गुरुत्वाकर्षण (Gravitation)

गुरुत्वाकर्षण (Gravitation)

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परिभाषा:
गुरुत्वाकर्षण ब्रह्मांड का एक मौलिक (fundamental) बल है, जिसके कारण किन्हीं भी दो पिंडों (bodies) के बीच एक आकर्षण बल (force of attraction) कार्य करता है, जिनके पास द्रव्यमान (mass) हो। यह वही बल है जो ग्रहों को सूर्य के चारों ओर घुमाता है, हमें जमीन पर रखता है, और तारों तथा आकाशगंगाओं का निर्माण करता है।

सर आइज़क न्यूटन ने सबसे पहले इस बल को व्यवस्थित रूप से समझाया था।


न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton’s Universal Law of Gravitation)

यह नियम गुरुत्वाकर्षण बल के परिमाण का वर्णन करता है।

नियम का कथन:

“ब्रह्मांड में किन्हीं भी दो पिंडों के बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती (directly proportional) तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional) होता है।”

गणितीय सूत्र:

F = G (m₁m₂ / r²)

जहाँ:


गुरुत्व (Gravity) और गुरुत्वीय त्वरण ‘g’ (Acceleration due to Gravity)

‘g’ के मान में परिवर्तन:
‘g’ का मान सार्वभौमिक नहीं है और यह निम्नलिखित कारकों के आधार पर बदलता है:

  1. पृथ्वी की सतह से ऊँचाई (Altitude): पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर g का मान घटता है।
  2. पृथ्वी की सतह से गहराई (Depth): पृथ्वी की सतह से नीचे (जैसे किसी खान में) जाने पर भी g का मान घटता है। पृथ्वी के केंद्र पर g का मान शून्य हो जाता है।
  3. पृथ्वी का आकार (Shape of the Earth): पृथ्वी पूर्ण रूप से गोल नहीं है, यह ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है। ध्रुवों पर त्रिज्या (radius) भूमध्य रेखा से कम होती है, इसलिए g का मान ध्रुवों पर अधिकतम और भूमध्य रेखा पर न्यूनतम होता है।
  4. पृथ्वी का घूर्णन (Rotation of the Earth): पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के कारण भी g का मान प्रभावित होता है और यह कम हो जाता है।

द्रव्यमान (Mass) और भार (Weight) में अंतर

यह गुरुत्वाकर्षण का एक बहुत महत्वपूर्ण अनुप्रयोग है।

आधारद्रव्यमान (Mass)भार (Weight)
परिभाषाकिसी वस्तु में मौजूद पदार्थ की कुल मात्रा।वह बल जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केंद्र की ओर खींचती है।
प्रकृतिअदिश राशि (Scalar) – इसकी कोई दिशा नहीं होती।सदिश राशि (Vector) – इसकी दिशा हमेशा पृथ्वी के केंद्र की ओर होती है।
सूत्रयह एक मौलिक गुण है।W = m × g (भार = द्रव्यमान × गुरुत्वीय त्वरण)
स्थिरतावस्तु का द्रव्यमान हर जगह (पृथ्वी, चंद्रमा, अंतरिक्ष) समान रहता हैवस्तु का भार g के मान के साथ बदलता रहता है। चंद्रमा पर भार पृथ्वी के भार का लगभग 1/6 होता है, और अंतरिक्ष में भार शून्य होता है।
SI मात्रककिलोग्राम (kg)न्यूटन (N) (क्योंकि यह एक बल है)
मापनइसे भौतिक तुला (Physical Balance) से मापा जाता है।इसे कमानीदार तुला (Spring Balance) से मापा जाता है।

पलायन वेग (Escape Velocity)

परिभाषा:

“पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे किसी पिंड को पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर फेंकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को हमेशा के लिए पार कर जाता है और कभी वापस नहीं लौटता।”

कक्षीय वेग (Orbital Velocity)

परिभाषा:

“कक्षीय वेग वह आवश्यक वेग है जो किसी उपग्रह को किसी ग्रह के चारों ओर एक स्थिर वृत्ताकार कक्षा में परिक्रमा करने के लिए चाहिए होता है।”



पदार्थ के गुण 

ठोस के गुण: प्रत्यास्थता और हुक का नियम

ठोस पदार्थों का एक महत्वपूर्ण यांत्रिक गुण (mechanical property) उनकी प्रत्यास्थता है। यह गुण बताता है कि एक ठोस वस्तु बाहरी बल के लगने पर कैसा व्यवहार करती है और बल हटाने के बाद क्या होता है।


प्रत्यास्थता (Elasticity)

परिभाषा:

किसी पदार्थ का वह गुण जिसके कारण वह वस्तु, उस पर लगाए गए बाहरी विरूपक बल (deforming force) द्वारा हुए आकार या आकृति में परिवर्तन का विरोध करती है, और बल को हटा दिए जाने पर अपनी मूल आकृति और आकार को पुनः प्राप्त कर लेती है, प्रत्यास्थता कहलाती है।

सरल शब्दों में, प्रत्यास्थता किसी वस्तु की “जिद्दीपन” है कि वह बदलना नहीं चाहती, और अगर उसे जबरदस्ती बदल दिया जाए, तो वह मौका मिलते ही वापस अपनी पुरानी स्थिति में आ जाती है।

उदाहरण:

प्लास्टिकता या सुघट्यता (Plasticity):
यह प्रत्यास्थता का विपरीत गुण है। यदि किसी वस्तु पर बल लगाने पर उसमें स्थायी (permanent) परिवर्तन हो जाता है और वह बल हटाने पर अपनी मूल अवस्था में वापस नहीं लौटती, तो इस गुण को प्लास्टिकता कहते हैं।


प्रतिबल (Stress) और विकृति (Strain)

हुक के नियम को समझने से पहले, इन दो महत्वपूर्ण राशियों को समझना आवश्यक है।

1. प्रतिबल (Stress)

2. विकृति (Strain)


हुक का नियम (Hooke’s Law)

प्रत्यास्थता के व्यवहार का वर्णन करने के लिए रॉबर्ट हुक ने यह प्रसिद्ध नियम दिया।

नियम का कथन:

प्रत्यास्थता की सीमा (elastic limit) के भीतर, किसी वस्तु में उत्पन्न प्रतिबल, उसमें उत्पन्न विकृति के समानुपाती होता है।”

गणितीय रूप:

प्रतिबल ∝ विकृति

या

प्रतिबल = E × विकृति

जहाँ, 

E = प्रतिबल / विकृति

प्रत्यास्थता गुणांक (E):

इस प्रकार, हुक का नियम हमें बताता है कि प्रत्यास्थ सीमा के भीतर, आप किसी वस्तु को जितना अधिक विकृत (विकृति) करेंगे, उसके अंदर उतना ही अधिक विरोधी बल (प्रतिबल) उत्पन्न होगा।


तरल के गुण (Properties of Fluids)

तरल (Fluid) वह पदार्थ है जो बह सकता है, जैसे कि द्रव (liquid) और गैस (gas)। तरल पदार्थों के कुछ विशिष्ट गुण होते हैं जो उन्हें ठोस से अलग करते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख गुणों का विस्तृत वर्णन दिया गया है:


1. घनत्व (Density)

परिभाषा: किसी पदार्थ के इकाई आयतन में निहित द्रव्यमान को उस पदार्थ का घनत्व कहते हैं। यह मापता है कि कोई पदार्थ कितना सघन या “ठोस” है।

उदाहरण: शहद का घनत्व पानी से अधिक होता है, इसलिए शहद पानी में डूब जाता है। लोहे का घनत्व पानी से अधिक होता है, लेकिन लकड़ी का घनत्व कम होता है, इसलिए लकड़ी तैरती है।


2. दाब (Pressure)

परिभाषा: किसी सतह के इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले लंबवत बल को दाब कहते हैं।

तरल के भीतर दाब:
किसी तरल के भीतर किसी बिंदु पर दाब, उस बिंदु के ऊपर मौजूद तरल स्तंभ (fluid column) के भार के कारण होता है।

इसी कारण से, गहराई बढ़ने के साथ तरल का दाब बढ़ता है। यही वजह है कि बाँध की दीवारें नीचे से अधिक चौड़ी बनाई जाती हैं।


3. पास्कल का नियम (Pascal’s Law)

नियम का कथन:

“किसी बंद पात्र (enclosed container) में रखे हुए तरल के किसी भी भाग पर जब दाब लगाया जाता है, तो वह दाब बिना किसी हानि के, तरल में सभी दिशाओं में समान रूप से संचरित (transmit) हो जाता है।”

अनुप्रयोग: इस नियम का उपयोग द्रव-चालित (hydraulic) प्रणालियों में बल को कई गुना बढ़ाने के लिए किया जाता है।

उदाहरण:


4. उत्प्लावन बल (Buoyant Force / Buoyancy)

परिभाषा: जब किसी वस्तु को किसी तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डुबोया जाता है, तो तरल द्वारा उस वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगाया जाता है, जिसे उत्प्लावन बल कहते हैं।


5. आर्किमिडीज का सिद्धांत (Archimedes’ Principle)

यह सिद्धांत हमें बताता है कि उत्प्लावन बल का परिमाण कितना होता है।

सिद्धांत का कथन:

“जब किसी वस्तु को किसी तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डुबोया जाता है, तो वह ऊपर की दिशा में एक बल का अनुभव करती है, जो उस वस्तु द्वारा हटाए गए तरल के भार के बराबर होता है।”

प्लवन का सिद्धांत (Principle of Flotation)

कोई वस्तु तैरेगी या डूबेगी, यह वस्तु के भार और उस पर लगने वाले उत्प्लावन बल के बीच के संबंध पर निर्भर करता है।

  1. वस्तु डूब जाएगी (Sinks):
    • शर्त: यदि वस्तु का भार (W) उस पर लगने वाले अधिकतम उत्प्लावन बल (F_B) से अधिक है।
    • (W > F_B)
    • घनत्व के संदर्भ में: यदि वस्तु का घनत्व (ρ_वस्तु) तरल के घनत्व (ρ_तरल) से अधिक है।
    • (ρ_वस्तु > ρ_तरल)
  2. वस्तु सतह पर तैरेगी (Floats on the Surface):
    • शर्त: यदि वस्तु का भार (W) उस पर लगने वाले अधिकतम उत्प्लावन बल (F_B) से कम है।
    • (W < F_B)
    • घनत्व के संदर्भ में: यदि वस्तु का घनत्व (ρ_वस्तु) तरल के घनत्व (ρ_तरल) से कम है।
    • (ρ_वस्तु < ρ_तरल)
    • वस्तु का केवल उतना ही हिस्सा डूबेगा, जितने से हटाए गए तरल का भार वस्तु के कुल भार के बराबर हो जाए।
  3. वस्तु तरल में डूबकर तैरेगी (Floats Fully Submerged):
    • शर्त: यदि वस्तु का भार (W) उस पर लगने वाले अधिकतम उत्प्लावन बल (F_B) के ठीक बराबर है।
    • (W = F_B)
    • घनत्व के संदर्भ में: यदि वस्तु का घनत्व (ρ_वस्तु) तरल के घनत्व (ρ_तरल) के बराबर है।
    • (ρ_वस्तु = ρ_तरल)

पृष्ठ तनाव (Surface Tension) और इसके प्रभाव

पृष्ठ तनाव द्रवों का एक बहुत ही रोचक और महत्वपूर्ण गुण है, जिसके कारण हम अपने दैनिक जीवन में कई अद्भुत घटनाएँ देखते हैं, जैसे पानी पर कीड़ों का चलना, बारिश की बूंदों का गोल होना और दीये की बत्ती में तेल का ऊपर चढ़ना।


पृष्ठ तनाव (Surface Tension)

अवधारणा:
कल्पना कीजिए कि आप एक चादर को चारों कोनों से पकड़कर तान देते हैं। वह एक खिंची हुई सतह बन जाती है। द्रवों का स्वतंत्र पृष्ठ (free surface) भी ठीक इसी तरह एक तनी हुई लोचदार झिल्ली (stretched elastic membrane) की तरह व्यवहार करता है। द्रव के पृष्ठ का यह गुण, जिसमें वह अपने क्षेत्रफल को न्यूनतम (minimum) करने का प्रयास करता है, पृष्ठ तनाव कहलाता है।

पृष्ठ तनाव का कारण (Reason):
इसका कारण द्रव के अणुओं के बीच लगने वाला ससंजक बल (Cohesive Force) है।

इस आंतरिक खिंचाव के कारण, सतह के सभी अणु एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैं, जिससे सतह सिकुड़ जाती है और एक तनी हुई झिल्ली जैसा व्यवहार करती है। इसी सिकुड़ने की प्रवृत्ति के कारण द्रव अपने पृष्ठीय क्षेत्रफल को न्यूनतम रखने का प्रयास करता है।

SI मात्रक: न्यूटन प्रति मीटर (N/m)


पृष्ठ तनाव के प्रभाव और उदाहरण

1. बूंदों और बुलबुलों का गोल होना (Spherical shape of Drops and Bubbles)

2. केशिकात्व (Capillarity)

परिभाषा:
एक बहुत ही पतली, खोखली नली, जिसे केशिका नली (capillary tube) कहते हैं, में किसी द्रव के अपने सामान्य स्तर से ऊपर चढ़ने या नीचे उतरने की घटना को केशिकात्व कहते हैं।

यह घटना दो प्रकार के बलों के बीच की प्रतिस्पर्धा का परिणाम है:

  1. ससंजक बल (Cohesive Force): एक ही पदार्थ के अणुओं के बीच लगने वाला आकर्षण बल (जैसे – पानी के अणुओं का आपस में आकर्षण)।
  2. आसंजक बल (Adhesive Force): अलग-अलग पदार्थों के अणुओं के बीच लगने वाला आकर्षण बल (जैसे – पानी और कांच की नली के अणुओं के बीच आकर्षण)।

केशिकात्व के दो प्रकार होते हैं:

A) द्रव का ऊपर चढ़ना (Capillary Rise):

दैनिक जीवन में उदाहरण:

B) द्रव का नीचे उतरना (Capillary Depression):

श्यानता (Viscosity): तरल पदार्थों का गाढ़ापन

श्यानता किसी भी तरल (द्रव या गैस) का वह गुण है, जिसके कारण वह अपने बहने का विरोध करता है। सरल शब्दों में, यह तरल का गाढ़ापन (thickness) या आंतरिक घर्षण (internal friction) है।


श्यानता की अवधारणा (Concept of Viscosity)

कल्पना कीजिए कि आप एक गिलास में पानी और दूसरे में शहद पलट रहे हैं। पानी आसानी से और तेजी से बह जाता है, जबकि शहद धीरे-धीरे और मुश्किल से बहता है। इसका कारण यह है कि शहद की श्यानता पानी से बहुत अधिक होती है।

यह आंतरिक घर्षण तरल की विभिन्न परतों के बीच होता है जो एक-दूसरे के ऊपर फिसलती हैं।

श्यानता का कारण:
इसका मुख्य कारण तरल के अणुओं के बीच लगने वाला ससंजक बल (Cohesive Force) है। गाढ़े द्रवों में अणुओं के बीच यह आकर्षण बल बहुत मजबूत होता है, जो उन्हें एक-दूसरे से अलग होने या फिसलने से रोकता है।

तापमान का प्रभाव:

SI मात्रक: पॉइज़्यूल (Poiseuille – Pl) या पास्कल-सेकंड (Pa·s)


स्टोक्स का नियम (Stokes’ Law)

जब कोई छोटी गोलीय वस्तु किसी श्यान तरल (जैसे हवा या पानी) में से होकर गिरती है, तो तरल उस वस्तु की गति का विरोध करता है और उस पर एक विरोधी बल लगाता है। इस विरोधी बल को श्यान बल (Viscous Force) कहते हैं।

सर जॉर्ज स्टोक्स ने इस बल की गणना के लिए एक नियम दिया, जिसे स्टोक्स का नियम कहते हैं।

नियम का कथन:

किसी श्यान तरल में धीमी गति से गिर रही एक छोटी, चिकनी गोलीय वस्तु पर लगने वाला श्यान बल (विरोधी बल), वस्तु की त्रिज्या (r), उसके वेग (v) और तरल के श्यानता गुणांक (η) के समानुपाती होता है।

सूत्र:

Fᵥ = 6πηrv

जहाँ:

यह नियम तभी लागू होता है जब:

  1. वस्तु का आकार बहुत छोटा और गोलाकार हो।
  2. वस्तु की गति बहुत धीमी हो (ताकि प्रवाह धारारेखीय बना रहे, विक्षुब्ध न हो)।
  3. तरल समांगी (homogeneous) हो।

स्टोक्स के नियम का अनुप्रयोग: सीमान्त वेग (Terminal Velocity)

स्टोक्स के नियम का सबसे अच्छा उदाहरण वर्षा की बूंदों का व्यवहार है।

  1. प्रारंभ में: जब बारिश की बूंद बादल से गिरना शुरू करती है, तो गुरुत्वाकर्षण बल (नीचे की ओर) के कारण उसका वेग तेजी से बढ़ता है।
  2. विरोधी बल: जैसे-जैसे बूंद का वेग (v) बढ़ता है, स्टोक्स के नियम के अनुसार, हवा का श्यान विरोधी बल (Fᵥ = 6πηrv, ऊपर की ओर) भी तेजी से बढ़ता है।
  3. संतुलन: एक स्थिति ऐसी आती है जब ऊपर की ओर लगने वाला श्यान बल (और उत्प्लावन बल), नीचे की ओर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल (बूंद का भार) के ठीक बराबर हो जाता है।
  4. नियत वेग: इस स्थिति में, बूंद पर लगने वाला कुल (net) बल शून्य हो जाता है, और उसका त्वरण भी शून्य हो जाता है। इसके बाद, बूंद एक नियत (constant) और अधिकतम वेग से नीचे गिरती है। इसी नियत वेग को सीमान्त वेग (Terminal Velocity) कहते हैं।

यही कारण है कि वर्षा की बूंदें हमें चोट नहीं पहुँचातीं। यदि हवा में श्यानता न होती, तो वे लगातार त्वरित होतीं और गोलियों की तरह घातक गति से पृथ्वी से टकरातीं।

दाब: वायुमंडलीय दाब और बैरोमीटर

दाब (Pressure)

परिभाषा: किसी सतह के एकांक क्षेत्रफल (unit area) पर लंबवत (perpendicularly) लगने वाले बल को दाब कहते हैं।

यह दर्शाता है कि कोई बल कितने बड़े या छोटे क्षेत्र पर केंद्रित है। समान बल को छोटे क्षेत्र पर लगाने से अधिक दाब उत्पन्न होता है।

सूत्र:

दाब (P) = बल (F) / क्षेत्रफल (A)

SI मात्रक:

अन्य प्रचलित मात्रक:


वायुमंडलीय दाब (Atmospheric Pressure)

अवधारणा:
हम पृथ्वी पर हवा के एक विशाल समुद्र के तल में रहते हैं। इस हवा (वायुमंडल) का अपना भार होता है, और यह भार पृथ्वी की सतह पर सभी वस्तुओं पर एक दाब डालता है। इसी दाब को वायुमंडलीय दाब कहते हैं।

परिभाषा:

“पृथ्वी की सतह के किसी भी बिंदु पर, उसके ऊपर मौजूद वायु के स्तंभ (column of air) द्वारा उस बिंदु के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले भार को वायुमंडलीय दाब कहते हैं।”

प्रमुख बिंदु:

  1. दिशा: यह दाब सभी दिशाओं में समान रूप से लगता है, न कि केवल ऊपर से नीचे की ओर। यही कारण है कि हमारा शरीर इसके भार से कुचलता नहीं है, क्योंकि हमारे शरीर के अंदर का दाब (जैसे रक्त दाब) बाहरी वायुमंडलीय दाब को संतुलित करता है।
  2. ऊँचाई के साथ परिवर्तन: पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर वायुमंडलीय दाब घटता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऊँचाई बढ़ने पर हमारे ऊपर हवा की मात्रा (या वायु स्तंभ की ऊँचाई) कम हो जाती है।
    • अनुप्रयोग: यही कारण है कि पहाड़ों पर खाना पकाना मुश्किल होता है (क्योंकि कम दाब पर पानी 100°C से कम तापमान पर ही उबलने लगता है), यात्रियों की नाक से खून आ सकता है, और हवाई जहाज में दाब को कृत्रिम रूप से नियंत्रित किया जाता है।
  3. समुद्र तल पर मान: समुद्र तल पर मानक वायुमंडलीय दाब (1 atm) लगभग 1.013 × 10⁵ पास्कल होता है। यह दाब लगभग 10 मीटर ऊँचे पानी के स्तंभ द्वारा लगाए गए दाब के बराबर होता है!

बैरोमीटर (Barometer)

परिभाषा:
बैरोमीटर वह उपकरण है जिसका उपयोग वायुमंडलीय दाब को मापने के लिए किया जाता है। इसका आविष्कार इवेंजेलिस्टा टोरिसेली (Evangelista Torricelli) ने किया था।

प्रकार: मुख्य रूप से दो प्रकार के बैरोमीटर होते हैं।

1. पारा बैरोमीटर (Mercury Barometer)

2. निर्द्रव बैरोमीटर (Aneroid Barometer)

बैरोमीटर का मौसम पूर्वानुमान में उपयोग: