गुरुत्वाकर्षण (Gravitation)
गुरुत्वाकर्षण (Gravitation)
परिभाषा:
गुरुत्वाकर्षण ब्रह्मांड का एक मौलिक (fundamental) बल है, जिसके कारण किन्हीं भी दो पिंडों (bodies) के बीच एक आकर्षण बल (force of attraction) कार्य करता है, जिनके पास द्रव्यमान (mass) हो। यह वही बल है जो ग्रहों को सूर्य के चारों ओर घुमाता है, हमें जमीन पर रखता है, और तारों तथा आकाशगंगाओं का निर्माण करता है।
सर आइज़क न्यूटन ने सबसे पहले इस बल को व्यवस्थित रूप से समझाया था।
न्यूटन का सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton’s Universal Law of Gravitation)
यह नियम गुरुत्वाकर्षण बल के परिमाण का वर्णन करता है।
नियम का कथन:
“ब्रह्मांड में किन्हीं भी दो पिंडों के बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती (directly proportional) तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती (inversely proportional) होता है।”
गणितीय सूत्र:
F = G (m₁m₂ / r²)
जहाँ:
- F = दो पिंडों के बीच लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल।
- G = सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (Universal Gravitational Constant)। इसका मान पूरे ब्रह्मांड में हर जगह और हर वस्तु के लिए समान रहता है।
- G ≈ 6.674 × 10⁻¹¹ N m²/kg²
- m₁ = पहले पिंड का द्रव्यमान।
- m₂ = दूसरे पिंड का द्रव्यमान।
- r = दोनों पिंडों के केंद्रों के बीच की दूरी।
गुरुत्व (Gravity) और गुरुत्वीय त्वरण ‘g’ (Acceleration due to Gravity)
- गुरुत्व (Gravity): यह गुरुत्वाकर्षण का ही एक विशेष रूप है। जब दो पिंडों में से एक पिंड पृथ्वी हो, तो उस आकर्षण बल को गुरुत्व बल कहते हैं। यह वह बल है जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केंद्र की ओर खींचती है।
- गुरुत्वीय त्वरण (g): जब कोई वस्तु पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण स्वतंत्र रूप से गिरती है, तो उसके वेग में जो त्वरण उत्पन्न होता है, उसे गुरुत्वीय त्वरण कहते हैं।
- पृथ्वी की सतह पर g का औसत मान लगभग 9.8 m/s² होता है।
- इसका अर्थ है कि हर सेकंड, एक स्वतंत्र रूप से गिरती हुई वस्तु का वेग 9.8 m/s बढ़ जाता है।
‘g’ के मान में परिवर्तन:
‘g’ का मान सार्वभौमिक नहीं है और यह निम्नलिखित कारकों के आधार पर बदलता है:
- पृथ्वी की सतह से ऊँचाई (Altitude): पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर g का मान घटता है।
- पृथ्वी की सतह से गहराई (Depth): पृथ्वी की सतह से नीचे (जैसे किसी खान में) जाने पर भी g का मान घटता है। पृथ्वी के केंद्र पर g का मान शून्य हो जाता है।
- पृथ्वी का आकार (Shape of the Earth): पृथ्वी पूर्ण रूप से गोल नहीं है, यह ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है। ध्रुवों पर त्रिज्या (radius) भूमध्य रेखा से कम होती है, इसलिए g का मान ध्रुवों पर अधिकतम और भूमध्य रेखा पर न्यूनतम होता है।
- पृथ्वी का घूर्णन (Rotation of the Earth): पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के कारण भी g का मान प्रभावित होता है और यह कम हो जाता है।
द्रव्यमान (Mass) और भार (Weight) में अंतर
यह गुरुत्वाकर्षण का एक बहुत महत्वपूर्ण अनुप्रयोग है।
| आधार | द्रव्यमान (Mass) | भार (Weight) |
| परिभाषा | किसी वस्तु में मौजूद पदार्थ की कुल मात्रा। | वह बल जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केंद्र की ओर खींचती है। |
| प्रकृति | अदिश राशि (Scalar) – इसकी कोई दिशा नहीं होती। | सदिश राशि (Vector) – इसकी दिशा हमेशा पृथ्वी के केंद्र की ओर होती है। |
| सूत्र | यह एक मौलिक गुण है। | W = m × g (भार = द्रव्यमान × गुरुत्वीय त्वरण) |
| स्थिरता | वस्तु का द्रव्यमान हर जगह (पृथ्वी, चंद्रमा, अंतरिक्ष) समान रहता है। | वस्तु का भार g के मान के साथ बदलता रहता है। चंद्रमा पर भार पृथ्वी के भार का लगभग 1/6 होता है, और अंतरिक्ष में भार शून्य होता है। |
| SI मात्रक | किलोग्राम (kg) | न्यूटन (N) (क्योंकि यह एक बल है) |
| मापन | इसे भौतिक तुला (Physical Balance) से मापा जाता है। | इसे कमानीदार तुला (Spring Balance) से मापा जाता है। |
पलायन वेग (Escape Velocity)
परिभाषा:
“पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे किसी पिंड को पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर फेंकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को हमेशा के लिए पार कर जाता है और कभी वापस नहीं लौटता।”
- यह पिंड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।
- यह उस ग्रह के द्रव्यमान (M) और त्रिज्या (R) पर निर्भर करता है जिससे पिंड को फेंका जा रहा है।
- पृथ्वी के लिए पलायन वेग का मान लगभग 11.2 किलोमीटर प्रति सेकंड (km/s) है।
- सूत्र: Vₑ = √(2GM/R)
कक्षीय वेग (Orbital Velocity)
परिभाषा:
“कक्षीय वेग वह आवश्यक वेग है जो किसी उपग्रह को किसी ग्रह के चारों ओर एक स्थिर वृत्ताकार कक्षा में परिक्रमा करने के लिए चाहिए होता है।”
- पृथ्वी की सतह के निकट परिक्रमा कर रहे उपग्रह का कक्षीय वेग लगभग 7.9 किलोमीटर प्रति सेकंड (km/s) है।
- सूत्र: Vₒ = √(GM/R)
पदार्थ के गुण
ठोस के गुण: प्रत्यास्थता और हुक का नियम
ठोस पदार्थों का एक महत्वपूर्ण यांत्रिक गुण (mechanical property) उनकी प्रत्यास्थता है। यह गुण बताता है कि एक ठोस वस्तु बाहरी बल के लगने पर कैसा व्यवहार करती है और बल हटाने के बाद क्या होता है।
प्रत्यास्थता (Elasticity)
परिभाषा:
किसी पदार्थ का वह गुण जिसके कारण वह वस्तु, उस पर लगाए गए बाहरी विरूपक बल (deforming force) द्वारा हुए आकार या आकृति में परिवर्तन का विरोध करती है, और बल को हटा दिए जाने पर अपनी मूल आकृति और आकार को पुनः प्राप्त कर लेती है, प्रत्यास्थता कहलाती है।
- विरूपक बल (Deforming Force): वह बाहरी बल जो किसी वस्तु के आकार या आकृति को बदलने का प्रयास करता है।
- प्रत्यानयन बल (Restoring Force): जब विरूपक बल लगाया जाता है, तो वस्तु के अंदर के अणु एक आंतरिक बल उत्पन्न करते हैं जो वस्तु को उसकी मूल अवस्था में वापस लाने का प्रयास करता है। यही प्रत्यानयन बल है।
सरल शब्दों में, प्रत्यास्थता किसी वस्तु की “जिद्दीपन” है कि वह बदलना नहीं चाहती, और अगर उसे जबरदस्ती बदल दिया जाए, तो वह मौका मिलते ही वापस अपनी पुरानी स्थिति में आ जाती है।
उदाहरण:
- जब आप एक रबर बैंड को खींचते हैं, तो उसका आकार बदल जाता है। जैसे ही आप उसे छोड़ते हैं, वह अपनी मूल लंबाई में वापस आ जाता है। यह प्रत्यास्थता के कारण है।
- स्टील की स्प्रिंग को दबाने या खींचने पर वह विकृत हो जाती है, लेकिन बल हटाने पर वापस अपने मूल आकार में आ जाती है। वास्तव में, स्टील रबर से कहीं अधिक प्रत्यास्थ होता है।
प्लास्टिकता या सुघट्यता (Plasticity):
यह प्रत्यास्थता का विपरीत गुण है। यदि किसी वस्तु पर बल लगाने पर उसमें स्थायी (permanent) परिवर्तन हो जाता है और वह बल हटाने पर अपनी मूल अवस्था में वापस नहीं लौटती, तो इस गुण को प्लास्टिकता कहते हैं।
- उदाहरण: गीली मिट्टी या च्युइंग गम। एक बार आकार बदलने पर वे वैसे ही रह जाते हैं।
प्रतिबल (Stress) और विकृति (Strain)
हुक के नियम को समझने से पहले, इन दो महत्वपूर्ण राशियों को समझना आवश्यक है।
1. प्रतिबल (Stress)
- परिभाषा: जब किसी वस्तु पर विरूपक बल लगाया जाता है, तो वस्तु के अंदर उत्पन्न होने वाले आंतरिक प्रत्यानयन बल को प्रति इकाई क्षेत्रफल पर प्रतिबल कहते हैं।
- यह मापता है कि वस्तु के अणु बाहरी बल का कितना विरोध कर रहे हैं।
- सूत्र: > प्रतिबल (σ) = बल (F) / क्षेत्रफल (A)
- SI मात्रक: न्यूटन प्रति वर्ग मीटर (N/m²) या पास्कल (Pa)।
2. विकृति (Strain)
- परिभाषा: विरूपक बल के कारण वस्तु की विमा (जैसे लंबाई, आयतन, या आकृति) में होने वाले भिन्नात्मक परिवर्तन को विकृति कहते हैं।
- यह मापता है कि वस्तु में कितना विरूपण (deformation) हुआ है।
- सूत्र (लंबाई के लिए): > विकृति (ε) = लंबाई में परिवर्तन (ΔL) / मूल लंबाई (L)
- मात्रक: विकृति का कोई मात्रक नहीं होता, क्योंकि यह समान राशियों का अनुपात है। यह एक विमाहीन राशि है।
हुक का नियम (Hooke’s Law)
प्रत्यास्थता के व्यवहार का वर्णन करने के लिए रॉबर्ट हुक ने यह प्रसिद्ध नियम दिया।
नियम का कथन:
“प्रत्यास्थता की सीमा (elastic limit) के भीतर, किसी वस्तु में उत्पन्न प्रतिबल, उसमें उत्पन्न विकृति के समानुपाती होता है।”
- प्रत्यास्थता की सीमा (Elastic Limit): यह किसी पदार्थ पर लगाए गए प्रतिबल की वह अधिकतम सीमा है जहाँ तक पदार्थ पूरी तरह से प्रत्यास्थ बना रहता है और बल हटाने पर अपनी मूल अवस्था में वापस आ जाता है। यदि प्रतिबल इस सीमा से अधिक हो जाए, तो वस्तु स्थायी रूप से विकृत हो जाती है।
गणितीय रूप:
प्रतिबल ∝ विकृति
या
प्रतिबल = E × विकृति
जहाँ,
E = प्रतिबल / विकृति
प्रत्यास्थता गुणांक (E):
- यह किसी पदार्थ की कठोरता या दृढ़ता (stiffness) का माप है।
- जिस पदार्थ का E मान जितना अधिक होता है, वह उतना ही अधिक प्रत्यास्थ (या कठोर) माना जाता है। उसे समान विकृति उत्पन्न करने के लिए अधिक प्रतिबल की आवश्यकता होती है।
- उदाहरण के लिए, स्टील का प्रत्यास्थता गुणांक रबर की तुलना में बहुत अधिक होता है, इसलिए स्टील अधिक प्रत्यास्थ है।
इस प्रकार, हुक का नियम हमें बताता है कि प्रत्यास्थ सीमा के भीतर, आप किसी वस्तु को जितना अधिक विकृत (विकृति) करेंगे, उसके अंदर उतना ही अधिक विरोधी बल (प्रतिबल) उत्पन्न होगा।
तरल के गुण (Properties of Fluids)
तरल (Fluid) वह पदार्थ है जो बह सकता है, जैसे कि द्रव (liquid) और गैस (gas)। तरल पदार्थों के कुछ विशिष्ट गुण होते हैं जो उन्हें ठोस से अलग करते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख गुणों का विस्तृत वर्णन दिया गया है:
1. घनत्व (Density)
परिभाषा: किसी पदार्थ के इकाई आयतन में निहित द्रव्यमान को उस पदार्थ का घनत्व कहते हैं। यह मापता है कि कोई पदार्थ कितना सघन या “ठोस” है।
- सूत्र:
घनत्व (ρ) = द्रव्यमान (m) / आयतन (V) - SI मात्रक: किलोग्राम प्रति घन मीटर ( kg/m ³)
- आपेक्षिक घनत्व (Relative Density): किसी पदार्थ के घनत्व और 4°C पर पानी के घनत्व के अनुपात को आपेक्षिक घनत्व कहते हैं। इसका कोई मात्रक नहीं होता।
उदाहरण: शहद का घनत्व पानी से अधिक होता है, इसलिए शहद पानी में डूब जाता है। लोहे का घनत्व पानी से अधिक होता है, लेकिन लकड़ी का घनत्व कम होता है, इसलिए लकड़ी तैरती है।
2. दाब (Pressure)
परिभाषा: किसी सतह के इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले लंबवत बल को दाब कहते हैं।
- सूत्र:
दाब (P) = बल (F) / क्षेत्रफल (A) - SI मात्रक: न्यूटन प्रति वर्ग मीटर (N/m²) या पास्कल (Pa)।
तरल के भीतर दाब:
किसी तरल के भीतर किसी बिंदु पर दाब, उस बिंदु के ऊपर मौजूद तरल स्तंभ (fluid column) के भार के कारण होता है।
- सूत्र:P = hρg
- h = तरल की सतह से बिंदु की गहराई
- ρ = तरल का घनत्व
- g = गुरुत्वीय त्वरण
इसी कारण से, गहराई बढ़ने के साथ तरल का दाब बढ़ता है। यही वजह है कि बाँध की दीवारें नीचे से अधिक चौड़ी बनाई जाती हैं।
3. पास्कल का नियम (Pascal’s Law)
नियम का कथन:
“किसी बंद पात्र (enclosed container) में रखे हुए तरल के किसी भी भाग पर जब दाब लगाया जाता है, तो वह दाब बिना किसी हानि के, तरल में सभी दिशाओं में समान रूप से संचरित (transmit) हो जाता है।”
अनुप्रयोग: इस नियम का उपयोग द्रव-चालित (hydraulic) प्रणालियों में बल को कई गुना बढ़ाने के लिए किया जाता है।
- सिद्धांत: F₁ / A₁ = F₂ / A₂
- एक छोटे पिस्टन (कम क्षेत्रफल A₁) पर थोड़ा बल (F₁) लगाकर, एक बड़े पिस्टन (अधिक क्षेत्रफल A₂) पर बहुत अधिक बल (F₂) उत्पन्न किया जा सकता है।
उदाहरण:
- हाइड्रोलिक लिफ्ट / जैक: कम बल लगाकर भारी वाहनों को उठाने के लिए।
- हाइड्रोलिक ब्रेक: कारों और ट्रकों में ब्रेकिंग सिस्टम।
4. उत्प्लावन बल (Buoyant Force / Buoyancy)
परिभाषा: जब किसी वस्तु को किसी तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डुबोया जाता है, तो तरल द्वारा उस वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगाया जाता है, जिसे उत्प्लावन बल कहते हैं।
- कारण: यह बल वस्तु के निचले और ऊपरी सतहों पर लगने वाले दाब के अंतर के कारण उत्पन्न होता है। चूँकि निचली सतह अधिक गहराई पर होती है, वहाँ दाब अधिक होता है, जिससे एक परिणामी बल ऊपर की ओर लगता है।
- प्रभाव: इसी बल के कारण वस्तुएं तरल में अपने वास्तविक भार से हल्की महसूस होती हैं।
5. आर्किमिडीज का सिद्धांत (Archimedes’ Principle)
यह सिद्धांत हमें बताता है कि उत्प्लावन बल का परिमाण कितना होता है।
सिद्धांत का कथन:
“जब किसी वस्तु को किसी तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डुबोया जाता है, तो वह ऊपर की दिशा में एक बल का अनुभव करती है, जो उस वस्तु द्वारा हटाए गए तरल के भार के बराबर होता है।”
- सूत्र:
उत्प्लावन बल (F_B) = हटाए गए तरल का भार
F_B = V_विस्थापित × ρ_तरल × g- V_विस्थापित = वस्तु का डूबा हुआ आयतन (जो हटाए गए तरल के आयतन के बराबर है)
- ρ_तरल = तरल का घनत्व
प्लवन का सिद्धांत (Principle of Flotation)
कोई वस्तु तैरेगी या डूबेगी, यह वस्तु के भार और उस पर लगने वाले उत्प्लावन बल के बीच के संबंध पर निर्भर करता है।
- वस्तु डूब जाएगी (Sinks):
- शर्त: यदि वस्तु का भार (W) उस पर लगने वाले अधिकतम उत्प्लावन बल (F_B) से अधिक है।
- (W > F_B)
- घनत्व के संदर्भ में: यदि वस्तु का घनत्व (ρ_वस्तु) तरल के घनत्व (ρ_तरल) से अधिक है।
- (ρ_वस्तु > ρ_तरल)
- वस्तु सतह पर तैरेगी (Floats on the Surface):
- शर्त: यदि वस्तु का भार (W) उस पर लगने वाले अधिकतम उत्प्लावन बल (F_B) से कम है।
- (W < F_B)
- घनत्व के संदर्भ में: यदि वस्तु का घनत्व (ρ_वस्तु) तरल के घनत्व (ρ_तरल) से कम है।
- (ρ_वस्तु < ρ_तरल)
- वस्तु का केवल उतना ही हिस्सा डूबेगा, जितने से हटाए गए तरल का भार वस्तु के कुल भार के बराबर हो जाए।
- वस्तु तरल में डूबकर तैरेगी (Floats Fully Submerged):
- शर्त: यदि वस्तु का भार (W) उस पर लगने वाले अधिकतम उत्प्लावन बल (F_B) के ठीक बराबर है।
- (W = F_B)
- घनत्व के संदर्भ में: यदि वस्तु का घनत्व (ρ_वस्तु) तरल के घनत्व (ρ_तरल) के बराबर है।
- (ρ_वस्तु = ρ_तरल)
पृष्ठ तनाव (Surface Tension) और इसके प्रभाव
पृष्ठ तनाव द्रवों का एक बहुत ही रोचक और महत्वपूर्ण गुण है, जिसके कारण हम अपने दैनिक जीवन में कई अद्भुत घटनाएँ देखते हैं, जैसे पानी पर कीड़ों का चलना, बारिश की बूंदों का गोल होना और दीये की बत्ती में तेल का ऊपर चढ़ना।
पृष्ठ तनाव (Surface Tension)
अवधारणा:
कल्पना कीजिए कि आप एक चादर को चारों कोनों से पकड़कर तान देते हैं। वह एक खिंची हुई सतह बन जाती है। द्रवों का स्वतंत्र पृष्ठ (free surface) भी ठीक इसी तरह एक तनी हुई लोचदार झिल्ली (stretched elastic membrane) की तरह व्यवहार करता है। द्रव के पृष्ठ का यह गुण, जिसमें वह अपने क्षेत्रफल को न्यूनतम (minimum) करने का प्रयास करता है, पृष्ठ तनाव कहलाता है।
पृष्ठ तनाव का कारण (Reason):
इसका कारण द्रव के अणुओं के बीच लगने वाला ससंजक बल (Cohesive Force) है।
- द्रव के भीतर का अणु: द्रव के अंदर स्थित अणु पर उसके चारों ओर के अन्य अणु सभी दिशाओं में समान रूप से आकर्षण बल लगाते हैं, जिससे उस पर लगने वाला कुल बल शून्य हो जाता है।
- द्रव के पृष्ठ का अणु: लेकिन, जो अणु द्रव की सतह पर होता है, उस पर केवल नीचे और बगल के अणु ही आकर्षण बल लगाते हैं। ऊपर की ओर (वायु में) कोई अणु नहीं होने के कारण, उस पर एक परिणामी खिंचाव नीचे की ओर (द्रव के अंदर की ओर) होता है।
इस आंतरिक खिंचाव के कारण, सतह के सभी अणु एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैं, जिससे सतह सिकुड़ जाती है और एक तनी हुई झिल्ली जैसा व्यवहार करती है। इसी सिकुड़ने की प्रवृत्ति के कारण द्रव अपने पृष्ठीय क्षेत्रफल को न्यूनतम रखने का प्रयास करता है।
SI मात्रक: न्यूटन प्रति मीटर (N/m)
पृष्ठ तनाव के प्रभाव और उदाहरण
1. बूंदों और बुलबुलों का गोल होना (Spherical shape of Drops and Bubbles)
- क्यों होता है? किसी भी दिए गए आयतन (volume) के लिए, गोले (sphere) का पृष्ठीय क्षेत्रफल (surface area) सबसे कम होता है।
- व्याख्या: जैसा कि हमने ऊपर समझा, पृष्ठ तनाव की प्राकृतिक प्रवृत्ति द्रव के सतह क्षेत्र को न्यूनतम करना है। जब वर्षा की बूंद हवा में गिरती है, तो गुरुत्वाकर्षण के अलावा उस पर कोई बाहरी बल नहीं होता। अतः, अपने पृष्ठीय क्षेत्रफल को न्यूनतम करने के प्रयास में, वह गोलाकार आकृति ग्रहण कर लेती है। यही कारण साबुन के बुलबुलों पर भी लागू होता है।
2. केशिकात्व (Capillarity)
परिभाषा:
एक बहुत ही पतली, खोखली नली, जिसे केशिका नली (capillary tube) कहते हैं, में किसी द्रव के अपने सामान्य स्तर से ऊपर चढ़ने या नीचे उतरने की घटना को केशिकात्व कहते हैं।
यह घटना दो प्रकार के बलों के बीच की प्रतिस्पर्धा का परिणाम है:
- ससंजक बल (Cohesive Force): एक ही पदार्थ के अणुओं के बीच लगने वाला आकर्षण बल (जैसे – पानी के अणुओं का आपस में आकर्षण)।
- आसंजक बल (Adhesive Force): अलग-अलग पदार्थों के अणुओं के बीच लगने वाला आकर्षण बल (जैसे – पानी और कांच की नली के अणुओं के बीच आकर्षण)।
केशिकात्व के दो प्रकार होते हैं:
A) द्रव का ऊपर चढ़ना (Capillary Rise):
- शर्त: जब आसंजक बल > ससंजक बल।
- उदाहरण: जब एक कांच की केशिका को पानी में डुबोया जाता है।
- व्याख्या: पानी के अणुओं का कांच के अणुओं के प्रति आकर्षण (आसंजक बल), पानी के अणुओं के आपसी आकर्षण (ससंजक बल) से अधिक होता है। इस कारण पानी कांच की दीवारों पर “चढ़ने” की कोशिश करता है, जिससे सतह अवतल (concave) हो जाती है। पृष्ठ तनाव इस घुमावदार सतह को सीधा करने की कोशिश में सतह पर ऊपर की ओर एक खिंचाव डालता है, जिससे पूरा द्रव स्तंभ ऊपर चढ़ जाता है।
दैनिक जीवन में उदाहरण:
- दीये या लालटेन की बत्ती में तेल का चढ़ना: बत्ती के धागे केशिकाओं का काम करते हैं।
- ब्लाटिंग पेपर का स्याही सोखना: पेपर के महीन रेशे केशिकाएं बनाते हैं।
- तौलिये का पानी सोखना।
- पेड़-पौधों में जड़ों से पानी का पत्तियों तक पहुंचना।
B) द्रव का नीचे उतरना (Capillary Depression):
- शर्त: जब ससंजक बल > आसंजक बल।
- उदाहरण: जब एक कांच की केशिका को पारा (Mercury) में डुबोया जाता है।
- व्याख्या: पारे के अणुओं का आपसी आकर्षण (ससंजक बल) बहुत मजबूत होता है। यह पारे और कांच के अणुओं के बीच के आकर्षण (आसंजक बल) से अधिक होता है। इस कारण पारा कांच की दीवारों से दूर हटने की कोशिश करता है, जिससे सतह उत्तल (convex) हो जाती है। पृष्ठ तनाव इस सतह को समतल करने के प्रयास में द्रव स्तंभ को नीचे की ओर धकेलता है।
श्यानता (Viscosity): तरल पदार्थों का गाढ़ापन
श्यानता किसी भी तरल (द्रव या गैस) का वह गुण है, जिसके कारण वह अपने बहने का विरोध करता है। सरल शब्दों में, यह तरल का गाढ़ापन (thickness) या आंतरिक घर्षण (internal friction) है।
श्यानता की अवधारणा (Concept of Viscosity)
कल्पना कीजिए कि आप एक गिलास में पानी और दूसरे में शहद पलट रहे हैं। पानी आसानी से और तेजी से बह जाता है, जबकि शहद धीरे-धीरे और मुश्किल से बहता है। इसका कारण यह है कि शहद की श्यानता पानी से बहुत अधिक होती है।
यह आंतरिक घर्षण तरल की विभिन्न परतों के बीच होता है जो एक-दूसरे के ऊपर फिसलती हैं।
- कम श्यानता (Low Viscosity): तरल की परतें एक-दूसरे पर आसानी से फिसलती हैं (जैसे: पानी, एल्कोहॉल)।
- अधिक श्यानता (High Viscosity): तरल की परतें एक-दूसरे की गति का जोरदार विरोध करती हैं (जैसे: शहद, ग्लिसरीन, डामर)।
श्यानता का कारण:
इसका मुख्य कारण तरल के अणुओं के बीच लगने वाला ससंजक बल (Cohesive Force) है। गाढ़े द्रवों में अणुओं के बीच यह आकर्षण बल बहुत मजबूत होता है, जो उन्हें एक-दूसरे से अलग होने या फिसलने से रोकता है।
तापमान का प्रभाव:
- द्रवों (Liquids) पर: तापमान बढ़ाने पर द्रवों की श्यानता घटती है। गर्म करने पर अणु दूर-दूर हो जाते हैं और ससंजक बल कमजोर हो जाता है, जिससे वे आसानी से बहने लगते हैं (जैसे गर्म शहद पतला हो जाता है)।
- गैसों (Gases) पर: तापमान बढ़ाने पर गैसों की श्यानता बढ़ती है।
SI मात्रक: पॉइज़्यूल (Poiseuille – Pl) या पास्कल-सेकंड (Pa·s)
स्टोक्स का नियम (Stokes’ Law)
जब कोई छोटी गोलीय वस्तु किसी श्यान तरल (जैसे हवा या पानी) में से होकर गिरती है, तो तरल उस वस्तु की गति का विरोध करता है और उस पर एक विरोधी बल लगाता है। इस विरोधी बल को श्यान बल (Viscous Force) कहते हैं।
सर जॉर्ज स्टोक्स ने इस बल की गणना के लिए एक नियम दिया, जिसे स्टोक्स का नियम कहते हैं।
नियम का कथन:
किसी श्यान तरल में धीमी गति से गिर रही एक छोटी, चिकनी गोलीय वस्तु पर लगने वाला श्यान बल (विरोधी बल), वस्तु की त्रिज्या (r), उसके वेग (v) और तरल के श्यानता गुणांक (η) के समानुपाती होता है।
सूत्र:
Fᵥ = 6πηrv
जहाँ:
- Fᵥ = श्यान बल (Viscous Drag Force)
- 6π = एक नियतांक है जो गोलीय आकृति के लिए मान्य है।
- η (ईटा) = तरल का श्यानता गुणांक (Coefficient of Viscosity)। यह मान तरल की प्रकृति पर निर्भर करता है (शहद के लिए उच्च, पानी के लिए निम्न)।
- r = गोलीय वस्तु की त्रिज्या (Radius)।
- v = वस्तु का वेग (Velocity)।
यह नियम तभी लागू होता है जब:
- वस्तु का आकार बहुत छोटा और गोलाकार हो।
- वस्तु की गति बहुत धीमी हो (ताकि प्रवाह धारारेखीय बना रहे, विक्षुब्ध न हो)।
- तरल समांगी (homogeneous) हो।
स्टोक्स के नियम का अनुप्रयोग: सीमान्त वेग (Terminal Velocity)
स्टोक्स के नियम का सबसे अच्छा उदाहरण वर्षा की बूंदों का व्यवहार है।
- प्रारंभ में: जब बारिश की बूंद बादल से गिरना शुरू करती है, तो गुरुत्वाकर्षण बल (नीचे की ओर) के कारण उसका वेग तेजी से बढ़ता है।
- विरोधी बल: जैसे-जैसे बूंद का वेग (v) बढ़ता है, स्टोक्स के नियम के अनुसार, हवा का श्यान विरोधी बल (Fᵥ = 6πηrv, ऊपर की ओर) भी तेजी से बढ़ता है।
- संतुलन: एक स्थिति ऐसी आती है जब ऊपर की ओर लगने वाला श्यान बल (और उत्प्लावन बल), नीचे की ओर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल (बूंद का भार) के ठीक बराबर हो जाता है।
- नियत वेग: इस स्थिति में, बूंद पर लगने वाला कुल (net) बल शून्य हो जाता है, और उसका त्वरण भी शून्य हो जाता है। इसके बाद, बूंद एक नियत (constant) और अधिकतम वेग से नीचे गिरती है। इसी नियत वेग को सीमान्त वेग (Terminal Velocity) कहते हैं।
यही कारण है कि वर्षा की बूंदें हमें चोट नहीं पहुँचातीं। यदि हवा में श्यानता न होती, तो वे लगातार त्वरित होतीं और गोलियों की तरह घातक गति से पृथ्वी से टकरातीं।
दाब: वायुमंडलीय दाब और बैरोमीटर
दाब (Pressure)
परिभाषा: किसी सतह के एकांक क्षेत्रफल (unit area) पर लंबवत (perpendicularly) लगने वाले बल को दाब कहते हैं।
यह दर्शाता है कि कोई बल कितने बड़े या छोटे क्षेत्र पर केंद्रित है। समान बल को छोटे क्षेत्र पर लगाने से अधिक दाब उत्पन्न होता है।
सूत्र:
दाब (P) = बल (F) / क्षेत्रफल (A)
SI मात्रक:
- न्यूटन प्रति वर्ग मीटर (N/m²), जिसे पास्कल (Pascal – Pa) भी कहा जाता है।
- 1 Pa = 1 N/m²
अन्य प्रचलित मात्रक:
- बार (Bar): यह एक बड़ा मात्रक है, जो अक्सर मौसम विज्ञान में उपयोग होता है। 1 बार = 10⁵ पास्कल।
- एटीएम (Atmosphere – atm): 1 atm = 1.01325 × 10⁵ Pa (समुद्र तल पर औसत वायुमंडलीय दाब के बराबर)।
- टॉर (Torr): 1 टॉर लगभग 1 mmHg (पारे के 1 मिलीमीटर स्तंभ) के दाब के बराबर होता है।
वायुमंडलीय दाब (Atmospheric Pressure)
अवधारणा:
हम पृथ्वी पर हवा के एक विशाल समुद्र के तल में रहते हैं। इस हवा (वायुमंडल) का अपना भार होता है, और यह भार पृथ्वी की सतह पर सभी वस्तुओं पर एक दाब डालता है। इसी दाब को वायुमंडलीय दाब कहते हैं।
परिभाषा:
“पृथ्वी की सतह के किसी भी बिंदु पर, उसके ऊपर मौजूद वायु के स्तंभ (column of air) द्वारा उस बिंदु के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले भार को वायुमंडलीय दाब कहते हैं।”
प्रमुख बिंदु:
- दिशा: यह दाब सभी दिशाओं में समान रूप से लगता है, न कि केवल ऊपर से नीचे की ओर। यही कारण है कि हमारा शरीर इसके भार से कुचलता नहीं है, क्योंकि हमारे शरीर के अंदर का दाब (जैसे रक्त दाब) बाहरी वायुमंडलीय दाब को संतुलित करता है।
- ऊँचाई के साथ परिवर्तन: पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर वायुमंडलीय दाब घटता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऊँचाई बढ़ने पर हमारे ऊपर हवा की मात्रा (या वायु स्तंभ की ऊँचाई) कम हो जाती है।
- अनुप्रयोग: यही कारण है कि पहाड़ों पर खाना पकाना मुश्किल होता है (क्योंकि कम दाब पर पानी 100°C से कम तापमान पर ही उबलने लगता है), यात्रियों की नाक से खून आ सकता है, और हवाई जहाज में दाब को कृत्रिम रूप से नियंत्रित किया जाता है।
- समुद्र तल पर मान: समुद्र तल पर मानक वायुमंडलीय दाब (1 atm) लगभग 1.013 × 10⁵ पास्कल होता है। यह दाब लगभग 10 मीटर ऊँचे पानी के स्तंभ द्वारा लगाए गए दाब के बराबर होता है!
बैरोमीटर (Barometer)
परिभाषा:
बैरोमीटर वह उपकरण है जिसका उपयोग वायुमंडलीय दाब को मापने के लिए किया जाता है। इसका आविष्कार इवेंजेलिस्टा टोरिसेली (Evangelista Torricelli) ने किया था।
प्रकार: मुख्य रूप से दो प्रकार के बैरोमीटर होते हैं।
1. पारा बैरोमीटर (Mercury Barometer)
- संरचना: इसमें कांच की एक लगभग 1 मीटर लंबी नली होती है जो एक सिरे पर बंद होती है। इस नली को पारे (mercury) से पूरी तरह भरकर, उसे उल्टा करके पारे से भरे एक बर्तन में खड़ा कर दिया जाता है।
- कार्यप्रणाली:
- नली के अंदर का पारा गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर गिरना शुरू होता है, लेकिन बर्तन में खुले पारे की सतह पर लगने वाला बाहरी वायुमंडलीय दाब उसे नीचे गिरने से रोकता है।
- पारा उस ऊँचाई पर आकर रुक जाता है, जहाँ नली में पारे के स्तंभ का दाब ठीक बाहरी वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाता है।
- नली के ऊपरी बंद सिरे में एक खाली जगह बन जाती है, जिसे ‘टोरिसेली का निर्वात’ (Torricellian Vacuum) कहते हैं।
- मापन: वायुमंडलीय दाब को सीधे पारे के स्तंभ की ऊँचाई (height) के रूप में मापा जाता है (जैसे mm of Hg या cm of Hg)।
- मानक मान: समुद्र तल पर, पारा स्तंभ की यह ऊँचाई लगभग 76 सेंटीमीटर (cm) या 760 मिलीमीटर (mm) होती है। 1 atm = 760 mmHg।
2. निर्द्रव बैरोमीटर (Aneroid Barometer)
- संरचना: इसमें तरल का उपयोग नहीं होता है। इसके अंदर धातु का एक लचीला, हवा-रहित डिब्बा होता है।
- कार्यप्रणाली:
- बाहरी वायुमंडलीय दाब बदलने पर यह डिब्बा थोड़ा दबता या फैलता है।
- इस डिब्बे की गति को लीवर की एक प्रणाली द्वारा एक संकेतक (pointer) से जोड़ दिया जाता है, जो एक पैमाने पर घूमकर दाब का पाठ्यांक (reading) देता है।
- लाभ: यह पारा बैरोमीटर की तुलना में अधिक हल्का, सुरक्षित और पोर्टेबल होता है। अल्टीमीटर (ऊंचाई मापने का यंत्र) इसी सिद्धांत पर काम करता है।
बैरोमीटर का मौसम पूर्वानुमान में उपयोग:
- दाब का अचानक गिरना: यह तूफ़ान या आँधी आने का संकेत है।
- दाब का धीरे-धीरे गिरना: यह वर्षा की संभावना को दर्शाता है।
- दाब का धीरे-धीरे बढ़ना: यह साफ मौसम का संकेत होता है।