छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास (Medieval History Of CG) 📖
📌 प्रमुख राजवंश और उनके क्षेत्र:
कल्चुरी वंश 👑
रतनपुर
रायपुर
नागवंश 🐍
फणीनागवंश (कवर्धा)
छिंदकनागवंश (चक्रकोट)
सोमवंश 🌙
कांकेर
काकतीय वंश 🛡️
बस्तर
मानचित्र में इन राजवंशों द्वारा शासित क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है, जिससे उनकी भौगोलिक स्थिति को समझने में आसानी होती है।
कल्चुरियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 📜
🧠 शासकों का क्रम:
कृष्णराज (500 से 575 ई.)
इन्हें कल्चुरी वंश का आदिपुरुष या मूलपुरुष माना जाता है।
शंकरगण प्रथम (575 से 600 ई. तक)
कृष्णराज के उत्तराधिकारी।
बुद्धराज
मध्यप्रदेश के कल्चुरी वंश से संबंधित।
महिष्मान
माहिष्मती नगर के संस्थापक।
वामराजदेव
त्रिपुरी में कल्चुरी वंश की स्थापना की।
प्रथम राजधानी: कालिंजर
द्वितीय राजधानी: त्रिपुरी (तेवर)
कोकल्ल प्रथम
इन्होंने त्रिपुरी को एक स्थायी राजधानी के रूप में स्थापित किया।
शंकरगण द्वितीय ‘मुग्धतुंग’
छत्तीसगढ़ के पाली क्षेत्र पर विजय प्राप्त की।
लक्ष्मणराज
ये त्रिपुरी की लहुरी शाखा से थे।
कोकल्लदेव-द्वितीय
इनके पुत्र कलिंगराज हुए।
कलिंगराज (1000 ई.)
इन्होंने पाली क्षेत्र को फिर से जीतकर छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश की नींव रखी।
🌍 कल्चुरी राजवंश का परिचय:
महत्वपूर्ण स्थान: भारतीय इतिहास में कल्चुरी राजवंश का एक खास स्थान है। इन्होंने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लगभग 1200 वर्षों (500 ई. से 1741 ई.) तक शासन किया, जो किसी भी राजवंश के लिए सबसे लंबी शासन अवधियों में से एक है।
मूल पुरुष: कल्चुरी वंश के संस्थापक कृष्णराज थे, जिन्होंने 550 ई. से 575 ई. तक शासन किया।
प्रमुख शासक: उनके बाद उनके पुत्र शंकरगण प्रथम (575-600 ई.) और फिर बुद्धराज (600-620 ई.) ने शासन किया।
अज्ञात काल: 620 ई. के बाद लगभग पौने दो सौ वर्षों तक कल्चुरियों की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
अन्य नाम: राजा कोकल्ल के ताम्रपत्र से यह जानकारी मिलती है कि कल्चुरियों को हैहयवंशीय नाम से भी जाना जाता था।
वंश परंपरा: दक्षिण कोसल के अभिलेखों के अनुसार, इस वंश के राजा स्वयं को चंद्रवंशीय और सहस्त्रार्जुन की संतान मानते थे।
मध्य प्रदेश में कल्चुरी शासन 🏛️
💡 सामान्य जानकारी:
हैहयवंशी ‘महिष्मान’ ने माहिष्मती नगर बसाया था, जो प्रारंभिक कल्चुरी शासकों की राजधानी थी।
यह स्थल आज इंदौर रियासत में स्थित महेश्वर के रूप में पहचाना जाता है।
माहिष्मती को कल्चुरी नरेशों की कुल राजधानी होने का गौरव प्राप्त है।
🗺️ साम्राज्य का विस्तार:
कल्चुरियों ने अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर और दक्षिण भारत में किया।
इस विस्तार अभियान के दौरान उन्होंने कई लड़ाइयां लड़ीं और समय-समय पर कालिंजर, त्रिपुरी, प्रयाग, काशी, तुम्माण, रतनपुर, रायपुर, और खल्लवाटिका जैसी राजधानियां स्थापित कीं।
🔑 त्रिपुरी के कल्चुरी:
संस्थापक: वामराज देव त्रिपुरी में कल्चुरी वंश के संस्थापक थे।
स्थान: त्रिपुरी, जिसका वर्तमान नाम ‘तेवर’ है, जबलपुर से 6 मील की दूरी पर स्थित है।
स्थायी राजधानी: त्रिपुरी को स्थायी राजधानी बनाने का श्रेय कोकल्ल प्रथम (875-900 ई.) को दिया जाता है।
👑 कोकल्लदेव प्रथम:
प्राप्त प्रशस्तियों के अनुसार, कोकल्लदेव प्रथम की 18 संतानें थीं, जिनमें सबसे बड़े पुत्र शंकरगण द्वितीय ‘मुग्धतुंग’ थे।
900 ई. में त्रिपुरी की गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने कोसल क्षेत्र में बाणवंशी शासकों को पराजित किया (कुछ विद्वानों के अनुसार सोमवंशी राजा शिवगुप्त को हराया) और क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
उन्होंने स्वयं शासन करने के बजाय अपने छोटे भाइयों को इन क्षेत्रों का मंडलाधिपति नियुक्त कर दिया और खुद त्रिपुरी लौट गए। उनकी राजधानी तुम्माण थी।
लगभग 950 ई. में, स्वर्णपुर (सोनपुरी, ओडिशा) के सोमवंशी राजाओं ने कल्चुरियों की इस शाखा को तुम्माण से खदेड़ दिया और क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
बाद में, लक्ष्मण राज द्वितीय (950-970 ई.) ने दक्षिण कोसल पर चढ़ाई करके सोमवंशी राजाओं को हराया, लेकिन क्षेत्र को अपने साम्राज्य में शामिल नहीं किया।
भारत में कल्चुरियों की स्थापित 4 शाखाएँ
शाखा
संस्थापक
माहिष्मति
कृष्णराज
तेवर (त्रिपुरी)
वामराजदेव
सरयूपार
व्यास
रत्नपुर
कलिंगराज
छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश (1000 ई. से 1741 ई.) 🏰
📜 पृष्ठभूमि (Background)
कोकल्लदेव द्वितीय (990-1015 ई.) ने अपने पुत्र कलिंगराज को दक्षिण कोसल क्षेत्र में युद्ध के लिए भेजा था।
कलिंगराज ने 1000 ई. में तुम्माण नगर को अपनी राजधानी बनाकर छत्तीसगढ़ में कल्चुरी साम्राज्य की स्थापना की।
🔑 मुख्य तथ्य
स्थापना: 1000 ई. में (छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश)। [CG Vyapam (MFA) 2017]
शासनकाल: 1000-1741 ई. तक (छत्तीसगढ़ में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला वंश)। [CG Vyapam (NNRI)2018]
📝 ध्यान दें: कल्चुरियों ने 248 ई. से शुरू होने वाले ‘त्रैकुटक संवत्’ का उपयोग किया, जो अगले 1000 वर्षों तक प्रचलित रहा। रतनपुर में कल्चुरी राजवंश की लहुरी शाखा ने 10वीं शताब्दी में अपना राज्य स्थापित किया, जो 18वीं शताब्दी के मध्य तक बना रहा। [CGPSC(Pre)2015]
वैवाहिक संबंध: इन्होंने कोमोमण्डल के अधिपति वज्जूक की कन्या नोनल्ला से विवाह किया। उत्तराधिकारी न होने के कारण पेण्ड्रा क्षेत्र रत्नदेव को मिल गया।
साहिल्ल के पुत्रों का सहयोग: साहिल्ल के तीन पुत्रों (भागिल, देसल, स्वामिन) ने रत्नदेव प्रथम को साम्राज्य विस्तार में मदद की।
पृथ्वीदेव प्रथम
सामंत जयदेव द्वारा: डांडोरा (सरगुजा) क्षेत्र के 2100 गाँवों पर विजय प्राप्त की।
सामंत देवसिन्हा द्वारा: कोमोमण्डल (पेण्ड्रा) क्षेत्र के 750 गाँवों को पूरी तरह से जीता।
जाजल्यदेव प्रथम
प्रथम विजय अभियान: बैरागढ़ (चन्द्रपुर), लंजिका (बालाघाट), भणार (भंडार), तलहारी मण्डल (मल्हार) को अपने अधिकार में लिया।
द्वितीय विजय अभियान: बंगाल में दण्डकपुर (मिदनापुर) और आंध्र के खिमड़ी जैसे सुदूर प्रदेशों पर विजय प्राप्त की।
शासक और उनके शिलालेख/ताम्रपत्र ✍️
शासक
शिलालेख / ताम्रपत्र
पृथ्वीदेव-I
1. अमोदा ताम्रपत्र: इसमें उन्हें 21000 गांवों का विजेता बताया गया है। 2. रायपुर ताम्रपत्र: ‘सकलकोसलाधिपति’ के रूप में वर्णन है। 3. लाफागढ़ ताम्रपत्र, 4. भाटापारा ताम्रपत्र
जाजल्यदेव-I
रतनपुर ताम्रपत्र
रत्नदेव-II
1. अकलतरा अभिलेख, 2. पारागांव अभिलेख (सूर्यग्रहण पर ग्राम दान का उल्लेख), 3. शिवरीनारायण, 4. सरखों
पृथ्वीदेव-II
इनके सर्वाधिक 14 अभिलेख मिले हैं। कोनी शिलालेख में ‘सलोनी ग्राम’ दान करने का वर्णन है। [CG PSC (ARO) 2022], [CG PSC (ACF)2021]
जाजल्यदेव-II
1. अमोदा ताम्रपत्र: इसमें थीरू/धीरू नामक व्यक्ति द्वारा जाजल्यदेव द्वितीय को बंदी बनाने का उल्लेख है। 2. मल्हार अभिलेख: इसमें सोमराज द्वारा पातालेश्वर (केदारेश्वर) मंदिर बनवाने का उल्लेख है। 3. शिवरीनारायण, 4. समडील
रत्नदेव-III
1. खरौद (इनके शासनकाल में भीषण अकाल का उल्लेख है), 2. पासीद
प्रतापमल्ल
1. पेडरा बंध, 2. कोनारी, 3. बिलाईगढ़ से दो ताम्रपत्र, 4. पवनी ताम्रपत्र
बाहरेन्द्र साय
1. रतनपुर अभिलेख: 1495 ई. में महामाया मंदिर के सभागृह का जीर्णोद्धार और बहरैया तालाब खुदवाने का वर्णन है। 2. कोसगई अभिलेख: इससे दो अभिलेख मिले हैं जिनमें पूर्ववर्ती कल्चुरी शासकों का उल्लेख है।
कल्चुरीकालीन स्थापत्य कला 🏛️
शासक
स्थापत्य निर्माण
रत्नदेव-I
1. महामाया मंदिर (रतनपुर), 2. बंकेश्वर महादेव मंदिर (तुम्माण), 3. रत्नेश्वर महादेव मंदिर (तुम्माण), 4. महिषासुर मर्दिनी मंदिर (लाफागढ़)
पृथ्वीदेव-I
1. पृथ्वीदेवेश्वर मंदिर (तुम्माण), 2. चैतुरगढ़ का किला (लाफागढ़)
जाजल्यदेव-I
1. विष्णु मंदिर (जांजगीर), 2. शिव मंदिर (बेलपान)
रत्नदेव-II
सूर्य पुत्र रेवंत का मंदिर (कोटगढ़)
पृथ्वीदेव-II
1. नरसिंह नाथ मंदिर (ब्रम्हदेव) (सम्बलपुर), 2. धुर्जरी मंदिर, नारायणपुर (बलौदाबाजार), 3. राम मंदिर, राजिम (जगपालदेव)
जाजल्यदेव-II
1. चन्द्रचूड़ मंदिर (शिवरीनारायण), 2. पातालेश्वर/केदारेश्वर महादेव मंदिर (सोमराज) (मल्हार)
रत्नदेव-III
1. लखनीदेवी (एकवीरा) मंदिर (रतनपुर), 2. पुराराति शिव मंदिर (रतनपुर)
बाहरेन्द्र साय
1. छुरी-कोसगई किला, 2. कोसगई मंदिर (कोसगई)
कल्याण साय
जगन्नाथ स्वामी मंदिर (रतनपुर गज किला)
तखतसिंह
शिव मंदिर (तखतपुर)
ब्रम्हदेव राय
1. विष्णु मंदिर (देवपाल) (खल्लारी), 2. हटकेश्वर महादेव मंदिर, रायपुर
जैतसिंह देव
दूधाधारी मठ (बलभद्र दास) (रायपुर)
तपस्वी संतोष गिरि
कन्ठीदेवल मंदिर (रतनपुर)
👑 1. कलिंगराज (1000 से 1020 ई.)
शासनकाल: 1000 से 1020 ई.।
पदवी: इन्हें छत्तीसगढ़ में कल्चुरी वंश का प्रथम शासक एवं संस्थापक माना जाता है। [CG PSC(ADH)2011]
राजधानी: तुम्माण, जो कल्चुरियों की पहली या आरंभिक राजधानी थी। [CG Vyapam (RI)2017, (FDFG)2024], [CG PSC(ADI)2016][CGPSC(Sci.off.)2018]
ঐতিহাসিক उल्लेख:
अलबरूनी: प्रसिद्ध विद्वान अलबरूनी ने अपनी पुस्तक “तहकीक-ए-हिन्द” में इनका वर्णन किया है। [CG Vyapam (Lect.)2023, (ESC)2022,(PDEO)2015,(ADEO)2012]
पृथ्वीदेव प्रथम का अमोदा ताम्रपत्र: इस ताम्रपत्र में भी कलिंगराज का उल्लेख मिलता है।
रतनपुर शिलालेख (जाजल्यदेव प्रथम): इस शिलालेख में कलिंगराज के प्रताप का वर्णन करते हुए लिखा है – “वह (कलिंगराज) शत्रुओं की स्त्रियों की आंखों से बहते हुए जल से पुष्ट हुआ प्रताप का वृक्ष था।”
मंदिर निर्माण: इन्होंने महिषासुर मर्दिनी मंदिर, चैतुरगढ़ (कोरबा) का निर्माण करवाया था।
👑 2. कमलराज (1020 से 1045 ई.)
शासनकाल: 1020 से 1045 ई.।
समकालीन शासक: ये त्रिपुरी के कल्चुरी शासक गांगेयदेव के समकालीन थे।
सैन्य सहायता: अमोदा ताम्रपत्र के अनुसार, कमलराज ने त्रिपुरी के शासक गांगेयदेव को उत्कल (ओड़िशा) अभियान में सैन्य सहायता प्रदान की थी। [CG PSC(EAP)2016][CGPSC(Pre)2019]
विजय: कमलराज ने उत्कल के राजा को पराजित किया और विजय से प्राप्त धन गांगेयदेव को सौंप दिया।
साहिल्ल का आगमन: उत्कल अभियान से लौटते समय, कमलराज अपने साथ साहिल्ल नामक एक वीर योद्धा को लाए। साहिल्ल और उनके वंशजों ने कल्चुरी शासकों को साम्राज्य विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे कई राज्यों पर विजय प्राप्त हुई।
👑 3. रत्नदेव प्रथम (1045 से 1065 ई.)
शासनकाल: 1045 से 1065 ई.।
वंश परिचय: जाजल्यदेव-I के रतनपुर शिलालेख के अनुसार, ये कमलराज के पुत्र थे, जिनका नाम रत्नराज मिलता है।
विवाह: इन्होंने नोनल्ला देवी से विवाह किया, जो कोमोमण्डल के अधिपति वज्जक/वजूवर्मन की कन्या थीं। [CGPSC(IMO)2020]
राजधानी:
तुम्माण (1045-1050): ये तुम्माण से शासन करने वाले अंतिम कल्चुरी शासक थे। तुम्माण राजधानी से शासन करने वाले शासक थे:
कलिंगराज (1000-1020)
कमलराज (1020-1045)
रत्नदेव (1045-1050)
रतनपुर: 1050 ई. में इन्होंने रतनपुर नगर की स्थापना की और राजधानी को तुम्माण से रतनपुर स्थानांतरित कर दिया। [CGPSC(Pre)2020, (Mains)2011], [CG Vyapam (Maha.lek)2017], [CG PSC(ADJE)2020, (SEE)2017, (Engg, Set-1)2015, (Pre)2022] [CG Vyapam (DCAG)2018]
निर्माण कार्य:
रतनपुर में इन्होंने अनेक तालाबों का निर्माण करवाया, जिसके कारण रतनपुर को तालाबों की नगरी के नाम से जाना जाने लगा। [CG PSC(RDA)2014]
इन तालाबों के कारण रतनपुर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया, जिससे इसे कुबेरपुर की संज्ञा भी दी गई।
निर्माण और विस्तार (रत्नदेव प्रथम)
मंदिर निर्माण:
महामाया मंदिर, रतनपुर (11वीं शताब्दी में) [CG PSC(RDA)2014][CG PSC(Lib)2014]
महिषासुर मर्दिनी, लाफागढ़
रत्नेश्वर शिव मंदिर, तुम्माण
वंकेश्वर शिव मंदिर, तुम्माण
कन्ठीदेवल मंदिर, रतनपुर (1039 ई. में तपस्वी संतोषगिरी द्वारा निर्मित)
किला निर्माण:
रतनपुर किला (गज किला)
द्वार: 1. सिंह द्वार, 2. गणेश द्वार, 3. भैरव द्वार, 4. सेमर द्वार
विशेष: इस किले में रावण की एक अनोखी मूर्ति है जिसमें वह स्वयं का सिर काट रहा है। [CGVyapam(Patwari)2017][CGPSC(Lib.)2017]
साम्राज्य विस्तार:
वैवाहिक संबंध: कोमोमण्डल अधिपति वज्जक की कन्या नोनल्ला से विवाह के कारण, उत्तराधिकारी न होने पर उत्तर-पश्चिमी बिलासपुर (पेण्ड्रा) का क्षेत्र रत्नदेव को प्राप्त हुआ।
साहिल्ल के पुत्रों के सहयोग से: साहिल्ल के तीन पुत्रों (भागिल, देसल, स्वामिन) की मदद से साम्राज्य को भट्टविल तथा बिहरा तक विस्तारित किया।
विजय अभियान:
कलिंग अभियान (1055 ई.): कलिंग के सोमवंशी शासक महाभवगुप्त चतुर्थ उद्योतकेसरी को पराजित कर कलिंग क्षेत्र को कल्चुरी साम्राज्य में मिला लिया।
सामंत जयदेव द्वारा: डांडोरा (सरगुजा) क्षेत्र के 2100 गाँवों पर विजय प्राप्त की।
सामंत देवसिन्हा द्वारा: कोमोमण्डल (पेण्ड्रा) क्षेत्र के 750 गाँवों को पूर्णतः जीता। इससे सम्पूर्ण दक्षिण कोसल इनके अधीन आ गया।
पराजय: इन्होंने छिंदकनागवंशीय शासक सोमेश्वरदेव प्रथम को पराजित कर दक्षिण कोसल के कुछ हिस्सों को अपने अधिकार में ले लिया था।
👑 5. जाजल्यदेव प्रथम (1090 से 1120 ई.)
शासनकाल: 1090 से 1120 ई. [CG Vyapam (FI)2022]
विवाह: लाच्छलादेवी से। [CGPSC(ADA)2023]
जानकारी का स्रोत: रतनपुर एवं पाली अभिलेख।
उपाधि: गजशार्दूल।
पदाधिकारी:
गुरु: रुद्रशिव (बौद्ध दार्शनिक ग्रंथ के ज्ञाता)।
संधिविग्रहक: विग्रहराज।
मंत्री: पुरुषोत्तम।
साम्राज्य विस्तार:
प्रथम विजय: बैरागढ़ (चन्द्रपुर), लंजिका (बालाघाट), भणार (भंडार), तलहारी मण्डल (मल्हार) को अपने अधिकार में लिया।
द्वितीय विजय: बंगाल के दण्डकपुर (मिदनापुर) और आंध्रा के खिमड़ी पर विजय प्राप्त की।
विजय अभियान:
सोमेश्वरदेव के विरुद्ध: इन्होंने छिन्दक नागवंशी शासक सोमेश्वरदेव को पराजित कर उनके पूरे परिवार को बंदी बना लिया था, लेकिन सोमेश्वर देव की माता गुन्डमहादेवी के अनुरोध पर उन्हें छोड़ दिया। [CGVyapam (ECH)2017, (Lab Tech.)2024], [CGPSC(Pre)2019,(SES)2020, (ADI)2016]
सुवर्णपुर के शासक भुजबल: इन्होंने ओड़िशा के सुवर्णपुर (सोनपुर) पर आक्रमण कर राजा भुजबल को हराया।
गंग शासकों के विरुद्ध: ओड़िशा के गंग शासकों पर भी विजय प्राप्त की।
जाजल्यदेव प्रथम के अन्य कार्य
स्वतंत्रता की घोषणा: इन्होंने त्रिपुरी के कल्चुरियों की अधीनता को अस्वीकार कर स्वतंत्रता की घोषणा की और अपने नाम के सोने व तांबे के सिक्के जारी किए।
सोने के सिक्के: अग्र भाग पर “श्रीमज्जाजल्यदेव” और पृष्ठ भाग पर गजशार्दूल का चिह्न अंकित था। [CGPSC(Regi.)2017].[CGPSC(Hortielt)2015]
तांबे के सिक्के: इन पर हनुमान की आकृति अंकित थी, जो चंदेलों के सिक्कों के समान थी।
नगर निर्माण:
जाजल्यपुर नगर: वर्तमान में जांजगीर के नाम से जाना जाता है। इनकी स्मृति में आज भी प्रतिवर्ष जाजल्य महोत्सव का आयोजन होता है। [CGPSC(AP)2016]
विष्णु मंदिर (नकटा मंदिर): जाजल्यपुर में ऐतिहासिक भीमा तालाब के तट पर इसका निर्माण कराया। [CGPSC(ADVSH) 2013,(EAP)2017]
निर्माण/जीर्णोद्धार:
बेलपान स्थित शिव मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
पाली का शिव मंदिर (कोरबा): इसका जीर्णोद्धार करवाया, जिसके द्वार पर “श्री मज्जाजल्लदेवस्यकीर्तिः” उत्कीर्ण है। [CG Vyapam (FI)2013]
विशेष: माना जाता है कि जाजल्यदेव प्रथम अपने जीवन के अंतिम दिनों में मकरध्वज नामक जोगी के साथ चले गए और फिर वापस नहीं लौटे।
👑 6. रत्नदेव द्वितीय (1120 से 1135 ई.)
शासनकाल: 1120 से 1135 ई.।
अभिलेख:
अकलतरा अभिलेख: इसमें इनके सामंत द्वारा कोटगढ़ में रेवंत मंदिर और विशाल तालाब बनाने का उल्लेख है।
पारागांव ताम्रपत्र: सूर्यग्रहण के अवसर पर बोडलानवा ग्राम दान करने का उल्लेख है।
शिवरीनारायण ताम्रपत्र, 4. सरखों ताम्रपत्र
प्रचलन: इन्होंने भी अपने पिता की तरह त्रिपुरी की अधीनता को अस्वीकार करते हुए सोने और चांदी के सिक्के जारी करवाए।
विजय अभियान:
त्रिपुरी नरेश गयाकर्ण: इन्होंने त्रिपुरी के राजा गयाकर्ण के आक्रमण को विफल किया। [CG PSC(CMO)2019]
गंगवंशीय शासक अनंतवर्मा चोड़गंग (1130 ई.): इन्हें और इनके मांडलिकों ने मिलकर तलहारी मण्डल के पास हराया। [CG PSC(CMO)2019, (Asst. HYD)2020,(Pre)2019]
बंगाल के गौड़ राजाओं को परास्त किया। [CG PSC(CMO)2019]
खिज्जिंग के राजा हरवोहु को हराया।
शिवरीनारायण के अन्य नाम 📍
युग
नाम
सतयुग
बैकुंठपुर
त्रेतायुग
रामपुर
द्वापरयुग
विष्णुपुर
कलयुग
नारायणपुर / शिवरीनारायण
अन्य नाम
नारायण क्षेत्र, विष्णुकांक्षी
👑 7. पृथ्वीदेव द्वितीय (1135 से 1165 ई.)
शासनकाल: 1135 से 1165 ई.। [CGVyapam(FI)2022]
पुत्र: इनके पुत्रों में जाजल्यदेव-II, उल्हण, गोपालदेव और विकन्नदेव का नाम मिलता है।
प्रचलन: इन्होंने अपने पिता और दादा की परंपरा को निभाते हुए सोने, चांदी (छोटे आकार के) और तांबे के सिक्के जारी किए।
विशेष ज्ञान: इन्हें 36 विभिन्न विधाओं का ज्ञाता माना जाता था (इसका उल्लेख पृथ्वीदेव द्वितीय के कोनी अभिलेख में मिलता है)।
📜 अभिलेख और जानकारी
इनके शासनकाल के सर्वाधिक 14 अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
कोनी शिलालेख:
इस अभिलेख से पता चलता है कि भूमि की माप और कृषि के लिए ‘हल’ का उपयोग किया जाता था।
इसमें ‘सर्वाधिकारिन पुरुषोत्तम’ को ‘सलोनी ग्राम’ दान करने और उसे ‘सर्वविधि कर्म’ का पद प्रदान करने का वर्णन है। [CGPSC(ARO)2022,(ACF)2021]
इसमें पशुपालन का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन ‘काशल’ नामक एक पशु चिकित्सक का वर्णन मिलता है।
अन्य शिलालेख: कोटगढ़, राजिम, बिलाईगढ़, अमोदा, रतनपुर, पारागांव, घोटिया, कुगदा आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।
🛠️ निर्माण और जीर्णोद्धार
जीर्णोद्धार:
राजीव लोचन मंदिर, राजिम: इसका जीर्णोद्धार सेनापति जगपाल द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर मूल रूप से नलवंशी शासक विलासतुंग द्वारा बनवाया गया एक विष्णु मंदिर है। [CGPSC(CMO)2010, (ITI Prin.)2016]
कन्ठीदेवल मंदिर, रतनपुर: 1039 ई. में तपस्वी संतोषगिरी द्वारा निर्मित इस मंदिर का भी इन्होंने जीर्णोद्धार करवाया।
मंदिर निर्माण:
रामचन्द्र मंदिर, राजिम (सेनापति जगपाल देव द्वारा)।
शिव मंदिर, नारायणपुर, बलौदाबाजार (सामंत ब्रम्हदेव द्वारा)।
नगर बसाया: जगपालपुर नगर (सेनापति जगपाल देव द्वारा)।
⚔️ साम्राज्य विस्तार और विजय
सेनापति: जगपाल / जगतपाल।
साम्राज्य विस्तार: राजिम शिलालेख के अनुसार, सेनापति जगतपाल ने अपने स्वामी के लिए सरहरागढ़ (सारंगढ़), मेचका-सिहावा (धमतरी), कांदा-डोंगर, कुसुमभोग, भ्रमरवद्र, और काकरय (कांकेर) जैसे क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की। कल्चुरियों के साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार इन्हीं के शासनकाल में अमरकंटक से गोदावरी तक हुआ।
विजय अभियान:
छिंदकनागवंशीय शासक कन्हरदेव: चक्रकोट (बस्तर) में शासक कन्हरदेव को पराजित किया।
गंगवंशीय शासक मधुकामार्णव: सामंत ब्रम्हदेव के साथ मिलकर गंगवंशी शासक जटेश्वर मधुकामार्णव को पराजित कर कैद कर लिया।
👑 8. जाजल्यदेव द्वितीय (1166 से 1168 ई.)
शासनकाल: 1166 से 1168 ई.।
उपाधि: तुम्माणाधिपति (शिलालेखों से प्राप्त जानकारी के अनुसार)।
जानकारी के स्रोत:
अमोदा ताम्रपत्र: इस लेख में वर्णित है कि थीरु/धीरू नामक एक व्यक्ति ने जाजल्यदेव द्वितीय को बंदी बना लिया था।
मल्हार अभिलेख: इसमें पातालेश्वर (केदारेश्वर) मंदिर बनवाने का उल्लेख है।
शिवरीनारायण और समडील ताम्रपत्र भी इनके काल के प्रमुख स्रोत हैं।
मंदिर निर्माण:
चन्द्रचूड़ मंदिर, शिवरीनारायण:
निर्माणकर्ता: कल्हणदेव / अल्हणदेव / उल्हणदेव (पृथ्वीदेव द्वितीय के पुत्र)।
स्थान: महानदी के तट पर।
पातालेश्वर महादेव मंदिर, मल्हार:
निर्माणकर्ता: सोमराज नामक एक ब्राह्मण (कुमेटी ग्राम के निवासी)।
समय: 1167-68 ई. में।
आक्रमण: इनके शासनकाल में त्रिपुरी के शासक जयसिंह ने रतनपुर पर असफल आक्रमण किया। यह युद्ध शिवरीनारायण के पास हुआ था, जिसमें अल्हणदेव ने जाजल्यदेव का साथ देते हुए वीरगति प्राप्त की। [CGPSC(Pre)2019][CG Vyapam (LOI)2018], [CG PSC (ITI Prin.) 2016]
👑 9. जगतदेव / जगद्देव (1168 से 1178 ई.)
शासनकाल: 1168 से 1178 ई.।
विवाह: सोमल्लादेवी से। [CGPSC(ADA)2023]
जानकारी का स्रोत: इनके पुत्र रत्नदेव तृतीय का खरौद शिलालेख।
शांति स्थापना: खरौद अभिलेख से ज्ञात होता है कि जाजल्यदेव की मृत्यु के बाद राज्य में अशांति और अव्यवस्था फैल गई थी। उस समय उनके बड़े भाई जगतदेव गंग राजा के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। मृत्यु का समाचार पाकर, वे युद्ध छोड़कर रतनपुर लौटे और राज्य में शांति और सुव्यवस्था स्थापित की। उन्होंने लगभग 10 वर्षों तक रतनपुर पर शासन किया।
👑 10. रत्नदेव तृतीय (1178 से 1198 ई.)
शासनकाल: 1178 से 1198 ई.।
पत्नी: इनके दो पत्नियाँ थीं- रल्हा और पद्मा (खरौद शिलालेख के अनुसार)।
सेनापति: गंगाधर राव।
प्रमुख घटना: खरौद शिलालेख के अनुसार, इनके शासनकाल में भीषण अकाल पड़ा था, जिससे राज्य में अव्यवस्था फैल गई थी। इस संकट की स्थिति में, राजा ने गंगाधर नामक ब्राह्मण को अपना मंत्री नियुक्त किया, जिन्होंने अपनी सूझबूझ से राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया।
जीर्णोद्धार:
लखनेश्वर मंदिर (खरौद सभा मण्डप), (सेनापति गंगाधर राव द्वारा)।
शौरी / सबरी मंदिर (खरौद मण्डप), (सेनापति गंगाधर राव द्वारा)।
मंदिर निर्माण:
पुराराति (शिव) मंदिर, रतनपुर।
लखनीदेवी (एकवीरा) मंदिर, रतनपुर:
स्थान: एकवीरा की पहाड़ी।
निर्माणकर्ता: सेनापति गंगाधर राव, 1179 ई. में।
नामकरण: यह वास्तव में माता लक्ष्मी का मंदिर है, जो अपभ्रंश होकर लखनीदेवी मंदिर कहलाया।
👑 11. प्रतापमल्ल (1198 से 1222 ई.)
शासनकाल: 1198 से 1222 ई.।
मुद्रा: इनके बालपुर से 12 तांबे के सिक्के मिले हैं, जो गोल एवं षट्कोणीय आकार के हैं और उन पर सिंह तथा कटार की आकृति अंकित है।
सामंत: जसराज अथवा यशोराज।
ताम्रपत्र:
पेडरा बंध (कल्चुरी संवत् 965 – 1213 ई.)
कोनारी (कल्चुरी संवत् 968 – 1216 ई.)
बिलाईगढ़ से दो ताम्रपत्र (कल्चुरी संवत् 969 – 1217 ई.) [CG PSC(Pre)2022]
पवनी ताम्रपत्र
विशेष: इन्होंने कल्चुरी संवत् का अंतिम बार प्रयोग किया। इनके कार्यकाल में गंग नरेश अनंगभीम तृतीय का आक्रमण हुआ, जिससे कल्चुरी वंश को भारी क्षति पहुंची और वह छिन्न-भिन्न हो गया।
⏳ अंधकार युग (Dark Age)
प्रतापमल्ल के बाद लगभग 200 वर्षों तक के शासनकाल की कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसी कारण इस काल को अंधकार युग की संज्ञा दी गई है।
मराठाकालीन विद्वान बाबू रेवाराम के अनुसार, प्रतापमल्ल देव के बाद भी कई पीढ़ियों ने रतनपुर पर शासन किया, जिसका विवरण ‘प्राचीन छत्तीसगढ़’ (पेज क्र. 120) में मिलता है।
इसी कालक्रम में आगे बाहर साय / बाहरेन्द्र साय ने रतनपुर की सत्ता को फिर से स्थापित किया।
नोट: 1440-41 ई. के दौरान रतनपुर पर महमूद खिलजी ने आक्रमण किया था।
राजधानी: कोसंगा / कोसगई (कोरबा)। इनके शासनकाल में आक्रमणकारियों की लूट-पाट बढ़ने के कारण, उन्होंने राजकोष को रतनपुर से हटाकर छुरी-कोसगई में स्थानांतरित कर दिया और वहीं से शासन करने लगे।
मंत्री: माधव।
निर्माण कार्य:
कोसगई मंदिर (छुरी-कोसगई, कोरबा)।
कोषागार की स्थापना, कोसंगा (कोसगई) में।
बहरैया तालाब, रतनपुर।
जीर्णोद्धार: महामाया मंदिर का सभागृह।
जानकारी के स्रोत:
रतनपुर अभिलेख: इससे ज्ञात होता है कि 1495 ई. में बाहरेन्द्र साय ने महामाया मंदिर के सभागृह का जीर्णोद्धार कराया और प्रसिद्ध बहरैया तालाब खुदवाया।
कोसगई अभिलेख: कोसगई से इनके दो अभिलेख मिले हैं, जिनमें पूर्ववर्ती कल्चुरी शासकों का उल्लेख है। [CG PSC(Pre)2022], [CG Vyapam (TET)2019]
प्रदान:
सोनाखान जमींदारी: सैन्य सहयोग के बदले, इन्होंने बिसई ठाकुर बिंझवार को सोनाखान क्षेत्र की जमींदारी सौंपी।
कोसगई किला: इन्होंने घाटमदेव को कोसगई किले का अधिपति नियुक्त कर यह किला उसे सौंप दिया।
👑 13. कल्याण साय (1544 से 1581 ई.)
शासनकाल: 1544 से 1581 ई.।
निर्माण कार्य:
जगन्नाथ स्वामी मंदिर (रतनपुर के गजकिला में)।
लालपुर नगर बसाया।
मुगल दरबार में उपस्थिति: विभिन्न स्रोतों के अनुसार, इन्होंने मुगल दरबार में 8 वर्षों तक अपनी सेवा दी। [CG Vyapam (AGDO)2018]
बाबू रेवाराम के अनुसार: राजस्व विवाद के कारण, मुगल बादशाह अकबर ने इन्हें दिल्ली दरबार में बुलाकर 8 साल तक रखा।
गोपल्ला गीत के अनुसार: ये जहाँगीर के समय दिल्ली गए थे, जैसा कि गीत में वर्णित है: “बड़े राजा कल्याण साय, दिल्ली के सेवा जाय।” [CGVyapam (VPR)2021]
जहाँगीर की आत्मकथा (तुजुक-ए-जहांगीरी) के अनुसार: ये जहाँगीर के शासनकाल के 14वें वर्ष (लगभग 1619 ई.) में शहजादा परवेज के साथ दरबार में उपस्थित हुए थे। [CGPSC(Mains)2011, (AP)2009]
राजस्व सुधार:
जमाबंदी प्रणाली: इसी प्रणाली से छत्तीसगढ़ में गढ़ व्यवस्था की शुरुआत हुई, जो बाद में ‘छत्तीसगढ़’ नाम का आधार बनी।
राजस्व पुस्तिका: इनके द्वारा तैयार की गई राजस्व पुस्तिका के अनुसार रतनपुर राज्य के गढ़ों से साढ़े छः लाख रुपये का राजस्व प्राप्त होता था।
मि.चिस्म द्वारा अध्ययन: बिलासपुर के प्रथम अंग्रेज बंदोबस्त अधिकारी मि. चिस्म ने 1868 में इस पुस्तिका का अध्ययन किया और इसी के आधार पर रतनपुर और रायपुर के 18-18 गढ़ों (कुल 36 गढ़) का उल्लेख किया।
नोट: मुगल शासनकाल में छत्तीसगढ़ को रतनपुर क्षेत्र कहा जाता था। [CSPHCL-2019] [CG VS (AG3) 2021]
उत्तराधिकारी (प्राचीन छत्तीसगढ़, प्यारेलाल गुप्त के अनुसार): इनके बाद लक्ष्मण साय (1581), शंकर साय (1596), त्रिभुवन साय (1622), जगमोहन साय (1635), अदली साय (1649) और रणजीत साय (1675) ने शासन किया।
👑 14. लक्ष्मण साय (1581 ई. से प्रारंभ)
शासनकाल: इनका शासन 1581 ई. से आरंभ हुआ।
प्रमुख कार्य: इनके द्वारा ‘देश बही खाता’ नामक एक महत्वपूर्ण लेखा-जोखा पुस्तिका तैयार की गई थी। [CG Vyapam(FI)2022]
👑 15. तखतसिंह (1685 – 1689 ई.)
समकालीन: ये मुगल सम्राट औरंगजेब के समकालीन थे।
नगर निर्माण: इन्होंने तखतपुर नामक नगर की स्थापना की।
परिवार: इनके भाइयों में सरदारसिंह, बखतसिंह और रघुनाथ सिंह का नाम मिलता है।
विशेष जानकारी:
पं. शिवदत्त शास्त्री के ‘रतनपुर इतिहास समुच्चय’ के अनुसार, तखतसिंह निःसंतान थे। उन्होंने शास्त्रानुसार अपनी पत्नी का नियोग अपने दीवान बड़गैया नामक ब्राह्मण से करवाया, जिससे राजसिंह का जन्म हुआ।
ऐतिहासिक यात्रा: शिवाजी महाराज आगरा के किले से निकलकर कानपुर, प्रयागराज होते हुए सरगुजा के घने जंगलों से रतनपुर पहुँचे। यहाँ से वे रायपुर, चन्द्रपुर (महाराष्ट्र) और करीमगंज (महाराष्ट्र) होते हुए 22 सितंबर 1666 को रायगढ़ (महाराष्ट्र) पहुँचे। इस प्रकार, बहुत ही कम समय के लिए वे तखतसिंह के शासनकाल में रतनपुर में प्रवास पर रहे।
👑 16. राजसिंह (1689 से 1712 ई.)
शासनकाल: 1689 से 1712 ई. तक।
विवाह: इनकी तीन रानियाँ थीं: दिव्यपुरी, सुवंशकोरी और कजरीदेवी।
नगर निर्माण: इन्होंने अपनी पत्नी कजरी देवी के आग्रह पर रतनपुर के समीप राजपुर (जूना शहर) नामक नगर बसाया और वहीं बादल महल का निर्माण करवाया, जिसे ‘सतखण्डा महल’ के नाम से भी जाना जाता है।
दरबारी कवि: गोपाल मिश्र, जिनकी प्रसिद्ध रचना ‘खूब तमाशा’ (1689 ई.) है।
पारिवारिक त्रासदी:
इनके पुत्र का नाम विश्वनाथ सिंह था। जब उन्हें अपने जन्म की नियोग प्रथा के बारे में पता चला, तो उन्होंने आत्मग्लानि में बड़गैया की हत्या कर दी और स्वयं भी आत्महत्या कर ली।
इस घटना के बाद राजसिंह पुत्रहीन हो गए और उन्होंने रायपुर के कल्चुरी राजकुमार मोहन सिंह को शासन सौंपने का वचन दिया। हालांकि, राजसिंह की मृत्यु के समय मोहन सिंह शिकार पर गए हुए थे, जिस कारण उनके चाचा सरदार सिंह शासक बन गए और मोहन सिंह को सत्ता नहीं मिल सकी।
👑 17. सरदार सिंह (1712 से 1732 ई.)
शासनकाल: 1712 से 1732 ई. तक।
उत्तराधिकार: वे निःसंतान थे, इसलिए उन्होंने अपनी मृत्यु के समीप अपने 60 वर्षीय भाई रघुनाथसिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।
👑 18. रघुनाथसिंह (1732 से 1745 ई.)
👑 स्वतंत्र शासन (1732 – 1741 ई.)
ये रतनपुर के अंतिम स्वतंत्र कल्चुरी शासक थे। [CSPHCL-2019]
😔 मराठा अधीन शासन (1741 – 1745 ई.)
ये मराठों (भोंसलों) के अधीन शासन करने वाले प्रथम कल्चुरी शासक बने।
विवाह: इनकी दो रानियाँ थीं- लक्ष्मणकुंवर और पद्मकुंवर।
⚔️ मराठा आक्रमण और पतन (1741 ई.)
आक्रमण: 1741 ई. में भोंसला शासक रघुजी प्रथम के सेनापति भास्कर पंत ने ओडिशा अभियान के दौरान रतनपुर पर आक्रमण किया। [CGVyapam (ANM) 2015] [CG PSC(ACF)2016, (ARTO)2017, (ADP) 2019, (Pre)2020]
पतन का कारण: रघुनाथ सिंह अपने पुत्र की मृत्यु से गहरे शोक में थे और राजकीय कार्यों में उनका मन नहीं लगता था। इसी टूटे हुए मनोबल और उदासीनता के कारण, जब मराठा सेना ने आक्रमण किया, तो उन्होंने बिना किसी युद्ध के आत्मसमर्पण कर दिया।
परिणाम: सहजता से रतनपुर पर मराठों का अधिकार हो गया और इस तरह गौरवशाली हैहयवंशी राज्य का अंत हो गया। 1741 में पराजित होने के बाद भी वे 1745 ई. तक मराठों के अधीन प्रशासक बने रहे, जब तक कि उन्हें हटाकर मोहन सिंह को नियुक्त नहीं किया गया। [CG PSC(ADI)2016]
🛡️ भास्कर पंत: एक युग का परिवर्तक
परिचय: ये नागपुर के भोंसले शासक रघुजी प्रथम के सेनापति थे। [CGVyapam (VPR)2021] [CG PSC(Mains)2011, (ADP) 2019]
रतनपुर पर आक्रमण (1741 ई.): बंगाल विजय अभियान के समय इन्होंने कल्चुरी शासक रघुनाथ सिंह पर आक्रमण कर सरलता से रतनपुर पर अधिकार कर लिया। उन्होंने रघुनाथ सिंह का खजाना लूट लिया और उन पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
प्रशासनिक व्यवस्था: भास्कर पंत ने मराठा हितों की देख-रेख के लिए कल्याणगिरी गोसाई को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया।
मोहनसिंह का उदय: रघुनाथ सिंह और कल्याणगिरी गोसाई के बीच मतभेद होने के कारण कल्याणगिरी को हटा दिया गया। उधर, सत्ता की लालसा में मोहनसिंह ने विद्रोह का प्रयास किया लेकिन असफल रहे। इसके बाद वे नागपुर चले गए और रघुजी प्रथम की सेवा करने लगे।
सत्ता परिवर्तन: 1745 ई. में रघुजी प्रथम ने दूसरे बंगाल अभियान के दौरान रतनपुर पर फिर से आक्रमण किया और रघुनाथ सिंह को हटाकर मोहनसिंह को रतनपुर का शासन सौंप दिया।
अंत: 1744-45 में बंगाल अभियान से लौटते समय, अलीवर्दी खां (बंगाल के शासक) द्वारा धोखे से मनकुटा नामक स्थान पर भास्कर पंत की हत्या कर दी गई।
👑 19. मोहनसिंह (1745 से 1757 ई.)
शासनकाल: 1745 से 1757 ई. तक।
मृत्यु: 23 जनवरी 1757 (रतनपुर)।
पदवी: ये मराठों के अधीन शासन करने वाले अंतिम कल्चुरी शासक थे।
🌿 रायपुर के कल्चुरियों की लहुरी शाखा (Raipur Lahuri branch of Kalchuries)
📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्थापना: 14वीं सदी के अंत में, रतनपुर के राजा के एक रिश्तेदार लक्ष्मीदेव को प्रतिनिधि के रूप में खल्लवाटिका (खल्लारी) भेजा गया था, जहाँ वे स्थायी रूप से बस गए। उनके पुत्र सिंघणदेव ने शिवनाथ नदी के दक्षिण में स्थित 18 गढ़ों को जीतकर रायपुर में एक स्वतंत्र लहुरी शाखा की स्थापना की।
शाखा विभाजन: रायपुर गजेटियर के अनुसार, 14वीं सदी के अंत में रतनपुर के शासक वीरसिंह देव के समय कल्चुरी शाखा दो भागों में विभाजित हो गई थी:
जगन्नाथ सिंह (रतनपुर के शासक)
वीरसिंह देव (रतनपुर क्षेत्र में शासन किया)
देवसिंह देव (शिवनाथ नदी के दक्षिण भाग में)
लक्ष्मीदेव
सिंघणदेव
रामचन्द्रदेव
🔑 मुख्य तथ्य
शाखा: मुख्य शाखा (त्रिपुरी शाखा) रतनपुर में शासन करती रही, जबकि दूसरी शाखा (लहुरी) रायपुर क्षेत्र में स्थापित हो गई।
उपाधि: रायपुर शाखा के शासकों को “महाराजकुमार राजा” की उपाधि से संबोधित किया जाता था। [CG PSC(CMO)2019]
वंशावली: हैहयवंशीय शासकों की वंशावली का उल्लेख शिवरीनारायण मंदिर के शिलालेख में मिलता है। [CG PSC(IMO)2020]
जानकारी के स्रोत:
खल्लारी शिलालेख (ब्रम्हदेव)
रायपुर शिलालेख (ब्रम्हदेव)
विभिन्न कालखण्डों में रायपुर का नामकरण
काल/युग
नाम
सतयुग
कनकपुर
त्रेतायुग
हाटकपुर
द्वापरयुग
कंचनपुर
कल्चुरी काल
रायपुर
।
👑 रायपुर (खल्लवाटिका/खल्लारी) के शासक
शासक
शासनकाल
महत्वपूर्ण तथ्य
केशव देव
राजधानी – खल्लवाटिका/खल्लारी
[CGPSC (ADPE&S) 2019]
लक्ष्मी देव
1300 – 1340 ई.
–
सिंघण देव
1340 – 1380 ई.
–
रामचन्द्र देव
1380 – 1400 ई.
रायपुर शहर के संस्थापक
ब्रम्ह देव
1400 – 1420 ई.
रायपुर का नामकरण इन्हीं के नाम पर हुआ
केशव देव (II)
1420 – 1438 ई.
–
भुनेश्वर देव
1438 – 1463 ई.
–
मानसिंह देव
1463 – 1478 ई.
[CGPSC (Pre) 2023]
संतोषसिंह देव
1478 – 1498 ई.
–
सूरतसिंह देव
1498 – 1518 ई.
–
सैनसिंह देव
1518 – 1528 ई.
–
चामुण्डासिंह देव
1528 – 1563 ई.
[CGPSC (Pre) 2023], [CGPSC (ACF) 2016]
वंशीसिंह देव
1563 – 1582 ई.
–
धनसिंह देव
1582 – 1604 ई.
–
जैतसिंह देव
1604 – 1615 ई.
बलभद्रदास द्वारा दूधाधारी मंदिर निर्माण [CGPSC (Pre) 2023], [CGVyapam (CACC) 2017]
फत्तेसिंह देव
1615 – 1636 ई.
–
यादसिंह देव
1636 – 1650 ई.
–
सोमदत्त देव
1650 – 1663 ई.
[CGPSC (Pre) 2023]
बलदेवसिंह देव
1663 – 1685 ई.
–
उमेदसिंह देव
1685 – 1705 ई.
[CGPSC (ACF) 2016]
बनवीरसिंह देव
1705 – 1741 ई.
–
अमरसिंह देव
1741 – 1753 ई.
अंतिम शासक [CGPSC (ADS) 2017]
📜 विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)
प्र-1. निम्नलिखित शासकों में से कौन रायपुर की कल्चुरी शाखा से संबंधित थे? [CG PSC(ACF)2016]
प्रारंभ: रायपुर की कल्चुरी शाखा का आरंभ इन्हीं से माना जाता है।
संस्थापक: इन्हें परंपरागत रूप से रायपुर की लहुरी शाखा का संस्थापक माना जाता है। (हालांकि, आयोग द्वारा रामचंद्रदेव को संस्थापक के रूप में स्वीकार किया गया है।) [CG PSC(ADPES)2019]
सिंघण देव
विवरण: खल्लारी शिलालेख के अनुसार, ये लक्ष्मीदेव के पुत्र थे। इन्होंने शत्रुओं को पराजित कर 18 गढ़ों पर विजय प्राप्त की थी।
रामचंद्र देव
संस्थापक: इन्हें आयोग द्वारा रायपुर की कल्चुरी शाखा का संस्थापक माना गया है। [CG PSC(AMO)2017, (Pre) 2016, (ADS) 2017]
शासक: ये रायपुर कल्चुरी शाखा के प्रथम शासक थे। [CG PSC(AMO)2017]
नगर निर्माण: इन्होंने रायपुर नगर की स्थापना अपने पुत्र ब्रह्मदेवराय के नाम पर की थी। [CG PSC(Lib)2017]
निर्माण:
बूढ़ा तालाब के पास एक किले का निर्माण कराया।
श्री रामचन्द्रजी के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
विजय: खल्लारी शिलालेख के अनुसार, इन्होंने फणीनागवंशीय शासक मोनिंग देव को पराजित किया था।
ब्रह्मदेव / हरिब्रह्म देव
राजधानी:
खल्लारी।
रायपुर (इन्होंने ही 1409 ई. में रायपुर को अपनी राजधानी बनाया)।
निर्माण कार्य:
नारायण मंदिर (जगन्नाथ मंदिर):
स्थान: खल्लारी (महासमुंद)
वर्ष: 1415 ई.
निर्माणकर्ता: देवपाल (खल्लारी क्षेत्र का निवासी) [CG Vyapam(TC)2010] [CG PSC(ARO)2020]
हटकेश्वर महादेव मंदिर:
स्थान: महादेव घाट (रायपुर)
निर्माणकर्ता: हाजिराज
नदी: खारून नदी के तट पर।
शिलालेख:
रायपुर शिलालेख: यह वर्तमान में नागपुर संग्रहालय में संरक्षित है। [CG PSC(ARTO)2020]
खल्लारी शिलालेख:
वर्ष: 1402-1415 ई.
वर्णन: इसमें लक्ष्मीदेव के पुत्र सिंघणदेव, उनके पुत्र रामचन्द्रदेव और फिर उनके पुत्र ब्रम्हदेव का उल्लेख है। इसमें यह भी वर्णित है कि रामचंद्र देवराय ने फणीनागवंशी मोनिंगदेव को हराया था और देवपाल नामक मोची ने नारायण मंदिर का निर्माण कराया था।
भाषा: संस्कृत (लिपि – देवनागरी)।
विशेष: इन्हीं के नाम (ब्रह्मदेवराय) पर रायपुर शहर का नामकरण किया गया। [CG PSC(RDA)2014]
😔 रायपुर कल्चुरी शाखा का पतन
अमरसिंह देव
पदवी: ये रायपुर लहुरी शाखा के अंतिम शासक थे। [CG PSC(ADS)2017]
जानकारी: आरंग ताम्रपत्र (1735 ई.) के अनुसार, इन्होंने नंद ठाकुर को कुछ रियासतें प्रदान की थीं।
पतन का दौर:
1741 ई. में भोंसला सेनापति भास्कर पंत ने जब रतनपुर के कल्चुरियों पर आक्रमण किया, तब अमर सिंह ने मराठा सेना का कोई विरोध नहीं किया। इसी कारण, भास्कर पंत ने भी रायपुर शाखा पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया और अमर सिंह 1750 ई. तक शासन करते रहे।
1750 ई. में मराठा शासकों ने अमरसिंह को पद से हटा दिया और 7 हजार रु. वार्षिक भेंट के बदले में रायपुर, राजिम और पाटन के तीन परगने जागीर के रूप में प्रदान किए। [CGPSC(ADPO)2021]
मृत्यु: 1753 ई. में अमर सिंह की मृत्यु के बाद शिवराज सिंह उनके उत्तराधिकारी बने।
शिवराज सिंह देव
परिदृश्य: जब अमर सिंह की मृत्यु हुई, शिवराज सिंह तीर्थ यात्रा पर गए हुए थे। इस अवसर का लाभ उठाकर मराठों ने रायपुर, राजिम और पाटन पर कब्जा कर लिया।
अंतिम अध्याय: बाद में, जब छत्तीसगढ़ के शासक बिम्बाजी भोंसले बने, तो उन्होंने शिवराजसिंह देव के अनुरोध पर उन्हें जीवन-यापन के लिए महासमुंद तहसील में बड़गांव सहित कर-मुक्त 5 गांव प्रदान किए।
पूर्ण पतन: यह व्यवस्था 1822 ई. तक चली। ब्रिटिश नियंत्रण काल में भोंसला शासक ने बड़गांव को भी छीन लिया। इस प्रकार, 1822 में रायपुर शाखा के कल्चुरियों की सत्ता पूरी तरह समाप्त हो गई।
🏛️ कल्चुरीकालीन शासन व्यवस्था
शासन प्रणाली: छत्तीसगढ़ में कल्चुरी प्रशासन की व्यवस्था राजतंत्र पर आधारित थी। [CGPSC(ACF)2016, (ADPPO) 2017, (Sci.off.) 2018]
प्रशासनिक सहायता: प्रशासन में राजा को ‘अमात्यों’ (मंत्रियों) की सहायता प्राप्त होती थी। [CGPSC(ACF)2016, (ADPPO) 2017, (Sci.off.) 2018]
राज्य का विभाजन: सम्पूर्ण कल्चुरी राज्य को गढ़ों (प्रांतों) में विभाजित किया गया था।
दीर्घकालिक शासन: कल्चुरी शासकों ने प्रदेश में किसी भी अन्य राजवंश की तुलना में सबसे लंबी अवधि तक शासन किया। [CGPSC(ACF)2016]
प्रशासन की प्रकृति: कल्चुरियों ने छत्तीसगढ़ में एक लोकप्रिय, विकेन्द्रीकृत तथा सुदृढ़ शासन व्यवस्था की स्थापना की थी, जिसका प्रमुख राजा होता था। उन्होंने प्रशासनिक पदों पर स्थानीय लोगों को भी नियुक्त किया। [CGPSC(ACF)2016, (Sci.off.) 2018]
👨💼 कल्चुरीकालीन मंत्रीगण (मंत्रिपरिषद)
पद
विभाग / कार्य
01. युवराज
राजा का उत्तराधिकारी।
02. महामंत्री
सर्वप्रमुख अधिकारी, जो राजा का मुख्य प्रशासनिक सलाहकार होता था।
03. महामात्य
प्रमुख मंत्री।
04. अमात्य
मंत्री परिषद् का सदस्य।
05. महाध्यक्ष
सचिवालय का प्रमुख।
06. महाप्रतिहार
संचार विभाग का प्रमुख।
07. महाप्रमात्
यह जमाबंदी विभाग का प्रमुख होता था और प्रमुख लगान अधिकारी के रूप में कार्य करता था, जो भूमि लगान का निर्धारण करता था। [CG PSC (Pre)2017, (ADH) 2022]
08. महासंधिविग्रह
विदेश विभाग का प्रमुख। [CG PSC(ADJE)2020]
09. महाकोट्टपाल
दुर्ग या किले की रक्षा करने वाला अधिकारी। [CG PSC(ADJE)2020]
10. महापुरोहित / महाधर्म कार्णिक
धार्मिक विभाग का प्रमुख। (इसके अधीन दान पत्र लिखने हेतु धर्मलेखी कार्य करते थे)। [CG PSC(ADJE)2020]
👮♂️ कल्चुरीकालीन अधिकारीगण
पद
संबंधित विभाग / कार्य
पद
संबंधित विभाग / कार्य
01. शोल्किक
कर संग्रहण अधिकारी
07. नैमित्तिक
राज ज्योतिषी
02. पुरप्रधान
नगर का प्रमुख अधिकारी
08. आकराधिकार पुरुष
राज्य की खानों का प्रमुख
03. ग्रामकुट
ग्राम का प्रमुख अधिकारी
09. घट्टपत्ति व तरपत्ति
नावों की देख-रेख करने वाला
04. ग्रामागमिक
यातायात प्रबंधक अधिकारी
10. दांडिक
न्याय अधिकारी [CG PSC(ADJE)2020]
05. महाभण्डागारीक
मुख्य कोषाध्यक्ष
11. महाक्ष पटलिक
राजस्व विभाग
06. महाबलाधिकृत
मुख्य सेनापति
12. धर्मलेखी
दानपत्रों का लेखा-जोखा करने वाला अधिकारी। [CG PSC(ADJE)2020]
⚖️ प्रशासनिक एवं राजस्व व्यवस्था
पुलिस व्यवस्था
पद
विवरण
1. दण्डपाशिक
सर्वोच्च पुलिस अधिकारी
2. दुष्टसाधक
चोरों को पकड़ने वाला अधिकारी
3. चाट
लोगों की संपत्ति की रक्षा करने वाली पुलिस
4. भाट
शांति व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस
सैन्य व्यवस्था
पद
विवरण
प्रमुख
राजा
सर्वोच्च अधिकारी
महाबलाधिकृत (सेनापति)
हस्ति सेना प्रमुख
महापीलुपति
अश्वसेना प्रमुख
महाश्वसाधनिक
राजस्व व्यवस्था
पद
विवरण
महा-प्रमात्
प्रमुख राजस्व अधिकारी [CG PSC(ADH)2022]
शोल्किक
कर संग्रहण अधिकारी
युगा
मंडपिका/बाजारों में सामान बेचने के लिए लिया जाने वाला परवाना (परमिट)। (2 युगा = 1 पौर)
🏘️ कल्चुरियों की पंचकुल व्यवस्था
उद्देश्य: गाँव और नगरों में स्थानीय स्व-शासन के लिए कल्चुरी शासकों ने पंचकुल व्यवस्था का निर्माण किया था। [CG PSC(SES)2017]
सदस्य: इसमें पांच से दस सदस्य होते थे, जिन्हें महत्तर कहा जाता था। सदस्य प्रमुख को महत्तम कहते थे।
प्रमुख:
नगर प्रमुख – पुरप्रधान
ग्राम प्रमुख – ग्रामकुट / ग्रामभोगी (ये गौंटिया के अधीन होते थे)।
अधिकारी: इसमें 6 प्रमुख अधिकारी होते थे: मुख्य पुलिस अधिकारी, पटेल, तहसीलदार, लेखक/करणिक, शुल्क ग्राह (कर वसूलने वाला), और प्रतिहारी (सिपाही)। [CG Vyapam (ITI H)2023]
मुख्य ग्राम: मुख्य ग्राम को “ज्येष्ठिका ग्राम” कहा जाता था।
गौंटिया: गौंटिया को गांव में कृषि योग्य भूमि का 8वाँ भाग निःशुल्क और गांवों की जमीन का 16वाँ भाग दान आदि के लिए दिया जाता था।
रतनपुर का विभाजन: रतनपुर नगर को 5 भागों (खोल) में विभाजित किया गया था: तुमान खोल, नलखोल, देवी खोल, भैरमखोल और वराहखोल। [CG PSC(ADA)2020]
पदों का पदानुक्रम और गांवों की संख्या
पद
गांवों के स्वामी
महामण्डलेश्वर
01 लाख
माण्डलिक
50 हजार
सामंत
10 हजार
लघु सामंत
05 हजार
चतुरांशक
01 हजार
🔺 कल्चुरीकालीन प्रशासनिक इकाई एवं उनके प्रमुख
स्तर
इकाई
अधिकारी / पदनाम
विशेषता
1️⃣
राष्ट्र (सर्वोच्च इकाई)
राजा
सम्पूर्ण शासन का प्रमुख
2️⃣
विषय (जिला)
विषयपति
जिला स्तर का अधिकारी
3️⃣
देश / जनपद (लगभग 1 लाख गाँवों का समूह)
महामण्डलेश्वर
प्रान्तीय शासक
4️⃣
मण्डल (विकासखण्ड)
माण्डलिक
मण्डल स्तर का अधिकारी
5️⃣
गढ़ (एक गढ़ में 84 गाँव = 12×7)
दीवान / गढ़ाधिपति
गढ़ का शासक
6️⃣
बरहों (12 गाँवों का समूह)
दाऊ / तालुकाधिपति
छोटे समूह का प्रमुख
7️⃣
ग्राम (सबसे छोटी इकाई)
गौटिया
गाँव का मुखिया
📚 कल्चुरीकालीन साहित्य एवं भाषा
लेखक / कवि
रचनाएँ
गोपाल चन्द्र मिश्र (राजसिंह के दरबारी कवि)
1. खूब तमाशा (1689 ई.) – गोपाल कवि ने इस कृति में इस क्षेत्र को पहली बार ‘छत्तीसगढ़’ नाम से संबोधित किया। 2. सुदामा चरित [CG Vyapam (Asst. lekh.)2018],[CGPSC(ADR)2019] 3. जैमिनी अश्वमेघ 4. भक्ति चिंतामणि (कृष्ण प्रबंध काव्य) 5. राम प्रताप (अपूर्ण)
माखन मिश्र
1. राम प्रताप (पूर्ण) 2. छन्द विलास 3. गोपाल विरचित
पं. तेजनाथ शास्त्री
रामायण सार संग्रह
नारायण कवि
रामाभ्युदय (इस रचना की जानकारी पुजारीपाली शिलालेख से मिलती है।)
शिवदत्त शास्त्री
रतनपुर इतिहास समुच्चय
भाषा:
राजाश्रय: कल्चुरी दरबार में संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत भाषा के कवियों को भी आश्रय प्राप्त था।
राजकार्य की भाषा: राज-काज के सभी कार्य संस्कृत भाषा में होते थे।
जनसामान्य की भाषा: आम लोगों में छत्तीसगढ़ी बोली का प्रचलन था।
🌱 अग्रहार
परिभाषा: यह एक विशेष प्रकार की दान प्रथा थी, जिसके तहत ब्राह्मणों को किसी गाँव में बसाकर उनके जीवन-यापन के लिए उस गाँव की सम्पूर्ण आय दान में दे दी जाती थी।
🌾 कल्चुरीकालीन आर्थिक दशा
आजीविका: कल्चुरी काल में अधिकांश लोगों का आर्थिक जीवन कृषि एवं पशुपालन पर ही निर्भर था।
⚖️ माप और तौल
भूमि माप (Land Measurement)
भूमि की माप हलों की संख्या के आधार पर की जाती थी।
एक हल = एक बैल द्वारा जोती जाने वाली भूमि (लगभग पाँच एकड़ जमीन के बराबर)।
तौल का मान (Weight Measurement)
5 सेर = 1 पंसेरी
8 पंसेरी = 1 मन [CGPSC(AMO)2022, (Sci. Off.)2022]
सिक्कों का मान (Currency Value)
4 कौड़ी = 1 गंडा
5 गंडा = 1 कोरी
20 कोरी = 1 दोगानी
16 दोगानी = 1 रुपया
💰 कर व्यवस्था
प्रमुख कर: भूमि कर, बाग-बगीचा कर, चारागाह कर, वन कर, आयात-निर्यात कर, नाव कर, पशु बिक्री कर, नमक कर, खान कर, और नदी घाट कर जैसे विभिन्न प्रकार के कर लगाए जाते थे।
विशेष कर:
घोड़े की बिक्री पर 2 पौर कर लगता था।
हाथी की बिक्री पर 4 पौर कर लगता था।
पौर का आशय चांदी के सिक्के से था, जबकि 2 युगा = 1 पौर होता था।
⚖️ स्थानीय न्याय और भूमि प्रथा
ग्राम पंचायत:
यह गाँव के वाद-विवादों का निपटारा करती थी।
फौजदारी मामलों में लगने वाले जुर्माने को “दशापराध दण्ड” कहा जाता था।
जुर्माने की राशि राजा या दान प्राप्त करने वाले ब्राह्मण के पास जमा होती थी।
लाखा बांटा:
यह कल्चुरी काल में प्रचलित जमीन की अदला-बदली की एक प्रथा थी, जो 1864-65 तक भी जारी रही।
इस प्रथा के अंतर्गत, भू-लगान का निर्धारण गौंटिया और किसान के बीच अंतिम सहमति से होता था।
📜 कल्चुरीकालीन करों की विस्तृत सूची
कर का नाम
कर का विवरण
उद्रंग
स्थायी भूमि पर लगने वाला कर।
उपरिकर
अस्थायी कृषि भूमि पर लिया जाने वाला कर।
भाग
उपज का 1/6 हिस्सा।
भोग
राजा को दिया जाने वाला विशेष उपहार या उपकर।
हिरण्य
नकद (Cash) के रूप में दिया जाने वाला कर।
प्रवणि कर
व्यापारियों से लिया जाने वाला कर।
वृष्टि
बेगारी कर (बिना मजदूरी के काम करवाना)।
भूतवात-प्रत्यय
गांव के उत्पादित वस्तुओं और बाहर से गांव में लाई गई वस्तुओं पर लगने वाला कर।
दशापराध
गाँव वालों से किसी अपराध के लिए लिया जाने वाला जुर्माना।
दूःसाध्यादाय
फौजदारी (आपराधिक) अपराधियों से लिया जाने वाला कर।
दित्य
राजा को दिया जाने वाला नजराना।
वसतिदण्ड व प्रयाणदण्ड
राजा के सिपाहियों की सेवा के लिए लिया जाने वाला कर।
चोल्लिका कर
मंदिरों में आने वाले पुष्पों पर कर।
खलाभिक्षा
खलिहान की जमीन पर लगने वाला चुंगी कर।
रसवती
शराब निर्माण पर कर।
चरी
पशु चारण (चराई) पर कर।
पट्टकिलादाय
पटेल के वेतन के लिए लिया जाने वाला कर।
घट्टादाय
घाट के उपयोग पर लगने वाला कर, जिसे घटपति वसूलता था।
मागणिक
आपातकालीन स्थितियों में लगाया जाने वाला कर।
🏰 छत्तीसगढ़ में कल्चुरीकालीन गढ़-व्यवस्था
विभाजन: छत्तीसगढ़ में गढ़ व्यवस्था कल्चुरियों की दो शाखाओं के बीच विभाजित थी:
शिवनाथ नदी का उत्तरी भाग: रतनपुर के राजा के अधिकार क्षेत्र में 18 गढ़ थे।
शिवनाथ नदी का दक्षिणी भाग: रायपुर के राजा के अधिकार क्षेत्र में 18 गढ़ थे।
छत्तीसगढ़ नामकरण: दोनों भागों को मिलाकर कुल 36 गढ़ होते थे, और इसी कारण से इस क्षेत्र का नाम छत्तीसगढ़ पड़ा। [CSPHCL-2019] [CG V.S (AG-3))2021]
विशेष: यदि गढ़पति (गढ़ का प्रमुख) ब्राह्मण होता था, तो उसे दीवान कहा जाता था। जमाबंदी प्रणाली के आधार पर ही इन 36 गढ़ों की खोज मि. चिस्म ने की थी।
📜 विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)
प्र-1. निम्नलिखित में से कौन-सा गढ़ छत्तीसगढ़ राज्य में मौजूद नहीं है? [CG PSC(ADP)2019] (A) पावागढ़ (B) सिंघनगढ़ (C) कोटगढ़ (D) नवागढ़
प्र-2. कल्चुरी कालीन रतनपुर से शासित होने वाले गढ़ों के निम्नलिखित समूहों में से सही गढ़ों का समूह चुनिए। [CG PSC(Pre)2023] (A) खरौद, लाफा, छुरी, पंडरभट्ठा (B) उपरोड़ा, खल्लारी, नवागढ़, मोहंदी (C) लाफा, नवागढ़, सिमगा, मातिन (D) अकलवाड़ा, तेंगनगढ़, लवन, मारो