1. संक्षेपण (Précis Writing)

अर्थ और परिभाषा:
‘संक्षेपण’ शब्द का मूल है ‘संक्षेप’, जिसका अर्थ है ‘छोटा करना’ या ‘संक्षिप्त करना’

परिभाषा: किसी विस्तृत गद्यांश, लेख या विवरण के मूल भावों और अनिवार्य तथ्यों को, बिना कोई भी महत्वपूर्ण जानकारी छोड़े, संक्षिप्त, सुगठित और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने की कला को संक्षेपण कहते हैं।

यह “गागर में सागर भरने” की कला है। इसका उद्देश्य मूल अवतरण का लगभग एक-तिहाई (1/3) भाग में सार प्रस्तुत करना होता है।

एक अच्छे संक्षेपण के नियम और विधि

संक्षेपण करने की प्रक्रिया को इन चरणों में बाँटा जा सकता है:

चरण 1: ध्यानपूर्वक पढ़ना (Careful Reading)

चरण 2: महत्वपूर्ण अंशों को रेखांकित करना (Underlining Key Points)

चरण 3: रूपरेखा तैयार करना (Creating an Outline)

चरण 4: प्रथम प्रारूप लिखना (Writing the First Draft)

चरण 5: शीर्षक का चुनाव (Choosing a Title)

चरण 6: अंतिम रूप और संशोधन (Finalizing and Revision)

संक्षेपण का उदाहरण:


2. पल्लवन (Elaboration / Expansion)

अर्थ और परिभाषा:
‘पल्लवन’ शब्द ‘पल्लव’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘पत्ता’ या ‘कोंपल’। जिस प्रकार एक छोटे से बीज से पत्ते और शाखाएँ निकलकर वृक्ष का विस्तार होता है, उसी प्रकार पल्लवन का अर्थ है ‘विस्तार करना’ या ‘बढ़ाना’

परिभाषा: किसी सूत्र वाक्य, सूक्ति, कहावत, लोकोक्ति या किसी विचार को सरल भाषा में, उदाहरणों और तर्कों के साथ विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करने की कला को पल्लवन कहते हैं।

यह संक्षेपण के ठीक विपरीत, “गागर से सागर बनाने” की कला है।

एक अच्छे पल्लवन के नियम और विधि

चरण 1: मूल भाव को समझना (Understanding the Core Idea)

चरण 2: विचार-विस्तार और रूपरेखा (Brainstorming and Outline)

चरण 3: लेखन प्रारंभ करना (Starting the Elaboration)

चरण 4: निष्कर्ष (Conclusion)

नोट: पल्लवन में लेखक को अपनी तरफ से कोई ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए जो मूल भाव के विरुद्ध हो।

पल्लवन का उदाहरण:


संक्षेपण और पल्लवन में अंतर

आधारसंक्षेपण (Précis)पल्लवन (Elaboration)
अर्थसंक्षिप्त करना, छोटा करनाविस्तार करना, बढ़ाना
उद्देश्यविस्तृत लेख का सार प्रस्तुत करनाएक संक्षिप्त विचार का भाव स्पष्ट करना
प्रक्रियाअनावश्यक अंशों को हटानानए विचारों और उदाहरणों को जोड़ना
शब्द-संख्यामूल से कम (लगभग 1/3)मूल से बहुत अधिक
कला“गागर में सागर भरना”“गागर से सागर बनाना”


हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल-विभाजन

हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत समृद्ध और विशाल है। अध्ययन की सुविधा के लिए साहित्य के इतिहासकारों ने इसे विशिष्ट प्रवृत्तियों और रचना-शैलियों के आधार पर विभिन्न कालों में विभाजित किया है। हालाँकि विभिन्न विद्वानों के मतों में थोड़ा-बहुत अंतर है, किन्तु आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा किया गया काल-विभाजन सर्वाधिक प्रामाणिक और मान्य माना जाता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार हिन्दी साहित्य का काल-विभाजन इस प्रकार है:

काल का नामअन्य प्रचलित नामसमयावधि (लगभग)
1. आदिकालवीरगाथा कालसंवत् 1050 – 1375 (सन् 993 ई. – 1318 ई.)
2. भक्तिकालपूर्व मध्यकालसंवत् 1375 – 1700 (सन् 1318 ई. – 1643 ई.)
3. रीतिकालउत्तर मध्यकालसंवत् 1700 – 1900 (सन् 1643 ई. – 1843 ई.)
4. आधुनिक कालगद्य कालसंवत् 1900 – अब तक (सन् 1843 ई. – अब तक)

आइए, अब प्रत्येक काल की प्रमुख प्रवृत्तियों और रचनाकारों को विस्तार से समझते हैं।

1. आदिकाल (वीरगाथा काल) (सन् 993 ई. – 1318 ई.)

यह हिन्दी साहित्य का आरंभिक काल था। इस काल का साहित्य मुख्यतः वीरता, शौर्य और युद्धों के वर्णन से भरा हुआ है।


2. भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल) (सन् 1318 ई. – 1643 ई.)

यह हिन्दी साहित्य का “स्वर्ण युग” (Golden Age) कहलाता है। इस काल में भक्ति भावना की प्रबल धारा प्रवाहित हुई, जिसने समाज, धर्म और साहित्य पर गहरा प्रभाव डाला।

भक्तिकाल को मुख्यतः दो धाराओं और फिर उनकी उपधाराओं में बाँटा गया है:

(क) निर्गुण भक्ति धारा (ईश्वर के निराकार रूप की उपासना)

  1. ज्ञानमार्गी शाखा (संत काव्य): ज्ञान के द्वारा ईश्वर को पाने पर बल।
    • कबीरदास: (प्रमुख कवि) बीजक (साखी, सबद, रमैनी)।
    • रैदास, गुरु नानक, दादूदयाल
  2. प्रेममार्गी शाखा (सूफी काव्य): प्रेम (इश्क) को ईश्वर प्राप्ति का साधन मानना।
    • मलिक मुहम्मद जायसी: (प्रमुख कवि) पद्मावत, अखरावट
    • कुतुबन, मंझन

(ख) सगुण भक्ति धारा (ईश्वर के साकार रूप की उपासना)

  1. रामभक्ति शाखा: भगवान राम को आराध्य मानकर भक्ति काव्य की रचना।
    • तुलसीदास: (प्रमुख कवि) रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली।
    • नाभादास, अग्रदास
  2. कृष्णभक्ति शाखा: भगवान कृष्ण के बाल-रूप और प्रेम-लीलाओं का वर्णन।
    • सूरदास: (प्रमुख कवि) सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य-लहरी।
    • मीराबाई, रसखान, नंददास

3. रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल) (सन् 1643 ई. – 1843 ई.)

इस काल में भक्ति की धारा मंद पड़ गई और साहित्य राजदरबारों की शोभा बन गया। ‘रीति’ का अर्थ है – ‘बँधी-बँधाई परिपाटी’। इस काल के कवियों ने संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ग्रंथों (अलंकार, रस, नायिका-भेद) के आधार पर लक्षण-ग्रंथों की रचना की।


4. आधुनिक काल (गद्य काल) (सन् 1843 ई. – अब तक)

इस काल में पहली बार गद्य (Prose) की विधाओं (कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध) का व्यापक विकास हुआ, इसलिए आचार्य शुक्ल ने इसे ‘गद्य काल’ भी कहा है।

आधुनिक काल को अध्ययन की सुविधा के लिए कई उप-युगों में बाँटा गया है:

  1. भारतेन्दु युग (1850-1900): खड़ी बोली गद्य का विकास, नवजागरण और समाज-सुधार का स्वर।
    • प्रमुख लेखक: भारतेन्दु हरिश्चंद्र
  2. द्विवेदी युग (1900-1918): ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादन द्वारा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा का परिष्कार और मानकीकरण किया। खड़ी बोली पद्य की भाषा बनी।
    • प्रमुख कवि: मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
  3. छायावाद युग (1918-1936): काव्य में प्रेम, प्रकृति और वैयक्तिक अनुभूतियों का सूक्ष्म, काल्पनिक और लाक्षणिक चित्रण।
    • प्रमुख कवि (छायावाद के चार स्तंभ): जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा
  4. प्रगतिवाद युग (1936-1943): मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित, शोषण और सामाजिक विषमता के विरुद्ध काव्य रचना।
    • प्रमुख कवि: नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, रामधारी सिंह ‘दिनकर’
  5. प्रयोगवाद युग (1943-1951): ‘तार सप्तक’ के प्रकाशन से शुरुआत। काव्य में नए-नए प्रयोग, प्रतीक और बिंबों पर बल।
    • प्रमुख कवि: अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन), मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर
  6. नई कविता (1951 से आगे): लघु मानव की पीड़ा, कुंठा और महानगरीय जीवन की विसंगतियों का चित्रण।
  7. साठोत्तरी कविता/समकालीन कविता (1960 से अब तक): मोहभंग, आक्रोश और व्यवस्था के विरुद्ध स्वर।


व्याकरणिक पद एवं उनके भेद

पद क्या है?

‘शब्द’ और ‘पद’ में एक सूक्ष्म अंतर है।

परिभाषा:
वाक्य में प्रयुक्त शब्द ही पद कहलाते हैं। व्याकरण की दृष्टि से इन्हीं पदों का वर्गीकरण और अध्ययन किया जाता है।


व्याकरणिक पदों के भेद (प्रकार)

प्रयोग और रूप-परिवर्तन (विकार) के आधार पर व्याकरणिक पदों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है:

  1. विकारी पद (Declinable/Inflected Words)
  2. अविकारी पद (Indeclinable/Uninflected Words) या अव्यय

1. विकारी पद (Declinable Words)

परिभाषा:
वे पद (शब्द) जिनका रूप लिंग (gender), वचन (number), कारक (case) और काल (tense) के कारण बदल जाता है (या उनमें विकार आ जाता है), विकारी पद कहलाते हैं।

विकारी पदों के चार भेद होते हैं:

(क) संज्ञा (Noun)

किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, जाति या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं।

(ख) सर्वनाम (Pronoun)

संज्ञा के स्थान पर प्रयोग होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं। (जैसे – मैं, तुम, वह, कोई)।

(ग) विशेषण (Adjective)

संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (गुण, दोष, संख्या) बताने वाले शब्दों को विशेषण कहते हैं। (जैसे – अच्छा, काला, चार, थोड़ा)।

(घ) क्रिया (Verb)

जिस पद से किसी काम के करने या होने का बोध हो, उसे क्रिया कहते हैं। (जैसे – पढ़ना, खेलना, सोना)।


2. अविकारी पद / अव्यय (Indeclinable Words)

परिभाषा:
वे पद (शब्द) जिनका रूप लिंग, वचन, कारक या काल के कारण कभी नहीं बदलता, वे अविकारी पद या अव्यय कहलाते हैं। ‘अव्यय’ का अर्थ ही है- ‘जिसका कुछ भी व्यय (खर्च/बदलाव) न हो’। ये हमेशा एक ही रूप में बने रहते हैं।

अविकारी पदों (अव्यय) के भी चार मुख्य भेद होते हैं:

(क) क्रिया-विशेषण (Adverb)

जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, उन्हें क्रिया-विशेषण कहते हैं।

(ख) संबंधबोधक (Preposition/Postposition)

जो अव्यय संज्ञा या सर्वनाम के बाद आकर उनका संबंध वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ जोड़ते हैं, उन्हें संबंधबोधक कहते हैं।

(ग) समुच्चयबोधक (Conjunction)

जो अव्यय दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने का काम करते हैं, उन्हें समुच्चयबोधक कहते हैं।

(घ) विस्मयादिबोधक (Interjection)

जिन अव्ययों से हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य जैसे भाव प्रकट होते हैं, उन्हें विस्मयादिबोधक कहते हैं।

सारांश तालिका (Summary Table)

पद (Parts of Speech)प्रकार (Type)भेद (Sub-type)उदाहरण (Example)
विकारी (बदलने वाले)1. संज्ञा (Noun)राम, पुस्तक, जयपुर, अच्छाई
2. सर्वनाम (Pronoun)मैं, तुम, वह, यह, कोई
3. विशेषण (Adjective)अच्छा, मीठा, चार, लंबा
4. क्रिया (Verb)खाना, जाना, हँसना, पढ़ना
अविकारी (न बदलने वाले)(अव्यय)1. क्रिया-विशेषण (Adverb)धीरे-धीरे, आज, ऊपर, बहुत
2. संबंधबोधक (Preposition)के पास, के बिना, से पहले
3. समुच्चयबोधक (Conjunction)और, लेकिन, क्योंकि, या
4. विस्मयादिबोधक (Interjection)अरे!, वाह!, छि!, ओह!

व्याकरणीय पद एवं उनके भेद

विषयवस्तुप्रकारनाम
1. संज्ञा051. व्यक्तिवाचक 2. जातिवाचक 3. समूहवाचक 4. भाववाचक 5. पदार्थवाचक / द्रव्यवाचक
2. सर्वनाम061. पुरुषवाचक 2. निजवाचक 3. निश्चयवाचक 4. अनिश्चयवाचक 5. संबंधवाचक 6. प्रश्नवाचक
3. विशेषण041. गुणवाचक 2. संख्यावाचक 3. परिमाणवाचक 4. सार्वनामिक विशेषण
4. क्रिया021. सकर्मक क्रिया 2. अकर्मक क्रिया
5. धातु021. मूल धातु 2. यौगिक धातु
6. संयुक्त क्रिया111. आरम्भबोधक 2. समाप्तिबोधक 3. अवकाशबोधक 4. अनुमतिबोधक 5. नित्यताबोधक 6. आवश्यकताबोधक 7. निश्चयबोधक 8. इच्छाबोधक 9. अभ्यासबोधक 10. शक्तिबोधक 11. पुनरुक्त संयुक्त क्रिया
7. वाच्य031. कर्तृवाच्य 2. कर्मवाच्य 3. भाववाच्य
8. वाक्य के प्रकार
अर्थ के आधार पर081. विधिवाचक 2. निषेधवाचक 3. आज्ञावाचक 4. प्रश्नवाचक 5. विस्मयवाचक 6. संदेहवाचक 7. इच्छावाचक 8. संकेतवाचक
रचना के आधार पर031. सरल / साधारण वाक्य 2. मिश्र वाक्य 3. संयुक्त वाक्य
9. संधि031. स्वर संधि 2. व्यंजन संधि 3. विसर्ग संधि
स्वर संधि051. दीर्घ स्वर संधि 2. गुण स्वर संधि 3. वृद्धि स्वर संधि 4. यण स्वर संधि 5. अयादि स्वर संधि
10. वर्ण02(i) स्वर वर्ण (11) (ii) व्यंजन वर्ण (33) • मूल स्वर (04) • संयुक्त व्यंजन (04) • उत्क्षिप्त व्यंजन (02)
11. लिंग031. स्त्रीलिंग 2. पुल्लिंग 3. उभयलिंग
12. समास061. अव्ययीभाव 2. तत्पुरुष 3. कर्मधारय 4. द्विगु 5. द्वन्द्व 6. बहुव्रीहि (प्रयोग के आधार पर 4–(i) अव्ययीभाव (ii) तत्पुरुष (iii) द्वन्द्व (iii) बहुव्रीहि)
द्वन्द्व समास के प्रकार031. इतरेतर द्वन्द्व 2. समाहार द्वन्द्व 3. वैकल्पिक द्वन्द्व
कर्मधारय के प्रकार041. विशेषण पूर्वपद 2. विशेष्य पूर्वपद 3. विशेषणोभयपद 4. विशेष्योभयपद
बहुव्रीहि के प्रकार041. समानाधिकरण 2. व्यधिकरण 3. तुल्ययोग(सह) 4. व्यतिहार
13. वचन021. एकवचन 2. बहुवचन
14. कारक081. कर्ता 2. कर्म 3. करण 4. सम्प्रदान 5. अपादान 6. संबंध 7. अधिकरण 8. सम्बोधन
15. प्रत्यय021. कृत प्रत्यय 2. तद्धित प्रत्यय
16. अलंकार031. शब्दालंकार 2. अर्थालंकार 3. उभयालंकार
17. रस
अंग / अवयव04• स्थायीभाव (09) • विभाव (02) • अनुभाव (05) • संचारीभाव (33)
प्रकार091. श्रृंगार 2. हास्य 3. वीर 4. करुण 5. भयानक 6. रौद्र 7. वीभत्स 8. अद्भुत 9. शांत