भारत के राष्ट्रपति (The President of India)

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भारत का राष्ट्रपति देश का राष्ट्र प्रमुख (Head of the State) होता है और भारत का प्रथम नागरिक कहलाता है। वह भारतीय संघ की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख भी होता है। संसदीय व्यवस्था होने के कारण, राष्ट्रपति नाममात्र का कार्यकारी प्रमुख (Nominal Executive) होता है, जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं।

संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 52 से 78 तक संघ की कार्यपालिका का वर्णन है, जिसमें राष्ट्रपति एक केंद्रीय भूमिका में हैं।


अनुच्छेद 52: भारत का राष्ट्रपति

यह अनुच्छेद कहता है कि “भारत का एक राष्ट्रपति होगा।”

निर्वाचन (Election) – अनुच्छेद 54 एवं 55

योग्यताएँ (Qualifications) – अनुच्छेद 58

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो।
  3. वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  4. वह किसी भी लाभ के पद (Office of Profit) पर न हो।

कार्यकाल एवं पदत्याग (Term and Resignation) – अनुच्छेद 56


महाभियोग (Impeachment) – अनुच्छेद 61

राष्ट्रपति को उनके कार्यकाल से पूर्व केवल “संविधान का उल्लंघन” (Violation of the Constitution) के आधार पर ही हटाया जा सकता है। यह एक अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया है।

नोट: अब तक भारत के किसी भी राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं लगाया गया है।


राष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य (Powers and Functions of the President)

राष्ट्रपति की शक्तियों को कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

1. कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers)

2. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

3. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)

4. न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers)

5. सैन्य शक्तियाँ (Military Powers)

6. राजनयिक शक्तियाँ (Diplomatic Powers)

7. आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers)

राष्ट्रपति को तीन प्रकार की आपातकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं:


वीटो शक्ति (Veto Power)

राष्ट्रपति को संसद द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में तीन प्रकार की वीटो शक्तियाँ प्राप्त हैं:

  1. आत्यंतिक वीटो (Absolute Veto): विधेयक पर अपनी राय सुरक्षित रखना (अर्थात्, सहमति न देना), जिससे विधेयक समाप्त हो जाता है।
  2. निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto): विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को वापस भेजना।
  3. पॉकेट वीटो (Pocket Veto): विधेयक पर न तो सहमति देना, न ही असहमति जताना और न ही पुनर्विचार के लिए भेजना, बल्कि उसे अनिश्चित काल के लिए अपने पास लंबित रखना। (जैसे 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने ‘भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक’ पर इसका प्रयोग किया था)।

भारत के राष्ट्रपतियों की सूची (List of Presidents of India)

क्रम संख्यानामकार्यकाल (आरंभ)कार्यकाल (समाप्त)महत्वपूर्ण तथ्य
1.डॉ. राजेन्द्र प्रसाद26 जनवरी 195013 मई 1962भारत के पहले राष्ट्रपति; एकमात्र राष्ट्रपति जिन्होंने दो कार्यकाल पूरे किए।
2.डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन13 मई 196213 मई 1967भारत के पहले उपराष्ट्रपति; इनके जन्मदिन को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
3.डॉ. जाकिर हुसैन13 मई 19673 मई 1969भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति; कार्यकाल के दौरान मृत्यु।
वराहगिरि वेंकट गिरि (वी. वी. गिरि)3 मई 196920 जुलाई 1969कार्यवाहक राष्ट्रपति।
मोहम्मद हिदायतुल्लाह20 जुलाई 196924 अगस्त 1969कार्यवाहक राष्ट्रपति; भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश।
4.वराहगिरि वेंकट गिरि (वी. वी. गिरि)24 अगस्त 196924 अगस्त 1974स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुने गए।
5.फखरुद्दीन अली अहमद24 अगस्त 197411 फरवरी 1977कार्यकाल के दौरान मृत्यु; इनके समय में आपातकाल (1975) लगा।
बसप्पा दानप्पा जत्ती (बी. डी. जत्ती)11 फरवरी 197725 जुलाई 1977कार्यवाहक राष्ट्रपति।
6.नीलम संजीव रेड्डी25 जुलाई 197725 जुलाई 1982एकमात्र राष्ट्रपति जो निर्विरोध चुने गए; सबसे युवा राष्ट्रपति।
7.ज्ञानी जैल सिंह25 जुलाई 198225 जुलाई 1987भारत के पहले सिख राष्ट्रपति; ‘पॉकेट वीटो’ का प्रयोग किया।
8.रामास्वामी वेंकटरमन25 जुलाई 198725 जुलाई 1992
9.डॉ. शंकर दयाल शर्मा25 जुलाई 199225 जुलाई 1997
10.कोचेरिल रमन नारायणन (के. आर. नारायणन)25 जुलाई 199725 जुलाई 2002भारत के पहले दलित राष्ट्रपति।
11.डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम25 जुलाई 200225 जुलाई 2007“मिसाइल मैन” और “जनता के राष्ट्रपति” के रूप में प्रसिद्ध; भारत के पहले गैर-राजनीतिक राष्ट्रपति।
12.प्रतिभा देवीसिंह पाटिल25 जुलाई 200725 जुलाई 2012भारत की पहली महिला राष्ट्रपति।
13.प्रणब मुखर्जी25 जुलाई 201225 जुलाई 2017भारत रत्न से सम्मानित।
14.राम नाथ कोविन्द25 जुलाई 201725 जुलाई 2022
15.द्रौपदी मुर्मू25 जुलाई 2022पदासीनभारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति और दूसरी महिला राष्ट्रपति।

भारत के उपराष्ट्रपति (The Vice-President of India)

भारत का उपराष्ट्रपति देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है, जो राष्ट्रपति के बाद आता है। उपराष्ट्रपति का पद अमेरिका के उपराष्ट्रपति के पद की तर्ज पर बनाया गया है।

संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 63 से 71 तक उपराष्ट्रपति से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख है।


अनुच्छेद 63: भारत का उपराष्ट्रपति

यह अनुच्छेद कहता है कि “भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।”

निर्वाचन (Election) – अनुच्छेद 66

योग्यताएँ (Qualifications) – अनुच्छेद 66(3)

उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो।
  3. वह राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो (जबकि राष्ट्रपति के लिए लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता चाहिए)।
  4. वह किसी भी लाभ के पद (Office of Profit) पर न हो।

कार्यकाल एवं पदत्याग (Term and Resignation) – अनुच्छेद 67

पद से हटाने की प्रक्रिया (Removal Procedure) – अनुच्छेद 67(b)

उपराष्ट्रपति को उनके कार्यकाल से पूर्व पद से हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया राष्ट्रपति पर लगने वाले महाभियोग (Impeachment) जितनी जटिल नहीं है।

नोट: उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए “संविधान के उल्लंघन” जैसे किसी विशेष आधार का उल्लेख संविधान में नहीं किया गया है।


उपराष्ट्रपति के कार्य एवं शक्तियाँ (Functions and Powers of the Vice-President)

उपराष्ट्रपति के मुख्य रूप से दो प्रमुख कार्य हैं:

1. राज्यसभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman of the Rajya Sabha) – अनुच्छेद 64

2. राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना (Acting as President) – अनुच्छेद 65

महत्वपूर्ण बिंदु:


उपराष्ट्रपति से संबंधित अन्य तथ्य

निष्कर्ष:
यद्यपि उपराष्ट्रपति का पद राष्ट्रपति जितना शक्तिशाली नहीं है, फिर भी यह भारतीय शासन व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पद राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में निरंतरता सुनिश्चित करता है और राज्यसभा के सभापति के रूप में संसदीय प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।


भारत के उपराष्ट्रपतियों की सूची (List of Vice-Presidents of India)

क्रम संख्यानामकार्यकाल (आरंभ)कार्यकाल (समाप्त)महत्वपूर्ण तथ्य
1.सर्वपल्ली राधाकृष्णन13 मई 195212 मई 1962भारत के पहले उपराष्ट्रपति; दो कार्यकाल पूरे किए।
2.जाकिर हुसैन13 मई 196212 मई 1967बाद में भारत के राष्ट्रपति बने।
3.वराहगिरि वेंकट गिरि (वी. वी. गिरि)13 मई 19673 मई 1969राष्ट्रपति बनने के लिए पद से इस्तीफा दिया।
4.गोपाल स्वरूप पाठक31 अगस्त 196930 अगस्त 1974
5.बसप्पा दानप्पा जत्ती (बी. डी. जत्ती)31 अगस्त 197430 अगस्त 1979फखरुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के बाद कार्यवाहक राष्ट्रपति बने।
6.मोहम्मद हिदायतुल्लाह31 अगस्त 197930 अगस्त 1984भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश।
7.रामास्वामी वेंकटरमन31 अगस्त 198424 जुलाई 1987बाद में भारत के राष्ट्रपति बने।
8.शंकर दयाल शर्मा3 सितंबर 198724 जुलाई 1992बाद में भारत के राष्ट्रपति बने।
9.कोचेरिल रमन नारायणन (के. आर. नारायणन)21 अगस्त 199224 जुलाई 1997बाद में भारत के राष्ट्रपति बने।
10.कृष्ण कांत21 अगस्त 199727 जुलाई 2002कार्यकाल के दौरान मृत्यु।
11.भैरों सिंह शेखावत19 अगस्त 200221 जुलाई 2007
12.मोहम्मद हामिद अंसारी11 अगस्त 200710 अगस्त 2017एस. राधाकृष्णन के बाद दो कार्यकाल पूरे करने वाले दूसरे उपराष्ट्रपति।
13.मुप्पवरपु वेंकैया नायडू11 अगस्त 201710 अगस्त 2022
14.जगदीप धनखड़11 अगस्त 20222025

15.              सी. पी. राधाकृष्णन     पदासीन


प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद (The Prime Minister and the Council of Ministers)

भारत की संसदीय प्रणाली में राष्ट्रपति नाममात्र के कार्यकारी प्रमुख (Nominal Executive) होते हैं, जबकि प्रधानमंत्री, अपनी मंत्रिपरिषद के साथ, वास्तविक कार्यकारी प्रमुख (Real Executive) होते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 74 और 75 में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद से संबंधित विस्तृत प्रावधान किए गए हैं।

अनुच्छेद 74(1): “राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा, और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा।”


प्रधानमंत्री (The Prime Minister)

प्रधानमंत्री भारतीय शासन व्यवस्था का केंद्रीय और सबसे शक्तिशाली पद है। वह सरकार का प्रमुख होता है।

नियुक्ति (Appointment)

शक्तियाँ एवं कार्य (Powers and Functions)

प्रधानमंत्री की शक्तियों को विभिन्न संदर्भों में समझा जा सकता है:

1. मंत्रिपरिषद के संबंध में:

2. राष्ट्रपति के संबंध में:

3. संसद के संबंध में:

4. अन्य शक्तियाँ:


मंत्रिपरिषद (The Council of Ministers)

मंत्रिपरिषद वह वृहद् निकाय है जिसमें सरकार के सभी मंत्री शामिल होते हैं। यह एक टीम के रूप में काम करती है जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं।

मंत्रिपरिषद की संरचना और रचना

मंत्रिपरिषद में तीन श्रेणियों के मंत्री होते हैं:

मंत्री का प्रकारविवरण
1. कैबिनेट मंत्री* ये सबसे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण मंत्री होते हैं।<br>* ये अपने-अपने मंत्रालयों (जैसे- गृह, रक्षा, वित्त, विदेश) के प्रमुख होते हैं।<br>* मंत्रिमंडल (Cabinet) इन्हीं मंत्रियों से मिलकर बनता है। सरकार के सभी प्रमुख नीतिगत निर्णय मंत्रिमंडल की बैठकों में ही लिए जाते हैं।
2. राज्य मंत्री* इनकी दो श्रेणियाँ होती हैं:<br> (क) राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार): इन्हें छोटे मंत्रालयों का स्वतंत्र प्रभार दिया जाता है। ये कैबिनेट की बैठकों में तभी भाग लेते हैं जब उनके मंत्रालय से संबंधित किसी विषय पर चर्चा हो।<br> (ख) राज्य मंत्री: ये कैबिनेट मंत्रियों के साथ संबद्ध होते हैं और उनके प्रशासनिक कार्यों में सहायता करते हैं।
3. उपमंत्री* ये सबसे कनिष्ठ मंत्री होते हैं और इनका कोई स्वतंत्र प्रभार नहीं होता।<br>* वे कैबिनेट मंत्रियों या राज्य मंत्रियों के अधीन कार्य करते हैं और उनकी सहायता करते हैं।

नोट: “मंत्रिपरिषद” एक व्यापक शब्द है जिसमें सभी (कैबिनेट, राज्य और उप) मंत्री शामिल हैं, जबकि “मंत्रिमंडल” एक छोटा और अधिक शक्तिशाली निकाय है जिसमें केवल कैबिनेट स्तर के मंत्री होते हैं।

मंत्रिपरिषद का आकार

उत्तरदायित्व (Responsibility)

1. सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility):

2. व्यक्तिगत उत्तरदाययोત (Individual Responsibility):


भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची (List of Prime Ministers of India)

क्रम संख्यानामकार्यकाल (आरंभ)कार्यकाल (समाप्त)राजनीतिक दलमहत्वपूर्ण तथ्य
1.जवाहरलाल नेहरू15 अगस्त 194727 मई 1964भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसभारत के पहले और सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्री; कार्यकाल के दौरान मृत्यु।
गुलजारीलाल नंदा27 मई 19649 जून 1964भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसकार्यवाहक प्रधानमंत्री।
2.लाल बहादुर शास्त्री9 जून 196411 जनवरी 1966भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस“जय जवान, जय किसान” का नारा दिया; ताशकंद, सोवियत संघ में मृत्यु।
गुलजारीलाल नंदा11 जनवरी 196624 जनवरी 1966भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसदूसरी बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री।
3.इन्दिरा गांधी24 जनवरी 196624 मार्च 1977भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसभारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री; पहला कार्यकाल।
4.मोरारजी देसाई24 मार्च 197728 जुलाई 1979जनता पार्टीभारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री; सबसे वृद्ध प्रधानमंत्री।
5.चरण सिंह28 जुलाई 197914 जनवरी 1980जनता पार्टी (सेक्युलर)एकमात्र प्रधानमंत्री जो कभी संसद का सामना नहीं कर सके।
(3)इन्दिरा गांधी14 जनवरी 198031 अक्टूबर 1984भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई)दूसरा कार्यकाल; कार्यकाल के दौरान हत्या।
6.राजीव गांधी31 अक्टूबर 19842 दिसंबर 1989भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई)सबसे युवा प्रधानमंत्री।
7.विश्वनाथ प्रताप सिंह2 दिसंबर 198910 नवंबर 1990जनता दलमंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं।
8.चन्द्र शेखर10 नवंबर 199021 जून 1991समाजवादी जनता पार्टी
9.पी. वी. नरसिम्हा राव21 जून 199116 मई 1996भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसभारत में आर्थिक उदारीकरण के जनक।
10.अटल बिहारी वाजपेयी16 मई 19961 जून 1996भारतीय जनता पार्टीसबसे छोटा कार्यकाल (13 दिन)।
11.एच. डी. देवेगौड़ा1 जून 199621 अप्रैल 1997जनता दल
12.इन्द्र कुमार गुजराल21 अप्रैल 199719 मार्च 1998जनता दल‘गुजराल सिद्धांत’ विदेश नीति के लिए जाने जाते हैं।
(10)अटल बिहारी वाजपेयी19 मार्च 199822 मई 2004भारतीय जनता पार्टीपहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री जिन्होंने पूर्ण कार्यकाल पूरा किया।
13.मनमोहन सिंह22 मई 200426 मई 2014भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसभारत के पहले सिख प्रधानमंत्री।
14.नरेन्द्र मोदी26 मई 2014पदासीनभारतीय जनता पार्टीदूसरे प्रधानमंत्री (नेहरू के बाद) जो दो पूर्ण कार्यकाल के बाद तीसरे कार्यकाल के लिए चुने गए।

यहाँ वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) की सूची दी गई है, जो नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के लिए जून 2024 में हुए पुनर्गठन पर आधारित है। कृपया ध्यान दें कि यह एक गतिशील सूची है और समय के साथ इसमें बदलाव संभव हैं।

यह सूची कैबिनेट मंत्रियों की है, जो सरकार में सर्वोच्च स्तर के मंत्री होते हैं।


भारत का वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल (जून 2024 तक)

क्र.सं.मंत्री का नाममंत्रालय
1.श्री नरेंद्र मोदीप्रधानमंत्री; कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय; परमाणु ऊर्जा विभाग; अंतरिक्ष विभाग; (और वे सभी विभाग जो किसी मंत्री को आवंटित नहीं हैं)
2.श्री राजनाथ सिंहरक्षा मंत्री
3.श्री अमित शाहगृह मंत्री; सहकारिता मंत्री
4.श्री नितिन गडकरीसड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री
5.श्री जगत प्रकाश नड्डा (जे. पी. नड्डा)स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री; रसायन और उर्वरक मंत्री
6.श्री शिवराज सिंह चौहानकृषि और किसान कल्याण मंत्री; ग्रामीण विकास मंत्री
7.श्रीमती निर्मला सीतारमणवित्त मंत्री; कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री
8.डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर (एस. जयशंकर)विदेश मंत्री
9.श्री मनोहर लाल खट्टरआवास और शहरी मामलों के मंत्री; ऊर्जा मंत्री
10.श्री एच. डी. कुमारस्वामीभारी उद्योग मंत्री; इस्पात मंत्री
11.श्री पीयूष गोयलवाणिज्य और उद्योग मंत्री
12.श्री धर्मेंद्र प्रधानशिक्षा मंत्री
13.श्री जीतन राम मांझीसूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री
14.श्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह)पंचायती राज मंत्री; मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री
15.श्री सर्बानंद सोनोवालबंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री
16.डॉ. वीरेंद्र कुमारसामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री
17.श्री किंजरापु राममोहन नायडूनागरिक उड्डयन मंत्री
18.श्री प्रहलाद जोशीउपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री; नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री
19.श्री जुएल ओरामजनजातीय मामलों के मंत्री
20.श्री गिरिराज सिंहकपड़ा मंत्री
21.श्री अश्विनी वैष्णवरेल मंत्री; सूचना और प्रसारण मंत्री; इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री
22.श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधियासंचार मंत्री; पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास मंत्री
23.श्री भूपेंद्र यादवपर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री
24.श्री गजेंद्र सिंह शेखावतसंस्कृति मंत्री; पर्यटन मंत्री
25.श्रीमती अन्नपूर्णा देवीमहिला एवं बाल विकास मंत्री
26.श्री किरेन रिजिजूसंसदीय कार्य मंत्री; अल्पसंख्यक कार्य मंत्री
27.श्री हरदीप सिंह पुरीपेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री
28.डॉ. मनसुख मंडावियाश्रम और रोजगार मंत्री; युवा मामले और खेल मंत्री
29.श्री जी. किशन रेड्डीकोयला मंत्री; खान मंत्री
30.श्री चिराग पासवानखाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री
31.श्री सी. आर. पाटिलजल शक्ति मंत्री

संसद (The Parliament of India)

परिभाषा:
भारत की संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था (Supreme Legislative Body) है। यह वह निकाय है जो देश के लिए कानूनों का निर्माण करता है, सरकार के कार्यों की निगरानी करता है, और जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय संसद द्विसदनीय (Bicameral) है।

संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद की संरचना, गठन, प्रक्रिया और शक्तियों का वर्णन किया गया है।

अनुच्छेद 79 के अनुसार, भारत की संसद तीन अंगों से मिलकर बनती है:
संसद = राष्ट्रपति + लोकसभा + राज्यसभा

यह महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं होते, फिर भी वे संसद का एक अभिन्न अंग हैं, क्योंकि संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक उनकी स्वीकृति के बिना कानून नहीं बन सकता।


संसद के दो सदन (The Two Houses of Parliament)

1. लोकसभा (The House of the People)

इसे “निचला सदन” (Lower House) या “जनता का सदन” भी कहा जाता है क्योंकि इसके सदस्य सीधे भारत की जनता द्वारा चुने जाते हैं।

2. राज्यसभा (The Council of States)

इसे “उच्च सदन” (Upper House) या “राज्यों की परिषद” भी कहा जाता है क्योंकि यह भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करती है।

आधारलोकसभाराज्यसभा
अन्य नामनिचला सदन, जनता का सदनउच्च सदन, राज्यों की परिषद
सदस्य संख्यावर्तमान में 543वर्तमान में 245
चुनावप्रत्यक्ष (जनता द्वारा)अप्रत्यक्ष (विधायकों द्वारा)
कार्यकाल5 वर्ष (अस्थायी सदन)स्थायी सदन (सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष)
अध्यक्षलोकसभा अध्यक्ष (Speaker)भारत के उपराष्ट्रपति (सभापति)

संसद के कार्य और शक्तियाँ (Functions and Powers of Parliament)

  1. विधायी कार्य (Legislative Functions):
    • संसद का सबसे प्रमुख कार्य देश के लिए कानूनों का निर्माण करना है।
    • यह संघ सूची और समवर्ती सूची में दिए गए विषयों पर कानून बना सकती है। विशेष परिस्थितियों में यह राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
  2. कार्यपालिका पर नियंत्रण (Executive Control):
    • संसदीय प्रणाली में, कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
    • संसद विभिन्न तरीकों से सरकार पर नियंत्रण रखती है, जैसे – प्रश्नकाल, शून्यकाल, स्थगन प्रस्ताव, निंदा प्रस्ताव, और अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से।
  3. वित्तीय कार्य (Financial Functions):
    • संसद देश के वित्त पर पूर्ण नियंत्रण रखती है।
    • वार्षिक बजट संसद द्वारा ही पारित किया जाता है।
    • संसद की स्वीकृति के बिना सरकार न तो कोई कर लगा सकती है और न ही भारत की संचित निधि से कोई धन खर्च कर सकती है।
    • धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
  4. संविधान संशोधन की शक्ति (Constituent Functions):
    • संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है।
  5. न्यायिक कार्य (Judicial Functions):
    • संसद, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों पर महाभियोग (Impeachment) लगाकर उन्हें पद से हटा सकती है।
  6. निर्वाचन संबंधी कार्य (Electoral Functions):
    • संसद, भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेती है।

संसदीय प्रक्रिया (Legislative Procedure)

एक विधेयक (Bill) कानून कैसे बनता है?

  1. पहला वाचन: विधेयक को किसी भी सदन में प्रस्तुत करना।
  2. दूसरा वाचन: विधेयक के प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा और इसे संसदीय समितियों के पास भेजना।
  3. तीसरा वाचन: विधेयक को अंतिम रूप से स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए मतदान।
  4. दूसरे सदन में प्रक्रिया: एक सदन से पारित होने के बाद, विधेयक को दूसरे सदन में भेजा जाता है, जहाँ यही प्रक्रिया दोहराई जाती है।
  5. राष्ट्रपति की स्वीकृति: दोनों सदनों से पारित होने के बाद, विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। उनकी सहमति मिलते ही विधेयक, अधिनियम (Act) यानी कानून बन जाता है।

दोनों सदनों में गतिरोध (Deadlock):

यदि किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में असहमति होती है, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुला सकते हैं, जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करते हैं।


केंद्रीय मंत्रिमंडल (The Union Cabinet)

परिभाषा:
मंत्रिमंडल (कैबिनेट), मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) का वह सबसे महत्वपूर्ण और अंतरंग (core) भाग है जिसमें सरकार के सर्वोच्च स्तर के यानी कैबिनेट मंत्री ही शामिल होते हैं। यह भारत सरकार की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था (highest decision-making body) है।

यह संसदीय प्रणाली में वास्तविक कार्यकारी शक्ति का केंद्र है, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं।

“मंत्रिपरिषद” और “मंत्रिमंडल” में अंतर (Difference between Council of Ministers and Cabinet)

यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ये दोनों शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं।

आधारमंत्रिपरिषद (Council of Ministers)मंत्रिमंडल (Cabinet)
आकारयह एक बड़ा निकाय है, जिसमें 60 से 70 मंत्री तक हो सकते हैं।यह एक छोटा निकाय है, जिसमें केवल 15 से 20 शीर्ष मंत्री होते हैं।
रचनाइसमें तीनों श्रेणियों के मंत्री शामिल होते हैं – कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उपमंत्री।इसमें केवल कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
शक्तिसैद्धांतिक रूप से सारी कार्यकारी शक्तियाँ इसमें निहित हैं।व्यावहारिक रूप में, यह मंत्रिपरिषद की शक्तियों का वास्तविक प्रयोग करता है और नीति-निर्माण करता है।
कार्ययह मंत्रिमंडल के निर्णयों को लागू करता है और उसके कार्यों की निगरानी करता है।यह सरकार की नीतियों का निर्धारण करता है, सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेता है, और मंत्रिपरिषद के लिए दिशानिर्देश तैयार करता है।
बैठकेंइसकी बैठकें बहुत कम होती हैं। यह सामूहिक रूप से निर्णय नहीं लेता।इसकी बैठकें नियमित (प्रायः सप्ताह में एक बार) होती हैं और सभी महत्वपूर्ण निर्णय यहीं लिए जाते हैं।
संवैधानिक स्थितियह एक संवैधानिक निकाय है, जिसका उल्लेख अनुच्छेद 74 और 75 में है।यह भी एक संवैधानिक निकाय है। “कैबिनेट” शब्द मूल संविधान में नहीं था, इसे 44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा अनुच्छेद 352 में जोड़ा गया।

संक्षेप में, मंत्रिपरिषद “सरकार” है, तो मंत्रिमंडल उसका “हृदय” या “नाभिक” है।


मंत्रिमंडल की संरचना (Composition of the Cabinet)


मंत्रिमंडल की भूमिका और कार्य (Role and Functions of the Cabinet)

मंत्रिमंडल भारतीय शासन व्यवस्था का मुख्य नीति-निर्धारक केंद्र है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:

1. नीति निर्धारण (Policy Making)

2. विधायी कार्य (Legislative Functions)

3. सर्वोच्च कार्यकारी प्राधिकार (Supreme Executive Authority)

4. वित्तीय कार्य (Financial Functions)

5. समन्वयकारी भूमिका (Coordinating Role)

6. राष्ट्रपति को सलाह देना (Advisory Role to the President)

7. संकट प्रबंधन (Crisis Management)


मंत्रिमंडल की समितियाँ (Cabinet Committees)


मंत्रिमंडलीय समितियाँ (Cabinet Committees)

परिभाषा:
मंत्रिमंडलीय समितियाँ ऐसे छोटे निकाय या समूह होते हैं जिनका गठन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है। इनमें कैबिनेट स्तर के वरिष्ठ मंत्रियों को शामिल किया जाता है ताकि वे किसी विशेष मुद्दे या क्षेत्र पर गहराई से विचार-विमर्श कर सकें, नीतिगत निर्णय ले सकें, और बाद में अपने निर्णयों से पूर्ण मंत्रिमंडल को अवगत करा सकें या उसका अनुमोदन प्राप्त कर सकें।

ये समितियाँ सरकार के काम के अत्यधिक बोझ को कम करती हैं और मुद्दों के गहन विश्लेषण को सुनिश्चित करती हैं।

प्रमुख विशेषताएँ

  1. संविधान-बाह्य (Extra-Constitutional):
    • इन समितियों का उल्लेख संविधान में नहीं है। इनका गठन ‘भारत सरकार के कार्य आवंटन नियम’ (Transaction of Business Rules) के तहत किया जाता है। ये परंपरा पर आधारित हैं।
  2. गठन:
    • इनका गठन प्रधानमंत्री द्वारा समय की आवश्यकता और स्थिति के अनुसार किया जाता है। प्रधानमंत्री ही तय करते हैं कि कौन सी समिति बनेगी और उसमें कौन-कौन सदस्य होगा।
  3. सदस्यता:
    • इनकी सदस्य संख्या आमतौर पर 3 से 8 के बीच होती है।
    • इनमें मुख्यतः कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री चाहें तो अन्य मंत्रियों (जैसे राज्य मंत्री) को भी इनका सदस्य बना सकते हैं।
  4. अध्यक्षता:
    • अधिकांश महत्वपूर्ण समितियों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री स्वयं करते हैं।
    • कुछ समितियों की अध्यक्षता अन्य वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री (जैसे गृह मंत्री या वित्त मंत्री) भी कर सकते हैं।
  5. निर्णय:
    • इन समितियों के निर्णय लगभग मंत्रिमंडल के निर्णय के समान ही माने जाते हैं। हालांकि, महत्वपूर्ण मामलों पर मंत्रिमंडल की पूर्ण बैठक में अनुमोदन लिया जा सकता है।

मंत्रिमंडलीय समितियों के प्रकार (Types of Cabinet Committees)

ये समितियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं:

  1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees):
    • ये वे समितियाँ हैं जो प्रकृति में स्थायी होती हैं और हमेशा अस्तित्व में रहती हैं।
  2. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees):
    • ये किसी विशेष प्रयोजन या समस्या के समाधान के लिए बनाई जाती हैं और काम पूरा हो जाने के बाद इन्हें भंग कर दिया जाता है

संसदीय समितियाँ (Parliamentary Committees)

संसद केवल अपने सत्रों के दौरान ही बैठक करती है, जो साल में सीमित समय के लिए होते हैं। संसद के पास बहुत से जटिल विधायी और वित्तीय कार्य होते हैं, जिनका सदन की पूर्ण बैठक में गहराई से विश्लेषण करना संभव नहीं होता। इसी कमी को पूरा करने के लिए संसदीय समितियों का गठन किया जाता है।

परिभाषा:
संसदीय समिति, सांसदों का एक ऐसा छोटा समूह होता है जिसका गठन सदन द्वारा (अध्यक्ष/सभापति द्वारा) किया जाता है। यह समिति किसी विशेष विषय (जैसे विधेयक, बजट या सरकारी नीति) की गहन जाँच करती है और अपनी रिपोर्ट सदन को सौंपती है।

प्रकार: संसदीय समितियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं:

  1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees)
  2. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)

स्थायी समितियाँ (Standing Committees)

परिभाषा:
ये वे समितियाँ हैं जो प्रकृति में स्थायी होती हैं, अर्थात् इनका गठन प्रतिवर्ष या समय-समय पर किया जाता है और ये निरंतर आधार पर कार्य करती रहती हैं।

स्थायी समितियों को उनके कार्य की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

1. वित्तीय समितियाँ (Financial Committees)

ये समितियाँ सरकार के वित्तीय कामकाज और खर्चों पर निगरानी रखती हैं और इन्हें संसदीय नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।

(क) लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee – PAC)

(ख) प्राक्कलन समिति (Estimates Committee)

(ग) सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी समिति (Committee on Public Undertakings)

2. विभागीय स्थायी समितियाँ (Departmental Standing Committees – DRCs)

3. जाँच समितियाँ (Committees to Inquire)

4. सदन के दिन-प्रतिदिन के कार्यों से संबंधित समितियाँ

5. सेवा समितियाँ (Service Committees)

ये सदस्यों को आवास, वेतन और अन्य सुविधाएँ प्रदान करने से संबंधित होती हैं, जैसे – सामान्य प्रयोजन समिति, आवास समिति आदि।


स्थायी समितियों का महत्व (Significance of Standing Committees)

  1. सरकार पर विस्तृत निगरानी: ये समितियाँ सरकार के कार्यों पर गहन और विस्तृत निगरानी रखती हैं, जो सदन की बैठक में संभव नहीं है।
  2. विधायी कार्यों की गुणवत्ता में सुधार: ये विधेयकों के हर पहलू की सूक्ष्मता से जाँच करती हैं, जिससे बेहतर और प्रभावी कानून बनते हैं।
  3. वित्तीय जवाबदेही: वित्तीय समितियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि सरकारी पैसा सही तरीके से और मितव्ययिता से खर्च हो।
  4. विशेषज्ञता का उपयोग: ये विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ राय प्राप्त कर सकती हैं, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार होता है।
  5. दलगत राजनीति से परे कार्य: इन समितियों की बैठकें बंद कमरे में होती हैं, जिससे सदस्य दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित में निष्पक्ष रूप से अपनी राय रख सकते हैं।

तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)

परिभाषा:
‘तदर्थ’ (Ad-hoc) एक लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ है “इस प्रयोजन के लिए” (for this purpose)

तदर्थ समितियाँ वे समितियाँ होती हैं जिनका गठन किसी विशिष्ट प्रयोजन या कार्य के लिए किया जाता है। जब वे अपना निर्दिष्ट कार्य पूरा कर लेती हैं और अपनी रिपोर्ट सौंप देती हैं, तो उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। ये समितियाँ अस्थायी (temporary) प्रकृति की होती हैं।

गठन: इनका गठन आवश्यकता पड़ने पर सदन द्वारा एक प्रस्ताव पारित करके या लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति द्वारा किया जाता है।


तदर्थ समितियों के प्रकार (Types of Ad-hoc Committees)

तदर्थ समितियों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

  1. जाँच समितियाँ (Inquiry Committees)
  2. सलाहकार समितियाँ (Advisory Committees)

1. जाँच समितियाँ (Inquiry Committees)

इन समितियों का गठन समय-समय पर किसी विशेष घटना, विषय या घोटाले की जाँच करने के लिए किया जाता है। ये समितियाँ उस मामले की गहन छानबीन करती हैं, साक्ष्य जुटाती हैं, और निष्कर्षों के साथ अपनी रिपोर्ट सदन को सौंपती हैं।

प्रमुख उदाहरण:

2. सलाहकार समितियाँ (Advisory Committees)

इन समितियों का गठन किसी विशेष विषय पर सदन को सलाह देने या रिपोर्ट तैयार करने के लिए किया जाता है। इनका कार्यक्षेत्र जाँच की बजाय परामर्श देना होता है।

उदाहरण:


तदर्थ समितियों की कार्यप्रणाली

  1. नियुक्ति: इन समितियों के सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति सदन या लोकसभा अध्यक्ष/सभापति द्वारा की जाती है।
  2. कार्य: समिति अपने निर्दिष्ट विषय की जाँच करती है, विशेषज्ञों को बुला सकती है, दस्तावेज़ों की मांग कर सकती है, और प्रभावित पक्षों से पूछताछ कर सकती है।
  3. रिपोर्ट प्रस्तुत करना: अपना कार्य पूरा करने के बाद, समिति एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करती है और उसे सदन के पटल पर रखती है।
  4. विघटन: रिपोर्ट सौंपने के साथ ही समिति का कार्य समाप्त हो जाता है और वह स्वतः ही भंग हो जाती है।

स्थायी और तदर्थ समितियों में मुख्य अंतर (Key Difference)

आधारस्थायी समितियाँ (Standing Committees)तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)
प्रकृतिस्थायी (Permanent) और निरंतर आधार पर कार्य करती हैं।अस्थायी (Temporary) और विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनती हैं।
कार्यक्षेत्रइनका कार्यक्षेत्र पूर्व-निर्धारित और व्यापक होता है (जैसे वित्त, रक्षा आदि)।इनका कार्यक्षेत्र संकीर्ण और विशिष्ट होता है (जैसे किसी एक घोटाले की जाँच)।
अस्तित्वइनका अस्तित्व लगातार बना रहता है; हर साल पुनर्गठन होता है।कार्य समाप्त होने पर इनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

निष्कर्ष:
तदर्थ समितियाँ संसदीय निगरानी का एक लचीला और शक्तिशाली उपकरण हैं, जो संसद को अचानक उत्पन्न हुए जटिल और विवादास्पद मामलों की गहराई से जाँच करने की क्षमता प्रदान करती हैं, जिसके लिए स्थायी समितियों का नियमित ढाँचा शायद अपर्याप्त हो।


कुछ प्रमुख स्थायी मंत्रिमंडलीय समितियाँ (वर्तमान में)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल में वर्तमान में निम्नलिखित प्रमुख समितियाँ कार्यरत हैं (इनकी संख्या और संरचना समय-समय पर बदल सकती है):

1. राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Political Affairs – CCPA)

2. आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Economic Affairs – CCEA)

3. सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Security – CCS)

4. नियुक्ति संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (Appointments Committee of the Cabinet – ACC)

5. संसदीय मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Parliamentary Affairs)

6. आवास संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Accommodation)

इसके अलावा, निवेश एवं विकास और रोजगार एवं कौशल विकास पर भी मंत्रिमंडलीय समितियाँ गठित की गई हैं।


मंत्रिमंडलीय समितियों का महत्व (Significance of Cabinet Committees)

  1. कार्य के विभाजन का साधन: ये समितियाँ काम का विभाजन करती हैं और मंत्रिमंडल के बोझ को हल्का करती हैं।
  2. गहन परीक्षण: ये नीतियो पर विस्तृत और गहन विचार-विमर्श को संभव बनाती हैं। छोटे समूह में होने के कारण हर पहलू पर बारीकी से चर्चा हो पाती है।
  3. शीघ्र निर्णय: छोटे आकार के कारण, ये समितियाँ जल्दी बैठकें कर सकती हैं और महत्वपूर्ण मुद्दों पर शीघ्रता से निर्णय ले सकती हैं, जिससे निर्णय प्रक्रिया तेज होती है।
  4. समन्वय स्थापित करना: ये विभिन्न मंत्रालयों के बीच नीतियों पर समन्वय स्थापित करने में मदद करती हैं।
  5. प्रधानमंत्री का नियंत्रण: इन समितियों, विशेषकर जिनकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, के माध्यम से सरकार की नीतियों पर प्रधानमंत्री का नियंत्रण और पकड़ मजबूत होती है।