प्रत्यय (Suffix)

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परिभाषा:
‘प्रत्यय’ शब्द दो अंशों से मिलकर बना है: प्रति + अय

व्याकरणिक परिभाषा:
वे शब्दांश जो किसी मूल शब्द के अंत (End) में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता ला देते हैं, ‘प्रत्यय’ कहलाते हैं।

उपसर्ग और प्रत्यय में मुख्य अंतर:

उदाहरण:
‘समाज’ एक मूल शब्द है। इसमें प्रत्यय जोड़कर नए शब्द बनाए जा सकते हैं:


प्रत्यय के भेद (Types of Suffix)

प्रत्यय के मुख्य रूप से दो (2) भेद होते हैं:

  1. कृत् प्रत्यय (Krit Pratyay)
  2. तद्धित प्रत्यय (Taddhit Pratyay)

1. कृत् प्रत्यय (Krit Pratyay)

कृत् प्रत्यय के उपभेद:

उपभेदक्या बनाते हैं?प्रत्ययउदाहरण (धातु + प्रत्यय = कृदंत शब्द)
कर्तृवाचक कृदंतक्रिया के करने वाले (कर्ता)-अक, -आकू, -एरा, -ऐयागा + अक = गायक, लड़ + आकू = लड़ाकू, लूट + एरा = लुटेरा, गा + ऐया = गवैया
कर्मवाचक कृदंतजिस पर क्रिया का फल पड़े-औना, -नाखेल + औना = खिलौना, गा + ना = गाना, खा + ना = खाना
करणवाचक कृदंतक्रिया के साधन (tool)-अन, -ई, -ऊ, -नीझाड़ + अन = झाड़न, बेल + न = बेलन, झाड़ + ऊ = झाड़ू, कतर + नी = कतरनी
भाववाचक कृदंतक्रिया के भाव (अमूर्त संज्ञा)-आई, -आवट, -आन, -अंतपढ़ + आई = पढ़ाई, लिख + आवट = लिखावट, उठ + आन = उठान, रट + अंत = रटंत
क्रियाद्योतक कृदंतक्रिया-विशेषण या क्रिया का रूप-ता, -कर, -याजा + ता = जाता हुआ, लिख + कर = लिखकर, खो + या = खोया हुआ

2. तद्धित प्रत्यय (Taddhit Pratyay)

तद्धित प्रत्यय के उपभेद:

उपभेदक्या बनाते हैं?प्रत्ययउदाहरण (शब्द + प्रत्यय = तद्धितांत शब्द)
कर्तृवाचक तद्धितकर्ता या कार्य करने वाला-आर, -इया, -एरा, -चीसोना (संज्ञा) + आर = सोनार, लोहा + आर = लोहार, दुःख + इया = दुखिया, साँप + एरा = सँपेरा, मशाल + ची = मशालची
भाववाचक तद्धितभाव (अमूर्त संज्ञा)-आई, -आस, -पन, -पा, -ताअच्छा (विशेषण) + आई = अच्छाई, मीठा + आस = मिठास, बच्चा + पन = बचपन, बूढ़ा + पा = बुढ़ापा, सुंदर + ता = सुंदरता
संबंधवाचक तद्धितसंबंध बताने वाले शब्द-इक, -आल, -एरासमाज + इक = सामाजिक, ससुर + आल = ससुराल, चाचा + एरा = चचेरा, मौसा + एरा = मौसेरा
ऊनतावाचक तद्धितलघुता या छोटा रूप-इया, -ओला, -ड़ीलुटिया (लोटा से), डिबिया (डिब्बा से), खटोला (खाट से), पहाड़ी (पहाड़ से)
स्त्रीबोधक तद्धितस्त्रीलिंग रूप-इन, -आनी, -नी, -इयानाग + इन = नागिन, देवर + आनी = देवरानी, शेर + नी = शेरनी, बेटा + इया = बिटिया
गुणवाचक तद्धितगुणवाचक विशेषण-आ, -ईला, -ईन, -ईभूख + आ = भूखा, चमक + ईला = चमकीला, ग्राम + ईन = ग्रामीण, धन + ई = धनी
स्थानवाचक तद्धितस्थान बताने वाले शब्द-वाला, -इया, -ईदिल्ली + वाला = दिल्लीवाला, मुंबई + इया = मुंबइया, पंजाब + ई = पंजाबी

निष्कर्ष

प्रत्यय, शब्द-निर्माण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रचनात्मक माध्यम है। यह भाषा को नए शब्द देकर उसकी अभिव्यक्ति क्षमता को बढ़ाता है। कृत् प्रत्यय क्रियाओं से नए शब्द बनाते हैं, जबकि तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण से नए शब्दों की रचना करते हैं, जिससे भाषा का शब्द-भंडार निरंतर समृद्ध होता रहता है।



संधि (Joining of Letters)

परिभाषा:
‘संधि’ का शाब्दिक अर्थ है – मेल, मिलाप या समझौता

व्याकरणिक परिभाषा:
दो निकटवर्ती वर्णों (sounds/letters) के परस्पर मेल से जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे संधि कहते हैं।

संधि और समास में अंतर:


संधि के भेद (Types of Sandhi)

वर्णों के मेल के आधार पर, संधि के तीन (3) मुख्य भेद होते हैं:

  1. स्वर संधि (Vowel Sandhi)
  2. व्यंजन संधि (Consonant Sandhi)
  3. विसर्ग संधि (Visarga Sandhi)

1. स्वर संधि (Vowel Sandhi)

स्वर संधि के पाँच उपभेद:

क) दीर्घ संधि (Long Vowel Sandhi)

ख) गुण संधि (Quality Vowel Sandhi)

ग) वृद्धि संधि (Growth Vowel Sandhi)

घ) यण संधि (Semi-Vowel Sandhi)

ङ) अयादि संधि (Glide Vowel Sandhi)


22. व्यंजन संधि (Consonant Sandhi)

परिभाषा:
जब किसी व्यंजन का मेल किसी स्वर से या किसी अन्य व्यंजन से होता है, तो उससे जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं।

पहचान की सबसे पहली और सामान्य ट्रिक:

जब संधि-विच्छेद किया जाए, तो पहले शब्द का अंतिम वर्ण हमेशा एक हलंत ( ् ) लगा हुआ व्यंजन होगा।
उदाहरण: जगत् + ईश = जगदीश (यहाँ ‘जगत्’ का अंतिम वर्ण ‘त्’ हलंत के साथ है)।

व्यंजन संधि के प्रमुख नियम और उन्हें पहचानने की ट्रिक्स

व्यंजन संधि के नियम स्वर संधि की तरह सीधे नहीं हैं, लेकिन कुछ पैटर्न हैं जिन्हें पहचानकर इसे समझना आसान हो जाता है।

नियम 1: वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे में परिवर्तन

(किसी वर्ग के क्, च्, ट्, त्, प् का ग्, ज्, ड्, द्, ब् में बदलना)

नियम 2: वर्ग के पहले वर्ण का पाँचवें में परिवर्तन

(किसी वर्ग के क्, च्, ट्, त्, प् का ङ्, ञ्, ण्, न्, म् में बदलना)

नियम 3: ‘त्’ संबंधी विशेष नियम (बहुत महत्वपूर्ण)

‘त्’ के बाद अलग-अलग व्यंजन आने पर वह बदल जाता है।

‘त्’ के बाद‘त्’ का परिवर्तनउदाहरण
च, छच्उत् + चारण = उच्चारण / सत् + चरित्र = सच्चरित्र
ज, झज्सत् + जन = सज्जन / उत् + ज्वल = उज्ज्वल
ट, ठट्तत् + टीका = तट्टीका
ड, ढड्उत् + डयन = उड्डयन
ल्उत् + लास = उल्लास / तत् + लीन = तल्लीन
‘त्’ का ‘च्’ और ‘श’ का ‘छ’उत् + श्वास = उच्छ्वास

नियम 4: ‘म्’ संबंधी नियम

नियम 5: ‘छ’ संबंधी नियम

नियम 6: ‘स’ का ‘ष’ में परिवर्तन

सारांश में ट्रिक्स

  1. विच्छेद करने पर पहले शब्द के अंत में हलंत ( ् ) आए।
  2. शब्द में ग्, ज्, ड्, द्, ब् हों, तो वे विच्छेद में अपने वर्ग के पहले अक्षर में बदल जाते हैं।
  3. शब्द में च्च, ज्ज, ल्ल, ट्ट जैसे दोहरे व्यंजन हों।
  4. शब्द के ऊपर अनुस्वार (ं) हो और विच्छेद करने पर वह ‘म्’ में बदल जाए।
  5. शब्द में ‘च्छ’ हो और विच्छेद करने पर ‘च्’ गायब हो जाए।


3. विसर्ग संधि (Visarga Sand-hi)

परिभाषा:
जब विसर्ग (ः) के बाद कोई स्वर या व्यंजन वर्ण आता है, तो विसर्ग में जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं।

पहचान की सबसे पहली और सामान्य ट्रिक:

जब संधि-विच्छेद किया जाए, तो पहले शब्द के अंत में हमेशा विसर्ग (ः) आएगा।
उदाहरण: मनः + हर = मनोहर (यहाँ ‘मनः’ के अंत में विसर्ग है)।


विसर्ग संधि के प्रमुख नियम और उन्हें पहचानने की ट्रिक्स

विसर्ग के बाद आने वाले वर्ण के आधार पर विसर्ग में कई तरह के परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों को पहचानना ही विसर्ग संधि को पहचानने की ट्रिक है।

नियम 1: विसर्ग का ‘ओ’ में परिवर्तन

नियम 2: विसर्ग का ‘र्’ में परिवर्तन (रेफ ‘र्’ के रूप में)

नियम 3: विसर्ग का ‘श्’, ‘ष्’, ‘स्’ (आधे) में परिवर्तन

नियम 4: विसर्ग का लोप हो जाना (गायब हो जाना)

नियम 5: विसर्ग का अपरिवर्तित रहना

सारांश में ट्रिक्स

  1. शब्द में ‘ओ’ की मात्रा दिखे → उसे विसर्ग (ः) से बदलकर देखें (मनोहर = मनः + हर)।
  2. शब्द में आधा ‘र्’ (रेफ) दिखे → उसे हटाकर विसर्ग लगाएँ (निर्धन = निः + धन)।
  3. शब्द में आधा ‘श्’, ‘ष्’, ‘स्’ दिखे → उसे हटाकर विसर्ग लगाएँ (नमस्ते = नमः + ते)।
  4. शब्द की शुरुआत ‘नी’ या ‘दू’ से हो और उसके बाद ‘र’ आए → ‘नी’/’दू’ को ‘निः’/’दुः’ में बदलें (नीरोग = निः + रोग)।

निष्कर्ष

संधि, शब्दों की रचना को समझने, वर्तनी की शुद्धता को बनाए रखने, और भाषा के प्रवाह को सुंदर बनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह दिखाती है कि कैसे ध्वनियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और नए रूप ग्रहण करती हैं।



समास (Samas – Compounding of Words)

हिंदी व्याकरण में समास एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अपनी भाषा को संक्षिप्त (छोटा), प्रभावशाली और सुंदर बनाते हैं।

यहाँ समास का विस्तृत और सरल स्पष्टीकरण दिया गया है:


1. समास क्या है? (Definition & Meaning)

‘समास’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है— ‘संक्षेप’ (Shortening) या ‘मिलाना’।

परिभाषा:
जब दो या दो से अधिक शब्दों (पदों) को मिलाकर एक नया सार्थक शब्द बनाया जाता है, तो इस प्रक्रिया को समास कहते हैं।

2. महत्वपूर्ण शब्दावली (Key Terminology)

समास को समझने के लिए इन चार शब्दों को समझना आवश्यक है:

  1. समस्तपद (Samastpad): समास की प्रक्रिया से बने नए शब्द को ‘समस्तपद’ या ‘सामासिक शब्द’ कहते हैं।
    • (उदा: राजपुत्र, गंगाजल)
  2. समास-विग्रह (Samas-Vigrah): समस्तपद को तोड़कर वापस उसके मूल रूप में विस्तार से लिखने की क्रिया को ‘समास-विग्रह’ कहते हैं।
    • (उदा: राजपुत्र → राजा का पुत्र)
  3. पूर्वपद (Purvapad): समस्तपद के पहले शब्द को ‘पूर्वपद’ कहते हैं।
  4. उत्तरपद (Uttarpad): समस्तपद के दूसरे (बाद वाले) शब्द को ‘उत्तरपद’ कहते हैं।
    • उदाहरण: गंगाजल (समस्तपद)
      • गंगा (पूर्वपद)
      • जल (उत्तरपद)
      • विग्रह: गंगा का जल

3. संधि और समास में अंतर (Difference between Sandhi and Samas)

यह एक सामान्य उलझन है, इसे स्पष्ट करना जरुरी है:


4. समास के भेद (Types of Samas)

मुख्य रूप से पदों की प्रधानता (कौन सा शब्द मुख्य है) के आधार पर समास के 6 भेद माने जाते हैं:

  1. अव्ययीभाव समास (Avyayibhav)
  2. तत्पुरुष समास (Tatpurush)
  3. कर्मधारय समास (Karmadharaya)
  4. द्विगु समास (Dvigu)
  5. द्वंद्व समास (Dvandva)
  6. बहुव्रीहि समास (Bahuvrihi)

5. भेदों का विस्तृत वर्णन (Detailed Explanation of Types)

1. अव्ययीभाव समास (Avyayibhav Samas)

2. तत्पुरुष समास (Tatpurush Samas)

तत्पुरुष समास को कारक चिह्नों के आधार पर 6 उप-भेदों में बाँटा जाता है:

(नोट: एक ‘नञ् तत्पुरुष’ भी होता है जहाँ पहला पद नकारात्मक होता है। उदा: अधर्म = न धर्म, अन्याय = न न्याय)

3. कर्मधारय समास (Karmadharaya Samas)

4. द्विगु समास (Dvigu Samas)

5. द्वंद्व समास (Dvandva Samas)

6. बहुव्रीहि समास (Bahuvrihi Samas)


6. कुछ सामान्य उलझनें (Common Confusions)

परीक्षा में अक्सर ऐसे शब्द आते हैं जो दो समासों में फिट हो सकते हैं। यहाँ ‘समास-विग्रह’ और ‘संदर्भ’ महत्वपूर्ण होता है।

1. कर्मधारय और बहुव्रीहि में अंतर:

2. द्विगु और बहुव्रीहि में अंतर:

संक्षेप में याद रखने का तरीका (Summary)

  1. अव्ययीभाव: पहला पद उपसर्ग/अव्यय (यथा, प्रति, आ)।
  2. तत्पुरुष: कारक चिह्नों का लोप (का, की, से, में)।
  3. कर्मधारय: विशेषण-विशेष्य या तुलना (है जो, के समान)।
  4. द्विगु: पहला पद संख्या, समूह का बोध।
  5. द्वंद्व: दोनों पद प्रधान, बीच में ‘और’/’या’ (जोड़ीदार शब्द)।
  6. बहुव्रीहि: तीसरा विशेष अर्थ (ज्यादातर देवताओं के नाम)।

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समास पहचानने की सरल ट्रिक्स

हर समास की एक खास पहचान होती है, जिसे आप कीवर्ड (Keyword) की तरह याद रख सकते हैं:

1. अव्ययीभाव समास (Avyayibhav)

2. तत्पुरुष समास (Tatpurush)

3. कर्मधारय समास (Karmadharaya)

4. द्विगु समास (Dvigu)

5. द्वंद्व समास (Dvandva)

6. बहुव्रीहि समास (Bahuvrihi)


अनेकार्थी शब्द (Polysemous Words)

हिन्दी भाषा की समृद्धि का एक और प्रमाण अनेकार्थी शब्द हैं। ये शब्द भाषा को अधिक गूढ़, रोचक और काव्यात्मक बनाते हैं। इन्हें समझना भाषा पर अच्छी पकड़ बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है।


1. अनेकार्थी शब्द क्या हैं? (Definition & Meaning)

‘अनेकार्थी’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: अनेक + अर्थी

परिभाषा:
जब कोई एक ही शब्द, प्रसंग (Context) के अनुसार अलग-अलग स्थितियों में भिन्न-भिन्न (अलग-अलग) अर्थ देता है, तो उसे अनेकार्थी शब्द कहते हैं।

देखिये, शब्द एक ही है (‘हार’), लेकिन वाक्य के अनुसार उसका अर्थ पूरी तरह बदल गया। यही अनेकार्थी शब्द की विशेषता है।


2. महत्वपूर्ण अंतर (Important Differences)

छात्र अक्सर अनेकार्थी और पर्यायवाची शब्दों में भ्रमित हो जाते हैं। इसे समझना बहुत आसान है:


3. अनेकार्थी शब्दों की सूची (List of Polysemous Words)

यहाँ कुछ सबसे सामान्य और महत्वपूर्ण अनेकार्थी शब्दों की सूची उनके विभिन्न अर्थों और वाक्यों में प्रयोग के साथ दी गई है:

अ, आ

ग, घ

त, प, फ

व, ह


4. पहचानने और याद करने की ट्रिक्स

अनेकार्थी शब्दों को पहचानने का केवल एक ही अचूक तरीका है: वाक्य का प्रसंग (Context)।

  1. वाक्य ही राजा है (Context is King): किसी शब्द का अर्थ क्या है, यह हमेशा उसे वाक्य में कैसे प्रयोग किया गया है, इसी से पता चलता है। शब्द को अकेले देखकर उसका अर्थ तय नहीं कर सकते।
    • “मुझे सोने का हार चाहिए।” (यहाँ सोना = Gold)
    • “मुझे अब सोना है।” (यहाँ सोना = Sleep)
  2. अधिक पढ़ें (Read More): जितना अधिक आप पढ़ेंगे (कहानियाँ, समाचार पत्र, कविताएँ), उतने ही अधिक अनेकार्थी शब्द आपको उनके सही प्रसंग में मिलेंगे और वे अपने आप याद हो जाएँगे।
  3. खुद वाक्य बनाएँ (Make Your Own Sentences): जब भी कोई नया अनेकार्थी शब्द सीखें, तो उसके सभी अर्थों के लिए एक-एक वाक्य बनाने का प्रयास करें। इससे वह शब्द हमेशा के लिए याद हो जाएगा।

  1. अंक – गोद, संख्या, नाटक का अध्याय
  2. अंबर – आकाश, वस्त्र, कपास
  3. अक्षर – वर्ण, ईश्वर, अविनाशी
  4. अर्थ – मतलब, धन, कारण, लिए
  5. आम – एक फल, साधारण, सामान्य
  6. अलि – भौंरा, सखी, बिच्छू
  7. उत्तर – जवाब, एक दिशा, बाद का
  8. कर – हाथ, टैक्स, किरण, हाथी की सूँड़
  9. काल – समय, मृत्यु, यमराज
  10. कनक – सोना, धतूरा, गेहूँ
  11. कर्ण – कान, कुंती का पुत्र (कर्ण)
  12. काम – कार्य, इच्छा, कामदेव
  13. कुशल – खैरियत, निपुण, चतुर
  14. कोटि – करोड़, श्रेणी, धनुष का सिरा
  15. खग – पक्षी, तारा, बाण
  16. गति – चाल, हालत (दशा), मोक्ष
  17. गुरु – शिक्षक, भारी, बड़ा, श्रेष्ठ
  18. गो – गाय, इंद्रिय, पृथ्वी, वाणी, किरण
  19. घन – बादल, घना, हथौड़ा
  20. घट – घड़ा, शरीर, कम होना
  21. चपला – बिजली, लक्ष्मी, चंचल स्त्री
  22. चीर – वस्त्र, पट्टी, चीरना
  23. जलज – कमल, मोती, शंख, मछली
  24. जीवन – ज़िन्दगी, पानी, प्राण
  25. जाल – फँसाने का यंत्र, बुनावट, माया
  26. तीर – बाण, नदी का किनारा (तट)
  27. ताल – तालाब, संगीत की लय, ताड़ का पेड़
  28. दंड – सज़ा, डंडा, व्यायाम का एक प्रकार
  29. दल – समूह, पत्ता, पक्ष
  30. द्विज – ब्राह्मण, पक्षी, दाँत, चंद्रमा
  31. धन – संपत्ति, जोड़ का चिह्न (+)
  32. नाग – साँप, हाथी, एक पर्वत
  33. नग – पर्वत, रत्न, वृक्ष
  34. पद – पैर, ओहदा, कविता का चरण
  35. पत्र – पत्ता, चिट्ठी, पंख
  36. पय – दूध, पानी, अमृत
  37. फल – खाने वाला फल, परिणाम, भाले की नोक
  38. बल – शक्ति, सेना, रस्सी की ऐंठन
  39. मधु – शहद, शराब, वसंत ऋतु
  40. मान – इज़्ज़त, अभिमान, नाप-तौल
  41. मित्र – दोस्त, सूर्य
  42. मुद्रा – सिक्का, मोहर, अंगूठी, मुख का भाव
  43. मूल – जड़, मुख्य, पूँजी
  44. राग – प्रेम, गाने की लय (धुन)
  45. रस – स्वाद, फलों का निचोड़, आनंद
  46. लक्ष्य – निशाना, उद्देश्य
  47. वर्ण – अक्षर, रंग, जाति
  48. वर – दूल्हा, वरदान, श्रेष्ठ
  49. विधि – कानून, तरीका, भाग्य, ब्रह्मा
  50. हरि – विष्णु, बंदर, सिंह, सर्प, मेंढक
  51. पानी – जल, चमक (मोती की), इज़्ज़त (सम्मान)
  52. पतंग – सूर्य, पक्षी, उड़ाई जाने वाली पतंग, कीड़ा
  53. पट – वस्त्र, परदा, दरवाज़ा (किवाड़)
  54. पयोधर – बादल, स्तन, पर्वत
  55. पृष्ठ – पीठ, किताब का पन्ना, सतह
  56. प्रकृति – स्वभाव, कुदरत (Nature), मूल अवस्था
  57. प्रभाव – असर, महिमा, सामर्थ्य
  58. पर – पंख, ऊपर, लेकिन, बाद का
  59. पूर्व – पहले, एक दिशा
  60. पेशी – तारीख (सुनवाई की), मांस का टुकड़ा
  61. बंधन – कैद, रिश्ता, बाँध
  62. भाग – हिस्सा, भाग्य, दौड़ना
  63. भेद – रहस्य, अंतर, प्रकार
  64. मत – राय (विचार), वोट, नहीं (निषेध)
  65. माधव – कृष्ण/विष्णु, वसंत ऋतु, शहद
  66. मानना – आदर करना, स्वीकार करना, रूठना
  67. योग – जोड़, ध्यान, उपाय, युक्ति
  68. रक्त – खून, लाल रंग, केसर
  69. राशि – ढेर, ज्योतिष की राशियाँ (जैसे- मेष, वृष)
  70. लक्ष्य – निशाना, उद्देश्य
  71. लहर – तरंग, उमंग, झोंका
  72. वन – जंगल, जल
  73. विग्रह – लड़ाई, देवता की मूर्ति, समास को अलग करना
  74. विषम – जो सम न हो, बहुत कठिन, असमान
  75. शिखा – चोटी, आग की लौ
  76. शिव – महादेव, कल्याणकारी, मंगल
  77. शून्य – आकाश, अभाव, ईश्वर (निर्गुण), बिंदु
  78. श्री – लक्ष्मी, शोभा, संपत्ति, कांति, ‘जी’ के अर्थ में
  79. संधि – मेल (जोड़), युग, सेंध
  80. सारंग – मोर, सर्प, बादल, हिरण, दीपक, स्त्री, कमल
  81. सुधा – अमृत, पानी, चूना
  82. सुरभि – सुगंध, गाय, पृथ्वी, वसंत ऋतु
  83. स्नेह – प्रेम, तेल, चिकनाई
  84. हंस – एक पक्षी, सूर्य, आत्मा, योगी
  85. हस्ती – हाथी, अस्तित्व (हस्ती मिट गई)
  86. हीन – रहित, तुच्छ (नीच), कम
  87. क्षेत्र – खेत, शरीर, तीर्थ स्थान, ज्यामिति की आकृति
  88. अधर – होंठ, आकाश (अंतरिक्ष), नीचा
  89. अपेक्षा – इच्छा, आवश्यकता, तुलना में (in comparison to)
  90. अरुण – लाल रंग, सूर्य का सारथी, सूर्य
  91. गुण – विशेषता, रस्सी, धनुष की डोरी
  92. ग्रहण – लेना, सूर्य/चंद्र ग्रहण
  93. गिरा – वाणी, गिर पड़ना (क्रिया)
  94. चक्र – पहिया, घेरा, एक अस्त्र (सुदर्शन चक्र)
  95. जीवन – ज़िन्दगी, पानी, प्राणवायु
  96. ठाकुर – देवता, स्वामी, क्षत्रिय जाति
  97. ढाल – रक्षक अस्त्र, उतार (ढलान)
  98. तारा – नक्षत्र, आँख की पुतली
  99. धात्री – आँवला, उपमाता (दाई), पृथ्वी
  100. निशाचर – राक्षस, उल्लू, चोर


वर्तनी / शब्द शुद्धि (Vartani / Shabd Shuddhi)

हिन्दी भाषा में वर्तनी (Spelling) का बहुत महत्व है। हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है, इसका सबसे बड़ा नियम है— “जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है।”

यदि हमारा उच्चारण (Pronunciation) अशुद्ध होगा, तो हमारी वर्तनी भी अशुद्ध (गलत) हो जाएगी। शब्दों को उनके मानक और सही रूप में लिखने की प्रक्रिया को ही ‘शब्द-शुद्धि’ या ‘वर्तनी-शुद्धि’ कहते हैं।


1. वर्तनी में गलतियां क्यों होती हैं? (Causes of Errors)

वर्तनी अशुद्ध होने के मुख्य कारण ये हैं:

  1. अशुद्ध उच्चारण: (सबसे बड़ा कारण)। जैसे- ‘आशीर्वाद’ को ‘आशिरवाद’ बोलना।
  2. मात्राओं का ज्ञान न होना: ‘इ’ (ि) और ‘ई’ (ी) या ‘उ’ (ु) और ‘ऊ’ (ू) में अंतर न पता होना।
  3. क्षेत्रीय प्रभाव: स्थानीय बोली का असर लिखने पर पड़ना। (जैसे- कुछ क्षेत्रों में ‘स्कूल’ को ‘इस्कूल’ बोलते/लिखते हैं)।
  4. व्याकरण की जानकारी की कमी: संधि और समास के नियमों का ज्ञान न होना।

2. अशुद्धियों के प्रकार और सुधारने के नियम (Types of Errors & Tricks)

आइए, मुख्य प्रकार की अशुद्धियों और उन्हें सुधारने की Tricks को समझते हैं:

प्रकार 1: ‘इ/ई’ और ‘उ/ऊ’ की गलतियाँ (Swara Errors)

लोग अक्सर छोटी और बड़ी मात्रा में गलती करते हैं।

अशुद्ध (गलत)शुद्ध (सही)कारण/टिप्पणी
रचीयतारचयिता‘य’ पर छोटी मात्रा आती है।
कवित्रीकवयित्रीयह परीक्षा में बहुत पूछा जाता है।
दिपावलीदीपावलीदीप + अवली (दीपों की पंक्ति)।
निरोगनीरोगनि: + रोग (संधि का नियम, ‘न’ बड़ा हो जाता है)।
प्रभूप्रभुभगवान के लिए छोटी मात्रा।
गुरु (बड़ा ‘रू’)गुरु (छोटा ‘रु’)‘र’ में ‘उ’ की मात्रा (रु) बिना गांठ की होती है।

प्रकार 2: ‘रेफ’ ( र् ) और ‘पदेन’ ( ्र ) की गलतियाँ (‘R’ sound)

यह सबसे ज्यादा भ्रमित करने वाला हिस्सा है।

अशुद्ध (गलत)शुद्ध (सही)टिप्पणी
आर्शिवादआशीर्वादट्रिक याद रखें (शी के बाद बोला, व पर लगा)।
अन्र्तगतअंतर्गतत के बाद र् बोला, ग पर लगेगा।
पुनर्जन्मपुनर्जन्मन के बाद र् बोला, ज पर लगेगा।

प्रकार 3: संयुक्त अक्षरों की गलतियाँ (Half Letter Errors)

कुछ शब्दों में यह भ्रम होता है कि कौन सा अक्षर आधा है और कौन सा पूरा।

अशुद्ध (गलत)शुद्ध (सही)टिप्पणी
उज्जवल / उज्वलउज्ज्वलदोनों ‘ज्’ आधे होंगे।
जोत्सनाज्योत्स्नाआधा ‘त्’ और आधा ‘स्’ आएगा।
सन्यासीसंन्यासीबिंदु (.) और आधा ‘न्’ दोनों आएँगे।
श्रृंगार (Galat font)शृंगार‘श्’ में ‘ऋ’ की मात्रा लगती है, ‘र’ नहीं जुड़ता।

प्रकार 4: अनावश्यक शब्दों का प्रयोग (Extra Words Error)

लोग कभी-कभी अर्थ को प्रभावी बनाने के लिए गलत शब्द जोड़ देते हैं।

अशुद्ध (गलत)शुद्ध (सही)कारण
पूज्यनीयपूजनीय या पूज्यदोनों को मिलाना गलत है।
अत्याधिकअत्यधिकअति + अधिक (संधि में ‘आ’ की मात्रा नहीं बनती)।
उपरोक्तउपर्युक्तऊपर + उक्त से बना सही शब्द।

3. 50 अति महत्वपूर्ण शुद्ध-अशुद्ध शब्दों की सूची

परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले शब्दों का अभ्यास करें:

अ, आ

  1. अधीन (गलत: आधीन)
  2. अत्याधिक (गलत) → अत्यधिक (सही)
  3. अहिल्या (गलत) → अहल्या (सही)
  4. अनुग्रहीत (गलत) → अनुगृहीत (सही – ‘ऋ’ की मात्रा)
  5. अनधिकार (गलत: अनाधिकार)
  6. आजीविका (गलत: आजिविका)
  7. अंत्याक्षरी (गलत: अंताक्षरी)

उ, ऊ
8. उज्ज्वल (दोनों ‘ज’ आधे)
9. उन्नति (गलत: उन्नती)
10. ऊपर (गलत: उपर)

क, ग
11. कवयित्री (गलत: कवित्री)
12. कालिदास (गलत: कालीदास – ‘ल’ छोटा होगा)
13. कृपया (गलत: कृपाया – पूरा ‘प’ आएगा)
14. गृहस्थ (घर वाला) / ग्रह (Planet) – अंतर समझें।
15. गरिष्ठ (गलत: गरिष्ट)

ज, त
16. ज्योत्स्ना (गलत: ज्योत्सना – आधा त, आधा स)
17. त्योहार (गलत: त्यौहार – एक मात्रा आएगी)
18. तात्कालिक (गलत: तत्कालिक) Let me double check this. तत् + काल + इक = तात्कालिक (वृद्धि हो जाती है)। Correct.
19. तत्त्व (गलत: तत्व – दो आधे ‘त्’ हैं)

द, ध, न, प
20. दवाई (सही) → दवाइयाँ (बहुवचन में मात्रा छोटी हो जाती है)।
21. दुरावस्था (गलत) → दुरवस्था (सही)
22. निरीक्षण (गलत: निरिक्षण)
23. नूपुर (गलत: नुपूर – पहले बड़ा ‘नू’ फिर छोटा ‘पु’)
24. पत्नी (गलत: पत्नि)
25. पूजनीय (गलत: पूज्यनीय)
26. प्रतिष्ठा (गलत: प्रतिष्टा)
27. प्रदर्शन (गलत) → प्रदर्शनी (सही)

र, व
28. रचयिता (गलत: रचीयता)
29. विदुषी (विद्वान महिला के लिए)
30. वाल्मीकि (गलत: वाल्मिकी – ‘क’ पर छोटी मात्रा)
31. वापस (गलत: वापिस)

श, ष, स
32. आशीर्वाद (याद रखें ट्रिक)
33. शृंगार (श् + ऋ) (गलत: श्रृंगार – ‘श’ में डंडा नहीं लगता)
34. शमशान (गलत) → श्मशान (सही – आधा ‘श्’)
35. संन्यासी (बिंदु और ‘न’ दोनों)
36. स्वास्थ्य (गलत: स्वास्थ)
37. सहस्र (सही – ‘स’ में ‘र’) / गलत: सहस्त्र (‘त्र’ नहीं होता)
38. सामाजिक (गलत: समाजिक) Let me double check. समाज + इक = सामाजिक. Correct.

अन्य महत्वपूर्ण (Miscellaneous)
39. मिष्ठान्न (गलत) → मिष्टान्न (सही – ‘ट’ आता है)
40. यानि (गलत) → यानी (सही)
41. मैथिलीशरण (गलत: मैथलीशरण)
42. युधिष्ठिर (गलत: युधिष्टिर – ‘ठ’ आएगा)
43. प्रफुल्लित (गलत) → प्रफुल्ल (सही)
44. निरपराधी (गलत) → निरपराध (सही) Let me check context. ‘वह निरपराधी है’ (galat) -> ‘वह निरपराध है’ (sahi).
45. व्यावहारिक (गलत: व्यवहारिक)
46. श्रीमती (दोनों मात्राएं बड़ी)
47. हिरण्यकशिपु (गलत: हिरण्यकश्यप) – बहुत कठिन लेकिन पूछा जाता है।
48. सुशोभित (गलत: सुसोभित)
49. चिह्न (गलत: चिन्ह – ‘ह’ आधा है, ‘न’ पूरा है) → चिह्न ( ह् + न)
50. जिजीविषा (जीने की इच्छा) – (छोटी ‘जि’, बड़ी ‘जी’, छोटी ‘वि’, ‘षा’)

निष्कर्ष (Conclusion):
शुद्ध वर्तनी के लिए सबसे अच्छी ट्रिक है— “शुद्ध बोलें और ध्यान से पढ़ें।” जब भी आप कोई अच्छा लेख या किताब पढ़ें, तो कठिन शब्दों की लिखावट (Spelling) पर गौर करें।


वर्तनी / शब्द-शुद्धि के 50 अतिरिक्त उदाहरण

क्रम संख्याअशुद्ध शब्द (गलत)शुद्ध शब्द (सही)संकेत/नियम
51.अनाधिकृतअनधिकृत‘अन्’ उपसर्ग है, ‘अना’ नहीं। (अन् + अधिकृत)
52.मृत्यूमृत्यु‘य’ में हमेशा छोटी ‘उ’ की मात्रा आती है।
53.ब्रम्हाब्रह्मा‘ह’ आधा होता है और ‘म’ पूरा होता है (ह् + म)।
54.दृष्टीदृष्टि‘द’ के नीचे ‘ऋ’ की मात्रा होती है, ‘र’ नहीं।
55.सौंदर्यतासौंदर्य या सुंदरता‘य’ और ‘ता’ प्रत्यय एक साथ नहीं लगते।
56.परिक्षापरीक्षा‘र’ पर हमेशा बड़ी ‘ई’ की मात्रा आती है।
57.स्थायीत्वस्थायित्वस्थायित्व
58.बारातबरातमानक शब्द ‘बरात’ है, ‘बारात’ नहीं।
59.अंर्तध्यानअंतर्धानअंतः + धान से बना है। ‘ध्यान’ नहीं।
60.अहसानएहसान‘ए’ का प्रयोग होता है, ‘अ’ का नहीं।
61.इक्षाईक्षाइसका अर्थ ‘देखना’ है, जिसमें बड़ी ‘ई’ आती है।
62.पतीपति‘पति’ में छोटी मात्रा, जबकि ‘पत्नी’ में बड़ी मात्रा।
63.तिथीतिथिदोनों मात्राएँ छोटी होती हैं।
64.व्यक्तीव्यक्ति‘क’ आधा और ‘त’ पर छोटी मात्रा।
65.स्थितीस्थिति‘थ’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा।
66.गृहिणीगृहिणी‘ह’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा।
67.बिमारबीमार‘ब’ पर बड़ी ‘ई’ की मात्रा।
68.स्त्रोतस्रोत‘स’ के नीचे ‘र’ (पदेन) लगता है।
69.अध्ययनअध्ययनदो ‘य’ का प्रयोग होता है ( अधि + अयन )।
70.इक्ट्ठाइकट्ठा‘ट’ के नीचे हलंत और फिर ‘ठा’।
71.ऊधमउधमछोटा ‘उ’ का प्रयोग होता है।
72.संग्रहितसंगृहीत‘ग’ में ‘ऋ’ की मात्रा और ‘ह’ में बड़ी ‘ई’।
73.साप्ताहिकसाप्ताहिकसप्ताह + इक (पहले वर्ण में ‘आ’ की मात्रा लग जाती है)।
74.ऐतिहासिकऐतिहासिकइतिहास + इक (‘इ’ का ‘ऐ’ हो जाता है)।
75.रात्रीरात्रि‘त्र’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा।
76.परिस्थितीपरिस्थिति‘परि’ उपसर्ग और ‘स्थिति’।
77.पुरुस्कारपुरस्कारविसर्ग संधि (पुरः + कार), ‘उ’ की मात्रा नहीं बदलती।
78.प्रमाणिकप्रामाणिकप्रमाण + इक ( ‘प्र’ का ‘प्रा’ हो जाता है)।
79.शासनशासनपहले ‘श’ (शलगम), फिर ‘स’ (सपेरा)।
80.മനസमानस
81.शारिरिकशारीरिकपहले ‘री’ बड़ी, फिर ‘रि’ छोटी।
82.सन्मानसम्मानसम् + मान ( ‘म’ आधा हो जाता है)।
83.रात्रीरात्रित्र पर छोटी ‘इ’ की मात्रा।
84.स्थाईस्थायीअंत में ‘यी’ का प्रयोग मानक है।
85.सुसुप्तसुषुप्त‘ष’ (षट्कोण) का प्रयोग होता है।
86.हस्ताक्षेपहस्तक्षेप‘हस्त’ का क्षेप (दखल), ‘हस्ता’ नहीं।
87.क्षत्रीयक्षत्रिय‘त्र’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा।
88.महत्वमहत्त्व‘त्’ दो बार आधा होता है (महत् + त्व)।
89.सदृश्यसदृशमूल शब्द ‘सदृश’ है। ‘सदृश्यता’ भी सही है।
90.स्वालंबनस्वावलंबनस्व + अवलंबन (‘आ’ की मात्रा आएगी)।
91.इर्ष्याईर्ष्याबड़ी ‘ई’ और आधा ‘र्’ षट्कोण वाले ‘ष’ पर।
92.उपरिलिखितउपरिलिखितउपरि + लिखित से बना है।
93.कुमुदनीकुमुदिनी‘द’ पर छोटी ‘इ’ की मात्रा।
94.औद्यौगिकऔद्योगिकउद्योग + इक से बना है।
95.वांछनीयवांछनीय‘छ’ (छाता) वाला अक्षर आता है।
96.भूकभूखसही शब्द ‘भूख’ होता है।
97.ब्राम्हणब्राह्मणब्रह्मा की तरह, ‘ह’ आधा और ‘म’ पूरा।
98.മനസमानस
99.अविष्कारआविष्कारआविः + कार (संधि के कारण ‘आ’ आता है)।
100.व्यक्तीत्वव्यक्तित्वव्यक्ति + त्व से बना है।

इन शब्दों का नियमित अभ्यास करने से वर्तनी की अशुद्धियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। शुद्ध लिखने के लिए शुद्ध उच्चारण और ध्यान से पढ़ने की आदत डालना सबसे उत्तम उपाय है।