1. संक्षेपण (Précis Writing)
अर्थ और परिभाषा:
‘संक्षेपण’ शब्द का मूल है ‘संक्षेप’, जिसका अर्थ है ‘छोटा करना’ या ‘संक्षिप्त करना’।
परिभाषा: किसी विस्तृत गद्यांश, लेख या विवरण के मूल भावों और अनिवार्य तथ्यों को, बिना कोई भी महत्वपूर्ण जानकारी छोड़े, संक्षिप्त, सुगठित और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने की कला को संक्षेपण कहते हैं।
यह “गागर में सागर भरने” की कला है। इसका उद्देश्य मूल अवतरण का लगभग एक-तिहाई (1/3) भाग में सार प्रस्तुत करना होता है।
एक अच्छे संक्षेपण के नियम और विधि
संक्षेपण करने की प्रक्रिया को इन चरणों में बाँटा जा सकता है:
चरण 1: ध्यानपूर्वक पढ़ना (Careful Reading)
- दिए गए गद्यांश को कम से कम दो-तीन बार बहुत ध्यान से पढ़ें ताकि उसका केंद्रीय भाव (Central Idea) और मूल संदेश अच्छी तरह समझ में आ जाए।
चरण 2: महत्वपूर्ण अंशों को रेखांकित करना (Underlining Key Points)
- पढ़ते समय उन वाक्यों, वाक्यांशों और शब्दों को रेखांकित करें जो मूल भाव को व्यक्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
- उदाहरण, अलंकारिक भाषा, मुहावरे, उद्धरण और बार-बार दोहराई गई बातों को छोड़ दें।
चरण 3: रूपरेखा तैयार करना (Creating an Outline)
- रेखांकित किए गए मुख्य बिंदुओं के आधार पर एक संक्षिप्त रूपरेखा तैयार करें। यह सुनिश्चित करें कि कोई भी महत्वपूर्ण विचार छूट न जाए।
चरण 4: प्रथम प्रारूप लिखना (Writing the First Draft)
- अब रूपरेखा के आधार पर, अपनी भाषा में, एक brouillon (rough draft) लिखें। यह सबसे महत्वपूर्ण नियम है कि संक्षेपण अपनी भाषा में लिखा जाना चाहिए, न कि मूल गद्यांश से वाक्यों को ज्यों का त्यों उतारकर।
- लिखते समय वाक्य छोटे, सरल और सुगठित हों।
चरण 5: शीर्षक का चुनाव (Choosing a Title)
- संक्षेपण का एक उपयुक्त, संक्षिप्त और सार्थक शीर्षक अवश्य दें। शीर्षक केंद्रीय भाव पर आधारित होना चाहिए।
चरण 6: अंतिम रूप और संशोधन (Finalizing and Revision)
- अपने brouillon को फिर से पढ़ें। देखें कि क्या इसमें मूल गद्यांश का पूरा सार आ गया है।
- अनावश्यक शब्दों को हटाएँ और व्याकरण तथा वर्तनी की जाँच करें।
- शब्दों की संख्या गिनकर सुनिश्चित करें कि यह मूल गद्यांश का लगभग एक-तिहाई हो।
संक्षेपण का उदाहरण:
- मूल गद्यांश (लगभग 90 शब्द):
मनुष्य के जीवन में परिश्रम का बहुत अधिक महत्व है। बिना परिश्रम के कोई भी व्यक्ति सफलता की सीढ़ियों पर नहीं चढ़ सकता। जो विद्यार्थी परिश्रम करता है, वह परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करता है। जो किसान परिश्रम करता है, उसकी फसल अच्छी होती है। परिश्रमी व्यक्ति ही अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर पाता है और समाज में सम्मान पाता है। इतिहास गवाह है कि महान कहे जाने वाले सभी व्यक्तियों ने कठोर परिश्रम के बल पर ही महानता प्राप्त की। अतः परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। - संक्षेपण:
- शीर्षक: परिश्रम का महत्व (या) सफलता की कुंजी: परिश्रम
- संक्षिप्त रूप (लगभग 30 शब्द):
परिश्रम ही जीवन में सफलता का मूल आधार है। विद्यार्थी, किसान से लेकर महान व्यक्तियों तक, सभी परिश्रम के बल पर ही अपने लक्ष्य प्राप्त करते हैं और सम्मान पाते हैं। वस्तुतः परिश्रम ही सफलता की एकमात्र कुंजी है।
2. पल्लवन (Elaboration / Expansion)
अर्थ और परिभाषा:
‘पल्लवन’ शब्द ‘पल्लव’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘पत्ता’ या ‘कोंपल’। जिस प्रकार एक छोटे से बीज से पत्ते और शाखाएँ निकलकर वृक्ष का विस्तार होता है, उसी प्रकार पल्लवन का अर्थ है ‘विस्तार करना’ या ‘बढ़ाना’।
परिभाषा: किसी सूत्र वाक्य, सूक्ति, कहावत, लोकोक्ति या किसी विचार को सरल भाषा में, उदाहरणों और तर्कों के साथ विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करने की कला को पल्लवन कहते हैं।
यह संक्षेपण के ठीक विपरीत, “गागर से सागर बनाने” की कला है।
एक अच्छे पल्लवन के नियम और विधि
चरण 1: मूल भाव को समझना (Understanding the Core Idea)
- दिए गए सूत्र-वाक्य (जैसे – “अहिंसा परमो धर्मः”) को ध्यान से पढ़ें और उसके शाब्दिक तथा गहरे अर्थ को अच्छी तरह समझें।
चरण 2: विचार-विस्तार और रूपरेखा (Brainstorming and Outline)
- मूल विचार से संबंधित सभी संभावित पहलुओं पर मंथन करें।
- उससे जुड़े उदाहरण (ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक), तर्क, तथ्य, और कहानियों के बारे में सोचें और एक रूपरेखा बना लें।
चरण 3: लेखन प्रारंभ करना (Starting the Elaboration)
- पल्लवन की शुरुआत में मूल भाव को सरल शब्दों में स्पष्ट करें।
- इसे अलग-अलग अनुच्छेदों में लिखें। प्रत्येक अनुच्छेद में एक मुख्य बिंदु को तर्क और उदाहरणों के साथ समझाएँ।
- इसमें आप विषय के पक्ष और विपक्ष पर भी संतुलित चर्चा कर सकते हैं।
- भाषा सरल, स्पष्ट और प्रवाहमयी होनी चाहिए।
चरण 4: निष्कर्ष (Conclusion)
- अंत में, सभी विचारों का सार प्रस्तुत करते हुए एक संक्षिप्त निष्कर्ष लिखें।
नोट: पल्लवन में लेखक को अपनी तरफ से कोई ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए जो मूल भाव के विरुद्ध हो।
पल्लवन का उदाहरण:
- सूत्र-वाक्य: करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
- पल्लवन (संक्षिप्त रूप में):
प्रस्तुत सूक्ति का अर्थ है कि निरंतर अभ्यास करने से मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान और कुशल बन सकता है। कोई भी व्यक्ति जन्म से विद्वान नहीं होता। सफलता का रहस्य प्रतिभा में नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास और अभ्यास में छिपा है।
जिस प्रकार कुएँ की जगत पर बार-बार रस्सी के आने-जाने से कोमल रस्सी भी कठोर पत्थर पर निशान बना देती है, उसी प्रकार मंदबुद्धि व्यक्ति भी लगातार अभ्यास से ज्ञान प्राप्त कर सकता है। एक छोटा बच्चा बार-बार गिरकर ही चलना सीखता है। संगीतकार घंटों रियाज़ करके संगीत में निपुण होता है और एक खिलाड़ी अथक अभ्यास से ही अपने खेल में महारत हासिल करता है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहाँ साधारण व्यक्तियों ने अपने निरंतर अभ्यास और लगन से महान कार्य कर दिखाए।
अतः यह सिद्ध है कि सफलता के लिए अभ्यास एक अनिवार्य शर्त है। लगन और धैर्य के साथ किया गया निरंतर अभ्यास असंभव को भी संभव बना सकता है।
संक्षेपण और पल्लवन में अंतर
| आधार | संक्षेपण (Précis) | पल्लवन (Elaboration) |
| अर्थ | संक्षिप्त करना, छोटा करना | विस्तार करना, बढ़ाना |
| उद्देश्य | विस्तृत लेख का सार प्रस्तुत करना | एक संक्षिप्त विचार का भाव स्पष्ट करना |
| प्रक्रिया | अनावश्यक अंशों को हटाना | नए विचारों और उदाहरणों को जोड़ना |
| शब्द-संख्या | मूल से कम (लगभग 1/3) | मूल से बहुत अधिक |
| कला | “गागर में सागर भरना” | “गागर से सागर बनाना” |
हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल-विभाजन
हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत समृद्ध और विशाल है। अध्ययन की सुविधा के लिए साहित्य के इतिहासकारों ने इसे विशिष्ट प्रवृत्तियों और रचना-शैलियों के आधार पर विभिन्न कालों में विभाजित किया है। हालाँकि विभिन्न विद्वानों के मतों में थोड़ा-बहुत अंतर है, किन्तु आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा किया गया काल-विभाजन सर्वाधिक प्रामाणिक और मान्य माना जाता है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार हिन्दी साहित्य का काल-विभाजन इस प्रकार है:
| काल का नाम | अन्य प्रचलित नाम | समयावधि (लगभग) |
| 1. आदिकाल | वीरगाथा काल | संवत् 1050 – 1375 (सन् 993 ई. – 1318 ई.) |
| 2. भक्तिकाल | पूर्व मध्यकाल | संवत् 1375 – 1700 (सन् 1318 ई. – 1643 ई.) |
| 3. रीतिकाल | उत्तर मध्यकाल | संवत् 1700 – 1900 (सन् 1643 ई. – 1843 ई.) |
| 4. आधुनिक काल | गद्य काल | संवत् 1900 – अब तक (सन् 1843 ई. – अब तक) |
आइए, अब प्रत्येक काल की प्रमुख प्रवृत्तियों और रचनाकारों को विस्तार से समझते हैं।
1. आदिकाल (वीरगाथा काल) (सन् 993 ई. – 1318 ई.)
यह हिन्दी साहित्य का आरंभिक काल था। इस काल का साहित्य मुख्यतः वीरता, शौर्य और युद्धों के वर्णन से भरा हुआ है।
- प्रमुख प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ):
- वीर रस की प्रधानता: आश्रयदाता राजाओं की वीरता और युद्धों का सजीव और अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन।
- ऐतिहासिकता का अभाव: घटनाओं में कल्पना का मिश्रण बहुत अधिक था।
- श्रृंगार रस का प्रयोग: वीरता के साथ-साथ श्रृंगार रस का भी सुंदर चित्रण मिलता है।
- डिंगल और पिंगल भाषा का प्रयोग: राजस्थानी मिश्रित अपभ्रंश (डिंगल) और ब्रजभाषा मिश्रित अपभ्रंश (पिंगल) का प्रयोग हुआ।
- रासो ग्रंथों की रचना: ‘रासो’ नामक वीरगाथात्मक काव्यों की रचना हुई।
- इस काल में सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य की भी रचना हुई।
- प्रमुख कवि और रचनाएँ:
- चंदबरदाई – पृथ्वीराज रासो (हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है)।
- दलपति विजय – खुमान रासो
- नरपति नाल्ह – बीसलदेव रासो
- जगनिक – परमाल रासो (आल्हा-खंड इसी का एक भाग है)।
- अमीर खुसरो – पहेलियाँ, मुकरियाँ, खड़ी बोली के आदि कवि।
2. भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल) (सन् 1318 ई. – 1643 ई.)
यह हिन्दी साहित्य का “स्वर्ण युग” (Golden Age) कहलाता है। इस काल में भक्ति भावना की प्रबल धारा प्रवाहित हुई, जिसने समाज, धर्म और साहित्य पर गहरा प्रभाव डाला।
भक्तिकाल को मुख्यतः दो धाराओं और फिर उनकी उपधाराओं में बाँटा गया है:
(क) निर्गुण भक्ति धारा (ईश्वर के निराकार रूप की उपासना)
- ज्ञानमार्गी शाखा (संत काव्य): ज्ञान के द्वारा ईश्वर को पाने पर बल।
- कबीरदास: (प्रमुख कवि) बीजक (साखी, सबद, रमैनी)।
- रैदास, गुरु नानक, दादूदयाल
- प्रेममार्गी शाखा (सूफी काव्य): प्रेम (इश्क) को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानना।
- मलिक मुहम्मद जायसी: (प्रमुख कवि) पद्मावत, अखरावट।
- कुतुबन, मंझन
(ख) सगुण भक्ति धारा (ईश्वर के साकार रूप की उपासना)
- रामभक्ति शाखा: भगवान राम को आराध्य मानकर भक्ति काव्य की रचना।
- तुलसीदास: (प्रमुख कवि) रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली।
- नाभादास, अग्रदास
- कृष्णभक्ति शाखा: भगवान कृष्ण के बाल-रूप और प्रेम-लीलाओं का वर्णन।
- सूरदास: (प्रमुख कवि) सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य-लहरी।
- मीराबाई, रसखान, नंददास
3. रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल) (सन् 1643 ई. – 1843 ई.)
इस काल में भक्ति की धारा मंद पड़ गई और साहित्य राजदरबारों की शोभा बन गया। ‘रीति’ का अर्थ है – ‘बँधी-बँधाई परिपाटी’। इस काल के कवियों ने संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ग्रंथों (अलंकार, रस, नायिका-भेद) के आधार पर लक्षण-ग्रंथों की रचना की।
- प्रमुख प्रवृत्तियाँ:
- रीति-ग्रंथों का निर्माण: काव्य के अंगों (रस, अलंकार, छंद, नायिका-भेद) पर लक्षण-ग्रंथों की रचना।
- श्रृंगार रस की प्रधानता: नायिका के नख-शिख वर्णन और श्रृंगारिक चित्रण की बहुलता।
- आश्रयदाताओं की प्रशंसा: कवियों द्वारा अपने राजा-महाराजाओं की प्रशंसा में काव्य रचना।
- प्रकृति का उद्दीपन रूप में चित्रण।
- ब्रजभाषा की प्रधानता।
- प्रमुख कवि:
- चिंतामणि, केशवदास (कठिन काव्य के प्रेत) – रामचंद्रिका।
- बिहारी – बिहारी सतसई (गागर में सागर भरने वाली एकमात्र रचना)।
- भूषण – (रीतिकाल के वीर रस के एकमात्र कवि)।
- मतिराम, देव, पद्माकर, घनानंद (रीतिमुक्त कवि)।
4. आधुनिक काल (गद्य काल) (सन् 1843 ई. – अब तक)
इस काल में पहली बार गद्य (Prose) की विधाओं (कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध) का व्यापक विकास हुआ, इसलिए आचार्य शुक्ल ने इसे ‘गद्य काल’ भी कहा है।
आधुनिक काल को अध्ययन की सुविधा के लिए कई उप-युगों में बाँटा गया है:
- भारतेन्दु युग (1850-1900): खड़ी बोली गद्य का विकास, नवजागरण और समाज-सुधार का स्वर।
- प्रमुख लेखक: भारतेन्दु हरिश्चंद्र।
- द्विवेदी युग (1900-1918): ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादन द्वारा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा का परिष्कार और मानकीकरण किया। खड़ी बोली पद्य की भाषा बनी।
- प्रमुख कवि: मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’।
- छायावाद युग (1918-1936): काव्य में प्रेम, प्रकृति और वैयक्तिक अनुभूतियों का सूक्ष्म, काल्पनिक और लाक्षणिक चित्रण।
- प्रमुख कवि (छायावाद के चार स्तंभ): जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा।
- प्रगतिवाद युग (1936-1943): मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित, शोषण और सामाजिक विषमता के विरुद्ध काव्य रचना।
- प्रमुख कवि: नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, रामधारी सिंह ‘दिनकर’।
- प्रयोगवाद युग (1943-1951): ‘तार सप्तक’ के प्रकाशन से शुरुआत। काव्य में नए-नए प्रयोग, प्रतीक और बिंबों पर बल।
- प्रमुख कवि: अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन), मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर।
- नई कविता (1951 से आगे): लघु मानव की पीड़ा, कुंठा और महानगरीय जीवन की विसंगतियों का चित्रण।
- साठोत्तरी कविता/समकालीन कविता (1960 से अब तक): मोहभंग, आक्रोश और व्यवस्था के विरुद्ध स्वर।
व्याकरणिक पद एवं उनके भेद
पद क्या है?
‘शब्द’ और ‘पद’ में एक सूक्ष्म अंतर है।
- शब्द: वर्णों का सार्थक समूह शब्द कहलाता है। जब तक शब्द स्वतंत्र रहता है और वाक्य में प्रयोग नहीं होता, वह केवल ‘शब्द’ होता है। जैसे: कमल, लड़का, सुंदर, खेलना।
- पद: जब कोई सार्थक शब्द व्याकरण के नियमों (जैसे- लिंग, वचन, कारक, काल) में बंधकर किसी वाक्य में प्रयोग हो जाता है, तब वह ‘शब्द’ न कहलाकर ‘पद’ बन जाता है।
- उदाहरण: “कमल तालाब में खिलता है।” इस वाक्य में ‘कमल’ एक पद है। यहाँ वह कर्ता का कार्य कर रहा है।
परिभाषा:
वाक्य में प्रयुक्त शब्द ही पद कहलाते हैं। व्याकरण की दृष्टि से इन्हीं पदों का वर्गीकरण और अध्ययन किया जाता है।
व्याकरणिक पदों के भेद (प्रकार)
प्रयोग और रूप-परिवर्तन (विकार) के आधार पर व्याकरणिक पदों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है:
- विकारी पद (Declinable/Inflected Words)
- अविकारी पद (Indeclinable/Uninflected Words) या अव्यय
1. विकारी पद (Declinable Words)
परिभाषा:
वे पद (शब्द) जिनका रूप लिंग (gender), वचन (number), कारक (case) और काल (tense) के कारण बदल जाता है (या उनमें विकार आ जाता है), विकारी पद कहलाते हैं।
विकारी पदों के चार भेद होते हैं:
(क) संज्ञा (Noun)
किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, जाति या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं।
- विकार का उदाहरण:
- लिंग के कारण: लड़का पढ़ता है। → लड़की पढ़ती है।
- वचन के कारण: लड़का पढ़ता है। → लड़के पढ़ते हैं।
- कारक के कारण: लड़का पढ़ता है। → लड़के ने पढ़ा।
(ख) सर्वनाम (Pronoun)
संज्ञा के स्थान पर प्रयोग होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं। (जैसे – मैं, तुम, वह, कोई)।
- विकार का उदाहरण:
- वचन के कारण: मैं जाता हूँ। → हम जाते हैं।
- कारक के कारण: वह खेलता है। → उसने खेला, उसको बुलाओ।
(ग) विशेषण (Adjective)
संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (गुण, दोष, संख्या) बताने वाले शब्दों को विशेषण कहते हैं। (जैसे – अच्छा, काला, चार, थोड़ा)।
- विकार का उदाहरण:
- लिंग के कारण: अच्छा लड़का। → अच्छी लड़की।
- वचन के कारण: अच्छा लड़का। → अच्छे लड़के।
(घ) क्रिया (Verb)
जिस पद से किसी काम के करने या होने का बोध हो, उसे क्रिया कहते हैं। (जैसे – पढ़ना, खेलना, सोना)।
- विकार का उदाहरण:
- लिंग के कारण: लड़का पढ़ता है। → लड़की पढ़ती है।
- काल के कारण: वह पढ़ता है। → उसने पढ़ा। → वह पढ़ेगा।
- वचन के कारण: वह खेलता है। → वे खेलते हैं।
2. अविकारी पद / अव्यय (Indeclinable Words)
परिभाषा:
वे पद (शब्द) जिनका रूप लिंग, वचन, कारक या काल के कारण कभी नहीं बदलता, वे अविकारी पद या अव्यय कहलाते हैं। ‘अव्यय’ का अर्थ ही है- ‘जिसका कुछ भी व्यय (खर्च/बदलाव) न हो’। ये हमेशा एक ही रूप में बने रहते हैं।
अविकारी पदों (अव्यय) के भी चार मुख्य भेद होते हैं:
(क) क्रिया-विशेषण (Adverb)
जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, उन्हें क्रिया-विशेषण कहते हैं।
- उदाहरण: वह धीरे-धीरे चलता है। (चलने की विशेषता – धीरे-धीरे)।
- अविकारी रूप:
- लड़का धीरे-धीरे चलता है।
- लड़की धीरे-धीरे चलती है।
- लड़के धीरे-धीरे चलते हैं।
(आप देख सकते हैं कि लिंग और वचन बदलने पर भी ‘धीरे-धीरे’ नहीं बदला)।
(ख) संबंधबोधक (Preposition/Postposition)
जो अव्यय संज्ञा या सर्वनाम के बाद आकर उनका संबंध वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ जोड़ते हैं, उन्हें संबंधबोधक कहते हैं।
- उदाहरण: घर के सामने पेड़ है। वह डर के मारे काँप गया।
- अविकारी रूप: राम के बिना श्याम नहीं जाएगा। सीता के बिना गीता नहीं जाएगी। (‘के बिना’ नहीं बदला)।
(ग) समुच्चयबोधक (Conjunction)
जो अव्यय दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने का काम करते हैं, उन्हें समुच्चयबोधक कहते हैं।
- उदाहरण: राम और श्याम भाई हैं। मेहनत करो इसलिए सफल होगे।
- अविकारी रूप: ‘और’, ‘लेकिन’, ‘इसलिए’, ‘या’ कभी नहीं बदलते।
(घ) विस्मयादिबोधक (Interjection)
जिन अव्ययों से हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य जैसे भाव प्रकट होते हैं, उन्हें विस्मयादिबोधक कहते हैं।
- उदाहरण: वाह! कितना सुंदर दृश्य है। अरे! तुम कब आए?
- अविकारी रूप: इनके रूप में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता।
सारांश तालिका (Summary Table)
| पद (Parts of Speech) | प्रकार (Type) | भेद (Sub-type) | उदाहरण (Example) |
| विकारी (बदलने वाले) | 1. संज्ञा (Noun) | राम, पुस्तक, जयपुर, अच्छाई | |
| 2. सर्वनाम (Pronoun) | मैं, तुम, वह, यह, कोई | ||
| 3. विशेषण (Adjective) | अच्छा, मीठा, चार, लंबा | ||
| 4. क्रिया (Verb) | खाना, जाना, हँसना, पढ़ना | ||
| अविकारी (न बदलने वाले) | (अव्यय) | 1. क्रिया-विशेषण (Adverb) | धीरे-धीरे, आज, ऊपर, बहुत |
| 2. संबंधबोधक (Preposition) | के पास, के बिना, से पहले | ||
| 3. समुच्चयबोधक (Conjunction) | और, लेकिन, क्योंकि, या | ||
| 4. विस्मयादिबोधक (Interjection) | अरे!, वाह!, छि!, ओह! |
व्याकरणीय पद एवं उनके भेद
| विषयवस्तु | प्रकार | नाम |
| 1. संज्ञा | 05 | 1. व्यक्तिवाचक 2. जातिवाचक 3. समूहवाचक 4. भाववाचक 5. पदार्थवाचक / द्रव्यवाचक |
| 2. सर्वनाम | 06 | 1. पुरुषवाचक 2. निजवाचक 3. निश्चयवाचक 4. अनिश्चयवाचक 5. संबंधवाचक 6. प्रश्नवाचक |
| 3. विशेषण | 04 | 1. गुणवाचक 2. संख्यावाचक 3. परिमाणवाचक 4. सार्वनामिक विशेषण |
| 4. क्रिया | 02 | 1. सकर्मक क्रिया 2. अकर्मक क्रिया |
| 5. धातु | 02 | 1. मूल धातु 2. यौगिक धातु |
| 6. संयुक्त क्रिया | 11 | 1. आरम्भबोधक 2. समाप्तिबोधक 3. अवकाशबोधक 4. अनुमतिबोधक 5. नित्यताबोधक 6. आवश्यकताबोधक 7. निश्चयबोधक 8. इच्छाबोधक 9. अभ्यासबोधक 10. शक्तिबोधक 11. पुनरुक्त संयुक्त क्रिया |
| 7. वाच्य | 03 | 1. कर्तृवाच्य 2. कर्मवाच्य 3. भाववाच्य |
| 8. वाक्य के प्रकार | ||
| अर्थ के आधार पर | 08 | 1. विधिवाचक 2. निषेधवाचक 3. आज्ञावाचक 4. प्रश्नवाचक 5. विस्मयवाचक 6. संदेहवाचक 7. इच्छावाचक 8. संकेतवाचक |
| रचना के आधार पर | 03 | 1. सरल / साधारण वाक्य 2. मिश्र वाक्य 3. संयुक्त वाक्य |
| 9. संधि | 03 | 1. स्वर संधि 2. व्यंजन संधि 3. विसर्ग संधि |
| स्वर संधि | 05 | 1. दीर्घ स्वर संधि 2. गुण स्वर संधि 3. वृद्धि स्वर संधि 4. यण स्वर संधि 5. अयादि स्वर संधि |
| 10. वर्ण | 02 | (i) स्वर वर्ण (11) (ii) व्यंजन वर्ण (33) • मूल स्वर (04) • संयुक्त व्यंजन (04) • उत्क्षिप्त व्यंजन (02) |
| 11. लिंग | 03 | 1. स्त्रीलिंग 2. पुल्लिंग 3. उभयलिंग |
| 12. समास | 06 | 1. अव्ययीभाव 2. तत्पुरुष 3. कर्मधारय 4. द्विगु 5. द्वन्द्व 6. बहुव्रीहि (प्रयोग के आधार पर 4–(i) अव्ययीभाव (ii) तत्पुरुष (iii) द्वन्द्व (iii) बहुव्रीहि) |
| द्वन्द्व समास के प्रकार | 03 | 1. इतरेतर द्वन्द्व 2. समाहार द्वन्द्व 3. वैकल्पिक द्वन्द्व |
| कर्मधारय के प्रकार | 04 | 1. विशेषण पूर्वपद 2. विशेष्य पूर्वपद 3. विशेषणोभयपद 4. विशेष्योभयपद |
| बहुव्रीहि के प्रकार | 04 | 1. समानाधिकरण 2. व्यधिकरण 3. तुल्ययोग(सह) 4. व्यतिहार |
| 13. वचन | 02 | 1. एकवचन 2. बहुवचन |
| 14. कारक | 08 | 1. कर्ता 2. कर्म 3. करण 4. सम्प्रदान 5. अपादान 6. संबंध 7. अधिकरण 8. सम्बोधन |
| 15. प्रत्यय | 02 | 1. कृत प्रत्यय 2. तद्धित प्रत्यय |
| 16. अलंकार | 03 | 1. शब्दालंकार 2. अर्थालंकार 3. उभयालंकार |
| 17. रस | ||
| अंग / अवयव | 04 | • स्थायीभाव (09) • विभाव (02) • अनुभाव (05) • संचारीभाव (33) |
| प्रकार | 09 | 1. श्रृंगार 2. हास्य 3. वीर 4. करुण 5. भयानक 6. रौद्र 7. वीभत्स 8. अद्भुत 9. शांत |