क्रिया (Verb)
धातु (Dhaatu) – क्रिया का मूल रूप
परिभाषा:
क्रिया के मूल (basic/root), अविभाज्य (indivisible) और सबसे छोटे अंश को ‘धातु’ कहते हैं। धातु ही क्रिया पद का वह अंश है जो किसी क्रिया के सभी रूपों में समान रूप से पाया जाता है।
- ‘धातु’ की अवधारणा संस्कृत व्याकरण से ली गई है।
- सरल शब्दों में, धातु क्रिया का “बीज” (seed) है, जिससे क्रिया के विभिन्न रूपों (जैसे – पढ़ना, पढ़ता है, पढ़ो, पढ़कर, पढ़ाएगा) का निर्माण होता है।
धातु की पहचान (How to Identify Dhaatu)
किसी भी क्रिया शब्द से ‘ना’ प्रत्यय को हटाने के बाद जो अंश बचता है, वही उसकी धातु कहलाता है।
| क्रिया (पूर्ण रूप) | प्रत्यय (-ना) | धातु (मूल रूप) |
| पढ़ना | -ना | पढ़ |
| लिखना | -ना | लिख |
| गाना | -ना | गा |
| जाना | -ना | जा |
| देखना | -ना | देख |
| खाना | -ना | खा |
क्रिया के विभिन्न रूपों में धातु को पहचानना:
- पढ़ता है, पढ़ती है, पढ़ेंगे, पढ़ो, पढ़कर → इन सभी में ‘पढ़’ अंश समान है, यही धातु है।
धातु के भेद (Types of Dhaatu)
व्युत्पत्ति या बनावट के आधार पर, धातु के मुख्य रूप से दो भेद माने जाते हैं, हालांकि कुछ विद्वान इसके तीन या चार भेद भी करते हैं।
1. मूल धातु (Mool Dhaatu / Simple Root)
- परिभाषा:
वे धातुएँ जो किसी अन्य शब्द पर निर्भर नहीं होतीं, अर्थात् स्वतंत्र होती हैं, उन्हें मूल धातु कहते हैं। - इन्हें और अधिक तोड़ा नहीं जा सकता। ये भाषा की मौलिक क्रिया-रूप होती हैं।
- उदाहरण:
- खा, पी, जा, आ, देख, सुन, पढ़, लिख, सो, रो, हँस आदि।
2. यौगिक धातु (Yaugik Dhaatu / Compound Root)
- परिभाषा:
वे धातुएँ जो मूल धातु में प्रत्यय (suffix) लगाकर या दो या दो से अधिक धातुओं को जोड़कर या संज्ञा/विशेषण में प्रत्यय लगाकर बनाई जाती हैं, उन्हें यौगिक धातु कहते हैं। - यौगिक धातु मुख्य रूप से तीन प्रकार से बनाई जाती हैं:
क) प्रेरणार्थक धातु (Causative Root):- जब कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी और को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, तो उसे व्यक्त करने वाली धातु।
- मूल धातु से दो रूपों में बनती है:
- प्रथम प्रेरणार्थक: धातु में ‘आ’ प्रत्यय लगाकर। (उदा. – कराना, पढ़ाना)
- द्वितीय प्रेरणार्थक: धातु में ‘वा’ प्रत्यय लगाकर। (उदा. – करवाना, पढ़वाना)
| मूल धातु | प्रथम प्रेरणार्थक (कराना) | द्वितीय प्रेरणार्थक (करवाना) |
| पढ़ | पढ़ा (पढ़ाना) | पढ़वा (पढ़वाना) |
| कर | करा (कराना) | करवा (करवाना) |
| देख | दिखा (दिखाना) | दिखवा (दिखवाना) |
| सुन | सुना (सुनाना) | सुनवा (सुनवाना) |
| उठ | उठा (उठाना) | उठवा (उठवाना) |
ख) नाम धातु (Nominal Root):- वे धातुएँ जो संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्दों से बनती हैं।
| मूल शब्द (प्रकार)| बनी हुई नामधातु| क्रिया |
| :— | :— |:—|
| हाथ (संज्ञा) | हथिया | हथियाना |
| बात (संज्ञा) | बतिया | बतियाना |
| शर्म (संज्ञा) | शर्मा | शर्माना |
| गर्म (विशेषण)| गरमा | गरमाना |
| चिकना (विशेषण)| चिकना | चिकनाना|
| अपना (सर्वनाम)| अपना | अपनाना |
- वे धातुएँ जो संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्दों से बनती हैं।
- ग) संयुक्त/समास धातु (Compound/Complex Root):
- जब दो या दो से अधिक मूल धातुओं को एक साथ जोड़कर एक नई क्रिया का अर्थ व्यक्त किया जाता है।
- उदाहरण:
- पढ़ना-लिखना → पढ़-लिख
- उठना-बैठना → उठ-बैठ
- चलना-फिरना → चल-फिर
- खाना-पीना → खा-पी
- आना-जाना → आ-जा
- वाक्य में प्रयोग: उसे पढ़ना-लिखना अच्छा लगता है। / वह यहाँ आता-जाता रहता है।
अनुकरणात्मक धातु (Onomatopoeic Root):
- कुछ वैयाकरण इसे यौगिक धातु का ही एक उपभेद मानते हैं, जबकि कुछ इसे एक अलग श्रेणी में रखते हैं।
- परिभाषा:
वे धातुएँ जो किसी ध्वनि (sound) के अनुकरण (imitation) पर बनाई जाती हैं। - उदाहरण:
- टन्-टन् (ध्वनि) → टनटनाना
- खट्-खट् (ध्वनि) → खटखटाना
- भन्-भन् (ध्वनि) → भिनभिनाना (मक्खी)
- मिमि (ध्वनि) → मिमियाना (बकरी)
निष्कर्ष
धातु, क्रिया का मूल तत्व और उसका ‘डीएनए’ है। क्रिया चाहे किसी भी काल, लिंग, वचन या रूप में प्रयोग हो, उसका धातु अंश हमेशा स्थिर रहता है। धातु के प्रकारों को समझने से हम यह जान पाते हैं कि हिन्दी में नए-नए क्रिया शब्दों का निर्माण किस प्रकार होता है, चाहे वह प्रेरणा से हो, संज्ञा से हो, या ध्वनियों के अनुकरण से हो।
क्रिया
परिभाषा:
जिन शब्दों से किसी कार्य (action) के करने या होने, किसी घटना के घटित होने, या किसी व्यक्ति या वस्तु की अवस्था या स्थिति का बोध होता है, उन्हें क्रिया कहते हैं।
- ‘क्रिया’ व्याकरण का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि क्रिया के बिना कोई भी वाक्य पूर्ण नहीं हो सकता।
- संस्कृत में क्रिया-रूप को ‘धातु’ (root) कहते हैं। हिन्दी के क्रिया-पद इसी धातु में ‘ना’ प्रत्यय लगाकर बनते हैं।
- धातु + ना = क्रिया
- पढ़ (धातु) + ना = पढ़ना
- लिख (धातु) + ना = लिखना
- खा (धातु) + ना = खाना
क्रिया के उदाहरण:
- कार्य का करना: मोहन पढ़ रहा है। (मोहन द्वारा पढ़ने का कार्य हो रहा है)
- कार्य का होना: नदी बह रही है। (नदी खुद बह रही है, कोई कर नहीं रहा)
- अवस्था/स्थिति: वह बीमार है। (उसकी अवस्था का बोध)
क्रिया के भेद (Types of Verb)
क्रिया के भेद कई आधारों पर किए जाते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख हैं:
क) कर्म के आधार पर
ख) संरचना या प्रयोग के आधार पर
क) कर्म के आधार पर क्रिया के भेद (Based on Object)
यह क्रिया का सबसे महत्वपूर्ण वर्गीकरण है।
1. अकर्मक क्रिया (Intransitive Verb)
- परिभाषा:
‘अकर्मक’ = अ (बिना) + कर्मक (कर्म के), अर्थात् ‘कर्म के बिना’।
जिस क्रिया के साथ कर्म (object) नहीं होता और क्रिया का फल या प्रभाव सीधा कर्ता (subject) पर पड़ता है, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। - पहचान की ट्रिक:
क्रिया से पहले “क्या?” और “किसको?” प्रश्न करने पर यदि कोई उत्तर नहीं मिलता, तो वह क्रिया अकर्मक होती है। - उदाहरण:
- पक्षी उड़ते हैं।
- (प्रश्न: क्या उड़ते हैं? → उत्तर नहीं। कौन उड़ते हैं? → पक्षी (कर्ता))
- उड़ने का फल सीधा ‘पक्षी’ (कर्ता) पर पड़ रहा है।
- बच्चा रोता है।
- (प्रश्न: क्या रोता है? → उत्तर नहीं।)
- राम दौड़ता है।
- वह हँसता है।
- नदी बहती है।
- पक्षी उड़ते हैं।
- स्वाभाविक क्रियाएँ: हँसना, रोना, सोना, दौड़ना, चलना, उड़ना, तैरना, उगना, डूबना, चमकना आदि क्रियाएँ प्रायः अकर्मक होती हैं।
2. सकर्मक क्रिया (Transitive Verb)
- परिभाषा:
‘सकर्मक’ = स (सहित) + कर्मक (कर्म के), अर्थात् ‘कर्म के साथ’।
जिस क्रिया के साथ कर्म (object) होता है और क्रिया का फल कर्ता पर न पड़कर, सीधा कर्म पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। - पहचान की ट्रिक:
क्रिया से पहले “क्या?” या “किसको?” प्रश्न करने पर यदि कोई संभावित उत्तर मिलता है, तो वह क्रिया सकर्मक होती है। - उदाहरण:
- राम पुस्तक पढ़ता है।
- (प्रश्न: क्या पढ़ता है? → उत्तर: पुस्तक (कर्म))
- पढ़ने का फल ‘राम’ पर नहीं, ‘पुस्तक’ पर पड़ रहा है।
- माँ खाना बनाती है।
- (प्रश्न: क्या बनाती है? → उत्तर: खाना (कर्म))
- वह सेब खाता है।
- रमेश ने सुरेश को पीटा।
- (प्रश्न: किसको पीटा? → उत्तर: सुरेश को (कर्म))
- राम पुस्तक पढ़ता है।
सकर्मक क्रिया के दो उपभेद:
- एककर्मक क्रिया: जब वाक्य में क्रिया का केवल एक कर्म हो। (जैसे – “वह आम खाता है।”)
- द्विकर्मक क्रिया: जब वाक्य में क्रिया के दो कर्म हों। इसमें “क्या?” और “किसको?” दोनों का उत्तर मिलता है। पहला कर्म गौण (indirect, प्राणीवाचक) और दूसरा मुख्य (direct, वस्तुवाचक) होता है।
- उदाहरण: अध्यापक ने छात्रों कोभूगोल पढ़ाया।
- (प्रश्न: क्या पढ़ाया? → भूगोल)
- (प्रश्न: किसको पढ़ाया? → छात्रों को)
- उदाहरण: अध्यापक ने छात्रों कोभूगोल पढ़ाया।
ख) संरचना या प्रयोग के आधार पर क्रिया के भेद (Based on Structure)
- सामान्य क्रिया (Simple Verb): जब वाक्य में केवल एक ही क्रिया पद का प्रयोग हो। (जैसे – वह आया।)
- संयुक्त क्रिया (Compound Verb): जब दो या दो से अधिक क्रियाएँ मिलकर एक ही कार्य को पूर्ण करने का बोध कराएँ। इसमें पहली क्रिया मुख्य होती है और दूसरी उसकी सहायक। (जैसे – वह घर पहुँच गया। (पहुँचना + जाना))
- नामधातु क्रिया (Nominal Verb): जो क्रियाएँ संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्दों में ‘ना’ प्रत्यय जोड़कर बनाई जाती हैं।
- हाथ (संज्ञा) → हथियाना
- बात (संज्ञा) → बतियाना
- लात (संज्ञा) → लतियाना
- गर्म (विशेषण) → गरमाना
- अपना (सर्वनाम) → अपनाना
- प्रेरणार्थक क्रिया (Causative Verb): जब कर्ता स्वयं कार्य न करके, किसी दूसरे को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।
- प्रथम प्रेरणार्थक: माँ परिवार के लिए भोजन बनाती है। (माँ खुद कार्य कर रही है)
- द्वितीय प्रेरणार्थक: माँ पुत्री से भोजन बनवाती है। (माँ दूसरे को प्रेरित कर रही है)
- अन्य उदाहरण: पढ़ना → पढ़ाना → पढ़वाना; करना → कराना → करवाना।
- पूर्वकालिक क्रिया (Absolutive Verb): जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त करके तत्काल कोई दूसरी क्रिया आरंभ करता है, तो पहली समाप्त हुई क्रिया पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है।
- पहचान: धातु के साथ ‘कर’ या ‘करके’ लगा होता है।
- उदाहरण: वह खाकर सो गया। (पहले खाने का काम हुआ, फिर सोने का)।
- पुजारी ने नहाकर पूजा की।
- सहायक क्रिया (Auxiliary/Helping Verb): मुख्य क्रिया के अर्थ को स्पष्ट और पूर्ण करने में सहायता करने वाली क्रिया। (जैसे – वह पढ़ रहा है। यहाँ ‘रहा है’ सहायक क्रिया है)।
- कृदंत क्रिया (Participle): जब क्रिया शब्दों में प्रत्यय जुड़कर उनका प्रयोग संज्ञा, विशेषण या क्रिया-विशेषण की तरह होने लगता है। (जैसे – भागता हुआ चोर; उसका चलना अच्छा है)।
काल (Tense)
परिभाषा:
क्रिया के जिस रूप से उसके होने या करने के समय (Time) तथा उसकी पूर्णता या अपूर्णता की अवस्था (State) का बोध होता है, उसे ‘काल’ कहते हैं।
- सरल शब्दों में, काल हमें यह बताता है कि कोई क्रिया कब हुई (भूतकाल में), कब हो रही है (वर्तमान में), या कब होगी (भविष्य में)।
- ‘काल’ का शाब्दिक अर्थ ‘समय’ होता है।
उदाहरण:
- राम पढ़ता था। (क्रिया बीते हुए समय में हुई → भूतकाल)
- राम पढ़ रहा है। (क्रिया अभी चल रही है → वर्तमान काल)
- राम पढ़ेगा। (क्रिया आने वाले समय में होगी → भविष्यत् काल)
काल के भेद (Types of Tense)
काल के मुख्य रूप से तीन (3) भेद होते हैं:
- भूतकाल (Past Tense) – बीता हुआ समय
- वर्तमान काल (Present Tense) – चल रहा समय
- भविष्यत् काल (Future Tense) – आने वाला समय
1. भूतकाल (Past Tense)
- परिभाषा: क्रिया के जिस रूप से कार्य के बीते हुए समय में समाप्त हो जाने का बोध होता है, उसे भूतकाल कहते हैं।
- पहचान: वाक्यों के अंत में प्रायः ‘था’, ‘थी’, ‘थे’, ‘आ’, ‘ई’, ‘ए’ आते हैं।
भूतकाल के उपभेद (Sub-types of Past Tense):
भूतकाल के छह (6) उपभेद होते हैं:
क) सामान्य भूतकाल (Simple Past):
- क्रिया बीते हुए समय में सामान्य रूप से हुई, लेकिन उसके निश्चित समय का बोध नहीं होता।
- उदाहरण: राम ने रोटी खाई। / मोहन आया। / सीता गई।
ख) आसन्न भूतकाल (Recent Past):
- क्रिया अभी-अभी कुछ समय पहले ही समाप्त हुई है।
- संरचना: सामान्य भूतकाल की क्रिया + ‘है’, ‘हैं’।
- उदाहरण: राम ने रोटी खाई है। / मोहन आया है। (अर्थात्, आने का काम अभी पूरा हुआ है)।
ग) पूर्ण भूतकाल (Complete Past):
- क्रिया को समाप्त हुए बहुत समय बीत चुका है।
- संरचना: सामान्य भूतकाल की क्रिया + ‘था’, ‘थी’, ‘थे’।
- उदाहरण: राम ने रोटी खाई थी। / मोहन आया था। / अंग्रेजों ने भारत पर राज किया था।
घ) अपूर्ण भूतकाल (Incomplete Past):
- क्रिया बीते हुए समय में जारी थी (चल रही थी), परन्तु उसके समाप्त होने का पता नहीं चलता।
- पहचान: ‘रहा था’, ‘रही थी’, ‘रहे थे’।
- उदाहरण: राम रोटी खा रहा था। / मोहन आ रहा था। / बच्चे खेल रहे थे।
ङ) संदिग्ध भूतकाल (Doubtful Past):
- बीते हुए समय में क्रिया के होने पर संदेह या शंका व्यक्त की जाती है।
- संरचना: सामान्य भूतकाल की क्रिया + ‘होगा’, ‘होगी’, ‘होंगे’।
- उदाहरण: राम ने रोटी खाई होगी। / मोहन आया होगा। / दुकान बंद हो गई होगी।
च) हेतु-हेतुमद् भूतकाल (Conditional Past):
- जब भूतकाल में एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर करता है, लेकिन किसी कारण से क्रिया हो नहीं पाई।
- पहचान: इसमें दो क्रियाएँ होती हैं, और प्रायः ‘यदि…तो…’, ‘अगर…तो…’ जैसे शब्द आते हैं।
- उदाहरण: यदि तुम पढ़ते, तो पास हो जाते। / अगर वर्षा होती, तो फसल अच्छी होती।
2. वर्तमान काल (Present Tense)
- परिभाषा: क्रिया के जिस रूप से कार्य के वर्तमान (चल रहे) समय में होने का बोध होता है, उसे वर्तमान काल कहते हैं।
- पहचान: वाक्यों के अंत में ‘है’, ‘हैं’, ‘हूँ’ आते हैं।
वर्तमान काल के उपभेद (Sub-types of Present Tense):
वर्तमान काल के मुख्य रूप से तीन (3) उपभेद माने जाते हैं (कुछ विद्वान 5 भी मानते हैं)।
क) सामान्य वर्तमान काल (Simple Present):
- क्रिया वर्तमान में सामान्य रूप से होती है। यह कर्ता की आदत या स्वभाव को बताती है।
- पहचान: ‘ता है’, ‘ती है’, ‘ते हैं’।
- उदाहरण: राम रोटी खाता है। / मोहन आता है। / सूर्य पूर्व में उगता है।
ख) अपूर्ण / तात्कालिक वर्तमान काल (Present Continuous):
- क्रिया वर्तमान में लगातार चल रही है (जारी है)।
- पहचान: ‘रहा है’, ‘रही है’, ‘रहे हैं’।
- उदाहरण: राम रोटी खा रहा है। / मोहन आ रहा है। / मैं पढ़ रहा हूँ।
ग) संदिग्ध वर्तमान काल (Doubtful Present):
- वर्तमान में क्रिया के होने पर संदेह या शंका व्यक्त की जाती है।
- पहचान: ‘ता होगा’, ‘ती होगी’, ‘ते होंगे’।
- उदाहरण: राम रोटी खाता होगा। / मोहन आता होगा। / माँ खाना बनाती होगी।
3. भविष्यत् काल (Future Tense)
- परिभाषा: क्रिया के जिस रूप से कार्य के आने वाले समय (भविष्य) में होने का बोध होता है, उसे भविष्यत् काल कहते हैं।
- पहचान: वाक्यों के अंत में ‘गा’, ‘गी’, ‘गे’ आते हैं।
भविष्यत् काल के उपभेद (Sub-types of Future Tense):
भविष्यत् काल के मुख्य रूप से तीन (3) उपभेद होते हैं।
क) सामान्य भविष्यत् काल (Simple Future):
- क्रिया आने वाले समय में सामान्य रूप से होगी।
- पहचान: ‘गा’, ‘गी’, ‘गे’।
- उदाहरण: राम रोटी खाएगा। / मोहन आएगा। / हम कल दिल्ली जाएँगे।
ख) संभाव्य भविष्यत् काल (Subjunctive Future):
- भविष्य में कार्य के होने की संभावना, इच्छा या आशा व्यक्त की जाती है।
- पहचान: इसमें क्रिया के साथ ‘शायद’, ‘संभवतः’ जैसे शब्द आते हैं या क्रिया ‘ए’, ‘ऐं’, ‘ओ’ पर समाप्त होती है।
- उदाहरण: शायद आज वर्षा हो। / संभव है कि चोर पकड़ा जाए। / वह आए तो मैं जाऊँ।
ग) हेतु-हेतुमद् भविष्यत् काल (Conditional Future):
- जब भविष्य में एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर करता है।
- पहचान: ‘यदि…तो…’, ‘अगर…तो…’ का प्रयोग होता है।
- उदाहरण: यदि तुम परिश्रम करोगे, तो सफल हो जाओगे। / वह आए, तो मैं जाऊँगा।
क्रिया-विशेषण (Adverb)
परिभाषा:
वे अविकारी (अव्यय) शब्द जो वाक्य में क्रिया (Verb) की विशेषता बताते हैं, क्रिया-विशेषण कहलाते हैं।
- यह बताते हैं कि क्रिया कब (when), कहाँ (where), कैसे (how) और कितनी (how much) हुई।
- ‘अविकारी’ का अर्थ है कि इन शब्दों पर लिंग, वचन, कारक का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, ये हमेशा अपने मूल रूप में ही रहते हैं।
विशेषण और क्रिया-विशेषण में अंतर:
- विशेषण: संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है।
- क्रिया-विशेषण: क्रिया की विशेषता बताता है।
- उदाहरण:
- “धीमे लोग पीछे रह जाते हैं।” (यहाँ ‘धीमे’ शब्द ‘लोग’ (संज्ञा) की विशेषता बता रहा है → विशेषण)
- “कछुआ धीरे-धीरे चलता है।” (यहाँ ‘धीरे-धीरे’ शब्द ‘चलता है’ (क्रिया) की विशेषता बता रहा है → क्रिया-विशेषण)
क्रिया-विशेषण के भेद (Types of Adverb)
अर्थ के आधार पर, क्रिया-विशेषण के चार (4) मुख्य भेद होते हैं:
1. कालवाचक क्रिया-विशेषण (Adverb of Time)
- परिभाषा: जो क्रिया-विशेषण क्रिया के होने के समय का बोध कराते हैं, उन्हें कालवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
- पहचान की ट्रिक: यह क्रिया से “कब?” (When?) प्रश्न करने पर उत्तर देता है।
- उदाहरण:
- वह कल आएगा। (प्रश्न: कब आएगा? → उत्तर: कल)
- तुम अभी जाओ।
- मैं हमेशा सच बोलता हूँ।
- आज बारिश होगी।
- प्रमुख शब्द: आज, कल, परसों, अब, जब, तब, अभी, कभी, तुरंत, पहले, बाद में, प्रतिदिन, हमेशा, लगातार, दिन भर, आजकल।
2. स्थानवाचक क्रिया-विशेषण (Adverb of Place)
- परिभाषा: जो क्रिया-विशेषण क्रिया के होने के स्थान या दिशा का बोध कराते हैं, उन्हें स्थानवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
- पहचान की ट्रिक: यह क्रिया से “कहाँ?” (Where?) प्रश्न करने पर उत्तर देता है।
- उदाहरण:
- बच्चे ऊपर खेल रहे हैं। (प्रश्न: कहाँ खेल रहे हैं? → उत्तर: ऊपर)
- ईश्वर सर्वत्र है।
- तुम यहाँ बैठो।
- वह उधर चला गया।
- प्रमुख शब्द: यहाँ, वहाँ, जहाँ, कहाँ, अंदर, बाहर, ऊपर, नीचे, आगे, पीछे, पास, दूर, दाएँ, बाएँ, इधर, उधर, सर्वत्र।
3. रीतिवाचक क्रिया-विशेषण (Adverb of Manner)
- परिभाषा: जो क्रिया-विशेषण क्रिया के होने की रीति या ढंग (तरीका) का बोध कराते हैं, उन्हें रीतिवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
- पहचान की ट्रिक: यह क्रिया से “कैसे?” (How?) प्रश्न करने पर उत्तर देता है।
- उदाहरण:
- घोड़ा तेज दौड़ता है। (प्रश्न: कैसे दौड़ता है? → उत्तर: तेज)
- कछुआ धीरे-धीरे चलता है।
- बारिश अचानक आ गई।
- अवश्य सफल होंगे।
- प्रमुख शब्द: धीरे-धीरे, तेज, अचानक, सहसा, शायद, अवश्य, इसलिए, ध्यानपूर्वक, भली-भाँति, ऐसे, वैसे, वैसे।
4. परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण (Adverb of Degree/Quantity)
- परिभाषा: जो क्रिया-विशेषण क्रिया की मात्रा (quantity) या परिमाण (degree) का बोध कराते हैं, उन्हें परिमाणवाचक क्रिया-विशेषण कहते हैं।
- पहचान की ट्रिक: यह क्रिया से “कितना?” / “कितनी?” (How much?) प्रश्न करने पर उत्तर देता है।
- उदाहरण:
- वह बहुत बोलता है। (प्रश्न: कितना बोलता है? → उत्तर: बहुत)
- तुम कम खाया करो।
- उतना ही खाओ जितना पचा सको।
- वह लगभग पहुँच गया होगा।
- प्रमुख शब्द: बहुत, कम, अधिक, ज्यादा, थोड़ा, कुछ, काफी, उतना, जितना, लगभग, बिल्कुल, अत्यंत, जरा।
क्रिया-विशेषण की सारणी (Table for Quick Revision)
| भेद | क्या बताता है? | प्रश्न | उदाहरण शब्द | उदाहरण वाक्य |
| कालवाचक | समय (Time) | कब? | आज, कल, हमेशा, अभी | वह कल आएगा। |
| स्थानवाचक | स्थान/दिशा (Place) | कहाँ? | यहाँ, वहाँ, अंदर, बाहर | बच्चे बाहर खेल रहे हैं। |
| रीतिवाचक | रीति/तरीका (Manner) | कैसे? | धीरे-धीरे, तेज, अचानक | कछुआ धीरे-धीरे चलता है। |
| परिमाणवाचक | मात्रा/परिमाण (Quantity) | कितना? | बहुत, कम, ज्यादा, थोड़ा | तुम कम बोला करो। |
प्रयोग के आधार पर भेद (संक्षिप्त)
- साधारण क्रिया-विशेषण: जिनका प्रयोग वाक्य में स्वतंत्र रूप से होता है (जैसे – वह जल्दी चला गया)।
- संयोजक क्रिया-विशेषण: जो दो उपवाक्यों को जोड़ते हैं (जैसे – जहाँ तुम रहते हो, वहाँ मैं भी रहता था)।
- अनुबद्ध क्रिया-विशेषण: जो किसी शब्द के साथ अवधारणा (concept) के लिए आते हैं (जैसे – यह काम तो हो ही नहीं सकता)।
रूप के आधार पर भेद (संस्वक्षिप्त)
- मूल क्रिया-विशेषण: जो बिना किसी प्रत्यय के बनते हैं (जैसे- ठीक, अचानक, फिर)।
- यौगिक क्रिया-विशेषण: जो प्रत्यय या समास से बनते हैं (जैसे- मन से, दिन भर, प्रतिदिन)।
- स्थानीय क्रिया-विशेषण: जो अन्य शब्द-भेद होते हुए भी, क्रिया-विशेषण का काम करते हैं (जैसे – वह सिर पढ़ेगा – अर्थात् ‘मन से’ पढ़ेगा)।
व्याकरण में अर्थ के आधार पर चार भेद ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण और प्रचलित हैं।
अव्यय / अविकारी शब्द
परिभाषा:
‘अव्यय’ शब्द दो अंशों से मिलकर बना है: अ + व्यय
- अ = नहीं
- व्यय = खर्च होना या बदलना
इस प्रकार, अव्यय का शाब्दिक अर्थ है – “जो कभी व्यय (परिवर्तित) न हो।”
व्याकरणिक परिभाषा:
वे शब्द जिनके रूप में लिंग, वचन, कारक, काल, आदि के कारण कोई परिवर्तन या विकार नहीं होता, अव्यय या अविकारी शब्द कहलाते हैं। ये शब्द किसी भी परिस्थिति में हमेशा अपने मूल रूप में ही बने रहते हैं।
अव्यय के भेद (Types of Avyay)
प्रयोग के आधार पर, अव्यय के मुख्य रूप से चार (4) भेद होते हैं। कुछ विद्वान निपात को भी इसका पाँचवाँ भेद मानते हैं।
- क्रिया-विशेषण (Adverb)
- संबंधबोधक (Preposition)
- समुच्चयबोधक (Conjunction)
- विस्मयादिबोधक (Interjection)
- (निपात – Emphatic Particle)
अव्यय के भेदों की विस्तृत व्याख्या
1. क्रिया-विशेषण (Adverb)
- परिभाषा: जो अव्यय शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, वे क्रिया-विशेषण कहलाते हैं। यह बताता है कि क्रिया कब, कहाँ, कैसे और कितनी हुई।
- उदाहरण:
- कछुआ धीरे-धीरे चलता है। (क्रिया का तरीका)
- वह कल आएगा। (क्रिया का समय)
- बच्चे ऊपर खेल रहे हैं। (क्रिया का स्थान)
- तुम बहुत बोलते हो। (क्रिया की मात्रा)
- शब्द: धीरे-धीरे, तेज, आज, कल, यहाँ, वहाँ, कम, अधिक आदि।
2. संबंधबोधक (Preposition)
- परिभाषा: जो अव्यय शब्द वाक्य में आए संज्ञा या सर्वनाम का संबंध वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ बताते हैं, वे संबंधबोधक कहलाते हैं।
- पहचान की ट्रिक: ये अक्सर कारक विभक्तियों (के, की, से) के बाद आते हैं।
- उदाहरण:
- घर के पास एक मंदिर है। (‘घर’ का संबंध ‘मंदिर’ से बताया)
- मेरे घर के सामने बगीचा है।
- वह अपने मित्र के साथ गया।
- छत के ऊपर बंदर बैठा है।
- शब्द: के पास, के ऊपर, के नीचे, के सामने, के पीछे, की ओर, के बिना, के साथ, से पहले।
3. समुच्चयबोधक (Conjunction)
- परिभाषा: जो अव्यय शब्द दो शब्दों, दो वाक्यांशों, या दो वाक्यों (उपवाक्यों) को आपस में जोड़ने (connect) का काम करते हैं, वे समुच्चयबोधक कहलाते हैं। इन्हें ‘योजक’ (connector) भी कहते हैं।
- इसके दो उपभेद होते हैं:
- क) समानाधिकरण (Co-ordinator): जो दो समान स्तर के वाक्यों को जोड़ते हैं।
- शब्द: और, तथा, एवं, या, अथवा, लेकिन, किंतु, परंतु, इसलिए।
- उदाहरण: राम और श्याम भाई हैं। / मेहनत करो इसलिए सफल होगे।
- ख) व्यधिकरण (Subordinator): जो एक मुख्य उपवाक्य को एक या अधिक आश्रित उपवाक्यों से जोड़ते हैं।
- शब्द: कि, जो, क्योंकि, ताकि, यद्यपि…तथापि, जैसा…वैसा।
- उदाहरण: गाँधीजी ने कहा कि सदा सत्य बोलो। / यद्यपि वह गरीब है, तथापि ईमानदार है।
- क) समानाधिकरण (Co-ordinator): जो दो समान स्तर के वाक्यों को जोड़ते हैं।
4. विस्मयादिबोधक (Interjection)
- परिभाषा: जो अव्यय शब्द हर्ष, शोक, आश्चर्य, घृणा, प्रशंसा, आदि मन के भावों (emotions) को अचानक और तीव्रता से प्रकट करते हैं, वे विस्मयादिबोधक कहलाते हैं।
- पहचान की ट्रिक: इन शब्दों के बाद अक्सर विस्मयादिबोधक चिह्न (!) लगा होता है।
- उदाहरण:
- वाह! क्या सुंदर दृश्य है! (हर्ष)
- अरे! तुम कब आए? (आश्चर्य)
- हाय! उसका सब कुछ लुट गया। (शोक)
- छि! कितनी गंदगी है। (घृणा)
- शाबाश! तुमने बहुत अच्छा काम किया। (प्रशंसा)
- शब्द: वाह!, अरे!, हे!, हाय!, छि!, शाबाश!, ओहो!
5. निपात (Nipat – Emphatic Particle)
- परिभाषा: जो अव्यय शब्द वाक्य में किसी शब्द या पद के बाद लगकर उसके अर्थ में एक विशेष प्रकार का बल (emphasis) भर देते हैं, निपात कहलाते हैं।
- इनका अपना कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता और ये वाक्य के अंग नहीं माने जाते।
- उदाहरण:
- ही: मुझे यह काम आज ही करना है। (आज पर बल)
- भी: तुम भी मेरे साथ चलो।
- तो: राम तो आएगा।
- तक: मैं रात तक इंतजार करूँगा।
- भर: मुझे मात्र दस रुपये भर चाहिए।
- शब्द: ही, भी, तो, तक, भर, मात्र, केवल।
अविकारी होने का प्रमाण (Proof of being Indeclinable)
आइए एक उदाहरण से समझते हैं कि ये शब्द क्यों नहीं बदलते:
- मूल वाक्य: लड़का धीरे-धीरे और चुपचाप घर के अंदर गया।
- लिंग बदलने पर: लड़की धीरे-धीरे और चुपचाप घर के अंदर गई।
- वचन बदलने पर: लड़के धीरे-धीरे और चुपचाप घर के अंदर गए।
आप देख सकते हैं कि ‘धीरे-धीरे’, ‘और’, ‘चुपचाप’, ‘के अंदर’ – इन शब्दों में लिंग या वचन के कारण कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसलिए ये अव्यय / अविकारी शब्द हैं।
कारक (Case)
परिभाषा:
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उसका संबंध क्रिया (Verb) तथा वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ जाना जाता है, उसे ‘कारक’ कहते हैं।
- सरल शब्दों में, कारक वह व्याकरणिक इकाई है जो यह बताती है कि वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा या सर्वनाम शब्द क्या काम कर रहा है (जैसे- काम को करने वाला है, जिस पर काम का असर हो रहा है, या जिसके लिए काम हो रहा है आदि)।
- कारक के इस संबंध को प्रकट करने के लिए जिन चिह्नों (symbols) का प्रयोग किया जाता है, उन्हें कारक चिह्न, विभक्ति, या परसर्ग (postposition) कहते हैं।
उदाहरण:
“राम ने रावण को बाण से मारा।”
इस वाक्य में:
- ‘ने’ चिह्न बता रहा है कि मारने का काम ‘राम’ ने किया (राम कर्ता कारक है)।
- ‘को’ चिह्न बता रहा है कि मारने का असर ‘रावण’ पर हुआ (रावण कर्म कारक है)।
- ‘से’ चिह्न बता रहा है कि मारने का साधन ‘बाण’ था (बाण करण कारक है)।
कारक के भेद और उनके विभक्ति चिह्न
हिन्दी में कारक के आठ (8) भेद माने जाते हैं। प्रत्येक कारक का अपना एक निश्चित विभक्ति चिह्न होता है, जिसे याद रखना बहुत आवश्यक है।
| क्र. सं. | कारक का नाम | विभक्ति चिह्न / परसर्ग | अर्थ / पहचान का तरीका |
| 1. | कर्ता कारक | ने | काम को करने वाला (Who did it?) |
| 2. | कर्म कारक | को | क्रिया का फल/असर जिस पर पड़े (What? / Whom?) |
| 3. | करण कारक | से, के द्वारा | क्रिया को करने का साधन या माध्यम (With what? / By what?) |
| 4. | संप्रदान कारक | को, के लिए, हेतु | जिसके लिए क्रिया की जाए (For whom?) |
| 5. | अपादान कारक | से (अलग होने के अर्थ में) | अलग होना, तुलना करना, डरना, शर्माना |
| 6. | संबंध कारक | का, की, के, रा, री, रे | संबंध बताना (Whose?) |
| 7. | अधिकरण कारक | में, पर | क्रिया के होने का स्थान या समय (आधार) (Where? / When?) |
| 8. | संबोधन कारक | हे!, अरे!, ओ!, अजी! | पुकारना, बुलाना, संबोधित करना |
सभी कारकों की विस्तृत व्याख्या (उदाहरण सहित)
1. कर्ता कारक (Nominative Case)
- पहचान: क्रिया को करने वाला।
- चिह्न: ने (यह चिह्न केवल भूतकाल की सकर्मक क्रियाओं के साथ आता है)। वर्तमान और भविष्यत् काल में ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता।
- उदाहरण:
- राम ने पत्र लिखा। (भूतकाल)
- राम पत्र लिखता है। (यहाँ कर्ता ‘राम’ है, पर ‘ने’ चिह्न नहीं है)।
- सीता खाना पकाएगी। (भविष्यत् काल)
2. कर्म कारक (Accusative Case)
- पहचान: जिस पर क्रिया का फल पड़े।
- चिह्न: को (यह चिह्न केवल सजीव कर्मों के साथ अनिवार्य रूप से लगता है; निर्जीव कर्मों के साथ अक्सर नहीं लगता)।
- उदाहरण:
- अध्यापक ने छात्र को पीटा। (सजीव कर्म)
- राम पुस्तक पढ़ता है। (निर्जीव कर्म ‘पुस्तक’, इसलिए ‘को’ नहीं लगा)।
3. करण कारक (Instrumental Case)
- पहचान: क्रिया को करने का साधन।
- चिह्न: से, के द्वारा
- उदाहरण:
- वह कलम से लिखता है। (लिखने का साधन – कलम)
- पत्र डाक के द्वारा भेजा गया।
- लड़के गेंद से खेल रहे हैं।
4. संप्रदान कारक (Dative Case)
- पहचान: जिसके लिए कोई कार्य किया जाए या जिसे कुछ दिया जाए।
- चिह्न: को, के लिए
- उदाहरण:
- माँ बच्चे के लिए दूध लाई।
- राजा ने गरीबों को वस्त्र दिए। (यहाँ ‘को’ देने के अर्थ में है, इसलिए संप्रदान)।
- नोट (कर्म ‘को’ और संप्रदान ‘को’ में अंतर): जब ‘को’ का प्रयोग ‘देने’ या ‘उपकार’ के अर्थ में हो, तो वह संप्रदान होता है। जब क्रिया का असर बताने के लिए हो, तो कर्म होता है।
5. अपादान कारक (Ablative Case)
- पहचान: जिससे कोई वस्तु अलग हो, या जिससे तुलना, भय, ईर्ष्या, लज्जा का भाव हो।
- चिह्न: से (अलग होने के अर्थ में)
- उदाहरण:
- पेड़ से पत्ता गिरता है। (अलग होना)
- गंगा हिमालय से निकलती है। (अलग होना)
- राम, श्याम से लंबा है। (तुलना)
- बच्चा शेर से डरता है। (डर)
- बहू ससुर से शर्माती है। (लज्जा)
6. संबंध कारक (Genitive/Possessive Case)
- पहचान: जो संज्ञा या सर्वनाम का अन्य संज्ञा या सर्वनाम से संबंध बताए।
- चिह्न: का, की, के, रा, री, रे (मेरा, मेरी, मेरे)
- उदाहरण:
- यह राम का घर है।
- राम की बहन आ रही है।
- यह मेरी किताब है।
7. अधिकरण कारक (Locative Case)
- पहचान: जो क्रिया के होने का आधार (स्थान या समय) बताए।
- चिह्न: में, पर
- उदाहरण:
- मछलियाँ पानी में रहती हैं। (रहने का स्थान)
- किताब मेज पर रखी है। (रखने का स्थान)
- वह तीन घंटे में लौटेगा। (लौटने का समय)
8. संबोधन कारक (Vocative Case)
- पहचान: किसी को पुकारने, बुलाने या सचेत करने के लिए।
- चिह्न: हे!, अरे!, ओ!, अजी! (इनके बाद विस्मयादिबोधक चिह्न ‘!’ लगता है)।
- उदाहरण:
- हे राम! यह क्या हो गया?
- अरे भाई! तुम कब आए?
- ओ लड़के! इधर आ।