वाच्य (Voice)
परिभाषा:
क्रिया के जिस रूप से यह पता चले कि वाक्य में क्रिया का मुख्य केंद्र-बिंदु (focus) कर्ता (subject), कर्म (object), या भाव (emotion/action) है, उसे वाच्य कहते हैं।
सरल शब्दों में, वाच्य यह बताता है कि वाक्य में क्रिया किसके अनुसार चल रही है—कर्ता के, कर्म के, या भाव के।
वाच्य के भेद (Types of Voice)
वाच्य के तीन मुख्य भेद होते हैं:
- कर्तृवाच्य (Kartrivachya) – Active Voice
- कर्मवाच्य (Karmavachya) – Passive Voice
- भाववाच्य (Bhavavachya) – Impersonal Voice
1. कर्तृवाच्य (Active Voice)
- परिभाषा: जब वाक्य में क्रिया का सीधा संबंध कर्ता से होता है, अर्थात् क्रिया के लिंग और वचन कर्ता के अनुसार होते हैं, उसे कर्तृवाच्य कहते हैं।
- पहचान (Tricks):
- इसमें कर्ता की प्रधानता होती है।
- क्रिया अकर्मक (Intransitive) या सकर्मक (Transitive) दोनों हो सकती है।
- कर्ता के साथ या तो कोई चिह्न नहीं होता, या ‘ने’ चिह्न होता है।
- उदाहरण:
- राम पत्र लिखता है।
- (कर्ता ‘राम’ पुल्लिंग, एकवचन है, इसलिए क्रिया ‘लिखता है’ भी पुल्लिंग, एकवचन है।)
- सीता गाना गाती है।
- (कर्ता ‘सीता’ स्त्रीलिंग, एकवचन है, इसलिए क्रिया ‘गाती है’ भी स्त्रीलिंग, एकवचन है।)
- लड़के फुटबॉल खेलते हैं।
- (कर्ता ‘लड़के’ पुल्लिंग, बहुवचन है, इसलिए क्रिया ‘खेलते हैं’ भी पुल्लिंग, बहुवचन है।)
- राम पत्र लिखता है।
2. कर्मवाच्य (Passive Voice)
- परिभाषा: जब वाक्य में क्रिया का सीधा संबंध कर्म से होता है, अर्थात् क्रिया के लिंग और वचन कर्म के अनुसार होते हैं, उसे कर्मवाच्य कहते हैं।
- पहचान (Tricks):
- इसमें कर्म की प्रधानता होती है।
- क्रिया हमेशा सकर्मक होती है (क्योंकि कर्म का होना अनिवार्य है)।
- कर्ता के बाद ‘से’ या ‘के द्वारा’ लगा होता है।
- मुख्य क्रिया भूतकाल (past participle) में होती है और उसके साथ ‘जाना’ क्रिया का रूप (जैसे – जाता है, गई, जाएँगे) जुड़ा होता है।
- उदाहरण:
- राम के द्वारा पत्रलिखा जाता है।
- (कर्म ‘पत्र’ पुल्लिंग, एकवचन है, इसलिए क्रिया ‘लिखा जाता है’ भी उसी के अनुसार है, कर्ता ‘राम’ के अनुसार नहीं।)
- सीता के द्वारा गीतगाया गया।
- (कर्म ‘गीत’ पुल्लिंग, एकवचन है, इसलिए क्रिया ‘गाया गया’ भी उसी के अनुसार है।)
- मेरे द्वारा पुस्तकपढ़ी गई।
- (कर्म ‘पुस्तक’ स्त्रीलिंग, एकवचन है, इसलिए क्रिया ‘पढ़ी गई’ भी उसी के अनुसार है।)
- राम के द्वारा पत्रलिखा जाता है।
3. भाववाच्य (Impersonal Voice)
- परिभाषा: जब वाक्य में क्रिया का संबंध न कर्ता से हो, न कर्म से, बल्कि क्रिया के भाव से हो, उसे भाववाच्य कहते हैं।
- पहचान (Tricks):
- इसमें भाव की प्रधानता होती है।
- क्रिया हमेशा अकर्मक होती है।
- कर्ता के बाद ‘से’ लगा होता है।
- अधिकतर वाक्यों में असमर्थता या विवशता प्रकट की जाती है और ये प्रायः नकारात्मक (negative) होते हैं।
- सबसे महत्वपूर्ण नियम: क्रिया हमेशा अन्य पुरुष, पुल्लिंग, एकवचन में रहती है, चाहे कर्ता कोई भी हो।
- उदाहरण:
- मुझसे अब चला नहीं जाता।
- रोगी से उठा नहीं जाता।
- दादी से देखा नहीं जाता।
- चलो, अब सोया जाए। (यह सकारात्मक उदाहरण है।)
वाच्य परिवर्तन (Voice Transformation)
परीक्षा में वाच्य बदलने के लिए अक्सर पूछा जाता है।
(A) कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य में बदलना
- कर्ता के आगे ‘से’ या ‘के द्वारा’ लगाएँ।
- मुख्य क्रिया को भूतकाल (past participle) में बदलें।
- उस क्रिया के साथ ‘जाना’ क्रिया का रूप कर्म के लिंग और वचन के अनुसार लगाएँ।
- उदाहरण:
- कर्तृवाच्य: राम पत्र लिखता है।
- कर्मवाच्य: राम के द्वारा पत्र लिखा जाता है।
- कर्तृवाच्य: बच्चे मिठाई खाएँगे।
- कर्मवाच्य: बच्चों के द्वारा मिठाई खाई जाएगी। (मिठाई स्त्रीलिंग है)
(B) कर्तृवाच्य से भाववाच्य में बदलना
- कर्ता के आगे ‘से’ लगाएँ।
- क्रिया को हमेशा अन्य पुरुष, पुल्लिंग, एकवचन में रखें।
- ‘जाना’ क्रिया को सहायक क्रिया के रूप में जोड़ें।
- उदाहरण:
- कर्तृवाच्य: मैं चल नहीं सकता।
- भाववाच्य: मुझसे चला नहीं जाता।
- कर्तृवाच्य: पक्षी नहीं उड़ते।
- भाववाच्य: पक्षियों से उड़ा नहीं जाता।
तीनों वाच्यों की तुलना (Quick Comparison)
| आधार | कर्तृवाच्य (Active) | कर्मवाच्य (Passive) | भाववाच्य (Impersonal) |
| प्रधानता | कर्ता (Subject) | कर्म (Object) | भाव (Action) |
| क्रिया का लिंग/वचन | कर्ता के अनुसार | कर्म के अनुसार | हमेशा पुल्लिंग, एकवचन |
| क्रिया का प्रकार | सकर्मक / अकर्मक | केवल सकर्मक | केवल अकर्मक |
| कर्ता के साथ | कुछ नहीं / ‘ने’ | ‘से’ / ‘के द्वारा’ | ‘से’ |
| उदाहरण | वह पढ़ता है। | उसके द्वारा पढ़ा जाता है। | उससे पढ़ा नहीं जाता। |
रस
रस काव्यशास्त्र (Poetics) का एक अत्यंत गहन और आनंददायक विषय है। यह केवल एक व्याकरणिक विषय नहीं, बल्कि साहित्य के हृदय को समझने की कला है।
आइए, इसे सरल और विस्तृत रूप में समझते हैं।
रस (Aesthetics/Emotion in Literature)
शाब्दिक अर्थ: ‘रस’ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘जूस’ (Juice) या ‘अर्क’ (Essence)।
काव्य में अर्थ:
जिस प्रकार फलों को निचोड़ने से ‘रस’ निकलता है, जो हमें स्वाद और आनंद देता है, ठीक उसी प्रकार, किसी कविता, कहानी, नाटक या साहित्य को पढ़ने, सुनने या देखने से पाठक या श्रोता के हृदय में जो आनंद या भाव उत्पन्न होता है, उसे ही रस कहते हैं।
यह साहित्य का वह तत्व है जो पाठक को सीधे पात्रों की भावनाओं से जोड़ता है।
रस की परिभाषा और सूत्र
रस सिद्धांत के प्रवर्तक आचार्य भरत मुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में रस का सूत्र दिया है:
“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः।”
- सरल शब्दों में इसका अर्थ है:
विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भाव के संयोग (मिलने) से स्थायी भाव जब जागृत होता है, तो रस की उत्पत्ति होती है।
रस के चार अंग (The Four Elements of Ras)
उपरोक्त सूत्र के अनुसार, रस के चार मुख्य अंग या अवयव होते हैं, जिनके मिलने से ही रस उत्पन्न होता है:
1. स्थायी भाव (Permanent Emotion)
ये वे मूल भाव हैं जो हर मनुष्य के हृदय में स्थायी रूप से (हमेशा) सुप्त (सोए हुए) अवस्था में रहते हैं। अनुकूल परिस्थिति या कारण पाकर ये भाव जागृत हो जाते हैं।
- उदाहरण: क्रोध, प्रेम, दुःख, उत्साह आदि भाव हम सब में होते हैं, बस सही मौका मिलने पर प्रकट हो जाते हैं।
2. विभाव (The Cause / Stimulus)
जिन कारणों से स्थायी भाव जागृत होता है, उन्हें विभाव कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं:
- (क) आलंबन विभाव: वह मुख्य व्यक्ति या वस्तु जिसके कारण मन में भाव जगे।
- जैसे: नायक के मन में नायिका को देखकर प्रेम (रति) का भाव जागना। यहाँ नायिका आलंबन है।
- (ख) उद्दीपन विभाव: वे परिस्थितियाँ, वातावरण या वस्तुएँ जो जागे हुए भाव को और तेज (उद्दीप्त) कर दें।
- जैसे: नायक-नायिका का प्रेम भाव चाँदनी रात, सुंदर बगीचे या मधुर संगीत के कारण और बढ़ जाता है। यहाँ चाँदनी रात उद्दीपन है।
3. अनुभाव (The Physical Reaction)
स्थायी भाव के जागृत होने पर व्यक्ति जो शारीरिक चेष्टाएँ या क्रियाएँ करता है, उन्हें अनुभाव कहते हैं। ये भावों के बाहरी लक्षण हैं।
- उदाहरण:
- क्रोध में आँखें लाल होना, मुट्ठी भींचना।
- भय में काँपना, पसीना आना।
- प्रेम में मुस्कुराना, शर्माना।
4. संचारी भाव (या व्यभिचारी भाव) (Transitory Emotions)
ये वे क्षणिक (थोड़ी देर के लिए आने वाले) भाव हैं जो स्थायी भाव को और मजबूत करने के लिए बीच-बीच में आते-जाते रहते हैं। इन्हें पानी के बुलबुलों के समान माना गया है। इनकी संख्या 33 मानी गई है।
- उदाहरण: चिंता, गर्व, हर्ष, लज्जा, शंका आदि।
- जैसे: किसी प्रियजन के वियोग (करुण रस) में उसकी चिंता करना, उसकी पुरानी बातों को याद करके क्षण भर के लिए हर्षित होना, फिर दुखी हो जाना। यहाँ ‘चिंता’ और ‘हर्ष’ संचारी भाव हैं।
रस के प्रकार और उनके स्थायी भाव (Types of Ras and their Permanent Emotions)
मुख्य रूप से 9 रस माने गए हैं, लेकिन बाद में दो और रस (वात्सल्य और भक्ति) जोड़ दिए गए। इस प्रकार अब 11 रस माने जाते हैं।
| रस का नाम | स्थायी भाव (Permanent Emotion) | संक्षिप्त अर्थ व उदाहरण |
| 1. शृंगार रस | रति (प्रेम) | नायक-नायिका के प्रेम, मिलन (संयोग) या बिछोह (वियोग) का वर्णन।<br>उदा. (संयोग): “बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।”<br>उदा. (वियोग): “हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनैनी?” |
| 2. हास्य रस | हास (हँसी) | किसी की विचित्र वेश-भूषा, वाणी या चेष्टाओं से उत्पन्न हँसी का भाव।<br>उदा.: “बुरे समय को देखकर गंजे तू क्यों रोय। किसी भी हालत में तेरा बाल न बाँका होय।” |
| 3. करुण रस | शोक (दुःख) | किसी प्रियजन के विनाश, मृत्यु या अनिष्ट से उत्पन्न दुःख का भाव।<br>उदा.: “अभी तो मुकुट बँधा था माथ, हुए कल ही हल्दी के हाथ… हाय रुक गया यहीं संसार, बना सिंदूर अनल अंगार।” |
| 4. रौद्र रस | क्रोध (गुस्सा) | किसी के अपमान, निंदा या अनुचित कार्य के कारण उत्पन्न क्रोध का भाव।<br>उदा.: “श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे।” |
| 5. वीर रस | उत्साह (वीरता) | युद्ध, दान, धर्म या दया में проявляющаяся वीरता और उत्साह का भाव।<br>उदा.: “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।” |
| 6. भयानक रस | भय (डर) | किसी डरावने व्यक्ति, वस्तु या दृश्य को देखकर उत्पन्न भय का भाव।<br>उदा.: “एक ओर अजगरहिं लखि, एक ओर मृगराय। विकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय।” |
| 7. वीभत्स रस | जुगुप्सा (घृणा) | किसी घृणित वस्तु या दृश्य को देखकर उत्पन्न घृणा या ग्लानि का भाव।<br>उदा.: “सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत।” |
| 8. अद्भुत रस | विस्मय (आश्चर्य) | किसी अलौकिक, विचित्र या आश्चर्यजनक वस्तु या दृश्य को देखकर उत्पन्न आश्चर्य का भाव।<br>उदा.: “देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया। क्षणभर को वह बनी अचेतन, हिल न सकी कोमल काया।” |
| 9. शांत रस | निर्वेद (वैराग्य/शांति) | संसार की नश्वरता और मोह-माया से विरक्ति होने पर उत्पन्न शांति का भाव।<br>उदा.: “मन रे तन कागद का पुतला, लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।” |
| 10. वात्सल्य रस | वत्सलता (संतान-प्रेम) | माता-पिता का अपनी संतान के प्रति प्रेम और स्नेह का भाव। (इसे पहले शृंगार में ही गिना जाता था)।<br>उदा.: “किलकत कान्ह घुटरुवन आवत। मनिमय कनक नंद के आँगन, बिंब पकरिबे धावत।” |
| 11. भक्ति रस | भगवत् रति (ईश्वर-प्रेम) | ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और अनन्यता का भाव।<br>उदा.: “मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।” |
छंद (Meter in Poetry)
परिभाषा:
वर्णों या मात्राओं की नियमित गणना और विशिष्ट व्यवस्था के साथ, लय (rhythm) और गति (pace) उत्पन्न करने के लिए की जाने वाली पद्य-रचना को छंद कहते हैं।
- सरल शब्दों में: छंद कविता को लिखने का एक ‘नियम’ या ‘ढाँचा’ (structure) है, जो उसे साधारण गद्य (prose) से अलग कर संगीतमय और गेय (sungable) बनाता है।
छंद के अंग (Elements of Chhand)
छंद को समझने के लिए इसके निम्नलिखित 7 अंगों को जानना आवश्यक है:
1. चरण / पद / पाद (Line/Quarter)
छंद की प्रत्येक पंक्ति को चरण या पद कहते हैं। एक छंद में सामान्यतः चार चरण होते हैं।
2. वर्ण और मात्रा (Letter and Mora/Unit of Syllable-length)
- (क) वर्ण (Varna / Letter):
- ह्रस्व (लघु) वर्ण: जिनके उच्चारण में कम समय लगता है। जैसे – अ, इ, उ, ऋ और इनसे बने व्यंजन (क, कि, कु, कृ)।
- दीर्घ (गुरु) वर्ण: जिनके उच्चारण में अधिक समय लगता है। जैसे – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः और इनसे बने व्यंजन (का, की, कू, के, कै, को, कौ, कं, कः)।
- (ख) मात्रा (Matra / Unit of Length):
वर्णों के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं। छंदशास्त्र में मात्रा गणना का नियम है:- लघु (।): ह्रस्व वर्णों की 1 मात्रा गिनी जाती है और उसे खड़ी पाई (।) से दर्शाते हैं।
- गुरु (ऽ): दीर्घ वर्णों की 2 मात्राएँ गिनी जाती हैं और उसे अवग्रह चिह्न (ऽ) से दर्शाते हैं।
- विशेष नियम: आधे अक्षर (जैसे – ‘त्’ सत्य में) की अपनी कोई मात्रा नहीं होती, लेकिन वह अपने से ठीक पहले वाले लघु वर्ण को गुरु (ऽ) बना देता है। (जैसे- स+त्+य = सत् + य = ऽ।)
3. यति / विराम (Caesura / Pause)
छंद को पढ़ते समय जहाँ थोड़ा रुकना पड़ता है, उसे यति कहते हैं।
4. गति (Rhythm / Flow)
छंद को पढ़ते समय जो लय या प्रवाह उत्पन्न होता है, उसे गति कहते हैं।
5. तुक (Rhyme)
चरण के अंत में आने वाली समान ध्वनियों को तुक कहते हैं।
- जैसे: “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।।” (सागर-उजागर में तुक है)।
6. गण (Group of Three Syllables)
यह वर्णिक छंदों में प्रयोग होता है। तीन वर्णों (अक्षरों) के समूह को गण कहते हैं। गणों की संख्या 8 है, जिन्हें ‘यमाताराजभानसलगा’ सूत्र से याद रखा जाता है।
- यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), सगण (।।ऽ)।
7. संख्या और क्रम (Count and Order)
छंदों में मात्राओं या वर्णों की गिनती (संख्या) और लघु-गुरु के स्थान (क्रम) का निश्चित होना आवश्यक है।
छंद के प्रकार (Types of Chhand)
मात्रा या वर्णों की गणना के आधार पर छंद के मुख्य रूप से तीन भेद होते हैं:
1. मात्रिक छंद (Based on Matra Count)
जिन छंदों की रचना मात्राओं की गिनती के आधार पर की जाती है, उन्हें मात्रिक छंद कहते हैं।
यह तीन प्रकार के होते हैं:
- (क) सम मात्रिक छंद: जिसके सभी (चारों) चरणों में मात्राओं की संख्या समान हो।
- चौपाई: प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ। (जैसे – हनुमान चालीसा)
- रोला: प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ। (यति 11 और 13 पर)।
- गीतिका: प्रत्येक चरण में 26-26 मात्राएँ।
- हरिगीतिका: प्रत्येक चरण में 28-28 मात्राएँ।
- (ख) अर्धसम मात्रिक छंद: जिसके पहले और तीसरे (विषम) चरणों में तथा दूसरे और चौथे (सम) चरणों में मात्राएँ समान हों।
- दोहा: विषम चरणों (1, 3) में 13-13 और सम चरणों (2, 4) में 11-11 मात्राएँ।
- उदा: श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि। (13, 11)
- सोरठा: यह दोहे का ठीक उल्टा होता है। विषम चरणों में 11-11 और सम चरणों में 13-13 मात्राएँ।
- बरवै: विषम चरणों में 12-12 और सम चरणों में 7-7 मात्राएँ।
- दोहा: विषम चरणों (1, 3) में 13-13 और सम चरणों (2, 4) में 11-11 मात्राएँ।
- (ग) विषम मात्रिक छंद: जिसके चरण असमान हों और जो दो छंदों को मिलाकर बनता हो।
- कुंडलिया: यह दोहा + रोला को मिलाकर बनता है। इसमें 6 चरण होते हैं। इसकी पहचान यह है कि जिस शब्द से यह शुरू होता है, उसी शब्द पर समाप्त होता है।
- छप्पय: यह रोला + उल्लाला को मिलाकर बनता है।
2. वर्णिक छंद (Based on Varna Count)
जिन छंदों की रचना वर्णों की गिनती और क्रम के आधार पर की जाती है, उन्हें वर्णिक छंद कहते हैं।
- इंद्रवज्रा: प्रत्येक चरण में 11 वर्ण (तगण, तगण, जगण, गुरु, गुरु)।
- मंदाक्रांता: प्रत्येक चरण में 17 वर्ण।
- सवैया: 22 से 26 वर्णों वाले छंद।
3. मुक्तक छंद (Free Verse)
वह छंद जो वर्ण या मात्रा के किसी भी नियम से मुक्त हो, केवल भाव और लय पर आधारित हो। आधुनिक कविताएँ अधिकतर मुक्तक छंद में ही लिखी जाती हैं।
उदाहरण द्वारा मात्रा गणना (Example of Matra Calculation)
दोहा: श्री गुरु चरन सरोज रज
- श्री: (दीर्घ ‘ई’) = ऽ (2)
- गु: (लघु ‘उ’) = । (1)
- रु: (लघु ‘उ’) = । (1)
- च: = । (1)
- र: = । (1)
- न: = । (1)
- स: = । (1)
- रो: (दीर्घ ‘ओ’) = ऽ (2)
- ज: = । (1)
- र: = । (1)
- ज: = । (1)
कुल गणना: ऽ + । + । + । + । + । + । + ऽ + । + । + । = 2 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 2 + 1 + 1 + 1 = 13 मात्राएँ।
यह दोहे के पहले (विषम) चरण का नियम है।
अलंकार (Figure of Speech)
शाब्दिक अर्थ:
‘अलंकार’ शब्द ‘अलम्’ + ‘कार’ से मिलकर बना है।
- अलम् का अर्थ है – ‘आभूषण’ (ornament) या ‘सजावट’।
- कार का अर्थ है – ‘करने वाला’।
इस प्रकार, अलंकार का अर्थ हुआ – “सुशोभित करने वाला”।
परिभाषा:
जिस प्रकार स्त्रियाँ अपनी सुंदरता बढ़ाने के लिए आभूषणों का प्रयोग करती हैं, उसी प्रकार कवि अपनी कविता या काव्य को सजाने, उसकी शोभा बढ़ाने और उसे अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए जिन तत्वों का प्रयोग करते हैं, उन्हें अलंकार कहते हैं।
- सरल शब्दों में: अलंकार काव्य में शब्दों और अर्थों के माध्यम से चमत्कार या सौंदर्य उत्पन्न करने का एक तरीका है।
अलंकार के भेद (Types of Alankar)
मुख्य रूप से अलंकार के तीन भेद होते हैं, लेकिन अध्ययन की दृष्टि से दो प्रमुख हैं:
- शब्दालंकार (Based on Words)
- अर्थालंकार (Based on Meaning)
- उभयालंकार (Based on Both)
1. शब्दालंकार
जब कविता में शब्दों के विशिष्ट प्रयोग से चमत्कार या सौंदर्य उत्पन्न होता है, तो उसे शब्दालंकार कहते हैं।
- पहचान: यहाँ सौंदर्य शब्द पर निर्भर करता है। यदि उस शब्द को हटाकर उसका पर्यायवाची (synonym) रख दिया जाए, तो चमत्कार समाप्त हो जाएगा।
प्रमुख शब्दालंकार:
(क) अनुप्रास अलंकार (Alliteration)
- परिभाषा: जब किसी काव्य पंक्ति में किसी एक व्यंजन वर्ण (consonant) की बार-बार आवृत्ति (repetition) होती है।
- उदाहरण:
- “चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल-थल में।”
- (यहाँ ‘च’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।)
- “तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।”
- (यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।)
- “चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल-थल में।”
(ख) यमक अलंकार (Homonym/Pun)
- परिभाषा: जब एक ही शब्द एक से अधिक बार आए, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग हो।
- उदाहरण:
- “कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।।”
- (यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है। पहले ‘कनक’ का अर्थ सोना (gold) है और दूसरे का अर्थ धतूरा (poisonous plant) है।)
- “काली घटा का घमंड घटा।”
- (पहले ‘घटा’ का अर्थ है बादल (cloud) और दूसरे ‘घटा’ का अर्थ है कम होना (decrease)।)
- “कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय।।”
(ग) श्लेष अलंकार (Pun/Double Entendre)
- परिभाषा: ‘श्लेष’ का अर्थ है ‘चिपकना’। जब कोई एक ही शब्द आए, लेकिन उसके एक से अधिक अर्थ निकलते हों (अर्थात्, एक ही शब्द से कई अर्थ चिपके हों)।
- उदाहरण:
- “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।”
- (यहाँ दूसरी पंक्ति में ‘पानी’ शब्द एक बार आया है, लेकिन उसके तीन अर्थ हैं: मोती के संदर्भ में चमक, मनुष्य (मानुष) के संदर्भ में इज्जत/सम्मान, और चूने (चून) के संदर्भ में जल।)
- “सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।”
- (यहाँ ‘सुबरन’ (सुवर्ण) के तीन अर्थ हैं: कवि के लिए सुंदर अक्षर, व्यभिचारी के लिए सुंदर रूप/रंग, और चोर के लिए सोना (gold)।)
- “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।”
2. अर्थालंकार
जब कविता में अर्थ के माध्यम से चमत्कार या सौंदर्य उत्पन्न होता है, तो उसे अर्थालंकार कहते हैं।
- पहचान: यहाँ सौंदर्य अर्थ पर निर्भर होता है। यदि शब्द को बदलकर उसका पर्यायवाची रख भी दें, तो भी चमत्कार बना रहेगा।
प्रमुख अर्थालंकार:
(क) उपमा अलंकार (Simile)
- परिभाषा: जब किन्हीं दो अलग-अलग वस्तुओं या व्यक्तियों में उनके गुण, धर्म या रूप की समानता के कारण तुलना (comparison) की जाती है।
- पहचान (Tricks): इसमें सा, सी, से, सम, सरिस, जैसा, ज्यों जैसे वाचक शब्दों का प्रयोग होता है।
- इसके चार अंग होते हैं:
- उपमेय: जिसकी तुलना की जाए (The thing being compared)।
- उपमान: जिससे तुलना की जाए (The thing it is compared to)।
- वाचक शब्द: तुलना बताने वाला शब्द (सा, सी, आदि)।
- साधारण धर्म: वह गुण जो दोनों में समान हो।
- उदाहरण:
- “पीपर पात सरिस मन डोला।”
- अर्थ: मन पीपल के पत्ते के समान डोल गया।
- (यहाँ ‘मन’ (उपमेय) की तुलना ‘पीपल के पत्ते’ (उपमान) से की गई है, वाचक शब्द ‘सरिस’ है और साधारण धर्म ‘डोलना’ है।)
- “पीपर पात सरिस मन डोला।”
(ख) रूपक अलंकार (Metaphor)
- परिभाषा: जब गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय (जिसकी तुलना हो) पर उपमान (जिससे तुलना हो) का आरोप कर दिया जाए, अर्थात् दोनों को एक ही मान लिया जाए। इसमें तुलना नहीं होती, बल्कि सीधे एकरूपता बताई जाती है।
- पहचान: इसमें उपमेय और उपमान के बीच में योजक चिह्न (-) आ सकता है और वाचक शब्द (सा, सी) का अभाव होता है।
- उदाहरण:
- “चरण-कमल बंदौ हरि राइ।”
- (यहाँ ‘चरण’ (उपमेय) को ‘कमल’ (उपमान) के समान न बताकर, सीधे ‘कमल’ ही कह दिया गया है।)
- “मैया, मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों।”
- (यहाँ बालक चंद्रमा-जैसा खिलौना नहीं, बल्कि चंद्रमा-रूपी खिलौना ही लेने की जिद कर रहा है।)
- “चरण-कमल बंदौ हरि राइ।”
(ग) उत्प्रेक्षा अलंकार (Poetic Fancy/Presumption)
- परिभाषा: जब उपमेय में उपमान के होने की संभावना या कल्पना (possibility or imagination) की जाती है।
- पहचान (Tricks): इसमें मानो, मनु, मनहु, जानो, जनु, जनहु, ज्यों जैसे वाचक शब्दों का प्रयोग होता है।
- उदाहरण:
- “सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहु नीलमनि सैल पर, आतप परयो प्रभात।।”
- (यहाँ श्रीकृष्ण के साँवले शरीर पर पीले वस्त्र ऐसे लग रहे हैं, मानो नीले पर्वत पर सुबह की धूप पड़ रही हो।)
- “सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहु नीलमनि सैल पर, आतप परयो प्रभात।।”
(घ) अतिशयोक्ति अलंकार (Hyperbole)
- परिभाषा: जब किसी बात को लोक-सीमा से बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाए, जो सामान्यतः संभव न हो।
- उदाहरण:
- “आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।।”
- (यहाँ सोचने की गति से भी तेज घोड़े के नदी पार करने की बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है।)
- “आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।।”
(ङ) मानवीकरण अलंकार (Personification)
- परिभाषा: जब जड़ (निर्जीव) पदार्थों या प्रकृति पर मानवीय क्रियाओं या भावनाओं का आरोप किया जाता है, अर्थात् उन्हें मनुष्य की तरह व्यवहार करते हुए दिखाया जाता है।
- उदाहरण:
- “मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।”
- (यहाँ बादलों (मेघ) को किसी मेहमान (मनुष्य) की तरह सज-संवरकर आते हुए दिखाया गया है।)
- “फूल हँसे, कलियाँ मुसकाईं।”
- (फूल और कलियों को मनुष्य की तरह हँसते-मुस्कुराते हुए बताया गया है।)
- “मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।”
अपठित गद्यांश एवं पद्यांश (Unseen Prose and Poetry Passage)
हिंदी भाषा की समझ और विश्लेषण क्षमता को परखने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका है। यह लगभग हर कक्षा और प्रतियोगी परीक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा है।
आइए, इसे हल करने की विधि, टिप्स और ट्रिक्स को विस्तार से समझते हैं।
अपठित गद्यांश एवं पद्यांश का अर्थ
- अपठित: ‘अ’ + ‘पठित’ अर्थात् ‘जो पहले पढ़ा हुआ न हो’।
- गद्यांश: गद्य (Prose – कहानी, लेख, निबंध आदि) का एक अंश (Passage)।
- पद्यांश: पद्य (Poetry – कविता, दोहा आदि) का एक अंश (Stanza)।
इस प्रकार, यह एक ऐसा गद्य या पद्य का अंश होता है जो विद्यार्थी ने अपनी पाठ्यपुस्तक में नहीं पढ़ा होता है। इसका उद्देश्य आपकी समझ, विश्लेषण, व्याख्या और शब्द-ज्ञान की जाँच करना होता है।
1. अपठित गद्यांश को हल करने की विधि और टिप्स
गद्यांश में सीधे तथ्य और जानकारी होती है, इसलिए यह पद्यांश से अपेक्षाकृत सरल होता है।
चरण 1: पहले प्रश्नों को पढ़ें (Quick Scan of Questions)
- पूरे गद्यांश को पढ़ने से पहले, एक बार जल्दी से सभी प्रश्नों पर नज़र डालें। इससे आपको यह अंदाज़ा लग जाएगा कि आपको गद्यांश में किन मुख्य बिंदुओं या सूचनाओं को ढूँढ़ना है। यह आपका समय बचाता है।
चरण 2: गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें (Careful Reading)
- अब गद्यांश को बहुत ध्यान से और समझते हुए पढ़ें। पढ़ते समय उन पंक्तियों को रेखांकित (underline) करते चलें जिनका संबंध आपने पहले पढ़े हुए प्रश्नों से लग रहा हो।
- गद्यांश के केंद्रीय भाव (central idea) को समझने की कोशिश करें कि लेखक आखिर कहना क्या चाहता है।
चरण 3: प्रश्नों के उत्तर लिखें (Answering the Questions)
- अब एक-एक प्रश्न पढ़ें और रेखांकित पंक्तियों की मदद से उसका उत्तर खोजें।
- सबसे महत्वपूर्ण नियम: उत्तर अपनी भाषा में लिखें, गद्यांश की पंक्तियों को ज्यों का त्यों (copy-paste) न उतारें। इससे परीक्षक पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
- उत्तर संक्षिप्त (brief) और सटीक (to the point) होना चाहिए। जितनी बात पूछी गई है, केवल उतना ही लिखें।
- यदि किसी शब्द का विलोम, पर्यायवाची या अर्थ पूछा गया है, तो उसका उत्तर गद्यांश के संदर्भ (context) के अनुसार ही दें।
चरण 4: शीर्षक का चुनाव (Choosing the Title)
- शीर्षक गद्यांश का “केंद्र बिंदु” होता है।
- यह पता लगाने के लिए स्वयं से पूछें, “यह पूरा गद्यांश किस एक चीज़ या विषय के बारे में है?”
- शीर्षक हमेशा बहुत छोटा (2-4 शब्दों का), आकर्षक और सारगर्भित (meaningful) होना चाहिए।
- गद्यांश की पहली या आखिरी पंक्तियों में अक्सर शीर्षक छिपा होता है।
उदाहरण गद्यांश:
मनुष्य का जीवन केवल अपनी उन्नति के लिए नहीं है, बल्कि उसे समाज के प्रति भी अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना पड़ता है। सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों की भलाई के लिए भी कार्य करता है। परोपकार ही मनुष्य को पशुओं से अलग करता है। हमें निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करनी चाहिए क्योंकि सामाजिक उन्नति में ही हमारी उन्नति निहित है।
प्रश्न:
- मनुष्य का जीवन किसके लिए है?
- उत्तर: मनुष्य का जीवन केवल अपनी उन्नति के लिए ही नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए भी है।
- परोपकार का क्या महत्व है?
- उत्तर: परोपकार ही वह गुण है जो मनुष्य को पशुओं से श्रेष्ठ बनाता है और सच्ची मानवता सिखाता है।
- इस गद्यांश का उचित शीर्षक क्या होगा?
- शीर्षक: परोपकार का महत्व / सामाजिक कर्तव्य / सच्चा मनुष्य।
2. अपठित पद्यांश को हल करने की विधि और टिप्स
पद्यांश में भाव और कल्पना होती है, इसलिए यह गद्यांश से थोड़ा कठिन हो सकता है।
चरण 1: पद्यांश को दो-तीन बार पढ़ें (Multiple Readings)
- कविता की भाषा सांकेतिक और लाक्षणिक होती है। इसलिए पहली बार में पूरा अर्थ समझना मुश्किल हो सकता है।
- कविता को कम से कम 2-3 बार धीरे-धीरे, लय के साथ पढ़ें। इससे उसका भाव और मूल संदेश स्पष्ट होने लगेगा।
चरण 2: शब्दों के अर्थ और भाव को समझें (Understand the Inner Meaning)
- कवि शब्दों का सीधा प्रयोग नहीं करते। उनके छिपे हुए, यानी लाक्षणिक अर्थ को समझने का प्रयास करें।
- जैसे, यदि ‘अंधेरा’ लिखा है तो उसका मतलब सिर्फ ‘रात’ नहीं, बल्कि ‘अज्ञान’, ‘निराशा’ या ‘बुराई’ भी हो सकता है।
- हर पंक्ति का सरल गद्य में मन-ही-मन अनुवाद करें।
चरण 3: प्रश्नों को समझकर उत्तर दें (Answering Precisely)
- प्रश्नों का उत्तर कविता के भाव के आधार पर दें, न कि केवल शाब्दिक अर्थ पर।
- यदि अलंकार, रस, या छंद पूछा जाए, तो उसकी पहचान करें। (जैसे – ‘चरण-कमल’ में रूपक अलंकार है)।
- उत्तर अपनी भाषा में, सरल और स्पष्ट गद्य में लिखें।
चरण 4: शीर्षक और केंद्रीय भाव (Title and Central Idea)
- केंद्रीय भाव में यह बताया जाता है कि कवि इस कविता के माध्यम से क्या संदेश (message) देना चाहता है।
- शीर्षक भी उसी केंद्रीय भाव से जुड़ा हुआ, संक्षिप्त और आकर्षक होना चाहिए।
उदाहरण पद्यांश:
उठो, जागो, जीवन के प्रभात, वसुधा पर छाया है नूतन प्रकाश,
बीती विभावरी, जागो अब, मत देखो पीछे की निराश,
कर्म-क्षेत्र में बढ़ो निरंतर, श्रम से लिखो नया इतिहास।
प्रश्न:
- कवि किसे और क्यों जगा रहा है?
- उत्तर: कवि निराश और अकर्मण्य लोगों को जगा रहा है ताकि वे नए अवसर का लाभ उठाकर कर्म-क्षेत्र में आगे बढ़ें।
- “बीती विभावरी” का भाव क्या है?
- उत्तर: “बीती विभावरी” का भाव है कि निराशा और दुःख की रात बीत चुकी है और अब आशा की नई सुबह हो गई है।
- इस पद्यांश का उचित शीर्षक क्या होगा?
- शीर्षक: जीवन का प्रभात / जागो और बढ़ो / नवीन آغ
पत्र-लेखन (Letter Writing)
एक अत्यंत महत्वपूर्ण कला और संचार का एक सशक्त माध्यम है। भले ही आज डिजिटल युग है, लेकिन औपचारिक (Official) और व्यावसायिक (Business) जगत में पत्रों का महत्व आज भी बना हुआ है।
आइए, पत्र-लेखन के प्रारूप (format), प्रकार और महत्वपूर्ण नियमों को विस्तार से समझते हैं।
पत्र-लेखन (Letter Writing)
परिभाषा:
पत्र एक ऐसा लिखित माध्यम है जिसके द्वारा हम दूर बैठे किसी व्यक्ति, संबंधी या किसी अधिकारी तक अपने विचारों, भावनाओं, संदेशों या सूचनाओं को पहुँचाते हैं। एक अच्छा पत्र लेखक की योग्यता और व्यक्तित्व का परिचायक होता है।
एक अच्छे पत्र की विशेषताएँ
- सरलता: पत्र की भाषा सरल, स्पष्ट और स्वाभाविक होनी चाहिए।
- स्पष्टता: जो कुछ भी कहना हो, वह एकदम स्पष्ट होना चाहिए, कोई भ्रम नहीं रहना चाहिए।
- संक्षिप्तता: पत्र में अनावश्यक विस्तार नहीं होना चाहिए। बात कम-से-कम शब्दों में कही जानी चाहिए।
- उद्देश्यपूर्णता: पत्र अपने उद्देश्य में पूर्ण होना चाहिए, यानी उसे पढ़कर पाठक के मन में कोई शंका न रहे।
- शिष्टता: पत्र में विनम्रता और शिष्टाचार का भाव झलकना चाहिए, भले ही आप शिकायत क्यों न कर रहे हों।
- आकर्षकता: पत्र की लिखावट सुंदर, साफ़ और प्रारूप सही होना चाहिए।
पत्र के प्रकार (Types of Letters)
मुख्य रूप से पत्र दो प्रकार के होते हैं:
- अनौपचारिक पत्र (Informal Letter)
- औपचारिक पत्र (Formal Letter)
1. अनौपचारिक पत्र (Informal Letter)
ये पत्र उन लोगों को लिखे जाते हैं जिनसे हमारा व्यक्तिगत या पारिवारिक संबंध होता है। जैसे – माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, सगे-संबंधी। इन पत्रों में भावनाओं और व्यक्तिगत बातों की प्रधानता होती है।
अनौपचारिक पत्र का प्रारूप (Format)
- प्रेषक का पता (Sender’s Address): सबसे ऊपर, बाईं ओर पत्र लिखने वाले का पता लिखा जाता है।
- दिनांक (Date): पते के ठीक नीचे दिनांक लिखी जाती है।
- संबोधन (Salutation): जिसे पत्र लिखा जा रहा है, उसके लिए संबंध के अनुसार संबोधन।
- बड़ों के लिए: आदरणीय/पूज्य/पूजनीय पिताजी/माताजी/चाचाजी
- बराबर वालों के लिए: प्रिय मित्र/प्रिय भाई/प्रिय बहन
- छोटों के लिए: प्रिय/प्यारे अनुज/पुत्र
- अभिवादन (Greeting): संबंध के अनुसार।
- बड़ों के लिए: सादर प्रणाम/चरण स्पर्श
- बराबर वालों के लिए: सप्रेम नमस्ते/नमस्कार/मधुर स्नेह
- छोटों के लिए: शुभाशीष/खुश रहो/स्नेह
- मुख्य विषय-वस्तु (Main Body): यह पत्र का मुख्य भाग है। इसे प्रायः तीन अनुच्छेदों में बाँटा जाता है:
- पहला अनुच्छेद: हाल-चाल पूछना और अपनी कुशलता बताना। (“मैं यहाँ कुशल हूँ और आशा है…”)
- दूसरा अनुच्छेद: जिस विषय पर पत्र लिखना है, उसका विस्तार से वर्णन।
- तीसरा अनुच्छेद: समाप्ति और बड़ों को प्रणाम व छोटों को स्नेह कहना।
- समापन (Closing):
- आपका प्रिय पुत्र/आपकी प्रिय पुत्री/आपका मित्र/आपका भाई आदि।
- प्रेषक का नाम (Sender’s Name): अंत में अपना नाम लिखें।
अनौपचारिक पत्र का उदाहरण
<details>
<summary><b>अपने मित्र को जन्मदिन की बधाई देते हुए पत्र (Click to view)</b></summary>
(1) पता
A-123, सेक्टर-5
शांति नगर,
नई दिल्ली-1100XX
(2) दिनांक
08 अक्टूबर, 2025
(3) संबोधन
प्रिय मित्र सोहन,
(4) अभिवादन
सप्रेम नमस्ते।
(5) मुख्य विषय-वस्तु
मैं यहाँ कुशल हूँ और आशा करता हूँ कि तुम भी अपने परिवार के साथ सकुशल होगे।
आज तुम्हारे जीवन का एक बहुत ही विशेष दिन है। तुम्हारे जन्मदिन के इस शुभ अवसर पर मेरी ओर से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। ईश्वर करे कि तुम्हारे जीवन में यह दिन बार-बार आए और तुम्हारे लिए ढेर सारी खुशियाँ लेकर आए। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि तुम अपने जीवन के हर लक्ष्य में सफल हो और हमेशा स्वस्थ और प्रसन्न रहो।
इस अवसर पर मैं तुम्हारे पास नहीं आ सका, इसका मुझे खेद है। लेकिन मेरा उपहार तुम्हें शीघ्र ही मिल जाएगा।
अपने माता-पिता को मेरा प्रणाम कहना। तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा में।
(6) समापन
तुम्हारा प्रिय मित्र,
(7) नाम
राहुल
</details>
2. औपचारिक पत्र (Formal Letter)
ये पत्र उन लोगों को लिखे जाते हैं जिनसे हमारा व्यक्तिगत संबंध नहीं होता। ये व्यावसायिक, सरकारी या कार्यालयी कार्यों के लिए लिखे जाते हैं। जैसे – प्रधानाचार्य, सरकारी अधिकारी, संपादक, पुस्तक विक्रेता आदि। इनमें तथ्यों और सूचनाओं की प्रधानता होती है।
औपचारिक पत्र का प्रारूप (Format)
- प्रेषक का पता (Sender’s Address): सबसे ऊपर, बाईं ओर। (परीक्षा भवन में इसकी जगह ‘परीक्षा भवन’ लिखें)।
- दिनांक (Date): पते के नीचे।
- प्राप्तकर्ता का पद और पता (Receiver’s Designation and Address): जिसे पत्र भेजा जा रहा है उसका पदनाम और पता।
- जैसे: सेवा में,<br/> श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,<br/> विद्यालय का नाम,<br/> शहर का नाम
- विषय (Subject): यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें पत्र का मुख्य उद्देश्य संक्षिप्त रूप में लिखा जाता है। (“शुल्क माफी हेतु प्रार्थना-पत्र।”)
- संबोधन (Salutation):
- महोदय/महोदया, मान्यवर, श्रीमान आदि।
- मुख्य विषय-वस्तु (Main Body): इसे प्रायः दो या तीन अनुच्छेदों में लिखते हैं:
- पहला अनुच्छेद: सविनय निवेदन के साथ अपनी समस्या या बात का परिचय देना।
- दूसरा अनुच्छेद: विषय का विस्तार से वर्णन, कारण और प्रभाव बताना।
- तीसरा अनुच्छेद: अनुरोध या प्रार्थना के साथ पत्र का समापन। (“अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि…”)
- धन्यवाद ज्ञापन (Thanks): सधन्यवाद।
- समापन (Closing):
- भवदीय/प्रार्थी/आज्ञाकारी शिष्य/निवेदक आदि।
- प्रेषक का नाम (Sender’s Name): अपना नाम, कक्षा, और रोल नंबर (यदि आवश्यक हो)।
औपचारिक पत्र का उदाहरण
<details>
<summary><b>शुल्क माफी के लिए प्रधानाचार्य को पत्र (Click to view)</b></summary>
(1) प्रेषक का पता
परीक्षा भवन,
नई दिल्ली।
(2) दिनांक
08 अक्टूबर, 2025
(3) प्राप्तकर्ता का पद और पता
सेवा में,
श्रीमान प्रधानाचार्य महोदय,
क. ख. ग. विद्यालय,
चंडीगढ़।
(4) विषय: शुल्क माफी हेतु प्रार्थना-पत्र।
(5) संबोधन
महोदय,
(6) मुख्य विषय-वस्तु
सविनय निवेदन यह है कि मैं आपके विद्यालय में कक्षा दसवीं ‘अ’ का छात्र हूँ। मेरे पिताजी एक निजी कंपनी में एक सामान्य कर्मचारी हैं और उनका वेतन बहुत कम है। हमारे परिवार में पाँच सदस्य हैं, और घर का खर्च बड़ी कठिनाई से चलता है।
महंगाई के इस दौर में, मेरे पिताजी मेरी विद्यालय की फीस देने में असमर्थता महसूस कर रहे हैं। मैं अपनी कक्षा का एक परिश्रमी छात्र हूँ और पिछली सभी कक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त करता आया हूँ। मैं अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहता हूँ।
अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि मेरी पारिवारिक आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए मेरा पूर्ण शुल्क माफ करने की कृपा करें, ताकि मैं अपनी पढ़ाई जारी रख सकूँ। मैं आपका सदा आभारी रहूँगा।
(7) धन्यवाद ज्ञापन
सधन्यवाद।
(8) समापन
आपका आज्ञाकारी शिष्य,
(9) नाम
आदित्य शर्मा
कक्षा: दसवीं ‘अ’
अनुक्रमांक: 15
</details>
निबंध-लेखन (Essay Writing)
परिभाषा:
‘निबंध’ शब्द ‘नि + बंध’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ‘अच्छी तरह से बँधा हुआ’। किसी एक विषय पर अपने विचारों, भावों और तर्कों को व्यवस्थित, क्रमबद्ध और सुसंबद्ध रूप में लिखित रूप देना ही निबंध-लेखन कहलाता है। यह किसी विषय का गद्यात्मक विश्लेषण होता है।
एक अच्छे निबंध के अंग
एक सुगठित निबंध के मुख्य रूप से तीन अंग होते हैं:
1. भूमिका (Introduction):
यह निबंध का प्रवेश द्वार है। इसे आकर्षक और प्रभावशाली होना चाहिए ताकि पाठक पूरा निबंध पढ़ने के लिए प्रेरित हो। इसकी शुरुआत किसी सूक्ति (Quote), कविता की पंक्ति, प्रश्न या विषय के संक्षिप्त परिचय से की जा सकती है। इसमें विषय का परिचय दिया जाता है और यह बताया जाता है कि आप आगे निबंध में किन पहलुओं पर चर्चा करने वाले हैं। (यह 3-4 पंक्तियों से अधिक नहीं होना चाहिए)।
2. विषय-विस्तार / मध्य भाग (Body):
यह निबंध का सबसे बड़ा और मुख्य भाग है। इसमें विषय के सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जाती है। इसे अलग-अलग अनुच्छेदों (paragraphs) में विभाजित करना चाहिए। प्रत्येक अनुच्छेद में एक मुख्य बिंदु पर चर्चा करनी चाहिए। अनुच्छेदों का क्रम तार्किक (logical) होना चाहिए। जैसे – अर्थ, प्रकार, कारण, प्रभाव, लाभ, हानि आदि। अपनी बात को प्रमाणित और प्रभावशाली बनाने के लिए उदाहरणों (examples), आँकड़ों (data), तथ्यों (facts), और महान व्यक्तियों के कथनों का प्रयोग करना चाहिए। इसमें विषय के पक्ष और विपक्ष, दोनों पर संतुलित विचार प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
3. उपसंहार (Conclusion):
यह निबंध का अंतिम भाग है, जिसमें पूरे निबंध का निष्कर्ष (summary) या सार प्रस्तुत किया जाता है। इसमें कही गई सभी बातों को संक्षिप्त रूप में दोहराते हुए अपना अंतिम विचार दिया जाता है। इसमें विषय से संबंधित कोई संदेश, सुझाव या भविष्य की दिशा भी दी जा सकती है। इसका अंत हमेशा एक सकारात्मक (positive) और आशावादी दृष्टिकोण के साथ होना चाहिए।
निबंध लिखने के चरण (Steps for Writing an Essay)
एक प्रभावी निबंध लिखने के लिए इन चरणों का पालन करें:
चरण 1: विषय का चयन (Topic Selection)
दिए गए विकल्पों में से उस विषय को चुनें जिस पर आपके पास सबसे अधिक जानकारी और विचार हों।
चरण 2: रूपरेखा तैयार करना (Creating an Outline/Blueprint)
यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है। लिखने से पहले, एक रफ कागज पर निबंध की एक रूपरेखा बना लें। सोचें कि आप भूमिका में क्या लिखेंगे, मध्य भाग में कौन-कौन से बिंदु (points) किन-किन अनुच्छेदों में डालेंगे, और उपसंहार में क्या निष्कर्ष निकालेंगे।
- उदाहरण (विषय: प्रदूषण):
- भूमिका: सूक्ति + प्रदूषण का अर्थ।
- मध्य भाग:
- प्रदूषण के प्रकार (जल, वायु, ध्वनि)।
- प्रदूषण के कारण (औद्योगिकीकरण, वनों की कटाई, जनसंख्या वृद्धि)।
- प्रदूषण के प्रभाव (बीमारियाँ, जलवायु परिवर्तन)।
- रोकथाम के उपाय (सरकारी प्रयास, व्यक्तिगत प्रयास)।
- उपसंहार: सारांश + भविष्य के लिए संदेश।
चरण 3: लेखन कार्य (Writing the Essay)
अब अपनी बनाई गई रूपरेखा के आधार पर निबंध लिखना शुरू करें। सरल और स्पष्ट भाषा का प्रयोग करें। वाक्य छोटे और सुगठित होने चाहिए। वर्तनी और व्याकरण (Spelling and Grammar) की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। विराम चिह्नों (Punctuation) का सही प्रयोग करें। निबंध की शब्द-सीमा (word limit) का ध्यान रखें।
चरण 4: दोहराना और सुधार करना (Revision and Editing)
निबंध पूरा लिखने के बाद, उसे शुरू से अंत तक कम से कम एक बार ध्यान से पढ़ें। वर्तनी, व्याकरण या वाक्यों की बनावट में जो भी त्रुटियाँ मिलें, उन्हें सुधारें। देखें कि सभी अनुच्छेद एक-दूसरे से सही ढंग से जुड़े हैं या नहीं।
निबंध का एक उदाहरण (Sample Essay Outline)
विषय: पर्यावरण प्रदूषण: समस्या और समाधान
भूमिका: “स्वस्थ जीवन का है आधार, स्वच्छ सुंदर पर्यावरण हमारा।” – इस सूक्ति से शुरुआत। पर्यावरण और प्रदूषण का अर्थ बताना।
मध्य भाग (विषय-विस्तार):
- अनुच्छेद 1: प्रदूषण के विभिन्न प्रकारों का वर्णन – वायु प्रदूषण (वाहनों, कारखानों का धुआँ), जल प्रदूषण (रासायनिक कचरा), ध्वनि प्रदूषण (शोरगुल) और मृदा प्रदूषण (कीटनाशक)।
- अनुच्छेद 2: प्रदूषण के मूल कारणों पर चर्चा – बढ़ती जनसंख्या, अंधाधुंध औद्योगिकीकरण, वनों की कटाई, शहरीकरण।
- अनुच्छेद 3: प्रदूषण के भयानक प्रभावों का उल्लेख – मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव (कैंसर, श्वास रोग), पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव (ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण)।
- अनुच्छेद 4: प्रदूषण रोकने के उपायों पर चर्चा – अधिक से अधिक पेड़ लगाना, नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) का प्रयोग, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पालन।
उपसंहार (निष्कर्ष):
पूरे निबंध का सार प्रस्तुत करना। यह बताना कि प्रदूषण एक वैश्विक समस्या है। एक सकारात्मक संदेश देना – “यह केवल सरकार की ही नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम अपने पर्यावरण को स्वच्छ और सुरक्षित रखें, क्योंकि एक स्वच्छ पर्यावरण ही स्वस्थ भविष्य की नींव है।”
इन नियमों और चरणों का पालन करके आप किसी भी विषय पर एक उत्कृष्ट और प्रभावशाली निबंध लिख सकते हैं।