📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -1

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📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -2

📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -3

📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास भाग -4

📜 छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास

📌 मराठों का अप्रत्यक्ष शासनकाल (1741-57 ई.)


👑 मराठा शासन (1758-87 ई.)


🏛️ सूबा शासन व्यवस्था (1788-1818 ई.)


ब्रिटिश संरक्षण में मराठा शासन (1818-30 ई.)


👑 पुनः मराठा शासन (1830-54 ई.)


प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन (1854-1947 ई.)













सूबेदारों का क्रम

1. महिपत राव दिनकर (1788-1790 ई.)

2. विठ्ठलराव दिनकर (1790-1796 ई.)

3. भवानी कालू (1796-1797 ई.)

4. केशव गोविंद (1797-1808 ई.)


🏴‍☠️ पिण्डारी


5. बिंकोजी पिंड्री एवं ढीरो कुल्ललुकर (1808-09)

6. बिकाजी गोपाल/भीकाभाऊ (1809-1817 ई.) [CG PSC(ADJE)2020]


7. सखाराम हरि एवं सीताराम टांटिया (1817 ई.)

8. यादव राव दिवाकर (1817-1818 ई.)


यह दौर छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसकी घटनाएँ इस प्रकार हैं:



1. कैप्टन एडमंड (1818 ई.)

2. कैप्टन पी. वान्स एगेन्यू (1818-1825 ई.)

⚔️ प्रमुख विद्रोह (एगेन्यू के काल में)

3. कैप्टन हण्टर (1825 ई.)

4. कैप्टन सेंडिस (1825-1828 ई.)

5. कैप्टन विलकिंसन (1828 ई.)

6. कैप्टन क्राफर्ड (1828-1830 ई.)


रघुजी तृतीय का शासनकाल (1830-1854)


🛠️ सुधार कार्य


** व्यवस्था**


⚔️ शासनकाल के प्रमुख विद्रोह

इनके शासनकाल में छत्तीसगढ़ में निम्नलिखित विद्रोह हुए: [CG PSC(ADS)2019]

  1. धमधा के गोंड जमींदार का विद्रोह (1830) [CG PSC(Pre)2016, (ITI Pri.) 201]
  2. बरगढ़ के जमींदार का विद्रोह (1833-45)
  3. तारापुर का विद्रोह (1842-1854)
  4. मेरिया विद्रोह (1842-1863) (इन विद्रोहों का विस्तृत अध्ययन जनजाति विद्रोह अध्याय में किया जाएगा)।

1. धमधा के गोंड राजा का विद्रोह (1830) [CG PSC (Pre)2023, (ITI Pri.) 202]

2. बरगढ़ का विद्रोह (1833-1845)


📜 रघुजी तृतीय का निधन और विलय


🔑 पदाधिकारी विशेष: एक दृष्टि में


भोंसला राजवंश ने 1741 से 1854 ई. तक छत्तीसगढ़ पर शासन किया। इस दौरान उन्होंने कल्चुरी शासन व्यवस्था में बदलाव करते हुए कई नई प्रशासनिक और राजनीतिक नीतियों को पेश किया।

प्रशासनिक व्यवस्था

मराठों की शासन प्रणाली नागपुर से केंद्रीकृत और संचालित होती थी। उस समय छत्तीसगढ़ को एक सूबा मानकर प्रशासनिक दृष्टि से दो भागों में विभाजित किया गया था:


प्रमुख मराठाकालीन अधिकारी

💡 ध्यान दें: सूबा और परगना, दोनों स्तरों पर अलग-अलग फड़नवीस और पोतदार नियुक्त होते थे।


अधिकारियों के कार्य और दायित्व

अन्य प्रमुख कर्मचारी


1. तालुकदारी व्यवस्था

2. ताहुतदारी व्यवस्था


💰 राजस्व आय के प्रमुख स्त्रोत

भोंसला शासकों की आय के 07 प्रमुख स्त्रोत निम्नलिखित थे:


💸 अन्य कर


💑 विवाह से संबंधित कर


🎁 नजराना (भेंट और उपहार)

  1. दशहरा टीका: दशहरे के अवसर पर सभी ठेकेदारों को एक निश्चित नजराना देना पड़ता था। इसके अलावा, प्रत्येक गाँव से एक बकरा और एक ‘खदी’ भी वसूल की जाती थी।
  2. चूड़ी और मड़वना: जब किसी गाँव का ठेका तीन साल बाद किसी नए ठेकेदार को दिया जाता था, तो उससे एक बड़ी राशि नजराने के रूप में ली जाती थी। प्रत्येक ठेकेदार को हर तीसरे वर्ष अपनी सारी जमीन की एक साल की पूरी लगान ‘पटानी’ के रूप में देनी पड़ती थी, जिसे ‘पटेली दण्ड’ कहा जाता था।
  3. पान टीका: यह राजा साहब के पान खाने के खर्च को पूरा करने के लिए वसूला जाता था।
  4. उड़द-कोहड़ा टीका: राजभंडार के लिए “बड़ी” बनाने हेतु प्रत्येक गाँव से कुछ मात्रा में उड़द और कुम्हड़ा लिया जाता था।
  5. फगुवा टीका: फागुन (होली) के त्यौहार के अवसर पर हर गाँव से भेंट ली जाती थी।
  6. जांगीबरार: यह वैष्णव साधुओं के मठों के खर्च के लिए लिया जाता था।
  7. घी-टीका: यह राजभंडार के लिए घी के रूप में लिया जाता था।

⚖️ विनिमय व मापन (Exchange and Measurement System)

शुरुआत में, व्यापारिक लेन-देन के लिए कौड़ियों का प्रयोग होता था, लेकिन समय के साथ ‘कौड़ियों’ का स्थान ‘नागपुरी रुपया’ ने ले लिया।

मापन प्रणालियाँ


📚 मराठाकालीन साहित्य एवं भाषा (Maratha Era Literature & Language)

💡 नोट: रतनपुर के मराठा शासक अपने प्रशासनिक दस्तावेज़ों में मराठी और हिन्दुस्तानी भाषा का उपयोग करते थे। [CG PSC(Pre)202]


⚖️ मराठाकालीन पंचायत एवं न्याय व्यवस्था


📜 महत्वपूर्ण तथ्य (Miscellaneous Facts)