भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology)

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पृथ्वी की आंतरिक संरचना: गहन, संरचित, एवं परीक्षा-केंद्रित अध्ययन

विस्तृत विषय-सूची (Detailed Table of Contents)

मुख्य टॉपिकविस्तृत उप-टॉपिक
I. आंतरिक संरचना की जानकारी के स्रोतA. प्रत्यक्ष स्रोत
B. अप्रत्यक्ष स्रोत (भूकम्पीय तरंगों का महत्व)
II. रासायनिक संरचना पर आधारित वर्गीकरणA. पर्पटी (Crust)
B. मैंटल (Mantle)
C. क्रोड (Core)
III. भौतिक/यांत्रिक संरचना पर आधारित वर्गीकरणA. स्थलमंडल और दुर्बलता मंडल (Lithosphere and Asthenosphere)
B. मध्यमंडल (Mesosphere) और क्रोड (Core)
IV. पृथ्वी की प्रमुख असंबद्धताएँ (Discontinuities)

आंतरिक संरचना की जानकारी के स्रोत

प्रत्यक्ष स्रोत (Direct Sources)

प्रत्यक्ष स्रोत वे माध्यम हैं जिनसे हमें पृथ्वी के आंतरिक भाग से सीधे भौतिक नमूने (Physical Samples) प्राप्त होते हैं या हम उन गहराइयों तक सीधे पहुँचकर अवलोकन कर सकते हैं। हालाँकि ये स्रोत पृथ्वी की विशाल त्रिज्या (लगभग 6,371 कि.मी.) की तुलना में बहुत सीमित गहराई तक ही जानकारी दे पाते हैं, फिर भी ये हमारे भूवैज्ञानिक मॉडलों को प्रमाणित करने के लिए मौलिक आधार प्रदान करते हैं।

1. सतही चट्टानें एवं ज्वालामुखी उद्गार (Surface Rocks & Volcanic Eruptions)

2. खनन और वेधन परियोजनाएँ (Mining and Drilling Projects)

प्रत्यक्ष स्रोतों की सीमाएँ (Limitations of Direct Sources)

  1. अत्यधिक सीमित गहराई: अब तक की सबसे गहरी ड्रिलिंग (12.2 कि.मी.) भी पृथ्वी के केंद्र तक की दूरी (6,371 कि.मी.) का मात्र 0.2% है।
  2. अत्यधिक लागत और तकनीकी चुनौतियाँ: गहराई पर अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण ड्रिलिंग उपकरण पिघल जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं।

निष्कर्ष: प्रत्यक्ष स्रोत हमें पृथ्वी की पर्पटी और ऊपरी मैंटल के बारे में बहुमूल्य और ठोस जानकारी देते हैं, लेकिन वे पृथ्वी की समग्र आंतरिक संरचना, विशेष रूप से गहरे मैंटल और क्रोड के बारे में बताने में असमर्थ हैं। इसी कारण हमें अप्रत्यक्ष स्रोतों, विशेषकर भूकम्पीय तरंगों पर निर्भर रहना पड़ता है।


अप्रत्यक्ष स्रोत (Indirect Sources)

अप्रत्यक्ष स्रोत वे विधियाँ हैं जिनमें पृथ्वी के आंतरिक भाग का अध्ययन सीधे भौतिक नमूनों से नहीं, बल्कि विभिन्न भूभौतिकीय घटनाओं और वैज्ञानिक सिद्धांतों के विश्लेषण के माध्यम से किया जाता है। पृथ्वी की गहराई तक हमारी पहुँच की सीमाओं के कारण, आंतरिक संरचना के बारे में हमारी अधिकांश समझ इन्हीं स्रोतों पर आधारित है।

1. तापमान, दबाव और घनत्व का विश्लेषण

ये तीनों गुण गहराई के साथ बदलते हैं और पृथ्वी की परतों की भौतिक अवस्था (ठोस, द्रव) तथा संरचना को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

2. उल्का पिंड (Meteorites)

उल्का पिंड अंतरिक्ष से पृथ्वी पर गिरने वाले ठोस पिंड हैं। माना जाता है कि इनका निर्माण उसी प्रक्रिया से हुआ है जिससे हमारे सौर मंडल और पृथ्वी का निर्माण हुआ था। जब लोहे और निकेल से बने उल्का पिंडों का विश्लेषण किया जाता है, तो उनकी संरचना पृथ्वी के क्रोड के अनुमानित संघटन से मेल खाती है। यह क्रोड की संरचना (जिसे ‘निफे’ – Nife कहते हैं) के बारे में एक महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष प्रमाण है।

3. गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्र

4. भूकम्पीय तरंगें (Seismic Waves) – ⋆ सर्वाधिक महत्वपूर्ण और निर्णायक स्रोत

भूकंप के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा तरंगों का अध्ययन पृथ्वी के आंतरिक भाग की सबसे सटीक तस्वीर प्रदान करता है। इन तरंगों का व्यवहार पदार्थ के घनत्व, कठोरता और भौतिक अवस्था के अनुसार बदलता है, जिससे वे एक तरह से पृथ्वी का ‘अल्ट्रासाउंड’ करती हैं।

भूकम्पीय तरंगों का तुलनात्मक विश्लेषण

तरंग का प्रकारगुण एवं विशेषताएँभूवैज्ञानिक निष्कर्ष एवं PYQ तथ्य
P-तरंगें (प्राथमिक तरंगें)✓ अनुदैर्ध्य (Longitudinal) तरंगें हैं।<br>✓ इनकी गति सबसे तेज होती है।<br>✓ ये ठोस, द्रव और गैस, तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं।इनका वेग घनत्व के साथ बढ़ता है। जहाँ भी इनके वेग में अचानक परिवर्तन होता है, उसे एक नई परत या असंबद्धता (Discontinuity) माना जाता है।
S-तरंगें (द्वितीयक तरंगें)✓ अनुप्रस्थ (Transverse) तरंगें हैं।<br>✓ इनकी गति P-तरंगों से कम होती है।<br>✓ ये केवल ठोस माध्यम से ही गुजर सकती हैं; द्रव में लुप्त हो जाती हैं।2,900 कि.मी.2,900 कि.मी. (मैंटल-क्रोड सीमा) पर इनका पूरी तरह से गायब हो जाना, बाहरी क्रोड के तरल (liquid) होने का अकाट्य प्रमाण है। [UPSC 2021]

[आरेख: पृथ्वी के क्रॉस-सेक्शन का एक सरल चित्र, जिसमें भूकंप के केंद्र (Focus) से निकलती P और S तरंगों को दर्शाया गया हो। S-तरंगों को तरल बाहरी क्रोड पर रुकते हुए और एक बड़े छाया क्षेत्र का निर्माण करते हुए दिखाया जाए।]


भूकम्पीय तरंगें (Seismic Waves)

भूकंप के दौरान, जहाँ ऊर्जा मुक्त होती है (उद्गम केंद्र या Focus), वहाँ से चारों दिशाओं में तरंगों के रूप में कंपन फैलता है। शांत तालाब में पत्थर फेंकने पर उत्पन्न होने वाली लहरों की तरह, ये ऊर्जा तरंगें पृथ्वी के भीतर और इसकी सतह पर यात्रा करती हैं। इन्हीं तरंगों को भूकम्पीय तरंगें कहा जाता है। भूकम्पीय तरंगों का अध्ययन (सिस्मोलॉजी) ही पृथ्वी की आंतरिक परतों के बारे में जानकारी का सबसे विश्वसनीय और विस्तृत स्रोत है।

भूकम्पीय तरंगों के प्रकार

इन तरंगों को मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

  1. मुख्य तरंगें (Body Waves): ये तरंगें पृथ्वी के उद्गम केंद्र से उत्पन्न होकर पृथ्वी के आंतरिक भाग (Body) से होकर गुजरती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं:
  2. सतही तरंगें (Surface Waves): जब मुख्य तरंगें पृथ्वी की सतह पर पहुँचती हैं, तो वे सतही चट्टानों के साथ क्रिया करके नई तरंगों को जन्म देती हैं, जिन्हें सतही तरंगें कहते हैं। ये तरंगें सतह के साथ-साथ चलती हैं और सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं।

1. मुख्य तरंगें (Body Waves) का विस्तृत विश्लेषण

2. सतही तरंगें (Surface Waves)

ये तरंगें पृथ्वी की सतह तक ही सीमित रहती हैं और मुख्य तरंगों की तुलना में धीमी गति से चलती हैं, लेकिन इनका आयाम (Amplitude) बहुत अधिक होता है, जिसके कारण ये सबसे अधिक विनाशकारी होती हैं।

पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने में भूकम्पीय तरंगों की भूमिका

भूकम्पीय तरंगें पृथ्वी के लिए एक प्रकार के ‘अल्ट्रासाउंड’ का काम करती हैं। उनके व्यवहार का विश्लेषण करके वैज्ञानिक निम्नलिखित निष्कर्ष निकालते हैं:

मुख्य तरंगों का तुलनात्मक अध्ययन

विशेषताP-तरंगें (Primary Waves)S-तरंगें (Secondary Waves)
गतिसबसे तेज (Fastest)धीमी (P-waves की लगभग 60%)
तरंग की प्रकृतिअनुदैर्ध्य (Longitudinal) – दबाव और फैलावअनुप्रस्थ (Transverse) – ऊपर-नीचे गति
माध्यम की आवश्यकताठोस, द्रव, गैस (तीनों में संचरण)केवल ठोस (तरल में विलुप्त)
भूकंपीय स्टेशन पर आगमनसबसे पहले (First to arrive)P-तरंगों के बाद (Second to arrive)
वैज्ञानिक योगदानपरतों के घनत्व और सीमाओं का निर्धारणबाहरी क्रोड के तरल होने का निर्णायक प्रमाण

[आरेख: पृथ्वी का एक क्रॉस-सेक्शन जिसमें भूकंप के उद्गम केंद्र से निकलती P और S तरंगों का मार्ग दर्शाया गया हो। S-तरंगों को तरल बाहरी क्रोड की सीमा पर समाप्त होते हुए और P-तरंगों को अपवर्तित होते हुए दिखाया जाए, जिससे दोनों का ‘छाया क्षेत्र’ स्पष्ट रूप से समझ में आए।]


रासायनिक संरचना पर आधारित वर्गीकरण (Classification based on Chemical Composition)

प्रारंभिक भूवैज्ञानिकों ने पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने के लिए उसके रासायनिक संघटन और पदार्थों के घनत्व को आधार बनाया। इस वर्गीकरण के अनुसार, पृथ्वी मुख्य रूप से तीन संकेंद्रित परतों (Concentric Layers) से मिलकर बनी है। ऑस्ट्रियाई भूविज्ञानी एडवर्ड स्वेस (Eduard Suess) इस वर्गीकरण के प्रमुख प्रस्तावक थे। उन्होंने प्रमुख रासायनिक तत्वों की प्रधानता के आधार पर इन परतों का नामकरण किया।

यह वर्गीकरण पृथ्वी की आंतरिक परतों को समझने का सबसे सरल और मौलिक तरीका है।

[आरेख: पृथ्वी का एक सरल कटा हुआ दृश्य (Cross-section) जिसमें सबसे ऊपरी पतली परत पर्पटी (सियाल और सिमा), उसके नीचे विस्तृत मैंटल और केंद्र में क्रोड (निफे) को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया हो।]

1. पर्पटी (Crust)

यह पृथ्वी की सबसे बाहरी, सबसे पतली और ठोस परत है। इसकी मोटाई और संरचना स्थान के अनुसार भिन्न होती है। रासायनिक आधार पर इसे दो उप-भागों में विभाजित किया जाता है:

2. मैंटल (Mantle)

यह पृथ्वी की मध्यवर्ती परत है जो पर्पटी के ठीक नीचे से शुरू होती है और लगभग 2,900 किलोमीटर की गहराई तक फैली हुई है।

3. क्रोड (Core)

यह पृथ्वी की सबसे भीतरी और सबसे सघन परत है, जो मैंटल के नीचे 2,900 किलोमीटर से लेकर पृथ्वी के केंद्र (6,371 किलोमीटर) तक विस्तृत है।

रासायनिक परतों का तुलनात्मक सारांश

परतवैकल्पिक नाम (स्वेस)प्रमुख रासायनिक तत्वऔसत घनत्व (ग्राम/से.मी.³)प्रमुख विशेषताएँ
पर्पटी (Crust)सियाल (Sial) / सिमा (Sima)सिलिका, एल्युमिनियम, मैग्नीशियम, ऑक्सीजन2.7 – 3.0सबसे पतली, भंगुर (Brittle), और हल्की परत।
मैंटल (Mantle)सिलिकॉन, मैग्नीशियम, लोहा, ऑक्सीजन3.3 – 5.7पृथ्वी के आयतन का सबसे बड़ा हिस्सा (84%)। प्लेट विवर्तनिकी का चालक।
क्रोड (Core)निफे (Nife)लोहा (Iron) और निकेल (Nickel)11.0 – 13.0सबसे सघन परत। पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का स्रोत।

III. भौतिक/यांत्रिक संरचना पर आधारित वर्गीकरण (Classification based on Physical/Mechanical Properties)

यह वर्गीकरण पृथ्वी की परतों को उनकी रासायनिक संरचना के बजाय उनके यांत्रिक गुणों (Mechanical Properties) जैसे—कठोरता, भंगुरता (Brittle nature), लचीलापन (Ductility), और भौतिक अवस्था (ठोस, प्लास्टिक, या तरल) के आधार पर करता है। यह आधुनिक प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) सिद्धांत को समझने के लिए मौलिक आधार प्रदान करता है, क्योंकि यह बताता है कि पृथ्वी की प्लेटें कैसे गति करती हैं।

[आरेख: पृथ्वी का एक क्रॉस-सेक्शन जिसमें स्थलमंडल को एक कठोर प्लेट के रूप में दर्शाया गया हो, जो अर्ध-तरल दुर्बलतामंडल के ऊपर “तैर” रही हो। उसके नीचे मध्यमंडल और फिर तरल बाहरी व ठोस आंतरिक क्रोड को लेबल किया गया हो।]

A. स्थलमंडल और दुर्बलता मंडल (Lithosphere and Asthenosphere)

ये दो परतें पृथ्वी की सतह पर होने वाली अधिकांश भूवैज्ञानिक घटनाओं (ज्वालामुखी, भूकंप, पर्वत निर्माण) के लिए जिम्मेदार हैं।

B. मध्यमंडल और क्रोड (Mesosphere and Core)

ये पृथ्वी की गहरी परतें हैं, जो अत्यधिक तापमान और दबाव के अधीन हैं।

भौतिक परतों का सारांश

भौतिक परतगहराई (किमी)भौतिक अवस्था / गुणसंघटक रासायनिक परतेंप्रमुख भूवैज्ञानिक भूमिका
स्थलमंडल (Lithosphere)0 – 200कठोर, भंगुर, ठोसपर्पटी + मैंटल का ऊपरी भागविवर्तनिक प्लेटों का निर्माण।
दुर्बलतामंडल (Asthenosphere)200 – 400प्लास्टिक, आंशिक गलितऊपरी मैंटलप्लेटों की गति का आधार; मैग्मा का स्रोत।
मध्यमंडल (Mesosphere)400 – 2,900कठोर, ठोसनिचला मैंटलअत्यधिक दबाव के कारण ठोस।
बाहरी क्रोड (Outer Core)2,900 – 5,150तरल (Liquid)क्रोडपृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का स्रोत।
आंतरिक क्रोड (Inner Core)5,150 – 6,371ठोस (Solid)क्रोडअत्यधिक दबाव के कारण ठोस।

IV. पृथ्वी की प्रमुख असंबद्धताएँ (Discontinuities)

पृथ्वी की आंतरिक परतें एक-दूसरे से प्याज के छिलकों की तरह सटी हुई हैं, लेकिन वे एक समान नहीं हैं। एक परत से दूसरी परत में जाने पर उनके रासायनिक संघटन, घनत्व और भौतिक अवस्था में अचानक परिवर्तन होता है। जिन संक्रमण क्षेत्रों (Transition Zones) या सीमाओं पर ये तीव्र परिवर्तन होते हैं, उन्हें भूविज्ञान में असंबद्धता (Discontinuity) कहा जाता है।

असंबद्धताओं की पहचान मुख्य रूप से भूकम्पीय तरंगों (Seismic Waves) के वेग (Velocity) और दिशा (Direction) में होने वाले अचानक परिवर्तनों से की जाती है। जब तरंगें एक भिन्न घनत्व वाले माध्यम में प्रवेश करती हैं, तो वे या तो परावर्तित (Reflect) होती हैं या अपवर्तित (Reflect) हो जाती हैं, जिससे इन सीमाओं का पता चलता है।

[आरेख: पृथ्वी के क्रॉस-सेक्शन का एक चित्र जिसमें सभी पाँच प्रमुख असंबद्धताओं (कॉनराड, मोहो, रेपेट्टी, गुटेनबर्ग, लेहमन) को उनकी सही परतों के बीच सीमा के रूप में स्पष्ट रूप से लेबल किया गया हो।]

प्रमुख असंबद्धताएँ (Major Discontinuities)

पृथ्वी के भीतर पाँच प्रमुख असंबद्धताएँ पहचानी गई हैं, जो पर्पटी से लेकर क्रोड तक की परतों को विभाजित करती हैं।

सभी असंबद्धताओं का सारांश

असंबद्धता का नामकिन परतों को अलग करती हैअनुमानित गहराई (किमी)संबंधित परतसंबंधित PYQ/मुख्य तथ्य
कॉनराडऊपरी पर्पटी और निचली पर्पटी15 – 30पर्पटीमहाद्वीपीय पर्पटी में प्रमुख।
मोहरोविसिक (मोहो)पर्पटी और मैंटल35 (महाद्वीप) / 7 (महासागर)पर्पटी / मैंटल सीमाP-तरंगों के वेग में तीव्र वृद्धि।
रेपेट्टीऊपरी मैंटल और निचला मैंटल~ 660मैंटलमैंटल के भीतर का विभाजन।
गुटेनबर्गमैंटल और क्रोड2,900मैंटल / क्रोड सीमाS-तरंगें विलुप्त हो जाती हैं। [UPSC Mains]
लेहमनबाहरी क्रोड और आंतरिक क्रोड5,150क्रोडतरल से ठोस अवस्था में परिवर्तन का संकेत।


शैलों का वर्गीकरण (Classification of Rocks)

पृथ्वी की पर्पटी (Crust) विभिन्न प्रकार की चट्टानों से बनी है, जिन्हें शैल भी कहा जाता है। शैल प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एक या एक से अधिक खनिजों का एक ठोस समुच्चय (Aggregate) होती है। शैलों का कोई निश्चित रासायनिक संघटन नहीं होता है। उनका निर्माण, गुण और स्वरूप उनके बनने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर शैलों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks)

आग्नेय चट्टानें (लैटिन शब्द ‘Ignis’ अर्थात ‘अग्नि’) पृथ्वी पर पाई जाने वाली तीन प्रमुख चट्टान श्रेणियों में से एक हैं। इनका निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग में मौजूद गर्म, तरल एवं पिघले हुए पदार्थ, जिसे मैग्मा (Magma) कहा जाता है, के ठंडा होकर ठोस होने की प्रक्रिया से होता है।

💡 इन्हें ‘प्राथमिक चट्टानें’ (Primary Rocks) भी कहा जाता है, क्योंकि ये सीधे मैग्मा से बनती हैं और पृथ्वी की पर्पटी (Crust) पर बनने वाली ये पहली चट्टानें हैं। अन्य सभी प्रकार की चट्टानें (अवसादी और रूपांतरित) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं से बनती हैं। पृथ्वी की पर्पटी का लगभग 90% से अधिक भाग आग्नेय चट्टानों से बना है।

निर्माण प्रक्रिया

  1. मैग्मा का निर्माण: पृथ्वी के मैंटल में उच्च तापमान और दबाव के कारण चट्टानें पिघलकर मैग्मा का निर्माण करती हैं।
  2. मैग्मा का ऊपर उठना: यह पिघला हुआ मैग्मा आसपास की ठोस चट्टानों की तुलना में हल्का होता है, इसलिए यह पृथ्वी की सतह की ओर ऊपर उठता है।
  3. ठोस अवस्था में परिवर्तन (Crystallization): जब यह मैग्मा ऊपर उठते हुए या सतह पर पहुँचकर ठंडा होता है, तो इसके खनिज क्रिस्टल के रूप में जमने लगते हैं और एक ठोस चट्टान का निर्माण करते हैं।

आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण

आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण मुख्य रूप से दो आधारों पर किया जाता है: उत्पत्ति का स्थान (Location of Formation) और रासायनिक संरचना (Chemical Composition)

मैग्मा के ठंडा होने की जगह के आधार पर ये दो प्रकार की होती हैं:

सिलिका (SiO₂) की मात्रा के आधार पर आग्नेय चट्टानों को वर्गीकृत किया जाता है:

चट्टान का प्रकारसिलिका की मात्रा (%)विशेषताएँउदाहरण
अम्लीय (Acidic/Felsic)65% से अधिक हल्की, कम घनत्व والی हल्के रंग (गुलाबी, सफेद) कीग्रेनाइट (Granite), रायोलाइट (Rhyolite)
मध्यवर्ती (Intermediate)55% – 65% अम्लीय और क्षारीय के बीच के गुणएंडेसाइट (Andesite), डायोराइट (Diorite)
क्षारीय (Basic/Mafic)45% – 55% भारी, अधिक घनत्व والی गहरे रंग (काला, गहरा हरा) की, लोहा और मैग्नीशियम की अधिकताबेसाल्ट (Basalt), गैब्रो (Gabbro)
अल्ट्रा-क्षारीय (Ultra-Basic/Ultramafic)45% से कम सबसे भारी और सघन मैंटल की प्रमुख चट्टानेंपेरिडोटाइट (Peridotite)

आग्नेय चट्टानों की प्रमुख विशेषताएँ

[आरेख: एक ज्वालामुखी और पृथ्वी की सतह के नीचे का क्रॉस-सेक्शन। इसमें मैग्मा चैम्बर, सतह के नीचे जमे हुए ग्रेनाइट (अंतर्वेधी) और सतह पर बहते लावा से बनते बेसाल्ट (बहिर्वेधी) को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया हो।]

आग्नेय चट्टानों का रूपांतरण (Metamorphism of Igneous Rocks)

जब preexisting (पहले से मौजूद) आग्नेय चट्टानें पृथ्वी के भीतर अत्यधिक ताप (Heat), दाब (Pressure), या रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थों (Chemically Active Fluids) के प्रभाव में आती हैं, तो उनके मूल खनिज संघटन और संरचना (Texture) में ठोस अवस्था में ही परिवर्तन हो जाता है। इस प्रक्रिया को कायांतरण (Metamorphism) कहते हैं और इससे बनने वाली नई चट्टानों को रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) कहा जाता है।

रूपांतरण के दौरान चट्टान पिघलती नहीं है, बल्कि उसके खनिजों का पुन: क्रिस्टलीकरण (Recrystallization) हो जाता है, जिससे वे नए खनिजों या नई संरचना में व्यवस्थित हो जाते हैं।

रूपांतरण के प्रमुख कारक

  1. दाब (Pressure): जब चट्टानें गहराई में दब जाती हैं, तो ऊपर की चट्टानों का भार उन पर अत्यधिक दबाव डालता है। इससे खनिज सघन हो जाते हैं और एक निश्चित दिशा में संरेखित (align) हो जाते हैं, जिससे पत्रित (Foliated) चट्टानों का निर्माण होता है।
  2. ताप (Heat): पृथ्वी के आंतरिक भाग की ऊष्मा या मैग्मा के संपर्क में आने से चट्टानों के खनिज नए खनिजों में बदल जाते हैं।
  3. रासायनिक द्रव: गर्म पानी या अन्य तरल पदार्थ चट्टानों से गुजरते हुए कुछ खनिजों को घोल सकते हैं और नए खनिजों का निक्षेपण कर सकते हैं।

प्रमुख आग्नेय चट्टानों से बनने वाली रूपांतरित चट्टानें

आग्नेय चट्टानें रूपांतरण के बाद पत्रित (Foliated) या अपत्रित (Non-foliated) दोनों प्रकार की चट्टानें बना सकती हैं।

तालिका (Table) के रूप में वर्गीकरण

टेबल तथ्यों को याद रखने का सबसे प्रभावी तरीका होता है, खासकर जब तुलना करनी हो। यह प्रीलिम्स और मेन्स दोनों के लिए बहुत उपयोगी है।

आग्नेय चट्टानों का रूपांतरण: एक तुलनात्मक तालिका

मूल आग्नेय चट्टान (Parent Igneous Rock)प्रमुख रूपांतरण प्रक्रिया (Metamorphic Process)बनने वाली रूपांतरित चट्टान (Resulting Metamorphic Rock)मुख्य विशेषताएँ और तथ्य
ग्रेनाइट (Granite)उच्च क्षेत्रीय कायांतरण (High-Grade Regional Metamorphism) – उच्च ताप और दाबनाइस (Gneiss)पत्रित (Foliated) चट्टान।<br>⋆ इसमें हल्के और गहरे रंग के खनिजों की बैंडिंग (पट्टियाँ) स्पष्ट दिखती हैं।
बेसाल्ट (Basalt)क्षेत्रीय कायांतरण (Regional Metamorphism) – मध्यम से उच्च ताप और दाबशिस्ट (Schist) / एम्फीबोलाइट (Amphibolite)⋆ गहरे रंग की, सघन चट्टानें।<br>⋆ महासागरीय प्लेटों के क्षेपण (Subduction) क्षेत्रों में यह रूपांतरण आम है।
पेरिडोटाइट (Peridotite)जलयोजन (Hydration) – पानी के साथ रासायनिक क्रियासर्पेन्टीनाइट (Serpentinite)अपत्रित (Non-foliated) चट्टान।<br>⋆ अक्सर चिकनी और हरे रंग की होती है।
रायोलाइट (Rhyolite)निम्न से मध्यम कायांतरण (Low to Medium Metamorphism)शिस्ट (Schist)⋆ रायोलाइट, ग्रेनाइट का बहिर्वेधी (extrusive) रूप है। रूपांतरण से महीन दाने वाला शिस्ट बनता है।


2. अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks)

अवसादी चट्टानें (लैटिन शब्द ‘Sedimentum’ अर्थात ‘व्यवस्थित होना’ या ‘तली में बैठना’) पृथ्वी पर पाई जाने वाली तीन प्रमुख चट्टान श्रेणियों में से एक हैं। इनका निर्माण पूर्व-स्थित चट्टानों (आग्नेय, रूपांतरित या अन्य अवसादी) के अपक्षय (Weathering) और अपरदन (Erosion) से प्राप्त कणों, या जैविक पदार्थों, या रासायनिक प्रक्रियाओं से प्राप्त अवसादों (Sediments) के जमाव (Deposition) और संघनन (Compaction) से होता है।

💡 इन्हें ‘द्वितीयक चट्टानें’ (Secondary Rocks) या ‘परतदार चट्टानें’ (Stratified Rocks) भी कहा जाता है, क्योंकि इनका निर्माण पुरानी चट्टानों के टुकड़ों से होता है और ये अक्सर परतों के रूप में जमा होती हैं। पृथ्वी की सतह का लगभग 75% हिस्सा अवसादी चट्टानों से ढका है, हालांकि पर्पटी के कुल आयतन में इनका योगदान केवल 5-10% है।

निर्माण प्रक्रिया (शिलीभवन – Lithification)

अवसादों के ढीले ढेर का एक कठोर चट्टान में बदलना शिलीभवन (Lithification) कहलाता है। इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से दो चरण होते हैं:

  1. अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण (Weathering, Erosion, and Deposition):
    • पुरानी चट्टानें भौतिक (तापमान, पाला) और रासायनिक (वर्षा का जल) कारकों से छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती हैं।
    • नदी, हवा, ग्लेशियर जैसे अपरदन के कारक इन टुकड़ों (अवसादों) को बहाकर या उड़ाकर कहीं और, विशेषकर झीलों, घाटियों या समुद्रों की तली में, जमा कर देते हैं। यह जमाव अक्सर एक के ऊपर एक, परतों (Strata) के रूप में होता है।
  2. संघनन और सीमेंटीकरण (Compaction and Cementation):
    • नई परतें जमा होने पर नीचे की परतों पर दबाव बढ़ता है, जिससे उनके कण पास-पास आ जाते हैं और उनके बीच का पानी बाहर निकल जाता है। इस प्रक्रिया को संघनन (Compaction) कहते हैं।
    • इसके बाद, पानी में घुले हुए खनिज (जैसे सिलिका, कैल्साइट, या आयरन ऑक्साइड) इन कणों के बीच की खाली जगह में रिसकर उन्हें आपस में चिपका देते हैं, जैसे सीमेंट ईंटों को जोड़ता है। इस प्रक्रिया को सीमेंटीकरण (Cementation) कहते हैं।

अवसादी चट्टानों का वर्गीकरण

इन चट्टानों को उनके निर्माण में उपयोग हुए अवसादों के स्रोत और प्रकृति के आधार पर तीन मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:

अवसादी चट्टानों की प्रमुख विशेषताएँ

[आरेख: एक लैंडस्केप जिसमें एक नदी पहाड़ों (आग्नेय चट्टान) से अवसाद बहाकर ला रही है और उसे एक झील या समुद्र की तली में परतों के रूप में जमा कर रही है। नीचे की परतों को संघनित होकर अवसादी चट्टान (जैसे बलुआ पत्थर) बनते हुए दिखाया जाए।]

अवसादी चट्टानों का रूपांतरण (Metamorphism of Sedimentary Rocks)

जब preexisting (पहले से मौजूद) अवसादी चट्टानें पृथ्वी के भीतर अत्यधिक ताप (Heat), दाब (Pressure), या रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थों (Chemically Active Fluids) के प्रभाव में आती हैं, तो उनके मूल खनिज संघटन और संरचना (Texture) में ठोस अवस्था में ही परिवर्तन हो जाता है। इस प्रक्रिया को कायांतरण (Metamorphism) कहते हैं और इससे बनने वाली नई चट्टानों को रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) कहा जाता है।

अवसादी चट्टानों का रूपांतरण भूविज्ञान में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इनसे बनने वाली कई रूपांतरित चट्टानें (जैसे संगमरमर, क्वार्टजाइट, स्लेट) आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत मूल्यवान हैं। रूपांतरण की प्रक्रिया अवसादी चट्टानों के मूल गुणों, जैसे परतदार संरचना और जीवाश्मों, को पूरी तरह से नष्ट कर सकती है।

प्रमुख अवसादी चट्टानों से बनने वाली रूपांतरित चट्टानें

अवसादी चट्टानों के रूपांतरण की तालिका और फ्लोचार्ट

तुलनात्मक तालिका

मूल अवसादी चट्टानरूपांतरण की तीव्रताबनने वाली रूपांतरित चट्टानपत्रण (Foliation)
चूना पत्थरनिम्न से उच्चसंगमरमरअपत्रित (Non-foliated)
बलुआ पत्थरमध्यम से उच्चक्वार्टजाइटअपत्रित (Non-foliated)
शेलनिम्नस्लेटपत्रित (Foliated)
निम्न से मध्यमफिलाइटपत्रित (Foliated)
मध्यमशिस्टपत्रित (Foliated)
उच्चनाइसपत्रित (Foliated)
कांग्लोमरेटमध्यम से उच्चमेटा-कांग्लोमरेटपत्रित (Foliated)

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)

रूपांतरित चट्टानें (ग्रीक शब्द ‘Meta’ अर्थात ‘परिवर्तन’ और ‘Morph’ अर्थात ‘स्वरूप’) वे चट्टानें हैं जो पूर्व-स्थित (preexisting) चट्टानों के स्वरूप, संघटन और संरचना में परिवर्तन के परिणामस्वरूप बनती हैं। यह परिवर्तन तब होता है जब मूल चट्टान (Parent Rock) — जो आग्नेय, अवसादी या कोई अन्य रूपांतरित चट्टान हो सकती है — अत्यधिक ताप (Heat), दाब (Pressure), या रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थों के प्रभाव में आती है।

💡 यह कायांतरण (Metamorphism) की प्रक्रिया चट्टान के पिघले बिना ठोस अवस्था में ही होती है। यदि चट्टान पिघल जाती है, तो वह मैग्मा बन जाएगी और उससे बनने वाली चट्टान आग्नेय कहलाएगी। कायांतरण एक ‘पुन: क्रिस्टलीकरण’ (Recrystallization) की प्रक्रिया है।

रूपांतरण के कारक (Agents of Metamorphism)

कायांतरण की प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन कारकों द्वारा नियंत्रित होती है:

  1. ताप (Heat):
    • स्रोत: ताप का स्रोत या तो पृथ्वी के भीतर का मैग्मा हो सकता है या फिर भूतापीय प्रवणता (Geothermal Gradient) (गहराई के साथ तापमान में वृद्धि) हो सकता है।
    • प्रभाव: ऊष्मा खनिजों के बीच के रासायनिक बंधों को कमजोर करती है और उन्हें नए खनिजों के रूप में पुन: क्रिस्टलीकृत होने के लिए प्रेरित करती है जो उच्च तापमान पर स्थिर होते हैं।
  2. दाब (Pressure):
    • स्रोत: दाब दो प्रकार का होता है—
      1. समान दाब (Confining Pressure): गहराई में चारों दिशाओं से लगने वाला दाब। यह खनिजों को सघन बनाता है।
      2. निर्देशित दाब (Directed Pressure): प्लेटों के टकराने जैसे विवर्तनिक बलों (Tectonic Forces) से लगने वाला एक दिशात्मक दाब।
    • प्रभाव: निर्देशित दाब खनिजों को अपनी सबसे लंबी अक्ष के समानांतर समतल परतों में संरेखित (align) होने के लिए मजबूर करता है। इसी प्रक्रिया से पत्रण (Foliation) का विकास होता है।
  3. रासायनिक रूप से सक्रिय तरल पदार्थ (Chemically Active Fluids):
    • गर्म पानी या अन्य तरल पदार्थ चट्टानों की दरारों से गुजरते हुए खनिजों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, कुछ खनिजों को घोलते हैं और उनकी जगह नए खनिजों का निक्षेपण करते हैं, जिससे चट्टान का रासायनिक संघटन बदल जाता है।

कायांतरण के प्रकार (Types of Metamorphism)

रूपांतरित चट्टानों का वर्गीकरण (Classification)

रूपांतरित चट्टानों को उनकी संरचना (Texture), विशेषकर खनिजों के संरेखण (Alignment), के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है:

प्रमुख रूपांतरित चट्टानें और उनकी मूल चट्टानें

यह तालिका परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

रूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock)मूल चट्टान (Parent Rock)मूल चट्टान का प्रकारसंबंधित PYQ/मुख्य तथ्य
स्लेट (Slate)शेल (Shale)अवसादीसबसे निम्न-श्रेणी का रूपांतरण।
शिस्ट (Schist)शेल, बेसाल्टअवसादी/आग्नेयस्पष्ट पत्रण वाली चट्टान।
नाइस (Gneiss)ग्रेनाइट, शेलआग्नेय/अवसादीउच्च-श्रेणी कायांतरण; खनिजों की बैंडिंग।
संगमरमर (Marble)चूना पत्थर (Limestone)अवसादीअपत्रित चट्टान; मूर्तिकला और निर्माण में उपयोग।
क्वार्टजाइट (Quartzite)बलुआ पत्थर (Sandstone)अवसादीअपत्रित चट्टान; अत्यंत कठोर और टिकाऊ।
एम्फीबोलाइट (Amphibolite)बेसाल्ट, गैब्रोआग्नेयगहरे रंग की, उच्च-श्रेणी की चट्टान।
सर्पेन्टीनाइट (Serpentinite)पेरिडोटाइटआग्नेयमैंटल की चट्टानों के जलयोजन से बनती है।
हीरा (Diamond)कोयला (Coal)अवसादीकार्बन का उच्चतम ताप-दाब पर रूपांतरण।

शैल चक्र से संबंध: रूपांतरित चट्टानें शैल चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे अपक्षयित होकर अवसाद बना सकती हैं, या अत्यधिक ताप के कारण पिघलकर मैग्मा बन सकती हैं, जो बाद में आग्नेय चट्टानों का निर्माण करता है। यह पृथ्वी की गतिशील प्रकृति को दर्शाता है।


रूपांतरित चट्टानों का रूपांतरण (Metamorphism of Metamorphic Rocks)

हाँ, यह बिल्कुल संभव है कि एक रूपांतरित चट्टान का फिर से रूपांतरण हो जाए। जब कोई पहले से मौजूद रूपांतरित चट्टान (जैसे स्लेट, शिस्ट या नाइस) फिर से अत्यधिक ताप (Heat) और दाब (Pressure) की परिस्थितियों का सामना करती है, तो वह एक नई, उच्च-श्रेणी (Higher-Grade) की रूपांतरित चट्टान में बदल सकती है। इस प्रक्रिया को पुन: कायांतरण (Re-metamorphism) कहा जाता है।

💡 यह प्रक्रिया शैल चक्र (Rock Cycle) की चक्रीय और गतिशील प्रकृति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। चट्टानें स्थिर नहीं होतीं; वे अपने परिवेश के अनुसार लगातार बदलती रहती हैं। यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन क्षेत्रों में होती है जहाँ कई पर्वत-निर्माण घटनाएँ (Orogenic Events) घटित हुई हों।

पुन: रूपांतरण की प्रक्रिया कैसे होती है?

पुन: रूपांतरण तब होता है जब कायांतरण की परिस्थितियाँ पहले से अधिक तीव्र हो जाती हैं।

इस उदाहरण में, शिस्ट का निर्माण स्लेट (एक रूपांतरित चट्टान) के पुन: रूपांतरण से हुआ है। इसी तरह, नाइस का निर्माण शिस्ट (एक अन्य रूपांतरित चट्टान) के पुन: रूपांतरण से हो सकता है।

प्रमुख उदाहरण: एक रूपांतरित चट्टान से दूसरी रूपांतरित चट्टान का निर्माण

यह प्रक्रिया एक प्रगतिशील श्रृंखला (Progressive Series) के रूप में देखी जा सकती है, जहाँ प्रत्येक अगली चट्टान पिछली चट्टान से अधिक रूपांतरित होती है।

मूल चट्टान (Parent Rock)रूपांतरण की तीव्रताबनने वाली नई रूपांतरित चट्टानमुख्य परिवर्तन
स्लेट (Slate)मध्यम (Intermediate Grade)फिलाइट (Phyllite) / शिस्ट (Schist)क्रिस्टल का आकार बढ़ता है, सतह पर चमक (Sheen) या स्पष्ट पत्रण (Foliation) विकसित होता है।
शिस्ट (Schist)उच्च (High Grade)नाइस (Gneiss)खनिज अलग-अलग पट्टियों (Bands) में व्यवस्थित हो जाते हैं (नाइसी बैंडिंग)।
नाइस (Gneiss)अत्यंत उच्च (Very High Grade)मिग्मेटाइट (Migmatite)⋆ यह एक मिश्रित चट्टान है। अत्यधिक उच्च तापमान के कारण नाइस आंशिक रूप से पिघलने लगती है। इसमें रूपांतरित (ठोस) और आग्नेय (पिघला हुआ) दोनों भाग पाए जाते हैं।

कायांतरण की श्रेणी (Grade of Metamorphism)

कायांतरण की श्रेणी या ग्रेड का निर्धारण इस बात से होता है कि मूल चट्टान ने कितने तीव्र ताप और दाब का अनुभव किया है।

जैसे-जैसे कायांतरण की श्रेणी बढ़ती है, चट्टान के क्रिस्टल का आकार बड़ा होता जाता है और अक्सर पत्रण (Foliation) अधिक स्पष्ट हो जाता है।


प्रमुख रूपांतरित चट्टानें और उनकी मूल चट्टानें

मूल चट्टान (Parent Rock)चट्टान का प्रकाररूपांतरित चट्टान (Metamorphic Rock)संबंधित PYQ/तथ्य
ग्रेनाइट (Granite)आग्नेयनाइस (Gneiss)पत्रित (Foliated) चट्टान
बेसाल्ट (Basalt)आग्नेयएम्फीबोलाइट (Amphibolite) / शिस्ट (Schist)
चूना पत्थर (Limestone)अवसादीसंगमरमर (Marble)⋆ यह सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है। [SSC/State PSC Multiple Times]
बलुआ पत्थर (Sandstone)अवसादीक्वार्टजाइट (Quartzite)⋆ अत्यंत कठोर चट्टान। [UPPSC 2020]
शेल (Shale)अवसादीस्लेट (Slate)लिखने और छत बनाने में उपयोग।
कोयला (Coal)अवसादीग्रेफाइट (Graphite) / हीरा (Diamond)कार्बन का रूपांतरण।

शैल चक्र (The Rock Cycle)

शैल चक्र एक सतत प्रक्रिया है जिसके द्वारा पुरानी चट्टानें लगातार नई चट्टानों में परिवर्तित होती रहती हैं। यह दर्शाता है कि तीनों प्रकार की चट्टानें एक-दूसरे से संबंधित हैं और एक-दूसरे में बदल सकती हैं।

⋆ यह चक्र पृथ्वी को एक गतिशील ग्रह (Dynamic Planet) के रूप में स्थापित करता है। [UPSC Mains Conceptual Question]

[आरेख: शैल चक्र का एक विस्तृत और सुस्पष्ट चित्र, जिसमें तीनों चट्टानों के एक-दूसरे में परिवर्तन की प्रक्रिया (जैसे गलन, अपक्षय, कायांतरण) को तीरों (Arrows) के माध्यम से दर्शाया गया हो।]


शैलों का आर्थिक महत्व (Economic Importance of Rocks)

शैलें (चट्टानें) केवल भू-आकृतियों का निर्माण ही नहीं करतीं, बल्कि वे मानव सभ्यता के विकास और आर्थिक गतिविधियों का एक मूलभूत आधार हैं। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक, मानव ने अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चट्टानों और उनसे प्राप्त खनिजों का उपयोग किया है। शैलों का आर्थिक महत्व उनके प्रकार (आग्नेय, अवसादी, रूपांतरित) और उनमें पाए जाने वाले खनिजों पर निर्भर करता है।

1. आग्नेय चट्टानों का आर्थिक महत्व (Economic Importance of Igneous Rocks)

आग्नेय चट्टानें मैग्मा के ठंडा होने से बनती हैं और इनमें बहुमूल्य धात्विक खनिजों के भंडार पाए जाते हैं।

2. अवसादी चट्टानों का आर्थिक महत्व (Economic Importance of Sedimentary Rocks)

अवसादी चट्टानों का आर्थिक महत्व मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन, अधात्विक खनिजों और निर्माण सामग्री से जुड़ा है।

3. रूपांतरित चट्टानों का आर्थिक महत्व (Economic Importance of Metamorphic Rocks)

रूपांतरित चट्टानें अपनी कठोरता, क्रिस्टलीय संरचना और आकर्षक स्वरूप के कारण निर्माण और सजावटी कार्यों में अत्यधिक मूल्यवान हैं।

शैलों के आर्थिक महत्व का सारांश

शैल का प्रकारप्रमुख आर्थिक उत्पादउदाहरण
आग्नेय (Igneous) धात्विक खनिज (अयस्क)<br> निर्माण पत्थर<br> रत्नसोना, लोहा, तांबा<br>ग्रेनाइट<br>हीरा (किम्बरलाइट में)
अवसादी (Sedimentary) जीवाश्म ईंधन<br> सीमेंट का कच्चा माल<br> औद्योगिक खनिजकोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस<br>चूना पत्थर<br>सेंधा नमक, जिप्सम
रूपांतरित (Metamorphic) सजावटी पत्थर<br> औद्योगिक खनिज<br> रत्नसंगमरमर, स्लेट, क्वार्टजाइट<br>ग्रेफाइट, अभ्रक<br>माणिक, नीलम

शैलों के अन्य महत्वपूर्ण पहलू (Other Important Aspects of Rocks)

आर्थिक लाभ के अतिरिक्त, शैलें पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र, मानव इतिहास और वैज्ञानिक समझ के लिए एक मौलिक आधार प्रदान करती हैं।

1. मृदा निर्माण और कृषि का आधार (Basis of Soil Formation and Agriculture)

2. भू-आकृतियों का निर्माण (Formation of Landforms)

चट्टानों की कठोरता, संरचना और अपरदन के प्रति उनकी प्रतिरोधक क्षमता विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियों (Landforms) को जन्म देती है।

3. भूवैज्ञानिक इतिहास का अभिलेख (Record of Geological History)

चट्टानें पृथ्वी के अतीत को समझने के लिए एक “किताब” की तरह हैं। भूवैज्ञानिक इनका अध्ययन करके अरबों वर्षों के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।

4. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व (Cultural and Historical Significance)

मानव ने हमेशा अपने आश्रय, औजारों, कला और वास्तुकला के लिए चट्टानों का उपयोग किया है।

शैलों के अन्य महत्व का सारांश

क्षेत्रमहत्वउदाहरण
पारिस्थितिकी (Ecology)मिट्टी का निर्माण, पौधों के लिए पोषक तत्वों का स्रोत।बेसाल्ट से काली मिट्टी, जलोढ़ निक्षेपों से उपजाऊ मैदान।
भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology)विविध स्थलाकृतियों (पठार, घाटियाँ, गुफाएँ) का निर्माण।ग्रैंड कैन्यन, कार्स्ट गुफाएँ।
वैज्ञानिक ज्ञान (Scientific Knowledge)पृथ्वी के इतिहास, जीवन के विकास और जलवायु परिवर्तन का रिकॉर्ड।चट्टानों की परतें, जीवाश्म, रेडियोमेट्रिक डेटिंग।
मानव इतिहास और संस्कृतिआश्रय, औजार, कला, वास्तुकला और आध्यात्मिक प्रतीक।पाषाण युग के औजार, भीमबेटका गुफाएँ, ताजमहल, पिरामिड।

1. चट्टानों की संरचनाएँ और बनावट (Textures and Structures of Rocks)

परीक्षा में सीधे तौर पर बनावट (Texture) से जुड़े प्रश्न पूछे जा सकते हैं, क्योंकि यह चट्टान के निर्माण की परिस्थितियों को दर्शाता है।

2. भारतीय संदर्भ में शैलों का वर्गीकरण (Indian Context)

यह सेक्शन भूगोल और इतिहास दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की भूवैज्ञानिक संरचना और प्रमुख शैल समूहों से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।

3. चट्टानों के बीच मुख्य अंतर (Key Differences)

एक तुलनात्मक तालिका आपके रिवीजन के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है और सीधे प्रश्न बनाने में मदद कर सकती है।

आधारआग्नेय चट्टानअवसादी चट्टानरूपांतरित चट्टान
निर्माणमैग्मा/लावा के ठंडा होने सेअवसादों के जमाव और संघनन सेताप और दाब से स्वरूप परिवर्तन
परतें (Layers)नहीं पाई जातींहाँ, परतदार होती हैंहाँ (पत्रित) / नहीं (अपत्रित)
जीवाश्म (Fossils)अनुपस्थितहाँ, पाए जाते हैंआमतौर पर नष्ट हो जाते हैं
रवे (Crystals)हाँ, रवेदार होती हैंआमतौर पर नहीं (टुकड़ों से बनी)हाँ, पुन: क्रिस्टलीकृत
कठोरताअत्यधिक कठोरअपेक्षाकृत नरम और भंगुरआमतौर पर कठोर और सघन
उदाहरणग्रेनाइट, बेसाल्टबलुआ पत्थर, चूना पत्थर, शेलसंगमरमर, क्वार्टजाइट, स्लेट, नाइस

प्रश्न का प्रकार: “निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:”

  1. आग्नेय चट्टानों में जीवाश्म पाए जाते हैं।
  2. अवसादी चट्टानें हमेशा परतदार होती हैं।
    (सही उत्तर: केवल 2)

4. अवधारणात्मक स्पष्टता के लिए कुछ और शब्द (More Conceptual Terms)