कवर्धा से लगभग 16 किमी की दूरी पर स्थित मड़वा महल मंदिर से विक्रम संवत् 1406 (अर्थात् 1349 ई.) का एक महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुआ है। इस शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि राजा रामचंद्र ने यहाँ एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया और कुछ ग्राम दान में दिए। शिलालेख में यह भी उल्लेख है कि रामचंद्र का विवाह कल्चुरी राजकुमारी अंबिका देवी से हुआ था, और इसमें फणीनागवंश के शासकों की वंशावली भी दी गई है।
| क्रम | शासक का नाम | विशेष जानकारी / प्रमाण |
|---|---|---|
| 1 | सिंहराज | कांकेर के सोमवंश के संस्थापक |
| 2 | व्याघ्रराज | — |
| 3 | बोपदेव | — |
| 4 | कर्णराज | सिहावा ताम्रपत्रलेख |
| 5 | कृष्णराज | — |
| 6 | जैतराज / जैतराम | — |
| 7 | सोमचन्द्र | — |
| 8 | भानुदेव | कांकेर शिलालेख |
| 9 | सोमराज | — |
| 10 | पंपराज | तहनाकापार ताम्रपत्र |
(मूल दस्तावेज़ में छत्तीसगढ़ में नागवंश की दो शाखाओं – कवर्धा के फणीनागवंश और बस्तर के छिंदकनागवंश का एक फ्लोचार्ट भी दर्शाया गया है।)
| शासक | अभिलेख / शिलालेख | संबंधित जानकारी |
| 1. नृपति भूषण (संस्थापक) | एर्राकोट तेलगु अभिलेख | संस्थापक, 1023 ई. में चोल राजा राजेन्द्र प्रथम के साथ बस्तर आए। |
| 2. जगदेवभूषण धारावर्ष | — | — |
| 3. मथुरांतकदेव | — | — |
| 4. सोमेश्वरदेव प्रथम | कुरूसपाल शिलालेख | [CG PSC(CMO)2019,(EAP) 2016,(ARTO)2017] |
| 5. कन्हरदेव प्रथम | बारसूर अभिलेख | [CG PSC(CMO)2019] |
| 6. जयसिंह देव प्रथम | सोनारपाल शिलालेख | [CG PSC(CMO)2019,(EAP)2016,(ARTO)2017] |
| 7. राजभूषण सोमेश्वरदेव द्वितीय | — | — |
| 8. जगदेवभूषण नरसिंहदेव | दंतेवाड़ा स्तंभ लेख | [CG PSC(ADI)2016,(EAP) 2016,(ARTO) 2017] |
| 9. कन्हरदेव द्वितीय | — | — |
| 10. हरिशचंद्रदेव (अंतिम शासक) | टेमरा सती अभिलेख | इस राजवंश के अंतिम शासक, इनका अंतिम अभिलेख मिला है। |
| स्थापत्य | निर्माणकर्ता |
| 1. चन्द्रादित्येश्वर/चन्द्रादित्य मंदिर (शिव मंदिर) | चन्द्रादित्य (धारावर्ष का सेनापति) |
| 2. चन्द्रादित्य सरोवर | चन्द्रादित्य (धारावर्ष का सेनापति) |
| 3. बत्तीसा मंदिर (भगवान शिव का जुड़वा मंदिर) | गंग महादेवी (सोमेश्वरदेव-I की रानी) |
| 4. विशाल गणेश प्रतिमा (बारसूर) | बाणासुर नामक राजा |
| 5. नारायणपाल (बस्तर) का विष्णु मंदिर | सोमेश्वर देव-I |
| 6. मामा-भांजा मंदिर (बारसूर) (गणेश व नरसिंहनाथ की प्रतिमा) | छिंदक नागवंशीय शासक |
| 7. ढोलकल गणेश प्रतिमा (दंतेवाड़ा) | छिंदक नागवंशीय शासक |
| विषय | विवरण | संबंधित पी.वाई.क्यू (PYQ) |
| 🕰️ शासनकाल | 1324-1961 ई. (बस्तर में सर्वाधिक लम्बे समय तक शासन करने वाला वंश) | [CG Vyapam (MFA) 2017] |
| 🌍 शासन क्षेत्र | बस्तर/चक्रकोट/भ्रमरकोट | [CG Vyapam (CACC) 2017, (AAF) 2016] |
| 👑 संस्थापक | छत्तीसगढ़ में: अन्नमदेव वारंगल में: गणपति | [CG PSC(Pre)2023], [CG VS (AG-3))2021] |
| 💔 अंतिम शासक | प्रवीरचंद्र भंजदेव | |
| 🏰 प्राचीन राजधानी | काकतिपुर | |
| 📍 राजधानियाँ (क्रमशः) | 1. मंधोता / मधुपुरी (अन्नमदेव) 2. चक्रकोट (पुरुषोत्तम देव) 3. बस्तर (दिकपालदेव) 4. जगदलपुर (दलपत देव) | |
| 🙏 कुल देवी | दंतेश्वरी देवी | [CG PSC(Mains)2011, (Lib.) 2014] |
| 🎤 विशेष | बस्तर के लोकगीतों में इस वंश को चालकी वंश / चालुक्य वंश के नाम से संबोधित किया गया है। |
प्र. बस्तर में काकतीय वंश के निम्नलिखित शासकों का सही क्रम निर्धारित कीजिए: [CGPSC(ADA)2020]
(i) अन्नमदेव
(ii) नरसिंहदेव
(iii) पुरुषोत्तमदेव
(iv) दलपतदेव
(B) (i), (iii), (ii), (iv)
प्र. बस्तर के काकतीय राजवंश के शासनकाल का सही क्रम है: [CGPSC(ARO)2022]
भैरवदेव → पुरुषोत्तमदेव → नरसिंह देव → प्रतापराज देव
🔍 पुरातात्विक साक्ष्य – दंतेश्वरी देवी मंदिरयह मंदिर दंतेवाड़ा में स्थित एक प्रमुख शक्तिपीठ है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ देवी सती का एक दाँत गिरा था। मंदिर की प्रधान प्रतिमा महिषासुरमर्दिनी की है, जो काले पत्थर से निर्मित है। मंदिर का निर्माण संभवतः 11-12वीं शताब्दी में छिंदक नागवंशी शासकों द्वारा करवाया गया था, और 14वीं शताब्दी में अन्नमदेव ने इसका जीर्णोद्धार कराया, जो वारंगल के प्रतापरूद्र के भाई थे। [CGPSC(ARO)2022]
प्र. छत्तीसगढ़ के इतिहास की निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए: [CGPSC(Pre)2020]
(i) हल्बा विद्रोह
(ii) परलकोट के जमींदार गेंद सिंह को फाँसी
(iii) सिपाही विद्रोह की शुरूआत
(iv) छत्तीसगढ़ में मराठों का आक्रमण
(v) मुरिया विद्रोह
(vi) रतनपुर की स्थापना
(vii) शहीद वीर नारायण सिंह को फाँसी
(उत्तर- B) घटनाओं का सही कालक्रम है: (vi) रतनपुर की स्थापना → (iv) छत्तीसगढ़ में मराठों का आक्रमण → (i) हल्बा विद्रोह → (ii) परलकोट के जमींदार गेंद सिंह को फाँसी → (vii) शहीद वीर नारायण सिंह को फाँसी → (iii) सिपाही विद्रोह की शुरूआत → (v) मुरिया विद्रोह
| वर्ष | विद्रोह | शासक | नेतृत्वकर्ता | उद्देश्य | दमनकर्ता | प्रमुख तथ्य |
| 1774 | हल्बा | अजमेर सिंह | अजमेर सिंह | उत्तराधिकार हेतु | — | • अजमेर सिंह की मृत्यु हुई। • यह विद्रोह काकतीय वंश के पतन का कारण बना। |
| 1792 | सरगुजा | अजीत सिंह | अजीत सिंह | — | — | • 1792 में अजीत सिंह शहीद हो गए। |
| 1795 | भोपालपट्टनम् | दरिया देव | स्थानीय जनता | जे.टी. ब्लंट के बस्तर आगमन के विरोध में | — | • यह कंपनी सरकार के विरुद्ध तीसरा विद्रोह था। |
| 1824-25 | परलकोट | महिपाल देव | गेंदसिंह | अबूझमाड़ियों को शोषणमुक्त कराना | पेबे (Pebey) | • 20 जनवरी 1825 को गेंदसिंह को फाँसी दी गई। • परलकोट के जमींदार की पदवी ‘भूमिया’ थी। [CG Vyapam(ESC) 2017] |
| 1842 | तारापुर | भूपालदेव | दलगंजन सिंह | कर वृद्धि के विरोध में | — | • दीवान जगबंधु की बर्खास्तगी हुई। |
| 1842 | मेरिया | भूपालदेव | हिड़मा मांझी | नरबलि प्रथा समाप्ति के विरोध में | कैम्पबेल | • दंतेश्वरी माता के मंदिर में दी जाने वाली बलि को ‘मेरिया’ कहते थे। |
| 1856 | लिंगागिरी | भैरमदेव | धुरवाराम माड़िया | बस्तर को अंग्रेजी साम्राज्य में विलय से रोकना | — | • यह विद्रोह बस्तर का महान मुक्ति संग्राम कहलाता है। • चार्ल्स इलियट ने 1856 में बस्तर का भ्रमण किया था। |
| 1859 | कोई विद्रोह | भैरमदेव | नांगुल दोरला | साल वृक्ष की कटाई के विरोध में | ग्लास्फर्ड | • नारा: “एक वृक्ष के पीछे एक सिर”। • इसे छत्तीसगढ़ का चिपको आंदोलन कहा जाता है। |
| 1876 | मुड़िया | भैरमदेव | झाड़ा सिरहा | अंग्रेजों की दमनकारी नीति के विरुद्ध | मैक जार्ज | • प्रतीक: आम वृक्ष की टहनी। • मुड़िया जनजाति ने प्रमुख भूमिका निभाई। |
| 1910 | भूमकाल | रूद्रप्रतापदेव | गुण्डाधुर | बहुआयामी कारण | कै. गेयर | • प्रतीक: लाल मिर्च एवं आम की टहनी। • लालकालेन्द्र सिंह, रानी स्वर्ण कुंवर प्रमुख थे। |
बस्तर में ‘भूमक’ या ‘भूमकाल’ का शाब्दिक अर्थ है भूमि का कांपना या भूकंप, यानी एक बड़ा उलट-पलट। यह विद्रोह इस क्षेत्र के निवासियों के लिए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समान था। इसके कई बहुआयामी कारण थे, जो इस प्रकार हैं:
| दिनांक | स्थान | प्रमुख घटनाएँ |
| अक्टूबर 1909 | ताड़ोकी | • दशहरे के दिन, राजमाता स्वर्ण कुंवर ने लाल कालेन्द्र सिंह की उपस्थिति में आदिवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित किया। [CG PSC(Pre)2022] • वीर गुंडाधुर को 1910 की क्रांति का नेता चुना गया और एक गुप्त योजना बनाई गई। |
| जनवरी 1910 | ताड़ोकी | • एक गुप्त सम्मेलन में, क्रांतिकारियों ने लाल कालिन्द्र सिंह के समक्ष बस्तर की अस्मिता के लिए अपने जीवन और धन का बलिदान करने की शपथ ली। |
| 1 फरवरी | गीदम | • आदिवासी विद्रोहियों ने दीवान पण्डा बैजनाथ और राजगुरू को घेरने के लिए कई स्थानों पर आक्रमण किया। |
| 2 फरवरी | पुसपाल | • विद्रोहियों ने पुसपाल बाजार लूटकर विद्रोह की विधिवत शुरुआत की। • इसी दिन यहाँ के पाठशालाओं की झोपड़ियों में आग लगा दी गई। |
| 3 फरवरी | चिंगपाल | • लाल कालेन्द्र ने बस्तर की जनता से ब्रिटिश सरकार पर आक्रमण करने, पुलिस थाना और वन विभाग के कार्यालयों को जलाने और बाहरी लोगों (परदेशियों) को मारकर भगाने का आह्वान किया। |
| 4 फरवरी | कुकानार | • नूरसब खां नामक व्यापारी की हत्या कर दी गई और पुलिस चौकी को जला दिया गया। |
| 5 फरवरी | करंजी | • विद्रोहियों द्वारा करंजी बाजार लूटा गया, जो कुंवर बहादुर सिंह के अधिकार में था। |
| 6 फरवरी | बस्तर | • विद्रोहियों ने भूमकाल विद्रोह के लिए 6 फरवरी का दिन निश्चित किया था, और इस दिन खुले तौर पर विद्रोह का बिगुल बज गया। |
| 7 फरवरी | गीदम | • विद्रोह के आगाज के बाद गीदम में गुप्त सभा हुई, जहाँ महारानी सुबरन कुंवर ने आदिवासियों को संबोधित करते हुए मुरियाराज की स्थापना का संकल्प लेने को कहा। [CG PSC(Pre)2022] • गीदम पर कब्जा करने के बाद, विप्लवी बारसूर की ओर बढ़ गए। |
| 8 फरवरी | कुटरू | • संचार के लिए बिछी तार की लाइनें काट दी गईं। • गुण्डाधूर ने कुटरू पर कब्जा कर वहां के जमींदार बहादुर निजाम शाह को मुरिया राज के अधीन घोषित कर दिया। |
| 9 फरवरी | कुआकोंडा | • यहां कार्यरत एक वन कर्मचारी की हत्या कर दी गई। • भैरमगढ़ में विद्रोहियों ने एक पुलिस कर्मचारी को मार डाला। |
| 10 फरवरी | मारेंगा, तोकापाल, करंजी | • क्षेत्र के स्कूलों में आग लगा दी गई। |
| 9-10 फरवरी | गुमकापाल, तोकापाल | • इस बीच रायपुर, धमतरी, बीजापुर, दंतेवाड़ा और कुटरू के डाकघरों की डाक को लूट लिया गया। |
| 12 फरवरी | केशकाल | • विद्रोह फैलने पर अंग्रेज अधिकारी गेयर और ड्यूक केशकाल में फंस गए, जहाँ विद्रोहियों ने उन्हें 4 दिनों तक घेर कर रखा। |
| 13 फरवरी | गीदम | • विद्रोहियों ने गीदम में व्यापारियों को लूटा और पाठशालाओं को आग के हवाले कर दिया। |
| 16 फरवरी | खड्गाघाट (इंद्रावती नदी तट) | • रायपुर से आई अंग्रेजी फौज से गुण्डाधूर के पांच दलों का भीषण युद्ध हुआ। • गेयर ने छल से आदिवासियों को विश्वास में लेकर (माटी किरिया कराकर) नदी पार की और फिर उन पर गोलियां चलाईं। |
| 22 फरवरी | जगदलपुर | • लाल कालिन्द्र सहित 17 विप्लवी नेताओं को गिरफ्तार कर सैन्य छावनी में पूछताछ के लिए ले जाया गया। |
| 23-24 फरवरी | जगदलपुर | • विद्रोह के दमन के लिए 200 पुलिस, 150 मद्रास प्रेसिडेंसी की पुलिस, तथा पंजाब बटालियन के 170 सैनिकों का अतिरिक्त बल जगदलपुर पहुँचा। |
| 25 फरवरी 1910 | डाफनगर / छोटे डोंगर | • वीर गुंडाधुर के नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ भीषण संघर्ष हुआ। • सुप्रीम कमांडर ‘गेयर’ ने पंजाबी सेना के बल पर विद्रोहियों का क्रूरता से दमन किया। |
| दिनांक | स्थान | प्रमुख घटनाएँ |
| 26 फरवरी | ताड़ोकी | • लाल कालिन्द्र सिंह और 15 अन्य नेताओं के घरों को लूटकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उनके घरों को जला दिया गया। |
| 28 फरवरी | बस्तर क्षेत्र | • अतिरिक्त पुलिस और सैन्य बल पूरे बस्तर की दिशाओं में फैला दिए गए, जिससे सैकड़ों की संख्या में गिरफ्तारियाँ हुईं और लोगों को राज्य से बाहर निकाल दिया गया। |
| 5 मार्च | जगदलपुर | • रानी सुवर्ण कुंवर और लाल कालेन्द्र सिंह को जगदलपुर आवास पर छापा मारकर नजरबंद कर दिया गया और उन्हें रायपुर जेल भेज दिया गया। [CG PSC(Pre)2022] |
| 6 मार्च | बस्तर क्षेत्र | • ब्रिटिश अधिकारी रैण्डाल ने परजा क्षेत्र में, सी. मिडेल्टन ने दण्डामी माड़िया क्षेत्र में, और ड्यूक ने दोरला क्षेत्र में विद्रोहियों पर क्रूरतापूर्वक हमला किया। |
| 13 मार्च | जगदलपुर | • गिरफ्तार आदिवासियों पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध का आरोप लगाकर सुनवाई शुरू की गई, जो 28 अप्रैल 1910 तक चली। |
| 25 मार्च | बस्तर | • आधी रात में, गुण्डाधूर ने अपने 600 माड़िया सैन्य दल के साथ गेयर की सेना पर आक्रमण कर दिया। |
| 26 मार्च | अलनार | • रात में गेयर ने गुण्डाधूर के मित्र और विश्वासपात्र सोनू मांझी को अपनी ओर मिला लिया। सोनू मांझी ने विद्रोहियों को खूब शराब पिलाई और फिर गेयर ने नशे में धुत विद्रोहियों पर हमला कर दिया, जिससे कई लोग मारे गए। हालांकि, इस हमले में भी गुण्डाधूर वहां से बच निकलने में सफल रहे। |
| 1916 | एलिचपुर | • भूमकाल विद्रोह के 6 साल बाद, 1916 में नागपुर से 175 मील दूर एलिचपुर में निर्वासन के दौरान लाल कालिन्द्र की मृत्यु हो गई। |
| क्षेत्र | विद्रोही नेता का नाम | क्षेत्र | विद्रोही नेता का नाम |
| 1. अंतागढ़ | आयतु महरा | 2. कोण्डागांव | भागी |
| 3. दंतेवाड़ा | डिंडा एवं कराटी मासा | 4. बीजापुर | रामनाथ सिंह |
| 5. सुकमा | बोडकीबोरी तथा दनिया | 6. कोंटा | धनीराम हल्बा |
| 7. इन्द्रावती घाटी | रोड़ापेदा | 8. जगदलपुर | सीताराम महरा |
| 9. बस्तर | जोगी | 10. बारसूर | कोरियामांझी एवं जकरापेदा |
| वंश | शासक | अभिलेख / ताम्रपत्र | महत्वपूर्ण जानकारी |
| मौर्य | अशोक | जोगीमारा | • भाषा: पाली, लिपि: ब्राम्ही। |
| सातवाहन | 1. वरदत्तश्री | गुंजी चट्टान लेख | • वरदत्तश्री ने अपनी आयु वृद्धि के लिए ब्राह्मणों को 1000 गायें दान में दी थीं। |
| 2. वशिष्ठीपुत्र पुडुमावी | मल्हार, विक्रमपुर अभिलेख | • इसमें ‘वतासक’ के अमात्य बुनुगोनु नाग और नन्हें कुमार पुडुमावी का उल्लेख है। | |
| 3. इसिनाग | मल्हार स्मृति लेख | • — | |
| 4. अन्य | किरारी काष्ठ स्तंभ लेख | • सातवाहनकालीन कर्मचारियों के पदनाम का उल्लेख मिलता है। | |
| वाकाटक | 1. प्रभावती गुप्त | पूना अभिलेख | • यह वाकाटकों की जानकारी का प्रमुख स्रोत है और वाकाटकों के गुप्तों के अधीन होने के प्रमाण देता है। |
| 2. नरेन्द्रसेन | बालाघाट लेख | • इसमें नरेन्द्रसेन द्वारा कोसल, मालवा, और मैकल पर अधिकार स्थापित करने का उल्लेख है। | |
| 3. हरिसेन | अजंता अभिलेख | • इसमें वाकाटकों के कोसल क्षेत्र में शासन और उनकी वंशावली की जानकारी दी गई है। | |
| गुप्तवंश | 1. समुद्रगुप्त | प्रयाग प्रशस्ति | • दक्षिणापथ अभियान के दौरान समुद्रगुप्त ने कोसल के वाकाटक राजा महेन्द्रसेन और महाकान्तार के नलवंशीय शासक व्याघ्रराज को पराजित किया था। |
| 2. भानुगुप्त | एरण अभिलेख | • इसमें शरभपुरीयवंशीय शरभराज का वर्णन भानुगुप्त के सामंत गोपराज के नाना के रूप में किया गया है। | |
| राजर्षितुल्यवंश | 1. भीमसेन-II | आरंग ताम्रपत्र | • इससे इस वंश की वंशावली की जानकारी मिलती है। • इसमें भीमसेन-II द्वारा हरिस्वामी और बप्पस्वामी को दोण्डा में स्थित भट्टपल्ली नामक गाँव दान देने का उल्लेख है। |
| पर्वतद्वारक वंश | 1. तुष्टिकर | तेरासिंघा ताम्रपत्र | • देवभोग को दान में देने का उल्लेख है। • इनकी राजधानी तारंभक की जानकारी मिलती है। |
| शरभपुरीय वंश | 1. नरेन्द्र | पीपरदुला, कुरूद ताम्रपत्र | • पीपरदुला: भोगपति राहुदेव द्वारा नंदपुर में शर्कराप्रद नामक ग्राम दान में देने का उल्लेख है। [CG Vyapam(HELT)2024] • कुरूद: परम भट्टारक द्वारा भाश्रुतस्वामी नामक ब्राह्मण को केशवक नामक ग्राम दान देने का उल्लेख है। |
| 2. जयराज | मल्हार/रांवा, आरंग, मल्हार ताम्रपत्र | • आरंग ताम्रपत्र: शासन के 5वें वर्ष में जारी किया गया। • मल्हार ताम्रपत्र: शासन के 5वें और 9वें वर्ष में जारी किया गया। | |
| 3. सुदेवराज | कौआताल, धमतरी, मल्हार ताम्रपत्र | • कौआताल ताम्रपत्र से जयराज का नाम ‘दुर्गराज’ के रूप में पहली बार उल्लेखित हुआ है। इसमें इंद्रबल का उल्लेख दूतक/सर्वाधिकारीकर्ता के रूप में है। • धमतरी और मल्हार ताम्रपत्रों में इन्द्रबलराज का पुनः उल्लेख है। | |
| 4. व्याघ्रराज | — | • इस वंश के एक और नाम ‘अमरार्यकुल’ का पता चलता है। | |
| 5. प्रवरराज-I | ठाकुरदिया, मल्हार | • — | |
| शैलवंश | जयवर्द्धन | राघोली ताम्रपत्र | • इस वंश की वंशावली की जानकारी मिलती है। • श्रीवर्द्धन द्वारा एक सूर्य मंदिर का निर्माण करवाए जाने का उल्लेख है। |
| नलवंश | 1. भवदत्तवर्मन | ऋद्धिपुर ताम्रपत्र | • सत्ता प्राप्ति के बाद भवदत्तवर्मन ने वाकाटक शासक नरेन्द्रसेन पर आक्रमण कर नंदीवर्द्धन को तहस-नहस कर दिया था। |
| 2. अर्थपतिभट्टारक | केसरीबेड़ा [CG PSC(TSI)2024] | • वाकाटक शासक पृथ्वीसेन-II ने अर्थपति भट्टारक को पराजित कर पुष्करी को नष्ट कर दिया था। | |
| 3. स्कंदवर्मन | पोड़ागढ़ | • इसमें ‘विजयी था, विजयी है, विजयी रहेगा’ पंक्ति का उल्लेख है। | |
| 4. स्तंभराज | कुलिया | • वेंगी के चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन-I ने नलवंश पर आक्रमण किया था। | |
| 5. विलासतुंग | राजिम अभिलेख | • यह अभिलेख विलासतुंग के पिता और पितामह की जानकारी देता है और छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। | |
| 6. भीमसेन देव | गुंजाम, पड़ियापाथर | • — | |
| सिरपुर का पाण्डुवंश | 1. उदयन | कालिंजर | • कालिंजर में भद्रेश्वर शिव मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। |
| 2. इंद्रबल | खरौद, मलगा, कौआताल | [CG Vyapam(HELT)2024] | |
| 3. भवदेव रणकेसरी | भांदक शिलालेख | • — | |
| 4. महाशिव तीवरदेव | राजिम, बालोद, बोडा ताम्रपत्र | [CG Vyapam(HELT)2024] | |
| 5. नंन्नराज द्वितीय | अड़भार ताम्रपत्र | [CG Vyapam(HELT)2024] | |
| 6. महाशिवगुप्त बालार्जुन | सिरपुर, जुनवानी अभिलेख | • सिरपुर शिलालेख: इसमें सिरपुर में एक विष्णु मंदिर बनाने का उल्लेख है। इसके प्रशस्ति कवि ईशान (चिंतातुरांग) थे। • जुनवानी अभिलेख: इससे पता चलता है कि वे शैव धर्म की सोम सिद्धांत शाखा के अनुयायी थे। |
| वंश | शासक | अभिलेख / ताम्रपत्र | महत्वपूर्ण जानकारी |
| मैकल का सोमवंश | 1. सूरबल | सेनकपाट, बोंदा, मल्हार, बम्हनी ताम्रपत्र | • बोंदा: मकर संक्रांति पर ग्राम दान का उल्लेख है। सूरबल का नाम ‘उदीर्णवैर्य’ वर्णित है। • मल्हार: सूरबल द्वारा जयेश्वर भट्टारक (शिव मंदिर) के लिए संगम ग्राम दान में देने का उल्लेख है। |
| कलिंग का सोमवंश | 1. महाभवगुप्त-I जनमेजय | मुरसीमा, आराम, सुवर्णपुर ताम्रपत्र | • — |
| 2. महाशिवगुप्त-I ययाति | मारमंजुर, पटना अभिलेख | • पटना अभिलेख: विनीतपुर का नामकरण ययातिनगर रखने का उल्लेख है। | |
| 3. महाशिवगुप्त-II धर्मरथ | महुलपारा अभिलेख | • धर्मरथ के विजय अभियानों का वर्णन है। | |
| 4. इन्द्ररथ | बानपुर अभिलेख | • चोल शासक राजेन्द्र प्रथम द्वारा ययातिनगर पर आक्रमण का उल्लेख है। | |
| 5. कर्णकेसरी | रत्नागिरी अभिलेख | • — | |
| कांकेर का सोमवंश | 1. कर्णराज | सिहावा ताम्रपत्र | • देवहद में 5 मंदिरों के निर्माण का उल्लेख और छठवें मंदिर का निर्माण पत्नी भोपल्ला देवी के नाम से करवाने का वर्णन है। |
| 2. पंपराज | तहनकापार ताम्रपत्र | • ब्राह्मण लक्ष्मीधर को जैपरा एवं चिखली ग्राम दान में देने का उल्लेख है। | |
| 3. भानुदेव | कांकेर अभिलेख | • इस वंश की वंशावली की जानकारी मिलती है। • नायक वासुदेव द्वारा मंदिर, भवन और तालाब निर्माण का उल्लेख है। |
| वंश | शासक | अभिलेख / ताम्रपत्र | महत्वपूर्ण जानकारी |
| बाणवंश | विक्रमादित्य | पाली अभिलेख | • पाली में प्रस्तर शिव मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। |
| कल्चुरी वंश | पृथ्वीदेव-I | 1. अमोदा, 2. रायपुर, 3. लाफागढ़, 4. भाटापारा ताम्रपत्र | • अमोदा ताम्रपत्र: इसमें उन्हें 21000 ग्रामों का स्वामी कहा गया है। • रायपुर ताम्रपत्र: इसमें सकलकोसलाधिपति उपाधि का उल्लेख है। |
| जाजल्यदेव-I | रतनपुर शिलालेख, पाली लेख | • रतनपुर: रतनपुर कल्चुरी की प्रारंभिक जानकारी का स्रोत है। • पाली लेख: पाली के शिव मंदिर का जीर्णोद्धार करवाने का उल्लेख है। | |
| रत्नदेव-II | शिवरीनारायण, अकलतरा आदि | • शिवरीनारायण: इससे कल्चुरी शासकों की वंशावली प्राप्त होती है और जाजल्यदेव-I की विजयों की जानकारी मिलती है। | |
| पृथ्वीदेव-II | बादल महल, राजिम, कोनी अभिलेख | • राजिम: सामंत जगपाल द्वारा राजीव लोचन मंदिर का जीर्णोद्धार करवाने का उल्लेख है। | |
| जाजल्यदेव-II | शिवरीनारायण, मल्हार, अमोदा | • मल्हार: गंगाधर के पुत्र सोमराज द्वारा केदारेश्वर (पातालेश्वर) मंदिर बनवाने का उल्लेख है। | |
| रत्नदेव-III | खरौद, पासिद ताम्रपत्र | • सेनापति गंगाधर द्वारा खरौद के लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराने का उल्लेख है। | |
| बाहरेन्द्र साय | रतनपुर लेख, कोसगई ताम्रपत्र | • रतनपुर: 1495 ई. में महामाया मंदिर का जीर्णोद्धार करवाने का उल्लेख है। | |
| ब्रम्हदेव (रायपुर शाखा) | खल्लारी, रायपुर अभिलेख | • खल्लारी: देवपाल द्वारा जगन्नाथ मंदिर (नारायण मंदिर) बनवाने का उल्लेख है। • रायपुर: यह शिलालेख नागपुर संग्रहालय में स्थित है। | |
| छिंदक नागवंश | 1. सोमेश्वर देव | कुरूसपाल अभिलेख | • सोमेश्वर देव के विजय अभियानों का उल्लेख है। |
| 2. कन्हरदेव | बारसूर अभिलेख | • चन्द्रादित्य द्वारा चन्द्रादित्य सरोवर व चन्द्रादित्येश्वर शिव मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। | |
| 5. नरसिंह देव | भैरमगढ़ अभिलेख | • इस अभिलेख में नरसिंह देव को माणिक्य देवी का उपासक बताया गया है। | |
| 6. हरिशचंद्रदेव | टेमरा अभिलेख | • छिंदक नागवंश के इतिहास का अंतिम ज्ञात स्रोत है। | |
| 8. मधुरांतक देव | राजपुर ताम्रपत्र | • माणिकेश्वरी देवी मंदिर में नरबलि हेतु राजपुर ग्राम दान देने का उल्लेख है। | |
| फणी नागवंश | 1. रामचन्द्र देव | मड़वा महल शिलालेख | • मड़वा महल और मड़वा मंदिर का 1349 ई. में निर्माण का उल्लेख है। [CG Vyapam(HW)2024] |
| काकतीय वंश | 1. दिक्पाल देव | दंतेवाड़ा शिलालेख | • यह छत्तीसगढ़ी भाषा मिश्रित गद्य रूप में प्रथम शिलालेख है। |
| क्र. | किला / महल | निर्माणकर्ता | वंश |
| 1. | पांच मंजिला संघाराम | सद्वाह | — |
| 2. | गजकिला | रत्नदेव प्रथम | कल्चुरी |
| 3. | चैतुरगढ़ (लाफागढ़) | पृथ्वीदेव प्रथम | कल्चुरी |
| 4. | विकर्णपुर महल | रत्नदेव द्वितीय | कल्चुरी |
| 5. | डूमर महल | पृथ्वीदेव द्वितीय | कल्चुरी |
| 6. | कोसगई किला | बाहरेन्द्र साय | कल्चुरी |
| 7. | बादल महल | राज सिंह | कल्चुरी |
| 8. | मड़वा महल | रामचंद्र देव | फणीनागवंश |
| 9. | राजपुर किला | वीर सिंह | काकतीयवंश |
| 10. | कवर्धा महल | राजा धर्मराज | — |
| 11. | गिरि विलास महल (1924) | राजा जवाहर सिंह | — |
| 12. | कोरिया पैलेस (1924) | रामानुज प्रताप सिंह देव | — |