहोल (Kola Superdeep Borehole), जो रूस के आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है, मानव द्वारा खोदा गया सबसे गहरा बोरहोल है। इसकी गहराई 12.2 किलोमीटर से अधिक है। [BPSC 2019 – Related Concept]
प्रत्यक्ष स्रोतों की सीमाएँ (Limitations of Direct Sources)
- अत्यधिक सीमित गहराई: अब तक की सबसे गहरी ड्रिलिंग (12.2 कि.मी.) भी पृथ्वी के केंद्र तक की दूरी (6,371 कि.मी.) का मात्र 0.2% है।
- अत्यधिक लागत और तकनीकी चुनौतियाँ: गहराई पर अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण ड्रिलिंग उपकरण पिघल जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं।
निष्कर्ष: प्रत्यक्ष स्रोत हमें पृथ्वी की पर्पटी और ऊपरी मैंटल के बारे में बहुमूल्य और ठोस जानकारी देते हैं, लेकिन वे पृथ्वी की समग्र आंतरिक संरचना, विशेष रूप से गहरे मैंटल और क्रोड के बारे में बताने में असमर्थ हैं। इसी कारण हमें अप्रत्यक्ष स्रोतों, विशेषकर भूकम्पीय तरंगों पर निर्भर रहना पड़ता है।
अप्रत्यक्ष स्रोत (Indirect Sources)
अप्रत्यक्ष स्रोत वे विधियाँ हैं जिनमें पृथ्वी के आंतरिक भाग का अध्ययन सीधे भौतिक नमूनों से नहीं, बल्कि विभिन्न भूभौतिकीय घटनाओं और वैज्ञानिक सिद्धांतों के विश्लेषण के माध्यम से किया जाता है। पृथ्वी की गहराई तक हमारी पहुँच की सीमाओं के कारण, आंतरिक संरचना के बारे में हमारी अधिकांश समझ इन्हीं स्रोतों पर आधारित है।
1. तापमान, दबाव और घनत्व का विश्लेषण
ये तीनों गुण गहराई के साथ बदलते हैं और पृथ्वी की परतों की भौतिक अवस्था (ठोस, द्रव) तथा संरचना को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- तापमान (Temperature)
सतह से केंद्र की ओर जाने पर तापमान में लगातार वृद्धि होती है। यह वृद्धि मुख्य रूप से रेडियोधर्मी पदार्थों के विखंडन और दबाव के कारण उत्पन्न ऊष्मा से होती है। केंद्र का तापमान लगभग 6,000°C तक अनुमानित है। यह अत्यधिक तापमान ही बाहरी क्रोड (Outer Core) के तरल अवस्था में होने का मुख्य कारण है। - दबाव (Pressure)
ऊपरी चट्टानी परतों का भार नीचे की परतों पर अत्यधिक दबाव डालता है, जो केंद्र की ओर बढ़ता जाता है।
⋆ उदाहरण: पृथ्वी का आंतरिक क्रोड (Inner Core) बाहरी क्रोड से भी अधिक गर्म होने के बावजूद, इसी अत्यधिक दबाव के कारण ठोस अवस्था में रहता है। दबाव इतना अधिक होता है कि वह परमाणुओं को तरल अवस्था में फैलने से रोक देता है। - घनत्व (Density)
पृथ्वी का औसत घनत्व लगभग 5.5 ग्राम/से.मी.³ है, जबकि सतही चट्टानों का औसत घनत्व केवल 2.7-3.0 ग्राम/से.मी.³ है। यह गणितीय अंतर स्पष्ट रूप से बताता है कि पृथ्वी के आंतरिक भाग (क्रोड) में बहुत अधिक घनत्व वाले पदार्थ मौजूद हैं।
⋆ निष्कर्ष: इसी आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि पृथ्वी का क्रोड भारी धातुओं, जैसे लोहा और निकेल, से बना है। [UPPSC 2021]
2. उल्का पिंड (Meteorites)
उल्का पिंड अंतरिक्ष से पृथ्वी पर गिरने वाले ठोस पिंड हैं। माना जाता है कि इनका निर्माण उसी प्रक्रिया से हुआ है जिससे हमारे सौर मंडल और पृथ्वी का निर्माण हुआ था। जब लोहे और निकेल से बने उल्का पिंडों का विश्लेषण किया जाता है, तो उनकी संरचना पृथ्वी के क्रोड के अनुमानित संघटन से मेल खाती है। यह क्रोड की संरचना (जिसे ‘निफे’ – Nife कहते हैं) के बारे में एक महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष प्रमाण है।
3. गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्र
- गुरुत्वाकर्षण विसंगति (Gravity Anomaly)
पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वाकर्षण का मान हर जगह एक समान नहीं है। यह भिन्नता पर्पटी और मैंटल में द्रव्यमान (Mass) के असमान वितरण के कारण होती है। यह विसंगति हमें पृथ्वी की आंतरिक परतों की सजातीय (Homogeneous) न होने की जानकारी देती है। - पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s Magnetic Field)
पृथ्वी एक विशाल चुंबक की तरह व्यवहार करती है, जिसका मुख्य कारण जियोडायनेमो प्रभाव (Geodynamo Effect) है। यह प्रभाव तभी संभव है जब पृथ्वी के क्रोड का बाहरी हिस्सा विद्युत सुचालक तरल अवस्था में हो और वह संवहन धाराओं (Convection Currents) के कारण लगातार गति कर रहा हो।
⋆ यह बाहरी क्रोड के तरल होने का एक ठोस अप्रत्यक्ष प्रमाण है। [UPSC Mains, UPPSC 2023]
4. भूकम्पीय तरंगें (Seismic Waves) – ⋆ सर्वाधिक महत्वपूर्ण और निर्णायक स्रोत
भूकंप के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा तरंगों का अध्ययन पृथ्वी के आंतरिक भाग की सबसे सटीक तस्वीर प्रदान करता है। इन तरंगों का व्यवहार पदार्थ के घनत्व, कठोरता और भौतिक अवस्था के अनुसार बदलता है, जिससे वे एक तरह से पृथ्वी का ‘अल्ट्रासाउंड’ करती हैं।
भूकम्पीय तरंगों का तुलनात्मक विश्लेषण
| तरंग का प्रकार | गुण एवं विशेषताएँ | भूवैज्ञानिक निष्कर्ष एवं PYQ तथ्य |
| P-तरंगें (प्राथमिक तरंगें) | ✓ अनुदैर्ध्य (Longitudinal) तरंगें हैं।<br>✓ इनकी गति सबसे तेज होती है।<br>✓ ये ठोस, द्रव और गैस, तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं। | इनका वेग घनत्व के साथ बढ़ता है। जहाँ भी इनके वेग में अचानक परिवर्तन होता है, उसे एक नई परत या असंबद्धता (Discontinuity) माना जाता है। |
| S-तरंगें (द्वितीयक तरंगें) | ✓ अनुप्रस्थ (Transverse) तरंगें हैं।<br>✓ इनकी गति P-तरंगों से कम होती है।<br>✓ ये केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं; द्रव में लुप्त हो जाती हैं। | 2,900 कि.मी.2,900 कि.मी. (मैंटल-क्रोड सीमा) पर इनका पूरी तरह से गायब हो जाना, बाहरी क्रोड के तरल (liquid) होने का अकाट्य प्रमाण है। [UPSC 2021] |
छाया क्षेत्र (Shadow Zone)
यह पृथ्वी की सतह का वह क्षेत्र है जहाँ किसी विशेष भूकंप के बाद कोई भी भूकम्पीय तरंग (P या S) दर्ज नहीं की जाती। S-तरंगों का छाया क्षेत्र P-तरंगों की तुलना में बहुत बड़ा होता है क्योंकि तरल बाहरी क्रोड S-तरंगों को पूरी तरह से रोक देता है, जबकि P-तरंगें उससे गुजरते हुए केवल अपना मार्ग बदलती (अपवर्तित होती) हैं। यह छाया क्षेत्र क्रोड के आकार और अवस्था की सटीक जानकारी देता है।
[आरेख: पृथ्वी के क्रॉस-सेक्शन का एक सरल चित्र, जिसमें भूकंप के केंद्र (Focus) से निकलती P और S तरंगों को दर्शाया गया हो। S-तरंगों को तरल बाहरी क्रोड पर रुकते हुए और एक बड़े छाया क्षेत्र का निर्माण करते हुए दिखाया जाए।]
भूकम्पीय तरंगें (Seismic Waves)
भूकंप के दौरान, जहाँ ऊर्जा मुक्त होती है (उद्गम केंद्र या Focus), वहाँ से चारों दिशाओं में तरंगों के रूप में कंपन फैलता है। शांत तालाब में पत्थर फेंकने पर उत्पन्न होने वाली लहरों की तरह, ये ऊर्जा तरंगें पृथ्वी के भीतर और इसकी सतह पर यात्रा करती हैं। इन्हीं तरंगों को भूकम्पीय तरंगें कहा जाता है। भूकम्पीय तरंगों का अध्ययन (सिस्मोलॉजी) ही पृथ्वी की आंतरिक परतों के बारे में जानकारी का सबसे विश्वसनीय और विस्तृत स्रोत है।
भूकम्पीय तरंगों के प्रकार
इन तरंगों को मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:
- मुख्य तरंगें (Body Waves): ये तरंगें पृथ्वी के उद्गम केंद्र से उत्पन्न होकर पृथ्वी के आंतरिक भाग (Body) से होकर गुजरती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं:
- सतही तरंगें (Surface Waves): जब मुख्य तरंगें पृथ्वी की सतह पर पहुँचती हैं, तो वे सतही चट्टानों के साथ क्रिया करके नई तरंगों को जन्म देती हैं, जिन्हें सतही तरंगें कहते हैं। ये तरंगें सतह के साथ-साथ चलती हैं और सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं।
1. मुख्य तरंगें (Body Waves) का विस्तृत विश्लेषण
- P-तरंगें (प्राथमिक तरंगें – Primary Waves)
ये सबसे तीव्र गति वाली तरंगें हैं और भूकंपीय स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती हैं।- गति की प्रकृति: ये ध्वनि तरंगों की तरह अनुदैर्ध्य (Longitudinal) होती हैं, अर्थात इनके कणों का कंपन तरंग की दिशा में आगे-पीछे होता है। यह चट्टानों पर दबाव डालती हैं और उनमें फैलाव तथा संकुचन पैदा करती हैं।
- माध्यम: ये ठोस, द्रव और गैस, तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं। हालांकि, एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाने पर इनकी गति और दिशा में परिवर्तन (अपवर्तन) होता है।
- वैज्ञानिक महत्व: इनका वेग पदार्थ के घनत्व पर निर्भर करता है। अधिक घनत्व वाले पदार्थ में इनकी गति तेज होती है। इनके वेग में होने वाले परिवर्तन से ही पृथ्वी की परतों और असंबद्धताओं (Discontinuities) का पता लगाया गया है।
- S-तरंगें (द्वितीयक तरंगें – Secondary Waves)
ये P-तरंगों के बाद भूकंपीय स्टेशन पर पहुँचती हैं और इनकी गति P-तरंगों से कम होती है।- गति की प्रकृति: ये प्रकाश तरंगों की तरह अनुप्रस्थ (Transverse) होती हैं। इनमें कणों का कंपन तरंग की दिशा के समकोण (ऊपर-नीचे) होता है।
- माध्यम: यह इनकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। यह केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं; द्रव या गैस में यह विलुप्त हो जाती हैं।
- ⋆ वैज्ञानिक महत्व: इनका यही गुण पृथ्वी के बाहरी क्रोड (Outer Core) के तरल होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब S-तरंगें मैंटल-क्रोड सीमा पर पहुँचती हैं, तो वे तरल बाहरी क्रोड में प्रवेश नहीं कर पातीं और वहीं समाप्त हो जाती हैं। [UPSC 2021]
2. सतही तरंगें (Surface Waves)
ये तरंगें पृथ्वी की सतह तक ही सीमित रहती हैं और मुख्य तरंगों की तुलना में धीमी गति से चलती हैं, लेकिन इनका आयाम (Amplitude) बहुत अधिक होता है, जिसके कारण ये सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं।
- लव तरंगें (Love Waves or L-waves): इनकी गति सतही तरंगों में सबसे तेज होती है। इनमें चट्टानों के कण धरातल पर क्षैतिज रूप से (दाएँ-बाएँ) कंपन करते हैं। ये इमारतों की नींव को हिलाकर सबसे अधिक क्षति पहुँचाती हैं।
- रैले तरंगें (Rayleigh Waves or R-waves): ये तरंगें समुद्र की लहरों की तरह गोलाकार या दीर्घवृत्ताकार पथ पर कंपन करती हैं। यह धरातल पर एक साथ ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज दोनों तरह की गति उत्पन्न करती हैं, जिससे जमीन लुढ़कती हुई महसूस होती है।
पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय तरंगों की भूमिका
भूकम्पीय तरंगें पृथ्वी के लिए एक प्रकार के ‘अल्ट्रासाउंड’ का काम करती हैं। उनके व्यवहार का विश्लेषण करके वैज्ञानिक निम्नलिखित निष्कर्ष निकालते हैं:
- परतों का निर्धारण: जब ये तरंगें एक अलग घनत्व वाली परत में प्रवेश करती हैं, तो उनकी गति बदल जाती है और वे मुड़ (अपवर्तित) जाती हैं। इन परिवर्तनों का अध्ययन करके ही पर्पटी, मैंटल और क्रोड जैसी परतों की सीमाओं (असंबद्धताओं) का पता लगाया गया है।
- छाया क्षेत्र (Shadow Zone)
यह पृथ्वी की सतह का वह क्षेत्र है जहाँ किसी विशेष भूकंप की P या S तरंगें दर्ज नहीं की जाती हैं। यह छाया क्षेत्र क्रोड की उपस्थिति और उसकी अवस्था का सबसे बड़ा प्रमाण है।- P-तरंगों का छाया क्षेत्र: भूकंप के केंद्र से 105° से 145° के बीच का क्षेत्र P-तरंगों का छाया क्षेत्र कहलाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि P-तरंगें तरल बाहरी क्रोड से गुजरते समय तेजी से मुड़ (अपवर्तित) जाती हैं।
- S-तरंगों का छाया क्षेत्र: यह P-तरंगों के छाया क्षेत्र से बहुत बड़ा होता है। भूकंप केंद्र से 105° के बाद का पूरा क्षेत्र S-तरंगों के लिए छाया क्षेत्र बन जाता है, क्योंकि S-तरंगें तरल बाहरी क्रोड में प्रवेश ही नहीं कर पातीं।
- ⋆ निष्कर्ष: S-तरंगों का विशाल छाया क्षेत्र ही वह अकाट्य प्रमाण है जो सिद्ध करता है कि पृथ्वी का बाहरी क्रोड तरल अवस्था में है। [UPSC/State PCS Conceptual Question]
मुख्य तरंगों का तुलनात्मक अध्ययन
| विशेषता | P-तरंगें (Primary Waves) | S-तरंगें (Secondary Waves) |
| गति | सबसे तेज (Fastest) | धीमी (P-waves की लगभग 60%) |
| तरंग की प्रकृति | अनुदैर्ध्य (Longitudinal) – दबाव और फैलाव | अनुप्रस्थ (Transverse) – ऊपर-नीचे गति |
| माध्यम की आवश्यकता | ठोस, द्रव, गैस (तीनों में संचरण) | केवल ठोस (तरल में विलुप्त) |
| भूकंपीय स्टेशन पर आगमन | सबसे पहले (First to arrive) | P-तरंगों के बाद (Second to arrive) |
| वैज्ञानिक योगदान | परतों के घनत्व और सीमाओं का निर्धारण | बाहरी क्रोड के तरल होने का निर्णायक प्रमाण |
[आरेख: पृथ्वी का एक क्रॉस-सेक्शन जिसमें भूकंप के उद्गम केंद्र से निकलती P और S तरंगों का मार्ग दर्शाया गया हो। S-तरंगों को तरल बाहरी क्रोड की सीमा पर समाप्त होते हुए और P-तरंगों को अपवर्तित होते हुए दिखाया जाए, जिससे दोनों का ‘छाया क्षेत्र’ स्पष्ट रूप से समझ में आए।]
रासायनिक संरचना पर आधारित वर्गीकरण (Classification based on Chemical Composition)
प्रारंभिक भूवैज्ञानिकों ने पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने के लिए उसके रासायनिक संघटन और पदार्थों के घनत्व को आधार बनाया। इस वर्गीकरण के अनुसार, पृथ्वी मुख्य रूप से तीन संकेंद्रित परतों (Concentric Layers) से मिलकर बनी है। ऑस्ट्रियाई भूविज्ञानी एडवर्ड स्वेस (Eduard Suess) इस वर्गीकरण के प्रमुख प्रस्तावक थे। उन्होंने प्रमुख रासायनिक तत्वों की प्रधानता के आधार पर इन परतों का नामकरण किया।
यह वर्गीकरण पृथ्वी की आंतरिक परतों को समझने का सबसे सरल और मौलिक तरीका है।
[आरेख: पृथ्वी का एक सरल कटा हुआ दृश्य (Cross-section) जिसमें सबसे ऊपरी पतली परत पर्पटी (सियाल और सिमा), उसके नीचे विस्तृत मैंटल और केंद्र में क्रोड (निफे) को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया हो।]
1. पर्पटी (Crust)
यह पृथ्वी की सबसे बाहरी, सबसे पतली और ठोस परत है। इसकी मोटाई और संरचना स्थान के अनुसार भिन्न होती है। रासायनिक आधार पर इसे दो उप-भागों में विभाजित किया जाता है:
- महाद्वीपीय पर्पटी (Continental Crust)
- नाम: इसे सियाल (SIAL) परत भी कहा जाता है, क्योंकि यह मुख्य रूप से सिलिका (Si) और एल्युमिनियम (Al) से बनी है।
- चट्टानें: यह परत मुख्यतः ग्रेनाइट (Granite) और रूपांतरित चट्टानों से बनी है, जो प्रकृति में अम्लीय (Acidic) होती हैं।
- मोटाई: इसकी औसत मोटाई लगभग 30 से 50 किलोमीटर तक होती है, लेकिन ऊँचे पर्वतों (जैसे हिमालय) के नीचे यह 70 किलोमीटर से भी अधिक हो सकती है।
- घनत्व: इसका घनत्व अपेक्षाकृत कम (लगभग 2.7 ग्राम/से.मी.³) होता है। इसी कम घनत्व के कारण महाद्वीप, महासागरीय पर्पटी के ऊपर “तैरते” हैं। [MPPSC 2020]
- महासागरीय पर्पटी (Oceanic Crust)
- नाम: इसे सिमा (SIMA) परत भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें सिलिका (Si) और मैग्नीशियम (Mg) की प्रधानता होती है।
- चट्टानें: यह परत मुख्यतः बेसाल्ट (Basalt) चट्टानों से बनी होती है, जो प्रकृति में क्षारीय (Basic) होती हैं।
- मोटाई: यह महाद्वीपीय पर्पटी की तुलना में बहुत पतली होती है; इसकी औसत मोटाई केवल 5 से 10 किलोमीटर है।
- घनत्व: इसका घनत्व महाद्वीपीय पर्पटी से अधिक (लगभग 3.0 ग्राम/से.मी.³) होता है।
2. मैंटल (Mantle)
यह पृथ्वी की मध्यवर्ती परत है जो पर्पटी के ठीक नीचे से शुरू होती है और लगभग 2,900 किलोमीटर की गहराई तक फैली हुई है।
- रासायनिक संरचना: इसमें सिलिकेट चट्टानों की प्रधानता होती है, लेकिन पर्पटी की तुलना में इसमें लोहा (Iron) और मैग्नीशियम (Magnesium) की मात्रा बहुत अधिक होती है। प्रमुख खनिज ऑलिवीन (Olivine) और पाइरॉक्सीन (Pyroxene) हैं।
- आयतन और द्रव्यमान: मैंटल पृथ्वी के कुल आयतन का लगभग 84% और कुल द्रव्यमान का लगभग 67% हिस्सा घेरता है। यह पृथ्वी की सबसे विशाल परत है।
- घनत्व: मैंटल का घनत्व गहराई के साथ 3.3 ग्राम/से.मी.³ से बढ़कर 5.7 ग्राम/से.मी.³ तक हो जाता है।
- महत्व: मैंटल के ऊपरी भाग (दुर्बलतामंडल) में होने वाली संवहन धाराएँ (Convection Currents) ही प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) और उससे संबंधित घटनाओं (ज्वालामुखी, भूकंप, पर्वत निर्माण) के लिए मुख्य चालक बल हैं। [UPSC Mains Conceptual Question]
3. क्रोड (Core)
यह पृथ्वी की सबसे भीतरी और सबसे सघन परत है, जो मैंटल के नीचे 2,900 किलोमीटर से लेकर पृथ्वी के केंद्र (6,371 किलोमीटर) तक विस्तृत है।
- नाम: इसे निफे (NIFE) परत कहा जाता है, क्योंकि यह मुख्य रूप से भारी धातुओं – निकेल (Ni) और लोहा (Fe) (लैटिन नाम: फेरम) से बनी है। [UPPSC 2021]
- घनत्व: इसका घनत्व बहुत अधिक होता है (लगभग 11 से 13 ग्राम/से.मी.³)। पृथ्वी का औसत घनत्व (5.5 ग्राम/से.मी.³) इसी भारी क्रोड के कारण है।
- उप-विभाजन: भूकम्पीय तरंगों के विश्लेषण से पता चला ہے कि क्रोड दो भागों में बंटा है:
- बाहरी क्रोड (Outer Core): 2,900 कि.मी. से 5,150 कि.मी. तक। यह तरल (Liquid) अवस्था में है क्योंकि S-तरंगें इससे नहीं गुजर पातीं।
- आंतरिक क्रोड (Inner Core): 5,150 कि.मी. से केंद्र तक। यह अत्यधिक दबाव के कारण ठोस (Solid) अवस्था में है।
- महत्व: बाहरी क्रोड में तरल लोहे के संचलन के कारण ही पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s Magnetic Field) उत्पन्न होता है, जो हमें हानिकारक सौर विकिरण से बचाता है।
रासायनिक परतों का तुलनात्मक सारांश
| परत | वैकल्पिक नाम (स्वेस) | प्रमुख रासायनिक तत्व | औसत घनत्व (ग्राम/से.मी.³) | प्रमुख विशेषताएँ |
| पर्पटी (Crust) | सियाल (Sial) / सिमा (Sima) | सिलिका, एल्युमिनियम, मैग्नीशियम, ऑक्सीजन | 2.7 – 3.0 | सबसे पतली, भंगुर (Brittle), और हल्की परत। |
| मैंटल (Mantle) | – | सिलिकॉन, मैग्नीशियम, लोहा, ऑक्सीजन | 3.3 – 5.7 | पृथ्वी के आयतन का सबसे बड़ा हिस्सा (84%)। प्लेट विवर्तनिकी का चालक। |
| क्रोड (Core) | निफे (Nife) | लोहा (Iron) और निकेल (Nickel) | 11.0 – 13.0 | सबसे सघन परत। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का स्रोत। |
III. भौतिक/यांत्रिक संरचना पर आधारित वर्गीकरण (Classification based on Physical/Mechanical Properties)
यह वर्गीकरण पृथ्वी की परतों को उनकी रासायनिक संरचना के बजाय उनके यांत्रिक गुणों (Mechanical Properties) जैसे—कठोरता, भंगुरता (Brittle nature), लचीलापन (Ductility), और भौतिक अवस्था (ठोस, प्लास्टिक, या तरल) के आधार पर करता है। यह आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) सिद्धांत को समझने के लिए मौलिक आधार प्रदान करता है, क्योंकि यह बताता है कि पृथ्वी की प्लेटें कैसे गति करती हैं।
[आरेख: पृथ्वी का एक क्रॉस-सेक्शन जिसमें स्थलमंडल को एक कठोर प्लेट के रूप में दर्शाया गया हो, जो अर्ध-तरल दुर्बलतामंडल के ऊपर “तैर” रही हो। उसके नीचे मध्यमंडल और फिर तरल बाहरी व ठोस आंतरिक क्रोड को लेबल किया गया हो।]
A. स्थलमंडल और दुर्बलता मंडल (Lithosphere and Asthenosphere)
ये दो परतें पृथ्वी की सतह पर होने वाली अधिकांश भूवैज्ञानिक घटनाओं (ज्वालामुखी, भूकंप, पर्वत निर्माण) के लिए जिम्मेदार हैं।
- स्थलमंडल (Lithosphere)
“लिथोस” का अर्थ है चट्टान। यह पृथ्वी की सबसे बाहरी, कठोर, भंगुर और ठंडी परत है।- संरचना: यह दो रासायनिक परतों से मिलकर बना है:
- संपूर्ण पर्पटी (Crust): (महाद्वीपीय और महासागरीय दोनों)
- मैंटल का सबसे ऊपरी कठोर भाग (Uppermost Rigid part of Mantle)
- गहराई: इसकी मोटाई एक समान नहीं है। महासागरों के नीचे यह पतला (लगभग 5-10 किमी) होता है, जबकि महाद्वीपों के नीचे इसकी मोटाई लगभग 200 किमी तक हो सकती है।
- महत्व: स्थलमंडल एक सतत परत नहीं है, बल्कि कई बड़े और छोटे टुकड़ों में टूटा हुआ है। इन्हीं टुकड़ों को विवर्तनिक प्लेटें (Tectonic Plates) कहा जाता है। ये प्लेटें ही गति करती हैं, जिसके कारण अधिकांश भूगर्भीय घटनाएँ होती हैं। [BPSC 2022]
- संरचना: यह दो रासायनिक परतों से मिलकर बना है:
- दुर्बलतामंडल (Asthenosphere)
“एस्थेनोस” का अर्थ है कमजोर। यह परत स्थलमंडल के ठीक नीचे स्थित है और ऊपरी मैंटल का हिस्सा है।- भौतिक अवस्था: यह परत पूरी तरह से पिघली हुई नहीं है, बल्कि एक आंशिक रूप से गलित (Partially Molten), प्लास्टिक या अत्यधिक चिपचिपी (Viscous) अवस्था में है। इसे “प्लास्टिक” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह लंबे समय तक दबाव पड़ने पर बह सकती है, ठीक टूथपेस्ट की तरह।
- गहराई: यह लगभग 100 किमी से शुरू होकर 400 किमी की गहराई तक पाई जाती है।
- कम वेग क्षेत्र (Low Velocity Zone – LVZ): इस परत में भूकम्पीय तरंगों की गति कम हो जाती है क्योंकि यह पूरी तरह से ठोस नहीं है। इसी कारण इसे ‘निम्न वेग मंडल’ भी कहते हैं।
- महत्व:
- कठोर स्थलमंडलीय प्लेटें इसी कमजोर और लचीली परत के ऊपर तैरती और गति करती हैं।
- यह ज्वालामुखी उद्गार के लिए मैग्मा (Magma) का मुख्य स्रोत है। [UPSC/State PCS Conceptual Question]
B. मध्यमंडल और क्रोड (Mesosphere and Core)
ये पृथ्वी की गहरी परतें हैं, जो अत्यधिक तापमान और दबाव के अधीन हैं।
- मध्यमंडल (Mesosphere)
- स्थान: यह दुर्बलतामंडल के नीचे से शुरू होकर बाहरी क्रोड की सीमा (लगभग 400 किमी से 2900 किमी) तक फैला हुआ है। यह शेष मैंटल के बराबर है।
- भौतिक अवस्था: दुर्बलतामंडल के विपरीत, यह परत पूरी तरह से ठोस और कठोर है। अत्यधिक दबाव के कारण यहाँ की चट्टानें पिघल नहीं पातीं, भले ही तापमान बहुत अधिक हो।
- बैरिसफेयर (Barysphere) – पृथ्वी का क्रोड
यह पृथ्वी की सबसे भीतरी परत है और भौतिक गुणों के आधार पर दो भागों में विभाजित है:- बाहरी क्रोड (Outer Core)
- गहराई: 2,900 किमी से 5,150 किमी तक।
- भौतिक अवस्था: यह परत तरल (Liquid) अवस्था में है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि S-तरंगें इससे होकर नहीं गुजर पाती हैं।
- महत्व: इस परत में पिघले हुए लोहे और निकेल की संवहन धाराएँ (Convection Currents) पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Geomagnetic Field) को जन्म देती हैं, जिसे जियोडायनेमो प्रभाव कहा जाता है।
- आंतरिक क्रोड (Inner Core)
- गहराई: 5,150 किमी से पृथ्वी के केंद्र (6,371 किमी) तक।
- भौतिक अवस्था: अत्यधिक उच्च तापमान (~6,000°C) के बावजूद, यह परत अत्यधिक दबाव के कारण ठोस अवस्था में है। यह एक अत्यंत सघन, धात्विक गोला है।
- बाहरी क्रोड (Outer Core)
भौतिक परतों का सारांश
| भौतिक परत | गहराई (किमी) | भौतिक अवस्था / गुण | संघटक रासायनिक परतें | प्रमुख भूवैज्ञानिक भूमिका |
| स्थलमंडल (Lithosphere) | 0 – 200 | कठोर, भंगुर, ठोस | पर्पटी + मैंटल का ऊपरी भाग | विवर्तनिक प्लेटों का निर्माण। |
| दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) | 200 – 400 | प्लास्टिक, आंशिक गलित | ऊपरी मैंटल | प्लेटों की गति का आधार; मैग्मा का स्रोत। |
| मध्यमंडल (Mesosphere) | 400 – 2,900 | कठोर, ठोस | निचला मैंटल | अत्यधिक दबाव के कारण ठोस। |
| बाहरी क्रोड (Outer Core) | 2,900 – 5,150 | तरल (Liquid) | क्रोड | पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का स्रोत। |
| आंतरिक क्रोड (Inner Core) | 5,150 – 6,371 | ठोस (Solid) | क्रोड | अत्यधिक दबाव के कारण ठोस। |
IV. पृथ्वी की प्रमुख असंबद्धताएँ (Discontinuities)
पृथ्वी की आंतरिक परतें एक-दूसरे से प्याज के छिलकों की तरह सटी हुई हैं, लेकिन वे एक समान नहीं हैं। एक परत से दूसरी परत में जाने पर उनके रासायनिक संघटन, घनत्व और भौतिक अवस्था में अचानक परिवर्तन होता है। जिन संक्रमण क्षेत्रों (Transition Zones) या सीमाओं पर ये तीव्र परिवर्तन होते हैं, उन्हें भूविज्ञान में असंबद्धता (Discontinuity) कहा जाता है।
असंबद्धताओं की पहचान मुख्य रूप से भूकम्पीय तरंगों (Seismic Waves) के वेग (Velocity) और दिशा (Direction) में होने वाले अचानक परिवर्तनों से की जाती है। जब तरंगें एक भिन्न घनत्व वाले माध्यम में प्रवेश करती हैं, तो वे या तो परावर्तित (Reflect) होती हैं या अपवर्तित (Reflect) हो जाती हैं, जिससे इन सीमाओं का पता चलता है।
[आरेख: पृथ्वी के क्रॉस-सेक्शन का एक चित्र जिसमें सभी पाँच प्रमुख असंबद्धताओं (कॉनराड, मोहो, रेपेट्टी, गुटेनबर्ग, लेहमन) को उनकी सही परतों के बीच सीमा के रूप में स्पष्ट रूप से लेबल किया गया हो।]
प्रमुख असंबद्धताएँ (Major Discontinuities)
पृथ्वी के भीतर पाँच प्रमुख असंबद्धताएँ पहचानी गई हैं, जो पर्पटी से लेकर क्रोड तक की परतों को विभाजित करती हैं।
- 1. कॉनराड असंबद्धता (Conrad Discontinuity)
- स्थान: यह असंबद्धता महाद्वीपीय पर्पटी के भीतर पाई जाती है।
- विभाजन: यह ऊपरी पर्पटी (सियाल) को निचली पर्पटी (सिमा) से अलग करती है। ऊपरी पर्पटी की चट्टानें कम घनत्व वाली और ग्रेनाइट जैसी होती हैं, जबकि निचली पर्पटी अधिक घनत्व वाली और बेसाल्ट जैसी होती है।
- विशेषता: यह एक सतत और सार्वभौमिक सीमा नहीं है और महासागरीय पर्पटी में लगभग अनुपस्थित होती है।
- 2. मोहरोविसिक (मोहो) असंबद्धता (Mohorovičić ‘Moho’ Discontinuity)
- स्थान: यह पृथ्वी की सबसे बाहरी परतों के बीच स्थित है।
- विभाजन: यह पर्पटी (Crust) को मैंटल (Mantle) से अलग करती है।
- विशेषता: यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और स्पष्ट सीमा है। इस सीमा को पार करते ही भूकम्पीय तरंगों (विशेषकर P-तरंगों) के वेग में अचानक और तीव्र वृद्धि होती है, जो मैंटल के अधिक घनत्व को इंगित करता है।
- खोजकर्ता: इसकी खोज 1909 में क्रोएशियाई भूकंपविज्ञानी एंड्रिजा मोहरोविसिक ने की थी।
- 3. रेपेट्टी असंबद्धता (Repetti Discontinuity)
- स्थान: यह असंबद्धता मैंटल के भीतर स्थित है।
- विभाजन: यह ऊपरी मैंटल (Upper Mantle) को निचले मैंटल (Lower Mantle) से अलग करती है।
- विशेषता: इस गहराई पर खनिजों की संरचना और क्रिस्टल रूप में परिवर्तन के कारण घनत्व में वृद्धि होती है।
- 4. गुटेनबर्ग असंबद्धता (Gutenberg Discontinuity)
- स्थान: यह मैंटल और क्रोड के बीच की गहरी सीमा है।
- विभाजन: यह मैंटल (Mantle) को क्रोड (Core) से अलग करती है। यह लगभग 2,900 किलोमीटर की गहराई पर स्थित है।
- विशेषता: यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण सीमा है क्योंकि यहाँ भूकम्पीय तरंगों के व्यवहार में नाटकीय परिवर्तन होता है:
- P-तरंगों का वेग अचानक कम हो जाता है।
- S-तरंगें पूरी तरह से विलुप्त हो जाती हैं, जो बाहरी क्रोड के तरल होने का निर्णायक प्रमाण है। [UPSC Mains, State PCS Conceptual]
- खोजकर्ता: इसका नाम जर्मन-अमेरिकी भूभौतिकीविद् बेनो गुटेनबर्ग के नाम पर रखा गया है।
- 5. लेहमन असंबद्धता (Lehman Discontinuity)
- स्थान: यह असंबद्धता पृथ्वी के क्रोड के भीतर स्थित है।
- विभाजन: यह तरल बाहरी क्रोड (Outer Core) को ठोस आंतरिक क्रोड (Inner Core) से अलग करती है।
- विशेषता: इस सीमा पर P-तरंगों के वेग में फिर से एक बार तीव्र वृद्धि दर्ज की जाती है, जो आंतरिक क्रोड के ठोस अवस्था में होने का संकेत देती है।
- खोजकर्ता: इसकी खोज 1936 में डेनिश भूकंपविज्ञानी इंगे लेहमन ने की थी।
सभी असंबद्धताओं का सारांश
| असंबद्धता का नाम | किन परतों को अलग करती है | अनुमानित गहराई (किमी) | संबंधित परत | संबंधित PYQ/मुख्य तथ्य |
| कॉनराड | ऊपरी पर्पटी और निचली पर्पटी | 15 – 30 | पर्पटी | महाद्वीपीय पर्पटी में प्रमुख। |
| मोहरोविसिक (मोहो) | पर्पटी और मैंटल | 35 (महाद्वीप) / 7 (महासागर) | पर्पटी / मैंटल सीमा | P-तरंगों के वेग में तीव्र वृद्धि। |
| रेपेट्टी | ऊपरी मैंटल और निचला मैंटल | ~ 660 | मैंटल | मैंटल के भीतर का विभाजन। |
| गुटेनबर्ग | मैंटल और क्रोड | 2,900 | मैंटल / क्रोड सीमा | S-तरंगें विलुप्त हो जाती हैं। [UPSC Mains] |
| लेहमन | बाहरी क्रोड और आंतरिक क्रोड | 5,150 | क्रोड | तरल से ठोस अवस्था में परिवर्तन का संकेत। |
शैलों का वर्गीकरण (Classification of Rocks)
पृथ्वी की पर्पटी (Crust) विभिन्न प्रकार की चट्टानों से बनी है, जिन्हें शैल भी कहा जाता है। शैल प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एक या एक से अधिक खनिजों का एक ठोस समुच्चय (Aggregate) होती है। शैलों का कोई निश्चित रासायनिक संघटन नहीं होता है। उनका निर्माण, गुण और स्वरूप उनके बनने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर शैलों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।
1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks)
आग्नेय चट्टानें (लैटिन शब्द ‘Ignis’ अर्थात ‘अग्नि’) पृथ्वी पर पाई जाने वाली तीन प्रमुख चट्टान श्रेणियों में से एक हैं। इनका निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग में मौजूद गर्म, तरल एवं पिघले हुए पदार्थ, जिसे मैग्मा (Magma) कहा जाता है, के ठंडा होकर ठोस होने की प्रक्रिया से होता है।
💡 इन्हें ‘प्राथमिक चट्टानें’ (Primary Rocks) भी कहा जाता है, क्योंकि ये सीधे मैग्मा से बनती हैं और पृथ्वी की पर्पटी (Crust) पर बनने वाली ये पहली चट्टानें हैं। अन्य सभी प्रकार की चट्टानें (अवसादी और रूपांतरित) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं से बनती हैं। पृथ्वी की पर्पटी का लगभग 90% से अधिक भाग आग्नेय चट्टानों से बना है।
निर्माण प्रक्रिया
- मैग्मा का निर्माण: पृथ्वी के मैंटल में उच्च तापमान और दबाव के कारण चट्टानें पिघलकर मैग्मा का निर्माण करती हैं।
- मैग्मा का ऊपर उठना: यह पिघला हुआ मैग्मा आसपास की ठोस चट्टानों की तुलना में हल्का होता है, इसलिए यह पृथ्वी की सतह की ओर ऊपर उठता है।
- ठोस अवस्था में परिवर्तन (Crystallization): जब यह मैग्मा ऊपर उठते हुए या सतह पर पहुँचकर ठंडा होता है, तो इसके खनिज क्रिस्टल के रूप में जमने लगते हैं और एक ठोस चट्टान का निर्माण करते हैं।
आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण
आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो आधारों पर किया जाता है: उत्पत्ति का स्थान (Location of Formation) और रासायनिक संरचना (Chemical Composition)।
मैग्मा के ठंडा होने की जगह के आधार पर ये दो प्रकार की होती हैं:
- 1. अंतर्वेधी आग्नेय चट्टानें (Intrusive Igneous Rocks)
जब मैग्मा पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुँच पाता और धरातल के नीचे ही दरारों या गुहाओं में धीरे-धीरे ठंडा होकर जम जाता है, तो अंतर्वेधी चट्टानों का निर्माण होता है। इन्हें ‘पातालीय चट्टानें’ (Plutonic Rocks) भी कहते हैं।- विशेषताएँ:
- धीमी गति से ठंडा होना: गहराई में उच्च तापमान के कारण मैग्मा बहुत धीमी गति से ठंडा होता है।
- बड़े रवे (Large Crystals): धीमी गति से ठंडा होने के कारण खनिजों को बड़े क्रिस्टल बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इसलिए, इन चट्टानों के रवे मोटे और आसानी से दिखाई देने वाले होते हैं (Phaneritic texture)।
- उदाहरण:
- ग्रेनाइट (Granite): महाद्वीपीय पर्पटी की मुख्य चट्टान, निर्माण सामग्री में व्यापक रूप से उपयोग होती है।
- गैब्रो (Gabbro)
- डायोराइट (Diorite)
- विशेषताएँ:
- 2. बहिर्वेधी आग्नेय चट्टानें (Extrusive Igneous Rocks)
जब मैग्मा ज्वालामुखी उद्गार के माध्यम से पृथ्वी की सतह पर लावा (Lava) के रूप में बाहर आता है और हवा या पानी के संपर्क में आने से तेजी से ठंडा होकर जम जाता है, तो बहिर्वेधी चट्टानों का निर्माण होता है। इन्हें ‘ज्वालामुखीय चट्टानें’ (Volcanic Rocks) भी कहते हैं।- विशेषताएँ:
- तेजी से ठंडा होना: सतह पर कम तापमान के कारण लावा बहुत तेजी से ठंडा होता है।
- महीन या सूक्ष्म रवे (Fine Crystals): तेजी से ठंडा होने के कारण खनिजों को बड़े क्रिस्टल बनाने का समय नहीं मिलता। इसलिए, इनके रवे बहुत छोटे होते हैं या होते ही नहीं (Aphanitic texture)। कुछ चट्टानें काँच जैसी (Glassy) भी हो सकती हैं।
- उदाहरण:
- बेसाल्ट (Basalt): महासागरीय पर्पटी की मुख्य चट्टान। भारत का दक्कन का पठार (Deccan Plateau) बेसाल्ट लावा के प्रवाह से ही बना है। [MPPSC 2020]
- ऑब्सिडियन (Obsidian): काँच जैसी दिखने वाली चट्टान, जो लावा के अत्यधिक तेजी से ठंडे होने पर बनती है।
- प्यूमिस (Pumice): एक बहुत हल्की, छिद्रयुक्त चट्टान जो गैसों के निकलने के कारण बनती है। यह पानी पर तैर सकती है।
- विशेषताएँ:
सिलिका (SiO₂) की मात्रा के आधार पर आग्नेय चट्टानों को वर्गीकृत किया जाता है:
| चट्टान का प्रकार | सिलिका की मात्रा (%) | विशेषताएँ | उदाहरण |
| अम्लीय (Acidic/Felsic) | 65% से अधिक | ∙ हल्की, कम घनत्व والی ∙ हल्के रंग (गुलाबी, सफेद) की | ग्रेनाइट (Granite), रायोलाइट (Rhyolite) |
| मध्यवर्ती (Intermediate) | 55% – 65% | ∙ अम्लीय और क्षारीय के बीच के गुण | एंडेसाइट (Andesite), डायोराइट (Diorite) |
| क्षारीय (Basic/Mafic) | 45% – 55% | ∙ भारी, अधिक घनत्व والی ∙ गहरे रंग (काला, गहरा हरा) की, लोहा और मैग्नीशियम की अधिकता | बेसाल्ट (Basalt), गैब्रो (Gabbro) |
| अल्ट्रा-क्षारीय (Ultra-Basic/Ultramafic) | 45% से कम | ∙ सबसे भारी और सघन ∙ मैंटल की प्रमुख चट्टानें | पेरिडोटाइट (Peridotite) |
आग्नेय चट्टानों की प्रमुख विशेषताएँ
- रवेदार संरचना (Crystalline Structure): ये चट्टानें खनिजों के क्रिस्टल से बनी होती हैं।
- परतों का अभाव: अवसादी चट्टानों के विपरीत, इनमें कोई परत नहीं पाई जाती है।
- जीवाश्म रहित (Non-Fossiliferous): इनका निर्माण अत्यधिक गर्म मैग्मा से होता है, जिसमें किसी भी जीव के अवशेष (Fossils) पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। यह इनकी एक महत्वपूर्ण पहचान है। [UPSC/State PSC Prelims Multiple Times]
- कठोरता और स्थायित्व: ये चट्टानें आमतौर पर बहुत कठोर, सघन और अपरदन-रोधी होती हैं। इसी कारण इनका उपयोग भवन निर्माण और स्मारकों में बहुतायत से किया जाता है।
- खनिजों का स्रोत: सोना, चाँदी, प्लैटिनम, ताँबा, जस्ता, और सीसा जैसे धात्विक खनिज अक्सर आग्नेय चट्टानों की नसों (Veins) या परतों में पाए जाते हैं।
[आरेख: एक ज्वालामुखी और पृथ्वी की सतह के नीचे का क्रॉस-सेक्शन। इसमें मैग्मा चैम्बर, सतह के नीचे जमे हुए ग्रेनाइट (अंतर्वेधी) और सतह पर बहते लावा से बनते बेसाल्ट (बहिर्वेधी) को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया हो।]
आग्नेय चट्टानों का रूपांतरण (Metamorphism of Igneous Rocks)
जब preexisting (पहले से मौजूद) आग्नेय चट्टानें पृथ्वी के भीतर अत्यधिक ताप (Heat), दाब (Pressure), या रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थों (Chemically Active Fluids) के प्रभाव में आती हैं, तो उनके मूल खनिज संघटन और संरचना (Texture) में ठोस अवस्था में ही परिवर्तन हो जाता है। इस प्रक्रिया को कायांतरण (Metamorphism) कहते हैं और इससे बनने वाली नई चट्टानों को रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) कहा जाता है।
रूपांतरण के दौरान चट्टान पिघलती नहीं है, बल्कि उसके खनिजों का पुन: क्रिस्टलीकरण (Recrystallization) हो जाता है, जिससे वे नए खनिजों या नई संरचना में व्यवस्थित हो जाते हैं।
रूपांतरण के प्रमुख कारक
- दाब (Pressure): जब चट्टानें गहराई में दब जाती हैं, तो ऊपर की चट्टानों का भार उन पर अत्यधिक दबाव डालता है। इससे खनिज सघन हो जाते हैं और एक निश्चित दिशा में संरेखित (align) हो जाते हैं, जिससे पत्रित (Foliated) चट्टानों का निर्माण होता है।
- ताप (Heat): पृथ्वी के आंतरिक भाग की ऊष्मा या मैग्मा के संपर्क में आने से चट्टानों के खनिज नए खनिजों में बदल जाते हैं।
- रासायनिक द्रव: गर्म पानी या अन्य तरल पदार्थ चट्टानों से गुजरते हुए कुछ खनिजों को घोल सकते हैं और नए खनिजों का निक्षेपण कर सकते हैं।
प्रमुख आग्नेय चट्टानों से बनने वाली रूपांतरित चट्टानें
आग्नेय चट्टानें रूपांतरण के बाद पत्रित (Foliated) या अपत्रित (Non-foliated) दोनों प्रकार की चट्टानें बना सकती हैं।
- 1. ग्रेनाइट (Granite) का रूपांतरण
- मूल चट्टान: ग्रेनाइट (एक अंतर्वेधी, अम्लीय आग्नेय चट्टान)
- रूपांतरित चट्टान: नाइस (Gneiss)
- प्रक्रिया: जब ग्रेनाइट पर उच्च ताप और निर्देशित दाब (Directed Pressure) लगता है, तो इसके खनिज (मुख्य रूप से क्वार्ट्ज, फेल्डस्पार, और अभ्रक) अलग-अलग बैंड या परतों में व्यवस्थित हो जाते हैं। हल्के रंग (क्वार्ट्ज, फेल्डस्पार) और गहरे रंग (बायोटाइट अभ्रक) के खनिजों की यह बैंडिंग (Banding) नाइस की मुख्य पहचान है।
- विशेषता: नाइस एक उच्च-श्रेणी (High-Grade) की रूपांतरित चट्टान है और इसमें स्पष्ट पत्रण (Foliation) दिखाई देता है।
- 2. बेसाल्ट (Basalt) का रूपांतरण
- मूल चट्टान: बेसाल्ट (एक बहिर्वेधी, क्षारीय आग्नेय चट्टान)
- रूपांतरित चट्टानें: शिस्ट (Schist) और एम्फीबोलाइट (Amphibolite)
- प्रक्रिया: बेसाल्ट का रूपांतरण एक क्रमिक प्रक्रिया है जो ताप और दाब के स्तर पर निर्भर करती है:
- निम्न-श्रेणी रूपांतरण (Low-grade metamorphism): कम ताप-दाब पर बेसाल्ट पहले ग्रीनशिस्ट (Greenschist) में बदलता है, जिसमें हरे रंग के खनिज (जैसे क्लोराइट) की प्रधानता होती है।
- मध्यम से उच्च-श्रेणी रूपांतरण (Medium to High-grade metamorphism): और अधिक ताप-दाब पर ग्रीनशिस्ट एम्फीबोलाइट (Amphibolite) में बदल जाता है, जिसमें एम्फीबोल (जैसे हॉर्नब्लेंड) और प्लाजियोक्लेज़ फेल्डस्पार जैसे खनिज प्रमुख होते हैं। यह एक गहरी रंग की, सघन चट्टान है। अत्यधिक रूपांतरण पर शिस्ट (Schist) भी बन सकता है।
- विशेषता: बेसाल्ट का रूपांतरण अक्सर अभिसारी प्लेट सीमाओं (Convergent Plate Boundaries) पर होता है, जहाँ महासागरीय पर्पटी का क्षेपण (Subduction) होता है।
- 3. पेरिडोटाइट (Peridotite) का रूपांतरण
- मूल चट्टान: पेरिडोटाइट (एक अल्ट्रा-क्षारीय आग्नेय चट्टान, जो पृथ्वी के मैंटल में पाई जाती है)
- रूपांतरित चट्टान: सर्पेन्टीनाइट (Serpentinite)
- प्रक्रिया: जब पेरिडोटाइट गर्म पानी (जलयोजन – Hydration) के संपर्क में आता है, तो इसके प्रमुख खनिज ऑलिवीन और पाइरॉक्सीन सर्पेन्टीन खनिजों में बदल जाते हैं।
- विशेषता: यह एक चिकनी, अक्सर हरे रंग की चट्टान होती है जिसका उपयोग सजावटी पत्थर के रूप में किया जाता है।
तालिका (Table) के रूप में वर्गीकरण
टेबल तथ्यों को याद रखने का सबसे प्रभावी तरीका होता है, खासकर जब तुलना करनी हो। यह प्रीलिम्स और मेन्स दोनों के लिए बहुत उपयोगी है।
आग्नेय चट्टानों का रूपांतरण: एक तुलनात्मक तालिका
| मूल आग्नेय चट्टान (Parent Igneous Rock) | प्रमुख रूपांतरण प्रक्रिया (Metamorphic Process) | बनने वाली रूपांतरित चट्टान (Resulting Metamorphic Rock) | मुख्य विशेषताएँ और तथ्य |
| ग्रेनाइट (Granite) | उच्च क्षेत्रीय कायांतरण (High-Grade Regional Metamorphism) – उच्च ताप और दाब | नाइस (Gneiss) | ⋆ पत्रित (Foliated) चट्टान।<br>⋆ इसमें हल्के और गहरे रंग के खनिजों की बैंडिंग (पट्टियाँ) स्पष्ट दिखती हैं। |
| बेसाल्ट (Basalt) | क्षेत्रीय कायांतरण (Regional Metamorphism) – मध्यम से उच्च ताप और दाब | शिस्ट (Schist) / एम्फीबोलाइट (Amphibolite) | ⋆ गहरे रंग की, सघन चट्टानें।<br>⋆ महासागरीय प्लेटों के क्षेपण (Subduction) क्षेत्रों में यह रूपांतरण आम है। |
| पेरिडोटाइट (Peridotite) | जलयोजन (Hydration) – पानी के साथ रासायनिक क्रिया | सर्पेन्टीनाइट (Serpentinite) | ⋆ अपत्रित (Non-foliated) चट्टान।<br>⋆ अक्सर चिकनी और हरे रंग की होती है। |
| रायोलाइट (Rhyolite) | निम्न से मध्यम कायांतरण (Low to Medium Metamorphism) | शिस्ट (Schist) | ⋆ रायोलाइट, ग्रेनाइट का बहिर्वेधी (extrusive) रूप है। रूपांतरण से महीन दाने वाला शिस्ट बनता है। |
2. अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks)
अवसादी चट्टानें (लैटिन शब्द ‘Sedimentum’ अर्थात ‘व्यवस्थित होना’ या ‘तली में बैठना’) पृथ्वी पर पाई जाने वाली तीन प्रमुख चट्टान श्रेणियों में से एक हैं। इनका निर्माण पूर्व-स्थित चट्टानों (आग्नेय, रूपांतरित या अन्य अवसादी) के अपक्षय (Weathering) और अपरदन (Erosion) से प्राप्त कणों, या जैविक पदार्थों, या रासायनिक प्रक्रियाओं से प्राप्त अवसादों (Sediments) के जमाव (Deposition) और संघनन (Compaction) से होता है।
💡 इन्हें ‘द्वितीयक चट्टानें’ (Secondary Rocks) या ‘परतदार चट्टानें’ (Stratified Rocks) भी कहा जाता है, क्योंकि इनका निर्माण पुरानी चट्टानों के टुकड़ों से होता है और ये अक्सर परतों के रूप में जमा होती हैं। पृथ्वी की सतह का लगभग 75% हिस्सा अवसादी चट्टानों से ढका है, हालांकि पर्पटी के कुल आयतन में इनका योगदान केवल 5-10% है।
निर्माण प्रक्रिया (शिलीभवन – Lithification)
अवसादों के ढीले ढेर का एक कठोर चट्टान में बदलना शिलीभवन (Lithification) कहलाता है। इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से दो चरण होते हैं:
- अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण (Weathering, Erosion, and Deposition):
- पुरानी चट्टानें भौतिक (तापमान, पाला) और रासायनिक (वर्षा का जल) कारकों से छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती हैं।
- नदी, हवा, ग्लेशियर जैसे अपरदन के कारक इन टुकड़ों (अवसादों) को बहाकर या उड़ाकर कहीं और, विशेषकर झीलों, घाटियों या समुद्रों की तली में, जमा कर देते हैं। यह जमाव अक्सर एक के ऊपर एक, परतों (Strata) के रूप में होता है।
- संघनन और सीमेंटीकरण (Compaction and Cementation):
- नई परतें जमा होने पर नीचे की परतों पर दबाव बढ़ता है, जिससे उनके कण पास-पास आ जाते हैं और उनके बीच का पानी बाहर निकल जाता है। इस प्रक्रिया को संघनन (Compaction) कहते हैं।
- इसके बाद, पानी में घुले हुए खनिज (जैसे सिलिका, कैल्साइट, या आयरन ऑक्साइड) इन कणों के बीच की खाली जगह में रिसकर उन्हें आपस में चिपका देते हैं, जैसे सीमेंट ईंटों को जोड़ता है। इस प्रक्रिया को सीमेंटीकरण (Cementation) कहते हैं।
अवसादी चट्टानों का वर्गीकरण
इन चट्टानों को उनके निर्माण में उपयोग हुए अवसादों के स्रोत और प्रकृति के आधार पर तीन मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
- 1. यांत्रिक रूप से निर्मित (Mechanically/Clastically Formed)
इनका निर्माण पुरानी चट्टानों के भौतिक टुकड़ों (कंकड़, रेत, गाद, मिट्टी) के जमाव और शिलीभवन से होता है। कणों के आकार के आधार पर इनके प्रकार होते हैं:- कांग्लोमरेट (Conglomerate): गोल कंकड़-पत्थरों के सीमेंटेड होने से बनती है।
- ब्रेक्शिया (Breccia): नुकीले या कोणीय कंकड़-पत्थरों के सीमेंटेड होने से बनती है।
- बलुआ पत्थर (Sandstone): रेत के कणों (मुख्य रूप से क्वार्ट्ज) के जमाव से बनती है। यह निर्माण कार्यों में बहुत उपयोगी है। [UPPSC 2020]
- शेल (Shale): मिट्टी (Clay) और गाद (Silt) जैसी बहुत महीन कणों के जमाव से बनती है। यह सबसे आम अवसादी चट्टान है।
- 2. रासायनिक रूप से निर्मित (Chemically Formed)
इनका निर्माण जल में घुले हुए खनिजों के वाष्पीकरण या रासायनिक अवक्षेपण (Chemical Precipitation) के कारण होता है।- चूना पत्थर (Limestone): मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट (कैल्साइट) के अवक्षेपण से बनता है। (हालांकि, इसका निर्माण जैविक रूप से भी होता है)।
- सेंधा नमक (Rock Salt): खारे पानी (जैसे झीलों) के वाष्पीकरण से बनता है।
- जिप्सम (Gypsum): यह भी वाष्पीकरण (Evaporation) से बनने वाली एक प्रमुख चट्टान है।
- चर्ट (Chert): सिलिका के रासायनिक अवक्षेपण से बनती है।
- 3. जैविक रूप से निर्मित (Organically Formed)
इनका निर्माण जीवित जीवों (पेड़-पौधों और जानवरों) के अवशेषों के जमाव और विघटन से होता है।- चूना पत्थर (Limestone): समुद्री जीवों (जैसे मूंगा, घोंघा, फोरामिनिफेरा) के कैल्शियम कार्बोनेट युक्त कंकालों और खोलों के जमाव से बनता है।
- कोयला (Coal): दलदली क्षेत्रों में लाखों वर्षों तक दबे हुए पौधों के अवशेषों के संघनन से बनता है। यह एक महत्वपूर्ण जीवाश्म ईंधन है। [Jharkhand PSC 2021]
- पीट (Peat): कोयला निर्माण का प्रारंभिक चरण।
अवसादी चट्टानों की प्रमुख विशेषताएँ
- परतदार संरचना (Stratification): ये चट्टानें हमेशा विभिन्न मोटाई की परतों में पाई जाती हैं। यह इनकी सबसे प्रमुख पहचान है।
- जीवाश्मों की उपस्थिति (Presence of Fossils): ⋆ इन चट्टानों में जीवाश्म (Fossils) पाए जाते हैं। चूँकि इनका निर्माण कम तापमान पर होता है, इसलिए इनमें दबे हुए पौधे और जानवरों के अवशेष संरक्षित हो जाते हैं। जीवाश्मों का अध्ययन पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास और जीवन के विकास को समझने में मदद करता है। [UPSC 2017, UPPSC 2022 – Multiple Times]
- नरम प्रकृति: ये आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों की तुलना में अपेक्षाकृत नरम होती हैं और आसानी से टूट सकती हैं।
- छिद्रपूर्णता (Porosity): बलुआ पत्थर जैसी चट्टानों में कणों के बीच खाली जगह (रंध्र) होती है, जिससे वे सरंध्र (Porous) होती हैं।
- जीवाश्म ईंधनों का भंडार: विश्व के अधिकांश कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के भंडार अवसादी चट्टानों के छिद्रों में ही पाए जाते हैं। [UPSC Prelims]
- सतही आकृतियाँ: इन चट्टानों पर अक्सर पानी की लहरों के निशान (Ripple Marks) या सूखे हुए कीचड़ की दरारें (Mud Cracks) जैसी सतही आकृतियाँ भी पाई जाती हैं।
[आरेख: एक लैंडस्केप जिसमें एक नदी पहाड़ों (आग्नेय चट्टान) से अवसाद बहाकर ला रही है और उसे एक झील या समुद्र की तली में परतों के रूप में जमा कर रही है। नीचे की परतों को संघनित होकर अवसादी चट्टान (जैसे बलुआ पत्थर) बनते हुए दिखाया जाए।]
अवसादी चट्टानों का रूपांतरण (Metamorphism of Sedimentary Rocks)
जब preexisting (पहले से मौजूद) अवसादी चट्टानें पृथ्वी के भीतर अत्यधिक ताप (Heat), दाब (Pressure), या रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थों (Chemically Active Fluids) के प्रभाव में आती हैं, तो उनके मूल खनिज संघटन और संरचना (Texture) में ठोस अवस्था में ही परिवर्तन हो जाता है। इस प्रक्रिया को कायांतरण (Metamorphism) कहते हैं और इससे बनने वाली नई चट्टानों को रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) कहा जाता है।
अवसादी चट्टानों का रूपांतरण भूविज्ञान में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इनसे बनने वाली कई रूपांतरित चट्टानें (जैसे संगमरमर, क्वार्टजाइट, स्लेट) आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत मूल्यवान हैं। रूपांतरण की प्रक्रिया अवसादी चट्टानों के मूल गुणों, जैसे परतदार संरचना और जीवाश्मों, को पूरी तरह से नष्ट कर सकती है।
प्रमुख अवसादी चट्टानों से बनने वाली रूपांतरित चट्टानें
- 1. चूना पत्थर (Limestone) का रूपांतरण
- मूल चट्टान: चूना पत्थर (एक रासायनिक/जैविक अवसादी चट्टान, जो मुख्य रूप से कैल्साइट – CaCO₃ से बनी है)।
- रूपांतरित चट्टान: संगमरमर (Marble)
- प्रक्रिया: जब चूना पत्थर पर अत्यधिक ताप और दाब पड़ता है, तो इसके छोटे कैल्साइट क्रिस्टल पुन: क्रिस्टलीकृत (Recrystallize) होकर बड़े, आपस में गुंथे हुए क्रिस्टल का निर्माण करते हैं। इससे एक सघन और कठोर चट्टान बनती है जिसे संगमरमर कहते हैं।
- विशेषता: संगमरमर एक अपत्रित (Non-foliated) चट्टान है, क्योंकि कैल्साइट के क्रिस्टल किसी एक दिशा में संरेखित नहीं होते। शुद्ध संगमरमर सफेद होता है, लेकिन अशुद्धियों (जैसे मिट्टी, आयरन ऑक्साइड) के कारण यह विभिन्न रंगों (गुलाबी, हरा, काला) का हो सकता है।
- PYQ संदर्भ: ⋆ यह सबसे प्रसिद्ध और बार-बार पूछे जाने वाले उदाहरणों में से एक है। [SSC/State PSC – Multiple Times]
- 2. बलुआ पत्थर (Sandstone) का रूपांतरण
- मूल चट्टान: बलुआ पत्थर (एक यांत्रिक अवसादी चट्टान, जो मुख्य रूप से क्वार्ट्ज – SiO₂ के रेत कणों से बनी है)।
- रूपांतरित चट्टान: क्वार्टजाइट (Quartzite)
- प्रक्रिया: उच्च ताप और दाब के कारण बलुआ पत्थर के क्वार्ट्ज कण और उन्हें जोड़ने वाला सिलिका सीमेंट आपस में मिलकर पूरी तरह से पुन: क्रिस्टलीकृत हो जाते हैं। यह एक अत्यंत कठोर और टिकाऊ चट्टान का निर्माण करता है।
- विशेषता: क्वार्टजाइट एक अपत्रित (Non-foliated) चट्टान है। यह इतनी कठोर होती है कि जब यह टूटती है, तो यह कणों के बीच से नहीं, बल्कि कणों के आर-पार टूटती है। इसका उपयोग निर्माण सामग्री और रेलवे ट्रैक के गिट्टी (Ballast) के रूप में होता है। [UPPSC 2020]
- 3. शेल (Shale) का रूपांतरण
- मूल चट्टान: शेल (एक यांत्रिक अवसादी चट्टान, जो मिट्टी (Clay) और गाद (Silt) जैसे बहुत महीन कणों से बनी है)।
- प्रक्रिया: शेल का रूपांतरण ताप और दाब की मात्रा के आधार पर एक क्रमिक श्रृंखला में होता है। इस प्रक्रिया को निम्न-श्रेणी से उच्च-श्रेणी कायांतरण कहा जाता है।
- कम दाब और ताप (Low-grade metamorphism): शेल सबसे पहले स्लेट (Slate) में बदलती है। दबाव के कारण मिट्टी के खनिज (Mica flakes) एक-दूसरे के समानांतर संरेखित हो जाते हैं, जिससे स्लेट में एक सपाट सतह (Slaty cleavage) विकसित होती है और यह पतली परतों में टूट सकती है।
- और अधिक ताप और दाब: स्लेट आगे फिलाइट (Phyllite) में बदल जाती है। इसमें अभ्रक (Mica) के कण थोड़े बड़े हो जाते हैं, जिससे इसकी सतह पर एक रेशमी चमक (Silky sheen) आ जाती है।
- मध्यम से उच्च ताप और दाब (Medium to high-grade): फिलाइट आगे शिस्ट (Schist) में रूपांतरित हो जाती है। इसमें अभ्रक के कण इतने बड़े हो जाते हैं कि उन्हें आँखों से देखा जा सकता है, जिससे चट्टान में एक स्पष्ट पत्रण (Foliation) दिखाई देता है जिसे शिस्टोसिटी (Schistosity) कहते हैं।
- उच्चतम ताप और दाब (Highest-grade): अंत में, शिस्ट नाइस (Gneiss) में बदल सकती है, जिसमें खनिज अलग-अलग हल्की और गहरी पट्टियों में व्यवस्थित हो जाते हैं।
- 4. कांग्लोमरेट (Conglomerate) का रूपांतरण
- मूल चट्टान: कांग्लोमरेट (गोल कंकड़-पत्थरों से बनी अवसादी चट्टान)।
- रूपांतरित चट्टान: मेटा-कांग्लोमरेट (Meta-conglomerate)
- प्रक्रिया: अत्यधिक दबाव के कारण इसके मूल कंकड़ खिंच जाते हैं और चपटे हो जाते हैं, लेकिन फिर भी अपनी पहचान बनाए रखते हैं।
अवसादी चट्टानों के रूपांतरण की तालिका और फ्लोचार्ट
तुलनात्मक तालिका
| मूल अवसादी चट्टान | रूपांतरण की तीव्रता | बनने वाली रूपांतरित चट्टान | पत्रण (Foliation) |
| चूना पत्थर | निम्न से उच्च | संगमरमर | अपत्रित (Non-foliated) |
| बलुआ पत्थर | मध्यम से उच्च | क्वार्टजाइट | अपत्रित (Non-foliated) |
| शेल | निम्न | स्लेट | पत्रित (Foliated) |
| निम्न से मध्यम | फिलाइट | पत्रित (Foliated) | |
| मध्यम | शिस्ट | पत्रित (Foliated) | |
| उच्च | नाइस | पत्रित (Foliated) | |
| कांग्लोमरेट | मध्यम से उच्च | मेटा-कांग्लोमरेट | पत्रित (Foliated) |
3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)
रूपांतरित चट्टानें (ग्रीक शब्द ‘Meta’ अर्थात ‘परिवर्तन’ और ‘Morph’ अर्थात ‘स्वरूप’) वे चट्टानें हैं जो पूर्व-स्थित (preexisting) चट्टानों के स्वरूप, संघटन और संरचना में परिवर्तन के परिणामस्वरूप बनती हैं। यह परिवर्तन तब होता है जब मूल चट्टान (Parent Rock) — जो आग्नेय, अवसादी या कोई अन्य रूपांतरित चट्टान हो सकती है — अत्यधिक ताप (Heat), दाब (Pressure), या रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थों के प्रभाव में आती है।
💡 यह कायांतरण (Metamorphism) की प्रक्रिया चट्टान के पिघले बिना ठोस अवस्था में ही होती है। यदि चट्टान पिघल जाती है, तो वह मैग्मा बन जाएगी और उससे बनने वाली चट्टान आग्नेय कहलाएगी। कायांतरण एक ‘पुन: क्रिस्टलीकरण’ (Recrystallization) की प्रक्रिया है।
रूपांतरण के कारक (Agents of Metamorphism)
कायांतरण की प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन कारकों द्वारा नियंत्रित होती है:
- ताप (Heat):
- स्रोत: ताप का स्रोत या तो पृथ्वी के भीतर का मैग्मा हो सकता है या फिर भूतापीय प्रवणता (Geothermal Gradient) (गहराई के साथ तापमान में वृद्धि) हो सकता है।
- प्रभाव: ऊष्मा खनिजों के बीच के रासायनिक बंधों को कमजोर करती है और उन्हें नए खनिजों के रूप में पुन: क्रिस्टलीकृत होने के लिए प्रेरित करती है जो उच्च तापमान पर स्थिर होते हैं।
- दाब (Pressure):
- स्रोत: दाब दो प्रकार का होता है—
- समान दाब (Confining Pressure): गहराई में चारों दिशाओं से लगने वाला दाब। यह खनिजों को सघन बनाता है।
- निर्देशित दाब (Directed Pressure): प्लेटों के टकराने जैसे विवर्तनिक बलों (Tectonic Forces) से लगने वाला एक दिशात्मक दाब।
- प्रभाव: निर्देशित दाब खनिजों को अपनी सबसे लंबी अक्ष के समानांतर समतल परतों में संरेखित (align) होने के लिए मजबूर करता है। इसी प्रक्रिया से पत्रण (Foliation) का विकास होता है।
- स्रोत: दाब दो प्रकार का होता है—
- रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थ (Chemically Active Fluids):
- गर्म पानी या अन्य तरल पदार्थ चट्टानों की दरारों से गुजरते हुए खनिजों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, कुछ खनिजों को घोलते हैं और उनकी जगह नए खनिजों का निक्षेपण करते हैं, जिससे चट्टान का रासायनिक संघटन बदल जाता है।
कायांतरण के प्रकार (Types of Metamorphism)
- 1. तापीय या संपर्क कायांतरण (Thermal or Contact Metamorphism): जब गर्म, पिघला हुआ मैग्मा या लावा ठंडी चट्टानों के संपर्क में आता है, तो वह अपने संपर्क क्षेत्र में मौजूद चट्टानों को “पका” देता है, जिससे उनके खनिज बदल जाते हैं। यह स्थानीय स्तर पर होता है।
- 2. क्षेत्रीय या गतिक कायांतरण (Regional or Dynamic Metamorphism): यह सबसे व्यापक प्रकार का कायांतरण है जो एक विशाल क्षेत्र में होता है। यह मुख्य रूप से पर्वत निर्माण प्रक्रियाओं के दौरान होता है, जब विवर्तनिक प्लेटें टकराती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर चट्टानों पर उच्च दाब और उच्च ताप दोनों लगते हैं। अधिकांश पत्रित (Foliated) चट्टानें इसी प्रक्रिया से बनती हैं। [UPSC Mains]
रूपांतरित चट्टानों का वर्गीकरण (Classification)
रूपांतरित चट्टानों को उनकी संरचना (Texture), विशेषकर खनिजों के संरेखण (Alignment), के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है:
- 1. पत्रित चट्टानें (Foliated Rocks)
ये वे चट्टानें हैं जिनमें निर्देशित दाब के कारण खनिज समानांतर परतों, पट्टियों या बैंड्स (Bands) में व्यवस्थित हो जाते हैं। यह पत्रण (Foliation) चट्टान को परतदार रूप देता है और यह अक्सर आसानी से इन परतों के साथ टूट सकती है।- पत्रण की तीव्रता (Grade of Foliation): दाब की मात्रा बढ़ने पर पत्रण और स्पष्ट होता जाता है:
- स्लेटी विदलन (Slaty Cleavage): खनिज बहुत सूक्ष्म होते हैं और चट्टान सपाट परतों में टूटती है। (उदा. स्लेट)
- शिस्टोसिटी (Schistosity): अभ्रक (Mica) जैसे खनिज बड़े होते हैं और आंखों से दिखाई देते हैं, जो चट्टान को एक चमकीला, परतदार रूप देते हैं। (उदा. शिस्ट)
- नाइसी बैंडिंग (Gneissic Banding): खनिज पूरी तरह से अलग होकर हल्की और गहरी रंग की पट्टियों या बैंड्स में व्यवस्थित हो जाते हैं। (उदा. नाइस)
- प्रमुख उदाहरण: स्लेट (Slate), फिलाइट (Phyllite), शिस्ट (Schist), और नाइस (Gneiss)।
- पत्रण की तीव्रता (Grade of Foliation): दाब की मात्रा बढ़ने पर पत्रण और स्पष्ट होता जाता है:
- 2. अपत्रित चट्टानें (Non-foliated Rocks)
इन चट्टानों में खनिजों का कोई परतदार या बैंडेड संरेखण नहीं होता। ये आमतौर पर उन चट्टानों से बनती हैं जिनमें मुख्य रूप से केवल एक ही खनिज होता है, या जब वे समान दाब (Confining Pressure) के तहत बनती हैं न कि निर्देशित दाब के।- प्रमुख उदाहरण:
- संगमरमर (Marble): चूना पत्थर के रूपांतरण से बनता है, जो मुख्य रूप से कैल्साइट से बना है। [State PSC]
- क्वार्टजाइट (Quartzite): बलुआ पत्थर के रूपांतरण से बनता है, जो मुख्य रूप से क्वार्ट्ज से बना है। [UPPSC]
- हॉर्नफेल्स (Hornfels): यह संपर्क कायांतरण से बनी एक बहुत कठोर, सूक्ष्म दाने वाली चट्टान है।
- प्रमुख उदाहरण:
प्रमुख रूपांतरित चट्टानें और उनकी मूल चट्टानें
यह तालिका परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
| रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) | मूल चट्टान (Parent Rock) | मूल चट्टान का प्रकार | संबंधित PYQ/मुख्य तथ्य |
| स्लेट (Slate) | शेल (Shale) | अवसादी | सबसे निम्न-श्रेणी का रूपांतरण। |
| शिस्ट (Schist) | शेल, बेसाल्ट | अवसादी/आग्नेय | स्पष्ट पत्रण वाली चट्टान। |
| नाइस (Gneiss) | ग्रेनाइट, शेल | आग्नेय/अवसादी | उच्च-श्रेणी कायांतरण; खनिजों की बैंडिंग। |
| संगमरमर (Marble) | चूना पत्थर (Limestone) | अवसादी | ⋆ अपत्रित चट्टान; मूर्तिकला और निर्माण में उपयोग। |
| क्वार्टजाइट (Quartzite) | बलुआ पत्थर (Sandstone) | अवसादी | ⋆ अपत्रित चट्टान; अत्यंत कठोर और टिकाऊ। |
| एम्फीबोलाइट (Amphibolite) | बेसाल्ट, गैब्रो | आग्नेय | गहरे रंग की, उच्च-श्रेणी की चट्टान। |
| सर्पेन्टीनाइट (Serpentinite) | पेरिडोटाइट | आग्नेय | मैंटल की चट्टानों के जलयोजन से बनती है। |
| हीरा (Diamond) | कोयला (Coal) | अवसादी | कार्बन का उच्चतम ताप-दाब पर रूपांतरण। |
शैल चक्र से संबंध: रूपांतरित चट्टानें शैल चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे अपक्षयित होकर अवसाद बना सकती हैं, या अत्यधिक ताप के कारण पिघलकर मैग्मा बन सकती हैं, जो बाद में आग्नेय चट्टानों का निर्माण करता है। यह पृथ्वी की गतिशील प्रकृति को दर्शाता है।
रूपांतरित चट्टानों का रूपांतरण (Metamorphism of Metamorphic Rocks)
हाँ, यह बिल्कुल संभव है कि एक रूपांतरित चट्टान का फिर से रूपांतरण हो जाए। जब कोई पहले से मौजूद रूपांतरित चट्टान (जैसे स्लेट, शिस्ट या नाइस) फिर से अत्यधिक ताप (Heat) और दाब (Pressure) की परिस्थितियों का सामना करती है, तो वह एक नई, उच्च-श्रेणी (Higher-Grade) की रूपांतरित चट्टान में बदल सकती है। इस प्रक्रिया को पुन: कायांतरण (Re-metamorphism) कहा जाता है।
💡 यह प्रक्रिया शैल चक्र (Rock Cycle) की चक्रीय और गतिशील प्रकृति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। चट्टानें स्थिर नहीं होतीं; वे अपने परिवेश के अनुसार लगातार बदलती रहती हैं। यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन क्षेत्रों में होती है जहाँ कई पर्वत-निर्माण घटनाएँ (Orogenic Events) घटित हुई हों।
पुन: रूपांतरण की प्रक्रिया कैसे होती है?
पुन: रूपांतरण तब होता है जब कायांतरण की परिस्थितियाँ पहले से अधिक तीव्र हो जाती हैं।
- उदाहरण: कल्पना कीजिए कि एक शेल (Shale) नामक अवसादी चट्टान का क्षेत्रीय कायांतरण होता है।
- पहला रूपांतरण (निम्न-श्रेणी): कम ताप और दाब पर, शेल स्लेट (Slate) में बदल जाती है। स्लेट एक निम्न-श्रेणी की रूपांतरित चट्टान है।
- दूसरा रूपांतरण (मध्यम-श्रेणी): अब यदि वही स्लेट विवर्तनिक गतिविधियों के कारण और अधिक गहराई में दब जाती है, जहाँ ताप और दाब पहले से अधिक है, तो वह पुन: रूपांतरित होकर शिस्ट (Schist) में बदल जाएगी। यहाँ, स्लेट के सूक्ष्म खनिज (जैसे क्लोराइट) बड़े और स्पष्ट दिखने वाले अभ्रक (Mica) के क्रिस्टल में बदल जाते हैं।
- तीसरा रूपांतरण (उच्च-श्रेणी): यदि वही शिस्ट और भी अधिक तीव्र ताप और दाब का सामना करती है, तो वह पुन: रूपांतरित होकर नाइस (Gneiss) में बदल सकती है। इस प्रक्रिया में, शिस्ट के खनिज पूरी तरह से अलग होकर हल्की और गहरी रंग की पट्टियों (Bands) में व्यवस्थित हो जाते हैं।
इस उदाहरण में, शिस्ट का निर्माण स्लेट (एक रूपांतरित चट्टान) के पुन: रूपांतरण से हुआ है। इसी तरह, नाइस का निर्माण शिस्ट (एक अन्य रूपांतरित चट्टान) के पुन: रूपांतरण से हो सकता है।
प्रमुख उदाहरण: एक रूपांतरित चट्टान से दूसरी रूपांतरित चट्टान का निर्माण
यह प्रक्रिया एक प्रगतिशील श्रृंखला (Progressive Series) के रूप में देखी जा सकती है, जहाँ प्रत्येक अगली चट्टान पिछली चट्टान से अधिक रूपांतरित होती है।
| मूल चट्टान (Parent Rock) | रूपांतरण की तीव्रता | बनने वाली नई रूपांतरित चट्टान | मुख्य परिवर्तन |
| स्लेट (Slate) | मध्यम (Intermediate Grade) | फिलाइट (Phyllite) / शिस्ट (Schist) | क्रिस्टल का आकार बढ़ता है, सतह पर चमक (Sheen) या स्पष्ट पत्रण (Foliation) विकसित होता है। |
| शिस्ट (Schist) | उच्च (High Grade) | नाइस (Gneiss) | खनिज अलग-अलग पट्टियों (Bands) में व्यवस्थित हो जाते हैं (नाइसी बैंडिंग)। |
| नाइस (Gneiss) | अत्यंत उच्च (Very High Grade) | मिग्मेटाइट (Migmatite) | ⋆ यह एक मिश्रित चट्टान है। अत्यधिक उच्च तापमान के कारण नाइस आंशिक रूप से पिघलने लगती है। इसमें रूपांतरित (ठोस) और आग्नेय (पिघला हुआ) दोनों भाग पाए जाते हैं। |
कायांतरण की श्रेणी (Grade of Metamorphism)
कायांतरण की श्रेणी या ग्रेड का निर्धारण इस बात से होता है कि मूल चट्टान ने कितने तीव्र ताप और दाब का अनुभव किया है।
- निम्न-श्रेणी (Low-Grade): कम तापमान और दबाव। (जैसे: स्लेट)
- मध्यम-श्रेणी (Intermediate-Grade): मध्यम तापमान और दबाव। (जैसे: शिस्ट)
- उच्च-श्रेणी (High-Grade): उच्च तापमान और दबाव। (जैसे: नाइस)
जैसे-जैसे कायांतरण की श्रेणी बढ़ती है, चट्टान के क्रिस्टल का आकार बड़ा होता जाता है और अक्सर पत्रण (Foliation) अधिक स्पष्ट हो जाता है।
प्रमुख रूपांतरित चट्टानें और उनकी मूल चट्टानें
| मूल चट्टान (Parent Rock) | चट्टान का प्रकार | रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) | संबंधित PYQ/तथ्य |
| ग्रेनाइट (Granite) | आग्नेय | नाइस (Gneiss) | पत्रित (Foliated) चट्टान |
| बेसाल्ट (Basalt) | आग्नेय | एम्फीबोलाइट (Amphibolite) / शिस्ट (Schist) | — |
| चूना पत्थर (Limestone) | अवसादी | संगमरमर (Marble) | ⋆ यह सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है। [SSC/State PSC Multiple Times] |
| बलुआ पत्थर (Sandstone) | अवसादी | क्वार्टजाइट (Quartzite) | ⋆ अत्यंत कठोर चट्टान। [UPPSC 2020] |
| शेल (Shale) | अवसादी | स्लेट (Slate) | लिखने और छत बनाने में उपयोग। |
| कोयला (Coal) | अवसादी | ग्रेफाइट (Graphite) / हीरा (Diamond) | कार्बन का रूपांतरण। |
शैल चक्र (The Rock Cycle)
शैल चक्र एक सतत प्रक्रिया है जिसके द्वारा पुरानी चट्टानें लगातार नई चट्टानों में परिवर्तित होती रहती हैं। यह दर्शाता है कि तीनों प्रकार की चट्टानें एक-दूसरे से संबंधित हैं और एक-दूसरे में बदल सकती हैं।
- आग्नेय चट्टानें टूटकर अवसाद बनती हैं, जिनसे अवसादी चट्टानें बनती हैं।
- अवसादी और आग्नेय चट्टानें ताप और दाब के कारण रूपांतरित चट्टानों में बदल जाती हैं।
- रूपांतरित और अवसादी चट्टानें पिघलकर मैग्मा बन सकती हैं, जो ठंडा होकर पुनः आग्नेय चट्टानें बनाता है।
⋆ यह चक्र पृथ्वी को एक गतिशील ग्रह (Dynamic Planet) के रूप में स्थापित करता है। [UPSC Mains Conceptual Question]
[आरेख: शैल चक्र का एक विस्तृत और सुस्पष्ट चित्र, जिसमें तीनों चट्टानों के एक-दूसरे में परिवर्तन की प्रक्रिया (जैसे गलन, अपक्षय, कायांतरण) को तीरों (Arrows) के माध्यम से दर्शाया गया हो।]
शैलों का आर्थिक महत्व (Economic Importance of Rocks)
शैलें (चट्टानें) केवल भू-आकृतियों का निर्माण ही नहीं करतीं, बल्कि वे मानव सभ्यता के विकास और आर्थिक गतिविधियों का एक मूलभूत आधार हैं। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक, मानव ने अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चट्टानों और उनसे प्राप्त खनिजों का उपयोग किया है। शैलों का आर्थिक महत्व उनके प्रकार (आग्नेय, अवसादी, रूपांतरित) और उनमें पाए जाने वाले खनिजों पर निर्भर करता है।
1. आग्नेय चट्टानों का आर्थिक महत्व (Economic Importance of Igneous Rocks)
आग्नेय चट्टानें मैग्मा के ठंडा होने से बनती हैं और इनमें बहुमूल्य धात्विक खनिजों के भंडार पाए जाते हैं।
- बहुमूल्य और धात्विक खनिज (Precious and Metallic Minerals):
- मैग्मा के ठंडा होने की प्रक्रिया के दौरान विभिन्न खनिज अपने गलनांक और घनत्व के आधार पर अलग-अलग चरणों में क्रिस्टलीकृत होते हैं। इससे धात्विक खनिजों के अयस्क (Ores) शिराओं (Veins) या परतों (Layers) के रूप में केंद्रित हो जाते हैं।
- प्रमुख खनिज:
- लौह अयस्क (Iron Ore), निकल (Nickel), तांबा (Copper), सीसा (Lead), और जस्ता (Zinc)।
- बहुमूल्य धातुएँ: सोना (Gold), चाँदी (Silver), और प्लैटिनम (Platinum) अक्सर क्वार्ट्ज शिराओं में पाई जाती हैं जो ग्रेनाइट जैसी चट्टानों में होती हैं। [UPSC Prelims]
- उदाहरण: भारत में कर्नाटक की कोलार गोल्ड फील्ड्स धारवाड़ क्रम की चट्टानों (जो आग्नेय मूल की हैं) में स्थित है।
- भवन और निर्माण सामग्री (Building and Construction Material):
- आग्नेय चट्टानें अपनी कठोरता, सघनता और स्थायित्व के कारण निर्माण कार्यों के लिए उत्कृष्ट मानी जाती हैं।
- ग्रेनाइट (Granite): इसका उपयोग इमारतों, स्मारकों, रसोई के काउंटरटॉप, फर्श की टाइलों और सड़कों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
- बेसाल्ट (Basalt): इसे कुचलकर सड़क निर्माण में गिट्टी (Ballast) के रूप में उपयोग किया जाता है।
- रत्न (Gemstones):
- कुछ आग्नेय चट्टानों (जैसे पेग्माटाइट) में दुर्लभ और बहुमूल्य रत्नों के क्रिस्टल पाए जाते हैं।
- उदाहरण: पन्ना (Emerald), पुखराज (Topaz), और टूरमैलीन (Tourmaline)।
2. अवसादी चट्टानों का आर्थिक महत्व (Economic Importance of Sedimentary Rocks)
अवसादी चट्टानों का आर्थिक महत्व मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन, अधात्विक खनिजों और निर्माण सामग्री से जुड़ा है।
- जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels):
- ⋆ विश्व के लगभग सभी जीवाश्म ईंधन भंडार अवसादी चट्टानों में पाए जाते हैं। यह इनका सबसे बड़ा आर्थिक महत्व है। [UPSC Prelims]
- कोयला (Coal): पौधों के अवशेषों के दबने और संघनन से बनी एक प्रमुख अवसादी चट्टान, जो ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। भारत में गोंडवाना क्रम की चट्टानें कोयले के लिए प्रसिद्ध हैं। [State PSC]
- पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस (Petroleum and Natural Gas): समुद्री जीवों के अवशेषों से बनती हैं और बलुआ पत्थर (Sandstone) और चूना पत्थर (Limestone) जैसी छिद्रपूर्ण (Porous) चट्टानों के रंध्रों में संचित होती हैं।
- निर्माण सामग्री (Construction Material):
- बलुआ पत्थर (Sandstone): भारत के कई ऐतिहासिक किले और इमारतें (जैसे दिल्ली का लाल किला, आगरा का किला) बलुआ पत्थर से बनी हैं।
- चूना पत्थर (Limestone): यह सीमेंट उद्योग का आधार है। सीमेंट बनाने के लिए चूना पत्थर मुख्य कच्चा माल है। [UPPSC 2022]
- औद्योगिक खनिज (Industrial Minerals):
- सेंधा नमक (Rock Salt): भोजन और रासायनिक उद्योगों में उपयोग होता है।
- जिप्सम (Gypsum): सीमेंट, प्लास्टर ऑफ पेरिस और उर्वरक उद्योगों में इसका उपयोग होता है।
- पोटाश (Potash): उर्वरक का एक प्रमुख स्रोत।
- फॉस्फेट चट्टानें (Phosphate Rocks): इनका उपयोग भी फॉस्फेट उर्वरक बनाने में होता है।
- मिट्टी (Soils):
- अवसादी चट्टानों के अपक्षय से अत्यंत उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी का निर्माण होता है, जो कृषि का आधार है।
3. रूपांतरित चट्टानों का आर्थिक महत्व (Economic Importance of Metamorphic Rocks)
रूपांतरित चट्टानें अपनी कठोरता, क्रिस्टलीय संरचना और आकर्षक स्वरूप के कारण निर्माण और सजावटी कार्यों में अत्यधिक मूल्यवान हैं।
- भवन और सजावटी पत्थर (Building and Decorative Stone):
- संगमरमर (Marble): चूना पत्थर के रूपांतरण से बनती है। यह मूर्तिकला, फर्श और भव्य इमारतों के निर्माण के लिए एक बहुत मूल्यवान पत्थर है।
- उदाहरण: ताजमहल पूरी तरह से संगमरमर से बना है।
- स्लेट (Slate): शेल के रूपांतरण से बनती है। इसका उपयोग छत की टाइलों (Roofing), फर्श और लिखने वाली स्लेट बनाने में होता है।
- क्वार्टजाइट (Quartzite): बलुआ पत्थर के रूपांतरण से बनती है। यह अत्यंत कठोर होती है और इसका उपयोग निर्माण और रेलवे ट्रैक की गिट्टी के रूप में होता है।
- खनिज (Minerals):
- रूपांतरण की प्रक्रिया कभी-कभी खनिजों को केंद्रित कर देती है।
- ग्रेफाइट (Graphite): कोयले के रूपांतरण से बनता है, जिसका उपयोग पेंसिल और स्नेहक (Lubricant) के रूप में होता है।
- एस्बेस्टस (Asbestos), टैल्क (Talc) और अभ्रक (Mica) जैसी कई औद्योगिक खनिज शिस्ट जैसी रूपांतरित चट्टानों में पाए जाते हैं।
- रत्न (Gemstones):
- कायांतरण की प्रक्रिया कुछ बहुमूल्य रत्नों का भी निर्माण करती है।
- उदाहरण: माणिक (Ruby) और नीलम (Sapphire) कोरंडम खनिज के रूपांतरित रूप हैं। गार्नेट (Garnet) भी एक आम रूपांतरित रत्न है।
शैलों के आर्थिक महत्व का सारांश
| शैल का प्रकार | प्रमुख आर्थिक उत्पाद | उदाहरण |
| आग्नेय (Igneous) | ∙ धात्विक खनिज (अयस्क)<br>∙ निर्माण पत्थर<br>∙ रत्न | सोना, लोहा, तांबा<br>ग्रेनाइट<br>हीरा (किम्बरलाइट में) |
| अवसादी (Sedimentary) | ∙ जीवाश्म ईंधन<br>∙ सीमेंट का कच्चा माल<br>∙ औद्योगिक खनिज | कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस<br>चूना पत्थर<br>सेंधा नमक, जिप्सम |
| रूपांतरित (Metamorphic) | ∙ सजावटी पत्थर<br>∙ औद्योगिक खनिज<br>∙ रत्न | संगमरमर, स्लेट, क्वार्टजाइट<br>ग्रेफाइट, अभ्रक<br>माणिक, नीलम |
शैलों के अन्य महत्वपूर्ण पहलू (Other Important Aspects of Rocks)
आर्थिक लाभ के अतिरिक्त, शैलें पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र, मानव इतिहास और वैज्ञानिक समझ के लिए एक मौलिक आधार प्रदान करती हैं।
1. मृदा निर्माण और कृषि का आधार (Basis of Soil Formation and Agriculture)
- अपक्षय (Weathering): शैलें ही मृदा (मिट्टी) की मूल सामग्री (Parent Material) होती हैं। लाखों वर्षों में भौतिक (तापमान, वर्षा) और जैविक (पौधों की जड़ें, सूक्ष्मजीव) कारकों के कारण चट्टानें धीरे-धीरे टूटकर छोटे-छोटे कणों में बदल जाती हैं। इस प्रक्रिया को अपक्षय कहा जाता है।
- खनिज पोषण: चट्टानों में मौजूद खनिज (जैसे पोटेशियम, फॉस्फोरस, कैल्शियम) मिट्टी में मिल जाते हैं और पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं।
- ⋆ उदाहरण: दक्कन के पठार की काली मिट्टी (Regur Soil), जो कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है, बेसाल्ट (आग्नेय चट्टान) के अपक्षय से बनी है। इसमें लौह और मैग्नीशियम की अधिकता होती है। [UPSC Prelims]
- नदी घाटियों की जलोढ़ मिट्टी, जो विश्व की सबसे उपजाऊ मिट्टियों में से है, अवसादी निक्षेपों से बनती है।
- निष्कर्ष: चट्टानों के बिना मिट्टी का निर्माण संभव नहीं है, और मिट्टी के बिना कृषि और मानव के लिए भोजन का उत्पादन असंभव है।
2. भू-आकृतियों का निर्माण (Formation of Landforms)
चट्टानों की कठोरता, संरचना और अपरदन के प्रति उनकी प्रतिरोधक क्षमता विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियों (Landforms) को जन्म देती है।
- कठोर और नरम चट्टानों का प्रभाव:
- पठार और मेसा: कठोर चट्टानें (जैसे आग्नेय और रूपांतरित) अपरदन का प्रतिरोध करती हैं, जिससे वे आसपास के नरम क्षेत्रों से ऊँची उठी रह जाती हैं और पठारों (Plateaus) या मेसा (Mesas) का निर्माण करती हैं।
- घाटियाँ और मैदान: नरम चट्टानें (जैसे शेल) आसानी से अपरदित हो जाती हैं, जिससे घाटियों और मैदानों का निर्माण होता है।
- ⋆ उदाहरण: ग्रैंड कैन्यन (Grand Canyon) का निर्माण कोलोराडो नदी द्वारा अवसादी चट्टानों की परतों को काटने से हुआ है, जिससे चट्टानों की भूवैज्ञानिक संरचना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- विशिष्ट भू-आकृतियाँ:
- कार्स्ट स्थलाकृति (Karst Topography): चूना पत्थर (Limestone) जैसी घुलनशील चट्टानों वाले क्षेत्रों में भूमिगत गुफाएँ (Caves), सिंकहोल (Sinkholes) और स्टैलेक्टाइट (Stalactites) जैसी अद्वितीय आकृतियाँ बनती हैं। [UPSC 2021]
- ग्रेनाइटिक डोम (Granitic Domes): ग्रेनाइट जैसी कठोर आग्नेय चट्टानों के अपक्षय से गोलाकार और गुंबददार पहाड़ियों का निर्माण होता है।
3. भूवैज्ञानिक इतिहास का अभिलेख (Record of Geological History)
चट्टानें पृथ्वी के अतीत को समझने के लिए एक “किताब” की तरह हैं। भूवैज्ञानिक इनका अध्ययन करके अरबों वर्षों के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।
- अवसादी चट्टानों की परतें (Strata):
- अवसादी चट्टानों की परतें एक समयरेखा की तरह होती हैं। सबसे नीचे की परत सबसे पुरानी और सबसे ऊपर की परत सबसे नई होती है। इस सिद्धांत को ‘अध्यारोपण का नियम’ (Law of Superposition) कहते हैं।
- जीवाश्म (Fossils):
- ⋆ अवसादी चट्टानों में पाए जाने वाले जीवाश्म पृथ्वी पर जीवन के विकास, प्राचीन जलवायु, और उस समय के पर्यावरण के बारे में प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करते हैं।
- उदाहरण: डायनासोर के जीवाश्म हमें मेसोजोइक युग के बारे में बताते हैं। कोयले के भंडार यह संकेत देते हैं कि अतीत में उन क्षेत्रों में गर्म और नम जलवायु वाले घने जंगल थे। [State PSC]
- आयु निर्धारण (Dating of Rocks):
- रेडियोमेट्रिक डेटिंग (Radiometric Dating) तकनीक का उपयोग करके आग्नेय चट्टानों की आयु का सटीक पता लगाया जा सकता है। इससे हमें पृथ्वी, महाद्वीपों और प्रमुख भूवैज्ञानिक घटनाओं (जैसे पर्वत निर्माण) की आयु का पता चलता है।
4. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व (Cultural and Historical Significance)
मानव ने हमेशा अपने आश्रय, औजारों, कला और वास्तुकला के लिए चट्टानों का उपयोग किया है।
- प्रागैतिहासिक उपयोग:
- पाषाण युग में प्रारंभिक मानवों ने चर्ट (Chert) और फ्लिंट (Flint) जैसी चट्टानों से औजार और हथियार बनाए।
- गुफा चित्रकारी (Cave Paintings): आदिमानवों ने चट्टानी गुफाओं को आश्रय के रूप में इस्तेमाल किया और उनकी दीवारों पर चित्र बनाए, जैसे कि भीमबेटका (भारत) और अल्तामीरा (स्पेन) की गुफाओं में।
- वास्तुकला और स्मारक:
- विश्व की कई महान सभ्यताएं अपने पीछे चट्टानों से बने स्मारक छोड़ गई हैं।
- उदाहरण: मिस्र के पिरामिड (चूना पत्थर और ग्रेनाइट), रोम का कोलोसियम, भारत में एलोरा और अजंता की गुफाएँ (बेसाल्ट चट्टान को काटकर बनाई गईं)।
- आध्यात्मिक महत्व:
- कई संस्कृतियों में पहाड़ों, बड़ी चट्टानों और पत्थरों का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व होता है। (जैसे कैलाश पर्वत)।
शैलों के अन्य महत्व का सारांश
| क्षेत्र | महत्व | उदाहरण |
| पारिस्थितिकी (Ecology) | मिट्टी का निर्माण, पौधों के लिए पोषक तत्वों का स्रोत। | बेसाल्ट से काली मिट्टी, जलोढ़ निक्षेपों से उपजाऊ मैदान। |
| भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) | विविध स्थलाकृतियों (पठार, घाटियाँ, गुफाएँ) का निर्माण। | ग्रैंड कैन्यन, कार्स्ट गुफाएँ। |
| वैज्ञानिक ज्ञान (Scientific Knowledge) | पृथ्वी के इतिहास, जीवन के विकास और जलवायु परिवर्तन का रिकॉर्ड। | चट्टानों की परतें, जीवाश्म, रेडियोमेट्रिक डेटिंग। |
| मानव इतिहास और संस्कृति | आश्रय, औजार, कला, वास्तुकला और आध्यात्मिक प्रतीक। | पाषाण युग के औजार, भीमबेटका गुफाएँ, ताजमहल, पिरामिड। |
1. चट्टानों की संरचनाएँ और बनावट (Textures and Structures of Rocks)
परीक्षा में सीधे तौर पर बनावट (Texture) से जुड़े प्रश्न पूछे जा सकते हैं, क्योंकि यह चट्टान के निर्माण की परिस्थितियों को दर्शाता है।
- आग्नेय बनावट (Igneous Textures):
- फैनेरिटिक (Phaneritic): बड़े रवे, जो आँखों से देखे जा सकते हैं। यह अंतर्वेधी (Intrusive) चट्टानों (जैसे ग्रेनाइट) में पाया जाता है और धीमी गति से ठंडा होने का संकेत देता है।
- एफैनिटिक (Aphanitic): सूक्ष्म रवे, जिन्हें माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सकता है। यह बहिर्वेधी (Extrusive) चट्टानों (जैसे बेसाल्ट) में पाया जाता है और तेजी से ठंडा होने का संकेत देता है।
- पोर्फाइरिटिक (Porphyritic): बड़े और छोटे दोनों रवों का मिश्रण। यह दो-चरणों में ठंडा होने को इंगित करता है (पहले धीरे, फिर तेजी से)।
- ग्लासी (Glassy): इसमें रवे नहीं होते (जैसे ऑब्सीडियन)। यह लावा के अत्यंत तेजी से ठंडा होने का परिणाम है।
- ⋆ प्रश्न बन सकता है: “यदि एक आग्नेय चट्टान में बड़े क्रिस्टल पाए जाते हैं, तो यह क्या इंगित करता है?” (उत्तर: यह धीमी गति से ठंडा हुआ है, संभवतः धरातल के नीचे)।
2. भारतीय संदर्भ में शैलों का वर्गीकरण (Indian Context)
यह सेक्शन भूगोल और इतिहास दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की भूवैज्ञानिक संरचना और प्रमुख शैल समूहों से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
- धारवाड़ क्रम की चट्टानें (Dharwar System):
- महत्व: भारत की सबसे पुरानी अवसादी चट्टानें और आर्थिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण।
- खनिज: भारत की लगभग सभी प्रमुख धातुएँ (लोहा, मैंगनीज, तांबा, सोना) इन्हीं चट्टानों में पाई जाती हैं।
- ⋆ PYQ Link: “भारत में धात्विक खनिजों का प्रमुख स्रोत कौन-सा शैल समूह है?” [UPSC/UPPSC]
- गोंडवाना क्रम की चट्टानें (Gondwana System):
- महत्व: भारत का 98% कोयला इन्हीं चट्टानों में पाया जाता है।
- क्षेत्र: दामोदर, महानदी, गोदावरी नदी घाटियाँ।
- ⋆ PYQ Link: “भारत में कोयला भंडार मुख्य रूप से किन चट्टानों में केंद्रित है?” [Jharkhand PSC/BPSC]
- दक्कन ट्रैप (Deccan Trap):
- निर्माण: क्रिटेशियस युग के अंत में हुए दरारी ज्वालामुखी उद्गार (Fissure Eruption) से बने बेसाल्ट लावा का प्रवाह।
- महत्व: इन चट्टानों के अपक्षय से काली मिट्टी (Regur Soil) का निर्माण हुआ, जो कपास के लिए प्रसिद्ध है।
- ⋆ PYQ Link: “दक्कन ट्रैप का निर्माण किस प्रकार की चट्टान से हुआ है?” [MPPSC/UPSC]
3. चट्टानों के बीच मुख्य अंतर (Key Differences)
एक तुलनात्मक तालिका आपके रिवीजन के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है और सीधे प्रश्न बनाने में मदद कर सकती है।
| आधार | आग्नेय चट्टान | अवसादी चट्टान | रूपांतरित चट्टान |
| निर्माण | मैग्मा/लावा के ठंडा होने से | अवसादों के जमाव और संघनन से | ताप और दाब से स्वरूप परिवर्तन |
| परतें (Layers) | नहीं पाई जातीं | हाँ, परतदार होती हैं | हाँ (पत्रित) / नहीं (अपत्रित) |
| जीवाश्म (Fossils) | अनुपस्थित | हाँ, पाए जाते हैं | आमतौर पर नष्ट हो जाते हैं |
| रवे (Crystals) | हाँ, रवेदार होती हैं | आमतौर पर नहीं (टुकड़ों से बनी) | हाँ, पुन: क्रिस्टलीकृत |
| कठोरता | अत्यधिक कठोर | अपेक्षाकृत नरम और भंगुर | आमतौर पर कठोर और सघन |
| उदाहरण | ग्रेनाइट, बेसाल्ट | बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, शेल | संगमरमर, क्वार्टजाइट, स्लेट, नाइस |
⋆ प्रश्न का प्रकार: “निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:”
- आग्नेय चट्टानों में जीवाश्म पाए जाते हैं।
- अवसादी चट्टानें हमेशा परतदार होती हैं।
(सही उत्तर: केवल 2)
4. अवधारणात्मक स्पष्टता के लिए कुछ और शब्द (More Conceptual Terms)
- शिलीभवन (Lithification): वह प्रक्रिया जिससे ढीले अवसाद एक ठोस चट्टान में बदल जाते हैं (संघनन + सीमेंटीकरण)।
- पत्रण (Foliation): निर्देशित दबाव के कारण रूपांतरित चट्टानों में खनिजों का समानांतर परतों में व्यवस्थित होना।
- अपक्षय (Weathering) बनाम अपरदन (Erosion):
- अपक्षय: चट्टानों का अपने ही स्थान पर टूटना-फूटना।
- अपरदन: टूटे हुए पदार्थों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर परिवहन (नदी, हवा आदि द्वारा)।
- मैग्मा (Magma) बनाम लावा (Lava):
- मैग्मा: पिघली हुई चट्टान जब वह पृथ्वी की सतह के नीचे हो।
- लावा: पिघली हुई चट्टान जब वह पृथ्वी की सतह के ऊपर आ जाती है।
⋆ ये शब्दावलियाँ कथन-आधारित प्रश्नों को हल करने में मदद करती हैं।