छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -4
छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -1
छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -2
छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -3
🌾 छत्तीसगढ़ में हुए प्रमुख किसान आन्दोलन
📖 अंग्रेजों के शासन के दौरान, संपूर्ण भारत की तरह छत्तीसगढ़ की कई रियासतों और जमींदारियों में भी किसानों ने शोषणकारी नीतियों का विरोध किया। उन्होंने अपने वाजिब हकों की मांग करते हुए आंदोलन शुरू किए। छत्तीसगढ़ के मुख्य कृषक आंदोलनों का ब्यौरा नीचे दिया गया है।
📅 प्रमुख किसान आंदोलनों की संक्षिप्त सारणी
| वर्ष | स्थान | नेतृत्वकर्ता |
| 1879-80 | राजनांदगांव | सेवता ठाकुर |
| 1920 | कंडेल ग्राम | पं. सुन्दरलाल शर्मा |
| 1937-39 | डौंडीलोहारा | नरसिंह प्रसाद अग्रवाल |
| 1938-39 | छुईखदान | रामनारायण मिश्र (हर्षुल) |
| 1941 | सारंगढ़ | दानीराम पटेल |
| 1944-45 | कांकेर | इंदु केंवट |
| 1947 | सक्ती | स्थानीय निवासी |
💡 विशेष नोट: 17 अक्टूबर 1937 को रायपुर के आनंद समाज पुस्तकालय में एक महत्वपूर्ण किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व श्री कन्हैयालाल मिश्र ने संभाला था।
✊ आंदोलनों का विस्तृत विवरण
1. बेगार विरोधी आंदोलन (1879-80)
- 📍 स्थान: राजनांदगांव
- 👤 नेतृत्वकर्ता: सेवता ठाकुर
- 📜 घटनाक्रम:
- सामंती व्यवस्था के अंतर्गत राजनांदगांव एक सामंती राज्य था। 1870 में महंत घासीदास को शासक नियुक्त किया गया।
- इसके बाद राजनांदगांव एक नगर के रूप में विकसित होने लगा, जहाँ बेगारी (बिना मजदूरी के जबरन काम) की प्रथा बढ़ गई।
- इस प्रथा से परेशान होकर किसानों ने 1879-80 में सेवता ठाकुर के नेतृत्व में यह आंदोलन चलाया।
2. डौंडीलोहारा जमींदारी में किसान आंदोलन (1937-39)
[CG Vyapam (HW) 2016]
- 📍 स्थान: मालीथोरी बाजार गांव, डौंडीलोहारा (बालोद)
- 👤 नेतृत्वकर्ता: नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, उनके छोटे भाई सरयू प्रसाद अग्रवाल, और पं. रत्नाकर झा।
- 🤝 सहयोगी: वली मोहम्मद
- 🌱 कारण:
- डौंडीलोहारा के जमींदार और दीवान मनीराम पांडेय की शोषणकारी नीतियों के कारण स्थानीय लोगों को जंगल से चरी-निस्तारी (पशुओं के लिए चारा और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएँ) जैसी अनेक सुविधाओं से वंचित कर दिया गया था।
- 📜 घटनाक्रम:
- 28 अगस्त, 1937 को डौंडीलोहारा के सभी किसान मालीथोरी बाजार में एक विशाल जनसभा के लिए एकत्र हुए।
- उन्होंने दीवान की गलत नीतियों की कड़ी आलोचना की और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया।
- किसानों के अनुरोध पर गांधीवादी नेता सरयू प्रसाद अग्रवाल ने नेतृत्व स्वीकार किया और 9 दिनों का अनशन रखा।
- ⚖️ परिणाम:
- समय के साथ, आंदोलन के नेता नरसिंह प्रसाद अग्रवाल, सरयू प्रसाद अग्रवाल और वली मोहम्मद को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया। उन्हें और अन्य सत्याग्रहियों को सजा भी हुई।
- हालांकि, कांग्रेस मंत्रिमंडल के सत्ता से हटने से पहले ही इन किसान सत्याग्रहियों और नेताओं को जेल से रिहा कर दिया गया।
- 5 मई 1939 को कुसुमकसा गांव में एक विशाल सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसके बाद चरी और निस्तारी के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाया गया। [CG PSC (SEE) 2022]
3. प्रांतीय किसान सम्मेलन (17 अक्टूबर 1937)
- 📍 स्थान: आनंद समाज पुस्तकालय, रायपुर
- 👤 अध्यक्ष: कन्हैया लाल मिश्र
- 🤝 सहयोगी: यतियतन लाल
- 🎯 उद्देश्य: किसानों की समस्याओं को मांग के रूप में प्रस्तुत कर प्रस्ताव पारित करना।
4. छुईखदान रियासत में ‘लगान बंदी’ आंदोलन (1938-39)
[CG PSC(ADJE)2020], [CG PSC(ADR)2019]
- 📍 स्थान: छुईखदान रियासत
- 🌱 कारण: अंग्रेज-भक्त दीवान की शोषण करने वाली नीतियां।
- 👤 नेतृत्वकर्ता: रामनारायण मिश्र (हर्षल)
- 🌍 समतुल्यता: इस आंदोलन की तुलना बारदोली सत्याग्रह से की जाती है।
- 📜 घटनाक्रम:
- श्री रामनारायण मिश्र दीवान की शोषक नीतियों के बारे में बताने के लिए महात्मा गांधी से मिलने दिल्ली गए।
- ⚖️ परिणाम:
- गांधीजी और अन्य कांग्रेस नेताओं का मानना था कि “रियासत के आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप रियासती जनता के हितों को नुकसान पहुंचाएगा।”
- इसी विचार के कारण गांधीजी ने लगानबंदी आंदोलन में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया और उनकी सलाह पर यह आंदोलन स्थगित कर दिया गया।
5. सारंगढ़ रियासत में किसान आंदोलन (1941)
- 📍 स्थान: सारंगढ़
- 👤 नेतृत्वकर्ता: दानीराम पटेल (परसाडीह के गौटिया)
- 🌱 कारण: ‘चरी’ नामक एक विशेष कर का विरोध।
- ⚖️ परिणाम: उस समय के सारंगढ़ नरेश, जवाहर सिंह, ने रियासत में ली जाने वाली बेगार प्रथा को समाप्त करने की घोषणा की।
6. कांकेर में किसान आंदोलन (1944-45)
- 📍 स्थान: कांकेर रियासत
- 👤 नेतृत्वकर्ता: इंदु केंवट (सुरंगदाह गाँव के गौटिया)
- 🌱 कारण: दीवान जे.एन. महंत को हटाकर टी. महापात्र को कांकेर रियासत का नया दीवान बनाना।
- 📜 घटनाक्रम:
- दीवान टी. महापात्र ने 1944 में एक नया भू-बंदोबस्त लागू किया, जिसके तहत राजस्व वसूली का काम ठेका प्रणाली पर दे दिया गया।
- इस व्यवस्था के कारण गांव के गौटिया अधिक राजस्व वसूलने के लिए किसानों का शोषण करने लगे।
- इस नई भू-राजस्व प्रणाली से लोगों में गहरा असंतोष फैल गया और इंदु केंवट ने लोगों को लगान नहीं देने के लिए प्रेरित किया।
- ⚖️ परिणाम: विद्रोह के विशाल रूप को देखते हुए, रियासत के प्रमुख भानुप्रताप देव ने विद्रोही किसानों के साथ समझौता कर लिया।
7. सक्ती रियासत में किसान आंदोलन (नवम्बर 1947)
- 📍 स्थान: सक्ती
- 👤 नेतृत्वकर्ता: स्थानीय निवासी
- 🤝 विशेष भूमिका: इस आंदोलन में ठाकुर प्यारेलाल सिंह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी।
- 🌱 कारण: तत्कालीन शासक लीलाधर सिंह की शोषणकारी कृषि नीति के विरुद्ध।
- 💡 विशेष नोट: सक्ती रियासत का भारतीय संघ में विलय होने के बाद भी यह कृषक आंदोलन जारी रहा था। [CGPSC(CMO)2010]
👑 छत्तीसगढ़ की जमींदारियां एवं देशी रियासतें
📜 ऐतिहासिक संदर्भ
- व्यवस्था की पृष्ठभूमि: जमींदारी प्रणाली के तहत, एक विशेष वर्ग को कुछ भू-क्षेत्रों पर प्रभुसत्ता स्वीकार करने के बदले में विशेष अधिकार प्राप्त थे। वे आवश्यकता पड़ने पर राजाओं को सैन्य सहायता प्रदान करते थे और इसके एवज में उन्हें कर से छूट मिलती थी। यह व्यवस्था कलचुरी और मराठा काल में भी बनी रही।
- अंग्रेजों का हस्तक्षेप: 1857 के विद्रोह में सोनाखान जमींदारी ने अंग्रेजों का कड़ा विरोध किया। इस घटना के बाद, ब्रिटिश अधिकारी सर रिचर्ड टेम्पल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे भारत सरकार को बताएं कि छत्तीसगढ़ के किन जमींदारों को फ्यूडेटरी चीफ (राजसी अधिकार वाला शासक) बनाया जा सकता है।
- व्यवस्था का पुनर्गठन: ब्रिटिश शासन के दौरान, सर रिचर्ड टेम्पल ने 1862 में जमींदारी व्यवस्था का नए सिरे से सर्वेक्षण कराकर इसे दो वर्गों में विभाजित कर दिया:
- 🥇 प्रथम वर्ग: इसमें उन रियासतों या जागीरदारियों को शामिल किया गया जिनके प्रमुख को ‘राजा’ कहा जाता था। इस तरह, छत्तीसगढ़ की कुल जमींदारियों में से केवल 14 जमींदारियों को रियासत का दर्जा मिला।
- 🥈 द्वितीय वर्ग: इसमें उन जमींदारी क्षेत्रों को रखा गया जिन्हें रियासत का दर्जा नहीं दिया गया था। इनके प्रमुखों को ‘जमींदार’ ही कहा जाता था।
🗺️ रियासतों का गठन
- शुरुआती दौर (1862): प्रारंभ में, 1862 में छत्तीसगढ़ की 9 जमींदारियों को रियासत (फ्यूड्यूटरी स्टेट) के रूप में मान्यता प्रदान की गई। उस समय नागपुर के कमिश्नर मिस्टर कास्थवेट थे।
- विस्तार का दौर (1905): ब्रिटिश शासन में बंगाल विभाजन के दौरान, 1905 में छत्तीसगढ़ के सम्बलपुर जिले की पांच जमींदारियों (कालाहांडी, पटना, रायखोल, बामरा, और सोनपुर) को बंगाल प्रांत में स्थानांतरित कर दिया गया। उसी समय, छोटानागपुर क्षेत्र की पांच जमींदारियों (कोरिया, चांगभखार, सरगुजा, उदयपुर, और जशपुर) को छत्तीसगढ़ में शामिल करके उन्हें देशी रियासत का दर्जा दिया गया।
- कुल संख्या: इस प्रकार 1905 में छत्तीसगढ़ की देशी रियासतों की कुल संख्या 14 हो गई।
👑 छत्तीसगढ़ की 14 रियासतें
| मूलतः शामिल 9 रियासतें (हिन्दी भाषी) | 1905 में शामिल 5 रियासतें (छत्तीसगढ़ी बोली) | 1905 में हटाई गईं 5 रियासतें (उड़िया भाषी) |
| 1. बस्तर | 1. कोरिया | 1. कालाहाण्डी |
| 2. कांकेर | 2. चांगभखार | 2. पटना |
| 3. नांदगांव | 3. सरगुजा | 3. रायखोल |
| 4. खैरागढ़ | 4. उदयपुर | 4. बामरा |
| 5. छुईखदान | 5. जशपुर | 5. सोनपुर |
| 6. कवर्धा | ||
| 7. सक्ती | ||
| 8. सारंगढ़ | ||
| 9. रायगढ़ |
🧠 जमींदारी व्यवस्था पर महत्वपूर्ण कथन
- मि. जेनकिन्स: “भौगोलिक स्थिति, सामाजिक संरचना और भूमि की व्यवस्था के कारण छत्तीसगढ़ में जमींदारों का وجود स्वाभाविक और आवश्यक रहा है।” [CG PSC(Pre)2021]
- रिचर्ड टेम्पल: “छत्तीसगढ़ के अशांत और अव्यवस्थित क्षेत्रों में शांति एवं व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से जमींदारियां स्थापित की गईं।”
📜 वे जमींदारियां जिन्हें रियासत का दर्जा नहीं मिला
| क्षेत्र | जमींदारियां | ||||
| रायपुर | 1. कोड़िया | 2. नर्रा | 3. सुअरमार | 4. फिंगेश्वर | 5. बिन्द्रानवागढ़ |
| 6. भटगांव | 7. बिलाईगढ़ | 8. फूलझर | 9. सोनाखान | 10. देवरी | |
| दुर्ग | 1. गंडई | 2. औंधी | 3. परपोड़ी/परपोड़ा | 4. अंबागढ़ चौकी | 5. ठाकुरटोला |
| 6. पानाबरस | 7. डौंडीलोहारा | ||||
| बस्तर | 1. परलकोट | 2. चितलनार | 3. अंतागढ़ | 4. सुकमा | 5. भोपालपट्टनम |
| बिलासपुर | 1. कोरबा | 2. चांपा | 3. लाफा | 4. छुरी | 5. केन्दा |
| 6. पेण्ड्रा | 7. मातीन | 8. उपरोड़ा | 9. पण्डरिया | ||
| रायगढ़ | 1. तारापुर | 2. डोंगरपाली | 3. बगीचा | 4. लैलूंगा | 5. खरियार/खैरिवाडीह |
| सरगुजा | 1. खड़गवां |
💡 विशेष तथ्य
- सन् 1947 से पहले छत्तीसगढ़ में 9 परगने और 27 जमींदारियां थीं। [CG PSC(SEE)2020]
- एकमात्र मुस्लिम जमींदारी: खुज्जी
- पिण्डारियों का प्रमुख केंद्र: पेण्ड्रा
- जमींदारी जब्त होने की घटना: कोरबा
🎖️ ब्रिटिश सरकार द्वारा शासकों को दी गई उपाधियाँ
| क्र. | शासक | रियासत | उपाधि |
| 1. | रघुनाथ शरण सिंह | सरगुजा | महाराजा बहादुर |
| 2. | रामानुज शरण सिंह | सरगुजा | कमांडर ऑफ द ब्रिटिश इंपीरियर |
| 3. | लाल विंधेश्वरी प्रसाद सिंहदेव | उदयपुर | राजा बहादुर व सितारे हिन्द |
| 4. | विष्णु प्रसाद सिंहदेव | जशपुर | राजा बहादुर |
| 5. | जगजीत सिंह | चांगभखार | भैय्या |
| 6. | रूद्रप्रताप देव | बस्तर | सेंट ऑफ जेरूसलम |
| 7. | भूपदेव सिंह | रायगढ़ | राजा बहादुर |
| 8. | चक्रधर सिंह | रायगढ़ | संगीत सम्राट |
| 9. | जवाहर सिंह | सारंगढ़ | राजा बहादुर व सी.आई.ई. |
| 10. | लीलाधर सिंह | सक्ती | राजा बहादुर |
| 11. | महंत बलरामदास | राजनांदगांव | राजा बहादुर |
इस सारणी में छत्तीसगढ़ की प्रमुख देशी रियासतों, उनके वंश, संस्थापक और विलय के समय के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किए गए हैं।
📜 रियासतों की विस्तृत सारणी
| क्र. | देशी रियासत | वंश | संस्थापक | सनद् प्राप्ति | शासक (सनद् के समय) | विलय पत्र पर हस्ताक्षरकर्ता |
| 1. | बस्तर | काकतीय | अन्नमदेव | 1908 | रूद्रप्रतापदेव | प्रवीरचन्द्र भंजदेव |
| 2. | कांकेर | सोमवंश | सिंहराज | 20 मई 1865 | नरहरदेव | भानुप्रतापसिंह देव |
| 3. | राजनांदगांव | बैरागी वंश | महंत हरिदास | 1865 [CG PSC(Pre)2022] | महंत घासीदास | रानी जयंती देवी [CG PSC (ADH) 2022] |
| 4. | खैरागढ़ | नागवंश | लक्ष्मीनिधि राय | 20 मई 1865 | लाल फत्तेसिंह | राजा विरेन्द्र बहादुर सिंह |
| 5. | छुईखदान | बैरागी वंश | महंत रूपदास | 20 मई 1863 | महंत लक्ष्मणदास | रितुपर्ण किशोर दास |
| 6. | कवर्धा | राजगोंड़ | महाबली सिंह | 1865 | बहादुर सिंह | धर्मराज सिंह |
| 7. | रायगढ़ | राजगोंड़ | मदन सिंह | 1867 | घनश्याम सिंह | चक्रधर सिंह (विलय से पूर्व मृत्यु) |
| 8. | सारंगढ़ | राजगोंड़ | नरेन्द्र साय | 3 नवंबर 1909 | जवाहर सिंह | नरेशचन्द्र सिंह |
| 9. | सक्ती | राजगोंड़ | हरि व गुजर | 1865 | रणजीत सिंह | लीलाधर सिंह |
| 10. | चांगभखार | जगदीश सिंह | 1899 | भैय्या महावीर सिंह | कृष्णप्रताप सिंह | |
| 11. | कोरिया | क्षत्रीय चौहान | धारामल सिंह | 9 फरवरी 1876 | प्राण सिंह | रामानुजप्रताप सिंहदेव |
| 12. | सरगुजा | रक्सेल | विष्णुप्रताप सिंह | 1899 | रघुनाथशरण सिंह | रामानुजशरण सिंहदेव |
| 13. | उदयपुर | 1877 | धर्मजीत सिंह | चंद्रचूड़प्रताप सिंहदेव | ||
| 14. | जशपुर | सूर्य वंश | सुजान देव | 1899 | प्रतापनारायण सिंह | टी.सी.आर. मेनन (शासक-विजयभूषण) |
💡 ज्ञान परीक्षण (PYQ)
प्रश्न: राजनांदगांव रियासत के शासक महंत घासीदास को ब्रिटिश शासन द्वारा शासक होने का सनद (अधिकार पत्र) कब प्रदान किया गया था? [CG PSC(Pre)2022]
(A) 1861
(B) 1865
(C) 1869
(D) 1872
उत्तर: (B) 1865
👑 छत्तीसगढ़ की देशी रियासतें और उनका विलय
📜 छत्तीसगढ़ की 14 रियासतों की संरचना
- मूल 9 रियासतें: बस्तर, कांकेर, नांदगांव, खैरागढ़, छुईखदान, कवर्धा, सक्ती, सारंगढ़, रायगढ़।
- 1905 में शामिल 5 रियासतें: कोरिया, चांगभखार, सरगुजा, उदयपुर, जशपुर।
- 1905 में हटाई गई 5 रियासतें (संबलपुर क्षेत्र): कालाहाण्डी, पटना, रायखोल, बामरा, सोनपुर।
🌟 पूर्वी रियासत संघ: ओडिशा और छत्तीसगढ़ की रियासतों ने मिलकर एक ‘पूर्वी रियासत संघ’ का गठन किया था।
✍️ ‘अधिमिलन की नीति’ पर हस्ताक्षर
- पृष्ठभूमि: भारत सरकार ने रियासतों के भारत संघ में विलय के लिए एक ‘अधिमिलन पत्र’ का मसौदा तैयार किया।
- मुख्य शर्तें: इस प्रारूप के अनुसार, रियासतों को विदेशी मामले, रक्षा, और यातायात जैसे तीन प्रमुख विषयों पर अपना अधिकार भारत संघ को सौंपना था, और इस अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर कर भारतीय संघ में शामिल होना था।
- प्रमुख बैठक: 1 अगस्त 1947 को, छत्तीसगढ़ में अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए रायपुर के राजकुमार कॉलेज में रियासतों के प्रमुखों की एक बैठक हुई। हालांकि, इसमें बस्तर रियासत के प्रमुख शामिल नहीं हुए थे।
- कार्यान्वयन: 15 अगस्त 1947 को, भारतीय रियासत विभाग ने छत्तीसगढ़ की सभी 14 सामंतीय रियासतों को प्रवेश अनुबंध पत्र और यथास्थिति समझौते की प्रतियां डाक द्वारा भेजीं।
- 🥇 पहली रियासत: खैरागढ़ छत्तीसगढ़ की पहली रियासत थी जिसने भारत संघ में शामिल होने की स्वीकृति प्रदान की।
- 🤝 महत्वपूर्ण भूमिका: छत्तीसगढ़ की सभी 14 रियासतों ने अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर कर भारत संघ में प्रवेश लिया। इस विलय प्रक्रिया में ‘काउंसिल ऑफ एक्शन इन छत्तीसगढ़ स्टेट’ की एक अहम भूमिका थी।
📅 रियासतों के हस्ताक्षर का क्रम
| हस्ताक्षर की तिथि | रियासत का नाम |
| 05 अगस्त 1947 | खैरागढ़ रियासत |
| 07 अगस्त 1947 | कोरिया रियासत |
| 09 अगस्त 1947 | सरगुजा रियासत |
| 11 अगस्त 1947 | रायगढ़ रियासत, कांकेर रियासत |
| 15 अगस्त 1947 से पूर्व | चांगभखार, सारंगढ़, कवर्धा, छुईखदान, उदयपुर, बस्तर, सक्ती रियासत |
| 22 अगस्त 1947 | नांदगांव रियासत |
| 01 सितंबर 1947 | जशपुर रियासत [CG(VDAG)2021] |
🗺️ रियासतों का जिलों में समावेशन
| शामिल रियासतें | नवीन जिला |
| बस्तर रियासत | बस्तर |
| कांकेर रियासत | कांकेर |
| रायगढ़, उदयपुर (धरमजयगढ़) रियासत | रायगढ़ |
| सारंगढ़ रियासत | सारंगढ़ |
| जशपुर रियासत | जशपुर |
| चांगभखार | म.चि.भ. (मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर) |
| कोरिया रियासत | कोरिया |
| सरगुजा रियासत | सरगुजा |
| नांदगांव रियासत | राजनांदगांव |
| कवर्धा रियासत | कवर्धा |
| छुईखदान, खैरागढ़ रियासत | खै-छु-गं (खैरागढ़-छुईखदान-गंडई) |
🤝 छत्तीसगढ़ की रियासतों का एकीकरण
🌍 पूर्वी राज्यसंघ का गठन (अगस्त 1946)
- 🌱 कारण: कैबिनेट मिशन योजना के प्रस्ताव के बाद, ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सारंगढ़, खैरागढ़, कोरिया, छुईखदान, कांकेर जैसी रियासतें अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने की मंशा रखती थीं। [CSPHCL (2022)]
- 🏛️ मुख्यालय: रायपुर
- 👤 अध्यक्ष: रामानुजप्रताप सिंह देव
- 👥 सदस्य: सक्ती, खैरागढ़, कांकेर आदि रियासतों के नरेश
✊ छत्तीसगढ़ काउंसिल ऑफ एक्शन (1946)
- 👤 अध्यक्ष: ठाकुर प्यारेलाल (ठाकुर साहब) [CG PSC (DSPR, MI, MO) 2022]
- 👤 मंत्री: प्रो. जयनारायण पांडे
- 🎯 उद्देश्य: छत्तीसगढ़ की सभी रियासतों के लोगों में जागरूकता का प्रसार करना और रियासतों में प्रजातांत्रिक मूल्यों को विकसित करना।
- 💡 विशेष:
- रियासतों के विलीनीकरण की प्रक्रिया स्वतंत्रता से पहले ही आरंभ हो गई थी और इस संस्था ने इसे आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- ठाकुर साहब “छत्तीसगढ़ विलीनीकृत रियासत प्रतिनिधि सभा” के अध्यक्ष भी थे।
- ठाकुर प्यारेलाल सिंह छत्तीसगढ़ की रियासतों में जन-संघर्ष के लिए गठित ‘छत्तीसगढ़ काउंसिल ऑफ एक्शन’ के सर्वमान्य नेता थे। [CG PSC(DSPR, MI & MO)2022]
- रियासतों के विलय में ‘कौंसिल ऑफ एक्शन इन छत्तीसगढ़ स्टेट्स’ की महत्वपूर्ण भूमिका थी। [CG Vyapam (SGST)2021]
🗣️ राजाओं की ऐतिहासिक बैठक
- 📍 स्थान: नागपुर
- 📅 तिथि: 15 दिसम्बर 1947
- 👥 शामिल: छत्तीसगढ़ की 14 में से 11 रियासतों के शासक
- 🇮🇳 केन्द्रीय पदाधिकारी: सरदार वल्लभ भाई पटेल (सचिव: वी.पी. मेनन)
- ** राज्य स्तरीय पदाधिकारी:** गवर्नर मंगल दास पकवासा और मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल
छत्तीसगढ़ की रियासतों का अंतिम विलय
- 🔑 मुख्य तिथि: 1 जनवरी 1948 को सभी रियासतें भारत संघ में पूरी तरह विलीन हो गईं। [CG VyapamSI (Mains) 2023, (Ameen)2017], [CG PSC (Eng. Set-1)2015]
- 👤 नेतृत्वकर्ता: सरदार वल्लभ भाई पटेल [CG PSC(Eng. Set-1)2015]
- 🤝 सहयोगी: पं. रविशंकर शुक्ल [CG PSC(Eng. Set-1)2015]
- ✍️ हस्ताक्षर: सभी रियासतों के शासकों ने संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। [CG PSC(Eng. Set-1)2015]
- 🥇 सर्वप्रथम स्वीकृति: खैरागढ़ रियासत
- 🏁 अंतिम हस्ताक्षरकर्ता: जशपुर रियासत
👑 1. बस्तर रियासत: एक ऐतिहासिक अवलोकन
📜 परिचय
- 🌱 संस्थापक: अन्नमदेव
- 🛡️ वंश: काकतीय
- 📜 सनद् प्राप्ति: 1908 (शासक – रूद्रप्रताप देव)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 15 अगस्त 1947 से पूर्व (शासक – प्रवीरचंद्र भंजदेव)
- 🏰 राजधानियाँ:
- मंधोता (मधुपुरी) – अन्नमदेव
- चक्रकोट – पुरुषोत्तमदेव
- बस्तर – दिक्पाल देव
- जगदलपुर – दलपत देव
- 🏞️ क्षेत्रफल: 13,062 वर्ग मील
- 💡 उपनाम: छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी रियासत [CG PSC(Pre), CSPHCL 2019, 2022, CG PSC(AP) 2016]। इसे “भारत का सोया हुआ दैत्य,” “शोधकर्ताओं का स्वर्ग,” और “विचित्रताओं का प्रदेश” भी कहा जाता है।
👑 प्रमुख शासक
| स्वतंत्र शासक (1324-1777 ई.) | मराठाधीन शासक (1777-1818 ई.) | आंग्ल-मराठाधीन शासक (1818-1853 ई.) | ब्रिटिशकालीन शासक (1854-1947 ई.) |
| 01. अन्नमदेव (1324-1369) | 16. दरिया देव (1777-1800) | 17. महिपाल देव (1800-1842) | 19. भैरम देव (1853-1891) |
| 02. हमीर देव (1369-1410) | 18. भूपाल देव (1842-1853) | 20. रूद्रप्रताप देव (1891-1921) | |
| 03. भैरव देव (1410-1468) | 21. प्रफुल्लकुमारी देवी (1921-1936) | ||
| 04. पुरुषोत्तम देव (1468-1534) | 22. प्रवीरचंद्र भंजदेव (1936-1966) | ||
| 05. जयसिंह देव (1534-1558) | |||
| 06. नरसिंह देव (1558-1602) | स्वतंत्रता के बाद काकतीयवंशीय उत्तराधिकारी | ||
| 07. प्रतापराज देव (1602-1625) | 22. प्रवीरचंद्र भंजदेव (1936-1966) | ||
| 08. जगदीश राज देव (1625-1639) | 23. विजयचंद्र भंजदेव (1966-1969) | ||
| 09. वीर नारायण देव (1639-1654) | 24. भरतचंद्र भंजदेव (1969-1997) | ||
| 10. वीरसिंह देव (1654-1680) | 25. कमलचंद्र भंजदेव (1997-अब तक) | ||
| 11. दिकपाल देव (1680-1709) | |||
| 12. राजपाल देव (1709-1721) | |||
| 13. चंदेल मामा (1721-1731) | |||
| 14. दलपत देव (1731-1774) | |||
| 15. अजमेर देव (1774-1777) |
👑 2. कांकेर रियासत: संक्षिप्त इतिहास
📜 परिचय
- 🌱 संस्थापक:
- सिंहराज (इतिहासकार रायबहादुर हीरालाल के अनुसार)
- राजा कन्हरदेव (किंवदंती के अनुसार)
- 🛡️ वंश: सोमवंश
- 👑 पुस्तैनी उपाधि: महाराजाधिराज
- 📜 सनद् प्राप्ति: 20 मई 1865 (शासक – नरहरदेव)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 11 अगस्त 1947 (शासक – भानुप्रताप सिंहदेव)
- 🏰 राजधानी: कांकेर
- 💡 अर्थ: गोंड़ी भाषा के अनुसार, कांकेर का शाब्दिक अर्थ है “एक वृक्ष का पानी”।
- 🏞️ क्षेत्रफल: 1429 वर्ग मील
- 🏛️ प्राचीन नाम: कंकण, कंकणाय, काकरय, काकरम, कंकनगरी
- 🚶 यूरोपीय यात्री: मि. जे.टी. ब्लंट 7 अप्रैल 1795 ई. में आए।
👑 प्रमुख शासक
1. रहिपाल देव
- 🤝 समकालीन: बिम्बाजी भोंसले
- 👑 करद राज्य: मराठों के अधीन
- 📜 विशेष: इस रियासत का क्रमबद्ध इतिहास इसी शासक से प्राप्त होता है।
2. धीरज सिंह
- 🗺️ प्राप्ति: सिहावा परगना
- 📜 कारण: सिहावा क्षेत्र पर अधिकार करने के लिए बस्तर और मराठों के बीच हुए संघर्ष में धीरज सिंह ने मराठों का साथ दिया था।
- 👑 उत्तराधिकारी: रामसिंह
3. भूपदेव
- 👤 पिता: रामसिंह
- ⚔️ आक्रमण: 1809 ई. में मराठों ने कांकेर पर हमला किया।
- 📜 कारण: मराठों के खिलाफ बस्तर के राजा की सहायता करने के कारण।
4. नरहरदेव (1853-1903 ई.)
- 📜 सनद् प्राप्ति: 20 मई 1865 (भारत के गवर्नर जनरल – जॉन लॉरेंस)
- 💍 विवाह: चंद्रकुंवर (बस्तर के राजा भूपालदेव की पुत्री) से।
- 🤝 बहन: लक्ष्मीकुंवर (विवाह – तारापुर परगने की दीवान दलगंजनसिंह से)। लक्ष्मीकुंवर और दलगंजनसिंह के पुत्र लाल कालेन्द्र सिंह थे।
- 👑 उत्तराधिकारी: कोमल देव (भतीजा)
5. कोमल देव (1903-1925 ई.)
- 🌪️ विद्रोह: इनके शासनकाल में बस्तर में भूमकाल विद्रोह (1910 ई.) हुआ।
- 🤝 सहायता: भूमकाल विद्रोह के समय उन्होंने अंग्रेजों की सहायता की थी, जिसके कारण ब्रिटिश हुकूमत ने 1911 में इन्हें नौ तोपों की सलामी दी।
- 👑 उत्तराधिकारी: भानुप्रताप देव (छोटा नागपुर के राजा के पौत्र)
6. भानुप्रताप देव (1925-1947 ई.)
- 👑 सदस्य: चेंबर ऑफ प्रिंसेस
- ✍️ विलय: इन्होंने भारत संघ में विलय के लिए 11 अगस्त 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। 1 जनवरी 1948 को यह रियासत भारत संघ में विलीन हो गई।
- 🤝 विशेष: कोमल देव (1903-1925 ई.) इनके मौसा थे।
💰 राजस्व व्यवस्था
- 🌾 एक नागर: दो जोड़ी बैलों द्वारा की जाने वाली खेती पर लगने वाला कर।
- 💍 हल्दी सारी: महाराज के परिवार में विवाहोत्सव पर लिया जाने वाला कर।
- 👰 चूड़ी कर: चूड़ी पहनाकर पत्नी बनाने वाले पुरुष से लिया जाने वाला कर।
- 🔴 तिलक कर: राजकुमार के जन्मोत्सव पर लोग लाल टीका लगाते थे, इस पर भी कर वसूला जाता था।
👑 3. राजनांदगांव रियासत: एक समग्र अवलोकन
📜 परिचय
- 🌱 प्रारंभिक जमींदार: प्रहलाद दास (आदि संस्थापक)
- 👤 संस्थापक: महंत हरिदास
- 🛡️ वंश: बैरागी वंश [CG PSC(ITI Princi.)2016]
- 📜 सनद प्राप्ति: 1865 ई. (शासक – महंत घासीदास) [CG PSC(Pre)2022]
- ✍️ विलयपत्र पर हस्ताक्षर: 22 अगस्त 1947
- ✒️ विलयपत्र पर हस्ताक्षरकर्ता: रानी जयंती देवी [CG PSC(ADH)2022]
- 👑 उपाधि: महंत
- 🗺️ निर्माण: पांडादाह, नांदगांव, मोहगाँव और डोंगरगढ़ परगना को मिलाकर इस रियासत का निर्माण हुआ था।
- 🏞️ क्षेत्रफल: 871 वर्ग मील
- 🙏 उपासक: भगवान श्रीकृष्ण के
- 🏛️ अन्य नाम: नांदगांव / नंदीग्राम
- 🌟 विशेष: यह रियासत छत्तीसगढ़ की एक विकसित रियासत मानी जाती थी।
👑 प्रमुख शासक
1. महंत घासीदास
- 👑 रियासत का दर्जा: इनके शासनकाल में, 1862 ई. में राजनांदगांव को रियासत (फिड्यूटरी स्टेट) का दर्जा मिला।
- 📜 सनद् प्राप्ति: इन्हीं के शासनकाल में, 1865 ई. में राजनांदगांव को एक सामंतीय राज्य घोषित किया गया। [CG PSC(Pre)2022]
- 🏛️ स्थापत्य: इन्होंने रायपुर में महंत घासीदास संग्रहालय (1875 ई.) और राजनांदगांव रियासत के राजमहल का निर्माण करवाया।
- 🤝 सहायता: अफगान युद्ध (1878-79 ई.) के दौरान, इन्होंने लॉर्ड लिटन को 1,10,000 रु. की आवश्यक सामग्री भेजकर सहायता की थी।
- ✊ आंदोलन: इनके ही शासनकाल में राजनांदगांव में 1879-80 में सेवता सिंह ठाकुर के नेतृत्व में प्रसिद्ध बेगार विरोधी आंदोलन हुआ था।
- 👑 उत्तराधिकारी: पुत्र बलराम दास
2. महंत बलरामदास (1883-1897 ई.)
- 👑 उपाधि: राजाबहादुर
- 🏭 स्थापना: इन्होंने बंगाल-नागपुर कॉटन (BNC) मिल, राजनांदगांव (1892) और नांदगांव में अंग्रेजी माध्यमिक विद्यालय की स्थापना की।
- 👤 अध्यक्ष: वे BNC मिल के संचालक बोर्ड के अध्यक्ष थे। [CG PSC(SEE)2017]
- 👑 उत्तराधिकारी: दत्तक पुत्र महंत राजेन्द्र दास
3. महंत राजेन्द्र दास (1897-1912 ई.)
- 🏛️ शासन: ये अल्पवयस्क थे, इसलिए इनके शासनकाल में राजनांदगांव रियासत का शासन ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त पॉलिटिकल एजेंट के माध्यम से चलाया जाता था।
- ⏳ मृत्यु: 25 मई 1912
- 👑 उत्तराधिकारी: महंत सर्वेश्वर दास
4. महंत सर्वेश्वर दास (1912-1938 ई.)
- 🚫 निष्कासन: सरकारी धन के दुरुपयोग के कारण ब्रिटिश शासन ने इन्हें 1933 में राजनांदगांव रियासत से निष्कासित कर दिया।
- 👸 पत्नी: महारानी जयंती देवी
- 👑 उत्तराधिकारी: महंत दिग्विजय दास
5. महंत दिग्विजय दास (1938-1947 ई.)
- ⚖️ रियासत का शासन: 1938-1947 ई. तक, यह राज्य ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ (सरकारी संरक्षण) के अंतर्गत शामिल था।
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 22 अगस्त 1947
- ✒️ हस्ताक्षरकर्ता: महारानी जयंती देवी (इनके अल्पवयस्क होने के कारण)। [CG PSC(ADH)2022]
- 🇮🇳 भारत संघ में विलय: 1 जनवरी 1948
🌳 वंशावली
- महंत प्रहलाद दास
- ↓ शिष्य
- महंत हरिदास
- ↓ शिष्य
- महंत रामदास
- ↓ शिष्य
- महंत हिमाचल दास
- ↓ शिष्य
- महंत मौजीराम
- ↓ शिष्य
- महंत घासीदास
- ↓ पुत्र
- महंत बलरामदास (1883-1897 ई.)
- ↓ दत्तक पुत्र
- महंत राजेन्द्र दास (1897-1912 ई.)
- ↓ शिष्य
- महंत सर्वेश्वर दास (1912-1938 ई.)
- ↓ पत्नी (संरक्षिका) – जयंती देवी
- ↓ पुत्र
- शासक-दिग्विजय दास (1938-1947 ई.)
👑 4. खैरागढ़ रियासत: एक विस्तृत अवलोकन
📜 परिचय
- 👤 संस्थापक: लक्ष्मीनिधि राय
- 🛡️ वंश: नागवंश, जिसका विवरण ‘नागवंश’ नामक पुस्तक में मिलता है।
- 📜 सनद प्राप्ति: 20 मई 1865 (शासक – लाल फत्तेह सिंह)
- ✍️ विलयपत्र पर हस्ताक्षर: 5 अगस्त 1947
- ✒️ विलयपत्र पर हस्ताक्षरकर्ता: राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह
- 🌟 विशेष: यह छत्तीसगढ़ की पहली देशी रियासत थी जिसने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
- 🏰 राजधानी:
- खोलवा: प्रारंभिक राजधानी
- खैरागढ़: खड्गराय द्वारा निर्मित
- 🏞️ क्षेत्रफल: 1931 वर्ग मील
- 💡 अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:
- छत्तीसगढ़ की 14 देशी रियासतों में से, खैरागढ़ मराठा शासकों को सबसे अधिक ‘टकोली’ (कर) चुकाता था।
- खैरागढ़ के राजाओं को द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट के समान न्यायिक शक्तियाँ प्राप्त थीं।
👑 प्रमुख शासक
1. लक्ष्मीनिधि राय
- ⏳ स्थापना: 1490 ई. में इन्होंने मंडला के शासक संग्राम सिंह को हराकर खैरागढ़ रियासत की नींव रखी।
- 🏰 राजधानी: खोलवा (प्रारंभिक)
- ✒️ दरबारी कवि: दलपतराम राव
- 📜 साहित्यिक योगदान: इन्होंने अपनी रचनाओं में पहली बार ‘छत्तीसगढ़’ शब्द का उल्लेख किया। [CG Vyapam (Mahalekh.)2017]लक्ष्मीनिधि राय सुनी चित दे,
गढ़ छत्तीस में ना गढ़ेया रही। - 👑 उत्तराधिकारी: सगुण राय, भीम राय, घनश्याम राय एवं औघड़ राय
2. श्याम राय
- 🤝 सहायता: 1740 ई. में इन्होंने लांजी के जमींदार के खिलाफ मंडला के राजा महाराज शाह की मदद की। इसके बदले में मंडला के राजा ने उन्हें खैरागढ़ रियासत के विस्तार की अनुमति दी।
- 👑 उत्तराधिकारी: दरियाब सिंह, अनुप सिंह, माधव सिंह एवं खड़ग राय
3. खड़ग राय
- ⚔️ पराजय: लांजी के जमींदार ने नागपुर के भोंसले शासक की सहायता से इन्हें पराजित किया।
- 📜 मान्यता: 1756 ई. में इन्होंने अपनी योग्यता से नागपुर के भोंसले शासक से एक सामंत के रूप में मान्यता प्राप्त कर ली और यह मराठों का एक करद राज्य बन गया।
- 🏛️ राजधानी परिवर्तन: इन्होंने राजधानी को खोलवा से खैरागढ़ स्थानांतरित कर दिया।
- 👑 उत्तराधिकारी: टिकैत राय
4. टिकैत राय
- ✊ विद्रोह का दमन: 1818 में, ब्रिटिश नियंत्रण काल के दौरान, इन्होंने डोंगरगढ़ के जमींदार के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया और डोंगरगढ़ की जमींदारी प्राप्त कर ली।
5. दिगपाल सिंह
- 🗺️ भूमि हस्तांतरण: डोंगरगढ़ विद्रोह को दबाने में मदद के बदले में, राजनांदगांव के शासक ने कुछ क्षेत्रों की मांग की, जिसके परिणामस्वरूप दिगपाल सिंह ने उन्हें छुरिया और सिंगारपुर का कुछ हिस्सा दे दिया।
- 👑 उत्तराधिकारी: महिपाल सिंह
6. लाल फतेह सिंह
- 🇬🇧 अधीनता: 1854 में खैरागढ़ रियासत ब्रिटिश शासन के अधीन आ गई।
- 🤝 1857 की क्रांति में भूमिका: इन्होंने 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों का साथ दिया और रायपुर के डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स सी. इलियट को सुरक्षा प्रदान की।
- 👑 दर्जा: इनके शासनकाल में 1862 ई. में खैरागढ़ को रियासत का दर्जा मिला।
- 📜 सनद प्राप्ति: 20 मई 1863 ई.
- 👑 उत्तराधिकारी: राजा उमराव सिंह
7. राजा उमराव सिंह
- 🎖️ उपाधि: 1898 ई. में ब्रिटिश शासन द्वारा इन्हें ‘राजा’ की उपाधि दी गई।
- 👑 उत्तराधिकारी: राजा कमल नारायण और राजा लाल बहादुर सिंह
8. राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह
- 👩❤️👨 पत्नी: रानी पद्मावती
- 👧 पुत्र: इंदिरा
- 🎓 स्थापना: इन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा के नाम पर 1944 में अपने राजमहल में ‘इंदिरा कला संगीत महाविद्यालय’ की स्थापना की, जिसे 1956 में विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ। यह एशिया का पहला संगीत विश्वविद्यालय है।
- 🇮🇳 विलय: 5 अगस्त 1947 को, यह विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले छत्तीसगढ़ के पहले शासक बने। 1 जनवरी 1948 को खैरागढ़ रियासत पूरी तरह भारत संघ में विलीन हो गई।
🌳 खैरागढ़ राजवंश की वंशावली
- लक्ष्मीनिधि राय ↓
- सगुण राय ↓
- भीम राय ↓
- घनश्याम राय ↓
- औघड़ राय ↓
- श्याम सिंह ↓
- खड़ग राय ↓
- टिकैत राय ↓
- दिगपाल सिंह ↓
- महिपाल सिंह ↓
- लाल फत्तेह सिंह ↓
- राजा उमराव सिंह (1874-1890) ↓
- कमल नारायण सिंह (1890-1908) ↓
- लालबहादुर सिंह (1908-1918) ↓
- विरेन्द्र बहादुर सिंह (1918 से विलय तक)
👑 5. छुईखदान रियासत: एक परिचय
📜 सामान्य जानकारी
- 👤 संस्थापक: महंत रूपदास
- 🏰 राजधानी:
- कोंड़का: (प्रारंभिक)
- छुईखदान: (मंहत तुलसीदास द्वारा स्थापित)
- 🛡️ राजवंश: बैरागी [CG PSC(ITI Princi.)2016]
- 🎖️ उपाधि: महंत
- 📜 सनद प्राप्ति: 20 मई 1863 (शासक: मंहत लक्ष्मण दास)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 15 अगस्त 1947 के पूर्व
- ✒️ हस्ताक्षरकर्ता: रितुपर्ण किशोर दास
👑 प्रारंभिक शासक
1. महंत रूपदास
- 🌱 स्थापना: इन्होंने कोंड़का के जमींदार को दिए गए कर्ज के बदले में यह जमींदारी प्राप्त कर रियासत की स्थापना की।
- 🏰 राजधानी: कोंड़का
- 👑 उत्तराधिकारी: शिष्य महंत ब्रम्ह दास
2. महंत ब्रम्हदास
- ⚔️ विवाद और मृत्यु: परपोड़ी के जमींदार से हुए एक विवाद में इनकी हत्या हो गई।
- 👑 उत्तराधिकारी: महंत तुलसीदास
3. महंत तुलसीदास
- 📜 अधीनता: परपोड़ी के जमींदार के भय से इन्होंने मराठों से सहायता ली और उनका करद राज्य बनना स्वीकार कर लिया।
- 🏛️ राजधानी परिवर्तन: इन्होंने राजधानी को कोंड़का से छुईखदान में स्थानांतरित किया।
- 👑 उत्तराधिकारी: महंत बालमुकुंददास (अल्पकालीन) एवं महंत लक्ष्मणदास
🌳 छुईखदान की वंशावली
- महंत रूप दास ↓ शिष्य
- महंत ब्रम्ह दास ↓ पुत्र
- महंत तुलसी दास ↓
- महंत बालमकुंद दास ↓ पुत्र
- महंत लक्ष्मण दास ↓ पुत्र
- महंत श्याम किशोर दास ↓ पुत्र
- राधा वल्लभ किशोर दास ↓ पुत्र
- दिग्विजय किशोर दास ↓ भतीजा
- महंत भूनर किशोर दास ↓
- महंत रितुपर्ण किशोर दास
4. महंत लक्ष्मणदास (1845-1887)
- 🇬🇧 अधीनता: इनके शासनकाल में, 1854 में छुईखदान रियासत सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन आ गई।
- 👑 दर्जा: 1862 में इस रियासत को正式दर्जा प्रदान किया गया।
- 📜 सनद् प्राप्ति: 20 मई, 1863
- 👑 उत्तराधिकारी: महंत श्याम किशोर दास
5. महंत श्याम किशोर दास (1888-1896)
- 🚫 बहिष्कृत: प्रशासनिक उदासीनता के कारण इन्हें 1892 में रियासत के राज-काज से हटा दिया गया था।
- 👑 उत्तराधिकारी: महंत राधा बल्लभ किशोर दास
6. महंत राधा बल्लभ किशोर दास (1897-1898 ई.)
- ⏳ हत्या: 1898 में इनकी हत्या कर दी गई थी।
- 👑 उत्तराधिकारी: महंत दिग्विजय किशोर दास → महंत भूनर किशोर दास → महंत रितुपर्ण किशोर दास
7. महंत रितुपर्ण किशोर दास
- ✊ आंदोलन: इनके शासनकाल में, 1939 ई. में छुईखदान रियासत में प्रसिद्ध लगान बंदी आंदोलन हुआ था।
- 🇮🇳 विलय: इन्होंने 15 अगस्त 1947 से पूर्व भारत संघ में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद, 1 जनवरी 1948 को छुईखदान रियासत पूरी तरह से भारत संघ में विलीन हो गई। [CG PSC (SEE) 2017]
👑 6. कवर्धा रियासत: एक विस्तृत अवलोकन
📜 परिचय
- 👤 संस्थापक: महाबली सिंह [CG Vyapam (ESC)2022]
- 🛡️ वंश: राजगोंड
- 🎖️ उपाधि: ठाकुर
- 📜 सनद प्राप्ति: 1865 ई. (शासक – बहादुर सिंह)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 15 अगस्त 1947 के पूर्व
- ✒️ विलय पत्र पर हस्ताक्षरकर्ता: धर्मराज सिंह
- 🏞️ क्षेत्र: 798 वर्ग मील
👑 प्रमुख शासक
1. महाबली सिंह
- 👤 संस्थापक: ये कवर्धा रियासत के संस्थापक थे। [CG Vyapam (ESC)2022]
- 👑 उत्तराधिकारी: उजियार सिंह एवं टोकसिंह
2. बहादुर सिंह
- 🗺️ प्राप्ति: जब टोकसिंह की निःसंतान अवस्था में मृत्यु हुई, तब पंडरिया के जमींदार बहादुर सिंह को कवर्धा रियासत का शासन मिला।
- 👑 दर्जा: इनके ही शासनकाल में, 1862 में कवर्धा को रियासत का दर्जा प्रदान किया गया।
- 📜 सनद प्राप्ति: 20 मई 1865 ई. (वायसराय जॉन लारेंस द्वारा प्रदान की गई)।
3. धर्मराज सिंह
- 🏰 डिजाइन: कवर्धा महल का डिजाइन इनके शासनकाल में तैयार किया गया।
- 🇮🇳 विलय: इन्होंने भारत संघ में विलय के लिए 15 अगस्त 1947 से पूर्व संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर किए, और जनवरी 1948 में यह रियासत छत्तीसगढ़ की अन्य रियासतों के साथ भारत संघ में पूरी तरह विलीन हो गई।
🌳 कवर्धा रियासत की वंशावली
- महाबली सिंह
- ↓
- उजियार सिंह
- ↓
- टोकसिंह
- ↓ (निःसंतान अवस्था में मृत्यु)
- बहादुर सिंह
- ↓ (पंडरिया के जमींदार)
- राजपाल सिंह
- ↓
- जदुनाथ सिंह
- ↓
- धर्मराज सिंह
👑 7. रायगढ़ रियासत: एक समग्र दृष्टिकोण
📜 परिचय
- 💡 अर्थ: राजा का किला या गढ़
- 👤 संस्थापक: राजा मदनसिंह
- 🛡️ वंश: राजगोंड
- 📜 सनद प्राप्ति: 1867 ई. (शासक – घनश्याम सिंह)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 11 अगस्त 1947
- ✒️ विलय पत्र पर हस्ताक्षरकर्ता: राजा चक्रधर सिंह (हालांकि विलय से पहले इनकी मृत्यु हो गई थी; विलय के समय शासक ललित सिंह थे)
- 🏞️ क्षेत्रफल: 1486 वर्गमील
- 🌍 सम्मिलित: यह गोंडवाना के 57 महलों में से एक था।
👑 प्रमुख शासक
1. मदन सिंह
- 🌱 स्थापना: रायगढ़ मूलतः सम्बलपुर राज्य का हिस्सा था। राजा मदन सिंह ने नेहरू मांझी की सहायता से इसे प्राप्त कर एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया।
- 👑 उत्तराधिकारी: तखतसिंह, बैठसिंह एवं दिलीप सिंह
2. दिलीप सिंह
- 👑 दर्जा: इन्हें रायगढ़ रियासत के प्रथम जमींदार का दर्जा मिला।
3. राजा जुझार सिंह (1832-1865 ई.)
- 🇬🇧 अधीनता: इनके शासनकाल में, 1800 ई. में रायगढ़ रियासत ने मराठों की अधीनता अस्वीकार कर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का संरक्षण स्वीकार कर लिया था।
- 📉 परिणाम: सम्बलपुर की रानी से प्राप्त पद्मपुर क्षेत्र पर उनका अधिकार समाप्त हो गया।
4. देवनाथ सिंह (1832-1862 ई.)
- ✊ बरगढ़ विद्रोह: इनके शासनकाल में, 1833 ई. में बरगढ़ के जमींदार अजीत सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। देवनाथ सिंह ने अंग्रेजों की सहायता से इस विद्रोह को दबाया और पुरस्कार के रूप में उन्हें बरगढ़ की जमींदारी प्राप्त हुई।
- 🤝 उदयपुर विद्रोह: 1857 ई. में इन्होंने उदयपुर रियासत के शासक शिवराज सिंह को बंदी बनाने में अंग्रेजों की सहायता की, जिसके बाद शिवराज सिंह को कालापानी की सजा हुई।
5. घनश्याम सिंह (1862-1890 ई.)
- 📜 सनद प्राप्ति: 1867 ई.
- 🚫 निष्कासन: 1 फरवरी 1855 ई. को ब्रिटिश शासन ने इन पर कुशासन का आरोप लगाकर पद से हटा दिया और रायगढ़ रियासत के प्रबंधन के लिए अतिरिक्त असिस्टेंट कमिश्नर रायशरन घोष को नियुक्त किया।
6. भूपदेव सिंह (1894-1917 ई.)
- 🎖️ उपाधि: राजा बहादुर (12 दिसंबर 1911 को ब्रिटिश शासन द्वारा प्रदान की गई)
- 🚂 निर्माण: इनके शासन काल में ब्रिटिश शासन ने रेलवे लाइन बिछाई।
- 🎂 उपलब्धि: गणेश चतुर्थी के दिन, 1905 में राजा चक्रधर सिंह का जन्म हुआ, जिसके उपलक्ष्य में हर वर्ष गणेश चतुर्थी पर एक विशाल समारोह का आयोजन किया जाता था।
7. नटवर सिंह (1917-1924 ई.)
- ⏳ शासन: इनका शासनकाल काफी छोटा था। 15 फरवरी 1924 ई. में इनकी मृत्यु के बाद, इनके भाई राजा चक्रधर सिंह को रायगढ़ का राजा बनाया गया।
8. चक्रधर सिंह (1924-1947 ई.)
- 🎂 जन्म: 19 अगस्त 1905 (गणेश चतुर्थी)
- 🇮🇳 विलय: भारत संघ में विलय हेतु 11 अगस्त 1947 को संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर किए, परंतु विलय से पहले 7 अक्टूबर 1947 को इनकी मृत्यु हो गई।
- 🎖️ उपाधि: संगीत सम्राट (वायसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा लखनऊ में प्रदान की गई)
- 📚 रचनाएँ:
- संगीत एवं नृत्य: नर्तन सर्वस्व, तालतोय निधि (30 किलो), मुरजपर्ण पुष्पाकर, रागरत्न मंजुषा, तालबल पुष्पाकर [CG PSC (Mains) 2011]
- उपन्यास: अल्कापुरी, बैरागढ़िया राजकुमार, मायाचक्र
- नाटक: प्रेम के तीर
- हिन्दी काव्य: रत्न रास, रत्न मंजूषा, रत्नाहार, काव्य कानन
- उर्दू काव्य: जोशे फरहत, निगारे फरहत
- 🎓 गुरु: सीताराम और राजा लक्ष्मण सिंह
- 🕺 प्रवर्तक: इन्हें कत्थक नृत्य के रायगढ़ घराना का प्रवर्तक माना जाता है। [CG PSC(Pre) 2016], [CG Vyapam (VSAM) 2024]
- 🎶 वादन: तबला वादन [CG PSC (Horti.Cul.) 2015]
- 🤝 आश्रय: वे स्वयं संगीतकार थे और संगीतकारों को आश्रय प्रदान करते थे। [CG Vyapam (AGDO) 2018]
- 👑 विशेष: ये रायगढ़ रियासत के अंतिम शासक थे। [CG Secretariat(AG-3)2021]
- 🏆 पद्मश्री सम्मान (2024): राजा चक्रधर सिंह के प्रिय शिष्य कार्तिकराम बरेठ के पुत्र, श्री रामलाल बरेठ को कत्थक नृत्य के क्षेत्र में कला में उनके योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।
9. ललित सिंह
- 📅 राज्याभिषेक: इनका राज्याभिषेक 21 जनवरी 1948 को होना था, परंतु इससे पहले ही रियासत का भारत संघ में विलय हो गया।
- ⚖️ स्थिति: ललित सिंह इस रियासत के प्रशासक थे, परंतु उन्हें राजा बनने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका।
🌳 रायगढ़ रियासत की वंशावली
- मदन सिंह ↓
- तखत सिंह ↓
- बैंट सिंह ↓
- दिलीप सिंह ↓
- जुझार सिंह (1800-32 ई.) ↓
- देवनाथ सिंह (1832-62 ई.) ↓
- घनश्याम सिंह (1862-90 ई.) ↓
- भूपदेव सिंह (1894-1917 ई.) ↓
- नटवर सिंह (1917-24 ई.) ↓
- चक्रधर सिंह (1924-47 ई.) ↓
- ललित सिंह (अगस्त 1947 से विलय तक)
💃 राजा चक्रधर सिंह के शिष्य (दरबारी नर्तक)
- मुख्य शिष्य: फिरतूदास, कल्याणदास, कार्तिकराम, अनुजराम, बर्मनलाल
- अन्य: भगवान दास माणिक, सीताराम
- शिष्यों की परंपरा:
- राममूर्ति वैष्णव, बासंती वैष्णव, सुनील वैष्णव, शरद वैष्णव, ज्योतिश्री वैष्णव
- दादूलाल, मीना, रामलाल, भूपेन्द्र
- परिवार: मोहिनी (पत्नी), मानव (पुत्र)
👑 8. सारंगढ़ रियासत: एक विस्तृत रूपरेखा
📜 परिचय
- 💡 अर्थ: बांस का दुर्ग
- 👤 संस्थापक: नरेन्द्र साय
- 🛡️ वंश: राजगोंड
- 📜 सनद प्राप्ति: 03 नवंबर 1909 (शासक – जवाहर सिंह)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 15 अगस्त 1947 के पूर्व
- ✒️ विलय पत्र पर हस्ताक्षरकर्ता: (संभवतः) नरेश सिंह (राजा चक्रधर सिंह के स्थान पर)
- ⚖️ शासन: विलय के समय ललित सिंह का शासन था।
- 🏞️ क्षेत्रफल: 540 वर्गमील
- 🌍 सम्मिलित: गोंडवाना के 57 महलों में से एक।
👑 प्रमुख शासक
1. नरेन्द्र साय
- 🌱 स्थापना: इन्होंने महाराष्ट्र के भंडारा जिले के लांजी नामक स्थान से आकर इस रियासत की स्थापना की थी।
- 👑 उत्तराधिकारी: धरहम्मीर सिंह → बरबर साय → उदय भान → वीर भान → उद्योत साय।
- ⚔️ आक्रमण: सारंगढ़ गोंडवाना राज्य के 57 महलों में से एक था। अकबर के सेनापति मानसिंह ने बंगाल विजय अभियान के दौरान इस पर आक्रमण कर इसे जीत लिया था।
2. उद्योत साय
- ⚔️ विजय: संबलपुर के राजा छत्रसाय ने सारंगढ़ रियासत पर अधिकार कर लिया था, परंतु उद्योत साय ने उन्हें पराजित कर सारंगढ़ को पुनः अपने अधीन कर लिया।
3. कल्याण साय
- 📜 पट्टी: नागपुर के भोंसले शासक रघुजी प्रथम ने इन्हें ‘राजा’ की पट्टी प्रदान की।
- 🤝 सहायता: इन्होंने फूलझर राज्य के आक्रमण के विरुद्ध मराठों की सहायता की थी।
- 🔗 अधीनता: इनके शासनकाल में सारंगढ़ रियासत रतनपुर के मराठों के अधीन आ गई।
4. विश्वनाथ साय
- 🤝 सहायता: इन्होंने संबलपुर के जमींदार अतीज सिंह के बेटे जैतसिंह की, विद्रोही दीवान अकबर के विरुद्ध, सहायता की थी।
- 🎁 उपहार: राजा जैतसिंह ने उपहार स्वरूप इन्हें सरिया परगना प्रदान किया।
- 🕊️ यात्री: अलेक्जेंडर इलियट की नागपुर यात्रा के दौरान सारंगढ़ रियासत में मृत्यु हो गई। उनकी समाधि आज भी सालर ग्राम में स्थित है।
- 👑 उत्तराधिकारी: सुभद्र साय → भीखम साय → टिकम साय → गजराज सिंह → संग्राम सिंह।
5. संग्राम सिंह (1830-72)
- 🇬🇧 अधीनता: इनके शासनकाल में सारंगढ़ रियासत ब्रिटिश हुकूमत के अधीन आ गई।
- 🤝 सहायता: 1857 की क्रांति के दौरान इन्होंने क्रांतिकारी नेता कमल सिंह को पकड़कर अंग्रेजों को सौंप दिया था।
- 👑 दर्जा: 1862 में सारंगढ़ को रियासत का दर्जा और 1865 में सामंतीय शासक का दर्जा दिया गया।
- 👑 उत्तराधिकारी: भवानी प्रताप सिंह → रघुवर सिंह → जवाहर सिंह।
6. जवाहर सिंह (1890-1946)
- 📜 सत्ता प्राप्ति: 3 नवंबर 1909 को इन्हें राजकुमार कॉलेज में सामंत शासक के रूप में राज्याधिकार प्राप्त हुआ।
- 🏰 निर्माण: सारंगढ़ महल।
- 🎖️ उपाधि: 1. राजा बहादुर, 2. सी.आई.ई. (कम्पेनियन ऑफ इंडियन इम्पीरियल)।
- ✊ विद्रोह: 1941 में, परसाडीह के गौटिया दानीराम पटेल के नेतृत्व में सारंगढ़ रियासत में किसान आंदोलन हुआ था।
7. राजा नरेश सिंह (1946 से विलय तक)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 15 अगस्त 1947 के पूर्व।
- 🇮🇳 भारत संघ में विलय: 1 जनवरी 1948 को सारंगढ़ रियासत भारत संघ में पूरी तरह विलीन हो गई। [CSPHCL-2022]
🌳 सारंगढ़ की वंशावली
- नरेन्द्र साय ↓ धरहम्मीर सिंह ↓ बरबर साय ↓ उदय भान ↓ वीर भान ↓ उद्योत साय ↓ कल्याण साय ↓ विश्वनाथ साय ↓ सुभद साय ↓ भीखम साय ↓ टिकम साय ↓ संग्राम सिंह ↓ भवानी प्रताप सिंह ↓ रघुवर सिंह ↓ जवाहर सिंह ↓ नरेश सिंह।
👑 9. सक्ती रियासत: एक संक्षिप्त परिचय
📜 सामान्य जानकारी
- 👤 संस्थापक: हरि व गुजर नामक दो भाई
- 🛡️ राजवंश: राजगोंड
- 📜 सनद प्राप्ति: 1865 ई. (शासक – रणजीत सिंह)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 15 अगस्त 1947 के पूर्व
- ✒️ विलय पत्र पर हस्ताक्षरकर्ता: लीलाधर सिंह
- 🏞️ क्षेत्रफल: 138 वर्ग मील
- 🌟 विशेष: यह 14 रियासतों में सबसे छोटी रियासत थी।
🌳 सक्ती राजवंश की वंशावली
| मुख्य शाखा | द्वितीय शाखा (चिओगुनी मजही) |
| 1. हरि | ↓ चिओगुनी मजही |
| 2. तारामनही ↓ | ↓ अज्ञात |
| 3. लालसाय ↓ | ↓ रूद्र सिंह |
| 4. गुलाबसाय ↓ | ↓ उदय सिंह |
| 5. धनसाय ↓ | ↓ कुवत सिंह |
| 6. वैद्यनाथ साय ↓ | ↓ कगन सिंह |
| 7. दूध साय ↓ | ↓ |
| 8. गदाय साय → | 10. कलंदर सिंह ↓ |
| 9. शिव सिंह (रानी तेजकुमारी) → | 11. रणजीत सिंह ↓ |
| 12. रूपनारायण सिंह ↓ | |
| 13. लीलाधर सिंह |
| शासकों की सूची |
| 1. हरि और गुजर |
| 2. तार मांझी |
| 3. लालसाय |
| 4. धनसाय |
| 5. बैजनाथ साय |
| 6. दूध साय |
| 7. कलन्दरसिंह |
| 8. लीलाधर सिंह |
👑 9. सक्ती रियासत (शासक-मंडल)
👑 प्रमुख शासक
1. कलंदर सिंह (1832-62)
- 🤝 समकालीन: ये रायगढ़ रियासत के शासक देवनाथ सिंह के समकालीन थे।
- 👑 दर्जा: 1862 में सक्ती को रियासत का दर्जा प्राप्त हुआ।
- 🌟 विशेष: ये सक्ती रियासत की द्वितीय शाखा के पहले शासक थे।
2. रणजीत सिंह (1862-91 ई.)
- 📜 सनद प्राप्ति: 1865 ई.
- 🚫 निष्कासन: 1875 में, ब्रिटिश सरकार ने इन पर षड्यंत्र रचने और कुशासन का आरोप लगाकर इन्हें सक्ती रियासत के शासन से हटा दिया था।
- 👑 उत्तराधिकारी: रूपनारायण सिंह
3. रूपनारायण सिंह (1892-1914 ई.)
- 📜 सनद प्राप्ति: 26 जुलाई 1892 (शर्त के साथ कि ब्रिटिश शासन द्वारा नियुक्त दीवान से सलाह लेना अनिवार्य होगा)।
- ⚖️ प्रतिबंध: 1902 में प्रशासन में अव्यवस्था फैलने के कारण इन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिसे 1905 में हटा दिया गया।
- 👑 उत्तराधिकारी: लीलाधर सिंह (भतीजा)
4. लीलाधर सिंह (1914 ई. से विलय तक)
- 🎖️ उपाधि: “राजा बहादुर”
- ⚖️ अधिकार: इनकी कार्यकुशलता के कारण ब्रिटिश सरकार ने इन्हें फाँसी की सजा देने का अधिकार प्रदान किया था।
- 🏆 उपलब्धि: 1929 में मध्यप्रांत के गवर्नर ने सक्ती रियासत को ‘श्रेष्ठ रियासत’ का दर्जा दिया था।
- ✊ किसान आंदोलन: नवंबर 1947 में इनकी शोषणकारी नीतियों के कारण स्थानीय किसानों ने इनके विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया, जो रियासत के भारत संघ में विलय के बाद भी जारी रहा। [CG PSC(CMO)2010]
- 🇮🇳 भारत संघ में विलय: 15 अगस्त 1947 से पूर्व लीलाधर सिंह ने भारत संघ में विलय के लिए संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, और जनवरी 1948 में यह रियासत भारत संघ में पूरी तरह विलीन हो गई।
👑 10. चांगभखार रियासत: एक विस्तृत अवलोकन
📜 परिचय
- 👤 संस्थापक: जगजीत सिंह
- 🎖️ उपाधि: ‘भैय्या’
- 🏰 राजधानी: भरतपुर
- 🏞️ क्षेत्रफल: 904 वर्गमील [CSPHCL (2019)]
- 📜 सनद प्राप्ति: 1899 ई. (शासक – महावीर सिंह)
- ✍️ हस्ताक्षर: 15 अगस्त 1947 के पूर्व (विलय पत्र पर)
- ✒️ हस्ताक्षरकर्ता: कृष्णप्रताप सिंह
- 🌟 विशेष: यह रियासत 1905 तक छोटा नागपुर का हिस्सा थी और पहले कोरिया राज्य के अंतर्गत एक जमींदारी थी।
👑 प्रमुख शासक
1. भैय्या जगजीत सिंह (1848-1875)
- 🌱 स्थापना: 1848 में इनके प्रयासों से चांगभखार रियासत को कोरिया रियासत से स्वतंत्र मान्यता प्राप्त हुई।
- 🎖️ उपाधि: ‘भैय्या’ (ब्रिटिश सरकार द्वारा)
- 🏰 राजधानी: भरतपुर
2. भैय्या बलभद्र सिंह (1875-1896)
- ✍️ समझौता: 1875 ई. में ब्रिटिश सरकार के एक इकरारनामे पर हस्ताक्षर कर इन्होंने 20 वर्षों के लिए इस रियासत का बंदोबस्त ब्रिटिश सरकार के हाथों में सौंप दिया।
3. भैय्या महावीर सिंह (1896-1932)
- 👤 संरक्षक: चाचा लाल बजरंग सिंह
- 📜 सनद प्राप्ति: 1899 (वायसराय लॉर्ड कर्जन)
- 🗺️ स्थानान्तरण: 1905 में बंगाल के छोटा नागपुर से मध्यप्रांत (छत्तीसगढ़) में शामिल किया गया।
- ⛏️ अधिकार प्राप्ति: खनिज उत्खनन (1928 में वायसराय लार्ड इर्विन द्वारा)
- 👑 उत्तराधिकारी: कृष्णप्रताप सिंहदेव (दत्तकपुत्र)
4. भैय्या कृष्णप्रताप सिंहदेव (1932 से विलय तक)
- 🇮🇳 विलय: इन्होंने 15 अगस्त 1947 के पूर्व संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। जनवरी 1948 में इस रियासत का भारत संघ में पूरी तरह विलय हो गया।
🌳 चांगभखार की वंशावली
- भैय्या ↓ जगजीत सिंह ↓ बलभद्र सिंह ↓ महावीर सिंह ↓ लाल बजरंग सिंह ↓ कृष्णप्रताप सिंह
👑 11. कोरिया रियासत: एक परिचय
📜 सामान्य जानकारी
- 👤 संस्थापक: धारामल शाह (कोल राजाओं को परास्त कर)
- 🛡️ वंश: क्षत्रिय चौहान
- 🏰 राजधानी: बैकुंठपुर
- 📜 सनद प्राप्ति: 9 फरवरी 1876 (शासक – प्राणसिंह)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 07 अगस्त 1947
- ✒️ हस्ताक्षरकर्ता: रामानुजप्रताप सिंह
- 🏞️ क्षेत्रफल: 1631 वर्गमील
👑 प्रमुख शासक
1. धारामल शाह
- 🌱 स्थापना: क्षत्रिय चौहान वंश के धारामल शाह ने कोल राजाओं को हराकर कोरिया रियासत की स्थापना की।
2. गरीब सिंह (1818-1848 ई.)
- 📜 इतिहास: इस रियासत का क्रमबद्ध इतिहास इन्हीं के शासन से प्राप्त होता है।
- 🤝 हस्तांतरण: 1818 में अप्पा साहब भोंसले ने अंग्रेजों से संधि कर इस रियासत को उन्हें सौंप दिया।
3. अमोल सिंह (1848-1876 ई.)
- ✍️ समझौता: 3 जनवरी 1848 को ब्रिटिश सरकार के एक कबुलियतनामे पर हस्ताक्षर कर इन्होंने 10 वर्षों के लिए रियासत का बंदोबस्त अंग्रेजों के हाथों में सौंप दिया, और यह एक करद राज्य बन गया।
4. प्राण सिंह (1876-1897 ई.)
- 📜 सनद प्राप्ति: 9 फरवरी, 1876 (ब्रिटिश सरकार द्वारा)
- 🕊️ मृत्यु: 1897 में निःसंतान अवस्था में इनकी मृत्यु हो गई, और इस प्रकार धारामल का वंश समाप्त हो गया।
- 👑 उत्तराधिकारी: शिवमंगल सिंह (संबंधी)
5. शिवमंगल सिंह (1897-1909 ई.)
- 🗺️ स्थानान्तरण: 1905 में बंगाल के छोटा नागपुर से मध्यप्रांत (छत्तीसगढ़) में शामिल किया गया।
- 👑 दर्जा: फिड्यूटरी चीफ (1899 में वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा)
🌳 कोरिया राजवंश की वंशावली
- धारामल शाह ↓ गरीब सिंह ↓ अमोल सिंह ↓ प्राण सिंह ↓ शिवमंगल सिंह ↓ रामानुजप्रताप सिंह
6. रामानुजप्रताप सिंहदेव (1909 ई. से विलय तक)
- ⛏️ अधिकार प्राप्ति: इन्होंने भारत सचिव से विनती कर 1928 में खनिज उत्खनन का अधिकार प्राप्त किया।
- 🌐 भागीदारी:
- प्रथम गोलमेज सम्मेलन, लंदन (12 नवंबर 1930 – 19 जनवरी 1931): इस सम्मेलन में 16 देशी रियासतों ने भाग लिया था, जिसमें छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व इन्होंने किया था।
- द्वितीय गोलमेज सम्मेलन, लंदन (7 सितंबर 1931 – 1 दिसंबर 1931): इन्होंने छत्तीसगढ़ की देशी रियासतों का प्रतिनिधित्व करते हुए बम्बई से एस. एस. राजपुताना जहाज में सवार होकर लंदन की यात्रा की।
- ✊ विद्रोह: 1932 में कोरिया रियासत में प्रसिद्ध गोंड विद्रोह हुआ था।
- 👑 अध्यक्षता: इन्होंने पूर्वी देशी रियासत संघ (1946) की अध्यक्षता की, जिसका निर्माण ओडिशा एवं छत्तीसगढ़ की देशी रियासतों ने मिलकर किया था।
- 🇮🇳 भारत संघ में विलय: 7 अगस्त 1947 को इन्होंने संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर किए, और 1 जनवरी 1948 को कोरिया रियासत का भारत संघ में पूर्ण विलय हो गया।
👑 12. सरगुजा रियासत: एक विस्तृत अवलोकन
📜 परिचय
- 🏛️ प्राचीन नाम: ‘डान्डोर’
- 👤 संस्थापक: विष्णुप्रताप सिंह
- 🛡️ वंश: रक्सेल राजपूत राजवंश [CG PSC(ACF)2017]
- 🏰 राजधानी: अम्बिकापुर
- 📜 सनद प्राप्त: 1899 ई. (शासक – रघुनाथ शरण सिंह)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 09 अगस्त 1947
- ✒️ हस्ताक्षरकर्ता: रामानुज शरण सिंहदेव
- 🏞️ क्षेत्रफल: 6,055 वर्गमील
👑 प्रमुख शासक
1. विष्णुप्रताप सिंह
- 🌱 संस्थापक: ये सरगुजा रियासत के संस्थापक थे, जिन्होंने आस-पास के क्षेत्रों को जीतकर रियासत का विस्तार किया और रामगढ़ की पहाड़ी पर एक दुर्ग का निर्माण करवाया।
2. शिव सिंह (1758-1788 ई.)
- 📜 इतिहास: इस रियासत का क्रमबद्ध इतिहास इन्हीं के शासनकाल से प्राप्त होता है।
- ⚔️ आक्रमण: इनके समय में पहली बार मराठों ने सरगुजा राज्य पर आक्रमण किया, जिसके बाद इन्होंने मराठों की अधीनता स्वीकार कर वार्षिक टकोली (कर) देने का वचन दिया।
3. अजीत सिंह (1758-1788 ई.)
- ✊ विद्रोह: इनके शासन काल में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध 1792 ई. में पलामू का विद्रोह हुआ था, जो छत्तीसगढ़ का दूसरा ब्रिटिश विरोधी आंदोलन माना जाता है।
4. लाल संग्राम सिंह (1799 ई.)
- 👑 सत्ता प्राप्ति: इन्होंने अपने भाई अजीत सिंह की विधवा रानी की हत्या कर राजगद्दी प्राप्त की थी। बाद में, कर्नल जोन्स ने इन्हें परास्त कर सरगुजा रियासत से निष्कासित कर दिया।
5. बलभद्र सिंह (1799-1820 ई.)
- 👑 सत्ता प्राप्ति: 1799 में ब्रिटिश अधिकारी कर्नल जोन्स की सहायता से इन्हें सरगुजा का सिंहासन प्राप्त हुआ।
- 🇬🇧 प्रभुत्व: सीताबर्डी युद्ध के बाद, जनवरी 1818 में अप्पा साहब भोंसले ने सरगुजा रियासत अंग्रेजों को सौंप दी, जिससे इस पर अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।
6. अमर सिंह (1820-1852 ई.)
- 👑 उत्तराधिकारी: इनके दो पुत्र थे – इंद्रजीत सिंह (सरगुजा के उत्तराधिकारी) और लालबिन्ध्येश्वरी प्रसाद सिंहदेव (उदयपुर रियासत के शासक बने)।
7. इंद्रजीत सिंह (1852-1882)
- 🧠 शासन: इनके मानसिक रूप से विक्षिप्त होने के कारण रियासत का प्रशासन उनके छोटे भाई लालबिन्ध्येश्वरी प्रसाद सिंहदेव देखते थे।
8. रघुनाथशरण सिंह (1882-1917 ई.)
- 🎖️ उपाधि: ‘महाराजा बहादुर’ (वायसराय लॉर्ड एल्गिन द्वारा)
- 📜 सनद प्राप्ति: 1899
- 🗺️ हस्तांतरण: 1905 में बंगाल के छोटा नागपुर से मध्यप्रांत (छत्तीसगढ़) में शामिल किया गया।
9. रामानुजशरण सिंहदेव (1917-1947 ई.)
- 🎖️ उपाधियाँ:
- कमांडर ऑफ दी ब्रिटिश इम्पीरर: प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की सहायता करने के कारण।
- महाराजा: खानदानी उपाधि।
- ✊ विद्रोह: इनके शासनकाल में सरगुजा रियासत में 1918 में प्रसिद्ध किसान उरांव विद्रोह हुआ था।
- 🇮🇳 भारत संघ में विलय: 9 अगस्त 1947 को संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर किए और 1 जनवरी 1948 को सरगुजा रियासत भारत संघ में पूरी तरह विलीन हो गई।
🌳 सरगुजा राजवंश की वंशावली
- विष्णुप्रताप सिंह ↓ शिव सिंह ↓ अजीत सिंह ↓ लाल संग्रामसिंह ↓ बलभद्र सिंह ↓ अमर सिंह ↓ इन्द्रजीत सिंह ↓ रघुनाथ शरण सिंह ↓ रामानुज शरण सिंह
👑 13. उदयपुर रियासत: एक विस्तृत रूपरेखा
📜 परिचय
- 🏰 राजधानी: धर्मजयगढ़ (धरमजयगढ़)
- 🤝 घनिष्ठ संबंध: इसका इतिहास सरगुजा रियासत से गहराई से जुड़ा हुआ है।
- 📜 क्रमबद्ध इतिहास: इसका व्यवस्थित इतिहास 1818 ईस्वी से मिलता है।
- 📜 सनद प्राप्ति: 1877 ई. (शासक – धर्मजीत सिंह)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 15 अगस्त 1947 के पूर्व
- ✒️ हस्ताक्षरकर्ता: चन्द्रचूड़ प्रताप सिंह
👑 प्रमुख शासक
1. कल्याण सिंह (1818-1857 ई.)
- 📜 इतिहास: उदयपुर रियासत का व्यवस्थित इतिहास इन्हीं के शासनकाल से शुरू होता है।
- ✊ विद्रोह (1857):
- कारण: 1852 में लॉर्ड डलहौजी ने अपनी विस्तारवादी नीति के तहत नरबलि का आरोप लगाकर कल्याण सिंह और उनके दो भाइयों, शिवराज सिंह एवं धीरज सिंह को रांची जेल में बंद कर दिया था।
- घटनाक्रम: 1857 की क्रांति के समय, भारतीय क्रांतिकारियों की मदद से ये भाईयों सहित जेल से भागकर उदयपुर आ गए और राज सिंहासन पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध में वे अपने भाई धीरज सिंह के साथ शहीद हो गए। इसे उदयपुर के विद्रोह के नाम से जाना जाता है।
- 👑 उत्तराधिकारी: शिवराज सिंह
2. शिवराज सिंह (1857-1859 ई.)
- ⚔️ शासन: 1857 की क्रांति में कल्याण सिंह और धीरज सिंह की मृत्यु के बाद, शिवराज सिंह ने उदयपुर की गद्दी संभाली।
- ⚖️ सजा: 1859 ई. में, अंग्रेजों ने रायगढ़ रियासत के शासक देवनाथ सिंह की मदद से इन्हें पराजित कर बंदी बना लिया और काला पानी की सजा देकर अंडमान जेल भेज दिया।
3. लाल विन्धेश्वरी प्रसाद सिंह (1860-1875 ई.)
- 🎁 सत्ता प्राप्ति: सरगुजा रियासत के राजकुमार लाल विन्ध्येश्वरी प्रसाद सिंह को 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की सहायता करने के पुरस्कार स्वरूप उदयपुर रियासत प्रदान की गई।
- 🎖️ उपाधि: 1. ‘सितारे हिन्द’ (1857 की क्रांति में अंग्रेजों का सहयोग करने के कारण), 2. ‘राजा बहादुर’।
4. धर्मजीत सिंह (1876-1900 ई.)
- 🏰 राजधानी परिवर्तन: इन्होंने ‘रबकोन/राभको’ नामक गांव को अपनी राजधानी बनाया और उसका नाम बदलकर धर्मजयगढ़ कर दिया।
- 🎖️ उपाधि: राजा (लॉर्ड रिपन द्वारा)
- 📜 सनद प्राप्ति: 1877
5. चन्द्रशेखरप्रताप सिंहदेव (1900-1925 ई.)
- 🎓 शिक्षा: राजकुमार कॉलेज, रायपुर
- 👑 उत्तराधिकारी: चन्द्रचूड़ प्रताप सिंह
6. चन्द्रचूड़ प्रताप सिंह (1926-1947 ई.)
- 🇮🇳 भारत संघ में विलय: इन्होंने 15 अगस्त 1947 के पूर्व संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे। तत्पश्चात्, जनवरी 1948 में यह रियासत भारत संघ में पूरी तरह विलीन हो गई।
🌳 उदयपुर राजवंश की वंशावली
- कल्याण सिंह ↓ शिवराज सिंह ↓ लाल विन्धेश्वरी प्रसाद सिंह ↓ धर्मजीत सिंह ↓ चन्द्रशेखर प्रताप सिंह ↓ चन्द्रचूड़ प्रताप सिंह
👑 14. जशपुर रियासत: एक विस्तृत अवलोकन
📜 परिचय
- 👤 संस्थापक: सुजान देव (सोनपुर के राजा का ज्येष्ठ पुत्र) [CSPHCL (2022)]
- 🛡️ वंश: सूर्यवंश
- 📜 स्थापना: डोम राजाओं द्वारा
- 📜 सनद प्राप्ति: 1899 ई. (शासक – प्रतापनारायण सिंह)
- ✍️ विलय पत्र पर हस्ताक्षर: 01 सितम्बर 1947
- 🌟 विशेष: यह संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर करने वाली छत्तीसगढ़ की अंतिम देशी रियासत थी। [CG VS(AG-3)2021]
- ✒️ हस्ताक्षरकर्ता: टी.सी.आर.मेनन (शासक – विजयभूषण सिंहदेव)
👑 प्रमुख शासक
1. सुजानदेव
- 🌱 स्थापना: सोनपुर राजा के ज्येष्ठ पुत्र, सुजानदेव ने यहां शासन करने वाले डोम राजा रायभान को परास्त कर जशपुर रियासत की स्थापना की। [CSPHCL (2022)]
2. रणजीत सिंहदेव (1800-1813 ई.)
- 📜 इतिहास: जशपुर रियासत का व्यवस्थित इतिहास इन्हीं के शासन काल से प्राप्त होता है।
- ⚔️ हत्या: 1813 ई. में सरगुजा रियासत के लाल संग्रामसिंह ने आक्रमण कर इस रियासत के तीन चौथाई (3/4) भाग पर कब्जा कर लिया और इनकी हत्या कर दी।
3. रामसिंह देव (1813-1850 ई.)
- 🤝 सहायता: लाल संग्राम सिंह के भय से इनकी माता ने अंग्रेजों से सहायता मांगी, जिसके बाद मि. रफ्सेस ने लाल संग्राम सिंह को जशपुर रियासत से खदेड़ दिया।
- 🔗 अधीनता: मार्च 1818 में, अप्पा साहब भोंसले ने एक संधि द्वारा जशपुर और सरगुजा का कुछ भाग ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया। तब अंग्रेजों ने जशपुर को सरगुजा के अधीन कर दिया। [CSPHCL (2022)]
4. प्रतापनारायण सिंहदेव (1850-1900 ई.)
- 📜 सनद प्राप्ति: 1899 ई. (वायसराय लार्ड कर्जन)
- 🕊️ मृत्यु: अप्रैल 1900 में चेचक की बीमारी के कारण।
5. विष्णुप्रसाद सिंहदेव (1900-1924 ई.)
- 🎖️ उपाधि: ‘राजा बहादुर’ (वायसराय हार्डिंग द्वारा)
- 🚫 पदमुक्ति: 1922 में रियासत में हुए उपद्रव के कारण, 1923 में अंग्रेजों ने इन पर कुशासन का आरोप लगाकर प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।
- 👑 उत्तराधिकारी: देवशरण सिंहदेव (1924-1931) → विजयभूषण सिंहदेव (1931 से विलय तक)
6. विजयभूषण सिंहदेव (1931-1947)
- 👤 सुपरिंटेंडेन्ट: सत्ता प्राप्ति के समय इनके नाबालिग होने के कारण मध्यप्रांत के अधिकारी अब्दुल गफ्फार खाँ को रियासत का सुपरिंटेंडेन्ट नियुक्त किया गया।
- ✍️ विलय:
- रियासत के विलय के समय जशपुर के राजा विजयभूषण सिंहदेव थे।
- 15 अगस्त 1947 तक इस रियासत ने भारत संघ में विलय के लिए हस्ताक्षर नहीं किए थे।
- अंततः 1 सितम्बर 1947 को रियासत ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। [CSVyapam (VDAJ) 2021)]
- संविलियन पत्र पर हस्ताक्षर टी.सी.आर. मेनन ने किए, जबकि शासक विजयभूषण सिंहदेव थे।
- जनवरी 1948 में यह रियासत भारत संघ में पूरी तरह विलीन हो गई।
- 👑 दिलीप सिंह जूदेव: ये जशपुर राजवंश से संबंधित हैं।
🌳 जशपुर राजवंश की वंशावली
- सुजानदेव ↓ रणजीत सिंहदेव ↓ रामसिंहदेव ↓ प्रतापनारायण सिंहदेव ↓ विष्णु प्रसाद सिंहदेव ↓ देवशरण सिंहदेव ↓ विजय भूषण सिंहदेव