संसदीय समितियाँ (Parliamentary Committees)

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 भारतीय लोकतंत्र और शासन व्यवस्था का एक अनिवार्य और शक्तिशाली अंग हैं। ये समितियाँ संसद के “दिमाग” और “आँखों” की तरह काम करती हैं, जो सरकार के कामकाज पर गहन निगरानी रखती हैं।

यहाँ संसदीय समितियों का एक समग्र और व्यवस्थित अवलोकन प्रस्तुत है।


संसदीय समितियाँ (Parliamentary Committees)

परिभाषा:
संसदीय समिति, सांसदों का एक ऐसा छोटा और विशेषज्ञ समूह होता है जिसका गठन सदन (लोकसभा या राज्यसभा) द्वारा किया जाता है। यह समिति किसी विशेष विषय (जैसे विधेयक, बजट, सरकारी नीति या भ्रष्टाचार के आरोप) की विस्तृत जाँच करती है, विशेषज्ञों से परामर्श करती है और अपनी सिफारिशों के साथ एक रिपोर्ट सदन को सौंपती है।

आवश्यकता क्यों है?
संसद का सत्र साल में कुछ ही समय के लिए चलता है और सदन में सैकड़ों सदस्य होते हैं। इतने बड़े सदन के लिए सरकार के हर जटिल कार्य, हर विधेयक के हर क्लॉज, और बजट के हर आवंटन पर गहराई से बहस करना और विश्लेषण करना संभव नहीं होता। संसदीय समितियाँ इसी कमी को पूरा करती हैं और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर गहनता से कार्य करती हैं।


संसदीय समितियों की प्रमुख विशेषताएँ

  1. नियुक्ति/चुनाव: समिति का गठन सदन द्वारा किया जाता है या अध्यक्ष (लोकसभा)/सभापति (राज्यसभा) द्वारा नामित किया जाता है।
  2. निर्देश: ये समितियाँ अध्यक्ष/सभापति के निर्देशन में कार्य करती हैं।
  3. रिपोर्ट: ये अपनी रिपोर्ट सदन या अध्यक्ष/सभापति को प्रस्तुत करती हैं।
  4. सचिवालय: इन समितियों को लोकसभा या राज्यसभा सचिवालय द्वारा सचिवीय सहायता प्रदान की जाती है।

संसदीय समितियों का वर्गीकरण

संसदीय समितियों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees)
2. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)


1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees)

ये समितियाँ स्थायी प्रकृति की होती हैं, इनका गठन प्रतिवर्ष किया जाता है और ये निरंतर आधार पर काम करती हैं। इन्हें कार्य की प्रकृति के आधार पर विभिन्न उप-श्रेणियों में बांटा गया है:

(क) वित्तीय समितियाँ (Financial Committees) – (सर्वाधिक महत्वपूर्ण)

  1. लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee – PAC):
    • सदस्य: 22 (15 लोकसभा + 7 राज्यसभा)।
    • कार्य: CAG की रिपोर्ट की जाँच करना और यह सुनिश्चित करना कि सरकारी खर्च सही तरीके से हुआ है या नहीं। इसके अध्यक्ष विपक्षी दल से होते हैं।
  2. प्राक्कलन समिति (Estimates Committee):
    • सदस्य: 30 (सभी केवल लोकसभा से)।
    • कार्य: बजट के अनुमानों की जाँच करना और सरकारी खर्चों में मितव्ययिता (economy) लाने के उपाय सुझाना। इसे “सतत मितव्ययिता समिति” भी कहते हैं।
  3. सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी समिति (Committee on Public Undertakings):
    • सदस्य: 22 (15 लोकसभा + 7 राज्यसभा)।
    • कार्य: सरकारी कंपनियों (PSUs) के प्रदर्शन और खातों की जाँच करना।

(ख) विभागीय स्थायी समितियाँ (Departmental Standing Committees – DRCs)

(ग) जाँच समितियाँ

(घ) सदन के कामकाज से संबंधित समितियाँ


2. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)

ये समितियाँ अस्थायी प्रकृति की होती हैं, जिन्हें किसी विशेष प्रयोजन के लिए गठित किया जाता है और कार्य पूरा होने पर ये भंग हो जाती हैं।

(क) जाँच समितियाँ

(ख) सलाहकार समितियाँ


संसदीय समितियों का महत्व

  1. सरकार पर गहन निगरानी: ये सरकार के कामकाज पर विस्तृत और गहरी नजर रखती हैं।
  2. कार्यपालिका की जवाबदेही: ये कार्यपालिका को संसद के प्रति अधिक जवाबदेह बनाती हैं।
  3. दलगत राजनीति से परे: इन समितियों की बैठकें बंद कमरों में होती हैं, जहाँ सदस्य दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में मुद्दों पर चर्चा करते हैं।
  4. विधेयकों की गुणवत्ता में सुधार: ये विधेयकों के हर पहलू की बारीकी से जाँच करती हैं, जिससे कानूनों की गुणवत्ता में सुधार होता है।
  5. जनता की भागीदारी: याचिका समिति के माध्यम से आम नागरिक भी अपनी बात संसद तक पहुँचा सकते हैं।
  6. विशेषज्ञता का समावेश: ये समितियाँ अपने कार्य के दौरान विशेषज्ञों, अधिकारियों और हितधारकों को बुलाकर उनकी राय ले सकती हैं।

संक्षेप में, संसदीय समितियाँ लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि सरकार संसद और अंततः भारत की जनता के प्रति जवाबदेह बनी रहे।


राज्यपाल (The Governor)

परिभाषा:
जिस प्रकार केंद्र में राष्ट्र का प्रमुख राष्ट्रपति होता है, ठीक उसी प्रकार राज्यों में राज्य का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) राज्यपाल होता है। वह राज्य की कार्यपालिका का नाममात्र का प्रमुख (Nominal Executive) होता है, जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं।

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका का वर्णन है, जिसमें राज्यपाल का पद एक केंद्रीय स्थान रखता है।

अनुच्छेद 153 के अनुसार, “प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।”


नियुक्ति (Appointment) – अनुच्छेद 155

योग्यताएँ (Qualifications) – अनुच्छेद 157

राज्यपाल पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ निर्धारित हैं:

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो।

परंपराएँ (Conventions):
हालांकि ये संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं हैं, फिर भी दो स्वस्थ परंपराएँ स्थापित हुई हैं:

  1. राज्यपाल को उस राज्य का निवासी नहीं होना चाहिए जहाँ उसे नियुक्त किया जा रहा है, ताकि वह स्थानीय राजनीति से मुक्त रहकर निष्पक्ष कार्य कर सके।
  2. राज्यपाल की नियुक्ति से पहले राष्ट्रपति संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श करते हैं।

कार्यकाल (Term) – अनुच्छेद 156


राज्यपाल की शक्तियाँ और कार्य (Powers and Functions of the Governor)

राज्यपाल की शक्तियाँ काफी हद तक राष्ट्रपति के समान होती हैं, लेकिन कुछ मामलों में भिन्न भी हैं।

1. कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers)

2. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

3. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)

4. न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers)

5. विवेकाधीन शक्तियाँ (Discretionary Powers)

यह वह क्षेत्र है जहाँ राज्यपाल, राष्ट्रपति से अधिक शक्तिशाली प्रतीत होता है, क्योंकि राष्ट्रपति के पास नाममात्र की विवेकाधीन शक्तियाँ होती हैं।


राज्यपाल की भूमिका और विवाद (Role of the Governor and Controversies)

राज्यपाल की दोहरी भूमिका होती है:

  1. राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में।
  2. केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में।

यह दोहरी भूमिका ही अक्सर विवाद का कारण बनती है। कई बार राज्यपाल पर यह आरोप लगता है कि वह राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करने के बजाय, केंद्र में सत्तारूढ़ दल के एक एजेंट के रूप में कार्य कर रहा है, खासकर जब राज्य और केंद्र में अलग-अलग दलों की सरकारें हों। अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का प्रयोग और मुख्यमंत्री की नियुक्ति में विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग सबसे विवादास्पद मुद्दे रहे हैं।

विभिन्न आयोगों (जैसे सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग) ने राज्यपाल की भूमिका को निष्पक्ष और स्वतंत्र बनाने के लिए कई सिफारिशें दी हैं।


, यहाँ मुख्यमंत्री (Chief Minister) के पद, नियुक्ति, शक्तियों और भूमिका पर एक विस्तृत और सरल व्याख्या प्रस्तुत है। मुख्यमंत्री राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का केंद्र बिंदु होता है।


मुख्यमंत्री (The Chief Minister)

परिभाषा:
जिस प्रकार केंद्र में सरकार का वास्तविक प्रमुख प्रधानमंत्री होता है, ठीक उसी प्रकार राज्यों में सरकार का वास्तविक कार्यकारी प्रमुख (Real Executive Head) मुख्यमंत्री होता है। राज्यपाल राज्य का नाममात्र का प्रमुख (Nominal Head) होता है, जबकि वास्तविक शक्तियाँ मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं।

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान में मुख्यमंत्री की नियुक्ति और शक्तियों से संबंधित विस्तृत प्रावधान नहीं हैं, लेकिन कुछ प्रमुख अनुच्छेद उनकी भूमिका को परिभाषित करते हैं:


मुख्यमंत्री की नियुक्ति (Appointment of the Chief Minister)

कार्यकाल (Term)


मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ (Powers and Functions of the Chief Minister)

मुख्यमंत्री की शक्तियाँ राज्य स्तर पर लगभग प्रधानमंत्री के समान ही होती हैं।

1. मंत्रिपरिषद के संबंध में

2. राज्यपाल के संबंध में

3. राज्य विधानमंडल के संबंध में

4. अन्य शक्तियाँ और भूमिका

निष्कर्ष:
मुख्यमंत्री राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था की धुरी है। राज्य में उसकी स्थिति केंद्र में प्रधानमंत्री के समान ही होती है। वह “राज्य रूपी जहाज का कप्तान” है, जो मंत्रिपरिषद के साथ मिलकर राज्य के शासन को दिशा देता है।


राज्य मंत्रिपरिषद (The State Council of Ministers)

परिभाषा:
राज्य मंत्रिपरिषद, राज्यपाल को उसके कार्यों में सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में गठित मंत्रियों का एक समूह है। भारतीय संविधान के अनुसार, राज्य की वास्तविक कार्यकारी शक्ति (Real Executive Power) इसी मंत्रिपरिषद में निहित होती है।

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 में राज्य मंत्रिपरिषद के गठन और कार्यप्रणाली से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।


मंत्रिपरिषद की संरचना और रचना (Composition of the Council of Ministers)

केंद्र की तरह ही, राज्य की मंत्रिपरिषद में भी मंत्रियों की तीन मुख्य श्रेणियाँ होती हैं:

मंत्री का प्रकारविवरण
1. कैबिनेट मंत्री* ये मंत्रिपरिषद के सबसे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण सदस्य होते हैं।<br>* ये राज्य सरकार के प्रमुख विभागों (जैसे- गृह, वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) के प्रमुख होते हैं।<br>* राज्य सरकार की समस्त नीतिगत निर्णय इन्हीं मंत्रियों द्वारा बनी कैबिनेट (मंत्रिमंडल) की बैठकों में लिए जाते हैं।
2. राज्य मंत्री* ये दूसरे स्तर के मंत्री होते हैं। इनकी दो भूमिकाएँ हो सकती हैं:<br> (क) राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार): इन्हें किसी छोटे विभाग का स्वतंत्र प्रमुख बनाया जा सकता है। ये कैबिनेट की बैठकों में तभी शामिल होते हैं जब उनके विभाग से संबंधित कोई मामला हो।<br> (ख) राज्य मंत्री: इन्हें कैबिनेट मंत्रियों के साथ संबद्ध किया जाता है और वे उनके कार्यों में सहायता करते हैं।
3. उपमंत्री* ये सबसे कनिष्ठ मंत्री होते हैं। इन्हें कोई स्वतंत्र विभाग नहीं दिया जाता।<br>* इनका मुख्य कार्य वरिष्ठ मंत्रियों (कैबिनेट या राज्य मंत्री) को उनके प्रशासनिक और संसदीय कार्यों में सहायता प्रदान करना होता है।

नोट: “मंत्रिपरिषद” एक व्यापक निकाय है जिसमें तीनों श्रेणियों के मंत्री शामिल होते हैं, जबकि “मंत्रिमंडल (कैबिनेट)” एक छोटा और अधिक शक्तिशाली समूह है जिसमें केवल कैबिनेट स्तर के मंत्री होते हैं।

मंत्रिपरिषद का आकार (Size of the Council of Ministers)


मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली (Working of the Council of Ministers)

1. नियुक्ति और कार्यकाल (Appointment and Term)

2. उत्तरदायित्व (Responsibility)

मंत्रियों का उत्तरदायित्व दोहरा होता है:

(क) सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility):

(ख) व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (Individual Responsibility):

3. गोपनीयता की शपथ (Oath of Secrecy)


राज्य मंत्रिपरिषद के कार्य और शक्तियाँ

मंत्रिपरिषद राज्य की वास्तविक कार्यकारी शक्ति है और इसके कार्य अत्यंत व्यापक हैं:

  1. नीति-निर्माण: राज्य के लिए सभी महत्वपूर्ण नीतियों का निर्माण और निर्धारण करना मंत्रिपरिषद का प्रमुख कार्य है।
  2. कानून-निर्माण में भूमिका: मंत्रिपरिषद ही विधानमंडल में अधिकांश विधेयक प्रस्तुत करती है और उन्हें पारित करवाने का प्रयास करती है।
  3. बजट तैयार करना: राज्य का वार्षिक बजट वित्त मंत्री द्वारा तैयार किया जाता है और मंत्रिपरिषद द्वारा स्वीकृत होने के बाद ही विधानसभा में पेश किया जाता है।
  4. प्रशासन चलाना: विभिन्न विभागों के माध्यम से सरकारी नीतियों और कानूनों को लागू करना और राज्य का प्रशासन चलाना।
  5. राज्यपाल को सलाह देना: मंत्रिपरिषद ही राज्यपाल को राज्य के शासन से संबंधित सभी मामलों पर सलाह देती है।
  6. नियुक्तियाँ करना: राज्य के महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों आदि महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों का निर्णय वास्तव में मंत्रिपरिषद ही करती है, भले ही औपचारिक नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती हो।
  7. कर लगाना और खर्च करना: विधानसभा की स्वीकृति से नए कर लगाना और राज्य की संचित निधि से धन खर्च करना।

राज्य विधानमंडल (The State Legislature)

परिभाषा:
राज्य विधानमंडल किसी भी राज्य का सर्वोच्च विधायी निकाय (Supreme Legislative Body) होता है, जिसका मुख्य कार्य राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानूनों का निर्माण करना है।

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्यों के विधानमंडलों की संरचना, गठन, शक्तियों और प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है।

अनुच्छेद 168 के अनुसार, राज्य विधानमंडल का गठन राज्यपाल और एक या दो सदनों से मिलकर होता है।


राज्य विधानमंडल की संरचना (Structure of the State Legislature)

राज्यों में विधानमंडल की संरचना दो प्रकार की हो सकती है:

  1. एकसदनीय विधानमंडल (Unicameral Legislature):
    • जहाँ विधानमंडल में केवल एक सदन होता है: विधानसभा (Legislative Assembly)
    • भारत के अधिकांश राज्यों में यही व्यवस्था है।
  2. द्विसदनीय विधानमंडल (Bicameral Legislature):
    • जहाँ विधानमंडल में दो सदन होते हैं:
      • विधानसभा (Legislative Assembly) – निचला सदन
      • विधान परिषद (Legislative Council) – उच्च सदन
    • वर्तमान में, भारत के केवल 6 राज्यों में द्विसदनीय विधानमंडल है:
      • उत्तर प्रदेश (UP), बिहार (Bihar), महाराष्ट्र (Maharashtra), कर्नाटक (Karnataka), आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh), और तेलंगाना (Telangana)

विधानमंडल के दो सदन

1. विधानसभा (Legislative Assembly)

यह राज्य विधानमंडल का लोकप्रिय, प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित और सबसे शक्तिशाली सदन होता है। इसे “निचला सदन” भी कहा जाता है।

2. विधान परिषद (Legislative Council)

यह “उच्च सदन” कहलाता है और राज्यसभा की तरह एक स्थायी और बौद्धिक सदन माना जाता है।


राज्य विधानमंडल के कार्य एवं शक्तियाँ

1. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

2. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)

3. कार्यपालिका पर नियंत्रण (Control over the Executive)

4. निर्वाचन संबंधी शक्तियाँ


विधानसभा और विधान परिषद में तुलना

आधारविधानसभा (Legislative Assembly)विधान परिषद (Legislative Council)
प्रकृतिअस्थायी सदन, शक्तिशालीस्थायी सदन, कम शक्तिशाली
सदस्यजनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचितअप्रत्यक्ष निर्वाचित और मनोनीत
कार्यकाल5 वर्ष6 वर्ष (सदस्यों का)
वित्तीय शक्तियाँधन विधेयक पर पूर्ण नियंत्रणकेवल 14 दिनों तक रोक सकती है
साधारण विधेयकइस सदन का निर्णय अंतिम होता हैकेवल 4 महीने तक रोक सकती है
सरकार पर नियंत्रणमंत्रिपरिषद इसके प्रति उत्तरदायी हैइसका सरकार पर कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं होता

निष्कर्ष:
राज्य विधानमंडल में, चाहे द्विसदनीय व्यवस्था ही क्यों न हो, विधानसभा ही सर्वोच्च और सबसे शक्तिशाली सदन है। विधान परिषद की भूमिका मुख्यतः एक सलाहकार और विलंबकारी निकाय की होती है, जो विधेयकों पर पुनर्विचार का एक अवसर प्रदान करती है, लेकिन उन्हें रोक नहीं सकती।


उच्चतम न्यायालय (The Supreme Court of India)

परिभाषा:
भारत का उच्चतम न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायिक मंच, अंतिम अपील न्यायालय (final court of appeal) और संविधान का संरक्षक (Guardian of the Constitution) है। यह भारत की एकीकृत न्यायिक प्रणाली (Integrated Judicial System) के शिखर पर है, जिसके निर्णय देश के अन्य सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होते हैं।

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 124 से 147 तक उच्चतम न्यायालय के गठन, स्वतंत्रता, अधिकार क्षेत्र, शक्तियों और प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है।

उद्घाटन: भारत के उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी, 1950 को हुआ था।


संरचना और संगठन (Composition and Organisation)

न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of Judges)

योग्यताएँ (Qualifications)

उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति के पास निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. और,
    • उसे किसी उच्च न्यायालय (High Court) में कम से कम 5 वर्ष के लिए न्यायाधीश होना चाहिए; या
    • उसे किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष के लिए अधिवक्ता (advocate) होना चाहिए; या
    • वह राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित न्यायविद् (distinguished jurist) हो।

कार्यकाल और पद से हटाना


उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार और शक्तियाँ (Jurisdiction and Powers)

उच्चतम न्यायालय की शक्तियों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. मूल/प्रारंभिक क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) – अनुच्छेद 131

2. रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) – अनुच्छेद 32

3. अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction)

4. सलाहकारी क्षेत्राधिकार (Advisory Jurisdiction) – अनुच्छेद 143

5. अभिलेख न्यायालय (Court of Record) – अनुच्छेद 129

6. न्यायिक समीक्षा की शक्ति (Power of Judicial Review)

7. अन्य शक्तियाँ

निष्कर्ष:
उच्चतम न्यायालय केवल एक न्यायिक संस्था नहीं है, बल्कि यह संविधान का प्रहरी, नागरिकों के अधिकारों का रक्षक और विधि के शासन का सर्वोच्च प्रतीक है, जो भारतीय लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखता है।


न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)

परिभाषा:
न्यायिक समीक्षा, न्यायपालिका (विशेषकर उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों) की वह शक्ति है जिसके द्वारा वह विधायिका (Legislature) द्वारा बनाए गए कानूनों और कार्यपालिका (Executive) द्वारा जारी किए गए आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करती है।

यदि जाँच में कोई कानून या आदेश संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता है, तो न्यायपालिका उसे अमान्य, अवैध और शून्य (unconstitutional, illegal and void) घोषित कर सकती है।

स्रोत: न्यायिक समीक्षा की अवधारणा अमेरिका के संविधान से प्रेरित है, जहाँ इसे ‘मारबरी बनाम मैडिसन’ (1803) के ऐतिहासिक मामले में मुख्य न्यायाधीश जॉन मार्शल द्वारा स्थापित किया गया था।


भारतीय संविधान में न्यायिक समीक्षा का आधार

यद्यपि भारतीय संविधान में ‘न्यायिक समीक्षा’ शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है, लेकिन कई अनुच्छेद अप्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका को यह शक्ति प्रदान करते हैं। इसके संवैधानिक आधार निम्नलिखित हैं:

केशवानंद भारती मामला (1973): इस मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि न्यायिक समीक्षा संविधान के “मूल ढाँचे” (Basic Structure) का एक हिस्सा है, और इसलिए इसे संसद द्वारा संशोधन करके भी छीना या कम नहीं किया जा सकता।


न्यायिक समीक्षा का दायरा (Scope of Judicial Review)

न्यायिक समीक्षा का प्रयोग निम्नलिखित के विरुद्ध किया जा सकता है:

  1. संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित कानून (Legislative Acts):
    • न्यायपालिका यह जाँच कर सकती है कि क्या कोई कानून संविधान के मौलिक अधिकारों (भाग-3) या अन्य किसी प्रावधान का उल्लंघन तो नहीं करता।
    • वह यह भी देखती है कि क्या कानून बनाने वाली विधायिका ने अपनी शक्तियों की सीमा (legislative competence) के भीतर रहकर काम किया है।
  2. कार्यपालिका के आदेश (Executive Orders):
    • राष्ट्रपति, राज्यपाल या अन्य अधिकारियों द्वारा जारी किए गए आदेश, अध्यादेश और नियम।
  3. संवैधानिक संशोधन (Constitutional Amendments):
    • केशवानंद भारती मामले के बाद, न्यायपालिका अब यह भी समीक्षा कर सकती है कि क्या कोई संविधान संशोधन ‘मूल ढाँचे’ के सिद्धांत का उल्लंघन तो नहीं करता है। (जैसे: 99वें संविधान संशोधन, जो राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग से संबंधित था, को उच्चतम न्यायालय ने 2015 में अमान्य घोषित कर दिया था)।

न्यायिक समीक्षा का महत्व (Significance of Judicial Review)

  1. संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखना:
    • यह सुनिश्चित करती है कि संविधान देश का सर्वोच्च कानून बना रहे और सरकार का कोई भी अंग इसका उल्लंघन न कर सके।
  2. मौलिक अधिकारों की रक्षा:
    • यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों को विधायिका और कार्यपालिका के अतिक्रमण से बचाती है। यह मौलिक अधिकारों का “रक्षक” है।
  3. संघीय संतुलन बनाए रखना:
    • यह केंद्र और राज्यों को अपने-अपने विधायी क्षेत्रों तक सीमित रखकर देश के संघीय संतुलन को बनाए रखने में मदद करती है।
  4. शक्तियों के पृथक्करण को लागू करना:
    • यह सुनिश्चित करती है कि विधायिका और कार्यपालिका अपनी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन न करें, जिससे शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत लागू होता है।
  5. न्यायपालिका की स्वतंत्रता:
    • यह शक्ति न्यायपालिका को सरकार के अन्य दो अंगों से स्वतंत्र रहकर कार्य करने में सक्षम बनाती है।

न्यायिक समीक्षा की आलोचना

कुछ आलोचक इसे “न्यायिक अतिक्रमण” (Judicial Activism/Overreach) कहते हैं और निम्नलिखित तर्क देते हैं:

निष्कर्ष:
आलोचनाओं के बावजूद, न्यायिक समीक्षा भारतीय लोकतंत्र का एक अनिवार्य स्तंभ है। यह शक्तियों पर एक आवश्यक नियंत्रण और संतुलन (check and balance) स्थापित करती है, जो सरकार को निरंकुश होने से रोकता है और विधि के शासन (Rule of Law) को सुनिश्चित करता है।


न्यायिक सक्रियता (Jud-icial Activism)

परिभाषा:
न्यायिक सक्रियता, न्यायपालिका की उस सक्रिय और प्रगतिशील भूमिका को संदर्भित करती है जिसमें वह समाज में न्याय सुनिश्चित करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी पारंपरिक शक्तियों से आगे बढ़कर कार्यपालिका (Executive) और विधायिका (Legislature) को उनके संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए निर्देश देती है।

इसका मुख्य उद्देश्य “सामाजिक न्याय” (Social Justice) की स्थापना करना और सरकार के अन्य अंगों को उनकी जवाबदेही का एहसास कराना है।


न्यायिक सक्रियता की उत्पत्ति और विकास (Origin and Evolution)

न्यायिक सक्रियता के मुख्य कारण (Reasons for Judicial Activism)

  1. कार्यपालिका की निष्क्रियता: जब कार्यपालिका अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहती है या भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाती है, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
  2. विधायिका का पतन: जब विधायिका जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने और समय पर कानून बनाने में असफल हो जाती है।
  3. नागरिकों का न्यायपालिका पर बढ़ता विश्वास: लोगों का यह मानना है कि जब कोई नहीं सुनता, तो न्यायपालिका सुनेगी।
  4. संविधान की उदार व्याख्या: न्यायाधीशों द्वारा संविधान के प्रावधानों (विशेषकर अनुच्छेद 21 – जीवन का अधिकार) की व्यापक और उदार व्याख्या ने न्यायिक सक्रियता को बढ़ावा दिया।

न्यायिक सक्रियता के साधन (Tools of Judicial Activism)

न्यायपालिका ने न्यायिक सक्रियता को प्रभावी बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण साधनों का विकास किया, जिनमें सबसे प्रमुख है जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL)

जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL)


न्यायिक सक्रियता के सकारात्मक प्रभाव (Positive Impacts)

  1. न्याय को सुलभ बनाया: इसने न्याय को समाज के सबसे गरीब और कमजोर वर्गों (बंधुआ मजदूर, कैदी, बच्चे) तक पहुँचाया।
  2. मौलिक अधिकारों का विस्तार: न्यायपालिका ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्याख्या करते हुए इसमें ‘गरिमामय जीवन का अधिकार’, ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’, ‘निजता का अधिकार (Right to Privacy)’, ‘मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार’ जैसे कई नए अधिकारों को शामिल किया।
  3. कार्यपालिका को जवाबदेह बनाया: इसने कार्यपालिका को भ्रष्टाचार और निष्क्रियता के मामलों में जवाबदेह ठहराया (जैसे- 2G घोटाला, कोयला घोटाला)।
  4. पर्यावरण संरक्षण: पर्यावरण से जुड़े कई ऐतिहासिक निर्णय (जैसे- दिल्ली में CNG बसों का अनिवार्य होना) न्यायिक सक्रियता का ही परिणाम हैं।
  5. चुनावी सुधार: राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए उम्मीदवारों द्वारा अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और देनदारियों की घोषणा को अनिवार्य बनाना।

न्यायिक सक्रियता की आलोचना: न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach)

जब न्यायिक सक्रियता अपनी सीमाओं को लांघकर विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अत्यधिक हस्तक्षेप करने लगती है, तो इसे ‘न्यायिक अतिक्रमण’ (Jud-icial Overreach) कहा जाता है। इसकी आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की जाती है:

  1. शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन: आलोचकों का मानना है कि यह शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन है, क्योंकि न्यायपालिका कानून बनाने और नीति लागू करने का काम करने लगती है जो विधायिका और कार्यपालिका का कार्य है।
  2. न्यायपालिका की जवाबदेही का अभाव: न्यायाधीश निर्वाचित नहीं होते हैं, इसलिए वे जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं होते।
  3. न्यायालयों पर बोझ: PIL की बाढ़ ने न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ बढ़ा दिया है, जिससे सामान्य मामलों में न्याय मिलने में देरी होती है।
  4. लोकप्रियता हासिल करने का साधन: कुछ आलोचक इसे ‘Publicity Interest Litigation’ भी कहते हैं, क्योंकि इसका उपयोग कभी-कभी प्रचार पाने के लिए किया जाता है।

निष्कर्ष:
न्यायिक सक्रियता एक दोधारी तलवार है। जब तक इसका प्रयोग सरकार की निष्क्रियता को भरने और गरीबों को न्याय दिलाने के लिए किया जाता है, यह लोकतंत्र के लिए एक वरदान है। लेकिन जब यह अपनी सीमाओं को पार कर ‘न्यायिक अतिक्रमण’ का रूप ले लेती है, तो यह शक्तियों के संतुलन के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए, न्यायपालिका को ‘न्यायिक संयम’ (Judicial Restraint) बरतते हुए एक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।


जनहित याचिका (Public- Interest Litigation – PIL)

परिभाषा:
‘जनहित याचिका’, जिसका शाब्दिक अर्थ है “जनता के हित में मुकदमा”, भारतीय कानून द्वारा दिया गया एक ऐसा शक्तिशाली उपकरण है, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति या गैर-सरकारी संगठन (NGO) सार्वजनिक महत्व के किसी मुद्दे पर, जिसमें किसी व्यक्ति या समूह के मौलिक या कानूनी अधिकारों का हनन हो रहा हो, सीधे उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) या उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) में न्याय के लिए याचिका दायर कर सकता है।

यह न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी साधन है।


PIL की उत्पत्ति और विकास

“Locus Standi” (अभियोजन की स्थिति) के नियम में ढील


किन मुद्दों पर PIL दायर की जा सकती है?

PIL किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक हित के लिए दायर की जा सकती है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार के मुद्दे आते हैं:


कौन PIL दायर कर सकता है?

कानूनन, कोई भी “सद्भाव रखने वाला भारतीय नागरिक” या सामाजिक संगठन PIL दायर कर सकता है, यदि उसका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित हो।

PIL कहाँ दायर की जाती है?


जनहित याचिका का महत्व और प्रभाव (Significance and Impact)

  1. न्याय का लोकतंत्रीकरण: इसने न्याय को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के दायरे से निकालकर समाज के सबसे गरीब और कमजोर वर्गों तक पहुँचाया।
  2. मौलिक अधिकारों के दायरे का विस्तार: PIL के माध्यम से ही न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्याख्या करते हुए इसमें ‘गरिमामय जीवन’, ‘स्वच्छ पर्यावरण’, ‘आश्रय का अधिकार’, ‘निजता का अधिकार’ जैसे कई महत्वपूर्ण अधिकारों को शामिल किया है।
  3. सरकार की जवाबदेही: इसने कार्यपालिका और विधायिका को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया है। कई मामलों में, न्यायालय ने सरकारों को उनकी संवैधानिक जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए मजबूर किया है।
  4. भ्रष्टाचार पर रोक: PIL का उपयोग सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को उजागर करने और उस पर अंकुश लगाने के लिए एक प्रभावी हथियार के रूप में किया गया है।
  5. पर्यावरण का संरक्षण: भारत में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण कानूनी प्रगति PIL के माध्यम से ही हुई है (जैसे- ताजमहल का संरक्षण, गंगा की सफाई, दिल्ली में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण)।

PIL के दुरुपयोग और आलोचना

निष्कर्ष:
आलोचनाओं और चुनौतियों के बावजूद, जनहित याचिका भारतीय न्याय प्रणाली की एक अनूठी और क्रांतिकारी देन है। यह विधि के शासन (Rule of Law) को बनाए रखने और समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है, जिसने भारत में सामाजिक और आर्थिक न्याय की अवधारणा को नई ऊँचाइयाँ दी हैं।


उच्च न्यायालय (The High Court)

परिभाषा:
उच्च न्यायालय किसी भी राज्य की न्यायिक प्रणाली के शिखर पर स्थित होता है। यह राज्य क्षेत्र के भीतर न्याय का सर्वोच्च न्यायालय है। हालाँकि, यह उच्चतम न्यायालय के अधीन और उसके अधीक्षण में कार्य करता है।

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों के गठन, स्वतंत्रता, अधिकार क्षेत्र, शक्तियों और प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है।

स्थापना: भारत में सबसे पहले 1862 में तीन उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई थी: कलकत्ता, बंबई और मद्रास। वर्तमान में भारत में 25 उच्च न्यायालय हैं।


संरचना और संगठन (Composition and Organisation)

न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of Judges) – अनुच्छेद 217

योग्यताएँ (Qualifications)

उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति के पास निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. और,
    • उसे भारत के राज्य क्षेत्र में कम से कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण करने का अनुभव हो; या
    • वह किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता (advocate) रहा हो।

कार्यकाल और पद से हटाना


उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार और शक्तियाँ (Jurisdiction and Powers)

1. प्रारंभिक/मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction)

2. रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) – अनुच्छेद 226

3. अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction)

4. अधीक्षण क्षेत्राधिकार (Supervisory Jurisdiction) – अनुच्छेद 227

5. अभिलेख न्यायालय (Court of Record) – अनुच्छेद 215

6. न्यायिक समीक्षा की शक्ति (Power of Judicial Review)

निष्कर्ष:
उच्च न्यायालय राज्य की न्यायिक प्रणाली की धुरी है। यह न केवल अधीनस्थ न्यायालयों के लिए अपील का अंतिम मंच है, बल्कि नागरिकों के मौलिक और कानूनी अधिकारों का एक प्रमुख संरक्षक भी है, जो विधि के शासन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


अधिकरण / न्यायाधिकरण (Tribunals)

परिभाषा:
अधिकरण एक अर्ध-न्यायिक संस्था (Quasi-Judicial Body) होती है, जिसे प्रशासनिक (administrative) या कर-संबंधी (tax-related) जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के विवादों का निपटारा करने के लिए स्थापित किया जाता है। ये पारंपरिक न्यायालयों (जैसे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय) से अलग होते हैं, क्योंकि इनका कार्यक्षेत्र सीमित और विशिष्ट होता है।

इनका मुख्य उद्देश्य सामान्य न्यायालयों के काम के बोझ को कम करना और विशेष ज्ञान की आवश्यकता वाले मामलों में त्वरित (speedy), सस्ता (less expensive) और विशेषज्ञ (expert) न्याय प्रदान करना है।


संवैधानिक प्रावधान


1. प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunals) – अनुच्छेद 323-A


2. अन्य मामलों के लिए अधिकरण (Tribunals for Other Matters) – अनुच्छेद 323-B

आधारअनुच्छेद 323-A (प्रशासनिक)अनुच्छेद 323-B (अन्य)
विषयकेवल लोक सेवा मामलों से संबंधित।विभिन्न विशिष्ट विषयों (कर, श्रम आदि) से संबंधित।
स्थापनाअधिकरण केवल संसद द्वारा स्थापित किए जा सकते हैं।अधिकरण संसद और राज्य विधानमंडल, दोनों द्वारा स्थापित किए जा सकते हैं।
पदानुक्रमइसमें केवल एक अधिकरण (केंद्र या राज्य के लिए) की स्थापना का प्रावधान है।इसमें अधिकरणों का एक पदानुक्रम (hierarchy) स्थापित किया जा सकता है।

अन्य अधिकरणों के कुछ उदाहरण:


अधिकरणों का महत्व (Significance of Tribunals)

  1. त्वरित न्याय: ये सामान्य न्यायालयों की तुलना में मामलों का निपटारा अधिक तेजी से करते हैं।
  2. कम खर्चीला: इनकी प्रक्रिया कम औपचारिक और कम खर्चीली होती है।
  3. विशेषज्ञता: इनमें न्यायिक सदस्यों के साथ-साथ संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ (Expert members) भी होते हैं, जो मामलों की तकनीकी बारीकियों को बेहतर ढंग से समझते हैं।
  4. न्यायालयों का बोझ कम करना: ये सामान्य अदालतों (विशेषकर उच्च न्यायालयों) के कार्यभार को कम करते हैं, जिससे वे अधिक महत्वपूर्ण मामलों पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।

निष्कर्ष: अधिकरण भारतीय न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो पारंपरिक न्यायपालिका के पूरक के रूप में कार्य करते हैं और विशिष्ट प्रकार के विवादों के समाधान के लिए एक प्रभावी मंच प्रदान करते हैं।


अधीनस्थ न्यायालय (The Subordinate Courts)

परिभाषा:
राज्य की न्यायिक प्रणाली में, उच्च न्यायालय (High Court) के अधीन कार्य करने वाले सभी न्यायालयों को सामूहिक रूप से अधीनस्थ न्यायालय कहा जाता है। ये जिला और उससे निचले स्तर पर कार्य करते हैं।

इन न्यायालयों को ‘निचली अदालतें’ (Lower Courts) भी कहा जाता है।

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों के संगठन, संरचना और नियंत्रण से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।


अधीनस्थ न्यायपालिका की संरचना (Structure of the Subordinate Judiciary)

राज्य में अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना और पदनाम (designation) राज्यों के अनुसार थोड़े भिन्न हो सकते हैं, लेकिन मोटे तौर पर एक समान पदानुक्रम (hierarchy) होता है। इन्हें मुख्यतः दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

  1. जिला एवं सत्र न्यायाधीश न्यायालय (District and Sessions Judge’s Court) – यह जिले का सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण है।
  2. अन्य अधीनस्थ न्यायालय (Other Subordinate Courts)

1. जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District and Sessions Judge)


2. जिला एवं सत्र न्यायालय के अधीन अन्य न्यायालय

इन न्यायालयों को फिर से दीवानी और आपराधिक श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

दीवानी पक्ष (Civil Side)आपराधिक पक्ष (Criminal Side)
(i) अधीनस्थ न्यायाधीश न्यायालय (Subordinate Judge’s Court)<br>- यह दीवानी मामलों को सुनता है।<br>- इसके पास असीमित वित्तीय क्षेत्राधिकार हो सकता है।<br>- इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायालय में होती है।(i) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय (Court of Chief Judicial Magistrate – CJM)<br>- यह उन आपराधिक मामलों को सुनता है जिनमें सजा 7 वर्ष तक की हो सकती है।<br>- इसके नीचे प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट होते हैं।
(ii) मुंसिफ न्यायालय (Munsiff’s Court)<br>- यह छोटे वित्तीय मूल्य के दीवानी मामलों की सुनवाई करता है।<br>- यह न्यायपालिका का सबसे निचला स्तर है।(ii) न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय (Court of Judicial Magistrate)<br>- यह उन मामलों की सुनवाई करता है जिनमें 3 वर्ष तक की सजा हो सकती है।

नोट: महानगरों (Metropolitan Cities) में, इन न्यायाधीशों के पदनाम बदल जाते हैं, जैसे:


न्यायिक अधिकारियों पर नियंत्रण (Control over Judicial Officers)


लोक अदालतें (Lok Adalats)

निष्कर्ष:
अधीनस्थ न्यायालय भारतीय न्यायिक प्रणाली की नींव हैं। ये न्याय तक पहुँच का पहला बिंदु हैं और देश की अधिकांश न्यायिक कार्यवाही यहीं संचालित होती है। उच्च न्यायालय का प्रशासनिक नियंत्रण इनकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।