भाषा (Language)

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भाषा (Language)

भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों, भावों और अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं। यह मानव समाज में संचार का सबसे महत्वपूर्ण और सशक्त साधन है। भाषा के बिना मनुष्य अपने विचारों को व्यक्त नहीं कर सकता और न ही दूसरों के विचारों को समझ सकता है।

1. भाषा की परिभाषा:

सरल शब्दों में, भाषा ध्वनियों और प्रतीकों की एक व्यवस्थित प्रणाली है जिसका उपयोग मनुष्य आपसी संचार के लिए करते हैं। यह प्रतीकों का एक ऐसा सेट है, जिसका कुछ अर्थ होता है, और इन प्रतीकों को व्यवस्थित करने के लिए कुछ नियम होते हैं (जिन्हें व्याकरण कहते हैं)।

2. भाषा की प्रमुख विशेषताएँ:

भाषा कुछ विशिष्ट गुणों से युक्त होती है जो इसे मानव समाज के लिए इतना आवश्यक बनाते हैं:

3. भाषा के मुख्य रूप:

भाषा को मुख्यतः दो प्रमुख रूपों में देखा जाता है, हालाँकि सांकेतिक भाषा भी एक महत्वपूर्ण रूप है:

4. भाषा का महत्व:

भाषा मानव जीवन और समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:

5. बोली, उपभाषा और भाषा में अंतर:

भाषा मानव जाति की सबसे अद्भुत और महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिसके बिना आधुनिक सभ्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती।


भाषा और व्याकरण

भाषा और व्याकरण (Language and Grammar)

भाषा: विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम

भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारों, भावों, अनुभवों और इच्छाओं को व्यक्त करता है और दूसरों के विचारों को समझता है। यह सामाजिक जीवन की आधारशिला है और संचार का सबसे प्रमुख साधन है।

भाषा समय के साथ बदलती रहती है, नए शब्द जुड़ते हैं, और पुराने अप्रचलित हो जाते हैं। यह किसी समाज की संस्कृति, ज्ञान और पहचान का आईना होती है।

व्याकरण: भाषा को नियंत्रित करने वाले नियम

व्याकरण वह शास्त्र या विज्ञान है जो भाषा को शुद्ध रूप में बोलने, लिखने और समझने के नियम सिखाता है। यह भाषा की संरचना, शब्दों के गठन, और वाक्यों की रचना को नियंत्रित करता है।

परिभाषा:

इसे ‘भाषा का संविधान’ भी कहा जा सकता है। जैसे संविधान किसी देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए नियम बनाता है, वैसे ही व्याकरण भाषा को अनुशासित और व्यवस्थित करता है।

व्याकरण के प्रमुख अंग (Parts of Grammar)

व्याकरण का अध्ययन मुख्य रूप से तीन (या कभी-कभी चार) भागों में विभाजित किया जाता है:

  1. वर्ण-विचार (Orthography/Phonology):
    • इसमें वर्णों (अक्षरों) के आकार, प्रकार, उनके उच्चारण स्थान, और लिखने की विधि का अध्ययन किया जाता है।
    • स्वर, व्यंजन, मात्राएँ, उच्चारण आदि इसी के अंतर्गत आते हैं।
  2. शब्द-विचार (Morphology/Etymology):
    • इसमें शब्दों के भेद (संज्ञा, सर्वनाम आदि), उनकी उत्पत्ति (तत्सम, तद्भव), उनकी रचना (रूढ़, यौगिक), और उनके रूपांतरण (लिंग, वचन, कारक) का अध्ययन किया जाता है।
  3. वाक्य-विचार (Syntax):
    • इसमें वाक्य की रचना, वाक्य के अंग (उद्देश्य-विधेय), वाक्य के प्रकार (सरल, संयुक्त), विराम चिह्नों का प्रयोग और वाक्य-शुद्धि का अध्ययन किया जाता है।
  4. (पद-विचार): कुछ व्याकरण विशेषज्ञ इसे एक अलग अंग मानते हैं, जिसमें वाक्य में प्रयुक्त होने वाले शब्दों (पदों) और उनके व्याकरणिक परिचय का अध्ययन किया जाता है।

भाषा और व्याकरण का अटूट संबंध

भाषा और व्याकरण एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। इनका संबंध इस प्रकार समझा जा सकता है:

निष्कर्ष

भाषा एक जीवंत नदी की तरह है, जो स्वाभाविक रूप से बहती है, और व्याकरण उस नदी के दो किनारों की तरह है, जो उसे सही दिशा में और मर्यादा के साथ बहने में मदद करते हैं। बिना व्याकरण के भाषा अनियंत्रित, अव्यवस्थित और अस्पष्ट हो सकती है, जबकि बिना भाषा के व्याकरण का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

संक्षेप में:

दोनों मिलकर ही एक सशक्त और सार्थक संचार प्रणाली का निर्माण करते हैं।


भाषा की परिभाषा (Definition of Language)

भाषा शब्द संस्कृत के ‘भाष्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है ‘बोलना’ या ‘कहना’। यह वह साधन (माध्यम) है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारों, भावों, इच्छाओं और अनुभवों को दूसरों के सामने प्रकट करता है और दूसरों के विचारों को समझता है।

सरल शब्दों में, भाषा सार्थक ध्वनियों और संकेतों की एक ऐसी व्यवस्थित प्रणाली है जिसका उपयोग समाज में रहने वाले लोग आपसी संचार के लिए करते हैं।

कुछ प्रमुख परिभाषाएँ:


भाषा के प्रकार (Types of Language)

संचार के माध्यम के आधार पर भाषा के मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं:

1. मौखिक भाषा (Oral Language)

परिभाषा: जब हम बोलकर अपने विचारों को प्रकट करते हैं और सामने वाला सुनकर उसे समझता है, तो उसे मौखिक भाषा कहते हैं। यह भाषा का सबसे प्राचीन, स्वाभाविक और सर्वाधिक प्रयोग किया जाने वाला रूप है।

2. लिखित भाषा (Written Language)

परिभाषा: जब हम लिखकर अपने विचारों को प्रकट करते हैं और कोई दूसरा व्यक्ति उसे पढ़कर समझता है, तो उसे लिखित भाषा कहते हैं। इसमें वर्णों, अक्षरों और प्रतीकों की एक निश्चित व्यवस्था का प्रयोग किया जाता है, जिसे लिपि (Script) कहते हैं।

3. सांकेतिक भाषा (Sign Language)

परिभाषा: जब विचारों और भावों का आदान-प्रदान इशारों, संकेतों या शारीरिक हाव-भावों के माध्यम से किया जाता है, तो उसे सांकेतिक भाषा कहते हैं।


तीनों रूपों की तुलना

आधारमौखिक भाषालिखित भाषासांकेतिक भाषा
माध्यमध्वनि (Sound)लिपि/वर्ण (Script/Letters)संकेत/इशारे (Signs/Gestures)
स्थायित्वअस्थायी (Temporary)स्थायी (Permanent)अस्थायी (Temporary)
सीखने की प्रक्रियास्वाभाविक/अनुकरण द्वाराऔपचारिक शिक्षा/अभ्यास द्वाराअनुकरण या प्रशिक्षण द्वारा
क्षेत्र/व्यापकतासीमित (सुनने वाले तक)अत्यंत व्यापक (दूर-दूर तक)बहुत सीमित
स्पष्टताप्रायः स्पष्टसर्वाधिक स्पष्ट और प्रामाणिकसीमित स्पष्टता

बोली (Dialect)

परिभाषा:
बोली, भाषा का वह सीमित और क्षेत्रीय रूप है जो किसी स्थान विशेष में स्थानीय लोगों द्वारा बोलचाल के लिए प्रयोग किया जाता है। यह भाषा का सबसे छोटा और आधारभूत रूप है। बोली मुख्य रूप से मौखिक होती है और इसका कोई मानक लिखित रूप या व्याकरण नहीं होता।

सरल शब्दों में, जब एक ही भाषा अलग-अलग जगहों पर थोड़ी-थोड़ी भिन्नता के साथ बोली जाती है, तो उसके इन विभिन्न रूपों को ‘बोली’ कहते हैं।


बोली की प्रमुख विशेषताएँ:

  1. सीमित क्षेत्र: बोली का प्रयोग एक बहुत ही सीमित भौगोलिक क्षेत्र में होता है, जैसे कोई गाँव, कस्बा या जिला।
  2. मौखिक रूप: यह मुख्य रूप से बोलचाल तक ही सीमित होती है। इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनकर और अनुकरण करके ही सीखा जाता है।
  3. मानक व्याकरण का अभाव: बोली का कोई निश्चित और लिखित व्याकरण नहीं होता। इसके नियम स्थानीय स्तर पर ही तय होते हैं और उनमें विविधता पाई जाती है।
  4. साहित्य का अभाव: सामान्यतः बोली में उच्च कोटि के साहित्य की रचना नहीं होती। इसमें ज्यादातर लोकगीत, लोक-कथाएँ और कहावतें ही मिलती हैं।
  5. घरेलू और अनौपचारिक प्रयोग: बोली का प्रयोग घरेलू बातचीत और अनौपचारिक संचार में किया जाता है। इसे शिक्षा, प्रशासन या कार्यालयों में उपयोग नहीं किया जाता।
  6. शब्द भंडार में स्थानीयता: बोली में स्थानीयता का गहरा प्रभाव होता है, और इसमें उस क्षेत्र विशेष में प्रचलित शब्द अधिक होते हैं।

बोली, उपभाषा और भाषा में संबंध और अंतर:

इन तीनों के बीच एक पदानुक्रम (hierarchy) का संबंध है। यह एक विकास की प्रक्रिया को दर्शाता है।

संक्षेप में, प्रक्रिया:
बोली → उपभाषा → भाषा


हिन्दी की प्रमुख उपभाषाएँ और उनके अंतर्गत आने वाली बोलियाँ:

हिन्दी भाषा को मुख्य रूप से 5 उपभाषाओं में बांटा गया है, जिनके अंतर्गत 17-18 प्रमुख बोलियाँ आती हैं:

  1. पश्चिमी हिन्दी: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणवी (बाँगरू), बुंदेली, कन्नौजी।
  2. पूर्वी हिन्दी: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
  3. बिहारी हिन्दी: भोजपुरी, मगही, मैथिली।
  4. राजस्थानी हिन्दी: मारवाड़ी (पश्चिमी राजस्थानी), जयपुरी/ढूंढाड़ी (पूर्वी राजस्थानी), मेवाती (उत्तरी राजस्थानी), मालवी (दक्षिणी राजस्थानी)।
  5. पहाड़ी हिन्दी: कुमाऊँनी, गढ़वाली।

तुलनात्मक सारणी

आधारबोली (Dialect)उपभाषा (Sub-language)भाषा (Language)
क्षेत्रसीमित (जिला/कस्बा)विस्तृत (कई जिले/क्षेत्र)अत्यंत व्यापक (पूरा राज्य/देश)
साहित्यनहीं होता (केवल लोकगीत)रचित हो सकता हैसमृद्ध और मानक साहित्य होता है
व्याकरणमानक नहीं होतानिश्चित हो सकता हैमानक और सर्वमान्य होता है
प्रयोगकेवल अनौपचारिक बोलचालसाहित्यिक और बोलचालऔपचारिक (शिक्षा, प्रशासन, साहित्य)
मान्यतास्थानीय स्तर परक्षेत्रीय स्तर परराष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर

निष्कर्ष

बोली किसी भी जीवंत भाषा की जड़ होती है। यह भाषा को स्थानीय रंग, विविधता और नए शब्द प्रदान करके उसे समृद्ध बनाती है। हर मानक भाषा की शुरुआत एक बोली के रूप में ही होती है, जो समय के साथ विकसित होकर एक विस्तृत रूप धारण कर लेती है।


खड़ी बोली (Khari Boli)

परिभाषा:
खड़ी बोली, पश्चिमी हिन्दी उपभाषा की एक प्रमुख बोली है, जो अपने परिनिष्ठित और मानकीकृत रूप में आज की मानक हिन्दी (Standard Hindi) और मानक उर्दू का आधार है। इसका उद्भव दिल्ली-मेरठ के आसपास के क्षेत्र में हुआ और आज यह भारत की राजभाषा, संपर्क भाषा और शिक्षा-साहित्य की मुख्य भाषा बन चुकी है।

इसे ‘कौरवी’ (Kauravi) के नाम से भी जाना जाता है, यह नाम विद्वान राहुल सांकृत्यायन द्वारा दिया गया था।


“खड़ी बोली” नाम का अर्थ:

इस नामकरण के पीछे कई मत प्रचलित हैं:

  1. खरी या शुद्ध: कुछ विद्वानों का मानना है कि ‘खड़ी’ का अर्थ ‘खरी’ अर्थात् ‘शुद्ध’ (pure) है, जो अन्य बोलियों की तुलना में अधिक परिमार्जित थी।
  2. खड़ी पाई: इसके अधिकांश शब्दों के अंत में ‘आ’ की मात्रा (खड़ी पाई) का प्रयोग होता है (जैसे – आया, गया, मेरा, घोड़ा), जबकि ब्रजभाषा में ‘ओ’ की मात्रा (आयो, गयो, मेरो) का प्रयोग होता था।
  3. कर्कशता: ब्रजभाषा और अवधी की तुलना में इसकी ध्वनि कर्कश और खड़ी-खड़ी (erect/stark) लगती थी, इसलिए इसे ‘खड़ी बोली’ कहा गया।

भौगोलिक क्षेत्र (Geographical Area):

खड़ी बोली का मूल क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली के आसपास का इलाका है। इसके मुख्य केंद्र हैं:


खड़ी बोली का ऐतिहासिक विकास: हिन्दी का आधार बनने की यात्रा

खड़ी बोली का एक स्थानीय बोली से राष्ट्रभाषा बनने तक का सफर अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे तीन चरणों में समझा जा सकता है:

1. आदिकाल और मध्यकाल:

2. आधुनिक काल (सबसे महत्वपूर्ण चरण):
आधुनिक काल में खड़ी बोली का गद्य और पद्य दोनों में अभूतपूर्व विकास हुआ।

3. स्वतंत्रता के बाद:
स्वतंत्रता के बाद, इसी मानकीकृत खड़ी बोली को ‘हिन्दी’ के रूप में भारत की राजभाषा का दर्जा दिया गया और आज यही शिक्षा, मीडिया, साहित्य, सिनेमा और प्रशासन की भाषा है।


खड़ी बोली की प्रमुख विशेषताएँ:

  1. आकारांत प्रवृत्ति: शब्दों के अंत में ‘आ’ स्वर की प्रधानता होती है। (उदा. – लड़का, खाया, अपना)।
  2. सरलता और स्पष्टता: यह ब्रजभाषा और अवधी की तरह मधुर और कोमल नहीं, बल्कि सीधी और स्पष्ट है।
  3. द्वित्व व्यंजनों का प्रयोग: ‘बेटा’ को ‘बेट्टा’, ‘गया’ को ‘गय्या’ बोलने की प्रवृत्ति ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी है।
  4. शब्दावली: इसकी मूल शब्दावली तद्भव शब्दों पर आधारित है, लेकिन मानक रूप में यह संस्कृत (तत्सम), अरबी-फारसी और अंग्रेजी के शब्दों को भी सहजता से अपना लेती है।

निष्कर्ष

खड़ी बोली की यात्रा एक छोटी-सी क्षेत्रीय बोली से एक विशाल राष्ट्र की राजभाषा और संपर्क भाषा बनने की अद्भुत कहानी है। आज जब हम ‘हिन्दी’ की बात करते हैं, तो व्याकरणिक और साहित्यिक दृष्टि से हमारा तात्पर्य इसी मानकीकृत खड़ी बोली से होता है।


मानक भाषा (Standard Language)

परिभाषा:
मानक भाषा, किसी भाषा के उस सर्वमान्य, शुद्ध, और परिनिष्ठित रूप को कहते हैं, जिसे उस भाषा के सभी शिक्षित व्यक्ति अपने औपचारिक लेखन, पठन-पाठन, सरकारी कामकाज और सामाजिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान में प्रयोग करते हैं।

यह भाषा का वह रूप है जो व्याकरण के नियमों से नियंत्रित होता है और जिसे क्षेत्रीय प्रभावों से मुक्त माना जाता है ताकि उसे पूरे भाषा-क्षेत्र में एक समान रूप से समझा और प्रयोग किया जा सके।

सरल शब्दों में, जैसे व्यापार के लिए एक मानक बाट (किलोग्राम) या दूरी के लिए एक मानक इकाई (मीटर) होती है, वैसे ही भाषा के शुद्ध और सर्वमान्य रूप को मानक भाषा कहते हैं।


मानक भाषा की आवश्यकता क्यों है? (Purpose of Standard Language)

किसी भी भाषा में एक मानक रूप की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है:

  1. भाषा में एकरूपता लाना: एक ही भाषा की कई बोलियाँ और उपभाषाएँ होती हैं। मानक रूप इन सभी में एकरूपता लाता है, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
  2. व्यापक स्तर पर संचार: मानक भाषा के माध्यम से अलग-अलग बोली बोलने वाले लोग भी आपस में आसानी से विचार-विमर्श कर सकते हैं।
  3. शिक्षा का माध्यम: स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम मानक भाषा ही होती है। पाठ्यपुस्तकें इसी भाषा में लिखी जाती हैं।
  4. सरकारी कामकाज: देश का प्रशासनिक कार्य, कानून और न्याय-व्यवस्था एक ही भाषा में होनी चाहिए, और वह मानक भाषा होती है।
  5. साहित्य और ज्ञान का संरक्षण: उच्च कोटि का साहित्य, विज्ञान और तकनीकी ज्ञान मानक भाषा में ही लिखा जाता है ताकि वह सभी के लिए सुलभ हो सके।

मानक भाषा बनती कैसे है? (Process of Standardization)

कोई भी मानक भाषा हमेशा से मानक नहीं होती। यह एक लंबी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया से गुजरकर यह दर्जा प्राप्त करती है। इसके चरण इस प्रकार हैं:

  1. बोली से शुरुआत: सबसे पहले वह भाषा एक सीमित क्षेत्र की बोली (dialect) होती है।
  2. साहित्यिक प्रयोग: जब उस बोली में कोई प्रतिभाशाली साहित्यकार उच्च कोटि की रचनाएँ करने लगता है, तो उसका महत्व बढ़ जाता है।
  3. विस्तार और स्वीकृति: धीरे-धीरे वह बोली अपने क्षेत्र से बाहर निकलकर अन्य क्षेत्रों में भी लोकप्रिय होने लगती है और शिक्षित वर्ग उसे अपना लेता है।
  4. व्याकरण का निर्धारण: भाषाविद और विद्वान उस बोली का विश्लेषण करके उसके व्याकरण के नियम निश्चित करते हैं और उसकी वर्तनी (spelling) और शब्दकोश को मानकीकृत करते हैं।
  5. राज्याश्रय या सामाजिक प्रतिष्ठा: जब उसे सरकार द्वारा राजकाज की भाषा का दर्जा मिल जाता है या वह समाज में प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाती है, तब वह पूरी तरह मानक भाषा के रूप में स्थापित हो जाती है।

उदाहरण: हिन्दी भाषा
हिन्दी भाषा का मानक रूप खड़ी बोली पर आधारित है। खड़ी बोली पहले दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की एक स्थानीय बोली थी। भारतेंदु युग में यह गद्य की भाषा बनी, द्विवेदी युग में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसे व्याकरण की दृष्टि से परिमार्जित और मानकीकृत किया, और स्वतंत्रता के बाद यह भारत की राजभाषा बनी।


मानक भाषा की विशेषताएँ (Characteristics of Standard Language)


बोली और मानक भाषा में अंतर

आधारबोली (Dialect)मानक भाषा (Standard Language)
क्षेत्रसीमित एवं स्थानीयविस्तृत एवं व्यापक
व्याकरणनिश्चित व्याकरण नहीं होतासुनिर्धारित और मानक व्याकरण होता है
प्रयोगअनौपचारिक बोलचाल और घरेलू बातचीतऔपचारिक (शिक्षा, प्रशासन, साहित्य)
मान्यतास्थानीय स्तर परराष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर
लिपि/साहित्यप्रायः लिपिबद्ध नहीं, साहित्य कमनिश्चित लिपि, समृद्ध साहित्य

निष्कर्ष

मानक भाषा किसी बोली को समाप्त नहीं करती, बल्कि वह सभी बोलियों के ऊपर एक सेतु (bridge) का काम करती है, जो अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को एक साझा मंच पर लाकर जोड़ती है। बोलियाँ जहाँ भाषा में स्थानीय रंग और विविधता भरती हैं, वहीं मानक भाषा उसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और गौरव प्रदान करती है।


मानकीकरण (Standardization)

परिभाषा:
मानकीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा भाषा के किसी एक रूप या बोली को सचेत रूप से चुनकर उसे व्याकरण, वर्तनी (spelling), उच्चारण और शब्दावली की दृष्टि से सुव्यवस्थित और सर्वमान्य बनाया जाता है, ताकि वह भाषा के पूरे क्षेत्र में संचार, शिक्षा और प्रशासन के लिए एक मानक (standard) के रूप में काम कर सके।

यह प्रक्रिया भाषा की स्वाभाविक विविधता में से एकरूपता स्थापित करती है ताकि संवाद में अस्पष्टता और भ्रम को दूर किया जा सके।

सरल शब्दों में, मानकीकरण का अर्थ है भाषा के लिए “नियम तय करना”


मानकीकरण की आवश्यकता क्यों?

किसी भी विकसित भाषा के लिए मानकीकरण आवश्यक है क्योंकि:

  1. एकरूपता और स्पष्टता: यह सुनिश्चित करता है कि पूरे भाषा-क्षेत्र में शब्दों को एक ही तरह से लिखा और समझा जाए।
  2. व्यापक संचार: यह अलग-अलग बोली बोलने वाले लोगों के बीच एक पुल का काम करता है, जिससे वे एक-दूसरे से प्रभावी ढंग से संवाद कर सकें।
  3. शिक्षा और प्रशासन: पाठ्यपुस्तकों, सरकारी दस्तावेजों और कानूनों के लिए एक निश्चित और सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता होती है।
  4. ज्ञान का प्रसार: वैज्ञानिक, तकनीकी और साहित्यिक ज्ञान को एक मानक भाषा में ही प्रभावी ढंग से संचित और प्रसारित किया जा सकता है।
  5. भाषा को प्रतिष्ठा: मानकीकरण भाषा को एक गौरवपूर्ण और प्रतिष्ठित दर्जा दिलाता है।

भाषा के मानकीकरण की प्रक्रिया (Process of Standardization)

मानकीकरण एक स्वाभाविक और सचेत, दोनों तरह की प्रक्रिया है। इसके मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:

  1. चयन (Selection):
    सबसे पहले, किसी भाषा की विभिन्न बोलियों में से किसी एक बोली का चयन किया जाता है। यह चयन अक्सर उस बोली का होता है जो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक रूप से अधिक प्रभावशाली होती है।
    • उदाहरण: हिन्दी के लिए खड़ी बोली का चयन हुआ, क्योंकि यह दिल्ली के आसपास के राजनीतिक और व्यापारिक केंद्र की बोली थी।
  2. संहिताकरण / कोडिफिकेशन (Codification):
    यह मानकीकरण का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इसमें चुनी हुई बोली को नियमबद्ध किया जाता है।
    • व्याकरण लिखना: उस भाषा के नियमों को स्पष्ट करने के लिए एक मानक व्याकरण तैयार किया जाता है।
    • शब्दकोश बनाना: भाषा के शब्दों और उनके अर्थों को संकलित करके एक मानक शब्दकोश (dictionary) बनाया जाता है।
    • वर्तनी निश्चित करना: शब्दों को लिखने का एक निश्चित और सर्वमान्य तरीका (standard spelling) तय किया जाता है।
  3. विस्तारीकरण / प्रकार्यात्मक विकास (Elaboration/Functional Development):
    इस चरण में, मानकीकृत भाषा को जीवन के नए क्षेत्रों (जैसे विज्ञान, कानून, प्रौद्योगिकी, मीडिया) में प्रयोग करने के लायक बनाया जाता है। इसके लिए नई शब्दावली गढ़ी जाती है या अन्य भाषाओं से शब्द उधार लिए जाते हैं।
    • उदाहरण: विधि, विज्ञान और तकनीक के लिए पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण।
  4. स्वीकृति (Acceptance):
    अंतिम चरण में, समाज उस मानकीकृत रूप को स्वीकार कर लेता है। जब शिक्षित वर्ग, लेखक, सरकार और मीडिया उसे अपना लेते हैं, तो यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है।

हिन्दी भाषा के मानकीकरण का उदाहरण

हिन्दी का मानकीकरण इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है:

वर्तनी के मानकीकरण के कुछ उदाहरण:

पुराना/अमानक रूपनया/मानक रूपमानकीकरण का कारण
गयी, आयी, हुयीगई, आई, हुईक्रियापदों में अंत में ‘ई’ स्वर का प्रयोग
नयी, स्थायीनई, स्थाई‘य’ की जगह स्वर का प्रयोग (कुछ विद्वान अभी भी ‘स्थायी’ को सही मानते हैं)
अन्तर्لمانياअन्तर्राष्ट्रीय‘र’ के पंचमाक्षर और अनुस्वार संबंधी नियम
खायेगाखाएगाक्रिया के रूपों में एकरूपता
चाहियेचाहिएएकरूपता लाने के लिए

निष्कर्ष

मानकीकरण एक सतत और गतिशील प्रक्रिया है। यह किसी भाषा को जड़ नहीं बनाता, बल्कि उसे समय की जरूरतों के अनुसार विकसित होने में मदद करता है। यह भाषा के स्थानीय रूपों (बोलियों) को समाप्त नहीं करता, बल्कि उनके ऊपर एक ऐसी सर्वमान्य परत बनाता है जो व्यापक संचार और राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है।


भाषा के मानकीकरण के सोपान (Stages of Standardization)

सोपान 1: चयन (Selection)

यह मानकीकरण की प्रक्रिया का पहला और सबसे आधारभूत चरण है। इसमें किसी भाषा-समुदाय में प्रचलित विभिन्न बोलियों या उपभाषाओं में से किसी एक को मानक भाषा के आधार के रूप में चुना जाता है।

सोपान 2: संहिताकरण / कूटबद्धन (Codification)

एक बार बोली का चयन हो जाने के बाद, उसे नियमबद्ध और व्यवस्थित करने का कार्य किया जाता है। यही संहिताकरण है। इसका उद्देश्य भाषा की संरचना को निश्चित और स्थिर करना है ताकि उसमें एकरूपता आ सके।

सोपान 3: प्रकार्यात्मक संवर्धन / विस्तार (Elaboration of Function)

इस चरण में, मानकीकृत भाषा की क्षमता का विकास और विस्तार किया जाता है ताकि वह जीवन के सभी उच्च-स्तरीय क्षेत्रों में सफलतापूर्वक प्रयोग की जा सके। इसे केवल बोलचाल और सामान्य साहित्य तक सीमित न रखकर और अधिक जटिल कार्यों के योग्य बनाया जाता है।

सोपान 4: स्वीकृति (Acceptance)

यह मानकीकरण का अंतिम सोपान है, जहाँ भाषा-समुदाय द्वारा उस मानकीकृत रूप को स्वीकार कर लिया जाता है और उसे प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। यह स्वीकृति ही किसी भाषा को वास्तविक रूप में ‘मानक’ बनाती है।


निष्कर्ष

यह चारों सोपान मिलकर एक बोली को एक पूर्ण विकसित मानक भाषा में बदल देते हैं। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें समय के साथ संशोधन और विकास की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।


अमानक भाषा (Non-Standard Language)

परिभाषा:
अमानक भाषा, किसी भाषा के उस रूप को कहते हैं जो व्याकरण के स्थापित नियमों का पालन नहीं करता और जिसे शिक्षित समाज द्वारा औपचारिक लेखन, भाषण या सार्वजनिक संचार में स्वीकार नहीं किया जाता है।

यह भाषा का वह स्वरूप है जो क्षेत्रीयता, अशिक्षा, बोलचाल की सहजता या व्यक्तिगत आदतों के प्रभाव में मानक भाषा के नियमों से भटक जाता है। इसे अक्सर ‘अशुद्ध’ या ‘अपरिमार्जित’ भाषा भी माना जाता है, हालांकि भाषावैज्ञानिक दृष्टि से यह केवल भाषा का एक ‘भिन्न रूप’ होता है।

सरल शब्दों में, मानक भाषा यदि भाषा का ‘संविधान’ है, तो अमानक भाषा उन बोलचाल के रूपों की तरह है जो उस संविधान के नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं करते।


अमानक भाषा की विशेषताएँ:

  1. व्याकरण के नियमों की अवहेलना: इसमें लिंग, वचन, कारक, क्रिया और वाक्य-विन्यास संबंधी अशुद्धियाँ पाई जाती हैं।
  2. क्षेत्रीय प्रभाव (Dialectal Influence): अमानक भाषा पर स्थानीय बोलियों का गहरा प्रभाव होता है। लोग अक्सर अपनी बोली के शब्दों, लहजे और वाक्य-रचना को मानक भाषा में मिला देते हैं।
  3. अनौपचारिक प्रयोग: इसका प्रयोग मुख्य रूप से अनौपचारिक बातचीत, घरेलू संवाद और मित्रों के बीच होता है।
  4. लिखित रूप में भिन्नता: अमानक भाषा को जब लिखा जाता है, तो उसकी वर्तनी (spelling) में अक्सर एकरूपता नहीं होती।
  5. सामाजिक अस्वीकृति: इसे शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और औपचारिक लेखन जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों में प्रयोग के लिए अनुपयुक्त समझा जाता है।

अमानक भाषा के कुछ उदाहरण (हिन्दी के संदर्भ में):

यहाँ मानक भाषा और उसकी तुलना में अमानक भाषा के कुछ उदाहरण दिए गए हैं, जो आमतौर पर सुनने और देखने को मिलते हैं:

श्रेणीमानक भाषा (Standard Language)अमानक भाषा (Non-Standard Language)अमानकता का कारण
सर्वनाम संबंधीमुझे जाना है।मेरे को जाना है। / अपुन को जाना है।सर्वनाम का गलत प्रयोग
क्रिया संबंधीआप बैठिए।आप बैठो।आदरसूचक क्रिया का गलत प्रयोग
लिंग संबंधीमेरी कलम खो गई।मेरा कलम खो गया।‘कलम’ (स्त्रीलिंग) के साथ पुल्लिंग क्रिया का प्रयोग
वचन संबंधीउसका प्राण निकल गया।उसके प्राण निकल गए।‘प्राण’ (नित्य बहुवचन) के साथ एकवचन क्रिया
वाक्य-विन्यासवह लगभग बीस वर्ष का है।वह बीस वर्ष का लगभग है।शब्द क्रम की अशुद्धि
वर्तनी (Spelling)कृपया, आशीर्वाद, उज्ज्वलकिरपा, आश्रीवाद, उज्वलगलत वर्तनी का प्रयोग
शब्द प्रयोगपिताजी आए हैं।बाप आया है।असभ्य/अशिष्ट शब्द का प्रयोग
क्षेत्रीय प्रभावमैं घर जा रहा हूँ।हम घर जा रहे हैं। (भोजपुरी प्रभाव में ‘मैं’ के लिए भी ‘हम’)बोली का प्रभाव
अंग्रेजी का प्रभावकृपया सहयोग करें।प्लीज़ को-ऑपरेट करें। (Hinglish)दूसरी भाषा का अनुचित मिश्रण

क्या अमानक भाषा हमेशा “गलत” होती है?

निष्कर्ष

मानक भाषा जहाँ भाषा को एकरूपता, स्थिरता और व्यापकता प्रदान करती है, वहीं अमानक भाषा उसकी अनौपचारिक, क्षेत्रीय और जीवंत विविधता को दर्शाती है। एक शिक्षित और कुशल भाषा प्रयोगकर्ता को यह पता होता है कि किस परिस्थिति में मानक भाषा का प्रयोग करना है और कहाँ अनौपचारिक या क्षेत्रीय रूपों का प्रयोग किया जा सकता है। शिक्षा और औपचारिक संचार के लिए हमेशा मानक भाषा का ही प्रयोग श्रेयस्कर होता है।


राष्ट्रभाषा (National Language)

परिभाषा:
राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है जो किसी भी राष्ट्र (देश) की एकता, अखंडता और पहचान का प्रतीक होती है तथा जिसे उस राष्ट्र के अधिकांश निवासी बोलते और समझते हैं। यह केवल एक प्रशासनिक भाषा न होकर, पूरे राष्ट्र के जन-जीवन, संस्कृति, साहित्य और सामाजिक व्यवहार में रची-बसी होती है।

यह वह भाषा है जिसके साथ देश के लोगों का एक भावनात्मक जुड़ाव होता है और जो देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को अभिव्यक्त करती है।

सरल शब्दों में, राष्ट्रभाषा किसी भी देश की “आत्मा की भाषा” होती है, जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है।


राष्ट्रभाषा की विशेषताएँ:

एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसमें कुछ विशेष गुण होने चाहिए:

  1. बहुसंख्यक लोगों की भाषा: इसे देश की अधिकांश जनसंख्या द्वारा बोला और समझा जाना चाहिए।
  2. व्यापक भौगोलिक प्रसार: यह केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित न होकर, देश के अधिकतर भागों में संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग की जाती हो।
  3. समृद्ध साहित्य: उसका साहित्य गौरवशाली और समृद्ध हो, जिसमें देश की संस्कृति और इतिहास की झलक हो।
  4. सरल और सुबोध व्याकरण: उसकी संरचना और व्याकरण सरल हो ताकि अन्य भाषा-भाषी लोग भी उसे आसानी से सीख सकें।
  5. राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक: वह भाषा देश के स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक आंदोलनों और राष्ट्रीय गौरव से जुड़ी रही हो।
  6. अपनी लिपि: उसकी अपनी एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित लिपि होनी चाहिए।

भारत की राष्ट्रभाषा: एक संवैधानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण

भारत के संदर्भ में ‘राष्ट्रभाषा’ का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है।

संवैधानिक स्थिति:

व्यावहारिक स्थिति (De facto National Language):

संवैधानिक रूप से कोई राष्ट्रभाषा न होने के बावजूद, व्यावहारिक रूप से हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा के सभी गुणों को पूरा करती है और इसे अघोषित राष्ट्रभाषा के रूप में देखा जाता है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

  1. सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा: 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 44% लोग हिन्दी को अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते हैं और एक बड़ी जनसंख्या इसे दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में समझती और बोलती है। यह भारत में किसी भी अन्य भाषा से कहीं अधिक है।
  2. संपर्क भाषा (Lingua Franca): हिन्दी भारत की सबसे बड़ी संपर्क भाषा है। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत, पश्चिम भारत और यहाँ तक कि दक्षिण और पूर्वोत्तर के शहरी क्षेत्रों में भी, अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग आपस में संवाद करने के लिए हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं।
  3. ऐतिहासिक भूमिका: हिन्दी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पूरे देश को एक साथ लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल जैसे कई अहिंदी भाषी नेताओं ने भी राष्ट्र की एकता के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का समर्थन किया था।
  4. सांस्कृतिक प्रसार: बॉलीवुड सिनेमा, संगीत और टेलीविजन कार्यक्रमों ने हिन्दी को देश के कोने-कोने तक, यहाँ तक कि दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के राज्यों तक भी पहुँचा दिया है, जिससे इसकी स्वीकार्यता और समझ बढ़ी है।

राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर

आधारराष्ट्रभाषा (National Language)राजभाषा (Official Language)
परिभाषाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव की भाषा, जिसे अधिकांश लोग समझते हैं।सरकारी कामकाज, प्रशासन और संसद में प्रयोग होने वाली भाषा।
संवैधानिक स्थितिभारत में संवैधानिक रूप से कोई नहीं।हिन्दी (संघ की), और राज्यों की अपनी-अपनी राजभाषाएँ।
स्वरूपस्वाभाविक, भावनात्मक, जन-केंद्रित।प्रशासनिक, कानूनी, नियम-आधारित।
संबंधइसका संबंध देश की जनता और संस्कृति से है।इसका संबंध केवल सरकारी तंत्र से है।
अनिवार्यताइसे सीखना या बोलना अनिवार्य नहीं।सरकारी कर्मचारियों के लिए इसे जानना आवश्यक हो सकता है।

निष्कर्ष

अतः, संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि संवैधानिक तौर पर भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से हिन्दी ही राष्ट्रभाषा की भूमिका निभा रही है। यह भारत की सांस्कृतिक और भाषाई एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है और देश के अधिकांश लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है।


राजभाषा (Official Language)

परिभाषा:
राजभाषा का शाब्दिक अर्थ है – “राज-काज की भाषा” अर्थात् वह भाषा जिसका प्रयोग किसी देश या राज्य के सरकारी कार्यालयों, प्रशासन, संसद, विधानमंडल तथा न्यायिक कार्यवाहियों के लिए किया जाता है।

यह वह भाषा है जिसे कोई देश अपने संवैधानिक प्रावधानों के तहत सरकारी कामकाज को पूरा करने के लिए आधिकारिक (Official) रूप से अपनाता है। इसका संबंध पूरी तरह से प्रशासनिक और कानूनी तंत्र से होता है।


भारत में राजभाषा: संवैधानिक प्रावधान

भारत एक बहुभाषी देश है। इसलिए, संविधान निर्माताओं ने भाषा के मुद्दे पर बहुत सोच-समझकर प्रावधान बनाए। भारतीय संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के संबंध में विस्तृत व्यवस्था की गई है।

1. संघ की राजभाषा (Official Language of the Union)

2. राज्यों की राजभाषा (Official Languages of the States)

3. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की भाषा

4. हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्देश


राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर

यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि राजभाषा और राष्ट्रभाषा एक नहीं हैं।

आधारराजभाषा (Official Language)राष्ट्रभाषा (National Language)
परिभाषासरकारी कामकाज, प्रशासन और संसद में प्रयोग होने वाली भाषा।राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव की भाषा, जिसे अधिकांश लोग समझते हैं।
संवैधानिक स्थितिहिन्दी संघ की राजभाषा है, और राज्यों की अपनी-अपनी राजभाषाएँ हैं।भारत में संवैधानिक रूप से कोई नहीं
स्वरूपप्रशासनिक, कानूनी, औपचारिक।स्वाभाविक, भावनात्मक, जन-केंद्रित।
संबंधइसका संबंध केवल सरकारी तंत्र से है।इसका संबंध देश की जनता और संस्कृति से है।
क्षेत्रइसका प्रयोग क्षेत्र सीमित और औपचारिक होता है (केवल कार्यालयों, संसद में)।इसका प्रयोग व्यापक और अनौपचारिक होता है (पूरे देश में संपर्क भाषा के रूप में)।

राजभाषा हिन्दी की वर्तमान स्थिति

निष्कर्ष

राजभाषा एक संवैधानिक और प्रशासनिक शब्द है, जिसका सीधा संबंध सरकारी कामकाज से है। भारत के संदर्भ में, हिन्दी संघ की राजभाषा और अंग्रेजी सह-राजभाषा है, जबकि राज्यों को अपनी राजभाषा चुनने की स्वतंत्रता है। यह राष्ट्रभाषा की भावनात्मक और सांस्कृतिक अवधारणा से पूरी तरह भिन्न है।


राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर (Difference between National Language and Official Language)

किसी भी देश के संदर्भ में राष्ट्रभाषा और राजभाषा दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं, जिनके अर्थ, स्वरूप और कार्यक्षेत्र में महत्वपूर्ण अंतर होता है। भारत के संदर्भ में यह अंतर और भी स्पष्ट हो जाता है।


परिभाषा के आधार पर अंतर


स्वरूप और प्रकृति के आधार पर अंतर


कार्यक्षेत्र के आधार पर अंतर


भारत के संदर्भ में अंतर

यह अंतर भारत के संदर्भ में सबसे अधिक प्रासंगिक है:


तुलनात्मक सारणी: राष्ट्रभाषा बनाम राजभाषा

आधारराष्ट्रभाषा (National Language)राजभाषा (Official Language)
अर्थराष्ट्र की पहचान और भावनात्मक एकता की भाषा।सरकारी कामकाज और प्रशासन की भाषा।
प्रकृतिस्वाभाविक, भावनात्मक, सांस्कृतिक।औपचारिक, प्रशासनिक, कानूनी।
चयनजनता द्वारा स्वतः स्वीकृत।संविधान द्वारा निर्धारित।
कार्यक्षेत्रव्यापक (पूरा देश, जन-जीवन, संपर्क भाषा)।सीमित (सरकारी कार्यालय, संसद)।
संबंधदेश की जनता और संस्कृति से।देश के शासन-तंत्र से।
भारत में संवैधानिक स्थितिकिसी भाषा को दर्जा नहीं।हिन्दी (संघ की) और राज्यों की अपनी भाषाएँ।
उदाहरण (भारत में)हिन्दी (व्यावहारिक रूप से)।हिन्दी, अंग्रेजी और अन्य 22 अनुसूचित भाषाएँ (राज्यों में)।

निष्कर्ष

संक्षेप में, राष्ट्रभाषा का आधार भावनात्मक और सांस्कृतिक होता है, जबकि राजभाषा का आधार संवैधानिक और प्रशासनिक होता है। भारत में हिन्दी भले ही संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा न हो, पर व्यावहारिक रूप से वह इस पद पर आसीन है, जबकि राजभाषा का पद उसे कानूनी तौर पर प्राप्त है।


विभाषा / उपभाषा (Sub-language / Dialect Cluster)

परिभाषा:
विभाषा या उपभाषा, भाषा के विकास क्रम में बोली (Dialect) से उन्नत और मानक भाषा (Standard Language) से निम्न स्तर की भाषाई इकाई है।

जब कोई बोली भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक या साहित्यिक कारणों से अपने सीमित क्षेत्र से बाहर निकलकर एक विस्तृत भू-भाग में प्रचलित हो जाती है, उसमें साहित्य-रचना होने लगती है, और उसका अपना व्याकरणिक ढाँचा भी निश्चित होने लगता है, तो वह बोली न रहकर विभाषा या उपभाषा का दर्जा प्राप्त कर लेती है।

सरल शब्दों में, विभाषा ऐसी ‘विकसित बोली’ होती है, जो अभी पूर्ण रूप से भाषा नहीं बन पाई है। यह कई मिलती-जुलती बोलियों का एक समूह होती है।


विभाषा / उपभाषा की प्रमुख विशेषताएँ:

  1. बोली से विस्तृत क्षेत्र: इसका भौगोलिक क्षेत्र एक बोली की तुलना में बहुत बड़ा होता है और यह कई जिलों या एक पूरे क्षेत्र में फैली हो सकती है।
  2. साहित्यिक रचना: इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसमें साहित्य लिखा जाने लगता है। जैसे, मध्यकाल में ब्रजभाषा और अवधी, जो मूलतः बोलियाँ थीं, उनमें उच्च कोटि का साहित्य (सूरसागर, रामचरितमानस) लिखा गया, जिससे वे विभाषा बन गईं।
  3. एकाधिक बोलियों का समूह: एक उपभाषा के अंतर्गत प्रायः कई ऐसी बोलियाँ आती हैं, जिनमें आपसी समानता होती है।
    • उदाहरण: बिहारी एक उपभाषा है, जिसके अंतर्गत भोजपुरी, मैथिली, और मगही जैसी बोलियाँ आती हैं। इन तीनों में बहुत सी समानताएँ हैं।
  4. अपना व्याकरणिक ढाँचा: इसका एक निश्चित व्याकरणिक ढाँचा विकसित होने लगता है, भले ही वह मानक भाषा जितना कठोर न हो।
  5. मानक भाषा का आधार: अक्सर किसी विभाषा की ही कोई एक बोली विकसित होकर मानक भाषा का रूप ले लेती है। जैसे पश्चिमी हिन्दी उपभाषा की खड़ी बोली ने आज की मानक हिन्दी का रूप लिया है।

भाषा के विकास का क्रम: बोली → विभाषा → भाषा

भाषा के विकास की यह प्रक्रिया एक पदानुक्रम (hierarchy) दर्शाती है:

  1. बोली (Dialect):
    • सबसे छोटी और सीमित इकाई।
    • केवल मौखिक और अनौपचारिक प्रयोग।
    • कोई साहित्य नहीं।
    • उदाहरण: मारवाड़ी, मेवाती।
  2. विभाषा / उपभाषा (Sub-language):
    • बोली का विकसित और विस्तृत रूप।
    • साहित्यिक रचना संभव।
    • क्षेत्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा।
    • कई मिलती-जुलती बोलियों का समूह।
    • उदाहरण: राजस्थानी एक उपभाषा है, जिसके अंतर्गत मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी आदि बोलियाँ आती हैं।
  3. भाषा (Language):
    • विभाषा का परिनिष्ठित, मानकीकृत और सर्वमान्य रूप।
    • समृद्ध साहित्य, मानक व्याकरण।
    • शिक्षा, प्रशासन और राजकाज में प्रयोग।
    • उदाहरण: हिन्दी एक मानक भाषा है।

हिन्दी की प्रमुख उपभाषाएँ (विभाषाएँ) और उनकी बोलियाँ:

हिन्दी भाषा का विशाल क्षेत्र पाँच प्रमुख उपभाषाओं में विभाजित है। ये उपभाषाएँ ही विभाषाएँ हैं, जिनके अंतर्गत विभिन्न बोलियाँ आती हैं:

  1. पश्चिमी हिन्दी:
    • बोलियाँ: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणवी (बाँगरू), बुंदेली, कन्नौजी।
    • विशेषता: आज की मानक हिन्दी इसी की खड़ी बोली से विकसित हुई है।
  2. पूर्वी हिन्दी:
    • बोलियाँ: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
    • विशेषता: ‘रामचरितमानस’ की रचना अवधी में हुई।
  3. बिहारी हिन्दी:
    • बोलियाँ: भोजपुरी, मगही, मैथिली।
    • विशेषता: भोजपुरी और मैथिली अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बोली जाती हैं।
  4. राजस्थानी हिन्दी:
    • बोलियाँ: मारवाड़ी, जयपुरी (ढूंढाड़ी), मेवाती, मालवी।
  5. पहाड़ी हिन्दी:
    • बोलियाँ: कुमाऊँनी, गढ़वाली, पश्चिमी पहाड़ी।

निष्कर्ष

विभाषा या उपभाषा, भाषा और बोली के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह दर्शाती है कि भाषा स्थिर नहीं होती, बल्कि निरंतर विकास की प्रक्रिया में रहती है। यह क्षेत्रीय अस्मिताओं और साहित्यिक परंपराओं को सहेजकर रखती है और मानक भाषा को जीवंतता तथा विविधता प्रदान करती है। कोई बोली जब अपनी सीमाओं को लांघकर साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व प्राप्त कर लेती है, तो वह विभाषा के पद पर आसीन हो जाती है।


1. लक्ष्य भाषा (Target Language)

परिभाषा:
लक्ष्य भाषा वह भाषा है जिसे कोई व्यक्ति सीख रहा है या जिसमें किसी पाठ (text) का अनुवाद (translation) किया जा रहा है। यह “सीखने” या “अनुवाद करने” के लक्ष्य को दर्शाती है।

इसका प्रयोग मुख्य रूप से भाषा शिक्षण (Language Learning) और अनुवाद (Translation) के संदर्भ में किया जाता है।

विशेषताएँ:


2. साहित्यिक भाषा (Literary Language)

परिभाषा:
साहित्यिक भाषा, किसी भी भाषा का वह परिमार्जित, अलंकृत, और कलात्मक रूप है जिसका प्रयोग साहित्य (कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास आदि) की रचना के लिए किया जाता है। यह आम बोलचाल की भाषा से भिन्न, अधिक सुसंस्कृत और प्रभावशाली होती है।

विशेषताएँ:


3. व्यक्ति भाषा / व्यक्ति-बोली (Idiolect)

परिभाषा:
व्यक्ति भाषा या व्यक्ति-बोली, किसी एक विशेष व्यक्ति द्वारा बोली जाने वाली भाषा का अद्वितीय (unique) और विशिष्ट रूप है। यह प्रत्येक व्यक्ति की अपनी भाषाई पहचान होती है, जो उसकी शिक्षा, सामाजिक पृष्ठभूमि, आयु, भौगोलिक क्षेत्र और व्यक्तिगत आदतों से मिलकर बनती है।

विशेषताएँ:


4. विशिष्ट भाषा / प्रयोजनमूलक भाषा (Special Language / Language for Specific Purposes – LSP)

परिभाषा:
विशिष्ट भाषा, जिसे प्रयोजनमूलक भाषा भी कहते हैं, भाषा का वह स्वरूप है जो किसी विशेष विषय, पेशे (profession), या कार्यक्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित होता है। इसकी शब्दावली और वाक्य-संरचना उस विशिष्ट क्षेत्र की अवधारणाओं को व्यक्त करने के लिए होती है।

विशेषताएँ:


संपर्क भाषा (Link Language / Lingua Franca)

परिभाषा:
संपर्क भाषा वह भाषा होती है जिसका प्रयोग किसी ऐसे क्षेत्र में किया जाता है जहाँ लोग अलग-अलग मातृभाषाएँ बोलते हैं, ताकि वे एक-दूसरे से संवाद या संपर्क स्थापित कर सकें। यह एक सेतु (bridge) की तरह काम करती है, जो भाषाई विभिन्नता वाले समाज के लोगों को आपस में जोड़ती है।

इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिंग्वा फ़्रैंका (Lingua Franca) भी कहा जाता है। संपर्क भाषा किसी व्यक्ति की मातृभाषा न होते हुए भी, व्यापार, प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक मेलजोल के लिए एक साझा (common) भाषा के रूप में अपना ली जाती है।

सरल शब्दों में, संपर्क भाषा वह “कामचलाऊ भाषा” है जो अलग-अलग भाषा बोलने वालों को एक-दूसरे से बात करने में मदद करती है।


संपर्क भाषा की विशेषताएँ:

  1. बहुभाषी समाज में आवश्यकता: इसकी आवश्यकता केवल वहीं होती है, जहाँ कई भाषाएँ बोली जाती हैं।
  2. अर्जित भाषा: यह प्रायः लोगों की मातृभाषा नहीं होती, बल्कि वे इसे दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में सीखते हैं।
  3. व्याकरण में सरलता: संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग होने पर इसके व्याकरण और संरचना में अक्सर थोड़ा सरलीकरण आ जाता है ताकि इसे सीखना आसान हो सके।
  4. कार्य-केंद्रित: इसका मुख्य उद्देश्य विचारों का आदान-प्रदान करना और काम पूरा करना होता है, न कि साहित्यिक सौंदर्य प्रस्तुत करना।
  5. व्यापक स्वीकार्यता: इसे उस क्षेत्र के अधिकांश लोग संचार के माध्यम के रूप में स्वीकार करते हैं।

भारत के संदर्भ में संपर्क भाषा

भारत दुनिया के सबसे अधिक भाषाई विविधता वाले देशों में से एक है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ हैं। ऐसे में संपर्क भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत में संपर्क भाषा के दो स्तर हैं:

1. अखिल भारतीय स्तर पर संपर्क भाषा – हिन्दी
हिन्दी निस्संदेह भारत की सबसे बड़ी और सबसे प्रमुख संपर्क भाषा है। इसके निम्नलिखित कारण हैं:

इसलिए, जब कोई भारतीय अपने राज्य से बाहर यात्रा करता है, तो संवाद के लिए वह सबसे पहले हिन्दी का ही सहारा लेता है।

2. सह-संपर्क भाषा – अंग्रेजी
अंग्रेजी भी भारत में एक महत्वपूर्ण संपर्क भाषा की भूमिका निभाती है, विशेषकर कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में:


विश्व के संदर्भ में संपर्क भाषा

विश्व स्तर पर, अंग्रेजी आज की निर्विवाद रूप से वैश्विक संपर्क भाषा (Global Lingua Franca) है। इसका प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कूटनीति, पर्यटन और इंटरनेट पर संवाद के लिए किया जाता है।


निष्कर्ष

संपर्क भाषा किसी भी बहुभाषी राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक एकता के लिए अनिवार्य है। भारत के संदर्भ में, हिन्दी आम जन-जीवन की सबसे बड़ी संपर्क भाषा है जो देश की विशाल आबादी को आपस में जोड़ती है, जबकि अंग्रेजी उच्च शिक्षा और पेशेवर दुनिया में एक महत्वपूर्ण सह-संपर्क भाषा की भूमिका निभाती है।


शास्त्रीय भाषा (Classical Language)

परिभाषा:
शास्त्रीय भाषा उस भाषा को कहा जाता है जिसका एक अत्यंत समृद्ध, प्राचीन और गौरवशाली साहित्यिक इतिहास होता है, जिसे उस भाषा को बोलने वाले लोग अपनी बहुमूल्य विरासत मानते हैं। यह एक ऐसी भाषा होती है जिसकी अपनी मौलिकता होती है और वह किसी अन्य भाषा परिवार से उत्पन्न नहीं होती।

यह केवल एक पुरानी भाषा नहीं है, बल्कि एक ऐसी भाषा है जिसने उच्च कोटि के साहित्य को जन्म दिया हो और जिसकी परंपरा आज भी जीवित हो। भारत सरकार कुछ विशेष मानदंडों के आधार पर भाषाओं को “शास्त्रीय भाषा” का दर्जा प्रदान करती है।


शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के लिए भारत सरकार के मानदंड (Criteria)

भारत सरकार ने वर्ष 2004 में भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के लिए निम्नलिखित चार प्रमुख मानदंड निर्धारित किए:

  1. प्राचीनता (Antiquity):
    • उस भाषा के प्रारंभिक ग्रंथों का इतिहास 1500 से 2000 वर्ष से अधिक पुराना होना चाहिए।
  2. मौलिकता (Originality):
    • उस भाषा का अपना एक मौलिक साहित्यिक परंपरा होनी चाहिए, जो किसी अन्य भाषा समुदाय से उधार न ली गई हो। वह किसी अन्य भाषा का विकसित रूप न हो।
  3. समृद्ध साहित्यिक विरासत (Rich Literary Heritage):
    • उस भाषा में एक विशाल और मूल्यवान प्राचीन साहित्य या ग्रंथों का भंडार होना चाहिए, जिसे उसकी बोलने वाली पीढ़ियाँ एक अमूल्य विरासत के रूप में मानती हों।
  4. प्राचीन और आधुनिक रूप में भिन्नता (Discontinuity):
    • शास्त्रीय भाषा का प्राचीन साहित्यिक रूप उसके आधुनिक रूप से भिन्न हो सकता है। यह भी संभव है कि शास्त्रीय भाषा और उसके बाद के रूपों में एक तरह की भिन्नता हो। (उदाहरण के लिए, शास्त्रीय संस्कृत और आज की बोलचाल की हिंदी में बहुत अंतर है)।

भारत की शास्त्रीय भाषाएँ (Classical Languages of India)

इन मानदंडों के आधार पर, भारत सरकार ने अब तक कुल 6 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया है। ये भाषाएँ निम्नलिखित हैं (दर्जा मिलने के क्रम में):

1. तमिल (Tamil)

2. संस्कृत (Sanskrit)

3. कन्नड़ (Kannada)

4. तेलुगु (Telugu)

5. मलयालम (Malayalam)

6. ओड़िया (Odia)


शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने के लाभ:

जिस भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है, उसे केंद्र सरकार द्वारा निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:

  1. उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना: उस भाषा के अध्ययन के लिए “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस” स्थापित किए जाते हैं।
  2. अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार: उस भाषा के प्रतिष्ठित विद्वानों के लिए दो प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा की जाती है।
  3. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से अनुरोध किया जाता है कि वह केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय भाषाओं के विद्वानों के लिए व्यावसायिक पीठ (Professional Chairs) स्थापित करे।

निष्कर्ष

शास्त्रीय भाषा का दर्जा किसी भाषा की प्राचीनता, मौलिकता और साहित्यिक समृद्धि को एक राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करता है। यह उस भाषा की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और उसके अध्ययन को बढ़ावा देने में मदद करता है। भारत की ये 6 शास्त्रीय भाषाएँ देश की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता की गहराई को दर्शाती हैं।


हिन्दी भाषा का इतिहास

हिन्दी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है। यह उस विशाल भाषा परिवार की एक महत्वपूर्ण कड़ी है जिसकी जड़ें प्राचीन भारत की संस्कृत भाषा में हैं। हिन्दी के विकास क्रम को समझना वास्तव में भारतीय भाषाओं की यात्रा को समझना है।

हिन्दी, भारोपीय (Indo-European) भाषा-परिवार की भारतीय-आर्य (Indo-Aryan) शाखा की एक प्रमुख भाषा है। इसके विकास क्रम को तीन प्रमुख कालों में बांटा जा सकता है:


विकास क्रम: संस्कृत से हिन्दी तक की यात्रा

1. प्राचीन भारतीय आर्य-भाषा काल (1500 ई.पू. – 500 ई.पू.)

2. मध्यकालीन भारतीय आर्य-भाषा काल (500 ई.पू. – 1000 ई.)
जैसे-जैसे समय बीता, आम बोलचाल की भाषा संस्कृत से और सरल होती गई, जिससे नई भाषाओं का जन्म हुआ, जिन्हें प्राकृत भाषाएँ कहा गया।

3. आधुनिक भारतीय आर्य-भाषा काल (1000 ई. – अब तक)
लगभग 1000 ई. के आसपास, शौरसेनी अपभ्रंश से पश्चिमी हिन्दी का विकास हुआ, जिसकी एक प्रमुख बोली खड़ी बोली थी। यहीं से हिन्दी भाषा का आधुनिक रूप शुरू होता है, जिसे हम तीन चरणों में बाँट सकते हैं:


सार संक्षेप (Journey in brief):

वैदिक संस्कृत → लौकिक संस्कृत → पालि → प्राकृत → अपभ्रंश (शौरसेनी) → पश्चिमी हिन्दी → खड़ी बोली → मानक हिन्दी

इस तरह, संस्कृत की एक विशाल और गौरवशाली परंपरा से निकलकर, हिन्दी ने कई पड़ावों को पार करते हुए आज का आधुनिक स्वरूप प्राप्त किया है।


अपभ्रंश (Apabhransha)

परिभाषा:
अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ है – ‘बिगड़ा हुआ’ या ‘पथ से भटका हुआ’। भाषा विज्ञान के संदर्भ में, अपभ्रंश मध्यकालीन भारतीय आर्य-भाषा के उस अंतिम चरण को कहते हैं जो प्राकृत और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की एक संक्रमणकालीन कड़ी (transitional link) है।

इसका काल सामान्यतः 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है। यह उस समय की लोक-प्रचलित और साहित्यिक भाषा थी। इन्हीं क्षेत्रीय अपभ्रंशों से लगभग 1000 ई. के आसपास आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म हुआ।


प्रमुख अपभ्रंश और उनसे विकसित आधुनिक भाषाएँ एवं उपभाषाएँ

अलग-अलग क्षेत्रों में प्राकृत के भिन्न-भिन्न रूप प्रचलित थे, जिनसे क्षेत्रीय अपभ्रंशों का विकास हुआ। प्रमुख अपभ्रंश और उनसे विकसित भाषाएँ निम्नलिखित हैं:

1. शौरसेनी अपभ्रंश (Shaurseni Apabhransha)

यह अपभ्रंश का सबसे महत्वपूर्ण रूप था, जो ‘शूरसेन’ (आधुनिक मथुरा के आसपास का क्षेत्र) या मध्य देश में बोला जाता था। इससे आधुनिक भारतीय भाषाओं का सबसे बड़ा समूह विकसित हुआ।

2. मागधी अपभ्रंश (Magadhi Apabhransha)

यह मगध (आधुनिक दक्षिण बिहार) और उसके आसपास के पूर्वी क्षेत्रों में प्रचलित थी।

3. अर्धमागधी अपभ्रंश (Ardhamagadhi Apabhransha)

इसका क्षेत्र शौरसेनी (पश्चिम) और मागधी (पूर्व) के बीच में स्थित था, यानी ‘आधा मगध’। यह अवध और बघेलखंड के आसपास बोली जाती थी।

4. खस अपभ्रंश (Khas Apabhransha)

इसका प्रचलन हिमालय के तराई वाले इलाकों में रहने वाले ‘खस’ जाति के लोगों में था।

5. ब्राचड़ अपभ्रंश (Vrachada Apabhransha)

यह उत्तर-पश्चिम क्षेत्र, विशेषकर सिंध, में प्रचलित थी।

6. पैशाची अपभ्रंश (Paishachi Apabhransha)

इसका प्रयोग भी पश्चिमोत्तर भारत (पंजाब और कश्मीर के आसपास) में होता था। ‘पैशाच’ का अर्थ पिशाचों से नहीं, बल्कि यह एक जाति विशेष का नाम था।

7. महाराष्ट्री अपभ्रंश (Maharashtri Apabhransha)

यह अपभ्रंश आधुनिक महाराष्ट्र के क्षेत्र में बोली जाती थी।


सारणीबद्ध प्रस्तुति

अपभ्रंश का नामविकसित आधुनिक भाषाएँ एवं उपभाषाएँ (उनके अंतर्गत आने वाली बोलियाँ)
1. शौरसेनी अपभ्रंशपश्चिमी हिन्दी (खड़ी बोली, ब्रज, हरियाणवी, बुंदेली, कन्नौजी)
राजस्थानी (मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी)
गुजराती
पहाड़ी (कुमाऊँनी, गढ़वाली)
2. मागधी अपभ्रंशबिहारी हिन्दी (भोजपुरी, मगही, मैथिली)
बंगला
ओड़िया
असमिया
3. अर्धमागधी अपभ्रंशपूर्वी हिन्दी (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी)
4. खस अपभ्रंशपहाड़ी हिन्दी (प्रमुख रूप से)
5. ब्राचड़ अपभ्रanshaसिंधी
6. पैशाची अपभ्रंशलहँदा और पंजाबी
7. महाराष्ट्री अपभ्रंशमराठी

यह वर्गीकरण दर्शाता है कि भारत की अधिकांश आधुनिक आर्य भाषाएँ इन्हीं क्षेत्रीय अपभ्रंशों के गर्भ से जन्मी हैं, और हिन्दी भाषा का विशाल परिवार (जिसमें पश्चिमी, पूर्वी, बिहारी, राजस्थानी और पहाड़ी उपभाषाएँ शामिल हैं) मुख्य रूप से शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी अपभ्रंशों की देन है।


अपभ्रंश भाषा से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

नाम और अर्थ

  1. शाब्दिक अर्थ: “अपभ्रंश” का शाब्दिक अर्थ है ‘बिगड़ा हुआ’, ‘पतित’ या ‘गिरा हुआ’
  2. नामकरण का कारण: प्रारंभिक भाषाविदों (जैसे पतंजलि) ने इसे संस्कृत के मानक रूप से “भ्रष्ट” या बिगड़ा हुआ माना था, इसलिए यह नाम प्रचलित हुआ। हालांकि, भाषा विज्ञान की दृष्टि से यह केवल भाषा का एक स्वाभाविक विकास था।
  3. अन्य नाम: अपभ्रंश को ‘अवहट्ठ’, ‘देशी भाषा’ और ‘ग्राम भाषा’ भी कहा गया है। ‘अवहट्ठ’ (जिसका अर्थ है ‘अपभ्रष्ट’) अपभ्रंश के परवर्ती या अंतिम रूप को कहा जाता है।

ऐतिहासिक और साहित्यिक तथ्य

  1. काल निर्धारण: इसका काल सामान्यतः 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है, हालांकि इसके साहित्यिक प्रयोग 12वीं-13वीं सदी तक भी मिलते रहे।
  2. संयोजक कड़ी: यह मध्यकालीन आर्य भाषाओं (प्राकृत) और आधुनिक आर्य भाषाओं (हिन्दी, बंगला, मराठी आदि) के बीच की एक महत्वपूर्ण संयोजक या संक्रमणकालीन कड़ी (transitional link) है।
  3. वियोगात्मक प्रवृत्ति: अपभ्रंश, संस्कृत और प्राकृत (जो संयोगात्मक थीं) की तुलना में अधिक वियोगात्मक (Analytical) भाषा बन गई थी। अर्थात्, इसमें विभक्तियों की जगह परसर्गों/सहायक क्रियाओं (जैसे – का, के, की) का प्रयोग शुरू हो गया था। (उदाहरण: संस्कृत का ‘रामेण’ हिन्दी में ‘राम ने’ हो गया)। यहीं से हिन्दी के व्याकरण की नींव पड़ी।
  4. प्रमुख साहित्यकार:
    • स्वयंभू: इन्हें ‘अपभ्रंश का वाल्मीकि’ कहा जाता है। इनकी सबसे प्रसिद्ध रचना ‘पउमचरिउ’ (पद्मचरित) है, जो अपभ्रंश की रामायण मानी जाती है।
    • पुष्पदंत: इन्हें ‘अपभ्रंश का वेदव्यास’ कहा जाता है। इनकी प्रमुख रचना ‘महापुराण’ है।
    • धनपाल: इनकी रचना ‘भविस्सयत्तकहा’ (भविष्यदत्तकथा) प्रसिद्ध है।
    • अब्दुर रहमान (अद्दहमाण): इनका ‘संदेश रासक’ किसी मुस्लिम कवि द्वारा भारतीय भाषा में लिखा गया पहला काव्य माना जाता है।

भाषाई विशेषताएँ

  1. स्वरों की संख्या: अपभ्रंश में मुख्य रूप से आठ स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ) थे। ‘ऐ’ और ‘औ’ स्वर नहीं थे, उनका उच्चारण ‘अइ’ और ‘अउ’ के रूप में होता था।
  2. नपुंसकलिंग का लोप: अपभ्रंश में नपुंसकलिंग समाप्त हो गया था, और केवल पुल्लिंग और स्त्रीलिंग – दो ही लिंग रह गए थे। यह विशेषता आधुनिक हिन्दी में भी विद्यमान है।
  3. ऋ (ऋषि वाला) स्वर का अभाव: ‘ऋ’ स्वर का प्रयोग समाप्त हो गया था। इसका उच्चारण या तो ‘रि’ होता था या ‘अ’। जैसे, ‘ऋतु’ को ‘रितु’ बोला जाने लगा।
  4. द्विवचन का लोप: संस्कृत की तरह इसमें द्विवचन नहीं था, केवल एकवचन और बहुवचन ही थे, जो हिन्दी में भी जारी रहा।
  5. शौरसेनी अपभ्रंश का प्रभुत्व: सभी अपभ्रंशों में, शौरसेनी अपभ्रंश सबसे महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह मध्य देश की भाषा थी, जो उस समय का सांस्कृतिक केंद्र था। आधुनिक हिन्दी इसी से विकसित हुई।

हिन्दी से संबंधित विशिष्ट तथ्य

  1. हिन्दी का जन्म: हिन्दी का जन्म सीधे संस्कृत से नहीं, बल्कि अपभ्रंश से हुआ है। हिन्दी की आदि जननी भले ही संस्कृत हो, पर उसकी निकटतम पूर्वज शौरसेनी अपभ्रंश है।
  2. पहला प्रयोग: “हिन्दी” शब्द का प्रयोग भाषा के अर्थ में सबसे पहले अमीर खुसरो ने किया, लेकिन अपभ्रंश में रचित ‘श्रावकाचार’ (देवसेन द्वारा) को अक्सर हिन्दी की पहली रचना माना जाता है क्योंकि उसका विषय और भाषा हिन्दी के बहुत निकट है।
  3. विद्यापति और अवहट्ठ: कवि विद्यापति ने अपनी रचना ‘कीर्तिलता’ की भाषा को ‘अवहट्ठ’ कहा है, जो यह दर्शाता है कि 14वीं सदी में भी अपभ्रंश का परवर्ती रूप साहित्य में प्रयोग हो रहा था।

लिपि (Script)

परिभाषा:
किसी भी भाषा की ध्वनियों (sounds) को लिखने के लिए जिन चिह्नों या प्रतीकों (signs or symbols) का प्रयोग किया जाता है, उन चिह्नों की व्यवस्थित प्रणाली को लिपि कहते हैं।

लिपि की आवश्यकता और महत्व:

  1. भाषा को स्थायित्व प्रदान करना: लिपि भाषा को स्थायी रूप देती है। इसके बिना, ज्ञान, विचार और इतिहास को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाना असंभव होता।
  2. ज्ञान का संचय और प्रसार: किताबें, ग्रंथ और आज का डिजिटल डेटा, सब कुछ लिपि के कारण ही संभव है। यह ज्ञान को सुरक्षित रखता है और दूर-दूर तक फैलाता है।
  3. भौगोलिक सीमा का विस्तार: लिपि के माध्यम से भाषा अपनी भौगोलिक सीमाओं को लांघकर पूरे विश्व में फैल सकती है।
  4. उच्चारण में एकरूपता: लिपि किसी शब्द के शुद्ध रूप को निश्चित करती है, जिससे उच्चारण में एकरूपता बनी रहती है।

देवनागरी लिपि (Devanagari Script)

परिभाषा:
देवनागरी, भारत की एक प्राचीन, वैज्ञानिक और सर्वाधिक प्रचलित लिपियों में से एक है। यह एक आक्षरिक लिपि (Abugida/Alphasyllabary) है, जिसका विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। यह बाएँ से दाएँ (left to right) लिखी जाती है।

यह केवल हिन्दी की ही नहीं, बल्कि भारत और नेपाल की अनेक भाषाओं की लिपि है।

देवनागरी लिपि का विकास क्रम:

इसका विकास क्रम इस प्रकार है:

ब्राह्मी लिपि (प्राचीन भारत) → गुप्त लिपि → कुटिल लिपि (सिद्धमातृका) → नागरी लिपि → देवनागरी लिपि (आधुनिक रूप)

देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली प्रमुख भाषाएँ:


देवनागरी लिपि की विशेषताएँ (Features of Devanagari Script)

देवनागरी को दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपियों (most scientific scripts) में से एक माना जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. ध्वन्यात्मक लिपि (Phonetic Script):
    • जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है: इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जैसा उच्चारण किया जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। इसमें अंग्रेजी की तरह ‘know’ में ‘k’ या ‘psychology’ में ‘p’ जैसे मूक (silent) अक्षर नहीं होते।
    • एक ध्वनि के लिए एक चिह्न: हर ध्वनि (sound) के लिए एक निश्चित और अद्वितीय वर्ण (चिह्न) है।
  2. वर्गीकरण में वैज्ञानिकता (Scientific Classification):
    • इसके वर्णों का वर्गीकरण अत्यंत वैज्ञानिक है। स्वरों और व्यंजनों को अलग-अलग रखा गया है।
    • व्यंजनों को उच्चारण स्थान (कंठ, तालु, मूर्धा आदि) और प्रयत्न (अल्पप्राण, महाप्राण) के आधार पर व्यवस्थित किया गया है, जो सीखने और समझने में बहुत आसान है। (जैसे – क, ख, ग, घ, ङ सभी कंठ से बोले जाते हैं)।
  3. आक्षरिक लिपि (Abugida System):
    • देवनागरी में प्रत्येक व्यंजन वर्ण में अंतर्निहित (inherent) ‘अ’ स्वर माना जाता है (जैसे- ‘क्’ + ‘अ’ = ‘क’)।
    • अन्य स्वरों को जोड़ने के लिए मात्राओं का प्रयोग किया जाता है, जो लिखने में समय और स्थान बचाती हैं।
  4. शिरोरेखा का प्रयोग (Use of Headstroke):
    • शब्दों के ऊपर खींची जाने वाली सीधी रेखा (शिरोरेखा) देवनागरी की पहचान है। यह शब्दों को एक साथ बांधकर पढ़ने में सुगमता प्रदान करती है।
  5. व्यापकता:
    • यह भारत की अनेक भाषाओं को लिखने में सक्षम है। इसमें लगभग सभी भारतीय ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए चिह्न मौजूद हैं।

देवनागरी लिपि की सीमाएँ / सुधार की आवश्यकताएँ:

इसकी वैज्ञानिकता के बावजूद, इसमें कुछ समस्याएँ हैं जिन पर सुधार के लिए चर्चा होती रहती है:

  1. कुछ वर्णों का दोहरा रूप: कुछ अक्षर दो तरह से लिखे जाते हैं, जैसे- ‘अ’ (अ vs. अ), ‘झ’ (झ vs. झ)। मानकीकरण द्वारा इसे ठीक करने का प्रयास किया गया है।
  2. टंकण और मुद्रण में कठिनाई: मात्राओं और संयुक्त अक्षरों के कारण टाइपिंग और प्रिंटिंग में थोड़ी जटिलता आती है। (हालांकि यूनिकोड ने इसे बहुत सरल बना दिया है)।
  3. संयुक्त अक्षरों की जटिलता: कुछ संयुक्त अक्षर (जैसे- क् + ष = क्ष, द् + य = द्य) अपने मूल वर्णों से बिल्कुल भिन्न दिखते हैं, जो सीखने में कठिनाई पैदा करते हैं।
  4. शिरोरेखा का अनावश्यक श्रम: कुछ लोगों का मानना है कि शिरोरेखा खींचने में अतिरिक्त समय लगता है।

निष्कर्ष

लिपि, भाषा के शरीर की तरह है, जो उसे एक मूर्त रूप देती है, जबकि भाषा उसकी आत्मा है। देवनागरी लिपि अपनी वैज्ञानिक संरचना और ध्वन्यात्मक सटीकता के कारण हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए एक आदर्श लिपि है। इसने भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को सदियों से संजोकर रखा है और आज भी यह देश की सबसे महत्वपूर्ण लिपियों में से एक है।


वर्ण-विचार

वर्ण-विचार (Orthography/Phonology)

वर्ण-विचार, हिंदी व्याकरण का वह पहला और सबसे महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें वर्णों (letters/sounds) के आकार, भेद, उनके उच्चारण स्थान, और उनके संयोग (मेल) से शब्द बनाने के नियमों का अध्ययन किया जाता है। यह व्याकरण की नींव है, क्योंकि भाषा की शुद्धता का आरंभ वर्णों के शुद्ध ज्ञान और उच्चारण से ही होता है।

1. वर्ण (Letter/Phoneme)

परिभाषा: भाषा की वह सबसे छोटी ध्वनि जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते, ‘वर्ण’ कहलाती है। वर्ण को ‘अक्षर’ भी कहा जाता है।

वर्णमाला (Alphabet)

परिभाषा:
किसी भी भाषा में प्रयुक्त होने वाले सभी वर्णों (letters) के व्यवस्थित, क्रमबद्ध एवं संपूर्ण समूह को ‘वर्णमाला’ कहा जाता है। ‘वर्णमाला’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘वर्ण’ (अक्षर) और ‘माला’ (समूह/हार), जिसका अर्थ है ‘वर्णों का समूह या हार’।

हिन्दी वर्णमाला देवनागरी लिपि पर आधारित है और इसके वर्णों का वर्गीकरण अत्यंत वैज्ञानिक है।


मानक हिन्दी वर्णमाला (Standard Hindi Alphabet)

मानक हिन्दी वर्णमाला में कुल 52 वर्ण माने जाते हैं, जिनका वर्गीकरण इस प्रकार है:

श्रेणीउप-श्रेणीवर्णसंख्या
स्वर (Vowels)अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ11
अयोगवाह (Ayogvah)अं (अनुस्वार), अः (विसर्ग)2
व्यंजन (Consonants)स्पर्श व्यंजन (K-varg to P-varg)क, ख, ग, घ, ङ<br>च, छ, ज, झ, ञ<br>ट, ठ, ड, ढ, ण<br>त, थ, द, ध, न<br>प, फ, ब, भ, म25
अंतःस्थ व्यंजनय, र, ल, व4
ऊष्म व्यंजनश, ष, स, ह4
उत्क्षिप्त / द्विगुण व्यंजनड़, ढ़2
संयुक्त व्यंजनक्ष, त्र, ज्ञ, श्र4
कुल वर्ण52

वर्णमाला का विस्तृत विश्लेषण:

स्वर (Vowels)

परिभाषा:
वे वर्ण जिनका उच्चारण स्वतंत्र रूप से, बिना किसी अन्य वर्ण (व्यंजन) की सहायता के होता है, स्वर कहलाते हैं। इनके उच्चारण के समय फेफड़ों से निकलने वाली हवा मुख में बिना किसी रुकावट या बाधा के बाहर निकल जाती है।

हिन्दी वर्णमाला में स्वरों की संख्या: 11

स्वर वर्ण:
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ

स्वरों का वर्गीकरण (Classification of Vowels)

स्वरों को अलग-अलग आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. उच्चारण में लगने वाले समय (मात्रा) के आधार पर

इस आधार पर स्वर के तीन भेद होते हैं:

2. जिह्वा (जीभ) के प्रयोग के आधार पर

3. मुख खुलने (मुख-विवर) के आधार पर

ओष्ठों की स्थिति / ओष्ठाकृति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण

(Classification of Vowels based on the position of Lips)

1. वृत्तमुखी / वृत्ताकार स्वर (Rounded Vowels)

परिभाषा:
जिन स्वरों के उच्चारण के समय हमारे होंठ गोलाकार (वृत्त के समान) हो जाते हैं, उन्हें वृत्तमुखी या वृत्ताकार स्वर कहा जाता है। ‘वृत्तमुखी’ का अर्थ है – ‘वृत्त के समान मुख वाला’।

2. अवृत्तमुखी / अवृत्ताकार स्वर (Unrounded Vowels)

परिभाषा:
जिन स्वरों के उच्चारण के समय हमारे होंठ गोलाकार न होकर सामान्य रूप में फैले रहते हैं, उन्हें अवृत्तमुखी या अवृत्ताकार स्वर कहा जाता है। ‘अवृत्तमुखी’ का अर्थ है – ‘बिना वृत्त (गोले) के मुख वाला’।

तुलनात्मक सारणी

वर्गीकरणहोठों की स्थितिस्वर वर्ण
वृत्तमुखी (Rounded)होंठ गोलाकार हो जाते हैंउ, ऊ, ओ, औ
अवृत्तमुखी (Unrounded)होंठ सामान्य या फैले रहते हैं, गोल नहीं होतेअ, आ, इ, ई, ऋ, ए, ऐ

एक अतिरिक्त वर्गीकरण

कभी-कभी अवृत्तमुखी को दो और भागों में बाँटा जाता है:

हालांकि, मुख्य वर्गीकरण वृत्तमुखी और अवृत्तमुखी ही है और यही सर्वाधिक मान्य है।

निष्कर्ष

ओष्ठों की स्थिति का यह वर्गीकरण स्वरों के उच्चारण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ‘उ’, ‘ऊ’, ‘ओ’, ‘औ’ बोलने के लिए होठों को गोल करना अनिवार्य है, जबकि ‘अ’, ‘आ’, ‘इ’, ‘ई’ जैसे स्वर बिना होठों को गोल किए ही बोले जा सकते हैं। यह स्वरों के बीच के सूक्ष्म उच्चारण-भेद को समझने में मदद करता है।

जाति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण

(Classification of Vowels based on Caste/Homogeneity of Articulation)

इस आधार पर स्वरों को दो मुख्य भागों में बांटा जाता है:

  1. सवर्ण / सजातीय स्वर (Homogeneous Vowels)
  2. असवर्ण / विजातीय स्वर (Heterogeneous Vowels)

1. सवर्ण / सजातीय स्वर (Homogeneous Vowels)

परिभाषा:
वे स्वर जिनका उच्चारण स्थान (Place of Articulation) और उच्चारण प्रयत्न (Manner of Articulation) एक समान होता है, सजातीय स्वर कहलाते हैं। ‘सजातीय’ का अर्थ है – ‘एक ही जाति (प्रकार) के’।

2. असवर्ण / विजातीय स्वर (Heterogeneous Vowels)

परिभाषा:
वे स्वर जिनका उच्चारण स्थान और उच्चारण प्रयत्न अलग-अलग होता है, विजातीय स्वर कहलाते हैं। ‘विजातीय’ का अर्थ है – ‘भिन्न जाति (प्रकार) के’।

तुलनात्मक सारणी

आधारसजातीय स्वरविजातीय स्वर
परिभाषाएक समान उच्चारण स्थान वाले स्वर।भिन्न-भिन्न उच्चारण स्थान वाले स्वर।
संरचनाएक ही ह्रस्व स्वर के योग से बनते हैं।दो भिन्न स्वरों के योग से बनते हैं।
वर्ण(अ, आ), (इ, ई), (उ, ऊ)ए, ऐ, ओ, औ
प्रकृतिमूल स्वरों के दीर्घ रूप।संयुक्त स्वर (Compound Vowels)
संधि में भूमिकादीर्घ संधि का आधार।गुण संधि और वृद्धि संधि का आधार।

निष्कर्ष

जाति के आधार पर स्वरों का यह वर्गीकरण केवल सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि यह हिन्दी की स्वर संधि प्रणाली को समझने की कुंजी है। यह स्पष्ट करता है कि जब समान प्रकृति के स्वर मिलते हैं तो वे उसी ध्वनि को लंबा (दीर्घ) कर देते हैं, जबकि जब भिन्न प्रकृति के स्वर मिलते हैं तो वे एक पूरी तरह से नई ध्वनि का निर्माण करते हैं।

अलिजिह्वा / कौवे की स्थिति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण

सबसे पहले, यह जानना आवश्यक है कि अलिजिह्वा (Uvula) क्या है?

अलिजिह्वा, जिसे आम भाषा में ‘कौवा’ या ‘गलशुंडिका’ भी कहते हैं, हमारे गले के पिछले भाग में, कोमल तालु (soft palate) से नीचे की ओर लटकता हुआ मांस का एक छोटा-सा टुकड़ा होता है। स्वरों और कुछ व्यंजनों के उच्चारण में इसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उच्चारण के समय कौवे की स्थिति के आधार पर हम स्वरों को दो मुख्य भागों में बाँट सकते हैं:

  1. मौखिक या निरनुनासिक स्वर (Oral Vowels)
  2. अनुनासिक स्वर (Nasalized Vowels)

1. मौखिक या निरनुनासिक स्वर (Oral Vowels)

परिभाषा:
जिन स्वरों के उच्चारण के समय फेफड़ों से आने वाली हवा केवल मुख (मुँह) से बाहर निकलती है, उन्हें मौखिक या निरनुनासिक स्वर कहते हैं। ‘निरनुनासिक’ का अर्थ है – ‘बिना नाक के’।

2. अनुनासिक स्वर (Nasalized Vowels)

परिभाषा:
जिन स्वरों के उच्चारण के समय हवा मुख (मुँह) और नासिका (नाक) दोनों से एक साथ बाहर निकलती है, उन्हें अनुनासिक स्वर कहते हैं। ‘अनुनासिक’ का अर्थ है – ‘नाक के साथ’।

सारणी में तुलना

आधारमौखिक स्वर (Oral Vowel)अनुनासिक स्वर (Nasalized Vowel)
वायु का निकासकेवल मुँह सेमुँह और नाक, दोनों से एक साथ
कौवे की स्थितिऊपर उठकर नासिका मार्ग बंद कर देता हैथोड़ा नीचे रहकर नासिका मार्ग खुला रखता है
ध्वनि की प्रकृतिशुद्ध और स्पष्टनासिक्यता युक्त, थोड़ी गहरी
लेखन चिह्नकोई चिह्न नहींचंद्रबिंदु (ँ) या बिंदी (ं) (मात्रा के साथ)
उदाहरणघर, आग, पानी, हवागाँव, आँख, पाँच, धुआँ, मैं
हिन्दी में महत्वयह स्वरों का मूल रूप हैयह अर्थभेदक है (जैसे – हँस vs. हंस)

निष्कर्ष

अलिजिह्वा या कौवे की स्थिति यह निर्धारित करती है कि ध्वनि का स्वरूप मौखिक होगा या अनुनासिक। कोमल तालु के ऊपर उठकर नासिका मार्ग को बंद कर देने से मौखिक स्वर बनते हैं, जबकि उसके थोड़ा शिथिल या नीचे रहने से, जिससे हवा मुँह और नाक दोनों से निकल सके, अनुनासिक स्वर बनते हैं। यह सूक्ष्म अंतर हिन्दी में कई शब्दों के अर्थ को बदलने की क्षमता रखता है।

मात्राएँ (Vowel Signs)

जब स्वरों को व्यंजनों के साथ मिलाकर लिखा जाता है, तो उनका मूल रूप नहीं लिखा जाता, बल्कि उनके स्थान पर उनके चिह्न प्रयोग किए जाते हैं। इन्हीं चिह्नों को ‘मात्रा’ कहते हैं।

स्वरमात्रा चिह्नउदाहरण
(कोई नहीं)क + अ = क
क + आ = का
िक + इ = कि
क + ई = की
क + उ = कु
क + ऊ = कू
क + ऋ = कृ
क + ए = के
क + ऐ = कै
क + ओ = को
क + औ = कौ

स्वर ध्वनि की प्रमुख विशेषताएँ

1. स्वतंत्र उच्चारण (Independent Articulation):

2. अबाध वायु-प्रवाह (Unobstructed Airflow):

3. घोष/सघोष ध्वनि (Voiced Sounds):

4. नाद और माधुर्य (Sonority and Musicality):

5. अक्षर (Syllable) का केंद्र:

6. दीर्घ उच्चारण की क्षमता (Ability to be Prolonged):

7. मात्रा का वाहक (Carrier of Matra/Duration):

8. वर्गीकरण का आधार (Basis of Classification):

निष्कर्ष:

संक्षेप में, स्वर ध्वनियाँ भाषा की वे आधारभूत, संगीतात्मक और स्वतंत्र ध्वनियाँ हैं, जो व्यंजनों को उच्चारण प्रदान करती हैं और शब्दों की संरचना का केंद्र होती हैं। उनका अबाध प्रवाह, घोष गुण और अक्षरों का निर्माण करने की क्षमता उन्हें भाषा की ध्वनि-प्रणाली में एक विशिष्ट और अनिवार्य स्थान दिलाती है।

2. अयोगवाह (Ayogvah) – (संख्या: 2)

ये न तो पूर्ण स्वर हैं और न ही पूर्ण व्यंजन, फिर भी ये अर्थ वहन करते हैं। इनका स्थान हमेशा स्वर के बाद आता है।


संयुक्त स्वर (Compound Vowels)

परिभाषा:
वे स्वर जो दो भिन्न-भिन्न (विजातीय) स्वरों के मेल या संयोग से बनते हैं, संयुक्त स्वर कहलाते हैं। इनका निर्माण एक ही जैसे स्वरों (सजातीय स्वरों) के योग से नहीं होता, बल्कि दो अलग-अलग उच्चारण स्थान वाले स्वरों को मिलाकर होता है।

हिन्दी वर्णमाला में कुल 4 संयुक्त स्वर हैं:

  1. ए (e)
  2. ऐ (ai)
  3. ओ (o)
  4. औ (au)

ये चारों स्वर दीर्घ स्वर की श्रेणी में भी आते हैं क्योंकि इनके उच्चारण में ह्रस्व स्वरों की तुलना में दोगुना समय लगता है।


संयुक्त स्वरों का निर्माण (Formation of Compound Vowels)

इनका निर्माण कैसे होता है, यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यही हिन्दी की गुण संधि और वृद्धि संधि का आधार है।

1. ए (e)

2. ऐ (ai)

3. ओ (o)

4. औ (au)


मूल दीर्घ स्वर और संयुक्त स्वर में अंतर

यह समझना महत्वपूर्ण है कि सभी दीर्घ स्वर संयुक्त नहीं होते।

श्रेणीवर्णनिर्माणप्रकृति
मूल दीर्घ स्वरआ, ई, ऊसजातीय स्वरों के योग से<br>(अ+अ=आ, इ+इ=ई, उ+उ=ऊ)ये सजातीय हैं
संयुक्त दीर्घ स्वरए, ऐ, ओ, औविजातीय (भिन्न) स्वरों के योग से<br>(अ+इ=ए, अ+उ=ओ)ये विजातीय हैं

सारांश सारणी

संयुक्त स्वरनिर्माणउच्चारण स्थान
अ/आ + इ/ईकंठ-तालव्य
अ/आ + ए/ऐकंठ-तालव्य
अ/आ + उ/ऊकंठोष्ठ्य
अ/आ + ओ/औकंठोष्ठ्य

निष्कर्ष

संयुक्त स्वर वे विशेष दीर्घ स्वर हैं जो दो अलग-अलग ध्वनियों के मिलने से एक नई और एकल ध्वनि का निर्माण करते हैं। इनकी संरचना को समझना हिन्दी व्याकरण में संधि जैसे महत्वपूर्ण अध्यायों को आसानी से समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।


2. अनुस्वार (Anuswar)

परिभाषा:
अनुस्वार (ं) एक नासिक्य ध्वनि (nasal sound) है जिसका उच्चारण केवल नाक से होता है और इसकी ध्वनि थोड़ी तीव्र और स्पष्ट होती है। यह अयोगवाह कहलाता है क्योंकि यह न तो स्वर है और न ही व्यंजन, पर स्वर के बाद आता है।


3. अनुनासिक (Anunasik)

परिभाषा:
अनुनासिक (ँ) भी एक नासिक्य ध्वनि है, लेकिन इसका उच्चारण नाक और मुँह दोनों से समान दबाव के साथ किया जाता है। इसकी ध्वनि कोमल और गहरी होती है। इसे चंद्रबिंदु भी कहते हैं। यह स्वर का एक गुण है, अलग वर्ण नहीं।

अनुस्वार और अनुनासिक में मुख्य अंतर:


4. विसर्ग (Visarg)

परिभाषा:
विसर्ग (ः) भी एक अयोगवाह ध्वनि है। इसका उच्चारण आधे ‘ह’ के समान होता है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से संस्कृत के तत्सम शब्दों में होता है।


5. नासिक्य वर्ण / पंचमाक्षर (Nasal Letters / Panchamakshar)

परिभाषा:
नासिक्य वर्ण वे व्यंजन हैं जिनका उच्चारण मुख के साथ-साथ नाक (नासिका) की सहायता से भी होता है। हिन्दी वर्णमाला के प्रत्येक स्पर्श व्यंजन वर्ग (क, च, ट, त, प) का पाँचवाँ और अंतिम वर्ण नासिक्य वर्ण कहलाता है। इसीलिए इन्हें पंचमाक्षर भी कहते हैं।

ये 5 नासिक्य व्यंजन हैं:

  1. ङ (ṅa): क-वर्ग का नासिक्य (जैसे- वाङ्मय, दिङ्नाग)
  2. ञ (ña): च-वर्ग का नासिक्य (जैसे- वाञ्छनीय, चञ्चल)
  3. ण (ṇa): ट-वर्ग का नासिक्य (जैसे- कण्ठ, घण्टा)
  4. न (na): त-वर्ग का नासिक्य (जैसे- अन्त, हिन्दी)
  5. म (ma): प-वर्ग का नासिक्य (जैसे- सम्भव, अम्बा)

आधुनिक प्रयोग:
आधुनिक हिन्दी लेखन में मानकीकरण के नियम के अनुसार, जब पंचमाक्षर अपने ही वर्ग के किसी व्यंजन के साथ आता है, तो उसकी जगह पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग करने की सुविधा दी गई है। जैसे ‘हिन्दी’ को ‘हिंदी’ और ‘गङ्गा’ को ‘गंगा’ लिखना। लेकिन यह जानना महत्वपूर्ण है कि उस अनुस्वार का वास्तविक उच्चारण संबंधित पंचमाक्षर का ही होता है।


ट्रिक 1: व्यंजनों के पाँचों वर्ग (क, च, ट, त, प) याद करने की ट्रिक

याद रखें ये मज़ेदार वाक्य: “कचट-तप”
यह एक ही शब्द है जिसमें पाँचों वर्गों का पहला अक्षर क्रम से है:

बस “कचटतप” शब्द को याद कर लें, आपको पाँचों वर्ग क्रम से याद हो जाएँगे।

ट्रिक 2: उच्चारण स्थान याद करने की शानदार ट्रिक

अपने गले से होठों की तरफ के क्रम में उच्चारण स्थान याद करें।

ट्रिक-वाक्य: “एक तो मुर्गा दाँत-ओंठ पर” या एक सरल वाक्य “K T M दो (KTM DO)”
इस वाक्य के अक्षरों को “कचटतप” के क्रम से जोड़ दें:

कचटतप (वर्ग)KTM DO (उच्चारण स्थान)
क-वर्ग (क)K – कंठ (गला)
च-वर्ग (च)T – तालु (गले के ऊपर)
ट-वर्ग (ट)M – मूर्धा (मुँह का ऊपरी छत)
त-वर्ग (त)D – दंत (दाँत)
प-वर्ग (प)O – ओष्ठ (होंठ)

कैसे काम करता है:

  1. क वर्ग के सभी अक्षर कंठ से बोले जाते हैं (सबसे अंदर)।
  2. च वर्ग के सभी अक्षर तालु से (थोड़ा बाहर)।
  3. ट वर्ग के सभी अक्षर मूर्धा से (मुँह की छत से)।
  4. त वर्ग के सभी अक्षर दंत (दाँत) से (जीभ दाँतों को छूती है)।
  5. प वर्ग के सभी अक्षर ओष्ठ (होंठ) से (होंठ आपस में मिलते हैं, सबसे बाहर)।

ट्रिक 3: अल्पप्राण और महाप्राण पहचानने की गणितीय ट्रिक

प्राण = श्वास (साँस)

गणितीय नियम: अल्पप्राण = 1, 3, 5 और महाप्राण = 2, 4
प्रत्येक वर्ग (क, च, ट, त, प) के लिए यह नियम लागू करें:

1. अल्पप्राण2. महाप्राण3. अल्पप्राण4. महाप्राण5. अल्पप्राण
ख (kha)घ (gha)
छ (cha)झ (jha)
ठ (tha)ढ (dha)

साथ में यह भी याद रखें:

सरल ट्रिक: जिन व्यंजनों के अंग्रेजी उच्चारण में ‘h’ लगता है, वे अक्सर महाप्राण होते हैं (जैसे – kh, gh, ch(h), jh, th, dh)।

ट्रिक 4: सघोष (घोष) और अघोष पहचानने की ट्रिक

घोष = नाद/कंपन

गणितीय नियम: अघोष = 1, 2 और सघोष = 3, 4, 5
प्रत्येक वर्ग के लिए यह नियम लागू करें:

1. अघोष2. अघोष3. सघोष4. सघोष5. सघोष

साथ में यह भी याद रखें:

सब कुछ एक टेबल में (SUPER TRICK TABLE)

बस इस टेबल को दिमाग में बिठा लें:

1 (क, च…)2 (ख, छ…)3 (ग, ज…)4 (घ, झ…)5 (ङ, ञ…)
घोषत्वअघोषअघोषसघोषसघोषसघोष
प्राणत्वअल्पप्राणमहाप्राणअल्पप्राणमहाप्राणअल्पप्राण
याद करने का तरीकाशुरुआत कठोर (अघोष) और अंत मधुर (सघोष)एक छोड़कर एक महाप्राण

इन ट्रिक्स को एक या दो बार अभ्यास करें, और हिन्दी वर्णमाला का यह कठिन लगने वाला अध्याय आपको हमेशा के लिए याद हो जाएगा

3. व्यंजन (Consonants)

क) स्पर्श व्यंजन (Sparsh Vyanjan) – (संख्या: 25)
जिनके उच्चारण में जीभ मुख के अलग-अलग हिस्सों (कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ) को स्पर्श करती है। इन्हें पाँच वर्गों में बांटा गया है, और प्रत्येक वर्ग के अंतिम वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) को नासिक्य/पंचमाक्षर कहते हैं।

ख) अंतःस्थ व्यंजन (Antasth Vyanjan) – (संख्या: 4)
इनका उच्चारण स्वर और व्यंजन के बीच का-सा होता है। जीभ मुख के किसी भाग को पूरी तरह स्पर्श नहीं करती।

ग) ऊष्म व्यंजन (Ushm Vyanjan) – (संख्या: 4)
इनके उच्चारण में मुख से हवा रगड़ खाकर निकलती है, जिससे ऊष्मा (गर्मी) पैदा होती है।

घ) उत्क्षिप्त / द्विगुण व्यंजन (Utkshipt / Dwigun Vyanjan) – (संख्या: 2)
इनके उच्चारण में जीभ ऊपर उठकर झटके के साथ नीचे आती है। ये हिन्दी के अपने विकसित व्यंजन हैं। इनसे कोई शब्द शुरू नहीं होता।

ङ) संयुक्त व्यंजन (Sanyukt Vyanjan) – (संख्या: 4)
ये दो व्यंजनों के मेल से बनते हैं।

आगत (गृहीत) ध्वनियाँ (Adopted Sounds):
हिन्दी ने कुछ विदेशी भाषाओं (अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी) से भी कुछ ध्वनियों को अपनाया है, जिन्हें वर्णमाला में सीधे तौर पर शामिल नहीं किया जाता, पर लेखन में प्रयोग होता है। इनके नीचे बिंदी (नुक्ता) लगाई जाती है।


द्वित्व व्यंजन वाले कुछ शब्द हैं ‘बच्चा’ (च्+च), ‘अम्मा’ (म्+म), ‘कुत्ता’ (त्+त), ‘दिल्ली’ (ल्+ल), ‘सिक्का’ (क्+क), और ‘गद्दा’ (द्+द)। द्वित्व व्यंजन तब बनता है जब एक ही व्यंजन दो बार प्रयोग होता है, जिनमें से एक आधा और दूसरा पूरा होता है। 

उदाहरण:

समझने के लिए मुख्य बिंदु:

उच्चारण स्थान (Place of Articulation)

परिभाषा:
मुख के जिस भाग से किसी ध्वनि (वर्ण) का उच्चारण किया जाता है, उस भाग को उस ध्वनि का ‘उच्चारण स्थान’ कहते हैं। फेफड़ों से निकलने वाली हवा मुख के इन भागों से टकराकर या उनमें परिवर्तन करके भिन्न-भिन्न ध्वनियों को जन्म देती है।

हिन्दी ध्वनियों का उच्चारण स्थान के अनुसार वर्गीकरण

हिन्दी की ध्वनियों (स्वर और व्यंजन) को उनके उच्चारण स्थानों के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है:

1. कंठ्य (Guttural)

जिन ध्वनियों का उच्चारण कंठ (गले) से होता है।

2. तालव्य (Palatal)

जिन ध्वनियों का उच्चारण जीभ के तालु (मुँह के भीतर की छत का अगला हिस्सा) को स्पर्श करने से होता है।

3. मूर्धन्य (Retroflex)

जिन ध्वनियों का उच्चारण जीभ के अगले भाग द्वारा मूर्धा (मुँह के भीतर की छत का पिछला, कठोर हिस्सा) को स्पर्श करने से होता है।

4. दंत्य (Dental)

जिन ध्वनियों का उच्चारण जीभ के अग्र भाग के ऊपरी दाँतों को स्पर्श करने से होता है।

5. ओष्ठ्य (Labial)

जिन ध्वनियों का उच्चारण दोनों होंठों (ओष्ठों) के मिलने से होता है।

संयुक्त उच्चारण स्थान वाली ध्वनियाँ

कुछ ध्वनियाँ ऐसी हैं जिनका उच्चारण मुख के दो भागों के संयोग से होता है।

6. कंठ-तालव्य (Guttural-Palatal)

जिनका उच्चारण कंठ और तालु, दोनों की सहायता से होता है।

7. कंठोष्ठ्य (Guttural-Labial)

जिनका उच्चारण कंठ और होंठ, दोनों की सहायता से होता है।

8. दंतोष्ठ्य (Denti-Labial)

जिनका उच्चारण ऊपरी दाँत और निचले होंठ के मिलने से होता है।

9. नासिक्य (Nasal)

जिन ध्वनियों के उच्चारण में हवा मुख के साथ-साथ नाक से भी बाहर निकलती है।

10. वर्त्स्य (Alveolar) – एक विशिष्ट श्रेणी

कुछ भाषाविद् कुछ दंत्य ध्वनियों को वर्त्स्य (मसूड़ा) की श्रेणी में रखते हैं क्योंकि इनके उच्चारण में जीभ ऊपरी दाँतों के ठीक पीछे के कठोर मसूड़े को छूती है।

उच्चारण स्थानों की सारणी

क्र. सं.उच्चारण स्थान का नामउच्चारण में सहायक अंगउच्चारित वर्ण
1.कंठ्यकंठ (गला)अ, आ, क-वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), ह, अः
2.तालव्यतालु और जीभइ, ई, च-वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ), य, श
3.मूर्धन्यमूर्धा और जीभऋ, ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण), ड़, ढ़, र, ष
4.दंत्यदाँत और जीभत-वर्ग (त, थ, द, ध, न), ल, स
5.ओष्ठ्यदोनों होंठउ, ऊ, प-वर्ग (प, फ, ब, भ, म)
6.कंठ-तालव्यकंठ और तालुए, ऐ
7.कंठोष्ठ्यकंठ और होंठओ, औ
8.दंतोष्ठ्यदाँत और होंठ
9.नासिक्यनाक और मुखङ, ञ, ण, न, म, अं, अँ

उच्चारण प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण

‘उच्चारण प्रयत्न’ का अर्थ है किसी ध्वनि (वर्ण) को बोलने के लिए मुख के अंगों द्वारा किया जाने वाला प्रयास या यत्न। जब हम व्यंजन बोलते हैं, तो हमारे मुख के अंग (जैसे- जीभ, होंठ, तालु) और स्वर-तंत्रियाँ कई तरह के प्रयास करती हैं।

उच्चारण प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों को मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में बाँटा जाता है:

  1. अभ्यंतर प्रयत्न (Internal Effort): ध्वनि के उच्चारण से ठीक पहले मुख के भीतर होने वाला प्रयत्न।
  2. बाह्य प्रयत्न (External Effort): ध्वनि के उच्चारण के समय होने वाले बाहरी प्रयत्न (जैसे – श्वास का प्रयोग, कंपन)।

हिन्दी में बाह्य प्रयत्न के आधार पर किया गया वर्गीकरण अधिक प्रचलित और महत्वपूर्ण है।

A. बाह्य प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण

बाह्य प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के दो मुख्य भेद हैं:

1. श्वास-वायु (प्राण) की मात्रा के आधार पर
2. स्वर-तंत्रियों में कंपन (नाद/घोष) के आधार पर

1. श्वास-वायु (प्राण) की मात्रा के आधार पर

इसका अर्थ है कि व्यंजन के उच्चारण में कितनी मात्रा में हवा (श्वास) फेफड़ों से बाहर निकलती है।

2. स्वर-तंत्रियों में कंपन (नाद/घोष) के आधार पर

इसका अर्थ है कि व्यंजन के उच्चारण के समय गले में स्थित स्वर-तंत्रियों (vocal cords) में कंपन होता है या नहीं।

B. अभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण (संक्षिप्त)

यह वर्गीकरण मुख्य रूप से संस्कृत व्याकरण में अधिक प्रयोग होता है, पर हिन्दी में भी इसे समझा जा सकता है। यह बताता है कि ध्वनि उत्पन्न होने से पहले मुख के अंदर क्या-क्या प्रयास होते हैं।

उच्चारण प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण (सारणी)

यह सारणी बाह्य प्रयत्न (श्वास-वायु और स्वर-तंत्रियों में कंपन) पर आधारित है, जो हिन्दी व्याकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

वर्गवर्णअघोष / सघोष? (कंपन)अल्पप्राण / महाप्राण? (श्वास-वायु)उच्चारण स्थान
क-वर्गअघोष (1)अल्पप्राण (1)कंठ्य
अघोष (2)महाप्राण (2)कंठ्य
सघोष (3)अल्पप्राण (3)कंठ्य
सघोष (4)महाप्राण (4)कंठ्य
सघोष (5)अल्पप्राण (5)कंठ्य/नासिक्य
च-वर्गअघोष (1)अल्पप्राण (1)तालव्य
अघोष (2)महाप्राण (2)तालव्य
सघोष (3)अल्पप्राण (3)तालव्य
सघोष (4)महाप्राण (4)तालव्य
सघोष (5)अल्पप्राण (5)तालव्य/नासिक्य
ट-वर्गअघोष (1)अल्पप्राण (1)मूर्धन्य
अघोष (2)महाप्राण (2)मूर्धन्य
सघोष (3)अल्पप्राण (3)मूर्धन्य
सघोष (4)महाप्राण (4)मूर्धन्य
सघोष (5)अल्पप्राण (5)मूर्धन्य/नासिक्य
त-वर्गअघोष (1)अल्पप्राण (1)दंत्य
अघोष (2)महाप्राण (2)दंत्य
सघोष (3)अल्पप्राण (3)दंत्य
सघोष (4)महाप्राण (4)दंत्य
सघोष (5)अल्पप्राण (5)दंत्य/नासिक्य
प-वर्गअघोष (1)अल्पप्राण (1)ओष्ठ्य
अघोष (2)महाप्राण (2)ओष्ठ्य
सघोष (3)अल्पप्राण (3)ओष्ठ्य
सघोष (4)महाप्राण (4)ओष्ठ्य
सघोष (5)अल्पप्राण (5)ओष्ठ्य/नासिक्य
अंतःस्थसघोषअल्पप्राणतालव्य
सघोषअल्पप्राणमूर्धन्य/वर्त्स्य
सघोषअल्पप्राणदंत्य/वर्त्स्य
सघोषअल्पप्राणदंतोष्ठ्य
ऊष्मअघोषमहाप्राणतालव्य
अघोषमहाप्राणमूर्धन्य
अघोषमहाप्राणदंत्य/वर्त्स्य
सघोषमहाप्राणकंठ्य (स्वरयंत्रीय)
उत्क्षिप्तड़सघोषअल्पप्राणमूर्धन्य
ढ़सघोषमहाप्राणमूर्धन्य
नोटसभी स्वरसघोषअल्पप्राण(भिन्न-भिन्न)

ट्रिक के साथ संक्षिप्त सारणी (Easy-to-Remember Summary Table)

प्रयत्नवर्ण
अघोष (No Vibration)प्रत्येक वर्ग का 1, 2 वर्ण + श, ष, स (कुल 13)
सघोष (Vibration)प्रत्येक वर्ग का 3, 4, 5 वर्ण + य, र, ल, व, ह + सभी स्वर
अल्पप्राण (Less Air)प्रत्येक वर्ग का 1, 3, 5 वर्ण + य, र, ल, व + सभी स्वर
महाप्राण (More Air)प्रत्येक वर्ग का 2, 4 वर्ण + श, ष, स, ह (कुल 14)

निष्कर्ष

हिन्दी की वर्णमाला अपने वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित वर्गीकरण के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। इसका प्रत्येक वर्ण एक विशिष्ट ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है, जो इसे सीखने और सिखाने में अत्यंत सुगम बनाता है। यह वर्णमाला भारत की भाषाई विविधता और उसके ऐतिहासिक विकास का प्रतीक है।


बारहखड़ी (Barahkhadi)

परिभाषा:
बारहखड़ी, देवनागरी लिपि और अन्य भारतीय लिपियों में व्यंजनों और स्वरों के संयोग (मेल) से बनने वाले अक्षरों के क्रमबद्ध समूह को कहते हैं। इसमें प्रत्येक व्यंजन के साथ बारह (या उससे अधिक) स्वरों (मात्राओं) को लगाकर उसके विभिन्न रूपों को दर्शाया जाता है।

यह वर्णमाला सीखने और शब्दों का सही उच्चारण करने का एक बुनियादी और परंपरागत तरीका है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को यह सिखाना है कि व्यंजनों पर मात्राएँ कैसे लगाई जाती हैं और उनका उच्चारण कैसे बदलता है।

“बारहखड़ी” नाम “बारह अक्षरों की लड़ी (श्रृंखला)” से बना है, क्योंकि इसमें परंपरागत रूप से बारह स्वर रूपों को शामिल किया जाता था।


बारहखड़ी की संरचना

बारहखड़ी में एक व्यंजन के साथ निम्नलिखित ग्यारह (11) स्वरों और दो (2) अयोगवाहों को जोड़ा जाता है। आधुनिक बारहखड़ी में ‘ऋ’ की मात्रा को अक्सर शामिल नहीं किया जाता, क्योंकि इसका प्रयोग कुछ विशेष तत्सम शब्दों तक ही सीमित है।

एक व्यंजन (जैसे – ‘क’) के लिए बारहखड़ी इस प्रकार बनेगी:

  1. क (क् + अ) → (मूल रूप)
  2. का (क् + आ) → (ा की मात्रा)
  3. कि (क् + इ) → (ि की मात्रा)
  4. की (क् + ई) → (ी की मात्रा)
  5. कु (क् + उ) → (ु की मात्रा)
  6. कू (क् + ऊ) → (ू की मात्रा)
  7. के (क् + ए) → (े की मात्रा)
  8. कै (क् + ऐ) → (ै की मात्रा)
  9. को (क् + ओ) → (ो की मात्रा)
  10. कौ (क् + औ) → (ौ की मात्रा)
  11. कं (क् + अं) → (ं अनुस्वार)
  12. कः (क् + अः) → (ः विसर्ग)

एक साथ:
क, का, कि, की, कु, कू, के, कै, को, कौ, कं, कः

ऋ ( ृ ) की मात्रा के साथ:
अगर ‘ऋ’ की मात्रा को भी शामिल किया जाए, तो इसका रूप कृ (क् + ऋ) होगा। तब इसे ‘तेरहखड़ी’ कहा जा सकता है, लेकिन पारंपरिक नाम “बारहखड़ी” ही प्रचलित है।


बारहखड़ी का महत्व

  1. भाषा की बुनियाद: यह हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने का पहला कदम है।
  2. मात्राओं का ज्ञान: यह छात्रों को स्वरों और उनकी मात्राओं को पहचानने और उनका सही प्रयोग करने में मदद करती है।
  3. शुद्ध उच्चारण: बारहखड़ी के अभ्यास से शब्दों का शुद्ध उच्चारण करना आसान हो जाता है, विशेषकर ह्रस्व (इ, उ) और दीर्घ (ई, ऊ) मात्राओं के बीच के अंतर को समझना।
  4. पढ़ने और लिखने में सहायक: यह पढ़ने (reading) और लिखने (writing) के कौशल को विकसित करने का एक सिद्ध और प्रभावी तरीका है। शब्दों को अक्षरों में तोड़कर (syllabification) पढ़ने की क्षमता इसी से विकसित होती है।

आधुनिक संदर्भ और सीमाएँ

निष्कर्ष

सीमाओं के बावजूद, बारहखड़ी आज भी देवनागरी लिपि आधारित भाषाओं को सिखाने के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली और आधारभूत उपकरण है। यह सीखने की प्रक्रिया को एक व्यवस्थित ढाँचा प्रदान करती है और बच्चों की भाषाई नींव को मजबूत करती है, जिससे वे आत्मविश्वास के साथ पढ़ना और लिखना सीख पाते हैं।