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यूरोपीय शक्तियों का आगमन: एक विस्तृत विश्लेषण

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15वीं शताब्दी तक, भारत और पूर्वी देशों के मसालों, रेशम और कीमती पत्थरों का व्यापार यूरोप में बहुत लाभदायक था। यह व्यापार मुख्य रूप से भूमि मार्गों (सिल्क रूट) से होता था, जिस पर अरब और वेनिस के व्यापारियों का एकाधिकार था।

  • 1453 में कुस्तुन्तुनिया (Constantinople) पर तुर्कों का अधिकार: इस घटना ने यूरोप और भारत के बीच के पारंपरिक भूमि व्यापार मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। अब यूरोपीय देशों को मसालों और अन्य वस्तुओं के लिए तुर्क साम्राज्य को भारी कर देना पड़ता था, जिससे व्यापार घाटे का सौदा बन गया।
  • पुनर्जागरण (Renaissance) का प्रभाव: यूरोप में वैज्ञानिक सोच, नई खोजों और साहसिक कार्यों को बढ़ावा मिला। जहाज निर्माण तकनीक बेहतर हुई और नाविकों को दुनिया के नए समुद्री मार्गों की खोज के लिए प्रोत्साहित किया गया।
  • धन और धर्म का आकर्षण: यूरोपीय शासक पूर्व के देशों के साथ सीधा व्यापार करके अपार धन कमाना चाहते थे। इसके साथ ही, ईसाई धर्म का प्रचार भी एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था। इसे अक्सर “Gold, Glory, and God” (धन, वैभव और ईश्वर) के नारे से जोड़ा जाता है।

पुर्तगाली “कंपनी” के बारे में विस्तृत जानकारी यहाँ दी गई है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह ब्रिटिश या डच ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी निजी ज्वाइंट-स्टॉक कंपनी नहीं थी, बल्कि यह सीधे पुर्तगाली राजशाही द्वारा नियंत्रित एक राज्य-उद्यम (State Enterprise) थी।


पुर्तगाली साम्राज्य: एस्टाडो-द-इंडिया (Estado da Índia – “भारत का राज्य”)

पुर्तगाली, भारत आने वाली पहली और जाने वाली अंतिम यूरोपीय शक्ति थे। उनके आगमन ने भारत और यूरोप के बीच संबंधों का एक नया अध्याय शुरू किया।

कंपनी की प्रकृति: एक सरकारी उद्यम

  • नाम: पुर्तगालियों के भारतीय साम्राज्य को आधिकारिक तौर पर “एस्टाडो-द-इंडिया” (The State of India) कहा जाता था।
  • संरचना: यह एक निजी कंपनी नहीं थी। इसके सभी निर्णय, गवर्नर की नियुक्ति और नीतियां सीधे पुर्तगाल के राजा द्वारा नियंत्रित होती थीं। इसका मुख्य उद्देश्य व्यापार से लाभ कमाने के साथ-साथ पुर्तगाली साम्राज्य का विस्तार और ईसाई धर्म का प्रचार करना था।
  • फर्क: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक निजी कंपनी थी जिसे व्यापार करने के लिए सरकार से चार्टर मिला था, जबकि एस्टाडो-द-इंडिया खुद पुर्तगाली सरकार का ही एक अंग था।

आगमन और प्रमुख घटनाएँ (Arrival and Key Events)

  • 1498: वास्को-डी-गामा का कालीकट (केरल) आगमन। यह भारत के लिए सीधे समुद्री मार्ग की खोज थी, जिसने अरब और वेनिस के व्यापारियों के मसाला व्यापार के एकाधिकार को तोड़ दिया।
  • 1503: पुर्तगालियों ने कोचीन में अपनी पहली फैक्ट्री (किला) स्थापित की।
  • 1505: फ्रांसिस्को-डी-अल्मीडा को भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर नियुक्त किया गया।
  • 1510: अल्फांसो-डी-अल्बुकर्क (भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक) ने बीजापुर के सुल्तान से गोवा को जीत लिया। यह भारत में उनकी सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण विजय थी।
  • 1530: राजधानी को कोचीन से गोवा स्थानांतरित कर दिया गया। गोवा अगले 400 वर्षों तक पुर्तगाली भारत की राजधानी बना रहा।
  • 1535 और 1559: क्रमशः दीव और दमन पर कब्जा कर लिया गया, जिससे पश्चिमी तट पर उनकी पकड़ मजबूत हो गई।

प्रमुख नीतियां और रणनीतियाँ (Key Policies and Strategies)

  1. शांत जल की नीति (Blue Water Policy): गवर्नर अल्मीडा द्वारा शुरू की गई इस नीति का उद्देश्य जमीन पर अधिकार करने के बजाय हिंद महासागर में नौसैनिक वर्चस्व स्थापित करना था।
  2. क्षेत्रीय साम्राज्य की स्थापना: अल्बुकर्क ने इस नीति को बदल दिया और गोवा जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर सीधे कब्जा करके एक स्थायी क्षेत्रीय साम्राज्य की नींव रखी।
  3. कार्टाज़ प्रणाली (Cartaz System): यह पुर्तगाली शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद उपकरण था।
    • यह क्या था: यह एक तरह का व्यापारिक लाइसेंस या परमिट था।
    • कार्यप्रणाली: हिंद महासागर में व्यापार करने वाले किसी भी गैर-पुर्तगाली जहाज को पुर्तगालियों से ‘कार्टाज़’ खरीदना पड़ता था। जिन जहाजों के पास कार्टाज़ नहीं होता था, उन्हें लूट लिया जाता था या डुबो दिया जाता था। यहाँ तक कि मुगल बादशाह अकबर को भी अपने जहाजों के लिए यह लेना पड़ता था।
    • उद्देश्य: हिंद महासागर के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना और राजस्व उत्पन्न करना।

भारत पर प्रभाव और योगदान (Impact and Contributions)

  • नकारात्मक प्रभाव:
    • धार्मिक असहिष्णुता: उन्होंने गोवा में “गोवा इन्क्विजिशन” (Goa Inquisition) की स्थापना की, जिसके तहत गैर-ईसाइयों (हिंदुओं और मुसलमानों) पर अत्याचार किए गए और उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।
    • समुद्री लूटपाट: कार्टाज़ प्रणाली के माध्यम से उन्होंने समुद्री व्यापार पर आतंक का माहौल बना दिया।
  • सकारात्मक प्रभाव:
    • नई फसलों का आगमन: पुर्तगाली अपने साथ अमेरिका से कई नई फसलें लेकर आए, जिनमें तम्बाकू, आलू, मक्का, टमाटर और लाल मिर्च शामिल हैं।
    • प्रिंटिंग प्रेस: भारत में पहले प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना 1556 में गोवा में पुर्तगालियों द्वारा ही की गई थी।
    • वास्तुकला: उन्होंने भारत में ‘गोथिक’ वास्तुकला की शुरुआत की। गोवा के कई चर्च आज भी इसके उदाहरण हैं।

पतन के कारण (Reasons for Decline)

  • अन्य यूरोपीय शक्तियों का आगमन: 17वीं शताब्दी में डचों और अंग्रेजों के आगमन ने उनकी नौसैनिक श्रेष्ठता को चुनौती दी और उन्हें कई जगहों से खदेड़ दिया।
  • धार्मिक नीतियां: उनकी कट्टर धार्मिक नीतियों ने उन्हें स्थानीय शासकों और प्रजा के बीच अलोकप्रिय बना दिया।
  • ब्राजील की खोज: उनका ध्यान दक्षिण अमेरिका में अपने नए उपनिवेश, ब्राजील की ओर अधिक आकर्षित हो गया, जो उन्हें भारत से ज्यादा लाभदायक लगा।
  • भ्रष्टाचार: उनके अधिकारी भ्रष्ट हो गए और निजी व्यापार को ज्यादा महत्व देने लगे।

अंतिम वापसी (The Final Departure)

पुर्तगाली भारत आने वाले पहले यूरोपीय थे और जाने वाले अंतिम थे। भारत की आजादी के बाद भी, गोवा, दमन और दीव उनके कब्जे में रहे। 1961 में, भारतीय सेना ने “ऑपरेशन विजय” के माध्यम से इन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और पुर्तगाली शासन का अंत हुआ।

सारांश तालिका

पहलूविवरण
आधिकारिक नामएस्टाडो-द-इंडिया (Estado da Índia)
प्रकृतिसरकारी-उद्यम (State-run Enterprise)
प्रथम आगमन1498 (वास्को-डी-गामा)
पहली फैक्ट्रीकोचीन (1503)
राजधानीगोवा (1530 से)
प्रमुख नीतिकार्टाज़ प्रणाली (Cartaz System)
योगदानप्रिंटिंग प्रेस, नई फसलें (आलू, मिर्च), गोथिक वास्तुकला
अंतिम वापसी1961 (ऑपरेशन विजय द्वारा)

पुर्तगाली गवर्नर: परिचय और उद्देश्य

1498 में वास्को-डी-गामा के आगमन के बाद, पुर्तगालियों को यह समझ आ गया था कि भारत में अपने व्यापारिक हितों की रक्षा और विस्तार के लिए एक स्थायी और संगठित प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से, पुर्तगाली राजा ने भारत में वायसराय या गवर्नर नियुक्त करने का निर्णय लिया।

इन गवर्नरों के मुख्य उद्देश्य थे:

  • मसाला व्यापार पर एकाधिकार: अरब व्यापारियों को हिंद महासागर से पूरी तरह हटाना।
  • नौसैनिक प्रभुत्व: हिंद महासागर में पुर्तगाली नौसेना को सर्वोच्च शक्ति बनाना।
  • साम्राज्य विस्तार: सामरिक महत्व के बंदरगाहों और क्षेत्रों पर कब्जा करना।
  • धर्म प्रचार: ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना।

यहाँ तीन सबसे महत्वपूर्ण पुर्तगाली गवर्नरों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जिन्होंने पुर्तगाली शक्ति की दिशा तय की।

1. फ्रांसिस्को-डी-अल्मीडा (Francisco de Almeida)

  • कार्यकाल: 1505 – 1509
  • उपाधि: भारत में प्रथम पुर्तगाली गवर्नर।

प्रमुख नीतियां और कार्य:

  • 🔵 शांत जल की नीति (Blue Water Policy): अल्मीडा का मानना था कि पुर्तगालियों को जमीन पर किले बनाने के बजाय समुद्र पर अपनी शक्ति केंद्रित करनी चाहिए। उसका मानना था कि “जो भी समुद्र का स्वामी होगा, वही भारत का स्वामी होगा।” इसी नीति के तहत, उसने हिंद महासागर में एक शक्तिशाली नौसेना स्थापित करने पर जोर दिया।
  • नौसैनिक विजय: 1509 में, उसने मिस्र, तुर्की और गुजरात की संयुक्त नौसेना को दीव के युद्ध में हराकर हिंद महासागर में पुर्तगाली नौसैनिक श्रेष्ठता स्थापित की।

महत्व: अल्मीडा ने भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की नौसैनिक नींव रखी। उसने यह सुनिश्चित किया कि समुद्र के व्यापार मार्गों पर पुर्तगालियों का पूर्ण नियंत्रण हो।


2. अल्फांसो-डी-अल्बुकर्क (Afonso de Albuquerque)

  • कार्यकाल: 1509 – 1515
  • उपाधि: भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक (Real Founder)

प्रमुख नीतियां और कार्य:

  • ⚔️ गोवा पर विजय (1510): यह अल्बुकर्क की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उसने बीजापुर के सुल्तान, यूसुफ आदिल शाह से गोवा छीन लिया। गोवा अपने प्राकृतिक बंदरगाह और सामरिक स्थिति के कारण पुर्तगाली साम्राज्य का एक आदर्श मुख्यालय बन गया।
  • साम्राज्य विस्तार: उसने पूर्व में मलक्का (1511) और फारस की खाड़ी में होर्मुज (1515) पर भी नियंत्रण स्थापित किया, जिससे हिंद महासागर के सभी प्रमुख प्रवेश द्वारों पर पुर्तगालियों का कब्जा हो गया।
  • सामाजिक नीतियां:
    • उसने पुर्तगालियों को स्थानीय भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसका उद्देश्य एक स्थायी पुर्तगाली आबादी बनाना था जो साम्राज्य के प्रति वफादार हो।
    • उसने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया, ऐसा करने वाला वह पहला यूरोपीय था।
  • किलेबंदी: उसने ब्लू वाटर पॉलिसी के विपरीत, जमीन पर मजबूत किले बनाने और क्षेत्र पर स्थायी कब्जा करने पर जोर दिया।

महत्व: अल्बुकर्क ने पुर्तगाली उपस्थिति को एक व्यापारिक उद्यम से एक स्थायी क्षेत्रीय साम्राज्य (Territorial Empire) में बदल दिया। उसने पुर्तगाली शक्ति का प्रशासनिक और सैन्य केंद्र स्थापित किया।


3. नूनो-दा-कुन्हा (Nuno da Cunha)

  • कार्यकाल: 1529 – 1538
  • उपाधि: साम्राज्य का विस्तारक और संगठक।

प्रमुख नीतियां और कार्य:

  • राजधानी का स्थानांतरण (1530): उसने पुर्तगाली सरकार के मुख्यालय को कोचीन से गोवा स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद गोवा आधिकारिक रूप से पुर्तगाली भारत की राजधानी बन गया।
  • नए क्षेत्रों पर कब्जा: उसने गुजरात के शासक बहादुर शाह की मदद की और बदले में दीव और बेसिन (वसई) पर कब्जा कर लिया, जिससे पश्चिमी तट पर पुर्तगाली प्रभाव और बढ़ गया।

महत्व: नूनो-दा-कुन्हा ने अल्बुकर्क द्वारा स्थापित साम्राज्य को और मजबूत किया और उसका विस्तार किया। उसके समय में, गोवा पुर्तगाली एशिया का राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र बन गया।


सारांश तालिका (Summary Table)

गवर्नरकार्यकालसबसे महत्वपूर्ण योगदानउपाधि/विशेषता
फ्रांसिस्को-डी-अल्मीडा1505-1509🔵 ब्लू वाटर पॉलिसी और नौसैनिक प्रभुत्वप्रथम पुर्तगाली गवर्नर
अल्फांसो-डी-अल्बुकर्क1509-1515⚔️ गोवा पर विजय (1510) और स्थायी साम्राज्य की नींवपुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक
नूनो-दा-कुन्हा1529-1538🏛️ राजधानी को गोवा स्थानांतरित किया; दीव और बेसिन पर कब्ज़ासाम्राज्य का विस्तारक

इन तीन गवर्नरों के बाद भी कई गवर्नर आए, लेकिन पुर्तगाली शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होती गई क्योंकि उन्हें डचों और बाद में अंग्रेजों से कड़ी चुनौती मिली। हालांकि, गोवा, दमन और दीव पर उनका शासन 1961 तक बना रहा।


2. डच 🇳🇱 (The Commercial Power – व्यावसायिक शक्ति)

डचों की रुचि भारत में साम्राज्य स्थापित करने में नहीं थी, बल्कि वे विशुद्ध रूप से व्यापार करने आए थे। उनका मुख्य लक्ष्य इंडोनेशिया के “मसाला द्वीपों” (Spice Islands) पर नियंत्रण करना था। भारत उनके लिए सिर्फ एक व्यापारिक स्टेशन था।

डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) के बारे में विस्तार से जानते हैं, जो इतिहास की सबसे शक्तिशाली और धनी व्यापारिक कंपनियों में से एक थी।

डच ईस्ट इंडिया कंपनी: Vereenigde Oostindische Compagnie (VOC) 🇳🇱

यह सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि एक आर्थिक और सैन्य महाशक्ति थी। इसे दुनिया की पहली बहुराष्ट्रीय निगम (Multinational Corporation) और पहली ज्वाइंट-स्टॉक कंपनी (Joint-Stock Company) माना जाता है जिसे स्टॉक जारी करने का अधिकार था।

1. कंपनी की प्रकृति और स्थापना

  • नाम: Vereenigde Oostindische Compagnie (VOC), जिसका अर्थ है “संयुक्त ईस्ट इंडिया कंपनी”।
  • स्थापना: 1602 में, नीदरलैंड की सरकार (States-General) द्वारा। इसे एशिया के साथ व्यापार करने के लिए 21 साल का एकाधिकार दिया गया था।
  • संरचना और शक्तियाँ: VOC एक निजी कंपनी थी, लेकिन इसे सरकार से लगभग एक देश जैसी शक्तियाँ प्राप्त थीं:
    • युद्ध छेड़ने और शांति समझौते करने का अधिकार।
    • किले और उपनिवेश बनाने का अधिकार।
    • अपने सिक्के ढालने का अधिकार।
    • अन्य देशों के साथ संधियाँ करने का अधिकार।

यह इसे पुर्तगाली मॉडल (जो पूरी तरह से सरकारी था) से अधिक लचीला और फ्रांसीसी मॉडल (जो सरकार पर बहुत अधिक निर्भर था) से अधिक शक्तिशाली बनाता था।


2. भारत में आगमन और प्रमुख फैक्ट्रियाँ

डचों का मुख्य उद्देश्य पुर्तगालियों को मसाला व्यापार से बाहर करना और व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना था। भारत उनके लिए इंडोनेशिया के मसाला द्वीपों (Spice Islands) तक पहुँचने के रास्ते में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।

  • पहली फैक्ट्री (1605): मसूलीपट्टनम (आंध्र प्रदेश के कोरोमंडल तट पर)।
  • अन्य प्रमुख केंद्र:
    • पुलीकट (Pulicat): मसूलीपट्टनम के बाद, यह भारत में उनका मुख्य केंद्र बन गया। उन्होंने यहीं अपने सोने के सिक्के (पगोडा) ढाले।
    • सूरत (1616): पश्चिमी भारत में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र।
    • चिनसुरा (1653): बंगाल में, जो वस्त्र, अफीम और शोरा के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
    • कोचीन (1663): उन्होंने पुर्तगालियों को हराकर मालाबार तट पर इस महत्वपूर्ण बंदरगाह पर कब्जा कर लिया, जिससे काली मिर्च के व्यापार पर उनका नियंत्रण हो गया।

3. व्यापार और आर्थिक रणनीति (Trade and Economic Strategy)

  • प्रमुख व्यापारिक वस्तुएँ:
    • सूती वस्त्र (Cotton Textiles): भारत में डचों का मुख्य व्यवसाय कपड़े का था। वे कोरोमंडल तट से बड़ी मात्रा में कपड़ा खरीदते और उसे दक्षिण-पूर्व एशिया (मसाला द्वीपों) में बेचकर मसाले खरीदते थे।
    • मसाले: काली मिर्च, लौंग, जायफल आदि।
    • अन्य वस्तुएँ: रेशम, अफीम (बंगाल से), शोरा (saltpetre, बारूद बनाने के लिए) और नील।
  • रणनीति: उनकी रणनीति सीधी थी – प्रतिस्पर्धा को खत्म करो और एकाधिकार स्थापित करो। उन्होंने पुर्तगालियों को सैन्य रूप से हराया और अंग्रेजों के साथ लगातार व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में लगे रहे।

4. पतन के कारण (Reasons for Decline in India)

17वीं शताब्दी में अपनी सफलता के बावजूद, 18वीं शताब्दी में भारत में डच शक्ति का पतन शुरू हो गया।

  • ⚔️ बेदरा का युद्ध (Battle of Bedara, 1759): यह भारत में डचों के पतन का निर्णायक मोड़ था।
    • स्थान: बंगाल (चिनसुरा के पास)।
    • किसके बीच: रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना और डच सेना के बीच।
    • परिणाम: डचों की बुरी तरह हार हुई। इस हार ने भारत में उनकी सैन्य महत्वाकांक्षाओं को समाप्त कर दिया और बंगाल में अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।
  • अंग्रेजों की बढ़ती नौसैनिक शक्ति: 18वीं शताब्दी तक, ब्रिटिश रॉयल नेवी दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेना बन चुकी थी, जिसने समुद्र में डच प्रभुत्व को चुनौती दी।
  • इंडोनेशिया पर ध्यान केंद्रित करना: डचों ने पाया कि भारत की तुलना में इंडोनेशिया के मसाला द्वीपों पर एकाधिकार बनाए रखना कहीं अधिक लाभदायक था, क्योंकि वहाँ उन्हें अंग्रेजों से कम प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए, उन्होंने अपना ध्यान और संसाधन धीरे-धीरे भारत से हटाकर इंडोनेशिया (Dutch East Indies) पर केंद्रित कर लिया।
  • कंपनी में भ्रष्टाचार: समय के साथ कंपनी के अधिकारी भ्रष्ट हो गए, जिससे कंपनी को भारी वित्तीय नुकसान हुआ। अंततः, 1799 में डच सरकार ने दिवालिया हो चुकी VOC को भंग कर दिया।

सारांश तालिका

निष्कर्ष: डच कंपनी एक विशाल व्यापारिक साम्राज्य थी, लेकिन भारत में उनका मुख्य उद्देश्य व्यापारिक लाभ कमाना था, न कि ब्रिटिश या फ्रांसीसी की तरह एक क्षेत्रीय साम्राज्य बनाना। अंग्रेजों के साथ अपनी निर्णायक हार के बाद, उन्होंने भारत को छोड़कर इंडोनेशिया पर ध्यान केंद्रित करना अधिक विवेकपूर्ण समझा।

डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) एक व्यापारिक निगम के रूप में संगठित थी, और उनके भारतीय क्षेत्रों का प्रशासन सीधे तौर पर बटाविया (आधुनिक जकार्ता, इंडोनेशिया) में स्थित डच गवर्नर-जनरल के अधीन था। भारत में अलग-अलग डच बस्तियों या “फैक्ट्रियों” का नेतृत्व आमतौर पर एक निदेशक (Director) या प्रमुख (Chief) करता था, न कि उस तरह का गवर्नर जिसके पास व्यापक सैन्य और राजनीतिक शक्तियाँ हों जैसी अल्बुकर्क या डूप्ले के पास थीं।

इसलिए, भारत में विशिष्ट “डच गवर्नरों” की एक लंबी और प्रसिद्ध सूची नहीं मिलती है। लेकिन कुछ ऐसे प्रमुख व्यक्ति और कमांडर ज़रूर थे जिन्होंने भारत में डच उपस्थिति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यहाँ कुछ प्रमुख डच प्रशासकों और कमांडरों का उल्लेख है जिन्होंने गवर्नर के समकक्ष भूमिका निभाई:

1. पीटर बोथ (Pieter Both)

  • भूमिका: डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) के पहले गवर्नर-जनरल
  • कार्यकाल: 1610-1614
  • योगदान: हालांकि उनका मुख्यालय बटाविया में था, लेकिन उनकी नीतियों ने ही भारत में डच व्यापारिक कोठियों की स्थापना की दिशा तय की। उन्होंने ही डच कंपनी को एक संगठित प्रशासनिक रूप दिया। भारत में डचों की प्रारंभिक सफलता का श्रेय उनकी संगठनात्मक क्षमता को दिया जा सकता है।

2. यान पीटर्सजून कोएन (Jan Pieterszoon Coen)

  • भूमिका: डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) के एक और প্রভাবশালী गवर्नर-जनरल।
  • कार्यकाल: (दो बार) 1619–1623 और 1627–1629
  • योगदान: कोएन को डच औपनिवेशिक साम्राज्य के संस्थापकों में से एक माना जाता है। वह अपनी आक्रामक और क्रूर नीतियों के लिए जाने जाते थे। उनका मानना था कि “व्यापार बिना युद्ध के और युद्ध बिना व्यापार के नहीं चल सकता।” हालांकि उनका मुख्य ध्यान इंडोनेशिया पर था, लेकिन उनकी नीतियों ने भारत में भी डचों को पुर्तगालियों और अंग्रेजों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रेरित किया।

3. रिनस वैन लीर (Rinus Van Lier)

  • भूमिका: Coromandel तट के एक महत्वपूर्ण Dutch गवर्नर
  • योगदान: उसके तहत, 18वीं सदी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने Coromandel क्षेत्र में, विशेष रूप से कपड़ा व्यापार में, काफी सफलता हासिल की। ये उन प्रशासकों के उदाहरण हैं जिन्होंने विशिष्ट क्षेत्रों में डच व्यापार को मजबूत किया।

4. राइक्लोफ वैन गोएन्स (Rijckloff van Goens)

  • भूमिका: एक एडमिरल और कमांडर, बाद में बटाविया के गवर्नर-जनरल बने।
  • योगदान: उन्होंने 1663 में कोचीन (कोच्चि) पर पुर्तगालियों से कब्जा करने में डच सेना का नेतृत्व किया था। यह भारत के मालाबार तट पर डचों की सबसे बड़ी सैन्य सफलताओं में से एक थी। इस जीत ने मालाबार तट के मसाला व्यापार पर डचों का नियंत्रण स्थापित कर दिया। भले ही वे उस समय औपचारिक रूप से ‘गवर्नर’ न हों, लेकिन उनकी भूमिका निर्णायक थी।

डचों की प्रशासनिक व्यवस्था का सारांश

निष्कर्ष:
डचों ने भारत में कोई ऐसा प्रसिद्ध गवर्नर नियुक्त नहीं किया जिसने अल्बुकर्क या क्लाइव की तरह इतिहास की दिशा बदल दी हो। उनकी शक्ति उनकी कंपनी की संगठित व्यापारिक प्रणाली में निहित थी, न कि किसी एक करिश्माई नेता में। उनका प्रशासनिक मॉडल विकेंद्रीकृत था और पूरी तरह से व्यापार पर केंद्रित था। इसी कारण से, भारतीय इतिहास में विशिष्ट डच गवर्नरों का उतना उल्लेख नहीं मिलता है।


3. अंग्रेज 🇬🇧 (The Masters – शासक)

अंग्रेज सबसे अनुशासित, संगठित और दूरदर्शी थे। वे व्यापारी के रूप में आए लेकिन भारत की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर शासक बन बैठे।

इतिहास की सबसे प्रभावशाली और सफल कंपनी, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) पर विस्तार से जानते हैं। यह अकेली ऐसी कंपनी थी जो एक व्यापारिक संस्था से शुरू होकर भारत की शासक बन बैठी।

द इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी (The English East India Company) 🇬🇧

इसे आधिकारिक तौर पर “Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies” के नाम से जाना जाता था। यह एक निजी ज्वाइंट-स्टॉक कंपनी थी, जिसने इसे अपने पुर्तगाली और फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में अधिक लचीलापन और निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी।

1. स्थापना और भारत में आगमन

  • स्थापना: 31 दिसंबर 1600 को, महारानी एलिजाबेथ I ने एक शाही चार्टर (Royal Charter) के द्वारा इस कंपनी को पूर्व के देशों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया।
  • प्रारंभिक उद्देश्य: मुख्य रूप से मसाला व्यापार (विशेषकर इंडोनेशिया के मसाला द्वीपों) में हिस्सा लेना, लेकिन जल्द ही उनका ध्यान भारत के सूती वस्त्र और रेशम पर केंद्रित हो गया।
  • पहला आगमन (1608): कैप्टन विलियम हॉकिन्स मुगल बादशाह जहाँगीर के दरबार में सूरत में फैक्ट्री खोलने की अनुमति लेने पहुँचा, लेकिन पुर्तगालियों के दबाव के कारण वह असफल रहा।
  • पहली सफलता (1612): सूरत के पास स्वाल्ली के युद्ध (Battle of Swally) में अंग्रेजों ने एक छोटे से बेड़े से एक बड़े पुर्तगाली बेड़े को हरा दिया। इस नौसैनिक जीत ने जहाँगीर को बहुत प्रभावित किया।
  • पहली स्थायी फैक्ट्री (1613): स्वाल्ली की जीत के बाद, जहाँगीर ने अंग्रेजों को सूरत में एक स्थायी फैक्ट्री स्थापित करने की अनुमति दे दी।

2. शक्ति के केंद्रों की स्थापना: तीन स्तंभ

अंग्रेजों ने अपनी शक्ति तीन प्रमुख तटीय शहरों (प्रेसीडेंसी) में केंद्रित की, जो उनके साम्राज्य की नींव बने।

  1. मद्रास (Madras): 1639 में, फ्रांसिस डे ने स्थानीय राजा से जमीन का एक टुकड़ा खरीदा और वहाँ फोर्ट सेंट जॉर्ज (Fort St. George) का निर्माण किया। यह पूर्वी तट पर उनका मुख्यालय बना।
  2. बॉम्बे (Bombay): 1661 में, पुर्तगाल ने अपनी राजकुमारी की शादी ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय से करने पर बॉम्बे को दहेज के रूप में दे दिया। 1668 में, राजा ने इसे केवल 10 पाउंड वार्षिक किराये पर कंपनी को सौंप दिया। यह पश्चिमी तट पर उनका मुख्य बंदरगाह बन गया।
  3. कलकत्ता (Calcutta): 1690 में, जॉब चारनॉक ने तीन गाँवों (सुतानाती, गोविंदपुर, कलिकाता) को मिलाकर कलकत्ता की नींव रखी। यहाँ फोर्ट विलियम (Fort William) का निर्माण किया गया और यह जल्द ही भारत में अंग्रेजों का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

3. बदलाव का दौर: व्यापारी से शासक तक

18वीं शताब्दी के मध्य में, कंपनी ने भारतीय राजनीति में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।

  • ⚔️ प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey, 1757): यह भारत के इतिहास का निर्णायक मोड़ था।
    • रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में, कंपनी ने बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला को एक षड्यंत्र के तहत हराया।
    • परिणाम: बंगाल पर कंपनी का अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया। उन्हें बंगाल के विशाल राजस्व का उपयोग अपनी सेना को बढ़ाने और अन्य यूरोपीय शक्तियों (विशेषकर फ्रांसीसी) को हराने के लिए करने का मौका मिला।
  • ⚔️ बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar, 1764):
    • इस युद्ध में कंपनी ने बंगाल के नवाब, अवध के नवाब और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को हराया।
    • परिणाम: 1765 में इलाहाबाद की संधि हुई, जिसके द्वारा कंपनी को मुगल बादशाह से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) प्राप्त हुई। इसने कंपनी को कानूनी रूप से इस क्षेत्र का शासक बना दिया।

4. कंपनी राज (The Company Raj): 1773-1857

दीवानी अधिकार प्राप्त करने के बाद, कंपनी एक व्यापारिक इकाई से एक प्रशासनिक इकाई में बदल गई। इस अवधि को ‘कंपनी राज’ के नाम से जाना जाता है।

  • साम्राज्य विस्तार की नीतियां:
    • सहायक संधि (Subsidiary Alliance): लॉर्ड वेलेजली द्वारा शुरू की गई इस नीति के तहत, भारतीय राज्यों को अपनी सुरक्षा के लिए कंपनी की सेना रखनी पड़ती थी, जिसका खर्च वे खुद उठाते थे।
    • व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse): लॉर्ड डलहौजी ने इस नीति के तहत कई राज्यों (जैसे झाँसी, सतारा) को यह कहकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया कि उनका कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं है।
  • 1857 का महाविद्रोह (The Great Revolt of 1857): कंपनी की शोषक आर्थिक नीतियों, आक्रामक विस्तारवादी नीतियों और सामाजिक-धार्मिक हस्तक्षेपों के कारण 1857 का विद्रोह हुआ।

5. कंपनी शासन का अंत

  • 1857 के विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को यह एहसास दिलाया कि एक व्यापारिक कंपनी इतने बड़े देश पर शासन नहीं कर सकती।
  • भारत सरकार अधिनियम 1858 (Government of India Act 1858): इस अधिनियम के द्वारा, भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया गया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश ताज (British Crown) के अधीन आ गया। गवर्नर-जनरल अब वायसराय कहलाने लगा।
  • 1 जून 1874 को, ईस्ट इंडिया कंपनी को औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया।

सारांश तालिका


चरण 1: बंगाल के गवर्नर (Governors of Bengal)

यह वो दौर था जब ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक शक्ति से राजनीतिक शक्ति बन रही थी। इनका अधिकार क्षेत्र मुख्य रूप से बंगाल तक ही सीमित था।


चरण 2: बंगाल के गवर्नर-जनरल (Governor-Generals of Bengal)

1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के बाद, बंगाल के गवर्नर को ‘गवर्नर-जनरल’ बना दिया गया और मद्रास तथा बॉम्बे प्रेसीडेंसी को उसके अधीन कर दिया गया।


चरण 3: भारत के गवर्नर-जनरल (Governor-Generals of India)

1833 के चार्टर एक्ट के तहत, बंगाल के गवर्नर-जनरल को पूरे भारत का गवर्नर-जनरल बना दिया गया, जिससे शक्ति का केंद्रीकरण हुआ।


चरण 4: भारत के वायसराय (Viceroys of India)

1857 के विद्रोह के बाद, भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से छीनकर सीधे ब्रिटिश ताज (Crown) को सौंप दिया गया। अब गवर्नर-जनरल को ‘वायसराय’ (राजा का प्रतिनिधि) कहा जाने लगा।


स्वतंत्र भारत के गवर्नर-जनरल


4. फ्रांसीसी 🇫🇷 (The Final Challengers – अंतिम प्रतिद्वंद्वी)

फ्रांसीसी भारत में आने वाली अंतिम बड़ी यूरोपीय शक्ति थे और वे अंग्रेजों के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी साबित हुए। उनका उद्देश्य भी व्यापार के साथ-साथ साम्राज्य का विस्तार करना था।

फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी के बारे में विस्तार से जानते हैं। भारत में उनका इतिहास अंग्रेजों के साथ उनकी कट्टर प्रतिद्वंद्विता और साम्राज्य निर्माण की महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए जाना जाता है।

द फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी (The French East India Company) 🇫🇷

यह कंपनी अपने ब्रिटिश और डच समकक्षों से बहुत अलग थी, क्योंकि यह मुख्य रूप से एक सरकारी पहल थी, न कि एक निजी व्यापारिक उद्यम।

1. स्थापना और प्रकृति

  • आधिकारिक नाम: Compagnie française pour le commerce des Indes orientales (फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी)।
  • स्थापना: 1664 में। इसकी स्थापना फ्रांस के सम्राट लुई XIV के प्रसिद्ध वित्त मंत्री जीन-बैप्टिस्ट कोल्बर्ट (Jean-Baptiste Colbert) के प्रयासों से हुई थी।
  • प्रकृति (Nature): यह एक राज्य-नियंत्रित (State-controlled) कंपनी थी। इसका मतलब था कि:
    • इसके अधिकांश फंड सरकारी खजाने से आते थे।
    • इसके निदेशक राजा द्वारा नियुक्त किए जाते थे।
    • इसे निर्णय लेने के लिए पेरिस में सरकार पर बहुत अधिक निर्भर रहना पड़ता था।
    • इस सरकारी नियंत्रण ने कंपनी को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की तुलना में कम लचीला और धीमा बना दिया।

2. भारत में आगमन और प्रमुख केंद्र

फ्रांसीसी भारत आने वाली अंतिम प्रमुख यूरोपीय शक्ति थे, जिससे उन्हें पहले से स्थापित शक्तियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी।

  • पहली फैक्ट्री (1668): अंग्रेजों की तरह ही, उन्होंने अपनी पहली फैक्ट्री सूरत में स्थापित की, जो उस समय पश्चिमी भारत का मुख्य व्यापारिक केंद्र था।
  • अन्य केंद्र: उन्होंने मसूलीपट्टनम में भी एक फैक्ट्री खोली।
  • पांडिचेरी (Pondicherry) – फ्रांसीसी भारत का दिल:
    • स्थापना: 1674 में, फ्रैंकोइस मार्टिन (François Martin) ने एक स्थानीय शासक से एक छोटा सा गाँव प्राप्त किया और उसे पांडिचेरी (आधुनिक पुडुचेरी) के रूप में विकसित किया।
    • महत्व: यह जल्द ही भारत में फ्रांसीसी गतिविधियों का मुख्यालय और सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

3. महत्वाकांक्षाओं का दौर: डूप्ले और साम्राज्य का सपना

18वीं शताब्दी के मध्य में, गवर्नर जोसेफ फ्रैंकोइस डूप्ले (Joseph François Dupleix) के नेतृत्व में फ्रांसीसी कंपनी का चरित्र पूरी तरह से बदल गया।

  • डूप्ले का विजन: डूप्ले ने महसूस किया कि केवल व्यापार से लाभ कमाना पर्याप्त नहीं है। भारत की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर यहाँ एक फ्रांसीसी साम्राज्य स्थापित किया जा सकता है।
  • डूप्ले की नीतियां (जो बाद में अंग्रेजों ने अपनाईं):
    1. भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप: उसने भारतीय राज्यों के उत्तराधिकार के विवादों में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया।
    2. सहायक संधि की अवधारणा: वह एक भारतीय शासक को सैन्य सहायता देता और बदले में उससे धन, क्षेत्र और व्यापारिक छूटें प्राप्त करता।
    3. भारतीय सैनिकों का उपयोग: उसने स्थानीय भारतीय सैनिकों को यूरोपीय तर्ज पर प्रशिक्षित कर अपनी सेना में भर्ती किया।

4. अंग्रेजों से टकराव: कर्नाटक युद्ध (Carnatic Wars)

डूप्ले की महत्वाकांक्षी नीतियों ने सीधे तौर पर अंग्रेजों के हितों को चुनौती दी, जिसके कारण दक्षिण भारत में वर्चस्व के लिए दोनों शक्तियों के बीच तीन युद्ध हुए, जिन्हें कर्नाटक युद्ध (1746-1763) के नाम से जाना जाता है।

  • पहला युद्ध: फ्रांसीसियों का पलड़ा भारी रहा और उन्होंने मद्रास पर कब्जा कर लिया।
  • दूसरा युद्ध: अनौपचारिक रूप से लड़ा गया, दोनों पक्षों को मिली-जुली सफलता मिली।
  • तीसरा युद्ध: यह निर्णायक साबित हुआ।
    • ⚔️ वांडीवाश का युद्ध (Battle of Wandiwash, 1760): यह निर्णायक युद्ध था। इसमें सर आयर कूट (Sir Eyre Coote) के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना ने काउंट-डी-लाली के नेतृत्व वाली फ्रांसीसी सेना को बुरी तरह हराया।
    • परिणाम: इस हार ने भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य के सपने को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

5. फ्रांसीसियों की विफलता के कारण

  1. कंपनी की सरकारी प्रकृति: कंपनी को हर फैसले के लिए फ्रांसीसी सरकार पर निर्भर रहना पड़ता था, जो धीमी और अक्षम थी। इसके विपरीत, ब्रिटिश कंपनी त्वरित व्यावसायिक निर्णय ले सकती थी।
  2. नौसैनिक कमजोरी: अंग्रेजों की नौसेना (Royal Navy) फ्रांसीसियों से कहीं बेहतर थी, जिससे वे भारत में आसानी से सैनिक और रसद पहुँचा सकते थे।
  3. वित्तीय मुद्दे: फ्रांसीसी कंपनी को सरकार से पर्याप्त और समय पर वित्तीय सहायता नहीं मिली। ब्रिटिश कंपनी बहुत धनी थी और अपने युद्धों का खर्च आसानी से उठा सकती थी।
  4. रणनीतिक भूल: फ्रांसीसी सरकार का डूप्ले को 1754 में वापस बुलाने का निर्णय उनकी सबसे बड़ी भूल थी।
  5. केंद्रों का महत्व: अंग्रेजों के पास कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास जैसे रणनीतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण और धनी केंद्र थे, जबकि फ्रांसीसी मुख्य रूप से पांडिचेरी तक ही सीमित थे।

अंतिम स्थिति

वांडीवाश की हार और 1763 की पेरिस संधि के बाद, फ्रांसीसियों को उनकी फैक्ट्रियाँ (पांडिचेरी, चंदननगर आदि) वापस तो कर दी गईं, लेकिन उन पर यह शर्त लगा दी गई कि वे उनकी किलेबंदी नहीं कर सकते और न ही वहां सेना रख सकते हैं। इस प्रकार, वे भारत में केवल एक व्यापारिक केंद्र बनकर रह गए और एक राजनीतिक शक्ति के रूप में समाप्त हो गए।

सारांश तालिका

पहलूविवरण
आधिकारिक नामCompagnie des Indes orientales
स्थापना वर्ष1664
प्रकृतिराज्य-नियंत्रित कंपनी (State-controlled)
पहली फैक्ट्रीसूरत (1668)
मुख्य केंद्रपांडिचेरी
प्रमुख गवर्नरजोसेफ फ्रैंकोइस डूप्ले
निर्णायक युद्धवांडीवाश का युद्ध (1760), अंग्रेजों से हार
अंतिम स्थितिएक राजनीतिक शक्ति के रूप में समाप्त, केवल व्यापारिक बस्तियों तक सीमित रहे।

फ्रांसीसी गवर्नर: परिचय और उद्देश्य

फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी (Compagnie des Indes Orientales) की स्थापना 1664 में हुई थी। यह एक सरकारी कंपनी थी, जिसका अर्थ था कि इस पर फ्रांसीसी सरकार का सीधा नियंत्रण था। भारत में नियुक्त किए गए गवर्नरों को न केवल व्यापारिक हितों को साधना था, बल्कि फ्रांसीसी साम्राज्य की महत्वाकांक्षाओं को भी पूरा करना था।

इन गवर्नरों के मुख्य उद्देश्य थे:

  • भारत के साथ व्यापार, विशेषकर वस्त्रों के व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करना।
  • अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव को रोकना और उन्हें भारत से बाहर निकालना।
  • भारत में एक फ्रांसीसी औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना करना।

प्रमुख फ्रांसीसी गवर्नर और उनके योगदान

यहाँ कुछ सबसे महत्वपूर्ण फ्रांसीसी गवर्नरों का विस्तृत विवरण दिया गया है।

1. फ्रैंकोइस मार्टिन (François Martin)

  • कार्यकाल: (कई बार गवर्नर रहे) लगभग 1681 से 1706 के बीच।
  • उपाधि: भारत में पांडिचेरी के संस्थापक (Founder of Pondicherry)

प्रमुख कार्य और योगदान:

  • पांडिचेरी की स्थापना (1674): मार्टिन ने 1673 में एक छोटा सा गाँव हासिल किया और उसे पांडिचेरी के रूप में विकसित किया। अपनी दूरदर्शिता और प्रशासनिक कौशल से, उन्होंने पांडिचेरी को एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र और एक सुदृढ़ किलेबंद बस्ती बना दिया।
  • फ्रांसीसी शक्ति का केंद्र: पांडिचेरी जल्द ही भारत में फ्रांसीसी गतिविधियों का मुख्य केंद्र बन गया।
  • संघर्षों का सामना: उन्हें डचों और मुगलों से लगातार संघर्ष करना पड़ा। 1693 में डचों ने पांडिचेरी पर कब्जा कर लिया था, लेकिन 1697 में मार्टिन ने इसे संधि के तहत वापस हासिल कर लिया और इसे फिर से बसाया।

महत्व: फ्रैंकोइस मार्टिन ने भारत में फ्रांसीसी उपस्थिति की वास्तविक नींव रखी। उन्होंने एक मजबूत आधार (पांडिचेरी) स्थापित किया, जिसके बिना डूप्ले जैसे बाद के गवर्नर अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं को क्रियान्वित नहीं कर सकते थे।


2. जोसेफ फ्रैंकोइस डूप्ले (Joseph François Dupleix)

  • कार्यकाल: 1742 – 1754 (भारत में फ्रांसीसी बस्तियों के गवर्नर-जनरल)
  • उपाधि: एक दूरदर्शी और कूटनीतिक रणनीतिकार।

प्रमुख नीतियां और कार्य:

  • 🧠 सहायक संधि की नीति का जनक (Father of the policy of Subsidiary Alliance): डूप्ले वह पहला यूरोपीय था जिसने यह महसूस किया कि भारतीय शासकों की आपसी लड़ाई का फायदा उठाया जा सकता है। उसने एक शासक को अपनी सेना की मदद देने और बदले में उससे धन, क्षेत्र और व्यापारिक विशेषाधिकार प्राप्त करने की नीति शुरू की। बाद में अंग्रेजों ने इसी नीति का प्रयोग पूरे भारत पर कब्जा करने के लिए किया।
  • भारतीय सैनिकों का यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षण: उसने पहली बार भारतीय सैनिकों को यूरोपीय वर्दी पहनाकर और यूरोपीय सैन्य तरीकों से प्रशिक्षित करके अपनी सेना में भर्ती किया। यह एक क्रांतिकारी कदम था।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप: व्यापार पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, डूप्ले ने कर्नाटक और हैदराबाद के उत्तराधिकार विवादों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप किया। यह आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष (कर्नाटक युद्धों) का मुख्य कारण बना।
  • प्रारंभिक सफलता: पहले कर्नाटक युद्ध (1746-48) में, डूप्ले ने सफलतापूर्वक अंग्रेजों को मद्रास में हराया, जिससे उसकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई।

डूप्ले का पतन:

  • उसकी नीतियां बहुत खर्चीली थीं, और फ्रांसीसी सरकार इन युद्धों का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं थी।
  • दूसरे कर्नाटक युद्ध में उसकी योजनाओं को वैसी सफलता नहीं मिली जैसी उसने उम्मीद की थी।
  • व्यापारिक लाभ में कमी और लगातार युद्धों से तंग आकर फ्रांसीसी सरकार ने 1754 में उसे वापस बुला लिया, जो उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई।

महत्व: डूप्ले ने भारत को जीतने का वह तरीका खोजा, जिस पर चलकर बाद में अंग्रेज भारत के स्वामी बने। वह एक साम्राज्य-निर्माता था जो समय से बहुत आगे की सोच रहा था।


3. काउंट-डी-लाली (Comte de Lally)

  • कार्यकाल: 1758 – 1761
  • उपाधि: भारत में फ्रांसीसी शक्ति के पतन का गवाह।

पृष्ठभूमि: लाली को तीसरे कर्नाटक युद्ध के दौरान फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व करने के लिए भारत भेजा गया था।

  • 性格 (Personality): वह एक बहादुर सैनिक तो था, लेकिन उसमें डूप्ले जैसी कूटनीतिक समझ और धैर्य का अभाव था। वह बहुत गर्म मिजाज का और हठी था।
  • ⚔️ वांडीवाश का युद्ध (Battle of Wandiwash, 1760): यह भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष का सबसे निर्णायक युद्ध था। लाली के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना को सर आयर कूट के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना से करारी हार का सामना करना पड़ा।
  • पतन: इस हार के बाद, 1761 में अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर भी कब्जा कर लिया। हालांकि 1763 की पेरिस की संधि के तहत पांडिचेरी फ्रांसीसियों को वापस मिल गया, लेकिन उन्हें वहां किलेबंदी करने या सेना रखने की इजाजत नहीं थी।

महत्व: लाली के नेतृत्व में हुई वांडीवाश की हार ने भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य की महत्वाकांक्षाओं पर अंतिम मुहर लगा दी। इसके बाद फ्रांसीसी भारत में केवल एक व्यापारिक शक्ति बनकर रह गए, राजनीतिक नहीं।


सारांश तालिका (Summary Table)


डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी (Danish East India Company) 🇩🇰

अंग्रेजों और डचों की सफलता से प्रेरित होकर, डेनमार्क-नॉर्वे के साम्राज्य ने भी पूर्वी व्यापार में अपनी हिस्सेदारी के लिए एक कंपनी की स्थापना की।

कंपनी का नाम: डैनिश ईस्ट इंडिया कंपनी (Dansk Østindisk Kompagni)
स्थापना: 1616 में डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन IV द्वारा।


1. भारत में आगमन और प्रमुख बस्तियाँ (Arrival and Key Settlements)

डेनिश कंपनी का मुख्य उद्देश्य साम्राज्य बनाना नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से व्यापार करना था। उन्होंने सैन्य संघर्षों से बचने की पूरी कोशिश की।

  • त्रांकेबार (Tranquebar) – पहली फैक्ट्री:
    • स्थान: तमिलनाडु का कोरोमंडल तट (आज का थारंगमबाड़ी)।
    • स्थापना: 1620 में। एडमिरल ओवे जेड्डे (Ove Gjedde) ने तंजौर के नायक (स्थानीय शासक) के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर किए और त्रांकेबार में बसने का अधिकार प्राप्त किया।
    • विकास: उन्होंने यहाँ फोर्ट डैन्सबोर्ग (Fort Dansborg) नामक एक किले का निर्माण किया, जो आज भी मौजूद है। त्रांकेबार भारत में डेनिश गतिविधियों का पहला और सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा।
  • सेरामपुर (Serampore) – दूसरी प्रमुख बस्ती:
    • स्थान: बंगाल में हुगली नदी के किनारे (कलकत्ता के पास)। इसे फ्रेडरिकनगर (Frederiksnagore) भी कहा जाता था।
    • स्थापना: 1755 में। बंगाल उस समय भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था, इसलिए डेनिश कंपनी ने यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराना महत्वपूर्ण समझा।
    • विकास: सेरामपुर जल्द ही त्रांकेबार से भी अधिक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। 18वीं शताब्दी के अंत तक, यह डेनिश भारत की वास्तविक राजधानी बन गया था।

2. डेनिश कंपनी की गतिविधियाँ और योगदान (Activities and Contributions)

डेनिश कंपनी का प्रभाव उनके व्यापारिक आकार से कहीं ज्यादा उनके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों के कारण था।

  • व्यापार (Trade):
    • उनका व्यापार अंग्रेजों या डचों की तुलना में बहुत छोटे पैमाने पर था।
    • वे मुख्य रूप से बंगाल के वस्त्र, चाय और काली मिर्च का व्यापार करते थे।
  • मिशनरी कार्य (Missionary Work) – सबसे महत्वपूर्ण योगदान:
    • डेनिश कंपनी अपनी बस्तियों में ईसाई मिशनरियों को काम करने की पूरी स्वतंत्रता देती थी।
    • सेरामपुर मिशन (Serampore Mission): 18वीं शताब्दी के अंत में, तीन बैपटिस्ट मिशनरी – विलियम कैरी, जोशुआ मार्शमैन, और विलियम वार्ड – सेरामपुर में बस गए। इन्हें “सेरामपुर तिकड़ी” (Serampore Trio) के नाम से जाना जाता है।
    • इन मिशनरियों ने भारतीय समाज के सुधार, शिक्षा और साहित्य में अभूतपूर्व योगदान दिया। उन्होंने बाइबिल का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया।
  • प्रिंटिंग प्रेस और शिक्षा (Printing Press and Education):
    • सेरामपुर मिशन प्रेस की स्थापना की गई, जो भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रिंटिंग प्रेसों में से एक बन गया। यहाँ न केवल धार्मिक ग्रंथ, बल्कि कई अन्य विषयों पर भी किताबें छापी गईं, जिससे बंगाली गद्य के विकास में मदद मिली।
    • 1818 में, सेरामपुर कॉलेज की स्थापना की गई, जो आज भी एक प्रतिष्ठित संस्थान है। यह एशिया के शुरुआती कॉलेजों में से एक था जो डिग्री प्रदान कर सकता था।

3. पतन और वापसी (Decline and Departure)

  • कमजोर वित्तीय स्थिति: डेनिश कंपनी कभी भी बहुत अधिक मुनाफा नहीं कमा सकी और उसे हमेशा वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा।
  • यूरोप में नेपोलियन के युद्ध: इन युद्धों में डेनमार्क की हार हुई और उसकी नौसैनिक शक्ति लगभग समाप्त हो गई, जिससे उसकी विदेशी बस्तियों से संपर्क टूट गया।
  • अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति: भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की जबरदस्त शक्ति के सामने डेनिश कंपनी का टिक पाना असंभव था।
  • बस्तियों की बिक्री: अंततः, डेनिश सरकार ने अपनी वित्तीय समस्याओं के कारण भारतीय बस्तियों को बेचने का फैसला किया। 1845 में, त्रांकेबार और सेरामपुर सहित सभी डेनिश बस्तियों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बेच दिया गया।

सारांश तालिका

निष्कर्ष: डेनिश शक्ति भारत में एक छोटा सा अध्याय है, लेकिन उनका legado (विरासत) साम्राज्य बनाने में नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य और आधुनिक विचारों को बढ़ावा देने में था।


संक्षेप में, यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन व्यापार के लालच से शुरू हुआ, लेकिन भारत की कमजोर राजनीतिक स्थिति ने इसे साम्राज्य की दौड़ में बदल दिया। इस दौड़ में बेहतर संगठन, श्रेष्ठ नौसेना और कुशल नेतृत्व के कारण अंग्रेज विजयी हुए और उन्होंने अगले 200 वर्षों तक भारत पर शासन किया।


भारत में यूरोपीय कंपनियों की फैक्ट्रियाँ (व्यापारिक कोठियाँ)

नोट: यहाँ ‘फैक्ट्री’ का मतलब आधुनिक कारखाने से नहीं है, बल्कि किलेबंद परिसर (fortified compound) से है, जहाँ अधिकारी रहते थे, माल का भंडारण होता था और व्यापार संचालित किया जाता था।


अंग्रेजों की प्रभुत्व स्थापित करने की प्रक्रिया (एंग्लो-डच संघर्ष, एंग्लो-फ्रांसीसी संघर्ष)

18वीं शताब्दी के मध्य तक, अंग्रेज यह समझ चुके थे कि भारत पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के लिए उन्हें दो मुख्य चुनौतियों से पार पाना होगा:

  1. अन्य यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी: विशेष रूप से डच और फ्रांसीसी।
  2. भारतीय राज्य: मुगल साम्राज्य के पतन के बाद उभर रही क्षेत्रीय शक्तियाँ।

अंग्रेजों ने एक-एक करके इन चुनौतियों को समाप्त किया।

  • एंग्लो-डच संघर्ष: अंग्रेजों ने 1759 में बेदरा के युद्ध में डचों को निर्णायक रूप से हराकर उनकी चुनौती को समाप्त कर दिया।
  • एंग्लो-फ्रांसीसी संघर्ष: यह भारत पर नियंत्रण के लिए सबसे बड़ी और सबसे लंबी लड़ाई थी, जो कर्नाटक युद्धों के रूप में लड़ी गई।

कर्नाटक के युद्ध (The Carnatic Wars): 1746 – 1763

यह भारत की धरती पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच लड़े गए तीन युद्धों की एक श्रृंखला थी। इन युद्धों ने यह तय कर दिया कि भारत में अगली सर्वोच्च शक्ति कौन होगी।

कर्नाटक युद्धों के सामान्य कारण (General Causes)

  1. यूरोपीय प्रतिद्वंद्विता: इन युद्धों का सबसे बड़ा कारण ब्रिटेन और फ्रांस के बीच यूरोप में चल रही पुरानी दुश्मनी थी। जब भी वे यूरोप में लड़ते, उनकी कंपनियां भारत में भी लड़ने लगती थीं।
  2. व्यापारिक एकाधिकार की इच्छा: दोनों कंपनियां भारत के लाभदायक व्यापार पर अपना एकाधिकार चाहती थीं और एक-दूसरे को रास्ते से हटाना चाहती थीं।
  3. भारत की राजनीतिक अस्थिरता: मुगल साम्राज्य कमजोर हो चुका था। हैदराबाद और उसके अधीन आने वाले कर्नाटक (नवाब का क्षेत्र) में उत्तराधिकार के लिए लगातार झगड़े हो रहे थे। दोनों यूरोपीय कंपनियों ने इस राजनीतिक शून्य का फायदा उठाने का फैसला किया।
  4. साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं: फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले (Dupleix) ने भारत में एक यूरोपीय साम्राज्य स्थापित करने का सपना देखा था, जिसने अंग्रेजों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित किया।

पहला कर्नाटक युद्ध (First Carnatic War: 1746-1748)

  • कारण: यह यूरोप में चल रहे ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध का सीधा परिणाम था।
  • प्रमुख घटनाएँ:
    • फ्रांसीसियों ने अंग्रेजों के महत्वपूर्ण केंद्र मद्रास पर कब्जा कर लिया
    • सेंट थोम का युद्ध: कर्नाटक के नवाब ने फ्रांसीसियों से मद्रास खाली करने को कहा। जब फ्रांसीसियों ने इनकार कर दिया, तो नवाब ने अपनी 10,000 की सेना भेजी, जिसे फ्रांसीसियों की मात्र कुछ सौ सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी ने हरा दिया।
  • परिणाम और महत्व:
    • यूरोप में एक्स-ला-चैपल की संधि (1748) के साथ युद्ध समाप्त हो गया। मद्रास वापस अंग्रेजों को दे दिया गया।
    • यह युद्ध अनिर्णायक रहा, लेकिन इसका सबसे बड़ा महत्व यह था कि इसने यह साबित कर दिया कि एक छोटी, अनुशासित और आधुनिक हथियारों से लैस यूरोपीय सेना, एक बहुत बड़ी भारतीय सेना को आसानी से हरा सकती है। इसने दोनों कंपनियों की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ा दिया।

दूसरा कर्नाटक युद्ध (Second Carnatic War: 1749-1754)

  • कारण: यह युद्ध भारतीय उत्तराधिकार के विवादों के कारण हुआ। दोनों कंपनियों ने “सहायक संधि” की नीति का प्रयोग किया।
    • हैदराबाद में: एक तरफ नासिर जंग, तो दूसरी तरफ मुजफ्फर जंग गद्दी का दावेदार था।
    • कर्नाटक में: एक तरफ अनवर-उद-दीन, तो दूसरी तरफ चंदा साहिब दावेदार था।
  • प्रमुख घटना: आरकॉट की घेराबंदी (1751): जब फ्रांसीसी और उनके सहयोगी त्रिचनापल्ली में ब्रिटिश समर्थित मोहम्मद अली को घेर रहे थे, तब एक युवा क्लर्क-से-अधिकारी बने रॉबर्ट क्लाइव ने कर्नाटक की राजधानी आरकॉट पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया। यह एक मास्टरस्ट्रोक था जिसने युद्ध का पासा पलट दिया।
  • परिणाम और महत्व:
    • युद्ध में अंग्रेजों की स्थिति मजबूत हुई और उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी।
    • फ्रांसीसी सरकार ने डूप्ले की खर्चीली नीतियों से तंग आकर 1754 में उसे वापस बुला लिया। यह फ्रांसीसियों की सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
    • ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना की दिशा में यह एक बड़ा कदम था, क्योंकि उनका मुख्य प्रतिद्वंद्वी (डूप्ले) अब मैदान में नहीं था।

तीसरा कर्नाटक युद्ध (Third Carnatic War: 1758-1763)

  • कारण: यह यूरोप में शुरू हुए सप्तवर्षीय युद्ध (Seven Years’ War) का विस्तार था और भारत में प्रभुत्व के लिए अंतिम लड़ाई थी।
  • निर्णायक युद्ध: वांडीवाश का युद्ध (Battle of Wandiwash, 1760):
    • यह युद्ध कर्नाटक युद्धों का सबसे निर्णायक मुकाबला था।
    • ब्रिटिश सेना का नेतृत्व सर आयर कूट और फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व काउंट-डी-लाली ने किया।
    • अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को बुरी तरह से पराजित किया।
  • परिणाम और महत्व:
    • 1763 में पेरिस की संधि के साथ युद्ध समाप्त हुआ।
    • फ्रांसीसियों को उनकी बस्तियां (जैसे पांडिचेरी) वापस दे दी गईं, लेकिन उन्हें किलेबंदी करने या सेना रखने की अनुमति नहीं थी
    • इस संधि ने फ्रांसीसियों को भारत में एक राजनीतिक शक्ति के रूप में पूरी तरह समाप्त कर दिया। वे अब केवल व्यापारी बनकर रह गए।

कर्नाटक युद्धों के परिणाम और ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना

कर्नाटक युद्धों के परिणामों ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी:

  1. मुख्य यूरोपीय प्रतिद्वंद्वी का अंत: फ्रांसीसियों के सफाए के बाद, अंग्रेज भारत में एकमात्र dominante यूरोपीय शक्ति बन गए।
  2. सैन्य श्रेष्ठता साबित: इन युद्धों ने अंग्रेजों की नौसैनिक और सैन्य श्रेष्ठता को पूरी तरह से स्थापित कर दिया।
  3. आर्थिक लाभ: युद्धों के माध्यम से अंग्रेजों ने दक्षिण भारत में बहुत अधिक धन, क्षेत्र और प्रभाव प्राप्त किया, जिसका उपयोग उन्होंने अपनी शक्ति को और बढ़ाने के लिए किया।
  4. भारतीय राजनीति की समझ: उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की कला सीखी और भारतीय शासकों की कमजोरियों का फायदा उठाना सीख लिया।
  5. बंगाल विजय का मार्ग प्रशस्त: दक्षिण में फ्रांसीसियों को नियंत्रित करने के बाद, अंग्रेज अपना पूरा ध्यान भारत के सबसे अमीर प्रांत बंगाल पर केंद्रित कर सके। 1757 में प्लासी की लड़ाई लड़ने के लिए रॉबर्ट क्लाइव के पास जो आत्मविश्वास और संसाधन थे, वे काफी हद तक कर्नाटक युद्धों के अनुभव से ही आए थे।

संक्षेप में, कर्नाटक युद्धों ने उस मैदान को साफ कर दिया जिस पर अंग्रेजों ने अपने विशाल भारतीय साम्राज्य का निर्माण किया। फ्रांसीसियों को हराकर उन्होंने अपनी सबसे बड़ी बाधा दूर कर दी थी।


 प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। यह कोई पारंपरिक युद्ध नहीं, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र और धोखा था जिसने भारत के भाग्य को हमेशा के लिए बदल दिया।

आइए इसे पूरी विस्तार से समझते हैं।


⚔️ प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey): 23 जून 1757

यह युद्ध बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला और रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व वाली ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ।

1. पृष्ठभूमि: नवाब और कंपनी के बीच बढ़ते तनाव

1756 में अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद, उसका युवा नाती सिराज-उद-दौला बंगाल का नवाब बना। उसके और अंग्रेजों के बीच शुरुआत से ही संबंध तनावपूर्ण थे।

इस “ब्लैक होल” की घटना ने रॉबर्ट क्लाइव को मद्रास से एक सेना के साथ कलकत्ता वापस जीतने और नवाब से बदला लेने का एक मजबूत बहाना दे दिया।

2. घटनाक्रम: युद्ध नहीं, एक सुनियोजित षड्यंत्र

क्लाइव जानता था कि वह नवाब की विशाल सेना को सीधे युद्ध में नहीं हरा सकता। इसलिए, उसने युद्ध जीतने के लिए सैन्य शक्ति से ज्यादा कूटनीति और षड्यंत्र का सहारा लिया।

क्लाइव का षड्यंत्र:

  • 🤝 प्रमुख खिलाड़ी: क्लाइव ने नवाब के असंतुष्ट दरबारियों से संपर्क किया।
  • 🎯 मुख्य साजिशकर्ता:
    • मीर जाफर (Mir Jafar): नवाब का सेनापति। क्लाइव ने उसे युद्ध के बाद बंगाल का नवाब बनाने का लालच दिया।
    • राय दुर्लभ (Rai Durlabh): नवाब का एक और प्रमुख कमांडर।
    • जगत सेठ (Jagat Seth): बंगाल के सबसे अमीर बैंकर।
    • अमीचंद (Omi chand): एक धनी व्यापारी जो मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था।
  • 🤫 गुप्त संधि: इन सभी ने मिलकर एक गुप्त संधि की। योजना यह थी कि युद्ध के मैदान में मीर जाफर और राय दुर्लभ अपनी सेना की टुकड़ियों के साथ निष्क्रिय रहेंगे और नवाब का साथ नहीं देंगे।

युद्ध का दिन (23 जून 1757):

  • 📍 स्थान: प्लासी (भागीरथी नदी के किनारे)।
  • सेना की ताकत (लगभग):
    • नवाब সিরাজ-उद-दौला: 50,000 सैनिक + 40-50 फ्रांसीसी सैनिक
    • रॉबर्ट क्लाइव: 3,000 सैनिक (जिसमें ~2,200 भारतीय और ~800 यूरोपीय थे)
  • युद्ध का Verlauf:
    • युद्ध शुरू हुआ, लेकिन जैसा कि तय था, नवाब की सेना का एक बहुत बड़ा हिस्सा (मीर जाफर और राय दुर्लभ के अधीन) चुपचाप खड़ा रहा और युद्ध में शामिल नहीं हुआ।
    • नवाब की सेना के कुछ वफादार सैनिकों (जैसे मीर मदान और मोहन लाल) ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन वे मारे गए।
    • अपने सेनापतियों के धोखे को देखकर सिराज-उद-दौला घबरा गया और युद्ध के मैदान से भाग गया। बाद में उसे पकड़कर मीर जाफर के बेटे मीरन ने मार डाला।

परिणाम:
कुछ ही घंटों में युद्ध समाप्त हो गया। यह एक वास्तविक लड़ाई कम और एक पूर्वनियोजित नाटक ज्यादा था। अंग्रेजों की निर्णायक जीत हुई।

3. प्लासी के युद्ध का महत्व और दूरगामी परिणाम

प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास में एक मील का पत्थर था। इसके परिणाम बहुत गहरे और दूरगामी थे।

तत्काल परिणाम:

  • 👑 राजनीतिक:
    • मीर जाफर को बंगाल का कठपुतली नवाब बनाया गया। वास्तविक सत्ता क्लाइव और कंपनी के हाथों में थी।
    • इसने बंगाल में अंग्रेजी राजनीतिक वर्चस्व की शुरुआत की।
  • 💰 आर्थिक (सबसे महत्वपूर्ण):
    • कंपनी को बंगाल का निर्बाध और कर-मुक्त व्यापार करने का अधिकार मिला।
    • कंपनी और उसके अधिकारियों को मीर जाफर से भारी मात्रा में धन, उपहार और 24-परगना जिले की जमींदारी मिली।
    • बंगाल की “प्लासी लूट” शुरू हुई। बंगाल के विशाल राजस्व का उपयोग अब कंपनी ने अपनी सेना को मजबूत करने और फ्रांसीसियों को हराने (कर्नाटक युद्ध) के लिए किया।

दूरगामी परिणाम:

  • 🔑 भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव: प्लासी की जीत ने अंग्रेजों के लिए भारत में एक विशाल साम्राज्य की नींव रखी। बंगाल से प्राप्त धन के बिना वे कभी भी इतनी बड़ी शक्ति नहीं बन सकते थे।
  • नैतिक पतन: इस युद्ध ने दिखाया कि अंग्रेज अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किसी भी नैतिक सीमा (धोखा, षड्यंत्र) को पार कर सकते हैं।
  • आर्थिक शोषण: इसके बाद बंगाल का आर्थिक शोषण शुरू हुआ, जिससे एक समय का सबसे धनी प्रांत धीरे-धीरे कंगाल हो गया।
  • अगले कदम का आधार: प्लासी की जीत के आत्मविश्वास और संसाधनों के बल पर ही अंग्रेजों ने बक्सर का युद्ध (1764) जीता, जिसने भारत में उनके शासन पर अंतिम मुहर लगा दी।

निष्कर्ष में, जैसा कि इतिहासकार के. एम. पणिक्कर ने कहा है, “प्लासी एक सौदा था जिसमें बंगाल के धनी बैंकरों और मीर जाफर ने नवाब को अंग्रेजों के हाथों बेच दिया।” यह एक ऐसी घटना थी जिसने एक व्यापारिक कंपनी को भारत का भाग्य-विधाता बना दिया।


बक्सर का युद्ध प्लासी से भी अधिक महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने भारत में ब्रिटिश सत्ता को षड्यंत्र की नींव से निकालकर वास्तविक सैन्य शक्ति की नींव पर स्थापित कर दिया। आइए, बक्सर के युद्ध का विस्तृत विश्लेषण करें।


⚔️ बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar): 22 अक्टूबर 1764

यह युद्ध प्लासी की तरह कोई धोखा नहीं, बल्कि दो शक्तिशाली सेनाओं के बीच लड़ी गई एक वास्तविक लड़ाई थी, जिसने भारत में अंग्रेजों की सैन्य श्रेष्ठता को निर्विवाद रूप से स्थापित कर दिया।

1. कारण और पृष्ठभूमि: प्लासी के बाद की स्थिति

प्लासी (1757) के बाद, मीर जाफर को बंगाल का नवाब तो बना दिया गया, लेकिन वह अंग्रेजों के हाथों की एक कठपुतली था।

  • लगातार धन की मांग: अंग्रेज लगातार मीर जाफर से धन और रियायतों की मांग कर रहे थे, जिससे बंगाल का खजाना खाली हो गया।
  • मीर कासिम का नवाब बनना: जब मीर जाफर अंग्रेजों की मांगें पूरी नहीं कर सका, तो अंग्रेजों ने 1760 में उसे हटाकर उसके दामाद, मीर कासिम (Mir Qasim), को नवाब बना दिया। अंग्रेजों को लगा कि वह भी एक कमजोर कठपुतली साबित होगा।

मीर कासिम की नीतियां – संघर्ष का मूल कारण:
मीर कासिम एक योग्य, कुशल और महत्वाकांक्षी शासक था। वह अंग्रेजों के प्रभाव से मुक्त होकर बंगाल पर वास्तविक नियंत्रण स्थापित करना चाहता था।

  • राजधानी का स्थानांतरण: अंग्रेजों के हस्तक्षेप से बचने के लिए, उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर (बिहार) स्थानांतरित कर दी।
  • सेना का आधुनिकीकरण: उसने अपनी सेना को यूरोपीय तर्ज पर प्रशिक्षित करना शुरू किया और मुंगेर में तोप और बंदूकें बनाने का कारखाना स्थापित किया।
  • आर्थिक सुधार:
    • सबसे बड़ा विवाद का कारण: उसने कंपनी के “दस्तक” (कर-मुक्त व्यापार पास) के दुरुपयोग को रोकने की कोशिश की।
    • जब अंग्रेज नहीं माने, तो उसने एक क्रांतिकारी कदम उठाया – उसने सभी भारतीय व्यापारियों के लिए भी व्यापार को कर-मुक्त (Tax-Free) कर दिया।
    • इस कदम ने अंग्रेजों को मिलने वाले विशेष लाभ को समाप्त कर दिया और उन्हें भारतीय व्यापारियों के बराबर ला खड़ा किया। अंग्रेज इससे आगबबूला हो गए क्योंकि उनका व्यापारिक एकाधिकार खत्म हो गया था।

इन्हीं कारणों से अंग्रेजों और मीर कासिम के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया।

2. घटनाक्रम: तीन शक्तियों का गठबंधन

अंग्रेजों ने मीर कासिम को हटाने का फैसला किया और उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। कई छोटी लड़ाइयों में हारने के बाद, मीर कासिम भागकर अवध पहुँचा। वहाँ उसने अंग्रेजों के खिलाफ एक शक्तिशाली गठबंधन बनाया।

संयुक्त भारतीय सेना का गठबंधन:

  1. 👑 मीर कासिम: बंगाल का अपदस्थ नवाब।
  2. 👑 शुजा-उद-दौला (Shuja-ud-Daula): अवध का नवाब।
  3. 👑 शाह आलम द्वितीय (Shah Alam II): मुगल बादशाह (जो उस समय नाममात्र का शासक था और अवध के नवाब के संरक्षण में रह रहा था)।

युद्ध का दिन (22 अक्टूबर 1764):

  • 📍 स्थान: बक्सर (बिहार)।
  • युद्ध: एक तरफ एक विशाल लेकिन असंगठित भारतीय गठबंधन था, और दूसरी तरफ एक छोटी, अनुशासित और बेहतर प्रशिक्षित ब्रिटिश सेना।
  • परिणाम: कुछ ही घंटों की लड़ाई में, मेजर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने संयुक्त भारतीय सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया। मीर कासिम भाग गया और शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

3. परिणाम और इलाहाबाद की संधि (1765)

बक्सर की जीत प्लासी से कहीं अधिक निर्णायक थी। इसने उत्तर भारत में ब्रिटिश शक्ति को स्थापित कर दिया। युद्ध के बाद, रॉबर्ट क्लाइव (जो वापस गवर्नर बनकर आया था) ने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय और अवध के नवाब शुजा-उद-दौला के साथ इलाहाबाद की संधि (Treaty of Allahabad) की।

इलाहाबाद की पहली संधि (मुगल बादशाह शाह आलम-II के साथ):

  • 📜 सबसे महत्वपूर्ण परिणाम: मुगल बादशाह ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की “दीवानी” (राजस्व एकत्र करने और दीवानी न्याय का अधिकार) स्थायी रूप से प्रदान कर दी।
  • इसके बदले में, कंपनी ने बादशाह को 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया।

इलाहाबाद की दूसरी संधि (अवध के नवाब शुजा-उद-दौला के साथ):

  • अवध को उसका राज्य वापस कर दिया गया (इलाहाबाद और कड़ा के जिले छोड़कर)।
  • नवाब पर युद्ध के हर्जाने के रूप में 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।
  • अवध कंपनी का एक मित्र राज्य बन गया।

4. बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना (Diarchy in Bengal: 1765-1772)

बक्सर की जीत और इलाहाबाद की संधि के बाद, रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल में एक अनूठी और शोषक प्रशासनिक व्यवस्था लागू की, जिसे “द्वैध शासन” कहा जाता है।

द्वैध शासन का अर्थ: दो शासकों का शासन।

परिणाम और प्रभाव:

  • यह प्रणाली बंगाल के लिए विनाशकारी साबित हुई।
  • कंपनी ने किसानों से क्रूरतापूर्वक अधिक से अधिक लगान वसूला, जिससे कृषि बर्बाद हो गई।
  • नवाब के पास प्रशासन चलाने के लिए धन नहीं था, जिससे कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो गई।
  • इस व्यवस्था ने कंपनी को अत्यधिक अमीर बना दिया और बंगाल की जनता को लूट लिया।
  • 1770 में बंगाल में पड़े भयानक अकाल के लिए इस शोषक व्यवस्था को ही जिम्मेदार माना जाता है।
  • अंततः 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने इस द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त कर दिया और बंगाल का पूरा प्रशासन सीधे कंपनी के नियंत्रण में ले लिया।

बक्सर युद्ध का महत्व:

  • वास्तविक सैन्य जीत: इसने अंग्रेजों की सैन्य श्रेष्ठता को सिद्ध किया।
  • कानूनी मान्यता: प्लासी ने जहाँ कंपनी को कठपुतली नवाब का स्वामी बनाया, वहीं बक्सर ने मुगल बादशाह के फरमान द्वारा कंपनी को बंगाल का कानूनी दीवान बना दिया।
  • उत्तर भारत में प्रवेश: इस जीत ने अंग्रेजों के लिए पूरे उत्तर भारत का दरवाजा खोल दिया और उनके अखिल भारतीय साम्राज्य की वास्तविक शुरुआत की।

भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना कोई एक घटना नहीं, बल्कि लगभग 100 वर्षों (1757-1856) तक चली एक सोची-समझी प्रक्रिया थी। इस प्रक्रिया में युद्ध, कूटनीति, चालाक संधियाँ और प्रशासनिक सुधार शामिल थे।

इसे हम दो मुख्य चरणों में समझ सकते हैं:

  1. साम्राज्य का विस्तार (Expansion of the Empire): 1757-1818 तक, जब उन्होंने मुख्य भारतीय शक्तियों को हराया।
  2. साम्राज्य का सुदृढीकरण (Consolidation of the Empire): 1818-1856 तक, जब उन्होंने बाकी क्षेत्रों को இணைத்து लिया और अपना प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत किया।

भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की प्रक्रिया (Process of Establishment)

चरण 1: साम्राज्य का विस्तार (c. 1757 – 1818) – प्रमुख शक्तियों पर विजय

प्लासी (1757) और बक्सर (1764) में बंगाल पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद, अंग्रेजों के सामने तीन बड़ी भारतीय शक्तियाँ थीं: मैसूर, मराठा और सिख

1. आंग्ल-मैसूर युद्ध (Anglo-Mysore Wars) – दक्षिण भारत पर नियंत्रण

मैसूर राज्य (हैदर अली और उसके पुत्र टीपू सुल्तान के अधीन) दक्षिण भारत में अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती था। मैसूर को हराने के लिए अंग्रेजों को चार युद्ध लड़ने पड़े।

➡️ परिणाम: टीपू सुल्तान की हार के साथ, दक्षिण भारत में ब्रिटिश वर्चस्व स्थापित हो गया।


2. आंग्ल-मराठा युद्ध (Anglo-Maratha Wars) – मध्य और पश्चिम भारत पर नियंत्रण

मुगल साम्राज्य के पतन के बाद, मराठा भारत की सबसे बड़ी शक्ति थे। लेकिन वे आंतरिक कलह (विभिन्न सरदारों जैसे सिंधिया, होल्कर, भोंसले, गायकवाड़ के बीच संघर्ष) के कारण कमजोर थे। अंग्रेजों ने इसी का फायदा उठाया।

➡️ परिणाम: 1818 तक, मराठों की चुनौती समाप्त हो गई और अंग्रेजों का लगभग पूरे भारत (पंजाब और सिंध को छोड़कर) पर प्रभुत्व स्थापित हो गया।


चरण 2: साम्राज्य का सुदृढीकरण (c. 1818 – 1856) – शेष भारत का विलय

मराठों को हराने के बाद, अंग्रेजों ने बची हुई शक्तियों को खत्म करने और सीधे प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित किया।

1. सिंध का विलय (Annexation of Sindh) – 1843
अफगानिस्तान में रूसी प्रभाव को रोकने के लिए, अंग्रेजों ने सिंध के महत्व को समझा। लॉर्ड एलेनबरो के समय में, चार्ल्स नेपियर ने सिंध के अमीरों को झूठे आरोपों में फंसाकर और युद्ध में हराकर सिंध पर कब्जा कर लिया। यह एक पूर्णतः अनैतिक और आक्रामक कार्रवाई थी।


2. आंग्ल-सिख युद्ध (Anglo-Sikh Wars) – पंजाब पर नियंत्रण

महाराजा रणजीत सिंह (मृत्यु 1839) के समय तक पंजाब एक शक्तिशाली राज्य था, और अंग्रेज उस पर हमला करने से डरते थे। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद, सिख साम्राज्य में राजनीतिक अस्थिरता फैल गई।

➡️ परिणाम: पंजाब के विलय के साथ ही, भारत की विजय का ब्रिटिश अभियान लगभग पूरा हो गया।


साम्राज्य विस्तार के कूटनीतिक उपकरण

अंग्रेजों ने केवल युद्धों से ही साम्राज्य का विस्तार नहीं किया, बल्कि दो बहुत ही चालाक नीतियों का भी उपयोग किया:

निष्कर्ष: 1757 के प्लासी के युद्ध से शुरू हुई यह प्रक्रिया 1856 में अवध के विलय के साथ समाप्त हुई। इन 100 वर्षों में, एक व्यापारिक कंपनी ने युद्ध और कूटनीतिक चालाकियों के माध्यम से दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक को अपने अधीन कर लिया और अपने विशाल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की।