ऊष्मा और ऊष्मागतिकी

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ताप और ऊष्मा (Temperature and Heat)

ताप (Temperature) और ऊष्मा (Heat) भौतिकी की दो ऐसी अवधारणाएँ हैं जिन्हें अक्सर एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन ये दोनों मौलिक रूप से भिन्न हैं। इन्हें समझना ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) की नींव है।


ताप (Temperature)

सरल परिभाषा:

ताप किसी वस्तु की ‘गर्मी’ या ‘ठंडक’ की माप है। यह हमें बताता है कि कोई वस्तु कितनी गर्म या ठंडी है।

वैज्ञानिक परिभाषा:

किसी वस्तु का ताप, उस वस्तु के भीतर कणों (अणुओं और परमाणुओं) की औसत गतिज ऊर्जा (average kinetic energy) का एक माप है।

मुख्य बिंदु:

ताप के मात्रक (Units of Temperature):

  1. डिग्री सेल्सियस (°C): दैनिक जीवन में सबसे प्रचलित पैमाना।
  2. डिग्री फारेनहाइट (°F): चिकित्सा और कुछ देशों में उपयोग किया जाने वाला पैमाना।
  3. केल्विन (K): यह ताप का SI मात्रक है। इसे परम ताप पैमाना (Absolute Temperature Scale) भी कहते हैं। 0 K (-273.15 °C) को परम शून्य (Absolute Zero) कहते हैं, जहाँ कणों की गति लगभग रुक जाती है।

ऊष्मा (Heat)

परिभाषा:

ऊष्मा, ऊर्जा का वह रूप है जो दो वस्तुओं के बीच उनके तापांतर (temperature difference) के कारण एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित (transfer) होती है।

मुख्य बिंदु:

ऊष्मा के मात्रक (Units of Heat):

  1. जूल (Joule – J): यह ऊष्मा का SI मात्रक है, क्योंकि ऊष्मा ऊर्जा का ही एक रूप है।
  2. कैलोरी (Calorie – cal): यह एक प्रचलित मात्रक है। 1 कैलोरी ऊष्मा की वह मात्रा है जो 1 ग्राम पानी का तापमान 1°C बढ़ाने के लिए आवश्यक होती है।
    •  कैलोरी ≈ 

ऊष्मा का स्थानांतरण (Heat Transfer)

ऊष्मा का स्थानांतरण तीन विधियों से होता है:

  1. चालन (Conduction):
    • क्या होता है: ऊष्मा का स्थानांतरण सीधे संपर्क में रखी वस्तुओं के बीच, बिना कणों के वास्तविक स्थानांतरण के होता है। गर्म कण अपनी जगह पर कंपन करके अपनी ऊर्जा ठंडे पड़ोसी कणों को स्थानांतरित कर देते हैं।
    • किसमें होता है: यह मुख्य रूप से ठोस (solids) पदार्थों में होता है, विशेषकर धातुओं में (जैसे लोहे की छड़ का एक सिरा गर्म करने पर दूसरे सिरे तक गर्मी पहुंचना)।
  2. संवहन (Convection):
    • क्या होता है: ऊष्मा का स्थानांतरण पदार्थ के कणों के वास्तविक mouvement (movement) के कारण होता है। गर्म कण हल्के होकर ऊपर उठते हैं और ठंडे, भारी कण उनकी जगह लेने के लिए नीचे आते हैं। यह एक धारा (convection current) बनाता है।
    • किसमें होता है: यह केवल तरल पदार्थों (द्रव और गैस) में संभव है (जैसे पानी का उबलना, कमरे में हीटर से हवा का गर्म होना)।
  3. विकिरण (Radiation):
    • क्या होता है: ऊष्मा का स्थानांतरण विद्युत चुम्बकीय तरंगों (electromagnetic waves) के रूप में होता है, और इसके लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है।
    • किसमें होता है: यह निर्वात (vacuum) में भी हो सकता है (जैसे सूर्य से पृथ्वी तक ऊष्मा का पहुंचना, आग के पास बैठने पर गर्मी महसूस होना)।

ताप और ऊष्मा में तुलनात्मक अंतर

आधारताप (Temperature)ऊष्मा (Heat)
परिभाषावस्तु की गर्मी या ठंडक की माप; कणों की औसत गतिज ऊर्जा।तापांतर के कारण स्थानांतरित होने वाली ऊर्जा।
प्रकृतियह वस्तु का एक गुण (Property) है जो उसकी अवस्था को बताता है।यह ऊर्जा का प्रवाह (Energy Flow) है, जो वस्तु के पास नहीं होता, बल्कि स्थानांतरित होता है।
दिशाइसकी कोई दिशा नहीं होती, यह एक अदिश राशि है।यह हमेशा उच्च ताप से निम्न ताप की ओर प्रवाहित होती है।
कारण और प्रभावयह प्रभाव (Effect) है।यह कारण (Cause) है। ऊष्मा देने पर ताप बढ़ता है।
SI मात्रककेल्विन (K)जूल (Joule)
उपकरणथर्मामीटर से मापा जाता है।कैलोरीमीटर से मापा जाता है।

तापमान के पैमाने: सेल्सियस, फ़ारेनहाइट, केल्विन

तापमान को मापने और व्यक्त करने के लिए कई पैमानों (scales) का विकास किया गया है। इनमें से तीन सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले पैमाने सेल्सियस, फ़ारेनहाइट और केल्विन हैं। प्रत्येक पैमाने का अपना संदर्भ बिंदु (reference point) और विभाजनों (divisions) का तरीका होता है।


1. सेल्सियस पैमाना (°C – Degree Celsius)

2. फ़ारेनहाइट पैमाना (°F – Degree Fahrenheit)

3. केल्विन पैमाना (K – Kelvin)


पैमानों के बीच संबंध और रूपांतरण सूत्र

इन तीनों पैमानों के बीच का संबंध एक सरल सूत्र द्वारा दर्शाया जा सकता है जो पानी के हिमांक और क्वथनांक पर आधारित है:

C / 100 = (F – 32) / 180 = (K – 273.15) / 100

इस सूत्र को सरल बनाने पर:

C / 5 = (F – 32) / 9 = (K – 273.15) / 5

इस मास्टर सूत्र का उपयोग करके, हम किसी भी एक पैमाने से दूसरे में तापमान को आसानी से बदल सकते हैं।

प्रमुख रूपांतरण सूत्र:

रूपांतरण (Conversion)सूत्र (Formula)
सेल्सियस से फ़ारेनहाइट (C → F)F = (9/5) × C + 32
फ़ारेनहाइट से सेल्सियस (F → C)C = 5/9 × (F – 32)
सेल्सियस से केल्विन (C → K)K = C + 273.15 (गणना में अक्सर 273 का उपयोग होता है)
केल्विन से सेल्सियस (K → C)C = K – 273.15

तुलनात्मक तालिका और महत्वपूर्ण मान

महत्वपूर्ण घटनाकेल्विन (K)सेल्सियस (°C)फ़ारेनहाइट (°F)
परम शून्य (Absolute Zero)0 K-273.15 °C-459.67 °F
पानी का जमना (Freezing Point)273.15 K0 °C32 °F
औसत कमरा तापमान~298 K~25 °C~77 °F
स्वस्थ मानव शरीर का तापमान~310 K~37 °C~98.6 °F
पानी का उबलना (Boiling Point)373.15 K100 °C212 °F

एक रोचक तथ्य: -40° वह तापमान है जहाँ सेल्सियस और फ़ारेनहाइट पैमाने का मान बराबर होता है। (-40 °C = -40 °F)


ऊष्मा का प्रवाह, विशिष्ट ऊष्मा और गुप्त ऊष्मा

ये तीनों अवधारणाएँ ऊष्मा (Heat) के व्यवहार को समझने के लिए मौलिक हैं। ऊष्मा का प्रवाह बताता है कि ऊष्मा एक जगह से दूसरी जगह कैसे जाती है, विशिष्ट ऊष्मा बताती है कि किसी पदार्थ का तापमान बदलने के लिए कितनी ऊष्मा चाहिए, और गुप्त ऊष्मा बताती है कि किसी पदार्थ की अवस्था (state) बदलने के लिए कितनी ऊष्मा चाहिए।


1. ऊष्मा का प्रवाह / स्थानांतरण (Heat Transfer)

ऊष्मा ऊर्जा का प्रवाह हमेशा उच्च तापमान वाली वस्तु से निम्न तापमान वाली वस्तु की ओर होता है। यह प्रवाह तीन विधियों से हो सकता है:

A) चालन (Conduction)

B) संवहन (Convection)

C) विकिरण (Radiation)


2. विशिष्ट ऊष्मा (Specific Heat)

अवधारणा: आपने देखा होगा कि धूप में रेत, पानी की तुलना में बहुत जल्दी गर्म हो जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों पदार्थों की ऊष्मा ग्रहण करने की क्षमता अलग-अलग होती है। इसी क्षमता को विशिष्ट ऊष्मा से मापा जाता है।

परिभाषा:

किसी पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा धारिता (Specific Heat Capacity), ऊष्मा की वह मात्रा है जो उस पदार्थ के एकांक द्रव्यमान (unit mass) का तापमान एकांक डिग्री (1°C या 1 K) बढ़ाने के लिए आवश्यक होती है।

महत्वपूर्ण बिंदु:


3. गुप्त ऊष्मा (Latent Heat)

अवधारणा: जब आप पानी उबालते हैं, तो तापमान 100°C पर पहुँचने के बाद तब तक स्थिर रहता है, जब तक कि सारा पानी भाप न बन जाए, भले ही आप लगातार ऊष्मा दे रहे हों। यह अतिरिक्त ऊष्मा कहाँ जाती है? यह ऊष्मा “छिपी” (latent) रहती है और पदार्थ की अवस्था (state) बदलने के काम आती है।

परिभाषा:

“नियत तापमान पर, किसी पदार्थ की अवस्था परिवर्तन (state change) के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को गुप्त ऊष्मा कहते हैं।”

गुप्त ऊष्मा के प्रकार:

  1. गलन की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Fusion):
    • क्या होता है: ठोस से द्रव में अवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक ऊष्मा (जैसे बर्फ का पानी बनना)।
    • बर्फ के लिए इसका मान लगभग 3.34 × 10⁵ J/kg होता है।
  2. वाष्पन की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Vaporization):
    • क्या होता है: द्रव से गैस में अवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक ऊष्मा (जैसे पानी का भाप बनना)।
    • पानी के लिए इसका मान लगभग 22.6 × 10⁵ J/kg होता है।
    • इसीलिए उबलते पानी की तुलना में भाप से जलना अधिक खतरनाक होता है, क्योंकि जब भाप त्वचा पर संघनित होती है, तो वह बहुत अधिक मात्रा में गुप्त ऊष्मा छोड़ती है।
आधारविशिष्ट ऊष्मा (Specific Heat)गुप्त ऊष्मा (Latent Heat)
कब होता है?जब पदार्थ का तापमान बदलता है (अवस्था नहीं)।जब पदार्थ की अवस्था बदलती है (तापमान नहीं)।
तापमान का व्यवहारतापमान बदलता है।तापमान स्थिर रहता है।
ऊर्जा का उपयोगकणों की गतिज ऊर्जा बढ़ाने में।अणुओं के बीच के बंधन तोड़ने में।
सूत्रQ = mcΔTQ = mL

ऊष्मा का संचरण / स्थानांतरण (Transmission / Transfer of Heat)

ऊष्मा, ऊर्जा का एक रूप है और इसका प्राकृतिक गुण उच्च तापमान वाले क्षेत्र से निम्न तापमान वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होना है। इस प्रवाह या स्थानांतरण को ही ऊष्मा का संचरण कहते हैं। ऊष्मा का यह संचरण तब तक जारी रहता है जब तक कि दोनों क्षेत्रों के बीच तापीय साम्यावस्था (thermal equilibrium), यानी समान तापमान, स्थापित न हो जाए।

ऊष्मा का संचरण मुख्य रूप से तीन अलग-अलग विधियों से होता है:

1. चालन (Conduction)


परिभाषा: ऊष्मा संचरण की वह विधि जिसमें माध्यम के कण अपने स्थान को छोड़े बिना, केवल कंपन (vibration) के द्वारा ऊष्मा को एक कण से दूसरे कण में स्थानांतरित करते हैं, चालन कहलाती है।

यह कैसे काम करता है?
यह विधि सीधे संपर्क पर आधारित है। जब किसी ठोस वस्तु (जैसे लोहे की छड़) के एक सिरे को गर्म किया जाता है, तो उस सिरे पर मौजूद कण ऊर्जा पाकर तेजी से कंपन करने लगते हैं। ये तेजी से कंपन करते हुए कण अपने पड़ोस के ठंडे कणों से टकराते हैं और अपनी ऊर्जा उन्हें दे देते हैं। यह प्रक्रिया आगे बढ़ती रहती है और ऊष्मा धीरे-धीरे गर्म सिरे से ठंडे सिरे की ओर पहुँच जाती है।

प्रमुख बिंदु:

चालक और कुचालक (Conductors and Insulators):

2. संवहन (Convection)


परिभाषा: ऊष्मा संचरण की वह विधि जिसमें माध्यम के कणों के वास्तविक स्थानांतरण (actual movement) द्वारा ऊष्मा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचती है, संवहन कहलाती है।

यह कैसे काम करता है?
जब किसी तरल (द्रव या गैस) को गर्म किया जाता है, तो ऊष्मा स्रोत के पास के कण गर्म हो जाते हैं। गर्म होने पर उनका घनत्व कम हो जाता है और वे हल्के होकर ऊपर की ओर उठते हैं। ऊपर मौजूद ठंडे और भारी कण उनका स्थान लेने के लिए नीचे आ जाते हैं, जो फिर से गर्म होकर ऊपर उठते हैं। यह प्रक्रिया एक चक्रीय प्रवाह बनाती है, जिसे संवहन धारा (Convection Current) कहते हैं, और इसी धारा के माध्यम से ऊष्मा पूरे तरल में फैल जाती है।

प्रमुख बिंदु:

3. विकिरण (Radiation)


परिभाषा: ऊष्मा संचरण की वह विधि जिसमें ऊष्मा का स्थानांतरण विद्युत चुम्बकीय तरंगों (Electromagnetic Waves) के रूप में होता है और इसके लिए किसी भी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती, विकिरण कहलाती है।

यह कैसे काम करता है?
प्रत्येक वस्तु जिसका तापमान परम शून्य (0 K) से अधिक होता है, वह ऊष्मीय ऊर्जा का विकिरण करती है। यह ऊर्जा इन्फ्रारेड तरंगों के रूप में चलती है और इसे चलने के लिए किसी माध्यम (ठोस, द्रव या गैस) की आवश्यकता नहीं होती। यह निर्वात (vacuum) में भी यात्रा कर सकती है।

प्रमुख बिंदु:

आधारचालन (Conduction)संवहन (Convection)विकिरण (Radiation)
माध्यम की आवश्यकताआवश्यक (मुख्यतः ठोस)आवश्यक (केवल द्रव और गैस)आवश्यक नहीं (निर्वात में भी)
कणों की भूमिकाकण अपनी जगह पर कंपन करते हैं।कण ऊष्मा के साथ स्थानांतरित होते हैं।कणों की कोई सीधी भूमिका नहीं।
संचरण की प्रकृतिधीमा प्रक्रियाधीमी प्रक्रियाप्रकाश की गति से (सबसे तेज)
मुख्य उदाहरणधातु की छड़ का गर्म होनापानी का उबलनासूर्य की गर्मी

ऊष्मा के चालक और कुचालक, थर्मस फ्लास्क का कार्य सिद्धांत


ऊष्मा के अच्छे और बुरे चालक (Good and Bad Conductors of Heat)

ऊष्मा संचरण की चालन विधि के आधार पर पदार्थों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है: चालक और कुचालक।

1. ऊष्मा के सुचालक (Good Conductors of Heat)

परिभाषा:

वे पदार्थ जो अपने में से ऊष्मा को आसानी से और तेजी से प्रवाहित होने देते हैं, ऊष्मा के सुचालक कहलाते हैं।

कारण:
सुचालकों, विशेषकर धातुओं में, बहुत सारे मुक्त इलेक्ट्रॉन (free electrons) होते हैं। जब इन्हें गर्म किया जाता है, तो ये मुक्त इलेक्ट्रॉन ऊर्जा ग्रहण कर तेजी से गति करते हैं और पूरे पदार्थ में तेजी से फैलकर अपनी ऊर्जा को अन्य इलेक्ट्रॉनों और परमाणुओं में स्थानांतरित कर देते हैं। यही कारण है कि धातुएँ ऊष्मा की इतनी अच्छी चालक होती हैं।

उदाहरण:

दैनिक जीवन में उपयोग:

2. ऊष्मा के कुचालक या ऊष्मारोधी (Bad Conductors or Insulators)

परिभाषा:

वे पदार्थ जो अपने में से ऊष्मा को बहुत मुश्किल से या न के बराबर प्रवाहित होने देते हैं, ऊष्मा के कुचालक या ऊष्मारोधी कहलाते हैं।

कारण:
कुचालक पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं होते हैं। इनमें ऊष्मा का संचरण केवल अणुओं के धीमे कंपन के माध्यम से होता है, जो कि एक बहुत ही अकुशल प्रक्रिया है।

उदाहरण:

दैनिक जीवन में उपयोग:


थर्मस फ्लास्क (निर्वात फ्लास्क) का कार्य सिद्धांत (Working Principle of Thermos Flask)

उद्देश्य: थर्मस फ्लास्क का मुख्य उद्देश्य इसके अंदर रखी वस्तु को लंबे समय तक गर्म या ठंडा रखना है। यह ऊष्मा के स्थानांतरण को यथासंभव रोककर ऐसा करता है।

सिद्धांत:
थर्मस फ्लास्क का कार्य सिद्धांत ऊष्मा संचरण की तीनों विधियों – चालन (Conduction), संवहन (Convection), और विकिरण (Radiation) – को एक साथ रोकना है।

थर्मस फ्लास्क की संरचना और कार्य:

  1. दोहरी दीवार वाली बोतल (Double-Walled Bottle):
    • इसमें काँच या स्टील की बनी दो दीवारों वाली एक बोतल होती है। एक बोतल के अंदर दूसरी बोतल।
    • कार्य: दोनों दीवारों के बीच की हवा को निकालकर निर्वात (Vacuum) पैदा कर दिया जाता है।
    • लाभ:
      • चालन (Conduction) की रोकथाम: चूँकि निर्वात में कोई कण (माध्यम) नहीं होता, इसलिए अंदर की गर्मी चालन विधि से बाहर नहीं जा सकती, और बाहर की गर्मी अंदर नहीं आ सकती।
      • संवहन (Convection) की रोकथाम: संवहन के लिए भी माध्यम (द्रव या गैस) की आवश्यकता होती है। निर्वात में कोई माध्यम न होने के कारण संवहन धाराएँ नहीं बन सकतीं।
  2. चमकदार या रजत-लेपित सतह (Shiny or Silver-Coated Surface):
    • बोतल की भीतरी दीवारों (जो निर्वात का सामना करती हैं) को चमकदार बनाया जाता है, अक्सर चाँदी की परत चढ़ाकर।
    • कार्य: चमकदार सतह ऊष्मा की खराब अवशोषक (poor absorber) और अच्छी परावर्तक (good reflector) होती है।
    • लाभ (विकिरण की रोकथाम – Prevention of Radiation):
      • गर्म वस्तु के लिए: अंदर रखी गर्म वस्तु (जैसे चाय) से निकलने वाली ऊष्मा विकिरण को भीतरी दीवार परावर्तित (reflect) करके वापस चाय में ही भेज देती है।
      • ठंडी वस्तु के लिए: बाहर से आने वाली ऊष्मा विकिरण को बाहरी दीवार की चमकदार सतह परावर्तित करके बाहर ही रोक देती है, उसे अंदर नहीं आने देती।
  3. कुचालक ढक्कन और आधार (Insulating Stopper and Base):
    • फ्लास्क का मुँह एक कॉर्क या प्लास्टिक के बने ढक्कन से बंद होता है।
    • बोतल को बाहरी आवरण में कुचालक पैड पर रखा जाता है।
    • लाभ (चालन की रोकथाम): ये ढक्कन और आधार ऊष्मा के कुचालक (insulators) होते हैं, जो मुँह और आधार के माध्यम से चालन द्वारा होने वाले ऊष्मा के क्षय को कम करते हैं।

इस प्रकार, थर्मस फ्लास्क इन तीनों तंत्रों के माध्यम से ऊष्मा के प्रवाह को लगभग पूरी तरह से रोक देता है, जिससे अंदर रखी वस्तु का तापमान लंबे समय तक लगभग स्थिर बना रहता है।



ऊष्मागतिकी (Thermodynamics)

ऊष्मागतिकी के नियम (Laws of Thermodynamics)

ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) भौतिकी की वह शाखा है जो ऊष्मा (Heat), कार्य (Work) और ऊर्जा (Energy) के बीच के संबंधों का अध्ययन करती है। इसके नियम यह बताते हैं कि ऊर्जा एक प्रणाली (system) और उसके परिवेश (surroundings) के बीच कैसे व्यवहार करती है।


ऊष्मागतिकी का शून्यवाँ नियम (Zeroth Law of Thermodynamics)

यह नियम “तापीय साम्यावस्था (Thermal Equilibrium)” की अवधारणा को परिभाषित करता है और तापमान के मापन का आधार है।

नियम का कथन:

“यदि दो निकाय (A और B) किसी तीसरे निकाय (C) के साथ अलग-अलग तापीय साम्यावस्था में हैं, तो वे (A और B) एक-दूसरे के साथ भी तापीय साम्यावस्था में होंगे।”

सरल शब्दों में: अगर A का तापमान C के बराबर है, और B का तापमान भी C के बराबर है, तो A और B का तापमान भी आपस में बराबर होगा।

महत्व:


ऊष्मागतिकी का पहला नियम (First Law of Thermodynamics)

यह नियम मूल रूप से ऊर्जा संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Energy) का ही एक रूप है, जो विशेष रूप से ऊष्मागतिक प्रणालियों पर लागू होता है।

नियम का कथन:

“किसी विलगित निकाय (isolated system) की कुल ऊर्जा स्थिर रहती है।”

या, इसे ऊष्मा और कार्य के संदर्भ में इस प्रकार कहा जा सकता है:

“जब किसी प्रणाली को ऊष्मा दी जाती है, तो वह ऊष्मा दो भागों में खर्च होती है: कुछ भाग प्रणाली की आंतरिक ऊर्जा (Internal Energy) को बढ़ाने में और शेष भाग प्रणाली द्वारा बाह्य कार्य (External Work) करने में।”

गणितीय सूत्र:

ΔQ = ΔU + ΔW

जहाँ:

आंतरिक ऊर्जा (ΔU): यह किसी प्रणाली के अणुओं की कुल ऊर्जा (गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा) होती है। यह प्रणाली के तापमान और अवस्था पर निर्भर करती है।
कार्य (ΔW): यह तब होता है जब प्रणाली का आयतन बदलता है, जैसे गैस के फैलने पर पिस्टन को धकेलना।

निष्कर्ष:


ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम (Second Law of Thermodynamics)

यह नियम पहले नियम की सीमाओं को दूर करता है और प्रकृति में होने वाली प्रक्रियाओं की दिशा और संभाव्यता को निर्धारित करता है। यह “एन्ट्रॉपी (Entropy)” की अवधारणा को प्रस्तुत करता है। इस नियम के कई कथन हैं, जो एक ही विचार को अलग-अलग तरीकों से व्यक्त करते हैं।

1. क्लॉसियस का कथन (Clausius Statement):

“किसी भी ऐसी प्रक्रिया का होना असंभव है जिसका एकमात्र परिणाम निम्न ताप वाली वस्तु से ऊष्मा निकालकर उच्च ताप वाली वस्तु में स्थानांतरित करना हो।”

सरल शब्दों में: ऊष्मा अपने आप ठंडी वस्तु से गर्म वस्तु की ओर प्रवाहित नहीं हो सकती। ऐसा करने के लिए बाह्य कार्य (external work) करना पड़ता है।

उदाहरण: आपका रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। वे ठंडे स्थान (फ्रिज के अंदर) से गर्मी निकालकर उसे गर्म स्थान (कमरे) में फेंकते हैं, लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें कंप्रेसर पर बाह्य कार्य करना पड़ता है (जिसके लिए बिजली की आवश्यकता होती है)।

2. केल्विन-प्लांक का कथन (Kelvin-Planck Statement):

“किसी भी ऐसी ऊष्मा इंजन का निर्माण करना असंभव है जो एक चक्र में काम करते हुए, किसी स्रोत से ली गई संपूर्ण ऊष्मा को बिना किसी भाग को सिंक (ठंडे भंडार) में छोड़े, पूरी तरह से कार्य में बदल दे।”

सरल शब्दों में: कोई भी इंजन 100% कार्यक्षम (efficient) नहीं हो सकता। जब भी ऊष्मा को कार्य में बदला जाता है, तो कुछ ऊष्मा का व्यय (wastage) होना अनिवार्य है।

उदाहरण: कार का इंजन पेट्रोल जलाने से उत्पन्न ऊष्मा का केवल एक हिस्सा ही पहियों को घुमाने (कार्य करने) में उपयोग कर पाता है। ऊष्मा का एक बड़ा हिस्सा साइलेंसर और रेडिएटर के माध्यम से वातावरण (सिंक) में व्यर्थ चला जाता है।

एन्ट्रॉपी (Entropy) और दूसरा नियम:

एन्ट्रॉपी किसी प्रणाली में अव्यवस्था या यादृच्छिकता (disorder or randomness) का माप है। दूसरे नियम का एक और कथन एन्ट्रॉपी के संदर्भ में है:

“किसी भी विलगित निकाय की कुल एन्ट्रॉपी समय के साथ हमेशा बढ़ती है या स्थिर रहती है; यह कभी घटती नहीं है।”

सरल शब्दों में: ब्रह्मांड लगातार अधिक अव्यवस्थित हो रहा है। प्राकृतिक प्रक्रियाएँ हमेशा उस दिशा में होती हैं जो कुल अव्यवस्था को बढ़ाती हैं।

निष्कर्ष:
दूसरा नियम हमें बताता है कि:


ऊष्मा इंजन (Heat Engine) और रेफ्रिजरेटर (Refrigerator)

ऊष्मा इंजन और रेफ्रिजरेटर, दोनों ही ऊष्मागतिकी के सिद्धांतों पर काम करने वाले उपकरण हैं, लेकिन उनके उद्देश्य और कार्य करने का तरीका एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत है।


ऊष्मा इंजन (Heat Engine)

उद्देश्य:

एक ऊष्मा इंजन का मुख्य उद्देश्य ऊष्मा ऊर्जा (Heat Energy) को यांत्रिक कार्य (Mechanical Work) में बदलना है।

यह ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम (केल्विन-प्लांक कथन) के अनुसार कार्य करता है।

कार्यप्रणाली और मुख्य घटक:
एक ऊष्मा इंजन एक चक्रीय प्रक्रिया (cyclic process) में काम करता है और इसके तीन मुख्य भाग होते हैं:

  1. ऊष्मा स्रोत (Hot Reservoir or Source):
    • यह एक उच्च तापमान (T₁) वाला पिंड होता है जिससे इंजन ऊष्मा लेता है।
    • उदाहरण: भाप इंजन में बॉयलर, पेट्रोल इंजन में जलता हुआ ईंधन।
  2. कार्यकारी पदार्थ (Working Substance):
    • यह वह पदार्थ है जो ऊष्मा को अवशोषित करता है, फैलता है और कार्य करता है।
    • उदाहरण: भाप इंजन में भाप, पेट्रोल इंजन में पेट्रोल और हवा का मिश्रण।
  3. सिंक (Cold Reservoir or Sink):
    • यह एक निम्न तापमान (T₂) वाला पिंड (आमतौर पर हमारा वातावरण) होता है जहाँ इंजन बची हुई अनुपयोगी ऊष्मा को छोड़ देता है।

कार्य चक्र (Working Cycle):

  1. कार्यकारी पदार्थ, स्रोत से ऊष्मा (Q₁) अवशोषित करता है।
  2. यह ऊष्मा प्राप्त कर फैलता है और पिस्टन पर कार्य ( करता है (जैसे पहियों को घुमाना)।
  3. दूसरे नियम के अनुसार, ली गई सारी ऊष्मा (Q₁) कार्य में नहीं बदल सकती। इसलिए, बची हुई ऊष्मा (Q₂) सिंक में छोड़ दी जाती है।
  4. कार्यकारी पदार्थ अपनी प्रारंभिक अवस्था में वापस आ जाता है और चक्र दोहराने के लिए तैयार होता है।

किया गया कार्य (Work Done):

W = Q₁ – Q₂
(लिया गया कार्य = अवशोषित ऊष्मा – छोड़ी गई ऊष्मा)

दक्षता (Efficiency, η):
किसी ऊष्मा इंजन की दक्षता यह बताती है कि वह ली गई ऊष्मा का कितना प्रतिशत हिस्सा उपयोगी कार्य में बदल पाता है।

η = (किया गया कार्य / अवशोषित ऊष्मा) = W / Q₁ = (Q₁ – Q₂) / Q₁

महत्वपूर्ण बिंदु:

उदाहरण: भाप इंजन, पेट्रोल इंजन, डीजल इंजन, गैस टरबाइन।


रेफ्रिजरेटर / ऊष्मा पम्प (Refrigerator / Heat Pump)

उद्देश्य:

एक रेफ्रिजरेटर का मुख्य उद्देश्य बाह्य कार्य (External Work) की सहायता से किसी ठंडे स्थान से ऊष्मा निकालकर उसे गर्म स्थान पर छोड़ना है।

यह ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम (क्लॉसियस कथन) के अनुसार कार्य करता है।

कार्यप्रणाली और मुख्य घटक:
रेफ्रिजरेटर को एक “उल्टा ऊष्मा इंजन” (reversed heat engine) भी कहा जा सकता है।

  1. ठंडा भंडार (Cold Reservoir):
    • यह वह स्थान है जिसे ठंडा रखना है (जैसे फ्रिज के अंदर का डिब्बा), जिसका तापमान T₂ होता है।
  2. गर्म भंडार (Hot Reservoir):
    • यह वह स्थान है जहाँ ऊष्मा को फेंका जाता है (जैसे कमरा), जिसका तापमान T₁ होता है।
  3. कार्यकारी पदार्थ (Working Substance):
    • यहाँ इसे प्रशीतक (Refrigerant) कहते हैं (जैसे फ्रिऑन)। यह एक ऐसा पदार्थ है जो कम तापमान पर आसानी से वाष्पित हो जाता है।
  4. कंप्रेसर (Compressor):
    • यह वह बाह्य युक्ति है जो प्रशीतक पर कार्य ( करती है। यही बिजली की खपत करता है।

कार्य चक्र (Working Cycle):

  1. वाष्पीकरण (Evaporation): तरल प्रशीतक फ्रिज के अंदर की पाइपों (वाष्पित्र) में जाता है और वहाँ की ऊष्मा (Q₂) को अवशोषित करके वाष्प में बदल जाता है। इससे फ्रिज के अंदर का तापमान कम हो जाता है।
  2. संपीड़न (Compression): कंप्रेसर इस निम्न दाब वाली वाष्प पर कार्य ( करके उसे उच्च दाब और उच्च तापमान वाली वाष्प में बदल देता है।
  3. संघनन (Condensation): यह गर्म वाष्प फ्रिज के पीछे लगी जालीनुमा पाइपों (संघनित्र) में जाती है। यहाँ यह अपनी ऊष्मा (Q₁) कमरे (गर्म भंडार) में छोड़ देती है और वापस तरल में बदल जाती है।
  4. प्रसार (Expansion): उच्च दाब वाला तरल एक प्रसार वाल्व से गुजरता है, जिससे उसका दाब और तापमान फिर से बहुत कम हो जाता है, और वह चक्र दोहराने के लिए तैयार हो जाता है।

छोड़ी गई ऊष्मा:

Q₁ = Q₂ + W
(वातावरण में छोड़ी गई ऊष्मा = फ्रिज से निकाली गई ऊष्मा + किया गया कार्य)

निष्पादन गुणांक (Coefficient of Performance, COP):
रेफ्रिजरेटर की प्रभावशीलता को “दक्षता” के बजाय निष्पादन गुणांक (COP) से मापा जाता है।

COP = (निकाली गई ऊष्मा / किया गया कार्य) = Q₂ / W

महत्वपूर्ण बिंदु:

आधारऊष्मा इंजन (Heat Engine)रेफ्रिजरेटर (Refrigerator)
उद्देश्यऊष्मा को कार्य में बदलना।ठंडे स्थान से ऊष्मा निकालकर गर्म स्थान पर फेंकना।
ऊर्जा का प्रवाहस्वतः (गर्म से ठंडे की ओर)।बाह्य कार्य की मदद से (ठंडे से गर्म की ओर)।
आउटपुटउपयोगी कार्य (ठंडा किया गया स्थान (निकाली गई ऊष्मा Q₂)।
इनपुटऊष्मा (कार्य (
मूल सिद्धांतकेल्विन-प्लांक कथन।क्लॉसियस कथन।
मापनदक्षता (η), हमेशा 1 से कम।निष्पादन गुणांक (COP), हमेशा 1 से अधिक।


 तरंग और ध्वनि 

तरंग गति (Wave Motion)

परिभाषा:
तरंग गति किसी माध्यम में उत्पन्न हुआ वह विक्षोभ (disturbance) है, जिसके द्वारा ऊर्जा (energy) एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होती है, बिना माध्यम के कणों के स्थायी स्थानांतरण के।

इसका अर्थ यह है कि माध्यम के कण अपने स्थान को नहीं छोड़ते हैं, वे केवल अपनी माध्य स्थिति (mean position) के इधर-उधर कंपन (vibration) करते हैं और अपनी ऊर्जा आगे वाले कणों को स्थानांतरित कर देते हैं।

उदाहरण:
जब आप शांत तालाब में पत्थर फेंकते हैं, तो पत्थर के गिरने की जगह से लहरें (विक्षोभ) गोलाकार रूप में बाहर की ओर फैलती हैं। यदि आप पानी में एक कॉर्क का टुकड़ा डाल दें, तो आप देखेंगे कि कॉर्क अपनी ही जगह पर ऊपर-नीचे होता है, लेकिन लहरों के साथ आगे नहीं बढ़ता। यह साबित करता है कि केवल विक्षोभ (ऊर्जा) आगे बढ़ रहा है, माध्यम के कण (पानी) नहीं।


तरंगों के प्रकार (Types of Waves)

यांत्रिक तरंगों (Mechanical Waves – जिन्हें संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है) को माध्यम के कणों के कंपन की दिशा और तरंग के संचरण की दिशा के बीच के संबंध के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है।

1. अनुप्रस्थ तरंगें (Transverse Waves)

परिभाषा:

वे तरंगें जिनमें माध्यम के कणों का कंपन, तरंग के संचरण की दिशा के लंबवत (perpendicular) होता है, अनुप्रस्थ तरंगें कहलाती हैं।

यह कैसे काम करता है?
कण ऊपर और नीचे (या आगे-पीछे) कंपन करते हैं, जबकि तरंग सीधी रेखा में आगे बढ़ती है। कंपन की दिशा और तरंग की गति की दिशा के बीच 90 डिग्री का कोण बनता है।

संरचना:
अनुप्रस्थ तरंगें श्रृंग (Crest) और गर्त (Trough) के रूप में आगे बढ़ती हैं।

उदाहरण:

विशेषता:


2. अनुदैर्ध्य तरंगें (Longitudinal Waves)

परिभाषा:

वे तरंगें जिनमें माध्यम के कणों का कंपन, तरंग के संचरण की दिशा के समांतर (parallel) या उसी दिशा में होता है, अनुदैर्ध्य तरंगें कहलाती हैं।

यह कैसे काम करता है?
कण तरंग की गति की दिशा में ही आगे-पीछे कंपन करते हैं। कणों का कंपन और तरंग का संचरण एक ही रेखा में होता है।

संरचना:
अनुदैर्ध्य तरंगें संपीड़न (Compression) और विरलन (Rarefaction) के रूप में आगे बढ़ती हैं।

उदाहरण:

विशेषता:


तुलनात्मक अंतर

आधारअनुप्रस्थ तरंग (Transverse Wave)अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudinal Wave)
कणों का कंपनतरंग संचरण की दिशा के लंबवततरंग संचरण की दिशा के समांतर
संरचनाश्रृंग (Crest) और गर्त (Trough) के रूप में।संपीड़न (Compression) और विरलन (Rarefaction) के रूप में।
किसमें उत्पन्न होती है?केवल ठोस और द्रवों की सतह पर।ठोस, द्रव और गैस, तीनों में।
परिवर्तनमाध्यम के आकार (Shape) में परिवर्तन होता है।माध्यम के घनत्व (Density) में परिवर्तन होता है।
ध्रुवण (Polarization)ध्रुवण संभव है।ध्रुवण संभव नहीं है।
उदाहरणप्रकाश तरंगें, रस्सी में तरंग।ध्वनि तरंगें, स्प्रिंग में तरंग।

तरंगों का वर्गीकरण: यांत्रिक और अयांत्रिक (विद्युत चुम्बकीय) तरंगें

तरंगों को इस आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है कि उन्हें संचरण (propagation) के लिए माध्यम की आवश्यकता है या नहीं। इस आधार पर, तरंगें दो मुख्य प्रकार की होती हैं:


1. यांत्रिक तरंगें (Mechanical Waves)

परिभाषा:

वे तरंगें जिनके संचरण के लिए एक भौतिक माध्यम (material medium), जैसे ठोस, द्रव या गैस, की आवश्यकता होती है, यांत्रिक तरंगें कहलाती हैं।

इसका अर्थ है कि ये तरंगें निर्वात (vacuum) में यात्रा नहीं कर सकतीं, क्योंकि उन्हें कंपन करने और ऊर्जा को स्थानांतरित करने के लिए कणों की आवश्यकता होती है।

उत्पत्ति का कारण:
यांत्रिक तरंगें माध्यम के कणों में विक्षोभ (disturbance) के कारण उत्पन्न होती हैं। यह विक्षोभ माध्यम की प्रत्यास्थता (elasticity) और जड़त्व (inertia) के गुणों के कारण आगे बढ़ता है।

यांत्रिक तरंगों के प्रकार:
यांत्रिक तरंगों को आगे दो भागों में बांटा गया है (जैसा कि पहले वर्णित है):


2. अयांत्रिक तरंगें या विद्युत चुम्बकीय तरंगें (Non-mechanical or Electromagnetic Waves)

परिभाषा:

वे तरंगें जिनके संचरण के लिए किसी भी भौतिक माध्यम की आवश्यकता नहीं होती, अयांत्रिक तरंगें कहलाती हैं। ये तरंगें निर्वात (vacuum) में भी यात्रा कर सकती हैं।

इन तरंगों को सामान्यतः विद्युत चुम्बकीय तरंगें (Electromagnetic Waves – EM Waves) कहा जाता है।

उत्पत्ति का कारण:
इनका निर्माण दोलन करते हुए (accelerating) विद्युत आवेशों द्वारा होता है। इनमें दोलन करते हुए विद्युत क्षेत्र (Electric Field) और चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) होते हैं, जो एक-दूसरे के लंबवत होते हैं और तरंग संचरण की दिशा के भी लंबवत होते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ:

विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम (Electromagnetic Spectrum):
विद्युत चुम्बकीय तरंगों को उनकी तरंग दैर्ध्य (wavelength) या आवृत्ति (frequency) के आधार पर एक व्यापक स्पेक्ट्रम में वर्गीकृत किया जाता है। बढ़ते हुए तरंग दैर्ध्य (और घटती हुई आवृत्ति) के क्रम में यह स्पेक्ट्रम इस प्रकार है:

  1. गामा किरणें (Gamma Rays): सबसे अधिक ऊर्जावान।
  2. एक्स-रे (X-rays): चिकित्सा निदान में उपयोग।
  3. पराबैंगनी किरणें (Ultraviolet – UV Rays): सूर्य से आती हैं।
  4. दृश्य प्रकाश (Visible Light): वह छोटा सा हिस्सा जिसे हम देख सकते हैं (VIBGYOR – बैंगनी से लाल तक)।
  5. अवरक्त किरणें (Infrared – IR Rays): ऊष्मा विकिरण, रिमोट कंट्रोल में उपयोग।
  6. माइक्रोवेव (Microwaves): माइक्रोवेव ओवन, रडार, वाई-फाई में उपयोग।
  7. रेडियो तरंगें (Radio Waves): सबसे लंबी तरंग दैर्ध्य; रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल संचार में उपयोग।

दोनों के बीच मुख्य अंतर का सारांश

आधारयांत्रिक तरंगें (Mechanical Waves)विद्युत चुम्बकीय तरंगें (EM Waves)
माध्यम की आवश्यकताहाँ, संचरण के लिए ठोस, द्रव या गैस की आवश्यकता होती है।नहीं, ये निर्वात में भी संचरित हो सकती हैं।
प्रकृतिये अनुप्रस्थ या अनुदैर्ध्य दोनों हो सकती हैं।ये हमेशा अनुप्रस्थ होती हैं।
चाल (Speed)चाल माध्यम के गुणों (जैसे घनत्व, प्रत्यास्थता) पर निर्भर करती है और अपेक्षाकृत कम होती है।निर्वात में इनकी चाल नियत (प्रकाश की चाल) होती है (3 × 10⁸ m/s), जो बहुत अधिक है।
उत्पत्ति का कारणमाध्यम के कणों में विक्षोभ के कारण।दोलन करते हुए विद्युत आवेशों के कारण।
उदाहरणध्वनि तरंगें, जल तरंगें, रस्सी में तरंगें।प्रकाश, रेडियो तरंगें, एक्स-रे, माइक्रोवेव।

ध्वनि तरंगें (Sound Waves)

परिभाषा:
ध्वनि (Sound) एक प्रकार की ऊर्जा है जो हमारे कानों में सुनने की संवेदना उत्पन्न करती है। भौतिकी में, ध्वनि एक यांत्रिक तरंग (Mechanical Wave) है जो किसी माध्यम (जैसे हवा, पानी या ठोस) में कंपन (vibration) के रूप में यात्रा करती है।


ध्वनि तरंगों की प्रकृति (Nature of Sound Waves)

ध्वनि तरंगों की प्रकृति को समझने के लिए दो मुख्य बिंदु हैं:

1. ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है (Sound is a Mechanical Wave)

2. ध्वनि एक अनुदैर्ध्य तरंग है (Sound is a Longitudinal Wave)


ध्वनि के अभिलक्षण (Characteristics of Sound Waves)

  1. आवृत्ति (Frequency – 
    • एक सेकंड में होने वाले कंपनों की संख्या को आवृत्ति कहते हैं।
    • इसका SI मात्रक हर्ट्ज़ (Hertz – Hz) है।
    • आवृत्ति ध्वनि के तारत्व (Pitch) को निर्धारित करती है।
      • उच्च आवृत्ति = उच्च तारत्व (तीखी/पतली आवाज, जैसे मच्छर की भिनभिनाहट, सीटी)।
      • निम्न आवृत्ति = निम्न तारत्व (मोटी/भारी आवाज, जैसे शेर की दहाड़, ड्रम)।
  2. आयाम (Amplitude):
    • माध्यम के कणों का उनकी माध्य स्थिति से अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है।
    • आयाम ध्वनि की प्रबलता (Loudness) या तीव्रता (Intensity) को निर्धारित करता है।
      • अधिक आयाम = अधिक प्रबलता (तेज आवाज)।
      • कम आयाम = कम प्रबलता (धीमी आवाज)।
    • प्रबलता को डेसीबल (Decibel – dB) में मापा जाता है।
  3. तरंग दैर्ध्य (Wavelength – 
    • दो क्रमागत संपीड़नों या दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी को तरंग दैर्ध्य कहते हैं।
    • इसका SI मात्रक मीटर (m) है।
  4. ध्वनि की चाल (Speed of Sound – 
    • ध्वनि की चाल उस माध्यम की प्रकृति (घनत्व, प्रत्यास्थता, तापमान) पर निर्भर करती है जिसमें वह यात्रा कर रही है।
    • एक सामान्य नियम के अनुसार: ठोस में चाल > द्रव में चाल > गैस में चाल
      • स्टील में ~5960 m/s
      • पानी में ~1480 m/s
      • हवा में (20°C पर) ~343 m/s
    • तापमान का प्रभाव: माध्यम का तापमान बढ़ाने पर ध्वनि की चाल बढ़ जाती है।

मनुष्य में श्रवण का परास (Range of Human Hearing)

मानव कान सभी आवृत्तियों की ध्वनियों को नहीं सुन सकता।

  1. श्रव्य तरंगें (Audible Waves):
    • जिनकी आवृत्ति 20 Hz से 20,000 Hz (या 20 kHz) के बीच होती है, उन्हें मानव कान सुन सकता है।
  2. अपश्रव्य तरंगें (Infrasound):
    • जिनकी आवृत्ति 20 Hz से कम होती है।
    • उदाहरण: भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, हाथी और व्हेल द्वारा उत्पन्न ध्वनियाँ।
  3. पराश्रव्य तरंगें (Ultrasound):
    • जिनकी आवृत्ति 20,000 Hz (20 kHz) से अधिक होती है।
    • उदाहरण: चमगादड़, डॉल्फिन इसका उपयोग नेविगेशन और शिकार के लिए करते हैं।
    • अनुप्रयोग: सोनार (SONAR) में समुद्र की गहराई मापने के लिए, चिकित्सा में अल्ट्रासोनोग्राफी (USG) के लिए, और उद्योगों में सफाई और धातु दोषों का पता लगाने के लिए।

ध्वनि से संबंधित प्रमुख घटनाएँ (Major Phenomena related to Sound)


ध्वनि के अभिलक्षण: तारत्व, प्रबलता, और गुणता (Characteristics of Sound: Pitch, Loudness, and Quality)

जब हम कोई संगीत सुनते हैं या किसी की आवाज़ पहचानते हैं, तो हमारा मस्तिष्क ध्वनि की कई विशेषताओं का विश्लेषण कर रहा होता है। इनमें से तीन सबसे प्रमुख अभिलक्षण हैं – तारत्व, प्रबलता, और गुणता। ये तीनों ध्वनि तरंगों के भौतिक गुणों से सीधे संबंधित हैं।


1. तारत्व (Pitch)

परिभाषा:
तारत्व ध्वनि का वह अभिलक्षण है जो हमें यह बताता है कि कोई ध्वनि कितनी ‘तीखी’ (shrill) या कितनी ‘मोटी’ (flat/grave) है। यह हमारे मस्तिष्क द्वारा ध्वनि की आवृत्ति की व्याख्या है।

किस भौतिक गुण पर निर्भर करता है?
तारत्व सीधे ध्वनि तरंग की आवृत्ति (Frequency) पर निर्भर करता है।

आवृत्ति का अर्थ है प्रति सेकंड कंपनों की संख्या, जिसे हर्ट्ज़ (Hz) में मापा जाता है।

उदाहरण:

उच्च तारत्व (High Pitch)निम्न तारत्व (Low Pitch)
मच्छर की भिनभिनाहटशेर की दहाड़
सीटी की आवाजड्रम की आवाज
महिलाओं और बच्चों की आवाज (आमतौर पर)पुरुषों की आवाज (आमतौर पर)
वायलिन की आवाजबास गिटार की आवाज

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2. प्रबलता (Loudness)

परिभाषा:
प्रबलता ध्वनि का वह अभिलक्षण है जो यह बताता है कि कोई ध्वनि कितनी ‘तेज’ (Loud) या ‘धीमी’ (Faint) है। यह हमारे कान द्वारा ध्वनि की तीव्रता (intensity) के प्रति शारीरिक अनुक्रिया है।

किस भौतिक गुण पर निर्भर करता है?
प्रबलता सीधे ध्वनि तरंग के आयाम (Amplitude) पर निर्भर करती है। आयाम ध्वनि ऊर्जा का माप है।

आयाम का अर्थ है माध्यम के कणों का उनकी माध्य स्थिति से अधिकतम विस्थापन।

मापन:
प्रबलता को जिस इकाई में मापा जाता है उसे डेसीबल (Decibel – dB) कहते हैं। डेसीबल एक लॉगरिदमिक पैमाना है।

उदाहरण:

अधिक प्रबलता (Loud Sound)कम प्रबलता (Faint Sound)
हवाई जहाज के इंजन की आवाज (~120 dB)पत्तों की सरसराहट (~20 dB)
डीजे म्यूजिक (~110 dB)फुसफुसाहट (~30 dB)
धीरे से ड्रम बजानाजोर से ड्रम बजाना
धीरे से चिल्लानाजोर से चिल्लाना

ध्यान दें: प्रबलता और तीव्रता में थोड़ा अंतर है। तीव्रता ध्वनि ऊर्जा का एक भौतिक माप (वॉट/मीटर²) है, जबकि प्रबलता हमारे कानों की उस तीव्रता के प्रति व्यक्तिपरक (subjective) अनुभूति है।


3. गुणता या तारता (Quality or Timbre)

परिभाषा:
गुणता ध्वनि का वह अभिलक्षण है जो हमें समान प्रबलता और समान तारत्व वाली दो ध्वनियों के बीच अंतर करने में सक्षम बनाता है, जो अलग-अलग स्रोतों से उत्पन्न हुई हों।

किस भौतिक गुण पर निर्भर करता है?
गुणता ध्वनि तरंग के तरंगाकृति (Waveform) या संनादी (Harmonics) पर निर्भर करती है।

व्याख्या:
जब कोई वाद्य यंत्र (जैसे सितार) या व्यक्ति बोलता है, तो वे एक शुद्ध आवृत्ति (जिसे मूल आवृत्ति या Fundamental कहते हैं) के साथ-साथ कई अन्य उच्च आवृत्तियों (जिन्हें अधिस्वरक (Overtones) या संनादी (Harmonics) कहते हैं) का भी उत्पादन करते हैं।

प्रत्येक ध्वनि स्रोत में इन संनादियों का मिश्रण और उनकी सापेक्ष तीव्रता अलग-अलग होती है, जो उस ध्वनि को एक विशिष्ट “रंग” या “बनावट” प्रदान करती है। यही गुणता है।

उदाहरण:


संक्षेप में


ध्वनि के अनुप्रयोग: सोनार (SONAR) और अल्ट्रासाउंड (Ultrasound)

उच्च आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगें, जिन्हें पराश्रव्य तरंगें (Ultrasonic Waves) कहा जाता है (आवृत्ति > 20,000 Hz), मानव कानों के लिए अश्रव्य होती हैं, लेकिन इनके विशिष्ट गुणों के कारण प्रौद्योगिकी और चिकित्सा में इनके अनेक महत्वपूर्ण अनुप्रयोग हैं। सोनार और अल्ट्रासाउंड इसी तकनीक पर आधारित दो प्रमुख अनुप्रयोग हैं।


1. सोनार (SONAR)

पूरा नाम: Sound Navigation and Ranging (ध्वनि नौसंचालन और परासन)

सिद्धांत:
सोनार ध्वनि के परावर्तन (reflection of sound) के सिद्धांत पर कार्य करता है, जिसे प्रतिध्वनि-परासन (Echo-ranging) भी कहते हैं।

यह कैसे काम करता है?

  1. प्रेषण (Transmission): सोनार उपकरण में एक प्रेषित्र (Transmitter) होता है, जो पानी के नीचे उच्च आवृत्ति वाली पराश्रव्य ध्वनि तरंगें उत्पन्न करता है और उन्हें सभी दिशाओं में या एक विशिष्ट दिशा में भेजता है।
  2. परावर्तन (Reflection): ये ध्वनि तरंगें पानी में यात्रा करती हैं। जब वे किसी वस्तु (जैसे पनडुब्बी, चट्टान, मछलियों का झुंड, या समुद्र तल) से टकराती हैं, तो वे वहां से परावर्तित होकर वापस लौटती हैं।
  3. अभिग्रहण (Reception): उपकरण में एक अभिग्राहक (Receiver or Detector) भी होता है जो इन परावर्तित तरंगों (प्रतिध्वनि या Echo) को ग्रहण करता है।
  4. गणना (Calculation): सोनार उपकरण, पराश्रव्य तरंगों के भेजने और प्रतिध्वनि के वापस लौटने के बीच लगे समय ( को मापता है। पानी में ध्वनि की चाल (v) पहले से ज्ञात होती है। इस जानकारी का उपयोग करके, वस्तु की दूरी (d) की गणना की जा सकती है।
    • सूत्र: 2d = v × t या d = (v × t) / 2
      (दूरी को दोगुना (2d) इसलिए लिया जाता है क्योंकि ध्वनि तरंग ने जाने और आने में कुल दूरी तय की है।)

उपयोग (Applications):


2. अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) या पराश्रव्य

सिद्धांत:
अल्ट्रासाउंड तकनीक भी पराश्रव्य तरंगों के परावर्तन के सिद्धांत पर आधारित है। यह मानव शरीर के कोमल ऊतकों (soft tissues) और अंगों की छवियां (images) बनाने के लिए उपयोग की जाती है।

यह कैसे काम करता है (चिकित्सा में)?

  1. ट्रांसड्यूसर (Transducer): एक हाथ में पकड़ने वाला उपकरण (जिसे प्रोब या ट्रांसड्यूसर कहा जाता है) शरीर के उस हिस्से पर रखा जाता है जिसकी जांच करनी होती है। यह ट्रांसड्यूसर पराश्रव्य ध्वनि तरंगें उत्पन्न करता है और उन्हें शरीर के अंदर भेजता है।
  2. परावर्तन और अभिग्रहण: ये ध्वनि तरंगें शरीर के अंदर यात्रा करती हैं और विभिन्न अंगों, ऊतकों, या तरल पदार्थों की सीमाओं से टकराकर वापस परावर्तित होती हैं। ट्रांसड्यूसर ही इन लौटती हुई प्रतिध्वनियों को ग्रहण करता है।
  3. छवि निर्माण (Image Creation): कंप्यूटर इन प्रतिध्वनियों के समय और तीव्रता का विश्लेषण करता है। अलग-अलग ऊतक ध्वनि को अलग-अलग तरीके से परावर्तित करते हैं। इस जानकारी का उपयोग करके, कंप्यूटर एक वास्तविक समय (real-time) की छवि बनाता है जिसे स्क्रीन पर देखा जा सकता है। इस छवि को सोनोग्राम (Sonogram) कहते हैं।

चिकित्सा में उपयोग (Medical Applications):

अन्य औद्योगिक उपयोग (Other Industrial Applications):


ध्वनि के प्रभाव: प्रतिध्वनि (Echo) और डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect)

ये दोनों ध्वनि से संबंधित बहुत ही रोचक और महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं, जिनका हम अपने दैनिक जीवन में अक्सर अनुभव करते हैं।


1. प्रतिध्वनि (Echo)

परिभाषा:

जब कोई ध्वनि तरंग किसी दूर स्थित सतह (जैसे दीवार, पहाड़ या इमारत) से परावर्तित (reflect) होकर हमें मूल ध्वनि के बाद स्पष्ट रूप से अलग सुनाई देती है, तो इस परावर्तित ध्वनि को प्रतिध्वनि कहते हैं।

यह प्रकाश के परावर्तन के समान ही है, जहाँ ध्वनि भी एक बाधा से टकराकर वापस लौटती है।

प्रतिध्वनि सुनने के लिए आवश्यक शर्तें:

हमारे मस्तिष्क में किसी भी ध्वनि की संवेदना लगभग 0.1 सेकंड तक बनी रहती है। इस प्रभाव को श्रुतिनिर्बंध (Persistence of Hearing) कहते हैं। एक स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए, मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि के हमारे कानों तक पहुँचने के बीच का समय अंतराल कम से कम 0.1 सेकंड होना चाहिए।

यदि यह अंतराल 0.1 सेकंड से कम होता है, तो हमारा मस्तिष्क दोनों ध्वनियों को अलग-अलग नहीं पहचान पाता और वे आपस में मिल जाती हैं।

स्रोत और अवरोध के बीच न्यूनतम दूरी की गणना:

  1. समय (t): ध्वनि के परावर्तित होकर वापस आने में लगने वाला न्यूनतम समय = 0.1 सेकंड।
  2. हवा में ध्वनि की चाल (v): लगभग 344 मीटर/सेकंड (20°C पर)।
  3. तय की गई कुल दूरी: ध्वनि स्रोत से अवरोध तक जाती है और फिर वापस आती है। यदि स्रोत और अवरोध के बीच की दूरी d है, तो कुल दूरी = d + d = 2d।
  4. सूत्र: दूरी = चाल × समय
    2d = v × t
    2d = 344 m/s × 0.1 s
    2d = 34.4 मीटर
    d = 34.4 / 2
    d = 17.2 मीटर

निष्कर्ष: एक स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए ध्वनि के स्रोत और परावर्तक सतह के बीच न्यूनतम दूरी लगभग 17.2 मीटर (लगभग 56 फीट) होनी चाहिए।

अनुप्रयोग:


2. डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect)

परिभाषा:

जब ध्वनि के स्रोत (source) और श्रोता (observer) के बीच एक सापेक्ष गति (relative motion) होती है, तो श्रोता द्वारा सुनी जाने वाली ध्वनि की आवृत्ति (frequency) में एक आभासी परिवर्तन (apparent change) होता है। इस घटना को डॉप्लर प्रभाव कहते हैं।

डॉप्लर प्रभाव की स्थितियाँ:

  1. जब स्रोत श्रोता के पास आ रहा हो:
    • क्या होता है: ध्वनि तरंगें एक-दूसरे के करीब दब जाती हैं (तरंग दैर्ध्य कम हो जाता है)।
    • परिणाम: श्रोता को बढ़ी हुई आवृत्ति और उच्च तारत्व (तीखी आवाज) सुनाई देती है।
  2. जब स्रोत श्रोता से दूर जा रहा हो:
    • क्या होता है: ध्वनि तरंगें एक-दूसरे से दूर फैल जाती हैं (तरंग दैर्ध्य बढ़ जाता है)।
    • परिणाम: श्रोता को घटी हुई आवृत्ति और निम्न तारत्व (मोटी आवाज) सुनाई देती है।

यही प्रभाव तब भी होता है जब स्रोत स्थिर हो और श्रोता गति कर रहा हो।

दैनिक जीवन में उदाहरण:

अनुप्रयोग:


मैक संख्या (Mach Number)

परिभाषा:
मैक संख्या (Mach Number) एक विमाहीन राशि (dimensionless quantity) है जो किसी वस्तु की चाल की तुलना, उस माध्यम में ध्वनि की चाल से करती है जिसमें वह वस्तु गति कर रही है।

इसका उपयोग मुख्य रूप से उन वस्तुओं की गति का वर्णन करने के लिए किया जाता है जो बहुत तेज चलती हैं, जैसे हवाई जहाज, रॉकेट, मिसाइल या कोई भी वस्तु जो ध्वनि की गति के करीब या उससे अधिक गति से यात्रा करती है।

इसका नाम ऑस्ट्रियाई भौतिक विज्ञानी और दार्शनिक अर्न्स्ट मैक (Ernst Mach) के नाम पर रखा गया है।

सूत्र:

M = v / a

जहाँ:

महत्वपूर्ण बिंदु:


गति का वर्गीकरण मैक संख्या के आधार पर

मैक संख्या के आधार पर, किसी वस्तु की गति को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:

1. सबसोनिक (Subsonic)

2. ट्रांसोनिक (Transonic)

3. सुपरसोनिक (Supersonic)

4. हाइपरसोनिक (Hypersonic)


सारांश तालिका

वर्गीकरणमैक संख्या (M)वस्तु की चाल (v) vs ध्वनि की चाल (a)
सबसोनिक (Subsonic)M < 1v < a (चाल ध्वनि से कम)
ट्रांसोनिक (Transonic)0.8 < M < 1.2v ≈ a (चाल ध्वनि के करीब)
सुपरसोनिक (Supersonic)1 < M < 5v > a (चाल ध्वनि से अधिक)
हाइपरसोनिक (Hypersonic)M > 5v >> a (चाल ध्वनि से बहुत अधिक)


प्रकाशिकी (Optics)

प्रकाश की प्रकृति (Nature of Light)

प्रकाश की प्रकृति भौतिकी के सबसे दिलचस्प और मौलिक सवालों में से एक रही है। सदियों तक वैज्ञानिक इस बात पर बहस करते रहे कि प्रकाश वास्तव में है क्या – क्या यह कणों की एक धारा है या एक तरंग? आधुनिक भौतिकी हमें बताती है कि इसका उत्तर आश्चर्यजनक रूप से जटिल और आकर्षक है।

संक्षेप में, प्रकाश की दोहरी प्रकृति (Dual Nature) होती है। इसका अर्थ है कि यह कुछ परिस्थितियों में कण (Particle) की तरह और कुछ अन्य परिस्थितियों में तरंग (Wave) की तरह व्यवहार करता है।

इस दोहरी प्रकृति को समझने के लिए, हमें ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और उन प्रयोगों को देखना होगा जिन्होंने इस अवधारणा को जन्म दिया।


1. प्रकाश का कणिका सिद्धांत (Particle Theory of Light)


2. प्रकाश का तरंग सिद्धांत (Wave Theory of Light)


3. आधुनिक क्वांटम सिद्धांत: दोहरी प्रकृति का समाधान

20वीं सदी की शुरुआत में, भौतिकी में एक क्रांति आई जिसने प्रकाश की प्रकृति की हमारी समझ को हमेशा के लिए बदल दिया।

फोटॉन (Photon):
एक फोटॉन प्रकाश का एक ऊर्जा पैकेट या कण है। प्रत्येक फोटॉन में एक निश्चित मात्रा में ऊर्जा होती है, जो उसकी आवृत्ति (या रंग) पर निर्भर करती है।

ऊर्जा (E) = h × आवृत्ति (f)
(जहाँ h प्लैंक नियतांक है)

इस प्रकार, प्रकाश-विद्युत प्रभाव यह साबित करता है कि प्रकाश कणों (फोटॉनों) की तरह व्यवहार करता है।

निष्कर्ष: प्रकाश की वास्तविक प्रकृति क्या है?

आधुनिक भौतिकी का निष्कर्ष है कि प्रकाश वास्तव में एक क्वांटम-यांत्रिक इकाई है जिसकी प्रकृति द्वैत (dual) है।

प्रकाश एक ही समय में तरंग और कण दोनों के गुण प्रदर्शित करता है।

** complementarity का सिद्धांत:** एक प्रयोग में हम प्रकाश के या तो तरंग स्वरूप को देख सकते हैं या कण स्वरूप को, लेकिन दोनों को एक साथ कभी नहीं। हम कौन सा प्रयोग चुनते हैं, यह तय करता है कि प्रकाश हमें अपना कौन सा चेहरा दिखाएगा।


तुलनात्मक सारांश

तरंग प्रकृति (Wave Nature)कण प्रकृति (Particle Nature)
प्रकाश विद्युत चुम्बकीय तरंग (Electromagnetic Wave) है।प्रकाश फोटॉन (Photons) नामक ऊर्जा के पैकेटों से बना है।
किन घटनाओं की व्याख्या करता है:किन घटनाओं की व्याख्या करता है:
• व्यतिकरण (Interference)• प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect)
• विवर्तन (Diffraction)• कॉम्पटन प्रभाव (Compton Effect)
• ध्रुवण (Polarization)• प्रकाश का सीधा चलना (Rectilinear Propagation)
• परावर्तन और अपवर्तन• परावर्तन और अपवर्तन

प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light)

परिभाषा:

जब प्रकाश की किरणें किसी चिकनी और चमकदार सतह (जैसे दर्पण) पर आपतित होती हैं, तो उनका अधिकांश भाग उस सतह से टकराकर उसी माध्यम में वापस लौट आता है। इस घटना को प्रकाश का परावर्तन कहते हैं।


परावर्तन से संबंधित महत्वपूर्ण पद

परावर्तन के नियमों को समझने से पहले, निम्नलिखित पदों को जानना आवश्यक है:


परावर्तन के नियम (Laws of Reflection)

प्रकाश का परावर्तन दो बहुत ही सरल और सार्वभौमिक नियमों का पालन करता है। ये नियम सभी प्रकार की परावर्तक सतहों (चाहे समतल हो या गोलीय) और सभी प्रकार की तरंगों के लिए सत्य हैं।

पहला नियम:

आपतन कोण (
∠i = ∠r

दूसरा नियम:

आपतित किरण, परावर्तित किरण, और आपतन बिंदु पर खींचा गया अभिलंब, तीनों एक ही तल (same plane) में स्थित होते हैं।


परावर्तन के प्रकार (Types of Reflection)

परावर्तक सतह की प्रकृति के आधार पर परावर्तन दो प्रकार का होता है:

  1. नियमित परावर्तन (Regular Reflection):
    • कब होता है: जब प्रकाश की समांतर किरणें किसी चिकनी और समतल सतह (जैसे समतल दर्पण, शांत जल की सतह) पर पड़ती हैं।
    • परिणाम: परावर्तन के बाद भी सभी किरणें एक-दूसरे के समांतर ही रहती हैं और एक निश्चित दिशा में जाती हैं।
    • प्रभाव: इसी प्रकार के परावर्तन के कारण हमें प्रतिबिंब (images) दिखाई देते हैं।
  2. विसरित या अनियमित परावर्तन (Diffused or Irregular Reflection):
    • कब होता है: जब प्रकाश की समांतर किरणें किसी खुरदरी या अनियमित सतह (जैसे दीवार, कागज, किताब, मेज) पर पड़ती हैं।
    • परिणाम: सतह के हर बिंदु पर अभिलंब की दिशा अलग-अलग होने के कारण, प्रकाश किरणें परावर्तन के बाद सभी संभव दिशाओं में बिखर जाती हैं। यहाँ भी परावर्तन के नियम हर बिंदु पर लागू होते हैं, लेकिन सतह की अनियमितता के कारण परिणामी किरणें समांतर नहीं रहतीं।
    • प्रभाव: विसरित परावर्तन के कारण ही हम उन वस्तुओं को देख पाते हैं जो स्वयं प्रकाश का स्रोत नहीं हैं (जैसे कुर्सी, मेज, किताबें)। सूर्य का प्रकाश इन वस्तुओं पर पड़ता है और सभी दिशाओं में विसरित होकर हमारी आँखों तक पहुँचता है, जिससे वे वस्तुएँ हमें दिखाई देती हैं। हमारे आस-पास की अधिकांश वस्तुएँ हमें इसी परावर्तन के कारण दिखाई देती हैं।

दर्पण (Mirrors): समतल और गोलीय दर्पण

अवधारणा: दर्पण एक चिकनी, पॉलिश की हुई परावर्तक सतह है जो अपने पर आपतित होने वाले अधिकांश प्रकाश को परावर्तित (Reflects) कर देती है, जिससे किसी वस्तु का प्रतिबिंब (Image) बनता है।


1. समतल दर्पण (Plane Mirror)

यह एक सीधी और समतल परावर्तक सतह होती है, जिसका उपयोग हम आमतौर पर घरों में चेहरा देखने के लिए करते हैं।

समतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब की विशेषताएं

(यह खंड प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है)

क्र.विशेषता (Characteristic)विवरण (Description)
1.प्रकृति (Nature)प्रतिबिंब हमेशा आभासी (Virtual) और सीधा (Erect) होता है। <br> (आभासी प्रतिबिंब का अर्थ है कि इसे पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता)।
2.आकार (Size)प्रतिबिंब का आकार वस्तु (बिम्ब) के आकार के ठीक बराबर होता है (h’ = h)।
3.दूरी (Distance)प्रतिबिंब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है, जितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने होती है (v = u)।
4.पार्श्व परावर्तन (Lateral Inversion)प्रतिबिंब में वस्तु का बायाँ भाग दायाँ और दायाँ भाग बायाँ दिखाई देता है।

उपयोग (Uses):

एक महत्वपूर्ण तथ्य: AMBULANCE शब्द वाहनों पर पार्श्व परावर्तित रूप में लिखा जाता है ताकि आगे के वाहनों के चालक अपने साइड मिरर में उसे सीधा पढ़ सकें


2. गोलीय दर्पण (Spherical Mirrors)

ये दर्पण एक खोखले गोले के परावर्तक भाग होते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं:

दर्पण का प्रकारअवतल दर्पण (Concave Mirror)उत्तल दर्पण (Convex Mirror)
पहचानपरावर्तक सतह अंदर की ओर धँसी होती है (गुफा की तरह)।परावर्तक सतह बाहर की ओर उभरी होती है।
प्रकाश पर प्रभावयह समांतर प्रकाश किरणों को एक बिंदु (फोकस) पर एकत्रित (Converges) करता है।यह समांतर प्रकाश किरणों को फैला (Diverges) देता है।
अन्य नामअभिसारी दर्पण (Converging Mirror)अपसारी दर्पण (Diverging Mirror)
आरेख

(A) अवतल दर्पण (Concave Mirror)

उपयोग (Uses of Concave Mirror): (परीक्षाओं में सबसे अधिक पूछा जाने वाला भाग)

उपयोगकारण / कार्यप्रणाली
दाढ़ी बनाने वाले शीशे (Shaving Mirrors) और मेकअप मिररजब चेहरे को फोकस (F) और ध्रुव (P) के बीच रखा जाता है, तो यह चेहरे का एक बड़ा, सीधा और आभासी प्रतिबिंब बनाता है, जिससे बारीक विवरण देखना आसान हो जाता है।
दंत चिकित्सक (Dentists) और ENT विशेषज्ञों द्वारादांतों, गले आदि का एक बड़ा और आवर्धित प्रतिबिंब देखने के लिए।
टॉर्च, सर्चलाइट और वाहनों की हेडलाइट्स मेंप्रकाश स्रोत (बल्ब) को दर्पण के मुख्य फोकस (F) पर रखा जाता है, जिससे परावर्तन के बाद एक शक्तिशाली, समांतर प्रकाश किरण पुंज प्राप्त होता है जो दूर तक जाता है।
सौर भट्टियों (Solar Furnaces) मेंसूर्य से आने वाली समांतर किरणों को एक बिंदु (फोकस) पर केंद्रित करके अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न करने के लिए।

प्रतिबिंब की प्रकृति: अवतल दर्पण वास्तविक और उल्टा (अधिकांश मामलों में) और आभासी और सीधा (एक विशेष मामले में) दोनों प्रकार के प्रतिबिंब बना सकता है। यह वस्तु के आकार से छोटा, बराबर और बड़ा प्रतिबिंब बना सकता है।


(B) उत्तल दर्पण (Convex Mirror)

उपयोग (Uses of Convex Mirror): (यह भी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है)

उपयोगकारण / कार्यप्रणाली
वाहनों के साइड मिरर / पश्च-दृश्य दर्पण (Rear-view Mirrors)इसके दो मुख्य कारण हैं: <br> 1. विस्तृत दृष्टि क्षेत्र (Wider Field of View): यह बाहर की ओर उभरा होता है, जिससे ड्राइवर अपने पीछे के एक बहुत बड़े क्षेत्र का दृश्य देख सकता है। <br> 2. सीधा और छोटा प्रतिबिंब: यह हमेशा एक सीधा प्रतिबिंब बनाता है और वस्तु से छोटा होता है, जिससे अधिक वाहन दर्पण में देखे जा सकते हैं।
सुरक्षा दर्पण (Security Mirrors)दुकानों, एटीएम और तंग सड़क मोड़ों पर बड़े क्षेत्र की निगरानी (surveillance) के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रतिबिंब की प्रकृति: उत्तल दर्पण हमेशा (always) वस्तु का एक छोटा, सीधा और आभासी प्रतिबिंब ही बनाता है, चाहे वस्तु कहीं भी रखी हो।


संक्षेप में उपयोगों की सारणी

दर्पण का प्रकारप्रमुख उपयोगप्रतिबिंब की प्रकृति
समतल (Plane)चेहरा देखना, पेरिस्कोपआभासी, सीधा, समान आकार
अवतल (Concave)दाढ़ी का शीशा, डॉक्टर, टॉर्च/हेडलाइट, सौर भट्टीवास्तविक/आभासी, उल्टा/सीधा, बड़ा/छोटा/समान
उत्तल (Convex)वाहनों का साइड मिरर, सुरक्षा दर्पणआभासी, सीधा, हमेशा छोटा

प्रकाश का अपवर्तन (Refraction of Light)

परिभाषा:

जब प्रकाश की किरण एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में तिरछा (obliquely) प्रवेश करती है, तो वह दोनों माध्यमों को अलग करने वाली सतह पर अपने पथ से विचलित हो जाती है (मुड़ जाती है)। प्रकाश के मुड़ने की इस घटना को प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।

अपवर्तन का कारण:
अपवर्तन का मूल कारण विभिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल का अलग-अलग होना है। जब प्रकाश एक ऐसे माध्यम में प्रवेश करता है जहाँ उसकी चाल बदल जाती है, तो वह मुड़ जाता है।


अपवर्तन से संबंधित पद

अपवर्तन के नियम को समझने के लिए संबंधित पद परावर्तन के समान ही हैं, बस परावर्तित किरण की जगह “अपवर्तित किरण” होती है।


अपवर्तन के नियम (Laws of Refraction)

प्रकाश का अपवर्तन, परावर्तन की तरह ही, दो निश्चित नियमों का पालन करता है।

पहला नियम:

आपतित किरण, अपवर्तित किरण, और दोनों माध्यमों को अलग करने वाली सतह के आपतन बिंदु पर खींचा गया अभिलंब, तीनों एक ही तल (same plane) में स्थित होते हैं।

यह नियम परावर्तन के दूसरे नियम के समान है। इसका अर्थ है कि ये तीनों रेखाएँ एक ही 2D सतह पर होती हैं।

दूसरा नियम: स्नेल का नियम (Snell’s Law)

यह नियम अपवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण नियम है और यह बताता है कि प्रकाश की किरण कितनी मुड़ेगी।

नियम का कथन:

“किन्हीं दो माध्यमों के युग्म के लिए और प्रकाश के किसी निश्चित रंग (या तरंग दैर्ध्य) के लिए, आपतन कोण की ज्या (sine of the angle of incidence) का अपवर्तन कोण की ज्या (sine of the angle of refraction) से अनुपात एक स्थिरांक (constant) होता है।”

इस स्थिरांक को पहले माध्यम के सापेक्ष दूसरे माध्यम का अपवर्तनांक (Refractive Index) कहते हैं।

गणितीय रूप:

(sin i) / (sin r) = स्थिरांक (n₂₁)

जहाँ:


प्रकाश किरण का व्यवहार

अपवर्तन के दौरान प्रकाश किरण के मुड़ने की दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वह विरल से सघन माध्यम में जा रही है या सघन से विरल माध्यम में।

  1. जब प्रकाश विरल माध्यम से सघन माध्यम में प्रवेश करता है (जैसे हवा से पानी में):
    • प्रकाश की चाल कम हो जाती है।
    • प्रकाश किरण अभिलंब की ओर (towards the normal) झुक जाती है।
    • इस स्थिति में, ∠i > ∠r।
  2. जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करता है (जैसे पानी से हवा में):
    • प्रकाश की चाल बढ़ जाती है।
    • प्रकाश किरण अभिलंब से दूर (away from the normal) हट जाती है।
    • इस स्थिति में, ∠r > ∠i।
  3. जब प्रकाश लंबवत आपतित होता है (i = 0°):
    • प्रकाश किरण बिना मुड़े सीधे निकल जाती है। इस स्थिति में अपवर्तन नहीं होता।

अपवर्तनांक (Refractive Index – n)

परिभाषा:
अपवर्तनांक किसी माध्यम का वह गुण है जो यह बताता है कि उस माध्यम में प्रकाश की चाल कितनी कम हो जाएगी। यह प्रकाश को मोड़ने की क्षमता का एक माप है।

अपवर्तनांक के प्रकार:

  1. सापेक्ष अपवर्तनांक (Relative Refractive Index):
    • जब प्रकाश माध्यम 1 से माध्यम 2 में जाता है, तो माध्यम 2 का अपवर्तनांक माध्यम 1 के सापेक्ष इस प्रकार परिभाषित होता है:
      n₂₁ = (माध्यम 1 में प्रकाश की चाल) / (माध्यम 2 में प्रकाश की चाल) = v₁ / v₂
  2. निरपेक्ष अपवर्तनांक (Absolute Refractive Index):
    • जब पहला माध्यम निर्वात (vacuum) या वायु हो, तो किसी माध्यम का अपवर्तनांक उसका निरपेक्ष अपवर्तनांक कहलाता है।
      n = (निर्वात में प्रकाश की चाल, c) / (माध्यम में प्रकाश की चाल, v)
      n = c / v

महत्वपूर्ण बिंदु:


लेंस (Lenses): उत्तल और अवतल लेंस

लेंस एक पारदर्शी प्रकाशीय माध्यम होता है जो दो सतहों से घिरा होता है, जिसमें से कम से कम एक सतह गोलीय (वक्रित) होती है। लेंस प्रकाश के अपवर्तन (refraction) के सिद्धांत पर कार्य करते हैं।


लेंस के प्रकार (Types of Lenses)

मुख्य रूप से दो प्रकार के गोलीय लेंस होते हैं:

1. उत्तल लेंस (Convex Lens)

2. अवतल लेंस (Concave Lens)


उत्तल लेंस द्वारा प्रतिबिम्ब का निर्माण (Image Formation)

उत्तल लेंस द्वारा बना प्रतिबिंब वस्तु की स्थिति पर निर्भर करता है (यह अवतल दर्पण के समान व्यवहार करता है)।

वस्तु की स्थितिप्रतिबिंब की स्थितिप्रतिबिंब का आकारप्रतिबिंब की प्रकृति
अनंत परफोकस (F₂) परअत्यधिक छोटा (बिंदु आकार)वास्तविक एवं उल्टा
2F₁ से परेF₂ और 2F₂ के बीचछोटावास्तविक एवं उल्टा
2F₁ पर2F₂ परसमान आकारवास्तविक एवं उल्टा
F₁ और 2F₁ के बीच2F₂ से परेबड़ा (विवर्धित)वास्तविक एवं उल्टा
F₁ परअनंत परअत्यधिक बड़ावास्तविक एवं उल्टा
O और F₁ के बीच (महत्वपूर्ण)लेंस के उसी तरफबड़ा (विवर्धित)आभासी एवं सीधा

उत्तल लेंस के उपयोग (Uses)

  1. आवर्धक लेंस (Magnifying Glass): जब किसी छोटी वस्तु (जैसे किताब के अक्षर) को लेंस के प्रकाशिक केंद्र (O) और फोकस (F₁) के बीच रखा जाता है, तो उत्तल लेंस उसका एक बड़ा, सीधा और आभासी प्रतिबिंब बनाता है।
  2. मानव नेत्र: हमारी आँख में एक उत्तल लेंस होता है जो रेटिना पर वस्तुओं का वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनाता है।
  3. दृष्टि दोष सुधार: दूर-दृष्टि दोष (Hypermetropia) को ठीक करने के लिए, जिसमें व्यक्ति को दूर की वस्तुएँ तो साफ दिखती हैं पर पास की नहीं, उत्तल लेंस के चश्मे का उपयोग किया जाता है।
  4. कैमरा: कैमरे में एक उत्तल लेंस होता है जो सेंसर (पहले फिल्म) पर वस्तु का एक छोटा, वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनाता है।
  5. सूक्ष्मदर्शी (Microscopes) और दूरदर्शी (Telescopes): इन प्रकाशीय यंत्रों में अत्यधिक आवर्धन प्राप्त करने के लिए उत्तल लेंसों के संयोजन का उपयोग किया जाता है।
  6. प्रोजेक्टर (Projectors): स्लाइड का बड़ा, वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब पर्दे पर बनाने के लिए।

अवतल लेंस द्वारा प्रतिबिम्ब का निर्माण (Image Formation)

अवतल लेंस हमेशा वस्तु का एक छोटा, सीधा और आभासी प्रतिबिंब बनाता है। प्रतिबिंब हमेशा लेंस के प्रकाशिक केंद्र (O) और फोकस (F₁) के बीच, वस्तु की तरफ ही बनता है, चाहे वस्तु कहीं भी रखी हो।

अवतल लेंस के उपयोग (Uses)

  1. दृष्टि दोष सुधार: निकट-दृष्टि दोष (Myopia) को ठीक करने के लिए, जिसमें व्यक्ति को पास की वस्तुएँ तो साफ दिखती हैं पर दूर की नहीं, अवतल लेंस के चश्मे का उपयोग किया जाता है। यह लेंस दूर से आने वाली किरणों को थोड़ा फैला देता है ताकि आँख का लेंस उन्हें सही ढंग से रेटिना पर केंद्रित कर सके।
  2. गैलीलियन दूरदर्शी (Galilean Telescope): इसमें अवतल लेंस का उपयोग नेत्रिका (eyepiece) के रूप में किया जाता है।
  3. लेजर और बीम एक्सपैंडर: लेजर बीम को फैलाने के लिए अवतल लेंस का उपयोग होता है।
  4. दरवाजे में लगे स्पाईहोल (Peepholes): दरवाजे में लगे व्यूफ़ाइंडर में एक अवतल लेंस होता है, जो बाहर खड़े व्यक्ति का एक छोटा और सीधा प्रतिबिंब बनाता है और देखने वाले को एक व्यापक दृष्टि क्षेत्र (wider field of view) प्रदान करता है।

संक्षेप में उपयोग

लेंस का प्रकारप्रमुख उपयोगउपयोग का कारण
उत्तल (Convex)आवर्धक लेंस, कैमरा, सूक्ष्मदर्शी, दूर-दृष्टि दोषबड़ा प्रतिबिंब (आभासी/वास्तविक) बनाना और किरणों को अभिसरित करना।
अवतल (Concave)निकट-दृष्टि दोष, स्पाईहोलकिरणों को अपसरित करना और छोटा, सीधा, आभासी प्रतिबिंब बनाना।

लेंस की क्षमता (Power of Lens) – डायोप्टर

अवधारणा:
आपने देखा होगा कि कुछ लोगों के चश्मे का नंबर “+2.0” होता है और कुछ का “-1.5″। यह “नंबर” वास्तव में उस चश्मे में लगे लेंस की क्षमता (Power of a Lens) को दर्शाता है।

लेंस की क्षमता इस बात का माप है कि कोई लेंस अपने पर पड़ने वाली प्रकाश की किरणों को कितना अधिक अभिसरित (converge) या अपसरित (diverge) करता है।


लेंस की क्षमता की परिभाषा

परिभाषा:

“किसी लेंस की क्षमता ( उसकी फोकस दूरी ( के व्युत्क्रम (reciprocal) के बराबर होती है, जब फोकस दूरी को मीटर में मापा गया हो।”

इसका मतलब है कि लेंस की क्षमता और उसकी फोकस दूरी में उल्टा संबंध है।

सूत्र:

P = 1 / f (जब f मीटर में हो)

जहाँ:

मुख्य बिंदु:

  1. फोकस दूरी जितनी कम, क्षमता उतनी अधिक:
    • एक मोटे (अधिक वक्रता वाले) लेंस की फोकस दूरी कम होती है। वह किरणों को बहुत अधिक मोड़ता है, इसलिए उसकी क्षमता अधिक होती है।
    • एक पतले (कम वक्रता वाले) लेंस की फोकस दूरी अधिक होती है। वह किरणों को कम मोड़ता है, इसलिए उसकी क्षमता कम होती है।
  2. फोकस दूरी मीटर में: सूत्र का उपयोग करते समय यह सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि फोकस दूरी मीटर में हो। यदि यह सेंटीमीटर में दी गई है, तो पहले उसे मीटर में बदलें (cm को 100 से भाग देकर)।

क्षमता का मात्रक: डायोप्टर (Dioptre)

लेंस की क्षमता का SI मात्रक डायोप्टर है। इसे D अक्षर से दर्शाया जाता है।

1 डायोप्टर की परिभाषा:

1 डायोप्टर ( उस लेंस की क्षमता है जिसकी फोकस दूरी 1 मीटर हो।

1 D = 1 m⁻¹


उत्तल और अवतल लेंस की क्षमता (Power of Convex and Concave Lenses)

लेंस की क्षमता धनात्मक (+) या ऋणात्मक (-) हो सकती है, जो यह दर्शाता है कि लेंस अभिसारी है या अपसारी। यह चिन्ह परिपाटी (sign convention) पर आधारित है।

1. उत्तल लेंस (Convex Lens) की क्षमता:

2. अवतल लेंस (Concave Lens) की क्षमता:


लेंसों के संयोजन की कुल क्षमता (Total Power of Lens Combination)

यदि कई पतले लेंसों को एक-दूसरे के संपर्क में रखा जाता है, तो उस संयोजन (combination) की कुल क्षमता उन सभी लेंसों की व्यक्तिगत क्षमताओं के साधारण बीजगणितीय योग (simple algebraic sum) के बराबर होती है।

सूत्र:

P_कुल = P₁ + P₂ + P₃ + …

उदाहरण:
यदि एक +2.0 D क्षमता वाले उत्तल लेंस और एक -1.0 D क्षमता वाले अवतल लेंस को संपर्क में रखा जाता है, तो संयोजन की कुल क्षमता होगी:
P_कुल = (+2.0 D) + (-1.0 D) = +1.0 D
यह संयोजन एक +1.0 D क्षमता वाले उत्तल लेंस की तरह व्यवहार करेगा।

चश्मे बनाने वाले (ऑप्टिशियन) इसी सिद्धांत का उपयोग करके विभिन्न लेंसों को मिलाकर सही नंबर का चश्मा बनाते हैं।


प्रकाश के अपवर्तन के व्यावहारिक उदाहरण

प्रकाश का अपवर्तन (Refraction of Light) एक आकर्षक घटना है जिसके कई प्रभाव हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं। जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाता है और मुड़ता है, तो यह हमारी आँखों को भ्रमित कर सकता है, जिससे वस्तुएँ अपनी वास्तविक स्थिति से अलग दिखाई देती हैं। यहाँ कुछ प्रमुख व्यावहारिक उदाहरण दिए गए हैं:


1. पानी में आंशिक रूप से डूबी हुई छड़ (या पेंसिल) का मुड़ा हुआ दिखना

घटना:
जब हम एक सीधी छड़ या पेंसिल को पानी से भरे गिलास में आंशिक रूप से डुबोते हैं, तो पानी की सतह पर, जहाँ हवा और पानी मिलते हैं, छड़ मुड़ी हुई या टूटी हुई प्रतीत होती है। साथ ही, पानी के अंदर का हिस्सा छोटा और थोड़ा ऊपर उठा हुआ भी दिखाई देता है।

वैज्ञानिक कारण:


2. पानी के टब या तालाब की तली का ऊपर उठा हुआ दिखना

घटना:
किसी पानी से भरे टब, बाल्टी या एक साफ तालाब की तली (bottom) हमें उसकी वास्तविक गहराई से कम गहरी दिखाई देती है।

वैज्ञानिक कारण:


3. तारों का टिमटिमाना (Twinkling of Stars)

घटना:
रात में जब हम तारों को देखते हैं, तो वे स्थिर रूप से चमकते हुए नहीं, बल्कि टिमटिमाते (flashing or twinkling) हुए दिखाई देते हैं।

वैज्ञानिक कारण:

ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते?


अन्य उदाहरण:


प्रकाश का प्रकीर्णन (Scattering of Light)

परिभाषा:

जब प्रकाश किसी ऐसे माध्यम से होकर गुजरता है जिसमें धूल, धुएं या गैसों के अत्यंत सूक्ष्म कण मौजूद होते हैं, तो इन कणों द्वारा प्रकाश को अवशोषित करके फिर उसे सभी संभव दिशाओं में फैला देने (re-radiate) की घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं।


प्रकीर्णन का नियम: लॉर्ड रेले का सिद्धांत (Rayleigh’s Law of Scattering)

प्रकीर्णन की मात्रा, प्रकाश के रंग (तरंग दैर्ध्य) और प्रकीर्णन करने वाले कणों के आकार पर निर्भर करती है।

रेले का सिद्धांत:
जब प्रकीर्णन करने वाले कणों का आकार, प्रकाश की तरंग दैर्ध्य (wavelength, λ) की तुलना में बहुत छोटा होता है, तो प्रकीर्णित प्रकाश की तीव्रता, उसकी तरंग दैर्ध्य की चौथी घात के व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional to the fourth power) होती है।

गणितीय रूप:

प्रकीर्णित प्रकाश की तीव्रता (I) ∝ 1 / λ⁴

इसका अर्थ है:

दृश्य प्रकाश के स्पेक्ट्रम (VIBGYOR) में, बैंगनी और नीले रंग की तरंग दैर्ध्य सबसे कम होती है, जबकि लाल रंग की सबसे अधिक।


प्रकीर्णन पर आधारित घटनाएँ

<h4><strong>1. आकाश का रंग नीला क्यों दिखाई देता है? (Why is the Sky Blue?)</strong></h4>

<h4><strong>2. सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य का लाल दिखाई देना (Why is the Sun Reddish at Sunrise and Sunset?)</strong></h4>


अन्य उदाहरण


प्रकाश का वर्ण विक्षेपण (Dispersion of Light)

परिभाषा:

जब श्वेत प्रकाश (White Light) की किरण किसी पारदर्शी माध्यम (जैसे प्रिज्म) से होकर गुजरती है, तो वह अपने अवयवी रंगों (constituent colours) में विभाजित हो जाती है। इस घटना को प्रकाश का वर्ण विक्षेपण कहते हैं।


प्रिज्म द्वारा श्वेत प्रकाश का वर्ण विक्षेपण

प्रिज्म एक त्रिभुजाकार पारदर्शी वस्तु है जिसका उपयोग वर्ण विक्षेपण की घटना को प्रदर्शित करने के लिए प्रमुखता से किया जाता है।

यह कैसे काम करता है?

  1. आपतन (Incidence): जब श्वेत प्रकाश की एक किरण प्रिज्म की एक सतह पर आपतित होती है, तो यह हवा (विरल माध्यम) से काँच (सघन माध्यम) में प्रवेश करते समय अपवर्तित (refracted) होती है और अभिलंब की ओर झुक जाती है।
  2. रंगों का विभाजन (Splitting of Colours):
    • वर्ण विक्षेपण का कारण: किसी भी माध्यम (जैसे काँच) का अपवर्तनांक (refractive index) प्रकाश के रंग (या तरंग दैर्ध्य) पर निर्भर करता है।
    • काँच का अपवर्तनांक बैंगनी रंग (कम तरंग दैर्ध्य) के लिए सबसे अधिक होता है और लाल रंग (अधिक तरंग दैर्ध्य) के लिए सबसे कम होता है।
    • अपवर्तन के नियम के अनुसार, जिस रंग के लिए अपवर्तनांक अधिक होगा, वह उतना ही अधिक मुड़ेगा
    • इसलिए, काँच में प्रवेश करते ही, श्वेत प्रकाश के सभी रंग अलग-अलग कोणों पर मुड़ जाते हैं, और यहीं से उनका विभाजन शुरू हो जाता है।
  3. निर्गमन (Emergence): जब ये अलग-अलग रंग की किरणें प्रिज्म की दूसरी सतह से बाहर निकलती हैं (काँच से हवा में), तो वे फिर से अपवर्तित होती हैं। इस बार वे अभिलंब से दूर हटती हैं, जिससे रंगों के बीच का अलगाव और भी बढ़ जाता है।
  4. स्पेक्ट्रम का बनना: प्रिज्म से निकलने वाली इन रंगीन किरणों को यदि एक सफेद पर्दे पर प्राप्त किया जाए, तो हमें सात रंगों की एक सुंदर पट्टी दिखाई देती है, जिसे स्पेक्ट्रम कहते हैं।

स्पेक्ट्रम में रंगों का क्रम (VIBGYOR):
इन रंगों का क्रम उनकी तरंग दैर्ध्य के बढ़ते (और झुकाव के घटते) क्रम में होता है:


इंद्रधनुष का बनना (Formation of Rainbow)

परिभाषा:
इंद्रधनुष आकाश में वर्षा के बाद दिखाई देने वाला एक प्राकृतिक स्पेक्ट्रम है। यह वायुमंडल में मौजूद पानी की छोटी-छोटी बूंदों द्वारा सूर्य के प्रकाश के वर्ण विक्षेपण, अपवर्तन, और पूर्ण आंतरिक परावर्तन की एक संयुक्त घटना है।

इंद्रधनुष बनने के लिए आवश्यक शर्तें:

  1. सूर्य प्रेक्षक (observer) के पीछे होना चाहिए।
  2. आकाश में बारिश की बूँदें मौजूद होनी चाहिए (यानी, या तो बारिश हो रही हो या अभी-अभी हुई हो)।

यह कैसे बनता है?
प्रत्येक बारिश की बूंद एक छोटे प्रिज्म की तरह कार्य करती है।

  1. पहला अपवर्तन और वर्ण विक्षेपण: जब सूर्य की प्रकाश किरण एक बारिश की बूंद में प्रवेश करती है, तो वह अपवर्तित होती है और अपने सात रंगों में विक्षेपित (disperse) हो जाती है।
  2. पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection): इसके बाद, ये अलग-अलग रंग की किरणें बूंद की आंतरिक सतह से टकराती हैं और पूर्ण आंतरिक रूप से परावर्तित हो जाती हैं। (कुछ मामलों में यह एक साधारण परावर्तन भी हो सकता है, लेकिन सबसे चमकीले इंद्रधनुष में TIR शामिल होता है)।
  3. दूसरा अपवर्तन: अंत में, ये किरणें बूंद से बाहर निकलती हैं (पानी से हवा में) और एक बार फिर से अपवर्तित होती हैं।

परिणाम:
बूंद से निकलने वाली ये रंगीन किरणें एक निश्चित कोण (लगभग 40° से 42° के बीच) पर होती हैं। जब यह रंगीन प्रकाश हमारी आँखों तक पहुँचता है, तो हमें आकाश में सात रंगों का एक सुंदर वृत्ताकार चाप दिखाई देता है जिसे इंद्रधनुष कहते हैं।

द्वितीयक इंद्रधनुष (Secondary Rainbow):
कभी-कभी मुख्य इंद्रधनुष के ऊपर एक और, धुंधला इंद्रधनुष दिखाई देता है, जिसे द्वितीयक इंद्रधनुष कहते हैं। यह बूंद के अंदर प्रकाश के दो बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण बनता है। इसमें रंगों का क्रम मुख्य इंद्रधनुष से उल्टा होता है (बाहर बैंगनी, अंदर लाल)।


प्रकाश का व्यतिकरण (Interference) और विवर्तन (Diffraction)

व्यतिकरण और विवर्तन, दोनों ही घटनाएँ प्रकाश की तरंग प्रकृति (Wave Nature) का अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। ये दोनों तब होती हैं जब प्रकाश तरंगें आपस में मिलती हैं या किसी अवरोध से टकराती हैं।


प्रकाश का व्यतिकरण (Interference of Light)

सिद्धांत: अध्यारोपण का सिद्धांत (Principle of Superposition)
जब समान आवृत्ति की दो या दो से अधिक प्रकाश तरंगें एक ही समय में, एक ही माध्यम में, एक ही दिशा में चलती हैं, तो वे एक-दूसरे पर अध्यारोपित (superpose) हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप, कुछ बिंदुओं पर प्रकाश की तीव्रता अधिकतम हो जाती है और कुछ पर न्यूनतम। ऊर्जा के इस पुनर्वितरण (redistribution) की घटना को व्यतिकरण कहते हैं।

व्यतिकरण के प्रकार:

  1. संपोषी व्यतिकरण (Constructive Interference):
    • कब होता है: जब दो तरंगों के श्रृंग (Crest) एक-दूसरे पर या गर्त (Trough) एक-दूसरे पर मिलते हैं (अर्थात, वे समान कला/phase में होती हैं)।
    • परिणाम: दोनों तरंगें मिलकर एक बड़ी तरंग बनाती हैं जिसका आयाम दोनों के आयामों के योग के बराबर होता है। इस बिंदु पर प्रकाश की तीव्रता अधिकतम हो जाती है और एक चमकीली फ्रिंज (Bright Fringe) दिखाई देती है।
  2. विनाशी व्यतिकरण (Destructive Interference):
    • कब होता है: जब एक तरंग का श्रृंग, दूसरी तरंग के गर्त पर मिलता है (अर्थात, वे विपरीत कला/phase में होती हैं)।
    • परिणाम: दोनों तरंगें एक-दूसरे के प्रभाव को निरस्त (cancel out) कर देती हैं। परिणामी तरंग का आयाम न्यूनतम (या शून्य) हो जाता है। इस बिंदु पर प्रकाश की तीव्रता न्यूनतम हो जाती है और एक अदीप्त या काली फ्रिंज (Dark Fringe) दिखाई देती है।

व्यतिकरण पर आधारित घटना: साबुन के बुलबुले या पानी पर फैली तेल की परत का रंगीन दिखना

यह व्यतिकरण का सबसे सुंदर और सामान्य उदाहरण है।

वैज्ञानिक कारण:

  1. पतली फिल्म: साबुन का बुलबुला या तेल की परत एक बहुत ही पतली पारदर्शी फिल्म (thin film) होती है, जिसकी दो सतहें होती हैं – एक ऊपरी सतह और एक निचली सतह।
  2. दो परावर्तित किरणें: जब श्वेत प्रकाश (जिसमें सभी रंग होते हैं) इस फिल्म पर पड़ता है, तो:
    • प्रकाश का कुछ हिस्सा फिल्म की ऊपरी सतह से तुरंत परावर्तित हो जाता है।
    • शेष प्रकाश फिल्म के अंदर अपवर्तित होता है, फिर फिल्म की निचली सतह से परावर्तित होकर वापस हवा में निकलता है।
  3. पथ का अंतर (Path Difference): दूसरी किरण (जो निचली सतह से परावर्तित हुई है) ने पहली किरण की तुलना में फिल्म की मोटाई के बराबर अतिरिक्त दूरी तय की है।
  4. व्यतिकरण: जब ये दोनों परावर्तित किरणें एक ही दिशा में आगे बढ़कर हमारी आँखों में प्रवेश करती हैं, तो वे आपस में व्यतिकरण करती हैं।
  5. रंगों का दिखना:
    • श्वेत प्रकाश के कुछ रंग (तरंग दैर्ध्य) संपोषी व्यतिकरण करते हैं और वे हमें चमकीले दिखाई देते हैं।
    • कुछ अन्य रंग विनाशी व्यतिकरण करते हैं और वे उस जगह से गायब हो जाते हैं।
    • फिल्म की मोटाई और देखने का कोण लगातार बदलता रहता है, इसलिए अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग रंग की तरंगें संपोषी व्यतिकरण की शर्त को पूरा करती हैं।
    • इसी कारण से हमें बुलबुले या तेल की परत पर लगातार बदलते हुए सुंदर इंद्रधनुषी रंग दिखाई देते हैं।

प्रकाश का विवर्तन (Diffraction of Light)

परिभाषा:

जब प्रकाश तरंगें किसी अत्यंत छोटे अवरोध या तीक्ष्ण किनारे (sharp edge) से होकर गुजरती हैं, तो वे उस किनारे पर थोड़ा मुड़ जाती हैं और अवरोध की ज्यामितीय छाया (geometrical shadow) में प्रवेश कर जाती हैं। प्रकाश के इस प्रकार मुड़ने की घटना को विवर्तन कहते हैं।

विवर्तन पैटर्न:
जब प्रकाश एक बहुत ही संकीर्ण झिरी (slit) से होकर गुजरता है और उसे पर्दे पर देखा जाता है, तो हमें केवल एक चमकीली रेखा नहीं मिलती। इसके बजाय, हमें एक केंद्रीय चमकीली फ्रिंज मिलती है जो सबसे चौड़ी और सबसे तीव्र होती है, जिसके दोनों ओर घटती तीव्रता की एकांतर (alternate) चमकीली और काली फ्रिंजें होती हैं।

दैनिक जीवन में उदाहरण:


मानव नेत्र और दृष्टि दोष (Human Eye and Defects of Vision)


मानव नेत्र की संरचना (Structure of the Human Eye)

मानव नेत्र एक अद्भुत और जटिल प्रकाशीय यंत्र है जो एक कैमरे की तरह काम करता है। यह हमें वस्तुओं को देखने और उनके रंग, आकार तथा दूरी का अनुभव करने में सक्षम बनाता है।

नेत्र के मुख्य भाग और उनके कार्य:

  1. कॉर्निया (Cornea – स्वच्छ मंडल):
    • यह नेत्र के सामने का एक उभरा हुआ, पारदर्शी भाग है।
    • प्रकाश सबसे पहले कॉर्निया से ही नेत्र में प्रवेश करता है। यह प्रकाश किरणों को अपवर्तित (refract) करने का अधिकांश कार्य करता है।
    • नेत्रदान में कॉर्निया का ही दान किया जाता है।
  2. आइरिस (Iris – परितारिका):
    • यह कॉर्निया के पीछे स्थित एक रंगीन, पेशीय डायाफ्राम है। इसका रंग ही आँख का रंग (जैसे काला, भूरा, नीला) निर्धारित करता है।
    • इसका मुख्य कार्य पुतली के आकार को नियंत्रित करना है।
  3. पुतली (Pupil – नेत्र तारा):
    • यह आइरिस के बीच में एक छोटा सा छेद होता है।
    • इसका कार्य नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करना है।
    • तेज प्रकाश में आइरिस सिकुड़कर पुतली को छोटा कर देता है ताकि कम प्रकाश अंदर जाए।
    • कम प्रकाश में आइरिस फैलकर पुतली को बड़ा कर देता है ताकि अधिक प्रकाश अंदर जा सके।
  4. नेत्र लेंस (Eye Lens):
    • यह एक उत्तल लेंस (Convex Lens) होता है जो रेशेदार जेली जैसे पदार्थ का बना होता है।
    • इसका कार्य प्रकाश किरणों को रेटिना पर केंद्रित (focus) करना है ताकि वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिंब बन सके।
    • यह अपनी फोकस दूरी को बदल सकता है।
  5. पक्ष्माभी पेशियाँ (Ciliary Muscles):
    • ये पेशियाँ नेत्र लेंस को अपनी जगह पर बनाए रखती हैं और उसके आकार (और फोकस दूरी) को बदलने में मदद करती हैं।
    • आंख की समंजन क्षमता (Power of Accommodation): इन पेशियों की सहायता से नेत्र लेंस अपनी फोकस दूरी को समायोजित करके पास और दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से रेटिना पर केंद्रित कर सकता है, इसी क्षमता को समंजन क्षमता कहते हैं।
  6. रेटिना (Retina – दृष्टि पटल):
    • यह नेत्र के पिछले भाग में स्थित एक प्रकाश-संवेदनशील पर्दा है। यह कैमरे की फिल्म या सेंसर की तरह काम करता है।
    • रेटिना पर वस्तु का वास्तविक (Real) और उल्टा (Inverted) प्रतिबिंब बनता है।
    • इसमें प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ (photoreceptor cells) होती हैं – शंकु (Cones) और शलाकाएँ (Rods)
      • शंकु (Cones): ये तेज प्रकाश में सक्रिय होती हैं और हमें रंगों की पहचान कराती हैं।
      • शलाकाएँ (Rods): ये मंद प्रकाश में सक्रिय होती हैं और प्रकाश की तीव्रता के प्रति संवेदनशील होती हैं।
  7. दृक् तंत्रिका (Optic Nerve):
    • यह तंत्रिका कोशिकाओं का एक बंडल है जो रेटिना पर बने प्रतिबिंब से उत्पन्न विद्युत संकेतों (electrical signals) को मस्तिष्क (Brain) तक पहुँचाता है।
    • मस्तिष्क इन संकेतों की व्याख्या करता है और हमें वस्तु को सीधा और उसके वास्तविक रूप में दिखाता है।
  8. अंध बिंदु (Blind Spot):
    • दृक् तंत्रिका और रेटिना के சந்தி-स्थल पर कोई प्रकाश-संवेदी कोशिका नहीं होती है। इस बिंदु पर बना प्रतिबिंब दिखाई नहीं देता, इसे अंध बिंदु कहते हैं।

दृष्टि दोष और उनका निवारण (Defects of Vision and their Correction)

आयु बढ़ने या अन्य कारणों से नेत्र की समंजन क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाते हैं। प्रमुख दृष्टि दोष इस प्रकार हैं:

1. निकट-दृष्टि दोष (Myopia or Near-Sightedness)

2. दूर-दृष्टि दोष (Hypermetropia or Far-Sightedness)

3. जरा-दृष्टि दोष (Presbyopia)

4. अबिन्दुकता (Astigmatism)