भारत के राष्ट्रपति (The President of India)
भारत का राष्ट्रपति देश का राष्ट्र प्रमुख (Head of the State) होता है और भारत का प्रथम नागरिक कहलाता है। वह भारतीय संघ की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख भी होता है। संसदीय व्यवस्था होने के कारण, राष्ट्रपति नाममात्र का कार्यकारी प्रमुख (Nominal Executive) होता है, जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्तियाँ प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं।
संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 52 से 78 तक संघ की कार्यपालिका का वर्णन है, जिसमें राष्ट्रपति एक केंद्रीय भूमिका में हैं।
अनुच्छेद 52: भारत का राष्ट्रपति
यह अनुच्छेद कहता है कि “भारत का एक राष्ट्रपति होगा।”
निर्वाचन (Election) – अनुच्छेद 54 एवं 55
- निर्वाचक मंडल (Electoral College): राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं होता, बल्कि एक निर्वाचक मंडल द्वारा होता है जिसमें निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैं:
- संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित सदस्य।
- सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
- दिल्ली और पुडुचेरी केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य (यह 70वें संविधान संशोधन, 1992 द्वारा जोड़ा गया)।
- नोट: मनोनीत सदस्य (nominated members) और विधान परिषदों के सदस्य इस चुनाव में भाग नहीं लेते हैं।
- निर्वाचन की प्रक्रिया:
- राष्ट्रपति का चुनाव “आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली” के अनुसार “एकल संक्रमणीय मत” (Single Transferable Vote) पद्धति से होता है।
- मतदान गुप्त होता है।
- इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति का चुनाव देश की संघीय भावना का प्रतिनिधित्व करे और सभी राज्यों की समान भागीदारी हो।
योग्यताएँ (Qualifications) – अनुच्छेद 58
राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:
- वह भारत का नागरिक हो।
- उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो।
- वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
- वह किसी भी लाभ के पद (Office of Profit) पर न हो।
कार्यकाल एवं पदत्याग (Term and Resignation) – अनुच्छेद 56
- कार्यकाल: राष्ट्रपति का कार्यकाल पद ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष का होता है।
- पदत्याग: राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित करते हुए दे सकते हैं।
- वह अपने पद पर तब तक बने रहते हैं जब तक कि उनका उत्तराधिकारी पद ग्रहण न कर ले। वे पुनर्निर्वाचन (re-election) के भी योग्य होते हैं।
महाभियोग (Impeachment) – अनुच्छेद 61
राष्ट्रपति को उनके कार्यकाल से पूर्व केवल “संविधान का उल्लंघन” (Violation of the Constitution) के आधार पर ही हटाया जा सकता है। यह एक अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया है।
- प्रक्रिया के चरण:
- महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में लाया जा सकता है।
- इस प्रस्ताव को लाने से 14 दिन पूर्व राष्ट्रपति को लिखित सूचना देना अनिवार्य है, जिस पर उस सदन के कम से कम एक-चौथाई (1/4) सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
- जिस सदन में प्रस्ताव लाया गया है, यदि वह सदन की कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई (2/3) बहुमत से उस प्रस्ताव को पारित कर दे, तो उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है।
- दूसरा सदन इन आरोपों की जाँच करता है। इस जाँच के दौरान राष्ट्रपति को उपस्थित होने और अपना पक्ष रखने का अधिकार होता है।
- यदि जाँच के बाद दूसरा सदन भी आरोपों को सही पाता है और प्रस्ताव को अपनी कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई (2/3) बहुमत से पारित कर देता है, तो राष्ट्रपति को प्रस्ताव पारित होने की तिथि से पद से हटा हुआ मान लिया जाता है।
नोट: अब तक भारत के किसी भी राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं लगाया गया है।
राष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य (Powers and Functions of the President)
राष्ट्रपति की शक्तियों को कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1. कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers)
- भारत सरकार के सभी शासन संबंधी कार्य राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।
- वह प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
- वह भारत के महान्यायवादी (Attorney General), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्तों, UPSC के अध्यक्ष व सदस्यों, वित्त आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों और राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति करता है।
- वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आयोग की नियुक्ति कर सकता है।
2. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)
- वह संसद की बैठक बुला सकता है, सत्रावसान कर सकता है और लोकसभा को भंग कर सकता है।
- वह प्रत्येक चुनाव के बाद और प्रत्येक वर्ष संसद के प्रथम सत्र को संबोधित करता है।
- संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के बाद ही कानून बनता है। वह विधेयक को अनुमति दे सकता है, रोक सकता है, या (धन विधेयक को छोड़कर) पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
- वह राज्यसभा में 12 सदस्यों (जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा का विशेष ज्ञान हो) और लोकसभा में 2 आंग्ल-भारतीय समुदाय के सदस्यों (अब 104वें संशोधन द्वारा समाप्त) को मनोनीत कर सकता है।
- जब संसद का सत्र न चल रहा हो, तब वह अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है (अनुच्छेद 123)। ये अध्यादेश संसद के कानूनों की तरह ही प्रभावी होते हैं, लेकिन इन्हें संसद की अगली बैठक के 6 सप्ताह के भीतर অনুমোদন कराना आवश्यक होता है।
3. वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)
- धन विधेयक (Money Bill) राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बाद ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- वह वार्षिक बजट (Annual Financial Statement) को संसद के समक्ष रखवाता है।
- भारत की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of India) पर उसका नियंत्रण होता है।
- वह केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के बँटवारे के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में एक वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन करता है।
4. न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers)
- वह उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
- अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा (Pardon), लघुकरण (Commute), परिहार (Remit), विराम (Respite) और प्रविलंबन (Reprieve) करने की शक्ति प्राप्त है। इसमें मृत्युदंड को भी माफ करने की शक्ति शामिल है।
5. सैन्य शक्तियाँ (Military Powers)
- वह भारत के तीनों सेनाओं (थल, जल और वायु) का सर्वोच्च सेनापति होता है।
- वह युद्ध की घोषणा और शांति की समाप्ति कर सकता है (लेकिन यह संसद के अनुमोदन के अधीन होता है)।
6. राजनयिक शक्तियाँ (Diplomatic Powers)
- सभी अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और समझौते राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।
- वह विदेशों में भारतीय राजदूतों की नियुक्ति करता है और विदेशी राजदूतों का स्वागत करता है।
7. आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers)
राष्ट्रपति को तीन प्रकार की आपातकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं:
- राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352): युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में।
- राज्यों में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356): किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर।
- वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360): भारत की वित्तीय स्थिरता या साख के खतरे की स्थिति में।
वीटो शक्ति (Veto Power)
राष्ट्रपति को संसद द्वारा पारित विधेयकों के संबंध में तीन प्रकार की वीटो शक्तियाँ प्राप्त हैं:
- आत्यंतिक वीटो (Absolute Veto): विधेयक पर अपनी राय सुरक्षित रखना (अर्थात्, सहमति न देना), जिससे विधेयक समाप्त हो जाता है।
- निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto): विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को वापस भेजना।
- पॉकेट वीटो (Pocket Veto): विधेयक पर न तो सहमति देना, न ही असहमति जताना और न ही पुनर्विचार के लिए भेजना, बल्कि उसे अनिश्चित काल के लिए अपने पास लंबित रखना। (जैसे 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने ‘भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक’ पर इसका प्रयोग किया था)।
भारत के राष्ट्रपतियों की सूची (List of Presidents of India)
| क्रम संख्या | नाम | कार्यकाल (आरंभ) | कार्यकाल (समाप्त) | महत्वपूर्ण तथ्य |
| 1. | डॉ. राजेन्द्र प्रसाद | 26 जनवरी 1950 | 13 मई 1962 | भारत के पहले राष्ट्रपति; एकमात्र राष्ट्रपति जिन्होंने दो कार्यकाल पूरे किए। |
| 2. | डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन | 13 मई 1962 | 13 मई 1967 | भारत के पहले उपराष्ट्रपति; इनके जन्मदिन को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। |
| 3. | डॉ. जाकिर हुसैन | 13 मई 1967 | 3 मई 1969 | भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति; कार्यकाल के दौरान मृत्यु। |
| – | वराहगिरि वेंकट गिरि (वी. वी. गिरि) | 3 मई 1969 | 20 जुलाई 1969 | कार्यवाहक राष्ट्रपति। |
| – | मोहम्मद हिदायतुल्लाह | 20 जुलाई 1969 | 24 अगस्त 1969 | कार्यवाहक राष्ट्रपति; भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश। |
| 4. | वराहगिरि वेंकट गिरि (वी. वी. गिरि) | 24 अगस्त 1969 | 24 अगस्त 1974 | स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुने गए। |
| 5. | फखरुद्दीन अली अहमद | 24 अगस्त 1974 | 11 फरवरी 1977 | कार्यकाल के दौरान मृत्यु; इनके समय में आपातकाल (1975) लगा। |
| – | बसप्पा दानप्पा जत्ती (बी. डी. जत्ती) | 11 फरवरी 1977 | 25 जुलाई 1977 | कार्यवाहक राष्ट्रपति। |
| 6. | नीलम संजीव रेड्डी | 25 जुलाई 1977 | 25 जुलाई 1982 | एकमात्र राष्ट्रपति जो निर्विरोध चुने गए; सबसे युवा राष्ट्रपति। |
| 7. | ज्ञानी जैल सिंह | 25 जुलाई 1982 | 25 जुलाई 1987 | भारत के पहले सिख राष्ट्रपति; ‘पॉकेट वीटो’ का प्रयोग किया। |
| 8. | रामास्वामी वेंकटरमन | 25 जुलाई 1987 | 25 जुलाई 1992 | |
| 9. | डॉ. शंकर दयाल शर्मा | 25 जुलाई 1992 | 25 जुलाई 1997 | |
| 10. | कोचेरिल रमन नारायणन (के. आर. नारायणन) | 25 जुलाई 1997 | 25 जुलाई 2002 | भारत के पहले दलित राष्ट्रपति। |
| 11. | डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम | 25 जुलाई 2002 | 25 जुलाई 2007 | “मिसाइल मैन” और “जनता के राष्ट्रपति” के रूप में प्रसिद्ध; भारत के पहले गैर-राजनीतिक राष्ट्रपति। |
| 12. | प्रतिभा देवीसिंह पाटिल | 25 जुलाई 2007 | 25 जुलाई 2012 | भारत की पहली महिला राष्ट्रपति। |
| 13. | प्रणब मुखर्जी | 25 जुलाई 2012 | 25 जुलाई 2017 | भारत रत्न से सम्मानित। |
| 14. | राम नाथ कोविन्द | 25 जुलाई 2017 | 25 जुलाई 2022 | |
| 15. | द्रौपदी मुर्मू | 25 जुलाई 2022 | पदासीन | भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति और दूसरी महिला राष्ट्रपति। |
भारत के उपराष्ट्रपति (The Vice-President of India)
भारत का उपराष्ट्रपति देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है, जो राष्ट्रपति के बाद आता है। उपराष्ट्रपति का पद अमेरिका के उपराष्ट्रपति के पद की तर्ज पर बनाया गया है।
संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 63 से 71 तक उपराष्ट्रपति से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख है।
अनुच्छेद 63: भारत का उपराष्ट्रपति
यह अनुच्छेद कहता है कि “भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।”
निर्वाचन (Election) – अनुच्छेद 66
- निर्वाचक मंडल (Electoral College): उपराष्ट्रपति का चुनाव भी राष्ट्रपति की तरह सीधे जनता द्वारा नहीं होता, बल्कि एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। हालाँकि, इसका निर्वाचक मंडल राष्ट्रपति से भिन्न होता है। इसमें शामिल होते हैं:
- संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित सदस्य।
- संसद के दोनों सदनों के मनोनीत सदस्य (Nominated members)।
- नोट: राज्यों की विधानसभाओं के सदस्य उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग नहीं लेते हैं।
- निर्वाचन की प्रक्रिया:
- उपराष्ट्रपति का चुनाव भी “आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली” के अनुसार “एकल संक्रमणीय मत” (Single Transferable Vote) पद्धति से होता है।
- मतदान गुप्त होता है।
योग्यताएँ (Qualifications) – अनुच्छेद 66(3)
उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए:
- वह भारत का नागरिक हो।
- उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो।
- वह राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो (जबकि राष्ट्रपति के लिए लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता चाहिए)।
- वह किसी भी लाभ के पद (Office of Profit) पर न हो।
कार्यकाल एवं पदत्याग (Term and Resignation) – अनुच्छेद 67
- कार्यकाल: उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पद ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष का होता है।
- पदत्याग: उपराष्ट्रपति अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए दे सकते हैं।
- वह अपने पद पर तब तक बने रहते हैं जब तक कि उनका उत्तराधिकारी पद ग्रहण न कर ले।
पद से हटाने की प्रक्रिया (Removal Procedure) – अनुच्छेद 67(b)
उपराष्ट्रपति को उनके कार्यकाल से पूर्व पद से हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया राष्ट्रपति पर लगने वाले महाभियोग (Impeachment) जितनी जटिल नहीं है।
- प्रक्रिया के चरण:
- उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही शुरू किया जा सकता है, लोकसभा में नहीं।
- इस प्रस्ताव को लाने से 14 दिन पूर्व उपराष्ट्रपति को लिखित सूचना देना अनिवार्य है।
- यदि राज्यसभा अपने तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (Effective Majority) से इस संकल्प (resolution) को पारित कर दे, और
- लोकसभा उस संकल्प से सहमत हो जाए (यानी साधारण बहुमत से पारित कर दे),
तो उपराष्ट्रपति को पद से हटा दिया जाता है।
नोट: उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए “संविधान के उल्लंघन” जैसे किसी विशेष आधार का उल्लेख संविधान में नहीं किया गया है।
उपराष्ट्रपति के कार्य एवं शक्तियाँ (Functions and Powers of the Vice-President)
उपराष्ट्रपति के मुख्य रूप से दो प्रमुख कार्य हैं:
1. राज्यसभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman of the Rajya Sabha) – अनुच्छेद 64
- यह उपराष्ट्रपति का मुख्य कार्य है। “पदेन” का अर्थ है कि जो भी व्यक्ति उपराष्ट्रपति के पद पर होगा, वह स्वतः ही राज्यसभा का सभापति होगा।
- इस भूमिका में, उनकी शक्तियाँ और कार्य लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) की तरह ही होते हैं।
- वे राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन करते हैं, सदन में अनुशासन बनाए रखते हैं और विधेयकों पर मतदान कराते हैं।
- जब किसी विधेयक पर मत बराबर हो जाते हैं, तो उन्हें निर्णायक मत (Casting Vote) देने का अधिकार होता है।
2. राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना (Acting as President) – अनुच्छेद 65
- जब राष्ट्रपति का पद उनकी मृत्यु, त्यागपत्र, महाभियोग या किसी अन्य कारण से रिक्त हो जाता है, तो उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति (Acting President) के रूप में कार्य करते हैं।
- वह अधिकतम छह महीने की अवधि तक ही कार्यवाहक राष्ट्रपति रह सकते हैं, क्योंकि इस अवधि के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव कराना अनिवार्य होता है।
- जब राष्ट्रपति बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ होते हैं, तब भी उपराष्ट्रपति उनके कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं, तो वे राज्यसभा के सभापति के कर्तव्यों का पालन नहीं करते हैं। उस दौरान, राज्यसभा का उपसभापति (Deputy Chairman) सभापति के कार्यों का निर्वहन करता है।
- जब उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं, तो उन्हें राष्ट्रपति को मिलने वाले सभी वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
- वेतन: उपराष्ट्रपति को जो वेतन मिलता है, वह उपराष्ट्रपति पद के लिए नहीं, बल्कि राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में मिलता है।
उपराष्ट्रपति से संबंधित अन्य तथ्य
- उपराष्ट्रपति के चुनाव संबंधी विवादों का निपटारा सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) द्वारा किया जाता है और उसका निर्णय अंतिम होता है।
- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति थे, जो बाद में दूसरे राष्ट्रपति बने।
- कृष्णकांत एकमात्र उपराष्ट्रपति थे जिनकी मृत्यु कार्यकाल के दौरान हुई।
निष्कर्ष:
यद्यपि उपराष्ट्रपति का पद राष्ट्रपति जितना शक्तिशाली नहीं है, फिर भी यह भारतीय शासन व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पद राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में निरंतरता सुनिश्चित करता है और राज्यसभा के सभापति के रूप में संसदीय प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
भारत के उपराष्ट्रपतियों की सूची (List of Vice-Presidents of India)
| क्रम संख्या | नाम | कार्यकाल (आरंभ) | कार्यकाल (समाप्त) | महत्वपूर्ण तथ्य |
| 1. | सर्वपल्ली राधाकृष्णन | 13 मई 1952 | 12 मई 1962 | भारत के पहले उपराष्ट्रपति; दो कार्यकाल पूरे किए। |
| 2. | जाकिर हुसैन | 13 मई 1962 | 12 मई 1967 | बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। |
| 3. | वराहगिरि वेंकट गिरि (वी. वी. गिरि) | 13 मई 1967 | 3 मई 1969 | राष्ट्रपति बनने के लिए पद से इस्तीफा दिया। |
| 4. | गोपाल स्वरूप पाठक | 31 अगस्त 1969 | 30 अगस्त 1974 | |
| 5. | बसप्पा दानप्पा जत्ती (बी. डी. जत्ती) | 31 अगस्त 1974 | 30 अगस्त 1979 | फखरुद्दीन अली अहमद की मृत्यु के बाद कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। |
| 6. | मोहम्मद हिदायतुल्लाह | 31 अगस्त 1979 | 30 अगस्त 1984 | भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश। |
| 7. | रामास्वामी वेंकटरमन | 31 अगस्त 1984 | 24 जुलाई 1987 | बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। |
| 8. | शंकर दयाल शर्मा | 3 सितंबर 1987 | 24 जुलाई 1992 | बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। |
| 9. | कोचेरिल रमन नारायणन (के. आर. नारायणन) | 21 अगस्त 1992 | 24 जुलाई 1997 | बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। |
| 10. | कृष्ण कांत | 21 अगस्त 1997 | 27 जुलाई 2002 | कार्यकाल के दौरान मृत्यु। |
| 11. | भैरों सिंह शेखावत | 19 अगस्त 2002 | 21 जुलाई 2007 | |
| 12. | मोहम्मद हामिद अंसारी | 11 अगस्त 2007 | 10 अगस्त 2017 | एस. राधाकृष्णन के बाद दो कार्यकाल पूरे करने वाले दूसरे उपराष्ट्रपति। |
| 13. | मुप्पवरपु वेंकैया नायडू | 11 अगस्त 2017 | 10 अगस्त 2022 | |
| 14. | जगदीप धनखड़ | 11 अगस्त 2022 | 2025 |
15. सी. पी. राधाकृष्णन पदासीन
प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद (The Prime Minister and the Council of Ministers)
भारत की संसदीय प्रणाली में राष्ट्रपति नाममात्र के कार्यकारी प्रमुख (Nominal Executive) होते हैं, जबकि प्रधानमंत्री, अपनी मंत्रिपरिषद के साथ, वास्तविक कार्यकारी प्रमुख (Real Executive) होते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 74 और 75 में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद से संबंधित विस्तृत प्रावधान किए गए हैं।
अनुच्छेद 74(1): “राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा, और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा।”
प्रधानमंत्री (The Prime Minister)
प्रधानमंत्री भारतीय शासन व्यवस्था का केंद्रीय और सबसे शक्तिशाली पद है। वह सरकार का प्रमुख होता है।
नियुक्ति (Appointment)
- अनुच्छेद 75 के अनुसार, प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।
- परंपरा के अनुसार, राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं।
- यदि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो राष्ट्रपति अपने विवेक का प्रयोग करते हुए सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं और उसे एक निश्चित समय (आमतौर पर एक महीने) के भीतर सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कहते हैं।
शक्तियाँ एवं कार्य (Powers and Functions)
प्रधानमंत्री की शक्तियों को विभिन्न संदर्भों में समझा जा सकता है:
1. मंत्रिपरिषद के संबंध में:
- मंत्रियों की नियुक्ति: प्रधानमंत्री ही यह तय करते हैं कि उनकी मंत्रिपरिषद में कौन-कौन मंत्री होगा। वह मंत्रियों की सूची राष्ट्रपति को सौंपते हैं, और राष्ट्रपति केवल उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त कर सकते हैं।
- मंत्रालयों का आवंटन: वह मंत्रियों के बीच मंत्रालयों (portfolios) का वितरण और फेरबदल करते हैं।
- मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष: वह मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और उसके निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
- त्यागपत्र: वह किसी भी मंत्री से त्यागपत्र देने के लिए कह सकते हैं या राष्ट्रपति को उसे बर्खास्त करने की सलाह दे सकते हैं।
- सरकार का विघटन: यदि प्रधानमंत्री अपने पद से त्यागपत्र दे देते हैं, तो पूरी मंत्रिपरिषद भंग हो जाती है।
2. राष्ट्रपति के संबंध में:
- संवाद की मुख्य कड़ी: अनुच्छेद 78 के अनुसार, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच संवाद का मुख्य माध्यम होते हैं। वह मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों और प्रशासन संबंधी सूचनाओं से राष्ट्रपति को अवगत कराते हैं।
- नियुक्ति संबंधी सलाह: प्रधानमंत्री ही राष्ट्रपति को विभिन्न महत्वपूर्ण अधिकारियों—जैसे भारत के महान्यायवादी (AG), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), UPSC के अध्यक्ष एवं सदस्य, चुनाव आयुक्तों, वित्त आयोग के अध्यक्ष—की नियुक्ति के संबंध में सलाह देते हैं।
3. संसद के संबंध में:
- सदन का नेता: प्रधानमंत्री प्रायः लोकसभा (निचले सदन) के नेता होते हैं।
- सत्र आहूत करना: वह राष्ट्रपति को संसद का सत्र बुलाने और सत्रावसान करने की सलाह देते हैं।
- लोकसभा का विघटन: वह किसी भी समय राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं।
- सरकार की नीतियों की घोषणा: वह संसद के पटल पर सरकार की महत्वपूर्ण नीतियों की घोषणा करते हैं।
4. अन्य शक्तियाँ:
- वह नीति (NITI) आयोग, राष्ट्रीय विकास परिषद, राष्ट्रीय एकता परिषद और अंतर-राज्यीय परिषद के पदेन अध्यक्ष होते हैं।
- वह राष्ट्र की विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- वह राष्ट्र के नेता के रूप में जाने जाते हैं।
मंत्रिपरिषद (The Council of Ministers)
मंत्रिपरिषद वह वृहद् निकाय है जिसमें सरकार के सभी मंत्री शामिल होते हैं। यह एक टीम के रूप में काम करती है जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं।
मंत्रिपरिषद की संरचना और रचना
मंत्रिपरिषद में तीन श्रेणियों के मंत्री होते हैं:
| मंत्री का प्रकार | विवरण |
| 1. कैबिनेट मंत्री | * ये सबसे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण मंत्री होते हैं।<br>* ये अपने-अपने मंत्रालयों (जैसे- गृह, रक्षा, वित्त, विदेश) के प्रमुख होते हैं।<br>* मंत्रिमंडल (Cabinet) इन्हीं मंत्रियों से मिलकर बनता है। सरकार के सभी प्रमुख नीतिगत निर्णय मंत्रिमंडल की बैठकों में ही लिए जाते हैं। |
| 2. राज्य मंत्री | * इनकी दो श्रेणियाँ होती हैं:<br> (क) राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार): इन्हें छोटे मंत्रालयों का स्वतंत्र प्रभार दिया जाता है। ये कैबिनेट की बैठकों में तभी भाग लेते हैं जब उनके मंत्रालय से संबंधित किसी विषय पर चर्चा हो।<br> (ख) राज्य मंत्री: ये कैबिनेट मंत्रियों के साथ संबद्ध होते हैं और उनके प्रशासनिक कार्यों में सहायता करते हैं। |
| 3. उपमंत्री | * ये सबसे कनिष्ठ मंत्री होते हैं और इनका कोई स्वतंत्र प्रभार नहीं होता।<br>* वे कैबिनेट मंत्रियों या राज्य मंत्रियों के अधीन कार्य करते हैं और उनकी सहायता करते हैं। |
नोट: “मंत्रिपरिषद” एक व्यापक शब्द है जिसमें सभी (कैबिनेट, राज्य और उप) मंत्री शामिल हैं, जबकि “मंत्रिमंडल” एक छोटा और अधिक शक्तिशाली निकाय है जिसमें केवल कैबिनेट स्तर के मंत्री होते हैं।
मंत्रिपरिषद का आकार
- 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा, मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की कुल संख्या (प्रधानमंत्री सहित) लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।
उत्तरदायित्व (Responsibility)
1. सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility):
- अनुच्छेद 75(3) के अनुसार, मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
- यह संसदीय प्रणाली का आधार है। इसका अर्थ है कि सभी मंत्री अपने सभी कार्यों के लिए संयुक्त रूप से जिम्मेदार होते हैं। वे “एक साथ तैरते हैं और एक साथ डूबते हैं।”
- यदि लोकसभा किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) पारित कर दे, तो संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है।
2. व्यक्तिगत उत्तरदाययोત (Individual Responsibility):
- अनुच्छेद 75(2) के अनुसार, मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बने रहते हैं।
- इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि वे प्रधानमंत्री के विश्वासपर्यंत पद पर रहते हैं। प्रधानमंत्री किसी भी मंत्री से उसके प्रदर्शन से असंतुष्ट होने पर त्यागपत्र मांग सकते हैं या राष्ट्रपति को उसे बर्खास्त करने की सलाह दे सकते हैं।
भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची (List of Prime Ministers of India)
| क्रम संख्या | नाम | कार्यकाल (आरंभ) | कार्यकाल (समाप्त) | राजनीतिक दल | महत्वपूर्ण तथ्य |
| 1. | जवाहरलाल नेहरू | 15 अगस्त 1947 | 27 मई 1964 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | भारत के पहले और सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्री; कार्यकाल के दौरान मृत्यु। |
| – | गुलजारीलाल नंदा | 27 मई 1964 | 9 जून 1964 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | कार्यवाहक प्रधानमंत्री। |
| 2. | लाल बहादुर शास्त्री | 9 जून 1964 | 11 जनवरी 1966 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया; ताशकंद, सोवियत संघ में मृत्यु। |
| – | गुलजारीलाल नंदा | 11 जनवरी 1966 | 24 जनवरी 1966 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | दूसरी बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री। |
| 3. | इन्दिरा गांधी | 24 जनवरी 1966 | 24 मार्च 1977 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री; पहला कार्यकाल। |
| 4. | मोरारजी देसाई | 24 मार्च 1977 | 28 जुलाई 1979 | जनता पार्टी | भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री; सबसे वृद्ध प्रधानमंत्री। |
| 5. | चरण सिंह | 28 जुलाई 1979 | 14 जनवरी 1980 | जनता पार्टी (सेक्युलर) | एकमात्र प्रधानमंत्री जो कभी संसद का सामना नहीं कर सके। |
| (3) | इन्दिरा गांधी | 14 जनवरी 1980 | 31 अक्टूबर 1984 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई) | दूसरा कार्यकाल; कार्यकाल के दौरान हत्या। |
| 6. | राजीव गांधी | 31 अक्टूबर 1984 | 2 दिसंबर 1989 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई) | सबसे युवा प्रधानमंत्री। |
| 7. | विश्वनाथ प्रताप सिंह | 2 दिसंबर 1989 | 10 नवंबर 1990 | जनता दल | मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं। |
| 8. | चन्द्र शेखर | 10 नवंबर 1990 | 21 जून 1991 | समाजवादी जनता पार्टी | |
| 9. | पी. वी. नरसिम्हा राव | 21 जून 1991 | 16 मई 1996 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | भारत में आर्थिक उदारीकरण के जनक। |
| 10. | अटल बिहारी वाजपेयी | 16 मई 1996 | 1 जून 1996 | भारतीय जनता पार्टी | सबसे छोटा कार्यकाल (13 दिन)। |
| 11. | एच. डी. देवेगौड़ा | 1 जून 1996 | 21 अप्रैल 1997 | जनता दल | |
| 12. | इन्द्र कुमार गुजराल | 21 अप्रैल 1997 | 19 मार्च 1998 | जनता दल | ‘गुजराल सिद्धांत’ विदेश नीति के लिए जाने जाते हैं। |
| (10) | अटल बिहारी वाजपेयी | 19 मार्च 1998 | 22 मई 2004 | भारतीय जनता पार्टी | पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री जिन्होंने पूर्ण कार्यकाल पूरा किया। |
| 13. | मनमोहन सिंह | 22 मई 2004 | 26 मई 2014 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | भारत के पहले सिख प्रधानमंत्री। |
| 14. | नरेन्द्र मोदी | 26 मई 2014 | पदासीन | भारतीय जनता पार्टी | दूसरे प्रधानमंत्री (नेहरू के बाद) जो दो पूर्ण कार्यकाल के बाद तीसरे कार्यकाल के लिए चुने गए। |
यहाँ वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) की सूची दी गई है, जो नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के लिए जून 2024 में हुए पुनर्गठन पर आधारित है। कृपया ध्यान दें कि यह एक गतिशील सूची है और समय के साथ इसमें बदलाव संभव हैं।
यह सूची कैबिनेट मंत्रियों की है, जो सरकार में सर्वोच्च स्तर के मंत्री होते हैं।
भारत का वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल (जून 2024 तक)
| क्र.सं. | मंत्री का नाम | मंत्रालय |
| 1. | श्री नरेंद्र मोदी | प्रधानमंत्री; कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय; परमाणु ऊर्जा विभाग; अंतरिक्ष विभाग; (और वे सभी विभाग जो किसी मंत्री को आवंटित नहीं हैं) |
| 2. | श्री राजनाथ सिंह | रक्षा मंत्री |
| 3. | श्री अमित शाह | गृह मंत्री; सहकारिता मंत्री |
| 4. | श्री नितिन गडकरी | सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री |
| 5. | श्री जगत प्रकाश नड्डा (जे. पी. नड्डा) | स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री; रसायन और उर्वरक मंत्री |
| 6. | श्री शिवराज सिंह चौहान | कृषि और किसान कल्याण मंत्री; ग्रामीण विकास मंत्री |
| 7. | श्रीमती निर्मला सीतारमण | वित्त मंत्री; कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री |
| 8. | डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर (एस. जयशंकर) | विदेश मंत्री |
| 9. | श्री मनोहर लाल खट्टर | आवास और शहरी मामलों के मंत्री; ऊर्जा मंत्री |
| 10. | श्री एच. डी. कुमारस्वामी | भारी उद्योग मंत्री; इस्पात मंत्री |
| 11. | श्री पीयूष गोयल | वाणिज्य और उद्योग मंत्री |
| 12. | श्री धर्मेंद्र प्रधान | शिक्षा मंत्री |
| 13. | श्री जीतन राम मांझी | सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री |
| 14. | श्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) | पंचायती राज मंत्री; मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री |
| 15. | श्री सर्बानंद सोनोवाल | बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री |
| 16. | डॉ. वीरेंद्र कुमार | सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री |
| 17. | श्री किंजरापु राममोहन नायडू | नागरिक उड्डयन मंत्री |
| 18. | श्री प्रहलाद जोशी | उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री; नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री |
| 19. | श्री जुएल ओराम | जनजातीय मामलों के मंत्री |
| 20. | श्री गिरिराज सिंह | कपड़ा मंत्री |
| 21. | श्री अश्विनी वैष्णव | रेल मंत्री; सूचना और प्रसारण मंत्री; इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री |
| 22. | श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया | संचार मंत्री; पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास मंत्री |
| 23. | श्री भूपेंद्र यादव | पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री |
| 24. | श्री गजेंद्र सिंह शेखावत | संस्कृति मंत्री; पर्यटन मंत्री |
| 25. | श्रीमती अन्नपूर्णा देवी | महिला एवं बाल विकास मंत्री |
| 26. | श्री किरेन रिजिजू | संसदीय कार्य मंत्री; अल्पसंख्यक कार्य मंत्री |
| 27. | श्री हरदीप सिंह पुरी | पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री |
| 28. | डॉ. मनसुख मंडाविया | श्रम और रोजगार मंत्री; युवा मामले और खेल मंत्री |
| 29. | श्री जी. किशन रेड्डी | कोयला मंत्री; खान मंत्री |
| 30. | श्री चिराग पासवान | खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री |
| 31. | श्री सी. आर. पाटिल | जल शक्ति मंत्री |
संसद (The Parliament of India)
परिभाषा:
भारत की संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था (Supreme Legislative Body) है। यह वह निकाय है जो देश के लिए कानूनों का निर्माण करता है, सरकार के कार्यों की निगरानी करता है, और जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय संसद द्विसदनीय (Bicameral) है।
संवैधानिक प्रावधान:
संविधान के भाग-5 में अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद की संरचना, गठन, प्रक्रिया और शक्तियों का वर्णन किया गया है।
अनुच्छेद 79 के अनुसार, भारत की संसद तीन अंगों से मिलकर बनती है:
संसद = राष्ट्रपति + लोकसभा + राज्यसभा
यह महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं होते, फिर भी वे संसद का एक अभिन्न अंग हैं, क्योंकि संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक उनकी स्वीकृति के बिना कानून नहीं बन सकता।
संसद के दो सदन (The Two Houses of Parliament)
1. लोकसभा (The House of the People)
इसे “निचला सदन” (Lower House) या “जनता का सदन” भी कहा जाता है क्योंकि इसके सदस्य सीधे भारत की जनता द्वारा चुने जाते हैं।
- संरचना और सदस्य संख्या:
- अधिकतम संख्या: 550 (530 राज्यों से और 20 केंद्रशासित प्रदेशों से)।
- वर्तमान संख्या: 543 (सभी निर्वाचित)।
- पहले एंग्लो-इंडियन समुदाय के 2 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता था, लेकिन 104वें संविधान संशोधन, 2019 द्वारा इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है।
- चुनाव: सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (18 वर्ष से अधिक आयु के नागरिक) के आधार पर होता है।
- कार्यकाल: लोकसभा का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। हालाँकि, प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति इसे समय से पहले भी भंग (dissolve) कर सकते हैं।
- अध्यक्षता: लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) करते हैं, जिनका चुनाव लोकसभा के सदस्य अपने में से ही करते हैं।
2. राज्यसभा (The Council of States)
इसे “उच्च सदन” (Upper House) या “राज्यों की परिषद” भी कहा जाता है क्योंकि यह भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करती है।
- संरचना और सदस्य संख्या:
- अधिकतम संख्या: 250 (238 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से निर्वाचित और 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत)।
- वर्तमान संख्या: 245 (233 निर्वाचित + 12 मनोनीत)।
- मनोनीत सदस्य: राष्ट्रपति द्वारा 12 सदस्य मनोनीत किए जाते हैं, जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या अनुभव होता है।
- चुनाव: सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
- कार्यकाल: राज्यसभा एक स्थायी सदन (Permanent House) है, यह कभी भंग नहीं होती।
- इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है।
- प्रत्येक दो वर्ष में इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य चुने जाते हैं।
- अध्यक्षता: भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होते हैं।
| आधार | लोकसभा | राज्यसभा |
| अन्य नाम | निचला सदन, जनता का सदन | उच्च सदन, राज्यों की परिषद |
| सदस्य संख्या | वर्तमान में 543 | वर्तमान में 245 |
| चुनाव | प्रत्यक्ष (जनता द्वारा) | अप्रत्यक्ष (विधायकों द्वारा) |
| कार्यकाल | 5 वर्ष (अस्थायी सदन) | स्थायी सदन (सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष) |
| अध्यक्ष | लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) | भारत के उपराष्ट्रपति (सभापति) |
संसद के कार्य और शक्तियाँ (Functions and Powers of Parliament)
- विधायी कार्य (Legislative Functions):
- संसद का सबसे प्रमुख कार्य देश के लिए कानूनों का निर्माण करना है।
- यह संघ सूची और समवर्ती सूची में दिए गए विषयों पर कानून बना सकती है। विशेष परिस्थितियों में यह राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
- कार्यपालिका पर नियंत्रण (Executive Control):
- संसदीय प्रणाली में, कार्यपालिका (मंत्रिपरिषद) सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
- संसद विभिन्न तरीकों से सरकार पर नियंत्रण रखती है, जैसे – प्रश्नकाल, शून्यकाल, स्थगन प्रस्ताव, निंदा प्रस्ताव, और अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से।
- वित्तीय कार्य (Financial Functions):
- संसद देश के वित्त पर पूर्ण नियंत्रण रखती है।
- वार्षिक बजट संसद द्वारा ही पारित किया जाता है।
- संसद की स्वीकृति के बिना सरकार न तो कोई कर लगा सकती है और न ही भारत की संचित निधि से कोई धन खर्च कर सकती है।
- धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
- संविधान संशोधन की शक्ति (Constituent Functions):
- संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है।
- न्यायिक कार्य (Judicial Functions):
- संसद, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों पर महाभियोग (Impeachment) लगाकर उन्हें पद से हटा सकती है।
- निर्वाचन संबंधी कार्य (Electoral Functions):
- संसद, भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेती है।
संसदीय प्रक्रिया (Legislative Procedure)
एक विधेयक (Bill) कानून कैसे बनता है?
- पहला वाचन: विधेयक को किसी भी सदन में प्रस्तुत करना।
- दूसरा वाचन: विधेयक के प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा और इसे संसदीय समितियों के पास भेजना।
- तीसरा वाचन: विधेयक को अंतिम रूप से स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए मतदान।
- दूसरे सदन में प्रक्रिया: एक सदन से पारित होने के बाद, विधेयक को दूसरे सदन में भेजा जाता है, जहाँ यही प्रक्रिया दोहराई जाती है।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति: दोनों सदनों से पारित होने के बाद, विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। उनकी सहमति मिलते ही विधेयक, अधिनियम (Act) यानी कानून बन जाता है।
दोनों सदनों में गतिरोध (Deadlock):
यदि किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में असहमति होती है, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुला सकते हैं, जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करते हैं।
केंद्रीय मंत्रिमंडल (The Union Cabinet)
परिभाषा:
मंत्रिमंडल (कैबिनेट), मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) का वह सबसे महत्वपूर्ण और अंतरंग (core) भाग है जिसमें सरकार के सर्वोच्च स्तर के यानी कैबिनेट मंत्री ही शामिल होते हैं। यह भारत सरकार की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था (highest decision-making body) है।
यह संसदीय प्रणाली में वास्तविक कार्यकारी शक्ति का केंद्र है, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं।
“मंत्रिपरिषद” और “मंत्रिमंडल” में अंतर (Difference between Council of Ministers and Cabinet)
यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ये दोनों शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं।
| आधार | मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) | मंत्रिमंडल (Cabinet) |
| आकार | यह एक बड़ा निकाय है, जिसमें 60 से 70 मंत्री तक हो सकते हैं। | यह एक छोटा निकाय है, जिसमें केवल 15 से 20 शीर्ष मंत्री होते हैं। |
| रचना | इसमें तीनों श्रेणियों के मंत्री शामिल होते हैं – कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उपमंत्री। | इसमें केवल कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। |
| शक्ति | सैद्धांतिक रूप से सारी कार्यकारी शक्तियाँ इसमें निहित हैं। | व्यावहारिक रूप में, यह मंत्रिपरिषद की शक्तियों का वास्तविक प्रयोग करता है और नीति-निर्माण करता है। |
| कार्य | यह मंत्रिमंडल के निर्णयों को लागू करता है और उसके कार्यों की निगरानी करता है। | यह सरकार की नीतियों का निर्धारण करता है, सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेता है, और मंत्रिपरिषद के लिए दिशानिर्देश तैयार करता है। |
| बैठकें | इसकी बैठकें बहुत कम होती हैं। यह सामूहिक रूप से निर्णय नहीं लेता। | इसकी बैठकें नियमित (प्रायः सप्ताह में एक बार) होती हैं और सभी महत्वपूर्ण निर्णय यहीं लिए जाते हैं। |
| संवैधानिक स्थिति | यह एक संवैधानिक निकाय है, जिसका उल्लेख अनुच्छेद 74 और 75 में है। | यह भी एक संवैधानिक निकाय है। “कैबिनेट” शब्द मूल संविधान में नहीं था, इसे 44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा अनुच्छेद 352 में जोड़ा गया। |
संक्षेप में, मंत्रिपरिषद “सरकार” है, तो मंत्रिमंडल उसका “हृदय” या “नाभिक” है।
मंत्रिमंडल की संरचना (Composition of the Cabinet)
- प्रमुख: प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल के प्रमुख होते हैं।
- सदस्य: इसमें केवल वरिष्ठ मंत्री शामिल होते हैं, जिन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है। ये सरकार के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों, जैसे – गृह, रक्षा, वित्त, विदेश, शिक्षा, रेल आदि के प्रमुख होते हैं।
- प्रधानमंत्री अपने विवेकानुसार कैबिनेट मंत्रियों का चयन करते हैं।
मंत्रिमंडल की भूमिका और कार्य (Role and Functions of the Cabinet)
मंत्रिमंडल भारतीय शासन व्यवस्था का मुख्य नीति-निर्धारक केंद्र है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
1. नीति निर्धारण (Policy Making)
- कैबिनेट ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की समस्त नीतियों का निर्धारण करती है। शिक्षा नीति, स्वास्थ्य नीति, आर्थिक नीति और विदेश नीति जैसे सभी महत्वपूर्ण निर्णय कैबिनेट द्वारा ही लिए जाते हैं।
2. विधायी कार्य (Legislative Functions)
- यद्यपि कानून संसद बनाती है, लेकिन लगभग 95% विधेयक मंत्रिमंडल द्वारा ही तैयार किए जाते हैं और संसद में प्रस्तुत किए जाते हैं।
- संसद का एजेंडा (कार्यसूची) भी कैबिनेट द्वारा ही तय किया जाता है।
3. सर्वोच्च कार्यकारी प्राधिकार (Supreme Executive Authority)
- यह केंद्र सरकार का सर्वोच्च कार्यकारी प्राधिकरण है। यह विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों का निर्देशन, समन्वय और पर्यवेक्षण करता है।
- सभी प्रमुख नियुक्तियाँ (जैसे राज्यपाल, राजदूत, आयोगों के अध्यक्ष) कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा ही तय की जाती हैं।
4. वित्तीय कार्य (Financial Functions)
- देश की आर्थिक दिशा और नीतियां कैबिनेट द्वारा ही निर्धारित होती हैं।
- वार्षिक बजट वित्त मंत्री द्वारा तैयार किया जाता है, लेकिन इसे कैबिनेट की स्वीकृति के बाद ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है।
5. समन्वयकारी भूमिका (Coordinating Role)
- मंत्रिमंडल सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय (coordination) स्थापित करने का कार्य करता है, ताकि सरकार एक इकाई के रूप में सुचारु रूप से कार्य कर सके।
6. राष्ट्रपति को सलाह देना (Advisory Role to the President)
- अनुच्छेद 74 के अनुसार, मंत्रिमंडल राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देता है, और राष्ट्रपति उस सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है।
- राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा भी मंत्रिमंडल की लिखित सलाह पर ही की जा सकती है।
7. संकट प्रबंधन (Crisis Management)
- देश के समक्ष आने वाले किसी भी बड़े संकट—चाहे वह प्राकृतिक आपदा हो, आर्थिक मंदी हो, या बाहरी आक्रमण—से निपटने की मुख्य जिम्मेदारी मंत्रिमंडल की ही होती है।
मंत्रिमंडल की समितियाँ (Cabinet Committees)
- कार्य के बोझ को कम करने और गहन विचार-विमर्श के लिए मंत्रिमंडल, “मंत्रिमंडलीय समितियों” (Cabinet Committees) के माध्यम से कार्य करता है।
- ये छोटे निकाय होते हैं, जिनमें कुछ विशेष मंत्री शामिल होते हैं जो किसी खास मुद्दे पर निर्णय लेते हैं और बाद में उसे पूर्ण कैबिनेट के समक्ष अनुमोदन के लिए रखते हैं।
- इनमें से कुछ प्रमुख समितियाँ हैं:
- राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCPA) (सबसे शक्तिशाली, इसे ‘सुपर कैबिनेट’ भी कहते हैं)
- आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA)
- सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCS)
- नियुक्ति संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (ACC)
- इन समितियों का गठन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है।
मंत्रिमंडलीय समितियाँ (Cabinet Committees)
परिभाषा:
मंत्रिमंडलीय समितियाँ ऐसे छोटे निकाय या समूह होते हैं जिनका गठन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है। इनमें कैबिनेट स्तर के वरिष्ठ मंत्रियों को शामिल किया जाता है ताकि वे किसी विशेष मुद्दे या क्षेत्र पर गहराई से विचार-विमर्श कर सकें, नीतिगत निर्णय ले सकें, और बाद में अपने निर्णयों से पूर्ण मंत्रिमंडल को अवगत करा सकें या उसका अनुमोदन प्राप्त कर सकें।
ये समितियाँ सरकार के काम के अत्यधिक बोझ को कम करती हैं और मुद्दों के गहन विश्लेषण को सुनिश्चित करती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
- संविधान-बाह्य (Extra-Constitutional):
- इन समितियों का उल्लेख संविधान में नहीं है। इनका गठन ‘भारत सरकार के कार्य आवंटन नियम’ (Transaction of Business Rules) के तहत किया जाता है। ये परंपरा पर आधारित हैं।
- गठन:
- इनका गठन प्रधानमंत्री द्वारा समय की आवश्यकता और स्थिति के अनुसार किया जाता है। प्रधानमंत्री ही तय करते हैं कि कौन सी समिति बनेगी और उसमें कौन-कौन सदस्य होगा।
- सदस्यता:
- इनकी सदस्य संख्या आमतौर पर 3 से 8 के बीच होती है।
- इनमें मुख्यतः कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री चाहें तो अन्य मंत्रियों (जैसे राज्य मंत्री) को भी इनका सदस्य बना सकते हैं।
- अध्यक्षता:
- अधिकांश महत्वपूर्ण समितियों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री स्वयं करते हैं।
- कुछ समितियों की अध्यक्षता अन्य वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री (जैसे गृह मंत्री या वित्त मंत्री) भी कर सकते हैं।
- निर्णय:
- इन समितियों के निर्णय लगभग मंत्रिमंडल के निर्णय के समान ही माने जाते हैं। हालांकि, महत्वपूर्ण मामलों पर मंत्रिमंडल की पूर्ण बैठक में अनुमोदन लिया जा सकता है।
मंत्रिमंडलीय समितियों के प्रकार (Types of Cabinet Committees)
ये समितियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं:
- स्थायी समितियाँ (Standing Committees):
- ये वे समितियाँ हैं जो प्रकृति में स्थायी होती हैं और हमेशा अस्तित्व में रहती हैं।
- तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees):
- ये किसी विशेष प्रयोजन या समस्या के समाधान के लिए बनाई जाती हैं और काम पूरा हो जाने के बाद इन्हें भंग कर दिया जाता है।
संसदीय समितियाँ (Parliamentary Committees)
संसद केवल अपने सत्रों के दौरान ही बैठक करती है, जो साल में सीमित समय के लिए होते हैं। संसद के पास बहुत से जटिल विधायी और वित्तीय कार्य होते हैं, जिनका सदन की पूर्ण बैठक में गहराई से विश्लेषण करना संभव नहीं होता। इसी कमी को पूरा करने के लिए संसदीय समितियों का गठन किया जाता है।
परिभाषा:
संसदीय समिति, सांसदों का एक ऐसा छोटा समूह होता है जिसका गठन सदन द्वारा (अध्यक्ष/सभापति द्वारा) किया जाता है। यह समिति किसी विशेष विषय (जैसे विधेयक, बजट या सरकारी नीति) की गहन जाँच करती है और अपनी रिपोर्ट सदन को सौंपती है।
प्रकार: संसदीय समितियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं:
- स्थायी समितियाँ (Standing Committees)
- तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)
स्थायी समितियाँ (Standing Committees)
परिभाषा:
ये वे समितियाँ हैं जो प्रकृति में स्थायी होती हैं, अर्थात् इनका गठन प्रतिवर्ष या समय-समय पर किया जाता है और ये निरंतर आधार पर कार्य करती रहती हैं।
स्थायी समितियों को उनके कार्य की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1. वित्तीय समितियाँ (Financial Committees)
ये समितियाँ सरकार के वित्तीय कामकाज और खर्चों पर निगरानी रखती हैं और इन्हें संसदीय नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।
(क) लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee – PAC)
- गठन: 1921 में (भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत)।
- सदस्य: कुल 22 सदस्य (15 लोकसभा से + 7 राज्यसभा से)।
- अध्यक्ष: परंपरा के अनुसार, इसका अध्यक्ष विपक्षी दल का कोई सदस्य होता है, जिसे लोकसभा अध्यक्ष नियुक्त करते हैं।
- कार्य:
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की वार्षिक रिपोर्ट की जाँच करना।
- यह सुनिश्चित करना कि सरकारी धन संसद की मंजूरी के अनुसार ही खर्च किया गया है। इसे CAG का “मित्र और मार्गदर्शक” कहा जाता है।
(ख) प्राक्कलन समिति (Estimates Committee)
- गठन: 1950 में (जॉन मथाई की सिफारिश पर)।
- सदस्य: कुल 30 सदस्य (सभी सदस्य केवल लोकसभा से होते हैं, राज्यसभा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं)।
- कार्य:
- बजट में शामिल अनुमानों (Estimates) की जाँच करना।
- प्रशासन में मितव्ययिता (economy) और कार्यकुशलता (efficiency) लाने के लिए वैकल्पिक नीतियाँ सुझाना। इसे ‘सतत मितव्ययिता समिति’ भी कहते हैं।
(ग) सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी समिति (Committee on Public Undertakings)
- गठन: 1964 में (कृष्ण मेनन समिति की सिफारिश पर)।
- सदस्य: कुल 22 सदस्य (15 लोकसभा से + 7 राज्यसभा से)।
- कार्य:
- सरकारी कंपनियों (PSUs) जैसे LIC, ONGC आदि के खातों और कामकाज की जाँच करना।
- यह देखना कि वे स्वायत्तता के साथ कुशलतापूर्वक चलाए जा रहे हैं या नहीं।
2. विभागीय स्थायी समितियाँ (Departmental Standing Committees – DRCs)
- गठन: 1993 में।
- संख्या: वर्तमान में कुल 24 समितियाँ हैं।
- 16 लोकसभा के अधीन
- 8 राज्यसभा के अधीन
- सदस्य: प्रत्येक समिति में 31 सदस्य होते हैं (21 लोकसभा से + 10 राज्यसभा से)।
- कार्य:
- ये समितियाँ अपने-अपने संबंधित मंत्रालयों/विभागों के बजट (अनुदान की माँगों) की विस्तृत जाँच करती हैं।
- संबंधित मंत्रालयों से जुड़े विधेयकों (Bills) का गहन विश्लेषण करती हैं।
- मंत्रालयों की वार्षिक रिपोर्ट पर विचार करती हैं।
- ये सरकार के लिए ‘लघु संसद’ (Mini-Parliament) की तरह काम करती हैं।
3. जाँच समितियाँ (Committees to Inquire)
- (क) याचिका समिति (Committee on Petitions): आम जनता से प्राप्त याचिकाओं पर विचार करती है।
- (ख) विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges): सदन और उसके सदस्यों के विशेषाधिकारों के हनन के मामलों की जाँच करती है।
- (ग) आचार समिति (Ethics Committee): सदस्यों के नैतिक और सदाचार पूर्ण आचरण की निगरानी करती है।
4. सदन के दिन-प्रतिदिन के कार्यों से संबंधित समितियाँ
- (क) कार्य मंत्रणा समिति (Business Advisory Committee): सदन के समय और कार्यक्रम का निर्धारण करती है।
- (ख) गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों तथा संकल्पों संबंधी समिति: प्राइवेट मेंबर बिल के लिए समय निर्धारित करती है।
- (ग) नियम समिति (Rules Committee): सदन की प्रक्रिया और कार्य-संचालन के नियमों पर विचार करती है।
5. सेवा समितियाँ (Service Committees)
ये सदस्यों को आवास, वेतन और अन्य सुविधाएँ प्रदान करने से संबंधित होती हैं, जैसे – सामान्य प्रयोजन समिति, आवास समिति आदि।
स्थायी समितियों का महत्व (Significance of Standing Committees)
- सरकार पर विस्तृत निगरानी: ये समितियाँ सरकार के कार्यों पर गहन और विस्तृत निगरानी रखती हैं, जो सदन की बैठक में संभव नहीं है।
- विधायी कार्यों की गुणवत्ता में सुधार: ये विधेयकों के हर पहलू की सूक्ष्मता से जाँच करती हैं, जिससे बेहतर और प्रभावी कानून बनते हैं।
- वित्तीय जवाबदेही: वित्तीय समितियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि सरकारी पैसा सही तरीके से और मितव्ययिता से खर्च हो।
- विशेषज्ञता का उपयोग: ये विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ राय प्राप्त कर सकती हैं, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार होता है।
- दलगत राजनीति से परे कार्य: इन समितियों की बैठकें बंद कमरे में होती हैं, जिससे सदस्य दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित में निष्पक्ष रूप से अपनी राय रख सकते हैं।
तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees)
परिभाषा:
‘तदर्थ’ (Ad-hoc) एक लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ है “इस प्रयोजन के लिए” (for this purpose)।
तदर्थ समितियाँ वे समितियाँ होती हैं जिनका गठन किसी विशिष्ट प्रयोजन या कार्य के लिए किया जाता है। जब वे अपना निर्दिष्ट कार्य पूरा कर लेती हैं और अपनी रिपोर्ट सौंप देती हैं, तो उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। ये समितियाँ अस्थायी (temporary) प्रकृति की होती हैं।
गठन: इनका गठन आवश्यकता पड़ने पर सदन द्वारा एक प्रस्ताव पारित करके या लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति द्वारा किया जाता है।
तदर्थ समितियों के प्रकार (Types of Ad-hoc Committees)
तदर्थ समितियों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- जाँच समितियाँ (Inquiry Committees)
- सलाहकार समितियाँ (Advisory Committees)
1. जाँच समितियाँ (Inquiry Committees)
इन समितियों का गठन समय-समय पर किसी विशेष घटना, विषय या घोटाले की जाँच करने के लिए किया जाता है। ये समितियाँ उस मामले की गहन छानबीन करती हैं, साक्ष्य जुटाती हैं, और निष्कर्षों के साथ अपनी रिपोर्ट सदन को सौंपती हैं।
प्रमुख उदाहरण:
- बोफोर्स तोप सौदे पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC):
- यह समिति 1987 में बोफोर्स घोटाले के आरोपों की जाँच के लिए बनाई गई थी।
- हर्षद मेहता स्टॉक मार्केट घोटाले पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC):
- 1992 में हुए शेयर बाजार घोटाले की जाँच के लिए इस समिति का गठन किया गया था।
- 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC):
- 2011 में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जाँच के लिए इसका गठन किया गया था।
- किसी विशिष्ट विधेयक पर प्रवर और संयुक्त समितियाँ (Select and Joint Committees on a particular Bill):
- यद्यपि आजकल अधिकांश विधेयक विभागीय स्थायी समितियों को भेजे जाते हैं, लेकिन यदि कोई विधेयक बहुत विवादास्पद या तकनीकी रूप से जटिल होता है, तो सदन एक विशेष समिति का गठन कर सकता है जिसे ‘प्रवर समिति’ (Select Committee) कहते हैं।
- यदि समिति में केवल एक ही सदन (लोकसभा या राज्यसभा) के सदस्य होते हैं, तो उसे ‘प्रवर समिति’ कहा जाता है।
- यदि समिति में दोनों सदनों के सदस्य शामिल होते हैं, तो उसे ‘संयुक्त प्रवर समिति’ (Joint Select Committee) या केवल ‘संयुक्त समिति’ (Joint Committee) कहा जाता है। इसमें लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य 2:1 के अनुपात में होते हैं।
- उदाहरण: हाल के वर्षों में विवादास्पद विधेयकों जैसे ‘नागरिकता (संशोधन) विधेयक’ और ‘डेटा संरक्षण विधेयक’ को भी संयुक्त समितियों को भेजा गया था।
2. सलाहकार समितियाँ (Advisory Committees)
इन समितियों का गठन किसी विशेष विषय पर सदन को सलाह देने या रिपोर्ट तैयार करने के लिए किया जाता है। इनका कार्यक्षेत्र जाँच की बजाय परामर्श देना होता है।
उदाहरण:
- रेलवे अभिसमय समिति (Railway Convention Committee)
- संसद भवन परिसर में खाद्य प्रबंधन पर समिति
- सांसदों के वेतन और भत्तों पर संयुक्त समिति
तदर्थ समितियों की कार्यप्रणाली
- नियुक्ति: इन समितियों के सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति सदन या लोकसभा अध्यक्ष/सभापति द्वारा की जाती है।
- कार्य: समिति अपने निर्दिष्ट विषय की जाँच करती है, विशेषज्ञों को बुला सकती है, दस्तावेज़ों की मांग कर सकती है, और प्रभावित पक्षों से पूछताछ कर सकती है।
- रिपोर्ट प्रस्तुत करना: अपना कार्य पूरा करने के बाद, समिति एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करती है और उसे सदन के पटल पर रखती है।
- विघटन: रिपोर्ट सौंपने के साथ ही समिति का कार्य समाप्त हो जाता है और वह स्वतः ही भंग हो जाती है।
स्थायी और तदर्थ समितियों में मुख्य अंतर (Key Difference)
| आधार | स्थायी समितियाँ (Standing Committees) | तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees) |
| प्रकृति | स्थायी (Permanent) और निरंतर आधार पर कार्य करती हैं। | अस्थायी (Temporary) और विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनती हैं। |
| कार्यक्षेत्र | इनका कार्यक्षेत्र पूर्व-निर्धारित और व्यापक होता है (जैसे वित्त, रक्षा आदि)। | इनका कार्यक्षेत्र संकीर्ण और विशिष्ट होता है (जैसे किसी एक घोटाले की जाँच)। |
| अस्तित्व | इनका अस्तित्व लगातार बना रहता है; हर साल पुनर्गठन होता है। | कार्य समाप्त होने पर इनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। |
निष्कर्ष:
तदर्थ समितियाँ संसदीय निगरानी का एक लचीला और शक्तिशाली उपकरण हैं, जो संसद को अचानक उत्पन्न हुए जटिल और विवादास्पद मामलों की गहराई से जाँच करने की क्षमता प्रदान करती हैं, जिसके लिए स्थायी समितियों का नियमित ढाँचा शायद अपर्याप्त हो।
कुछ प्रमुख स्थायी मंत्रिमंडलीय समितियाँ (वर्तमान में)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल में वर्तमान में निम्नलिखित प्रमुख समितियाँ कार्यरत हैं (इनकी संख्या और संरचना समय-समय पर बदल सकती है):
1. राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Political Affairs – CCPA)
- महत्व: यह सबसे शक्तिशाली समिति है। इसे प्रायः “सुपर कैबिनेट” (Super Cabinet) भी कहा जाता है।
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- कार्य: देश की आंतरिक और बाह्य नीतियों से संबंधित सभी महत्वपूर्ण राजनीतिक मामलों पर निर्णय लेना। केंद्र-राज्य संबंधों और विदेश नीति के प्रमुख मुद्दों पर विचार करना।
2. आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Economic Affairs – CCEA)
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- कार्य: यह देश की आर्थिक नीतियों को दिशा देती है और महत्वपूर्ण आर्थिक मामलों पर निर्णय लेती है। इसमें विदेशी निवेश, कृषि उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का निर्धारण और प्रमुख आर्थिक परियोजनाओं को मंजूरी देना शामिल है।
3. सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Security – CCS)
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- कार्य: यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित सर्वोच्च निकाय है। यह रक्षा नीति, प्रमुख रक्षा सौदों, खुफिया एजेंसियों (जैसे RAW, IB) के कामकाज और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े सभी महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय लेती है।
4. नियुक्ति संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (Appointments Committee of the Cabinet – ACC)
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री (गृह मंत्री भी इसके सदस्य होते हैं)।
- कार्य: केंद्र सरकार के उच्च स्तरीय पदों पर नियुक्तियों से संबंधित निर्णय लेना। इसमें सेना प्रमुख, रिजर्व बैंक के गवर्नर, केंद्रीय सचिवों, सार्वजनिक उपक्रमों के प्रमुखों आदि की नियुक्तियाँ शामिल हैं।
5. संसदीय मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Parliamentary Affairs)
- अध्यक्ष: सामान्यतः रक्षा मंत्री या कोई अन्य वरिष्ठ मंत्री (प्रधानमंत्री इसके सदस्य नहीं होते)।
- कार्य: संसद के सत्रों की तारीखें तय करना, संसद में सरकार के विधायी कार्यों (Legislative Business) की योजना बनाना और संसद में विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ समन्वय स्थापित करना।
6. आवास संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Accommodation)
- अध्यक्ष: सामान्यतः गृह मंत्री।
- कार्य: यह समिति सरकारी आवास के आवंटन से संबंधित नियमों का निर्धारण करती है और वरिष्ठ अधिकारियों व सांसदों को आवास आवंटित करने का कार्य देखती है।
इसके अलावा, निवेश एवं विकास और रोजगार एवं कौशल विकास पर भी मंत्रिमंडलीय समितियाँ गठित की गई हैं।
मंत्रिमंडलीय समितियों का महत्व (Significance of Cabinet Committees)
- कार्य के विभाजन का साधन: ये समितियाँ काम का विभाजन करती हैं और मंत्रिमंडल के बोझ को हल्का करती हैं।
- गहन परीक्षण: ये नीतियो पर विस्तृत और गहन विचार-विमर्श को संभव बनाती हैं। छोटे समूह में होने के कारण हर पहलू पर बारीकी से चर्चा हो पाती है।
- शीघ्र निर्णय: छोटे आकार के कारण, ये समितियाँ जल्दी बैठकें कर सकती हैं और महत्वपूर्ण मुद्दों पर शीघ्रता से निर्णय ले सकती हैं, जिससे निर्णय प्रक्रिया तेज होती है।
- समन्वय स्थापित करना: ये विभिन्न मंत्रालयों के बीच नीतियों पर समन्वय स्थापित करने में मदद करती हैं।
- प्रधानमंत्री का नियंत्रण: इन समितियों, विशेषकर जिनकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, के माध्यम से सरकार की नीतियों पर प्रधानमंत्री का नियंत्रण और पकड़ मजबूत होती है।