परिचय: साहित्यिक साक्ष्य के तहत, साहित्यिक ग्रंथों से मिलने वाली सामग्रियों का अध्ययन होता है। इन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: धार्मिक साहित्य और लौकिक साहित्य।
विशेष ज्ञान: शिलालेखों का अध्ययन पुरालेख शास्त्र कहलाता है, जबकि ऐतिहासिक लेखों के संरक्षण से जुड़ा विज्ञान म्यूजियोलॉजी के अंतर्गत आता है।
🙏 धार्मिक साहित्य (Religious Literature)
धार्मिक साहित्य को ब्राह्मण और ब्राह्मणेत्तर ग्रंथों में विभाजित किया जा सकता है।
ब्राह्मण ग्रंथ
प्रमुख ग्रंथ: इनमें वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण और स्मृति ग्रंथ शामिल हैं।
ब्राह्मणेत्तर साहित्य
मुख्य रचनाएँ: इस श्रेणी में बौद्ध और जैन साहित्य से संबंधित महत्वपूर्ण रचनाओं का उल्लेख होता है।
वेद (The Vedas)
महत्व: वेद भारत के सबसे प्राचीन धर्म ग्रंथ हैं, जिनके संकलन का श्रेय महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को दिया जाता है।
संख्या: वेदों की संख्या चार है – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इन चारों को सम्मिलित रूप से संहिता कहा जाता है।
📜 ऋग्वेद:
यह चारों वेदों में सबसे पुराना वेद है, जिसमें 10 मंडल, 8 अष्टक, 10,600 मंत्र और 1028 सूक्त हैं।
इसका रचना काल आमतौर पर 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के मध्य माना गया है।
इसका दूसरा और सातवां मंडल सबसे प्राचीन है, जबकि पहला और दसवां मंडल सबसे बाद में जोड़ा गया।
ऋग्वेद के नौवें मंडल को ‘सोम मंडल’ के नाम से भी जाना जाता है।
इसकी पांच प्रमुख शाखाएं हैं – शाकल, आश्वलायन, माण्डूक्य, शंखायन और वाष्कल।
ऋग्वेद के 10वें मंडल के पुरुषसूक्त में पहली बार वर्ण व्यवस्था का जिक्र मिलता है।
प्रसिद्ध गायत्री मंत्र (सावित्री) का स्रोत भी ऋग्वेद ही है।
🎵 सामवेद:
इसे भारतीय संगीत का मूल या जनक माना जाता है। इसमें मुख्य रूप से यज्ञों के समय गाए जाने वाले मंत्रों का संकलन है।
सामवेद में कुल 1549 ऋचाएँ हैं, जिनमें से केवल 75 नई हैं, बाकी ऋग्वेद से ली गई हैं।
इसकी तीन मुख्य शाखाएं हैं – जैमिनीय, राणायनीय और कौथुमीय।
✨ यजुर्वेद:
इसमें यज्ञों के नियमों और विधि-विधानों का संग्रह मिलता है।
यह एकमात्र वेद है जो गद्य और पद्य, दोनों शैलियों में रचा गया है।
इसके दो भाग हैं – कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद।
इसकी संहिताओं के रचयिता वाजसनेयी के पुत्र याज्ञवल्क्य हैं, इसलिए इसे ‘वाजसनेयी संहिता’ भी कहते हैं।
🌿 अथर्ववेद:
इसमें सामान्य मनुष्यों के विचारों और अंधविश्वासों का वर्णन है।
इसमें कुल 20 मंडल, 731 ऋचाएं और 6000 मंत्र हैं।
अथर्ववेद में परीक्षित को कुरुओं का राजा बताया गया है।
अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ
🧠 उपनिषद्:
इसका शाब्दिक अर्थ ‘समीप बैठना’ है। इसमें आत्मा, परमात्मा और संसार के संदर्भ में दार्शनिक विचारों का संग्रह है।
उपनिषद् वेदों का अंतिम हिस्सा हैं, इसलिए इन्हें वेदांत भी कहा जाता है।
इनकी कुल संख्या 108 है।
प्रसिद्ध राष्ट्रीय वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।
🌳 आरण्यक:
यह ब्राह्मण ग्रंथों का अंतिम भाग है, जिसमें दार्शनिक और रहस्यात्मक विषयों का वर्णन है।
📚 वेदांग:
वेदों को सही ढंग से समझने के लिए छः वेदांगों की रचना की गई। ये हैं – शिक्षा, छन्दस, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और कल्पसूत्र।
📜 पुराण:
पुराणों के रचयिता लोमहर्ष या उनके पुत्र उग्रश्रवा को माना जाता है। इनकी संख्या 18 है।
🏹 रामायण:
यह ‘आदि काव्य’ है जिसकी रचना संस्कृत में वाल्मीकि ने की थी। शुरुआत में इसमें 6000 श्लोक थे, जो बाद में 24,000 हो गए।
⚔️ महाभारत:
इसकी रचना महर्षि व्यास ने की थी। प्रारंभ में इसमें 8,800 श्लोक थे और इसे ‘जयसंहिता’ कहा जाता था। बाद में श्लोकों की संख्या बढ़कर 24,000 हो गई, और फिर एक लाख हो जाने पर इसे ‘महाभारत’ या ‘शतसहस्र संहिता’ कहा जाने लगा।
सूत्र, दर्शन और स्मृतियाँ
📌 कल्प सूत्र: ऐसे सूत्र जिनमें नियमों एवं विधि का वर्णन होता है, कल्पसूत्र कहलाते हैं। (रचना काल 600 ई.पू. से 300 ई. के मध्य)।
🏛️ षड्दर्शन: उपनिषदों के दर्शन को छः भागों में विभाजित किया गया है, जिसे षड्दर्शन कहते हैं। इसमें आत्मा, परमात्मा, जीवन और मृत्यु से संबंधित दार्शनिकता का वर्णन है।
📖 स्मृतियाँ: वेदांग और सूत्रों के बाद स्मृतियों का उदय हुआ, जिन्हें धर्म शास्त्र भी कहा जाता है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति प्रमुख हैं।
🏛️ लौकिक साहित्य (Secular Literature)
लौकिक साहित्य में ऐतिहासिक, अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रंथ और जीवनियां शामिल हैं, जिनसे भारतीय इतिहास को जानने में सहायता मिलती है।
कौटिल्य (चाणक्य) का अर्थशास्त्र मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी देता है।
कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी ऐतिहासिक रचनाओं में सबसे महत्वपूर्ण है।
पाणिनी की अष्टाध्यायी, पतंजलि का महाभाष्य और कालिदास का मालविकाग्निमित्र भी उल्लेखनीय हैं।
🗺️ विदेशी यात्रियों के विवरण (Accounts of Foreign Travelers)
इनके विवरण से तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का पता चलता है।
यूनान एवं रोम के लेखक
हेरोडोट्स: इन्हें ‘इतिहास का पिता’ कहा जाता है। इन्होंने अपनी पुस्तक हिस्टोरिका में भारत-फारस संबंधों का वर्णन किया।
मेगास्थनीज: यह सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया। इसने ‘इण्डिका’ ग्रंथ में मौर्ययुगीन समाज और संस्कृति के बारे में लिखा।
अन्य लेखक: डाइमेकस, डायोनिसियस, टॉलमी (‘भूगोल’ के लेखक), और प्लिनी (‘नेचुरल हिस्टोरिका’ के लेखक) शामिल हैं।
चीनी यात्रियों के वृत्तांत
🇨🇳 फाह्यान: यह गुप्त नरेश चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में आया था। इसने मध्य देश की जनता को ‘सुखी एवं समृद्ध’ बताया।
🇨🇳 ह्वेनसांग: यह हर्षवर्धन के समय भारत आया और 16 वर्षों तक रहा। इसका यात्रा वृत्तांत ‘सि-यू-की’ नाम से प्रसिद्ध है।
🇨🇳 इत्सिंग: यह सातवीं शताब्दी के अंत में भारत आया और इसने नालंदा व विक्रमशिला विश्वविद्यालय का वर्णन किया।
अरब यात्रियों के वृत्तांत
✍️ अलबरूनी: यह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। यह अरबी, फारसी और संस्कृत का ज्ञाता था।
✍️ इब्नखुर्दाव: इसने अपने ग्रंथ में भारतीय समाज और व्यापारिक मार्गों का विवरण दिया।
✍️ अल मसूदी: इसने तत्कालीन भारतीय समाज का जीवंत चित्रण किया।
✍️ सुलेमान: इनके विवरण से प्रतिहार एवं पाल राजाओं की जानकारी मिलती है।
इसके तहत तीन प्रकार के साक्ष्य आते हैं: अभिलेख, मुद्रा और स्मारक।
अभिलेख (Inscriptions)
परिचय: अभिलेख पत्थर की शिलाओं, स्तंभों, दीवारों, मुद्राओं और ताम्रपत्रों पर खोदे जाते थे। इनके अध्ययन को पुरालेख शास्त्र कहते हैं।
प्राचीनतम अभिलेख: सबसे पुराने अभिलेख मध्य एशिया के बोगजकोई से प्राप्त हुए हैं, जो लगभग 1400 ई.पू. के हैं और इनमें वैदिक देवता इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य के नाम मिलते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य:
भागवत धर्म का प्रमाण यवन राजदूत हेलियोडोरस के बेसनगर (विदिशा) गरुड़ स्तम्भ लेख से मिलता है।
सबसे पहले ‘भारतवर्ष’ का जिक्र कलिंग नरेश खारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख में मिलता है।
भारत पर हूण आक्रमण की जानकारी स्कंदगुप्त के भितरी स्तंभ लेख से प्राप्त होती है।
सती प्रथा का पहला साक्ष्य 510 ई. के एरण अभिलेख (सेनापति भानुगुप्त) से मिलता है।
क्र.सं.
अभिलेख
शासक एवं अभिलेख की विशेषताएँ
1.
हाथी गुम्फा अभिलेख
कलिंग राज खारवेल
2.
जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख
रुद्रदामन (सुदर्शन झील की जानकारी)
3.
नासिक अभिलेख
गौतमी बलश्री (सातवाहनों की उपलब्धियाँ)
4.
प्रयाग स्तम्भ अभिलेख
समुद्रगुप्त (इनकी विजयों की जानकारी)
5.
ऐहोल अभिलेख
पुलकेशिन द्वितीय
6.
मन्दसौर अभिलेख
मालवा नरेश यशोवर्मन
7.
ग्वालियर अभिलेख
प्रतिहार नरेश भोज
8.
भितरी एवं जूनागढ़ अभिलेख
स्कन्दगुप्त (हूणों पर विजय का विवरण)
9.
देवपाड़ा अभिलेख
बंगाल शासक विजयसेन
10.
एरण अभिलेख
भानुगुप्त
मुद्रा (Coins)
🪙 प्राचीनतम सिक्के: भारत में सबसे पुराने सिक्के आहत सिक्के (Punch Marked Coins) कहलाते हैं। साहित्यिक ग्रंथों में इन्हें कार्षापण, पुराण, धरण आदि कहा गया है।
🪙 लेख वाले सिक्के: सिक्कों पर लेख लिखवाने का काम सबसे पहले यवन शासकों ने शुरू किया।
🪙 महत्व: कनिष्क के सिक्कों से उसके बौद्ध धर्म का अनुयायी होने का प्रमाण मिलता है।
🗿 प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period)
परिभाषा: जिस काल का कोई लिखित विवरण नहीं मिलता, उसे प्रागैतिहासिक काल कहते हैं, जैसे- पाषाण कालीन इतिहास।
आद्य ऐतिहासिक काल: जिस काल के लिखित विवरण मिलते हैं लेकिन उन्हें पढ़ा नहीं जा सका है, वह आद्य ऐतिहासिक काल कहलाता है, जैसे- सिंधु सभ्यता।
विभाजन: प्रागैतिहासिक काल को तीन भागों में बांटा गया है- पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल, और नवपाषाण काल।
पुरापाषाण काल (5,00,000-10,000 ई.पू.)
अन्वेषण: भारत में पाषाण कालीन संस्कृति का अन्वेषण ब्रूस फ्रुट महोदय ने 1863 ई. में किया।
प्रमुख स्थल: इस युग के स्थल पाकिस्तान की सोहन घाटी एवं महाराष्ट्र में पाए गए हैं।
उपकरण: इस काल के मुख्य औजार थे- कुल्हाड़ी (हस्तकुठार), विदारिणी (क्लीवर) और खंडक (गंडासा)।
महत्वपूर्ण खोज:
हथनौरा (मध्य प्रदेश) से हाथी का सबसे पुराना जीवाश्म प्राप्त हुआ है।
मध्य पुरापाषाण युग के औजार मुख्यतः शल्क (Flake) के थे, इसलिए इसे फलक संस्कृति भी कहा गया है।
इसी काल में आग की खोज हुई, जबकि पहिए का आविष्कार नवपाषाण काल में हुआ।
इस काल के मानवों की गुफाएँ भीमबेटका से मिली हैं, जिनकी खोज 1958 में बी.एस. वाकणकर ने की थी।
🏹 मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age: 10,000–4,000 ई.पू.)
विशेषताएँ: इस काल में पुरापाषाण और नवपाषाण, दोनों कालों की मिली-जुली विशेषताएँ देखने को मिलती हैं।
जीवनशैली: इस युग के लोगों का जीवन शिकार, मछली पकड़ने और खाद्य सामग्री इकट्ठा करने पर आधारित था।
उपकरण: इस काल में पत्थरों के छोटे उपकरण यानी लघु पाषाण उपकरण बनाए जाते थे।
खोज: भारत में पहले लघु पाषाण उपकरण 1867 ई. में विंध्य क्षेत्र में सी.एल. कार्लाइल द्वारा खोजे गए थे।
प्रौद्योगिकी: मध्यपाषाण काल में प्रक्षेपास्त्र तकनीक का विकास हुआ, जिससे तीर-कमान का इस्तेमाल शुरू हुआ।
🌱 नवपाषाण काल (Neolithic Age: 9,000–1,000 ई.पू.)
शुरुआत: इस युग का आरंभ 9,000 ई. पू. से माना जाता है।
प्रमुख बदलाव: स्थायी निवास की अवधारणा इसी काल में विकसित हुई और मनुष्य ने सबसे पहले कुत्ते को पालतू जानवर बनाया।
उपकरण: इस काल के लोग पॉलिश किए हुए पत्थर के औजारों और हथियारों का उपयोग करते थे।
मुख्य विशेषताएँ: कृषि की शुरुआत, गर्त-आवास (बुर्जहोम), मानव शव के साथ कुत्ते को दफनाना, बड़ी संख्या में हड्डी के औजार, मिट्टी के बर्तन बनाना, ऊन के साक्ष्य, और एक स्थायी सामाजिक जीवन का निर्माण इस युग की प्रमुख विशेषताएँ थीं।
⏳ आद्य ऐतिहासिक काल (Proto-Historic Period)
इसे दो प्रमुख भागों में बांटा गया है:
ताम्रपाषाण काल (3500 ई.पू. – 1200 ई.पू.)
लौह काल (1000 ई.पू. – 600 ई.पू.)
ताम्रपाषाण काल:
यह मुख्य रूप से एक ग्रामीण संस्कृति थी, जिसे कृषक और पशुपालक संस्कृति के रूप में भी जाना जाता है।
इस काल के लोग तांबे और पत्थर का एक साथ प्रयोग करते थे, जो भारत में कई संस्कृतियों का आधार बना।
प्रमुख खोज: ‘ताँबा’ धातु का सबसे पहले उपयोग हुआ और पहला औजार ‘कुल्हाड़ी’ बनाया गया।
लौह काल:
इसका निर्धारण आमतौर पर 1000 ई.पू. से 600 ई.पू. के बीच किया जाता है।
उत्तर भारत में, लौह काल के साथ चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) संस्कृति मौजूद थी, जबकि दक्षिण भारत में यह महापाषाण संस्कृति के समकालीन था।
🏛️ हड़प्पा संस्कृति (Harappan Civilization)
काल-निर्धारण: रेडियो कार्बन C¹⁴ डेटिंग के अनुसार, सिन्धु घाटी सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. के बीच निर्धारित की गई है।
संस्थापक: इसकी खोज का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी तथा राखलदास बनर्जी को जाता है।
युग: इसे कांस्य युग (Bronze Age) में रखा गया है।
विस्तार: इसके सर्वाधिक पश्चिमी स्थल सुत्कांगेडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी स्थल आलमगीरपुर (मेरठ, उत्तर प्रदेश), उत्तरी स्थल माण्डा (जम्मू-कश्मीर) और दक्षिणी स्थल दायमाबाद (महाराष्ट्र) हैं।
लिपि: इसकी लिपि भावचित्रात्मक थी, जो दाईं से बाईं ओर और फिर बाईं से दाईं ओर लिखी जाती थी।
नगर नियोजन: नगरों और घरों के निर्माण के लिए ग्रिड पद्धति अपनाई गई थी। घरों के दरवाजे मुख्य सड़क पर न खुलकर पीछे की ओर खुलते थे, केवल लोथल इसका अपवाद था।
फसलें: यहाँ की मुख्य फसलें गेहूँ और जौ थीं।
माप-तौल: माप की इकाई संभवतः 16 के अनुपात में थी।
प्रमुख इमारतें: मोहनजोदड़ो से मिला अन्नागार इस सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत है, और यहीं से प्राप्त बृहत् स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है।
शासन: माना जाता है कि हड़प्पा संस्कृति का शासन वणिक वर्ग के हाथों में था।
उपासना: यहाँ के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर पूजा करते थे। वृक्ष-पूजा, शिव-पूजा, मातृदेवी की उपासना और पशुपति की पूजा भी प्रचलित थी। कूबड़ वाला साँड विशेष रूप से पूजनीय था।
अंतिम संस्कार: शवों को जलाने और दफनाने, दोनों की प्रथाएँ थीं। हड़प्पा में शवों को दफनाया जाता था, जबकि मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा थी।
🌍 सैंधव सभ्यता के प्रमुख स्थल
वर्ष
उत्खननकर्ता
प्रमुख स्थल
नदी
स्थिति
1921
दयाराम साहनी
हड़प्पा
रावी के बाएँ तट
पाकिस्तान (मोंटगोमरी जिला)
1922
राखलदास बनर्जी
मोहनजोदड़ो
सिन्धु के बाएँ तट
पाकिस्तान (सिंध प्रांत) का लरकाना जिला
1931
गोपाल मजूमदार
चन्हूदड़ो
सिन्धु
सिंध प्रांत (पाकिस्तान)
1953
बी.बी. लाल एवं बी.के. थापर
कालीबंगन
घग्घर
राजस्थान (हनुमानगढ़ जिला)
1953-54
रंगनाथ राव
रंगपुर
मादर
गुजरात (काठियावाड़)
1955-63
रंगनाथ राव
लोथल
भोगवा
गुजरात (अहमदाबाद)
1958
यज्ञदत्त शर्मा
आलमगीरपुर
हिन्डन
उत्तर प्रदेश (मेरठ)
1974
रवीन्द्र सिंह बिष्ट
बनावली
रंगोई
हरियाणा (हिसार)
1990-91
रवीन्द्र सिंह बिष्ट
धौलावीरा
मनहर व मानसर
गुजरात (कच्छ)
💡 रोचक तथ्य:
आग में पकी हुई मिट्टी को टेराकोटा कहा जाता है।
स्वतंत्रता के बाद, हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गए हैं।
सिन्धु घाटी से मिली नृत्य करती हुई बालिका की कांस्य मूर्ति एक महत्वपूर्ण रचना है।
मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है – ‘मृतकों का टीला’।
इस सभ्यता के विनाश का सबसे संभावित कारण बाढ़ माना जाता है।
📖 वैदिक काल (Vedic Period)
वैदिक काल को दो भागों में बांटा गया है:
ऋग्वैदिक काल (1500–1000 ई.पू.)
उत्तर वैदिक काल (1000–600 ई.पू.)
ऋग्वैदिक काल (Rigvedic Period)
संस्थापक: इसके संस्थापक आर्य थे, जिनकी निर्मित सभ्यता वैदिक सभ्यता कहलाई।
धातु का प्रयोग: ऋग्वैदिक काल के लोगों ने सबसे पहले तांबे का उपयोग किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में ‘अयस’ नाम से मिलता है।
आर्यों का मूल निवास: मैक्समूलर के अनुसार, आर्यों का मूल निवास स्थान मध्य एशिया (बैक्ट्रिया) था।
विद्वान
आर्यों का मूल निवास स्थान
मैक्समूलर
मध्य एशिया (बैक्ट्रिया)
बाल गंगाधर तिलक
उत्तरी ध्रुव
दयानन्द सरस्वती
तिब्बत
गंगानाथ झा
ब्रह्मर्षि देश
गार्डन चाइल्ड्स
दक्षिणी रूस
डॉ. अविनाश चन्द्र दास
सप्तसैंधव प्रदेश
समाज और प्रशासन:
सिन्धु सभ्यता के विपरीत, आर्य सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी और उनकी भाषा संस्कृत थी।
समाज पितृसत्तात्मक था, जिसकी सबसे छोटी इकाई परिवार (कुल) थी।
प्रशासनिक इकाइयों को 5 भागों में बांटा गया था – कुल, ग्राम, विश, जन, तथा राष्ट्र।
प्रमुख अधिकारी: राज्याधिकारियों में पुरोहित एवं सेनानी प्रमुख थे। इनकी संख्या राजा सहित लगभग 12 होती थी।
गुप्तचर: जनता की गतिविधियों पर नजर रखने वाले गुप्तचरों को स्पश कहा जाता था।
संस्थाएँ: सभा एवं समिति राजा को सलाह देने वाली संस्थाएँ थीं। ऋग्वैदिक काल में महिलाएँ भी इन सभाओं में भाग लेती थीं।
प्राचीन नाम
वर्तमान नाम
सिंधु
सिंधु
सरस्वती
सरसवती
शतुद्रि
सतलज
विपाशा
व्यास
परुष्णी
रावी
असिकनी
चिनाब
वितस्ता
झेलम
गोमल
गोमती
कुंभा
काबुल
📖 उत्तर वैदिक काल (Later Vedic Period)
जटिलता और भव्यता: इस काल में यज्ञ से जुड़े कर्मकाण्डों में जटिलता और भव्यता बढ़ गई।
देन: यज्ञ-विधान क्रियाएँ उत्तर वैदिक काल की देन मानी जाती हैं।
वैदिक काल के प्रमुख यज्ञ
राजसूय यज्ञ: यह यज्ञ राजा के राज्याभिषेक के अवसर पर होता था, जिससे माना जाता था कि उसे दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
अश्वमेध यज्ञ: यह यज्ञ राजा की शक्ति का प्रतीक था। इसमें राजा की शक्ति को दर्शाने वाले घोड़े को विभिन्न क्षेत्रों में घुमाया जाता था, जो उसके राज्य विस्तार का सूचक होता था।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
🔠 ऋग्वेद में शब्दों का उल्लेख:
जन: 275 बार
विश: 170 बार
सभा: 8 बार
समिति: 9 बार
शूद्र: 1 बार
🏞️ नदियाँ: ऋग्वेद में कुल 25 नदियों का उल्लेख है, जिसमें सरस्वती सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र नदी थी। गंगा और यमुना का उल्लेख केवल एक बार हुआ है।
🧠 शब्दों का स्रोत:
ओऽम: बृहदारण्यक उपनिषद्
सत्यमेव जयते: मुण्डकोपनिषद्
पाप-पुण्य: ऋग्वेद
स्वर्ग-नरक: ऋग्वेद
⚔️ दशराज्ञ युद्ध: इसका वर्णन ऋग्वेद के 7वें मण्डल में है, जो परुष्णी (रावी) नदी के तट पर सुदास एवं दस जनों के बीच हुआ, जिसमें सुदास की विजय हुई।
💡 जीवन और समाज:
ऋण देकर ब्याज लेने वाले व्यक्ति को वेकनॉट (सूदखोर) कहा जाता था।
अविवाहित रहने वाली स्त्रियों को अमाजू कहा जाता था।
आर्यों के प्रमुख देवता ‘इन्द्र’ और प्रिय पशु ‘घोड़ा’ था।
आर्यों द्वारा खोजी गई धातु लोहा थी, जिसे ‘श्याम अयस्’ कहा जाता था।
विधवा अपने मृतक पति के छोटे भाई (देवर) से विवाह कर सकती थी, जिसे नियोग प्रथा कहा जाता था।
आर्यों का मुख्य पेय पदार्थ सोमरस था।
🙏 पंच महायज्ञ (Five Great Sacrifices)
बह्मयज्ञ (ऋषियज्ञ): वेदों का पाठ करके प्राचीन ऋषियों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना।
देवयज्ञ: हवन की अग्नि में घी की आहुति देकर देवताओं का आह्वान करना।
पितृयज्ञ: अपने पूर्वजों को जल और भोजन (श्राद्ध) का तर्पण करके उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना।
भूतयज्ञ: सभी प्राणियों के प्रति कृतज्ञता के लिए पशु-पक्षियों और कीटों को बलि (भोजन) देना।
नृयज्ञ (अतिथियज्ञ): अतिथि सत्कार के माध्यम से मानव के प्रति कृतज्ञता दर्शाना।
📜 उत्तर वैदिक काल की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था (Later Vedic Society and Religion)
👑 शासन और देवता:
ऋग्वैदिक काल में पशुओं के देवता के रूप में पूजे जाने वाले पूषण, उत्तर वैदिक काल में शूद्रों के देवता बन गए।
उत्तर वैदिक काल में इंद्र के स्थान पर प्रजापति सबसे प्रिय और महत्वपूर्ण देवता हो गए। प्रजापति को सृष्टि का रचयिता, विष्णु को विश्व का रक्षक और पूषण को शूद्रों का देवता माना जाता था।
🧠 प्रमुख अवधारणाएँ:
गोत्र एवं आश्रम व्यवस्था: इन व्यवस्थाओं का उल्लेख सबसे पहले उत्तर वैदिक काल में हुआ।
पुनर्जन्म की अवधारणा: यह पहली बार बृहदारण्यक उपनिषद् में प्रस्तुत की गई।
वर्णों के कर्तव्य: ऐतरेय ब्राह्मण में चारों वर्णों के कर्तव्यों का वर्णन मिलता है।
🌱 जीवन और अर्थव्यवस्था:
उत्तर वैदिक काल में लोगों की आजीविका का मुख्य आधार कृषि हो गया था।
खेत जोतने वाले हल को ‘सिरा’ और हल से बनी रेखा को ‘सीता’ कहा जाता था।
‘शतमान’ और ‘निष्क’ उत्तर वैदिक काल की मुद्राएँ थीं।
✨ दर्शन और वास्तुकला:
भारत का सबसे प्राचीन दर्शन सांख्य दर्शन है, जिसमें प्रकृति को मूल तत्व माना गया है।
पहली बार पक्की ईंटों का उपयोग उत्तर वैदिक काल में कौशाम्बी नगर में देखने को मिलता है।
💍 विवाह के प्रकार (Types of Marriage)
प्राचीन भारत में आठ प्रकार के विवाह प्रचलित थे:
ब्रह्म विवाह: पिता अपनी पुत्री के लिए एक योग्य वर ढूंढकर उससे विवाह करता था।
दैव विवाह: पिता अपनी पुत्री का विवाह यज्ञ करने वाले पुरोहित से करता था।
आर्य विवाह: वर, कन्या के पिता को सम्मान स्वरूप एक जोड़ी बैल प्रदान करता था।
प्रजापत्य विवाह: वर पक्ष की ओर से विवाह का प्रस्ताव आता था।
असुर विवाह: वर, कन्या के पिता को धन या वस्तुएँ देकर विवाह करता था।
गंधर्व विवाह: यह प्रेम विवाह था, जिसमें माता-पिता की अनुमति आवश्यक नहीं थी।
राक्षस विवाह: कन्या का अपहरण करके उससे विवाह करना।
पैशाच विवाह: धोखे से या बलपूर्वक कन्या से विवाह करना।
नोट: असुर विवाह केवल वैश्य व शूद्र में, गंधर्व विवाह क्षत्रियों में, और राक्षस विवाह भी क्षत्रियों के लिए मान्य था। राक्षस और पैशाच विवाह को निंदनीय माना जाता था।
🧘 धार्मिक आंदोलन (Religious Movements)
जैन धर्म (Jainism)
संस्थापक: जैन धर्म के संस्थापक ऋषभदेव को माना जाता है, जो सम्राट भरत के पिता थे।
24वें तीर्थंकर: महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर थे।
महावीर का जीवन:
जन्म: 540 ई.पू. में कुण्डलग्राम (वैशाली) में हुआ।
पिता: सिद्धार्थ, जो ‘ज्ञातृक क्षत्रियों के संघ’ के प्रमुख थे।
माता: त्रिशला, जो लिच्छवि राजा चेटक की बहन थीं।
ज्ञान प्राप्ति: 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद, उन्हें जृम्भिक ग्राम के पास ऋजुपालिका नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद वे जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य) और निर्ग्रन्थ (बंधनहीन) कहलाए।
उपदेश: उन्होंने अपने उपदेश प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में दिए।
निर्वाण: 468 ई.पू. में 72 वर्ष की आयु में राजगृह के निकट पावापुरी में मल्लराजा सृस्तिपाल के महल में उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।
प्रमुख सिद्धांत: महावीर ने गृहस्थों के लिए पाँच अणुव्रत बताए:
सत्य वचन
अहिंसा
अस्तेय (चोरी न करना)
अपरिग्रह (सांसारिक वस्तुओं का त्याग)
ब्रह्मचर्य
विशेषता
विवरण
समय
300 ई.पू.
स्थल
पाटलिपुत्र
अध्यक्ष
स्थूलभद्र
शासक
चन्द्रगुप्त मौर्य
कार्य
12 अंगों का प्रणयन, जैन धर्म का दो भागों में विभाजन (श्वेताम्बर और दिगम्बर)
विशेषता
विवरण
समय
512 ई.
स्थल
वल्लभी
अध्यक्ष
देवर्धिक्षमाश्रमण
कार्य
धर्म ग्रंथों को अंतिम रूप से संकलित कर लिपिबद्ध किया गया।
💡 जैन धर्म से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य:
कल्पसूत्र: जैन तीर्थंकरों की जीवनियाँ भद्रबाहु द्वारा रचित कल्पसूत्र में संकलित हैं।
कैवल्य: यह शब्द जैन धर्म में मोक्ष के लिए प्रयुक्त होता है।
आगम: जैन साहित्य को ‘आगम’ कहा जाता है। इसके तहत 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण आदि शामिल हैं।
विभाजन: चंद्रगुप्त मौर्य के समय मगध में अकाल के बाद, जैन धर्म दिगम्बर (वस्त्रहीन) और श्वेताम्बर (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले) में विभाजित हो गया।
त्रिरत्न: महावीर ने कर्मफल से मुक्ति के लिए त्रिरत्न का सिद्धांत दिया:
सम्यक् ज्ञान: जैन धर्म के सिद्धांतों का सच्चा ज्ञान।
सम्यक् दर्शन: जैन तीर्थंकरों के उपदेशों में अटूट विश्वास।
सम्यक् चरित्र: प्राप्त ज्ञान को व्यवहार में लाना।
बौद्ध धर्म (Buddhism)
प्रवर्तक: बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी वन में हुआ था।
बुद्ध का जीवन:
माता-पिता: पिता शुद्धोधन शाक्य गण के प्रधान थे और माता मायादेवी कोलीय गणराज्य की कन्या थीं।
बचपन का नाम: सिद्धार्थ।
विवाह: 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह यशोधरा से हुआ।
महाभिनिष्क्रमण (गृह त्याग): 29 वर्ष की आयु में सांसारिक दुखों से व्यथित होकर उन्होंने गृह त्याग किया।
ज्ञान प्राप्ति (सम्बोधि): 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात को बोधगया में निरंजना नदी के किनारे, पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
महापरिनिर्वाण (मृत्यु): उनकी मृत्यु कुशीनारा में हुई।
नाम/वस्तु
संबंध
महामाया
गौतम बुद्ध की माँ
राहुल
गौतम बुद्ध का पुत्र
चन्ना
बुद्ध का सारथी
कंथक
बुद्ध का प्रिय घोड़ा
सुजाता
कृषक कन्या जिसने बुद्ध को खीर खिलाई थी
अलार कलाम
बुद्ध के शिक्षक, जिन्होंने योग और उपनिषद् की शिक्षा दी
अश्वत्थ (पीपल)
वह वृक्ष जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ
प्रतीक
घटना
🐘 हाथी
बुद्ध के गर्भ में आने का प्रतीक
🪷 कमल
जन्म का प्रतीक
🐎 घोड़ा
गृह-त्याग का प्रतीक
🌳 पीपल
ज्ञान का प्रतीक
🐾 पदचिन्ह
निर्वाण का प्रतीक
स्तूप
मृत्यु का प्रतीक
📜 उपदेश और संघ:
प्रथम उपदेश: बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ (ऋषिपतनम्) में दिया, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है।
भाषा: उन्होंने अपने उपदेश जनसाधारण की भाषा पाली में दिए।
महिला संघ: आनंद के अनुरोध पर संघ में पहली बार वैशाली में महिलाओं को प्रवेश दिया गया।
आष्टांगिक मार्ग: सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए बुद्ध ने इस मार्ग का उपदेश दिया।
त्रिपिटक: बौद्ध साहित्य को तीन पिटकों में विभाजित किया गया है:
सुत्तपिटक: बुद्ध के धार्मिक विचारों और वचनों का संग्रह।
विनय पिटक: बौद्ध संघ की विवेचना और नियम।
अभिधम्म पिटक: बुद्ध के दार्शनिक विचार।
अनीश्वरवाद: ईश्वर के अस्तित्व को न मानने के संबंध में बौद्ध और जैन धर्म में समानता है।
📈 बौद्ध धर्म का विकास:
प्रारंभिक चरण: बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति से लेकर परिनिर्वाण तक, पूर्वी भारत में इसका विस्तार हुआ।
अशोक का काल: अशोक के संरक्षण में यह धर्म भारत से बाहर फैला।
शुंग-कण्व काल: राजकीय संरक्षण में कमी के बावजूद, धनी व्यापारियों के समर्थन से यह फलता-फूलता रहा।
कनिष्क का काल: कनिष्क के समय में बौद्ध धर्म मध्य एशिया और चीन तक फैला। इसी दौरान यह महायान और हीनयान में विभाजित हो गया।
गुप्त काल: राजकीय संरक्षण की कमी के बाद भी यह लोकप्रिय बना रहा। कुमारगुप्त प्रथम द्वारा नालंदा महाविहार की स्थापना एक महत्वपूर्ण विकास था।
पालों का संरक्षण: पूर्वी भारत में पालों के संरक्षण में इसका पुनरुत्थान हुआ, लेकिन उनके पतन के बाद इसका प्रभाव कम हो गया।
विभाजन:
वैशाली की द्वितीय संगीति में बौद्ध संघ स्थविरवादियों और महासंघिकों में विभाजित हो गया।
आठवीं सदी में वज्रयान भी एक अलग पंथ के रूप में उभरा।
कुल मिलाकर, तीसरी संगीति तक बौद्ध धर्म 18 पंथों में बँट चुका था।
🙏 अन्य भारतीय धर्म
🔱 शैव धर्म (Shaivism)
ऋग्वेद में शिव के लिए ‘रुद्र’ नामक देवता का उल्लेख मिलता है।
वामन पुराण के अनुसार, शैव सम्प्रदाय की चार प्रमुख शाखाएँ थीं: पाशुपत, कापालिक, कालामुख और लिंगायत।
नयनार: पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार नयनारों द्वारा किया गया, जिनकी संख्या 63 बताई गई है।
🙏 वैष्णव धर्म (Vaishnavism)
इसके संस्थापक वृष्णि वंश के यादव नेता वासुदेव कृष्ण थे।
दशावतार: मत्स्य पुराण में विष्णु के दस अवतारों (मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध एवं कल्कि) का उल्लेख है।
अवतारवाद का सिद्धांत सबसे पहले भगवद्गीता में मिलता है।
अलवार: तमिल प्रदेश में यह धर्म अलवार संतों के माध्यम से विकसित हुआ।
🌙 इस्लाम धर्म (Islam)
संस्थापक: हजरत मुहम्मद साहब।
जन्म: 570 ई. में मक्का में हुआ।
ज्ञान प्राप्ति: 610 ई. में मक्का के पास हीरा नामक गुफा में उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।
हिजरी संवत्: 24 सितंबर, 622 ई. को पैगम्बर के मक्का से मदीना की यात्रा को मुस्लिम संवत् (हिजरी संवत्) के नाम से जाना जाता है।
पवित्र ग्रंथ: कुरान, जिसे देवदूत जिब्रियल ने पैगम्बर मुहम्मद साहब को अरबी भाषा में संप्रेषित किया था।
मृत्यु: 8 जून, 632 ई. को हुई, और उन्हें मदीना में दफनाया गया।
विभाजन: उनकी मृत्यु के बाद इस्लाम सुन्नी (सुन्ना में विश्वास करने वाले) तथा शिया (अली की शिक्षाओं में विश्वास करने वाले) में विभाजित हो गया।
✝️ ईसाई धर्म (Christianity)
संस्थापक: ईसा मसीह।
जन्म: जेरुशलम के निकट बैथलेहम नामक स्थान पर हुआ था।
🏛️ मगध साम्राज्य का उदय (Rise of Magadha Empire)
संस्थापक: मगध के प्रारंभिक राजवंश की स्थापना “वसु” के पुत्र “जरासन्ध” के पिता “बृहद्रथ” ने की थी।
हर्यक वंश: बिम्बिसार ने लगभग 545 ई.पू. में इस वंश की स्थापना की और राजगृह को अपनी राजधानी बनाया।
अजातशत्रु: इसने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या करके 493 ई. पूर्व में मगध का शासन संभाला। इसे पितृहंता भी कहा जाता है।
पाटलिपुत्र की स्थापना: अजातशत्रु के पुत्र उदयन ने ‘गार्गी संहिता’ और ‘वायु पुराण’ के अनुसार ‘पाटलिपुत्र’ नामक राजधानी की स्थापना की।
शिशुनाग वंश: हर्यक वंश के अंतिम राजा नागदशक की हत्या करके उसके अमात्य शिशुनाग ने 412 ई. पूर्व में इस वंश की स्थापना की।
नन्द वंश: इसका संस्थापक महापद्मनन्द था, जो एक शूद्र शासक था। इसने एकराट और एकछत्र की उपाधि धारण की थी। इस वंश का अंतिम शासक घनानंद था, जो सिकन्दर का समकालीन था।
वंश
संस्थापक
काल
राजधानी
बृहद्रथ वंश
बृहद्रथ
महाभारत काल
गिरिव्रज (राजगृह)
हर्यक वंश
बिम्बिसार
545 ई.पू.
राजगृह
शिशुनाग वंश
शिशुनाग
412 ई.पू.
वैशाली
नन्द वंश
महापद्म
344 ई.पू.
पाटलिपुत्र
⚔️ विदेशी आक्रमण (Foreign Invasions)
🇮🇷 ईरानी आक्रमण (Persian Invasion)
भारत पर पहला विदेशी आक्रमण ईरान के हखमनी साम्राज्य ने किया था।
डेरियस (दारा) (532-486 ई.पू.) ने भारत पर पहला सफल आक्रमण किया और गांधार तथा पंजाब को ईरानी साम्राज्य में मिला लिया।
🇬🇷 यूनानी आक्रमण (Greek Invasion)
सिकन्दर: यह 20 वर्ष की आयु में (335 ई.पू.) अपने पिता ‘फिलिप’ की मृत्यु के बाद ‘मकदूनिया’ का शासक बना।
भारत पर आक्रमण: इसने 326 ई. पूर्व में हिन्दूकुश पर्वत पार करके भारत पर आक्रमण किया।
हाइडेस्पेस का युद्ध: सिकन्दर ने इस युद्ध में भारतीय शासक पोरस को पराजित किया, लेकिन उसकी वीरता से प्रभावित होकर उसे मित्र बना लिया।
वापसी: सिकन्दर की सेना ने व्यास नदी को पार करने से मना कर दिया, जिसके बाद वह 325 ई.पू. में भारत से लौट गया।
मृत्यु: उसकी मृत्यु 323 ई.पू. में बेबीलोन में 33 वर्ष की आयु में हो गई।
👑 मौर्य साम्राज्य (Mauryan Empire)
🌟 चन्द्रगुप्त मौर्य (Chandragupta Maurya)
स्थापना: चन्द्रगुप्त मौर्य ने गुरु चाणक्य की सहायता से नंद शासक ‘घनानन्द’ का वध करके मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
विवाह और संधि: सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त से किया और काबुल, कन्धार, हेरात एवं मकरान प्रांत उसे सौंप दिए।
मेगास्थनीज: सेल्यूकस का राजदूत मेगास्थनीज, चन्द्रगुप्त के दरबार में आया, जिसने ‘इण्डिका’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।
क्र.सं.
शिलालेख
खोज का वर्ष
लिपि
1.
शाहबाजगढ़ी
1836
खरोष्ठी
2.
मानसेहरा
1889
खरोष्ठी
3.
गिरनार
1822
ब्राह्मी
4.
धौली
1837
ब्राह्मी
5.
कालसी
1837
ब्राह्मी
6.
जूनागढ़
1850
ब्राह्मी
👑 बिन्दुसार (Bindusara)
यह चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था और उसे अमित्रघात, सिंहसेन आदि नामों से भी जाना जाता है।
विद्रोह: इसके शासनकाल में ‘तक्षशिला’ में दो बार विद्रोह हुआ, जिसे पहली बार ‘अशोक’ ने और दूसरी बार सुसीम ने दबाया।
👑 अशोक (Ashoka)
यह बिन्दुसार का उत्तराधिकारी था, जो 269 ई.पू. में मगध की राजगद्दी पर बैठा।
प्रारंभिक जीवन: राजगद्दी पर बैठने से पहले, अशोक अवन्ति का राज्यपाल था।
कलिंग विजय: इसने अपने अभिषेक के आठवें वर्ष (लगभग 261 ई.पू.) में कलिंग पर आक्रमण किया और उसकी राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया।
नाम
स्रोत
अशोक मौर्य
गिरनार अभिलेख
अशोकवर्द्धन
पुराण
पियदस्सी
भाब्रु शिलालेख
अशोक
मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर, उद्गोलम अभिलेख
📜 अशोक के लेखों से संबंधित तथ्य (Facts Related to Ashoka’s Inscriptions)
पढ़ा जाना: अशोक के अभिलेखों को 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने सबसे पहले पढ़ा था।
अंतिम शासक: मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ था।
धर्म प्रचार: उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी।
धम्म यात्रा: अशोक ने अपने शासन के दौरान भूराजस्व की दर घटाने की घोषणा की थी, जिसका प्रमाण रुम्मिनदेई स्तम्भ-लेख में मिलता है।
अशोक का सबसे छोटा स्तम्भ-लेख रुम्मिन्देई है जिसकी खोज फीहरर ने की।
गुफा निर्माण: अशोक ने आजीवकों के लिए बराबर की पहाड़ियों में चार गुफाओं का निर्माण करवाया: कर्ण, चोपड़, सुदामा और विश्व झोपड़ी।
शिलालेखों की खोज: अशोक के शिलालेखों की खोज 1750 ई. में टीफेन्थेलर ने की थी।
🏛️ मौर्य प्रशासन (Mauryan Administration)
मंत्रिपरिषद: सम्राट की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद होती थी, जिसके सदस्यों की संख्या 12, 16 या 20 हो सकती थी।
तीर्थ: प्रशासन के शीर्षस्थ अधिकारियों को ‘तीर्थ’ कहा जाता था, जिनकी संख्या 18 थी। इन्हें महामात्र भी कहते थे।
प्रांत: अशोक के समय मौर्य साम्राज्य में 5 प्रांत थे, जिन्हें ‘चक्र’ कहा जाता था।
ग्राम: प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जिसका मुखिया ग्रामिक कहलाता था।
गुप्तचर: एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करके कार्य करने वाले गुप्तचर को ‘संचार’ कहा जाता था।
न्यायालय: मौर्य काल में दो प्रकार के न्यायालय थे:
धर्मस्थीय (दीवानी)
कण्टकशोधन (फौजदारी)
सप्तांग सिद्धांत: राजा के सप्तांग सिद्धांत की व्याख्या सबसे पहले कौटिल्य (चाणक्य) ने की थी, जिसमें राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड एवं मित्र शामिल थे।
अधिकारी
विभाग/कार्य
मंत्री
प्रधानमंत्री
पुरोहित
धर्म एवं दान विभाग का प्रधान
सेनापति
सैन्य विभाग का प्रधान
समहर्ता
आय का संग्रहकर्त्ता
सन्निधाता
राजकीय कोष का अध्यक्ष
पौर
नगर का कोतवाल
💸 मौर्यकालीन आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था (Mauryan Economic and Social System)
भूमिकर: राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमिकर था, जो उपज का 1/6 भाग होता था।
सरकारी भूमि: सरकारी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था।
समाज: मेगास्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों में विभाजित किया था: दार्शनिक, किसान, अहीर, कारीगर, सैनिक, निरीक्षक एवं सभासद।
स्वतन्त्र वेश्यावृत्ति: इस पेशे को अपनाने वाली महिला रूपाजीवा कहलाती थी।
⏳ मौर्योत्तर काल (Post-Mauryan Period)
⚫ शुंग वंश (Shunga Dynasty)
स्थापना: मौर्य सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या करके शुंग वंश की नींव डाली।
विशेषता: शुंग काल को वैदिक प्रतिक्रिया (पुनर्जागरण) का काल भी कहा जाता है।
निर्माण: भरहुत स्तूप का निर्माण पुष्यमित्र शुंग ने करवाया था।
अश्वमेध यज्ञ: अयोध्या शिलालेख के अनुसार, पुष्यमित्र शुंग ने अपने शासन के अंतिम दिनों में दो अश्वमेध यज्ञ करवाए थे।
⚫ कण्व वंश (Kanva Dynasty)
इसकी स्थापना शुंग वंश के अंतिम शासक देवभूति की हत्या करके 73 ई.पू. में सेनापति वासुदेव ने की थी।
⚫ सातवाहन/आंध्र वंश (Satavahana/Andhra Dynasty)
संस्थापक: सातवाहन वंश के संस्थापक सिमुक थे।
शासक: शातकर्णी-प्रथम ने दो अश्वमेध और एक राजसूय यज्ञ किया था।
सिक्के: सातवाहन शासकों ने चाँदी, ताँबे, सीसे, पोटीन और काँसे की मुद्राएँ चलाईं।
भाषा एवं समाज: इनकी राजकीय भाषा प्राकृत और लिपि ब्राह्मी थी, तथा समाज मातृसत्तात्मक था।
🇮🇳 भारत में इण्डो-ग्रीक राज्य (Indo-Greek Kingdom in India)
मिनाण्डर: यह एक प्रमुख इण्डो-ग्रीक शासक था, जिसे ‘एशिया का संरक्षक’ भी कहा गया है।
स्वर्ण सिक्के: भारत में सबसे पहले लेख वाले सोने के सिक्के यूनानियों ने ही चलाए।
मिलिंदपन्हो: ‘मिलिंदपन्हो’ नामक ग्रंथ में मिनाण्डर और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच का प्रसिद्ध वार्तालाप वर्णित है।
⚫ शक ‘सिथियन’ (Shaka ‘Scythian’)
शक मूल रूप से मध्य एशिया के निवासी थे।
रुद्रदामन प्रथम: यह सबसे प्रतापी शक शासक था। इसने सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाया और सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में गिरनार अभिलेख जारी किया।
विक्रम संवत्: 57 ई.पू. में उज्जैन के एक स्थानीय शासक ने शकों पर विजय के उपलक्ष्य में विक्रम संवत् चलाया।
⚫ पार्थियन/ ‘पह्लव’ (Parthian/’Pahlava’)
भारत में पहला पार्थियन शासक माउस था।
गोण्डोफर्नीज: यह सबसे शक्तिशाली पह्लव शासक था, जिसके शासनकाल में प्रथम ईसाई धर्म प्रचारक सेण्ट थामस भारत आए थे।
👑 कुषाण वंश (Kushan Dynasty)
मूल: कुषाण, युएची जाति की एक शाखा थे जिसका प्रभाव मध्य एशिया, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक फैला हुआ था।
प्रथम शासक: कुजुल कैडफिसिज प्रथम (15–65 ई.) कुषाण वंश का पहला शासक था, जिसके सिक्कों पर ‘युवांग’, ‘महाराज’ और ‘राजाधिराज’ जैसी उपाधियाँ मिलती हैं।
वास्तविक संस्थापक: भारत में कुषाण साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक विम कडफिसस को माना जाता है। वह शैव मत का अनुयायी था, और उसके सिक्कों पर शिव, नन्दी तथा त्रिशूल की आकृतियाँ पाई जाती हैं।
सोने के सिक्के: भारत में सबसे पहले सोने के सिक्के विम कडफिसस द्वारा ही चलाए गए थे।
सबसे शक्तिशाली शासक: कनिष्क (सन् 78 ई.) इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था, जिसकी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी।
शक-संवत्: कनिष्क ने एक संवत् चलाया जो शक-संवत् कहलाता है, जिसे आज भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।
चौथी बौद्ध संगीति: बौद्ध धर्म की चौथी बौद्ध संगीति कनिष्क के शासनकाल में कुण्डलवन (कश्मीर) में आयोजित हुई थी।
प्रसिद्ध विद्वान:
चरक: कनिष्क का राजवैद्य और आयुर्वेद का विख्यात विद्वान, जिसने चरक संहिता की रचना की।
अश्वघोष: कनिष्क का राजकवि, जिसने बौद्धों की रामायण कही जाने वाली ‘बुद्धचरित’ की रचना की।
नागार्जुन: इन्हें ‘भारत का आइंस्टीन’ कहा जाता है। इनकी पुस्तक ‘माध्यमिक सूत्र’ में सापेक्षता का सिद्धांत वर्णित है।
कला शैलियाँ: गांधार शैली और मथुरा शैली का विकास कनिष्क के शासनकाल में हुआ था।
अंतिम शासक: कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव था।
⚫ नाग वंश (Naga Dynasty)
शासन क्षेत्र: पुराणों के अनुसार, पद्मावती, मथुरा और नागपुर में नाग कुलों का शासन था।
‘भारशिव’: पद्मावती के नाग ‘भारशिव’ कहलाते थे।
संबंध: चन्द्रगुप्त द्वितीय का विवाह नागवंशीय कन्या ‘कुबेरनागा’ से हुआ था।
⚪ वाकाटक वंश (Vakataka Dynasty)
परिचय: यह (विष्णुवृद्धि गोत्र के ब्राह्मण) वंश का शासन दक्षिण भारत में तीसरी से छठी शताब्दी के बीच था।
संस्थापक: इस वंश का संस्थापक विन्ध्यशक्ति था।
प्रवरसेन प्रथम: इसने चार अश्वमेध यज्ञ किए और ‘सम्राट’ की उपाधि धारण की।
साहित्य: ‘कालिदास’ ने प्रवरसेन द्वितीय के संरक्षण में ‘मेघदूत’ नामक ग्रंथ की रचना की।
🛡️ चोल वंश (Chola Dynasty)
स्थापना: नौवीं शताब्दी में विजयालय ने 850 ई. में चोल वंश की स्थापना की, जिसकी राजधानी तंजौर थी।
आदित्य प्रथम: शिव का उपासक था और इसने कोदण्डराम की उपाधि धारण की थी।
परान्तक प्रथम: इसने पांड्य शासक राजसिंह द्वितीय को हराकर ‘मदुरैकोण्ड’ की उपाधि धारण की।
राजराज प्रथम: इसने दक्षिण भारत में स्वायत्तशासी लोकप्रशासन स्थापित किया और तंजौर में प्रसिद्ध राजराजेश्वर का शिव मंदिर बनवाया।
राजेन्द्र प्रथम: इसने कलिंग और बंगाल पर विजय प्राप्त करके ‘गंगैकोण्ड चोल’ की उपाधि धारण की और ‘गंगैकोण्ड चोलपुरम’ नामक नई राजधानी बसाई। इसे ‘दक्षिण भारत का नेपोलियन’ भी कहा जाता है।
कुलोतुंग प्रथम: व्यापारिक वस्तुओं से कर हटा देने के कारण इसे शुंगम तविर्त (करों को हटाने वाला) कहा गया।
कर का नाम
संबंधित क्षेत्र
आयम
राजस्व
कडिमै
लगान
मरमज्जाडि
वृक्ष कर
किडाक्काशु
पशु कर (नर पशु पर लगने वाला)
शासक
उपाधियाँ
परान्तक प्रथम
मदुरैकोण्ड
राजराज प्रथम
राजकेसरी, अरुमोलि, मुमाडिचोल देव
राजेन्द्र प्रथम
गंगईकोण्डचोल, मुडिगुंडचोल, पण्डितचोल
कुलोतुंग प्रथम
शुंगम तविर्त, कटैकोण्डचोलन
राजकीय चिह्न: चोलों का राजकीय चिह्न बाघ था।
प्रमुख शासक: इस वंश का एक और महत्वपूर्ण शासक करिकाल था, जिसे ‘जले हुए पैरों वाला’ भी कहा जाता था।
🏹 चेर वंश (Chera Dynasty)
क्षेत्र: चेर राज्य (केरल) पाण्ड्य देश के पश्चिम और उत्तर में समुद्र और पहाड़ों के बीच स्थित था।
उदयिन जेरल: यह चेर वंश का प्रथम शासक था। इसने ‘पत्तिनी’ या ‘कण्णगी’ पूजा की शुरुआत की थी।
🐠 पाण्ड्य वंश (Pandya Dynasty)
राजधानी: इनकी राजधानी मदुरा थी।
उल्लेख: पाण्ड्यों का उल्लेख सबसे पहले मेगास्थनीज ने किया था।
प्रतीक चिह्न: इनका प्रतीक चिह्न मछली (कार्प) था। यह राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था।
नेदुजेलियन: एक प्रमुख पांड्य शासक, जिसने निर्दोष कोवलन को मृत्युदंड दिया और बाद में सच्चाई पता चलने पर आत्महत्या कर ली।
🏛️ संगमकालीन सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक अवस्था (Sangam Period: Social, Religious and Economic Life)
समाज: संगम साहित्य के अनुसार समाज पाँच भागों में बँटा हुआ था: ब्राह्मण (सबसे ऊँचा स्थान), अरसर (शासक वर्ग), बेनिगर (वणिक वर्ग), वल्लाल (बड़े कृषक), और वेल्लार (मजदूर कृषक)।
दास प्रथा: संगम काल में दास प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन सती प्रथा प्रचलित थी।
प्रमुख देवता: मुख्य स्थानीय देवता मुरुगन थे, जिन्हें बाद में सुब्रह्मण्यम या कार्तिक कहा जाने लगा।
आर्थिक शब्दावली:
भाग: राजा को भूमि उत्पादन से प्राप्त होने वाला हिस्सा।
भोग: राजा को उपहार स्वरूप मिलने वाला कर।
हिरण्य: नकद रूप में लिया जाने वाला कर।
अग्रहार: मंदिरों एवं ब्राह्मणों को दान दी जाने वाली भूमि।
तिनई (क्षेत्र)
पुरम (युद्ध)
निवासी
देवतागण
कुरिंजी (पहाड़िया)
पशुओं की लूट
कुरुवर (पहाड़िया)
मुरुगन, सुब्रह्मण्य
मरुदम (मैदानी)
स्थायी पारंपरिक युद्ध
उलवर (कृषक)
सेनन, इंद्र
नेडल (तटीय)
स्थायी पारंपरिक युद्ध
पटदावर (मछुवारे)
वरुण, काडलर
🏛️ गुप्त काल (Gupta Period)
स्थापना: श्रीगुप्त ने 275 ई. में गुप्त राजवंश की स्थापना की थी।
चंद्रगुप्त प्रथम: इसने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की थी और गुप्त संवत् 319 ई. में शुरू किया था।
समुद्रगुप्त:
इसका वास्तविक नाम ‘काच’ था। इसे वी.ए. स्मिथ ने ‘भारतीय नेपोलियन’ कहा है।
यह संगीत-प्रेमी था, जैसा कि उसके सिक्कों पर उसे वीणा-वादन करते हुए दर्शाया गया है।
प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख में इसे ‘लिच्छवी दौहित्र’ कहा गया है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’:
इसने नागवंश की राजकुमारी ‘कुबेरनागा’ से विवाह किया और उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
इसके शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान (399-411 ई.) भारत आया था।
इसके दरबार में प्रसिद्ध नवरत्न थे, जिनमें कालिदास, वराहमिहिर और अमरसिंह प्रमुख थे।
शब्द
अर्थ
भाग
राजा को उत्पादन का हिस्सा
भोग
राजा को उपहार में कर
हिरण्य
नकद रूप में कर
विष्टि
निःशुल्क या बेगार श्रम
दीनार
स्वर्ण मुद्राएँ
अग्रहार
ब्राह्मणों/मंदिरों को दी गई भूमि
कुमारगुप्त प्रथम: इसने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
स्कन्दगुप्त: इसने हूणों को पराजित कर ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की और सुदर्शन झील का पुनरुद्धार करवाया।
अंतिम शासक: अंतिम गुप्त शासक भानुगुप्त था, जिसके एरण अभिलेख (510 ई.) से सती प्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य मिलता है।
🏛️ गुप्तकालीन प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था (Gupta Period: Administration and Economy)
प्रादेशिक इकाइयाँ:
‘देश’: गुप्त साम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई ‘देश’ थी, जिसके शासक को ‘गोप्ता’ कहा जाता था।
‘भुक्ति’: एक अन्य महत्वपूर्ण प्रादेशिक इकाई ‘भुक्ति’ थी, जिसके शासक ‘उपरिक’ कहलाते थे।
‘विषय’: भुक्ति के अधीन ‘विषय’ नामक प्रशासनिक इकाई होती थी, जिसके प्रमुख को ‘विषयपति’ कहा जाता था।
पुलिस विभाग:
पुलिस विभाग का मुख्य अधिकारी ‘दण्डपाशिक’ कहलाता था।
सामान्य पुलिसकर्मियों को ‘चारण एवं भाट’ कहा जाता था।
ग्राम प्रशासन:
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘ग्राम’ थी। ग्राम का प्रशासन ग्रामसभा द्वारा संचालित होता था।
ग्रामसभा का मुखिया ‘ग्रामिक’ कहलाता था और अन्य सदस्य ‘महत्तर’ कहलाते थे।
भू-राजस्व:
भू-राजस्व कुल उत्पादन का 1/4 से 1/6 भाग हुआ करता था।
मुद्रा:
गुप्तकालीन सोने के सिक्कों को ‘दीनार’ कहा जाता था।
चाँदी के सिक्कों को ‘रुप्यक’ कहा जाता था।
विद्वान
रचना/सिद्धांत
वत्स भट्टी
रावणवध
भास
स्वप्नवासवदत्तम्, चारूदत्तम्
अमर सिंह
अमरकोश
शूद्रक
मृच्छकटिकम्
वराहमिहिर
वृहत्संहिता, पंचसिद्धान्तिका
आर्यभट्ट
सूर्य सिद्धांत, आर्यभटीयम्
ब्रह्मगुप्त
ब्रह्म सिद्धांत
वागभट्ट
अष्टांगहृदयम् (चिकित्सा से संबंधित)
धन्वंतरि
शल्यशास्त्र (चिकित्सा से संबंधित)
🗿 गुप्तकालीन मंदिर (Gupta Period Temples)
मंदिर
स्थान
विष्णु मंदिर
तिगवा (जबलपुर, मध्य प्रदेश)
शिव मंदिर
भूमरा (नागौद, मध्य प्रदेश)
पार्वती मंदिर
नचना कुठार (मध्य प्रदेश)
दशावतार मंदिर
देवगढ़ (झाँसी, उत्तर प्रदेश)
भितरगाँव का मंदिर
भितरगाँव (कानपुर, उत्तर प्रदेश)
लक्ष्मण मंदिर
सिरपुर (छत्तीसगढ़) (ईंटों द्वारा निर्मित)
🌟 सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवस्था (Gupta Period: Social and Cultural Life)
कायस्थ जाति:
कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन याज्ञवल्क्य स्मृति में मिलता है।
एक जाति के रूप में कायस्थों का वर्णन ओशनम् स्मृति में मिलता है।
सती प्रथा:
इसका पहला अभिलेखीय साक्ष्य 510 ई. के भानुगुप्त के एरण अभिलेख से मिलता है।
पंचतंत्र:
विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र को संसार का सबसे प्रचलित ग्रंथ माना जाता है, बाइबिल के बाद इसका दूसरा स्थान है।
स्मृतियाँ:
याज्ञवल्क्य, नारद, कात्यायन और बृहस्पति स्मृतियों की रचना गुप्तकाल में ही हुई।
आर्यभट्ट:
चन्द्रगुप्त-II के दरबार के प्रसिद्ध विद्वान आर्यभट्ट ने ‘आर्यभटीयम्’ एवं ‘सूर्य सिद्धान्त’ नामक ग्रंथ लिखे और दशमलव प्रणाली का विकास किया। उन्होंने ही सबसे पहले बताया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है।
वराहमिहिर:
यह प्रसिद्ध खगोलशास्त्री थे जिन्होंने ‘बृहत्संहिता’ और ‘पंचसिद्धान्तिका’ की रचना की।
अजंता गुफाएँ:
अजंता की गुफाएँ बौद्ध धर्म की महायान शाखा से संबंधित हैं।
👑 गुप्तोत्तर काल (Post-Gupta Period)
प्रमुख राजवंश: गुप्त वंश के पतन के बाद मैत्रक, मौखरी, पुष्यभूति, परवर्ती गुप्त और गौड़ जैसे क्षेत्रीय राजवंशों का उदय हुआ।
वल्लभी का मैत्रक वंश
इस वंश का संस्थापक भट्टार्क था।
ध्रुवसेन द्वितीय, हर्षवर्धन का समकालीन था और इसी के समय ह्वेनसांग ने वल्लभी की यात्रा की थी।
मौखरी वंश
इस वंश के संस्थापक मुखर थे।
ग्रहवर्मा अंतिम मौखरी शासक था, जिसका विवाह हर्षवर्धन की बहन राज्यश्री से हुआ था।
उत्तरगुप्त वंश
कृष्णगुप्त को अपसढ़ अभिलेख में ‘नृप’ कहा गया है।
जीवितगुप्त द्वितीय को यशोवर्मन ने पराजित कर परवर्ती गुप्त राज्य का अंत कर दिया।
थानेश्वर का वर्द्धन वंश (पुष्यभूति वंश)
संस्थापक: इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति था।
हर्षवर्धन:
शासन: राज्यवर्द्धन के पश्चात् 16 वर्ष की उम्र में 606 ई. में हर्ष थानेश्वर का शासक बना।
युद्ध: हर्ष और चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के बीच नर्मदा नदी के तट पर युद्ध हुआ जिसमें हर्ष पराजित हुआ।
उपाधियाँ: हर्ष की उपाधि ‘शिलादित्य’ और ‘परमभट्टारक मगध नरेश’ थी।
रचनाएँ: हर्ष ने ‘सुप्रभात स्त्रोत’, ‘अष्टमहाश्रीचैत्य संस्कृत स्त्रोत’ और प्रियदर्शिका, रत्नावली तथा नागानन्द नामक तीन संस्कृत नाटक ग्रंथों की रचना की।
ह्वेनसांग: चीनी यात्री ह्वेनसांग, हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था। उसका यात्रा-वृत्तांत चीनी ग्रंथ ‘सी-यू-की’ से प्राप्त होता है।
धर्म: ह्वेनसांग से मिलने के बाद हर्ष ने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजकीय संरक्षण प्रदान किया और पूर्ण रूप से बौद्ध बन गया।
प्रशासन: प्रशासन की सुविधा के लिए हर्ष का साम्राज्य कई प्रांतों में विभाजित था। प्रांत को ‘भुक्ति’ कहा जाता था। ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी और उसका प्रधान ‘ग्रामाक्षपटलिक’ कहलाता था।
अधिकारी
पद/कार्य
सिंहनाद
मुख्य सेनापति
अमात्य
मन्त्रिपरिषद् के मंत्री
अपरिक
भुक्ति का प्रशासक
दण्डपाशिक
पुलिस अधिकारी
वृहदेश्वर
अश्व सेना का अधिकारी
बलाधिकृत
पैदल सेना का अधिकारी
कुंतल
अश्वसेना का प्रधान अधिकारी
💡 महत्वपूर्ण तथ्य (Interesting Facts)
नालंदा महाविहार: हर्ष के समय में, नालंदा महाविहार महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।
महामोक्षपरिषद्: हर्ष के समय में, प्रयाग में हर पाँचवें वर्ष एक समारोह आयोजित किया जाता था जिसे ‘महामोक्षपरिषद्’ कहा जाता था। ह्वेनसांग स्वयं छठे समारोह में सम्मिलित हुआ था।
बाणभट्ट: बाणभट्ट, हर्ष का दरबारी कवि था, जिसने ‘हर्षचरित’ एवं ‘कादम्बरी’ की रचना की थी।
📝 प्रश्नमाला (Practice Questions)
खजुराहो का कंदरिया महादेव मंदिर किसने बनवाया? (a) परमार (b) चेदि (c) राष्ट्रकूट (d) चन्देल
चोलों का राज्य किस क्षेत्र में फैला था? (a) विजयनगर क्षेत्र (b) मालाबार तट (d) कोरोमंडल तट, दक्कन के कुछ भाग
मीनाक्षी मंदिर कहाँ स्थित है? (c) मदुरै
भारतीय दर्शन की प्रारम्भिक शाखा कौन-सी है? (a) सांख्य
मालवा, गुजरात एवं महाराष्ट्र किस शासक ने पहली बार जीता? (d) चन्द्रगुप्त मौर्य
सांची का स्तूप किस शासक ने बनवाया था? (b) अशोक
‘सत्यमेव जयते’ शब्द कहां से लिया गया है? (d) मुण्डकोपनिषद
किस दक्षिण भारतीय राज्य में उत्तम ग्राम प्रशासन था? (c) चोल
बुद्ध के उपदेश किससे संबंधित हैं? (d) आचरण की शुद्धता व पवित्रता
चालुक्यों की राजधानी कहां थी? (a) वातापी
72 व्यापारी, चीन में किसके कार्यकाल में भेजे गए थे? (a) कुलोत्तुंग-I
विक्रम संवत् कब से प्रारम्भ हुआ? (b) 58 ई.पू.
सैंधव सभ्यता के महान् स्नानागार कहां से प्राप्त हुए हैं? (a) मोहनजोदड़ो
मूर्ति पूजा का आरम्भ कब से माना जाता है? (a) पूर्व आर्य (Pre Aryan)
बुद्ध की खड़ी प्रतिमा निम्न में से किस काल में बनाई गई? (b) कुषाणकाल
चंद्रगुप्त का प्रभाव पश्चिम भारत पर था, इसका प्रमाण रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है।
राजुक, मौर्य शासन में अधिकारी थे।
मिलिन्दपन्हो, एक पालि ग्रंथ है।
बोगजकोई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से प्राप्त अभिलेखों में वैदिक देवी-देवताओं का उल्लेख मिलता है।
‘आजीवक’ सम्प्रदाय के संस्थापक मक्खलि गोशाल थे।
बौद्ध और जैन धर्म, दोनों ही कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करते हैं।
काव्य शैली का प्राचीनतम नमूना रुद्रदामन के अभिलेख में मिलता है।
‘तोलकाप्पियम’ ग्रंथ व्याकरण और काव्य से संबंधित है।
कर्म का सिद्धांत, मीमांसा से संबंधित है।
🤔 निम्नलिखित पर विचार करें
कथन (A): लगभग दो वर्ष के अभियान के पश्चात् सिकंदर महान् ने 326 ई.पू. में भारत छोड़ दिया।
कारण (R): वह चन्द्रगुप्त मौर्य से पराजित हुआ था।
(c) A सही है, परन्तु R गलत है।
🤔 बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)
शून्यता के सिद्धांत का सर्वप्रथम प्रतिपादन करने वाले बौद्ध दार्शनिक का नाम है:
(a) नागार्जुन
भारत के किस स्थल की खुदाई से लौह धातु के प्रचलन के प्राचीनतम प्रमाण मिले हैं?
(b) अतरंजीखेड़ा
कपिलमुनि द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक प्रणाली है:
(b) सांख्य दर्शन
कालिदास द्वारा रचित ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक का नायक था:
(c) अग्निमित्र
बौद्ध धर्म के विषय में कौन-से कथन सही हैं?
बौद्ध धर्म ने ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया है।
उसने ब्राह्मण वर्ग की सर्वोच्च सामाजिक कोटि को चुनौती दी।
उसने कुछ शिल्पों को निम्न माना।
(b) 2 तथा 3
एलोरा में गुफाओं तथा शैलकृत मंदिरों का संबंध है, केवल:
(d) हिन्दुओं, बौद्धों तथा जैनियों से
आध्यात्मिक ज्ञान के विषय में नचिकेता और यम का संवाद किस उपनिषद् में प्राप्त होता है?
(c) कठोपनिषद्
निम्नलिखित में से कौन बुद्ध के जीवनकाल में ही संघ प्रमुख होना चाहता था?
(a) देवदत्त
आदिशंकर जो बाद में शंकराचार्य बने, उनका जन्म हुआ था:
(b) केरल में
रामानुज के अनुयायियों को कहा जाता है:
(b) वैष्णव
उपनिषद् काल के राजा अश्वपति शासक थे:
(b) कैकेय के
वैदिक नदी कुभा का स्थान कहां निर्धारित होना चाहिए?
(a) अफगानिस्तान
🏛️ दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate)
मध्यकालीन भारत में, भारत पर पहली बार ‘जजिया’ कर की वसूली मोहम्मद बिन कासिम द्वारा की गई थी।
सुल्तान की उपाधि धारण करने वाला पहला मुस्लिम शासक सुबुक्तगीन का पुत्र महमूद गजनवी था।
महमूद गजनवी का सबसे चर्चित आक्रमण 1025 ई. में सोमनाथ मंदिर (गुजरात) पर हुआ।
तराइन का द्वितीय युद्ध: 1192 ई. में गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच हुए इस युद्ध में चौहान की पराजय हुई।
चंदावर का युद्ध: 1194 ई. में गौरी और कन्नौज नरेश जयचन्द के बीच यह युद्ध हुआ, जिसमें गौरी विजयी रहा।
मुहम्मद गौरी की मृत्यु: 15 मार्च, 1206 ई. को, जब वह नमाज़ पढ़ रहा था, तो धोखे से उसकी हत्या कर दी गई।
शासक वंश
शासन काल (ईस्वी सन्)
गुलाम वंश
1206-1290
कुतुबुद्दीन ऐबक
1206-10
इल्तुतमिश
1211-36
रजिया बेगम
1236-40
खिलजी वंश
1290-1320
तुगलक वंश
1320-1414
सैयद वंश
1414-1451
लोदी वंश
1451-1526
** गुलाम वंश (1206-90 ई.)**
कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-10 ई.): इसने गुलाम वंश की स्थापना की और लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। इसे ‘लाखबख्श’ भी कहा जाता था। कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद और अढाई दिन का झोपड़ा का निर्माण इसी ने करवाया।
इल्तुतमिश (1210-36 ई.): इसने ‘इक्ता व्यवस्था’ का प्रचलन किया और चालीस गुलाम सरदारों का एक गुट ‘तुर्कान-ए-चहलगानी’ बनाया।
रजिया सुल्तान (1236-40): यह पहली मुस्लिम महिला शासक थी। उसने पर्दाप्रथा त्यागकर पुरुषों की तरह शासन किया।
बलबन (1266-87 ई.): इसने ‘तुर्कान-ए-चहलगानी’ का विनाश किया और राजदरबार में ‘सिजदा एवं पाबोस’ प्रथा की शुरुआत की। उसने फारसी रीति-रिवाज पर आधारित नवरोज उत्सव को भी प्रारंभ करवाया।
** खिलजी वंश (1290-1320 ई.)**
अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.): इसने अपने चाचा और ससुर जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करके सल्तनत की गद्दी प्राप्त की। इसे सिकन्दर-ए-सानी की उपाधि मिली थी।
बाजार नियंत्रण: इसने बाजार नियंत्रण की पूरी व्यवस्था का संचालन करने के लिए दीवान-ए-रियासत नामक अधिकारी की नियुक्ति की। इसने चराई कर (दुधारू पशुओं पर) और गढ़ी कर (घरों एवं झोपड़ी पर) जैसे नए कर भी लगाए।
स्थापत्य: जमात खाना मस्जिद, अलाई दरवाजा, और सीरी का किला का निर्माण करवाया।
जन्म और कार्यकाल: अमीर खुसरो का जन्म 1253 ई. में उत्तर प्रदेश के बदायूँ में हुआ था। वह बलबन से लेकर मुहम्मद तुगलक तक 8 सुल्तानों के दरबार में रहे।
उपनाम और शिष्य: उनका उपनाम तुति-ए-हिन्द (भारत का तोता) था और वह निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।
योगदान: उन्होंने सितार और तबले का आविष्कार किया और कव्वाली गायन की शुरुआत की।
दिल्ली सल्तनतकालीन प्रमुख अधिकारी एवं उनके कार्य
अधिकारी
विभाग/कार्य
वजीर
राजस्व विभाग (दीवान-ए-वजारत) का प्रधान
आरिज-ए-मुमालिक
सेना विभाग (दीवान-ए-अर्ज) का प्रधान
दबीर-ए-खास
शाही पत्र-व्यवहार विभाग (दीवान-ए-इंशा) का प्रधान
काजी-उल-कजात
न्याय विभाग का प्रधान
बरीद-ए-मुमालिक
गुप्तचर विभाग का प्रधान
कोतवाल
शहर की शांति व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी
** दिल्ली सल्तनतकालीन प्रमुख विभाग**
विभाग
कार्य
दीवान-ए-मुस्तखराज
राजस्व विभाग
दीवान-ए-अर्ज
सैन्य विभाग
दीवान-ए-कोही
कृषि विभाग
दीवान-ए-बंदगान
दासों का विभाग
दीवान-ए-खैरात
दान विभाग
दीवान-ए-इश्तिहाक
पेंशन विभाग
🏛️ बहमनी साम्राज्य का विभाजन (Division of the Bahmani Empire)
बहमनी साम्राज्य का पतन होने के बाद, यह पाँच स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया:
राज्य
राजधानी
स्थापना
संस्थापक
राजवंश
बरार
एलिचपुर/गाविलगढ़
1484 ई.
फतेहउल्ला इमादशाह
इमादशाही
बीजापुर
नौरसपुर
1489 ई.
युसूफ आदिलशाह
आदिलशाही
अहमदनगर
जुन्नार/खिरकी
1490 ई.
मलिक अहमद
निजामशाही
गोलकुंडा
गोलकुंडा
1512 ई.
कुली कुतुबशाह
कुतुबशाही
बीदर
बीदर
1526 ई.
अमीर अली बरीद
बरीदशाही
प्रशासनिक पद:
दौलताबाद के प्रांतपति (तरफदार) को ‘मसनद-ए-आली’ कहा जाता था, जबकि बरार के तरफदार को ‘मजलिस-ए-आली’ की उपाधि दी गई थी।
सुल्तान के महल और दरबार की सुरक्षा के लिए अंगरक्षक सैनिक दल होता था जिसे ‘साख-ए-खेल’ कहा जाता था। इसका प्रमुख अधिकारी ‘सर-ए-नौबत’ होता था।
⚔️ शेरशाह सूरी और उसके उत्तराधिकारी (1540-55 ई.)
स्थापना: अफगान वंश से संबंध रखने वाले शेरशाह सूरी ने सूर साम्राज्य की स्थापना की।
प्रारंभिक जीवन:
शेरशाह का मूल नाम ‘फरीद’ था और उनका जन्म 1472 ई. में बजवाड़ा (पंजाब) में हुआ था।
बिहार के अफगान शासक मुहम्मद बहार खाँ लोहानी ने फरीद द्वारा एक शेर को मारने पर उसे ‘शेर खाँ’ की उपाधि प्रदान की।
शासन:
बिलग्राम के युद्ध में हुमायूँ को पराजित करने के बाद, 1540 ई. में शेरशाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
उसने 22 मई, 1545 ई. में कालिंजर किले को जीतने के प्रयास में उक्का नामक आग्नेयास्त्र चलाते हुए अपनी जान गंवा दी।
प्रशासनिक सुधार:
मकबरा: शेरशाह का मकबरा सासाराम में एक झील के बीच ऊँचे टीले पर बनाया गया है।
भूमि माप: उसने भूमि की माप के लिए सिकन्दरी गज एवं सन की डंडी का प्रयोग किया।
मुद्रा: उसने 178 ग्रेन का चाँदी का रुपया और 380 ग्रेन का तांबे का दाम नामक सिक्का चलाया।
भू-राजस्व: कबूलियत एवं पट्टा प्रथा की शुरुआत शेरशाह ने की। पैदावार का लगभग 1/3 भाग लगान के रूप में वसूला जाता था।
बुनियादी ढाँचा: उसने पाटलिपुत्र को पटना के नाम से पुनः स्थापित किया और ग्रैंड ट्रंक रोड की मरम्मत करवाई।
डाक प्रथा: डाक प्रथा का प्रचलन भी शेरशाह के द्वारा किया गया।
मुगल साम्राज्य (Mughal Empire)
👑 बाबर (1526-30 ई.)
वंश: बाबर पितृवंश की ओर से तैमूर का पाँचवाँ वंशज और मातृवंश की ओर से चंगेज खाँ का चौदहवाँ वंशज था।
जन्म: उसका जन्म 14 फरवरी, 1483 ई. को फरगना में हुआ था। उसके पिता का नाम उमरशेख मिर्जा था।
उपाधि: 1507 ई. में, बाबर ने ‘पादशाह’ की उपाधि धारण की, जो उस समय तक किसी तैमूर शासक ने धारण नहीं की थी।
प्रमुख युद्ध:
पानीपत का प्रथम युद्ध (1526): इस युद्ध में बाबर ने पहली बार तुलुगमा युद्ध नीति और तोपखाने का प्रयोग किया। उस्ताद अली और मुस्तफा उसके दो प्रसिद्ध तोपची थे।
खानवा का युद्ध (1527): इस युद्ध में बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया और ‘गाजी’ की उपाधि धारण की।
मृत्यु और मकबरा:
26 दिसम्बर, 1530 ई. को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई।
प्रारंभ में उसके शव को आगरा के ‘नूर अफगान’ (आरामबाग) में दफनाया गया, लेकिन बाद में काबुल में उसके द्वारा चुने गए स्थान पर ले जाया गया।
आत्मकथा:
बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) तुर्की भाषा में लिखी, जिसका फारसी में अनुवाद अब्दुल रहीम खानखाना ने किया।
वर्ष
युद्ध
पक्ष
परिणाम
21 अप्रैल, 1526 ई.
पानीपत का प्रथम युद्ध
इब्राहिम लोदी एवं बाबर
बाबर विजयी
17 मार्च, 1527 ई.
खानवा का युद्ध
राणा सांगा एवं बाबर
बाबर विजयी
29 जनवरी, 1528 ई.
चन्देरी का युद्ध
मेदनी राय एवं बाबर
बाबर विजयी
6 मई, 1529 ई.
घाघरा का युद्ध
अफगानों एवं बाबर
बाबर विजयी
👑 हुमायूँ (1530-56 ई.)
प्रारंभिक जीवन: हुमायूँ का जन्म 6 मार्च, 1508 ई. को काबुल में हुआ था। आगरा की गद्दी पर बैठने से पहले वह बदख्शाँ का सूबेदार था।
साम्राज्य का विभाजन: उसने अपने भाइयों कामरान, असकरी और हिन्दाल में साम्राज्य का विभाजन किया।
दीनपनाह: 1533 ई. में उसने दिल्ली में ‘दीनपनाह’ नामक एक नए भवन का निर्माण करवाया।
संघर्ष और निर्वासन:
चौसा का युद्ध (1539): इस युद्ध में वह शेर खाँ से पराजित हुआ।
बिलग्राम/कन्नौज का युद्ध (1540): इस युद्ध में भी हारने के बाद हुमायूँ को भारत से निर्वासित होना पड़ा, और उसने लगभग 15 वर्ष तक घुमक्कड़ जीवन बिताया।
पुनः शासन: 1555 ई. में सरहिन्द के युद्ध में सूरी शासक सिकंदर शाह को हराकर उसने पुनः दिल्ली की गद्दी पर अधिकार कर लिया।
मृत्यु: 1 जनवरी, 1556 ई. को ‘दीनपनाह’ भवन में स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।
मकबरा: दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा उसकी पत्नी हाजी बेगम ने बनवाया था, जिसके वास्तुकार मिर्जा गियास थे।
👑 अकबर (1556-1605 ई.)
जन्म: अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 ई. को अमरकोट में राणा वीरसाल के महल में हुआ था।
राज्याभिषेक: 14 फरवरी, 1556 ई. को, बैरम खाँ ने कालानौर (पंजाब) में अकबर का राज्याभिषेक किया, जो 1560 ई. तक उसका संरक्षक रहा।
पानीपत का द्वितीय युद्ध (1556): 5 नवम्बर, 1556 ई. को अकबर और हेमू के बीच यह युद्ध हुआ, जिसमें अकबर की विजय हुई।
पेटीकोट शासन: 1560 से 1562 ई. तक के शासन को ‘पेटीकोट शासन’ कहा जाता है क्योंकि इस दौरान उसकी धाय माँ माहम अनगा का अत्यधिक प्रभाव था।
हल्दीघाटी का युद्ध (1576): यह प्रसिद्ध युद्ध 18 जून, 1576 ई. को मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुआ।
वर्ष
कार्य
1562 ई.
दास प्रथा का अंत, ‘हरम-दल’ से मुक्ति
1563 ई.
तीर्थयात्रा कर समाप्त
1564 ई.
जजिया कर समाप्त
1571 ई.
फतेहपुर सीकरी की स्थापना एवं राजधानी का आगरा से फतेहपुर स्थानांतरण
1575 ई.
इबादत खाने की स्थापना
1579 ई.
महजर की घोषणा
1582 ई.
दीन-ए-इलाही की घोषणा
राजस्व व्यवस्था:
अकबर के दीवान राजा टोडरमल ने 1580 ई. में दहसाला बन्दोबस्त व्यवस्था लागू की।
स्थापत्य कला:
अकबर ने आगरा का लालकिला, फतेहपुर सीकरी में शाहीमहल, दीवान-ए-खास, पंचमहल, बुलंद दरवाजा और जोधाबाई का महल जैसी कई महत्वपूर्ण इमारतों का निर्माण करवाया।
नवरत्न
परिचय/पद
1. मुल्ला दो प्याजा
सलाहकार
2. राजा मानसिंह
सेनापति
3. हकीम हुमाम
शाही रसोईघर के प्रमुख
4. राजा टोडरमल
वित्त मंत्री
5. अब्दुर रहीम खान-ए-खाना
कवि
6. फैजी
कवि
7. अबुल फजल
विद्वान/इतिहासकार
8. बीरबल
सलाहकार/सेनापति
9. तानसेन
संगीतकार
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:
संगीत सम्राट तानसेन का जन्म ग्वालियर में हुआ था। अकबर ने उन्हें कण्ठाभरण वाणी विलास की उपाधि दी थी।
मुगलों की राजकीय भाषा फारसी थी।
अकबर ने एक ‘अनुवाद विभाग’ की स्थापना की थी। ‘महाभारत’ का फारसी अनुवाद ‘रज्मनामा’ (युद्धों की पुस्तक) नाम से किया गया।
1602 ई. में, सलीम (जहाँगीर) के निर्देश पर अबुल-फजल की हत्या वीरसिंह बुन्देला ने कर दी थी।
मृत्यु: 16 अक्टूबर, 1605 ई. को अकबर की मृत्यु अतिसार रोग से हुई और उसे आगरा के निकट सिकन्दरा में दफनाया गया।
👑 जहाँगीर (1605-27 ई.)
न्याय की जंजीर: जहाँगीर को उसकी न्याय की जंजीर के लिए याद किया जाता है, जो सोने की बनी थी और आगरा के किले से लेकर यमुना तट तक लगी थी।
खुसरो का विद्रोह: उसके सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने 1606 ई. में विद्रोह कर दिया। खुसरो की सहायता करने के कारण जहाँगीर ने सिखों के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव को फाँसी दिलवा दी।
चित्रकला का स्वर्णकाल: जहाँगीर के काल को चित्रकला का स्वर्णकाल कहा जाता है। उस्ताद मंसूर और अबुल हसन उसके दरबार के प्रसिद्ध चित्रकार थे।
मकबरा: जहाँगीर का मकबरा लाहौर के शाहदरा में स्थित है, जिसे नूरजहाँ ने बनवाया था।
यूरोपीय यात्री: इसके दरबार में कैप्टन हॉकिन्स, सर टॉमस रो, विलियम फिंच और एडवर्ड टैरी जैसे यूरोपीय यात्री आए थे।
👑 शाहजहाँ (1627-58 ई.)
विवाह: शाहजहाँ का विवाह आसफ खाँ की पुत्री अर्जुमन्द बानो बेगम (मुमताज महल) से हुआ था।
स्थापत्य कला का स्वर्णयुग: शाहजहाँ के शासनकाल को स्थापत्यकला का स्वर्णयुग कहा जाता है।
प्रमुख निर्माण: दिल्ली का लालकिला, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, दिल्ली की जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद और ताजमहल उसकी प्रमुख कृतियाँ हैं।
ताजमहल का मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी था।
उत्तराधिकार का युद्ध:
शाहजहाँ के पुत्रों में दाराशिकोह सबसे विद्वान था। उसने ‘सर-ए-अकबर’ (महान रहस्य) नाम से उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करवाया।
शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके पुत्रों के बीच उत्तराधिकार का युद्ध शुरू हो गया।
अंतिम समय: औरंगजेब ने सितम्बर 1658 ई. में शाहजहाँ को बंदी बना लिया और 31 जनवरी, 1666 ई. को 74 वर्ष की आयु में बंदी अवस्था में ही उसकी मृत्यु हो गई।
👑 औरंगजेब आलमगीर (1658-1707 ई.)
शासन:
औरंगजेब सुन्नी धर्म को मानता था और उसे ‘जिन्दा पीर’ भी कहा जाता था।
उसने 1679 ई. में ‘जजिया कर’ को पुनः लागू कर दिया।
विद्रोह और नीतियां:
इस्लाम स्वीकार नहीं करने के कारण उसने सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर की हत्या 1675 ई. में दिल्ली में करवा दी थी।
उसके शासनकाल में मुगल सेना में सर्वाधिक हिन्दू सेनापति थे।
प्रमुख विजय: 1686 ई. में बीजापुर और 1687 में गोलकुण्डा को उसने मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
मृत्यु: 3 मार्च, 1707 ई. को औरंगजेब की मृत्यु अहमदनगर में हुई।
विद्रोह
काल
नेता
जाट विद्रोह
1667-88 ई.
गोकुल, राजाराम, चूरामण
अफगान विद्रोह
1667-72 ई.
भागू, अकमल खाँ
सतनामी विद्रोह
1672 ई.
सतनामी अनुयायी
बुंदेला विद्रोह
1661-1707 ई.
चम्पतराय, छत्रसाल
राजपूतों का विद्रोह
1679-1709 ई.
दुर्गादास राठौर
सिक्ख विद्रोह
1675 से मृत्यु तक
गुरु तेग बहादुर, गुरु गोविन्द सिंह एवं बंदा बहादुर
🏛️ मुगलकालीन प्रशासनिक व्यवस्था (Mughal Administrative System)
मीरबख्शी: यह सैन्य विभाग का प्रमुख होता था। इसके द्वारा ‘सरखत’ नामक पत्र पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही सेना को हर महीने वेतन दिया जाता था।
सद्र-उस-सुदूर: यह सम्राट को धार्मिक मामलों पर सलाह देता था और जब यह न्याय विभाग का प्रमुख होता था, तब उसे काजी कहा जाता था।
वजीर: यह राज्य का प्रधानमंत्री होता था। बाबर के शासनकाल में यह पद बहुत महत्वपूर्ण था।
मनसबदारी प्रथा: मुगलकालीन सैन्य व्यवस्था का आधार मनसबदारी प्रथा थी, जिसे सम्राट अकबर ने शुरू किया था।
यह व्यवस्था मंगोल नेता चंगेज खाँ की दशमलव प्रणाली पर आधारित थी।
10 से 500 तक मनसब प्राप्त करने वाले मनसबदार, 500 से 2500 तक मनसब प्राप्त करने वाले अमीर, और 2500 से ऊपर मनसब प्राप्त करने वाले अमीर-ए-आजम कहलाते थे।
परगने का शासन: परगने में शांति व्यवस्था की जिम्मेदारी शिकदार की होती थी, जबकि आमिल वित्त अधिकारी होता था। कानूनगो पटवारियों का प्रधान होता था।
🌱 मुगलकालीन भू-राजस्व व्यवस्था (Mughal Land Revenue System)
प्रमुख प्रणालियाँ: अकबर ने 1560 ई. में भू-राजस्व के लिए कई नई प्रणालियों को लागू किया, जिनमें टोडरमल की जब्ती प्रणाली, करोड़ी व्यवस्था, दहसाला प्रणाली, बँटाई और नस्क (कनकूत) शामिल थीं।
करोड़ी: 1573 ई. में अकबर द्वारा करोड़ी नामक अधिकारी की नियुक्ति की गई, जिसे अपने क्षेत्र से एक करोड़ दाम वसूल करना होता था।
दहसाला प्रणाली: 1580 ई. में अकबर ने वास्तविक उत्पादन, स्थानीय कीमतों और उत्पादकता के आधार पर ‘दहसाला प्रणाली’ को प्रचलित किया।
भूमि के प्रकार:
खालसा भूमि: यह भूमि सीधे बादशाह के नियंत्रण में होती थी।
जागीर भूमि: यह भूमि तनख्वाह के बदले में दी जाती थी।
सयूरगल/मदद-ए-माश: यह अनुदान में दी गई लगानहीन भूमि थी।
🌍 उत्पादकता के आधार पर भूमि का वर्गीकरण
भूमि का प्रकार
विशेषता
पोलज भूमि
यह सबसे उपजाऊ भूमि थी जिसमें हर साल खेती होती थी।
परती भूमि
इस भूमि पर एक फसल के बाद उसे खाली छोड़ दिया जाता था।
चाचर भूमि
इस भूमि पर 3-4 साल के अंतराल पर खेती होती थी।
बंजर भूमि
यह भूमि कृषि योग्य नहीं थी या बहुत कम उपजाऊ थी।
🌾 मुगल काल में कृषक (Peasants in the Mughal Era)
कृषक का प्रकार
विशेषता
1. खुदकाश्त
ये किसान उसी गाँव की भूमि पर खेती करते थे, जहाँ वे रहते थे।
2. पाही काश्त
ये किसान दूसरे गाँव में जाकर कृषि कार्य करते थे।
3. मुजारियन
ये किसान खुदकाश्त कृषकों से भूमि किराए पर लेकर कृषि कार्य करते थे।
🪙 मुगलकालीन सिक्के (Mughal Coinage)
शाही टकसाल: अकबर ने दिल्ली में एक शाही टकसाल का निर्माण करवाया, जिसका प्रमुख अब्दुस्समद को नियुक्त किया गया।
सिक्कों पर आकृतियाँ: अकबर ने असीरगढ़ विजय की स्मृति में अपने सिक्कों पर बाज की आकृति अंकित करवाई थी, जबकि जहाँगीर ने अपने सिक्कों पर अपनी और नूरजहाँ की आकृति बनवाई थी।
कलमा पर प्रतिबंध: औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा खुदवाना बंद करवा दिया था।
आना सिक्का: आना सिक्के का प्रचलन शाहजहाँ ने शुरू किया।
चाँदी का रुपया: मुगलकालीन अर्थव्यवस्था का आधार चाँदी का रुपया था।
दाम: दैनिक लेन-देन में दाम का प्रयोग होता था, जहाँ 40 दाम का एक रुपया होता था।
📚 मुगलकालीन साहित्य (Mughal Literature)
बाबर: बाबर ने मुबाइयान नामक एक नई काव्यशैली की शुरुआत की।
हुमायूँनामा: गुलबदन बेगम (हुमायूँ की बहन) द्वारा रचित इस ग्रंथ का एक हिस्सा बाबर के इतिहास पर और दूसरा हिस्सा हुमायूँ के जीवन पर केंद्रित है।
रामचरितमानस: रामभक्ति शाखा के प्रसिद्ध कवि तुलसीदास ने अकबर के शासनकाल में 1574 ई. में ‘रामचरितमानस’ की रचना आरंभ की।
मासिर-ए-आलमगीरी: औरंगजेब के समय मुहम्मद साकी द्वारा लिखी गई इस कृति को ‘मुगल राज्य का गजेटियर’ कहा जाता है।
🕌 मुगलकालीन वास्तुकला (Mughal Architecture)
फतेहपुर सीकरी: आगरा में स्थित फतेहपुर सीकरी का निर्माण सम्राट अकबर ने करवाया था। यहीं पर पंचमहल, सलीम चिश्ती का मकबरा और मरियम-उज-जमानी महल स्थित हैं।
इबादत खाना: अकबर की धार्मिक रुचि के परिणामस्वरूप, फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना (आराधना गृह) की स्थापना हुई, जिसे 1578 ई. में धर्म-संसद में बदल दिया गया।
⚔️ मराठा शक्ति का अभ्युदय (Rise of the Maratha Power)
शिवाजी (1627-80 ई.)
जन्म: मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी का जन्म 20 अप्रैल, 1627 ई. को शिवनेर के दुर्ग में हुआ था।
माता-पिता: उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले और माता का नाम जीजाबाई था।
गुरु: शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु समर्थ रामदास थे, जबकि उनके संरक्षक और शिक्षक दादाजी कोंडदेव थे।
राजधानी: 1656 ई. में शिवाजी ने रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया।
राज्याभिषेक: 5 जून, 1674 ई. को शिवाजी ने रायगढ़ में काशी के प्रसिद्ध विद्वान श्री गंगाभट्ट द्वारा अपना राज्याभिषेक करवाया और ‘छत्रपति’, ‘हैंदव धर्मोद्धारक’ तथा ‘गौब्राह्मण प्रतिपालक’ की उपाधि धारण की।
मृत्यु: 53 वर्ष की आयु में 14 अप्रैल, 1680 ई. को शिवाजी की मृत्यु हो गई।
कर प्रणाली:
चौथ: यह कर शिवाजी द्वारा पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण न करने के बदले में वसूला जाता था।
सरदेशमुखी: शिवाजी यह कर इसलिए वसूल करते थे क्योंकि वे महाराष्ट्र के पुश्तैनी सरदेशमुख थे।
राजस्व दर: शिवाजी के समय कुल उपज का 33% भाग राजस्व के रूप में वसूला जाता था।
सैन्य व्यवस्था: शिवाजी की सेना तीन प्रमुख भागों में विभाजित थी:
पागा सेना (नियमित घुड़सवार सैनिक)
सिलहदार (अस्थायी घुड़सवार सैनिक)
पैदल सेना
संधि
वर्ष
संधि संबंधित पक्ष
सूरत की संधि
1775 ई.
रघुनाथ राव तथा ईस्ट इंडिया कंपनी
पुरंदर की संधि
1776 ई.
पेशवा माधवराव नारायण राव तथा ईस्ट इंडिया कंपनी
बड़गांव की संधि
1779 ई.
पेशवा माधवराव नारायण राव तथा ईस्ट इंडिया कंपनी
सालबाई की संधि
1782 ई.
बाजीराव द्वितीय तथा ईस्ट इंडिया कंपनी
बेसीन की संधि
1802 ई.
पेशवा माधवराव नारायण राव तथा ईस्ट इंडिया कंपनी
शिवाजी के अष्टप्रधान
शिवाजी के मंत्रिमंडल को ‘अष्टप्रधान’ कहा जाता था, जिसमें निम्नलिखित आठ मंत्री होते थे:
पद (Position)
कार्य (Function)
पेशवा (प्रधानमंत्री)
राज्य के प्रशासन और अर्थव्यवस्था की देखरेख करने वाला मुख्य अधिकारी।
सर-ए-नौबत (सेनापति)
सैन्य विभाग का प्रमुख।
अमात्य (राजस्व मंत्री)
आय-व्यय का लेखा-जोखा रखने वाला।
वाकयानवीस (सूचना मंत्री)
गुप्तचर और संधि-विग्रह के विभागों का अध्यक्ष।
चिटनिस
राजकीय पत्रों की भाषा-शैली को देखना।
सुमन्त (विदेश मंत्री)
विदेशी मामलों का प्रभारी।
पंडित राव
धार्मिक कार्यों से संबंधित।
न्यायाधीश
न्याय विभाग का प्रमुख।
मराठा पेशवा (Maratha Peshwas)
बालाजी विश्वनाथ (1713-20 ई.): इन्हें 1713 ई. में शाहू ने पेशवा बनाया। इन्होंने पेशवा पद को वंशानुगत बना दिया, जिससे राजा की शक्ति कम हो गई।
बाजीराव प्रथम (1720-40 ई.): दिल्ली पर आक्रमण करने वाला यह पहला पेशवा था, जिसने 29 मार्च, 1737 ई. को दिल्ली पर धावा बोला।
बाला जी बाजीराव (1740–61): इन्हें नाना साहब के नाम से भी जाना जाता था।
पेशवा बाजीराव-II: कोरेगाँव और अष्टी के युद्धों में हारने के बाद, इसने 1818 ई. में अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।
🙏 महाराष्ट्र के प्रमुख संत (Prominent Saints of Maharashtra)
ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर (1271–96 ई.): इन्होंने भगवद्गीता पर ‘भावार्थ दीपिका’ नामक एक विस्तृत टीका लिखी।
नामदेव (1270–1350 ई.): इनके आराध्य देव पंडरपुर के विठोबा (विष्णु) थे। विठोबा की उपासना वरकरी संप्रदाय के नाम से जानी जाती है, जिसकी स्थापना नामदेव ने की थी।
एकनाथ (1533-99 ई.): इन्होंने रामायण पर ‘भावार्थ रामायण’ नामक टीका लिखी।
तुकाराम (1608-81 ई.): इन्होंने भक्तिपूर्ण कविताएँ लिखीं, जिन्हें ‘अभंग’ कहा जाता है।
रामदास (1608-81 ई.): शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने अपनी कृति “दासबोध” में मराठी राष्ट्रवाद को प्रेरित किया।