📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -1
📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -2
📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -3
📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -4
📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास
📌 मराठों का अप्रत्यक्ष शासनकाल (1741-57 ई.)
- इसकी शुरुआत रघुनाथ सिंह से हुई।
- उनके उत्तराधिकारी मोहन सिंह थे।
👑 मराठा शासन (1758-87 ई.)
- छत्तीसगढ़ में शासकों का क्रम इस प्रकार था:
- बिम्बाजी भोंसले (1758-1787)
- चिमणाजी भोंसले (1787-1788)
- व्यंकोजी भोंसले (1788-1811)
- पुरूषाजी / परसोजी (1811-1816)
- अप्पा साहेब (1816-1818)
🏛️ सूबा शासन व्यवस्था (1788-1818 ई.)
- इस दौरान नियुक्त सूबेदारों का अनुक्रम:
- महीपतराव दिनकर (1788-1790)
- विठ्ठलराव (1790-1796)
- भवानी कालू (1796-1797)
- केशव गोविंद (1797-1808)
- बिकोजी पिंड्री (1808-1809)
- बिकाजी गोपाल (1809-1817)
- सखाराम हरि एवं सीताराम टांटिया (1817)
- यादवराव दिवाकर (1817-1818)
ब्रिटिश संरक्षण में मराठा शासन (1818-30 ई.)
- ब्रिटिश अधीक्षकों का क्रम निम्नलिखित था:
- कैप्टन एडमण्ड (1818)
- कैप्टन एगेन्यु (1818-1825)
- कैप्टन हंटर (1825)
- कैप्टन सैंडिस (1825-28)
- कैप्टन विलकिंसन (1828)
- कैप्टन क्राफर्ड (1828-1830) [CG PSC (ACF) 2017]
👑 पुनः मराठा शासन (1830-54 ई.)
- इस अवधि में जिलेदारों का क्रम:
- कृष्णराव अप्पा
- अमृतराव अप्पा
- सद्दरूद्दीन
- दुर्गाप्रसाद
- इंदुकराव
- सखाराम बापू
- गोविंदराव अप्पा
- गोपालराव अप्पा
प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन (1854-1947 ई.)
- महत्वपूर्ण घटना: 13 मार्च 1854 को, लॉर्ड डलहौजी ने अपनी हड़प नीति के तहत इस क्षेत्र को ब्रिटिश शासन में सम्मिलित कर लिया।
अप्रत्यक्ष मराठा शासन (1741-1758 ई.)
- पृष्ठभूमि (1741-58 ई.):
- रतनपुर की कल्चुरी शाखा:
- 1. रघुनाथ सिंह
- 2. मोहन सिंह
- रायपुर की कल्चुरी शाखा:
- 1. अमर सिंह
- 2. शिवराज सिंह
- रतनपुर की कल्चुरी शाखा:
👑 प्रत्यक्ष मराठा शासन (1758-1787 ई.)
- ** ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:** 🧠
- 14 फरवरी 1755 को, नागपुर के साम्राज्यवादी शासक रघुजी प्रथम का निधन हो गया। इसके बाद, उनके चार बेटों के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष छिड़ गया।
- पेशवा के हस्तक्षेप के बाद यह संघर्ष समाप्त हुआ और नागपुर के भोंसला साम्राज्य को एक समझौते के तहत विभाजित कर दिया गया।
- इस विभाजन में, सम्पूर्ण नागपुर साम्राज्य को निम्नलिखित चार भागों में बांटा गया:
| क्रम | क्षेत्र | उत्तराधिकारी |
| 1 | नागपुर | जानोजी (सबसे बड़े पुत्र) |
| 2 | चाँदा | मूधोजी |
| 3 | बरार | साबाजी |
| 4 | छत्तीसगढ़ | बिम्बाजी (सबसे छोटे पुत्र) |
- छत्तीसगढ़ पर बिम्बाजी का प्रारंभिक शासन: 🌍
- बिम्बाजी भोंसले को विभाजन में नागपुर के अधीन रतनपुर का शासन मिला। शुरुआत में, वे अपने दीवान नीलू पंत (नीलकंठ) के माध्यम से प्रशासन चलाते थे।
- कुछ समय बाद, नीलू पंत से मोहभंग होने पर, उन्होंने घोड़ो पंत को रतनपुर के शासन के लिए भेजा।
- अंततः, बिम्बाजी भोंसले 1757 ई. में स्वयं शासन करने के लिए रतनपुर आए।
- उस समय, मोहन सिंह बाधा उत्पन्न करने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन वे अचानक बीमार पड़ गए।
- इसके परिणामस्वरूप, बिम्बाजी भोंसले को 1758 ई. में सत्ता की प्राप्ति हुई। [CGVyapam(KADI-2)2019]
वंश वृक्ष: रघुजी भोंसले
- रघुजी भोंसले के उत्तराधिकारी:
- जानोजी भोंसले (नागपुर क्षेत्र)
- साबाजी भोंसले (बरार, द्वारहा क्षेत्र)
- मूधोजी भोंसले (चांदा क्षेत्र)
- पुत्र: रघुजी द्वितीय (चांदा क्षेत्र)
- पुत्र: पुरूषाजी/परसोजी भोंसले (1811-1816) – व्यंकोजी के उत्तराधिकारी (छत्तीसगढ़ क्षेत्र)
- भाई: चिमणाजी भोंसले (1787-1788) – बिम्बाजी के उत्तराधिकारी (छत्तीसगढ़ क्षेत्र)
- पुत्र: रघुजी द्वितीय (चांदा क्षेत्र)
- बिम्बाजी भोंसले (1758-1787) (अधिग्रहित छत्तीसगढ़ क्षेत्र)
- उत्तराधिकारी: व्यंकोजी भोंसले (1788-1811) – चिमणाजी के उत्तराधिकारी (छत्तीसगढ़ क्षेत्र)
- पुत्र: अप्पा जी भोंसले (1816-1818) – पुरूषाजी के उत्तराधिकारी (छत्तीसगढ़ क्षेत्र)
- उत्तराधिकारी: व्यंकोजी भोंसले (1788-1811) – चिमणाजी के उत्तराधिकारी (छत्तीसगढ़ क्षेत्र)
- 🔑 छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्ष मराठा शासन के दौरान शासकों का क्रम:
- बिम्बाजी भोंसले (1758-1787) [CG PSC(ADPPO)2017],[CG PSC(EAP)2016]
- चिमणाजी भोंसले (1787-1788) [CG PSC(ADPPO)2017],[CG PSC(EAP)2016]
- व्यंकोजी भोंसले (1788-1811) [CG PSC(ADPPO)2017],[CG PSC(EAP)2016]
- पुरूषाजी/परसोजी भोंसले (1811-1816)
- अप्पाजी भोंसले (1816-1818) [CG PSC(EAP)2016]
व्यक्तिगत परिचय: बिम्बाजी भोंसले
- 👑 पिता: रघुजी प्रथम (निधन: 14 फरवरी 1755)।
- 📅 शासनकाल: 1758-1787 ई. [CG PSC (EAP) 2016]। उन्हें छत्तीसगढ़ का प्रथम मराठा शासक भी माना जाता है। [CG Vyapam(KADI)2019, (Patwari),(FI)2017],[CG PSC(ADIHS)2014]
- 🏛️ राजधानी: रतनपुर, जो छत्तीसगढ़ में मराठों की पहली राजधानी थी।
- 🪦 मृत्यु: 7 दिसंबर 1787 को उनका निधन हुआ। [CG PSC (ARTO) 2022]। इस बात का प्रमाण यूरोपीय यात्री मि. कोलब्रुक के यात्रा विवरण से मिलता है।
- 🌍 प्रारंभिक शासन: वे नागपुर में रहकर अपने दीवानों (1. नीलूपंत/नीलकंठ, 2. घोड़ोपंत) के माध्यम से शासन करते थे।
- ** आगमन:** दिसंबर 1757 में नागपुर से रतनपुर के लिए प्रस्थान किया और मोहन सिंह की मृत्यु के बाद 1758 में सत्ता संभाली।
- 🗺️ शासन क्षेत्र: उनके शासन में छत्तीसगढ़ (रतनपुर एवं रायपुर) सहित संबलपुर और पटना शामिल थे।
- 🎉 सांस्कृतिक योगदान: उन्होंने रतनपुर क्षेत्र में दशहरे के अवसर पर स्वर्ण पत्र देने की प्रथा की शुरुआत की।
- 🤝 दत्तक पुत्र: चिमणाजी भोंसले।
- 👩👩👧 परिवार:
- उनकी तीन पत्नियाँ थीं: 1. आनंदीबाई, 2. उमाबाई, 3. रमाबाई [CG Vyapam (Maha. lek.)2017]
- 1. आनंदीबाई:
- शासन: बिम्बाजी के निधन के बाद, उन्होंने 1787 से 1801 ई. तक सत्ता का नियंत्रण संभाला।
- संघर्ष: उनका सत्ता के लिए सूबेदार महिपतराव के साथ टकराव हुआ था। [CG PSC (ADS) 2017]
- प्रभाव: सूबेदार को शासन के सभी प्रमुख कार्यों के लिए आनंदीबाई से परामर्श लेना आवश्यक था। वास्तव में, आनंदीबाई ने अपनी मृत्यु तक शासन का संचालन किया।
- निर्माण कार्य: उन्होंने रामटेकरी मंदिर में बिम्बाजी की हाथ जोड़कर खड़ी प्रतिमा का निर्माण करवाया और पास में ही एक रानी जलाशय भी बनवाया। उन्होंने रतनपुर किले के अंदर श्री लक्ष्मीनारायण का एक छोटा मंदिर भी बनवाया था।
- यात्रा: यूरोपीय यात्री मि. लैंकी ने 1790 में छत्तीसगढ़ की यात्रा की थी।
- समकालीन शासक: आनंदीबाई के समय के मराठा शासक थे:
- बिम्बाजी भोंसले (1758–87)
- चिमणाजी (1787–88)
- व्यंकोजी भोंसले (1788–1811) [CG PSC(ACF)2016]
- 2. उमाबाई:
- अपने पति की मृत्यु से व्यथित होकर, वे 1787 ई. में सती हो गईं। इसके परिणामस्वरूप, रतनपुर में एक ‘सती चौरा’ का निर्माण किया गया।
- 3. रमाबाई:
- पति के वियोग में उन्होंने सांसारिक जीवन त्याग दिया और वन में चली गईं।
- 🗺️ विदेशी यात्री:
- मि. मॉट (1766)
- अलेक्जेंडर इलियट (1778)
- 🏛️ प्रशासनिक सुधार:
- रायपुर और रतनपुर का प्रशासनिक रूप से एकीकरण किया। [CG Vyapam (Patwari)2019]
- रतनपुर में एक न्यायालय की स्थापना की।
- राजनांदगांव और खुज्जी नामक दो नई जमींदारियाँ शुरू कीं।
- परगना पद्धति के प्रणेता: (जन्मदाता – विट्ठलराव दिनकर)।
- सैन्य सेवा में बहादुरी के लिए मोहम्मद खान तारान को मदनगढ़ किला क्षेत्र के पाँच स्थान (1. अकलतरा, 2. लवन, 3. खरौद, 4. मदनपुर, 5. किकरदा) पुरस्कार स्वरूप प्रदान किए। [CG PSC(AMO)2017][CG Vyapam (EAE)2017]
- मोहम्मद खान तारान 200 घुड़सवारों और 500 पैदल सैनिकों की एक टुकड़ी का नेतृत्व करते थे। उन्होंने मराठी, मोंढ़ी, और उर्दू भाषाओं के साथ-साथ मोड़ी लिपि का भी प्रयोग किया।
- 🕌 स्थापत्य:
- रामटेकरी मंदिर (रतनपुर) [CG PSC(Mains)2011]
- संगमेश्वर शिव मंदिर (रतनपुर)
- रतनपुर में एक मस्जिद का निर्माण।
- खण्डोबा मंदिर (रतनपुर)
- अमरकंटक में नर्मदा माई मंदिर में कुंड और मंदिर का निर्माण।
- 🛠️ जीर्णोद्धार:
- दूधाधारी मठ (रायपुर) (निर्माणकर्ता – बलभद्र दास) [CG Vyapam (CACC)2018]
- 🌱 ग्राम दान:
- राजिम के राजीव लोचन मंदिर के खर्चों को पूरा करने के लिए एक गाँव दान में दिया।
- दूधाधारी मठ को भी कुछ गाँव दान में दिए।
- ⚖️ न्यायालय:
- उन्होंने रतनपुर में एक नियमित न्यायालय स्थापित किया ताकि जनता को न्याय संबंधी सुविधाएँ मिल सकें।
प्रमुख पदाधिकारी और नीतियाँ
- 🧠 प्रमुख पदाधिकारी: जब बिम्बाजी भोंसले नागपुर से रतनपुर आए, तो वे प्रशासन में सहायता के लिए अपने साथ कुछ अनुभवी व्यक्तियों को भी लाए। इनमें से कुछ प्रमुख व्यक्ति इस प्रकार थे:
| पदाधिकारी | पद/विभाग |
| 1. घोड़ो महादेव | राज्य का प्रमुख प्रशासकीय अधिकारी/व्यवस्थापक/दीवान [CG PSC (Asst. HYD) 2020] |
| 2. कृष्णभट्ट उपाध्ये | राज पंडित |
| 3. मशारनिल्हे / मशारिल्हे | सह-सलाहकार (घोड़ो महादेव का) |
| 4. रामचन्द्र बक्षी | कीब प्रमुख (किला प्रमुख) |
| 5. माधव रामचन्द्र मजूमदार | लेखा |
| 6. कृष्णाजी मोहिते | राजस्व विभाग |
| 7. महमूद खाँ | शासन में |
| 8. कादर खाँ | सेना विभाग |
| 9. नीलू पंडित | सेनापति |
| 10. पाण्डुरंग (महाड़िक) | सर सेनापति, सैन्य विभाग |
- 📜 प्रशासनिक नीति:
- बिम्बाजी को नागपुर राजा के सहायक के रूप में नियुक्त किया गया था, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों का लाभ उठाकर स्वयं को एक स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया।
- वे सभी मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते थे और नागपुर से कोई संबंध नहीं रखते थे। [CG PSC(ACF)2021]
- बिम्बाजी का अपना अलग दरबार, सलाहकार और सेना थी, जिसमें नागपुर का कोई हस्तक्षेप नहीं था।
- 💰 राजस्व नीति:
- वे राज्य का पूरा लगान वसूलते थे और इसका कोई भी हिस्सा नागपुर को नहीं भेजते थे।
- सेना और खजाने पर उनका पूर्ण नियंत्रण था।
- उन्होंने छत्तीसगढ़ में अपने सिक्के जारी नहीं किए, बल्कि नागपुरी मुद्रा को ही प्रचलन में रखा।
- 🤝 जमींदारों से संबंध:
- बिम्बाजी भोंसले के जमींदारों के साथ संबंध सामान्यतः अच्छे थे, लेकिन जो जमींदार ‘टकोली’ (वार्षिक कर) देने में आनाकानी करते थे, उनका कठोरता से दमन किया जाता था।
- जमींदारों को अपने आंतरिक मामलों में स्वायत्तता प्राप्त थी।
- छत्तीसगढ़ के 32 प्रमुख जमींदारों से कुल 68,721 रुपये की वार्षिक टकोली प्राप्त होती थी।
- 1. धमधा: यहाँ के जमींदार ने विद्रोह किया, और 1781 ई. में बिम्बाजी भोंसले के आक्रमण के भय से जल समाधि लेकर प्राण त्याग दिए।
- 2. खैरागढ़:
- संभवतः यहाँ का जमींदार टकोली देने में आनाकानी करता था, जिस कारण टकोली की दर बढ़ा दी गई थी, जो बढ़कर 44,000 हो गई थी, जिसे बाद में कम किया गया।
- खैरागढ़ से सर्वाधिक 30,100 रुपये की टकोली वसूली जाती थी और वह 500 घुड़सवार सैनिकों की मदद भी करता था।
- 1768 ई. में बिम्बाजी ने खैरागढ़ पर आक्रमण किया।
- 3. कांकेर:
- कांकेर के राजा धीरज सिंह थे और सिहावा तालुका उनके अधीन था।
- संभवतः बस्तर क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए उनसे कोई टकोली नहीं ली जाती थी, बल्कि इसके बदले में वे 500 घुड़सवार सैनिकों का सहयोग प्रदान करते थे।
- 4. कोरबा: 🤝
- यहाँ के जमींदार ने विद्रोह कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी जमींदारी जब्त कर ली गई। [CG Vyapam(MFA)202]
- 5. चांपा:
- इस क्षेत्र के जमींदार को ‘दीवान’ कहा जाता था।
- 6. पण्डरिया:
- बिम्बाजी भोंसले के साथ इनके संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं थे।
- 7. चांगभखार:
- इस रियासत के शासक ने ‘टकोली’ देने से इनकार कर दिया। इसके फलस्वरूप, 1775 ई. में इस क्षेत्र पर आक्रमण कर उन्हें वार्षिक टकोली देने के लिए मजबूर किया गया।
- 8. सरगुजा:
- 1781 ई. में, महिपतराव काशी के नेतृत्व में इस जमींदारी पर आक्रमण किया गया और इसे भी वार्षिक टकोली देने के लिए विवश किया गया।
- 9. बस्तर:
- मराठों और बस्तर रियासत के शासकों के बीच संबंध समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते थे। मराठे बस्तर से केवल लगान वसूलते थे, जबकि अन्य मामलों में बस्तर के राजा स्वतंत्र थे।
- 💡 विशेष नोट:
- छत्तीसगढ़ के पहले इतिहासकार, बाबू रेवाराम कायस्थ (1812-1877) और शिवदत्त शास्त्री, दोनों ने बिम्बाजी के शासन की प्रशंसा की है।
- बिम्बाजी भोंसले ने 1758 ई. में रतनपुर के महामाया मंदिर के मुख्य पुजारी, पंडित पचकौड़ को वार्षिक अनुदान देने की घोषणा की थी।
👑 चिमणाजी भोंसले (1787-1788 ई.)
- 📜 शासनकाल: 1787-1788 ई. [CG PSC(EAP)2016]
- 👨👦👦 परिवार:
- पिता: मूधोजी (बिम्बाजी के भाई)
- दत्तक पुत्र: बिम्बाजी भोंसले के
- 📛 नाम:
- मूल नाम: खण्डोजी
- उपनाम: चिमनाबापू
- 🎖️ उपाधि: ‘सेना धुरंधर’ (यह उपाधि आनंदी बाई द्वारा दी गई थी)
- 🔑 वास्तविक शासन: इस अवधि में शासन की बागडोर वास्तव में आनंदी बाई के हाथों में थी। [CG Vyapam (PHEH)2023]
- 🛠️ जीर्णोद्धार: गंधेश्वर महादेव मंदिर, सिरपुर।
- 🪦 मृत्यु: 1788 में एक रहस्यमय परिस्थिति में उनकी मृत्यु हो गई।
👑 व्यंकोजी भोंसले (1788-1811 ई.)
- 📅 शासनकाल: 1788-1811 ई. [CG PSC(EAP)2016]
- 👨👦👦 पिता: मूधोजी
- 🎖️ उपाधि: ‘धुरंधर’ (यह उपाधि नागपुर के भोंसले शासक रघुजी द्वितीय द्वारा प्रदान की गई थी)।
- 🪦 मृत्यु: 1811 में बनारस की यात्रा के दौरान।
- 🏛️ प्रशासनिक व्यवस्था:
- इन्होंने सूबेदारी व्यवस्था (1788-1818 ई.) की शुरुआत की। [CG PSC(ABEO)2013, (Lib.)2017, (ADPPO)2013] [CG Vyapam(LOI)2015, (RI)2017]
- वे स्वयं नागपुर में निवास करते थे और सूबेदारों के माध्यम से छत्तीसगढ़ का शासन-प्रशासन चलाते थे।
- 🧑💼 अधीन सूबेदार: उनके शासनकाल (1788-1811 ई.) में निम्नलिखित सूबेदारों की नियुक्ति हुई:
- महिपतराव दिनकर (1788-1790 ई.) [CG PSC(Pre)2019]
- विठ्ठलराव दिनकर (1790-1796 ई.)
- भवानी कालू (1796-1797 ई.)
- केशव गोविंद (1797-1808 ई.)
- बिकोजी पिंड्री (1808-1809 ई.)
- बिकाजी गोपाल/भीखाभाऊ (1809-1817 ई.)
- 🗺️ यूरोपीय यात्री:
- फारेस्टर (1790 ई.): रायपुर की यात्रा करने वाले यूरोपीय यात्री।
- मि. जे. टी. ब्लंट: 31 मार्च 1795 को रायपुर और 13 मई, 1795 को रतनपुर की यात्रा की।
- कोलब्रुक (1799):
- 🌍 साम्राज्य विस्तार:
- सम्बलपुर रियासत (1808 ई.): सेनापति रामचन्द्र बाघ ने सम्बलपुर पर अधिकार कर उसे छत्तीसगढ़ में मिला लिया। यह क्षेत्र 1905 तक छत्तीसगढ़ का हिस्सा रहा।
- बस्तर रियासत (1809 ई.): व्यंकोजी के शासनकाल में, काकतीयवंशी शासक महिपालदेव ने टकोली देने से इनकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, सेनापति रामचन्द्र बाघ ने 1809 ई. में बस्तर पर आक्रमण किया और उन्हें टकोली देने के लिए मजबूर किया, साथ ही सिहावा क्षेत्र पर भी नियंत्रण कर लिया।
👑 पुरुषाजी/परसोजी/बालासाहब भोंसले (1811-1816 ई.)
- 📅 शासनकाल: 1811-1816 ई. [CG PSC(EAP)2016]
- 背景: व्यंकोजी की मृत्यु के बाद, नागपुर के शासक रघुजी भोंसले द्वितीय ने छत्तीसगढ़ का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और अपने पुत्र पुरुषाजी/परसोजी के नाम पर सूबेदारों के माध्यम से शासन चलाया।
- 👨👦👦 पिता: रघुजी द्वितीय
- 📛 उपनाम: बाला साहब भोंसले
- 👑 सत्तारूढ़: 22 मार्च 1816 को रघुजी द्वितीय की मृत्यु के बाद वे गद्दी पर बैठे।
- 🧑💼 अधीन सूबेदार: बिकाजी गोपाल
- 👩❤️👨 पत्नी: ‘काशीबाई’
- 🪦 मृत्यु: 1 फरवरी 1817 को पुरुषाजी का निधन हो गया, जिसके बाद 10 फरवरी 1817 को उनकी पत्नी सती हो गईं।
👑 अप्पासाहेब भोंसले (1816-1818 ई.)
- 📅 शासनकाल: 1816-1818 ई. [CG PSC(EAP)2016]
- 🧑💼 अधीन सूबेदार:
- सखाराम हरि एवं सीताराम टांटिया (1817 ई.)
- यादव राव दिवाकर (1817-1818 तक)
- 📜 घटनाक्रम:
- पुरूषाजी शारीरिक और मानसिक रूप से शासन के लिए अयोग्य थे, इसलिए रघुजी द्वितीय ने मृत्यु से पहले अप्पासाहेब (व्यंकोजी के पुत्र) को उनकी सहायता के लिए कहा था।
- पुरूषाजी के गद्दी पर बैठते ही अप्पासाहेब ने शासन की बागडोर संभाल ली, लेकिन महत्वाकांक्षा के कारण उन्होंने अंग्रेज रेजिडेंट जेनकिंस के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा।
- 27 अप्रैल, 1816: अप्पासाहेब ने गुप्त रूप से अंग्रेजों के साथ सहायक संधि कर ली।
- 1 फरवरी, 1817: अप्पासाहेब के इशारे पर पुरूषाजी की हत्या कर दी गई और वे नागपुर और छत्तीसगढ़ के शासक बन गए।
- 27 नवंबर, 1817: सीताबर्डी की लड़ाई में अंग्रेजी सेना के हाथों अप्पासाहेब की बुरी तरह हार हुई।
- 1818 ई.: अप्पासाहेब को पद से हटा दिया गया, और छत्तीसगढ़ के प्रशासन के लिए ब्रिटिश अधीक्षकों की नियुक्ति की गई।
- 🔑 महत्वपूर्ण तथ्य: इस राज्य में ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित होने से ठीक पहले अप्पासाहेब भोंसले का शासन था। [CG Vyapam(VFM)2021]
🌍 शासक और यूरोपीय यात्री: एक नजर में
| शासक / प्रशासक | सूबा प्रमुख | यूरोपीय यात्री (वर्ष) |
| 1. बिम्बाजी भोंसले | – | • मि. मॉट (1766)• एलेक्जेंडर इलियट (1778, मृत्यु: 12 सितम्बर 1778) |
| 2. आनंदी बाई | महिपतराव दिनकर | • मिस्टर लैंकी (1790) |
| 3. व्यंकोजी भोंसले | महिपतराव दिनकर | • फारेस्टर (1790) |
| विठ्ठलराव दिनकर | • मि. जे.टी.ब्लंट (1795) [CG Vyapam(EAE)2017] | |
| केशव गोविंद | • कोल ब्रुक (1799) [CG PSC(ADPPO)2013][CG Vyapam(ADEO)2017] |
📜 सूबा शासन
- 🗓️ शुरुआत: 1787 [CG Vyapam (Lab Tech.) 2024]
- ⏳ अवधि: 1788–1818 ई. [CG Vyapam (VPR)2021]
- 🏛️ मुख्यालय: रतनपुर
- 🧠 सूत्रधार: व्यंकोजी भोंसले [CG Vyapam (AGDO)2021, (Patwari)2016]
- 🏁 समाप्ति: जेनकिन्स द्वारा
- 🥇 प्रथम सूबेदार: महिपत राव दिनकर
- 🥈 अंतिम सूबेदार: यादव राव दिवाकर [CG Vyapam (RI)2017]
- 🎯 उद्देश्य: इस व्यवस्था को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य मराठा शासकों के लिए नागपुर से ही शासन व्यवस्था को संचालित करना और नागपुर की गद्दी पर अपना दावा मजबूत बनाए रखना था।
- 🧑💼 पद: सूबेदार शासक न होकर मराठों के अधीन एक अधिकारी या प्रतिनिधि मात्र होते थे।
- 🔑 अधिकार: सूबेदार को सूबा के सैन्य, नागरिक, दीवानी और फौजदारी से संबंधित सभी अधिकार प्राप्त थे। [CG Vyapam (AGDO)2021]
- 💡 विशेष: छत्तीसगढ़ में मराठों द्वारा स्थापित सूबा शासन, उनकी उपनिवेशवादी नीतियों का ही एक परिणाम था। इस शासन प्रणाली के तहत प्रदेश में कुल 8 सूबेदारों की नियुक्ति की गई, जिनका वर्णन इस प्रकार है: [CG PSC(ADS)2017], [CG PSC(Pre)2019],[CG Vyapam (ESC)2017]
सूबेदारों का क्रम
1. महिपत राव दिनकर (1788-1790 ई.)
- 👑 शासनकाल: 1788-1790 ई.
- 🔑 प्रमुख तथ्य: इन्हें छत्तीसगढ़ में सूबा शासन के अंतर्गत नियुक्त किया गया पहला सूबेदार माना जाता है। [CG Vyapam (Mahila Super.)2013, (RI)2015]
- ✈️ यूरोपीय यात्री: इनके समय में, फॉरेस्टर नामक यूरोपीय यात्री ने 17 मई, 1790 ई. को रायपुर की यात्रा की। [CGVyapam (DCAG)2018][CGPSC(CMO)2019, (SEE) 2022]
- ⚔️ सत्ता संघर्ष: इनका सत्ता को लेकर आनंदीबाई के साथ टकराव हुआ। [CG PSC(ADS)2017] ये केवल नाममात्र के लिए सूबेदारी का कार्य करते थे, क्योंकि शासन की सारी शक्तियाँ आनंदी बाई के हाथों में केंद्रित थीं। [CG PSC(ACF)2016]
2. विठ्ठलराव दिनकर (1790-1796 ई.)
- 👑 शासनकाल: 1790-1796 ई. [CG PSC(Asst. HYD)2020]
- ✈️ विदेशी यात्री: मिस्टर जे. टी. ब्लंट [CG Vyapam (EAE)2017],[CG PSC(CMO)2019]
- ⚔️ विद्रोह:
- सरगुजा विद्रोह (1792)
- भोपालपट्टनम का संघर्ष (1795): बस्तर में प्रवेश का विरोध कर रहे आदिवासियों और जे. टी. ब्लंट के बीच हुआ।
- 📜 जन्मदाता:
- पद्धति: परगना पद्धति (1790) [CGPSC(ADS)2017,(ACF)2016,2021]
- अवधि: 1790–1818
- प्रमुख: कमाविसदार [CGVyapam(AGDO)2018,2021]
- विशेष: इन्होंने कल्चुरीकालीन 36 गढ़ों को 27 परगनों में विभाजित कर दिया और गौंटिया के पद को पहले की तरह ही बनाए रखा।
3. भवानी कालू (1796-1797 ई.)
- ⏱️ शासनकाल: 1796-1797 ई. (यह सभी सूबेदारों में सबसे छोटी अवधि थी)।
- 📜 पदच्युति: इन्होंने अपने प्रतिनिधि (कोड़ो विष्णु) को भेजकर शासन करने का प्रयास किया, जिस कारण इन्हें पद से हटाकर केशव गोविंद को नया सूबेदार नियुक्त किया गया।
4. केशव गोविंद (1797-1808 ई.)
- 🕰️ शासनकाल: 1797-1808 ई. (यह सबसे लंबी अवधि तक सूबेदार रहे)।
- ✈️ यूरोपीय यात्री: कोलब्रुक (1799 ई.) [CG Vyapam (ADEO)2017] [CG PSC(CMO)2019]
- 🌍 साम्राज्य विस्तार: इन्होंने सम्बलपुर क्षेत्र को जीतकर मराठा साम्राज्य का विस्तार किया।
- ⚔️ सीमा विवाद: सरगुजा और छोटा नागपुर के बीच (नवंबर, 1808 ई.)।
- 🏴☠️ पिंडारी आक्रमण: इनके शासनकाल में पिंडारियों का पहला आक्रमण हुआ, और इन्होंने पिंडारियों के आक्रमण से छत्तीसगढ़ की सफलतापूर्वक रक्षा की। [CG PSC(ADS)2017]
🏴☠️ पिण्डारी
- 📛 आशय: “25 हजार लुटेरों का झुंड”
- 🏡 निवास: पेण्ड्रा (जनश्रुति के अनुसार, पिंडारियों के कारण ही इस क्षेत्र का नाम पेण्ड्रा पड़ा)
- 👤 प्रमुख: लहवरिया [CG PSC(ARO)2022]
- ⏳ प्रभाव: 1806 से 1810 ई. तक छत्तीसगढ़ में पिंडारियों का भय बना रहा।
- ⚔️ आक्रमण:
- प्रथम आक्रमण: केशव गोविंद के शासनकाल में।
- सर्वाधिक आक्रमण: बिकाजी गोपाल के समय (चरम सीमा पर)।
- पिण्डारियों का अंत: यादवराव दिवाकर के शासनकाल में 1818 ई. में हुआ। [CG PSC(AMO)201]
5. बिंकोजी पिंड्री एवं ढीरो कुल्ललुकर (1808-09)
6. बिकाजी गोपाल/भीकाभाऊ (1809-1817 ई.) [CG PSC(ADJE)2020]
- 👑 शासनकाल: 1809–1817 ई.
- 🏴☠️ पिंडारी आक्रमण: इनके समय में पिंडारियों की गतिविधियाँ अपने चरम पर थीं और छत्तीसगढ़ में लूटपाट की घटनाएँ बढ़ गईं। [CG PSC(ACF)2016]
- 🤝 हस्तक्षेप:
- सरगुजा रियासत/जमींदारी में उत्तराधिकार को लेकर चल रहे संघर्ष में हस्तक्षेप किया। [CG yapam(DCAG)2018], [CG PSC(ADS)2017,(CMO)2019]
- छोटा नागपुर और सरगुजा जमींदारी के बीच सीमा विवाद को सुलझाया।
- 🌪️ राजनीतिक अस्थिरता:
- 1811 ई.: भोंसला शासक व्यंकोजी भोंसले का निधन।
- 22 मार्च 1816: नागपुर के शासक रघुजी द्वितीय का निधन।
- 27 अप्रैल 1816: अप्पासाहेब द्वारा अंग्रेजों से गुप्त संधि।
- 1 फरवरी 1817: परसोजी/पुरूषाजी भोंसले का निधन।
- 1817: अप्पासाहेब की छत्तीसगढ़ में भोंसला शासक के रूप में नियुक्ति।
- 26-27 नवम्बर 1817: सीताबर्डी का युद्ध।
- ⚖️ आरोप: अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड हेस्टिंग्स पर भोंसला प्रशासन को कमजोर करने का आरोप लगा।
7. सखाराम हरि एवं सीताराम टांटिया (1817 ई.)
- 📅 शासनकाल: 1817 ई.
- 🕰️ शासन: सखाराम हरि (03 माह) एवं सीताराम टांटिया (08 माह)।
- 🔪 हत्या: सखाराम हरि की हत्या रतनपुर में एक व्यक्ति द्वारा गोली मारकर कर दी गई।
8. यादव राव दिवाकर (1817-1818 ई.)
- 👑 शासनकाल: 1817-1818 ई.
- 🏁 अंत:
- यह छत्तीसगढ़ में सूबा शासन के अंतर्गत नियुक्त अंतिम सूबेदार थे।
- 1818 में छत्तीसगढ़ में पिंडारियों का अंत हुआ। [CG PSC(AMO)2017]
- सूबा शासन की समाप्ति हुई।
- 📜 विशेष: छत्तीसगढ़ के ब्रिटिश रेजिडेंट जेनकिंस ने सूबा प्रणाली को समाप्त कर ब्रिटिश अधीक्षकों की नियुक्ति की।
ब्रिटिश नियंत्रण काल (1818-1830)
यह दौर छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसकी घटनाएँ इस प्रकार हैं:
- 🗓️ 22 मार्च, 1816: रघुजी द्वितीय का निधन।
- ✍️ 27 अप्रैल, 1816: अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड हेस्टिंग्स और अप्पासाहेब के बीच एक संधि संपन्न हुई।
- 💰 9 जून, 1816: संधि को लागू किया गया, जिसके तहत मराठों को एक अंग्रेजी सेना रखनी थी और इसके बदले अंग्रेजों को 75 लाख रुपये देने थे।
- ✝️ 1 फरवरी, 1817: परसोजी भोंसले की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु।
- 🔥 10 फरवरी, 1817: परसोजी भोंसले की पत्नी काशी बाई सती हो गईं।
- 👑 21 अप्रैल, 1817: रघुजी तृतीय की कम आयु के कारण, अप्पासाहेब को नागपुर राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। उन्होंने अंग्रेज-विरोधी पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना का नेतृत्व भी अपने हाथों में ले लिया।
- ⚔️ 27 नवंबर, 1817: सीताबर्डी का युद्ध (तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध)। इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई, जिसके बाद उन्हें अंग्रेजों की सहायक संधि स्वीकार करनी पड़ी।
- 🤝 6 फरवरी, 1818: अप्पासाहेब और अंग्रेज अधिकारी जेनकिंस के बीच एक समझौता हुआ।
- प्रावधान:
- रघुजी तृतीय के वयस्क होने तक अप्पासाहेब का शासन रहेगा।
- राजा, रेजीमेंट के निर्देशों के अनुसार कार्य करेगा।
- भोंसलों के अधीन क्षेत्रों (ग्वालियर, बरार, छत्तीसगढ़, सरगुजा और जबलपुर) में अंग्रेजों की शासन व्यवस्था लागू होगी।
- प्रावधान:
- ⛓️ 15 मार्च, 1818: गोंड राजाओं को उकसाने के आरोप में अप्पासाहेब को राजमहल में बंदी बना लिया गया।
- 🏃 3 मई, 1818: अप्पासाहेब सैनिकों को चकमा देकर इलाहाबाद से असीरगढ़ होते हुए लाहौर पहुँच गए।
- 📜 31 मई, 1818: नागपुर के रेसिडेंट जेनकिंस ने मराठा राज्य में ब्रिटिश नियंत्रण की घोषणा की (जब तक रघुजी तृतीय वयस्क नहीं हो जाते)।
- 🔑 1818 ई.: पहली बार छत्तीसगढ़ सीधे तौर पर अंग्रेजी शासन के अधीन आया। [CGVyapam (VPR)2021] [CGPSC(Lib)2014]
- ⚰️ 1840 ई.: 44 वर्ष की आयु में अप्पासाहेब की मृत्यु हो गई।
👮 ब्रिटिश अधीक्षक (British Superintendent)
- ⏳ अवधि: 1818 से 1830 तक।
- 📛 उपनाम: इस काल को आंग्ल-मराठा शासन, अंग्रेजों के अधीन मराठा शासन, या ब्रिटिश संरक्षणकाल के नाम से भी जाना जाता है।
- 🧑⚖️ नियुक्ति: छत्तीसगढ़ में प्रशासन के लिए ब्रिटिश सुपरिंटेंडेंट की नियुक्ति की गई, जिन्हें नागपुर के रेसिडेंट के अधीन रहकर कार्य करना होता था। [CG PSC(ADS)2017]
- 🔢 क्रम: ब्रिटिश नियंत्रण काल के दौरान कुल 06 ब्रिटिश अधीक्षक नियुक्त किए गए, जिनका विवरण इस प्रकार है:
1. कैप्टन एडमंड (1818 ई.)
- 👑 शासनकाल: 1818 ई.
- 🥇 पद: नागपुर के भोंसला राज्य पर ब्रिटिश संरक्षण के तहत छत्तीसगढ़ में नियुक्त होने वाले प्रथम सुपरिंटेंडेंट। [CG PSC (Mains) 2011],[CG PSC (Pre) 2016],[CG Vyapam (MFA)2017],[CG PSC(EAP)2016]
- 🏛️ राजधानी: रतनपुर
- ⚔️ विद्रोह: 1818 में डोंगरगढ़ के जमींदार का विद्रोह हुआ, जिसे अप्पासाहेब से प्रेरणा मिली थी। [CG PSC (Pre) 2017]
- 🧠 दमन: अधीक्षक एडमंड ने कूटनीति का प्रयोग करते हुए खैरागढ़ के जमींदार (संभवतः टिकैत राय) को डोंगरगढ़ की जमींदारी का लालच देकर सहयोग प्राप्त किया और विद्रोह को आसानी से दबा दिया। परिणामस्वरूप, खैरागढ़ के जमींदार को डोंगरगढ़ का क्षेत्र भी मिल गया।
2. कैप्टन पी. वान्स एगेन्यू (1818-1825 ई.)
- 👑 शासनकाल: 1818-1825 ई.
- 🏛️ राजधानी: रायपुर
- 📋 प्रशासनिक कार्य: इन्होंने छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक ढांचे का पुनर्गठन किया। [CG PSC(EAP)2016],[CG Vyapam (FI)2017]
- 1. राजधानी परिवर्तन: 1818 ई. में छत्तीसगढ़ की राजधानी को रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित किया। [CG PSC(Lib & SO)2019,(Pre)2013, 2017][CG Vyapam(Patwari)2017,(VPR)2021]
- 2. परगनों का पुनर्गठन: इन्होंने 27 परगनों को 8 (बाद में 9) परगनों में सीमित कर दिया:
- रतनपुर 2. रायपुर (सबसे बड़ा) 3. धमतरी 4. दुर्ग 5. धमधा 6. नवागढ़ 7. खरौद 8. राजहरा (सबसे छोटा) 9. बालोद (1820 ई. में शामिल) [CG PSC(SEE)2020]
- 3. प्रशासनिक सुधार: पटेल का पद समाप्त कर दिया गया, जबकि गोंटिया पद को बनाए रखा गया। साथ ही बरार पाण्डे, पोतदार, और अमीन (प्रत्येक परगने में) जैसे नए पद सृजित किए गए। [CG PSC(Lib)2017]
- 4. भू-राजस्व सुधार: लगान वसूली के लिए 3 किस्तों की प्रणाली शुरू की गई, जिसकी तिथियाँ थीं – 05 नवंबर, 05 फरवरी, 05 अप्रैल।
- 5. आर्थिक सुधार: वस्तु विनिमय के स्थान पर मुद्रा विनिमय को बढ़ावा दिया।
- 6. जमींदारों के साथ संबंध: जमींदारों के साथ संबंधों को स्पष्ट करने के लिए इकरारनामा दस्तावेज बनाया गया।
- 7. सिंचाई साधनों का विकास: क्षेत्र का सर्वेक्षण कराकर नदियों के जल प्रबंधन हेतु नहरों और स्टॉप डैम का निर्माण करवाया।
- 8. सैन्य सुधार: छत्तीसगढ़ के लिए 3000 घोड़े निर्धारित किए और एक अंतरिम अनियमित सेना का गठन किया।
- 9. समझौता: बस्तर और जैपुर (ओडिशा) जमींदारी के बीच कोटपाड़ परगना के विवाद को सुलझाया।
⚔️ प्रमुख विद्रोह (एगेन्यू के काल में)
| वर्ष | विद्रोह का नाम | विद्रोहकर्ता | दमनकर्ता |
| 1818 | नवागढ़ का विद्रोह | महारसिया (जमींदार) | — |
| 1818–1825 | गोंड विद्रोह | गोंड राजा (धमधा) | — |
| 1819 | सोनाखान में विद्रोह | रामसाय | कैप्टन मैक्सन |
| 1824–25 | परलकोट का विद्रोह | गेंदसिंह | कैप्टन पेबे |
| सावंत भारती का विद्रोह | सावंत भारती | [CG Vyapam (HCAG)2018] [CG PSC(ARO)2022,(TSI)2024] |
- 💡 विशेष: जेनकिंस ने 1818 में रतनपुर की यात्रा की। मिस्टर एगेन्यू और महिपाल देव की भेंट 1819 में धमतरी के राजूर में हुई थी।
3. कैप्टन हण्टर (1825 ई.)
- शासनकाल: 1825 ई.।
4. कैप्टन सेंडिस (1825-1828 ई.)
- 👑 शासनकाल: 1825-1828 ई.
- 🔑 अधिकार: इन्हें एगेन्यू की तुलना में अधिक सैनिक और असैनिक अधिकार प्राप्त थे।
- 📬 संचार माध्यम: छत्तीसगढ़ में डाक-तार व्यवस्था प्रारंभ की।
- 🌱 ताहुतदारी प्रथा: लोरमी (1826) और तरेंगा (1828) नामक दो ताहुतदारियों का निर्माण करवाया।
- 🗣️ भाषा: सरकारी कामकाज का माध्यम अंग्रेजी कर दिया गया।
- 🗓️ कैलेण्डर: 1 मई, 1828 से ग्रेगोरियन कैलेण्डर लागू किया।
- 🤝 समझौता: बस्तर, कांकेर और जैपुर के बीच विवादों में समझौता कराया। [CG PSC(Lib & SO)2019,(Pre)2017] 13 दिसम्बर, 1826 को रघुजी तृतीय और अंग्रेजों के मध्य सत्ता प्राप्ति हेतु एक समझौता हुआ। [CG PSC(ARO)2022]
5. कैप्टन विलकिंसन (1828 ई.)
- शासनकाल: 1828 ई.।
6. कैप्टन क्राफर्ड (1828-1830 ई.)
- 👑 शासनकाल: 1828-1830 ई.
- 🥈 पद: छत्तीसगढ़ के अंतिम ब्रिटिश अधीक्षक। [CG PSC(IMO)2020]
- ✍️ नवीन समझौता: 27 दिसम्बर 1829 को सत्ता प्राप्ति के लिए रघुजी तृतीय और नागपुर के ब्रिटिश रेजीडेंट मि. बिल्डर के बीच एक नया समझौता हुआ।
- 🏁 सत्ता हस्तांतरण:
- 6 जून 1830: ब्रिटिश संरक्षण काल की समाप्ति। [CG PSC(Pre)2017]
- 27 दिसंबर, 1829 की संधि के अनुसार, छत्तीसगढ़ का प्रशासन पुनः भोंसला शासक रघुजी तृतीय द्वारा नियुक्त अधिकारी कृष्णराज अप्पा को सौंपा गया। यह हस्तांतरण 6 जून, 1830 को पूर्ण हुआ।
पुनः भोंसला शासन (1830-1854 ई.)
रघुजी तृतीय का शासनकाल (1830-1854)
- 📜 पृष्ठभूमि: वर्ष 1828 में लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत के गवर्नर-जनरल बने। उनकी उदारवादी नीतियों के चलते, 1829 में अंग्रेजों और भोंसला शासक रघुजी तृतीय के मध्य एक संधि हुई। इसके बाद, मराठा शासकों को निर्धारित शर्तों के साथ उनका राज्य वापस सौंप दिया गया।
- प्रशासनिक निर्णय: रघुजी तृतीय ने छत्तीसगढ़ का प्रशासन जिलेदारों के माध्यम से चलाने का निर्णय लिया।
- सत्ता हस्तांतरण: 06 जून, 1830 को ब्रिटिश अधीक्षक क्रॉफर्ड ने भोंसला प्रतिनिधि कृष्णराव अप्पा को छत्तीसगढ़ का शासन सौंप दिया।
- 🌱 ताहुतदारी: यह व्यवस्था रघुजी तृतीय के शासनकाल में दो क्षेत्रों में लागू की गई:
- सिरपुर (1843)
- लवन (1848)
🛠️ सुधार कार्य
- 1. ठगों का दमन (1830):
- पृष्ठभूमि: छत्तीसगढ़ में ठगों (मुल्तानियों) के मुखिया सलावत, उदाहुस्न, प्यारे जमादार, हीरा नायक, उमर खाँ और दिलावर खाँ थे। ये अपनी लूट का 1/4 हिस्सा स्थानीय जमींदारों को देते थे।
- कार्यवाही: गवर्नर-जनरल विलियम बैंटिक के आदेश पर कर्नल स्लीमैन ने 1830 तक इन ठगों का पूरी तरह से सफाया कर दिया और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए जबलपुर में एक औद्योगिक विद्यालय की स्थापना की।
- 2. सती प्रथा पर प्रतिबंध (1831):
- राष्ट्रीय संदर्भ: भारत में राजा राममोहन राय के प्रयासों से प्रेरित होकर, गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1829 में सती प्रथा निषेध अधिनियम द्वारा इस प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था। अंग्रेजों ने इसके उन्मूलन का आदेश 04 सितंबर 1829 को ही जारी कर दिया था। [CG PSC(Pre)2023]
- छत्तीसगढ़ में क्रियान्वयन: छत्तीसगढ़ में उस समय सती प्रथा विद्यमान थी। रघुजी तृतीय द्वारा इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने का आदेश सितंबर 1831 में दिया गया था।
- 3. नरबलि प्रथा पर रोक:
- राष्ट्रीय संदर्भ: भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने 1843-45 में नर-बलि प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। इसके बावजूद, यह प्रथा बस्तर और करौंद की जमींदारियों में प्रचलित रही।
- स्थानीय साक्ष्य: इस संबंध में एकमात्र अभिलेख छिंदक नागवंशी शासक मधुरांतक देव का राजपुर ताम्रपत्र है, जिसमें मणिकेश्वरी देवी में नियमित नरबलि के लिए राजपुर नामक गाँव दान में दिए जाने का उल्लेख है।
- कार्यान्वयन: नरबलि प्रथा पर रोक लगाने के लिए जॉन कैम्पबेल को ब्रिटिश प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्हें इस प्रथा को कानूनी अपराध घोषित कर समाप्त करने में सफलता मिली। [CG PSC(Pre)2023]
** व्यवस्था**
- 🏛️ परिभाषा: 1830 से 1854 की अवधि में, इस क्षेत्र को ‘जिल्हा’ (Zilha) और इसके प्रशासक को ‘जिल्हेदार’ (Zilhedar) कहा जाता था।
- 📍 मुख्यालय: रायपुर
- 👑 नियुक्तिकर्ता: रघुजी तृतीय [CG PSC(AP)2009]
- ⏳ अवधि: 1830 से 1854 ई. [CG Vyapam(MFA)2015]
- 🧑💼 क्रम: कुल 8 जिलेदार नियुक्त हुए, जो इस प्रकार हैं: [CG PSC(ARO)2022]
- कृष्णराव अप्पा (छत्तीसगढ़ के प्रथम जिलेदार)
- अमृत राव अप्पा
- सद्दरूद्दीन
- दुर्गाप्रसाद
- इन्दुकराव
- सखाराम बापू
- गोविन्दराव अप्पा
- गोपालराव अप्पा (छत्तीसगढ़ के अंतिम जिलेदार)
- 🏁 अंत: चार्ल्स सी. इलियट ने 1854 ई. में इनसे शासन-प्रशासन अपने हाथों में ले लिया।
⚔️ शासनकाल के प्रमुख विद्रोह
इनके शासनकाल में छत्तीसगढ़ में निम्नलिखित विद्रोह हुए: [CG PSC(ADS)2019]
- धमधा के गोंड जमींदार का विद्रोह (1830) [CG PSC(Pre)2016, (ITI Pri.) 201]
- बरगढ़ के जमींदार का विद्रोह (1833-45)
- तारापुर का विद्रोह (1842-1854)
- मेरिया विद्रोह (1842-1863) (इन विद्रोहों का विस्तृत अध्ययन जनजाति विद्रोह अध्याय में किया जाएगा)।
1. धमधा के गोंड राजा का विद्रोह (1830) [CG PSC (Pre)2023, (ITI Pri.) 202]
- 👤 नेतृत्वकर्ता: धमधा के गोंड जमींदार
- 🎯 कारण: जिलेदार के शोषणपूर्ण कार्यों के प्रति असंतोष।
- 🛡️ दमन: कृष्णराव अप्पा ने अंग्रेजों के सहयोग से इस विद्रोह का दमन कर दिया।
2. बरगढ़ का विद्रोह (1833-1845)
- 👥 नेतृत्वकर्ता: अजीत सिंह और उनके पुत्र बलराम सिंह
- 🛡️ दमन: रायगढ़ रियासत के शासक देवनाथ सिंह ने अंग्रेजों के आदेश पर विद्रोह को दबा दिया।
- 📜 नोट: पुरस्कार स्वरूप, देवनाथ सिंह को बरगढ़ की जमींदारी प्रदान की गई। 1845 ई. में अंग्रेजों ने बलराम सिंह के साथ समझौता करके विद्रोह को शांत किया और उन्हें मालखरौदा सहित 10 गाँव प्रदान किए।
📜 रघुजी तृतीय का निधन और विलय
- 🪦 निधन: 11 दिसम्बर 1853 को 47 वर्ष की आयु में रघुजी तृतीय का निधन हो गया।
- 🔗 विलय: 1854 में, गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) के अंतर्गत नागपुर राज्य का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया।
- 🗺️ परिणाम: इसके साथ ही छत्तीसगढ़ भी अंतिम रूप से ब्रिटिश शासन का अंग बन गया।
- 💂♂️ सैन्य नियुक्ति: इस काल में यहाँ की अधिकांश फसल का निर्यात “कामठी” में स्थित ब्रिटिश सेना के लिए होता था। ब्रिटिश काल में छत्तीसगढ़ के प्रादेशिक सेना कमांडर कैप्टन मैक्सन को नियुक्त किया गया था।
🔑 पदाधिकारी विशेष: एक दृष्टि में
| पद | अधिकारी | स्रोत (PYQ) |
| छत्तीसगढ़ में प्रथम मराठा शासक | बिम्बाजी भोंसले | [CG PSC(ADIHS)2014],[CG Vyapam(Patwari, FI)2017, (KADI)2019] |
| छत्तीसगढ़ में अंतिम मराठा शासक | रघुजी तृतीय | |
| छत्तीसगढ़ में प्रथम सूबेदार | महिपतराव दिनकर | [CG Vyapam(RI)2015] |
| छत्तीसगढ़ में अंतिम सूबेदार | यादव राव दिवाकर | |
| छत्तीसगढ़ में प्रथम ब्रिटिश अधीक्षक | कैप्टन एडमंड | [CG PSC(Pre)2016],[CG Vyapam(MFA)2017] |
| छत्तीसगढ़ में अंतिम ब्रिटिश अधीक्षक | कैप्टन क्राफर्ड | [CG PSC(IMO)2020] |
| छत्तीसगढ़ में प्रथम जिलेदार | कृष्णराव अप्पा | |
| छत्तीसगढ़ में अंतिम जिलेदार | गोपालराव अप्पा |
मराठाकालीन शासन व्यवस्था
भोंसला राजवंश ने 1741 से 1854 ई. तक छत्तीसगढ़ पर शासन किया। इस दौरान उन्होंने कल्चुरी शासन व्यवस्था में बदलाव करते हुए कई नई प्रशासनिक और राजनीतिक नीतियों को पेश किया।
प्रशासनिक व्यवस्था
मराठों की शासन प्रणाली नागपुर से केंद्रीकृत और संचालित होती थी। उस समय छत्तीसगढ़ को एक सूबा मानकर प्रशासनिक दृष्टि से दो भागों में विभाजित किया गया था:
- 1. खालसा क्षेत्र: 🌿 यह वह क्षेत्र था जहाँ मराठा शासकों द्वारा सीधे तौर पर शासन किया जाता था। [CGPSC (Pre) 2018]
- 2. जमींदारी क्षेत्र: 🏞️ यह वह भूमि थी जो बड़े जमींदारों के नियंत्रण में होती थी, जिसे जमींदारी क्षेत्र कहा जाता था।
प्रमुख मराठाकालीन अधिकारी
| प्रशासनिक स्तर | संबंधित अधिकारी |
| सूबा शासन के प्रमुख अधिकारी | 1. सूबेदार 2. फड़नवीस 3. पोतदार |
| परगना के अधिकारी | 1. कमाविसदार 2. फड़नवीस 3. बड़कर 4. बरार पांडे 5. पंडरीपाण्डे 6. पोतदार |
| ग्राम स्तर के अधिकारी | 1. गौंटिया 2. पटेल 3. कोतवाल 4. चौहान |
| ब्रिटिश नियंत्रण काल में सृजित पद | 1. अमीन 2. पोतदार 3. बरार पांडे |
💡 ध्यान दें: सूबा और परगना, दोनों स्तरों पर अलग-अलग फड़नवीस और पोतदार नियुक्त होते थे।
अधिकारियों के कार्य और दायित्व
- 🔹 सूबेदार:
- यह सूबा शासन का सर्वोच्च अधिकारी था और भोंसला शासकों के प्रतिनिधि के तौर पर शासन करता था।
- यह नागरिक, सैन्य, वित्तीय, दीवानी और फौजदारी मामलों के विभागों का प्रमुख नियंत्रक था। [CG PSC(ADJ)2018] [CG PSC(ADR)2019]
- 🔹 फड़नवीस:
- यह एक राजस्व अधिकारी था जो सूबे के आय-व्यय का रिकॉर्ड रखता था।
- उसका एक सहायक अधिकारी नायब-फड़नवीस होता था। वरिष्ठ फड़नवीस सूबेदार के कार्यालय में पदस्थ रहता था।
- यह मराठाकालीन राजस्व अधिकारी का पद था। [CGPSC (EAP)2016, (CMO)2019, (DSPR MI & MO)2022]
- 🔹 पोतदार:
- यह राजधानी में स्थित खजाने में जमा होने वाली और निकाली जाने वाली राशि का हिसाब-किताब रखता था।
- 🔸 कमाविसदार:
- परगना का सर्वोच्च अधिकारी, जो सूबेदार के प्रति जवाबदेह होता था। [CG PSC(ADS)2017(CMO)]
- अपने क्षेत्र में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ राजस्व वसूली जैसे महत्वपूर्ण कार्य करता था। [CG PSC(ADS)201]
- शुकराना: रैय्यतों द्वारा कमाविसदार को दी जाने वाली भेंट।
- टीका/नजराना: रक्षाबंधन के अवसर पर कमाविसदार को दी जाने वाली भेंट।
- 🔸 फड़नवीस (लेखापाल):
- परगना के आय-व्यय का हिसाब रखने वाला सर्वोच्च लेखा अधिकारी। [CG PSC(EAP)2016(CMO)201]
- यह मराठाकालीन राजस्व अधिकारी था।
- 🔸 नायब फड़नवीस:
- यह फड़नवीस का सहायक होता था।
- 🔸 बड़कर:
- लगान से संबंधित दस्तावेज़ तैयार करना। [CG PSC(CMO)2019]
- परगनों की फसलों की स्थिति और अन्य सामान्य जानकारी कमाविसदार तक पहुँचाना। [CG PSC(ITI Pri.)2022, (EAP)2016, (VAS)2021]
- 🔸 बरार पाण्डे:
- प्रत्येक गाँव की कृषि उत्पादकता के आधार पर लगान का निर्धारण करता था।
- गाँवों का दौरा कर भू-राजस्व की जानकारी एकत्रित करता था।
- 🔸 पंडरीपाण्डे:
- मादक द्रव्यों से होने वाली आय का हिसाब रखने वाला अधिकारी।
- 🔸 पोतदार:
- मराठाकालीन राजकोषीय अधिकारी। [CSPHCL-2019]
- परगना के आय-व्यय का हिसाब रखता था। [CG PSC(CMO)201]
- इसकी नियुक्ति बरार पाण्डे के सहयोग के लिए की जाती थी।
- 🔺 गौंटिया:
- यह ग्रामीण स्तर का सर्वोच्च पद था, जिसका मुख्य कार्य ग्रामीण शासन का संचालन करना था। [CG PSC(EAP)2016] [CG PSC(ADH)2011]
- यह गाँव का प्रमुख न्यायिक और पुलिस प्रधान भी होता था।
- यह एक कल्चुरीकालीन पद था जिसे मराठा काल में भी बनाए रखा गया था। [CG PSC(Mains)2011]
- कमाविसदार द्वारा नए गौंटियाओं को नियुक्ति पत्र प्रदान किया जाता था।
- इनके कार्यों के बदले में इन्हें कर-मुक्त भूमि (ग्राम की कुल भूमि का 1/8 हिस्सा) और दान में भूमि (1/16 भाग) दी जाती थी।
- 🔺 पटेल:
- मराठाकाल में सृजित यह नया पद लगान निर्धारण और वसूली में सहायता करता था।
- 🔺 कोतवाल:
- गाँवों में सुरक्षा का कार्य करता था।
- 🔺 चौहान:
- यह ग्राम रक्षक होता था और इसके कार्यों पर गौंटिया का नियंत्रण होता था, तथा ग्राम सुरक्षा में गौंटिया की सहायता करता था।
📜 ब्रिटिश नियंत्रण काल में सृजित पद
- 🧑⚖️ अमीन: राजस्व से जुड़े हिसाब-किताब की सटीकता की जाँच के लिए, प्रत्येक परगने में एक ‘अमीन’ नामक कर्मचारी की नियुक्ति की जाती थी।
- ** बरार पाण्डे:** (जैसा कि पूर्व में वर्णित है)।
- 💰 पोतदार: (जैसा कि पूर्व में वर्णित है)।
अन्य प्रमुख कर्मचारी
- ✍️ पाण्डया: यह एक अस्थायी राजस्व कर्मचारी था, जिसे खास कार्यों के निष्पादन हेतु अमीन के साथ नियुक्त किया जाता था। कार्य की समाप्ति के बाद इस पद को भी समाप्त कर दिया जाता था।
- SERVANT पौनी: यह ग्राम स्तर पर एक विशेष सेवादार के रूप में कार्य करता था। [CG PSC(ADH)2022]
- 🛡️ माल चपरासी: यह सरकारी संपत्ति एवं माल की सुरक्षा करता था तथा राजस्व से संबंधित कार्यों में अपने उच्चस्थ अधिकारी की सहायता करता था। [CG PSC(Sci.off)2018]
- 💵 बख्शी: सेना के वेतन भुगतान का प्रभारी।
- 📜 सिक्के नवीस: मुहर और सील का प्रभारी।
- ✍️ चिटनीस: सचिव।
- 🧾 कारकुन: आयात-निर्यात कर (जिसे मराठा शासन में ‘सायर’ कहा जाता था) का हिसाब-किताब ‘कारकुन’ द्वारा रखा जाता था।
- 💡 विशेष: सूबेदार, फड़नवीस, उप-फड़नवीस, और कमाविसदार जैसे अधिकारियों को अपने क्षेत्र से प्रति ग्राम 1 रुपये की राशि प्राप्त होती थी।
💸 मराठाकालीन राजस्व व्यवस्था
1. तालुकदारी व्यवस्था
- 🌱 शुरुआत: मराठा शासनकाल में (प्रारंभकर्ता: मराठे)।
- 🗺️ गठन: इस व्यवस्था के तहत 1. तरेंगा (145 ग्राम) और 2. लोरमी (103 ग्राम) का गठन किया गया था।
- 🤝 समानता: यह राजस्व प्रबंधन की एक नवीन प्रणाली थी जो वर्तमान की ठेकेदारी पद्धति से मिलती-जुलती थी।
- ⚙️ प्रक्रिया: इस प्रणाली के अंतर्गत, भू-राजस्व वसूली का अधिकार एक निश्चित समय के लिए उस व्यक्ति को नीलाम किया जाता था जो सर्वाधिक बोली लगाता था। अवधि समाप्त होने पर ठेका या तो समाप्त हो जाता या उसका नवीनीकरण किया जाता था। तालुकदार ठेके की राशि को अंततः राजकोष में जमा करते थे।
2. ताहुतदारी व्यवस्था
- 🌱 शुरुआत: ब्रिटिश नियंत्रणकाल में।
- 👤 द्वारा: कैप्टन सैण्डिस (1826)।
- 🎯 उद्देश्य: इस व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य ऊसर, बंजर और अनुपयोगी भूमि को स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों की सहायता से खेती योग्य भूमि में बदलना था।
- 🗺️ गठन: इस व्यवस्था के तहत निर्मित क्षेत्र को ‘ताहुतदारी क्षेत्र’ और उसके प्रमुख को ‘ताहुतदार’ कहा जाता था। छत्तीसगढ़ में इस व्यवस्था के तहत निम्नलिखित ताहुतदारियाँ गठित की गईं:
- सैण्डिस द्वारा: लोरमी (1826), तरेंगा (1828)।
- मराठा काल में: सिरपुर (1843), लवन (1848)।
- चार्ल्स इलियट द्वारा: संजारी (1858), खल्लारी (1858), सिहावा (1858)।
- उपरोक्त तीनों ताहुतदारियाँ 1854 के बाद निर्मित हुईं। [CGPSC(Registrar)2021] [CGPSC (ITI Prin.)2016, (EAP) 2017]
- 📉 परिणाम: यह प्रणाली बहुत अधिक सफल नहीं हो पाई, क्योंकि स्थानीय प्रभावशाली लोग न तो जमींदारों की तरह धनवान थे और न ही गौंटिया की तरह अधिकार संपन्न थे।
- 💡 नोट: ताहुतदारी व्यवस्था ब्रिटिश नियंत्रण काल में 1826 में प्रारंभ हुई थी, जबकि तालुकदारी व्यवस्था को शुरू करने की सही तिथि अज्ञात है।
💰 राजस्व आय के प्रमुख स्त्रोत
भोंसला शासकों की आय के 07 प्रमुख स्त्रोत निम्नलिखित थे:
| कर (Tax) | विवरण | स्रोत (PYQ) |
| 1. भूमिकर | यह किसानों के पास मौजूद हलों की संख्या के आधार पर तय किया जाता था। | |
| 2. टकोली | जमींदारों से लिया जाने वाला वार्षिक कर या नजराना। | [CG PSC(AP) 2019, (ACF)2017] |
| 3. सायर | आयात-निर्यात कर या वस्तुओं की बिक्री पर लगने वाला कर। | [CG PSC(ACF)2017] |
| 4. कलाली | आबकारी कर, यानी मादक पदार्थों और शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस शुल्क। | [CG PSC(ACF)2017] |
| 5. पंडरी | गैर-कृषि व्यवसायों से लिया जाने वाला कर, जो परिवार की आय का 10% होता था। | [CG PSC(ACF)2017] |
| 6. सेवई | विभिन्न अस्थायी करों (जैसे जुर्माना) का सामूहिक नाम। | [CGPSC(SEE),(ADA)2020,(ARTO)2022] |
| 7. जमींदारी कर | जमींदारी क्षेत्र में आयातित अनाज पर लगाया जाने वाला कर। |
💸 अन्य कर
- 🤝 सुकराना: रैय्यतों द्वारा कमाविसदार को भेंट स्वरूप दी जाने वाली राशि।
- 🎉 टीका/नजराना: कमाविसदार को रक्षाबंधन के अवसर पर दिया जाने वाला कर। [CGPSC (FI)2022]
- 🏞️ महल: खालसा भूमि पर लगाया जाने वाला एक अनुमानित कर। [CGPSC (ARTO)2022]
- 🏡 पट्टी: घरों पर लगाया जाने वाला कर। [CGPSC (ARTO)2022]
- 🚜 जूहापट्टी: प्रति हल (नांगर) के पीछे लगाया जाने वाला कर।
- 🚶♂️ टोयंगा पट्टी: बंजारों पर लगाया जाने वाला कर।
- ⚖️ गुहेगारी: यह एक प्रकार का दण्ड था, जो अनैतिक कृत्यों जैसे कि अवैध यौन संबंधों के लिए लगाया जाता था।
- 🍽️ भात खवाई: यदि किसी व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था, तो उसे अपनी जाति में पुनः शामिल होने के लिए एक सामुदायिक भोज (दावत) का आयोजन करना पड़ता था, जिसे ‘भात खवाई’ कहते थे।
- 🎁 जेद्दीदा टीका: जब कोई व्यक्ति गौंटिया या पटेल के पद पर नियुक्त होता था, तो उसे सरकार को यह भेंट देनी पड़ती थी।
- 💰 चैतियाई: यह संपत्ति के मूल्य का एक-चौथाई (1/4) हिस्सा कर के रूप में लिया जाता था।
- 🚫 चौथी: अनधिकृत रूप से अर्जित संपत्ति पर लगने वाला कर।
- 🙏 ऐजारा करता: तीर्थ स्थानों पर व्यापार करने वाले व्यापारियों और विक्रेताओं से यह कर वसूला जाता था।
- 📈 कुर्की: सरकार के पक्ष में अनुकूल बिक्री होने पर संबंधित व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा से दिया जाने वाला कर।
- 🧾 नूरमिन्ह: यह एक प्रकार का आयात कर था जो ठेके पर दिया जाता था।
- ⛴️ घाट गारा: नदी घाट पार करने वाली गाड़ियों पर यह शुल्क लगाया जाता था।
💑 विवाह से संबंधित कर
- 🤵♂️👰♀️ मुनडोना / मुण्डोनुन: यह एक ऐसा कर था जो वर और वधू, दोनों के परिवारों से वसूला जाता था।
- widows चुरी पहरावन: यह विधवा पुनर्विवाह पर लगने वाला कर था। छत्तीसगढ़ में विधवा पुनर्विवाह को ‘चुरी पहिराना’ कहा जाता है। यह कर विशेष रूप से तब लगता था, जब कोई विधवा अपने देवर के बजाय किसी अन्य पुरुष से विवाह करती थी।
- 💍 धुजौनी: यह भी एक प्रकार का स्त्री पुनर्विवाह कर था, जो तब लगता था जब विधवा अपने देवर से विवाह करती थी।
- 👨👧 साबून: यह कर उन माता-पिता पर लगाया जाता था, जो अपनी विधवा पुत्री का पुनर्विवाह न कराकर उसे अपने पास ही रखते थे।
- 💔 पेठू: यह कर पूर्व विवाह को समाप्त कर नया रिश्ता बनाने की स्थिति में लगाया जाता था।
🎁 नजराना (भेंट और उपहार)
- दशहरा टीका: दशहरे के अवसर पर सभी ठेकेदारों को एक निश्चित नजराना देना पड़ता था। इसके अलावा, प्रत्येक गाँव से एक बकरा और एक ‘खदी’ भी वसूल की जाती थी।
- चूड़ी और मड़वना: जब किसी गाँव का ठेका तीन साल बाद किसी नए ठेकेदार को दिया जाता था, तो उससे एक बड़ी राशि नजराने के रूप में ली जाती थी। प्रत्येक ठेकेदार को हर तीसरे वर्ष अपनी सारी जमीन की एक साल की पूरी लगान ‘पटानी’ के रूप में देनी पड़ती थी, जिसे ‘पटेली दण्ड’ कहा जाता था।
- पान टीका: यह राजा साहब के पान खाने के खर्च को पूरा करने के लिए वसूला जाता था।
- उड़द-कोहड़ा टीका: राजभंडार के लिए “बड़ी” बनाने हेतु प्रत्येक गाँव से कुछ मात्रा में उड़द और कुम्हड़ा लिया जाता था।
- फगुवा टीका: फागुन (होली) के त्यौहार के अवसर पर हर गाँव से भेंट ली जाती थी।
- जांगीबरार: यह वैष्णव साधुओं के मठों के खर्च के लिए लिया जाता था।
- घी-टीका: यह राजभंडार के लिए घी के रूप में लिया जाता था।
⚖️ विनिमय व मापन (Exchange and Measurement System)
शुरुआत में, व्यापारिक लेन-देन के लिए कौड़ियों का प्रयोग होता था, लेकिन समय के साथ ‘कौड़ियों’ का स्थान ‘नागपुरी रुपया’ ने ले लिया।
मापन प्रणालियाँ
| 📏 मुद्रा प्रणाली (Currency) | ⚖️ मापतौल प्रणाली (Weights) | 🗺️ दूरी मापन (Distance) | 🧺 अन्य वस्तुएँ (Other Goods) |
| • 1 कौड़ी | • 1 फोहाई | • मील | • 1 सेर |
| ↓ | ↓ | ↓ | ↓ |
| • 1 गंडा (4 कौड़ी) | • 1 अधेलिया (2 फोहाई) | • 1 कोस (2 मील) | • 1 पंसेरी (5 सेर) |
| ↓ | ↓ | ↓ | ↓ |
| • 1 कोरी (5 गंडा) | • 1 चौथिया (2 अधेलिया) | • 1 धाप (आधा कोस) | • 1 मन (8 पंसेरी) |
| ↓ | ↓ | ↓ | ↓ |
| • 1 दोगानी (20 कोरी) | • 1 काठा (4 चौथिया) | • आधा धाप (1 हॉक) | |
| ↓ | ↓ | ||
| • 1 रूपया (16 दोगानी) | • 1 खंडी (20 काठा) | ||
| ↓ | |||
| • 1 गाड़ा (20 खंडी) | |||
| [CG PSC(AMO)2022, (Sci. off.) 20] |
📚 मराठाकालीन साहित्य एवं भाषा (Maratha Era Literature & Language)
- 👤 बाबू रेवाराम:
- वे रतनपुर के निवासी थे और एक प्रमुख मराठाकालीन लेखक थे। [CG PSC(Pre)2018] [CGVyapam(NSA)2016]
- प्रमुख रचनाएँ:
- तारीख-ए-हैहयवंशीय
- सार रामायण दीपिका
- विक्रम विलास
- गीता माधव
- रामाश्वमेघ
- रत्नपुर का इतिहास
- 🗣️ मराठाकालीन भाषा:
| शासक का काल | प्रचलित भाषा |
| • बिम्बाजी | मराठी, मोढी, उर्दू |
| • रघुजी तृतीय | मराठी, हिन्दूस्तानी |
💡 नोट: रतनपुर के मराठा शासक अपने प्रशासनिक दस्तावेज़ों में मराठी और हिन्दुस्तानी भाषा का उपयोग करते थे। [CG PSC(Pre)202]
⚖️ मराठाकालीन पंचायत एवं न्याय व्यवस्था
- मराठाकालीन पंचायत व्यवस्था में एक सदस्य सरकारी कर्मचारी भी होता था। [CG PSC(ADPO)202]
- इन पंचायतों द्वारा लिए गए निर्णयों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती थी।
- मराठों ने कल्चुरियों के समय से चली आ रही पंचायत प्रणाली का काफी हद तक पालन किया। [CG PSC(ADPO)202]
- जिन मामलों में कमाविसदार या अन्य उच्च अधिकारी पंचायत का गठन करते थे, उन मामलों में दोनों पक्षों से पहले ही एक इकरारनामा (समझौता पत्र) लिखवा लिया जाता था, ताकि पंचायत द्वारा दिए गए निर्णय दोनों के लिए बाध्यकारी हों।
- जनता अन्य माध्यमों से प्राप्त निर्णयों की तुलना में पंचायत के निर्णयों को अधिक तर्कसंगत, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण मानती थी।
- वे शासकीय न्याय की अपेक्षा पंचायती न्याय को अधिक वरीयता देते थे।
- फौजदारी (आपराधिक) मामलों के निपटारे के लिए छत्तीसगढ़ में कोई औपचारिक न्यायालय स्थापित नहीं था; ऐसे मामलों में फैसला स्वयं राजा या कमाविसदार ही करते थे।
- गाँव के छोटे-मोटे विवाद पटेल द्वारा सुलझाए जाते थे, जिसमें आमतौर पर जुर्माना लगाया जाता था। बड़े और गंभीर मामलों को पटेल उच्च शासकीय अधिकारियों के पास भेज देता था।
📜 महत्वपूर्ण तथ्य (Miscellaneous Facts)
- 💰 मुद्रा: नागपुरी रुपया (8 प्रकार के सिक्के प्रचलन में थे)। [CG PSC(IMO)2020]
- 🛡️ सेबंदी व्यवस्था: यह पुलिस व्यवस्था से संबंधित थी।
- 🏛️ प्रशासनिक परिवर्तन: मराठों ने कल्चुरियों की प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह से जारी नहीं रखा, केवल गौटिया के पद को बनाए रखा। [CG PSC (Pre)2015]
- 🤝 सत्ता हस्तांतरण: मराठों ने छत्तीसगढ़ का प्रशासन अंततः ब्रिटिशों को सौंप दिया।
- 🌾 भूराजस्व: मराठों ने भूराजस्व की ‘दहशाला बंदोबस्त’ प्रणाली लागू नहीं की थी। [CG PSC(Pre)2015]
- 📑 इजारेदारी व्यवस्था: मराठों ने छत्तीसगढ़ में ‘इजारेदारी व्यवस्था’ भी लागू नहीं की थी। [CG PSC(Pre)2015]
- ⚖️ ग्राम पंचायत: ग्राम स्तर पर, पंचायतें न्याय का कार्य करती थीं।
- ⚔️ सोनाखान का आतंक: मराठा काल में छत्तीसगढ़ की जनता सोनाखान जमींदारी के आतंक से लगातार प्रभावित रहती थी।
- 🌱 वरछा: यह एक प्रकार की कृषि भूमि थी जिसमें भारी मात्रा में गन्ने का उत्पादन होता था।
- 💸 बाढ़ी: यह साहूकारों से लिया जाने वाला ऋण था।
- 👑 रियासतें: सारंगढ़ और रायगढ़ रियासतों ने मराठों के स्थान पर स्वेच्छा से अंग्रेजी प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया था।
- 🚜 लगान निर्धारण: मराठा काल में लगान का निर्धारण हलों की संख्या के आधार पर होता था। प्रति हल 10 से 16 रुपये के बीच लगान वसूला जाता था।
- 📏 भूमि माप: भूमि का माप भी हलों की संख्या पर आधारित था। एक हल में 2 से 2.50 (ढाई) एकड़ भूमि होती थी।
- 📊 पूर्व-1818 दरें:
- 1 मन = 8 पंसेरी
- 1 नागपुरी रूपया = 16 दोगानी = 3680 कौड़ी [CG PSC (AMO), (Sci. Off.) 2022]
- 🌾 अनाज ऋण: छत्तीसगढ़ में अनाज के रूप में ऋण दिया जाता था, जिसे ‘सवाया’ (सवा गुना) या ‘ड्योढ़ा’ (डेढ़ गुना) के रूप में वसूला जाता था।