विद्युत और चुंबकत्व

स्थिर विद्युत (Electrostatics)

परिभाषा:
स्थिरविद्युतिकी या स्थिर विद्युत (Electrostatics), भौतिकी की वह शाखा है जिसके अंतर्गत स्थिर (at rest) आवेशों तथा उनके बीच होने वाली अन्योन्य क्रियाओं (interactions) जैसे- बल, क्षेत्र और विभव का अध्ययन किया जाता है।

इस शाखा की नींव विद्युत आवेश की अवधारणा पर टिकी है।


विद्युत आवेश (Electric Charge)

परिभाषा:
यह किसी भी पदार्थ का वह मौलिक गुण (fundamental property) है जिसके कारण वह पदार्थ विद्युत तथा चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करता है या उनका अनुभव करता है।

आवेश के प्रकार (Types of Charge):
आवेश दो प्रकार के होते हैं:

  1. धनात्मक आवेश (+ve): जब कोई वस्तु इलेक्ट्रॉन खोती है, तो उसमें प्रोटॉनों की अधिकता हो जाती है, और वह धनावेशित हो जाती है।
  2. ऋणात्मक आवेश (-ve): जब कोई वस्तु इलेक्ट्रॉन ग्रहण करती है, तो उसमें इलेक्ट्रॉनों की अधिकता हो जाती है, और वह ऋणावेशित हो जाती है।

विद्युत आवेश के मौलिक गुणधर्म (Fundamental Properties of Electric Charge):

  1. आकर्षण और प्रतिकर्षण (Attraction and Repulsion):
    • समान आवेश (Like charges) एक-दूसरे को प्रतिकर्षित (repel) करते हैं (जैसे, + और +, या – और -)।
    • विपरीत आवेश (Unlike charges) एक-दूसरे को आकर्षित (attract) करते हैं (जैसे, + और -)।
  2. आवेश का संरक्षण (Conservation of Charge):
    • किसी भी एक विलगित निकाय (isolated system) का कुल आवेश सदैव नियत या संरक्षित रहता है।
    • आवेश को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट; इसे केवल एक वस्तु से दूसरी वस्तु पर स्थानांतरित किया जा सकता है।
  3. आवेश का क्वांटीकरण (Quantization of Charge):
    • किसी भी वस्तु पर कुल आवेश (q), एक मूल आवेश (e – एक इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन पर आवेश का परिमाण) का पूर्ण गुणज (integral multiple) होता है।
    • इसका मतलब है कि आवेश टुकड़ों में नहीं, बल्कि पैकेट के रूप में स्थानांतरित होता है।
    • सूत्र:q = ne
      • n = एक पूर्णांक (…, -2, -1, 0, 1, 2, 3, …)
      • e = मूल आवेश ≈ 1.6 × 10⁻¹⁹ C
    • किसी भी वस्तु पर 1.5e या 2.7e जैसा आवेश संभव नहीं है।
  4. योज्यता (Additivity):
    • किसी निकाय का कुल आवेश उसके विभिन्न भागों पर उपस्थित आवेशों के बीजगणितीय योग (algebraic sum) के बराबर होता है। (चिन्हों का ध्यान रखा जाता है)।
    • उदाहरण: यदि किसी निकाय में +2C, -5C और +4C आवेश हैं, तो कुल आवेश (+2) + (-5) + (+4) = +1C होगा।

कूलॉम का नियम (Coulomb’s Law)

यह नियम दो स्थिर बिंदु आवेशों के बीच लगने वाले स्थिरविद्युत बल (Electrostatic Force) के परिमाण और दिशा का वर्णन करता है।

नियम का कथन:

“किन्हीं दो स्थिर बिंदु आवेशों के बीच लगने वाला आकर्षण या प्रतिकर्षण बल, उन दोनों आवेशों के परिमाणों के गुणनफल के समानुपाती (directly proportional) तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional) होता है।”
“यह बल दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश कार्य करता है।”

गणितीय सूत्र:

F = k ( |q₁q₂| / r² )

जहाँ:

नियतांक
नियतांक k को 1 / (4πε₀) भी लिखा जाता है, जहाँ ε₀ (एबसॉइलन नॉट) को निर्वात की विद्युतशीलता (permittivity of free space) कहते हैं। ε₀ ≈ 8.854 × 10⁻¹² C²/N m²।

कूलॉम बल और गुरुत्वाकर्षण बल में तुलना

गुण (Property)कूलॉम का स्थिरविद्युत बलन्यूटन का गुरुत्वाकर्षण बल
नियम का सूत्रF = k (q₁q₂ / r²)F = G (m₁m₂ / r²)
निर्भरताआवेशों (q₁, q₂) पर निर्भर।द्रव्यमानों (m₁, m₂) पर निर्भर।
प्रकृतिआकर्षी और प्रतिकर्षी दोनों हो सकता है।सदैव आकर्षी होता है।
माध्यम पर निर्भरतायह आवेशों के बीच के माध्यम पर निर्भर करता हैयह द्रव्यमानों के बीच के माध्यम पर निर्भर नहीं करता
प्रबलता (Strength)यह एक अत्यंत प्रबल बल है।यह एक अत्यंत दुर्बल (कमजोर) बल है।
समानतादोनों ही व्युत्क्रम वर्ग नियम (inverse square law) का पालन करते हैं, अर्थात् बल दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती है।दोनों ही व्युत्क्रम वर्ग नियम का पालन करते हैं।

धारा विद्युत (Current Electricity)

परिभाषा:
धारा विद्युत (Current Electricity) भौतिकी की वह शाखा है जो गतिमान आवेशों (moving charges) और उनसे संबंधित घटनाओं, जैसे विद्युत धारा, विभवांतर, और प्रतिरोध का अध्ययन करती है। स्थिर विद्युत के विपरीत, जहाँ आवेश रुके हुए होते हैं, यहाँ आवेशों का प्रवाह होता है।

इस शाखा के तीन मूलभूत स्तंभ हैं: विद्युत धारा (I), विभवांतर (V), और प्रतिरोध (R)।


1. विद्युत धारा (Electric Current – I)

परिभाषा:

“किसी चालक (conductor) के किसी अनुप्रस्थ काट (cross-section) से आवेश प्रवाह की दर (rate of flow of charge) को विद्युत धारा कहते हैं।”

सरल शब्दों में, यह बताता है कि किसी तार में से प्रति सेकंड कितना आवेश गुजर रहा है।

आवेश का प्रवाह:

सूत्र:

विद्युत धारा (I) = प्रवाहित कुल आवेश (Q) / लिया गया समय (t)
I = Q / t

SI मात्रक:

प्रकृति: विद्युत धारा एक अदिश राशि (Scalar Quantity) है, भले ही इसकी एक दिशा होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह सदिश योग के नियमों का पालन नहीं करती है।


2. विभवांतर (Potential Difference – V)

अवधारणा:
पानी हमेशा उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर बहता है। ऊष्मा हमेशा उच्च तापमान से निम्न तापमान की ओर प्रवाहित होती है। ठीक इसी तरह, विद्युत आवेश (धारा) भी अपने आप प्रवाहित नहीं होता; उसे प्रवाहित होने के लिए विद्युत दाब (electrical pressure) के अंतर की आवश्यकता होती है। यही विद्युत दाब का अंतर विभवांतर है।

परिभाषा:

“एकांक धनात्मक आवेश (unit positive charge) को विद्युत क्षेत्र में एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किए गए कार्य (work done) को उन दो बिंदुओं के बीच का विभवांतर कहते हैं।”

यह दो बिंदुओं के बीच प्रति इकाई आवेश ऊर्जा का अंतर है।

सूत्र:

विभवांतर (V) = किया गया कार्य (W) / आवेश (Q)
V = W / Q

SI मात्रक:


3. प्रतिरोध (Resistance – R)

परिभाषा:

“किसी चालक का वह गुण जो उसमें प्रवाहित होने वाले विद्युत आवेश (धारा) के प्रवाह का विरोध (oppose) करता है, प्रतिरोध कहलाता है।”

प्रतिरोध को प्रभावित करने वाले कारक:
किसी तार का प्रतिरोध निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है:

  1. तार की लंबाई (l): प्रतिरोध, तार की लंबाई के समानुपाती होता है (R ∝ l) (लंबा तार = अधिक प्रतिरोध)।
  2. तार की मोटाई (अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल, A): प्रतिरोध, तार की मोटाई के व्युत्क्रमानुपाती होता है (R ∝ 1/A) (मोटा तार = कम प्रतिरोध)।
  3. पदार्थ की प्रकृति (Nature of Material): अलग-अलग पदार्थों का प्रतिरोध अलग-अलग होता है। इस गुण को प्रतिरोधकता (Resistivity, ρ) कहते हैं।
  4. तापमान (Temperature):
    • चालकों (conductors) के लिए: तापमान बढ़ाने पर प्रतिरोध बढ़ता है
    • अर्धचालकों (semiconductors) के लिए: तापमान बढ़ाने पर प्रतिरोध घटता है

सूत्र:

R = ρ (l / A)

SI मात्रक:


ओम का नियम (Ohm’s Law)

परिभाषा:
जर्मन भौतिक विज्ञानी जॉर्ज साइमन ओम द्वारा दिया गया यह नियम किसी चालक के सिरों पर लगाए गए विभवांतर (Potential Difference) और उसमें बहने वाली विद्युत धारा (Electric Current) के बीच संबंध स्थापित करता है।

नियम का कथन:

“यदि किसी चालक की भौतिक अवस्था (जैसे ताप, दाब, लंबाई आदि) अपरिवर्तित रहे, तो उस चालक के सिरों पर लगाया गया विभवांतर (V), उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा (I) के समानुपाती होता है।”

गणितीय रूप:

V ∝ I

इस समानुपात को समीकरण में बदलने के लिए एक नियतांक (R) का उपयोग किया जाता है, जो उस चालक का प्रतिरोध (Resistance) कहलाता है।

V = I × R या V = IR

यह ओम के नियम का प्रसिद्ध सूत्र है।

सूत्र से अन्य संबंध:
इस एक सूत्र से हम धारा और प्रतिरोध के लिए भी संबंध निकाल सकते हैं:

I = V / R
R = V / I

ओम के नियम का ग्राफ (V-I Graph):
ओम के नियम का पालन करने वाले चालकों के लिए, विभवांतर (V) और धारा (I) के बीच खींचा गया ग्राफ हमेशा एक सीधी रेखा (straight line) होता है जो मूल बिंदु से होकर गुजरती है। इस ग्राफ का ढलान (slope) चालक के प्रतिरोध (R) को दर्शाता है।

ओम के नियम की सीमाएँ:
यह नियम सार्वभौमिक नहीं है। यह केवल धात्विक चालकों पर और निश्चित भौतिक परिस्थितियों में ही लागू होता है। अर्धचालक (Semiconductors), डायोड, ट्रांजिस्टर जैसे उपकरण ओम के नियम का पालन नहीं करते हैं (इन्हें अन-ओमीय युक्तियाँ कहते हैं)।


प्रतिरोधों का संयोजन (Combination of Resistors)

विद्युत परिपथ (electric circuits) में, वांछित (desired) परिणामी प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए अक्सर कई प्रतिरोधों को एक साथ जोड़ा जाता है। संयोजन के दो मुख्य तरीके हैं:

1. श्रेणी क्रम संयोजन (Series Combination)

पहचान:
जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधों को एक के बाद एक (end to end) इस प्रकार जोड़ा जाता है कि हर प्रतिरोध में से एक ही धारा (same current) प्रवाहित हो, तो इसे श्रेणी क्रम संयोजन कहते हैं। धारा को बहने के लिए केवल एक ही मार्ग मिलता है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  1. विद्युत धारा: परिपथ के प्रत्येक भाग में विद्युत धारा समान (same) रहती है। (I_total = I₁ = I₂ = I₃ …)
  2. विभवांतर: कुल विभवांतर (V) अलग-अलग प्रतिरोधों के विभवांतरों के योग के बराबर होता है। (V_total = V₁ + V₂ + V₃ …)
  3. तुल्य प्रतिरोध (Equivalent Resistance,  संयोजन का कुल या तुल्य प्रतिरोध, सभी व्यक्तिगत प्रतिरोधों के सीधे योग के बराबर होता है।

तुल्य प्रतिरोध का सूत्र:

R_s = R₁ + R₂ + R₃ + …

निष्कर्ष:

2. समानांतर (या पार्श्व) क्रम संयोजन (Parallel Combination)

पहचान:
जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधों को दो समान बिंदुओं (common points) के बीच इस प्रकार जोड़ा जाता है कि प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों पर विभवांतर समान (same potential difference) रहे, तो इसे समानांतर क्रम संयोजन कहते हैं। धारा कई शाखाओं में विभाजित हो जाती है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  1. विभवांतर: प्रत्येक शाखा में विभवांतर समान (same) रहता है। (V_total = V₁ = V₂ = V₃ …)
  2. विद्युत धारा: कुल धारा (I) अलग-अलग शाखाओं में बहने वाली धाराओं के योग के बराबर होती है। (I_total = I₁ + I₂ + I₃ …)
  3. तुल्य प्रतिरोध (Equivalent Resistance,  संयोजन के तुल्य प्रतिरोध का व्युत्क्रम (reciprocal), सभी व्यक्तिगत प्रतिरोधों के व्युत्क्रमों के योग के बराबर होता है।

तुल्य प्रतिरोध का सूत्र:

1 / R_p = 1 / R₁ + 1 / R₂ + 1 / R₃ + …

(केवल दो प्रतिरोधों के लिए एक शॉर्टकट सूत्र):

R_p = (R₁ × R₂) / (R₁ + R₂)

निष्कर्ष:

आधारश्रेणी क्रम (Series)समानांतर क्रम (Parallel)
धारा (I)सभी में समानशाखाओं में विभाजित
विभवांतर (V)घटकों में विभाजितसभी में समान
तुल्य प्रतिरोध (R)बढ़ता है (R_s = R₁ + R₂ +…)घटता है (1/R_p = 1/R₁ + 1/R₂ +…)

विद्युत शक्ति (Electrical Power) और विद्युत ऊर्जा

ये दोनों शब्द अक्सर एक साथ उपयोग किए जाते हैं, लेकिन इनका अर्थ अलग-
अलग है। इन्हें समझना हमारे बिजली के बिल और उपकरणों की कार्यप्रणाली को समझने के लिए आवश्यक है।


विद्युत शक्ति (Electrical Power – 

परिभाषा:

“किसी विद्युत परिपथ में ऊर्जा के उपभुक्त (consumed) होने की दर को विद्युत शक्ति कहते हैं।”

दूसरे शब्दों में, यह हमें बताता है कि कोई विद्युत उपकरण कितनी तेजी से विद्युत ऊर्जा को ऊष्मा, प्रकाश, या यांत्रिक ऊर्जा जैसे अन्य रूपों में बदल रहा है।

जिस उपकरण की पावर रेटिंग जितनी अधिक होती है, वह उतना ही अधिक शक्तिशाली होता है और उतनी ही तेजी से ऊर्जा की खपत करता है।

सूत्र:
विद्युत शक्ति के कई सूत्र हैं जिन्हें ओम के नियम (V=IR) का उपयोग करके एक-दूसरे में बदला जा सकता है।

  1. मूल सूत्र:
    शक्ति (P) = कार्य (W) / समय (t)
    चूँकि, W = VQ और I = Q/t, तो W = V(It)
    P = V(It) / t => P = VI
  2. अन्य महत्वपूर्ण सूत्र:
    • P = V × I (शक्ति = विभवांतर × धारा)
    • V = IR रखने पर: P = (IR) × I => P = I²R
    • I = V/R रखने पर: P = V × (V/R) => P = V²/R

SI मात्रक:

उदाहरण:
यदि एक बल्ब पर “100W – 220V” लिखा है, तो इसका अर्थ है कि जब इसे 220 वोल्ट पर जोड़ा जाता है, तो यह प्रति सेकंड 100 जूल विद्युत ऊर्जा की खपत करेगा।


विद्युत ऊर्जा (Electrical Energy – 

परिभाषा:

“किसी निश्चित समय में किसी विद्युत उपकरण द्वारा कुल उपभुक्त की गई शक्ति की मात्रा को विद्युत ऊर्जा कहते हैं।”

शक्ति जहाँ ऊर्जा खपत की “दर” है, वहीं ऊर्जा उस “कुल मात्रा” को दर्शाती है जिसकी खपत हुई है।

सूत्र:
शक्ति के सूत्र P = E/t से हम ऊर्जा का सूत्र निकाल सकते हैं:

ऊर्जा (E) = शक्ति (P) × समय (t)

इसे शक्ति के अन्य सूत्रों से भी लिखा जा सकता है:

E = V × I × t
E = I² × R × t
E = (V²/R) × t

SI मात्रक:


विद्युत ऊर्जा का व्यावसायिक मात्रक: किलोवॉट-घंटा (kWh) या “यूनिट”

जूल एक बहुत छोटी इकाई है। घरेलू और व्यावसायिक स्तर पर ऊर्जा की खपत को मापने के लिए एक बड़ी इकाई का उपयोग किया जाता है, जिसे किलोवॉट-घंटा (Kilowatt-hour – kWh) कहते हैं। इसी kWh को आम बोलचाल की भाषा में “यूनिट (Unit)” कहा जाता है, जिसके आधार पर हमारा बिजली का बिल आता है।

1 किलोवॉट-घंटा (1 यूनिट) की परिभाषा:

“यदि 1 किलोवॉट (1000 वॉट) शक्ति वाला कोई उपकरण 1 घंटे तक लगातार चलता है, तो उसके द्वारा उपभुक्त की गई ऊर्जा 1 kWh या 1 यूनिट होती है।”

1 kWh और जूल में संबंध:

1 kWh = 1 किलोवॉट × 1 घंटा
1 kWh = 1000 वॉट × (60 × 60 सेकंड)
1 kWh = 1000 × 3600 वॉट-सेकंड
1 kWh = 3,600,000 जूल
1 kWh = 3.6 × 10⁶ जूल

यूनिट (kWh) में बिजली की खपत की गणना कैसे करें?

सूत्र:

उपभुक्त यूनिटों की संख्या (kWh) = (उपकरण की शक्ति (वॉट में) × उपयोग के घंटे × दिनों की संख्या) / 1000

उदाहरण गणना:

प्रश्न: एक घर में 100 वॉट का एक बल्ब प्रतिदिन 6 घंटे जलता है। 30 दिनों (एक महीने) में वह कितनी यूनिट बिजली की खपत करेगा?

हल:

कुल घंटे = 6 × 30 = 180 घंटे

  1. वॉट-घंटे में ऊर्जा निकालें:
    ऊर्जा (Wh) = शक्ति (W) × समय (घंटे)
    ऊर्जा (Wh) = 100 W × 180 h = 18,000 Wh
  2. kWh (यूनिट) में बदलें: (1000 से भाग देकर)
    ऊर्जा (kWh) = 18,000 / 1000 = 18 kWh

अथवा, सीधे सूत्र का उपयोग करें:
यूनिट = (100 × 6 × 30) / 1000
यूनिट = 18,000 / 1000 = 18 यूनिट

यदि बिजली की दर 5 रुपये प्रति यूनिट है, तो महीने का बिल होगा:
बिल = 18 यूनिट × 5 रुपये/यूनिट = 90 रुपये


धारा का ऊष्मीय प्रभाव (Heating Effect of Current)


अवधारणा और कारण

परिभाषा:

जब किसी प्रतिरोधक (resistor) या चालक तार से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो वह तार गर्म हो जाता है। इस घटना को विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव या जूल का तापन नियम (Joule’s Law of Heating) कहते हैं।

ऊष्मीय प्रभाव का कारण:

जूल का तापन नियम (Joule’s Law of Heating)

जेम्स प्रेस्कॉट जूल ने इस उत्पन्न ऊष्मा की मात्रा को मापने के लिए एक नियम दिया। इस नियम के अनुसार, किसी प्रतिरोधक में उत्पन्न ऊष्मा की मात्रा (H):

  1. उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के वर्ग के समानुपाती होती है। (H ∝ I²)
  2. प्रतिरोधक के प्रतिरोध के समानुपाती होती है। (H ∝ R)
  3. उस समय के समानुपाती होती है जिसके लिए धारा प्रवाहित की जाती है। (H ∝ t)

इन तीनों को मिलाकर, हमें सूत्र प्राप्त होता है:

H = I²Rt

जहाँ:


धारा के ऊष्मीय प्रभाव के व्यावहारिक अनुप्रयोग

इस प्रभाव के कई अनुप्रयोग हैं जहाँ ऊष्मा की आवश्यकता होती है। इसके लिए ऐसे पदार्थों का उपयोग किया जाता है जिनका प्रतिरोध उच्च (High Resistance) हो और गलनांक उच्च (High Melting Point) हो।

1. विद्युत हीटर, इस्त्री (आयरन), गीजर, टोस्टर, आदि

2. विद्युत बल्ब (Electric Bulb)


फ्यूज तार का कार्य (Working of a Fuse Wire)

फ्यूज तार धारा के ऊष्मीय प्रभाव पर आधारित एक सुरक्षा उपकरण (safety device) है।

उद्देश्य:
इसका मुख्य कार्य विद्युत परिपथ और उपकरणों को अतिभारण (Overloading) और लघुपथन (Short-circuiting) के कारण होने वाली अत्यधिक धारा से बचाना है।

संरचना और कार्य:

आजकल फ्यूज तार की जगह MCB (Miniature Circuit Breaker) का उपयोग किया जाता है, जो धारा के चुंबकीय प्रभाव पर काम करता है और अधिक सुरक्षित तथा सुविधाजनक है।


धारा का चुंबकीय प्रभाव (Magnetic Effect of Current)

अवधारणा:
1820 में, हैन्स क्रिश्चियन ओर्स्टेड (Hans Christian Oersted) ने खोज की कि जब किसी चालक तार से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र (magnetic field) उत्पन्न हो जाता है। इसी घटना को विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं।

यह खोज क्रांतिकारी थी क्योंकि इसने पहली बार विद्युत और चुंबकत्व के बीच सीधे संबंध को स्थापित किया, जिससे विद्युत चुंबकत्व (Electromagnetism) नामक एक नई शाखा का जन्म हुआ।


विद्युत चुंबक (Electromagnet)

परिभाषा:
यह एक प्रकार का अस्थायी चुंबक (temporary magnet) है जो तब बनता है जब किसी नरम लोहे की क्रोड (soft iron core) पर एक विद्युतरोधी तांबे के तार को लपेटकर उस तार से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है।

कार्य सिद्धांत:
यह परिनालिका (solenoid) के चुंबकीय प्रभाव पर आधारित है। जब एक तार की कुंडली (जिसे परिनालिका कहते हैं) से धारा बहती है, तो वह एक छड़ चुंबक की तरह व्यवहार करती है। यदि इस परिनालिका के अंदर नरम लोहे की एक छड़ रख दी जाए, तो वह छड़ प्रबल रूप से चुंबकित हो जाती है, जिससे एक शक्तिशाली विद्युत चुंबक बनता है।

चुंबकीय शक्ति को कैसे बढ़ाएं?

उपयोग:


विद्युत मोटर (Electric Motor)

उद्देश्य:

विद्युत मोटर एक ऐसा उपकरण है जो विद्युत ऊर्जा (Electrical Energy) को यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) में बदलता है।

यह हमारे दैनिक जीवन में सबसे अधिक उपयोग होने वाले उपकरणों में से एक है (पंखा, वॉशिंग मशीन, मिक्सर, पानी का पंप आदि)।

कार्य सिद्धांत:
यह इस सिद्धांत पर कार्य करती है कि जब किसी चुंबकीय क्षेत्र में रखी धारावाही कुंडली (current-carrying coil) पर एक बल आघूर्ण (torque) लगता है, जिससे वह घूमने लगती है।

यह बल फ्लेमिंग के वामहस्त (बाएं हाथ) नियम (Fleming’s Left-Hand Rule) द्वारा वर्णित होता है।

कार्यप्रणाली (संक्षेप में):

  1. एक आयताकार कुंडली को एक शक्तिशाली स्थायी चुंबक के ध्रुवों के बीच रखा जाता है।
  2. जब कुंडली से धारा प्रवाहित की जाती है, तो फ्लेमिंग के वामहस्त नियम के अनुसार, कुंडली की आमने-सामने की भुजाओं पर बराबर और विपरीत बल लगते हैं।
  3. ये बल एक बल आघूर्ण (torque) बनाते हैं जो कुंडली को उसकी धुरी पर घुमाता है।
  4. आधे चक्कर के बाद धारा की दिशा को विभक्त वलय दिक्परिवर्तक (split-ring commutator) की सहायता से उलट दिया जाता है, ताकि कुंडली पर बल आघूर्ण लगातार एक ही दिशा में लगता रहे और वह निरंतर घूमती रहे।

विद्युत जनरेटर या डायनेमो (Electric Generator or Dynamo)

उद्देश्य:

विद्युत जनरेटर एक ऐसा उपकरण है जो यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) को विद्युत ऊर्जा (Electrical Energy) में बदलता है।

यह विद्युत मोटर के कार्य का ठीक उल्टा है।

कार्य सिद्धांत:
यह विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) के सिद्धांत पर कार्य करता है।

प्रेरित धारा की दिशा फ्लेमिंग के दक्षिण-हस्त (दाएं हाथ) नियम (Fleming’s Right-Hand Rule) द्वारा दी जाती है।

कार्यप्रणाली (संक्षेप में):

  1. जनरेटर में भी एक कुंडली होती है जिसे एक चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है।
  2. इस कुंडली को बाहरी यांत्रिक ऊर्जा (जैसे टरबाइन, इंजन) की मदद से घुमाया जाता है।
  3. जैसे-जैसे कुंडली घूमती है, उससे गुजरने वाले चुंबकीय फ्लक्स में लगातार परिवर्तन होता है।
  4. इस फ्लक्स परिवर्तन के कारण, कुंडली में एक प्रेरित धारा उत्पन्न हो जाती है।
  5. AC और DC जनरेटर:
    • AC जनरेटर (प्रत्यावर्ती धारा जनित्र): इसमें सर्पी वलय (slip rings) का उपयोग होता है, जो प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न करता है (जिसकी दिशा नियमित अंतराल पर बदलती है)।
    • DC जनरेटर (दिष्ट धारा जनित्र / डायनेमो): इसमें मोटर की तरह विभक्त वलय दिक्परिवर्तक (split-ring commutator) का उपयोग होता है, जो एकदिशीय धारा (direct current) उत्पन्न करता है।

दोनों उपकरणों में तुलना

गुणविद्युत मोटरविद्युत जनरेटर
ऊर्जा रूपांतरणविद्युत → यांत्रिकयांत्रिक → विद्युत
कार्य सिद्धांतचुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल।बदलते चुंबकीय क्षेत्र से धारा का प्रेरण।
उपयोगी नियमफ्लेमिंग का वामहस्त (बाएं हाथ) नियम।फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त (दाएं हाथ) नियम।
इनपुटविद्युत धारा।कुंडली का घूर्णन (यांत्रिक ऊर्जा)।
आउटपुटकुंडली का घूर्णन (यांत्रिक ऊर्जा)।विद्युत धारा।

विद्युत चुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction – EMI)

परिभाषा:

विद्युत चुंबकीय प्रेरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र (changing magnetic field) में रखे किसी चालक (जैसे तार की कुंडली) में विद्युत वाहक बल (EMF) और फलस्वरूप विद्युत धारा (electric current) उत्पन्न होती है।

इस अभूतपूर्व घटना की खोज 1831 में महान वैज्ञानिक माइकल फैराडे (Michael Faraday) ने की थी। यह खोज आधुनिक दुनिया की नींव है, क्योंकि दुनिया भर में बिजली का उत्पादन (generation) इसी सिद्धांत पर आधारित है।


फैराडे के विद्युत चुंबकीय प्रेरण के नियम

फैराडे ने अपने प्रयोगों के आधार पर दो नियम दिए जो इस घटना की व्याख्या करते हैं।

फैराडे का पहला नियम:

नियम का कथन:

“जब भी किसी बंद परिपथ (जैसे कुंडली) से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स (Magnetic Flux) में परिवर्तन होता है, तो उस परिपथ में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (Induced EMF) उत्पन्न हो जाता है।”
“यह प्रेरित EMF तब तक ही अस्तित्व में रहता है, जब तक चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन जारी रहता है।”

फैराडे का दूसरा नियम:

यह नियम प्रेरित EMF के परिमाण (magnitude) को बताता है।

नियम का कथन:

“किसी परिपथ में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण, उस परिपथ से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर (rate of change) के समानुपाती होता है।”

गणितीय रूप:

ε ∝ (ΔΦ / Δt)

यदि कुंडली में N फेरे हों, तो:

ε = -N (ΔΦ / Δt)

जहाँ:

ऋणात्मक (-) चिन्ह: इस सूत्र में ऋणात्मक चिन्ह लेन्ज़ के नियम (Lenz’s Law) के कारण आता है, जो प्रेरित EMF या धारा की दिशा को बताता है।


लेन्ज़ का नियम (Lenz’s Law)

यह नियम प्रेरित धारा की दिशा को निर्धारित करता है और यह ऊर्जा संरक्षण के नियम पर आधारित है।

नियम का कथन:

“किसी परिपथ में प्रेरित विद्युत धारा की दिशा सदैव इस प्रकार होती है कि वह उस कारण का ही विरोध करती है जिसके कारण वह स्वयं उत्पन्न हुई है।”

यह कैसे काम करता है:

  1. कारण का विरोध: यदि आप एक चुंबक के उत्तरी ध्रुव (North pole) को एक कुंडली के पास लाते हैं, तो कुंडली से जुड़ा चुंबकीय फ्लक्स बढ़ता है (यह धारा उत्पन्न होने का कारण है)।
  2. प्रेरित धारा का प्रभाव: लेन्ज़ के नियम के अनुसार, कुंडली में धारा इस तरह बहेगी कि वह इस फ्लक्स वृद्धि का विरोध करे।
  3. कुंडली का चुंबक बनना: विरोध करने के लिए, कुंडली का वह सिरा जो चुंबक के पास है, खुद एक उत्तरी ध्रुव (North pole) बन जाएगा (क्योंकि समान ध्रुव प्रतिकर्षित करते हैं)।
  4. धारा की दिशा: अब, दाएं हाथ के नियम का उपयोग करके, हम कुंडली में धारा की दिशा का पता लगा सकते हैं।

संक्षेप में, प्रेरित धारा एक ऐसा चुंबकीय क्षेत्र बनाती है जो मूल चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन का मुकाबला करने की कोशिश करता है।


चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन कैसे करें?

एक कुंडली में EMF प्रेरित करने के लिए, हम निम्नलिखित तरीकों से चुंबकीय फ्लक्स बदल सकते हैं:

  1. कुंडली के पास रखे चुंबक को गति कराकर (पास या दूर ले जाकर)।
  2. चुंबक को स्थिर रखकर कुंडली को गति कराकर।
  3. कुंडली और चुंबक दोनों को एक-दूसरे के सापेक्ष गति कराकर।
  4. कुंडली को एक परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र में रखकर (जैसे, एक अन्य कुंडली में बहने वाली धारा को बदलकर, जो ट्रांसफार्मर का सिद्धांत है)।
  5. चुंबकीय क्षेत्र में रखी कुंडली को घुमाकर (जो विद्युत जनरेटर का सिद्धांत है)।

अनुप्रयोग (Applications)

विद्युत चुंबकीय प्रेरण का सिद्धांत हमारे तकनीकी जीवन का आधार है।


प्रत्यावर्ती धारा (AC) और दिष्ट धारा (DC)

विद्युत धारा (Electric Current) मूल रूप से आवेशों का प्रवाह है। यह प्रवाह दो मुख्य तरीकों से हो सकता है, जिसके आधार पर धारा को दो प्रकारों में बांटा गया है: प्रत्यावर्ती धारा (AC) और दिष्ट धारा (DC)।


1. दिष्ट धारा (Direct Current – DC)

परिभाषा:

वह विद्युत धारा जो सदैव एक ही दिशा (one direction) में प्रवाहित होती है, दिष्ट धारा कहलाती है।

स्रोत (Sources):

उपयोग (Uses):


2. प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current – AC)

परिभाषा:

वह विद्युत धारा जिसका परिमाण (magnitude) और दिशा (direction) दोनों, समय के साथ एक निश्चित दर पर आवर्ती रूप से (periodically) बदलते रहते हैं, प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है।

स्रोत (Sources):

प्रमुख पद:

उपयोग (Uses):

AC और DC में तुलना

गुणप्रत्यावर्ती धारा (AC)दिष्ट धारा (DC)
दिशासमय के साथ नियमित रूप से बदलती है।सदैव एक ही दिशा में रहती है।
परिमाणसमय के साथ लगातार बदलता रहता है।आमतौर पर स्थिर रहता है।
आवृत्ति (Frequency)होती है (जैसे 50 Hz या 60 Hz)।शून्य (0 Hz)।
स्रोतAC जनरेटर (अल्टरनेटर)।बैटरी, सेल, DC जनरेटर, सौर सेल।
लाभट्रांसफार्मर द्वारा वोल्टेज को आसानी से बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इसे लंबी दूरी तक भेजना अधिक कुशल है।इसे बैटरियों में संग्रहीत (store) किया जा सकता है। इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए आवश्यक है।
हानिइसे संग्रहीत नहीं किया जा सकता। DC की तुलना में अधिक खतरनाक होती है।इसे लंबी दूरी तक भेजने में अधिक ऊर्जा हानि होती है। वोल्टेज को बदलना कठिन और महंगा है।

क्यों AC का उपयोग लंबी दूरी के लिए किया जाता है?
बिजली को लंबी दूरी तक भेजते समय P = I²R के कारण ऊर्जा की हानि होती है। इस हानि को कम करने के लिए, हमें धारा (I) को कम करना होगा। ट्रांसफार्मर का उपयोग करके, बिजली संयंत्रों पर वोल्टेज को बहुत अधिक (high voltage) कर दिया जाता है, जिससे धारा का मान बहुत कम हो जाता है (P = VI)। इससे तारों में होने वाली ऊष्मा हानि (I²R) न्यूनतम हो जाती है। हमारे शहरों तक पहुँचने पर, ट्रांसफार्मर का उपयोग करके इस उच्च वोल्टेज को फिर से सुरक्षित निम्न वोल्टेज (जैसे 220V) में बदल दिया जाता है। यह प्रक्रिया केवल AC के साथ ही संभव है।


ट्रांसफार्मर (Transformer)

परिभाषा:

ट्रांसफार्मर एक स्थिर (static) विद्युत उपकरण है जो अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction) के सिद्धांत का उपयोग करके, बिना आवृत्ति बदले, प्रत्यावर्ती वोल्टेज (voltage) को बढ़ाने या घटाने का कार्य करता है।

महत्वपूर्ण बिंदु:

कार्य सिद्धांत: अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction)
जब एक कुंडली (प्राथमिक) में बहने वाली प्रत्यावर्ती धारा के मान में परिवर्तन होता है, तो उससे संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में भी परिवर्तन होता है। यदि इस कुंडली के पास कोई दूसरी कुंडली (द्वितीयक) रखी है, तो इस बदलते चुंबकीय फ्लक्स के कारण दूसरी कुंडली में भी एक प्रेरित EMF (वोल्टेज) उत्पन्न हो जाता है।

संरचना:
इसमें एक नरम लोहे की क्रोड (soft iron laminated core) पर दो अलग-अलग तार की कुंडलियाँ लिपटी होती हैं:

  1. प्राथमिक कुंडली (Primary Coil –  इसे इनपुट AC स्रोत से जोड़ा जाता है।
  2. द्वितीयक कुंडली (Secondary Coil –  इससे आउटपुट वोल्टेज प्राप्त किया जाता है।

ट्रांसफार्मर के प्रकार:

  1. उच्चायी ट्रांसफार्मर (Step-up Transformer):
    • कार्य: निम्न वोल्टेज (Low Voltage) को उच्च वोल्टेज (High Voltage) में बदलता है।
    • संरचना: द्वितीयक कुंडली में फेरों की संख्या, प्राथमिक कुंडली से अधिक होती है (N_s > N_p)।
    • परिणाम: वोल्टेज बढ़ता है (V_s > V_p), लेकिन धारा घट जाती है (I_s < I_p)।
    • उपयोग: बिजली संयंत्रों पर।
  2. अपचायी ट्रांसफार्मर (Step-down Transformer):
    • कार्य: उच्च वोल्टेज (High Voltage) को निम्न वोल्टेज (Low Voltage) में बदलता है।
    • संरचना: द्वितीयक कुंडली में फेरों की संख्या, प्राथमिक कुंडली से कम होती है (N_s < N_p)।
    • परिणाम: वोल्टेज घटता है (V_s < V_p), लेकिन धारा बढ़ जाती है (I_s > I_p)।
    • उपयोग: हमारे घरों के पास लगे बिजली के खंभों पर, मोबाइल चार्जर के एडॉप्टर में, टेलीविजन में।


आधुनिक भौतिकी

पदार्थ की द्वैत प्रकृति (Dual Nature of Matter)

परिचय:
20वीं सदी की शुरुआत तक, वैज्ञानिक दुनिया को दो अलग-अलग हिस्सों में देखते थे: पदार्थ (Matter), जो कणों (particles) से बना है, और ऊर्जा (Energy), जो तरंगों (waves) के रूप में यात्रा करती है। माना जाता था कि एक कण एक कण है (जैसे इलेक्ट्रॉन या गेंद) और एक तरंग एक तरंग है (जैसे प्रकाश या ध्वनि)।

लेकिन क्वांटम यांत्रिकी के विकास ने इस दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदल दिया। आधुनिक भौतिकी का सबसे आश्चर्यजनक और मौलिक सिद्धांत है – पदार्थ की द्वैत प्रकृति। इसका अर्थ है कि पदार्थ, विशेष रूप से उप-परमाण्विक स्तर (sub-atomic level) पर, कण और तरंग दोनों के गुण प्रदर्शित करता है।


इस विचार की शुरुआत: प्रकाश की द्वैत प्रकृति

इस क्रांतिकारी विचार की प्रेरणा प्रकाश की प्रकृति से मिली।

  1. तरंग प्रकृति: व्यतिकरण (Interference) और विवर्तन (Diffraction) जैसी घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि प्रकाश एक तरंग है।
  2. कण प्रकृति: 1905 में, अल्बर्ट आइंस्टीन ने प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect) की व्याख्या करते हुए यह प्रस्तावित किया कि प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे पैकेट या क्वांटा से बना है, जिन्हें फोटॉन (Photon) कहते हैं। यह साबित करता था कि प्रकाश एक कण की तरह भी व्यवहार करता है।

इस प्रकार, यह स्थापित हो गया कि प्रकाश की प्रकृति द्वैत (dual) है।


डी-ब्रोग्ली की परिकल्पना (De Broglie’s Hypothesis)

1924 में, फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी लुई डी-ब्रोग्ली (Louis de Broglie) ने एक साहसिक और सममित परिकल्पना प्रस्तुत की:

“यदि प्रकाश (ऊर्जा) तरंग और कण दोनों की तरह व्यवहार कर सकता है, तो शायद पदार्थ (जैसे इलेक्ट्रॉन) भी तरंग और कण दोनों की तरह व्यवहार कर सकता है।”

उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक गतिमान कण (moving particle) के साथ एक तरंग संबद्ध होती है। इस तरंग को पदार्थ-तरंग (Matter Wave) या डी-ब्रोग्ली तरंग (de Broglie Wave) कहा गया।

डी-ब्रोग्ली तरंग दैर्ध्य (de Broglie Wavelength)

डी-ब्रोग्ली ने इस पदार्थ-तरंग की तरंग दैर्ध्य (λ) की गणना के लिए एक सूत्र भी दिया, जो खूबसूरती से कण (संवेग) और तरंग (तरंग दैर्ध्य) के गुणों को जोड़ता है:

λ = h / p

इसे इस प्रकार भी लिखा जा सकता है:

λ = h / (mv)

जहाँ:


प्रायोगिक पुष्टि: डेविसन और जर्मर का प्रयोग

डी-ब्रोग्ली की परिकल्पना शुरुआत में केवल एक सैद्धांतिक विचार थी। लेकिन 1927 में, अमेरिकी भौतिक विज्ञानी क्लिंटन डेविसन (Clinton Davisson) और लेस्टर जर्मर (Lester Germer) ने एक प्रयोग किया जिसने इस विचार को साबित कर दिया।


हम दैनिक जीवन की वस्तुओं में तरंग प्रकृति क्यों नहीं देखते?

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि हर गतिमान वस्तु एक तरंग है, तो एक चलती हुई क्रिकेट की गेंद हमें एक तरंग की तरह क्यों नहीं दिखती?

इसका उत्तर डी-ब्रोग्ली के सूत्र ( में छिपा है।

  1. क्रिकेट की गेंद के लिए:
    • द्रव्यमान (m) बहुत अधिक है।
    • प्लांक नियतांक (h) का मान अत्यंत छोटा (10⁻³⁴ की कोटि का) है।
    • सूत्र के अनुसार, जब m बहुत बड़ा होता है, तो तरंग दैर्ध्य (λ) अविश्वसनीय रूप से छोटी हो जाती है।
    • यह तरंग दैर्ध्य इतनी छोटी होती है कि इसे किसी भी उपकरण से मापना या इसके प्रभाव को देखना असंभव है।
  2. इलेक्ट्रॉन के लिए:
    • द्रव्यमान (m) बहुत कम (10⁻³¹ की कोटि का) है।
    • इस कम द्रव्यमान के कारण, इसकी तरंग दैर्ध्य (λ) काफी बड़ी होती है (परमाणुओं के बीच की दूरी की कोटि की)।
    • यह तरंग दैर्ध्य इतनी बड़ी है कि इसे प्रयोगों (जैसे डेविसन-जर्मर प्रयोग) में आसानी से देखा जा सकता है।

निष्कर्ष:
पदार्थ की द्वैत प्रकृति सार्वभौमिक है, लेकिन यह केवल सूक्ष्म, उप-परमाण्विक स्तर पर ही महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य होती है। हमारी रोजमर्रा की बड़ी (macroscopic) दुनिया में, वस्तुओं की तरंग प्रकृति इतनी नगण्य होती है कि हम केवल उनके कण स्वरूप का ही अनुभव करते हैं। यह अवधारणा क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) की आधारशिला है।


प्रकाशविद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect)

परिभाषा:

जब पर्याप्त रूप से उच्च आवृत्ति का प्रकाश (जैसे पराबैंगनी किरणें) किसी धातु की सतह पर आपतित होता है, तो उस धातु की सतह से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होने लगता है। इस घटना को प्रकाशविद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect) कहते हैं।

अवधारणा: यह घटना प्रकाश की ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने का एक उदाहरण है।


प्रकाशविद्युत प्रभाव का प्रायोगिक अवलोकन

प्रयोगों से इस प्रभाव के बारे में कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकले, जिन्हें उस समय का तरंग सिद्धांत (Wave Theory) समझाने में विफल रहा:

  1. देहली आवृत्ति (Threshold Frequency, 
    • प्रत्येक धातु के लिए एक न्यूनतम आवृत्ति होती है, जिससे कम आवृत्ति का प्रकाश उस धातु से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं कर सकता, चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी क्यों न हो। इस न्यूनतम आवृत्ति को देहली आवृत्ति कहते हैं।
    • इससे संबंधित एक देहली तरंगदैर्घ्य (Threshold Wavelength,  भी होती है, जो अधिकतम तरंगदैर्घ्य है जिस पर प्रभाव देखा जा सकता है (f₀ = c/λ₀)।
  2. तीव्रता का प्रभाव (Effect of Intensity):
    • देहली आवृत्ति से अधिक आवृत्ति के प्रकाश के लिए, उत्सर्जित होने वाले फोटो-इलेक्ट्रॉनों की संख्या (और फलस्वरूप प्रकाशविद्युत धारा) आपतित प्रकाश की तीव्रता (Intensity) के समानुपाती होती है।
    • अधिक तीव्रता का मतलब है अधिक फोटॉन, इसलिए अधिक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं।
  3. आवृत्ति का प्रभाव (Effect of Frequency):
    • उत्सर्जित होने वाले फोटो-इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम गतिज ऊर्जा (Maximum Kinetic Energy) आपतित प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करती है।
    • आवृत्ति बढ़ाने पर इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है। यह प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करती।
  4. तात्क्षणिक प्रक्रिया (Instantaneous Process):
    • जैसे ही प्रकाश धातु की सतह पर पड़ता है, इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन तुरंत (लगभग 10⁻⁹ सेकंड में) शुरू हो जाता है, इसमें कोई समय अंतराल नहीं होता, चाहे प्रकाश की तीव्रता कितनी भी कम क्यों न हो।

तरंग सिद्धांत की विफलता:
प्रकाश का तरंग सिद्धांत इन सभी अवलोकनों, विशेष रूप से देहली आवृत्ति और तात्क्षणिक उत्सर्जन की व्याख्या नहीं कर सका। तरंग सिद्धांत के अनुसार, कम तीव्रता का प्रकाश भी धीरे-धीरे पर्याप्त ऊर्जा जमा करके इलेक्ट्रॉनों को उत्सर्जित कर सकता था, जिसमें समय लगना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता।


आइंस्टीन की व्याख्या (1905) – प्रकाश का क्वांटम सिद्धांत

1905 में, अल्बर्ट आइंस्टीन ने मैक्स प्लैंक के क्वांटम सिद्धांत का उपयोग करके प्रकाशविद्युत प्रभाव की एक क्रांतिकारी और सफल व्याख्या प्रस्तुत की। इसी कार्य के लिए उन्हें 1921 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला।

आइंस्टीन की परिकल्पना:

  1. प्रकाश कणों से बना है: प्रकाश, ऊर्जा के छोटे-छोटे पैकेट या क्वांटा से मिलकर बना है, जिन्हें फोटॉन (Photon) कहते हैं।
  2. फोटॉन की ऊर्जा: प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा उसकी आवृत्ति (f) के समानुपाती होती है:
    E = hf
    • h = प्लांक नियतांक (Planck’s Constant)
  3. ऊर्जा का स्थानांतरण: प्रकाशविद्युत प्रभाव में, एक फोटॉन अपनी संपूर्ण ऊर्जा धातु के केवल एक इलेक्ट्रॉन को स्थानांतरित कर देता है। यह ऊर्जा का पैकेट के रूप में स्थानांतरण है, न कि तरंग के रूप में फैला हुआ।

आइंस्टीन का प्रकाशविद्युत समीकरण:

जब एक फोटॉन (hf) किसी इलेक्ट्रॉन से टकराता है, तो उसकी ऊर्जा दो भागों में खर्च होती है:

  1. कार्य फलन (Work Function,  ऊर्जा का एक हिस्सा इलेक्ट्रॉन को धातु की सतह से बाहर निकालने में खर्च हो जाता है। किसी धातु से इलेक्ट्रॉन को मुक्त कराने के लिए आवश्यक इस न्यूनतम ऊर्जा को उस धातु का कार्य फलन कहते हैं। Φ₀ = hf₀ (जहाँ f₀ देहली आवृत्ति है)।
  2. अधिकतम गतिज ऊर्जा (K.E._max): बची हुई ऊर्जा, उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन को गतिज ऊर्जा प्रदान करती है।

समीकरण:

आपतित फोटॉन की ऊर्जा = कार्य फलन + इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा
hf = Φ₀ + K.E._max

या

hf = hf₀ + ½ mv²_max

इस समीकरण ने प्रकाशविद्युत प्रभाव के सभी प्रायोगिक अवलोकनों की पूरी तरह से व्याख्या की:

निष्कर्ष:
प्रकाशविद्युत प्रभाव ने प्रकाश की कण प्रकृति को मजबूती से स्थापित किया और यह क्वांटम यांत्रिकी के विकास में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

अनुप्रयोग (Applications)


परमाणु और नाभिक (Atom and Nucleus)

परमाणु किसी भी तत्व का वह सबसे छोटा कण है जो उसके रासायनिक गुणों को प्रदर्शित करता है। प्रत्येक परमाणु के केंद्र में एक अत्यंत सघन, धनावेशित भाग होता है, जिसे नाभिक (Nucleus) कहते हैं। परमाणु का लगभग सारा द्रव्यमान इसी नाभिक में केंद्रित होता है।

नाभिक की संरचना: नाभिक दो प्रकार के कणों से मिलकर बना होता है:

प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों को संयुक्त रूप से न्यूक्लिऑन (Nucleons) कहा जाता है। इन्हें एक अत्यंत प्रबल बल, जिसे प्रबल नाभिकीय बल (Strong Nuclear Force) कहते हैं, एक साथ बांधे रखता है।


1. रेडियोधर्मिता (Radioactivity)

परिभाषा:
कुछ तत्वों के नाभिक अस्थिर (unstable) होते हैं। स्थायित्व (stability) प्राप्त करने के लिए, ये नाभिक स्वतः ही (spontaneously) कुछ अदृश्य कणों या ऊर्जा का विखंडन या उत्सर्जन (decay or emit) करते रहते हैं। पदार्थों के इस स्वतः विखंडन के गुण को रेडियोधर्मिता कहते हैं।

रेडियोधर्मी क्षय के प्रकार (Types of Radioactive Decay):
मुख्य रूप से तीन प्रकार के विकिरण उत्सर्जित होते हैं:

  1. अल्फा (α) क्षय: इसमें नाभिक से एक अल्फा कण (एक हीलियम नाभिक: 2 प्रोटॉन और 2 न्यूट्रॉन) निकलता है।
  2. बीटा (β) क्षय: इसमें नाभिक के अंदर एक न्यूट्रॉन, एक प्रोटॉन और एक इलेक्ट्रॉन (बीटा कण) में बदल जाता है और यह इलेक्ट्रॉन नाभिक से उत्सर्जित हो जाता है।
  3. गामा (γ) क्षय: इसमें नाभिक से कोई कण नहीं, बल्कि अत्यधिक ऊर्जा वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगें (गामा किरणें) निकलती हैं। यह अक्सर अल्फा या बीटा क्षय के बाद होता है जब नाभिक उत्तेजित अवस्था में होता है।
गुण (Property)अल्फा कण (α)बीटा कण (β)गामा किरणें (γ)
प्रकृतिहीलियम नाभिक (2p + 2n)तीव्र गति वाले इलेक्ट्रॉनउच्च ऊर्जा वाली विद्युत चुम्बकीय तरंगें
आवेश (Charge)धनात्मक (+2e)ऋणात्मक (-e)उदासीन (0)
द्रव्यमान (Mass)भारीनगण्य (इलेक्ट्रॉन के बराबर)शून्य (0)
भेदन क्षमता (Penetration)बहुत कम (कागज रोक सकता है)मध्यम (पतली धातु की चादर रोक सकती है)बहुत अधिक (मोटी कंक्रीट की दीवार रोक पाती है)
आयनन क्षमता (Ionization)बहुत अधिक (सर्वाधिक)मध्यमबहुत कम

2. नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission)

परिभाषा:

नाभिकीय विखंडन वह प्रक्रिया है जिसमें एक भारी अस्थिर नाभिक, न्यूट्रॉन की बमबारी के कारण लगभग बराबर आकार के दो या दो से अधिक छोटे, हल्के नाभिकों में टूट जाता है

इस प्रक्रिया में, द्रव्यमान की एक छोटी मात्रा ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है, जिससे अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है।

श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction):

श्रृंखला अभिक्रिया के प्रकार:

  1. अनियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया (Uncontrolled Chain Reaction): इसमें उत्पन्न सभी न्यूट्रॉन आगे विखंडन करते रहते हैं, जिससे कुछ ही क्षणों में एक विनाशकारी विस्फोट होता है। परमाणु बम (Atom Bomb) इसी सिद्धांत पर आधारित है।
  2. नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया (Controlled Chain Reaction): इसमें नियंत्रक छड़ों (जैसे कैडमियम) का उपयोग करके अतिरिक्त न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लिया जाता है, ताकि अभिक्रिया एक स्थिर दर से चले। नाभिकीय रिएक्टर (Nuclear Reactor) इसी सिद्धांत का उपयोग करके बिजली का उत्पादन करते हैं।

3. नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)

परिभाषा:

नाभिकीय संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक अत्यंत हल्के नाभिक, अत्यधिक उच्च ताप और दाब पर संयुक्त होकर एक भारी और अधिक स्थायी नाभिक का निर्माण करते हैं।

इस प्रक्रिया में भी द्रव्यमान की क्षति होती है जो अत्यधिक ऊर्जा के रूप में मुक्त होती है। नाभिकीय विखंडन की तुलना में संलयन में और भी अधिक ऊर्जा निकलती है।

आवश्यक शर्तें:
संलयन के लिए, हल्के नाभिकों (जिन पर धनात्मक आवेश होता है) के बीच लगने वाले प्रतिकर्षण बल को पार करने के लिए अत्यधिक उच्च तापमान (करोड़ों डिग्री सेल्सियस) और अत्यधिक उच्च दाब की आवश्यकता होती है। ऐसी परिस्थितियाँ तारों के कोर में पाई जाती हैं।

उदाहरण:

संलयन एक स्वच्छ ऊर्जा स्रोत क्यों है?
विखंडन की तुलना में संलयन अभिक्रिया में बहुत कम या न के बराबर रेडियोधर्मी अपशिष्ट (radioactive waste) उत्पन्न होता है। यदि इसे पृथ्वी पर नियंत्रित किया जा सके, तो यह ऊर्जा का एक लगभग असीमित और स्वच्छ स्रोत हो सकता है। इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ITER जैसी अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाएँ काम कर रही हैं।

आधारनाभिकीय विखंडन (Fission)नाभिकीय संलयन (Fusion)
प्रक्रियाएक भारी नाभिक का टूटना।दो हल्के नाभिकों का जुड़ना।
आवश्यक शर्तेंन्यूट्रॉन की बमबारी।अत्यधिक उच्च ताप और दाब।
ईंधनभारी तत्व (जैसे यूरेनियम, प्लूटोनियम)हल्के तत्व (जैसे हाइड्रोजन, हीलियम)
उत्पादछोटे नाभिक + न्यूट्रॉन।एक भारी नाभिक।
ऊर्जाबहुत अधिक ऊर्जा निकलती है।विखंडन से भी अधिक ऊर्जा निकलती है।
अपशिष्टरेडियोधर्मी अपशिष्ट उत्पन्न होता है।बहुत कम या न के बराबर।
उदाहरणपरमाणु बम, नाभिकीय रिएक्टर।सूर्य, हाइड्रोजन बम।

इलेक्ट्रॉनिकी (Electronics)

परिभाषा:
इलेक्ट्रॉनिकी, भौतिकी और इंजीनियरिंग की वह शाखा है जिसके अंतर्गत विभिन्न माध्यमों (जैसे अर्धचालक, निर्वात) में इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह को नियंत्रित (control) करके विभिन्न उपयोगी उपकरणों का निर्माण और अध्ययन किया जाता है।

यह पारंपरिक विद्युत (Electricity) से इस मायने में अलग है कि विद्युत का संबंध मुख्य रूप से ऊर्जा के उत्पादन, संचरण और उपयोग (जैसे हीटर, मोटर) से है, जबकि इलेक्ट्रॉनिकी का संबंध सूचना (information) को संसाधित (process), संग्रहीत (store) और संचारित (transmit) करने के लिए इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह को सटीकता से नियंत्रित करने से है।

इलेक्ट्रॉनिकी की नींव अर्धचालक (Semiconductors) नामक विशेष पदार्थों पर टिकी है।


ठोसों में ऊर्जा बैंड (Energy Bands in Solids)

पदार्थों के विद्युत व्यवहार को समझने के लिए, हम उनके ऊर्जा बैंड सिद्धांत को देखते हैं:

इसी ऊर्जा अंतराल के आधार पर ठोस तीन प्रकार के होते हैं:

  1. चालक (Conductors): इनमें संयोजी और चालन बैंड एक-दूसरे पर अध्यारोपित (overlap) होते हैं। कोई ऊर्जा अंतराल नहीं होता। इलेक्ट्रॉन आसानी से चालन बैंड में चले जाते हैं (जैसे- ताँबा, चाँदी)।
  2. कुचालक (Insulators): इनमें ऊर्जा अंतराल बहुत अधिक होता है (जैसे- लकड़ी, प्लास्टिक)। संयोजी बैंड से इलेक्ट्रॉनों को चालन बैंड में भेजना लगभग असंभव होता है।
  3. अर्धचालक (Semiconductors): इनमें ऊर्जा अंतराल बहुत कम होता है। सामान्य तापमान पर ये कुचालक की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन तापमान बढ़ाने पर या इनमें कुछ अशुद्धियाँ मिलाने पर, इलेक्ट्रॉन ऊर्जा अंतराल को पार करके चालन बैंड में चले जाते हैं और ये चालक बन जाते हैं (जैसे- सिलिकॉन (Si) और जर्मेनियम (Ge))।

अर्धचालक के प्रकार (Types of Semiconductors)

शुद्ध अर्धचालकों की चालकता बहुत कम होती है। इनकी चालकता बढ़ाने के लिए इनमें एक नियंत्रित प्रक्रिया द्वारा अशुद्धि मिलाई जाती है, जिसे मादन या डोपिंग (Doping) कहते हैं। डोपिंग के आधार पर ये दो प्रकार के होते हैं:

1. N-प्रकार अर्धचालक (N-type Semiconductor)

2. P-प्रकार अर्धचालक (P-type Semiconductor)


प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक उपकरण

1. P-N जंक्शन डायोड (P-N Junction Diode)

2. ट्रांजिस्टर (Transistor)

3. लॉजिक गेट्स (Logic Gates)

गेट (Gate)कार्य (Function)बूलियन व्यंजकसत्यता सारणी (Truth Table)
AND गेटआउटपुट ‘1’ होता है जब सभी इनपुट ‘1’ हों।Y = A · B<br> A B Y <br> 0 0 0 <br> 0 1 0 <br> 1 0 0 <br> 1 1 1 <br><br>
OR गेटआउटपुट ‘1’ होता है जब कोई भी एक इनपुट ‘1’ हो।Y = A + B<br> A B Y <br> 0 0 0 <br> 0 1 1 <br> 1 0 1 <br> 1 1 1 <br><br>
NOT गेटयह इनपुट को उलट देता है। इसे ‘इन्वर्टर’ भी कहते हैं।Y = A̅<br> A Y <br> 0 1 <br> 1 0 <br><br>
NAND गेटयह AND गेट का उल्टा है। (NOT + AND)Y = (A · B)̅<br> A B Y <br> 0 0 1 <br> 0 1 1 <br> 1 0 1 <br> 1 1 0 <br><br>
NOR गेटयह OR गेट का उल्टा है। (NOT + OR)Y = (A + B)̅<br> A B Y <br> 0 0 1 <br> 0 1 0 <br> 1 0 0 <br> 1 1 0 <br><br>

अर्धचालक (Semiconductors): डायोड और ट्रांजिस्टर

इलेक्ट्रॉनिकी (Electronics) की पूरी आधुनिक दुनिया अर्धचालक नामक पदार्थों के एक विशेष वर्ग पर आधारित है। ये वे पदार्थ हैं जिनका विद्युत व्यवहार चालक (conductors) और कुचालक (insulators) के बीच होता है।


अर्धचालक (Semiconductors) क्या हैं?

परिभाषा:

अर्धचालक वे ठोस पदार्थ हैं जिनकी विद्युत चालकता (electrical conductivity), चालकों (जैसे ताँबा) से कम लेकिन कुचालकों (जैसे लकड़ी) से अधिक होती है।

इनका सबसे महत्वपूर्ण गुण यह है कि इनकी चालकता को तापमान बढ़ाकर या इनमें अशुद्धियाँ (impurities) मिलाकर नियंत्रित और परिवर्तित किया जा सकता है।

डोपिंग (Doping) या मादन:
शुद्ध अर्धचालक की चालकता बहुत कम होती है। इसकी चालकता को इच्छानुसार बढ़ाने के लिए, इसमें एक नियंत्रित मात्रा में विशिष्ट अशुद्धि मिलाने की प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं। डोपिंग के आधार पर अर्धचालक दो प्रकार के होते हैं: N-प्रकार और P-प्रकार।

आधारN-प्रकार अर्धचालक (N-type)P-प्रकार अर्धचालक (P-type)
अशुद्धि (Dopant)पंचसंयोजी (Pentavalent) – जिसके बाहरी कोश में 5 इलेक्ट्रॉन हों (जैसे – फॉस्फोरस, आर्सेनिक)।त्रिसंयोजी (Trivalent) – जिसके बाहरी कोश में 3 इलेक्ट्रॉन हों (जैसे – बोरॉन, एल्युमिनियम)।
परिणाम4 इलेक्ट्रॉन बंध बना लेते हैं, 1 अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन मुक्त रह जाता है।3 इलेक्ट्रॉन बंध बनाते हैं, 1 इलेक्ट्रॉन की कमी रह जाती है, जिससे एक होल (Hole) बनता है।
मुख्य आवेश वाहकइलेक्ट्रॉन (Electron) – (ऋणावेशित, Negative)होल (Hole) – (धनावेशित की तरह व्यवहार करता है, Positive)
अल्प आवेश वाहकहोलइलेक्ट्रॉन

1. डायोड (Diode)

डायोड सबसे सरल अर्धचालक उपकरण है, जो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी का मूलभूत निर्माण खंड है।

संरचना:
एक P-N जंक्शन डायोड तब बनता है जब एक P-प्रकार के अर्धचालक को एक N-प्रकार के अर्धचालक के साथ एक विशेष प्रक्रिया द्वारा जोड़ा जाता है। इनके जुड़ने के स्थान को P-N जंक्शन कहते हैं।

कार्य सिद्धांत: धारा का एकदिशीय प्रवाह (Unidirectional Flow of Current)
डायोड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह विद्युत धारा को केवल एक ही दिशा में प्रवाहित होने देता है। यह एक इलेक्ट्रॉनिक चेक वाल्व की तरह काम करता है।

इस व्यवहार को समझने के लिए, हम डायोड को बैटरी से जोड़ने के दो तरीकों को देखते हैं, जिसे अभिनति (Biasing) कहते हैं।

A) अग्र अभिनति (Forward Bias)

B) पश्च अभिनति (Reverse Bias)

उपयोग (Applications):


2. ट्रांजिस्टर (Transistor)

ट्रांजिस्टर 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण आविष्कारों में से एक है। यह आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी की रीढ़ है, जिसने कंप्यूटर और संचार में क्रांति ला दी।

संरचना:
ट्रांजिस्टर एक तीन-टर्मिनल वाला अर्धचालक उपकरण है, जो दो P-N जंक्शनों को मिलाकर बनाया जाता है। यह दो प्रकार का होता है:

  1. NPN ट्रांजिस्टर (दो N-प्रकार की परतों के बीच एक पतली P-प्रकार की परत)
  2. PNP ट्रांजिस्टर (दो P-प्रकार की परतों के बीच एक पतली N-प्रकार की परत)

इसके तीन टर्मिनल होते हैं:

कार्य सिद्धांत:

ट्रांजिस्टर का मूल कार्य यह है कि आधार (Base) में प्रवाहित होने वाला एक छोटा सा विद्युत सिग्नल (धारा), उत्सर्जक और संग्राहक (Collector) के बीच प्रवाहित होने वाले एक बहुत बड़े विद्युत सिग्नल (धारा) को नियंत्रित करता है।

यह एक पानी के नल की तरह है, जहाँ वाल्व (आधार) को थोड़ा सा घुमाने पर पानी (धारा) का एक बड़ा प्रवाह नियंत्रित होता है।

उपयोग (Applications):
ट्रांजिस्टर के दो मुख्य उपयोग हैं, जो इसे इतना महत्वपूर्ण बनाते हैं:

  1. प्रवर्धक के रूप में (As an Amplifier):
    • इसका उपयोग एक कमजोर इनपुट सिग्नल (जैसे माइक्रोफोन से आने वाली आवाज) को एक शक्तिशाली आउटपुट सिग्नल में बदलने के लिए किया जाता है।
    • उदाहरण: रेडियो, टेलीविजन, लाउडस्पीकर और सभी प्रकार के ऑडियो सिस्टम में।
  2. एक स्विच के रूप में (As a Switch):
    • ट्रांजिस्टर को बहुत ही तेजी से चालू (ON) या बंद (OFF) किया जा सकता है, बिना किसी यांत्रिक हिस्से के।
    • यह गुण इसे डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी के लिए आदर्श बनाता है, जहाँ सूचना को ‘0’ (OFF) और ‘1’ (ON) के रूप में दर्शाया जाता है।
    • उदाहरण: कंप्यूटर के माइक्रोप्रोसेसर और मेमोरी चिप्स अरबों छोटे ट्रांजिस्टर स्विचों से मिलकर बने होते हैं। लॉजिक गेट्स बनाने के लिए भी इनका उपयोग होता है।

लॉजिक गेट्स का संक्षिप्त परिचय (A Brief Introduction to Logic Gates)

परिभाषा:
लॉजिक गेट्स (Logic Gates), डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स के मूलभूत निर्माण खंड (fundamental building blocks) हैं। ये ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सर्किट होते हैं जिनका एक या एक से अधिक इनपुट (Input) सिग्नल होता है और केवल एक आउटपुट (Output) सिग्नल होता है।

आउटपुट का मान, इनपुट पर लागू किए गए एक निश्चित तार्किक नियम (logical rule) पर आधारित होता है। इन्हें गेट इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये एक दरवाजे की तरह सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं – वे तय करते हैं कि सिग्नल को पास करना है या रोकना है।

यह कैसे काम करते हैं? बाइनरी तर्क (Binary Logic)
लॉजिक गेट्स बाइनरी प्रणाली (0 और 1) पर कार्य करते हैं। डिजिटल दुनिया में, हर जानकारी को दो अवस्थाओं में दर्शाया जाता है:

प्रत्येक गेट एक साधारण “हाँ” या “नहीं” (1 या 0) का निर्णय लेता है जो उसके इनपुट की स्थिति पर आधारित होता है। इन सरल गेट्स को लाखों-करोड़ों की संख्या में जोड़कर ही आधुनिक कंप्यूटर, स्मार्टफोन और सभी डिजिटल डिवाइस बनाए जाते हैं। ये आमतौर पर ट्रांजिस्टर से बने होते हैं।


प्रमुख लॉजिक गेट्स (Major Logic Gates)

प्रत्येक गेट के कार्य को एक सत्यता सारणी (Truth Table) द्वारा सबसे अच्छी तरह से समझाया जा सकता है, जो सभी संभावित इनपुट संयोजनों के लिए आउटपुट को दर्शाती है।

1. AND गेट

इनपुट Aइनपुट Bआउटपुट Y
000
010
100
111

2. OR गेट

इनपुट Aइनपुट Bआउटपुट Y
000
011
101
111

3. NOT गेट (इन्वर्टर)

इनपुट Aआउटपुट Y
01
10

सार्वत्रिक गेट (Universal Gates)

NAND और NOR गेट्स को सार्वत्रिक गेट कहा जाता है क्योंकि केवल NAND गेट्स का उपयोग करके (या केवल NOR गेट्स का उपयोग करके) हम किसी भी अन्य मूल गेट (AND, OR, NOT) को बना सकते हैं।

4. NAND गेट (NOT-AND)

इनपुट Aइनपुट Bआउटपुट Y
001
011
101
110

5. NOR गेट (NOT-OR)

इनपुट Aइनपुट Bआउटपुट Y
001
010
100
110

महत्व:
इन्हीं सरल लॉजिक गेट्स को जटिल संयोजनों में जोड़कर, ऐसे सर्किट बनाए जाते हैं जो जोड़, घटाव, गुणा, भाग, डेटा को संग्रहीत करना और निर्णय लेने जैसे कार्य कर सकते हैं। एक आधुनिक माइक्रोप्रोसेसर के अंदर अरबों की संख्या में लॉजिक गेट्स होते हैं जो उसे उसकी अभिकलन क्षमता (computing power) प्रदान करते हैं।


संचार प्रणाली: मॉडुलन (Communication System: Modulation)

अवधारणा (Concept):
कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बहुत ही महत्वपूर्ण संदेश (जैसे आपकी आवाज़) है, लेकिन वह बहुत कमजोर है और खुद से दूर तक यात्रा नहीं कर सकता। अब, कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बहुत शक्तिशाली और तेज़ धावक (runner) है जो मीलों तक बिना थके दौड़ सकता है, लेकिन उसके पास कोई संदेश नहीं है।

आप क्या करेंगे? आप अपना कमजोर संदेश उस शक्तिशाली धावक को देंगे, और वह धावक उसे लेकर दूर तक पहुँचा देगा।

संचार की दुनिया में, यही प्रक्रिया “मॉडुलन” है।

परिभाषा:

मॉडुलन (Modulation) वह प्रक्रिया है जिसमें किसी निम्न-आवृत्ति वाले मूल संदेश सिग्नल की कोई एक विशेषता (जैसे आयाम, आवृत्ति या कला) के अनुसार, एक उच्च-आवृत्ति वाली वाहक तरंग की विशेषता को बदला जाता है।

संक्षेप में, यह कम-ऊर्जा वाले सूचना सिग्नल को लंबी दूरी तक भेजने के लिए उच्च-ऊर्जा वाली वाहक तरंग पर अध्यारोपित (superimposing) करने या “सवार” करने की एक तकनीक है।


मॉडुलन की आवश्यकता क्यों है? (Why is Modulation Necessary?)

मूल सूचना सिग्नल (जैसे ध्वनि) को सीधे प्रसारित करना अव्यावहारिक और लगभग असंभव है। इसके मुख्य कारण हैं:

  1. एंटीना का आकार (Size of Antenna):
    • किसी भी सिग्नल को प्रभावी ढंग से प्रसारित करने के लिए, एंटीना का आकार सिग्नल की तरंग दैर्ध्य (wavelength, λ) की कोटि का (आमतौर पर λ/4) होना चाहिए।
    • ऑडियो सिग्नल की आवृत्ति बहुत कम (जैसे 20 kHz) होती है, जिससे उसकी तरंग दैर्ध्य बहुत लंबी हो जाती है (λ = c/f जहाँ c प्रकाश की चाल है)।
      • उदाहरण: 20 kHz सिग्नल के लिए, λ = (3 × 10⁸ m/s) / (20 × 10³ Hz) = 15,000 मीटर।
      • इसके लिए आवश्यक एंटीना का आकार लगभग 15000 / 4 = 3750 मीटर (लगभग 3.75 किलोमीटर!) लंबा होगा, जो बनाना असंभव है।
    • मॉडुलन करके हम उच्च आवृत्ति (जैसे 1 MHz) का उपयोग करते हैं, जिससे तरंग दैर्ध्य बहुत कम हो जाती है और एंटीना का आकार व्यावहारिक (practical) हो जाता है।
  2. सिग्नलों का आपस में मिलना (Mixing of Signals):
    • यदि हर कोई अपने ऑडियो सिग्नल (लगभग समान आवृत्ति रेंज) को सीधे प्रसारित करना शुरू कर दे, तो सभी सिग्नल वायुमंडल में एक-दूसरे के साथ मिल जाएंगे और किसी भी सिग्नल को अलग करना असंभव होगा।
    • मॉडुलन हमें प्रत्येक सिग्नल को एक अलग उच्च-आवृत्ति वाली वाहक तरंग आवंटित करने की अनुमति देता है (जैसे रेडियो स्टेशन 98.3 MHz, 93.5 MHz, 104.8 MHz पर प्रसारित होते हैं)। इससे रिसीवर (जैसे आपका रेडियो) अपनी इच्छानुसार स्टेशन को ट्यून करके उसे दूसरों से अलग कर सकता है।
  3. सिग्नल की प्रभावी शक्ति और दूरी (Effective Power and Distance):
    • किसी तरंग की ऊर्जा उसकी आवृत्ति के समानुपाती होती है (E = hf)।
    • निम्न-आवृत्ति वाले सिग्नलों में ऊर्जा बहुत कम होती है, इसलिए वे अधिक दूरी तय करने से पहले ही क्षीण हो जाते हैं। उच्च-आवृत्ति वाली वाहक तरंगें अधिक ऊर्जावान होती हैं और बिना अधिक क्षीण हुए लंबी दूरी तय कर सकती हैं।

मॉडुलन के प्रकार (Types of Modulation)

मॉडुलन इस आधार पर वर्गीकृत किया जाता है कि वाहक तरंग के किस गुण को बदला जा रहा है। मुख्य तीन प्रकार हैं:

  1. आयाम मॉडुलन (Amplitude Modulation – AM):
    • क्या बदलता है: इसमें वाहक तरंग का आयाम (Amplitude), संदेश सिग्नल के तात्क्षणिक मान के अनुसार बदलता है।
    • क्या स्थिर रहता है: वाहक तरंग की आवृत्ति और कला (phase) स्थिर रहती है।
    • उपयोग: AM रेडियो प्रसारण (जैसे All India Radio)।
  2. आवृत्ति मॉडुलन (Frequency Modulation – FM):
    • क्या बदलता है: इसमें वाहक तरंग की आवृत्ति (Frequency), संदेश सिग्नल के अनुसार बदलती है।
    • क्या स्थिर रहता है: वाहक तरंग का आयाम और कला स्थिर रहते हैं।
    • विशेषता: यह AM की तुलना में शोर (noise) से कम प्रभावित होता है, जिससे बेहतर गुणवत्ता वाली ध्वनि मिलती है।
    • उपयोग: FM रेडियो प्रसारण, टीवी ध्वनि।
  3. कला मॉडुलन (Phase Modulation – PM):
    • क्या बदलता है: इसमें वाहक तरंग की कला (Phase), संदेश सिग्नल के अनुसार बदलती है।
    • उपयोग: इसका उपयोग मुख्य रूप से डिजिटल संचार (Digital Communication) में किया जाता है।

विमॉडुलन (Demodulation)

यह मॉडुलन की विपरीत प्रक्रिया है।

विमॉडुलन वह प्रक्रिया है जिसमें रिसीवर पर, मॉडुलित तरंग से मूल, निम्न-आवृत्ति वाले संदेश सिग्नल को वापस प्राप्त किया जाता है या अलग किया जाता है।