
# m12

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- Published: 2025-09-12T18:07:19+05:30
- Author: Rakesh Kumar

 छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास: भाग -2 Page Contents Toggle  छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास: भाग -2 छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास: भाग -1🐍 कवर्धा के फणीनागवंश (Phaninaagvansh of Kawardha)🌳 वंशावली शासक (Genealogy of Rulers)🏛️ प्रमुख शासकों के निर्माण कार्य (Major Constructions)🌙 कांकेर के सोम वंश (Somvansh of Kanker)🌳 वंशावली शासक (Genealogy of Rulers)📜 शासकों का विस्तृत परिचय🌿 सोमवंश की तीन शाखाएँ✨ तेलुगू-चोड़वंश एवं बस्तर का गंग युग🐍 बस्तर का छिंदक नागवंश👑 प्रमुख शासक एवं उनके अभिलेख📜 शासकों का विस्तृत परिचय🛡️ बाद के शासक🏰 छिंदक नागवंश द्वारा निर्मित प्रमुख स्थापत्य🛡️ बस्तर के काकतीय वंश या चालुक्य वंश📋 सामान्य परिचय (General Introduction)🌳 काकतीयवंशीय शासकों का क्रम (Genealogy of Rulers)(A) स्वतंत्र शासक (Independent Rulers)(B) मराठाधीन शासक (Rulers under Maratha Suzerainty)(C) आंग्ल-मराठाधीन शासक (Rulers under Anglo-Maratha Control)(D) ब्रिटिशकालीन शासक (Rulers during British Era)🏹 प्रमुख जनजातीय विद्रोह (Major Tribal Revolts)📜 ताम्रपत्रों एवं अभिलेखों की जानकारी📜 मध्यकालीन इतिहास से संबंधित अभिलेख🏰 प्रमुख किले/महल और उनके निर्माणकर्ता  छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास: भाग -1 🐍 कवर्धा के फणीनागवंश (Phaninaagvansh of Kawardha) 🔑 मुख्य तथ्य 📜&nbsp;शासनकाल: इनका शासन लगभग 11वीं से 14वीं शताब्दी तक माना जाता है। 🌍&nbsp;शासन क्षेत्र: इनका मुख्य शासन क्षेत्र&nbsp;कवर्धा&nbsp;था। 🤝&nbsp;समकालीन वंश: ये&nbsp;कल्चुरी&nbsp;और&nbsp;छिंदकनागवंश&nbsp;के समकालीन थे। 🙏&nbsp;धर्म: ये&nbsp;शैव धर्म&nbsp;के अनुयायी थे। 👑&nbsp;संस्थापक:&nbsp;अहिराज&nbsp;को इस वंश का संस्थापक माना जाता है। 💔&nbsp;अंतिम शासक:&nbsp;मोनिंगदेव&nbsp;इस वंश के अंतिम शासक थे। 🧠&nbsp;जानकारी के स्रोत: पचराही से प्राप्त पुरातात्विक अवशेष इस वंश से संबंधित हैं। गोपालदेव का पुजारीपाली शिलालेख।&nbsp;[CG PSC(ADJ)2018] रामचन्द्रदेव का मड़वा महल शिलालेख। 🎖️&nbsp;पद: इस वंश के राजा हैहय (कल्चुरी) वंश के&nbsp;मांडलिक&nbsp;(सामंत) थे। 📜 मड़वा महल शिलालेख का महत्व कवर्धा से लगभग 16 किमी की दूरी पर स्थित मड़वा महल मंदिर से विक्रम संवत् 1406 (अर्थात्&nbsp;1349 ई.) का एक महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुआ है। इस शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि राजा&nbsp;रामचंद्र&nbsp;ने यहाँ एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया और कुछ ग्राम दान में दिए। शिलालेख में यह भी उल्लेख है कि रामचंद्र का विवाह कल्चुरी राजकुमारी&nbsp;अंबिका देवी&nbsp;से हुआ था, और इसमें फणीनागवंश के शासकों की वंशावली भी दी गई है। 🌳 वंशावली शासक (Genealogy of Rulers) अहिराज: इन्हें इस वंश का संस्थापक माना जाता है और परंपरा के अनुसार ये पहले राजा थे। राजल्ल धरणीधर महिमदेव सर्ववंदन (शक्तिचंद्र) गोपालदेव: मड़वा महल अभिलेख में वर्णित 6वें राजा गोपालदेव से इनका संबंध स्थापित किया गया है। पुजारीपाली शिलालेख में इन्हें देवी के अनेक रूपों का उपासक बताया गया है। इनकी कीर्ति श्रीकेदार, प्रयाग, पुष्कर, वाराणसी जैसे कई स्थानों तक फैली थी। इन्होंने&nbsp;गोपालपुर&nbsp;नामक नगर बसाया और रतनपुर के कल्चुरी राजा पृथ्वीदेव प्रथम के अधीन शासन किया। इनके उत्तराधिकारी&nbsp;नलदेव&nbsp;थे और इन्होंने&nbsp;भोरमदेव मंदिर&nbsp;का निर्माण कराया। नलदेव भुवनपालदेव कीर्तिपाल&nbsp;(इनके कोई पुत्र न होने के कारण इनके भाई जयत्रपाल ने राजगद्दी संभाली) जयत्रपाल&nbsp;(कीर्तिपाल के भाई) महिपाल विषमपाल जन्हु जनपाल या विजनपाल यशोराज: ये जनपाल के पुत्र थे और इनके 1150 ई. और 1182 ई. के अभिलेख मिले हैं। ये &#8216;महाराणक&#8217; थे। कन्नड़ देव या वल्लभदेव/चंदन लक्ष्मी वर्मा/लक्ष्मा वर्मा खाङ्गदेव भुवनैकमल्ल अर्जुन भीम भोज लक्ष्मणदेव&nbsp;(भोज की मृत्यु के बाद चंदन के प्रपौत्र लक्ष्मण राजा बने) रामचन्द्र देव: विवाह: इनका विवाह कल्चुरी राजकुमारी&nbsp;अंबिकादेवी&nbsp;से हुआ था।&nbsp;[CG PSC(ADA)2020,(AP)2019] निर्माण कार्य:&nbsp;मड़वा महल&nbsp;एवं&nbsp;छेरकी महल&nbsp;का निर्माण कराया। मोनिंगदेव: ये&nbsp;अंतिम फणीनागवंशीय शासक&nbsp;थे। रायपुर के कल्चुरी शासक&nbsp;रामचन्द्रदेव&nbsp;ने इन्हें पराजित कर इस वंश का अंत कर दिया। 🏛️ प्रमुख शासकों के निर्माण कार्य (Major Constructions) गोपाल देव निर्माण:&nbsp;भोरमदेव मंदिर 🗓️ निर्माण वर्ष: 1089 ई. (11वीं शताब्दी)।&nbsp;[CG Vyapam (MFA-2)2017] 📍 स्थान: छपरी के निकट चौरा ग्राम (कबीरधाम)।&nbsp;[CG Vyapam (MCDT)2017] 👑 शासक: गोपालदेव (शिलालेख &#8211; पुजारीपाली)। 🛠️ निर्माणकर्ता (जानकारी अनुसार): लक्ष्मणदेवराय (छपरी के प्रतिमालेख से जानकारी)। 🐍 वंश: फणीनागवंश।&nbsp;[CG PSC(Pre)2018] 🎨 शैली: नागर शैली / चंदेल शैली / सप्तभूमि शैली।&nbsp;[CG PSC(Sci. Off.)2018,(ADPPO)2013,(CMO)2010] 🏛️ समतुल्यता: मध्यप्रदेश के&nbsp;खजुराहो मंदिर&nbsp;के समान। 💎 उपनाम:&nbsp;छत्तीसगढ़ का खजुराहो।&nbsp;[CG Vyapam (ADEO)2012][CG PSC(MI)2016] ✨ विशेष: भोरमदेव मंदिर अपनी अद्भुत कलाकृतियों एवं मूर्तियों के कारण&nbsp;कला तीर्थ&nbsp;भी कहलाता है।&nbsp;[CG Vyapam (ECH)2017] रामचन्द्र देव 💖 विवाह: इनका विवाह कल्चुरी राजकुमारी&nbsp;अंबिकादेवी&nbsp;से हुआ था।&nbsp;[CG PSC(ADA)2020][CG PSC(AP)2019] 🏰 मंदिर/महल निर्माण: मड़वा महल: 📍 स्थान: छपरी ग्राम (कबीरधाम)। 🗓️ वर्ष: 1349 ई. (14वीं शताब्दी)। ** समर्पित**: यह एक शिव मंदिर है, जिसके गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है और यह 16 स्तम्भों पर टिका है। छेरकी महल: 📍 स्थान: चौरा ग्राम (कबीरधाम)।&nbsp;[CG PSC(ARO,APO)2014] 📜 शिलालेख: छत्तीसगढ़ के फणीनागवंशीय राजाओं से संबंधित&nbsp;मड़वा महल शिलालेख 1349 ई.&nbsp;का है।&nbsp;[CG PSC(ITI Pri.)2022], [CG Vyapam (HW)2024] मोनिंगदेव 👑 पद: ये फणीनागवंश के&nbsp;अंतिम शासक&nbsp;थे। ⚔️ पराजय: इन्हें रायपुर के कल्चुरी शासक&nbsp;रामचन्द्र देव&nbsp;ने पराजित किया था (स्रोत &#8211; राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी)। 🌙 कांकेर के सोम वंश (Somvansh of Kanker) 🔑 मुख्य तथ्य 📜&nbsp;शासनकाल: इनका शासनकाल लगभग 12वीं से 14वीं शताब्दी तक माना जाता है। 🌍&nbsp;शासन क्षेत्र: इनका शासन मुख्य रूप से&nbsp;कांकेर&nbsp;और&nbsp;सिहावा&nbsp;क्षेत्रों पर केंद्रित था। 👑&nbsp;संस्थापक: इस वंश के संस्थापक&nbsp;सिंहराज&nbsp;माने जाते हैं। 🤴&nbsp;अन्य शासक: सिंहराज के बाद व्याघ्रराज, बोपदेव, कृष्णराज, जैतराज, सोमचन्द्र और भानुदेव जैसे शासकों ने सत्ता संभाली। बोपदेव के तीन पुत्र थे &#8211; कर्णराज, सोमराज और कृष्णराज।&nbsp;[CGPSC(Lib &amp; Spot. Off.)2019] 🧠&nbsp;जानकारी के स्रोत: सिहावा ताम्रपत्रलेख: यह&nbsp;कर्णराज&nbsp;से संबंधित है। तहनकापार ताम्रपत्र, बस्तर: यह&nbsp;पंपराज&nbsp;से संबंधित है। कांकेर अभिलेख: यह&nbsp;भानुदेव&nbsp;से संबंधित है। यह अभिलेख शक संवत् 1242 (अर्थात्&nbsp;1320 ई.) का है और इसमें कांकेर के सोमवंशी राजाओं की वंशावली दी गई है। 🌳 वंशावली शासक (Genealogy of Rulers) ⚔️ कांकेर के सोमवंशीय शासक क्रमशासक का नामविशेष जानकारी / प्रमाण1सिंहराजकांकेर के सोमवंश के संस्थापक2व्याघ्रराज—3बोपदेव—4कर्णराजसिहावा ताम्रपत्रलेख5कृष्णराज—6जैतराज / जैतराम—7सोमचन्द्र—8भानुदेवकांकेर शिलालेख9सोमराज—10पंपराजतहनाकापार ताम्रपत्र 📜 शासकों का विस्तृत परिचय सिंहराज स्थापना: लोक कथाओं के अनुसार, सिंहराज कोढ़ रोग से पीड़ित होने के कारण जगन्नाथपुरी से सिहावा के घने जंगलों में आ गए थे। वहाँ देवइन्द्र नामक जलाशय में स्नान करने से वे रोगमुक्त हो गए। इसके बाद, उन्होंने उसी स्थान को अपना निवास बनाया और यहीं से कांकेर के सोमवंश की परंपरा का आरंभ हुआ। माना जाता है कि सिंहराज का संबंध ओडिशा के सोमवंशी राजपरिवार से था। व्याघ्रराज पहचान: ये सिंहराज के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। इन्हें&nbsp;बाघराज&nbsp;के नाम से भी जाना जाता है। शिलालेख: इनके दो शिलालेख&nbsp;देवकूट&nbsp;और&nbsp;गुरूर&nbsp;से प्राप्त हुए हैं। वोपदेव परिचय: ये व्याघ्रराज के पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे। राज्य का विभाजन: बस्तर से प्राप्त तहनकापार ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि वोपदेव के शासनकाल के बाद, कांकेर का सोमवंश&nbsp;तीन शाखाओं में&nbsp;विभाजित हो गया था। 🌿 सोमवंश की तीन शाखाएँ कांकेर शाखा: स्रोत: भानुदेव के कांकेर शिलालेख से यह जानकारी मिलती है कि वोपदेव के पुत्र कृष्णराज, उनके पुत्र जैतराज/जैतराम, उनके पुत्र सोमचंद्र, और फिर उनके पुत्र भानुदेव ने इस क्षेत्र पर शासन किया। निर्माण: भानुदेव के कांकेर शिलालेख में&nbsp;नायक वासुदेव&nbsp;द्वारा तीन मंदिर, एक भवन तथा दो तालाबों का निर्माण कराए जाने का उल्लेख मिलता है। सिहावा शाखा: स्रोत: कर्णराज के सिहावा अभिलेख (1191 ई.) से पता चलता है कि कर्णराज वोपदेव के पुत्र थे और इस शाखा के पहले शासक थे। उस समय सिहावा क्षेत्र को&nbsp;देवहद&nbsp;कहा जाता था। निर्माण: इस अभिलेख के अनुसार, शासक कर्णराज ने कांकेर के देवहद में&nbsp;पाँच मंदिरों का निर्माण&nbsp;करवाया था। उन्होंने अपनी पत्नी&nbsp;भोपल्लादेवी&nbsp;के नाम पर एक छठवें मंदिर का भी निर्माण कराया था। बस्तर शाखा: स्रोत: पम्पराज के तहनकापार (बस्तर) से दो ताम्रपत्र मिले हैं, जो इस शाखा की जानकारी का प्रमुख स्रोत हैं। इसमें वोपदेव के पुत्र सोमराज तथा उनके पुत्र पंपराज का उल्लेख है। दान: इस ताम्रपत्र में ब्राह्मण लक्ष्मीधर को&nbsp;जैपरा&nbsp;एवं&nbsp;चिथली/चिखली&nbsp;ग्राम दान में दिए जाने का उल्लेख है। 📝 अतिरिक्त तथ्य कांकेर के सोमवंशी राजाओं का एक ताम्रपत्र मैथिल रामचरण दास द्वारा लिखित&nbsp;संवत् 1707&nbsp;में&nbsp;खैरागढ़&nbsp;से भी प्राप्त हुआ है। कांकेर के सोमवंशी शासक रतनपुर के&nbsp;कल्चुरी शासकों के मांडलिक&nbsp;थे। कांकेर का सोमवंश, सिरपुर के सोमवंश से&nbsp;पूरी तरह से भिन्न&nbsp;था। (मूल दस्तावेज़ में छत्तीसगढ़ में नागवंश की दो शाखाओं &#8211; कवर्धा के फणीनागवंश और बस्तर के छिंदकनागवंश का एक फ्लोचार्ट भी दर्शाया गया है।) ✨ तेलुगू-चोड़वंश एवं बस्तर का गंग युग तेलुगू-चोड़वंश शासन क्षेत्र: ओडिशा के स्वर्णपुर (सोनपुर) एवं बस्तर के कुछ क्षेत्र। प्रमुख शासक: सोमेश्वर तृतीय (उपाधि-चक्रवर्ती), यशोराज प्रथम, यशोराज द्वितीय, धारल्लदेव। जानकारी का स्रोत: महदा ताम्रपत्र। अंत: कल्चुरी शासक&nbsp;जाजल्यदेव प्रथम&nbsp;ने सुवर्णपुर के शासक भुजबल को पराजित कर इस क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया। बस्तर का गंग युग राजधानी:&nbsp;बारसूर। ऐतिहासिकता: बस्तर भूषण ग्रंथ के अनुसार, बस्तर के गंग शासक जगन्नाथपुरी से आकर बारसूर में बस गए थे। उन्होंने अपने पूर्वज बाल-सूर्य के नाम पर एक नगर बसाया जो बाद में&nbsp;बारसूरगढ़&nbsp;के नाम से प्रसिद्ध हुआ।&nbsp;[CG Vyapam(PHEH)2023] निर्माण कार्य: बारसूर एक समय मंदिरों और तालाबों से भरा एक समृद्ध शहर था, जहाँ 147 बड़े सरोवर और उतने ही मंदिर थे। गंग वंश की वास्तुकला उत्कृष्ट थी, जिसमें बारसूर का&nbsp;नारायणगुड़ी का कलात्मक गरूड़ स्तम्भ&nbsp;तथा&nbsp;पेदाम्मागुड़ी की दुर्गा मूर्ति&nbsp;विशेष रूप से अद्भुत हैं। 🐍 बस्तर का छिंदक नागवंश 📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उत्पत्ति: माना जाता है कि चौथी शताब्दी ईस्वी में गुप्तों से पराजित होने के बाद, नागवंशी शासक विंध्य क्षेत्र से तेलंगाना की ओर चले गए। उन्हीं की एक शाखा ने बाद में बस्तर के&nbsp;चक्रकोट&nbsp;से अपना शासन प्रारंभ किया। 🔑 मुख्य तथ्य 🕰️&nbsp;शासनकाल: 1023 से 1324 ई. तक। 🌍&nbsp;शासन क्षेत्र: चक्रकोट, भ्रमरकोट एवं बारसूर। 🏰&nbsp;राजधानी: बारसूर दंतेवाड़ा&nbsp;(कन्हरदेव द्वितीय द्वारा स्थापित)&nbsp;[CG Vyapam (Patwari) 2022] 🎖️&nbsp;उपाधि: भोगवतीपुरेश्वर। 📜&nbsp;पदवी: छिन्दककुलकमल भास्कर छिन्दककुल तिलक 🐍&nbsp;ध्वज: सर्प (सांप) का चिह्न। 🐾&nbsp;राजकीय चिह्न: बाघ एवं उसके शावक (बच्चे)। 💰&nbsp;मुद्रा: छिंदक नागवंशी शासकों की&nbsp;28 स्वर्ण मुद्राएँ&nbsp;1957 में&nbsp;कोडिंगा क्षेत्र (कोरापुट)&nbsp;से प्राप्त हुई हैं। 🌌&nbsp;वंश का दावा: ये शासक स्वयं को सिंधु घाटी सभ्यता से आया हुआ बताते थे। 👑 प्रमुख शासक एवं उनके अभिलेख शासकअभिलेख / शिलालेखसंबंधित जानकारी1. नृपति भूषण (संस्थापक)एर्राकोट तेलगु अभिलेखसंस्थापक, 1023 ई. में चोल राजा राजेन्द्र प्रथम के साथ बस्तर आए।2. जगदेवभूषण धारावर्ष——3. मथुरांतकदेव——4. सोमेश्वरदेव प्रथमकुरूसपाल शिलालेख[CG PSC(CMO)2019,(EAP) 2016,(ARTO)2017]5. कन्हरदेव प्रथमबारसूर अभिलेख[CG PSC(CMO)2019]6. जयसिंह देव प्रथमसोनारपाल शिलालेख[CG PSC(CMO)2019,(EAP)2016,(ARTO)2017]7. राजभूषण सोमेश्वरदेव द्वितीय——8. जगदेवभूषण नरसिंहदेवदंतेवाड़ा स्तंभ लेख[CG PSC(ADI)2016,(EAP) 2016,(ARTO) 2017]9. कन्हरदेव द्वितीय——10. हरिशचंद्रदेव (अंतिम शासक)टेमरा सती अभिलेखइस राजवंश के अंतिम शासक, इनका अंतिम अभिलेख मिला है। 📜 शासकों का विस्तृत परिचय नृपति भूषण पदवी: इन्हें छिंदकनागवंश का&nbsp;प्रथम शासक&nbsp;या संस्थापक माना जाता है। स्रोत: इनका उल्लेख एर्राकोट से प्राप्त तेलुगु शिलालेख में मिलता है। ऐतिहासिक संभावना: यह माना जाता है कि&nbsp;1023 ई. में&nbsp;नृपति भूषण, चोल राजा&nbsp;राजेन्द्र प्रथम&nbsp;के साथ बस्तर आए थे और बाद में यहीं बसकर छिंदकनागवंश की स्थापना की। जगदेव भूषण धारावर्ष (1042 से 1060 ई. तक) राजधानी: बारसूर। जानकारी: बारसूर शिलालेख से ज्ञात होता है कि इनके शासनकाल में&nbsp;महामण्डलेश्वर चन्द्रादित्य&nbsp;ने&nbsp;चन्द्रादित्य तालाब&nbsp;एवं&nbsp;चन्द्रादित्येश्वर शिव मंदिर&nbsp;का निर्माण करवाया था। शासन परिवर्तन: इनकी वृद्धावस्था और इनके उत्तराधिकारी सोमेश्वर देव की बाल्यावस्था के कारण, धारावर्ष की बहन&nbsp;मासकदेवी&nbsp;ने 1061-64 ई. तक शासन संभाला। मधुरान्तक देव संघर्ष: जगदेव भूषण धारावर्ष की मृत्यु के बाद, सत्ता के लिए मधुरान्तक देव और सोमेश्वरदेव के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें&nbsp;मधुरान्तक देव&nbsp;सफल रहे। राजधानी: राजपुर (जगदलपुर)। उपाधि: वे भ्रमरकोट या मधुरमण्डल के सत्ताधारी के रूप में जाने जाते थे। ताम्रपत्र: राजपुर ताम्रपत्र (यह एकमात्र ताम्रपत्र है जिसमें&nbsp;नरबलि प्रथा&nbsp;का उल्लेख है)। इसमें माणिकेश्वरी देवी (दंतेश्वरी देवी) को नरबलि हेतु&nbsp;राजपुर&nbsp;नामक ग्राम दान देने का उल्लेख है। सोमेश्वरदेव प्रथम (1069 से 1111 ई. तक) सत्ता प्राप्ति: इन्होंने मधुरान्तक देव को पराजित कर सत्ता पर अधिकार किया। उपाधि: महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परमेश्वर। माता-पिता: ये जगदेवभूषण धारावर्ष के पुत्र थे, और इनकी माता का नाम गुण्डमहादेवी था। मुद्रा: इनके&nbsp;स्वर्ण सिक्के&nbsp;बिलासपुर से प्राप्त हुए हैं। कुरूसपाल अभिलेख:&nbsp;[CG PSC(Pre)2020] यह अभिलेख सोमेश्वर देव प्रथम द्वारा देवनागरी लिपि में, संस्कृत भाषा में लिखा गया है।&nbsp;[CG PSC(ADA) 2023] इस अभिलेख में&nbsp;कोसल के 6 लाख 96 हजार गांवों&nbsp;को अपने अधीन करने का उल्लेख है और&nbsp;मधुरांतक देव के वध&nbsp;का वर्णन भी मिलता है।&nbsp;[CG PSC(ARTO)2022] ⚔️ सोमेश्वरदेव प्रथम का विजय अभियान उड्र विजय: इन्होंने ओडिशा के सोमवंशी शासक उद्योत केसरी (महाभव गुप्त चतुर्थ) को पराजित किया। वेंगी विजय: इन्होंने वेंगी (गोदावरी-कृष्णा नदी के बीच का क्षेत्र) के नरेश वीरचोड को हराया। लेम्णा विजय: इनकी पहचान रायबहादुर हीरालाल ने छत्तीसगढ़ के लवन (बलौदाबाजार) से की है। लांजी विजय: इन्होंने बालाघाट स्थित लांजी पर विजय प्राप्त की, जहाँ त्रिपुरी के कल्चुरी नरेश यश कर्ण का शासन था। वज्र विजय: रायबहादुर हीरालाल के अनुसार, यह क्षेत्र वर्तमान बैरागढ़ (महाराष्ट्र) के अंतर्गत आता था। भद्रपत्तन विजय: यह वर्तमान भांडक नगर है। रतनपुर और कोसल विजय: इन्होंने कल्चुरी शासक पृथ्वीदेव प्रथम को पराजित किया। पराजय: बाद में, कल्चुरी शासक&nbsp;जाजल्यदेव प्रथम&nbsp;ने इन पर आक्रमण कर इन्हें मंत्रियों और रानियों सहित बंदी बना लिया, लेकिन इनकी माता गुण्ड महादेवी के अनुरोध पर इन्हें छोड़ दिया।&nbsp;[CGVyapam(Asst. Magn)2015] 🏛️ निर्माण कार्य एवं विरासत निर्माण: विष्णु मंदिर, नारायणपाल (बस्तर) बत्तीसा मंदिर&nbsp;(जुड़वां शिव मंदिर), बारसूर (दंतेवाड़ा) &#8211; यह मंदिर सोमेश्वरदेव प्रथम ने अपनी रानी गंगमहादेवी के लिए बनवाया था और यह 32 खम्भों पर टिका है। विशेष: इनके शासनकाल को&nbsp;बस्तर का स्वर्ण काल&nbsp;कहा जाता है। 🛡️ बाद के शासक कन्हरदेव प्रथम जानकारी: नारायणपाल अभिलेख के अनुसार, सोमेश्वरदेव प्रथम की मृत्यु के बाद यह विशाल साम्राज्य विरासत में&nbsp;कन्हरदेव&nbsp;को मिला। आक्रमण: कल्चुरी शासक पृथ्वीदेव द्वितीय के सामंत जगपाल देव ने&nbsp;1145 ई. में&nbsp;चक्रकोट पर आक्रमण कर कन्हर देव को पराजित किया था। जयसिंहदेव प्रथम जानकारी: सोनारपाल शिलालेख और केशरपाल अभिलेख में इनका उल्लेख मिलता है। राजभूषण सोमेश्वरदेव द्वितीय निर्माण: इनके शासनकाल में बारसूर के अधिकांश मंदिरों का निर्माण हुआ। जानकारी: बारसूर शिलालेख (गंगा महादेवी) में इन्हें&nbsp;राजभूषण सोमेश्वर&nbsp;कहा गया है। जगदेवभूषण नरसिंहदेव जानकारी: इनका उल्लेख दंतेवाड़ा स्तंभ लेख और जतनपाल शिलालेख में है। उपासना: भैरमगढ़ शिलालेख से पता चलता है कि वे&nbsp;माणिक्य देवी&nbsp;के भक्त थे। कन्हरदेव द्वितीय जानकारी: इनका उल्लेख बारसूर अभिलेख में है। राजधानी: इन्होंने अपनी राजधानी&nbsp;बारसूर से दंतेवाड़ा&nbsp;स्थानांतरित की। हरिशचन्द्र देव पदवी: ये इस राजवंश के&nbsp;अंतिम ज्ञात शासक&nbsp;थे। स्रोत: इनके बारे में जानकारी देने वाला अंतिम लेख&nbsp;टेमरा सती स्मारक लेख&nbsp;है, जिसमें&nbsp;चमेली देवी&nbsp;के साहस और जौहर का उल्लेख है। पतन: 1324 ई. में काकतीयवंशी शासक&nbsp;अन्नमदेव&nbsp;से संघर्ष में इन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। इस प्रकार, बस्तर क्षेत्र में छिंदक नागवंश का अंत हो गया और काकतीय वंश का उदय हुआ। विशेष: ये रतनपुर के&nbsp;कल्चुरियों के प्रतिद्वंद्वी&nbsp;थे। 🏰 छिंदक नागवंश द्वारा निर्मित प्रमुख स्थापत्य स्थापत्यनिर्माणकर्ता1.&nbsp;चन्द्रादित्येश्वर/चन्द्रादित्य मंदिर (शिव मंदिर)चन्द्रादित्य (धारावर्ष का सेनापति)2.&nbsp;चन्द्रादित्य सरोवरचन्द्रादित्य (धारावर्ष का सेनापति)3.&nbsp;बत्तीसा मंदिर (भगवान शिव का जुड़वा मंदिर)गंग महादेवी (सोमेश्वरदेव-I की रानी)4.&nbsp;विशाल गणेश प्रतिमा (बारसूर)बाणासुर नामक राजा5.&nbsp;नारायणपाल (बस्तर) का विष्णु मंदिरसोमेश्वर देव-I6.&nbsp;मामा-भांजा मंदिर (बारसूर) (गणेश व नरसिंहनाथ की प्रतिमा)छिंदक नागवंशीय शासक7.&nbsp;ढोलकल गणेश प्रतिमा (दंतेवाड़ा)छिंदक नागवंशीय शासक 🛡️ बस्तर के काकतीय वंश या चालुक्य वंश 📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background) उत्पत्ति: 13वीं शताब्दी में, वारंगल के काकतीय राजा&nbsp;गणपति&nbsp;की कोई पुत्र संतान नहीं थी, केवल दो पुत्रियाँ थीं &#8211;&nbsp;रूद्राम्मा&nbsp;और&nbsp;गणपाम्बा। विवाह और उत्तराधिकार: राजा गणपति ने अपनी पुत्री रूद्राम्मा का विवाह चालुक्य नरेश&nbsp;वीर भद्रेश्वर&nbsp;से कर उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। रूद्राम्मा ने 1261 से 1293 ई. तक वारंगल पर शासन किया, लेकिन दुर्भाग्यवश उनकी भी कोई पुत्र संतान नहीं थी, केवल एक पुत्री&nbsp;मम्मडम्मा&nbsp;थी। वंश का मिश्रण: मम्मडम्मा का विवाह चालुक्य वंश के&nbsp;महादेव&nbsp;नामक व्यक्ति से हुआ, जिससे उनके दो पुत्र हुए &#8211;&nbsp;प्रतापरुद्रदेव&nbsp;और&nbsp;अन्नमदेव। प्रतापरुद्रदेव का शासन: रानी रूद्राम्मा के कोई पुत्र न होने के कारण, उन्होंने अपनी पुत्री के बड़े पुत्र&nbsp;प्रतापरुद्रदेव&nbsp;को गोद ले लिया, जो बाद में वारंगल के काकतीय वंश की राजगद्दी पर बैठे। चालुक्य पहचान: दत्तक नियमों के अनुसार, प्रतापरुद्रदेव&nbsp;चालुक्य&nbsp;होते हुए भी&nbsp;काकतीय शासक&nbsp;कहलाए। लेकिन, उनके छोटे भाई&nbsp;अन्नमदेव&nbsp;अभी भी चालुक्यवंशी ही कहलाते थे। बस्तर के हल्बी-भतरी लोकगीतों में भी अन्नमदेव को&nbsp;&#8220;चालकी वंश&#8221;&nbsp;का राजा कहा गया है। 🤔 काकतीय नाम का रहस्य चूंकि प्रतापरुद्रदेव के भी कोई पुत्र नहीं था, इसलिए उनके छोटे भाई&nbsp;अन्नमदेव&nbsp;ही उनके उत्तराधिकारी बने। काकतीय परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए, उनके राजवंश को भी&nbsp;काकतीय राजवंश&nbsp;के नाम से जाना गया। प्रमाण: दंतेवाड़ा के शिलालेख में भी बस्तर के राजाओं को काकतीय कहा गया है, और इस वंश के 22वें शासक&nbsp;प्रवीरचन्द्र भंजदेव&nbsp;ने स्वयं को काकतीय ही बताया है। आदिपुरुष: काकतीयों के आदिपुरुष&nbsp;प्रतापरुद्रदेव, दुर्गा अर्थात&nbsp;&#8216;काकतीय&#8217; नाम की देवी&nbsp;के उपासक थे। तेलंगाना के &#8216;एकशिला&#8217; नगर में काकतीय देवी का प्रसिद्ध मंदिर आज भी मौजूद है। ⚔️ काकतीय वंश की स्थापना दिल्ली सल्तनत का आक्रमण: अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति&nbsp;मलिक काफूर&nbsp;ने 1309-10 ई. में वारंगल पर आक्रमण कर प्रतापरुद्रदेव को अधीनता स्वीकार करने पर विवश कर दिया। पतन: बाद में, तुगलक वंश के शासकों ने वारंगल को 1321-23 ई. में पूरी तरह से दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। अन्नमदेव का पलायन: इस उथल-पुथल के कारण प्रतापरुद्रदेव की मृत्यु हो गई और उनके भाई&nbsp;अन्नमदेव&nbsp;वारंगल छोड़कर बीजापुर के रास्ते से&nbsp;बारसूर&nbsp;पहुँचे। स्थापना: यहाँ उन्होंने अंतिम नागवंशी शासक&nbsp;हरिशचन्द्र&nbsp;को परास्त कर&nbsp;1324 ई. में&nbsp;सिंहासन पर अधिकार किया और इस प्रकार बस्तर में एक नए&nbsp;काकतीय वंश&nbsp;की नींव रखी। 📋 सामान्य परिचय (General Introduction) विषयविवरणसंबंधित पी.वाई.क्यू (PYQ)🕰️ शासनकाल1324-1961 ई. (बस्तर में सर्वाधिक लम्बे समय तक शासन करने वाला वंश)[CG Vyapam (MFA) 2017]🌍 शासन क्षेत्रबस्तर/चक्रकोट/भ्रमरकोट[CG Vyapam (CACC) 2017, (AAF) 2016]👑 संस्थापकछत्तीसगढ़ में: अन्नमदेव&nbsp;वारंगल में: गणपति[CG PSC(Pre)2023], [CG VS (AG-3))2021]💔 अंतिम शासकप्रवीरचंद्र भंजदेव🏰 प्राचीन राजधानीकाकतिपुर📍 राजधानियाँ (क्रमशः)1. मंधोता / मधुपुरी (अन्नमदेव) 2. चक्रकोट (पुरुषोत्तम देव) 3. बस्तर (दिकपालदेव) 4. जगदलपुर (दलपत देव)🙏 कुल देवीदंतेश्वरी देवी[CG PSC(Mains)2011, (Lib.) 2014]🎤 विशेषबस्तर के लोकगीतों में इस वंश को&nbsp;चालकी वंश / चालुक्य वंश&nbsp;के नाम से संबोधित किया गया है। 🌳 काकतीयवंशीय शासकों का क्रम (Genealogy of Rulers) अन्नमदेव&nbsp;(1324 – 1369 ई.) हमीर देव&nbsp;(1369 – 1410 ई.) भैरव देव&nbsp;(1410 – 1468 ई.) पुरुषोत्तम देव&nbsp;(1468 – 1534 ई.) जयसिंह देव&nbsp;(1534 – 1558 ई.) नरसिंह देव&nbsp;(1558 – 1602 ई.) प्रतापराज देव&nbsp;(1602 – 1625 ई.) जगदीश राज देव&nbsp;(1625 – 1639 ई.) वीर नारायण देव&nbsp;(1639 – 1654 ई.) वीरसिंह देव&nbsp;(1654 – 1680 ई.) दिकपाल देव&nbsp;(1680 – 1709 ई.) राजपाल देव&nbsp;(1709 – 1721 ई.) चंदेल मामा&nbsp;(1721 – 1731 ई.) &#8211; (एक घुसपैठिया शासक) दलपतदेव&nbsp;(प्रतापसिंह और दखिन सिंह इनके भाई थे) अजमेर देव&nbsp;(दलपतदेव के पुत्र) दरिया देव&nbsp;(दलपतदेव के पुत्र, इनके सहयोगी उमराव सिंह और गजराज सिंह थे) महिपाल देव&nbsp;(दरिया देव के वंशज) भूपाल देव&nbsp;(इनके भाई दलगंजन सिंह थे) भैरम देव&nbsp;(इनके भाई लाल कालीन्द्र सिंह थे) रुद्र प्रताप देव प्रफुल्ल कुमारी प्रवीरचंद्र भंजदेव विजयचंद्र भंजदेव&nbsp;(1966-1969 ई.) भरतचंद्र भंजदेव&nbsp;(1969-1997 ई.) कमलचंद्र भंजदेव&nbsp;(1997-वर्तमान तक) 📜 विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs) प्र. बस्तर में काकतीय वंश के निम्नलिखित शासकों का सही क्रम निर्धारित कीजिए:&nbsp;[CGPSC(ADA)2020](i) अन्नमदेव(ii) नरसिंहदेव(iii) पुरुषोत्तमदेव(iv) दलपतदेव (B) (i), (iii), (ii), (iv) प्र. बस्तर के काकतीय राजवंश के शासनकाल का सही क्रम है:&nbsp;[CGPSC(ARO)2022]भैरवदेव → पुरुषोत्तमदेव → नरसिंह देव → प्रतापराज देव (A) स्वतंत्र शासक (Independent Rulers) 👑 1. अन्नमदेव (1324-1369 ई.) पदवी: इन्हें छत्तीसगढ़ में काकतीय वंश का&nbsp;संस्थापक&nbsp;(1324 ई. में) माना जाता है।&nbsp;[CGPSC(Pre)2023] उपनाम: इन्हें दंतेवाड़ा शिलालेख में&nbsp;&#8220;अन्नमराज&#8221;&nbsp;कहा गया है। राजधानी:&nbsp;मंधोता&nbsp;(बस्तर)। विवाह: इनकी पत्नी&nbsp;सोनकुंवर चन्देलिन&nbsp;थीं, जो एक चन्देल राजकुमारी थीं। जीर्णोद्धार कार्य: अन्नमदेव ने दंतेवाड़ा जिले के तराला ग्राम में, शंखिनी-डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित&nbsp;दंतेश्वरी मंदिर&nbsp;का 14वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार करवाया था। साम्राज्य विस्तार: 1324 ई. में, इन्होंने बारसूर के छिंदक नागवंशी शासक&nbsp;हरिशचन्द्रदेव&nbsp;को पराजित कर सिंहासन पर अधिकार किया और बस्तर के छोटे-छोटे राजाओं को हराकर संपूर्ण बस्तर क्षेत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। 🔍 पुरातात्विक साक्ष्य &#8211; दंतेश्वरी देवी मंदिरयह मंदिर दंतेवाड़ा में स्थित एक प्रमुख शक्तिपीठ है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ देवी सती का एक&nbsp;दाँत&nbsp;गिरा था। मंदिर की प्रधान प्रतिमा महिषासुरमर्दिनी की है, जो काले पत्थर से निर्मित है। मंदिर का निर्माण संभवतः 11-12वीं शताब्दी में छिंदक नागवंशी शासकों द्वारा करवाया गया था, और 14वीं शताब्दी में&nbsp;अन्नमदेव&nbsp;ने इसका जीर्णोद्धार कराया, जो वारंगल के प्रतापरूद्र के भाई थे।&nbsp;[CGPSC(ARO)2022] 👑 2. हमीरदेव / हमीराजदेव (1369-1410 ई.) उपनाम: हमीराजदेव। विवाह: इनकी पत्नी&nbsp;श्यामकुमारी बघेलिन&nbsp;थीं, जो एक बघेल राजकुमारी थीं। विशेष: इनके शासनकाल से संबंधित जानकारी&nbsp;ओडिशा के इतिहास&nbsp;से भी प्राप्त होती है। 👑 3. भैरवदेव / भैराजदेव (1410-1468 ई.) विवाह: इनकी पत्नी का नाम&nbsp;मेघई अरिचकेलिन&nbsp;या&nbsp;मेघावती&nbsp;था। विशेष: मेघावती शिकार (आखेट) करने में अत्यंत निपुण थीं। उनकी स्मृति में आज भी बस्तर में&nbsp;मेघी साड़ी, मेघई गोहड़ी&nbsp;जैसी परंपराएं प्रचलित हैं। 👑 4. पुरुषोत्तम देव (1468-1534 ई.) राजधानी: इन्होंने अपनी राजधानी&nbsp;मंधोता से चक्रकोट&nbsp;स्थानांतरित की।&nbsp;[CGPSC(ARO)2022] उपासक: ये भगवान&nbsp;जगन्नाथ&nbsp;के परम भक्त थे। उपाधि: इन्हें पुरी के शासक द्वारा&nbsp;&#8220;रथपति&#8221;&nbsp;की उपाधि प्रदान की गई थी। पुरी के शासक ने इन्हें 16 पहियों वाला एक रथ भी भेंट किया था। विवाह: इनकी पत्नी का नाम&nbsp;कंचनकुंवर बघेलिन&nbsp;था। संस्कृति का प्रारंभ: बस्तर का विश्व प्रसिद्ध&nbsp;रथ यात्रा&nbsp;और&nbsp;गोंचा पर्व&nbsp;इन्हीं के द्वारा प्रारंभ किया गया था। इनके शासनकाल में ही बस्तर क्षेत्र में&nbsp;मड़ई (मेले)&nbsp;की शुरुआत हुई थी।&nbsp;[CG VS(AG-3))2021] 👑 5. प्रताप राजदेव (1602-1625 ई.) आक्रमण: इनके समय में, गोलकुण्डा के मुहम्मद कुली कुतुबशाह की सेना ने बस्तर पर आक्रमण किया था। काकतीय सेना ने इस आक्रमण को सफलतापूर्वक विफल कर दिया।&nbsp;[CGPSC(ARO)2022] 👑 6. वीरसिंह देव (1654-1680 ई.) निर्माण: इन्होंने&nbsp;राजपुर के दुर्ग (किला)&nbsp;का निर्माण करवाया था। 👑 7. दिकपालदेव (1680-1709 ई.) राजधानी: इन्होंने राजधानी को&nbsp;चक्रकोट से बस्तर&nbsp;स्थानांतरित किया। शिलालेख: दंतेवाड़ा से प्राप्त&nbsp;1703 ई.&nbsp;का शिलालेख, जो&nbsp;छत्तीसगढ़ी भाषा मिश्रित&nbsp;प्रथम लेख माना जाता है, इन्हीं से संबंधित है।&nbsp;[CG Vyapam (MBS)2021], [CG Vyapam (VPR)2021] 👑 8. राजपाल देव (1709-1721 ई.) उपाधि: प्रौढ़प्रताप चक्रवर्ती। अन्य नाम: रक्षपालदेव। उपासक:&nbsp;माणिकेश्वरी देवी&nbsp;(दंतेवाड़ा)। विवाह: इनका विवाह बघेलिन एवं चंदेलिन नामक दो राजकुमारियों से हुआ था, जिनसे इन्हें&nbsp;दलपतदेव, प्रतापसिंह और दखिनसिंह&nbsp;नामक तीन पुत्र प्राप्त हुए। 👑 9. चंदेल मामा (1721-1731 ई.) &#8211; (एक अस्थायी शासक) सत्ता पर कब्जा: राजपाल देव की मृत्यु के बाद, उनकी चंदेलिन रानी के भाई, यानी राजकुमारों के&nbsp;चंदेल मामा&nbsp;ने धोखे से सत्ता पर कब्जा कर लिया। सत्ता की वापसी: बाद में, राजकुमार&nbsp;दलपतदेव&nbsp;ने रक्षाबंधन के अवसर पर राखी का नेग (उपहार) लेने के बहाने चंदेल मामा के दरबार में प्रवेश किया और उनकी हत्या कर सत्ता को पुनः प्राप्त कर लिया। 👑 10. दलपत देव (1731–1774 ई.) राजधानी:&nbsp;जगदलपुर। इनके शासनकाल में राजधानी बस्तर से जगदलपुर स्थानांतरित की गई। पुत्र: इनके दो पुत्र थे &#8211;&nbsp;1. अजमेर सिंह, 2. दरियादेव। आक्रमण: इनके शासनकाल में, प्रथम भोंसला आक्रमण&nbsp;नीलू पंत / नीलू पंडित&nbsp;के नेतृत्व में हुआ, जो असफल रहा। तालाब निर्माण: इन्होंने अपने नाम पर&nbsp;दलपत सागर तालाब/झील&nbsp;का निर्माण करवाया (जिसका पूर्व नाम भूपाल ताल था)। यह वर्तमान में छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी झील है।&nbsp;[CGPSC(SEE) 2022, (AP)2019] 👑 11. अजमेर सिंह (1774-1777 ई.) संज्ञा: इन्हें बस्तर क्षेत्र में&nbsp;&#8220;क्रांति का मसीहा&#8221;&nbsp;कहा जाता है। संघर्ष: सत्ता के लिए इनका अपने भाई&nbsp;दरियादेव&nbsp;के साथ संघर्ष हुआ। विद्रोह: इनके नेतृत्व में बस्तर का प्रथम जनजातीय विद्रोह&nbsp;&#8216;हल्बा विद्रोह&#8217; (1774 ई.)&nbsp;प्रारंभ हुआ। परिणाम: हल्बा विद्रोह की असफलता के बाद काकतीय वंश का शासन मराठों के अधीन हो गया। (B) मराठाधीन शासक (Rulers under Maratha Suzerainty) 👑 12. दरियादेव (1777-1800 ई.) सत्ता प्राप्ति: इन्होंने अपने भाई के विरुद्ध षड्यंत्र रचकर सत्ता हासिल की। इस कार्य में जैपुर (जयपुर) नरेश विक्रमदेव, कंपनी सरकार के अधिकारी जॉनसन और मराठों ने इनकी सहायता की। कोटपाड़ की संधि (6 अप्रैल 1778): घटना: सत्ता हस्तांतरण के लिए जैपुर नरेश विक्रमदेव और बिम्बाजी भोंसले के प्रतिनिधि त्रयम्बक अवीरराव के बीच यह ऐतिहासिक संधि हुई। परिणाम: इस संधि के तहत जैपुर नरेश को कोटपाड़, चुकचुड़ा, पोड़ागढ़ और रायगढ़ा का क्षेत्र मिला तथा उन्होंने मराठों को&nbsp;59 हजार टकोली (वार्षिक कर)&nbsp;देना स्वीकार किया। विशेष: इस संधि के बाद बस्तर क्षेत्र पूरी तरह&nbsp;मराठा नियंत्रण&nbsp;में आ गया और छत्तीसगढ़ का अभिन्न अंग बन गया।&nbsp;[CGVyapam (SAAF)2018] ⚔️ भोपालपट्टनम का संघर्ष (1795 ई.) वर्ष: 1795 ई.। कारण: ब्रिटिश यात्री&nbsp;मि. जे.टी. ब्लंट&nbsp;के आगमन के विरोध में। घटना: जब मि. जे.टी. ब्लंट ने बीजापुर से भोपालपट्टनम होते हुए बस्तर क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास किया, तो स्थानीय आदिवासियों ने उनका घोर विरोध किया, जिसे &#8216;भोपालपट्टनम का संघर्ष&#8217; कहा जाता है। अंततः, ब्लंट को विवश होकर कलकत्ता लौटना पड़ा।&nbsp;[CG V.S.(AG-3))2021] [CGPSC(RDA)2014), (RDSP), (MI)2022] (C) आंग्ल-मराठाधीन शासक (Rulers under Anglo-Maratha Control) 👑 13. महिपालदेव (1800-1842 ई.) विद्रोह: इनके शासनकाल में&nbsp;1824-1825 ई.&nbsp;में गेंदसिंह के नेतृत्व में&nbsp;परलकोट का विद्रोह&nbsp;हुआ।&nbsp;[CGPSC(AP)2019] आक्रमण: मराठों को टकोली (कर) न चुकाने के कारण, मराठा शासक व्यंकोजी ने&nbsp;1809 में&nbsp;सेनापति रामचंद्र बाघ को आक्रमण हेतु भेजा। परिणाम: युद्ध में महिपालदेव पराजित हुए और संधि के अनुसार, टकोली न चुका पाने के कारण&nbsp;1830 ई. में सिहावा क्षेत्र&nbsp;नागपुर शासन को सौंप दिया। पुत्र: इनके दो पुत्र थे &#8211; 1. भूपालदेव, 2. दलगंजनसिंह। 👑 14. भूपालदेव (1842-1853 ई.) भाई का पद: इन्होंने अपने छोटे भाई&nbsp;दलगंजन सिंह&nbsp;को&nbsp;तारापुर परगने का अधिकारी&nbsp;नियुक्त किया था। अभियोग: मराठा शासकों ने&nbsp;नरबलि प्रथा&nbsp;को आधार बनाकर भूपालदेव पर गंभीर अभियोग लगाया। विद्रोह: इनके शासनकाल में दो महत्वपूर्ण जनजातीय विद्रोह हुए: तारापुर विद्रोह (1842–54) मेरिया विद्रोह (1842–63) (D) ब्रिटिशकालीन शासक (Rulers during British Era) ब्रिटिश अधिग्रहण: लॉर्ड डलहौजी की&nbsp;&#8220;हड़प नीति&#8221;&nbsp;के तहत, 13 मार्च 1854 को नागपुर राज्य का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में कर लिया गया। चूंकि बस्तर नागपुर साम्राज्य के अधीन था, इसलिए सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ क्षेत्र, जिसमें बस्तर भी शामिल था, ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया और बस्तर प्रशासनिक व राजनीतिक रूप से अंग्रेजों के अधीन हो गया। 👑 15. भैरमदेव (1853-1891 ई.) राज्याभिषेक: अपने पिता भूपालदेव की मृत्यु के बाद, मात्र 13 वर्ष की आयु में ये राजसिंहासन पर बैठे। प्रमुख यूरोपीय यात्री: इनके शासनकाल में, अंग्रेज अधिकारी&nbsp;चार्ल्स इलियट&nbsp;ने&nbsp;1856 ई.&nbsp;में बस्तर की यात्रा की। वे बस्तर की यात्रा करने वाले पहले यूरोपीय थे। जनजातीय विद्रोह: इनके कार्यकाल में तीन बड़े जनजातीय विद्रोह हुए: लिंगागिरी विद्रोह (1856) कोई विद्रोह (1859) मुड़िया / मुरिया विद्रोह (1876) विशेष: 1854 में, बस्तर ब्रिटिश भारत का एक&nbsp;मांडलिक राज्य&nbsp;बन गया। 1886 ई. से, यह निर्णय लिया गया कि बस्तर में केवल ब्रिटिश अधिकारियों को ही&nbsp;दीवान&nbsp;नियुक्त किया जाएगा। ⚔️ बस्तर की रानी, जुगराज कुँवर का विद्रोह (1878-82) शुरुआत: बस्तर के काकतीयवंशी राजा भैरमदेव की पत्नी, रानी&nbsp;जुगराज कुँवर&nbsp;ने 1878 से 1882 ई. तक अपने पति और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एक अनोखा विद्रोह किया, जिसे बस्तर के सरकारी अभिलेखों में हल्बी भाषा में&nbsp;&#8216;रानी-चो-रिस&#8217; (रानी का कोप)&nbsp;कहा जाता है।&nbsp;[CG Vyapam (ADPO)2021][CG Vyapam (FNDM)2019] कारण: विद्रोह का मुख्य कारण यह था कि ब्रिटिश अधिकारी&nbsp;फ्रेजर&nbsp;के कहने पर राजा भैरमदेव ने एक मुस्लिम महिला&nbsp;नावा बाई&nbsp;से विवाह कर लिया था, जबकि उनकी पहले से ही दो पत्नियाँ (रानी जुगराज कुँवर और सुवर्ण कुँवर) थीं। यह तीसरा विवाह उस युग की प्रचलित सामाजिक परंपराओं के विरुद्ध था, जिसका रानी जुगराज कुँवर ने तीव्र विरोध किया। नारा: विद्रोह के दौरान बस्तर की महिलाएं राजा के खिलाफ सड़कों पर उतर आईं और नारा लगाया:&nbsp;“भैरमदेव या तो नावाबाई को छोड़े अथवा बस्तर की राजगद्दी को छोड़ दे।” परिणाम: अंततः, इस नारी शक्ति के सामने ब्रिटिश शासन को झुकना पड़ा और रानी का यह संघर्ष&nbsp;सफल&nbsp;रहा। 👑 16. रुद्रप्रतापदेव (1891-1921 ई.) प्रारंभिक शासनकाल (1891-1908): राजा भैरमदेव की मृत्यु के समय, दीवान आलमचन्द्र थे, जिनके बाद&nbsp;रामचन्द्रराव मिश्र&nbsp;को दीवान बनाया गया। उस समय रुद्रप्रतापदेव केवल 6 वर्ष के थे, जिस कारण 1891 से 1908 तक बस्तर का शासन&nbsp;अंग्रेज प्रशासकों&nbsp;के अधिकार में रहा। फैगन (1896-1903)&nbsp;और&nbsp;गेयर (1899-1903)&nbsp;नामक दो यूरोपीय अधिकारियों ने इस दौरान प्रशासन का कार्यभार संभाला। शिक्षा सुधार: फैगन और गेयर ने बस्तर रियासत में&nbsp;अनिवार्य शिक्षा&nbsp;लागू की। शिक्षा: इन्होंने&nbsp;राजकुमार कॉलेज, रायपुर&nbsp;से अपनी शिक्षा प्राप्त की। सत्ता प्राप्ति:&nbsp;1908 में&nbsp;(23 वर्ष की आयु में) इन्हें शासन की बागडोर मिली। विवाह: इनकी दो पत्नियाँ थीं: कुसुमलता देवी चन्द्रकुमारी देवी&nbsp;(इनकी पुत्री का नाम&nbsp;प्रफुल्ल कुमारी देवी&nbsp;था)। उपाधि: इन्हें ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा&nbsp;&#8216;सेंट ऑफ जेरूसलम&#8217;&nbsp;की उपाधि प्रदान की गई थी, क्योंकि इन्होंने यूरोपीय महायुद्ध में ब्रिटिशों की सहायता की थी।&nbsp;[CG Vyapam (TSI)2017] विकास कार्य: इन्होंने&nbsp;जगदलपुर&nbsp;को&nbsp;&#8220;चौराहों का नगर&#8221;&nbsp;के रूप में विकसित किया।&nbsp;[CG Vyapam (FI)2022] विद्रोह: इनके शासनकाल में&nbsp;भूमकाल विद्रोह (1910)&nbsp;हुआ। दीवान: इनके समय दीवान&nbsp;बैजनाथ पण्डा&nbsp;ने वनों को आरक्षित करने की नीति लागू की। मृत्यु: इनकी मृत्यु&nbsp;1921 ई.&nbsp;में हुई। उत्तराधिकारी: इनकी पुत्री,&nbsp;प्रफुल्ल कुमारी देवी, इनकी उत्तराधिकारी बनीं। 👑 17. प्रफुल्ल कुमारी देवी (1921-1936 ई.) राज्याभिषेक:&nbsp;1922 में&nbsp;(मात्र 12 वर्ष की आयु में) इनका राज्याभिषेक हुआ। पदवी: ये छत्तीसगढ़ की&nbsp;प्रथम महिला शासिका&nbsp;थीं।&nbsp;[CGPSC(Pre)2020] विवाह: इनका विवाह&nbsp;1927 में&nbsp;मयूरभंज के महाराजा के भतीजे,&nbsp;प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव&nbsp;के साथ हुआ। संतान: कमला कुमारी (जन्म- 1928) प्रवीरचन्द्र भंजदेव&nbsp;(जन्म- 1929) गीतादेवी (जन्म- 1930) विजयचंद्र (जन्म- 1933) विशेषता: महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी एक&nbsp;जन-हितैषी शासिका&nbsp;थीं, जिस कारण अंग्रेज शासक उनसे नाखुश रहते थे और उन्हें लगातार तंग करते थे। मृत्यु: इन्हें&nbsp;अपेंडीसाइटिस के ऑपरेशन&nbsp;के बहाने लंदन भेजा गया, जहाँ&nbsp;1936 में&nbsp;इनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु आज भी संदेह के घेरे में है। उल्लेख: इनका उल्लेख ब्रिटिश पत्रिका&nbsp;&#8216;द इंडियन वुमन हुड&#8217;&nbsp;में किया गया है। 👑 18. प्रवीर चंद्र भंजदेव (1936-1966 ई.) राज्याभिषेक:&nbsp;1936 में&nbsp;इनका राज्याभिषेक हुआ और ये&nbsp;अंतिम काकतीय शासक&nbsp;थे। विलय: छत्तीसगढ़ की रियासतों के विलीनीकरण के समय, बस्तर रियासत के विलय समझौते पर इन्होंने ही&nbsp;हस्ताक्षर&nbsp;किए थे।&nbsp;[CG PSC(Sci. Off.)2018] मृत्यु:&nbsp;25 मार्च 1966&nbsp;को जगदलपुर राजमहल में पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में प्रवीरचन्द्र भंजदेव समेत अनेक आदिवासियों की मृत्यु हो गई। रचना: ये भंज वंश के थे, लेकिन इन्होंने अपने ग्रंथ&nbsp;&#8220;लोहांडीगुड़ा तरंगिनी&#8221;&nbsp;में स्वयं को&nbsp;काकतीय&nbsp;कहा है। सम्मान: इनके नाम पर छत्तीसगढ़ शासन द्वारा&nbsp;तीरंदाजी&nbsp;के क्षेत्र में पुरस्कार दिया जाता है।&nbsp;[CGPSC(MI)2018], [CG Vyapam (SMS)2018] 📜 विगत वर्षों का प्रश्न (PYQ) प्र. छत्तीसगढ़ के इतिहास की निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए:&nbsp;[CGPSC(Pre)2020](i) हल्बा विद्रोह(ii) परलकोट के जमींदार गेंद सिंह को फाँसी(iii) सिपाही विद्रोह की शुरूआत(iv) छत्तीसगढ़ में मराठों का आक्रमण(v) मुरिया विद्रोह(vi) रतनपुर की स्थापना(vii) शहीद वीर नारायण सिंह को फाँसी (उत्तर- B) घटनाओं का सही कालक्रम है: (vi) रतनपुर की स्थापना → (iv) छत्तीसगढ़ में मराठों का आक्रमण → (i) हल्बा विद्रोह → (ii) परलकोट के जमींदार गेंद सिंह को फाँसी → (vii) शहीद वीर नारायण सिंह को फाँसी → (iii) सिपाही विद्रोह की शुरूआत → (v) मुरिया विद्रोह 🏹 प्रमुख जनजातीय विद्रोह (Major Tribal Revolts) पृष्ठभूमि: काकतीय वंश के शासन काल में, दण्डकारण्य क्षेत्र में अनेक जनजातीय विद्रोह हुए। ये विद्रोह मुख्य रूप से जनजातीय&nbsp;शोषण&nbsp;और उनकी&nbsp;सांस्कृतिक अस्मिता&nbsp;पर हो रहे हस्तक्षेप के विरोध में हुए थे। ** विद्रोहों की सारणी** वर्षविद्रोहशासकनेतृत्वकर्ताउद्देश्यदमनकर्ताप्रमुख तथ्य1774हल्बाअजमेर सिंहअजमेर सिंहउत्तराधिकार हेतु—• अजमेर सिंह की मृत्यु हुई। • यह विद्रोह काकतीय वंश के पतन का कारण बना।1792सरगुजाअजीत सिंहअजीत सिंह——• 1792 में अजीत सिंह शहीद हो गए।1795भोपालपट्टनम्दरिया देवस्थानीय जनताजे.टी. ब्लंट के बस्तर आगमन के विरोध में—• यह कंपनी सरकार के विरुद्ध तीसरा विद्रोह था।1824-25परलकोटमहिपाल देवगेंदसिंहअबूझमाड़ियों को शोषणमुक्त करानापेबे (Pebey)• 20 जनवरी 1825 को गेंदसिंह को फाँसी दी गई। • परलकोट के जमींदार की पदवी &#8216;भूमिया&#8217; थी।&nbsp;[CG Vyapam(ESC) 2017]1842तारापुरभूपालदेवदलगंजन सिंहकर वृद्धि के विरोध में—• दीवान जगबंधु की बर्खास्तगी हुई।1842मेरियाभूपालदेवहिड़मा मांझीनरबलि प्रथा समाप्ति के विरोध मेंकैम्पबेल• दंतेश्वरी माता के मंदिर में दी जाने वाली बलि को &#8216;मेरिया&#8217; कहते थे।1856लिंगागिरीभैरमदेवधुरवाराम माड़ियाबस्तर को अंग्रेजी साम्राज्य में विलय से रोकना—• यह विद्रोह&nbsp;बस्तर का महान मुक्ति संग्राम&nbsp;कहलाता है। • चार्ल्स इलियट ने 1856 में बस्तर का भ्रमण किया था।1859कोई विद्रोहभैरमदेवनांगुल दोरलासाल वृक्ष की कटाई के विरोध मेंग्लास्फर्ड• नारा: &#8220;एक वृक्ष के पीछे एक सिर&#8221;। • इसे&nbsp;छत्तीसगढ़ का चिपको आंदोलन&nbsp;कहा जाता है।1876मुड़ियाभैरमदेवझाड़ा सिरहाअंग्रेजों की दमनकारी नीति के विरुद्धमैक जार्ज• प्रतीक: आम वृक्ष की टहनी। • मुड़िया जनजाति ने प्रमुख भूमिका निभाई।1910भूमकालरूद्रप्रतापदेवगुण्डाधुरबहुआयामी कारणकै. गेयर• प्रतीक: लाल मिर्च एवं आम की टहनी। • लालकालेन्द्र सिंह, रानी स्वर्ण कुंवर प्रमुख थे। ⚔️ जनजातीय विद्रोह का विस्तृत विश्लेषण 1. हल्बा विद्रोह (1774-1777 ई.) उपनाम: डोंगर विद्रोह।&nbsp;[CG PSC(ADPPO)2017] स्थान: डोंगर क्षेत्र (बस्तर)।&nbsp;[CG Vyapam (KADI-II)2019] शासक और नेतृत्वकर्ता: अजमेर सिंह। दमनकर्ता: दरियादेव, जैपुर (जयपुर) के शासक विक्रमदेव, मराठा एवं अंग्रेज। कारण: अजमेर सिंह और उनके भाई दरियादेव के बीच उत्तराधिकार को लेकर हुआ युद्ध।&nbsp;[CG PSC(Pre)2020] परिणाम: कोटपाड़ की संधि (6 अप्रैल 1778): इस संधि के परिणामस्वरूप बस्तर, भोंसलों का करद राज्य बन गया। 1777 में अजमेर सिंह की मृत्यु के पश्चात् पूरे हल्बा विद्रोहियों का निर्ममता से दमन कर दिया गया। नोट: यह विद्रोह चालुक्य (काकतीय) वंश के पतन का एक प्रमुख कारण था और इसे&nbsp;अंग्रेजों व मराठों के खिलाफ पहला प्रलेखित (documented) विद्रोह&nbsp;माना जाता है।&nbsp;[CSPHCL-2019], [CG PSC(RDA)2014] 2. सरगुजा विद्रोह (1792 ई.) उपनाम: पलामू विद्रोह। नेतृत्वकर्ता: अजीत सिंह। विशेष: अजीत सिंह ने राँची के बरवे परगना क्षेत्र को अंग्रेजों के अधिकार से छीन लिया था। हालांकि, 1792 में अपने संघर्ष के दौरान वे वीरगति को प्राप्त हुए। 3. भोपालपट्टनम संघर्ष (अप्रैल 1795 ई.) नेतृत्वकर्ता: स्थानीय जनता। कारण: ब्रिटिश यात्री&nbsp;मि. जे. टी. ब्लंट&nbsp;के बस्तर क्षेत्र में प्रवेश करने का विरोध। विशेष: यह&nbsp;कंपनी सरकार के विरुद्ध तीसरा प्रलेखित विद्रोह&nbsp;या जनजातीय संघर्ष था। 4. परलकोट विद्रोह (24 दिसंबर 1824 – 20 जनवरी 1825) शासक: महिपालदेव।&nbsp;[CG PSC(AP)2019][CG PSC(ADPPO)2017] नेतृत्वकर्ता:&nbsp;गेंदसिंह&nbsp;(परलकोट के जमींदार)।&nbsp;[CG PSC(Sci. Off.)2018,(Lib.)2017(AMO)2017(Pre)2015] सहयोगी: रमोतिन। विद्रोह का आरंभ स्थल: सितरम गाँव। भौगोलिक स्थिति: परलकोट, कोटरी, गुदरा एवं निबरा नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थित सात माड़िया राज्यों में सबसे बड़ा राज्य था। पदवी: परलकोट के जमींदार को&nbsp;&#8220;भूमिया राजा&#8221;&nbsp;कहा जाता था। काकतीय शासकों से मित्रता करने के बाद, उन्हें&nbsp;&#8220;भूमिया राजा एवं बस्तर के जमींदार&#8221;&nbsp;की दोहरी उपाधि प्राप्त हुई थी।&nbsp;[CG PSC(AMO)2017] उद्देश्य: अबूझमाड़ियों को&nbsp;शोषण से मुक्त कराना। एक ऐसे संसार की रचना करना जहाँ&nbsp;कोई शोषण न हो।&nbsp;[CGPSC(MI)2016] प्रतीक:&nbsp;धावड़ा वृक्ष&nbsp;की टहनी। प्रमुख घटनाक्रम: 24 दिसंबर 1824: जमींदार गेंदसिंह ने आदिवासियों को एकत्रित कर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा की।&nbsp;[CGPSC(ACF)2021] 4 जनवरी 1825: विद्रोहियों ने अबूझमाड़ से चांदा तक के क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया और मराठों को रसद पहुँचाने वाले बंजारों को लूटा। दमन: 4 जनवरी 1825: छत्तीसगढ़ के ब्रिटिश अधीक्षक&nbsp;मि. एगन्यू&nbsp;ने विद्रोह के दमन के लिए चांदा (महाराष्ट्र) के पुलिस अधीक्षक&nbsp;कैप्टन पेबे&nbsp;को परलकोट भेजा।&nbsp;[CGPSC(ACF)2021] 10 जनवरी 1825: कैप्टन पेबे और मराठों की संयुक्त सेना ने परलकोट को घेर लिया, और गेंदसिंह व उनके साथियों को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया। 20 जनवरी 1825: गेंदसिंह को उनके महल के सामने&nbsp;फाँसी दे दी गई। संज्ञा: गेंदसिंह को&nbsp;बस्तर का प्रथम शहीद&nbsp;कहा जाता है।&nbsp;[CG PSC(ACF)2020][CG PSC(Pre)2020,(ACF)2021(ADVHS)2013] [CGVyapam(FCPR)2016] 5. तारापुर विद्रोह (1842-1854 ई.) शासक: भूपालदेव।&nbsp;[CG PSC(ADPPO)2017] दीवान: जगबंधु। नेतृत्वकर्ता:&nbsp;दलगंजन सिंह&nbsp;(तारापुर परगना के प्रमुख)।&nbsp;[CG PSC(Pre)2022] [CG PSC(Lib.)2017, (Pre)2015] कारण: शासन में बढ़ता बाहरी हस्तक्षेप। करों में अत्यधिक वृद्धि। आदिवासियों की धार्मिक श्रद्धा और विश्वासों को आहत करना। दीवान जगबंधु के अत्याचार। परिणाम: मेजर विलियम्स&nbsp;द्वारा कर वृद्धि का आदेश वापस ले लिया गया। दीवान&nbsp;जगबंधु&nbsp;को पद से हटा दिया गया। 6. मेरिया/मेड़िया विद्रोह (1842-1863 ई.) शासक: भूपालदेव।&nbsp;[CG PSC(ADPPO)2017] नेतृत्वकर्ता:&nbsp;हिड़मा मांझी।&nbsp;[CGVyapam(PRPE)2022] [CG PSC(Lib.)2017, (Pre)2015] कारण: अंग्रेजों द्वारा पारंपरिक&nbsp;नरबलि प्रथा (मेरिया) को समाप्त करने&nbsp;का विरोध। घटनाक्रम: इस प्रथा को रोकने के लिए, नागपुर के भोंसला राजा ने&nbsp;दंतेवाड़ा के मंदिर में&nbsp;22 वर्षों के लिए एक सुरक्षा टुकड़ी तैनात की थी। दीवान के रूप में दलगंजन सिंह के स्थान पर&nbsp;वामनराव&nbsp;की नियुक्ति की गई। रायपुर के तहसीलदार&nbsp;शेर खां&nbsp;को नरबलि प्रथा के नियंत्रण के लिए नियुक्त किया गया। जांचकर्ता: मैकफर्सन। दमनकर्ता:&nbsp;कैम्पबेल। परिणाम: अंग्रेजों ने विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन कर दिया। नोट:&nbsp;दंतेश्वरी मंदिर में दी जाने वाली नरबलि को ही &#8220;मेरिया&#8221; कहा जाता था। 7. लिंगागिरी विद्रोह (1856-57 ई.) जिला: बीजापुर। शासक: भैरमदेव।&nbsp;[CGPSC(VAS)2021] दीवान: दलगंजन सिंह। नेतृत्वकर्ता:&nbsp;धुरवाराम माड़िया / धर्माराव। सहयोगी: यादोराव, व्यंकटराव। कारण: बस्तर को अंग्रेजी साम्राज्य में विलय करने की ब्रिटिश नीति का विरोध। प्रमुख घटनाक्रम: 3 मार्च 1856: चिंतलवार में अंग्रेजों और विद्रोहियों के बीच भीषण युद्ध हुआ। 5 मार्च 1856: नेतृत्वकर्ता&nbsp;धुरवाराम को फाँसी दे दी गई&nbsp;(वे&nbsp;बस्तर के दूसरे शहीद&nbsp;कहलाते हैं)।&nbsp;[CG PSC(DSPR MI &amp; MO)2022] परिणाम: धुरवाराम के सहयोगियों, यादोराव, बाबूराव और व्यंकटराव को भी फाँसी की सजा दी गई। लिंगागिरी तालुका को भोपालपट्टनम के जमींदार को सौंप दिया गया। संज्ञा: लिंगागिरी विद्रोह को&nbsp;&#8220;बस्तर का महान मुक्ति संग्राम&#8221;&nbsp;भी कहा जाता है।&nbsp;[CG PSC(Pre)2020] 8. कोई विद्रोह (1859 ई.) शासक: भैरमदेव।&nbsp;[CGVyapam (Jan. Sam. Off.)2018],[CG PSC (ARO,APO) 2014] नेतृत्वकर्ता:&nbsp;नागुल दोरला&nbsp;(पोतेकला के जमींदार)।&nbsp;[CG PSC(Pre)2015] सहयोगी: रामभोई (भोपालपट्टनम के जमींदार)। जग्गा राजू (भेज्जी के जमींदार)। दमनकर्ता: कैप्टन सी. ग्लासफर्ड (सिरोंचा के डिप्टी कमिश्नर)। कारण: अंग्रेजों और ठेकेदारों द्वारा बड़े पैमाने पर&nbsp;साल वृक्षों की कटाई&nbsp;का विरोध। नारा:&nbsp;&#8220;एक साल वृक्ष के पीछे, एक अंग्रेज व्यक्ति का सिर&#8221;। परिणाम: इस विद्रोह के दबाव में, अंग्रेजों ने बस्तर से लकड़ी ठेकेदारी की प्रथा को समाप्त कर दिया।&nbsp;[CG V.S (AG-3))2021] संज्ञा: इस विद्रोह को&nbsp;&#8220;छत्तीसगढ़ का चिपको आंदोलन&#8221;&nbsp;भी कहा जाता है। 9. मुड़िया/मुरिया विद्रोह (जनवरी 1876 ई.) शासक: भैरमदेव।&nbsp;[CGVyapam (Jan. Sam. Off.)2018] [CG PSC(MI)2014][CG PSC(ITI. Pri.)2016] प्रतीक:&nbsp;आम के वृक्ष की टहनी। नेतृत्वकर्ता:&nbsp;झाड़ा सिरहा&nbsp;(मूल नाम &#8211; रामू सिरहा)।&nbsp;[CGPSC(Pre)2022] [CG PSC(IMO)2020, (ADPPO)2017] प्रमुख कारण: अंग्रेजों की निरंकुश नीतियां और&nbsp;गोपीनाथ कपड़दार को दीवान बनाया जाना। गोपीनाथ कपड़दार के अनैतिक और दमनकारी कार्य। मुंशी अदितप्रसाद द्वारा आदिवासियों को झूठे मामलों में फंसाकर दंडित करवाना। आदिवासियों के बीच बढ़ता असंतोष। बिसाहा पद्धति: आदिवासियों से ब्रिटिश सेना द्वारा मुफ्त में या कम कीमत पर सामान खरीदना। प्रमुख घटनाक्रम: 2 मार्च 1876: असंतुष्ट आदिवासियों ने राजा का घेराव किया, जिसे&nbsp;&#8220;बस्तर में काला दिवस&#8221;&nbsp;के रूप में मनाया गया। 8 मार्च 1876:&nbsp;मैक जॉर्ज&nbsp;ने जगदलपुर में&nbsp;मुरिया दरबार&nbsp;का आयोजन करवाया। दमनकर्ता:&nbsp;मैक जॉर्ज। परिणाम: दीवान (गोपीनाथ) और मुंशी (अदितप्रसाद) दोनों को निष्कासित कर दिया गया। अंग्रेजों ने बस्तर में अनेक प्रशासनिक सुधार लागू किए, जिसमें&nbsp;नया 10 वर्षीय भू-राजस्व बंदोबस्त&nbsp;शामिल था। नोट: इस विद्रोह में&nbsp;मुड़िया जनजाति&nbsp;के लोगों ने प्रमुखता से भाग लिया था।&nbsp;[CG PSC(ITI. Pri.)2016] यह विद्रोह&nbsp;बस्तर का स्वाधीनता संग्राम&nbsp;कहलाता है और यह पूर्णतः&nbsp;अहिंसक&nbsp;था। दीवान गोपीनाथ कपड़दार: 1867 में&nbsp;भैरमदेव द्वारा दीवान नियुक्त किया गया।&nbsp;[CG PSC(Lib)2014] यह जनजातीय शोषण के लिए कुख्यात था।&nbsp;[CG PSC(SEE)2022] 1876 के मुरिया विद्रोह का यह प्रमुख कारण बना। भैरमदेव ने अपना शासन इसे सौंप दिया था, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।&nbsp;[CG PSC(SEE)2022] 10. पहाड़ी कोरवा विद्रोह (1883 ई.) नेतृत्वकर्ता: स्थानीय पहाड़ी कोरवा। विशेष: इस विद्रोह को पुनर्जीवित करने के प्रयास में अनेक ब्रिटिश कर्मचारियों की हत्या कर दी गई। दमन: विद्रोह का दमन&nbsp;रांची की ब्रिटिश बटालियन&nbsp;द्वारा किया गया। 11. भूमकाल विद्रोह (Bhoomkal Revolt) (1910 ई.) घोषणा: अक्टूबर 1909। वर्ष: फरवरी, 1910 ई.।&nbsp;[CG Vyapam (TET)2022] [CG PSC(IMO)2020] शासक: रूद्रप्रतापदेव।&nbsp;[CG Vyapam (Maha. lek.)2017] प्रमुख नेता:&nbsp;लालकालेन्द्र सिंह, रानी स्वर्ण कुंवर, कुंवर बहादुर सिंह, गुंडाधुर।&nbsp;[CG PSC(SES)2017] [CG PSC(ADPPO)2013] नेतृत्वकर्ता:&nbsp;गुण्डाधुर&nbsp;(नेतानार/नेगानार के जमींदार), जिन्हें&nbsp;&#8220;बस्तर का जननायक&#8221;&nbsp;कहा जाता है।&nbsp;[CG PSC(AMO)2017][CG PSC(ADH)2011] उद्देश्य: बस्तर में&nbsp;मुरिया राज स्थापित करना।&nbsp;[CG PSC(SEE)2020] नारा:&nbsp;&#8220;बस्तर, बस्तरवासियों का है&#8221;।&nbsp;[CG Vyapam(EBJE)2024] दीवान: बैजनाथ पण्डा। शुरुआत:&nbsp;पुसपाल बाजार को लूटकर।&nbsp;[CG Vyapam (EAE)2017][CG Vyapam(PDEO)2015] प्रतीक:&nbsp;लाल मिर्च, आम की टहनी, मिट्टी के ढेले व धनुष-बाण। मुखबिर (भेदिया): सोनू मांझी। दमनकर्ता: कैप्टन गेयर। परिणाम: विद्रोह के बाद, दीवान&nbsp;बैजनाथ पंडा&nbsp;को हटाकर उनके स्थान पर&nbsp;कैप्टन जेम्स&nbsp;को नया दीवान बनाया गया। 🌍 भूमकाल विद्रोह का घटनाक्रम: एक विस्तृत विश्लेषण ** विद्रोह के कारण** बस्तर में &#8216;भूमक&#8217; या &#8216;भूमकाल&#8217; का शाब्दिक अर्थ है&nbsp;भूमि का कांपना&nbsp;या&nbsp;भूकंप, यानी एक बड़ा उलट-पलट। यह विद्रोह इस क्षेत्र के निवासियों के लिए&nbsp;&#8216;भारत छोड़ो आंदोलन&#8217;&nbsp;के समान था। इसके कई बहुआयामी कारण थे, जो इस प्रकार हैं: राजनीतिक कारण: ब्रिटिश सरकार द्वारा राजा रूद्रप्रतापदेव के हाथों से वास्तविक सत्ता छीन लेना और गैर-काकतीय वंश के व्यक्ति (दीवान) की नियुक्ति करना। प्रशासनिक कारण: लाल कालेन्द्र सिंह और राजमाता स्वर्णकुंवर देवी की उपेक्षा तथा स्थानीय प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और शोषणकारी नीतियां। आर्थिक कारण: पुलिस, अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किया जाने वाला अत्याचार और अमानवीय व्यवहार। मुफ्त में मुर्गा, घी और जंगली उपज प्राप्त करना। आदिवासियों से बेगारी करवाना (बिना पारिश्रमिक के काम लेना) और कम मजदूरी देना। वन नीति: नए वन कानूनों के तहत आदिवासियों को उनके पारंपरिक वन अधिकारों से वंचित करना। राजस्व नीति: लगान (Tax) में वृद्धि करना और ठेकेदारी प्रथा को जारी रखना। शिक्षा और आबकारी नीति: नई शिक्षा नीति का जबरदस्ती थोपा जाना और आदिवासियों द्वारा घर में बनाई जाने वाली शराब (मादक पदार्थों) पर पाबंदी लगाना। धार्मिक और सामाजिक कारण: बस्तर में बाहरी लोगों का अनावश्यक हस्तक्षेप और ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करना। 🗓️ घटना का संक्षिप्त विवरण: तिथिवार दिनांकस्थानप्रमुख घटनाएँअक्टूबर 1909ताड़ोकी• दशहरे के दिन, राजमाता स्वर्ण कुंवर ने लाल कालेन्द्र सिंह की उपस्थिति में आदिवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित किया।&nbsp;[CG PSC(Pre)2022]&nbsp;•&nbsp;वीर गुंडाधुर&nbsp;को 1910 की क्रांति का नेता चुना गया और एक गुप्त योजना बनाई गई।जनवरी 1910ताड़ोकी• एक गुप्त सम्मेलन में, क्रांतिकारियों ने लाल कालिन्द्र सिंह के समक्ष बस्तर की अस्मिता के लिए अपने जीवन और धन का बलिदान करने की शपथ ली।1 फरवरीगीदम• आदिवासी विद्रोहियों ने दीवान&nbsp;पण्डा बैजनाथ&nbsp;और राजगुरू को घेरने के लिए कई स्थानों पर आक्रमण किया।2 फरवरीपुसपाल• विद्रोहियों ने&nbsp;पुसपाल बाजार लूटकर&nbsp;विद्रोह की विधिवत शुरुआत की। • इसी दिन यहाँ के पाठशालाओं की झोपड़ियों में आग लगा दी गई।3 फरवरीचिंगपाल• लाल कालेन्द्र ने बस्तर की जनता से ब्रिटिश सरकार पर आक्रमण करने, पुलिस थाना और वन विभाग के कार्यालयों को जलाने और बाहरी लोगों (परदेशियों) को मारकर भगाने का आह्वान किया।4 फरवरीकुकानार•&nbsp;नूरसब खां&nbsp;नामक व्यापारी की हत्या कर दी गई और पुलिस चौकी को जला दिया गया।5 फरवरीकरंजी• विद्रोहियों द्वारा&nbsp;करंजी बाजार&nbsp;लूटा गया, जो&nbsp;कुंवर बहादुर सिंह&nbsp;के अधिकार में था।6 फरवरीबस्तर• विद्रोहियों ने&nbsp;भूमकाल विद्रोह&nbsp;के लिए 6 फरवरी का दिन निश्चित किया था, और इस दिन खुले तौर पर विद्रोह का बिगुल बज गया।7 फरवरीगीदम• विद्रोह के आगाज के बाद गीदम में गुप्त सभा हुई, जहाँ महारानी&nbsp;सुबरन कुंवर&nbsp;ने आदिवासियों को संबोधित करते हुए&nbsp;मुरियाराज की स्थापना का संकल्प&nbsp;लेने को कहा।&nbsp;[CG PSC(Pre)2022]&nbsp;• गीदम पर कब्जा करने के बाद, विप्लवी बारसूर की ओर बढ़ गए।8 फरवरीकुटरू• संचार के लिए बिछी&nbsp;तार की लाइनें&nbsp;काट दी गईं। •&nbsp;गुण्डाधूर&nbsp;ने कुटरू पर कब्जा कर वहां के जमींदार&nbsp;बहादुर निजाम शाह&nbsp;को मुरिया राज के अधीन घोषित कर दिया।9 फरवरीकुआकोंडा• यहां कार्यरत एक&nbsp;वन कर्मचारी की हत्या&nbsp;कर दी गई। • भैरमगढ़ में विद्रोहियों ने एक&nbsp;पुलिस कर्मचारी को मार डाला।10 फरवरीमारेंगा, तोकापाल, करंजी• क्षेत्र के स्कूलों में आग लगा दी गई।9-10 फरवरीगुमकापाल, तोकापाल• इस बीच रायपुर, धमतरी, बीजापुर, दंतेवाड़ा और कुटरू के डाकघरों की&nbsp;डाक को लूट लिया गया।12 फरवरीकेशकाल• विद्रोह फैलने पर अंग्रेज अधिकारी&nbsp;गेयर और ड्यूक&nbsp;केशकाल में फंस गए, जहाँ विद्रोहियों ने उन्हें 4 दिनों तक घेर कर रखा।13 फरवरीगीदम• विद्रोहियों ने गीदम में व्यापारियों को लूटा और पाठशालाओं को आग के हवाले कर दिया।16 फरवरीखड्गाघाट (इंद्रावती नदी तट)• रायपुर से आई अंग्रेजी फौज से&nbsp;गुण्डाधूर के पांच दलों का भीषण युद्ध&nbsp;हुआ। •&nbsp;गेयर ने छल से&nbsp;आदिवासियों को विश्वास में लेकर (माटी किरिया कराकर) नदी पार की और फिर उन पर गोलियां चलाईं।22 फरवरीजगदलपुर•&nbsp;लाल कालिन्द्र&nbsp;सहित 17 विप्लवी नेताओं को गिरफ्तार कर सैन्य छावनी में पूछताछ के लिए ले जाया गया।23-24 फरवरीजगदलपुर• विद्रोह के दमन के लिए 200 पुलिस, 150 मद्रास प्रेसिडेंसी की पुलिस, तथा पंजाब बटालियन के 170 सैनिकों का अतिरिक्त बल जगदलपुर पहुँचा।25 फरवरी 1910डाफनगर / छोटे डोंगर•&nbsp;वीर गुंडाधुर&nbsp;के नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ भीषण संघर्ष हुआ। •&nbsp;सुप्रीम कमांडर &#8216;गेयर&#8217;&nbsp;ने पंजाबी सेना के बल पर विद्रोहियों का क्रूरता से दमन किया। 🏹 भूमकाल विद्रोह का अंतिम चरण और परिणाम (Final Phase and Aftermath) 🗓️ घटनाक्रम का संक्षिप्त विवरण (जारी&#8230;) दिनांकस्थानप्रमुख घटनाएँ26 फरवरीताड़ोकी•&nbsp;लाल कालिन्द्र सिंह&nbsp;और 15 अन्य नेताओं के घरों को लूटकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उनके घरों को जला दिया गया।28 फरवरीबस्तर क्षेत्र• अतिरिक्त पुलिस और सैन्य बल पूरे बस्तर की दिशाओं में फैला दिए गए, जिससे सैकड़ों की संख्या में गिरफ्तारियाँ हुईं और लोगों को राज्य से बाहर निकाल दिया गया।5 मार्चजगदलपुर•&nbsp;रानी सुवर्ण कुंवर&nbsp;और&nbsp;लाल कालेन्द्र सिंह&nbsp;को जगदलपुर आवास पर छापा मारकर नजरबंद कर दिया गया और उन्हें&nbsp;रायपुर जेल&nbsp;भेज दिया गया।&nbsp;[CG PSC(Pre)2022]6 मार्चबस्तर क्षेत्र• ब्रिटिश अधिकारी&nbsp;रैण्डाल&nbsp;ने परजा क्षेत्र में,&nbsp;सी. मिडेल्टन&nbsp;ने दण्डामी माड़िया क्षेत्र में, और&nbsp;ड्यूक&nbsp;ने दोरला क्षेत्र में विद्रोहियों पर क्रूरतापूर्वक हमला किया।13 मार्चजगदलपुर• गिरफ्तार आदिवासियों पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ&nbsp;युद्ध का आरोप&nbsp;लगाकर सुनवाई शुरू की गई, जो&nbsp;28 अप्रैल 1910 तक&nbsp;चली।25 मार्चबस्तर• आधी रात में,&nbsp;गुण्डाधूर&nbsp;ने अपने 600 माड़िया सैन्य दल के साथ&nbsp;गेयर&nbsp;की सेना पर आक्रमण कर दिया।26 मार्चअलनार• रात में गेयर ने गुण्डाधूर के मित्र और विश्वासपात्र&nbsp;सोनू मांझी&nbsp;को अपनी ओर मिला लिया। सोनू मांझी ने विद्रोहियों को खूब शराब पिलाई और फिर गेयर ने नशे में धुत विद्रोहियों पर हमला कर दिया, जिससे कई लोग मारे गए। हालांकि, इस हमले में भी&nbsp;गुण्डाधूर वहां से बच निकलने में सफल रहे।1916एलिचपुर• भूमकाल विद्रोह के 6 साल बाद,&nbsp;1916 में&nbsp;नागपुर से 175 मील दूर एलिचपुर में निर्वासन के दौरान&nbsp;लाल कालिन्द्र&nbsp;की मृत्यु हो गई। 📜 परिणाम (Result) यह ऐतिहासिक विद्रोह&nbsp;1 फरवरी 1910 से 29 मार्च 1910 तक&nbsp;सक्रिय रूप से चला। इस विद्रोह ने बस्तर में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिलाकर रख दिया। विद्रोह के परिणामस्वरूप, ब्रिटिश हुकूमत को बस्तर के दीवान&nbsp;बैजनाथ पंडा&nbsp;को पद से हटाना पड़ा और उनके स्थान पर&nbsp;कैप्टन जेम्स&nbsp;को नया दीवान नियुक्त किया गया। 🤔 असफलता के कारण (Reasons for Failure) विद्रोह की असफलता का मुख्य कारण&nbsp;काकतीय वंश के राजा रूद्रप्रतापदेव&nbsp;और&nbsp;कांकेर के राजा कोमलदेव&nbsp;द्वारा विद्रोहियों का समर्थन न करना था। यदि इन शासकों ने भूमकाल विद्रोह में आदिवासियों का साथ दिया होता, तो यह क्रांति संभवतः सफल होती और अंग्रेजों को बस्तर छोड़ना पड़ सकता था। 🌾 भूमकाल से जुड़े प्रमुख परगने और उनके नेता क्षेत्रविद्रोही नेता का नामक्षेत्रविद्रोही नेता का नाम1. अंतागढ़आयतु महरा2. कोण्डागांवभागी3. दंतेवाड़ाडिंडा एवं कराटी मासा4. बीजापुररामनाथ सिंह5. सुकमाबोडकीबोरी तथा दनिया6. कोंटाधनीराम हल्बा7. इन्द्रावती घाटीरोड़ापेदा8. जगदलपुरसीताराम महरा9. बस्तरजोगी10. बारसूरकोरियामांझी एवं जकरापेदा 📜 ताम्रपत्रों एवं अभिलेखों की जानकारी वंशशासकअभिलेख / ताम्रपत्रमहत्वपूर्ण जानकारीमौर्यअशोकजोगीमारा•&nbsp;भाषा: पाली,&nbsp;लिपि: ब्राम्ही।सातवाहन1. वरदत्तश्रीगुंजी चट्टान लेख• वरदत्तश्री ने अपनी आयु वृद्धि के लिए ब्राह्मणों को&nbsp;1000 गायें दान&nbsp;में दी थीं।2. वशिष्ठीपुत्र पुडुमावीमल्हार, विक्रमपुर अभिलेख• इसमें &#8216;वतासक&#8217; के अमात्य&nbsp;बुनुगोनु नाग&nbsp;और नन्हें कुमार पुडुमावी का उल्लेख है।3. इसिनागमल्हार स्मृति लेख• —4. अन्यकिरारी काष्ठ स्तंभ लेख• सातवाहनकालीन&nbsp;कर्मचारियों के पदनाम&nbsp;का उल्लेख मिलता है।वाकाटक1. प्रभावती गुप्तपूना अभिलेख• यह वाकाटकों की जानकारी का प्रमुख स्रोत है और वाकाटकों के&nbsp;गुप्तों के अधीन&nbsp;होने के प्रमाण देता है।2. नरेन्द्रसेनबालाघाट लेख• इसमें नरेन्द्रसेन द्वारा&nbsp;कोसल, मालवा, और मैकल&nbsp;पर अधिकार स्थापित करने का उल्लेख है।3. हरिसेनअजंता अभिलेख• इसमें वाकाटकों के कोसल क्षेत्र में शासन और उनकी वंशावली की जानकारी दी गई है।गुप्तवंश1. समुद्रगुप्तप्रयाग प्रशस्ति• दक्षिणापथ अभियान के दौरान समुद्रगुप्त ने कोसल के वाकाटक राजा&nbsp;महेन्द्रसेन&nbsp;और महाकान्तार के नलवंशीय शासक&nbsp;व्याघ्रराज&nbsp;को पराजित किया था।2. भानुगुप्तएरण अभिलेख• इसमें शरभपुरीयवंशीय&nbsp;शरभराज&nbsp;का वर्णन भानुगुप्त के सामंत&nbsp;गोपराज के नाना&nbsp;के रूप में किया गया है।राजर्षितुल्यवंश1. भीमसेन-IIआरंग ताम्रपत्र• इससे इस वंश की वंशावली की जानकारी मिलती है। • इसमें भीमसेन-II द्वारा&nbsp;हरिस्वामी&nbsp;और&nbsp;बप्पस्वामी&nbsp;को दोण्डा में स्थित&nbsp;भट्टपल्ली नामक गाँव दान&nbsp;देने का उल्लेख है।पर्वतद्वारक वंश1. तुष्टिकरतेरासिंघा ताम्रपत्र•&nbsp;देवभोग&nbsp;को दान में देने का उल्लेख है। • इनकी राजधानी&nbsp;तारंभक&nbsp;की जानकारी मिलती है।शरभपुरीय वंश1. नरेन्द्रपीपरदुला, कुरूद ताम्रपत्र•&nbsp;पीपरदुला: भोगपति राहुदेव द्वारा नंदपुर में शर्कराप्रद नामक ग्राम दान में देने का उल्लेख है।&nbsp;[CG Vyapam(HELT)2024]&nbsp;•&nbsp;कुरूद: परम भट्टारक द्वारा भाश्रुतस्वामी नामक ब्राह्मण को केशवक नामक ग्राम दान देने का उल्लेख है।2. जयराजमल्हार/रांवा, आरंग, मल्हार ताम्रपत्र•&nbsp;आरंग ताम्रपत्र: शासन के 5वें वर्ष में जारी किया गया। •&nbsp;मल्हार ताम्रपत्र: शासन के 5वें और 9वें वर्ष में जारी किया गया।3. सुदेवराजकौआताल, धमतरी, मल्हार ताम्रपत्र• कौआताल ताम्रपत्र से&nbsp;जयराज&nbsp;का नाम &#8216;दुर्गराज&#8217; के रूप में पहली बार उल्लेखित हुआ है। इसमें&nbsp;इंद्रबल&nbsp;का उल्लेख दूतक/सर्वाधिकारीकर्ता के रूप में है। • धमतरी और मल्हार ताम्रपत्रों में&nbsp;इन्द्रबलराज&nbsp;का पुनः उल्लेख है।4. व्याघ्रराज—• इस वंश के एक और नाम&nbsp;&#8216;अमरार्यकुल&#8217;&nbsp;का पता चलता है।5. प्रवरराज-Iठाकुरदिया, मल्हार• —शैलवंशजयवर्द्धनराघोली ताम्रपत्र• इस वंश की वंशावली की जानकारी मिलती है। •&nbsp;श्रीवर्द्धन&nbsp;द्वारा एक&nbsp;सूर्य मंदिर&nbsp;का निर्माण करवाए जाने का उल्लेख है।नलवंश1. भवदत्तवर्मनऋद्धिपुर ताम्रपत्र• सत्ता प्राप्ति के बाद भवदत्तवर्मन ने वाकाटक शासक&nbsp;नरेन्द्रसेन&nbsp;पर आक्रमण कर नंदीवर्द्धन को तहस-नहस कर दिया था।2. अर्थपतिभट्टारककेसरीबेड़ा&nbsp;[CG PSC(TSI)2024]• वाकाटक शासक&nbsp;पृथ्वीसेन-II&nbsp;ने अर्थपति भट्टारक को पराजित कर पुष्करी को नष्ट कर दिया था।3. स्कंदवर्मनपोड़ागढ़• इसमें &#8216;विजयी था, विजयी है, विजयी रहेगा&#8217; पंक्ति का उल्लेख है।4. स्तंभराजकुलिया• वेंगी के चालुक्य शासक&nbsp;कीर्तिवर्मन-I&nbsp;ने नलवंश पर आक्रमण किया था।5. विलासतुंगराजिम अभिलेख• यह अभिलेख विलासतुंग के पिता और पितामह की जानकारी देता है और&nbsp;छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास&nbsp;का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।6. भीमसेन देवगुंजाम, पड़ियापाथर• —सिरपुर का पाण्डुवंश1. उदयनकालिंजर• कालिंजर में&nbsp;भद्रेश्वर शिव मंदिर&nbsp;के निर्माण का उल्लेख है।2. इंद्रबलखरौद, मलगा, कौआताल[CG Vyapam(HELT)2024]3. भवदेव रणकेसरीभांदक शिलालेख• —4. महाशिव तीवरदेवराजिम, बालोद, बोडा ताम्रपत्र[CG Vyapam(HELT)2024]5. नंन्नराज द्वितीयअड़भार ताम्रपत्र[CG Vyapam(HELT)2024]6. महाशिवगुप्त बालार्जुनसिरपुर, जुनवानी अभिलेख•&nbsp;सिरपुर शिलालेख: इसमें&nbsp;सिरपुर में एक विष्णु मंदिर&nbsp;बनाने का उल्लेख है। इसके प्रशस्ति कवि&nbsp;ईशान (चिंतातुरांग)&nbsp;थे। •&nbsp;जुनवानी अभिलेख: इससे पता चलता है कि वे शैव धर्म की&nbsp;सोम सिद्धांत शाखा&nbsp;के अनुयायी थे। वंशशासकअभिलेख / ताम्रपत्रमहत्वपूर्ण जानकारीमैकल का सोमवंश1. सूरबलसेनकपाट, बोंदा, मल्हार, बम्हनी ताम्रपत्र•&nbsp;बोंदा: मकर संक्रांति पर ग्राम दान का उल्लेख है। सूरबल का नाम &#8216;उदीर्णवैर्य&#8217; वर्णित है। •&nbsp;मल्हार: सूरबल द्वारा जयेश्वर भट्टारक (शिव मंदिर) के लिए संगम ग्राम दान में देने का उल्लेख है।कलिंग का सोमवंश1. महाभवगुप्त-I जनमेजयमुरसीमा, आराम, सुवर्णपुर ताम्रपत्र• —2. महाशिवगुप्त-I ययातिमारमंजुर, पटना अभिलेख•&nbsp;पटना अभिलेख: विनीतपुर का नामकरण&nbsp;ययातिनगर&nbsp;रखने का उल्लेख है।3. महाशिवगुप्त-II धर्मरथमहुलपारा अभिलेख• धर्मरथ के विजय अभियानों का वर्णन है।4. इन्द्ररथबानपुर अभिलेख• चोल शासक&nbsp;राजेन्द्र प्रथम&nbsp;द्वारा ययातिनगर पर आक्रमण का उल्लेख है।5. कर्णकेसरीरत्नागिरी अभिलेख• —कांकेर का सोमवंश1. कर्णराजसिहावा ताम्रपत्र• देवहद में 5 मंदिरों के निर्माण का उल्लेख और छठवें मंदिर का निर्माण पत्नी भोपल्ला देवी के नाम से करवाने का वर्णन है।2. पंपराजतहनकापार ताम्रपत्र• ब्राह्मण लक्ष्मीधर को जैपरा एवं चिखली ग्राम दान में देने का उल्लेख है।3. भानुदेवकांकेर अभिलेख• इस वंश की वंशावली की जानकारी मिलती है। • नायक वासुदेव द्वारा मंदिर, भवन और तालाब निर्माण का उल्लेख है। 📜 मध्यकालीन इतिहास से संबंधित अभिलेख वंशशासकअभिलेख / ताम्रपत्रमहत्वपूर्ण जानकारीबाणवंशविक्रमादित्यपाली अभिलेख• पाली में&nbsp;प्रस्तर शिव मंदिर&nbsp;के निर्माण का उल्लेख है।कल्चुरी वंशपृथ्वीदेव-I1. अमोदा, 2. रायपुर, 3. लाफागढ़, 4. भाटापारा ताम्रपत्र•&nbsp;अमोदा ताम्रपत्र: इसमें उन्हें&nbsp;21000 ग्रामों का स्वामी&nbsp;कहा गया है। •&nbsp;रायपुर ताम्रपत्र: इसमें&nbsp;सकलकोसलाधिपति उपाधि&nbsp;का उल्लेख है।जाजल्यदेव-Iरतनपुर शिलालेख, पाली लेख•&nbsp;रतनपुर: रतनपुर कल्चुरी की प्रारंभिक जानकारी का स्रोत है। •&nbsp;पाली लेख: पाली के शिव मंदिर का&nbsp;जीर्णोद्धार&nbsp;करवाने का उल्लेख है।रत्नदेव-IIशिवरीनारायण, अकलतरा आदि•&nbsp;शिवरीनारायण: इससे कल्चुरी शासकों की वंशावली प्राप्त होती है और&nbsp;जाजल्यदेव-I की विजयों&nbsp;की जानकारी मिलती है।पृथ्वीदेव-IIबादल महल, राजिम, कोनी अभिलेख•&nbsp;राजिम: सामंत जगपाल द्वारा&nbsp;राजीव लोचन मंदिर का जीर्णोद्धार&nbsp;करवाने का उल्लेख है।जाजल्यदेव-IIशिवरीनारायण, मल्हार, अमोदा•&nbsp;मल्हार: गंगाधर के पुत्र सोमराज द्वारा&nbsp;केदारेश्वर (पातालेश्वर) मंदिर&nbsp;बनवाने का उल्लेख है।रत्नदेव-IIIखरौद, पासिद ताम्रपत्र• सेनापति गंगाधर द्वारा खरौद के&nbsp;लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार&nbsp;कराने का उल्लेख है।बाहरेन्द्र सायरतनपुर लेख, कोसगई ताम्रपत्र•&nbsp;रतनपुर:&nbsp;1495 ई. में महामाया मंदिर का जीर्णोद्धार&nbsp;करवाने का उल्लेख है।ब्रम्हदेव (रायपुर शाखा)खल्लारी, रायपुर अभिलेख•&nbsp;खल्लारी: देवपाल द्वारा&nbsp;जगन्नाथ मंदिर (नारायण मंदिर)&nbsp;बनवाने का उल्लेख है। •&nbsp;रायपुर: यह शिलालेख नागपुर संग्रहालय में स्थित है।छिंदक नागवंश1. सोमेश्वर देवकुरूसपाल अभिलेख• सोमेश्वर देव के विजय अभियानों का उल्लेख है।2. कन्हरदेवबारसूर अभिलेख•&nbsp;चन्द्रादित्य&nbsp;द्वारा चन्द्रादित्य सरोवर व चन्द्रादित्येश्वर शिव मंदिर के निर्माण का उल्लेख है।5. नरसिंह देवभैरमगढ़ अभिलेख• इस अभिलेख में नरसिंह देव को&nbsp;माणिक्य देवी का उपासक&nbsp;बताया गया है।6. हरिशचंद्रदेवटेमरा अभिलेख• छिंदक नागवंश के इतिहास का&nbsp;अंतिम ज्ञात स्रोत&nbsp;है।8. मधुरांतक देवराजपुर ताम्रपत्र•&nbsp;माणिकेश्वरी देवी मंदिर में नरबलि&nbsp;हेतु राजपुर ग्राम दान देने का उल्लेख है।फणी नागवंश1. रामचन्द्र देवमड़वा महल शिलालेख•&nbsp;मड़वा महल और मड़वा मंदिर का 1349 ई. में निर्माण&nbsp;का उल्लेख है।&nbsp;[CG Vyapam(HW)2024]काकतीय वंश1. दिक्पाल देवदंतेवाड़ा शिलालेख• यह&nbsp;छत्तीसगढ़ी भाषा मिश्रित गद्य रूप में प्रथम शिलालेख&nbsp;है। 🏰 प्रमुख किले/महल और उनके निर्माणकर्ता क्र.किला / महलनिर्माणकर्तावंश1.पांच मंजिला संघारामसद्वाह—2.गजकिलारत्नदेव प्रथमकल्चुरी3.चैतुरगढ़ (लाफागढ़)पृथ्वीदेव प्रथमकल्चुरी4.विकर्णपुर महलरत्नदेव द्वितीयकल्चुरी5.डूमर महलपृथ्वीदेव द्वितीयकल्चुरी6.कोसगई किलाबाहरेन्द्र सायकल्चुरी7.बादल महलराज सिंहकल्चुरी8.मड़वा महलरामचंद्र देवफणीनागवंश9.राजपुर किलावीर सिंहकाकतीयवंश10.कवर्धा महलराजा धर्मराज—11.गिरि विलास महल (1924)राजा जवाहर सिंह—12.कोरिया पैलेस (1924)रामानुज प्रताप सिंह देव—
