छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास: भाग -2

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 छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास: भाग -1

🐍 कवर्धा के फणीनागवंश (Phaninaagvansh of Kawardha)


🔑 मुख्य तथ्य


कवर्धा से लगभग 16 किमी की दूरी पर स्थित मड़वा महल मंदिर से विक्रम संवत् 1406 (अर्थात् 1349 ई.) का एक महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुआ है। इस शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि राजा रामचंद्र ने यहाँ एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया और कुछ ग्राम दान में दिए। शिलालेख में यह भी उल्लेख है कि रामचंद्र का विवाह कल्चुरी राजकुमारी अंबिका देवी से हुआ था, और इसमें फणीनागवंश के शासकों की वंशावली भी दी गई है।


  1. अहिराज: इन्हें इस वंश का संस्थापक माना जाता है और परंपरा के अनुसार ये पहले राजा थे।
  2. राजल्ल
  3. धरणीधर
  4. महिमदेव
  5. सर्ववंदन (शक्तिचंद्र)
  6. गोपालदेव: मड़वा महल अभिलेख में वर्णित 6वें राजा गोपालदेव से इनका संबंध स्थापित किया गया है। पुजारीपाली शिलालेख में इन्हें देवी के अनेक रूपों का उपासक बताया गया है। इनकी कीर्ति श्रीकेदार, प्रयाग, पुष्कर, वाराणसी जैसे कई स्थानों तक फैली थी। इन्होंने गोपालपुर नामक नगर बसाया और रतनपुर के कल्चुरी राजा पृथ्वीदेव प्रथम के अधीन शासन किया। इनके उत्तराधिकारी नलदेव थे और इन्होंने भोरमदेव मंदिर का निर्माण कराया।
  7. नलदेव
  8. भुवनपालदेव
  9. कीर्तिपाल (इनके कोई पुत्र न होने के कारण इनके भाई जयत्रपाल ने राजगद्दी संभाली)
  10. जयत्रपाल (कीर्तिपाल के भाई)
  11. महिपाल
  12. विषमपाल
  13. जन्हु
  14. जनपाल या विजनपाल
  15. यशोराज: ये जनपाल के पुत्र थे और इनके 1150 ई. और 1182 ई. के अभिलेख मिले हैं। ये ‘महाराणक’ थे।
  16. कन्नड़ देव या वल्लभदेव/चंदन
  17. लक्ष्मी वर्मा/लक्ष्मा वर्मा
  18. खाङ्गदेव
  19. भुवनैकमल्ल
  20. अर्जुन
  21. भीम
  22. भोज
  23. लक्ष्मणदेव (भोज की मृत्यु के बाद चंदन के प्रपौत्र लक्ष्मण राजा बने)
  24. रामचन्द्र देव:
  25. मोनिंगदेव:



🌙 कांकेर के सोम वंश (Somvansh of Kanker)





  1. कांकेर शाखा:
  2. सिहावा शाखा:
  3. बस्तर शाखा:

(मूल दस्तावेज़ में छत्तीसगढ़ में नागवंश की दो शाखाओं – कवर्धा के फणीनागवंश और बस्तर के छिंदकनागवंश का एक फ्लोचार्ट भी दर्शाया गया है।)


✨ तेलुगू-चोड़वंश एवं बस्तर का गंग युग


🐍 बस्तर का छिंदक नागवंश


📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि



नृपति भूषण

जगदेव भूषण धारावर्ष (1042 से 1060 ई. तक)

मधुरान्तक देव

सोमेश्वरदेव प्रथम (1069 से 1111 ई. तक)


⚔️ सोमेश्वरदेव प्रथम का विजय अभियान

  1. उड्र विजय: इन्होंने ओडिशा के सोमवंशी शासक उद्योत केसरी (महाभव गुप्त चतुर्थ) को पराजित किया।
  2. वेंगी विजय: इन्होंने वेंगी (गोदावरी-कृष्णा नदी के बीच का क्षेत्र) के नरेश वीरचोड को हराया।
  3. लेम्णा विजय: इनकी पहचान रायबहादुर हीरालाल ने छत्तीसगढ़ के लवन (बलौदाबाजार) से की है।
  4. लांजी विजय: इन्होंने बालाघाट स्थित लांजी पर विजय प्राप्त की, जहाँ त्रिपुरी के कल्चुरी नरेश यश कर्ण का शासन था।
  5. वज्र विजय: रायबहादुर हीरालाल के अनुसार, यह क्षेत्र वर्तमान बैरागढ़ (महाराष्ट्र) के अंतर्गत आता था।
  6. भद्रपत्तन विजय: यह वर्तमान भांडक नगर है।
  7. रतनपुर और कोसल विजय: इन्होंने कल्चुरी शासक पृथ्वीदेव प्रथम को पराजित किया।
  8. पराजय: बाद में, कल्चुरी शासक जाजल्यदेव प्रथम ने इन पर आक्रमण कर इन्हें मंत्रियों और रानियों सहित बंदी बना लिया, लेकिन इनकी माता गुण्ड महादेवी के अनुरोध पर इन्हें छोड़ दिया। [CGVyapam(Asst. Magn)2015]


कन्हरदेव प्रथम

जयसिंहदेव प्रथम

राजभूषण सोमेश्वरदेव द्वितीय

जगदेवभूषण नरसिंहदेव

कन्हरदेव द्वितीय

हरिशचन्द्र देव



🛡️ बस्तर के काकतीय वंश या चालुक्य वंश






📜 विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)

प्र. बस्तर में काकतीय वंश के निम्नलिखित शासकों का सही क्रम निर्धारित कीजिए: [CGPSC(ADA)2020]
(i) अन्नमदेव
(ii) नरसिंहदेव
(iii) पुरुषोत्तमदेव
(iv) दलपतदेव

(B) (i), (iii), (ii), (iv)

प्र. बस्तर के काकतीय राजवंश के शासनकाल का सही क्रम है: [CGPSC(ARO)2022]
भैरवदेव → पुरुषोत्तमदेव → नरसिंह देव → प्रतापराज देव



🔍 पुरातात्विक साक्ष्य – दंतेश्वरी देवी मंदिरयह मंदिर दंतेवाड़ा में स्थित एक प्रमुख शक्तिपीठ है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ देवी सती का एक दाँत गिरा था। मंदिर की प्रधान प्रतिमा महिषासुरमर्दिनी की है, जो काले पत्थर से निर्मित है। मंदिर का निर्माण संभवतः 11-12वीं शताब्दी में छिंदक नागवंशी शासकों द्वारा करवाया गया था, और 14वीं शताब्दी में अन्नमदेव ने इसका जीर्णोद्धार कराया, जो वारंगल के प्रतापरूद्र के भाई थे। [CGPSC(ARO)2022]





















📜 विगत वर्षों का प्रश्न (PYQ)

प्र. छत्तीसगढ़ के इतिहास की निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए: [CGPSC(Pre)2020]
(i) हल्बा विद्रोह
(ii) परलकोट के जमींदार गेंद सिंह को फाँसी
(iii) सिपाही विद्रोह की शुरूआत
(iv) छत्तीसगढ़ में मराठों का आक्रमण
(v) मुरिया विद्रोह
(vi) रतनपुर की स्थापना
(vii) शहीद वीर नारायण सिंह को फाँसी

(उत्तर- B) घटनाओं का सही कालक्रम है: (vi) रतनपुर की स्थापना → (iv) छत्तीसगढ़ में मराठों का आक्रमण → (i) हल्बा विद्रोह → (ii) परलकोट के जमींदार गेंद सिंह को फाँसी → (vii) शहीद वीर नारायण सिंह को फाँसी → (iii) सिपाही विद्रोह की शुरूआत → (v) मुरिया विद्रोह


🏹 प्रमुख जनजातीय विद्रोह (Major Tribal Revolts)



** विद्रोहों की सारणी**








** विद्रोह के कारण**

बस्तर में ‘भूमक’ या ‘भूमकाल’ का शाब्दिक अर्थ है भूमि का कांपना या भूकंप, यानी एक बड़ा उलट-पलट। यह विद्रोह इस क्षेत्र के निवासियों के लिए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समान था। इसके कई बहुआयामी कारण थे, जो इस प्रकार हैं:

  1. राजनीतिक कारण: ब्रिटिश सरकार द्वारा राजा रूद्रप्रतापदेव के हाथों से वास्तविक सत्ता छीन लेना और गैर-काकतीय वंश के व्यक्ति (दीवान) की नियुक्ति करना।
  2. प्रशासनिक कारण: लाल कालेन्द्र सिंह और राजमाता स्वर्णकुंवर देवी की उपेक्षा तथा स्थानीय प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और शोषणकारी नीतियां।
  3. आर्थिक कारण:
  4. वन नीति: नए वन कानूनों के तहत आदिवासियों को उनके पारंपरिक वन अधिकारों से वंचित करना।
  5. राजस्व नीति: लगान (Tax) में वृद्धि करना और ठेकेदारी प्रथा को जारी रखना।
  6. शिक्षा और आबकारी नीति: नई शिक्षा नीति का जबरदस्ती थोपा जाना और आदिवासियों द्वारा घर में बनाई जाने वाली शराब (मादक पदार्थों) पर पाबंदी लगाना।
  7. धार्मिक और सामाजिक कारण: बस्तर में बाहरी लोगों का अनावश्यक हस्तक्षेप और ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करना।

🗓️ घटना का संक्षिप्त विवरण: तिथिवार


🗓️ घटनाक्रम का संक्षिप्त विवरण (जारी…)




📜 ताम्रपत्रों एवं अभिलेखों की जानकारी



📜 मध्यकालीन इतिहास से संबंधित अभिलेख


🏰 प्रमुख किले/महल और उनके निर्माणकर्ता