प्रत्यय (Suffix)
परिभाषा:
‘प्रत्यय’ शब्द दो अंशों से मिलकर बना है: प्रति + अय
- प्रति = साथ में, पर बाद में
- अय = चलने वाला
व्याकरणिक परिभाषा:
वे शब्दांश जो किसी मूल शब्द के अंत (End) में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता ला देते हैं, ‘प्रत्यय’ कहलाते हैं।
- विशेषताएँ:
- ये शब्दांश होते हैं, शब्द नहीं।
- इनका अपना कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता।
- ये हमेशा मूल शब्द के बाद (अंत में) जुड़ते हैं।
उपसर्ग और प्रत्यय में मुख्य अंतर:
- उपसर्ग: शब्द के आरंभ (पहले) में जुड़ता है।
- प्रत्यय: शब्द के अंत (बाद) में जुड़ता है।
उदाहरण:
‘समाज’ एक मूल शब्द है। इसमें प्रत्यय जोड़कर नए शब्द बनाए जा सकते हैं:
- समाज + इक = सामाजिक (अर्थ: समाज से संबंधित – विशेषण बन गया)
‘लिख’ एक धातु है। इसमें प्रत्यय जोड़कर नए शब्द बनाए जा सकते हैं: - लिख + आवट = लिखावट (अर्थ: लिखने का ढंग – भाववाचक संज्ञा बन गया)
- लिख + ना = लिखना (अर्थ: लिखने की क्रिया)
प्रत्यय के भेद (Types of Suffix)
प्रत्यय के मुख्य रूप से दो (2) भेद होते हैं:
- कृत् प्रत्यय (Krit Pratyay)
- तद्धित प्रत्यय (Taddhit Pratyay)
1. कृत् प्रत्यय (Krit Pratyay)
- परिभाषा:
वे प्रत्यय जो क्रिया के मूल रूप अर्थात् ‘धातु’ (root of the verb) के अंत में जुड़कर संज्ञा या विशेषण शब्दों का निर्माण करते हैं, कृत् प्रत्यय कहलाते हैं। - कृत् प्रत्यय से बने शब्दों को ‘कृदंत’ (Kridant) कहते हैं।
- पहचान की ट्रिक: ये प्रत्यय हमेशा क्रिया की धातु (जैसे- पढ़, लिख, खा, गा) के साथ ही लगते हैं।
कृत् प्रत्यय के उपभेद:
| उपभेद | क्या बनाते हैं? | प्रत्यय | उदाहरण (धातु + प्रत्यय = कृदंत शब्द) |
| कर्तृवाचक कृदंत | क्रिया के करने वाले (कर्ता) | -अक, -आकू, -एरा, -ऐया | गा + अक = गायक, लड़ + आकू = लड़ाकू, लूट + एरा = लुटेरा, गा + ऐया = गवैया |
| कर्मवाचक कृदंत | जिस पर क्रिया का फल पड़े | -औना, -ना | खेल + औना = खिलौना, गा + ना = गाना, खा + ना = खाना |
| करणवाचक कृदंत | क्रिया के साधन (tool) | -अन, -ई, -ऊ, -नी | झाड़ + अन = झाड़न, बेल + न = बेलन, झाड़ + ऊ = झाड़ू, कतर + नी = कतरनी |
| भाववाचक कृदंत | क्रिया के भाव (अमूर्त संज्ञा) | -आई, -आवट, -आन, -अंत | पढ़ + आई = पढ़ाई, लिख + आवट = लिखावट, उठ + आन = उठान, रट + अंत = रटंत |
| क्रियाद्योतक कृदंत | क्रिया-विशेषण या क्रिया का रूप | -ता, -कर, -या | जा + ता = जाता हुआ, लिख + कर = लिखकर, खो + या = खोया हुआ |
2. तद्धित प्रत्यय (Taddhit Pratyay)
- परिभाषा:
वे प्रत्यय जो क्रिया की धातुओं को छोड़कर, अन्य शब्दों अर्थात् संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, या अव्यय के अंत में जुड़कर नए शब्दों का निर्माण करते हैं, तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। - तद्धित प्रत्यय से बने शब्दों को ‘तद्धितांत’ (Taddhitant) कहते हैं।
- पहचान की ट्रिक: ये प्रत्यय संज्ञा (जैसे – सोना, लोहा, समाज), विशेषण (जैसे – सुंदर, मीठा) या सर्वनाम (जैसे – अपना) के साथ लगते हैं, क्रिया के साथ नहीं।
तद्धित प्रत्यय के उपभेद:
| उपभेद | क्या बनाते हैं? | प्रत्यय | उदाहरण (शब्द + प्रत्यय = तद्धितांत शब्द) |
| कर्तृवाचक तद्धित | कर्ता या कार्य करने वाला | -आर, -इया, -एरा, -ची | सोना (संज्ञा) + आर = सोनार, लोहा + आर = लोहार, दुःख + इया = दुखिया, साँप + एरा = सँपेरा, मशाल + ची = मशालची |
| भाववाचक तद्धित | भाव (अमूर्त संज्ञा) | -आई, -आस, -पन, -पा, -ता | अच्छा (विशेषण) + आई = अच्छाई, मीठा + आस = मिठास, बच्चा + पन = बचपन, बूढ़ा + पा = बुढ़ापा, सुंदर + ता = सुंदरता |
| संबंधवाचक तद्धित | संबंध बताने वाले शब्द | -इक, -आल, -एरा | समाज + इक = सामाजिक, ससुर + आल = ससुराल, चाचा + एरा = चचेरा, मौसा + एरा = मौसेरा |
| ऊनतावाचक तद्धित | लघुता या छोटा रूप | -इया, -ओला, -ड़ी | लुटिया (लोटा से), डिबिया (डिब्बा से), खटोला (खाट से), पहाड़ी (पहाड़ से) |
| स्त्रीबोधक तद्धित | स्त्रीलिंग रूप | -इन, -आनी, -नी, -इया | नाग + इन = नागिन, देवर + आनी = देवरानी, शेर + नी = शेरनी, बेटा + इया = बिटिया |
| गुणवाचक तद्धित | गुणवाचक विशेषण | -आ, -ईला, -ईन, -ई | भूख + आ = भूखा, चमक + ईला = चमकीला, ग्राम + ईन = ग्रामीण, धन + ई = धनी |
| स्थानवाचक तद्धित | स्थान बताने वाले शब्द | -वाला, -इया, -ई | दिल्ली + वाला = दिल्लीवाला, मुंबई + इया = मुंबइया, पंजाब + ई = पंजाबी |
निष्कर्ष
प्रत्यय, शब्द-निर्माण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रचनात्मक माध्यम है। यह भाषा को नए शब्द देकर उसकी अभिव्यक्ति क्षमता को बढ़ाता है। कृत् प्रत्यय क्रियाओं से नए शब्द बनाते हैं, जबकि तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण से नए शब्दों की रचना करते हैं, जिससे भाषा का शब्द-भंडार निरंतर समृद्ध होता रहता है।
संधि (Joining of Letters)
परिभाषा:
‘संधि’ का शाब्दिक अर्थ है – मेल, मिलाप या समझौता।
व्याकरणिक परिभाषा:
दो निकटवर्ती वर्णों (sounds/letters) के परस्पर मेल से जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे संधि कहते हैं।
- सरल शब्दों में, जब दो शब्द पास-पास आते हैं, तो पहले शब्द की अंतिम ध्वनि और दूसरे शब्द की पहली ध्वनि आपस में मिलकर एक नई ध्वनि में बदल जाती है। इसी ध्वनि-परिवर्तन की प्रक्रिया को संधि कहते हैं।
- संधि विच्छेद: संधि द्वारा मिले हुए वर्णों को अलग-अलग करके, उन्हें फिर से पहली वाली स्थिति में ले जाने की प्रक्रिया को संधि-विच्छेद कहते हैं।
संधि और समास में अंतर:
- संधि: इसमें वर्णों/ध्वनियों का मेल होता है। (जैसे – हिम+आलय = हिमालय)
- समास: इसमें शब्दों/पदों का मेल होता है। (जैसे – राजा का कुमार = राजकुमार)
संधि के भेद (Types of Sandhi)
वर्णों के मेल के आधार पर, संधि के तीन (3) मुख्य भेद होते हैं:
- स्वर संधि (Vowel Sandhi)
- व्यंजन संधि (Consonant Sandhi)
- विसर्ग संधि (Visarga Sandhi)
1. स्वर संधि (Vowel Sandhi)
- परिभाषा: जब एक स्वर का दूसरे स्वर से मेल होता है, तो उससे होने वाले परिवर्तन को स्वर संधि कहते हैं।
- यह संधि का सबसे विस्तृत और महत्वपूर्ण भेद है।
स्वर संधि के पाँच उपभेद:
क) दीर्घ संधि (Long Vowel Sandhi)
- नियम: जब दो सजातीय (homogeneous) ह्रस्व या दीर्घ स्वर (अ/आ, इ/ई, उ/ऊ) पास-पास आते हैं, तो दोनों मिलकर उसी जाति का दीर्घ स्वर बन जाते हैं।
- अ + अ = आ (धर्म + अर्थ = धर्मार्थ)
- अ + आ = आ (हिम + आलय = हिमालय)
- इ + इ = ई (रवि + इंद्र = रवींद्र)
- ई + ई = ई (नदी + ईश = नदीश)
- उ + उ = ऊ (भानु + उदय = भानूदय)
ख) गुण संधि (Quality Vowel Sandhi)
- नियम: यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘इ’/’ई’ आए, तो दोनों मिलकर ‘ए’ (े) हो जाते हैं। यदि ‘उ’/’ऊ’ आए, तो दोनों मिलकर ‘ओ’ (ो) हो जाते हैं। और यदि ‘ऋ’ आए, तो ‘अर्’ (र्) हो जाता है।
- अ/आ + इ/ई → ए (नर + इंद्र = नरेंद्र; महा + ईश = महेश)
- अ/आ + उ/ऊ → ओ (सूर्य + उदय = सूर्योदय; महा + उत्सव = महोत्सव)
- अ/आ + ऋ → अर् (देव + ऋषि = देवर्षि; महा + ऋषि = महर्षि)
ग) वृद्धि संधि (Growth Vowel Sandhi)
- नियम: यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ए’/’ऐ’ आए, तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ (ै) हो जाते हैं। और यदि ‘ओ’/’औ’ आए, तो दोनों मिलकर ‘औ’ (ौ) हो जाते हैं।
- अ/आ + ए/ऐ → ऐ (एक + एक = एकैक; सदा + एव = सदैव)
- अ/आ + ओ/औ → औ (वन + औषधि = वनौषधि; महा + औषध = महौषध)
घ) यण संधि (Semi-Vowel Sandhi)
- नियम: यदि ‘इ’/’ई’, ‘उ’/’ऊ’ या ‘ऋ’ के बाद कोई भिन्न (दूसरा) स्वर आए, तो:
- ‘इ’/’ई’ का → ‘य्’ (आधा य) हो जाता है।
- ‘उ’/’ऊ’ का → ‘व्’ (आधा व) हो जाता है।
- ‘ऋ’ का → ‘र्’ (आधा र) हो जाता है।
- पहचान ट्रिक: इसमें ‘य’ या ‘व’ से पहले हमेशा आधा व्यंजन आता है।
- इ/ई + भिन्न स्वर → य् (प्रति + एक = प्रत्येक; नदी + अर्पण = नद्यर्पण)
- उ/ऊ + भिन्न स्वर → व् (सु + आगत = स्वागत; अनु + अय = अन्वय)
- ऋ + भिन्न स्वर → र् (पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा)
ङ) अयादि संधि (Glide Vowel Sandhi)
- नियम: यदि ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’, ‘औ’ के बाद कोई भिन्न स्वर आए, तो:
- ए → अय्
- ऐ → आय्
- ओ → अव्
- औ → आव्
- पहचान ट्रिक: इन शब्दों के बीच में ‘अय’, ‘आय’, ‘अव’, ‘आव’ की ध्वनि आती है।
- ने + अन = नयन (ए → अय्)
- नै + अक = नायक (ऐ → आय्)
- पो + अन = पवन (ओ → अव्)
- पौ + अक = पावक (औ → आव्)
22. व्यंजन संधि (Consonant Sandhi)
परिभाषा:
जब किसी व्यंजन का मेल किसी स्वर से या किसी अन्य व्यंजन से होता है, तो उससे जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं।
- मूल बात: व्यंजन संधि में परिवर्तन हमेशा व्यंजन वर्ण में ही होता है।
- मेल के प्रकार:
- व्यंजन + स्वर
- व्यंजन + व्यंजन
पहचान की सबसे पहली और सामान्य ट्रिक:
जब संधि-विच्छेद किया जाए, तो पहले शब्द का अंतिम वर्ण हमेशा एक हलंत ( ् ) लगा हुआ व्यंजन होगा।
उदाहरण: जगत् + ईश = जगदीश (यहाँ ‘जगत्’ का अंतिम वर्ण ‘त्’ हलंत के साथ है)।
व्यंजन संधि के प्रमुख नियम और उन्हें पहचानने की ट्रिक्स
व्यंजन संधि के नियम स्वर संधि की तरह सीधे नहीं हैं, लेकिन कुछ पैटर्न हैं जिन्हें पहचानकर इसे समझना आसान हो जाता है।
नियम 1: वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे में परिवर्तन
(किसी वर्ग के क्, च्, ट्, त्, प् का ग्, ज्, ड्, द्, ब् में बदलना)
- नियम: यदि किसी वर्ग के पहले व्यंजन (क्, च्, ट्, त्, प्) के बाद कोई स्वर, या वर्ग का तीसरा/चौथा व्यंजन, या अंतःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व) आए, तो पहला व्यंजन अपने ही वर्ग के तीसरे व्यंजन में बदल जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द के बीच में आपको ग्, ज्, ड्, द्, ब् (वर्ग के तीसरे अक्षर) दिखेंगे, जो अक्सर आधे रूप में या स्वर के साथ जुड़े होंगे। विच्छेद करने पर वह अपने वर्ग के पहले अक्षर (क्, च्, ट्, त्, प्) में बदल जाएगा।
- उदाहरण:
- ग् → दिक् + गज = दिग्गज
- ग् (स्वर के साथ) → दिक् + अंबर = दिगंबर
- ज् → अच् + अंत = अजंत
- ड् → षट् + आनन = षडानन
- द् → सत् + भावना = सद्भावना / जगत् + ईश = जगदीश
- ब् → अप् + ज = अब्ज
नियम 2: वर्ग के पहले वर्ण का पाँचवें में परिवर्तन
(किसी वर्ग के क्, च्, ट्, त्, प् का ङ्, ञ्, ण्, न्, म् में बदलना)
- नियम: यदि किसी वर्ग के पहले व्यंजन (क्, च्, ट्, त्, प्) के बाद कोई नासिक्य व्यंजन (न्, म्) आए, तो पहला व्यंजन अपने ही वर्ग के पाँचवें व्यंजन (पंचमाक्षर) में बदल जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द में दो नासिक्य व्यंजन या आधा पंचमाक्षर के साथ कोई और नासिक्य व्यंजन दिखेगा।
- उदाहरण:
- वाक् + मय = वाङ्मय
- षट् + मास = षण्मास
- उत् + नति = उन्नति
- जगत् + नाथ = जगन्नाथ
नियम 3: ‘त्’ संबंधी विशेष नियम (बहुत महत्वपूर्ण)
‘त्’ के बाद अलग-अलग व्यंजन आने पर वह बदल जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द के बीच में च्च, च्छ, ज्ज, ट्ट, ड्ड, ल्ल जैसे द्वित्व (doubled) या जुड़े हुए व्यंजन दिखेंगे।
| ‘त्’ के बाद | ‘त्’ का परिवर्तन | उदाहरण |
| च, छ | च् | उत् + चारण = उच्चारण / सत् + चरित्र = सच्चरित्र |
| ज, झ | ज् | सत् + जन = सज्जन / उत् + ज्वल = उज्ज्वल |
| ट, ठ | ट् | तत् + टीका = तट्टीका |
| ड, ढ | ड् | उत् + डयन = उड्डयन |
| ल | ल् | उत् + लास = उल्लास / तत् + लीन = तल्लीन |
| श | ‘त्’ का ‘च्’ और ‘श’ का ‘छ’ | उत् + श्वास = उच्छ्वास |
नियम 4: ‘म्’ संबंधी नियम
- नियम: यदि ‘म्’ के बाद ‘क’ से ‘भ’ तक कोई भी व्यंजन आए, तो ‘म्’ अनुस्वार (ं) में बदल जाता है या उसी वर्ग के पाँचवें वर्ण में बदल जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द के ऊपर बिंदी (अनुस्वार) दिखेगी, और विच्छेद करने पर वह बिंदी ‘म्’ (हलंत के साथ) में बदल जाएगी।
- उदाहरण:
- सम् + कल्प = संकल्प
- सम् + चय = संचय
- सम् + तोष = संतोष
- सम् + पूर्ण = संपूर्ण
- दूसरा नियम: यदि ‘म्’ के बाद य, र, ल, व, श, ष, स, ह या कोई दूसरा ‘म’ आए, तो ‘म्’ हमेशा अनुस्वार (ं) में ही बदलता है।
- सम् + योग = संयोग
- सम् + सार = संसार
- सम् + मान = सम्मान (यहाँ अनुस्वार नहीं होता, आधा ‘म’ जुड़ता है)
नियम 5: ‘छ’ संबंधी नियम
- नियम: यदि किसी ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ) या ‘आ’ के बाद ‘छ’ आए, तो ‘छ’ से पहले ‘च्’ (आधा च) जुड़ जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द में ‘च्छ’ दिखेगा, और विच्छेद करने पर ‘च्’ हट जाएगा।
- उदाहरण:
- स्व + छंद = स्वच्छंद
- परि + छेद = परिच्छेद
- अनु + छेद = अनुच्छेद
- आ + छादन = आच्छादन
नियम 6: ‘स’ का ‘ष’ में परिवर्तन
- नियम: यदि ‘स्’ से पहले ‘अ’/’आ’ से भिन्न कोई स्वर आए, तो ‘स्’ का ‘ष्’ हो जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द में ‘ष’ दिखेगा, और विच्छेद करने पर वह ‘स’ में बदल जाएगा।
- उदाहरण:
- वि + सम = विषम
- अभि + सेक = अभिषेक
- नि + सिद्ध = निषिद्ध
- सु + सुप्त = सुषुप्त
सारांश में ट्रिक्स
- विच्छेद करने पर पहले शब्द के अंत में हलंत ( ् ) आए।
- शब्द में ग्, ज्, ड्, द्, ब् हों, तो वे विच्छेद में अपने वर्ग के पहले अक्षर में बदल जाते हैं।
- शब्द में च्च, ज्ज, ल्ल, ट्ट जैसे दोहरे व्यंजन हों।
- शब्द के ऊपर अनुस्वार (ं) हो और विच्छेद करने पर वह ‘म्’ में बदल जाए।
- शब्द में ‘च्छ’ हो और विच्छेद करने पर ‘च्’ गायब हो जाए।
3. विसर्ग संधि (Visarga Sand-hi)
परिभाषा:
जब विसर्ग (ः) के बाद कोई स्वर या व्यंजन वर्ण आता है, तो विसर्ग में जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं।
- मूल बात: इसमें परिवर्तन हमेशा विसर्ग चिह्न (ः) में ही होता है।
- यह संधि मुख्य रूप से संस्कृत के तत्सम शब्दों में पाई जाती है।
पहचान की सबसे पहली और सामान्य ट्रिक:
जब संधि-विच्छेद किया जाए, तो पहले शब्द के अंत में हमेशा विसर्ग (ः) आएगा।
उदाहरण: मनः + हर = मनोहर (यहाँ ‘मनः’ के अंत में विसर्ग है)।
विसर्ग संधि के प्रमुख नियम और उन्हें पहचानने की ट्रिक्स
विसर्ग के बाद आने वाले वर्ण के आधार पर विसर्ग में कई तरह के परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों को पहचानना ही विसर्ग संधि को पहचानने की ट्रिक है।
नियम 1: विसर्ग का ‘ओ’ में परिवर्तन
- नियम: यदि विसर्ग (ः) से पहले ‘अ’ हो और बाद में भी ‘अ’ या किसी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण (सघोष व्यंजन), या य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण हो, तो विसर्ग (ः) का ‘ओ’ (ो) हो जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द के बीच में ‘ओ’ (ो) की मात्रा दिखाई देगी। जब आप उस शब्द का विच्छेद करेंगे, तो वह ‘ओ’ की मात्रा हटकर उसकी जगह पर विसर्ग (ः) लग जाएगा।
- लेकिन ध्यान रहे, यह नियम गुण संधि (‘अ’ + ‘उ’ = ओ) से अलग है। विच्छेद करने पर सार्थक शब्द बनने चाहिए।
- उदाहरण:
- मनः + हर = मनोहर ( मनोहर → मनः + हर )
- यशः + दा = यशोदा ( यशोदा → यशः + दा )
- तपः + बल = तपोबल ( तपोबल → तपः + बल )
- सरः + ज = सरोज ( सरोज → सरः + ज )
- मनः + रथ = मनोरथ
- अधः + गति = अधोगति
नियम 2: विसर्ग का ‘र्’ में परिवर्तन (रेफ ‘र्’ के रूप में)
- नियम: यदि विसर्ग (ः) से पहले ‘अ’/’आ’ को छोड़कर कोई दूसरा स्वर हो, और बाद में कोई स्वर, या वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण, या य, र, ल, व, ह हो, तो विसर्ग का ‘र्’ (आधा र) हो जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द के बीच में आपको ‘र्’ (रेफ के रूप में) या स्वर के साथ जुड़ा ‘र’ दिखाई देगा। विच्छेद करने पर वह ‘र’ हटकर उसकी जगह विसर्ग (ः) आ जाएगा।
- उदाहरण:
- निः + आशा = निराशा ( निराशा → निः + आशा )
- दुः + उपयोग = दुरुपयोग ( दुरुपयोग → दुः + उपयोग )
- निः + धन = निर्धन ( निर्धन → निः + धन )
- आशीः + वाद = आशीर्वाद ( आशीर्वाद → आशीः + वाद )
- दुः + जन = दुर्जन
नियम 3: विसर्ग का ‘श्’, ‘ष्’, ‘स्’ (आधे) में परिवर्तन
- नियम:
- यदि विसर्ग के बाद ‘च’ या ‘छ’ हो, तो विसर्ग ‘श्’ में बदल जाता है।
- यदि विसर्ग के बाद ‘क’, ‘ट’, ‘ठ’, ‘प’, ‘फ’ हो, तो विसर्ग ‘ष्’ में बदल जाता है।
- यदि विसर्ग के बाद ‘त’ या ‘थ’ या ‘स’ हो, तो विसर्ग ‘स्’ में बदल जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द के बीच में आपको आधा ‘श्’, ‘ष्’, या ‘स्’ दिखाई देगा। विच्छेद करने पर यह आधा वर्ण हटकर विसर्ग (ः) लग जाएगा।
- उदाहरण:
- आधा श् (श्):
- निः + चल = निश्चल
- दुः + चरित्र = दुश्चरित्र
- आधा ष् (ष्):
- निः + कपट = निष्कपट
- धनुः + टंकार = धनुष्टंकार
- निः + फल = निष्फल
- आधा स् (स्):
- नमः + ते = नमस्ते
- निः + संदेह = निस्संदेह
- दुः + साहस = दुस्साहस
- आधा श् (श्):
नियम 4: विसर्ग का लोप हो जाना (गायब हो जाना)
- नियम 1: यदि विसर्ग से पहले ‘अ’/’आ’ हो और बाद में कोई भिन्न स्वर हो, तो विसर्ग का लोप (गायब) हो जाता है।
- अतः + एव = अतएव (विसर्ग हट गया)
- नियम 2: यदि विसर्ग के बाद ‘र’ हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है और उससे पहले का ह्रस्व स्वर (इ, उ) दीर्घ (ई, ऊ) हो जाता है।
- पहचान की ट्रिक: शब्द में ‘नी’ या ‘दू’ के बाद ‘र’ दिखेगा। विच्छेद करने पर ‘नी’/’दू’ बदलकर ‘निः’/’दुः’ हो जाएगा।
- उदाहरण:
- निः + रोग = नीरोग
- निः + रस = नीरस
- दुः + राज = दूराज
नियम 5: विसर्ग का अपरिवर्तित रहना
- नियम: यदि विसर्ग से पहले ‘अ’ हो और बाद में ‘क’ या ‘प’ हो, तो विसर्ग में प्रायः कोई परिवर्तन नहीं होता।
- उदाहरण:
- प्रातः + काल = प्रातःकाल
- अधः + पतन = अधःपतन
- अंतः + करण = अंतःकरण
सारांश में ट्रिक्स
- शब्द में ‘ओ’ की मात्रा दिखे → उसे विसर्ग (ः) से बदलकर देखें (मनोहर = मनः + हर)।
- शब्द में आधा ‘र्’ (रेफ) दिखे → उसे हटाकर विसर्ग लगाएँ (निर्धन = निः + धन)।
- शब्द में आधा ‘श्’, ‘ष्’, ‘स्’ दिखे → उसे हटाकर विसर्ग लगाएँ (नमस्ते = नमः + ते)।
- शब्द की शुरुआत ‘नी’ या ‘दू’ से हो और उसके बाद ‘र’ आए → ‘नी’/’दू’ को ‘निः’/’दुः’ में बदलें (नीरोग = निः + रोग)।
निष्कर्ष
संधि, शब्दों की रचना को समझने, वर्तनी की शुद्धता को बनाए रखने, और भाषा के प्रवाह को सुंदर बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह दिखाती है कि कैसे ध्वनियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और नए रूप ग्रहण करती हैं।
समास (Samas – Compounding of Words)
हिंदी व्याकरण में समास एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अपनी भाषा को संक्षिप्त (छोटा), प्रभावशाली और सुंदर बनाते हैं।
यहाँ समास का विस्तृत और सरल स्पष्टीकरण दिया गया है:
1. समास क्या है? (Definition & Meaning)
‘समास’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है— ‘संक्षेप’ (Shortening) या ‘मिलाना’।
परिभाषा:
जब दो या दो से अधिक शब्दों (पदों) को मिलाकर एक नया सार्थक शब्द बनाया जाता है, तो इस प्रक्रिया को समास कहते हैं।
- उदाहरण:
- ‘राजा का कुमार’ (तीन शब्द) → ‘राजकुमार’ (एक शब्द – समास)
- ‘रसोई के लिए घर’ → ‘रसोईघर’
2. महत्वपूर्ण शब्दावली (Key Terminology)
समास को समझने के लिए इन चार शब्दों को समझना आवश्यक है:
- समस्तपद (Samastpad): समास की प्रक्रिया से बने नए शब्द को ‘समस्तपद’ या ‘सामासिक शब्द’ कहते हैं।
- (उदा: राजपुत्र, गंगाजल)
- समास-विग्रह (Samas-Vigrah): समस्तपद को तोड़कर वापस उसके मूल रूप में विस्तार से लिखने की क्रिया को ‘समास-विग्रह’ कहते हैं।
- (उदा: राजपुत्र → राजा का पुत्र)
- पूर्वपद (Purvapad): समस्तपद के पहले शब्द को ‘पूर्वपद’ कहते हैं।
- उत्तरपद (Uttarpad): समस्तपद के दूसरे (बाद वाले) शब्द को ‘उत्तरपद’ कहते हैं।
- उदाहरण: गंगाजल (समस्तपद)
- गंगा (पूर्वपद)
- जल (उत्तरपद)
- विग्रह: गंगा का जल
- उदाहरण: गंगाजल (समस्तपद)
3. संधि और समास में अंतर (Difference between Sandhi and Samas)
यह एक सामान्य उलझन है, इसे स्पष्ट करना जरुरी है:
- संधि (Sandhi): इसमें दो वर्णों (ध्वनियों) का मेल होता है और ध्वनि में परिवर्तन आता है।
- उदा: विद्या + आलय = विद्यालय (आ + आ = आ)
- समास (Samas): इसमें दो शब्दों का मेल होता है और उनके बीच के विभक्ति चिह्नों या योजक शब्दों का लोप हो जाता है (हटा दिए जाते हैं)।
- उदा: माता और पिता = माता-पिता (‘और’ हट गया)
4. समास के भेद (Types of Samas)
मुख्य रूप से पदों की प्रधानता (कौन सा शब्द मुख्य है) के आधार पर समास के 6 भेद माने जाते हैं:
- अव्ययीभाव समास (Avyayibhav)
- तत्पुरुष समास (Tatpurush)
- कर्मधारय समास (Karmadharaya)
- द्विगु समास (Dvigu)
- द्वंद्व समास (Dvandva)
- बहुव्रीहि समास (Bahuvrihi)
5. भेदों का विस्तृत वर्णन (Detailed Explanation of Types)
1. अव्ययीभाव समास (Avyayibhav Samas)
- पहचान: इसका पहला पद (पूर्वपद) प्रधान होता है और वह एक अव्यय (उपसर्ग) होता है। पूरा शब्द भी अव्यय (जिसका रूप नहीं बदलता) बन जाता है।
- ट्रिक: शब्द की शुरुआत अक्सर इन उपसर्गों से होती है: अनु, आ, प्रति, भर, यथा, बे, हर आदि। कभी-कभी एक ही शब्द दो बार आता है (पुनरुक्ति)।
- उदाहरण:
- यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
- प्रतिदिन = प्रत्येक दिन / हर दिन
- आजन्म = जन्म से लेकर
- भरपेट = पेट भरकर
- रातोंरात (पुनरुक्ति) = रात ही रात में
2. तत्पुरुष समास (Tatpurush Samas)
- पहचान: इसका दूसरा पद (उत्तरपद) प्रधान होता है। दोनों पदों के बीच कारक (Case) के चिह्न (जैसे- को, से, के लिए, का, में आदि) छुपे होते हैं, जो विग्रह करने पर दिखाई देते हैं।
तत्पुरुष समास को कारक चिह्नों के आधार पर 6 उप-भेदों में बाँटा जाता है:
- कर्म तत्पुरुष (चिह्न ‘को’ का लोप):
- गगनचुंबी = गगन को चूमने वाला
- यशप्राप्त = यश को प्राप्त
- करण तत्पुरुष (चिह्न ‘से’/’के द्वारा’ का लोप):
- हस्तलिखित = हाथ से लिखित
- तुलसीकृत = तुलसी के द्वारा कृत (रचित)
- संप्रदान तत्पुरुष (चिह्न ‘के लिए’ का लोप):
- रसोईघर = रसोई के लिए घर
- पाठशाला = पाठ के लिए शाला
- अपादान तत्पुरुष (चिह्न ‘से’ – अलग होने के अर्थ में):
- धनहीन = धन से हीन
- रोगमुक्त = रोग से मुक्त
- संबंध तत्पुरुष (चिह्न ‘का/की/के’ का लोप):
- राजपुत्र = राजा का पुत्र
- देशरक्षा = देश की रक्षा
- अधिकरण तत्पुरुष (चिह्न ‘में’/’पर’ का लोप):
- नगरवास = नगर में वास
- आपबीती = आप (स्वयं) पर बीती
(नोट: एक ‘नञ् तत्पुरुष’ भी होता है जहाँ पहला पद नकारात्मक होता है। उदा: अधर्म = न धर्म, अन्याय = न न्याय)
3. कर्मधारय समास (Karmadharaya Samas)
- पहचान: इसका भी उत्तरपद प्रधान होता है (यह तत्पुरुष का ही एक रूप माना जाता है)।
इसमें दोनों पदों के बीच ‘विशेषण-विशेष्य’ (Adjective-Noun) या ‘उपमान-उपमेय’ (Comparison) का संबंध होता है। - ट्रिक: विग्रह करने पर बीच में ‘है जो’ या ‘के समान’ शब्द आते हैं।
- उदाहरण:
- नीलकमल = नीला है जो कमल (विशेषण-विशेष्य)
- महात्मा = महान है जो आत्मा
- चरणकमल = कमल के समान चरण (तुलना/उपमा)
- चंद्रमुख = चंद्रमा के समान मुख
4. द्विगु समास (Dvigu Samas)
- पहचान: यह कर्मधारय का ही एक प्रकार है, लेकिन इसका पहला पद ‘संख्यावाचक’ (Number) होता है। यह किसी समूह या समाहार का बोध कराता है।
- उदाहरण:
- चौराहा = चार राहों का समूह
- नवरात्र = नौ रात्रियों का समूह
- त्रिलोक = तीन लोकों का समाहार
- शताब्दी = सौ अब्दों (वर्षों) का समूह
5. द्वंद्व समास (Dvandva Samas)
- पहचान: इसमें दोनों पद प्रधान होते हैं। दोनों शब्द एक-दूसरे के विलोम (Ulta) या पूरक होते हैं।
- ट्रिक: दोनों शब्दों के बीच अक्सर योजक चिह्न (-) लगा होता है। विग्रह करने पर ‘और’, ‘या’, ‘एवं’ लगता है।
- उदाहरण:
- माता-पिता = माता और पिता
- सुख-दुख = सुख या दुख
- दाल-रोटी = दाल और रोटी
- रात-दिन = रात और दिन
6. बहुव्रीहि समास (Bahuvrihi Samas)
- पहचान: इसमें कोई भी पद प्रधान नहीं होता। दोनों पद मिलकर किसी तीसरे विशेष अर्थ (Third Meaning) की ओर संकेत करते हैं। यह अक्सर देवताओं या विशिष्ट पौराणिक पात्रों के नाम होते हैं।
- ट्रिक: विग्रह करते समय अंत में ‘है जिसका’, ‘है जिसके’ या ‘वाला’ आता है और किसी विशेष व्यक्ति का नाम निकलता है।
- उदाहरण:
- दशानन = दस हैं आनन (मुख) जिसके अर्थात् रावण।
- नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव।
- लंबोदर = लंबा है उदर (पेट) जिसका अर्थात् गणेश।
- पीतांबर = पीला है अंबर (वस्त्र) जिसका अर्थात् विष्णु/कृष्ण।
6. कुछ सामान्य उलझनें (Common Confusions)
परीक्षा में अक्सर ऐसे शब्द आते हैं जो दो समासों में फिट हो सकते हैं। यहाँ ‘समास-विग्रह’ और ‘संदर्भ’ महत्वपूर्ण होता है।
1. कर्मधारय और बहुव्रीहि में अंतर:
- शब्द: नीलकंठ
- यदि विग्रह है: ‘नीला है जो कंठ’ (सिर्फ गले की विशेषता) → कर्मधारय।
- यदि विग्रह है: ‘नीला है कंठ जिसका (शिव)’ (तीसरा अर्थ) → बहुव्रीहि।
- टिप: यदि विकल्प में दोनों हों और शब्द किसी प्रसिद्ध व्यक्ति/देवता का नाम हो, तो ‘बहुव्रीहि’ को प्राथमिकता दें।
2. द्विगु और बहुव्रीहि में अंतर:
- शब्द: त्रिनेत्र
- यदि विग्रह है: ‘तीन नेत्रों का समूह’ → द्विगु (संख्या)।
- यदि विग्रह है: ‘तीन हैं नेत्र जिसके (शिव)’ → बहुव्रीहि (तीसरा अर्थ)।
- यहाँ भी बहुव्रीहि को प्राथमिकता दी जाती है यदि विशेष अर्थ निकल रहा हो।
संक्षेप में याद रखने का तरीका (Summary)
- अव्ययीभाव: पहला पद उपसर्ग/अव्यय (यथा, प्रति, आ)।
- तत्पुरुष: कारक चिह्नों का लोप (का, की, से, में)।
- कर्मधारय: विशेषण-विशेष्य या तुलना (है जो, के समान)।
- द्विगु: पहला पद संख्या, समूह का बोध।
- द्वंद्व: दोनों पद प्रधान, बीच में ‘और’/’या’ (जोड़ीदार शब्द)।
- बहुव्रीहि: तीसरा विशेष अर्थ (ज्यादातर देवताओं के नाम)।
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समास पहचानने की सरल ट्रिक्स
हर समास की एक खास पहचान होती है, जिसे आप कीवर्ड (Keyword) की तरह याद रख सकते हैं:
1. अव्ययीभाव समास (Avyayibhav)
- मुख्य पहचान: पहला पद प्रधान (मुख्य) होता है और उपसर्ग होता है।
- ट्रिक: शब्द की शुरुआत में आपको अक्सर ‘यथा’, ‘प्रति’, ‘आ’, ‘भर’, ‘अनु’, ‘बे’, ‘हर’ जैसे उपसर्ग मिलेंगे। या फिर एक ही शब्द दो बार आएगा।
- उदाहरण:
- यथाशक्ति → (शुरू में ‘यथा’)
- प्रतिदिन → (शुरू में ‘प्रति’)
- आजन्म → (शुरू में ‘आ’)
- हाथोंहाथ → (शब्द का दोहराव)
- उदाहरण:
2. तत्पुरुष समास (Tatpurush)
- मुख्य पहचान: दूसरा पद प्रधान होता है और बीच में कारक चिह्न छुपा होता है।
- ट्रिक: शब्द को तोड़कर (विग्रह करके) देखें। अगर बीच में का, की, के, को, से, के लिए, में, पर जैसे शब्द निकलकर आते हैं, तो वह तत्पुरुष समास है।
- उदाहरण:
- राजपुत्र → राजा का पुत्र ( ‘का’ निकला)
- रसोईघर → रसोई के लिए घर (‘के लिए’ निकला)
- आपबीती → आप पर बीती (‘पर’ निकला)
- उदाहरण:
3. कर्मधारय समास (Karmadharaya)
- मुख्य पहचान: एक पद विशेषता (Quality) बताता है और दूसरा पद वस्तु/व्यक्ति होता है। यानी, विशेषण-विशेष्य का संबंध।
- ट्रिक: शब्द को “है जो” या “के समान” लगाकर तोड़ें। अगर यह फिट बैठता है, तो वह कर्मधारय है।
- उदाहरण:
- नीलकमल → नीला है जो कमल
- महात्मा → महान है जो आत्मा
- चरणकमल → कमल के समान चरण (यहाँ तुलना हो रही है)
- उदाहरण:
4. द्विगु समास (Dvigu)
- मुख्य पहचान: पहला पद संख्या (Number) होता है। यह सबसे आसान है!
- ट्रिक: बस देखें कि क्या शब्द का पहला हिस्सा कोई गिनती है। यह हमेशा एक समूह (Group) का बोध कराएगा।
- उदाहरण:
- चौराहा → चार राहों का समूह
- नवरात्र → नौ रात्रियों का समूह
- त्रिभुज → तीन भुजाओं का समूह
- उदाहरण:
5. द्वंद्व समास (Dvandva)
- मुख्य पहचान: दोनों पद प्रधान होते हैं।
- ट्रिक: ये अक्सर जोड़ी वाले शब्द होते हैं, जैसे- विलोम शब्द, रिश्ते, या साथ आने वाली चीजें। इनके बीच में योजक चिह्न (-) लगा होता है और विग्रह करने पर ‘और’, ‘या’ आता है।
- उदाहरण:
- माता-पिता → माता और पिता
- सुख-दुख → सुख या दुख
- दाल-रोटी → दाल और रोटी
- उदाहरण:
6. बहुव्रीहि समास (Bahuvrihi)
- मुख्य पहचान: कोई भी पद प्रधान नहीं होता, बल्कि दोनों मिलकर किसी तीसरे (V.I.P.) अर्थ की ओर इशारा करते हैं।
- ट्रिक: इसका अर्थ हमेशा विशेष होता है (अक्सर भगवानों या पौराणिक पात्रों के नाम)। विग्रह करने पर अंत में “जिसका”, “जिसके”, “जिसकी” या “वाला” आता है।
- उदाहरण:
- दशानन → दस हैं मुख जिसके (अर्थात् → रावण)
- नीलकंठ → नीला है कंठ जिसका (अर्थात् → शिव)
- लंबोदर → लंबा है उदर (पेट) जिसका (अर्थात् → गणेश)
- उदाहरण:
अनेकार्थी शब्द (Polysemous Words)
हिन्दी भाषा की समृद्धि का एक और प्रमाण अनेकार्थी शब्द हैं। ये शब्द भाषा को अधिक गूढ़, रोचक और काव्यात्मक बनाते हैं। इन्हें समझना भाषा पर अच्छी पकड़ बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है।
1. अनेकार्थी शब्द क्या हैं? (Definition & Meaning)
‘अनेकार्थी’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: अनेक + अर्थी।
- अनेक का अर्थ है— एक से अधिक (Many)।
- अर्थी का अर्थ है— अर्थ रखने वाला (Meaning-holder)।
परिभाषा:
जब कोई एक ही शब्द, प्रसंग (Context) के अनुसार अलग-अलग स्थितियों में भिन्न-भिन्न (अलग-अलग) अर्थ देता है, तो उसे अनेकार्थी शब्द कहते हैं।
- उदाहरण:
- शब्द: हार
- अर्थ 1: “खेल में उसकी हार हो गई।” (यहाँ ‘हार’ का मतलब पराजय/Defeat है)।
- अर्थ 2: “रानी ने मोतियों का हार पहना था।” (यहाँ ‘हार’ का मतलब गले में पहनने वाली माला/Necklace है)।
- शब्द: हार
देखिये, शब्द एक ही है (‘हार’), लेकिन वाक्य के अनुसार उसका अर्थ पूरी तरह बदल गया। यही अनेकार्थी शब्द की विशेषता है।
2. महत्वपूर्ण अंतर (Important Differences)
छात्र अक्सर अनेकार्थी और पर्यायवाची शब्दों में भ्रमित हो जाते हैं। इसे समझना बहुत आसान है:
- पर्यायवाची शब्द (Synonyms):
- अनेक शब्द, एक अर्थ
- (जैसे: सूर्य, रवि, दिनकर, भास्कर – इन सभी शब्दों का एक ही अर्थ है: सूरज)।
- अनेकार्थी शब्द (Polysemous Words):
- एक शब्द, अनेक अर्थ
- (जैसे: कर – इसके अर्थ हैं: हाथ, टैक्स, सूँड़)।
3. अनेकार्थी शब्दों की सूची (List of Polysemous Words)
यहाँ कुछ सबसे सामान्य और महत्वपूर्ण अनेकार्थी शब्दों की सूची उनके विभिन्न अर्थों और वाक्यों में प्रयोग के साथ दी गई है:
अ, आ
- अंबर:
- आकाश (आकाश में तारे चमक रहे हैं।)
- वस्त्र/कपड़ा (भगवान विष्णु पीताम्बर धारण करते हैं।)
- कपास (इस क्षेत्र में अंबर की खेती होती है।)
- अक्षर:
- वर्ण (हिन्दी में 52 अक्षर होते हैं।)
- जिसका क्षर/नाश न हो (ब्रह्म, ईश्वर) (अक्षर अविनाशी है।)
- अर्थ:
- मतलब/मायने (आपकी बात का क्या अर्थ है?)
- धन/संपत्ति (अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है।)
- हेतु/लिए (वह धर्मार्थ काम करता है।)
क
- कर:
- हाथ (हमें अपने कर कमलों से दान देना चाहिए।)
- टैक्स (सरकार को समय पर कर चुकाना चाहिए।)
- हाथी की सूँड़ (हाथी अपनी कर से पानी पीता है।)
- कनक:
- सोना (Gold) (कनक के आभूषण बहुत महँगे हैं।)
- धतूरा (Poisonous plant) (कनक खाने से इंसान पागल हो जाता है।)
- गेहूँ (किसान कनक की फसल काट रहा है।)
- काल:
- समय (काल किसी के लिए नहीं रुकता।)
- मृत्यु/यमराज (उसका काल आ गया था।)
ग, घ
- गो:
- गाय (गो एक पालतू पशु है।)
- इंद्रिय (हमें अपनी गो पर नियंत्रण रखना चाहिए।)
- पृथ्वी (गो पर जीवन संभव है।)
- घट:
- घड़ा (कुम्हार घट बना रहा है।)
- शरीर (घट-घट में ईश्वर का वास है।)
- कम होना (कीमतें घट गई हैं।)
त, प, फ
- तीर:
- बाण (अर्जुन ने मछली की आँख पर तीर मारा।)
- नदी का किनारा/तट (नाव नदी के तीर पर लगी थी।)
- पत्र:
- चिट्ठी/खत (मैंने पिताजी को पत्र लिखा।)
- पत्ता (Leaf) (पेड़ से पत्र गिर रहे हैं।)
- फल:
- खाने वाला फल (Fruit) (सेब एक मीठा फल है।)
- परिणाम/नतीजा (आपको अपने कर्मों का फल अवश्य मिलेगा।)
- भाले की नोंक (शत्रु के सीने में भाले का फल घुस गया।)
व, ह
- वर:
- दूल्हा (वर-वधू को आशीर्वाद दीजिए।)
- वरदान (ऋषि ने राजा को पुत्र का वर दिया।)
- श्रेष्ठ (वह हमारे कुल के वर पुरुष हैं।)
- हरि: (यह सबसे प्रसिद्ध अनेकार्थी शब्दों में से एक है)
- विष्णु (हरि की कृपा से सब संभव है।)
- बंदर (हरि पेड़ पर उछल-कूद कर रहा था।)
- सिंह (शेर) (वन में हरि दहाड़ रहा था।)
- सर्प (हरि बिल में घुस गया।)
4. पहचानने और याद करने की ट्रिक्स
अनेकार्थी शब्दों को पहचानने का केवल एक ही अचूक तरीका है: वाक्य का प्रसंग (Context)।
- वाक्य ही राजा है (Context is King): किसी शब्द का अर्थ क्या है, यह हमेशा उसे वाक्य में कैसे प्रयोग किया गया है, इसी से पता चलता है। शब्द को अकेले देखकर उसका अर्थ तय नहीं कर सकते।
- “मुझे सोने का हार चाहिए।” (यहाँ सोना = Gold)
- “मुझे अब सोना है।” (यहाँ सोना = Sleep)
- अधिक पढ़ें (Read More): जितना अधिक आप पढ़ेंगे (कहानियाँ, समाचार पत्र, कविताएँ), उतने ही अधिक अनेकार्थी शब्द आपको उनके सही प्रसंग में मिलेंगे और वे अपने आप याद हो जाएँगे।
- खुद वाक्य बनाएँ (Make Your Own Sentences): जब भी कोई नया अनेकार्थी शब्द सीखें, तो उसके सभी अर्थों के लिए एक-एक वाक्य बनाने का प्रयास करें। इससे वह शब्द हमेशा के लिए याद हो जाएगा।
- अंक – गोद, संख्या, नाटक का अध्याय
- अंबर – आकाश, वस्त्र, कपास
- अक्षर – वर्ण, ईश्वर, अविनाशी
- अर्थ – मतलब, धन, कारण, लिए
- आम – एक फल, साधारण, सामान्य
- अलि – भौंरा, सखी, बिच्छू
- उत्तर – जवाब, एक दिशा, बाद का
- कर – हाथ, टैक्स, किरण, हाथी की सूँड़
- काल – समय, मृत्यु, यमराज
- कनक – सोना, धतूरा, गेहूँ
- कर्ण – कान, कुंती का पुत्र (कर्ण)
- काम – कार्य, इच्छा, कामदेव
- कुशल – खैरियत, निपुण, चतुर
- कोटि – करोड़, श्रेणी, धनुष का सिरा
- खग – पक्षी, तारा, बाण
- गति – चाल, हालत (दशा), मोक्ष
- गुरु – शिक्षक, भारी, बड़ा, श्रेष्ठ
- गो – गाय, इंद्रिय, पृथ्वी, वाणी, किरण
- घन – बादल, घना, हथौड़ा
- घट – घड़ा, शरीर, कम होना
- चपला – बिजली, लक्ष्मी, चंचल स्त्री
- चीर – वस्त्र, पट्टी, चीरना
- जलज – कमल, मोती, शंख, मछली
- जीवन – ज़िन्दगी, पानी, प्राण
- जाल – फँसाने का यंत्र, बुनावट, माया
- तीर – बाण, नदी का किनारा (तट)
- ताल – तालाब, संगीत की लय, ताड़ का पेड़
- दंड – सज़ा, डंडा, व्यायाम का एक प्रकार
- दल – समूह, पत्ता, पक्ष
- द्विज – ब्राह्मण, पक्षी, दाँत, चंद्रमा
- धन – संपत्ति, जोड़ का चिह्न (+)
- नाग – साँप, हाथी, एक पर्वत
- नग – पर्वत, रत्न, वृक्ष
- पद – पैर, ओहदा, कविता का चरण
- पत्र – पत्ता, चिट्ठी, पंख
- पय – दूध, पानी, अमृत
- फल – खाने वाला फल, परिणाम, भाले की नोक
- बल – शक्ति, सेना, रस्सी की ऐंठन
- मधु – शहद, शराब, वसंत ऋतु
- मान – इज़्ज़त, अभिमान, नाप-तौल
- मित्र – दोस्त, सूर्य
- मुद्रा – सिक्का, मोहर, अंगूठी, मुख का भाव
- मूल – जड़, मुख्य, पूँजी
- राग – प्रेम, गाने की लय (धुन)
- रस – स्वाद, फलों का निचोड़, आनंद
- लक्ष्य – निशाना, उद्देश्य
- वर्ण – अक्षर, रंग, जाति
- वर – दूल्हा, वरदान, श्रेष्ठ
- विधि – कानून, तरीका, भाग्य, ब्रह्मा
- हरि – विष्णु, बंदर, सिंह, सर्प, मेंढक
- पानी – जल, चमक (मोती की), इज़्ज़त (सम्मान)
- पतंग – सूर्य, पक्षी, उड़ाई जाने वाली पतंग, कीड़ा
- पट – वस्त्र, परदा, दरवाज़ा (किवाड़)
- पयोधर – बादल, स्तन, पर्वत
- पृष्ठ – पीठ, किताब का पन्ना, सतह
- प्रकृति – स्वभाव, कुदरत (Nature), मूल अवस्था
- प्रभाव – असर, महिमा, सामर्थ्य
- पर – पंख, ऊपर, लेकिन, बाद का
- पूर्व – पहले, एक दिशा
- पेशी – तारीख (सुनवाई की), मांस का टुकड़ा
- बंधन – कैद, रिश्ता, बाँध
- भाग – हिस्सा, भाग्य, दौड़ना
- भेद – रहस्य, अंतर, प्रकार
- मत – राय (विचार), वोट, नहीं (निषेध)
- माधव – कृष्ण/विष्णु, वसंत ऋतु, शहद
- मानना – आदर करना, स्वीकार करना, रूठना
- योग – जोड़, ध्यान, उपाय, युक्ति
- रक्त – खून, लाल रंग, केसर
- राशि – ढेर, ज्योतिष की राशियाँ (जैसे- मेष, वृष)
- लक्ष्य – निशाना, उद्देश्य
- लहर – तरंग, उमंग, झोंका
- वन – जंगल, जल
- विग्रह – लड़ाई, देवता की मूर्ति, समास को अलग करना
- विषम – जो सम न हो, बहुत कठिन, असमान
- शिखा – चोटी, आग की लौ
- शिव – महादेव, कल्याणकारी, मंगल
- शून्य – आकाश, अभाव, ईश्वर (निर्गुण), बिंदु
- श्री – लक्ष्मी, शोभा, संपत्ति, कांति, ‘जी’ के अर्थ में
- संधि – मेल (जोड़), युग, सेंध
- सारंग – मोर, सर्प, बादल, हिरण, दीपक, स्त्री, कमल
- सुधा – अमृत, पानी, चूना
- सुरभि – सुगंध, गाय, पृथ्वी, वसंत ऋतु
- स्नेह – प्रेम, तेल, चिकनाई
- हंस – एक पक्षी, सूर्य, आत्मा, योगी
- हस्ती – हाथी, अस्तित्व (हस्ती मिट गई)
- हीन – रहित, तुच्छ (नीच), कम
- क्षेत्र – खेत, शरीर, तीर्थ स्थान, ज्यामिति की आकृति
- अधर – होंठ, आकाश (अंतरिक्ष), नीचा
- अपेक्षा – इच्छा, आवश्यकता, तुलना में (in comparison to)
- अरुण – लाल रंग, सूर्य का सारथी, सूर्य
- गुण – विशेषता, रस्सी, धनुष की डोरी
- ग्रहण – लेना, सूर्य/चंद्र ग्रहण
- गिरा – वाणी, गिर पड़ना (क्रिया)
- चक्र – पहिया, घेरा, एक अस्त्र (सुदर्शन चक्र)
- जीवन – ज़िन्दगी, पानी, प्राणवायु
- ठाकुर – देवता, स्वामी, क्षत्रिय जाति
- ढाल – रक्षक अस्त्र, उतार (ढलान)
- तारा – नक्षत्र, आँख की पुतली
- धात्री – आँवला, उपमाता (दाई), पृथ्वी
- निशाचर – राक्षस, उल्लू, चोर
वर्तनी / शब्द शुद्धि (Vartani / Shabd Shuddhi)
हिन्दी भाषा में वर्तनी (Spelling) का बहुत महत्व है। हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है, इसका सबसे बड़ा नियम है— “जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है।”
यदि हमारा उच्चारण (Pronunciation) अशुद्ध होगा, तो हमारी वर्तनी भी अशुद्ध (गलत) हो जाएगी। शब्दों को उनके मानक और सही रूप में लिखने की प्रक्रिया को ही ‘शब्द-शुद्धि’ या ‘वर्तनी-शुद्धि’ कहते हैं।
1. वर्तनी में गलतियां क्यों होती हैं? (Causes of Errors)
वर्तनी अशुद्ध होने के मुख्य कारण ये हैं:
- अशुद्ध उच्चारण: (सबसे बड़ा कारण)। जैसे- ‘आशीर्वाद’ को ‘आशिरवाद’ बोलना।
- मात्राओं का ज्ञान न होना: ‘इ’ (ि) और ‘ई’ (ी) या ‘उ’ (ु) और ‘ऊ’ (ू) में अंतर न पता होना।
- क्षेत्रीय प्रभाव: स्थानीय बोली का असर लिखने पर पड़ना। (जैसे- कुछ क्षेत्रों में ‘स्कूल’ को ‘इस्कूल’ बोलते/लिखते हैं)।
- व्याकरण की जानकारी की कमी: संधि और समास के नियमों का ज्ञान न होना।
2. अशुद्धियों के प्रकार और सुधारने के नियम (Types of Errors & Tricks)
आइए, मुख्य प्रकार की अशुद्धियों और उन्हें सुधारने की Tricks को समझते हैं:
प्रकार 1: ‘इ/ई’ और ‘उ/ऊ’ की गलतियाँ (Swara Errors)
लोग अक्सर छोटी और बड़ी मात्रा में गलती करते हैं।
- नियम/ट्रिक (स्त्रीलिंग शब्द): अधिकतर स्त्रीलिंग शब्द (feminine words) बड़ी ‘ई’ या बड़ी ‘ऊ’ की मात्रा पर खत्म होते हैं।
- जैसे: पत्नी, नारी, देवी, श्रीमती, वधू, बहू।
- (अशुद्ध: श्रीमति, बधु ❌ | शुद्ध: श्रीमती, वधू ✅)
- महत्वपूर्ण उदाहरण:
| अशुद्ध (गलत) | शुद्ध (सही) | कारण/टिप्पणी |
| रचीयता | रचयिता | ‘य’ पर छोटी मात्रा आती है। |
| कवित्री | कवयित्री | यह परीक्षा में बहुत पूछा जाता है। |
| दिपावली | दीपावली | दीप + अवली (दीपों की पंक्ति)। |
| निरोग | नीरोग | नि: + रोग (संधि का नियम, ‘न’ बड़ा हो जाता है)। |
| प्रभू | प्रभु | भगवान के लिए छोटी मात्रा। |
| गुरु (बड़ा ‘रू’) | गुरु (छोटा ‘रु’) | ‘र’ में ‘उ’ की मात्रा (रु) बिना गांठ की होती है। |
प्रकार 2: ‘रेफ’ ( र् ) और ‘पदेन’ ( ्र ) की गलतियाँ (‘R’ sound)
यह सबसे ज्यादा भ्रमित करने वाला हिस्सा है।
- ट्रिक (रेफ का नियम): “जहाँ बोले, उसके अगले पर बैठे।”
जब ‘र्’ (आधा र) की आवाज़ आए, तो उसे उस वर्ण के ठीक बाद वाले अक्षर के ऊपर लगाया जाता है जिसके बाद उसका उच्चारण हुआ हो।- उदा: आशीर्वाद = आ + शी + र् + वा + द।
(‘र्’ की आवाज़ ‘शी’ के बाद आई, इसलिए वह ‘वा’ के ऊपर बैठेगा)।- अशुद्ध: आशिर्वाद (यह गलत है) ❌
- शुद्ध: आशीर्वाद ✅
- उदा: आशीर्वाद = आ + शी + र् + वा + द।
- महत्वपूर्ण उदाहरण:
| अशुद्ध (गलत) | शुद्ध (सही) | टिप्पणी |
| आर्शिवाद | आशीर्वाद | ट्रिक याद रखें (शी के बाद बोला, व पर लगा)। |
| अन्र्तगत | अंतर्गत | त के बाद र् बोला, ग पर लगेगा। |
| पुनर्जन्म | पुनर्जन्म | न के बाद र् बोला, ज पर लगेगा। |
प्रकार 3: संयुक्त अक्षरों की गलतियाँ (Half Letter Errors)
कुछ शब्दों में यह भ्रम होता है कि कौन सा अक्षर आधा है और कौन सा पूरा।
- ट्रिक: शब्द को धीमी गति से सही उच्चारण के साथ बोलें।
- उज्ज्वल: (उत + ज्वल)। इसमें दो ‘ज’ आते हैं और दोनों आधे होते हैं।
- महत्वपूर्ण उदाहरण:
| अशुद्ध (गलत) | शुद्ध (सही) | टिप्पणी |
| उज्जवल / उज्वल | उज्ज्वल | दोनों ‘ज्’ आधे होंगे। |
| जोत्सना | ज्योत्स्ना | आधा ‘त्’ और आधा ‘स्’ आएगा। |
| सन्यासी | संन्यासी | बिंदु (.) और आधा ‘न्’ दोनों आएँगे। |
| श्रृंगार (Galat font) | शृंगार | ‘श्’ में ‘ऋ’ की मात्रा लगती है, ‘र’ नहीं जुड़ता। |
प्रकार 4: अनावश्यक शब्दों का प्रयोग (Extra Words Error)
लोग कभी-कभी अर्थ को प्रभावी बनाने के लिए गलत शब्द जोड़ देते हैं।
- ट्रिक (“पूज्य” का नियम):
या तो शब्द ‘पूज्य’ होता है (पिताजी पूज्य हैं)।
या शब्द ‘पूजनीय’ होता है (माताजी पूजनीय हैं)।
‘पूज्यनीय’ शब्द व्याकरण की दृष्टि से बिल्कुल गलत है। - महत्वपूर्ण उदाहरण:
| अशुद्ध (गलत) | शुद्ध (सही) | कारण |
| पूज्यनीय | पूजनीय या पूज्य | दोनों को मिलाना गलत है। |
| अत्याधिक | अत्यधिक | अति + अधिक (संधि में ‘आ’ की मात्रा नहीं बनती)। |
| उपरोक्त | उपर्युक्त | ऊपर + उक्त से बना सही शब्द। |
3. 50 अति महत्वपूर्ण शुद्ध-अशुद्ध शब्दों की सूची
परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले शब्दों का अभ्यास करें:
अ, आ
- अधीन (गलत: आधीन)
- अत्याधिक (गलत) → अत्यधिक (सही)
- अहिल्या (गलत) → अहल्या (सही)
- अनुग्रहीत (गलत) → अनुगृहीत (सही – ‘ऋ’ की मात्रा)
- अनधिकार (गलत: अनाधिकार)
- आजीविका (गलत: आजिविका)
- अंत्याक्षरी (गलत: अंताक्षरी)
उ, ऊ
8. उज्ज्वल (दोनों ‘ज’ आधे)
9. उन्नति (गलत: उन्नती)
10. ऊपर (गलत: उपर)
क, ग
11. कवयित्री (गलत: कवित्री)
12. कालिदास (गलत: कालीदास – ‘ल’ छोटा होगा)
13. कृपया (गलत: कृपाया – पूरा ‘प’ आएगा)
14. गृहस्थ (घर वाला) / ग्रह (Planet) – अंतर समझें।
15. गरिष्ठ (गलत: गरिष्ट)
ज, त
16. ज्योत्स्ना (गलत: ज्योत्सना – आधा त, आधा स)
17. त्योहार (गलत: त्यौहार – एक मात्रा आएगी)
18. तात्कालिक (गलत: तत्कालिक) Let me double check this. तत् + काल + इक = तात्कालिक (वृद्धि हो जाती है)। Correct.
19. तत्त्व (गलत: तत्व – दो आधे ‘त्’ हैं)
द, ध, न, प
20. दवाई (सही) → दवाइयाँ (बहुवचन में मात्रा छोटी हो जाती है)।
21. दुरावस्था (गलत) → दुरवस्था (सही)
22. निरीक्षण (गलत: निरिक्षण)
23. नूपुर (गलत: नुपूर – पहले बड़ा ‘नू’ फिर छोटा ‘पु’)
24. पत्नी (गलत: पत्नि)
25. पूजनीय (गलत: पूज्यनीय)
26. प्रतिष्ठा (गलत: प्रतिष्टा)
27. प्रदर्शन (गलत) → प्रदर्शनी (सही)
र, व
28. रचयिता (गलत: रचीयता)
29. विदुषी (विद्वान महिला के लिए)
30. वाल्मीकि (गलत: वाल्मिकी – ‘क’ पर छोटी मात्रा)
31. वापस (गलत: वापिस)
श, ष, स
32. आशीर्वाद (याद रखें ट्रिक)
33. शृंगार (श् + ऋ) (गलत: श्रृंगार – ‘श’ में डंडा नहीं लगता)
34. शमशान (गलत) → श्मशान (सही – आधा ‘श्’)
35. संन्यासी (बिंदु और ‘न’ दोनों)
36. स्वास्थ्य (गलत: स्वास्थ)
37. सहस्र (सही – ‘स’ में ‘र’) / गलत: सहस्त्र (‘त्र’ नहीं होता)
38. सामाजिक (गलत: समाजिक) Let me double check. समाज + इक = सामाजिक. Correct.
अन्य महत्वपूर्ण (Miscellaneous)
39. मिष्ठान्न (गलत) → मिष्टान्न (सही – ‘ट’ आता है)
40. यानि (गलत) → यानी (सही)
41. मैथिलीशरण (गलत: मैथलीशरण)
42. युधिष्ठिर (गलत: युधिष्टिर – ‘ठ’ आएगा)
43. प्रफुल्लित (गलत) → प्रफुल्ल (सही)
44. निरपराधी (गलत) → निरपराध (सही) Let me check context. ‘वह निरपराधी है’ (galat) -> ‘वह निरपराध है’ (sahi).
45. व्यावहारिक (गलत: व्यवहारिक)
46. श्रीमती (दोनों मात्राएं बड़ी)
47. हिरण्यकशिपु (गलत: हिरण्यकश्यप) – बहुत कठिन लेकिन पूछा जाता है।
48. सुशोभित (गलत: सुसोभित)
49. चिह्न (गलत: चिन्ह – ‘ह’ आधा है, ‘न’ पूरा है) → चिह्न ( ह् + न)
50. जिजीविषा (जीने की इच्छा) – (छोटी ‘जि’, बड़ी ‘जी’, छोटी ‘वि’, ‘षा’)
निष्कर्ष (Conclusion):
शुद्ध वर्तनी के लिए सबसे अच्छी ट्रिक है— “शुद्ध बोलें और ध्यान से पढ़ें।” जब भी आप कोई अच्छा लेख या किताब पढ़ें, तो कठिन शब्दों की लिखावट (Spelling) पर गौर करें।
वर्तनी / शब्द-शुद्धि के 50 अतिरिक्त उदाहरण
| क्रम संख्या | अशुद्ध शब्द (गलत) | शुद्ध शब्द (सही) | संकेत/नियम |
| 51. | अनाधिकृत | अनधिकृत | ‘अन्’ उपसर्ग है, ‘अना’ नहीं। (अन् + अधिकृत) |
| 52. | मृत्यू | मृत्यु | ‘य’ में हमेशा छोटी ‘उ’ की मात्रा आती है। |
| 53. | ब्रम्हा | ब्रह्मा | ‘ह’ आधा होता है और ‘म’ पूरा होता है (ह् + म)। |
| 54. | दृष्टी | दृष्टि | ‘द’ के नीचे ‘ऋ’ की मात्रा होती है, ‘र’ नहीं। |
| 55. | सौंदर्यता | सौंदर्य या सुंदरता | ‘य’ और ‘ता’ प्रत्यय एक साथ नहीं लगते। |
| 56. | परिक्षा | परीक्षा | ‘र’ पर हमेशा बड़ी ‘ई’ की मात्रा आती है। |
| 57. | स्थायीत्व | स्थायित्व | स्थायित्व |
| 58. | बारात | बरात | मानक शब्द ‘बरात’ है, ‘बारात’ नहीं। |
| 59. | अंर्तध्यान | अंतर्धान | अंतः + धान से बना है। ‘ध्यान’ नहीं। |
| 60. | अहसान | एहसान | ‘ए’ का प्रयोग होता है, ‘अ’ का नहीं। |
| 61. | इक्षा | ईक्षा | इसका अर्थ ‘देखना’ है, जिसमें बड़ी ‘ई’ आती है। |
| 62. | पती | पति | ‘पति’ में छोटी मात्रा, जबकि ‘पत्नी’ में बड़ी मात्रा। |
| 63. | तिथी | तिथि | दोनों मात्राएँ छोटी होती हैं। |
| 64. | व्यक्ती | व्यक्ति | ‘क’ आधा और ‘त’ पर छोटी मात्रा। |
| 65. | स्थिती | स्थिति | ‘थ’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा। |
| 66. | गृहिणी | गृहिणी | ‘ह’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा। |
| 67. | बिमार | बीमार | ‘ब’ पर बड़ी ‘ई’ की मात्रा। |
| 68. | स्त्रोत | स्रोत | ‘स’ के नीचे ‘र’ (पदेन) लगता है। |
| 69. | अध्ययन | अध्ययन | दो ‘य’ का प्रयोग होता है ( अधि + अयन )। |
| 70. | इक्ट्ठा | इकट्ठा | ‘ट’ के नीचे हलंत और फिर ‘ठा’। |
| 71. | ऊधम | उधम | छोटा ‘उ’ का प्रयोग होता है। |
| 72. | संग्रहित | संगृहीत | ‘ग’ में ‘ऋ’ की मात्रा और ‘ह’ में बड़ी ‘ई’। |
| 73. | साप्ताहिक | साप्ताहिक | सप्ताह + इक (पहले वर्ण में ‘आ’ की मात्रा लग जाती है)। |
| 74. | ऐतिहासिक | ऐतिहासिक | इतिहास + इक (‘इ’ का ‘ऐ’ हो जाता है)। |
| 75. | रात्री | रात्रि | ‘त्र’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा। |
| 76. | परिस्थिती | परिस्थिति | ‘परि’ उपसर्ग और ‘स्थिति’। |
| 77. | पुरुस्कार | पुरस्कार | विसर्ग संधि (पुरः + कार), ‘उ’ की मात्रा नहीं बदलती। |
| 78. | प्रमाणिक | प्रामाणिक | प्रमाण + इक ( ‘प्र’ का ‘प्रा’ हो जाता है)। |
| 79. | शासन | शासन | पहले ‘श’ (शलगम), फिर ‘स’ (सपेरा)। |
| 80. | മനസ | मानस | |
| 81. | शारिरिक | शारीरिक | पहले ‘री’ बड़ी, फिर ‘रि’ छोटी। |
| 82. | सन्मान | सम्मान | सम् + मान ( ‘म’ आधा हो जाता है)। |
| 83. | रात्री | रात्रि | त्र पर छोटी ‘इ’ की मात्रा। |
| 84. | स्थाई | स्थायी | अंत में ‘यी’ का प्रयोग मानक है। |
| 85. | सुसुप्त | सुषुप्त | ‘ष’ (षट्कोण) का प्रयोग होता है। |
| 86. | हस्ताक्षेप | हस्तक्षेप | ‘हस्त’ का क्षेप (दखल), ‘हस्ता’ नहीं। |
| 87. | क्षत्रीय | क्षत्रिय | ‘त्र’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा। |
| 88. | महत्व | महत्त्व | ‘त्’ दो बार आधा होता है (महत् + त्व)। |
| 89. | सदृश्य | सदृश | मूल शब्द ‘सदृश’ है। ‘सदृश्यता’ भी सही है। |
| 90. | स्वालंबन | स्वावलंबन | स्व + अवलंबन (‘आ’ की मात्रा आएगी)। |
| 91. | इर्ष्या | ईर्ष्या | बड़ी ‘ई’ और आधा ‘र्’ षट्कोण वाले ‘ष’ पर। |
| 92. | उपरिलिखित | उपरिलिखित | उपरि + लिखित से बना है। |
| 93. | कुमुदनी | कुमुदिनी | ‘द’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा। |
| 94. | औद्यौगिक | औद्योगिक | उद्योग + इक से बना है। |
| 95. | वांछनीय | वांछनीय | ‘छ’ (छाता) वाला अक्षर आता है। |
| 96. | भूक | भूख | सही शब्द ‘भूख’ होता है। |
| 97. | ब्राम्हण | ब्राह्मण | ब्रह्मा की तरह, ‘ह’ आधा और ‘म’ पूरा। |
| 98. | മനസ | मानस | |
| 99. | अविष्कार | आविष्कार | आविः + कार (संधि के कारण ‘आ’ आता है)। |
| 100. | व्यक्तीत्व | व्यक्तित्व | व्यक्ति + त्व से बना है। |
इन शब्दों का नियमित अभ्यास करने से वर्तनी की अशुद्धियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। शुद्ध लिखने के लिए शुद्ध उच्चारण और ध्यान से पढ़ने की आदत डालना सबसे उत्तम उपाय है।