पंचायती राज (Panchayati Raj)
पंचायती राज व्यवस्था और इससे संबंधित 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र में एक क्रांतिकारी कदम था। इसने लोकतंत्र को ग्रासरूट (grassroots) स्तर यानी गाँवों तक पहुँचाया।
यहाँ इसका विस्तृत और सरल विश्लेषण प्रस्तुत है।
पंचायती राज (Panchayati Raj)
परिभाषा:
पंचायती राज, ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (Rural Local Self-Government) की एक प्रणाली है। इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों को अपने स्थानीय मामलों के प्रशासन में सीधे तौर पर भाग लेने का अवसर प्रदान करना और विकास प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाना है।
संवैधानिक आधार:
- मूल संविधान में: संविधान के अनुच्छेद 40 (राज्य के नीति निदेशक तत्वों में) में यह निर्देश दिया गया था कि “राज्य, ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों।”
- यह एक गांधीवादी सिद्धांत था, लेकिन यह केवल एक निर्देश था, इसे लागू करने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं थी।
पंचायती राज का विकास: प्रमुख समितियाँ
आजादी के बाद, ग्रामीण विकास के लिए सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) शुरू किया गया, लेकिन यह असफल रहा। इसकी विफलता के कारणों की जाँच और स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के उपाय सुझाने के लिए कई महत्वपूर्ण समितियाँ बनाई गईं:
- बलवंत राय मेहता समिति (1957):
- सिफारिश: इसने “लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण” (Democratic Decentralization) की योजना प्रस्तुत की।
- त्रि-स्तरीय प्रणाली: इसने तीन-स्तरीय (Three-tier) पंचायती राज प्रणाली की स्थापना की सिफारिश की, जिसे आज भी भारत में लागू किया गया है:
- ग्राम स्तर पर – ग्राम पंचायत
- खंड (Block) स्तर पर – पंचायत समिति
- जिला स्तर पर – जिला परिषद
- इसी सिफारिश के आधार पर, 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत की पहली पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया गया।
- अशोक मेहता समिति (1977):
- इसने दो-स्तरीय (द्वि-स्तरीय) प्रणाली (मंडल पंचायत और जिला परिषद) की सिफारिश की।
- पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की बात कही।
- एल. एम. सिंघवी समिति (1986):
- यह सबसे महत्वपूर्ण समिति थी, जिसने दृढ़ता से सिफारिश की कि पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता दी जानी चाहिए ताकि वे प्रभावी ढंग से काम कर सकें।
73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
एल. एम. सिंघवी समिति की सिफारिशों के आधार पर, पी. वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने यह ऐतिहासिक संशोधन पारित किया, जो 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ। इसीलिए 24 अप्रैल को “राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस” मनाया जाता है।
इस संशोधन ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ
- नया भाग और अनुसूची:
- संविधान में एक नया भाग-IX जोड़ा गया, जिसका शीर्षक ‘पंचायत’ है (अनुच्छेद 243 से 243-O तक)।
- एक नई ग्यारहवीं अनुसूची (Eleventh Schedule) जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों को हस्तांतरित किए जा सकने वाले 29 कार्यात्मक विषय (Functional Items) शामिल हैं, जैसे – कृषि, ग्रामीण आवास, सड़कें, पेयजल, गरीबी उन्मूलन आदि।
- त्रि-स्तरीय प्रणाली की अनिवार्यता:
- इसने सभी राज्यों के लिए (जिनकी जनसंख्या 20 लाख से कम है, उन्हें छोड़कर) एक त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली स्थापित करना अनिवार्य कर दिया:
- ग्राम स्तर पर: ग्राम पंचायत
- मध्यवर्ती (खंड/तालुक) स्तर पर: पंचायत समिति
- जिला स्तर पर: जिला परिषद
- इसने सभी राज्यों के लिए (जिनकी जनसंख्या 20 लाख से कम है, उन्हें छोड़कर) एक त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली स्थापित करना अनिवार्य कर दिया:
- ग्राम सभा (Gram Sabha) (अनुच्छेद 243-A):
- ग्राम सभा को पंचायती राज की “नींव” और “आत्मा” के रूप में संवैधानिक मान्यता दी गई।
- ग्राम सभा में गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता (registered voters) शामिल होते हैं। यह प्रत्यक्ष लोकतंत्र का एक उदाहरण है।
- सदस्यों और अध्यक्षों का चुनाव:
- तीनों स्तरों पर सभी सीटों को प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरा जाएगा।
- मध्यवर्ती और जिला स्तर के अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाएगा। ग्राम पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित तरीके से होगा।
- सीटों का आरक्षण (Reservation of Seats) (अनुच्छेद 243-D):
- अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण (सदस्यों और अध्यक्षों, दोनों के पदों पर)।
- महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटों का आरक्षण (सदस्यों और अध्यक्षों, दोनों के पदों पर)। यह एक क्रांतिकारी कदम था।
- कार्यकाल (Tenure) (अनुच्छेद 243-E):
- सभी पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है।
- यदि कोई पंचायत समय से पहले भंग हो जाती है, तो 6 महीने के भीतर नए चुनाव कराना अनिवार्य है।
- राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) (अनुच्छेद 243-K):
- पंचायतों के सभी चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण के लिए प्रत्येक राज्य में एक स्वतंत्र राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना का प्रावधान।
- राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) (अनुच्छेद 243-I):
- राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष में एक राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाएगा, जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा और राज्य तथा पंचायतों के बीच करों के वितरण की सिफारिश करेगा।
निष्कर्ष:
73वें संशोधन ने भारत में सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। इसने न केवल स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की, बल्कि महिलाओं और वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने और निर्णय लेने का एक अभूतपूर्व अवसर भी प्रदान किया, जिससे भारतीय लोकतंत्र की जड़ें और अधिक गहरी हुईं।
पेसा अधिनियम, 1996 (PESA Act, 1996) भारतीय शासन व्यवस्था, विशेषकर आदिवासी स्वशासन के संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मील का पत्थर कानून है। यह 73वें संविधान संशोधन का एक विस्तार है।
यहाँ इसका विस्तृत और सरल विश्लेषण प्रस्तुत है।
पेसा अधिनियम, 1996 (PESA Act, 1996)
पूरा नाम:
पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996
(The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996)
पृष्ठभूमि:
- 73वाँ संविधान संशोधन (1992): इस संशोधन ने पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया, लेकिन इसके प्रावधान अनुच्छेद 244(1) और 244(2) के अंतर्गत आने वाले अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों पर सीधे तौर पर लागू नहीं होते थे।
- आवश्यकता: इन क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक शासन प्रणालियाँ थीं। यह महसूस किया गया कि सामान्य पंचायती राज व्यवस्था को इन क्षेत्रों पर थोपने से उनकी स्वायत्तता और पारंपरिक अधिकारों को नुकसान पहुँचेगा।
- भूरिया समिति: इसी संदर्भ में, दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया, जिसने इन क्षेत्रों के लिए एक विशेष कानून बनाने की सिफारिश की।
- अधिनियम का पारित होना: भूरिया समिति की सिफारिशों के आधार पर, संसद ने दिसंबर 1996 में पेसा अधिनियम पारित किया।
पेसा अधिनियम का मुख्य उद्देश्य
इसका मूल उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देना और उन्हें स्वशासन (Self-rule) के लिए सशक्त बनाना है। यह अधिनियम “कानून बनाने में लोगों की भागीदारी” (Participatory Democracy) के सिद्धांत को मूर्त रूप देता है।
गांधीवादी दर्शन: यह महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज्य’ के दर्शन के बहुत करीब है।
पेसा अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ और प्रावधान
पेसा अधिनियम, राज्य विधानमंडलों को यह निर्देश देता है कि वे अपने पंचायत कानूनों में इन क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान शामिल करें जो निम्नलिखित सिद्धांतों के अनुरूप हों:
1. पारंपरिक व्यवस्था को मान्यता:
- राज्य का पंचायत कानून इन क्षेत्रों की प्रथागत कानूनों, सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाओं, और सामुदायिक संसाधनों के पारंपरिक प्रबंधन की प्रणालियों के अनुरूप होगा।
2. ग्राम सभा को अत्यधिक शक्तिशाली बनाना:
- पेसा के तहत “ग्राम सभा” (Gram Sabha) को सबसे शक्तिशाली और केंद्रीय इकाई बनाया गया है। इसमें एक गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता सदस्य होते हैं।
- ग्राम सभा की अनिवार्य शक्तियाँ:
- परामर्श का अधिकार: किसी भी विकास परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण करने से पहले या इन क्षेत्रों में लोगों के पुनर्वास से पहले ग्राम सभा से अनिवार्य रूप से परामर्श किया जाएगा।
- प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण: लघु वनोपज (Minor Forest Produce), लघु जल निकायों और लघु खनिजों (जैसे रेत) के प्रबंधन का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है।
- सामाजिक क्षेत्र पर नियंत्रण: अपने क्षेत्र में आने वाली सामाजिक संस्थाओं (जैसे स्कूल, अस्पताल) पर नियंत्रण रखने की शक्ति।
- योजनाओं की स्वीकृति: ग्राम पंचायतों द्वारा लागू की जाने वाली सामाजिक और आर्थिक विकास की योजनाओं और कार्यक्रमों को स्वीकृति देने का अधिकार।
- हितग्राहियों का चयन: गरीबी उन्मूलन और अन्य सरकारी कार्यक्रमों के तहत लाभार्थियों की पहचान करने और उनका चयन करने का अधिकार।
3. आरक्षण (Reservation):
- अनुसूचित क्षेत्रों में, पंचायतों के सभी स्तरों पर अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में होगा, और यह आरक्षण कुल सीटों के कम से कम आधे (50%) से कम नहीं होगा।
- पंचायतों के सभी स्तरों पर अध्यक्षों (Chairpersons) के पद भी अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित रहेंगे।
4. विवाद समाधान:
- ग्राम सभा को पारंपरिक तरीकों से विवादों का समाधान करने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की शक्ति दी गई है।
5. साहूकारी पर नियंत्रण:
- ग्राम सभा को अनुसूचित जनजातियों को दिए जाने वाले ऋण (साहूकारी) को नियंत्रित करने का अधिकार है।
पेसा अधिनियम का महत्व (Significance of PESA Act)
- संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा: यह आदिवासी समुदायों के पारंपरिक और प्रथागत अधिकारों को कानूनी मान्यता और सुरक्षा प्रदान करता है।
- जल, जंगल और ज़मीन पर अधिकार: यह “जल, जंगल, ज़मीन” पर आदिवासियों के अधिकारों को स्वीकार करता है, जो उनकी आजीविका का मुख्य आधार हैं।
- शोषण से बचाव: यह बाहरी शोषण (जैसे साहूकारों और ठेकेदारों द्वारा) को रोकने में मदद करता है।
- विकास में भागीदारी: यह विकास की प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक और सहभागी बनाता है, क्योंकि कोई भी बड़ा फैसला अब ग्राम सभा की सहमति के बिना नहीं लिया जा सकता।
- सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण: यह अधिनियम आदिवासी समुदायों को अपनी अनूठी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक शासन प्रणालियों को संरक्षित करने में सक्षम बनाता है।
चुनौतियाँ (Challenges in Implementation)
- राज्यों की अनिच्छा: कई राज्यों ने अभी तक पेसा के प्रावधानों के अनुरूप अपने राज्य पंचायत कानूनों में पूरी तरह से संशोधन नहीं किया है।
- जागरूकता का अभाव: कई आदिवासी समुदायों को अभी भी पेसा के तहत अपने अधिकारों की पूरी जानकारी नहीं है।
- प्रशासनिक उदासीनता: नौकरशाही अक्सर ग्राम सभा को शक्तियाँ हस्तांतरित करने में हिचकिचाती है।
- कानूनी अस्पष्टता: ‘लघु वनोपज’ और ‘लघु खनिज’ जैसे शब्दों की परिभाषा को लेकर अक्सर विवाद होता है।
निष्कर्ष:
पेसा अधिनियम, 1996 आदिवासी स्वशासन और सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कानून है। यह न केवल उनके संवैधानिक अधिकारों को मान्यता देता है, बल्कि विकास की एक ऐसी रूपरेखा प्रस्तुत करता है जिसमें निर्णय लेने की शक्ति बाहरी संस्थाओं के बजाय स्थानीय समुदाय के हाथों में होती है। हालांकि इसके कार्यान्वयन में कई चुनौतियाँ हैं, फिर भी यह भारत में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है।
शहरी स्थानीय स्वशासन: नगरपालिकाएँ (Urban Local Self-Government: Municipalities)
परिभाषा:
नगरपालिकाएँ शहरी क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ होती हैं। इनका उद्देश्य शहरी निवासियों को स्थानीय स्तर पर शासन में भाग लेने का अवसर देना और नागरिक सुविधाएँ (जैसे- सड़क, पानी, सफाई) प्रदान करना है।
संवैधानिक दर्जा:
- शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से दिया गया। यह अधिनियम 1 जून, 1993 को लागू हुआ।
- इसने शहरी शासन को एक संवैधानिक आधार और सुरक्षा प्रदान की।
74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
इस संशोधन ने भारत में शहरी स्थानीय शासन की नींव को मजबूत किया।
संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ
- नया भाग और अनुसूची:
- संविधान में एक नया भाग IX-A (9-क) जोड़ा गया, जिसका शीर्षक ‘नगरपालिकाएँ’ है (अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक)।
- एक नई बारहवीं अनुसूची (Twelfth Schedule) जोड़ी गई, जिसमें नगरपालिकाओं के 18 कार्यात्मक विषय (Functional Items) शामिल हैं, जैसे – शहरी नियोजन, सड़कें और पुल, जल आपूर्ति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई, झुग्गी सुधार, पार्कों का रखरखाव, जन्म और मृत्यु का पंजीकरण आदि।
- तीन प्रकार की नगरपालिकाओं का गठन (अनुच्छेद 243-Q):
- इसने हर राज्य में तीन प्रकार के शहरी स्थानीय निकायों की स्थापना को अनिवार्य कर दिया, जो क्षेत्र की प्रकृति पर आधारित हैं:
- नगर पंचायत (Nagar Panchayat): ग्रामीण से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहे क्षेत्रों के लिए। (छोटे शहर)
- नगर पालिका परिषद (Municipal Council): छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए।
- नगर निगम (Municipal Corporation): बड़े शहरी क्षेत्रों (जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ) के लिए।
- इसने हर राज्य में तीन प्रकार के शहरी स्थानीय निकायों की स्थापना को अनिवार्य कर दिया, जो क्षेत्र की प्रकृति पर आधारित हैं:
- संरचना और चुनाव:
- नगरपालिका के सभी सदस्यों (पार्षदों) का चुनाव उस क्षेत्र के लोगों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है।
- अध्यक्ष (मेयर/चेयरपर्सन) के चुनाव का तरीका राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित किया जाता है।
- वार्ड समितियाँ (Wards Committees):
- 3 लाख या उससे अधिक की जनसंख्या वाली नगरपालिकाओं में एक या अधिक वार्डों को मिलाकर वार्ड समितियों का गठन करना अनिवार्य है।
- सीटों का आरक्षण (Reservation of Seats) (अनुच्छेद 243-T):
- अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण।
- महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (1/3) सीटों का आरक्षण (सदस्यों और अध्यक्षों, दोनों के पदों पर)।
- कार्यकाल (Tenure) (अनुच्छेद 243-U):
- सभी नगरपालिकाओं का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है।
- यदि कोई नगरपालिका समय से पहले भंग हो जाती है, तो 6 महीने के भीतर नए चुनाव कराना अनिवार्य है।
- राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) (अनुच्छेद 243-ZA):
- पंचायतों की तरह ही, नगरपालिकाओं के चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण के लिए भी राज्य निर्वाचन आयोग जिम्मेदार होगा।
- राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) (अनुच्छेद 243-Y):
- राज्यपाल द्वारा गठित राज्य वित्त आयोग, नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा करेगा और उनकी वित्तीय मजबूती के लिए सिफारिशें देगा।
- जिला योजना समिति (District Planning Committee – DPC):
- यह संशोधन प्रत्येक जिले में एक जिला योजना समिति के गठन को अनिवार्य करता है।
- इसका कार्य जिले की पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को समेकित (consolidate) करना और पूरे जिले के लिए एक विकास योजना का मसौदा तैयार करना है।
नगर निगम (Municipal Corporation)
नगर निगम, शहरी स्थानीय स्वशासन का शीर्ष स्तर है जो बड़े महानगरीय शहरों में स्थापित किया जाता है।
नगर निगम की संरचना:
नगर निगम के तीन मुख्य अंग होते हैं:
- परिषद (The Council):
- यह नगर निगम का विधायी अंग (legislative wing) है।
- इसमें सीधे जनता द्वारा चुने गए पार्षद (Councillors) होते हैं।
- परिषद का प्रमुख महापौर या मेयर (Mayor) होता है, जिसकी सहायता के लिए एक उपमहापौर (Deputy Mayor) भी होता है। मेयर का चुनाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हो सकता है, जैसा कि राज्य सरकार निर्धारित करे।
- स्थायी समितियाँ (Standing Committees):
- ये परिषद के काम को आसान बनाने और विभिन्न क्षेत्रों (जैसे- जल आपूर्ति, सार्वजनिक निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा) पर विस्तृत विचार-विमर्श के लिए बनाई जाती हैं। ये समितियाँ नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- नगर आयुक्त (Municipal Commissioner):
- यह नगर निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (Chief Executive Officer) होता है।
- वह एक वरिष्ठ IAS अधिकारी होता है, जिसे राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।
- उसका मुख्य कार्य परिषद द्वारा लिए गए निर्णयों और नीतियों को लागू करना होता है। वह निगम के दिन-प्रतिदिन के प्रशासन के लिए जिम्मेदार होता है।
शक्ति का पृथक्करण: नगर निगम में विधायी शक्तियाँ (नीति बनाना) परिषद और स्थायी समितियों (निर्वाचित विंग) में निहित होती हैं, जबकि कार्यकारी शक्तियाँ (नीति लागू करना) नगर आयुक्त (प्रशासनिक विंग) में निहित होती हैं।
निष्कर्ष:
74वें संशोधन ने शहरी क्षेत्रों में एक व्यवस्थित, लोकतांत्रिक और सशक्त स्थानीय शासन की नींव रखी। नगर निगम जैसे निकाय आज भारत के बड़े शहरों के विकास, योजना और नागरिक सुविधाओं के प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।
केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations)
केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations) भारतीय संघवाद (Indian Federalism) की धुरी है। संविधान ने देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का एक विस्तृत और स्पष्ट विभाजन किया है।
इन संबंधों का अध्ययन तीन प्रमुख शीर्षकों के अंतर्गत किया जाता है:
- विधायी संबंध (Legislative Relations)
- प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations)
- वित्तीय संबंध (Financial Relations)
1. विधायी संबंध (Legislative Relations)
ये संबंध कानून बनाने की शक्तियों के विभाजन से संबंधित हैं। संविधान के भाग-11 में अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंधों का वर्णन है।
क्षेत्रीय विस्तार (Territorial Extent)
- संसद: भारत के पूरे राज्य क्षेत्र या उसके किसी भी भाग के लिए कानून बना सकती है। संसद के कानून भारतीय नागरिकों और उनकी संपत्ति पर, चाहे वे दुनिया में कहीं भी हों, लागू होते हैं।
- राज्य विधानमंडल: केवल अपने राज्य के भीतर या उसके किसी हिस्से के लिए ही कानून बना सकता है।
शक्तियों का विषय-वार वितरण (Distribution of Subjects)
- संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) में केंद्र और राज्यों के बीच विषयों का तीन सूचियों में स्पष्ट विभाजन किया गया है:
| सूची का नाम | विवरण | प्रमुख विषय |
| (i) संघ सूची (Union List) | इस पर केवल संसद कानून बना सकती है। इसमें 100 विषय (मूल रूप से 97) हैं। | रक्षा, विदेशी मामले, युद्ध और शांति, मुद्रा, बैंकिंग, रेलवे, जनगणना। |
| (ii) राज्य सूची (State List) | इस पर सामान्यतः केवल राज्य विधानमंडल ही कानून बना सकता है। इसमें 61 विषय (मूल रूप से 66) हैं। | पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, जेल, स्थानीय शासन। |
| (iii) समवर्ती सूची (Concurrent List) | इस पर संसद और राज्य विधानमंडल, दोनों कानून बना सकते हैं। इसमें 52 विषय (मूल रूप से 47) हैं। | शिक्षा, वन, विवाह और तलाक, आपराधिक कानून, बिजली। |
टकराव की स्थिति: यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर केंद्र और राज्य के कानूनों में टकराव होता है, तो केंद्र का कानून ही मान्य होगा (अनुच्छेद 254)।- अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary Powers): जो विषय किसी भी सूची में शामिल नहीं हैं, उन पर कानून बनाने की शक्ति संसद के पास है (अनुच्छेद 248)।
राज्य सूची पर संसदीय विधान
कुछ विशेष परिस्थितियों में, संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है, जो केंद्र की श्रेष्ठता को दर्शाता है:
- जब राज्यसभा प्रस्ताव पारित करे (अनुच्छेद 249): यदि राज्यसभा अपने विशेष बहुमत से यह प्रस्ताव पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक है।
- राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान (अनुच्छेद 352): आपातकाल लागू होने पर संसद को राज्य सूची के किसी भी विषय पर कानून बनाने की शक्ति मिल जाती है।
- राज्यों की सहमति से (अनुच्छेद 252): यदि दो या दो से अधिक राज्य विधानमंडल यह अनुरोध करें।
- अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए (अनुच्छेद 253):
- राष्ट्रपति शासन के दौरान (अनुच्छेद 356):
2. प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations)
इन संबंधों का तात्पर्य केंद्र और राज्यों की कार्यकारी शक्तियों के प्रयोग से है। इनका वर्णन संविधान के भाग-11 में अनुच्छेद 256 से 263 तक किया गया है।
शक्तियों का वितरण
- केंद्र की कार्यकारी शक्ति: उन सभी विषयों तक विस्तृत है जिन पर संसद को कानून बनाने की शक्ति है।
- राज्य की कार्यकारी शक्ति: उन सभी विषयों तक विस्तृत है जिन पर राज्य विधानमंडल को कानून बनाने की शक्ति है।
राज्यों पर केंद्र का नियंत्रण
संविधान ने केंद्र को राज्यों पर कुछ प्रशासनिक नियंत्रण भी दिए हैं ताकि एक सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था बनी रहे:
- अनुच्छेद 256: प्रत्येक राज्य की कार्यकारी शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा कि वह संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करे।
- अनुच्छेद 257: प्रत्येक राज्य अपनी कार्यकारी शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करेगा कि वह संघ की कार्यकारी शक्ति के प्रयोग में कोई बाधा न उत्पन्न करे।
- केंद्र द्वारा राज्यों को निर्देश: केंद्र, राज्यों को राष्ट्रीय महत्व या सैन्य महत्व की संचार प्रणालियों का निर्माण और रखरखाव करने के लिए निर्देश दे सकता है।
सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने वाले तंत्र
- अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services) (अनुच्छेद 312): IAS, IPS, IFS के अधिकारी केंद्र द्वारा भर्ती किए जाते हैं, लेकिन राज्यों में अपनी सेवाएँ देते हैं। ये केंद्र और राज्यों के बीच एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कड़ी हैं।
- अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) (अनुच्छेद 263): इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच तथा राज्यों के आपसी सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।
- सार्वजनिक अधिनियमों और न्यायिक कार्यवाहियों को मान्यता (अनुच्छेद 261):
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (अनुच्छेद 262): संसद ऐसे विवादों के समाधान के लिए कानून बना सकती है।
3. वित्तीय संबंध (Financial Relations)
वित्तीय संबंध, केंद्र और राज्यों के बीच कर लगाने और राजस्व के वितरण की व्यवस्था से संबंधित हैं। इनका वर्णन संविधान के भाग-12 में अनुच्छेद 268 से 293 तक किया गया है।
कर-अधिकारों का विभाजन (Division of Taxing Powers)
- संसद: संघ सूची में उल्लिखित विषयों पर कर लगा सकती है (जैसे- आयकर, सीमा शुल्क, निगम कर)।
- राज्य विधानमंडल: राज्य सूची में उल्लिखित विषयों पर कर लगा सकता है (जैसे- कृषि आय पर कर, भूमि राजस्व, शराब पर कर)।
- दोनों: समवर्ती सूची में कोई प्रमुख कर विषय नहीं है।
- GST (101वां संशोधन): इसने केंद्र और राज्यों के कई अप्रत्यक्ष करों को एक ही कर में एकीकृत कर दिया है।
राजस्व का वितरण
- केंद्र द्वारा लगाए गए और वसूले गए कुछ करों से प्राप्त राजस्व को केंद्र और राज्यों के बीच वितरित किया जाता है।
- इस वितरण की सिफारिश वित्त आयोग (Finance Commission) द्वारा की जाती है।
राज्यों को सहायता अनुदान (Grants-in-aid to the States)
संसद, आवश्यकता पड़ने पर राज्यों को सहायता के लिए अनुदान (Grants) प्रदान करती है:
- विधिक अनुदान (Statutory Grants) (अनुच्छेद 275): वित्त आयोग की सिफारिश पर उन राज्यों को दिया जाता है जिन्हें वित्तीय सहायता की आवश्यकता हो।
- विवेकाधीन अनुदान (Discretionary Grants) (अनुच्छेद 282): केंद्र किसी भी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किसी भी राज्य को यह अनुदान दे सकता है। योजना आयोग (अब नीति आयोग) के माध्यम से दिए जाने वाले अनुदान इसी के तहत आते थे।
वित्त आयोग (Finance Commission) – अनुच्छेद 280
- यह एक संवैधानिक निकाय है जिसका गठन राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष में किया जाता है।
- मुख्य कार्य:
- केंद्र और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के वितरण की सिफारिश करना।
- राज्यों को दिए जाने वाले सहायता अनुदान के सिद्धांतों की सिफारिश करना।
निष्कर्ष:
भारतीय संविधान ने केंद्र-राज्य संबंधों में सहयोगपूर्ण संघवाद (Cooperative Federalism) की स्थापना का प्रयास किया है, लेकिन इसमें केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है ताकि देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित हो सके।
अंतर-राज्यीय संबंध (Inter-State Relations)
अंतर-राज्यीय संबंधों को चार मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है:
- अंतर-राज्यीय जल विवाद (Inter-State Water Disputes)
- अंतर-राज्यीय परिषदें (Inter-State Councils)
- पारस्परिक मान्यता (Mutual Recognition) – लोक अधिनियम, अभिलेख और न्यायिक कार्यवाहियाँ
- अंतर-राज्यीय व्यापार, वाणिज्य और समागम (Inter-State Trade, Commerce and Intercourse)
1. अंतर-राज्यीय जल विवाद (Inter-State Water Disputes)
- संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 262: यह अनुच्छेद संसद को अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल के प्रयोग, वितरण और नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद के समाधान के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है।
- इसी अनुच्छेद के तहत, संसद यह भी प्रावधान कर सकती है कि ऐसे किसी भी विवाद में न तो उच्चतम न्यायालय और न ही कोई अन्य न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करेगा।
- संसद द्वारा बनाए गए कानून:
इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने दो महत्वपूर्ण कानून बनाए हैं:- नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956): यह केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विकास और विनियमन के लिए नदी बोर्ड स्थापित करने का अधिकार देता है।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State Water Disputes Act, 1956):
- यह केंद्र सरकार को किसी विशेष अंतर-राज्यीय जल विवाद के समाधान के लिए एक अस्थायी न्यायाधिकरण (Ad-hoc Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
- इस न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम और विवाद के सभी पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
- महत्वपूर्ण बात यह है कि एक बार जब विवाद न्यायाधिकरण को सौंप दिया जाता है, तो उच्चतम न्यायालय सहित कोई भी अन्य न्यायालय इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
- प्रमुख जल विवाद न्यायाधिकरण: कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण, गोदावरी जल विवाद न्यायाधिकरण, नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण आदि।
2. अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council)
- संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 263: यह राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि यदि उन्हें लगता है कि ऐसा करना सार्वजनिक हित में है, तो वह एक अंतर-राज्यीय परिषद का गठन कर सकते हैं।
- उद्देश्य:
- राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की जाँच करना और उन पर सलाह देना।
- केंद्र और राज्यों, या कई राज्यों के साझा हितों से संबंधित विषयों पर अन्वेषण और विचार-विमर्श करना।
- नीतियों और कार्यों के बेहतर समन्वय के लिए सिफारिशें करना।
- स्थापना:
- सरकारिया आयोग की सिफारिशों के आधार पर, 1990 में पहली बार राष्ट्रपति के आदेश से एक स्थायी अंतर-राज्यीय परिषद की स्थापना की गई।
- संरचना:
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- सदस्य:
- सभी राज्यों के मुख्यमंत्री।
- विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री।
- उन केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासक जहाँ विधानसभा नहीं है।
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित 6 केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (गृह मंत्री सहित)।
- भूमिका:
- यह सलाहकारी प्रकृति का एक निकाय है, जो सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण मंच है।
3. पारस्परिक मान्यता (Mutual Recognition)
- पूर्ण विश्वास और मान्यता खंड (Full Faith and Credit Clause):
- अनुच्छेद 261: इसके अनुसार, “भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र, संघ की तथा प्रत्येक राज्य की लोक अधिनियमों, अभिलेखों तथा न्यायिक कार्यवाहियों को पूरा विश्वास और पूरी मान्यता दी जाएगी।”
- सरल शब्दों में: इसका मतलब है कि एक राज्य द्वारा बनाए गए कानून (सिविल) और न्यायिक निर्णय (जैसे अदालत का आदेश) देश के अन्य सभी राज्यों में मान्य और लागू करने योग्य होंगे। (यह प्रावधान केवल दीवानी निर्णयों पर लागू होता है, आपराधिक निर्णयों पर नहीं)।
4. अंतर-राज्यीय व्यापार, वाणिज्य और समागम (Inter-State Trade, Commerce and Intercourse)
- संवैधानिक प्रावधान:
- संविधान के भाग-13 में अनुच्छेद 301 से 307 तक भारत के पूरे क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और आवागमन की स्वतंत्रता से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
- अनुच्छेद 301: यह घोषित करता है कि “संपूर्ण भारत के राज्य क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और समागम अबाध (free) होगा।”
- उद्देश्य:
- राज्यों के बीच व्यापारिक बाधाओं को दूर करना और पूरे देश को एकल बाजार (single market) के रूप में स्थापित करना।
- प्रतिबंध (Exceptions):
- यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है।
- संसद, सार्वजनिक हित में, राज्यों के बीच व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकती है (अनुच्छेद 302)। लेकिन संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो एक राज्य को दूसरे पर वरीयता दे या राज्यों के बीच भेदभाव करे (कुछ अपवादों को छोड़कर)।
- राज्य विधानमंडल भी सार्वजनिक हित में, अपने राज्य के भीतर व्यापार पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है, लेकिन ऐसा विधेयक विधानसभा में प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है (अनुच्छेद 304)।
क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)
ये संवैधानिक निकाय नहीं हैं।
इनका गठन संसद द्वारा बनाए गए एक अधिनियम—राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956—के तहत किया गया था।
इस अधिनियम ने देश को पांच क्षेत्रों (उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी) में विभाजित किया और प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक क्षेत्रीय परिषद की स्थापना की।
उद्देश्य: राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देना।
संरचना:
अध्यक्ष: केंद्रीय गृह मंत्री।
उपाध्यक्ष: क्षेत्र के प्रत्येक राज्य का मुख्यमंत्री, बारी-बारी से (rotationally) एक वर्ष के लिए।
सदस्य: क्षेत्र के सभी मुख्यमंत्री और प्रत्येक राज्य से दो अन्य मंत्री।
आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन प्रावधानों का विस्तृत वर्णन किया गया है।
स्रोत:
इन प्रावधानों को जर्मनी के वाइमर संविधान (Weimar Constitution of Germany) से लिया गया है।
उद्देश्य:
इन प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य देश पर आने वाले आंतरिक या बाहरी खतरों का सामना करना है। आपातकाल के दौरान, देश का संघीय ढाँचा (Federal Structure) औपचारिक रूप से संशोधित हुए बिना ही एकात्मक ढाँचे (Unitary Structure) में परिवर्तित हो जाता है।
संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल का उल्लेख है:
1. राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) – अनुच्छेद 352
उद्घोषणा का आधार:
राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तब कर सकते हैं जब उन्हें यह समाधान हो जाए कि युद्ध (war), बाह्य आक्रमण (external aggression) या सशस्त्र विद्रोह (armed rebellion) के कारण भारत या उसके किसी हिस्से की सुरक्षा खतरे में है।
- मूल संविधान में ‘सशस्त्र विद्रोह’ की जगह ‘आंतरिक अशांति’ (internal disturbance) शब्द था।
- 44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को हटा दिया गया क्योंकि यह बहुत अस्पष्ट था और इसका दुरुपयोग (1975 में) किया गया था। अब केवल ‘सशस्त्र विद्रोह’ के आधार पर ही आंतरिक आपातकाल लगाया जा सकता है।
संसदीय अनुमोदन और अवधि:
- आपातकाल की उद्घोषणा के एक महीने के भीतर इसका संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से अनुमोदित होना अनिवार्य है।
- एक बार अनुमोदित होने पर, आपातकाल छह महीने तक जारी रहता है।
- इसे हर छह महीने पर संसद के विशेष बहुमत से अनुमोदन लेकर अनिश्चित काल तक बढ़ाया जा सकता है।
- उद्घोषणा को राष्ट्रपति द्वारा कभी भी वापस लिया जा सकता है। इसे वापस लेने के लिए संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।
प्रभाव (Effects of National Emergency):
- केंद्र-राज्य संबंधों पर:
- कार्यकारी: राज्य सरकारें केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाती हैं।
- विधायी: संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है।
- वित्तीय: राष्ट्रपति केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के वितरण को संशोधित कर सकते हैं।
- लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल पर:
- लोकसभा का कार्यकाल एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है (इसे कितनी भी बार बढ़ाया जा सकता है)।
- मौलिक अधिकारों पर (सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव):
- अनुच्छेद 358: जैसे ही राष्ट्रीय आपातकाल (युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर) की घोषणा होती है, अनुच्छेद 19 के तहत दिए गए छह मौलिक अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं।
- अनुच्छेद 359: राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वह एक आदेश द्वारा अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर, अन्य किसी भी मौलिक अधिकार के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबित कर सकें। (44वें संशोधन के बाद, अनुच्छेद 20 और 21 को कभी निलंबित नहीं किया जा सकता)।
अब तक का प्रयोग: भारत में अब तक तीन बार राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया है:
- 1962 (चीन आक्रमण)
- 1971 (पाकिस्तान आक्रमण)
- 1975 (आंतरिक अशांति के आधार पर)
2. राज्यों में राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) – अनुच्छेद 356
इसे ‘राज्य आपातकाल’ (State Emergency) या ‘संवैधानिक आपातकाल’ (Constitutional Emergency) भी कहा जाता है।
उद्घोषणा का आधार:
अनुच्छेद 356 के तहत, राष्ट्रपति किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं, यदि वे इस बात से संतुष्ट हों कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता।
- यह उद्घोषणा राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर या उनके बिना भी की जा सकती है।
संसदीय अनुमोदन और अवधि:
- उद्घोषणा के दो महीने के भीतर इसका संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदित होना आवश्यक है।
- एक बार अनुमोदित होने पर, यह छह महीने तक जारी रहता है।
- इसे प्रत्येक छह महीने पर संसद के अनुमोदन से अधिकतम तीन वर्ष की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है।
प्रभाव:
- राष्ट्रपति राज्य सरकार के सभी या कुछ कार्यों को अपने हाथ में ले लेते हैं।
- राज्य की विधानसभा को भंग या निलंबित कर दिया जाता है।
- राज्य का शासन राष्ट्रपति की ओर से राज्यपाल चलाता है, जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त सलाहकारों की सहायता लेता है।
- संसद, राज्य के लिए कानून बना सकती है और राज्य के बजट को पारित कर सकती है।
- मौलिक अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
3. वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) – अनुच्छेद 360
उद्घोषणा का आधार:
यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हैं कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके किसी क्षेत्र की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा है, तो वह वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं।
संसदीय अनुमोदन और अवधि:
- उद्घोषणा के दो महीने के भीतर संसद के साधारण बहुमत से इसका अनुमोदन आवश्यक है।
- एक बार अनुमोदित होने पर, यह अनिश्चित काल तक प्रभावी रहता है जब तक कि इसे राष्ट्रपति द्वारा वापस नहीं ले लिया जाता। इसे बार-बार अनुमोदित करने की आवश्यकता नहीं होती।
प्रभाव:
- केंद्र, राज्यों को वित्तीय मामलों पर निर्देश दे सकता है।
- राज्यों के सभी धन विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित किया जा सकता है।
- राष्ट्रपति, केंद्र और राज्यों के कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कटौती का निर्देश दे सकते हैं, जिसमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी शामिल हैं।
अब तक का प्रयोग: भारत में अब तक कभी भी वित्तीय आपातकाल नहीं लगाया गया है।
निष्कर्ष: आपातकालीन प्रावधान संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता को दर्शाते हैं, जो देश को असाधारण संकटों से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। हालांकि, अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के राजनीतिक दुरुपयोग ने इसकी आलोचना को भी जन्म दिया है।
केंद्रशासित प्रदेश (The Union Territories)
परिभाषा:
केंद्रशासित प्रदेश भारत के वे संघीय क्षेत्र हैं जिन पर सीधे केंद्र सरकार का नियंत्रण और प्रशासन होता है। ये राज्यों से भिन्न होते हैं, जिनकी अपनी चुनी हुई सरकारें होती हैं।
ये क्षेत्र “केंद्र द्वारा शासित क्षेत्र” होते हैं, इसीलिए इन्हें ‘केंद्रशासित प्रदेश’ कहा जाता है।
संवैधानिक प्रावधान:
- संविधान के भाग-8 में अनुच्छेद 239 से 241 तक केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है।
- अनुच्छेद 1 के तहत, भारत को ‘राज्यों का संघ’ बताया गया है, और भारत के क्षेत्र में राज्य, केंद्रशासित प्रदेश और अर्जित किए गए क्षेत्र शामिल हैं।
केंद्रशासित प्रदेशों का गठन क्यों किया गया?
राज्यों के अलावा इन अलग प्रशासनिक इकाइयों को बनाने के पीछे कई विशिष्ट कारण थे:
- राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व:
- दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी) और चंडीगढ़ (दो राज्यों की संयुक्त राजधानी)। इन महत्वपूर्ण शहरों पर किसी एक राज्य का पूर्ण नियंत्रण न हो, इसलिए इन्हें सीधे केंद्र के अधीन रखा गया।
- सांस्कृतिक विशिष्टता:
- पुडुचेरी, दादरा और नगर हवेली, और दमन और दीव। ये क्षेत्र पूर्व में फ्रांसीसी और पुर्तगाली उपनिवेश थे। इनकी विशिष्ट संस्कृति और विरासत को संरक्षित करने के लिए इन्हें अलग इकाई बनाया गया।
- सामरिक और रणनीतिक महत्व:
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप। ये भारत की मुख्य भूमि से दूर स्थित हैं और देश की सुरक्षा के लिए इनका रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है, इसलिए इन पर सीधा केंद्रीय नियंत्रण आवश्यक है।
- पिछड़े और आदिवासी लोगों के विशेष उपचार:
- मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश जैसे कुछ क्षेत्र केंद्रशासित प्रदेश थे, जिन्हें बाद में पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया ताकि उनके विशिष्ट हितों की रक्षा की जा सके।
- विशेष परिस्थितियों के कारण:
- जम्मू और कश्मीर और लद्दाख का गठन जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत किया गया। राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक परिस्थितियों को देखते हुए इन्हें केंद्र के सीधे प्रशासन में लाया गया।
वर्तमान में भारत के केंद्रशासित प्रदेश (As of 2024)
वर्तमान में भारत में 8 केंद्रशासित प्रदेश हैं:
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
- चंडीगढ़
- दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव
(2020 में इन दोनों को मिलाकर एक कर दिया गया) - दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)
- जम्मू और कश्मीर
- लद्दाख
- लक्षद्वीप
- पुडुचेरी
केंद्रशासित प्रदेशों का प्रशासन (Administration of Union Territories)
- अनुच्छेद 239 के अनुसार, प्रत्येक केंद्रशासित प्रदेश का प्रशासन भारत के राष्ट्रपति द्वारा चलाया जाता है।
- राष्ट्रपति इस कार्य के लिए एक प्रशासक (Administrator) की नियुक्ति करते हैं, जो राष्ट्रपति के एक एजेंट के रूप में कार्य करता है, न कि राज्यपाल की तरह राज्य का प्रमुख।
- प्रशासक का पदनाम:
- कुछ केंद्रशासित प्रदेशों (जैसे दिल्ली, पुडुचेरी, अंडमान और निकोबार, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख) में प्रशासक को ‘उपराज्यपाल’ (Lieutenant Governor) कहा जाता है।
- अन्य में (जैसे चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव, लक्षद्वीप) उन्हें ‘मुख्य आयुक्त’ (Chief Commissioner) या केवल ‘प्रशासक’ (Administrator) कहा जाता है।
विधानमंडल वाले केंद्रशासित प्रदेश
हालांकि केंद्रशासित प्रदेशों पर केंद्र का शासन होता है, लेकिन संविधान ने कुछ के लिए विधानसभा और मंत्रिपरिषद की व्यवस्था भी की है ताकि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बना रहे।
- अनुच्छेद 239A: इसने संसद को पुडुचेरी के लिए एक विधानमंडल और मंत्रिपरिषद बनाने का अधिकार दिया।
- अनुच्छेद 239AA: 69वें संविधान संशोधन, 1991 द्वारा दिल्ली को एक विशेष दर्जा दिया गया और उसे ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली’ (National Capital Territory of Delhi) बनाया गया, जहाँ एक विधानसभा और मंत्रिपरिषद की स्थापना की गई।
- जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत जम्मू और कश्मीर में भी विधानसभा का प्रावधान किया गया है (लद्दाख में नहीं)।
वर्तमान में 3 केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा है:
- पुडुचेरी
- दिल्ली
- जम्मू और कश्मीर
विधानसभा वाले UTs की शक्तियाँ:
- इन विधानसभाओं को राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार होता है।
- दिल्ली का अपवाद: दिल्ली की विधानसभा पुलिस, लोक व्यवस्था और भूमि (तीन विषयों) पर कानून नहीं बना सकती। ये मामले सीधे केंद्र सरकार के अधीन हैं।
कानून बनाने की संसद की शक्ति
- अनुच्छेद 240 के अनुसार, राष्ट्रपति को अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव की शांति, प्रगति और सुशासन के लिए नियम बनाने की शक्ति है।
- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संसद सभी 8 केंद्रशासित प्रदेशों के लिए तीनों सूचियों (संघ, राज्य और समवर्ती) के किसी भी विषय पर कानून बना सकती है। संसद की यह शक्ति सर्वोच्च है।
केंद्रशासित प्रदेशों के लिए उच्च न्यायालय
अन्य केंद्रशासित प्रदेश विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं (जैसे- अंडमान और निकोबार, कलकत्ता उच्च न्यायालय के अधीन)।
अनुच्छेद 241 के तहत, संसद कानून द्वारा किसी भी केंद्रशासित प्रदेश के लिए एक उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है या उसे किसी पड़ोसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में रख सकती है।
दिल्ली एकमात्र केंद्रशासित प्रदेश है जिसका अपना उच्च न्यायालय (High Court) है।
जम्मू और कश्मीर और लद्दाख का एक साझा उच्च न्यायालय है।
अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्र (Scheduled and Tribal Areas)
परिभाषा:
ये भारत के वे क्षेत्र हैं जहाँ अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) की बड़ी आबादी निवास करती है। इन क्षेत्रों की पहचान उनके सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन, विशिष्ट संस्कृति और पारंपरिक स्वशासन प्रणालियों के आधार पर की जाती है।
संविधान इन क्षेत्रों के लिए एक विशेष प्रशासनिक व्यवस्था का प्रावधान करता है ताकि वहाँ के आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा की जा सके और उन्हें बाहरी शोषण से बचाया जा सके।
संवैधानिक प्रावधान:
- संविधान के भाग-10 में अनुच्छेद 244 के तहत इन क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष उपबंध किए गए हैं।
- इन क्षेत्रों से संबंधित विस्तृत प्रशासनिक प्रावधान पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची में दिए गए हैं।
1. पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule)
लागू क्षेत्र:
पाँचवीं अनुसूची के प्रावधान असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर भारत के लगभग सभी अन्य राज्यों में स्थित “अनुसूचित क्षेत्रों” (Scheduled Areas) के प्रशासन और नियंत्रण पर लागू होते हैं।
- वर्तमान में, यह 10 राज्यों में लागू है: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान।
पाँचवीं अनुसूची की प्रमुख विशेषताएँ
(क) क्षेत्रों की घोषणा:
- राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह किसी भी क्षेत्र को “अनुसूचित क्षेत्र” घोषित कर सके। वह राज्यपाल से परामर्श के बाद किसी भी अनुसूचित क्षेत्र की सीमाओं में परिवर्तन कर सकता है या उसे समाप्त कर सकता है।
(ख) कार्यकारी शक्ति का विस्तार:
- केंद्र सरकार, राज्यों को इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में निर्देश दे सकती है।
(ग) राज्यपाल की विशेष शक्तियाँ:
- राज्यपाल के पास इन क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में व्यापक और विशेष शक्तियाँ होती हैं।
- कानूनों को लागू करना: राज्यपाल यह निर्देश दे सकता है कि संसद या राज्य विधानमंडल का कोई विशेष कानून अनुसूचित क्षेत्र में लागू नहीं होगा या कुछ अपवादों और संशोधनों के साथ लागू होगा।
- शांति और सुशासन के लिए नियम बनाना: राज्यपाल, अनुसूचित क्षेत्रों की शांति और सुशासन के लिए नियम बना सकता है। इन नियमों के द्वारा वह जनजातीय भूमि के हस्तांतरण को प्रतिबंधित कर सकता है और आदिवासियों को साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए नियम बना सकता है।
- ऐसे नियम बनाने से पहले उन्हें राष्ट्रपति की सहमति लेनी आवश्यक होती है।
(घ) जनजाति सलाहकार परिषद (Tribes Advisory Council – TAC):
- जिन राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र हैं, वहाँ एक जनजाति सलाहकार परिषद का गठन करना अनिवार्य है।
- संरचना: इसमें अधिकतम 20 सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन-चौथाई (3/4) सदस्य राज्य विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधि होने चाहिए।
- कार्य: यह परिषद राज्य में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और उन्नति से संबंधित मामलों पर राज्यपाल को सलाह देती है।
2. छठी अनुसूची (Sixth Schedule)
लागू क्षेत्र:
छठी अनुसूची के प्रावधान केवल चार पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होते हैं:
- असम
- मेघालय
- त्रिपुरा
- मिजोरम
छठी अनुसूची की प्रमुख विशेषताएँ (यह पाँचवीं अनुसूची से अधिक स्वायत्तता देती है)
(क) स्वायत्त जिलों और स्वायत्त क्षेत्रों की स्थापना:
- इन चार राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों को “स्वायत्त जिलों” (Autonomous Districts) के रूप में गठित किया गया है।
- यदि एक ही स्वायत्त जिले में विभिन्न जनजातियाँ रहती हैं, तो राज्यपाल उसे “स्वायत्त क्षेत्रों” (Autonomous Regions) में विभाजित कर सकता है।
(ख) स्वायत्त जिला परिषद (Autonomous District Council – ADC):
- प्रत्येक स्वायत्त जिले के प्रशासन के लिए एक स्वायत्त जिला परिषद का गठन किया जाता है।
- संरचना: परिषद में 30 सदस्य होते हैं:
- 26 सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित होते हैं।
- 4 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।
- निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
(ग) जिला परिषदों की व्यापक शक्तियाँ:
- ये परिषदें केवल सलाहकार निकाय नहीं हैं, बल्कि इनके पास विधायी, कार्यकारी, न्यायिक और वित्तीय शक्तियाँ भी होती हैं।
- विधायी शक्तियाँ: ये परिषदें कुछ निर्दिष्ट विषयों पर कानून बना सकती हैं, जैसे- भूमि, वन, नहर, विवाह और तलाक, संपत्ति, सामाजिक रीति-रिवाज आदि। इन कानूनों को लागू होने के लिए राज्यपाल की सहमति आवश्यक है।
- कार्यकारी शक्तियाँ: ये अपने क्षेत्र में प्राथमिक स्कूलों, बाजारों, सड़कों आदि की स्थापना और प्रबंधन कर सकती हैं।
- न्यायिक शक्तियाँ: ये जनजातियों के आपसी विवादों के निपटारे के लिए ग्राम परिषद या न्यायालय स्थापित कर सकती हैं।
- वित्तीय शक्तियाँ: ये अपने क्षेत्र में भूमि राजस्व और कुछ विशिष्ट कर लगा सकती हैं और वसूल सकती हैं।
(घ) कानूनों का लागू होना:
- पाँचवीं अनुसूची की तरह ही, राज्यपाल यह निर्देश दे सकता है कि संसद या राज्य विधानमंडल का कोई कानून स्वायत्त जिलों पर लागू नहीं होगा या कुछ संशोधनों के साथ लागू होगा।
पाँचवीं और छठी अनुसूची में मुख्य अंतर
| आधार | पाँचवीं अनुसूची | छठी अनुसूची |
| क्षेत्र | 4 पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर, अन्य राज्यों के “अनुसूचित क्षेत्र”। | केवल असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के “जनजातीय क्षेत्र”। |
| प्रशासनिक इकाई | जनजाति सलाहकार परिषद (TAC)। | स्वायत्त जिला परिषद (ADC)। |
| शक्तियाँ | TAC एक सलाहकार निकाय है। | ADC एक शक्तिशाली निकाय है जिसके पास विधायी और न्यायिक शक्तियाँ भी हैं। |
| स्वायत्तता | इसमें जनजातीय लोगों को सीमित स्वायत्तता प्राप्त है। | इसमें आदिवासी समुदायों को बहुत अधिक स्वायत्तता प्रदान की गई है। |
निष्कर्ष:
ये विशेष संवैधानिक प्रावधान भारत की विविधता को समायोजित करने और सबसे कमजोर आदिवासी समुदाD…