संसदीय समितियाँ (Parliamentary Committees)
भारतीय लोकतंत्र और शासन व्यवस्था का एक अनिवार्य और शक्तिशाली अंग हैं। ये समितियाँ संसद के “दिमाग” और “आँखों” की तरह काम करती हैं, जो सरकार के कामकाज पर गहन निगरानी रखती हैं।
यहाँ संसदीय समितियों का एक समग्र और व्यवस्थित अवलोकन प्रस्तुत है।
संसदीय समितियाँ (Parliamentary Committees)
परिभाषा:
संसदीय समिति, सांसदों का एक ऐसा छोटा और विशेषज्ञ समूह होता है जिसका गठन सदन (लोकसभा या राज्यसभा) द्वारा किया जाता है। यह समिति किसी विशेष विषय (जैसे विधेयक, बजट, सरकारी नीति या भ्रष्टाचार के आरोप) की विस्तृत जाँच करती है, विशेषज्ञों से परामर्श करती है और अपनी सिफारिशों के साथ एक रिपोर्ट सदन को सौंपती है।
आवश्यकता क्यों है?
संसद का सत्र साल में कुछ ही समय के लिए चलता है और सदन में सैकड़ों सदस्य होते हैं। इतने बड़े सदन के लिए सरकार के हर जटिल कार्य, हर विधेयक के हर क्लॉज, और बजट के हर आवंटन पर गहराई से बहस करना और विश्लेषण करना संभव नहीं होता। संसदीय समितियाँ इसी कमी को पूरा करती हैं और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर गहनता से कार्य करती हैं।
संसदीय समितियों की प्रमुख विशेषताएँ
- नियुक्ति/चुनाव: समिति का गठन सदन द्वारा किया जाता है या अध्यक्ष (लोकसभा)/सभापति (राज्यसभा) द्वारा नामित किया जाता है।
- निर्देश: ये समितियाँ अध्यक्ष/सभापति के निर्देशन में कार्य करती हैं।
- रिपोर्ट: ये अपनी रिपोर्ट सदन या अध्यक्ष/सभापति को प्रस्तुत करती हैं।
- सचिवालय: इन समितियों को लोकसभा या राज्यसभा सचिवालय द्वारा सचिवीय सहायता प्रदान की जाती है।
संसदीय समितियों का वर्गीकरण
संसदीय समितियों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees)
2. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)
1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees)
ये समितियाँ स्थायी प्रकृति की होती हैं, इनका गठन प्रतिवर्ष किया जाता है और ये निरंतर आधार पर काम करती हैं। इन्हें कार्य की प्रकृति के आधार पर विभिन्न उप-श्रेणियों में बांटा गया है:
(क) वित्तीय समितियाँ (Financial Committees) – (सर्वाधिक महत्वपूर्ण)
- लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee – PAC):
- सदस्य: 22 (15 लोकसभा + 7 राज्यसभा)।
- कार्य: CAG की रिपोर्ट की जाँच करना और यह सुनिश्चित करना कि सरकारी खर्च सही तरीके से हुआ है या नहीं। इसके अध्यक्ष विपक्षी दल से होते हैं।
- प्राक्कलन समिति (Estimates Committee):
- सदस्य: 30 (सभी केवल लोकसभा से)।
- कार्य: बजट के अनुमानों की जाँच करना और सरकारी खर्चों में मितव्ययिता (economy) लाने के उपाय सुझाना। इसे “सतत मितव्ययिता समिति” भी कहते हैं।
- सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी समिति (Committee on Public Undertakings):
- सदस्य: 22 (15 लोकसभा + 7 राज्यसभा)।
- कार्य: सरकारी कंपनियों (PSUs) के प्रदर्शन और खातों की जाँच करना।
(ख) विभागीय स्थायी समितियाँ (Departmental Standing Committees – DRCs)
- संख्या: 24 समितियाँ (16 लोकसभा के अधीन, 8 राज्यसभा के अधीन)।
- सदस्य: प्रत्येक में 31 (21 लोकसभा + 10 राज्यसभा)।
- कार्य: ये समितियाँ ‘लघु संसद’ (Mini-Parliament) की तरह काम करती हैं। ये अपने-अपने संबंधित मंत्रालयों के अनुदान की माँगों (बजट) और विधेयकों की विस्तृत जाँच करती हैं।
(ग) जाँच समितियाँ
- विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges): सदन या सदस्यों के विशेषाधिकार हनन के मामलों की जाँच करती है।
- याचिका समिति (Committee on Petitions): आम लोगों द्वारा भेजी गई याचिकाओं पर विचार करती है।
(घ) सदन के कामकाज से संबंधित समितियाँ
- कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory Committee): सदन की कार्यवाही का समय और एजेंडा तय करती है।
- नियम समिति (Rules Committee): सदन के नियमों में संशोधन पर विचार करती है।
2. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)
ये समितियाँ अस्थायी प्रकृति की होती हैं, जिन्हें किसी विशेष प्रयोजन के लिए गठित किया जाता है और कार्य पूरा होने पर ये भंग हो जाती हैं।
(क) जाँच समितियाँ
- इनका गठन किसी विशेष घटना या घोटाले की जाँच के लिए किया जाता है।
- उदाहरण: संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee – JPC) का गठन अक्सर बड़े घोटालों (जैसे बोफोर्स घोटाला, 2G स्पेक्ट्रम घोटाला) की जाँच के लिए किया जाता रहा है।
(ख) सलाहकार समितियाँ
- ये समितियाँ किसी विशेष विधेयक पर गहन विचार-विमर्श करने के लिए बनाई जाती हैं। इन्हें प्रवर समिति (Select Committee) (यदि सदस्य एक सदन से हों) या संयुक्त प्रवर समिति (Joint Select Committee) (यदि सदस्य दोनों सदनों से हों) कहा जाता है।
- उदाहरण: नागरिकता (संशोधन) विधेयक को जाँच के लिए संयुक्त समिति के पास भेजा गया था।
संसदीय समितियों का महत्व
- सरकार पर गहन निगरानी: ये सरकार के कामकाज पर विस्तृत और गहरी नजर रखती हैं।
- कार्यपालिका की जवाबदेही: ये कार्यपालिका को संसद के प्रति अधिक जवाबदेह बनाती हैं।
- दलगत राजनीति से परे: इन समितियों की बैठकें बंद कमरों में होती हैं, जहाँ सदस्य दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में मुद्दों पर चर्चा करते हैं।
- विधेयकों की गुणवत्ता में सुधार: ये विधेयकों के हर पहलू की बारीकी से जाँच करती हैं, जिससे कानूनों की गुणवत्ता में सुधार होता है।
- जनता की भागीदारी: याचिका समिति के माध्यम से आम नागरिक भी अपनी बात संसद तक पहुँचा सकते हैं।
- विशेषज्ञता का समावेश: ये समितियाँ अपने कार्य के दौरान विशेषज्ञों, अधिकारियों और हितधारकों को बुलाकर उनकी राय ले सकती हैं।
संक्षेप में, संसदीय समितियाँ लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि सरकार संसद और अंततः भारत की जनता के प्रति जवाबदेह बनी रहे।
राज्यपाल (The Governor)
परिभाषा:
जिस प्रकार केंद्र में राष्ट्र का प्रमुख राष्ट्रपति होता है, ठीक उसी प्रकार राज्यों में राज्य का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) राज्यपाल होता है। वह राज्य की कार्यपालिका का नाममात्र का प्रमुख (Nominal Executive) होता है, जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं।
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका का वर्णन है, जिसमें राज्यपाल का पद एक केंद्रीय स्थान रखता है।
अनुच्छेद 153 के अनुसार, “प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।”
- 7वें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा यह भी प्रावधान जोड़ा गया कि एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है।
नियुक्ति (Appointment) – अनुच्छेद 155
- राज्यपाल का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं होता है और न ही उसका चुनाव राष्ट्रपति की तरह किसी विशेष निर्वाचक मंडल द्वारा होता है।
- राज्यपाल की नियुक्ति सीधे भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (during the pleasure of the President) अपना पद धारण करता है।
- यह प्रावधान कनाडा के संविधान से लिया गया है।
- “राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत” का व्यावहारिक अर्थ है कि उसे केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा कभी भी हटाया जा सकता है।
योग्यताएँ (Qualifications) – अनुच्छेद 157
राज्यपाल पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ निर्धारित हैं:
- वह भारत का नागरिक हो।
- उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो।
परंपराएँ (Conventions):
हालांकि ये संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं हैं, फिर भी दो स्वस्थ परंपराएँ स्थापित हुई हैं:
- राज्यपाल को उस राज्य का निवासी नहीं होना चाहिए जहाँ उसे नियुक्त किया जा रहा है, ताकि वह स्थानीय राजनीति से मुक्त रहकर निष्पक्ष कार्य कर सके।
- राज्यपाल की नियुक्ति से पहले राष्ट्रपति संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श करते हैं।
कार्यकाल (Term) – अनुच्छेद 156
- राज्यपाल का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
- लेकिन यह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत होने के कारण निश्चित नहीं है। राष्ट्रपति 5 वर्ष से पहले भी उसे हटा सकते हैं या उसका तबादला किसी अन्य राज्य में कर सकते हैं।
- राज्यपाल अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए दे सकता है।
राज्यपाल की शक्तियाँ और कार्य (Powers and Functions of the Governor)
राज्यपाल की शक्तियाँ काफी हद तक राष्ट्रपति के समान होती हैं, लेकिन कुछ मामलों में भिन्न भी हैं।
1. कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers)
- राज्य सरकार के सभी कार्यकारी कार्य औपचारिक रूप से राज्यपाल के नाम पर किए जाते हैं।
- वह मुख्यमंत्री की और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
- वह राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General), राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के अध्यक्ष व सदस्यों और राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों (Chancellors) की नियुक्ति करता है।
- वह राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के आधार पर राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) की सिफारिश राष्ट्रपति से कर सकता है।
2. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)
- वह राज्य विधानमंडल का एक अभिन्न अंग होता है।
- वह विधानमंडल के सत्र को आहूत (summon), सत्रावसान (prorogue) और विधानसभा को भंग (dissolve) कर सकता है।
- वह विधानमंडल द्वारा पारित किसी भी विधेयक को अपनी स्वीकृति दे सकता है, रोक सकता है, या (धन विधेयक को छोड़कर) पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
- अनुच्छेद 200 के तहत, वह किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख सकता है। यह उसकी एक महत्वपूर्ण विवेकाधीन शक्ति है।
- जब विधानमंडल का सत्र न चल रहा हो, तब वह अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है (अनुच्छेद 213)।
3. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)
- धन विधेयक (Money Bill) उसकी पूर्व अनुमति के बाद ही विधानसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- वह सुनिश्चित करता है कि राज्य का वार्षिक बजट विधानमंडल के समक्ष रखा जाए।
- राज्य की आकस्मिक निधि (Contingency Fund) उसके नियंत्रण में होती है।
4. न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers)
- अनुच्छेद 161 के तहत, राज्यपाल को राज्य की विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी व्यक्ति के दंड को क्षमा, लघुकरण, परिहार, विराम और प्रविलंबन करने की शक्ति है।
- नोट: राज्यपाल को मृत्युदंड को माफ (pardon) करने की शक्ति नहीं है (यह शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है), हालांकि वह मृत्युदंड को निलंबित या लघुकरण कर सकता है।
- वह राष्ट्रपति द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में परामर्श देता है।
5. विवेकाधीन शक्तियाँ (Discretionary Powers)
यह वह क्षेत्र है जहाँ राज्यपाल, राष्ट्रपति से अधिक शक्तिशाली प्रतीत होता है, क्योंकि राष्ट्रपति के पास नाममात्र की विवेकाधीन शक्तियाँ होती हैं।
- किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर मुख्यमंत्री की नियुक्ति करना।
- मंत्रिपरिषद को बर्खास्त करना, जब वह विधानसभा में अपना विश्वास मत खो चुकी हो।
- विधानसभा को भंग करना, यदि मंत्रिपरिषद ने अपना बहुमत खो दिया हो।
- अनुच्छेद 200 के तहत किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखना।
- अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश करना।
राज्यपाल की भूमिका और विवाद (Role of the Governor and Controversies)
राज्यपाल की दोहरी भूमिका होती है:
- राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में।
- केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में।
यह दोहरी भूमिका ही अक्सर विवाद का कारण बनती है। कई बार राज्यपाल पर यह आरोप लगता है कि वह राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करने के बजाय, केंद्र में सत्तारूढ़ दल के एक एजेंट के रूप में कार्य कर रहा है, खासकर जब राज्य और केंद्र में अलग-अलग दलों की सरकारें हों। अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का प्रयोग और मुख्यमंत्री की नियुक्ति में विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग सबसे विवादास्पद मुद्दे रहे हैं।
विभिन्न आयोगों (जैसे सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग) ने राज्यपाल की भूमिका को निष्पक्ष और स्वतंत्र बनाने के लिए कई सिफारिशें दी हैं।
, यहाँ मुख्यमंत्री (Chief Minister) के पद, नियुक्ति, शक्तियों और भूमिका पर एक विस्तृत और सरल व्याख्या प्रस्तुत है। मुख्यमंत्री राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का केंद्र बिंदु होता है।
मुख्यमंत्री (The Chief Minister)
परिभाषा:
जिस प्रकार केंद्र में सरकार का वास्तविक प्रमुख प्रधानमंत्री होता है, ठीक उसी प्रकार राज्यों में सरकार का वास्तविक कार्यकारी प्रमुख (Real Executive Head) मुख्यमंत्री होता है। राज्यपाल राज्य का नाममात्र का प्रमुख (Nominal Head) होता है, जबकि वास्तविक शक्तियाँ मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं।
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान में मुख्यमंत्री की नियुक्ति और शक्तियों से संबंधित विस्तृत प्रावधान नहीं हैं, लेकिन कुछ प्रमुख अनुच्छेद उनकी भूमिका को परिभाषित करते हैं:
- अनुच्छेद 163: राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा।
- अनुच्छेद 164: “मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा” और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा।
मुख्यमंत्री की नियुक्ति (Appointment of the Chief Minister)
- सामान्य प्रक्रिया: अनुच्छेद 164 के अनुसार, राज्यपाल, राज्य विधानसभा (Legislative Assembly) में बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं। यह संसदीय प्रणाली की एक स्थापित परंपरा है।
- जब किसी दल को बहुमत न मिले: यदि चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो राज्यपाल अपनी विवेकाधीन शक्तियों (Discretionary Powers) का प्रयोग करते हैं और:
- चुनाव पूर्व बने गठबंधन के नेता को आमंत्रित कर सकते हैं।
- या सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं और उन्हें एक निश्चित समय के भीतर सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं।
- सदस्यता की शर्त:
- मुख्यमंत्री को राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य होना अनिवार्य है।
- यदि नियुक्ति के समय कोई व्यक्ति सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर विधानमंडल के किसी भी सदन की सदस्यता ग्रहण करनी होती है, अन्यथा उसे मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ता है।
कार्यकाल (Term)
- मुख्यमंत्री का कार्यकाल निश्चित नहीं होता है।
- वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (during the pleasure of the Governor) पद धारण करता है।
- इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्यपाल उसे कभी भी बर्खास्त कर सकते हैं। जब तक मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त है, राज्यपाल उसे बर्खास्त नहीं कर सकते।
- यदि वह विधानसभा में अपना विश्वास मत (vote of confidence) खो देता है, तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है, अन्यथा राज्यपाल उसे पद से हटा सकते हैं।
- विधानसभा का कार्यकाल सामान्यतः 5 वर्ष का होता है, इसलिए मुख्यमंत्री का कार्यकाल भी सामान्यतः 5 वर्ष से अधिक नहीं होता।
मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ (Powers and Functions of the Chief Minister)
मुख्यमंत्री की शक्तियाँ राज्य स्तर पर लगभग प्रधानमंत्री के समान ही होती हैं।
1. मंत्रिपरिषद के संबंध में
- मंत्रिपरिषद का निर्माता: मुख्यमंत्री ही राज्यपाल को मंत्रियों की नियुक्ति के लिए सिफारिश करता है। कौन मंत्री बनेगा और कौन नहीं, यह निर्णय पूरी तरह से मुख्यमंत्री का होता है।
- मंत्रालयों का आवंटन और फेरबदल: वह मंत्रियों के बीच विभागों (portfolios) का वितरण करता है और आवश्यकतानुसार उनमें फेरबदल कर सकता है।
- मंत्रिपरिषद की अध्यक्षता: वह मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है और उसके निर्णयों को अंतिम रूप से प्रभावित करता है।
- मंत्रियों पर नियंत्रण: वह सभी मंत्रियों के कार्यों का समन्वय, निर्देशन और नियंत्रण करता है।
- मंत्रिपरिषद का विघटन: यदि मुख्यमंत्री त्यागपत्र दे दे या उसकी मृत्यु हो जाए, तो पूरी मंत्रिपरिषद स्वतः ही भंग हो जाती है।
2. राज्यपाल के संबंध में
- संवाद की मुख्य कड़ी:अनुच्छेद 167 के अनुसार, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच संवाद का प्रमुख माध्यम होता है।
- वह मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों और प्रशासन संबंधी जानकारी से राज्यपाल को अवगत कराता है।
- नियुक्ति संबंधी सलाह: मुख्यमंत्री ही राज्यपाल को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के संबंध में सलाह देता है, जैसे – महाधिवक्ता (Advocate General), राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य आदि।
3. राज्य विधानमंडल के संबंध में
- सदन का नेता: मुख्यमंत्री विधानसभा में सदन का नेता होता है।
- सत्र आहूत करना और विघटन: वह राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने, सत्रावसान करने और किसी भी समय विधानसभा को भंग करने की सिफारिश कर सकता है।
- सरकारी नीतियों की घोषणा: वह सदन के पटल पर सरकार की महत्वपूर्ण नीतियों की घोषणा करता है और सरकार का पक्ष रखता है।
4. अन्य शक्तियाँ और भूमिका
- वह राज्य योजना बोर्ड (State Planning Board) का पदेन अध्यक्ष होता है।
- वह संबंधित क्षेत्रीय परिषद (Zonal Council) का बारी-बारी से (rotationally) एक वर्ष के लिए उपाध्यक्ष होता है।
- वह अंतर-राज्यीय परिषद और नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल का सदस्य होता है।
- वह राज्य सरकार का मुख्य प्रवक्ता (Chief Spokesperson) होता है।
- आपदा के समय वह राज्य का मुख्य संकट प्रबंधक (chief crisis manager) होता है।
निष्कर्ष:
मुख्यमंत्री राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था की धुरी है। राज्य में उसकी स्थिति केंद्र में प्रधानमंत्री के समान ही होती है। वह “राज्य रूपी जहाज का कप्तान” है, जो मंत्रिपरिषद के साथ मिलकर राज्य के शासन को दिशा देता है।
राज्य मंत्रिपरिषद (The State Council of Ministers)
परिभाषा:
राज्य मंत्रिपरिषद, राज्यपाल को उसके कार्यों में सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में गठित मंत्रियों का एक समूह है। भारतीय संविधान के अनुसार, राज्य की वास्तविक कार्यकारी शक्ति (Real Executive Power) इसी मंत्रिपरिषद में निहित होती है।
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 में राज्य मंत्रिपरिषद के गठन और कार्यप्रणाली से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
- अनुच्छेद 163:“राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान, मुख्यमंत्री होगा।”
- इस अनुच्छेद के अनुसार, राज्यपाल अपनी विवेकाधीन शक्तियों को छोड़कर, अन्य सभी कार्यों का निर्वहन मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही करेगा।
- अनुच्छेद 164: यह मंत्रियों की नियुक्ति, कार्यकाल, उत्तरदायित्व और वेतन-भत्तों से संबंधित है।
मंत्रिपरिषद की संरचना और रचना (Composition of the Council of Ministers)
केंद्र की तरह ही, राज्य की मंत्रिपरिषद में भी मंत्रियों की तीन मुख्य श्रेणियाँ होती हैं:
| मंत्री का प्रकार | विवरण |
| 1. कैबिनेट मंत्री | * ये मंत्रिपरिषद के सबसे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण सदस्य होते हैं।<br>* ये राज्य सरकार के प्रमुख विभागों (जैसे- गृह, वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) के प्रमुख होते हैं।<br>* राज्य सरकार की समस्त नीतिगत निर्णय इन्हीं मंत्रियों द्वारा बनी कैबिनेट (मंत्रिमंडल) की बैठकों में लिए जाते हैं। |
| 2. राज्य मंत्री | * ये दूसरे स्तर के मंत्री होते हैं। इनकी दो भूमिकाएँ हो सकती हैं:<br> (क) राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार): इन्हें किसी छोटे विभाग का स्वतंत्र प्रमुख बनाया जा सकता है। ये कैबिनेट की बैठकों में तभी शामिल होते हैं जब उनके विभाग से संबंधित कोई मामला हो।<br> (ख) राज्य मंत्री: इन्हें कैबिनेट मंत्रियों के साथ संबद्ध किया जाता है और वे उनके कार्यों में सहायता करते हैं। |
| 3. उपमंत्री | * ये सबसे कनिष्ठ मंत्री होते हैं। इन्हें कोई स्वतंत्र विभाग नहीं दिया जाता।<br>* इनका मुख्य कार्य वरिष्ठ मंत्रियों (कैबिनेट या राज्य मंत्री) को उनके प्रशासनिक और संसदीय कार्यों में सहायता प्रदान करना होता है। |
नोट: “मंत्रिपरिषद” एक व्यापक निकाय है जिसमें तीनों श्रेणियों के मंत्री शामिल होते हैं, जबकि “मंत्रिमंडल (कैबिनेट)” एक छोटा और अधिक शक्तिशाली समूह है जिसमें केवल कैबिनेट स्तर के मंत्री होते हैं।
मंत्रिपरिषद का आकार (Size of the Council of Ministers)
- 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा, राज्य की मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की कुल संख्या (मुख्यमंत्री सहित) राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।
- इसी संशोधन के अनुसार, छोटे राज्यों के लिए यह भी प्रावधान है कि मंत्रियों की न्यूनतम संख्या 12 से कम नहीं होगी।
मंत्रिपरिषद की कार्यप्रणाली (Working of the Council of Ministers)
1. नियुक्ति और कार्यकाल (Appointment and Term)
- मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
- अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है।
- मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण करते हैं। इसका व्यावहारिक अर्थ है कि वे मुख्यमंत्री के विश्वास तक ही पद पर बने रह सकते हैं।
2. उत्तरदायित्व (Responsibility)
मंत्रियों का उत्तरदायित्व दोहरा होता है:
(क) सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility):
- अनुच्छेद 164(2) के अनुसार, मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा (Legislative Assembly) के प्रति उत्तरदायी होती है।
- यह संसदीय प्रणाली का आधार है। इसका अर्थ है कि संपूर्ण मंत्रिपरिषद अपने सभी निर्णयों और कार्यों के लिए एक संयुक्त इकाई के रूप में जिम्मेदार होती है।
- यदि विधानसभा, सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) पारित कर दे, तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है।
- कैबिनेट द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय सभी मंत्रियों का निर्णय माना जाता है, भले ही वे व्यक्तिगत रूप से उससे असहमत क्यों न हों।
(ख) व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (Individual Responsibility):
- अनुच्छेद 164(1) के अनुसार, मंत्री व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
- इसका अर्थ है कि मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल किसी भी मंत्री को पद से हटा सकते हैं, यदि मुख्यमंत्री उस मंत्री के प्रदर्शन या आचरण से संतुष्ट न हों।
3. गोपनीयता की शपथ (Oath of Secrecy)
- पद ग्रहण करने से पहले, प्रत्येक मंत्री को राज्यपाल के समक्ष पद और गोपनीयता की शपथ लेनी होती है। वे कैबिनेट की कार्यवाहियों और निर्णयों को गोपनीय रखने के लिए बाध्य होते हैं।
राज्य मंत्रिपरिषद के कार्य और शक्तियाँ
मंत्रिपरिषद राज्य की वास्तविक कार्यकारी शक्ति है और इसके कार्य अत्यंत व्यापक हैं:
- नीति-निर्माण: राज्य के लिए सभी महत्वपूर्ण नीतियों का निर्माण और निर्धारण करना मंत्रिपरिषद का प्रमुख कार्य है।
- कानून-निर्माण में भूमिका: मंत्रिपरिषद ही विधानमंडल में अधिकांश विधेयक प्रस्तुत करती है और उन्हें पारित करवाने का प्रयास करती है।
- बजट तैयार करना: राज्य का वार्षिक बजट वित्त मंत्री द्वारा तैयार किया जाता है और मंत्रिपरिषद द्वारा स्वीकृत होने के बाद ही विधानसभा में पेश किया जाता है।
- प्रशासन चलाना: विभिन्न विभागों के माध्यम से सरकारी नीतियों और कानूनों को लागू करना और राज्य का प्रशासन चलाना।
- राज्यपाल को सलाह देना: मंत्रिपरिषद ही राज्यपाल को राज्य के शासन से संबंधित सभी मामलों पर सलाह देती है।
- नियुक्तियाँ करना: राज्य के महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों आदि महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों का निर्णय वास्तव में मंत्रिपरिषद ही करती है, भले ही औपचारिक नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती हो।
- कर लगाना और खर्च करना: विधानसभा की स्वीकृति से नए कर लगाना और राज्य की संचित निधि से धन खर्च करना।
राज्य विधानमंडल (The State Legislature)
परिभाषा:
राज्य विधानमंडल किसी भी राज्य का सर्वोच्च विधायी निकाय (Supreme Legislative Body) होता है, जिसका मुख्य कार्य राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानूनों का निर्माण करना है।
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्यों के विधानमंडलों की संरचना, गठन, शक्तियों और प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है।
अनुच्छेद 168 के अनुसार, राज्य विधानमंडल का गठन राज्यपाल और एक या दो सदनों से मिलकर होता है।
राज्य विधानमंडल की संरचना (Structure of the State Legislature)
राज्यों में विधानमंडल की संरचना दो प्रकार की हो सकती है:
- एकसदनीय विधानमंडल (Unicameral Legislature):
- जहाँ विधानमंडल में केवल एक सदन होता है: विधानसभा (Legislative Assembly)।
- भारत के अधिकांश राज्यों में यही व्यवस्था है।
- द्विसदनीय विधानमंडल (Bicameral Legislature):
- जहाँ विधानमंडल में दो सदन होते हैं:
- विधानसभा (Legislative Assembly) – निचला सदन
- विधान परिषद (Legislative Council) – उच्च सदन
- वर्तमान में, भारत के केवल 6 राज्यों में द्विसदनीय विधानमंडल है:
- उत्तर प्रदेश (UP), बिहार (Bihar), महाराष्ट्र (Maharashtra), कर्नाटक (Karnataka), आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh), और तेलंगाना (Telangana)।
- जहाँ विधानमंडल में दो सदन होते हैं:
विधानमंडल के दो सदन
1. विधानसभा (Legislative Assembly)
यह राज्य विधानमंडल का लोकप्रिय, प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित और सबसे शक्तिशाली सदन होता है। इसे “निचला सदन” भी कहा जाता है।
- संरचना और सदस्य संख्या (अनुच्छेद 170):
- अधिकतम संख्या: किसी भी राज्य की विधानसभा में 500 से अधिक सदस्य नहीं हो सकते।
- न्यूनतम संख्या: 60 से कम सदस्य नहीं हो सकते। (अपवाद: गोवा, मिजोरम, सिक्किम जैसे छोटे राज्यों में सदस्य संख्या कम है)।
- सदस्यों को MLA (Member of Legislative Assembly) कहा जाता है।
- चुनाव:
- सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है।
- कार्यकाल:
- विधानसभा का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
- राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर इसे समय से पहले भी भंग (dissolve) कर सकते हैं।
- अध्यक्षता:
- विधानसभा के सदस्य अपने में से ही एक अध्यक्ष (Speaker) और एक उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) का चुनाव करते हैं, जो सदन की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं।
2. विधान परिषद (Legislative Council)
यह “उच्च सदन” कहलाता है और राज्यसभा की तरह एक स्थायी और बौद्धिक सदन माना जाता है।
- गठन और उत्सादन (Creation and Abolition) – अनुच्छेद 169:
- संसद को यह शक्ति है कि वह किसी राज्य में विधान परिषद का गठन कर सकती है या यदि पहले से मौजूद है तो उसे समाप्त (abolish) कर सकती है।
- यह संसद तभी कर सकती है जब संबंधित राज्य की विधानसभा इस संबंध में विशेष बहुमत (कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित व मतदान करने वालों का 2/3 बहुमत) से एक प्रस्ताव पारित करे।
- संरचना और सदस्य संख्या (अनुच्छेद 171):
- किसी भी विधान परिषद की सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई (1/3) से अधिक नहीं हो सकती।
- और किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं हो सकती।
- सदस्यों को MLC (Member of Legislative Council) कहा जाता है।
- चुनाव:
- सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से और मनोनयन द्वारा होता है।
- 1/3 सदस्य – स्थानीय निकायों (नगरपालिका, जिला बोर्ड) द्वारा चुने जाते हैं।
- 1/3 सदस्य – विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
- 1/12 सदस्य – राज्य के 3 वर्ष पुराने स्नातकों (Graduates) द्वारा चुने जाते हैं।
- 1/12 सदस्य – 3 वर्षों से अध्यापन कर रहे शिक्षकों द्वारा चुने जाते हैं।
- शेष 1/6 सदस्य – राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं (जो साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा से जुड़े हों)।
- सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से और मनोनयन द्वारा होता है।
- कार्यकाल:
- यह राज्यसभा की तरह एक स्थायी सदन है जो कभी भंग नहीं होता।
- इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है, और प्रत्येक दो वर्ष में इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
- अध्यक्षता:
- परिषद के सदस्य अपने में से ही एक सभापति (Chairman) और एक उपसभापति (Deputy Chairman) का चुनाव करते हैं।
राज्य विधानमंडल के कार्य एवं शक्तियाँ
1. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)
- राज्य विधानमंडल राज्य सूची और समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर कानून बना सकता है।
- साधारण विधेयक दोनों में से किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। कानून बनने के लिए इसे दोनों सदनों (जहाँ विधान परिषद है) और राज्यपाल की स्वीकृति मिलना आवश्यक है।
- यदि किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में गतिरोध हो, तो अंतिम निर्णय विधानसभा का ही मान्य होता है। विधान परिषद किसी विधेयक को अधिकतम 4 महीने तक ही रोक सकती है। (केंद्र की तरह संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है)।
2. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)
- राज्य का वित्त पूरी तरह से विधानसभा के नियंत्रण में होता है।
- धन विधेयक (Money Bill) केवल विधानसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
- विधानसभा से पारित होने के बाद, धन विधेयक विधान परिषद के पास भेजा जाता है। विधान परिषद इसे अधिकतम 14 दिनों तक ही रोक सकती है। यदि 14 दिनों के भीतर वह इसे वापस नहीं करती, तो यह स्वतः पारित मान लिया जाता है।
3. कार्यपालिका पर नियंत्रण (Control over the Executive)
- राज्य की मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, विधान परिषद के प्रति नहीं।
- विधानसभा, प्रश्न पूछकर, प्रस्ताव लाकर, और अविश्वास प्रस्ताव पारित करके मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण रखती है।
4. निर्वाचन संबंधी शक्तियाँ
- विधानमंडल के निर्वाचित सदस्य भारत के राष्ट्रपति और राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव में भाग लेते हैं।
विधानसभा और विधान परिषद में तुलना
| आधार | विधानसभा (Legislative Assembly) | विधान परिषद (Legislative Council) |
| प्रकृति | अस्थायी सदन, शक्तिशाली | स्थायी सदन, कम शक्तिशाली |
| सदस्य | जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित | अप्रत्यक्ष निर्वाचित और मनोनीत |
| कार्यकाल | 5 वर्ष | 6 वर्ष (सदस्यों का) |
| वित्तीय शक्तियाँ | धन विधेयक पर पूर्ण नियंत्रण | केवल 14 दिनों तक रोक सकती है |
| साधारण विधेयक | इस सदन का निर्णय अंतिम होता है | केवल 4 महीने तक रोक सकती है |
| सरकार पर नियंत्रण | मंत्रिपरिषद इसके प्रति उत्तरदायी है | इसका सरकार पर कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं होता |
निष्कर्ष:
राज्य विधानमंडल में, चाहे द्विसदनीय व्यवस्था ही क्यों न हो, विधानसभा ही सर्वोच्च और सबसे शक्तिशाली सदन है। विधान परिषद की भूमिका मुख्यतः एक सलाहकार और विलंबकारी निकाय की होती है, जो विधेयकों पर पुनर्विचार का एक अवसर प्रदान करती है, लेकिन उन्हें रोक नहीं सकती।
उच्चतम न्यायालय (The Supreme Court of India)
परिभाषा:
भारत का उच्चतम न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायिक मंच, अंतिम अपील न्यायालय (final court of appeal) और संविधान का संरक्षक (Guardian of the Constitution) है। यह भारत की एकीकृत न्यायिक प्रणाली (Integrated Judicial System) के शिखर पर है, जिसके निर्णय देश के अन्य सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होते हैं।
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 124 से 147 तक उच्चतम न्यायालय के गठन, स्वतंत्रता, अधिकार क्षेत्र, शक्तियों और प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है।
उद्घाटन: भारत के उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी, 1950 को हुआ था।
संरचना और संगठन (Composition and Organisation)
- मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश (अनुच्छेद 124):
- मूल रूप से, उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और 7 अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था थी।
- वर्तमान में, उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India – CJI) और 33 अन्य न्यायाधीश हैं, अर्थात् कुल 34 न्यायाधीश।
- न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति संसद के पास है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of Judges)
- मुख्य न्यायाधीश (CJI) की नियुक्ति:
- राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को सामान्यतः भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है (यह एक स्थापित परंपरा है)।
- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति:
- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के ऐसे अन्य न्यायाधीशों के परामर्श के बाद की जाती है जिनसे वह परामर्श करना आवश्यक समझें।
- कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System): व्यावहारिक रूप से, नियुक्तियाँ कॉलेजियम की सिफारिशों के आधार पर होती हैं। कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
योग्यताएँ (Qualifications)
उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति के पास निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:
- वह भारत का नागरिक हो।
- और,
- उसे किसी उच्च न्यायालय (High Court) में कम से कम 5 वर्ष के लिए न्यायाधीश होना चाहिए; या
- उसे किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष के लिए अधिवक्ता (advocate) होना चाहिए; या
- वह राष्ट्रपति की राय में एक प्रतिष्ठित न्यायविद् (distinguished jurist) हो।
कार्यकाल और पद से हटाना
- कार्यकाल: न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं।
- पदत्याग: वे अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंप सकते हैं।
- पद से हटाना (Removal/Impeachment):
- राष्ट्रपति के आदेश से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जा सकता है।
- यह आदेश केवल “साबित कदाचार (proved misbehaviour) या अक्षमता (incapacity)” के आधार पर ही जारी किया जा सकता है।
- इस प्रक्रिया के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित व मतदान करने वालों का दो-तिहाई बहुमत) से एक प्रस्ताव पारित किया जाना आवश्यक होता है।
उच्चतम न्यायालय का क्षेत्राधिकार और शक्तियाँ (Jurisdiction and Powers)
उच्चतम न्यायालय की शक्तियों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. मूल/प्रारंभिक क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) – अनुच्छेद 131
- यह उन विवादों से संबंधित है जिनकी सुनवाई सीधे उच्चतम न्यायालय में ही हो सकती है, किसी अन्य न्यायालय में नहीं।
- इसमें निम्नलिखित मामले शामिल हैं:
- केंद्र और एक या अधिक राज्यों के बीच का विवाद।
- केंद्र और कोई राज्य एक तरफ तथा एक या अधिक अन्य राज्य दूसरी तरफ, के बीच का विवाद।
- दो या दो से अधिक राज्यों के बीच का विवाद।
2. रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) – अनुच्छेद 32
- मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय एक गारंटर और रक्षक है।
- यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में पाँच प्रकार की रिट जारी कर सकता है: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा।
- अनुच्छेद 32 स्वयं में एक मौलिक अधिकार है।
3. अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction)
- उच्चतम न्यायालय, भारत का अंतिम अपील न्यायालय है। यह निचली अदालतों (मुख्य रूप से उच्च न्यायालयों) के फैसलों के खिलाफ अपीलें सुनता है।
- यह अपीलें निम्नलिखित मामलों में हो सकती हैं:
- संवैधानिक मामले (Constitutional matters): यदि उच्च न्यायालय प्रमाणित करे कि मामले में कानून का कोई सारवान प्रश्न (substantial question of law) निहित है जिसकी व्याख्या संविधान के संदर्भ में आवश्यक है।
- दीवानी/सिविल मामले (Civil matters): यदि मामला सामान्य महत्व के कानून के सारवान प्रश्न से संबंधित है।
- आपराधिक मामले (Criminal matters): यदि उच्च न्यायालय ने किसी अभियुक्त को बरी करने के आदेश को पलटकर उसे मृत्युदंड दे दिया हो।
4. सलाहकारी क्षेत्राधिकार (Advisory Jurisdiction) – अनुच्छेद 143
- राष्ट्रपति, विधि या तथ्य के किसी भी सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से सलाह माँग सकते हैं।
- न्यायालय अपनी सलाह देने के लिए बाध्य नहीं है।
- और राष्ट्रपति भी न्यायालय द्वारा दी गई सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।
5. अभिलेख न्यायालय (Court of Record) – अनुच्छेद 129
- इसके दो अर्थ हैं:
- उच्चतम न्यायालय के निर्णय और कार्यवाहियाँ साक्ष्य के रूप में दर्ज की जाती हैं और वे सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर बाध्यकारी होती हैं।
- न्यायालय को अपनी अवमानना (Contempt of Court) के लिए दंडित करने की शक्ति प्राप्त है।
6. न्यायिक समीक्षा की शक्ति (Power of Judicial Review)
- यह उच्चतम न्यायालय की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक है।
- इसके तहत, न्यायालय केंद्र और राज्य सरकारों के विधायी अधिनियमों और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच कर सकता है।
- यदि कोई कानून या आदेश संविधान के प्रावधानों (विशेषकर मूल ढाँचे) का उल्लंघन करता है, तो उच्चतम न्यायालय उसे अमान्य या शून्य घोषित कर सकता है।
7. अन्य शक्तियाँ
- वह अपने स्वयं के निर्णयों की समीक्षा कर सकता है।
- भारत के संपूर्ण क्षेत्र में न्यायिक अधीक्षण की शक्ति।
निष्कर्ष:
उच्चतम न्यायालय केवल एक न्यायिक संस्था नहीं है, बल्कि यह संविधान का प्रहरी, नागरिकों के अधिकारों का रक्षक और विधि के शासन का सर्वोच्च प्रतीक है, जो भारतीय लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखता है।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)
परिभाषा:
न्यायिक समीक्षा, न्यायपालिका (विशेषकर उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों) की वह शक्ति है जिसके द्वारा वह विधायिका (Legislature) द्वारा बनाए गए कानूनों और कार्यपालिका (Executive) द्वारा जारी किए गए आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करती है।
यदि जाँच में कोई कानून या आदेश संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता है, तो न्यायपालिका उसे अमान्य, अवैध और शून्य (unconstitutional, illegal and void) घोषित कर सकती है।
- सरल शब्दों में: यह न्यायपालिका की “अंपायर” की भूमिका है, जो यह सुनिश्चित करती है कि सरकार के सभी अंग (विधायिका और कार्यपालिका) संविधान द्वारा निर्धारित नियमों और सीमाओं के भीतर ही रहकर काम करें।
स्रोत: न्यायिक समीक्षा की अवधारणा अमेरिका के संविधान से प्रेरित है, जहाँ इसे ‘मारबरी बनाम मैडिसन’ (1803) के ऐतिहासिक मामले में मुख्य न्यायाधीश जॉन मार्शल द्वारा स्थापित किया गया था।
भारतीय संविधान में न्यायिक समीक्षा का आधार
यद्यपि भारतीय संविधान में ‘न्यायिक समीक्षा’ शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है, लेकिन कई अनुच्छेद अप्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका को यह शक्ति प्रदान करते हैं। इसके संवैधानिक आधार निम्नलिखित हैं:
- अनुच्छेद 13: यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से घोषित करता है कि कोई भी ‘विधि’ (कानून), जो मौलिक अधिकारों (भाग-3) का उल्लंघन करती है या उनसे असंगत है, उस मात्रा तक शून्य होगी। यह न्यायिक समीक्षा का सबसे स्पष्ट आधार है।
- अनुच्छेद 32 और 226:
- अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट (writ) जारी करने की शक्ति देता है, जो न्यायिक समीक्षा का एक रूप है।
- अनुच्छेद 226 यही शक्ति उच्च न्यायालयों को प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 131, 132, 133, 134, 135: ये अनुच्छेद उच्चतम न्यायालय को केंद्र-राज्य विवादों और विभिन्न अपीलीय मामलों में कानूनों की संवैधानिक व्याख्या करने का अधिकार देते हैं।
- अनुच्छेद 143: राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से सलाह मांगने की शक्ति देता है, जिसमें कानूनों की संवैधानिकता का प्रश्न शामिल हो सकता है।
- अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची: ये अनुच्छेद केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण को परिभाषित करते हैं। न्यायपालिका यह सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक समीक्षा का प्रयोग करती है कि कोई भी (केंद्र या राज्य) अपने विधायी क्षेत्र का अतिक्रमण न करे।
केशवानंद भारती मामला (1973): इस मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि न्यायिक समीक्षा संविधान के “मूल ढाँचे” (Basic Structure) का एक हिस्सा है, और इसलिए इसे संसद द्वारा संशोधन करके भी छीना या कम नहीं किया जा सकता।
न्यायिक समीक्षा का दायरा (Scope of Judicial Review)
न्यायिक समीक्षा का प्रयोग निम्नलिखित के विरुद्ध किया जा सकता है:
- संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित कानून (Legislative Acts):
- न्यायपालिका यह जाँच कर सकती है कि क्या कोई कानून संविधान के मौलिक अधिकारों (भाग-3) या अन्य किसी प्रावधान का उल्लंघन तो नहीं करता।
- वह यह भी देखती है कि क्या कानून बनाने वाली विधायिका ने अपनी शक्तियों की सीमा (legislative competence) के भीतर रहकर काम किया है।
- कार्यपालिका के आदेश (Executive Orders):
- राष्ट्रपति, राज्यपाल या अन्य अधिकारियों द्वारा जारी किए गए आदेश, अध्यादेश और नियम।
- संवैधानिक संशोधन (Constitutional Amendments):
- केशवानंद भारती मामले के बाद, न्यायपालिका अब यह भी समीक्षा कर सकती है कि क्या कोई संविधान संशोधन ‘मूल ढाँचे’ के सिद्धांत का उल्लंघन तो नहीं करता है। (जैसे: 99वें संविधान संशोधन, जो राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग से संबंधित था, को उच्चतम न्यायालय ने 2015 में अमान्य घोषित कर दिया था)।
न्यायिक समीक्षा का महत्व (Significance of Judicial Review)
- संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखना:
- यह सुनिश्चित करती है कि संविधान देश का सर्वोच्च कानून बना रहे और सरकार का कोई भी अंग इसका उल्लंघन न कर सके।
- मौलिक अधिकारों की रक्षा:
- यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों को विधायिका और कार्यपालिका के अतिक्रमण से बचाती है। यह मौलिक अधिकारों का “रक्षक” है।
- संघीय संतुलन बनाए रखना:
- यह केंद्र और राज्यों को अपने-अपने विधायी क्षेत्रों तक सीमित रखकर देश के संघीय संतुलन को बनाए रखने में मदद करती है।
- शक्तियों के पृथक्करण को लागू करना:
- यह सुनिश्चित करती है कि विधायिका और कार्यपालिका अपनी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन न करें, जिससे शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत लागू होता है।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता:
- यह शक्ति न्यायपालिका को सरकार के अन्य दो अंगों से स्वतंत्र रहकर कार्य करने में सक्षम बनाती है।
न्यायिक समीक्षा की आलोचना
कुछ आलोचक इसे “न्यायिक अतिक्रमण” (Judicial Activism/Overreach) कहते हैं और निम्नलिखित तर्क देते हैं:
- यह लोकतंत्र के विरुद्ध है क्योंकि गैर-निर्वाचित न्यायाधीश, जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के कानूनों को रद्द कर सकते हैं।
- यह प्रगतिशील कानूनों में बाधा उत्पन्न कर सकती है।
- न्यायाधीशों के व्यक्तिगत पूर्वाग्रह उनके निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।
निष्कर्ष:
आलोचनाओं के बावजूद, न्यायिक समीक्षा भारतीय लोकतंत्र का एक अनिवार्य स्तंभ है। यह शक्तियों पर एक आवश्यक नियंत्रण और संतुलन (check and balance) स्थापित करती है, जो सरकार को निरंकुश होने से रोकता है और विधि के शासन (Rule of Law) को सुनिश्चित करता है।
न्यायिक सक्रियता (Jud-icial Activism)
परिभाषा:
न्यायिक सक्रियता, न्यायपालिका की उस सक्रिय और प्रगतिशील भूमिका को संदर्भित करती है जिसमें वह समाज में न्याय सुनिश्चित करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी पारंपरिक शक्तियों से आगे बढ़कर कार्यपालिका (Executive) और विधायिका (Legislature) को उनके संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए निर्देश देती है।
- सरल शब्दों में: जब न्यायपालिका केवल मूक दर्शक बनकर मुकदमों का इंतजार नहीं करती, बल्कि समाज में व्याप्त अन्याय, सरकारी निष्क्रियता या भ्रष्टाचार को देखकर खुद आगे बढ़कर पहल करती है और हस्तक्षेप करती है, तो उसे न्यायिक सक्रियता कहते हैं।
इसका मुख्य उद्देश्य “सामाजिक न्याय” (Social Justice) की स्थापना करना और सरकार के अन्य अंगों को उनकी जवाबदेही का एहसास कराना है।
न्यायिक सक्रियता की उत्पत्ति और विकास (Origin and Evolution)
- वैश्विक उत्पत्ति: न्यायिक सक्रियता की अवधारणा अमेरिका में विकसित हुई।
- भारत में उत्पत्ति (1970-80 का दशक): भारत में इसकी शुरुआत आपातकाल (1975-77) के बाद हुई, जब नागरिक अधिकारों का बड़े पैमाने पर हनन हुआ। इस दौरान न्यायपालिका की भूमिका निष्क्रिय मानी गई।
- आपातकाल के बाद, उच्चतम न्यायालय ने अपनी भूमिका को फिर से परिभाषित किया और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अधिक मुखर और सक्रिय दृष्टिकोण अपनाया।
- न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर, न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती, और न्यायमूर्ति ओ. चिन्नप्पा रेड्डी को भारत में न्यायिक सक्रियता का प्रणेता माना जाता है।
न्यायिक सक्रियता के मुख्य कारण (Reasons for Judicial Activism)
- कार्यपालिका की निष्क्रियता: जब कार्यपालिका अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहती है या भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाती है, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
- विधायिका का पतन: जब विधायिका जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने और समय पर कानून बनाने में असफल हो जाती है।
- नागरिकों का न्यायपालिका पर बढ़ता विश्वास: लोगों का यह मानना है कि जब कोई नहीं सुनता, तो न्यायपालिका सुनेगी।
- संविधान की उदार व्याख्या: न्यायाधीशों द्वारा संविधान के प्रावधानों (विशेषकर अनुच्छेद 21 – जीवन का अधिकार) की व्यापक और उदार व्याख्या ने न्यायिक सक्रियता को बढ़ावा दिया।
न्यायिक सक्रियता के साधन (Tools of Judicial Activism)
न्यायपालिका ने न्यायिक सक्रियता को प्रभावी बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण साधनों का विकास किया, जिनमें सबसे प्रमुख है जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL)।
जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL)
- परिभाषा: PIL या जनहित याचिका, न्यायिक सक्रियता का सबसे शक्तिशाली उपकरण है। इसके तहत, कोई भी पीड़ित व्यक्ति या कोई अन्य सामाजिक कार्यकर्ता या संगठन किसी ऐसे व्यक्ति या समूह के अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) या उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) में याचिका दायर कर सकता है, जो गरीबी, अज्ञानता या अन्य किसी कारण से स्वयं न्यायालय नहीं जा सकता।
- परंपरागत नियम से भिन्न: पारंपरिक न्याय प्रणाली में केवल “पीड़ित पक्ष” (aggrieved party) ही न्यायालय जा सकता था (इसे Locus Standi का नियम कहते हैं)।
- क्रांतिकारी बदलाव: PIL ने ‘Locus Standi’ के इस कठोर नियम को शिथिल कर दिया। अब किसी भी सार्वजनिक महत्व के मुद्दे पर (जैसे- पर्यावरण प्रदूषण, भ्रष्टाचार, बाल श्रम, बंधुआ मजदूरी) कोई भी जागरूक नागरिक या NGO न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
- एक पोस्टकार्ड भी याचिका: न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती ने यहाँ तक कहा कि एक पोस्टकार्ड या पत्र को भी जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
न्यायिक सक्रियता के सकारात्मक प्रभाव (Positive Impacts)
- न्याय को सुलभ बनाया: इसने न्याय को समाज के सबसे गरीब और कमजोर वर्गों (बंधुआ मजदूर, कैदी, बच्चे) तक पहुँचाया।
- मौलिक अधिकारों का विस्तार: न्यायपालिका ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्याख्या करते हुए इसमें ‘गरिमामय जीवन का अधिकार’, ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’, ‘निजता का अधिकार (Right to Privacy)’, ‘मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार’ जैसे कई नए अधिकारों को शामिल किया।
- कार्यपालिका को जवाबदेह बनाया: इसने कार्यपालिका को भ्रष्टाचार और निष्क्रियता के मामलों में जवाबदेह ठहराया (जैसे- 2G घोटाला, कोयला घोटाला)।
- पर्यावरण संरक्षण: पर्यावरण से जुड़े कई ऐतिहासिक निर्णय (जैसे- दिल्ली में CNG बसों का अनिवार्य होना) न्यायिक सक्रियता का ही परिणाम हैं।
- चुनावी सुधार: राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए उम्मीदवारों द्वारा अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति और देनदारियों की घोषणा को अनिवार्य बनाना।
न्यायिक सक्रियता की आलोचना: न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach)
जब न्यायिक सक्रियता अपनी सीमाओं को लांघकर विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अत्यधिक हस्तक्षेप करने लगती है, तो इसे ‘न्यायिक अतिक्रमण’ (Jud-icial Overreach) कहा जाता है। इसकी आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की जाती है:
- शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन: आलोचकों का मानना है कि यह शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन है, क्योंकि न्यायपालिका कानून बनाने और नीति लागू करने का काम करने लगती है जो विधायिका और कार्यपालिका का कार्य है।
- न्यायपालिका की जवाबदेही का अभाव: न्यायाधीश निर्वाचित नहीं होते हैं, इसलिए वे जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं होते।
- न्यायालयों पर बोझ: PIL की बाढ़ ने न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ बढ़ा दिया है, जिससे सामान्य मामलों में न्याय मिलने में देरी होती है।
- लोकप्रियता हासिल करने का साधन: कुछ आलोचक इसे ‘Publicity Interest Litigation’ भी कहते हैं, क्योंकि इसका उपयोग कभी-कभी प्रचार पाने के लिए किया जाता है।
निष्कर्ष:
न्यायिक सक्रियता एक दोधारी तलवार है। जब तक इसका प्रयोग सरकार की निष्क्रियता को भरने और गरीबों को न्याय दिलाने के लिए किया जाता है, यह लोकतंत्र के लिए एक वरदान है। लेकिन जब यह अपनी सीमाओं को पार कर ‘न्यायिक अतिक्रमण’ का रूप ले लेती है, तो यह शक्तियों के संतुलन के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए, न्यायपालिका को ‘न्यायिक संयम’ (Judicial Restraint) बरतते हुए एक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।
जनहित याचिका (Public- Interest Litigation – PIL)
परिभाषा:
‘जनहित याचिका’, जिसका शाब्दिक अर्थ है “जनता के हित में मुकदमा”, भारतीय कानून द्वारा दिया गया एक ऐसा शक्तिशाली उपकरण है, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति या गैर-सरकारी संगठन (NGO) सार्वजनिक महत्व के किसी मुद्दे पर, जिसमें किसी व्यक्ति या समूह के मौलिक या कानूनी अधिकारों का हनन हो रहा हो, सीधे उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) या उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) में न्याय के लिए याचिका दायर कर सकता है।
- सरल शब्दों में: यह वह माध्यम है जिसके द्वारा वे लोग भी न्याय पा सकते हैं जो गरीबी, अज्ञानता, सामाजिक पिछड़ेपन या किसी अन्य कारण से खुद अदालत जाने में असमर्थ हैं। उनकी ओर से कोई भी दूसरा व्यक्ति या संगठन मुकदमा लड़ सकता है।
यह न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी साधन है।
PIL की उत्पत्ति और विकास
- वैश्विक उत्पत्ति: इसकी अवधारणा सबसे पहले अमेरिका में विकसित हुई थी।
- भारत में शुरुआत (1970-80 का दशक): भारत में जनहित याचिका की शुरुआत का श्रेय मुख्य रूप से उच्चतम न्यायालय के दो दूरदर्शी न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर और न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती, को दिया जाता है।
- ‘हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य’ (1979): इस मामले को भारत में पहली जनहित याचिका माना जाता है, जिसमें विचाराधीन कैदियों के अधिकारों का मुद्दा उठाया गया था।
- ‘एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ’ (1981): इस मामले ने भारत में जनहित याचिका को दृढ़ता से स्थापित किया।
“Locus Standi” (अभियोजन की स्थिति) के नियम में ढील
- पारंपरिक न्याय प्रणाली में ‘Locus Standi’ का कठोर नियम था, जिसका अर्थ था कि केवल वही व्यक्ति अदालत जा सकता है जिसके अधिकारों का सीधे तौर पर उल्लंघन हुआ हो (अर्थात् “केवल पीड़ित पक्ष”)।
- क्रांतिकारी परिवर्तन: PIL ने इस कठोर नियम को पूरी तरह से उदार बना दिया। अब, यदि कोई सार्वजनिक मुद्दा है, तो कोई भी व्यक्ति, भले ही वह सीधे तौर पर पीड़ित न हो, जनहित में न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। न्यायमूर्ति भगवती ने कहा था कि एक साधारण पत्र या पोस्टकार्ड को भी रिट याचिका के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
किन मुद्दों पर PIL दायर की जा सकती है?
PIL किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक हित के लिए दायर की जा सकती है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार के मुद्दे आते हैं:
- पर्यावरण प्रदूषण और पारिस्थितिक संतुलन।
- मानवाधिकारों का उल्लंघन, विशेषकर गरीब और वंचित वर्गों का।
- बंधुआ मजदूरी, बाल श्रम और श्रमिकों का शोषण।
- कैदियों के अधिकार और जेल सुधार।
- सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार और पद का दुरुपयोग।
- सरकारी नीतियों को लागू करने में निष्क्रियता।
- सड़क सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक मुद्दे।
- महिलाओं पर अत्याचार।
कौन PIL दायर कर सकता है?
कानूनन, कोई भी “सद्भाव रखने वाला भारतीय नागरिक” या सामाजिक संगठन PIL दायर कर सकता है, यदि उसका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित हो।
PIL कहाँ दायर की जाती है?
- उच्चतम न्यायालय में: अनुच्छेद 32 के तहत, यदि मामला मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा हो।
- उच्च न्यायालय में: अनुच्छेद 226 के तहत, यदि मामला मौलिक अधिकारों या किसी अन्य कानूनी अधिकार के उल्लंघन से जुड़ा हो।
जनहित याचिका का महत्व और प्रभाव (Significance and Impact)
- न्याय का लोकतंत्रीकरण: इसने न्याय को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के दायरे से निकालकर समाज के सबसे गरीब और कमजोर वर्गों तक पहुँचाया।
- मौलिक अधिकारों के दायरे का विस्तार: PIL के माध्यम से ही न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्याख्या करते हुए इसमें ‘गरिमामय जीवन’, ‘स्वच्छ पर्यावरण’, ‘आश्रय का अधिकार’, ‘निजता का अधिकार’ जैसे कई महत्वपूर्ण अधिकारों को शामिल किया है।
- सरकार की जवाबदेही: इसने कार्यपालिका और विधायिका को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया है। कई मामलों में, न्यायालय ने सरकारों को उनकी संवैधानिक जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए मजबूर किया है।
- भ्रष्टाचार पर रोक: PIL का उपयोग सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को उजागर करने और उस पर अंकुश लगाने के लिए एक प्रभावी हथियार के रूप में किया गया है।
- पर्यावरण का संरक्षण: भारत में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण कानूनी प्रगति PIL के माध्यम से ही हुई है (जैसे- ताजमहल का संरक्षण, गंगा की सफाई, दिल्ली में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण)।
PIL के दुरुपयोग और आलोचना
- दुर्भावनापूर्ण याचिकाएँ: कभी-कभी PIL का उपयोग व्यक्तिगत द्वेष, राजनीतिक लाभ या प्रसिद्धि पाने (Publicity Interest Litigation) के लिए किया जाता है।
- अनावश्यक न्यायिक हस्तक्षेप: इसके कारण न्यायालय उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने लगता है जो कार्यपालिका और विधायिका के डोमेन में आते हैं, जिससे ‘न्यायिक अतिक्रमण’ (Judicial Overreach) की स्थिति बनती है।
- न्यायालयों पर बढ़ता बोझ: बड़ी संख्या में तुच्छ PIL याचिकाओं के कारण न्यायालयों पर काम का बोझ बढ़ गया है, जिससे महत्वपूर्ण मामलों में देरी होती है।
निष्कर्ष:
आलोचनाओं और चुनौतियों के बावजूद, जनहित याचिका भारतीय न्याय प्रणाली की एक अनूठी और क्रांतिकारी देन है। यह विधि के शासन (Rule of Law) को बनाए रखने और समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाने का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है, जिसने भारत में सामाजिक और आर्थिक न्याय की अवधारणा को नई ऊँचाइयाँ दी हैं।
उच्च न्यायालय (The High Court)
परिभाषा:
उच्च न्यायालय किसी भी राज्य की न्यायिक प्रणाली के शिखर पर स्थित होता है। यह राज्य क्षेत्र के भीतर न्याय का सर्वोच्च न्यायालय है। हालाँकि, यह उच्चतम न्यायालय के अधीन और उसके अधीक्षण में कार्य करता है।
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों के गठन, स्वतंत्रता, अधिकार क्षेत्र, शक्तियों और प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है।
- अनुच्छेद 214: “प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।”
- अनुच्छेद 231: यह संसद को यह शक्ति देता है कि वह कानून द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों के लिए अथवा किसी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के लिए एक साझा उच्च न्यायालय (Common High Court) स्थापित कर सकती है।
- उदाहरण: पंजाब और हरियाणा का एक ही उच्च न्यायालय (चंडीगढ़ में) है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय असम, नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के लिए कार्य करता है।
स्थापना: भारत में सबसे पहले 1862 में तीन उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई थी: कलकत्ता, बंबई और मद्रास। वर्तमान में भारत में 25 उच्च न्यायालय हैं।
संरचना और संगठन (Composition and Organisation)
- न्यायाधीशों की संख्या (अनुच्छेद 216):
- प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) और ऐसे अन्य न्यायाधीश होते हैं जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझें।
- संविधान में न्यायाधीशों की कोई निश्चित संख्या निर्धारित नहीं की गई है; यह राष्ट्रपति के विवेक पर छोड़ दिया गया है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of Judges) – अनुच्छेद 217
- उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों (मुख्य और अन्य) की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति: राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के बाद नियुक्ति करते हैं।
- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति: राष्ट्रपति, CJI, संबंधित राज्य के राज्यपाल और उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के बाद नियुक्ति करते हैं।
- कॉलेजियम प्रणाली: व्यावहारिक रूप से, नियुक्तियाँ उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम की सिफारिशों के आधार पर होती हैं।
योग्यताएँ (Qualifications)
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति के पास निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:
- वह भारत का नागरिक हो।
- और,
- उसे भारत के राज्य क्षेत्र में कम से कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण करने का अनुभव हो; या
- वह किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता (advocate) रहा हो।
कार्यकाल और पद से हटाना
- कार्यकाल: न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं (उच्चतम न्यायालय के लिए यह 65 वर्ष है)।
- पदत्याग: वे अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंप सकते हैं।
- पद से हटाना (Removal):
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाया जाता है।
- अर्थात्, “साबित कदाचार या अक्षमता” के आधार पर, संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव के बाद राष्ट्रपति द्वारा।
उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार और शक्तियाँ (Jurisdiction and Powers)
1. प्रारंभिक/मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction)
- इसका अर्थ है कि कुछ मुकदमों की सुनवाई सीधे उच्च न्यायालय में शुरू हो सकती है।
- यह क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय की तुलना में संकीर्ण है।
- इसमें संसद और राज्य विधानमंडल के सदस्यों के चुनाव संबंधी विवाद, राजस्व मामले, विवाह, तलाक, और वसीयत से संबंधित मामले शामिल हैं।
2. रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) – अनुच्छेद 226
- यह उच्च न्यायालय की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक है।
- अनुच्छेद 226 के तहत, उच्च न्यायालय नागरिकों के मौलिक अधिकारों और अन्य किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन के लिए पाँच प्रकार की रिट जारी कर सकता है: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा।
- उच्चतम न्यायालय से तुलना: रिट जारी करने के मामले में उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय से भी व्यापक (wider) है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) केवल मौलिक अधिकारों के लिए रिट जारी कर सकता है, जबकि उच्च न्यायालय अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
3. अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate Jurisdiction)
- उच्च न्यायालय मुख्य रूप से एक अपीलीय न्यायालय है।
- यह अपने अधीनस्थ न्यायालयों (जैसे जिला न्यायालय) के निर्णयों के विरुद्ध दीवानी और आपराधिक, दोनों मामलों में अपीलें सुनता है।
4. अधीक्षण क्षेत्राधिकार (Supervisory Jurisdiction) – अनुच्छेद 227
- उच्च न्यायालय को अपने राज्य क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (tribunals) (सैन्य न्यायालयों को छोड़कर) के कामकाज का अधीक्षण (superintendence) करने की शक्ति प्राप्त है।
- यह एक बहुत व्यापक शक्ति है, जो उसे अधीनस्थ न्यायपालिका पर प्रशासनिक नियंत्रण प्रदान करती है।
5. अभिलेख न्यायालय (Court of Record) – अनुच्छेद 215
- इसके दो अर्थ हैं:
- उच्च न्यायालय के निर्णय और कार्यवाहियाँ रिकॉर्ड के रूप में रखी जाती हैं और वे अधीनस्थ न्यायालयों पर बाध्यकारी होती हैं।
- न्यायालय को अपनी अवमानना (Contempt of Court) के लिए दंडित करने की शक्ति प्राप्त है।
6. न्यायिक समीक्षा की शक्ति (Power of Judicial Review)
- उच्च न्यायालय, केंद्र और राज्य सरकार के कानूनों और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच कर सकता है।
- यदि कोई कानून या आदेश संविधान का उल्लंघन करता है, तो उसे अवैध या शून्य घोषित कर सकता है।
- न्यायिक समीक्षा की यह शक्ति भी संविधान के ‘मूल ढाँचे’ का हिस्सा है।
निष्कर्ष:
उच्च न्यायालय राज्य की न्यायिक प्रणाली की धुरी है। यह न केवल अधीनस्थ न्यायालयों के लिए अपील का अंतिम मंच है, बल्कि नागरिकों के मौलिक और कानूनी अधिकारों का एक प्रमुख संरक्षक भी है, जो विधि के शासन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अधिकरण / न्यायाधिकरण (Tribunals)
परिभाषा:
अधिकरण एक अर्ध-न्यायिक संस्था (Quasi-Judicial Body) होती है, जिसे प्रशासनिक (administrative) या कर-संबंधी (tax-related) जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के विवादों का निपटारा करने के लिए स्थापित किया जाता है। ये पारंपरिक न्यायालयों (जैसे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय) से अलग होते हैं, क्योंकि इनका कार्यक्षेत्र सीमित और विशिष्ट होता है।
इनका मुख्य उद्देश्य सामान्य न्यायालयों के काम के बोझ को कम करना और विशेष ज्ञान की आवश्यकता वाले मामलों में त्वरित (speedy), सस्ता (less expensive) और विशेषज्ञ (expert) न्याय प्रदान करना है।
संवैधानिक प्रावधान
- मूल संविधान में स्थिति: मूल संविधान में अधिकरणों से संबंधित कोई प्रावधान नहीं था।
- 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976:
- स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर, इस संशोधन द्वारा संविधान में एक नया भाग XIV-A (14-क) जोड़ा गया, जिसका शीर्षक है “अधिकरण” (Tribunals)।
- इस भाग में दो अनुच्छेद शामिल किए गए:
- अनुच्छेद 323-A: प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunals)।
- अनुच्छेद 323-B: अन्य मामलों के लिए अधिकरण (Tribunals for other matters)।
1. प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunals) – अनुच्छेद 323-A
- उद्देश्य: अनुच्छेद 323-A संसद को यह अधिकार देता है कि वह केंद्र और राज्यों की लोक सेवाओं (public services) में भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित विवादों के समाधान के लिए प्रशासनिक अधिकरणों की स्थापना करे।
- प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985:
- इसी अनुच्छेद के तहत, संसद ने प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम, 1985 पारित किया।
- इस अधिनियम के तहत निम्नलिखित अधिकरण स्थापित किए गए:
- (क) केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (Central Administrative Tribunal – CAT):
- स्थापना: 1985
- मुख्य पीठ (Principal Bench): दिल्ली
- कार्यक्षेत्र: यह केंद्र सरकार के कर्मचारियों की भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित विवादों और शिकायतों का निपटारा करता है। इसमें अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS), केंद्रीय लोक सेवाओं, और केंद्र सरकार के अधीन सिविल पदों पर नियुक्त कर्मचारी शामिल हैं।
- नोट: रक्षा बलों के सदस्य, उच्चतम न्यायालय और संसद के सचिवालय के कर्मचारी इसके दायरे में नहीं आते हैं।
- (ख) राज्य प्रशासनिक अधिकरण (State Administrative Tribunals – SATs):
- यह अधिनियम केंद्र सरकार को संबंधित राज्य सरकार के अनुरोध पर राज्य प्रशासनिक अधिकरण (SAT) स्थापित करने का भी अधिकार देता है।
- SAT राज्य सरकार के कर्मचारियों की भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित मामलों की सुनवाई करता है।
- (ग) संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण (Joint Administrative Tribunals – JATs):
- संसद, दो या अधिक राज्यों के लिए एक संयुक्त प्रशासनिक अधिकरण भी स्थापित कर सकती है।
- चंद्र कुमार मामला (1997):
- प्रारंभ में, CAT और SAT के निर्णयों के विरुद्ध अपील केवल उच्चतम न्यायालय में की जा सकती थी।
- लेकिन चंद्र कुमार मामले में, उच्चतम न्यायालय ने इस प्रावधान को अमान्य कर दिया और यह निर्णय दिया कि इन अधिकरणों के निर्णयों के विरुद्ध अपील संबंधित उच्च न्यायालय (High Court) की खंडपीठ (Division Bench) में की जा सकती है। न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालयों का न्यायिक समीक्षा का अधिकार संविधान के ‘मूल ढाँचे’ का हिस्सा है, जिसे छीना नहीं जा सकता।
2. अन्य मामलों के लिए अधिकरण (Tribunals for Other Matters) – अनुच्छेद 323-B
- उद्देश्य:अनुच्छेद 323-Bसंसद और राज्य विधानमंडलों (अपने-अपने क्षेत्राधिकार के भीतर) को निम्नलिखित मामलों से संबंधित विवादों के समाधान के लिए अधिकरणों की स्थापना का अधिकार देता है:
- कर-निर्धारण (Taxation)
- विदेशी मुद्रा और आयात-निर्यात (Foreign Exchange and Imports-Exports)
- औद्योगिक और श्रम विवाद (Industrial and Labour disputes)
- भूमि सुधार (Land reforms)
- शहरी संपत्ति की अधिकतम सीमा (Ceiling on urban property)
- संसद और राज्य विधानमंडलों के लिए निर्वाचन
- खाद्य पदार्थों का उत्पादन और वितरण
- अनुच्छेद 323-A और 323-B में मुख्य अंतर:
| आधार | अनुच्छेद 323-A (प्रशासनिक) | अनुच्छेद 323-B (अन्य) |
| विषय | केवल लोक सेवा मामलों से संबंधित। | विभिन्न विशिष्ट विषयों (कर, श्रम आदि) से संबंधित। |
| स्थापना | अधिकरण केवल संसद द्वारा स्थापित किए जा सकते हैं। | अधिकरण संसद और राज्य विधानमंडल, दोनों द्वारा स्थापित किए जा सकते हैं। |
| पदानुक्रम | इसमें केवल एक अधिकरण (केंद्र या राज्य के लिए) की स्थापना का प्रावधान है। | इसमें अधिकरणों का एक पदानुक्रम (hierarchy) स्थापित किया जा सकता है। |
अन्य अधिकरणों के कुछ उदाहरण:
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT): पर्यावरण संबंधी मामलों के लिए।
- आयकर अपीलीय अधिकरण (Income Tax Appellate Tribunal)।
- सशस्त्र बल अधिकरण (Armed Forces Tribunal)।
- ऋण वसूली अधिकरण (Debt Recovery Tribunal)।
अधिकरणों का महत्व (Significance of Tribunals)
- त्वरित न्याय: ये सामान्य न्यायालयों की तुलना में मामलों का निपटारा अधिक तेजी से करते हैं।
- कम खर्चीला: इनकी प्रक्रिया कम औपचारिक और कम खर्चीली होती है।
- विशेषज्ञता: इनमें न्यायिक सदस्यों के साथ-साथ संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ (Expert members) भी होते हैं, जो मामलों की तकनीकी बारीकियों को बेहतर ढंग से समझते हैं।
- न्यायालयों का बोझ कम करना: ये सामान्य अदालतों (विशेषकर उच्च न्यायालयों) के कार्यभार को कम करते हैं, जिससे वे अधिक महत्वपूर्ण मामलों पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।
निष्कर्ष: अधिकरण भारतीय न्याय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो पारंपरिक न्यायपालिका के पूरक के रूप में कार्य करते हैं और विशिष्ट प्रकार के विवादों के समाधान के लिए एक प्रभावी मंच प्रदान करते हैं।
अधीनस्थ न्यायालय (The Subordinate Courts)
परिभाषा:
राज्य की न्यायिक प्रणाली में, उच्च न्यायालय (High Court) के अधीन कार्य करने वाले सभी न्यायालयों को सामूहिक रूप से अधीनस्थ न्यायालय कहा जाता है। ये जिला और उससे निचले स्तर पर कार्य करते हैं।
इन न्यायालयों को ‘निचली अदालतें’ (Lower Courts) भी कहा जाता है।
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-6 में अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों के संगठन, संरचना और नियंत्रण से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
अधीनस्थ न्यायपालिका की संरचना (Structure of the Subordinate Judiciary)
राज्य में अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना और पदनाम (designation) राज्यों के अनुसार थोड़े भिन्न हो सकते हैं, लेकिन मोटे तौर पर एक समान पदानुक्रम (hierarchy) होता है। इन्हें मुख्यतः दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
- जिला एवं सत्र न्यायाधीश न्यायालय (District and Sessions Judge’s Court) – यह जिले का सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण है।
- अन्य अधीनस्थ न्यायालय (Other Subordinate Courts)
1. जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District and Sessions Judge)
- एक ही न्यायाधीश, दोहरी भूमिका:
- जब न्यायाधीश दीवानी (सिविल) मामलों की सुनवाई करता है, तो उसे “जिला न्यायाधीश” (District Judge) कहा जाता है।
- जब वही न्यायाधीश आपराधिक (क्रिमिनल) मामलों की सुनवाई करता है, तो उसे “सत्र न्यायाधीश” (Sessions Judge) कहा जाता है।
- नियुक्ति (अनुच्छेद 233):
- जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना (posting) और पदोन्नति राज्य के राज्यपाल द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है।
- योग्यता: जिला न्यायाधीश बनने के लिए, किसी व्यक्ति को कम से कम 7 वर्ष का वकील का अनुभव होना चाहिए और उसकी नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय द्वारा सिफारिश की जानी चाहिए।
- क्षेत्राधिकार:
- दीवानी मामलों में: इसके पास संपत्ति, अनुबंध, विवाह, तलाक आदि से जुड़े मुकदमों की सुनवाई का अधिकार होता है। इसके फैसलों के खिलाफ अपील उच्च न्यायालय में होती है।
- आपराधिक मामलों में: इसके पास हत्या, डकैती, बलात्कार जैसे गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई का अधिकार होता है। यह मृत्युदंड सहित कोई भी दंड दे सकता है।
- मृत्युदंड का अनुमोदन: सत्र न्यायाधीश द्वारा दिए गए किसी भी मृत्युदंड को प्रभावी होने से पहले उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि (confirmation) करना अनिवार्य होता है, भले ही दोषी व्यक्ति ने कोई अपील न की हो।
2. जिला एवं सत्र न्यायालय के अधीन अन्य न्यायालय
इन न्यायालयों को फिर से दीवानी और आपराधिक श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
| दीवानी पक्ष (Civil Side) | आपराधिक पक्ष (Criminal Side) |
| (i) अधीनस्थ न्यायाधीश न्यायालय (Subordinate Judge’s Court)<br>- यह दीवानी मामलों को सुनता है।<br>- इसके पास असीमित वित्तीय क्षेत्राधिकार हो सकता है।<br>- इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायालय में होती है। | (i) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय (Court of Chief Judicial Magistrate – CJM)<br>- यह उन आपराधिक मामलों को सुनता है जिनमें सजा 7 वर्ष तक की हो सकती है।<br>- इसके नीचे प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट होते हैं। |
| (ii) मुंसिफ न्यायालय (Munsiff’s Court)<br>- यह छोटे वित्तीय मूल्य के दीवानी मामलों की सुनवाई करता है।<br>- यह न्यायपालिका का सबसे निचला स्तर है। | (ii) न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय (Court of Judicial Magistrate)<br>- यह उन मामलों की सुनवाई करता है जिनमें 3 वर्ष तक की सजा हो सकती है। |
नोट: महानगरों (Metropolitan Cities) में, इन न्यायाधीशों के पदनाम बदल जाते हैं, जैसे:
- जिला न्यायाधीश → नगर सिविल न्यायाधीश (City Civil Judge)
- मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट → मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट (Chief Metropolitan Magistrate)
- न्यायिक मजिस्ट्रेट → महानगर मजिस्ट्रेट (Metropolitan Magistrate)
न्यायिक अधिकारियों पर नियंत्रण (Control over Judicial Officers)
- अनुच्छेद 235 के अनुसार, जिला न्यायालयों और उनसे अधीनस्थ सभी न्यायालयों का नियंत्रण (posting, promotion, grant of leave, etc.) संबंधित उच्च न्यायालय में निहित होता है।
- इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधीनस्थ न्यायपालिका कार्यपालिका (Executive) के हस्तक्षेप से स्वतंत्र रहकर निष्पक्ष रूप से कार्य करे।
लोक अदालतें (Lok Adalats)
- ‘लोक अदालत’ का अर्थ है ‘जनता की अदालत’। ये एक वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) का मंच हैं।
- उद्देश्य: इनका मुख्य उद्देश्य लंबित मामलों का आपसी समझौते के माध्यम से, त्वरित और कम खर्चे में निपटारा करना है।
- वैधानिक दर्जा: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987) के तहत इन्हें वैधानिक दर्जा दिया गया है।
- निर्णय:
- लोक अदालत का निर्णय एक दीवानी न्यायालय की डिक्री के समान माना जाता है।
- इसका निर्णय अंतिम और दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोक अदालत के निर्णय के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती।
- शुल्क वापसी: यदि कोई मामला जो नियमित अदालत में लंबित था, लोक अदालत में सुलझा लिया जाता है, तो वादी द्वारा भुगतान किया गया कोर्ट शुल्क वापस कर दिया जाता है।
निष्कर्ष:
अधीनस्थ न्यायालय भारतीय न्यायिक प्रणाली की नींव हैं। ये न्याय तक पहुँच का पहला बिंदु हैं और देश की अधिकांश न्यायिक कार्यवाही यहीं संचालित होती है। उच्च न्यायालय का प्रशासनिक नियंत्रण इनकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।