यांत्रिकी (Mechanics)

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मात्रक एवं विमाएँ (Units and Dimensions)

भौतिकी में किसी भी घटना का अध्ययन करने के लिए राशियों को मापना आवश्यक होता है। मात्रक (Unit) और विमा (Dimension) मापन के दो मूलभूत आधार हैं जो किसी भी भौतिक राशि को पूरी तरह से परिभाषित करते हैं।


भाग 1: मात्रक (Unit)

परिभाषा: किसी भौतिक राशि को मापने के लिए उपयोग किए जाने वाले निश्चित, मानकीकृत संदर्भ को उस राशि का मात्रक कहते हैं।

उदाहरण के लिए, जब हम कहते हैं कि एक मेज की लंबाई “2 मीटर” है, तो यहाँ ‘मीटर’ एक मात्रक है जो लंबाई को मापने का मानक है।

मात्रकों के प्रकार:

  1. मूल मात्रक (Fundamental Units): वे मात्रक जो एक-दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं और जिन्हें किसी अन्य मात्रक से व्युत्पन्न (derive) नहीं किया जा सकता। SI प्रणाली में सात मूल मात्रक हैं।
  2. व्युत्पन्न मात्रक (Derived Units): वे मात्रक जिन्हें मूल मात्रकों का उपयोग करके प्राप्त किया जाता है। जैसे, चाल का मात्रक (मीटर/सेकंड) लंबाई (मीटर) और समय (सेकंड) के मूल मात्रकों से मिलकर बना है।

मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली (SI System)

यह विश्व में सर्वाधिक प्रचलित और वैज्ञानिक कार्यों में उपयोग की जाने वाली प्रणाली है।

सात मूल SI मात्रक

भौतिक राशिSI मात्रकप्रतीक
1. लंबाई (Length)मीटरm
2. द्रव्यमान (Mass)किलोग्रामkg
3. समय (Time)सेकंडs
4. विद्युत धारा (Electric Current)एम्पीयरA
5. ऊष्मागतिक ताप (Temperature)केल्विनK
6. पदार्थ की मात्रा (Amount of Substance)मोलmol
7. ज्योति तीव्रता (Luminous Intensity)कैंडेलाcd

भाग 2: विमाएँ (Dimensions)

परिभाषा: किसी भौतिक राशि की विमाएँ वे घातें (powers) होती हैं जिन्हें उस राशि को व्यक्त करने के लिए मूल राशियों (द्रव्यमान, लंबाई, समय आदि) पर लगाया जाता है। यह किसी राशि की प्रकृति को बताता है, उसके मान को नहीं।

विमीय सूत्र और विमीय समीकरण

उदाहरण:
वेग = विस्थापन / समय
वेग का विमीय सूत्र = [L] / [T] = [L¹ T⁻¹]
वेग का विमीय समीकरण = [v] = [M⁰ L¹ T⁻¹]

कुछ महत्वपूर्ण भौतिक राशियों के विमीय सूत्र

भौतिक राशिसंबंधविमीय सूत्र
क्षेत्रफललंबाई × चौड़ाई[L²]
आयतनलंबाई × चौड़ाई × ऊँचाई[L³]
त्वरणवेग / समय[LT⁻²]
बलद्रव्यमान × त्वरण[MLT⁻²]
कार्य/ऊर्जाबल × दूरी[ML²T⁻²]
शक्तिकार्य / समय[ML²T⁻³]
दाबबल / क्षेत्रफल[ML⁻¹T⁻²]
संवेगद्रव्यमान × वेग[MLT⁻¹]
घनत्वद्रव्यमान / आयतन[ML⁻³]
आवृत्ति1 / आवर्तकाल[T⁻¹]
गुरुत्वाकर्षण नियतांक (G)F = Gm₁m₂/r² से[M⁻¹L³T⁻²]

मात्रक और विमा में मुख्य अंतर

आधारमात्रक (Unit)विमा (Dimension)
परिभाषायह एक राशि को मापने का मानक है।यह एक राशि की भौतिक प्रकृति को दर्शाती है।
प्रणाली पर निर्भरतायह मापन की प्रणाली (SI, CGS) पर निर्भर करता है।यह मापन की प्रणाली से स्वतंत्र होती है।
उदाहरणलंबाई का SI मात्रक ‘मीटर’ है, जबकि CGS मात्रक ‘सेंटीमीटर’ है।लंबाई की विमा हमेशा ‘[L]’ ही रहेगी, चाहे उसे मीटर में मापें या सेंटीमीटर में।
प्रकृतियह मात्रात्मक (quantitative) होता है।यह गुणात्मक (qualitative) होती है।
समानतादो अलग-अलग राशियों के मात्रक समान हो सकते हैं (जैसे कार्य और बल आघूर्ण दोनों का मात्रक न्यूटन-मीटर है)।दो अलग-अलग राशियों की विमाएँ भी समान हो सकती हैं (जैसे कार्य और बल आघूर्ण दोनों की विमा [ML²T⁻²] है)।

संक्षेप में, मात्रक हमें बताता है कि “कितना” मापा गया है (जैसे 10 मीटर), जबकि विमा हमें बताती है कि “क्या” मापा गया है (यानी लंबाई)।


भौतिक राशियाँ: अदिश और सदिश (Physical Quantities: Scalar and Vector)

भौतिकी में, हम जिन राशियों का अध्ययन करते हैं, उन्हें दिशा के आधार पर मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है: अदिश राशियाँ और सदिश राशियाँ।

अदिश राशियाँ (Scalar Quantities)

परिभाषा: वे भौतिक राशियाँ जिन्हें व्यक्त करने के लिए केवल परिमाण (magnitude) की आवश्यकता होती है, दिशा (direction) की नहीं, उन्हें अदिश राशियाँ कहते हैं।

परिमाण का अर्थ है उस राशि का संख्यात्मक मान और उसका मात्रक। उदाहरण के लिए, यदि हम कहते हैं कि चीनी का द्रव्यमान 5 किलोग्राम है, तो यह एक पूर्ण जानकारी है। हमें यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि यह 5 किलोग्राम किस दिशा में है।

विशेषताएँ:

अदिश राशियों के उदाहरण:

सदिश राशियाँ (Vector Quantities)

परिभाषा: वे भौतिक राशियाँ जिन्हें पूरी तरह से व्यक्त करने के लिए परिमाण (magnitude) और दिशा (direction) दोनों की आवश्यकता होती है, उन्हें सदिश राशियाँ कहते हैं।

यदि हम कहते हैं कि “एक वस्तु पर 10 न्यूटन का बल लग रहा है”, तो यह जानकारी अधूरी है। हमें यह भी बताना होगा कि यह बल किस दिशा में लग रहा है – पूर्व में, पश्चिम में, या किसी और दिशा में। दिशा बदलने से बल का प्रभाव बदल जाता है।

विशेषताएँ:

सदिश राशियों के उदाहरण:

अदिश और सदिश में मुख्य अंतर

आधारअदिश राशि (Scalar)सदिश राशि (Vector)
परिभाषाकेवल परिमाण होता है।परिमाण और दिशा दोनों होते हैं।
आवश्यकताइसे व्यक्त करने के लिए केवल एक संख्या और मात्रक चाहिए।इसे व्यक्त करने के लिए संख्या, मात्रक और दिशा चाहिए।
योग का नियमइन्हें बीजगणित के सामान्य नियमों द्वारा जोड़ा जाता है।इन्हें सदिश योग के नियमों (जैसे त्रिभुज नियम) द्वारा जोड़ा जाता है।
दिशा का प्रभावदिशा बदलने पर इन राशियों का मान नहीं बदलता।दिशा बदलने पर इन राशियों का मान और प्रभाव बदल जाता है।
उदाहरणचाल, दूरी, द्रव्यमान, समय।वेग, विस्थापन, बल, त्वरण।

मात्रक प्रणालियाँ (Systems of Units)

किसी भी भौतिक राशि के मापन के लिए एक मानक की आवश्यकता होती है, जिसे मात्रक (Unit) कहा जाता है। प्राचीन काल से ही व्यापार, विज्ञान और दैनिक जीवन में मापन के लिए अलग-अलग प्रणालियों का विकास हुआ। एकरूपता और सुगमता के लिए समय के साथ इन प्रणालियों का मानकीकरण किया गया।

मात्रक प्रणाली मात्रकों का एक संपूर्ण सेट होता है जिसमें मूल मात्रक और व्युत्पन्न मात्रक दोनों शामिल होते हैं।

प्रमुख मात्रक प्रणालियाँ

मुख्य रूप से चार मात्रक प्रणालियाँ प्रचलित रही हैं:

1. CGS प्रणाली (CGS System)

यह प्रणाली भौतिकी में, विशेषकर पुराने वैज्ञानिक कार्यों में काफी उपयोग की जाती थी।

2. FPS प्रणाली (FPS System)

इसे ब्रिटिश प्रणाली भी कहा जाता है, क्योंकि इसका विकास ब्रिटेन में हुआ था। आज भी कुछ देशों में इसका दैनिक जीवन में उपयोग होता है।

3. MKS प्रणाली (MKS System)

यह प्रणाली CGS प्रणाली का एक बड़ा और अधिक सुविधाजनक रूप थी, जो बाद में SI प्रणाली का आधार बनी।

4. SI प्रणाली (International System of Units)

SI का पूरा नाम Système International d’Unités (मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली) है। यह MKS प्रणाली का ही संशोधित और विस्तारित रूप है। आज यह वैज्ञानिक, तकनीकी और व्यावसायिक कार्यों के लिए विश्व स्तर पर स्वीकृत मानक प्रणाली है।

SI प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ:

  1. सार्वभौमिक स्वीकृति: यह लगभग पूरी दुनिया में मानक के रूप में स्वीकार की जाती है, जिससे वैज्ञानिक और व्यावसायिक संचार में आसानी होती है।
  2. सुसंगत प्रणाली (Coherent System): इसमें सभी व्युत्पन्न मात्रकों को मूल मात्रकों के साधारण गुणा या भाग से प्राप्त किया जा सकता है, बिना किसी अतिरिक्त संख्यात्मक गुणनखंड के। उदाहरण के लिए, बल का मात्रक (न्यूटन) सीधे द्रव्यमान (kg) और त्वरण (m/s²) के गुणनफल से आता है।
  3. दशमलव प्रणाली पर आधारित: यह प्रणाली 10 की घातों पर आधारित है, जिससे मात्रकों का एक-दूसरे में रूपांतरण (जैसे मीटर से किलोमीटर या सेंटीमीटर) बहुत सरल हो जाता है। इसके लिए किलो, सेंटी, मिली जैसे उपसर्गों (prefixes) का उपयोग किया जाता है।
  4. सात मूल मात्रक: इस प्रणाली की नींव सात मूल मात्रकों पर आधारित है, जिनसे अन्य सभी मात्रक बनाए जाते हैं।

SI प्रणाली के सात मूल मात्रक:

भौतिक राशिSI मात्रकप्रतीक
1. लंबाईमीटरm
2. द्रव्यमानकिलोग्रामkg
3. समयसेकंडs
4. विद्युत धाराएम्पीयरA
5. ऊष्मागतिक तापकेल्विनK
6. पदार्थ की मात्रामोलmol
7. ज्योति तीव्रताकैंडेलाcd

आज के समय में, जब तक विशेष रूप से किसी अन्य प्रणाली का उल्लेख न किया जाए, भौतिकी और विज्ञान में सभी गणनाएँ SI प्रणाली में ही की जाती हैं।


SI मात्रक प्रणाली: मूल मात्रक और व्युत्पन्न मात्रक

किसी भी भौतिक राशि को मापने के लिए एक मानक प्रणाली की आवश्यकता होती है ताकि पूरी दुनिया में मापन में एकरूपता बनी रहे। SI प्रणाली (Système International d’Unités या मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली) इसी उद्देश्य को पूरा करती है। यह वैज्ञानिक और तकनीकी कार्यों के लिए विश्व स्तर पर स्वीकृत मानक प्रणाली है।

इस प्रणाली में मात्रकों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. मूल मात्रक (Base Units or Fundamental Units)
  2. व्युत्पन्न मात्रक (Derived Units)

1. मूल मात्रक (Base Units)

परिभाषा: वे मात्रक जो एक-दूसरे से पूरी तरह से स्वतंत्र होते हैं और जिन्हें किसी अन्य मात्रक की सहायता से प्राप्त नहीं किया जा सकता, मूल मात्रक कहलाते हैं।

SI प्रणाली में सात (7) मूल मात्रक परिभाषित किए गए हैं। भौतिकी के सभी अन्य मात्रक इन्हीं सात मूल मात्रकों से मिलकर बनते हैं।

सात मूल SI मात्रक

क्र.भौतिक राशिSI मात्रकप्रतीक
1.लंबाई (Length)मीटरm
2.द्रव्यमान (Mass)किलोग्रामkg
3.समय (Time)सेकंडs
4.विद्युत धारा (Electric Current)एम्पीयरA
5.ऊष्मागतिक ताप (Thermodynamic Temperature)केल्विनK
6.पदार्थ की मात्रा (Amount of Substance)मोलmol
7.ज्योति तीव्रता (Luminous Intensity)कैंडेलाcd

पूरक मात्रक (Supplementary Units): इनके अलावा, ज्यामिति में उपयोग होने वाले दो पूरक मात्रक भी हैं:


2. व्युत्पन्न मात्रक (Derived Units)

परिभाषा: वे मात्रक जिन्हें दो या दो से अधिक मूल मात्रकों का उपयोग करके (गुणा या भाग द्वारा) प्राप्त किया जाता है, व्युत्पन्न मात्रक कहलाते हैं।

व्युत्पन्न मात्रकों की संख्या बहुत अधिक है, क्योंकि वे विभिन्न भौतिक राशियों के बीच संबंधों को दर्शाते हैं।

कुछ महत्वपूर्ण व्युत्पन्न मात्रक और उनकी व्युत्पत्ति

व्युत्पन्न राशिसंबंध (मूल राशियों से)SI मात्रक (व्युत्पन्न)विशेष नाम (प्रतीक)
क्षेत्रफल (Area)लंबाई × चौड़ाईm × m =
आयतन (Volume)लंबाई × चौड़ाई × ऊँचाईm × m × m =
चाल / वेग (Speed / Velocity)दूरी / समयm / s = m/s
त्वरण (Acceleration)वेग / समय(m/s) / s = m/s²
घनत्व (Density)द्रव्यमान / आयतनkg / m³ = ³
बल (Force)द्रव्यमान × त्वरणkg × (m/s²) = kg⋅m/s²न्यूटन (N)
संवेग (Momentum)द्रव्यमान × वेगkg × (m/s) = kg⋅m/s
कार्य / ऊर्जा (Work / Energy)बल × दूरीN × m = (kg⋅m/s²) × m = kg⋅m²/s²जूल (J)
शक्ति (Power)कार्य / समयJ / s = kg⋅m²/s³वॉट (W)
दाब (Pressure)बल / क्षेत्रफलN / m² = ⋅s²)पास्कल (Pa)
आवृत्ति (Frequency)1 / आवर्तकाल1 / s = s⁻¹हर्ट्ज (Hz)
विद्युत आवेश (Charge)विद्युत धारा × समयA × s = A⋅sकूलॉम (C)
विभवान्तर (Voltage)कार्य / आवेशJ / C = kg⋅m²/(A⋅s³)वोल्ट (V)
प्रतिरोध (Resistance)विभवान्तर / धाराV / A = kg⋅m²/(A²⋅s³)ओम (Ω)

संक्षेप में, SI प्रणाली की पूरी संरचना इन्हीं सात मूल मात्रकों पर टिकी हुई है। इन्हीं के संयोजन से अनगिनत व्युत्पन्न मात्रक बनाए जाते हैं, जो भौतिकी के विभिन्न क्षेत्रों में राशियों को मापने के काम आते हैं।


विमीय सूत्र (Dimensional Formula)

परिभाषा: किसी भौतिक राशि का विमीय सूत्र वह व्यंजक (expression) होता है जो यह दर्शाता है कि उस राशि को व्यक्त करने के लिए कौन-कौन सी मूल राशियों (जैसे द्रव्यमान, लंबाई, समय) की कितनी घातों (powers) की आवश्यकता है।

यह किसी भी भौतिक राशि की प्रकृति को बताता है, न कि उसके संख्यात्मक मान को। विमीय सूत्र लिखने के लिए, मूल राशियों को विशिष्ट प्रतीकों द्वारा एक गुरु कोष्ठक [ ] के अंदर लिखा जाता है।

मूल राशियों के विमीय प्रतीक:

सामान्यतः, यांत्रिकी (mechanics) में राशियों को [M], [L] और [T] के पदों में ही व्यक्त किया जाता है। किसी भी राशि Q का विमीय सूत्र [Mᵃ Lᵇ Tᶜ] के रूप में लिखा जाता है, जहाँ a, b, c उस राशि की विमाएँ कहलाती हैं।

विमीय सूत्र कैसे निकालें?

किसी भी राशि का विमीय सूत्र निकालने के लिए, इन चरणों का पालन करें:

  1. उस भौतिक राशि का सूत्र (formula) लिखें।
  2. सूत्र में आने वाली सभी राशियों को तब तक तोड़ते जाएँ जब तक कि वे सभी मूल राशियों (द्रव्यमान, लंबाई, समय आदि) के पदों में न आ जाएँ।
  3. सभी मूल राशियों के लिए उनके विमीय प्रतीक [M], [L], [T] आदि रखें।
  4. उन्हें सरल करके एक अंतिम व्यंजक प्राप्त करें।

उदाहरण 1: चाल (Speed) का विमीय सूत्र

  1. सूत्र: चाल = दूरी / समय
  2. मूल राशियों में: दूरी एक प्रकार की लंबाई है और समय एक मूल राशि है।
  3. प्रतीक रखना: [चाल] = [लंबाई] / [समय] = [L] / [T]
  4. अंतिम व्यंजक: [M⁰ L¹ T⁻¹]

उदाहरण 2: बल (Force) का विमीय सूत्र

  1. सूत्र: बल = द्रव्यमान × त्वरण
  2. मूल राशियों में: त्वरण = वेग / समय = (दूरी / समय) / समय
  3. प्रतीक रखना: [बल] = [द्रव्यमान] × [त्वरण]
    = [M] × ([L] / [T²])
  4. अंतिम व्यंजक: [M¹ L¹ T⁻²]

कुछ महत्वपूर्ण भौतिक राशियों के विमीय सूत्र

यहाँ कुछ सामान्य और महत्वपूर्ण भौतिक राशियों के विमीय सूत्र दिए गए हैं:

भौतिक राशि (Quantity)सूत्र (Formula)विमीय सूत्र (Dimensional Formula)
क्षेत्रफल (Area)लंबाई × चौड़ाई[M⁰ L² T⁰]
आयतन (Volume)लंबाई × चौड़ाई × ऊँचाई[M⁰ L³ T⁰]
घनत्व (Density)द्रव्यमान / आयतन[M¹ L⁻³ T⁰]
वेग/चाल (Velocity/Speed)विस्थापन / समय[M⁰ L¹ T⁻¹]
त्वरण (Acceleration)वेग / समय[M⁰ L¹ T⁻²]
संवेग (Momentum)द्रव्यमान × वेग[M¹ L¹ T⁻¹]
बल (Force)द्रव्यमान × त्वरण[M¹ L¹ T⁻²]
आवेग (Impulse)बल × समय[M¹ L¹ T⁻¹]
कार्य (Work)बल × विस्थापन[M¹ L² T⁻²]
ऊर्जा (Energy)(कार्य के समान)[M¹ L² T⁻²]
शक्ति (Power)कार्य / समय[M¹ L² T⁻³]
दाब (Pressure)बल / क्षेत्रफल[M¹ L⁻¹ T⁻²]
आवृत्ति (Frequency)1 / आवर्तकाल[M⁰ L⁰ T⁻¹]
कोणीय वेग (Angular Velocity)कोण / समय[M⁰ L⁰ T⁻¹] (कोण विमाहीन है)
गुरुत्वाकर्षण नियतांक (G)F = G(m₁m₂/r²) से[M⁻¹ L³ T⁻²]
प्रतिबल (Stress)बल / क्षेत्रफल[M¹ L⁻¹ T⁻²]
विकृति (Strain)लंबाई में परिवर्तन / मूल लंबाई[M⁰ L⁰ T⁰] (विमाहीन राशि)
पृष्ठ तनाव (Surface Tension)बल / लंबाई[M¹ L⁰ T⁻²]
आवेश (Charge)धारा × समय[M⁰ L⁰ T¹ A¹]
प्लांक नियतांक (h)E = hf से[M¹ L² T⁻¹]

विमाहीन राशियाँ (Dimensionless Quantities): कुछ राशियाँ जैसे विकृति, कोण, आपेक्षिक घनत्व आदि का कोई विमीय सूत्र नहीं होता है। इन्हें [M⁰ L⁰ T⁰] से दर्शाया जाता है।



गति

गति के मूल पद: दूरी, विस्थापन, चाल, वेग और त्वरण

गति (Motion) का अध्ययन करने के लिए इन पाँच मूलभूत राशियों को समझना अत्यंत आवश्यक है। ये सभी किसी वस्तु की स्थिति और उसकी स्थिति में हो रहे परिवर्तन का वर्णन करती हैं।


1. दूरी (Distance) और विस्थापन (Displacement)

ये दोनों राशियाँ वस्तु द्वारा तय की गई लंबाई को मापती हैं, लेकिन इनके अर्थ में एक मौलिक अंतर है।

उदाहरण से समझें:
मान लीजिए, एक व्यक्ति बिंदु A से चलना शुरू करता है, 4 मीटर पूर्व की ओर चलकर बिंदु B पर पहुँचता है, और फिर वहाँ से 3 मीटर उत्तर की ओर चलकर बिंदु C पर रुक जाता है।

दूरी (Distance)

विस्थापन (Displacement)


2. चाल (Speed) और वेग (Velocity)

ये दोनों राशियाँ यह बताती हैं कि कोई वस्तु कितनी तेजी से चल रही है।

चाल (Speed)

वेग (Velocity)

एकसमान और असमान वेग:


3. त्वरण (Acceleration)

त्वरण के प्रकार:

भाग 1: दूरी (Distance) और विस्थापन (Displacement)

अवधारणा: दूरी और विस्थापन, दोनों ही यह बताते हैं कि कोई वस्तु अपनी स्थिति से कितना हटी है, लेकिन ये दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।

क्र.आधार (Basis)दूरी (Distance)विस्थापन (Displacement)
1.परिभाषाकिसी गतिमान वस्तु द्वारा तय किए गए पथ की कुल (वास्तविक) लंबाई को दूरी कहते हैं।वस्तु की प्रारंभिक (Initial) और अंतिम (Final) स्थिति के बीच की सबसे छोटी, सीधी दूरी को विस्थापन कहते हैं।
2.राशि का प्रकारयह एक अदिश राशि (Scalar Quantity) है, क्योंकि इसमें केवल परिमाण (Magnitude) होता है, दिशा नहीं।यह एक सदिश राशि (Vector Quantity) है, क्योंकि इसमें परिमाण के साथ-साथ दिशा भी होती है।
3.पथ पर निर्भरतायह तय किए गए संपूर्ण पथ पर निर्भर करती है।यह केवल प्रारंभिक और अंतिम बिंदुओं पर निर्भर करता है, पथ पर नहीं।
4.मान (Value)गतिमान वस्तु के लिए इसका मान हमेशा धनात्मक (+) होता है, कभी भी शून्य या ऋणात्मक नहीं हो सकताइसका मान धनात्मक (+), ऋणात्मक (-) या शून्य (0) कुछ भी हो सकता है।
5.संबंधइसका मान हमेशा विस्थापन के परिमाण से बड़ा या उसके बराबर होता है। <br> **दूरी ≥विस्थापन
6.उदाहरणयदि कोई व्यक्ति A से B (3 मी) और फिर B से C (4 मी) जाता है, तो तय की गई दूरी = 3 + 4 = 7 मीटर।यदि कोई व्यक्ति A से C जाता है, तो विस्थापन सीधी दूरी AC होगा (पाइथागोरस प्रमेय से 5 मीटर)। यदि वह वापस A पर आ जाता है, तो विस्थापन शून्य होगा।

भाग 2: चाल (Speed) और वेग (Velocity)

अवधारणा: चाल और वेग, दोनों ही यह बताते हैं कि कोई वस्तु कितनी तेजी से चल रही है, लेकिन इनमें भी दिशा का एक महत्वपूर्ण अंतर है।

क्र.आधार (Basis)चाल (Speed)वेग (Velocity)
1.परिभाषाकिसी वस्तु द्वारा इकाई समय में तय की गई दूरी को चाल कहते हैं। (यह दूरी परिवर्तन की दर है)।किसी वस्तु द्वारा इकाई समय में हुए विस्थापन को वेग कहते हैं। (यह विस्थापन परिवर्तन की दर है)।
2.सूत्रचाल = कुल दूरी / कुल समयवेग = विस्थापन / कुल समय
3.राशि का प्रकारयह एक अदिश राशि (Scalar Quantity) है।यह एक सदिश राशि (Vector Quantity) है, और इसकी दिशा विस्थापन की दिशा में होती है।
4.मान (Value)इसका मान हमेशा धनात्मक (+) होता है।इसका मान धनात्मक (+), ऋणात्मक (-) या शून्य (0) हो सकता है।
5.विवरणयह केवल यह बताता है कि वस्तु कितनी तेजी से चल रही है।यह बताता है कि वस्तु कितनी तेजी से और किस दिशा में चल रही है।
6.SI मात्रकमीटर प्रति सेकंड (m/s)मीटर प्रति सेकंड (m/s)
7.उदाहरणएक कार 40 km/h की चाल से चल रही है।एक कार 40 km/h की चाल से उत्तर दिशा में जा रही है।

भाग 3: त्वरण (Acceleration)

अवधारणा: जब भी किसी वस्तु का वेग बदलता है (या तो गति तेज होती है, धीमी होती है या दिशा बदलती है), तो उसमें त्वरण उत्पन्न होता है।

क्र.आधार (Basis)विवरण (Description)
1.परिभाषाकिसी वस्तु के वेग में परिवर्तन की दर (Rate of change of velocity) को त्वरण कहते हैं।
2.सूत्रत्वरण = वेग में परिवर्तन / लिया गया समय <br><br> गणितीय रूप में: a = (v – u) / t <br> (जहाँ v अंतिम वेग, u प्रारंभिक वेग और t समय है)
3.राशि का प्रकारयह एक सदिश राशि (Vector Quantity) है। इसकी दिशा वेग परिवर्तन की दिशा में होती है (यानी जिस दिशा में बल लग रहा है)।
4.SI मात्रकमीटर प्रति सेकंड वर्ग (m/s²)
5.त्वरण के प्रकारधनात्मक त्वरण (+ve Acceleration): जब वस्तु का वेग समय के साथ बढ़ता है। (जैसे- रुकी हुई गाड़ी का चलना शुरू करना)।<br><br> • ऋणात्मक त्वरण (-ve Acceleration) / मंदन (Retardation): जब वस्तु का वेग समय के साथ घटता है। (जैसे- चलती हुई गाड़ी पर ब्रेक लगाना)। <br><br> • शून्य त्वरण (Zero Acceleration): जब वस्तु का वेग स्थिर (Constant) होता है (अर्थात् वस्तु या तो एक समान वेग से चल रही है या स्थिर है)।

गति के समीकरण (Equations of Motion)

परिचय और शर्त (Introduction and Condition)

गति के समीकरण उन समीकरणों का एक समूह है जो किसी वस्तु की स्थिति, वेग, त्वरण और समय के बीच संबंध स्थापित करते हैं। ये समीकरण हमें किसी भी समय वस्तु की गति के बारे में भविष्यवाणी करने में मदद करते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण शर्त: गति के ये समीकरण केवल तभी लागू होते हैं जब वस्तु एक सीधी रेखा में (in a straight line) गति कर रही हो और उसका त्वरण एकसमान (Uniform Acceleration) हो।


गति के तीन मुख्य समीकरण

इन समीकरणों में उपयोग होने वाले प्रतीक (Symbols):


1. गति का पहला समीकरण (First Equation of Motion)

(वेग-समय संबंध / Velocity-Time Relation)

समीकरण:
v = u + at

उदाहरण: एक कार 10 m/s के वेग से चल रही है। यदि उस पर 2 m/s² का त्वरण लगता है, तो 5 सेकंड बाद उसका वेग क्या होगा?


2. गति का दूसरा समीकरण (Second Equation of Motion)

(स्थिति-समय संबंध / Position-Time Relation)

समीकरण:
s = ut + ½ at²

उदाहरण: एक वस्तु विरामावस्था (rest) से चलना शुरू करती है और 4 m/s² के त्वरण से 3 सेकंड तक चलती है। इस दौरान वह कितनी दूरी तय करेगी?


3. गति का तीसरा समीकरण (Third Equation of Motion)

(स्थिति-वेग संबंध / Position-Velocity Relation)

समीकरण:
v² = u² + 2as

उदाहरण: 20 m/s के वेग से चल रही एक कार पर ब्रेक लगाने पर उसमें 5 m/s² का मंदन (retardation) उत्पन्न होता है। रुकने से पहले वह कितनी दूरी तय करेगी?


गुरुत्व के अधीन गति (Motion under Gravity)

जब कोई वस्तु पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में ऊपर या नीचे गति करती है, तो उस पर एक एकसमान गुरुत्वीय त्वरण (Uniform gravitational acceleration, g) कार्य करता है। ऐसे में गति के समीकरणों का रूप थोड़ा बदल जाता है।

यहाँ: a को g से प्रतिस्थापित किया जाता है। (पृथ्वी पर g ≈ 9.8 m/s² या गणना की सुविधा के लिए 10 m/s²)।

नियम:

गुरुत्व के अधीन गति के समीकरण:

मानक समीकरणनीचे की ओर गति (+g)ऊपर की ओर गति (-g)
v = u + atv = u + gtv = u – gt
s = ut + ½ at²h = ut + ½ gt² (s की जगह ऊंचाई ‘h’ का प्रयोग)h = ut – ½ gt²
v² = u² + 2asv² = u² + 2ghv² = u² – 2gh

उदाहरण: यदि किसी पत्थर को एक मीनार से विरामावस्था से गिराया जाता है, तो 2 सेकंड बाद उसका वेग क्या होगा? (मान लीजिए g = 10 m/s²)


न्यूटन का गति का पहला नियम: जड़त्व का नियम (Newton’s First Law: The Law of Inertia)

न्यूटन का पहला नियम बल (Force) की गुणात्मक परिभाषा देता है और “जड़त्व” की अवधारणा को स्थापित करता है। यह नियम बताता है कि वस्तुएँ अपनी गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती हैं।

नियम का कथन:

“प्रत्येक वस्तु अपनी विरामावस्था (state of rest) या एक सरल रेखा में एकसमान गति (state of uniform motion in a straight line) की अवस्था में तब तक बनी रहती है, जब तक कि उस पर कोई बाहरी असंतुलित बल (external unbalanced force) कार्य न करे।”

इसका सीधा सा अर्थ है:

…जब तक कि कोई बाहरी बल उसे ऐसा करने से न रोके।


जड़त्व (Inertia) क्या है?

जड़त्व किसी वस्तु का वह आंतरिक गुण (inherent property) है, जिसके कारण वह अपनी गति की अवस्था में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन का विरोध करती है।

यह किसी वस्तु की “आलसीपन” या “जिद्दीपन” की तरह है। वस्तुएँ जैसा कर रही हैं, वैसा ही करते रहना चाहती हैं।

जड़त्व और द्रव्यमान (Inertia and Mass):
किसी वस्तु का जड़त्व सीधे उसके द्रव्यमान (Mass) पर निर्भर करता है।

द्रव्यमान वास्तव में जड़त्व का माप है।


पहले नियम के दो भाग

इस नियम को बेहतर ढंग से समझने के लिए हम इसे दो भागों में बांट सकते हैं:

1. विराम का जड़त्व (Inertia of Rest)

इसका अर्थ है कि यदि कोई वस्तु रुकी हुई है, तो वह स्वयं गति करना शुरू नहीं कर सकती। वह तब तक रुकी रहेगी जब तक उस पर कोई बाहरी बल न लगाया जाए।

दैनिक जीवन में उदाहरण:

2. गति का जड़त्व (Inertia of Motion)

इसका अर्थ है कि यदि कोई वस्तु एकसमान गति से एक सीधी रेखा में चल रही है, तो वह स्वयं रुक नहीं सकती या अपनी दिशा नहीं बदल सकती। वह ऐसा तब तक करती रहेगी जब तक कोई बाहरी बल उसे रोके या उसकी दिशा न बदल दे।

दैनिक जीवन में उदाहरण:

निष्कर्ष

न्यूटन का पहला नियम हमें बताता है कि किसी वस्तु की गति को बदलने के लिए बल आवश्यक है। बल के बिना, वस्तु की अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। यह नियम बल की आवश्यकता को परिभाषित करता है, जबकि दूसरा नियम बताता है कि बल कितना प्रभाव डालेगा।


न्यूटन का गति का दूसरा नियम: बल और संवेग (Newton’s Second Law: Force and Momentum)

न्यूटन का पहला नियम यह बताता है कि किसी वस्तु की गति की अवस्था को बदलने के लिए बल आवश्यक है। दूसरा नियम इस संबंध को मात्रात्मक (quantitative) रूप देता है, यानी यह बताता है कि “कितना” बल लगाने पर “कितना” प्रभाव पड़ेगा।

इस नियम को समझने के लिए पहले संवेग (Momentum) की अवधारणा को समझना आवश्यक है।


संवेग (Momentum)

परिभाषा: किसी वस्तु के द्रव्यमान (mass) और उसके वेग (velocity) के गुणनफल को उस वस्तु का संवेग कहते हैं। इसे p से दर्शाया जाता है।

सरल शब्दों में, यह किसी वस्तु में समाहित “गति की कुल मात्रा” है।

सूत्र:

p = m × v

जहाँ:

विशेषताएँ:


न्यूटन का गति का दूसरा नियम (The Law of Force)

अब हम दूसरे नियम पर आते हैं, जो सीधे संवेग से जुड़ा है।

नियम का औपचारिक कथन:

“किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर (rate of change of momentum) उस पर लगाए गए बाहरी असंतुलित बल के समानुपाती होती है, और यह परिवर्तन बल की दिशा में ही होता है।”

गणितीय रूप में:

माना m द्रव्यमान की एक वस्तु u प्रारंभिक वेग से चल रही है। t समय तक उस पर एक बल F लगाया जाता है, जिससे उसका वेग v हो जाता है।

चूँकि हम जानते हैं कि त्वरण, a = 

(v−u)t

t

(vu)

 (वेग में परिवर्तन की दर)

तो, संवेग में परिवर्तन की दर = m × a

नियम के अनुसार, बल (F) ∝ संवेग में परिवर्तन की दर

F ∝ ma

इस समानुपात को समीकरण में बदलने के लिए एक नियतांक k का उपयोग किया जाता है:

F = kma

SI प्रणाली में मात्रकों को इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि नियतांक k का मान 1 होता है। इसलिए, यह समीकरण अपना सबसे प्रसिद्ध रूप ले लेता है।


बल का सूत्र: F = ma

यह न्यूटन के दूसरे नियम का सबसे सरल और प्रसिद्ध रूप है।

सूत्र:

बल = द्रव्यमान × त्वरण
F = m × a

यह सूत्र हमें तीन महत्वपूर्ण बातें बताता है:

  1. बल (F) ∝ त्वरण (a): यदि द्रव्यमान स्थिर है, तो किसी वस्तु में अधिक त्वरण उत्पन्न करने के लिए अधिक बल लगाना होगा। (किसी गेंद को धीरे से फेंकने की तुलना में तेजी से फेंकने में अधिक बल लगता है)।
  2. बल (F) ∝ द्रव्यमान (m): यदि त्वरण स्थिर है, तो भारी वस्तु को गति देने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है। (एक खाली और एक भरी हुई शॉपिंग कार्ट को समान गति से धकेलने में, भरी हुई कार्ट पर अधिक बल लगाना पड़ता है)।
  3. त्वरण (a) ∝ 1/द्रव्यमान (m): यदि बल स्थिर है, तो भारी वस्तु में कम त्वरण और हल्की वस्तु में अधिक त्वरण उत्पन्न होगा। (यदि आप एक ही बल से एक फुटबॉल और एक पत्थर को किक मारते हैं, तो फुटबॉल बहुत तेजी से दूर जाएगी)।

दैनिक जीवन में उदाहरण (संवेग के सिद्धांत पर आधारित):


न्यूटन का गति का तीसरा नियम: क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम (Newton’s Third Law: The Law of Action and Reaction)

न्यूटन का तीसरा नियम प्रकृति में बलों (forces) के व्यवहार का एक मौलिक सिद्धांत बताता है। यह नियम बताता है कि ब्रह्मांड में कोई भी बल अकेला नहीं होता; बल हमेशा जोड़े (pairs) में मौजूद होते हैं।

नियम का कथन:

“प्रत्येक क्रिया (action) के बराबर तथा विपरीत दिशा में एक प्रतिक्रिया (reaction) होती है।”

इसका सरल अर्थ है:
यदि कोई वस्तु (A) किसी दूसरी वस्तु (B) पर बल लगाती है, तो दूसरी वस्तु (B) भी पहली वस्तु (A) पर उतना ही बल, लेकिन विपरीत दिशा में, लगाती है।


तीसरे नियम की मुख्य विशेषताएँ:

  1. बल हमेशा जोड़े में होते हैं: प्रकृति में कोई एक अकेला, पृथक बल संभव नहीं है।
  2. क्रिया और प्रतिक्रिया परिमाण में बराबर होते हैं: दोनों बलों का मान (strength) हमेशा एक समान होता है। 10 न्यूटन की क्रिया पर 10 न्यूटन की ही प्रतिक्रिया होगी।
  3. क्रिया और प्रतिक्रिया दिशा में विपरीत होते हैं: यदि क्रिया पूर्व दिशा में है, तो प्रतिक्रिया पश्चिम दिशा में होगी।
  4. क्रिया और प्रतिक्रिया अलग-अलग वस्तुओं पर कार्य करते हैं: यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। ये दोनों बल एक ही वस्तु पर नहीं लगते, इसलिए वे एक-दूसरे को कभी भी निरस्त (cancel out) नहीं करते हैं।

गणितीय रूप में:
यदि वस्तु A द्वारा वस्तु B पर लगाया गया बल F_BA है, और वस्तु B द्वारा वस्तु A पर लगाया गया बल F_AB है, तो:

F_AB = – F_BA

यहाँ ऋणात्मक (-) चिन्ह यह दर्शाता है कि दोनों बलों की दिशा एक-दूसरे के विपरीत है।


एक आम ग़लतफ़हमी: बल एक-दूसरे को निरस्त क्यों नहीं करते?

यह एक सामान्य प्रश्न है कि यदि क्रिया और प्रतिक्रिया बराबर और विपरीत हैं, तो वे एक-दूसरे को संतुलित करके शून्य क्यों नहीं कर देते और गति कैसे संभव है?

उत्तर: ऐसा इसलिए होता है क्योंकि क्रिया और प्रतिक्रिया दो अलग-अलग वस्तुओं पर कार्य करते हैं।


दैनिक जीवन में क्रिया-प्रतिक्रिया के उदाहरण:

  1. पैदल चलना या दौड़ना: जब हम चलते हैं, तो हम अपने पैरों से जमीन को पीछे की ओर धकेलते हैं (यह क्रिया है)। इसके जवाब में, जमीन हमें आगे की ओर धकेलती है (यह प्रतिक्रिया है), और इसी प्रतिक्रिया बल के कारण हम आगे बढ़ पाते हैं।
  2. बंदूक से गोली चलाना: जब बंदूक से गोली छोड़ी जाती है, तो बंदूक गोली को आगे की ओर बल लगाकर धकेलती है (क्रिया)। उसी समय, गोली भी बंदूक को पीछे की ओर उतने ही बल से धकेलती है (प्रतिक्रिया)। इसी प्रतिक्रिया बल के कारण बंदूक चलाने वाले को कंधे पर झटका (recoil) महसूस होता है।
  3. रॉकेट का प्रक्षेपण: रॉकेट अत्यधिक वेग से गैसों को नीचे की ओर फेंकता है (क्रिया)। ये गैसें रॉकेट को उतने ही बल से ऊपर की ओर धकेलती हैं (प्रतिक्रिया), जिससे रॉकेट ऊपर उठता है।
  4. तैरना: एक तैराक पानी को अपने हाथों से पीछे की ओर धकेलता है (क्रिया)। इसके परिणामस्वरूप, पानी तैराक को आगे की ओर धकेलता है (प्रतिक्रिया)।
  5. नाव खेना: नाविक चप्पू (oar) से पानी को पीछे धकेलता है (क्रिया), और पानी नाव को आगे धकेलता है (प्रतिक्रिया)।
  6. पक्षी का उड़ना: पक्षी अपने पंखों से हवा को नीचे की ओर धकेलता है (क्रिया)। हवा, प्रतिक्रिया के रूप में, पक्षी को ऊपर की ओर धकेलती है, जिससे वह हवा में रह पाता है।
क्रिया (Action)प्रतिक्रिया (Reaction)
पैर का जमीन को पीछे धकेलना।जमीन का पैर को आगे धकेलना।
बंदूक का गोली को आगे धकेलना।गोली का बंदूक को पीछे धकेलना।
रॉकेट का गैसों को नीचे फेंकना।गैसों का रॉकेट को ऊपर उठाना।
हाथ का पानी को पीछे धकेलना।पानी का हाथ (तैराक) को आगे धकेलना।

वृत्तीय गति: अभिकेंद्रीय और अपकेंद्रीय बल (Circular Motion: Centripetal and Centrifugal Force)

वृत्तीय गति (Circular Motion)

परिभाषा: जब कोई वस्तु किसी वृत्ताकार पथ (circular path) पर गति करती है, तो उसकी गति को वृत्तीय गति कहते हैं।

वृत्तीय गति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि भले ही वस्तु की चाल (speed) स्थिर हो, उसका वेग (velocity) लगातार बदलता रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वेग एक सदिश राशि है, जिसमें परिमाण (चाल) और दिशा दोनों होते हैं। वृत्ताकार पथ पर हर बिंदु पर वस्तु की गति की दिशा बदलती है।

चूंकि वेग में परिवर्तन हो रहा है, इसका अर्थ है कि वस्तु में त्वरण (acceleration) है। न्यूटन के दूसरे नियम (F=ma) के अनुसार, जहाँ त्वरण होता है, वहाँ एक बल भी होना चाहिए। यही बल वस्तु को सीधी रेखा में जाने से रोककर वृत्ताकार पथ पर बनाए रखता है।


अभिकेंद्रीय बल (Centripetal Force)

परिभाषा: यह वह वास्तविक बल (Real Force) है जो किसी वस्तु को वृत्ताकार पथ पर गति करने के लिए आवश्यक होता है। यह बल वस्तु को लगातार पथ के केंद्र की ओर खींचता है।

“Centripetal” का अर्थ है “केंद्र की ओर लगने वाला” (center-seeking)।

मुख्य बिंदु:

  1. दिशा: इस बल की दिशा हमेशा वृत्ताकार पथ के केंद्र की ओर (towards the center) होती है और वस्तु के वेग की दिशा के लंबवत (perpendicular) होती है।
  2. यह कोई नया बल नहीं है: अभिकेंद्रीय बल अपने आप में कोई मौलिक बल नहीं है, बल्कि यह पहले से मौजूद बलों जैसे गुरुत्वाकर्षण, तनाव, घर्षण या विद्युत चुम्बकीय बल द्वारा प्रदान की जाने वाली एक भूमिका है।
  3. प्रभाव: यदि यह बल न हो, तो वस्तु न्यूटन के पहले नियम (जड़त्व) के अनुसार, अपनी गति की दिशा में एक सीधी रेखा में (वृत्त की स्पर्शरेखा पर) चली जाएगी।

सूत्र:

F_c = (mv²)/r

जहाँ:

दैनिक जीवन में उदाहरण:


अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force)

परिभाषा: यह एक आभासी या छद्म बल (Pseudo or Fictitious Force) है जो एक घूमते हुए निर्देश तंत्र (rotating frame of reference) में अनुभव होता है। यह कोई वास्तविक बल नहीं है जो किसी क्रिया के कारण उत्पन्न होता हो, बल्कि यह जड़त्व (Inertia) का ही एक प्रभाव है।

“Centrifugal” का अर्थ है “केंद्र से दूर जाने वाला” (center-fleeing)।

मुख्य बिंदु:

  1. दिशा: इसकी दिशा हमेशा वृत्त के केंद्र से बाहर की ओर (away from the center) महसूस होती है।
  2. अनुभव: यह बल केवल उसी व्यक्ति या वस्तु को महसूस होता है जो स्वयं घूम रही प्रणाली का हिस्सा है। बाहर खड़े किसी पर्यवेक्षक के लिए यह बल अस्तित्व में नहीं होता।
  3. कारण: यह बल वस्तु के जड़त्व के कारण महसूस होता है। वस्तु सीधी रेखा में गति करना चाहती है, लेकिन जब उसे वृत्ताकार पथ पर मोड़ा जाता है, तो उसे एक बाहरी ओर का धक्का महसूस होता है।

दैनिक जीवन में उदाहरण:

अभिकेंद्रीय और अपकेंद्रीय बल में तुलनात्मक अंतर

आधारअभिकेंद्रीय बल (Centripetal Force)अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force)
बल की प्रकृतियह एक वास्तविक बल (Real Force) है।यह एक आभासी/छद्म बल (Pseudo Force) है।
दिशाकेंद्र के अंदर की ओरकेंद्र से बाहर की ओर
कारणयह गुरुत्वाकर्षण, तनाव, घर्षण जैसे वास्तविक बलों के कारण होता है।यह घूमती हुई प्रणाली में जड़त्व (Inertia) के प्रभाव के कारण होता है।
निर्देश तंत्रयह जड़त्वीय और गैर-जड़त्वीय (घूमते हुए) दोनों तंत्रों से देखा जा सकता है।यह केवल गैर-जड़त्वीय (घूमते हुए) निर्देश तंत्र में ही अनुभव होता है।
प्रभावयह वस्तु को वृत्ताकार पथ पर बनाए रखता है।यह वस्तु को केंद्र से बाहर की ओर धकेलने का आभास कराता है।


प्रक्षेप्य गति (Projectile Motion)

परिभाषा: जब किसी पिंड (object) को प्रारंभिक वेग देकर वायु में फेंका जाता है, और वह केवल गुरुत्वाकर्षण बल (force of gravity) के प्रभाव में गति करता है, तो इस प्रकार की गति को प्रक्षेप्य गति कहते हैं।

इस गति का अध्ययन करते समय हम वायु के प्रतिरोध (air resistance) को नगण्य (negligible) मान लेते हैं।

उदाहरण:


प्रक्षेप्य गति का मूल सिद्धांत

प्रक्षेप्य गति को समझना तब बहुत आसान हो जाता है जब हम इसे दो स्वतंत्र एक-दूसरे के लंबवत गतियों में विभाजित करते हैं:

  1. क्षैतिज गति (Horizontal Motion): यह एकसमान वेग से होती है।
  2. ऊर्ध्वाधर गति (Vertical Motion): यह एकसमान त्वरण (गुरुत्वीय त्वरण ‘g’) के अंतर्गत होती है।

इन दोनों गतियों को जोड़ने वाली एकमात्र कड़ी समय (time) है। जितने समय तक पिंड हवा में रहता है, उतने ही समय तक वह क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर, दोनों दिशाओं में गति करता है।

दोनों गतियों का विश्लेषण

मान लीजिए एक पिंड को क्षैतिज से θ कोण पर u प्रारंभिक वेग से फेंका जाता है।

प्राचल (Parameter)क्षैतिज गति (X-अक्ष)ऊर्ध्वाधर गति (Y-अक्ष)
प्रारंभिक वेग (Initial Velocity)uₓ = u cos θuᵧ = u sin θ
त्वरण (Acceleration)aₓ = 0 <br> (क्योंकि क्षैतिज दिशा में कोई बल नहीं है)aᵧ = -g <br> (गुरुत्वाकर्षण बल हमेशा नीचे की ओर लगता है)
समय बाद वेगvₓ = uₓ = u cos θ <br> (वेग स्थिर रहता है)vᵧ = uᵧ + aᵧt = u sin θ – gt <br> (वेग लगातार बदलता है)
समय बाद स्थितिx = uₓt = (u cos θ)ty = uᵧt + ½ aᵧt² = (u sin θ)t – ½ gt²

प्रक्षेप्य गति से संबंधित महत्वपूर्ण सूत्र

इन सूत्रों का उपयोग प्रक्षेप्य गति से संबंधित गणनाओं में किया जाता है।

1. उड्डयन काल (Time of Flight, T)

यह वह कुल समय है जितने समय तक प्रक्षेप्य (पिंड) हवा में रहता है।

T = (2u sin θ) / g

2. अधिकतम ऊँचाई (Maximum Height, H)

यह प्रक्षेप्य द्वारा अपनी गति के दौरान प्राप्त की गई अधिकतम ऊर्ध्वाधर ऊँचाई है। अधिकतम ऊँचाई पर पिंड का ऊर्ध्वाधर वेग ( हो जाता है।

H = (u² sin² θ) / (2g)

3. क्षैतिज परास (Horizontal Range, R)

यह प्रक्षेप्य द्वारा अपने उड्डयन काल के दौरान तय की गई कुल क्षैतिज दूरी है।

R = (u² sin 2θ) / g


प्रक्षेप्य पथ (Path of Projectile)

महत्वपूर्ण बिंदु और विशेष स्थितियाँ

  1. अधिकतम क्षैतिज परास (Maximum Horizontal Range):
    • परास (Range) का मान sin 2θ पर निर्भर करता है।
    • परास अधिकतम तब होगा जब sin 2θ का मान अधिकतम (जो कि 1 होता है) हो।
    • sin 2θ = 1 => 2θ = 90° => θ = 45°
    • अतः, किसी पिंड को 45° के कोण पर फेंकने पर वह अधिकतम क्षैतिज दूरी तय करता है।
  2. समान परास (Same Range):
    • दो कोणों θ और (90° – θ) पर फेंके गए प्रक्षेप्य का क्षैतिज परास समान होता है (यदि प्रारंभिक वेग ‘u’ समान है)।
    • उदाहरण के लिए, 30° और 60° पर फेंके गए पिंड समान दूरी पर जाकर गिरेंगे, लेकिन 60° पर फेंका गया पिंड अधिक ऊँचाई तक जाएगा और हवा में अधिक देर तक रहेगा।
  3. अधिकतम ऊँचाई पर गति:
    • अधिकतम ऊँचाई पर, ऊर्ध्वाधर वेग (vᵧ) शून्य होता है, लेकिन क्षैतिज वेग (vₓ = u cos θ) बना रहता है।
    • इसलिए, अधिकतम ऊँचाई पर पिंड की कुल गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) शून्य नहीं होती है।
    • इस बिंदु पर वेग और त्वरण एक-दूसरे के लंबवत होते हैं। त्वरण (g) हमेशा नीचे की ओर होता है और वेग क्षैतिज दिशा में होता है।


कार्य, ऊर्जा और शक्ति

कार्य और ऊर्जा: परिभाषा एवं अवधारणाएँ

भौतिकी में कार्य (Work) और ऊर्जा (Energy) दो सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। ये दोनों एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। ऊर्जा के बिना कार्य संभव नहीं है और किया गया कार्य ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है।


कार्य (Work)

सामान्य अर्थ में: हम अपने दैनिक जीवन में किसी भी मानसिक या शारीरिक परिश्रम को “कार्य” कहते हैं, जैसे पढ़ना, सोचना, या एक जगह पर खड़े होकर वजन उठाए रखना।

भौतिकी के अर्थ में: भौतिकी में “कार्य” का एक विशिष्ट और सटीक अर्थ है। भौतिकी के अनुसार, कार्य तभी किया हुआ माना जाता है जब किसी वस्तु पर बल (Force) लगाया जाए और वह वस्तु बल की दिशा में कुछ विस्थापित (displace) हो।

यदि इन दोनों में से कोई एक भी शर्त पूरी नहीं होती, तो कोई कार्य नहीं किया जाता।

कार्य की परिभाषा:

“किसी वस्तु पर लगाए गए बल तथा बल की दिशा में हुए विस्थापन के गुणनफल को कार्य कहते हैं।”

सूत्र:

  1. जब बल विस्थापन की दिशा में हो:
    कार्य = बल × विस्थापन
    W = F × s
  2. जब बल विस्थापन से किसी कोण (θ) पर लगा हो:
    W = Fs cos θ

जहाँ:

कार्य के प्रकार:

  1. धनात्मक कार्य (Positive Work): जब बल विस्थापन की दिशा में (या 0° और 90° के बीच किसी कोण पर) लगता है, तो किया गया कार्य धनात्मक होता है। उदाहरण: घोड़े द्वारा गाड़ी को खींचना।
  2. ऋणात्मक कार्य (Negative Work): जब बल विस्थापन की विपरीत दिशा में (या 90° और 180° के बीच किसी कोण पर) लगता है, तो कार्य ऋणात्मक होता है। उदाहरण: ब्रेक लगाने पर घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य।
  3. शून्य कार्य (Zero Work): कार्य शून्य होता है जब:
    • कोई विस्थापन न हो (s=0): जैसे दीवार को धकेलना।
    • कोई बल न हो (F=0): जैसे अंतरिक्ष में एकसमान वेग से गति करती वस्तु।
    • बल और विस्थापन के बीच का कोण 90° हो (θ=90°): जैसे कुली द्वारा सिर पर बोझ रखकर क्षैतिज प्लेटफॉर्म पर चलना (गुरुत्वाकर्षण बल नीचे और विस्थापन आगे की ओर होता है)।

SI मात्रक: कार्य का SI मात्रक जूल (Joule) है। 1 जूल कार्य वह होता है जब 1 न्यूटन का बल किसी वस्तु को 1 मीटर तक विस्थापित करता है।
प्रकृति: यह एक अदिश राशि (Scalar Quantity) है।


ऊर्जा (Energy)

परिभाषा:

“किसी वस्तु के कार्य करने की क्षमता (capacity to do work) को उस वस्तु की ऊर्जा कहते हैं।”

सरल शब्दों में, यदि किसी वस्तु में ऊर्जा है, तो वह किसी दूसरी वस्तु पर बल लगाकर कार्य कर सकती है। जिस वस्तु पर कार्य किया जाता है, उसकी ऊर्जा बढ़ जाती है और जो वस्तु कार्य करती है, उसकी ऊर्जा कम हो जाती है।

SI मात्रक: ऊर्जा का SI मात्रक भी जूल (Joule) है।
प्रकृति: यह भी एक अदिश राशि (Scalar Quantity) है।

ऊर्जा के विभिन्न रूप:
ऊर्जा प्रकृति में कई रूपों में मौजूद है, जैसे – ऊष्मा ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा, ध्वनि ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, और नाभिकीय ऊर्जा।

यांत्रिकी (Mechanics) में, हम मुख्य रूप से यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) का अध्ययन करते हैं, जो दो प्रकार की होती है:

1. गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)

किसी वस्तु में उसकी गति (motion) के कारण जो कार्य करने की क्षमता होती है, उसे उसकी गतिज ऊर्जा कहते हैं।

2. स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy)

किसी वस्तु में उसकी विशेष स्थिति (position) या आकृति (configuration) के कारण जो कार्य करने की क्षमता होती है, उसे उसकी स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।

ऊर्जा संरक्षण का नियम: यह एक मौलिक नियम है जिसके अनुसार, “ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है; इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।”


ऊर्जा संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Energy)

ऊर्जा संरक्षण का नियम भौतिकी के सबसे मौलिक और महत्वपूर्ण सिद्धांतों में से एक है। यह नियम ऊर्जा के व्यवहार को नियंत्रित करता है और हमें बताता है कि ऊर्जा का कुल हिसाब हमेशा बराबर रहता है।

नियम का कथन:

“ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है; इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित (transform) किया जा सकता है।”

दूसरे शब्दों में, किसी भी विलगित निकाय (isolated system) की कुल ऊर्जा सदैव स्थिर या संरक्षित रहती है। इसका अर्थ है कि ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा हमेशा नियत (constant) रहती है। ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में बदलती है, लेकिन उसकी कुल मात्रा हमेशा उतनी ही रहती है।


यांत्रिक ऊर्जा संरक्षण (Conservation of Mechanical Energy)

यांत्रिकी में, हम अक्सर यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy) के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करते हैं। यांत्रिक ऊर्जा, गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा का योग होती है।

यदि किसी निकाय पर केवल संरक्षी बल (conservative forces) (जैसे गुरुत्वाकर्षण बल) कार्य कर रहे हों और कोई बाहरी बल (जैसे घर्षण) न हो, तो निकाय की कुल यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है।

गणितीय रूप में:

(K.E. + P.E.)_प्रारंभिक = (K.E. + P.E.)_अंतिम
½ mu² + mgh₁ = ½ mv² + mgh₂


यह नियम कैसे काम करता है: एक उदाहरण

आइए एक स्वतंत्र रूप से गिरती हुई गेंद का उदाहरण लेते हैं ताकि समझ सकें कि ऊर्जा कैसे परिवर्तित होती है।

  1. अधिकतम ऊँचाई पर (स्थिति A):
    • जब गेंद को अधिकतम ऊँचाई पर पकड़ा जाता है, तो वह स्थिर होती है (v=0), इसलिए उसकी गतिज ऊर्जा = 0
    • अपनी ऊँचाई के कारण, उसकी स्थितिज ऊर्जा = अधिकतम (mgh)
    • कुल ऊर्जा = 0 + स्थितिज ऊर्जा
  2. गिरने के दौरान (स्थिति B):
    • जैसे ही गेंद गिरना शुरू करती है, उसकी ऊँचाई कम होने लगती है, जिससे उसकी स्थितिज ऊर्जा घटती है
    • साथ ही, उसका वेग बढ़ता है, जिससे उसकी गतिज ऊर्जा बढ़ती है
    • स्थितिज ऊर्जा में जितनी कमी आती है, गतिज ऊर्जा में उतनी ही वृद्धि होती है।
    • कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा (यह अभी भी स्थिति A के बराबर है)।
  3. जमीन से टकराने से ठीक पहले (स्थिति C):
    • जब गेंद जमीन के सबसे करीब होती है (h≈0), तो उसकी स्थितिज ऊर्जा ≈ 0
    • इस बिंदु पर उसका वेग अधिकतम होता है, इसलिए उसकी गतिज ऊर्जा = अधिकतम (½ mv²)
    • कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + 0

इस पूरी प्रक्रिया में, स्थितिज ऊर्जा लगातार गतिज ऊर्जा में बदलती रही, लेकिन किसी भी बिंदु पर कुल ऊर्जा (K.E. + P.E.) का मान स्थिर रहा।


दैनिक जीवन में ऊर्जा संरक्षण के उदाहरण:

  1. घड़ी का पेंडुलम: पेंडुलम जब एक किनारे पर अधिकतम ऊँचाई पर होता है, तो उसमें अधिकतम स्थितिज ऊर्जा होती है। जैसे ही वह नीचे आता है, स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में बदल जाती है। सबसे निचले बिंदु पर गतिज ऊर्जा अधिकतम होती है। फिर वह दूसरी ओर ऊपर जाता है, और गतिज ऊर्जा वापस स्थितिज ऊर्जा में बदल जाती है।
  2. जलविद्युत बाँध (Hydroelectric Dam): बाँध में ऊँचाई पर संग्रहीत पानी में स्थितिज ऊर्जा होती है। जब पानी नीचे गिरता है, तो यह गतिज ऊर्जा में बदल जाती है। यह गिरता हुआ पानी टरबाइन को घुमाता है (यांत्रिक ऊर्जा), जिससे जनरेटर चलता है और विद्युत ऊर्जा बनती है।
  3. लाइट बल्ब: बल्ब में विद्युत ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा और ऊष्मा ऊर्जा में परिवर्तित होती है।
  4. भोजन करना: भोजन में संग्रहीत रासायनिक ऊर्जा, हमारे शरीर में काम करने के लिए यांत्रिक ऊर्जा और शरीर को गर्म रखने के लिए ऊष्मीय ऊर्जा में बदल जाती है।

महत्वपूर्ण बिंदु


शक्ति (Power) और इसके मात्रक

भौतिकी में शक्ति (Power) का संबंध कार्य और ऊर्जा से है, लेकिन यह उनसे एक महत्वपूर्ण पहलू में भिन्न है – यह समय के कारक को शामिल करता है।


शक्ति (Power) की परिभाषा

परिभाषा:

“कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं।”

दूसरे शब्दों में, शक्ति यह बताती है कि कोई कार्य कितनी तेजी से या कितनी धीमी गति से किया जा रहा है, अथवा ऊर्जा कितनी तेजी से एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो रही है।

अवधारणा:
मान लीजिए, दो मजदूर एक समान कार्य (जैसे 100 ईंटों को पहली मंजिल पर ले जाना) करते हैं। पहला मजदूर यह काम 1 घंटे में करता है, जबकि दूसरा मजदूर 2 घंटे में करता है। यहाँ, दोनों ने कार्य तो बराबर किया है, लेकिन पहले मजदूर ने कार्य को तेजी से किया, इसलिए उसकी शक्ति दूसरे मजदूर से अधिक है।

सूत्र:

शक्ति = किया गया कार्य / लिया गया समय

गणितीय रूप में:

P = W / t

जहाँ:

चूंकि कार्य और ऊर्जा आपस में संबंधित हैं, शक्ति को ऊर्जा के रूपांतरण की दर के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है।

शक्ति = उपभुक्त ऊर्जा / लिया गया समय

प्रकृति: शक्ति एक अदिश राशि (Scalar Quantity) है।
विमीय सूत्र: [ML²T⁻³]


शक्ति के मात्रक (Units of Power)

शक्ति के कई मात्रक हैं, जिनका उपयोग विभिन्न संदर्भों में किया जाता है।

1. वॉट (Watt – W)

2. किलोवॉट (Kilowatt – kW)

3. मेगावॉट (Megawatt – MW)

4. अश्वशक्ति (Horsepower – HP)

महत्वपूर्ण रूपांतरण (Important Conversion):

1 अश्वशक्ति (HP) = 746 वॉट (लगभग)


कार्य, ऊर्जा और शक्ति में तुलना

आधारकार्य (Work)ऊर्जा (Energy)शक्ति (Power)
परिभाषाबल और विस्थापन का गुणनफल।कार्य करने की क्षमता।कार्य करने की दर।
क्या मापता है?यह बताता है कि ‘कितना’ प्रयास किया गया।यह बताता है कि ‘कितना’ कार्य किया जा सकता है।यह बताता है कि ‘कितनी तेजी से’ कार्य किया गया।
SI मात्रकजूल (Joule)जूल (Joule)वॉट (Watt) या जूल/सेकंड
प्रकृतिअदिश राशिअदिश राशिअदिश राशि