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👑 ब्रिटिश आर्थिक नीतियां: भारत पर प्रभाव 👑

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में लागू की गई आर्थिक नीतियां मुख्य रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के हितों को साधने के लिए बनाई गई थीं। इन नीतियों ने भारत की पारंपरिक अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया और भारतीय संसाधनों का जमकर शोषण किया। 1757 से 1947 तक, इन नीतियों को मोटे तौर पर तीन चरणों में बांटा जा सकता है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के चरण 🪜

  1. व्यापारिक चरण (1757-1813): 🤑
    • इस चरण में, ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना और भारतीय वस्तुओं को खरीदकर यूरोप में बेचना था।
    • बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अधिकार प्राप्त करने के बाद, कंपनी ने भारतीय राजस्व का उपयोग भारतीय माल खरीदने के लिए किया, जिसे इंग्लैंड निर्यात किया गया।
    • इस दौरान भारत से धन का भारी मात्रा में पलायन हुआ, जिसने ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को वित्तपोषित करने में मदद की।
  2. औद्योगिक पूंजीवाद या मुक्त व्यापार का चरण (1813-1858): 🏭
    • 1813 के चार्टर एक्ट के बाद, कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हो गया और ‘मुक्त व्यापार’ की नीति अपनाई गई।
    • इसका असल मतलब था कि भारत को ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के लिए एक बाजार और कच्चे माल के स्रोत के रूप में बदल दिया गया।
    • ब्रिटेन से मशीनों से बने सस्ते कपड़े भारत में आने लगे, जिससे भारत के पारंपरिक हस्तशिल्प और कपड़ा उद्योग का पतन हो गया।
  3. वित्तीय पूंजीवाद का चरण (1858-1947): 💰
    • 1857 के विद्रोह के बाद, भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। इस चरण में, ब्रिटिश पूंजी का भारत में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ।
    • यह निवेश रेलवे, बागानों, कोयला खदानों और जूट मिलों जैसे क्षेत्रों में किया गया, जिनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति और तैयार माल को भारत के दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचाना था।
    • बैंकों और निर्यात-आयात फर्मों के माध्यम से ब्रिटिश पूंजी ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

प्रमुख आर्थिक नीतियां और उनका प्रभाव 📝

1. भू-राजस्व व्यवस्था (Land Revenue Systems): 🌾
अंग्रेजों ने अधिक से अधिक लगान वसूलने के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह की भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू कीं।

व्यवस्था का नामलागू क्षेत्रमुख्य प्रावधानप्रभाव
स्थायी बंदोबस्त (जमींदारी)बंगाल, बिहार, उड़ीसा, यू.पी. के कुछ हिस्सेजमींदारों को भूमि का स्वामी मानकर राजस्व की दर स्थायी रूप से तय कर दी गई। सरकार को राजस्व का 10/11 हिस्सा मिलता था।किसानों का अत्यधिक शोषण हुआ, जमींदारों का एक वफादार वर्ग तैयार हुआ, और कृषि में कोई निवेश नहीं हुआ।
रैयतवाड़ी व्यवस्थामद्रास, बंबई, असम, कुर्ग के कुछ हिस्सेसरकार का किसानों (रैयतों) से सीधा संपर्क स्थापित हुआ। भूमि का मालिक किसान को माना गया। राजस्व की दर बहुत ऊंची थी और इसे समय-समय पर संशोधित किया जाता था।किसानों पर लगान का बोझ बहुत अधिक था। प्राकृतिक आपदाओं में भी कोई छूट नहीं मिलती थी, जिससे वे महाजनों के चंगुल में फंस जाते थे।
महालवाड़ी व्यवस्थाउत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत, पंजाबपूरे गांव या ‘महाल’ को एक इकाई माना गया और राजस्व वसूली का जिम्मा गांव के मुखिया या प्रतिनिधियों को सौंपा गया।इसने भी किसानों का शोषण किया और अंततः ग्रामीण समुदाय की पारंपरिक संरचना को कमजोर कर दिया।

2. वि-औद्योगिकीकरण (De-industrialization): 📉

  • ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के बाद, भारत में ब्रिटेन की मशीनों से बना सस्ता माल बड़ी मात्रा में आने लगा।
  • ब्रिटिश सरकार ने भारतीय वस्तुओं के ब्रिटेन में आयात पर भारी शुल्क लगाया, जबकि ब्रिटिश माल के भारत में आयात को प्रोत्साहित किया।
  • परिणामस्वरूप, भारत के विश्व प्रसिद्ध वस्त्र उद्योग और अन्य हस्तशिल्प उद्योग नष्ट हो गए, जिससे लाखों कारीगर और शिल्पकार बेरोजगार हो गए और कृषि पर निर्भरता बढ़ गई।

3. कृषि का वाणिज्यीकरण (Commercialization of Agriculture): ☕🌱

  • किसानों को खाद्यान्न फसलों की जगह नील, कपास, जूट, चाय और अफीम जैसी नकदी फसलें उगाने के लिए मजबूर किया गया, क्योंकि ब्रिटिश उद्योगों को इन कच्चे मालों की जरूरत थी।
  • इसका परिणाम यह हुआ कि खाद्यान्न का उत्पादन कम हो गया, जिससे बार-बार अकाल पड़ने लगे।

4. धन की निकासी का सिद्धांत (Drain of Wealth Theory): 💸➡️🇬🇧

  • दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक ‘पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया।
  • इसका अर्थ था कि भारत से धन और संसाधनों का एकतरफा प्रवाह ब्रिटेन की ओर हो रहा था, जिसके बदले में भारत को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा था।
  • यह निकासी अंग्रेज अधिकारियों के वेतन, पेंशन, प्रशासनिक और सैन्य खर्चों के रूप में होती थी। दादाभाई नौरोजी ने इसे “सभी बुराइयों की बुराई” कहा।

निष्कर्ष 📜

ब्रिटिश आर्थिक नीतियों ने भारत की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। 😠 उन्होंने भारत को एक कच्चा माल उत्पादक और ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं का उपभोक्ता देश बना दिया। इन शोषणकारी नीतियों के कारण भारत में गरीबी और आर्थिक पिछड़ापन बढ़ा, जिसका प्रभाव आजादी के बाद भी लंबे समय तक महसूस किया गया।