पंचायती राज (Panchayati Raj)

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पंचायती राज व्यवस्था और इससे संबंधित 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र में एक क्रांतिकारी कदम था। इसने लोकतंत्र को ग्रासरूट (grassroots) स्तर यानी गाँवों तक पहुँचाया।

यहाँ इसका विस्तृत और सरल विश्लेषण प्रस्तुत है।


पंचायती राज (Panchayati Raj)

परिभाषा:
पंचायती राज, ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (Rural Local Self-Government) की एक प्रणाली है। इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को अपने स्थानीय मामलों के प्रशासन में सीधे तौर पर भाग लेने का अवसर प्रदान करना और विकास प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाना है।

संवैधानिक आधार:


पंचायती राज का विकास: प्रमुख समितियाँ

आजादी के बाद, ग्रामीण विकास के लिए सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) शुरू किया गया, लेकिन यह असफल रहा। इसकी विफलता के कारणों की जाँच और स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के उपाय सुझाने के लिए कई महत्वपूर्ण समितियाँ बनाई गईं:

  1. बलवंत राय मेहता समिति (1957):
    • सिफारिश: इसने “लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण” (Democratic Decentralization) की योजना प्रस्तुत की।
    • त्रि-स्तरीय प्रणाली: इसने तीन-स्तरीय (Three-tier) पंचायती राज प्रणाली की स्थापना की सिफारिश की, जिसे आज भी भारत में लागू किया गया है:
      1. ग्राम स्तर पर – ग्राम पंचायत
      2. खंड (Block) स्तर पर – पंचायत समिति
      3. जिला स्तर पर – जिला परिषद
    • इसी सिफारिश के आधार पर, 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत की पहली पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया गया।
  2. अशोक मेहता समिति (1977):
    • इसने दो-स्तरीय (द्वि-स्तरीय) प्रणाली (मंडल पंचायत और जिला परिषद) की सिफारिश की।
    • पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की बात कही।
  3. एल. एम. सिंघवी समिति (1986):
    • यह सबसे महत्वपूर्ण समिति थी, जिसने दृढ़ता से सिफारिश की कि पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता दी जानी चाहिए ताकि वे प्रभावी ढंग से काम कर सकें।

73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

एल. एम. सिंघवी समिति की सिफारिशों के आधार पर, पी. वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने यह ऐतिहासिक संशोधन पारित किया, जो 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ। इसीलिए 24 अप्रैल को “राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस” मनाया जाता है।

इस संशोधन ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।

संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ

  1. नया भाग और अनुसूची:
    • संविधान में एक नया भाग-IX जोड़ा गया, जिसका शीर्षक ‘पंचायत’ है (अनुच्छेद 243 से 243-O तक)।
    • एक नई ग्यारहवीं अनुसूची (Eleventh Schedule) जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों को हस्तांतरित किए जा सकने वाले 29 कार्यात्मक विषय (Functional Items) शामिल हैं, जैसे – कृषि, ग्रामीण आवास, सड़कें, पेयजल, गरीबी उन्मूलन आदि।
  2. त्रि-स्तरीय प्रणाली की अनिवार्यता:
    • इसने सभी राज्यों के लिए (जिनकी जनसंख्या 20 लाख से कम है, उन्हें छोड़कर) एक त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली स्थापित करना अनिवार्य कर दिया:
      • ग्राम स्तर पर: ग्राम पंचायत
      • मध्यवर्ती (खंड/तालुक) स्तर पर: पंचायत समिति
      • जिला स्तर पर: जिला परिषद
  3. ग्राम सभा (Gram Sabha) (अनुच्छेद 243-A):
    • ग्राम सभा को पंचायती राज की “नींव” और “आत्मा” के रूप में संवैधानिक मान्यता दी गई।
    • ग्राम सभा में गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता (registered voters) शामिल होते हैं। यह प्रत्यक्ष लोकतंत्र का एक उदाहरण है।
  4. सदस्यों और अध्यक्षों का चुनाव:
    • तीनों स्तरों पर सभी सीटों को प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरा जाएगा।
    • मध्यवर्ती और जिला स्तर के अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाएगा। ग्राम पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित तरीके से होगा।
  5. सीटों का आरक्षण (Reservation of Seats) (अनुच्छेद 243-D):
    • अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण (सदस्यों और अध्यक्षों, दोनों के पदों पर)।
    • महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटों का आरक्षण (सदस्यों और अध्यक्षों, दोनों के पदों पर)। यह एक क्रांतिकारी कदम था।
  6. कार्यकाल (Tenure) (अनुच्छेद 243-E):
    • सभी पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है।
    • यदि कोई पंचायत समय से पहले भंग हो जाती है, तो 6 महीने के भीतर नए चुनाव कराना अनिवार्य है।
  7. राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) (अनुच्छेद 243-K):
    • पंचायतों के सभी चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण के लिए प्रत्येक राज्य में एक स्वतंत्र राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना का प्रावधान।
  8. राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) (अनुच्छेद 243-I):
    • राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष में एक राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाएगा, जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा और राज्य तथा पंचायतों के बीच करों के वितरण की सिफारिश करेगा।

निष्कर्ष:
73वें संशोधन ने भारत में सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। इसने न केवल स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की, बल्कि महिलाओं और वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने और निर्णय लेने का एक अभूतपूर्व अवसर भी प्रदान किया, जिससे भारतीय लोकतंत्र की जड़ें और अधिक गहरी हुईं।


पेसा अधिनियम, 1996 (PESA Act, 1996) भारतीय शासन व्यवस्था, विशेषकर आदिवासी स्वशासन के संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मील का पत्थर कानून है। यह 73वें संविधान संशोधन का एक विस्तार है।

यहाँ इसका विस्तृत और सरल विश्लेषण प्रस्तुत है।


पेसा अधिनियम, 1996 (PESA Act, 1996)

पूरा नाम:
पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996
(The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996)

पृष्ठभूमि:


पेसा अधिनियम का मुख्य उद्देश्य

इसका मूल उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देना और उन्हें स्वशासन (Self-rule) के लिए सशक्त बनाना है। यह अधिनियम “कानून बनाने में लोगों की भागीदारी” (Participatory Democracy) के सिद्धांत को मूर्त रूप देता है।

गांधीवादी दर्शन: यह महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज्य’ के दर्शन के बहुत करीब है।


पेसा अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ और प्रावधान

पेसा अधिनियम, राज्य विधानमंडलों को यह निर्देश देता है कि वे अपने पंचायत कानूनों में इन क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान शामिल करें जो निम्नलिखित सिद्धांतों के अनुरूप हों:

1. पारंपरिक व्यवस्था को मान्यता:

2. ग्राम सभा को अत्यधिक शक्तिशाली बनाना:

3. आरक्षण (Reservation):

4. विवाद समाधान:

5. साहूकारी पर नियंत्रण:


पेसा अधिनियम का महत्व (Significance of PESA Act)

  1. संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा: यह आदिवासी समुदायों के पारंपरिक और प्रथागत अधिकारों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान करता है।
  2. जल, जंगल और ज़मीन पर अधिकार: यह “जल, जंगल, ज़मीन” पर आदिवासियों के अधिकारों को स्वीकार करता है, जो उनकी आजीविका का मुख्य आधार हैं।
  3. शोषण से बचाव: यह बाहरी शोषण (जैसे साहूकारों और ठेकेदारों द्वारा) को रोकने में मदद करता है।
  4. विकास में भागीदारी: यह विकास की प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक और सहभागी बनाता है, क्योंकि कोई भी बड़ा फैसला अब ग्राम सभा की सहमति के बिना नहीं लिया जा सकता।
  5. सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण: यह अधिनियम आदिवासी समुदायों को अपनी अनूठी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक शासन प्रणालियों को संरक्षित करने में सक्षम बनाता है।

चुनौतियाँ (Challenges in Implementation)

निष्कर्ष:
पेसा अधिनियम, 1996 आदिवासी स्वशासन और सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कानून है। यह न केवल उनके संवैधानिक अधिकारों को मान्यता देता है, बल्कि विकास की एक ऐसी रूपरेखा प्रस्तुत करता है जिसमें निर्णय लेने की शक्ति बाहरी संस्थाओं के बजाय स्थानीय समुदाय के हाथों में होती है। हालांकि इसके कार्यान्वयन में कई चुनौतियाँ हैं, फिर भी यह भारत में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है।


शहरी स्थानीय स्वशासन: नगरपालिकाएँ (Urban Local Self-Government: Municipalities)

परिभाषा:
नगरपालिकाएँ शहरी क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ होती हैं। इनका उद्देश्य शहरी निवासियों को स्थानीय स्तर पर शासन में भाग लेने का अवसर देना और नागरिक सुविधाएँ (जैसे- सड़क, पानी, सफाई) प्रदान करना है।

संवैधानिक दर्जा:


74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

इस संशोधन ने भारत में शहरी स्थानीय शासन की नींव को मजबूत किया।

संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ

  1. नया भाग और अनुसूची:
    • संविधान में एक नया भाग IX-A (9-क) जोड़ा गया, जिसका शीर्षक ‘नगरपालिकाएँ’ है (अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक)।
    • एक नई बारहवीं अनुसूची (Twelfth Schedule) जोड़ी गई, जिसमें नगरपालिकाओं के 18 कार्यात्मक विषय (Functional Items) शामिल हैं, जैसे – शहरी नियोजन, सड़कें और पुल, जल आपूर्ति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई, झुग्गी सुधार, पार्कों का रखरखाव, जन्म और मृत्यु का पंजीकरण आदि।
  2. तीन प्रकार की नगरपालिकाओं का गठन (अनुच्छेद 243-Q):
    • इसने हर राज्य में तीन प्रकार के शहरी स्थानीय निकायों की स्थापना को अनिवार्य कर दिया, जो क्षेत्र की प्रकृति पर आधारित हैं:
      1. नगर पंचायत (Nagar Panchayat): ग्रामीण से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहे क्षेत्रों के लिए। (छोटे शहर)
      2. नगर पालिका परिषद (Municipal Council): छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए।
      3. नगर निगम (Municipal Corporation): बड़े शहरी क्षेत्रों (जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ) के लिए।
  3. संरचना और चुनाव:
    • नगरपालिका के सभी सदस्यों (पार्षदों) का चुनाव उस क्षेत्र के लोगों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
    • अध्यक्ष (मेयर/चेयरपर्सन) के चुनाव का तरीका राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित किया जाता है।
  4. वार्ड समितियाँ (Wards Committees):
    • 3 लाख या उससे अधिक की जनसंख्या वाली नगरपालिकाओं में एक या अधिक वार्डों को मिलाकर वार्ड समितियों का गठन करना अनिवार्य है।
  5. सीटों का आरक्षण (Reservation of Seats) (अनुच्छेद 243-T):
    • अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण।
    • महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटों का आरक्षण (सदस्यों और अध्यक्षों, दोनों के पदों पर)।
  6. कार्यकाल (Tenure) (अनुच्छेद 243-U):
    • सभी नगरपालिकाओं का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है।
    • यदि कोई नगरपालिका समय से पहले भंग हो जाती है, तो 6 महीने के भीतर नए चुनाव कराना अनिवार्य है।
  7. राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) (अनुच्छेद 243-ZA):
    • पंचायतों की तरह ही, नगरपालिकाओं के चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण के लिए भी राज्य निर्वाचन आयोग जिम्मेदार होगा।
  8. राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) (अनुच्छेद 243-Y):
    • राज्यपाल द्वारा गठित राज्य वित्त आयोग, नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करेगा और उनकी वित्तीय मजबूती के लिए सिफारिशें देगा।
  9. जिला योजना समिति (District Planning Committee – DPC):
    • यह संशोधन प्रत्येक जिले में एक जिला योजना समिति के गठन को अनिवार्य करता है।
    • इसका कार्य जिले की पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को समेकित (consolidate) करना और पूरे जिले के लिए एक विकास योजना का मसौदा तैयार करना है।

नगर निगम (Municipal Corporation)

नगर निगम, शहरी स्थानीय स्वशासन का शीर्ष स्तर है जो बड़े महानगरीय शहरों में स्थापित किया जाता है।

नगर निगम की संरचना:

नगर निगम के तीन मुख्य अंग होते हैं:

  1. परिषद (The Council):
    • यह नगर निगम का विधायी अंग (legislative wing) है।
    • इसमें सीधे जनता द्वारा चुने गए पार्षद (Councillors) होते हैं।
    • परिषद का प्रमुख महापौर या मेयर (Mayor) होता है, जिसकी सहायता के लिए एक उपमहापौर (Deputy Mayor) भी होता है। मेयर का चुनाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हो सकता है, जैसा कि राज्य सरकार निर्धारित करे।
  2. स्थायी समितियाँ (Standing Committees):
    • ये परिषद के काम को आसान बनाने और विभिन्न क्षेत्रों (जैसे- जल आपूर्ति, सार्वजनिक निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा) पर विस्तृत विचार-विमर्श के लिए बनाई जाती हैं। ये समितियाँ नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  3. नगर आयुक्त (Municipal Commissioner):
    • यह नगर निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer) होता है।
    • वह एक वरिष्ठ IAS अधिकारी होता है, जिसे राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।
    • उसका मुख्य कार्य परिषद द्वारा लिए गए निर्णयों और नीतियों को लागू करना होता है। वह निगम के दिन-प्रतिदिन के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है।

शक्ति का पृथक्करण: नगर निगम में विधायी शक्तियाँ (नीति बनाना) परिषद और स्थायी समितियों (निर्वाचित विंग) में निहित होती हैं, जबकि कार्यकारी शक्तियाँ (नीति लागू करना) नगर आयुक्त (प्रशासनिक विंग) में निहित होती हैं।

निष्कर्ष:
74वें संशोधन ने शहरी क्षेत्रों में एक व्यवस्थित, लोकतांत्रिक और सशक्त स्थानीय शासन की नींव रखी। नगर निगम जैसे निकाय आज भारत के बड़े शहरों के विकास, योजना और नागरिक सुविधाओं के प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।


केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations) 

केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations) भारतीय संघवाद (Indian Federalism) की धुरी है। संविधान ने देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का एक विस्तृत और स्पष्ट विभाजन किया है।

इन संबंधों का अध्ययन तीन प्रमुख शीर्षकों के अंतर्गत किया जाता है:

  1. विधायी संबंध (Legislative Relations)
  2. प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations)
  3. वित्तीय संबंध (Financial Relations)

1. विधायी संबंध (Legislative Relations)

ये संबंध कानून बनाने की शक्तियों के विभाजन से संबंधित हैं। संविधान के भाग-11 में अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंधों का वर्णन है।

क्षेत्रीय विस्तार (Territorial Extent)

शक्तियों का विषय-वार वितरण (Distribution of Subjects)

सूची का नामविवरणप्रमुख विषय
(i) संघ सूची (Union List)इस पर केवल संसद कानून बना सकती है। इसमें 100 विषय (मूल रूप से 97) हैं।रक्षा, विदेशी मामले, युद्ध और शांति, मुद्रा, बैंकिंग, रेलवे, जनगणना।
(ii) राज्य सूची (State List)इस पर सामान्यतः केवल राज्य विधानमंडल ही कानून बना सकता है। इसमें 61 विषय (मूल रूप से 66) हैं।पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, जेल, स्थानीय शासन।
(iii) समवर्ती सूची (Concurrent List)इस पर संसद और राज्य विधानमंडल, दोनों कानून बना सकते हैं। इसमें 52 विषय (मूल रूप से 47) हैं।शिक्षा, वन, विवाह और तलाक, आपराधिक कानून, बिजली।

राज्य सूची पर संसदीय विधान

कुछ विशेष परिस्थितियों में, संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है, जो केंद्र की श्रेष्ठता को दर्शाता है:

  1. जब राज्यसभा प्रस्ताव पारित करे (अनुच्छेद 249): यदि राज्यसभा अपने विशेष बहुमत से यह प्रस्ताव पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक है।
  2. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान (अनुच्छेद 352): आपातकाल लागू होने पर संसद को राज्य सूची के किसी भी विषय पर कानून बनाने की शक्ति मिल जाती है।
  3. राज्यों की सहमति से (अनुच्छेद 252): यदि दो या दो से अधिक राज्य विधानमंडल यह अनुरोध करें।
  4. अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए (अनुच्छेद 253):
  5. राष्ट्रपति शासन के दौरान (अनुच्छेद 356):

2. प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations)

इन संबंधों का तात्पर्य केंद्र और राज्यों की कार्यकारी शक्तियों के प्रयोग से है। इनका वर्णन संविधान के भाग-11 में अनुच्छेद 256 से 263 तक किया गया है।

शक्तियों का वितरण

राज्यों पर केंद्र का नियंत्रण

संविधान ने केंद्र को राज्यों पर कुछ प्रशासनिक नियंत्रण भी दिए हैं ताकि एक सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था बनी रहे:

सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने वाले तंत्र

  1. अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services) (अनुच्छेद 312): IAS, IPS, IFS के अधिकारी केंद्र द्वारा भर्ती किए जाते हैं, लेकिन राज्यों में अपनी सेवाएँ देते हैं। ये केंद्र और राज्यों के बीच एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कड़ी हैं।
  2. अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) (अनुच्छेद 263): इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच तथा राज्यों के आपसी सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।
  3. सार्वजनिक अधिनियमों और न्यायिक कार्यवाहियों को मान्यता (अनुच्छेद 261):
  4. अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (अनुच्छेद 262): संसद ऐसे विवादों के समाधान के लिए कानून बना सकती है।

3. वित्तीय संबंध (Financial Relations)

वित्तीय संबंध, केंद्र और राज्यों के बीच कर लगाने और राजस्व के वितरण की व्यवस्था से संबंधित हैं। इनका वर्णन संविधान के भाग-12 में अनुच्छेद 268 से 293 तक किया गया है।

कर-अधिकारों का विभाजन (Division of Taxing Powers)

राजस्व का वितरण

राज्यों को सहायता अनुदान (Grants-in-aid to the States)

संसद, आवश्यकता पड़ने पर राज्यों को सहायता के लिए अनुदान (Grants) प्रदान करती है:

  1. विधिक अनुदान (Statutory Grants) (अनुच्छेद 275): वित्त आयोग की सिफारिश पर उन राज्यों को दिया जाता है जिन्हें वित्तीय सहायता की आवश्यकता हो।
  2. विवेकाधीन अनुदान (Discretionary Grants) (अनुच्छेद 282): केंद्र किसी भी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किसी भी राज्य को यह अनुदान दे सकता है। योजना आयोग (अब नीति आयोग) के माध्यम से दिए जाने वाले अनुदान इसी के तहत आते थे।

वित्त आयोग (Finance Commission) – अनुच्छेद 280

निष्कर्ष:
भारतीय संविधान ने केंद्र-राज्य संबंधों में सहयोगपूर्ण संघवाद (Cooperative Federalism) की स्थापना का प्रयास किया है, लेकिन इसमें केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है ताकि देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित हो सके।


अंतर-राज्यीय संबंध (Inter-State Relations)

अंतर-राज्यीय संबंधों को चार मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है:

  1. अंतर-राज्यीय जल विवाद (Inter-State Water Disputes)
  2. अंतर-राज्यीय परिषदें (Inter-State Councils)
  3. पारस्परिक मान्यता (Mutual Recognition) – लोक अधिनियम, अभिलेख और न्यायिक कार्यवाहियाँ
  4. अंतर-राज्यीय व्यापार, वाणिज्य और समागम (Inter-State Trade, Commerce and Intercourse)

1. अंतर-राज्यीय जल विवाद (Inter-State Water Disputes)


2. अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council)


3. पारस्परिक मान्यता (Mutual Recognition)


4. अंतर-राज्यीय व्यापार, वाणिज्य और समागम (Inter-State Trade, Commerce and Intercourse)


क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)

ये संवैधानिक निकाय नहीं हैं।

इनका गठन संसद द्वारा बनाए गए एक अधिनियम—राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956—के तहत किया गया था।

इस अधिनियम ने देश को पांच क्षेत्रों (उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी) में विभाजित किया और प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक क्षेत्रीय परिषद की स्थापना की।

उद्देश्य: राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देना।

संरचना:

अध्यक्ष: केंद्रीय गृह मंत्री

उपाध्यक्ष: क्षेत्र के प्रत्येक राज्य का मुख्यमंत्री, बारी-बारी से (rotationally) एक वर्ष के लिए।

सदस्य: क्षेत्र के सभी मुख्यमंत्री और प्रत्येक राज्य से दो अन्य मंत्री।


आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन प्रावधानों का विस्तृत वर्णन किया गया है।

स्रोत:
इन प्रावधानों को जर्मनी के वाइमर संविधान (Weimar Constitution of Germany) से लिया गया है।

उद्देश्य:
इन प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य देश पर आने वाले आंतरिक या बाहरी खतरों का सामना करना है। आपातकाल के दौरान, देश का संघीय ढाँचा (Federal Structure) औपचारिक रूप से संशोधित हुए बिना ही एकात्मक ढाँचे (Unitary Structure) में परिवर्तित हो जाता है।

संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल का उल्लेख है:


1. राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) – अनुच्छेद 352

उद्घोषणा का आधार:
राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तब कर सकते हैं जब उन्हें यह समाधान हो जाए कि युद्ध (war), बाह्य आक्रमण (external aggression) या सशस्त्र विद्रोह (armed rebellion) के कारण भारत या उसके किसी हिस्से की सुरक्षा खतरे में है।

संसदीय अनुमोदन और अवधि:

  1. आपातकाल की उद्घोषणा के एक महीने के भीतर इसका संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से अनुमोदित होना अनिवार्य है।
  2. एक बार अनुमोदित होने पर, आपातकाल छह महीने तक जारी रहता है।
  3. इसे हर छह महीने पर संसद के विशेष बहुमत से अनुमोदन लेकर अनिश्चित काल तक बढ़ाया जा सकता है।
  4. उद्घोषणा को राष्ट्रपति द्वारा कभी भी वापस लिया जा सकता है। इसे वापस लेने के लिए संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।

प्रभाव (Effects of National Emergency):

अब तक का प्रयोग: भारत में अब तक तीन बार राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया है:

  1. 1962 (चीन आक्रमण)
  2. 1971 (पाकिस्तान आक्रमण)
  3. 1975 (आंतरिक अशांति के आधार पर)

2. राज्यों में राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) – अनुच्छेद 356

इसे ‘राज्य आपातकाल’ (State Emergency) या ‘संवैधानिक आपातकाल’ (Constitutional Emergency) भी कहा जाता है।

उद्घोषणा का आधार:
अनुच्छेद 356 के तहत, राष्ट्रपति किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं, यदि वे इस बात से संतुष्ट हों कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता

संसदीय अनुमोदन और अवधि:

  1. उद्घोषणा के दो महीने के भीतर इसका संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदित होना आवश्यक है।
  2. एक बार अनुमोदित होने पर, यह छह महीने तक जारी रहता है।
  3. इसे प्रत्येक छह महीने पर संसद के अनुमोदन से अधिकतम तीन वर्ष की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है।

प्रभाव:


3. वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) – अनुच्छेद 360

उद्घोषणा का आधार:
यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हैं कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके किसी क्षेत्र की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा है, तो वह वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं।

संसदीय अनुमोदन और अवधि:

  1. उद्घोषणा के दो महीने के भीतर संसद के साधारण बहुमत से इसका अनुमोदन आवश्यक है।
  2. एक बार अनुमोदित होने पर, यह अनिश्चित काल तक प्रभावी रहता है जब तक कि इसे राष्ट्रपति द्वारा वापस नहीं ले लिया जाता। इसे बार-बार अनुमोदित करने की आवश्यकता नहीं होती।

प्रभाव:

अब तक का प्रयोग: भारत में अब तक कभी भी वित्तीय आपातकाल नहीं लगाया गया है

निष्कर्ष: आपातकालीन प्रावधान संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता को दर्शाते हैं, जो देश को असाधारण संकटों से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। हालांकि, अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के राजनीतिक दुरुपयोग ने इसकी आलोचना को भी जन्म दिया है।


केंद्रशासित प्रदेश (The Union Territories)

परिभाषा:
केंद्रशासित प्रदेश भारत के वे संघीय क्षेत्र हैं जिन पर सीधे केंद्र सरकार का नियंत्रण और प्रशासन होता है। ये राज्यों से भिन्न होते हैं, जिनकी अपनी चुनी हुई सरकारें होती हैं।

ये क्षेत्र “केंद्र द्वारा शासित क्षेत्र” होते हैं, इसीलिए इन्हें ‘केंद्रशासित प्रदेश’ कहा जाता है।

संवैधानिक प्रावधान:


केंद्रशासित प्रदेशों का गठन क्यों किया गया?

राज्यों के अलावा इन अलग प्रशासनिक इकाइयों को बनाने के पीछे कई विशिष्ट कारण थे:

  1. राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व:
    • दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी) और चंडीगढ़ (दो राज्यों की संयुक्त राजधानी)। इन महत्वपूर्ण शहरों पर किसी एक राज्य का पूर्ण नियंत्रण न हो, इसलिए इन्हें सीधे केंद्र के अधीन रखा गया।
  2. सांस्कृतिक विशिष्टता:
    • पुडुचेरी, दादरा और नगर हवेली, और दमन और दीव। ये क्षेत्र पूर्व में फ्रांसीसी और पुर्तगाली उपनिवेश थे। इनकी विशिष्ट संस्कृति और विरासत को संरक्षित करने के लिए इन्हें अलग इकाई बनाया गया।
  3. सामरिक और रणनीतिक महत्व:
    • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप। ये भारत की मुख्य भूमि से दूर स्थित हैं और देश की सुरक्षा के लिए इनका रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है, इसलिए इन पर सीधा केंद्रीय नियंत्रण आवश्यक है।
  4. पिछड़े और आदिवासी लोगों के विशेष उपचार:
    • मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश जैसे कुछ क्षेत्र केंद्रशासित प्रदेश थे, जिन्हें बाद में पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया ताकि उनके विशिष्ट हितों की रक्षा की जा सके।
  5. विशेष परिस्थितियों के कारण:
    • जम्मू और कश्मीर और लद्दाख का गठन जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत किया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक परिस्थितियों को देखते हुए इन्हें केंद्र के सीधे प्रशासन में लाया गया।

वर्तमान में भारत के केंद्रशासित प्रदेश (As of 2024)

वर्तमान में भारत में 8 केंद्रशासित प्रदेश हैं:

  1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
  2. चंडीगढ़
  3. दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव
    (2020 में इन दोनों को मिलाकर एक कर दिया गया)
  4. दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)
  5. जम्मू और कश्मीर
  6. लद्दाख
  7. लक्षद्वीप
  8. पुडुचेरी

केंद्रशासित प्रदेशों का प्रशासन (Administration of Union Territories)

विधानमंडल वाले केंद्रशासित प्रदेश

हालांकि केंद्रशासित प्रदेशों पर केंद्र का शासन होता है, लेकिन संविधान ने कुछ के लिए विधानसभा और मंत्रिपरिषद की व्यवस्था भी की है ताकि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बना रहे।

वर्तमान में 3 केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा है:

  1. पुडुचेरी
  2. दिल्ली
  3. जम्मू और कश्मीर

विधानसभा वाले UTs की शक्तियाँ:

कानून बनाने की संसद की शक्ति

केंद्रशासित प्रदेशों के लिए उच्च न्यायालय

अन्य केंद्रशासित प्रदेश विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं (जैसे- अंडमान और निकोबार, कलकत्ता उच्च न्यायालय के अधीन)।

अनुच्छेद 241 के तहत, संसद कानून द्वारा किसी भी केंद्रशासित प्रदेश के लिए एक उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है या उसे किसी पड़ोसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में रख सकती है।

दिल्ली एकमात्र केंद्रशासित प्रदेश है जिसका अपना उच्च न्यायालय (High Court) है।

जम्मू और कश्मीर और लद्दाख का एक साझा उच्च न्यायालय है।


अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्र (Scheduled and Tribal Areas)

परिभाषा:
ये भारत के वे क्षेत्र हैं जहाँ अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) की बड़ी आबादी निवास करती है। इन क्षेत्रों की पहचान उनके सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन, विशिष्ट संस्कृति और पारंपरिक स्वशासन प्रणालियों के आधार पर की जाती है।

संविधान इन क्षेत्रों के लिए एक विशेष प्रशासनिक व्यवस्था का प्रावधान करता है ताकि वहाँ के आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा की जा सके और उन्हें बाहरी शोषण से बचाया जा सके।

संवैधानिक प्रावधान:


1. पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule)

लागू क्षेत्र:
पाँचवीं अनुसूची के प्रावधान असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर भारत के लगभग सभी अन्य राज्यों में स्थित “अनुसूचित क्षेत्रों” (Scheduled Areas) के प्रशासन और नियंत्रण पर लागू होते हैं।

पाँचवीं अनुसूची की प्रमुख विशेषताएँ

(क) क्षेत्रों की घोषणा:

(ख) कार्यकारी शक्ति का विस्तार:

(ग) राज्यपाल की विशेष शक्तियाँ:

(घ) जनजाति सलाहकार परिषद (Tribes Advisory Council – TAC):


2. छठी अनुसूची (Sixth Schedule)

लागू क्षेत्र:
छठी अनुसूची के प्रावधान केवल चार पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होते हैं:

  1. असम
  2. मेघालय
  3. त्रिपुरा
  4. मिजोरम

छठी अनुसूची की प्रमुख विशेषताएँ (यह पाँचवीं अनुसूची से अधिक स्वायत्तता देती है)

(क) स्वायत्त जिलों और स्वायत्त क्षेत्रों की स्थापना:

(ख) स्वायत्त जिला परिषद (Autonomous District Council – ADC):

(ग) जिला परिषदों की व्यापक शक्तियाँ:

(घ) कानूनों का लागू होना:


पाँचवीं और छठी अनुसूची में मुख्य अंतर

आधारपाँचवीं अनुसूचीछठी अनुसूची
क्षेत्र4 पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर, अन्य राज्यों के “अनुसूचित क्षेत्र”केवल असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के “जनजातीय क्षेत्र”
प्रशासनिक इकाईजनजाति सलाहकार परिषद (TAC)।स्वायत्त जिला परिषद (ADC)
शक्तियाँTAC एक सलाहकार निकाय है।ADC एक शक्तिशाली निकाय है जिसके पास विधायी और न्यायिक शक्तियाँ भी हैं।
स्वायत्तताइसमें जनजातीय लोगों को सीमित स्वायत्तता प्राप्त है।इसमें आदिवासी समुदायों को बहुत अधिक स्वायत्तता प्रदान की गई है।

निष्कर्ष:
ये विशेष संवैधानिक प्रावधान भारत की विविधता को समायोजित करने और सबसे कमजोर आदिवासी समुदाD…