राजभाषा (Official Language)
परिभाषा:
‘राजभाषा’ का अर्थ है “राज-काज की भाषा” (Language of administration)। यह वह भाषा है जिसका प्रयोग किसी देश के सरकारी कामकाज, प्रशासन, संसद, विधानमंडलों और न्यायालयों में किया जाता है।
नोट: ‘राजभाषा’ और ‘राष्ट्रभाषा’ (National Language) में अंतर है। ‘राष्ट्रभाषा’ किसी देश के अधिकांश लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा होती है और उसकी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी होती है। भारत के संविधान में किसी भी भाषा को ‘राष्ट्रभाषा’ का दर्जा नहीं दिया गया है। हिन्दी भारत की राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं।
संवैधानिक प्रावधान:
- संविधान के भाग-17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा से संबंधित विस्तृत प्रावधान किए गए हैं।
- इसके अतिरिक्त, संविधान की आठवीं अनुसूची (Eighth Schedule) में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है।
संवैधानिक प्रावधानों का वर्गीकरण
राजभाषा से संबंधित प्रावधानों को चार मुख्य शीर्षकों में बांटा जा सकता है:
- संघ की भाषा (Language of the Union)
- क्षेत्रीय भाषाएँ (Regional Languages)
- न्यायपालिका और विधि के ग्रंथ की भाषा (Language of the Judiciary and Texts of Laws)
- विशेष निदेश (Special Directives)
1. संघ की भाषा (Language of the Union) – अनुच्छेद 343, 344
- अनुच्छेद 343(1):
- “संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।”
- अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप (1, 2, 3…) होगा।
- अंग्रेजी का प्रयोग:
- संविधान लागू होने के 15 वर्षों (अर्थात् 1965 तक) के लिए संघ के सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग जारी रखने का भी प्रावधान किया गया।
- राजभाषा अधिनियम, 1963 (Official Languages Act, 1963):
- इस अधिनियम ने 1965 के बाद भी हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को संघ के सभी शासकीय प्रयोजनों और संसद की कार्यवाही के लिए अनिश्चित काल के लिए जारी रखने की अनुमति दी।
- अनुच्छेद 344: राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति।
- यह राष्ट्रपति को संविधान के प्रारंभ से 5 वर्ष की समाप्ति पर और तत्पश्चात् 10 वर्ष की समाप्ति पर एक राजभाषा आयोग का गठन करने का अधिकार देता है।
- प्रथम राजभाषा आयोग का गठन 1955 में बी. जी. खेर की अध्यक्षता में किया गया था।
2. क्षेत्रीय भाषाएँ (Regional Languages) – अनुच्छेद 345-347
- अनुच्छेद 345: राज्य के विधानमंडल को उस राज्य में प्रयोग होने वाली एक या अधिक भाषाओं या हिन्दी को अपने शासकीय प्रयोजनों के लिए अपनाने का अधिकार है।
- जब तक राज्य ऐसा नहीं करता, तब तक उस राज्य में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा।
- अनुच्छेद 346: संघ और राज्यों के बीच तथा विभिन्न राज्यों के बीच संचार की भाषा वही होगी जो उस समय संघ की राजभाषा है (अर्थात्, हिन्दी या अंग्रेजी)।
3. न्यायपालिका और विधि के ग्रंथ की भाषा (Language of the Judiciary and Texts of Laws) – अनुच्छेद 348
- अनुच्छेद 348(1): यह प्रावधान करता है कि जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तब तक:
- उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) और प्रत्येक उच्च न्यायालय (High Court) की सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में होंगी।
- संसद और राज्य विधानमंडलों के सभी विधेयकों, अधिनियमों, और अन्य विधि के ग्रंथों के प्राधिकृत पाठ (Authoritative texts) अंग्रेजी में होंगे।
- अनुच्छेद 348(2): किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस राज्य के उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिन्दी या राज्य की किसी अन्य राजभाषा के प्रयोग को प्राधिकृत कर सकता है, लेकिन न्यायालय के निर्णयों और आदेशों के लिए नहीं।
4. विशेष निदेश (Special Directives)
- अनुच्छेद 350-A:
- प्रत्येक राज्य और स्थानीय प्राधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर उनकी मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करे।
- अनुच्छेद 351: हिन्दी भाषा के विकास के लिए निदेश।
- यह संघ का यह कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति (composite culture) के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके, और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो, वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्य रूप से संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।
आठवीं अनुसूची (Eighth Schedule)
- यह अनुसूची संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं की सूची प्रदान करती है।
- मूल रूप से इसमें 14 भाषाएँ थीं।
- बाद में जोड़ी गई भाषाएँ:
- सिंधी: (21वाँ संशोधन, 1967)
- कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली: (71वाँ संशोधन, 1992)
- बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली: (92वाँ संशोधन, 2003)
महत्व:
आठवीं अनुसूची में शामिल होने से किसी भाषा को सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन मिलता है। राजभाषा आयोग का गठन करते समय इन भाषाओं के प्रतिनिधियों को भी शामिल करना होता है।
निष्कर्ष:
भारतीय संविधान ने भाषा के संवेदनशील मुद्दे पर एक बहुत ही संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। इसने हिन्दी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं के विकास और प्रयोग को भी प्रोत्साहित किया। राजभाषा अधिनियम के माध्यम से अंग्रेजी के निरंतर प्रयोग की अनुमति देकर, इसने गैर-हिन्दी भाषी राज्यों की चिंताओं को भी दूर किया, जिससे भारत की भाषाई एकता और विविधता दोनों बनी रहीं।
संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित 22 भाषाएँ
| क्र.सं. | भाषा | टिप्पणी (संशोधन द्वारा शामिल, यदि कोई हो) |
| 1. | असमिया | |
| 2. | बांग्ला | |
| 3. | गुजराती | |
| 4. | हिन्दी | |
| 5. | कन्नड़ | |
| 6. | कश्मीरी | |
| 7. | मलयालम | |
| 8. | मराठी | |
| 9. | ओड़िया | |
| 10. | पंजाबी | |
| 11. | संस्कृत | |
| 12. | तमिल | |
| 13. | तेलुगु | |
| 14. | उर्दू | |
| 15. | सिंधी | 21वाँ संविधान संशोधन (1967) द्वारा जोड़ा गया |
| 16. | कोंकणी | 71वाँ संविधान संशोधन (1992) द्वारा जोड़ा गया |
| 17. | मणिपुरी (मैतेई) | 71वाँ संविधान संशोधन (1992) द्वारा जोड़ा गया |
| 18. | नेपाली | 71वाँ संविधान संशोधन (1992) द्वारा जोड़ा गया |
| 19. | बोडो | 92वाँ संविधान संशोधन (2003) द्वारा जोड़ा गया |
| 20. | डोगरी | 92वाँ संविधान संशोधन (2003) द्वारा जोड़ा गया |
| 21. | मैथिली | 92वाँ संविधान संशोधन (2003) द्वारा जोड़ा गया |
| 22. | संथाली | 92वाँ संविधान संशोधन (2003) द्वारा जोड़ा गया |
नोट:
- सूची में क्रम संख्या 1 से 14 तक की भाषाएँ मूल संविधान का हिस्सा थीं।
- अंग्रेजी भाषा आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है।
लोक सेवाएँ (Public Services in India)
परिभाषा:
लोक सेवाएँ उन स्थायी, पेशेवर, वैतनिक और कुशल अधिकारियों का समूह है जो सरकार की नीतियों को बनाने और उन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने तथा देश का दिन-प्रतिदिन का प्रशासन चलाने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
ये कार्यपालिका का स्थायी (Permanent) अंग हैं, जो राजनीतिक कार्यपालिका (यानी मंत्रीगण) के बदलने पर भी बने रहते हैं और शासन में निरंतरता सुनिश्चित करते हैं।
‘भारत के लौह पुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल ने लोक सेवाओं को “भारत का स्टील फ्रेम” (Steel frame of India) कहा था।
संवैधानिक प्रावधान:
- संविधान के भाग-14 में अनुच्छेद 308 से 323 तक “संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ” का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसमें भर्ती, सेवा शर्तें और लोक सेवकों को प्राप्त संरक्षण शामिल हैं।
लोक सेवाओं का वर्गीकरण (Classification of Public Services)
भारत में लोक सेवाओं को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
- अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services – AIS)
- केंद्रीय सेवाएँ (Central Services)
- राज्य सेवाएँ (State Services)
1. अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services – AIS)
परिभाषा:
ये वे सेवाएँ हैं जो केंद्र और राज्य सरकारों दोनों के लिए साझा हैं। इन सेवाओं के सदस्य केंद्र सरकार द्वारा भर्ती किए जाते हैं, उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है और विभिन्न राज्यों के कैडर (cadres) में आवंटित किया जाता है। वे केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों के अधीन सेवा करते हैं।
इन पर अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार (कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय) का होता है, जबकि तत्काल नियंत्रण राज्य सरकार का होता है। यह संघीय प्रणाली में एकता और एकरूपता सुनिश्चित करने का एक अनूठा तंत्र है।
वर्तमान में तीन अखिल भारतीय सेवाएँ हैं:
- भारतीय प्रशासनिक सेवा (Indian Administrative Service – IAS)
- भारतीय पुलिस सेवा (Indian Police Service – IPS)
- भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service – IFS)
- (IFS को 1966 में तीसरी अखिल भारतीय सेवा के रूप में बनाया गया था।)
अनुच्छेद 312: नई अखिल भारतीय सेवा का सृजन
- संविधान का अनुच्छेद 312 राज्यसभा को एक विशेष शक्ति प्रदान करता है।
- यदि राज्यसभा, अपने विशेष बहुमत (उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई) से यह प्रस्ताव पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में एक नई अखिल भारतीय सेवा का सृजन आवश्यक है, तो संसद कानून बनाकर ऐसी सेवा का गठन कर सकती है।
2. केंद्रीय सेवाएँ (Central Services)
परिभाषा:
ये वे सेवाएँ हैं जो पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। इन सेवाओं के सदस्य केवल केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में ही कार्य करते हैं।
प्रमुख उदाहरण:
- भारतीय विदेश सेवा (Indian Foreign Service – IFS)
- भारतीय राजस्व सेवा (Indian Revenue Service – IRS)
- भारतीय रेलवे सेवा (Indian Railway Services)
- भारतीय डाक सेवा (Indian Postal Service)
वर्गीकरण: केंद्रीय सेवाओं को समूह ‘क’, ‘ख’, ‘ग’, और ‘घ’ (Group A, B, C, D) में वर्गीकृत किया जाता है।
3. राज्य सेवाएँ (State Services)
परिभाषा:
ये वे सेवाएँ हैं जो पूरी तरह से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। इन सेवाओं के सदस्य संबंधित राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में कार्य करते हैं और उनके प्रशासन के लिए जिम्मेदार होते हैं।
भर्ती:
- इनकी भर्ती संबंधित राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commission – SPSC) द्वारा की जाती है।
- नियुक्ति: इनकी नियुक्ति और इन पर नियंत्रण राज्य सरकार का होता है।
प्रमुख उदाहरण:
- राज्य सिविल सेवा (जैसे – Deputy Collector/SDM)
- राज्य पुलिस सेवा (जैसे – Deputy Superintendent of Police – DSP)
- राज्य बिक्री कर अधिकारी
- तहसीलदार
सिविल सेवकों को संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Protection to Civil Servants)
संविधान यह सुनिश्चित करता है कि सिविल सेवक बिना किसी राजनीतिक दबाव या भय के निष्पक्ष रूप से कार्य कर सकें। इसके लिए अनुच्छेद 311 उन्हें कुछ महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय प्रदान करता है:
- अनुच्छेद 311(1):
- अखिल भारतीय सेवा या किसी राज्य की सिविल सेवा के किसी भी सदस्य को उसी प्राधिकारी द्वारा पद से नहीं हटाया या पदावनत नहीं किया जाएगा जो उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी के अधीनस्थ हो।
- (अर्थात्, यदि नियुक्ति राष्ट्रपति ने की है, तो कोई अधीनस्थ अधिकारी उसे नहीं हटा सकता)।
- अनुच्छेद 311(2):
- किसी भी सिविल सेवक को पद से हटाने, पदावनत करने या रैंक में कमी करने से पहले निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है:
- उसके विरुद्ध लगे आरोपों के बारे में उसे सूचित किया जाएगा।
- उसे उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का एक उचित अवसर (Reasonable opportunity of being heard) दिया जाएगा।
- किसी भी सिविल सेवक को पद से हटाने, पदावनत करने या रैंक में कमी करने से पहले निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है:
निष्कर्ष:
भारत की लोक सेवा प्रणाली देश की एकता, अखंडता और प्रशासन की निरंतरता को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये सेवाएँ “स्थायी कार्यपालिका” के रूप में, राजनीतिक अस्थिरता के समय में भी सरकार के कामकाज को सुचारु रूप से जारी रखती हैं और जनता तक सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों को पहुँचाने का मुख्य माध्यम हैं।
राजनीतिक दल (Political Parties)
परिभाषा:
राजनीतिक दल, समान विचारधारा और उद्देश्यों वाले लोगों का एक स्वैच्छिक और संगठित समूह होता है, जिसका मुख्य लक्ष्य चुनाव लड़कर और जीतकर सरकार बनाना तथा अपनी नीतियों को लागू करना होता है।
ये दल जनता और सरकार के बीच एक पुल (bridge) का काम करते हैं। वे जनता की मांगों और आकांक्षाओं को सरकार तक पहुँचाते हैं और सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को जनता तक ले जाते हैं।
एक राजनीतिक दल के घटक (Components of a Political Party)
किसी भी राजनीतिक दल के तीन मुख्य घटक होते हैं:
- नेता (The Leader): शीर्ष नेतृत्व जो पार्टी को दिशा देता है और प्रमुख निर्णय लेता है।
- सक्रिय सदस्य (The Active Members): वे समर्पित कार्यकर्ता जो पार्टी की नीतियों का प्रचार-प्रसार करते हैं, चुनाव अभियानों में भाग लेते हैं और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करते हैं।
- अनुयायी/समर्थक (The Followers/Supporters): आम जनता जो पार्टी की विचारधारा में विश्वास रखती है और चुनाव के समय उसे अपना मत (vote) देती है।
राजनीतिक दलों के कार्य (Functions of Political Parties)
राजनीतिक दल एक लोकतंत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं:
- चुनाव लड़ना:
- दलों का सबसे प्रमुख कार्य चुनावों में अपने उम्मीदवार खड़े करना और उन्हें जिताने का प्रयास करना है।
- नीति बनाना और प्रस्तुत करना:
- दल देश की विभिन्न समस्याओं पर अपनी नीतियां और कार्यक्रम बनाते हैं और उन्हें चुनाव घोषणापत्र (manifesto) के माध्यम से जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं, ताकि मतदाता एक सूचित विकल्प चुन सकें।
- सरकार बनाना और चलाना:
- चुनाव में बहुमत प्राप्त करने वाला दल सरकार का गठन करता है और अपनी घोषित नीतियों को लागू करने का प्रयास करता है।
- विपक्ष की भूमिका निभाना (Role of the Opposition):
- जो दल चुनाव हार जाते हैं, वे विपक्ष की भूमिका निभाते हैं। विपक्ष, सरकार की नीतियों और कार्यों की रचनात्मक आलोचना करता है, उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करता है और सरकार को निरंकुश होने से रोकता है।
- जनमत का निर्माण करना (Shaping Public Opinion):
- दल विभिन्न मुद्दों को उठाते हैं, उन पर बहस करते हैं और रैलियों, भाषणों और मीडिया के माध्यम से जनता को शिक्षित और जागरूक करते हैं, जिससे जनमत का निर्माण होता है।
- कानून निर्माण में भूमिका:
- दल कानून निर्माण प्रक्रिया में एक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। विधेयक अक्सर पार्टी लाइन के आधार पर ही पारित या अस्वीकार किए जाते हैं।
भारत में दलों को मान्यता (Recognition of Parties in India)
भारत में राजनीतिक दलों को मान्यता देने और उन्हें चुनाव चिह्न आवंटित करने का कार्य भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) करता है। ECI, प्रदर्शन के आधार पर दलों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत करता है:
- राष्ट्रीय दल (National Party)
- राज्यीय/क्षेत्रीय दल (State/Regional Party)
- पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल (Registered Unrecognised Party)
राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता की शर्तें (Conditions for Recognition as a National Party):
किसी दल को ‘राष्ट्रीय दल’ का दर्जा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित में से कोई एक शर्त पूरी करनी होती है:
- वह दल लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कम से कम चार राज्यों में कुल वैध मतों का 6% प्राप्त करे तथा किसी एक राज्य या राज्यों से लोकसभा में कम से कम 4 सीटें जीते।
या - वह दल लोकसभा की कुल सीटों में से कम से कम 2% सीटें (यानी 11 सीटें) जीते, और ये सीटें कम से कम तीन अलग-अलग राज्यों से जीती गई हों।
या - वह दल कम से कम चार राज्यों में ‘राज्यीय दल’ के रूप में मान्यता प्राप्त हो।
राज्यीय दल के रूप में मान्यता की शर्तें (Conditions for Recognition as a State Party):
किसी दल को ‘राज्यीय दल’ का दर्जा प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित में से कोई एक शर्त पूरी करनी होती है:
- वह दल राज्य की विधानसभा के आम चुनाव में राज्य में पड़े कुल वैध मतों का 6% प्राप्त करे तथा उसी राज्य की विधानसभा में कम से कम 2 सीटें जीते।
या - वह दल लोकसभा के आम चुनाव में राज्य में पड़े कुल वैध मतों का 6% प्राप्त करे तथा उसी राज्य से लोकसभा में कम से कम 1 सीट जीते।
या - वह दल राज्य की विधानसभा की कुल सीटों में से कम से कम 3% सीटें जीते, या 3 सीटें जीते (इनमें से जो भी अधिक हो)।
या - वह दल लोकसभा के आम चुनाव में राज्य से प्रत्येक 25 सीटों के लिए 1 सीट जीते।
या - वह दल राज्य में हुए लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का 8% प्राप्त करे (भले ही उसने कोई सीट न जीती हो)।
भारत में दलीय प्रणाली (Party System in India)
भारत में एक बहु-दलीय प्रणाली (Multi-party System) है, जहाँ कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल एक साथ मौजूद हैं और सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
- राष्ट्रीय दल: ये वे दल हैं जिनका प्रभाव और संगठन पूरे देश में या कई राज्यों में होता है (जैसे – भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, आम आदमी पार्टी)।
- क्षेत्रीय दल: ये वे दल हैं जिनका प्रभाव और आधार मुख्य रूप से एक विशेष राज्य या क्षेत्र तक ही सीमित होता है (जैसे – समाजवादी पार्टी (उत्तर प्रदेश), DMK (तमिलनाडु), तृणमूल कांग्रेस (पश्चिम बंगाल), शिवसेना (महाराष्ट्र))।
गठबंधन सरकारें (Coalition Governments):
बहु-दलीय प्रणाली के कारण, अक्सर केंद्र और राज्यों में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाता है। ऐसी स्थिति में, कई दल मिलकर सरकार बनाते हैं, जिसे गठबंधन सरकार कहा जाता है (जैसे – राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन – NDA, भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी गठबंधन – I.N.D.I.A.)।
निष्कर्ष:
राजनीतिक दल लोकतंत्र की धुरी हैं, जो नागरिकों को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने, अपनी पसंद की सरकार चुनने और शासन में अपनी आवाज उठाने का एक मंच प्रदान करते हैं। वे प्रतिस्पर्धा, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही के माध्यम से लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखते हैं।
भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका
परिभाषा:
क्षेत्रीय दल वे राजनीतिक दल होते हैं जिनका प्रभाव, संगठन और समर्थन मुख्य रूप से एक विशेष राज्य या भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित होता है। वे आम तौर पर उस क्षेत्र की विशिष्ट भाषाई, सांस्कृतिक, जातीय या आर्थिक हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। (जैसे – DMK तमिलनाडु में तमिल पहचान का, शिरोमणि अकाली दल पंजाब में सिख हितों का)।
आजादी के बाद शुरुआती कुछ दशकों तक भारतीय राजनीति पर राष्ट्रीय दलों (मुख्य रूप से कांग्रेस) का वर्चस्व था, लेकिन 1967 के बाद और विशेष रूप से 1990 के दशक के बाद से, क्षेत्रीय दलों का उदय भारतीय राजनीति की एक प्रमुख विशेषता बन गया है।
क्षेत्रीय दलों के उदय के कारण (Reasons for the Rise of Regional Parties)
- भाषाई और सांस्कृतिक विविधता: भारत की विशाल भाषाई और सांस्कृतिक विविधता ने क्षेत्रीय पहचान और आकांक्षाओं को जन्म दिया, जिन्हें अक्सर राष्ट्रीय दलों द्वारा पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया।
- क्षेत्रीय असंतुलन और असमान विकास: कुछ क्षेत्रों का मानना था कि राष्ट्रीय सरकारें उनके विकास की उपेक्षा कर रही हैं, जिससे क्षेत्रीय असंतोष बढ़ा।
- राष्ट्रीय दलों का पतन: विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी के अखिल भारतीय प्रभाव में कमी आने से जो राजनीतिक शून्य पैदा हुआ, उसे क्षेत्रीय दलों ने भरा।
- जाति और समुदाय आधारित राजनीति: कई क्षेत्रीय दल विशिष्ट जातियों या समुदायों (जैसे- उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी) के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए उभरे।
- ** करिश्माई क्षेत्रीय नेतृत्व:** एम. जी. रामचंद्रन (AIADMK), एन. टी. रामाराव (TDP), लालू प्रसाद यादव (RJD), मुलायम सिंह यादव (SP) जैसे मजबूत और करिश्माई क्षेत्रीय नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में शक्तिशाली जनाधार बनाया।
क्षेत्रीय दलों की सकारात्मक भूमिका (Positive Role of Regional Parties)
- संघवाद को मजबूत करना (Strengthening Federalism):
- क्षेत्रीय दलों ने भारतीय संघवाद को अधिक जीवंत और व्यावहारिक बनाया है। वे राज्यों के अधिकारों और स्वायत्तता की पुरजोर वकालत करते हैं और केंद्र सरकार को अपनी शक्तियों का मनमाने ढंग से प्रयोग करने से रोकते हैं।
- केंद्र में सत्ता का विकेंद्रीकरण:
- गठबंधन सरकारों के युग में (1989-2014), क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्माण को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। केंद्र की सरकारें उनकी मांगों और हितों को नजरअंदाज नहीं कर सकती थीं।
- क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व:
- वे क्षेत्रीय मुद्दों और मांगों (जैसे- विशेष राज्य का दर्जा, वित्तीय पैकेज) को राष्ट्रीय मंच पर उठाते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि राष्ट्रीय नीतियों में क्षेत्रीय हितों को भी शामिल किया जाए।
- लोकतंत्र में व्यापक भागीदारी:
- क्षेत्रीय दलों ने उन समूहों और समुदायों को एक राजनीतिक आवाज दी है जो पहले हाशिये पर थे। उन्होंने राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी को बढ़ाया है।
- केंद्र सरकार पर एक नियंत्रण (Check on Central Government):
- ये दल केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध करके एक शक्तिशाली विपक्ष की भूमिका निभाते हैं, जिससे सरकार की जवाबदेही बढ़ती है।
क्षेत्रीय दलों की नकारात्मक भूमिका (Negative Role of Regional Parties)
- राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा:
- गठबंधन सरकारों में क्षेत्रीय दल अक्सर अपने संकीर्ण हितों के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाते हैं। समर्थन वापस लेने की धमकी देकर वे राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकते हैं, जैसा कि 1990 के दशक में कई बार हुआ।
- क्षेत्रवाद और संकीर्णता को बढ़ावा:
- कभी-कभी, ये दल राष्ट्रीय हित के ऊपर संकीर्ण क्षेत्रीय, भाषाई या जातिगत हितों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे अलगाववाद और क्षेत्रवाद की भावना को बल मिलता है।
- भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद:
- कई क्षेत्रीय दल एक विशेष परिवार या व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित होते हैं, जिससे पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र का अभाव होता है और भाई-भतीजावाद (nepotism) तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
- मोल-भाव की राजनीति (Bargaining Politics):
- केंद्र में सरकार बनाने के लिए समर्थन देने के बदले में, ये दल अक्सर प्रमुख मंत्रालयों या राज्य के लिए विशेष पैकेजों की मांग करते हैं, जो हमेशा राष्ट्रीय हित में नहीं होता।
- राष्ट्रीय मुद्दों पर उदासीनता:
- उनका ध्यान मुख्यतः अपने क्षेत्र की समस्याओं पर केंद्रित होता है, और वे विदेश नीति या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे व्यापक राष्ट्रीय मुद्दों पर अक्सर कम ध्यान देते हैं।
निष्कर्ष:
क्षेत्रीय दल भारतीय राजनीति की एक दोधारी तलवार की तरह हैं। एक ओर, उन्होंने भारतीय संघवाद को मजबूत किया है, लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाया है और केंद्र की निरंकुशता पर अंकुश लगाया है। वहीं दूसरी ओर, उन्होंने राजनीतिक अस्थिरता, संकीर्ण क्षेत्रवाद और मोल-भाव की राजनीति को भी जन्म दिया है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य (2014 के बाद) में राष्ट्रीय स्तर पर एक दल (BJP) के मजबूत होने के कारण केंद्र में उनकी भूमिका कुछ कम हुई है, लेकिन राज्य स्तर पर वे आज भी अत्यंत शक्तिशाली और प्रासंगिक बने हुए हैं। कुल मिलाकर, क्षेत्रीय दल भारतीय लोकतंत्र की एक जीवंत और स्थायी वास्तविकता हैं, जिन्हें न तो नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही समाप्त किया जा सकता है।
चुनाव (Elections in India)
परिभाषा:
चुनाव वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चयन करते हैं, जो सरकार का गठन करते हैं और देश के लिए कानून बनाते हैं। भारत में, यह “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” (One Person, One Vote, One Value) के सिद्धांत पर आधारित सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) द्वारा संपन्न होता है।
चुनावों का संचालन:
- भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI): एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है जो भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद (लोकसभा, राज्यसभा) और राज्य विधानमंडलों के चुनावों का संचालन करता है।
- राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commissions): ये प्रत्येक राज्य में पंचायतों और नगरपालिकाओं जैसे स्थानीय निकायों के चुनाव कराते हैं।
भारतीय चुनावी प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार:
- 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक नागरिक, बिना किसी भेदभाव (जाति, धर्म, लिंग आदि) के, मतदान करने का अधिकार रखता है। (61वें संशोधन, 1989 द्वारा मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 की गई)।
- फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) प्रणाली:
- लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों के लिए यह प्रणाली अपनाई गई है।
- इसमें, किसी निर्वाचन क्षेत्र में जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है, भले ही उसे कुल मतों का बहुमत (50% से अधिक) न मिला हो।
- आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र (Reserved Constituencies):
- समाज के कमजोर वर्गों, यानी अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की गई हैं, ताकि उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
- स्वतंत्र निर्वाचन आयोग:
- चुनावों की निष्पक्षता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संविधान ने एक शक्तिशाली और स्वतंत्र निर्वाचन आयोग की स्थापना की है।
भारतीय चुनाव प्रणाली में चुनौतियाँ (Challenges in the Indian Electoral System)
समय के साथ भारतीय चुनाव प्रणाली में कई गंभीर चुनौतियाँ उभरी हैं, जिनके कारण सुधारों की आवश्यकता महसूस की गई:
- धन-बल का बढ़ता प्रभाव (Muscle and Money Power):
- चुनाव बहुत खर्चीले हो गए हैं, और अक्सर उम्मीदवार मतदाताओं को लुभाने के लिए पैसे और शराब का इस्तेमाल करते हैं।
- राजनीति का अपराधीकरण (Criminalization of Politics):
- आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो चुनाव जीतने के लिए हिंसा और डराने-धमकाने का सहारा लेते हैं।
- जाति और धर्म आधारित राजनीति:
- कई दल और उम्मीदवार जाति और धर्म के आधार पर वोट मांगते हैं, जो लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है।
- आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन:
- राजनीतिक दलों द्वारा आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का बार-बार उल्लंघन किया जाता है।
- गैर-गंभीर उम्मीदवारों की भीड़:
- चुनाव लड़ने की प्रक्रिया आसान होने के कारण, कई गैर-गंभीर उम्मीदवार भी मैदान में उतरते हैं, जिससे मतदाताओं में भ्रम पैदा होता है।
भारत में प्रमुख चुनावी सुधार (Major Electoral Reforms in India)
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, समय-समय पर कई महत्वपूर्ण चुनावी सुधार किए गए हैं:
- मतदान की आयु कम करना (1989):
- 61वें संविधान संशोधन द्वारा मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई, जिससे युवाओं की भागीदारी बढ़ी।
- इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का प्रयोग:
- EVM के उपयोग ने मतपत्रों की छपाई की आवश्यकता को समाप्त कर दिया और मतगणना को बहुत तेज और सटीक बना दिया। इसने बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाओं पर काफी हद तक रोक लगाई है।
- वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT):
- मतदाताओं का EVM पर विश्वास बढ़ाने के लिए, VVPAT की शुरुआत की गई। इसमें वोट देने के बाद, मतदाता को एक पर्ची दिखाई देती है जिसमें उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न होता है जिसे उसने वोट दिया है, जिससे पुष्टि हो जाती है कि उसका वोट सही जगह दर्ज हुआ है।
- आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct – MCC) का सख्ती से पालन:
- निर्वाचन आयोग ने चुनावों के दौरान सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग को रोकने, घृणास्पद भाषणों पर रोक लगाने और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आचार संहिता को कड़ाई से लागू किया है।
- उम्मीदवारों द्वारा हलफनामा (Affidavit by Candidates):
- उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय के बाद, अब प्रत्येक उम्मीदवार के लिए नामांकन पत्र के साथ एक हलफनामा दाखिल करना अनिवार्य है, जिसमें उसे अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और देनदारियों तथा शैक्षिक योग्यता की घोषणा करनी होती है। यह मतदाताओं को एक सूचित निर्णय लेने में मदद करता है।
- नोटा (NOTA – None of the Above) का विकल्प:
- 2013 से, EVM में NOTA का विकल्प भी दिया गया है। यदि कोई मतदाता चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार को पसंद नहीं करता है, तो वह NOTA का बटन दबा सकता है। यह मतदाताओं की नकारात्मक राय को दर्ज करने का एक तरीका है।
- चुनावी खर्च की सीमा:
- निर्वाचन आयोग उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले चुनावी खर्च पर एक सीमा लगाता है और इसकी निगरानी करता है, हालांकि यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
प्रस्तावित सुधार (Proposed Reforms)
चुनाव प्रणाली को और अधिक बेहतर बनाने के लिए कई सुधारों पर अभी भी चर्चा चल रही है, जैसे:
- एक साथ चुनाव (One Nation, One Election):
- लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव, ताकि खर्च कम हो और शासन में स्थिरता आए।
- राइट टू रिकॉल (Right to Recall):
- जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को, यदि वे उनके प्रदर्शन से असंतुष्ट हैं, कार्यकाल पूरा होने से पहले वापस बुलाने का अधिकार देना।
- राजनीति को अपराध-मुक्त करना:
- जिन व्यक्तियों पर गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप तय हो चुके हैं, उन्हें चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करना।
- राजनीतिक दलों का वित्तपोषण (Funding of Political Parties):
- राजनीतिक दलों के वित्तपोषण में अधिक पारदर्शिता लाना, जैसे Electoral Bonds की समीक्षा करना और दलों को RTI के दायरे में लाना।
- आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation):
- FPTP प्रणाली के बजाय, आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को अपनाने का सुझाव ताकि छोटे दलों को भी उनकी वोट हिस्सेदारी के अनुसार सीटें मिल सकें।
निष्कर्ष:
भारत ने एक मजबूत और विश्वसनीय चुनाव प्रणाली स्थापित करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि, धन-बल और अपराधीकरण जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। लोकतंत्र को वास्तव में जीवंत और प्रतिनिधिमूलक बनाए रखने के लिए निरंतर चुनावी सुधारों की प्रक्रिया को जारी रखना अत्यंत आवश्यक है।
चुनावी सुधारों पर प्रमुख समितियाँ (Major Committees on Electoral Reforms)
1. तारकुंडे समिति (1974)
जयप्रकाश नारायण द्वारा “नागरिकों के लिए लोकतंत्र” के आंदोलन के हिस्से के रूप में इस समिति का गठन किया गया था। इसे चुनाव सुधारों पर एक मील का पत्थर माना जाता है।
- प्रमुख सिफारिशें:
- मतदान की आयु: मतदान की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने की सिफारिश की। (इसे 61वें संशोधन, 1989 द्वारा लागू किया गया)।
- निर्वाचन आयोग की संरचना: निर्वाचन आयोग को तीन-सदस्यीय निकाय बनाया जाना चाहिए। (इसे 1989 में लागू किया गया)।
- चुनाव खर्च: राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले चुनाव खर्चों का हिसाब रखा जाना चाहिए और उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
- रेडियो और टीवी का उपयोग: राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार के लिए सरकार द्वारा नियंत्रित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
2. दिनेश गोस्वामी समिति (1990)
तत्कालीन कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में गठित इस समिति ने चुनाव सुधारों पर कई महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सुझाव दिए।
- प्रमुख सिफारिशें:
- इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM): EVM के उपयोग का सुझाव दिया, ताकि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और दक्षता लाई जा सके।
- अयोग्यता: किसी उम्मीदवार को, जिसके खिलाफ आरोप तय हो गए हों, चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने पर विचार करने को कहा।
- बूथ कैप्चरिंग: बूथ कैप्चरिंग के मामलों में कठोर दंड का प्रावधान और चुनाव रद्द करने की सिफारिश।
- चुनाव खर्च: उम्मीदवारों के चुनावी खर्चों को सरकार द्वारा वहन किए जाने (State Funding of Elections) के मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की।
- एक सीट से अधिक पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध।
3. वोहरा समिति (1993)
इस समिति का गठन मुख्य रूप से राजनीति के अपराधीकरण (Criminalization of Politics) के बीच के सांठगांठ की जांच के लिए किया गया था।
- प्रमुख सिफारिशें:
- समिति ने यह निष्कर्ष निकाला कि माफिया गिरोहों और अपराधियों का राजनेताओं और नौकरशाहों के साथ गहरा गठजोड़ बन गया है।
- इसने इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए खुफिया और जांच एजेंसियों को मजबूत करने और उनके बीच समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
4. इंद्रजीत गुप्त समिति (1998)
इस समिति का गठन मुख्य रूप से “चुनावों के राज्य वित्तपोषण” (State Funding of Elections) की व्यवहार्यता का अध्ययन करने के लिए किया गया था।
- प्रमुख सिफारिशें:
- समिति ने चुनावों के लिए आंशिक राज्य वित्तपोषण का समर्थन किया।
- यह सिफारिश की गई कि राज्य वित्तपोषण नकद के रूप में नहीं, बल्कि सामग्री और सुविधाओं (जैसे- ईंधन, वाहन, प्रचार सामग्री) के रूप में मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों को दिया जाना चाहिए।
- यह लाभ केवल उन्हीं दलों को मिलना चाहिए जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड न हो और जिन्होंने अपने खातों का ठीक से ऑडिट कराया हो।
5. विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999)
इस रिपोर्ट ने चुनाव सुधारों पर एक व्यापक ढांचा प्रस्तुत किया।
- प्रमुख सिफारिशें:
- एक साथ चुनाव: लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव।
- आनुपातिक प्रतिनिधित्व: जर्मनी की तरह, FPTP प्रणाली के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व के एक मिश्रित मॉडल को अपनाने का सुझाव।
- गठबंधन सरकारें: चुनाव पूर्व गठबंधनों को एक एकल राजनीतिक इकाई के रूप में पंजीकृत करने और चुनाव बाद गठबंधन बनाने पर कुछ प्रतिबंध लगाने की सिफारिश।
6. एम. एन. वेंकटचलैया आयोग (संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग) (2002)
इस आयोग ने भी चुनावी प्रक्रिया में सुधार के लिए कई सुझाव दिए।
- प्रमुख सिफारिशें:
- अपराधीकरण पर रोक: जिन उम्मीदवारों के खिलाफ जघन्य अपराधों में आरोप तय हो चुके हैं, उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जाना चाहिए।
- चुनावी खर्च का ऑडिट: राजनीतिक दलों के खातों का एक निर्धारित प्रारूप में ऑडिट होना चाहिए और उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
- नकारात्मक मतदान (Negative Vote): EVM में NOTA जैसे विकल्प की सिफारिश की।
- अनिवार्य मतदान: मतदान को अनिवार्य बनाने की संभावनाओं पर विचार करने को कहा।
7. तनख्वाह समिति (2010)
इस समिति का गठन चुनाव कानूनों और प्रक्रियाओं में सुधार के लिए किया गया था।
- प्रमुख सिफारिशें:
- गंभीर अपराधों में आरोपित व्यक्तियों को चुनाव से अयोग्य ठहराया जाए।
- गलत हलफनामा दाखिल करने वाले उम्मीदवारों के लिए कठोर दंड का प्रावधान।
- चुनावी याचिकाओं का निपटारा छह महीने के भीतर किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष:
इन समितियों की अनेक सिफारिशों को सरकार और निर्वाचन आयोग द्वारा समय-समय पर लागू किया गया है, जैसे- EVM का उपयोग, NOTA का विकल्प, मतदान की आयु कम करना, और उम्मीदवारों द्वारा हलफनामे की घोषणा। हालांकि, राजनीति के अपराधीकरण को रोकने और चुनावी वित्तपोषण में पारदर्शिता लाने जैसे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी भी व्यापक सुधारों की आवश्यकता है, ताकि भारतीय लोकतंत्र को और अधिक स्वच्छ, निष्पक्ष और मजबूत बनाया जा सके।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act)
भारतीय चुनावी कानून का आधार स्तंभ है। यह उन सभी नियमों और प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है जिनके आधार पर भारत में चुनाव संपन्न होते हैं।
यह अधिनियम मुख्य रूप से दो भागों में है:
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950)
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951)
आइए, इन दोनों को विस्तार से समझते हैं।
1. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950
यह अधिनियम चुनाव कराने के लिए संरचनात्मक और प्रारंभिक तैयारियों (structural and preparatory aspects) से संबंधित है। इसका मुख्य फोकस चुनाव से पहले की व्यवस्थाओं पर होता है।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान:
- निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (Delimitation of Constituencies):
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण और उनका सीमांकन कैसे किया जाएगा, इसके प्रावधान।
- मतदाता के रूप में योग्यता (Qualification of Voters):
- यह अधिनियम उन योग्यताओं को निर्धारित करता है जिनके आधार पर कोई व्यक्ति मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकता है। (मुख्य योग्यताएं संविधान के अनुच्छेद 326 में दी गई हैं – जैसे 18 वर्ष की आयु, भारत का नागरिक)।
- निर्वाचक नामावली (मतदाता सूची) तैयार करना (Preparation of Electoral Rolls):
- प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए मतदाता सूची कैसे तैयार की जाएगी, उसे कैसे संशोधित किया जाएगा और उससे संबंधित प्रक्रियाएँ क्या होंगी।
- लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों का आवंटन:
- संसद और राज्य विधानसभाओं में विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए सीटों की संख्या का आवंटन।
संक्षेप में, RPA, 1950 मुख्यतः चुनाव की ‘तैयारी’ से संबंधित है: मतदाता कौन होगा और चुनाव कहाँ होगा।
2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951
यह अधिनियम चुनाव कराने की वास्तविक प्रक्रिया (actual conduct of elections) और चुनावों के बाद उत्पन्न होने वाले मुद्दों से संबंधित है। यह एक अधिक व्यापक और महत्वपूर्ण कानून है।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान:
(क) चुनावों का वास्तविक संचालन:
- चुनाव कराने के लिए प्रशासनिक मशीनरी:
- मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी, रिटर्निंग ऑफिसर आदि की भूमिका और कर्तव्यों का निर्धारण।
- नामांकन और उम्मीदवारी (Nomination and Candidature):
- चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों का नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया और शर्तें।
- राजनीतिक दलों का पंजीकरण (Registration of Political Parties):
- राजनीतिक दलों के पंजीकरण और उन्हें मान्यता देने की प्रक्रिया।
- चुनाव कराने की प्रक्रिया:
- मतदान की प्रक्रिया, मतगणना और परिणामों की घोषणा।
(ख) उम्मीदवारों के लिए योग्यता और अयोग्यता (Qualifications and Disqualifications):
- योग्यता: संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्य बनने के लिए आवश्यक योग्यताएं।
- अयोग्यता (धारा 8): यह सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है। इसमें उन आधारों का उल्लेख है जिन पर किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य (disqualified) ठहराया जा सकता है।
- आपराधिक दोषसिद्धि: यदि किसी व्यक्ति को कुछ विशिष्ट अपराधों (जैसे- रिश्वतखोरी, दो समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना, बलात्कार, अस्पृश्यता) के लिए दोषी ठहराया गया हो।
- दो वर्ष से अधिक की सजा: यदि किसी व्यक्ति को किसी भी अपराध के लिए दो साल या उससे अधिक की कैद की सजा सुनाई जाती है, तो वह दोषी ठहराए जाने की तारीख से अयोग्य हो जाएगा और अपनी रिहाई के बाद भी अगले 6 वर्षों तक चुनाव नहीं लड़ सकेगा। (इसी प्रावधान के तहत राहुल गांधी की सदस्यता रद्द हुई थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया)।
- अन्य आधार: भ्रष्टाचार, सरकारी अनुबंधों में शामिल होना, चुनाव खर्च का ब्योरा देने में विफल रहना आदि।
(ग) भ्रष्ट आचरण और अन्य चुनावी अपराध (Corrupt Practices and other Electoral Offences):
- भ्रष्ट आचरण (धारा 123): यह अधिनियम उन कृत्यों को परिभाषित करता है जिन्हें “भ्रष्ट आचरण” माना जाता है, और यदि कोई उम्मीदवार इनमें लिप्त पाया जाता है तो उसका चुनाव रद्द किया जा सकता है।
- प्रमुख भ्रष्ट आचरण:
- रिश्वतखोरी (मतदाताओं को रिश्वत देना)।
- मतदाताओं पर असम्यक असर डालना (डराना, धमकाना)।
- धर्म, जाति, भाषा, समुदाय के आधार पर वोट मांगना या घृणा फैलाना।
- सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करना।
- निर्धारित सीमा से अधिक चुनाव खर्च करना।
- प्रमुख भ्रष्ट आचरण:
- चुनावी अपराध: बूथ कैप्चरिंग, मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ले जाने के लिए वाहन उपलब्ध कराना आदि को आपराधिक कृत्य माना गया है।
(घ) चुनाव संबंधी विवादों का समाधान (Settlement of Election Disputes):
- चुनाव परिणामों को चुनौती देने के लिए “चुनाव याचिका” (Election Petition) दायर करने की प्रक्रिया।
- ऐसी याचिकाएँ केवल संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय में ही दायर की जा सकती हैं।
- उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है।
निष्कर्ष:
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951 मिलकर भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं। RPA 1950 जहाँ चुनाव की पूर्व-तैयारी के लिए मंच तैयार करता है, वहीं RPA 1951 चुनावों की वास्तविक प्रक्रिया, उम्मीदवारों की योग्यता, भ्रष्ट आचरण और विवाद समाधान जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को नियंत्रित करता है, जिससे भारतीय लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं।