भाषा (Language)
भाषा (Language)
भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों, भावों और अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं। यह मानव समाज में संचार का सबसे महत्वपूर्ण और सशक्त साधन है। भाषा के बिना मनुष्य अपने विचारों को व्यक्त नहीं कर सकता और न ही दूसरों के विचारों को समझ सकता है।
1. भाषा की परिभाषा:
सरल शब्दों में, भाषा ध्वनियों और प्रतीकों की एक व्यवस्थित प्रणाली है जिसका उपयोग मनुष्य आपसी संचार के लिए करते हैं। यह प्रतीकों का एक ऐसा सेट है, जिसका कुछ अर्थ होता है, और इन प्रतीकों को व्यवस्थित करने के लिए कुछ नियम होते हैं (जिन्हें व्याकरण कहते हैं)।
- “भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर या पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।”
2. भाषा की प्रमुख विशेषताएँ:
भाषा कुछ विशिष्ट गुणों से युक्त होती है जो इसे मानव समाज के लिए इतना आवश्यक बनाते हैं:
- यादृच्छिक/प्रतीकात्मक (Arbitrary/Symbolic): शब्दों और उनके अर्थों के बीच कोई स्वाभाविक संबंध नहीं होता। एक ही वस्तु के लिए अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग शब्द होते हैं (जैसे – ‘पानी’, ‘Water’, ‘जल’, ‘नीर’)। यह पूरी तरह से प्रतीकात्मक और समाज द्वारा स्वीकृत होता है।
- परिवर्तनशील (Dynamic/Changing): भाषा स्थिर नहीं होती; यह समय के साथ बदलती रहती है। नए शब्द आते हैं, पुराने शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं या वे लुप्त हो जाते हैं। व्याकरण और उच्चारण में भी परिवर्तन होते हैं।
- सामाजिक संपत्ति (Social Property): भाषा किसी व्यक्ति विशेष की नहीं होती, बल्कि पूरे समाज की संपत्ति होती है। यह समाज में रहकर ही सीखी जाती है और उसी के विकास के साथ विकसित होती है।
- पैतृक नहीं, अर्जित (Learned, not Hereditary): भाषा हमें अपने माता-पिता से विरासत में नहीं मिलती। बच्चे भाषा को अपने आसपास के परिवेश और समाज से सीखते हैं। एक भारतीय बच्चा अमेरिका में जन्म लेकर अमेरिकी भाषा सीख सकता है।
- सीखने की जटिल प्रणाली: भाषा एक अत्यंत जटिल संरचना है जिसमें ध्वनियाँ, शब्द और व्याकरण के नियम शामिल होते हैं।
- विचारों की वाहक: भाषा के माध्यम से ही हम अमूर्त विचारों, भावनाओं, ज्ञान और संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते हैं।
- अनेक रूपों में (Multiple Forms): मौखिक, लिखित और सांकेतिक (इशारों की) – भाषा के कई रूप होते हैं।
3. भाषा के मुख्य रूप:
भाषा को मुख्यतः दो प्रमुख रूपों में देखा जाता है, हालाँकि सांकेतिक भाषा भी एक महत्वपूर्ण रूप है:
- क) मौखिक भाषा (Oral Language):
- जब विचारों का आदान-प्रदान बोलकर और सुनकर किया जाता है, तो उसे मौखिक भाषा कहते हैं।
- यह भाषा का सबसे प्राचीन और स्वाभाविक रूप है।
- उदाहरण: बातचीत करना, भाषण देना, कहानी सुनाना, फोन पर बात करना।
- ख) लिखित भाषा (Written Language):
- जब विचारों का आदान-प्रदान लिखकर और पढ़कर किया जाता है, तो उसे लिखित भाषा कहते हैं। इसमें अक्षरों, वर्णों या प्रतीकों का उपयोग किया जाता है।
- यह मौखिक भाषा की तुलना में अधिक स्थायी और सुविचारित होती है।
- उदाहरण: पत्र लिखना, किताब पढ़ना, समाचार-पत्र, ईमेल।
- ग) सांकेतिक भाषा (Sign Language):
- जब विचारों का आदान-प्रदान इशारों, संकेतों और शारीरिक हाव-भावों (body gestures) द्वारा किया जाता है, तो उसे सांकेतिक भाषा कहते हैं।
- इसका उपयोग विशेष रूप से उन लोगों द्वारा किया जाता है जो बोल या सुन नहीं सकते।
- उदाहरण: मूक-बधिर लोगों की भाषा, ट्रैफिक पुलिस के इशारे।
4. भाषा का महत्व:
भाषा मानव जीवन और समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- संचार का आधार: यह मनुष्यों के बीच आपसी संवाद और समझ का आधार है।
- ज्ञान का संचय: भाषा के माध्यम से ही ज्ञान और अनुभव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक संचरित होते हैं। शिक्षा, विज्ञान और साहित्य भाषा पर ही आधारित हैं।
- संस्कृति का वाहक: भाषा किसी भी समाज की संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं को सुरक्षित रखती है और आगे बढ़ाती है।
- विचार प्रक्रिया: मनुष्य भाषा के माध्यम से ही सोचते और समझते हैं। भाषा विचारों को व्यवस्थित करती है।
- सामाजिक एकीकरण: एक साझा भाषा लोगों को एक साथ लाती है और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देती है।
- मानव विकास का प्रतीक: भाषा का विकास मानव सभ्यता के विकास के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है।
5. बोली, उपभाषा और भाषा में अंतर:
- बोली (Dialect): यह भाषा का सबसे सीमित और स्थानीय रूप होता है, जो एक छोटे से क्षेत्र में बोला जाता है। इसका अपना कोई लिखित साहित्य या व्याकरण नहीं होता और इसे शिक्षा, प्रशासन में प्रयोग नहीं किया जाता। जैसे – ब्रज, अवधी, हरियाणवी।
- उपभाषा (Sub-language/Minor language): जब किसी बोली में साहित्य-रचना होने लगती है और उसका क्षेत्र थोड़ा विस्तृत हो जाता है, तो वह उपभाषा बन जाती है। उपभाषा का व्याकरण भी निश्चित होता है। जैसे – हिन्दी की उपभाषाएँ (पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी आदि)।
- भाषा (Language): जब किसी उपभाषा का क्षेत्र और विस्तृत हो जाता है, उसमें उच्च कोटि का साहित्य लिखा जाने लगता है, और उसे शिक्षा, प्रशासन, विज्ञान, साहित्य आदि में मान्यता मिल जाती है, तो वह एक मानक भाषा का दर्जा प्राप्त कर लेती है। इसमें विभिन्न बोलियाँ और उपभाषाएँ समाहित होती हैं। जैसे – हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत।
भाषा मानव जाति की सबसे अद्भुत और महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिसके बिना आधुनिक सभ्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
भाषा और व्याकरण
भाषा और व्याकरण (Language and Grammar)
भाषा: विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम
भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारों, भावों, अनुभवों और इच्छाओं को व्यक्त करता है और दूसरों के विचारों को समझता है। यह सामाजिक जीवन की आधारशिला है और संचार का सबसे प्रमुख साधन है।
- मूल रूप: भाषा का मूल रूप मौखिक है, जो ध्वनियों पर आधारित है।
- विकसित रूप: इसका विकसित रूप लिखित है, जो लिपि (चिह्नों या अक्षरों) पर आधारित है।
- उदाहरण: हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, स्पेनिश, फ्रेंच आदि सभी भाषाएँ हैं।
भाषा समय के साथ बदलती रहती है, नए शब्द जुड़ते हैं, और पुराने अप्रचलित हो जाते हैं। यह किसी समाज की संस्कृति, ज्ञान और पहचान का आईना होती है।
व्याकरण: भाषा को नियंत्रित करने वाले नियम
व्याकरण वह शास्त्र या विज्ञान है जो भाषा को शुद्ध रूप में बोलने, लिखने और समझने के नियम सिखाता है। यह भाषा की संरचना, शब्दों के गठन, और वाक्यों की रचना को नियंत्रित करता है।
परिभाषा:
- व्याकरण वह विद्या है जो हमें किसी भाषा का शुद्ध उच्चारण, शुद्ध लेखन एवं शुद्ध प्रयोग करना सिखाती है।
इसे ‘भाषा का संविधान’ भी कहा जा सकता है। जैसे संविधान किसी देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए नियम बनाता है, वैसे ही व्याकरण भाषा को अनुशासित और व्यवस्थित करता है।
व्याकरण के प्रमुख अंग (Parts of Grammar)
व्याकरण का अध्ययन मुख्य रूप से तीन (या कभी-कभी चार) भागों में विभाजित किया जाता है:
- वर्ण-विचार (Orthography/Phonology):
- इसमें वर्णों (अक्षरों) के आकार, प्रकार, उनके उच्चारण स्थान, और लिखने की विधि का अध्ययन किया जाता है।
- स्वर, व्यंजन, मात्राएँ, उच्चारण आदि इसी के अंतर्गत आते हैं।
- शब्द-विचार (Morphology/Etymology):
- इसमें शब्दों के भेद (संज्ञा, सर्वनाम आदि), उनकी उत्पत्ति (तत्सम, तद्भव), उनकी रचना (रूढ़, यौगिक), और उनके रूपांतरण (लिंग, वचन, कारक) का अध्ययन किया जाता है।
- वाक्य-विचार (Syntax):
- इसमें वाक्य की रचना, वाक्य के अंग (उद्देश्य-विधेय), वाक्य के प्रकार (सरल, संयुक्त), विराम चिह्नों का प्रयोग और वाक्य-शुद्धि का अध्ययन किया जाता है।
- (पद-विचार): कुछ व्याकरण विशेषज्ञ इसे एक अलग अंग मानते हैं, जिसमें वाक्य में प्रयुक्त होने वाले शब्दों (पदों) और उनके व्याकरणिक परिचय का अध्ययन किया जाता है।
भाषा और व्याकरण का अटूट संबंध
भाषा और व्याकरण एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। इनका संबंध इस प्रकार समझा जा सकता है:
- भाषा पहले, व्याकरण बाद में:
- समाज में पहले भाषा का जन्म होता है। लोग बोलना शुरू करते हैं, और धीरे-धीरे एक मौखिक संचार प्रणाली विकसित होती है।
- जब भाषा एक व्यवस्थित रूप ले लेती है, तब विद्वान और भाषाविद उसके नियमों को समझने और संहिताबद्ध (codify) करने का प्रयास करते हैं। यहीं से व्याकरण का जन्म होता है। अतः भाषा स्वाभाविक है, जबकि व्याकरण भाषा के आधार पर बनाया गया नियम-तंत्र है।
- व्याकरण भाषा को परिष्कृत और मानकीकृत करता है:
- व्याकरण भाषा के बिखरे हुए रूपों को एक मानक (Standard) और शुद्ध रूप प्रदान करता है।
- यह तय करता है कि क्या सही है और क्या गलत। जैसे – “मेरे को जाना है” भाषा का एक प्रचलित रूप है, लेकिन व्याकरण के अनुसार शुद्ध वाक्य “मुझे जाना है” होगा।
- व्याकरण भाषा में स्थिरता लाता है:
- भाषा परिवर्तनशील है, लेकिन व्याकरण के नियम उसे एक स्थिर ढाँचा प्रदान करते हैं, जिससे भाषा का मूल स्वरूप बना रहता है। यह भाषा को मनमाने ढंग से बदलने से रोकता है।
- सीखने में सहायक:
- मातृभाषा तो हम स्वाभाविक रूप से सीख लेते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति दूसरी भाषा सीखता है, तो व्याकरण के नियम उस भाषा की संरचना को समझने में बहुत मदद करते हैं।
निष्कर्ष
भाषा एक जीवंत नदी की तरह है, जो स्वाभाविक रूप से बहती है, और व्याकरण उस नदी के दो किनारों की तरह है, जो उसे सही दिशा में और मर्यादा के साथ बहने में मदद करते हैं। बिना व्याकरण के भाषा अनियंत्रित, अव्यवस्थित और अस्पष्ट हो सकती है, जबकि बिना भाषा के व्याकरण का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
संक्षेप में:
- भाषा = भावों की अभिव्यक्ति।
- व्याकरण = उस अभिव्यक्ति को शुद्ध और प्रभावी बनाने वाले नियम।
दोनों मिलकर ही एक सशक्त और सार्थक संचार प्रणाली का निर्माण करते हैं।
भाषा की परिभाषा (Definition of Language)
भाषा शब्द संस्कृत के ‘भाष्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है ‘बोलना’ या ‘कहना’। यह वह साधन (माध्यम) है जिसके द्वारा मनुष्य अपने मन के विचारों, भावों, इच्छाओं और अनुभवों को दूसरों के सामने प्रकट करता है और दूसरों के विचारों को समझता है।
सरल शब्दों में, भाषा सार्थक ध्वनियों और संकेतों की एक ऐसी व्यवस्थित प्रणाली है जिसका उपयोग समाज में रहने वाले लोग आपसी संचार के लिए करते हैं।
कुछ प्रमुख परिभाषाएँ:
- “भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर या पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।”
- “ध्वन्यात्मक प्रतीकों की वह व्यवस्था जिसके माध्यम से एक समाज के लोग आपस में विचार-विमर्श करते हैं, भाषा कहलाती है।”
भाषा के प्रकार (Types of Language)
संचार के माध्यम के आधार पर भाषा के मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं:
1. मौखिक भाषा (Oral Language)
परिभाषा: जब हम बोलकर अपने विचारों को प्रकट करते हैं और सामने वाला सुनकर उसे समझता है, तो उसे मौखिक भाषा कहते हैं। यह भाषा का सबसे प्राचीन, स्वाभाविक और सर्वाधिक प्रयोग किया जाने वाला रूप है।
- विशेषताएँ:
- यह भाषा का मूल रूप है। मनुष्य सबसे पहले बोलना ही सीखता है।
- यह अस्थायी होती है। बोले गए शब्द उसी क्षण समाप्त हो जाते हैं (जब तक कि उन्हें रिकॉर्ड न किया जाए)।
- इसमें उच्चारण, लहजे और भाव-भंगिमा का बहुत महत्व होता है।
- इसे सीखने के लिए विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं होती, इसे सुनकर अनुकरण द्वारा सीखा जाता है।
- उदाहरण:
- आपस में बातचीत करना
- भाषण देना या सुनना
- कहानी सुनाना या सुनना
- फोन पर बात करना
- रेडियो या टेलीविज़न देखना/सुनना
2. लिखित भाषा (Written Language)
परिभाषा: जब हम लिखकर अपने विचारों को प्रकट करते हैं और कोई दूसरा व्यक्ति उसे पढ़कर समझता है, तो उसे लिखित भाषा कहते हैं। इसमें वर्णों, अक्षरों और प्रतीकों की एक निश्चित व्यवस्था का प्रयोग किया जाता है, जिसे लिपि (Script) कहते हैं।
- विशेषताएँ:
- यह भाषा का स्थायी रूप है। इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
- ज्ञान, विज्ञान, साहित्य और इतिहास का संरक्षण लिखित भाषा के कारण ही संभव हो पाया है।
- यह अधिक सुविचारित, स्पष्ट और व्यवस्थित होती है।
- इसे सीखने के लिए औपचारिक शिक्षा और अभ्यास की आवश्यकता होती है।
- उदाहरण:
- पत्र लिखना
- पुस्तक या समाचार पत्र पढ़ना
- ईमेल या संदेश (message) भेजना
- निबंध या लेख लिखना
- नोटिस बोर्ड पर लिखी सूचना पढ़ना
3. सांकेतिक भाषा (Sign Language)
परिभाषा: जब विचारों और भावों का आदान-प्रदान इशारों, संकेतों या शारीरिक हाव-भावों के माध्यम से किया जाता है, तो उसे सांकेतिक भाषा कहते हैं।
- विशेषताएँ:
- यह भाषा उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो बोल या सुन नहीं सकते (मूक-बधिर)।
- सांकेतिक भाषा का भी अपना एक व्याकरण और व्यवस्थित नियम होते हैं।
- यह हर स्थिति में विचारों को पूरी तरह स्पष्ट करने में सक्षम नहीं हो सकती।
- उदाहरण:
- मूक-बधिर लोगों का आपस में बात करना।
- ट्रैफिक पुलिस का हाथ के इशारे से यातायात को नियंत्रित करना।
- क्रिकेट के अंपायर का इशारा करके आउट या छक्के का निर्णय देना।
- सिर हिलाकर ‘हाँ’ या ‘ना’ में जवाब देना।
- किसी को इशारे से बुलाना या जाने के लिए कहना।
तीनों रूपों की तुलना
| आधार | मौखिक भाषा | लिखित भाषा | सांकेतिक भाषा |
| माध्यम | ध्वनि (Sound) | लिपि/वर्ण (Script/Letters) | संकेत/इशारे (Signs/Gestures) |
| स्थायित्व | अस्थायी (Temporary) | स्थायी (Permanent) | अस्थायी (Temporary) |
| सीखने की प्रक्रिया | स्वाभाविक/अनुकरण द्वारा | औपचारिक शिक्षा/अभ्यास द्वारा | अनुकरण या प्रशिक्षण द्वारा |
| क्षेत्र/व्यापकता | सीमित (सुनने वाले तक) | अत्यंत व्यापक (दूर-दूर तक) | बहुत सीमित |
| स्पष्टता | प्रायः स्पष्ट | सर्वाधिक स्पष्ट और प्रामाणिक | सीमित स्पष्टता |
बोली (Dialect)
परिभाषा:
बोली, भाषा का वह सीमित और क्षेत्रीय रूप है जो किसी स्थान विशेष में स्थानीय लोगों द्वारा बोलचाल के लिए प्रयोग किया जाता है। यह भाषा का सबसे छोटा और आधारभूत रूप है। बोली मुख्य रूप से मौखिक होती है और इसका कोई मानक लिखित रूप या व्याकरण नहीं होता।
सरल शब्दों में, जब एक ही भाषा अलग-अलग जगहों पर थोड़ी-थोड़ी भिन्नता के साथ बोली जाती है, तो उसके इन विभिन्न रूपों को ‘बोली’ कहते हैं।
बोली की प्रमुख विशेषताएँ:
- सीमित क्षेत्र: बोली का प्रयोग एक बहुत ही सीमित भौगोलिक क्षेत्र में होता है, जैसे कोई गाँव, कस्बा या जिला।
- मौखिक रूप: यह मुख्य रूप से बोलचाल तक ही सीमित होती है। इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनकर और अनुकरण करके ही सीखा जाता है।
- मानक व्याकरण का अभाव: बोली का कोई निश्चित और लिखित व्याकरण नहीं होता। इसके नियम स्थानीय स्तर पर ही तय होते हैं और उनमें विविधता पाई जाती है।
- साहित्य का अभाव: सामान्यतः बोली में उच्च कोटि के साहित्य की रचना नहीं होती। इसमें ज्यादातर लोकगीत, लोक-कथाएँ और कहावतें ही मिलती हैं।
- घरेलू और अनौपचारिक प्रयोग: बोली का प्रयोग घरेलू बातचीत और अनौपचारिक संचार में किया जाता है। इसे शिक्षा, प्रशासन या कार्यालयों में उपयोग नहीं किया जाता।
- शब्द भंडार में स्थानीयता: बोली में स्थानीयता का गहरा प्रभाव होता है, और इसमें उस क्षेत्र विशेष में प्रचलित शब्द अधिक होते हैं।
बोली, उपभाषा और भाषा में संबंध और अंतर:
इन तीनों के बीच एक पदानुक्रम (hierarchy) का संबंध है। यह एक विकास की प्रक्रिया को दर्शाता है।
- 1. बोली (Dialect):
- यह सबसे छोटी इकाई है।
- उदाहरण: भोजपुरी, हरियाणवी, मारवाड़ी, अवधी, ब्रजभाषा।
- 2. उपभाषा (Sub-language):
- जब किसी बोली का क्षेत्र थोड़ा विस्तृत हो जाता है, उसमें साहित्य-रचना होने लगती है, और उसे बोलने वालों की संख्या बढ़ जाती है, तो वह ‘उपभाषा’ का रूप ले लेती है।
- एक उपभाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ आती हैं।
- उदाहरण: बिहारी एक उपभाषा है, जिसके अंतर्गत भोजपुरी, मैथिली और मगही बोलियाँ आती हैं। इसी तरह पश्चिमी हिन्दी एक उपभाषा है, जिसमें खड़ी बोली, ब्रजभाषा, हरियाणवी आदि बोलियाँ आती हैं।
- 3. भाषा (Language):
- जब कोई उपभाषा साहित्यिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक मान्यता प्राप्त कर लेती है, उसका अपना मानक व्याकरण निश्चित हो जाता है, और उसे शिक्षा, प्रशासन एवं राजकाज में प्रयोग किया जाने लगता है, तो वह ‘भाषा’ का दर्जा प्राप्त कर लेती है।
- उदाहरण: हिन्दी एक मानक भाषा है, जिसका विकास खड़ी बोली से हुआ है। आज हिन्दी में विभिन्न उपभाषाएँ और बोलियाँ समाहित हैं।
संक्षेप में, प्रक्रिया:
बोली → उपभाषा → भाषा
हिन्दी की प्रमुख उपभाषाएँ और उनके अंतर्गत आने वाली बोलियाँ:
हिन्दी भाषा को मुख्य रूप से 5 उपभाषाओं में बांटा गया है, जिनके अंतर्गत 17-18 प्रमुख बोलियाँ आती हैं:
- पश्चिमी हिन्दी: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणवी (बाँगरू), बुंदेली, कन्नौजी।
- पूर्वी हिन्दी: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
- बिहारी हिन्दी: भोजपुरी, मगही, मैथिली।
- राजस्थानी हिन्दी: मारवाड़ी (पश्चिमी राजस्थानी), जयपुरी/ढूंढाड़ी (पूर्वी राजस्थानी), मेवाती (उत्तरी राजस्थानी), मालवी (दक्षिणी राजस्थानी)।
- पहाड़ी हिन्दी: कुमाऊँनी, गढ़वाली।
तुलनात्मक सारणी
| आधार | बोली (Dialect) | उपभाषा (Sub-language) | भाषा (Language) |
| क्षेत्र | सीमित (जिला/कस्बा) | विस्तृत (कई जिले/क्षेत्र) | अत्यंत व्यापक (पूरा राज्य/देश) |
| साहित्य | नहीं होता (केवल लोकगीत) | रचित हो सकता है | समृद्ध और मानक साहित्य होता है |
| व्याकरण | मानक नहीं होता | निश्चित हो सकता है | मानक और सर्वमान्य होता है |
| प्रयोग | केवल अनौपचारिक बोलचाल | साहित्यिक और बोलचाल | औपचारिक (शिक्षा, प्रशासन, साहित्य) |
| मान्यता | स्थानीय स्तर पर | क्षेत्रीय स्तर पर | राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर |
निष्कर्ष
बोली किसी भी जीवंत भाषा की जड़ होती है। यह भाषा को स्थानीय रंग, विविधता और नए शब्द प्रदान करके उसे समृद्ध बनाती है। हर मानक भाषा की शुरुआत एक बोली के रूप में ही होती है, जो समय के साथ विकसित होकर एक विस्तृत रूप धारण कर लेती है।
खड़ी बोली (Khari Boli)
परिभाषा:
खड़ी बोली, पश्चिमी हिन्दी उपभाषा की एक प्रमुख बोली है, जो अपने परिनिष्ठित और मानकीकृत रूप में आज की मानक हिन्दी (Standard Hindi) और मानक उर्दू का आधार है। इसका उद्भव दिल्ली-मेरठ के आसपास के क्षेत्र में हुआ और आज यह भारत की राजभाषा, संपर्क भाषा और शिक्षा-साहित्य की मुख्य भाषा बन चुकी है।
इसे ‘कौरवी’ (Kauravi) के नाम से भी जाना जाता है, यह नाम विद्वान राहुल सांकृत्यायन द्वारा दिया गया था।
“खड़ी बोली” नाम का अर्थ:
इस नामकरण के पीछे कई मत प्रचलित हैं:
- खरी या शुद्ध: कुछ विद्वानों का मानना है कि ‘खड़ी’ का अर्थ ‘खरी’ अर्थात् ‘शुद्ध’ (pure) है, जो अन्य बोलियों की तुलना में अधिक परिमार्जित थी।
- खड़ी पाई: इसके अधिकांश शब्दों के अंत में ‘आ’ की मात्रा (खड़ी पाई) का प्रयोग होता है (जैसे – आया, गया, मेरा, घोड़ा), जबकि ब्रजभाषा में ‘ओ’ की मात्रा (आयो, गयो, मेरो) का प्रयोग होता था।
- कर्कशता: ब्रजभाषा और अवधी की तुलना में इसकी ध्वनि कर्कश और खड़ी-खड़ी (erect/stark) लगती थी, इसलिए इसे ‘खड़ी बोली’ कहा गया।
भौगोलिक क्षेत्र (Geographical Area):
खड़ी बोली का मूल क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली के आसपास का इलाका है। इसके मुख्य केंद्र हैं:
- दिल्ली
- मेरठ
- गाजियाबाद
- बिजनौर
- मुजफ्फरनगर
- सहारनपुर
- शामली
- अम्बाला
खड़ी बोली का ऐतिहासिक विकास: हिन्दी का आधार बनने की यात्रा
खड़ी बोली का एक स्थानीय बोली से राष्ट्रभाषा बनने तक का सफर अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे तीन चरणों में समझा जा सकता है:
1. आदिकाल और मध्यकाल:
- अमीर खुसरो (13वीं-14वीं सदी): खुसरो पहले ऐसे कवि थे जिन्होंने ब्रजभाषा के साथ-साथ आम बोलचाल की खड़ी बोली का प्रयोग अपनी पहेलियों, मुकरियों और दोहों में खुलकर किया। उन्हें ‘हिन्दी खड़ी बोली का प्रथम कवि’ माना जाता है।
- दक्खिनी हिन्दी: मध्यकाल में जब यह बोली दक्षिण भारत में सूफियों और संतों के साथ पहुँची, तो वहाँ ‘दक्खिनी हिन्दी’ के रूप में इसका साहित्यिक विकास हुआ।
- इस दौरान ब्रजभाषा और अवधी साहित्य की मुख्य भाषाएँ बनी रहीं और खड़ी बोली मुख्य रूप से आम बोलचाल तक सीमित रही।
2. आधुनिक काल (सबसे महत्वपूर्ण चरण):
आधुनिक काल में खड़ी बोली का गद्य और पद्य दोनों में अभूतपूर्व विकास हुआ।
- फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता (1800 ई.): अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा के लिए हिन्दी गद्य को बढ़ावा दिया। लल्लू लाल जी ने ‘प्रेमसागर’ और सदल मिश्र ने ‘नासिकेतोपाख्यान’ की रचना खड़ी बोली गद्य में की। यहीं से खड़ी बोली गद्य की नींव पड़ी।
- भारतेंदु युग (1850-1900): भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने पद्य (कविता) के लिए ब्रजभाषा को ही बनाए रखा, लेकिन गद्य (नाटक, निबंध, कहानी) के लिए खड़ी बोली को अपनाया। इससे खड़ी बोली गद्य में प्रतिष्ठित हो गई।
- द्विवेदी युग (1900-1920): यह खड़ी बोली के लिए स्वर्ण युग साबित हुआ। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादन के माध्यम से खड़ी बोली को व्याकरण की दृष्टि से परिष्कृत, परिमार्जित और मानकीकृत किया।
- उन्होंने कवियों को ब्रजभाषा छोड़कर खड़ी बोली में कविता लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।
- व्याकरण, वर्तनी (spelling) और वाक्य-विन्यास को एक मानक रूप दिया।
- मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जैसे कवियों ने खड़ी बोली में ‘साकेत’ और ‘प्रियप्रवास’ जैसे महाकाव्य लिखकर यह सिद्ध कर दिया कि खड़ी बोली में भी उच्च कोटि की कविता संभव है।
3. स्वतंत्रता के बाद:
स्वतंत्रता के बाद, इसी मानकीकृत खड़ी बोली को ‘हिन्दी’ के रूप में भारत की राजभाषा का दर्जा दिया गया और आज यही शिक्षा, मीडिया, साहित्य, सिनेमा और प्रशासन की भाषा है।
खड़ी बोली की प्रमुख विशेषताएँ:
- आकारांत प्रवृत्ति: शब्दों के अंत में ‘आ’ स्वर की प्रधानता होती है। (उदा. – लड़का, खाया, अपना)।
- सरलता और स्पष्टता: यह ब्रजभाषा और अवधी की तरह मधुर और कोमल नहीं, बल्कि सीधी और स्पष्ट है।
- द्वित्व व्यंजनों का प्रयोग: ‘बेटा’ को ‘बेट्टा’, ‘गया’ को ‘गय्या’ बोलने की प्रवृत्ति ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी है।
- शब्दावली: इसकी मूल शब्दावली तद्भव शब्दों पर आधारित है, लेकिन मानक रूप में यह संस्कृत (तत्सम), अरबी-फारसी और अंग्रेजी के शब्दों को भी सहजता से अपना लेती है।
निष्कर्ष
खड़ी बोली की यात्रा एक छोटी-सी क्षेत्रीय बोली से एक विशाल राष्ट्र की राजभाषा और संपर्क भाषा बनने की अद्भुत कहानी है। आज जब हम ‘हिन्दी’ की बात करते हैं, तो व्याकरणिक और साहित्यिक दृष्टि से हमारा तात्पर्य इसी मानकीकृत खड़ी बोली से होता है।
मानक भाषा (Standard Language)
परिभाषा:
मानक भाषा, किसी भाषा के उस सर्वमान्य, शुद्ध, और परिनिष्ठित रूप को कहते हैं, जिसे उस भाषा के सभी शिक्षित व्यक्ति अपने औपचारिक लेखन, पठन-पाठन, सरकारी कामकाज और सामाजिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान में प्रयोग करते हैं।
यह भाषा का वह रूप है जो व्याकरण के नियमों से नियंत्रित होता है और जिसे क्षेत्रीय प्रभावों से मुक्त माना जाता है ताकि उसे पूरे भाषा-क्षेत्र में एक समान रूप से समझा और प्रयोग किया जा सके।
सरल शब्दों में, जैसे व्यापार के लिए एक मानक बाट (किलोग्राम) या दूरी के लिए एक मानक इकाई (मीटर) होती है, वैसे ही भाषा के शुद्ध और सर्वमान्य रूप को मानक भाषा कहते हैं।
मानक भाषा की आवश्यकता क्यों है? (Purpose of Standard Language)
किसी भी भाषा में एक मानक रूप की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है:
- भाषा में एकरूपता लाना: एक ही भाषा की कई बोलियाँ और उपभाषाएँ होती हैं। मानक रूप इन सभी में एकरूपता लाता है, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
- व्यापक स्तर पर संचार: मानक भाषा के माध्यम से अलग-अलग बोली बोलने वाले लोग भी आपस में आसानी से विचार-विमर्श कर सकते हैं।
- शिक्षा का माध्यम: स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम मानक भाषा ही होती है। पाठ्यपुस्तकें इसी भाषा में लिखी जाती हैं।
- सरकारी कामकाज: देश का प्रशासनिक कार्य, कानून और न्याय-व्यवस्था एक ही भाषा में होनी चाहिए, और वह मानक भाषा होती है।
- साहित्य और ज्ञान का संरक्षण: उच्च कोटि का साहित्य, विज्ञान और तकनीकी ज्ञान मानक भाषा में ही लिखा जाता है ताकि वह सभी के लिए सुलभ हो सके।
मानक भाषा बनती कैसे है? (Process of Standardization)
कोई भी मानक भाषा हमेशा से मानक नहीं होती। यह एक लंबी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया से गुजरकर यह दर्जा प्राप्त करती है। इसके चरण इस प्रकार हैं:
- बोली से शुरुआत: सबसे पहले वह भाषा एक सीमित क्षेत्र की बोली (dialect) होती है।
- साहित्यिक प्रयोग: जब उस बोली में कोई प्रतिभाशाली साहित्यकार उच्च कोटि की रचनाएँ करने लगता है, तो उसका महत्व बढ़ जाता है।
- विस्तार और स्वीकृति: धीरे-धीरे वह बोली अपने क्षेत्र से बाहर निकलकर अन्य क्षेत्रों में भी लोकप्रिय होने लगती है और शिक्षित वर्ग उसे अपना लेता है।
- व्याकरण का निर्धारण: भाषाविद और विद्वान उस बोली का विश्लेषण करके उसके व्याकरण के नियम निश्चित करते हैं और उसकी वर्तनी (spelling) और शब्दकोश को मानकीकृत करते हैं।
- राज्याश्रय या सामाजिक प्रतिष्ठा: जब उसे सरकार द्वारा राजकाज की भाषा का दर्जा मिल जाता है या वह समाज में प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाती है, तब वह पूरी तरह मानक भाषा के रूप में स्थापित हो जाती है।
उदाहरण: हिन्दी भाषा
हिन्दी भाषा का मानक रूप खड़ी बोली पर आधारित है। खड़ी बोली पहले दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की एक स्थानीय बोली थी। भारतेंदु युग में यह गद्य की भाषा बनी, द्विवेदी युग में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसे व्याकरण की दृष्टि से परिमार्जित और मानकीकृत किया, और स्वतंत्रता के बाद यह भारत की राजभाषा बनी।
मानक भाषा की विशेषताएँ (Characteristics of Standard Language)
- यह व्याकरण सम्मत होती है।
- इसकी लिपि और वर्तनी निश्चित होती है।
- यह क्षेत्रीय प्रयोगों और स्थानीय मुहावरों से बचती है।
- इसका प्रयोग औपचारिक (formal) परिस्थितियों में होता है।
- इसे सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक मान्यता प्राप्त होती है।
बोली और मानक भाषा में अंतर
| आधार | बोली (Dialect) | मानक भाषा (Standard Language) |
| क्षेत्र | सीमित एवं स्थानीय | विस्तृत एवं व्यापक |
| व्याकरण | निश्चित व्याकरण नहीं होता | सुनिर्धारित और मानक व्याकरण होता है |
| प्रयोग | अनौपचारिक बोलचाल और घरेलू बातचीत | औपचारिक (शिक्षा, प्रशासन, साहित्य) |
| मान्यता | स्थानीय स्तर पर | राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर |
| लिपि/साहित्य | प्रायः लिपिबद्ध नहीं, साहित्य कम | निश्चित लिपि, समृद्ध साहित्य |
निष्कर्ष
मानक भाषा किसी बोली को समाप्त नहीं करती, बल्कि वह सभी बोलियों के ऊपर एक सेतु (bridge) का काम करती है, जो अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को एक साझा मंच पर लाकर जोड़ती है। बोलियाँ जहाँ भाषा में स्थानीय रंग और विविधता भरती हैं, वहीं मानक भाषा उसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और गौरव प्रदान करती है।
मानकीकरण (Standardization)
परिभाषा:
मानकीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा भाषा के किसी एक रूप या बोली को सचेत रूप से चुनकर उसे व्याकरण, वर्तनी (spelling), उच्चारण और शब्दावली की दृष्टि से सुव्यवस्थित और सर्वमान्य बनाया जाता है, ताकि वह भाषा के पूरे क्षेत्र में संचार, शिक्षा और प्रशासन के लिए एक मानक (standard) के रूप में काम कर सके।
यह प्रक्रिया भाषा की स्वाभाविक विविधता में से एकरूपता स्थापित करती है ताकि संवाद में अस्पष्टता और भ्रम को दूर किया जा सके।
सरल शब्दों में, मानकीकरण का अर्थ है भाषा के लिए “नियम तय करना”।
मानकीकरण की आवश्यकता क्यों?
किसी भी विकसित भाषा के लिए मानकीकरण आवश्यक है क्योंकि:
- एकरूपता और स्पष्टता: यह सुनिश्चित करता है कि पूरे भाषा-क्षेत्र में शब्दों को एक ही तरह से लिखा और समझा जाए।
- व्यापक संचार: यह अलग-अलग बोली बोलने वाले लोगों के बीच एक पुल का काम करता है, जिससे वे एक-दूसरे से प्रभावी ढंग से संवाद कर सकें।
- शिक्षा और प्रशासन: पाठ्यपुस्तकों, सरकारी दस्तावेजों और कानूनों के लिए एक निश्चित और सर्वमान्य भाषा की आवश्यकता होती है।
- ज्ञान का प्रसार: वैज्ञानिक, तकनीकी और साहित्यिक ज्ञान को एक मानक भाषा में ही प्रभावी ढंग से संचित और प्रसारित किया जा सकता है।
- भाषा को प्रतिष्ठा: मानकीकरण भाषा को एक गौरवपूर्ण और प्रतिष्ठित दर्जा दिलाता है।
भाषा के मानकीकरण की प्रक्रिया (Process of Standardization)
मानकीकरण एक स्वाभाविक और सचेत, दोनों तरह की प्रक्रिया है। इसके मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:
- चयन (Selection):
सबसे पहले, किसी भाषा की विभिन्न बोलियों में से किसी एक बोली का चयन किया जाता है। यह चयन अक्सर उस बोली का होता है जो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक रूप से अधिक प्रभावशाली होती है।- उदाहरण: हिन्दी के लिए खड़ी बोली का चयन हुआ, क्योंकि यह दिल्ली के आसपास के राजनीतिक और व्यापारिक केंद्र की बोली थी।
- संहिताकरण / कोडिफिकेशन (Codification):
यह मानकीकरण का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इसमें चुनी हुई बोली को नियमबद्ध किया जाता है।- व्याकरण लिखना: उस भाषा के नियमों को स्पष्ट करने के लिए एक मानक व्याकरण तैयार किया जाता है।
- शब्दकोश बनाना: भाषा के शब्दों और उनके अर्थों को संकलित करके एक मानक शब्दकोश (dictionary) बनाया जाता है।
- वर्तनी निश्चित करना: शब्दों को लिखने का एक निश्चित और सर्वमान्य तरीका (standard spelling) तय किया जाता है।
- विस्तारीकरण / प्रकार्यात्मक विकास (Elaboration/Functional Development):
इस चरण में, मानकीकृत भाषा को जीवन के नए क्षेत्रों (जैसे विज्ञान, कानून, प्रौद्योगिकी, मीडिया) में प्रयोग करने के लायक बनाया जाता है। इसके लिए नई शब्दावली गढ़ी जाती है या अन्य भाषाओं से शब्द उधार लिए जाते हैं।- उदाहरण: विधि, विज्ञान और तकनीक के लिए पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण।
- स्वीकृति (Acceptance):
अंतिम चरण में, समाज उस मानकीकृत रूप को स्वीकार कर लेता है। जब शिक्षित वर्ग, लेखक, सरकार और मीडिया उसे अपना लेते हैं, तो यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है।
हिन्दी भाषा के मानकीकरण का उदाहरण
हिन्दी का मानकीकरण इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है:
- चयन: आधार के रूप में खड़ी बोली को चुना गया।
- संहिताकरण:
- भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसे गद्य की भाषा बनाया।
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली के व्याकरण, वाक्य-विन्यास और वर्तनी को परिष्कृत और स्थिर करने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने भाषा में एकरूपता लाने पर जोर दिया।
- स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने देवनागरी लिपि और हिन्दी वर्तनी के मानकीकरण के लिए महत्वपूर्ण नियम बनाए।
वर्तनी के मानकीकरण के कुछ उदाहरण:
| पुराना/अमानक रूप | नया/मानक रूप | मानकीकरण का कारण |
| गयी, आयी, हुयी | गई, आई, हुई | क्रियापदों में अंत में ‘ई’ स्वर का प्रयोग |
| नयी, स्थायी | नई, स्थाई | ‘य’ की जगह स्वर का प्रयोग (कुछ विद्वान अभी भी ‘स्थायी’ को सही मानते हैं) |
| अन्तर्لمانيا | अन्तर्राष्ट्रीय | ‘र’ के पंचमाक्षर और अनुस्वार संबंधी नियम |
| खायेगा | खाएगा | क्रिया के रूपों में एकरूपता |
| चाहिये | चाहिए | एकरूपता लाने के लिए |
निष्कर्ष
मानकीकरण एक सतत और गतिशील प्रक्रिया है। यह किसी भाषा को जड़ नहीं बनाता, बल्कि उसे समय की जरूरतों के अनुसार विकसित होने में मदद करता है। यह भाषा के स्थानीय रूपों (बोलियों) को समाप्त नहीं करता, बल्कि उनके ऊपर एक ऐसी सर्वमान्य परत बनाता है जो व्यापक संचार और राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है।
भाषा के मानकीकरण के सोपान (Stages of Standardization)
सोपान 1: चयन (Selection)
यह मानकीकरण की प्रक्रिया का पहला और सबसे आधारभूत चरण है। इसमें किसी भाषा-समुदाय में प्रचलित विभिन्न बोलियों या उपभाषाओं में से किसी एक को मानक भाषा के आधार के रूप में चुना जाता है।
- चयन का आधार: यह चयन मनमाना नहीं होता। अक्सर उसी बोली को चुना जाता है जो:
- राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र की बोली हो (जैसे, दिल्ली की खड़ी बोली)।
- आर्थिक और व्यापारिक केंद्र में बोली जाती हो।
- सांस्कृतिक और साहित्यिक दृष्टि से अधिक प्रतिष्ठित हो।
- समाज के शिक्षित और प्रभावशाली वर्ग द्वारा प्रयोग की जाती हो।
- उदाहरण: हिन्दी के मानकीकरण के लिए अनेक बोलियाँ (जैसे- ब्रजभाषा, अवधी) होने के बावजूद खड़ी बोली का चयन किया गया क्योंकि यह दिल्ली और उसके आस-पास के सत्ता और व्यापार के केंद्र की बोली थी।
सोपान 2: संहिताकरण / कूटबद्धन (Codification)
एक बार बोली का चयन हो जाने के बाद, उसे नियमबद्ध और व्यवस्थित करने का कार्य किया जाता है। यही संहिताकरण है। इसका उद्देश्य भाषा की संरचना को निश्चित और स्थिर करना है ताकि उसमें एकरूपता आ सके।
- इस सोपान के अंतर्गत प्रमुख कार्य:
- मानक व्याकरण का निर्माण: भाषा के ध्वनियों, शब्दों और वाक्यों की संरचना को लेकर नियम बनाए जाते हैं और उन्हें व्याकरण की पुस्तकों में संकलित किया जाता है।
- मानक शब्दकोश का निर्माण: भाषा के शब्दों, उनके अर्थों और प्रयोगों को एकत्र करके एक आधिकारिक शब्दकोश (dictionary) तैयार किया जाता है।
- वर्तनी का मानकीकरण (Standardization of Spelling): शब्दों को लिखने का एक एकसमान और सर्वमान्य तरीका निर्धारित किया जाता है ताकि लेखन में होने वाली भिन्नता समाप्त हो सके।
- उदाहरण: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली की वर्तनी और व्याकरण को अनुशासित और परिष्कृत किया, जो संहिताकरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
सोपान 3: प्रकार्यात्मक संवर्धन / विस्तार (Elaboration of Function)
इस चरण में, मानकीकृत भाषा की क्षमता का विकास और विस्तार किया जाता है ताकि वह जीवन के सभी उच्च-स्तरीय क्षेत्रों में सफलतापूर्वक प्रयोग की जा सके। इसे केवल बोलचाल और सामान्य साहित्य तक सीमित न रखकर और अधिक जटिल कार्यों के योग्य बनाया जाता है।
- प्रमुख कार्य:
- शब्दावली का विकास (Lexical Expansion): विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कानून, चिकित्सा, प्रशासन जैसे विषयों के लिए नई पारिभाषिक शब्दावली (technical terminology) का निर्माण किया जाता है। यह शब्द निर्माण या अन्य भाषाओं से शब्द उधार लेकर किया जा सकता है।
- नई लेखन शैलियों का विकास: भाषा को विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियों, जैसे- कानूनी भाषा, वैज्ञानिक रिपोर्ट, अकादमिक लेखन, और मीडिया लेखन, के योग्य बनाया जाता है।
- उदाहरण: स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने विज्ञान और तकनीक के विषयों में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर तकनीकी शब्दावली का निर्माण किया।
सोपान 4: स्वीकृति (Acceptance)
यह मानकीकरण का अंतिम सोपान है, जहाँ भाषा-समुदाय द्वारा उस मानकीकृत रूप को स्वीकार कर लिया जाता है और उसे प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। यह स्वीकृति ही किसी भाषा को वास्तविक रूप में ‘मानक’ बनाती है।
- स्वीकृति के विभिन्न स्तर:
- सामाजिक स्वीकृति: समाज उसे “शुद्ध,” “सही,” और “प्रतिष्ठित” भाषा के रूप में स्वीकार करता है।
- सरकारी/संस्थागत स्वीकृति: सरकार उसे राजभाषा या आधिकारिक भाषा का दर्जा देती है। शिक्षा संस्थान उसे शिक्षा का माध्यम बनाते हैं।
- व्यावहारिक स्वीकृति: लेखक, पत्रकार और शिक्षित वर्ग उसे अपने लेखन और औपचारिक संवाद में व्यापक रूप से प्रयोग करने लगते हैं।
- उदाहरण: आज की मानकीकृत हिन्दी (खड़ी बोली) को पूरे हिन्दी भाषी समाज में शिक्षा, साहित्य और संचार की भाषा के रूप में स्वीकृति प्राप्त है।
निष्कर्ष
यह चारों सोपान मिलकर एक बोली को एक पूर्ण विकसित मानक भाषा में बदल देते हैं। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें समय के साथ संशोधन और विकास की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।
अमानक भाषा (Non-Standard Language)
परिभाषा:
अमानक भाषा, किसी भाषा के उस रूप को कहते हैं जो व्याकरण के स्थापित नियमों का पालन नहीं करता और जिसे शिक्षित समाज द्वारा औपचारिक लेखन, भाषण या सार्वजनिक संचार में स्वीकार नहीं किया जाता है।
यह भाषा का वह स्वरूप है जो क्षेत्रीयता, अशिक्षा, बोलचाल की सहजता या व्यक्तिगत आदतों के प्रभाव में मानक भाषा के नियमों से भटक जाता है। इसे अक्सर ‘अशुद्ध’ या ‘अपरिमार्जित’ भाषा भी माना जाता है, हालांकि भाषावैज्ञानिक दृष्टि से यह केवल भाषा का एक ‘भिन्न रूप’ होता है।
सरल शब्दों में, मानक भाषा यदि भाषा का ‘संविधान’ है, तो अमानक भाषा उन बोलचाल के रूपों की तरह है जो उस संविधान के नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं करते।
अमानक भाषा की विशेषताएँ:
- व्याकरण के नियमों की अवहेलना: इसमें लिंग, वचन, कारक, क्रिया और वाक्य-विन्यास संबंधी अशुद्धियाँ पाई जाती हैं।
- क्षेत्रीय प्रभाव (Dialectal Influence): अमानक भाषा पर स्थानीय बोलियों का गहरा प्रभाव होता है। लोग अक्सर अपनी बोली के शब्दों, लहजे और वाक्य-रचना को मानक भाषा में मिला देते हैं।
- अनौपचारिक प्रयोग: इसका प्रयोग मुख्य रूप से अनौपचारिक बातचीत, घरेलू संवाद और मित्रों के बीच होता है।
- लिखित रूप में भिन्नता: अमानक भाषा को जब लिखा जाता है, तो उसकी वर्तनी (spelling) में अक्सर एकरूपता नहीं होती।
- सामाजिक अस्वीकृति: इसे शिक्षा, प्रशासन, मीडिया और औपचारिक लेखन जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों में प्रयोग के लिए अनुपयुक्त समझा जाता है।
अमानक भाषा के कुछ उदाहरण (हिन्दी के संदर्भ में):
यहाँ मानक भाषा और उसकी तुलना में अमानक भाषा के कुछ उदाहरण दिए गए हैं, जो आमतौर पर सुनने और देखने को मिलते हैं:
| श्रेणी | मानक भाषा (Standard Language) | अमानक भाषा (Non-Standard Language) | अमानकता का कारण |
| सर्वनाम संबंधी | मुझे जाना है। | मेरे को जाना है। / अपुन को जाना है। | सर्वनाम का गलत प्रयोग |
| क्रिया संबंधी | आप बैठिए। | आप बैठो। | आदरसूचक क्रिया का गलत प्रयोग |
| लिंग संबंधी | मेरी कलम खो गई। | मेरा कलम खो गया। | ‘कलम’ (स्त्रीलिंग) के साथ पुल्लिंग क्रिया का प्रयोग |
| वचन संबंधी | उसका प्राण निकल गया। | उसके प्राण निकल गए। | ‘प्राण’ (नित्य बहुवचन) के साथ एकवचन क्रिया |
| वाक्य-विन्यास | वह लगभग बीस वर्ष का है। | वह बीस वर्ष का लगभग है। | शब्द क्रम की अशुद्धि |
| वर्तनी (Spelling) | कृपया, आशीर्वाद, उज्ज्वल | किरपा, आश्रीवाद, उज्वल | गलत वर्तनी का प्रयोग |
| शब्द प्रयोग | पिताजी आए हैं। | बाप आया है। | असभ्य/अशिष्ट शब्द का प्रयोग |
| क्षेत्रीय प्रभाव | मैं घर जा रहा हूँ। | हम घर जा रहे हैं। (भोजपुरी प्रभाव में ‘मैं’ के लिए भी ‘हम’) | बोली का प्रभाव |
| अंग्रेजी का प्रभाव | कृपया सहयोग करें। | प्लीज़ को-ऑपरेट करें। (Hinglish) | दूसरी भाषा का अनुचित मिश्रण |
क्या अमानक भाषा हमेशा “गलत” होती है?
- व्याकरणिक दृष्टि से: हाँ, औपचारिक और मानक संदर्भों में अमानक भाषा को अशुद्ध या गलत माना जाता है। शुद्ध लेखन और भाषण के लिए मानक भाषा का ही प्रयोग किया जाना चाहिए।
- भाषावैज्ञानिक दृष्टि से: नहीं। भाषावैज्ञानिक अमानक भाषा को ‘गलत’ नहीं, बल्कि भाषा का एक ‘स्वाभाविक और जीवंत रूप’ मानते हैं। वे इसका अध्ययन यह समझने के लिए करते हैं कि समाज के विभिन्न वर्गों में भाषा का प्रयोग कैसे होता है और भाषा में परिवर्तन कैसे आते हैं। बोलचाल में सरलता और सहजता के कारण ऐसे रूप विकसित हो जाते हैं।
निष्कर्ष
मानक भाषा जहाँ भाषा को एकरूपता, स्थिरता और व्यापकता प्रदान करती है, वहीं अमानक भाषा उसकी अनौपचारिक, क्षेत्रीय और जीवंत विविधता को दर्शाती है। एक शिक्षित और कुशल भाषा प्रयोगकर्ता को यह पता होता है कि किस परिस्थिति में मानक भाषा का प्रयोग करना है और कहाँ अनौपचारिक या क्षेत्रीय रूपों का प्रयोग किया जा सकता है। शिक्षा और औपचारिक संचार के लिए हमेशा मानक भाषा का ही प्रयोग श्रेयस्कर होता है।
राष्ट्रभाषा (National Language)
परिभाषा:
राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है जो किसी भी राष्ट्र (देश) की एकता, अखंडता और पहचान का प्रतीक होती है तथा जिसे उस राष्ट्र के अधिकांश निवासी बोलते और समझते हैं। यह केवल एक प्रशासनिक भाषा न होकर, पूरे राष्ट्र के जन-जीवन, संस्कृति, साहित्य और सामाजिक व्यवहार में रची-बसी होती है।
यह वह भाषा है जिसके साथ देश के लोगों का एक भावनात्मक जुड़ाव होता है और जो देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को अभिव्यक्त करती है।
सरल शब्दों में, राष्ट्रभाषा किसी भी देश की “आत्मा की भाषा” होती है, जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है।
राष्ट्रभाषा की विशेषताएँ:
एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसमें कुछ विशेष गुण होने चाहिए:
- बहुसंख्यक लोगों की भाषा: इसे देश की अधिकांश जनसंख्या द्वारा बोला और समझा जाना चाहिए।
- व्यापक भौगोलिक प्रसार: यह केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित न होकर, देश के अधिकतर भागों में संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग की जाती हो।
- समृद्ध साहित्य: उसका साहित्य गौरवशाली और समृद्ध हो, जिसमें देश की संस्कृति और इतिहास की झलक हो।
- सरल और सुबोध व्याकरण: उसकी संरचना और व्याकरण सरल हो ताकि अन्य भाषा-भाषी लोग भी उसे आसानी से सीख सकें।
- राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक: वह भाषा देश के स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक आंदोलनों और राष्ट्रीय गौरव से जुड़ी रही हो।
- अपनी लिपि: उसकी अपनी एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित लिपि होनी चाहिए।
भारत की राष्ट्रभाषा: एक संवैधानिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण
भारत के संदर्भ में ‘राष्ट्रभाषा’ का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है।
संवैधानिक स्थिति:
- कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं: यह जानना सबसे महत्वपूर्ण है कि भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को “राष्ट्रभाषा” का दर्जा नहीं दिया गया है। संविधान में “राजभाषा” का प्रावधान है, “राष्ट्रभाषा” का नहीं।
- राजभाषा हिन्दी: संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार, देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को संघ (केंद्र सरकार) की राजभाषा (Official Language) घोषित किया गया है, न कि राष्ट्रभाषा। राजभाषा का अर्थ होता है – सरकारी कामकाज की भाषा।
- सह-राजभाषा अंग्रेजी: हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी सह-राजभाषा के रूप में जारी रखने का प्रावधान किया गया।
- अनुसूचित भाषाएँ: संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 प्रमुख भाषाओं (जैसे – बंगाली, तमिल, मराठी, पंजाबी आदि) को सूचीबद्ध किया गया है। ये सभी भारत की सम्मानित भाषाएँ हैं और इनका भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है।
व्यावहारिक स्थिति (De facto National Language):
संवैधानिक रूप से कोई राष्ट्रभाषा न होने के बावजूद, व्यावहारिक रूप से हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा के सभी गुणों को पूरा करती है और इसे अघोषित राष्ट्रभाषा के रूप में देखा जाता है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:
- सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा: 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 44% लोग हिन्दी को अपनी मातृभाषा के रूप में बोलते हैं और एक बड़ी जनसंख्या इसे दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में समझती और बोलती है। यह भारत में किसी भी अन्य भाषा से कहीं अधिक है।
- संपर्क भाषा (Lingua Franca): हिन्दी भारत की सबसे बड़ी संपर्क भाषा है। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत, पश्चिम भारत और यहाँ तक कि दक्षिण और पूर्वोत्तर के शहरी क्षेत्रों में भी, अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग आपस में संवाद करने के लिए हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं।
- ऐतिहासिक भूमिका: हिन्दी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पूरे देश को एक साथ लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल जैसे कई अहिंदी भाषी नेताओं ने भी राष्ट्र की एकता के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का समर्थन किया था।
- सांस्कृतिक प्रसार: बॉलीवुड सिनेमा, संगीत और टेलीविजन कार्यक्रमों ने हिन्दी को देश के कोने-कोने तक, यहाँ तक कि दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के राज्यों तक भी पहुँचा दिया है, जिससे इसकी स्वीकार्यता और समझ बढ़ी है।
राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर
| आधार | राष्ट्रभाषा (National Language) | राजभाषा (Official Language) |
| परिभाषा | राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव की भाषा, जिसे अधिकांश लोग समझते हैं। | सरकारी कामकाज, प्रशासन और संसद में प्रयोग होने वाली भाषा। |
| संवैधानिक स्थिति | भारत में संवैधानिक रूप से कोई नहीं। | हिन्दी (संघ की), और राज्यों की अपनी-अपनी राजभाषाएँ। |
| स्वरूप | स्वाभाविक, भावनात्मक, जन-केंद्रित। | प्रशासनिक, कानूनी, नियम-आधारित। |
| संबंध | इसका संबंध देश की जनता और संस्कृति से है। | इसका संबंध केवल सरकारी तंत्र से है। |
| अनिवार्यता | इसे सीखना या बोलना अनिवार्य नहीं। | सरकारी कर्मचारियों के लिए इसे जानना आवश्यक हो सकता है। |
निष्कर्ष
अतः, संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि संवैधानिक तौर पर भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से हिन्दी ही राष्ट्रभाषा की भूमिका निभा रही है। यह भारत की सांस्कृतिक और भाषाई एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है और देश के अधिकांश लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ती है।
राजभाषा (Official Language)
परिभाषा:
राजभाषा का शाब्दिक अर्थ है – “राज-काज की भाषा” अर्थात् वह भाषा जिसका प्रयोग किसी देश या राज्य के सरकारी कार्यालयों, प्रशासन, संसद, विधानमंडल तथा न्यायिक कार्यवाहियों के लिए किया जाता है।
यह वह भाषा है जिसे कोई देश अपने संवैधानिक प्रावधानों के तहत सरकारी कामकाज को पूरा करने के लिए आधिकारिक (Official) रूप से अपनाता है। इसका संबंध पूरी तरह से प्रशासनिक और कानूनी तंत्र से होता है।
भारत में राजभाषा: संवैधानिक प्रावधान
भारत एक बहुभाषी देश है। इसलिए, संविधान निर्माताओं ने भाषा के मुद्दे पर बहुत सोच-समझकर प्रावधान बनाए। भारतीय संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के संबंध में विस्तृत व्यवस्था की गई है।
1. संघ की राजभाषा (Official Language of the Union)
- अनुच्छेद 343(1): इस अनुच्छेद के अनुसार, देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को संघ (केंद्र सरकार) की राजभाषा घोषित किया गया है। अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप (1, 2, 3…) होगा।
- अनुच्छेद 343(2): संविधान लागू होने के 15 वर्षों की अवधि (अर्थात् 1965 तक) के लिए सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने का प्रावधान किया गया, क्योंकि तत्काल हिन्दी को पूरे देश में लागू करना संभव नहीं था।
- राजभाषा अधिनियम, 1963: 1965 में अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त न हो जाए, इस आशंका को (विशेषकर अहिंदी भाषी राज्यों में) देखते हुए संसद ने यह अधिनियम पारित किया। इसके तहत यह व्यवस्था की गई कि हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी का प्रयोग भी सरकारी कामकाज में अनिश्चित काल तक जारी रहेगा। इसलिए, आज भारत संघ की दो राजभाषाएँ हैं – हिन्दी और सह-राजभाषा अंग्रेजी।
2. राज्यों की राजभाषा (Official Languages of the States)
- अनुच्छेद 345: यह अनुच्छेद राज्यों को यह स्वतंत्रता देता है कि वे अपने राज्य के विधानमंडल द्वारा उस राज्य में बोली जाने वाली एक या एक से अधिक भाषाओं को या हिन्दी को अपने सरकारी कामकाज के लिए राजभाषा के रूप में चुन सकते हैं।
- उदाहरण: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश की राजभाषा हिन्दी है; पंजाब की पंजाबी है; महाराष्ट्र की मराठी है; पश्चिम बंगाल की बंगाली है; और तमिलनाडु की तमिल है। कुछ राज्यों में एक से अधिक राजभाषाएँ भी हैं।
3. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की भाषा
- अनुच्छेद 348: इसके अनुसार, जब तक संसद कानून द्वारा कोई और व्यवस्था न करे, तब तक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) और सभी उच्च न्यायालयों (High Courts) की कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी होगी।
- संसद और राज्य विधानमंडलों में प्रस्तुत किए जाने वाले विधेयक, अधिनियम, अध्यादेश और नियमों का आधिकारिक पाठ भी अंग्रेजी में होगा।
4. हिन्दी भाषा के विकास के लिए निर्देश
- अनुच्छेद 351: यह अनुच्छेद केंद्र सरकार को यह कर्तव्य सौंपता है कि वह हिन्दी भाषा के प्रसार और विकास के लिए कार्य करे ताकि यह भारत की मिली-जुली संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।
राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर
यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि राजभाषा और राष्ट्रभाषा एक नहीं हैं।
| आधार | राजभाषा (Official Language) | राष्ट्रभाषा (National Language) |
| परिभाषा | सरकारी कामकाज, प्रशासन और संसद में प्रयोग होने वाली भाषा। | राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव की भाषा, जिसे अधिकांश लोग समझते हैं। |
| संवैधानिक स्थिति | हिन्दी संघ की राजभाषा है, और राज्यों की अपनी-अपनी राजभाषाएँ हैं। | भारत में संवैधानिक रूप से कोई नहीं। |
| स्वरूप | प्रशासनिक, कानूनी, औपचारिक। | स्वाभाविक, भावनात्मक, जन-केंद्रित। |
| संबंध | इसका संबंध केवल सरकारी तंत्र से है। | इसका संबंध देश की जनता और संस्कृति से है। |
| क्षेत्र | इसका प्रयोग क्षेत्र सीमित और औपचारिक होता है (केवल कार्यालयों, संसद में)। | इसका प्रयोग व्यापक और अनौपचारिक होता है (पूरे देश में संपर्क भाषा के रूप में)। |
राजभाषा हिन्दी की वर्तमान स्थिति
- आज हिन्दी भारत सरकार के कार्यालयों में एक प्रमुख राजभाषा के रूप में स्थापित है।
- राजभाषा विभाग (गृह मंत्रालय) हिन्दी के प्रचार-प्रसार और सरकारी कामकाज में इसके प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए काम करता है।
- सरकारी कार्यालयों के लिए हिन्दी का प्रयोग अनिवार्य करने हेतु नियम बनाए गए हैं और ‘क’, ‘ख’ और ‘ग’ क्षेत्रों में राज्यों को विभाजित कर पत्राचार के लिए हिन्दी के प्रयोग का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
निष्कर्ष
राजभाषा एक संवैधानिक और प्रशासनिक शब्द है, जिसका सीधा संबंध सरकारी कामकाज से है। भारत के संदर्भ में, हिन्दी संघ की राजभाषा और अंग्रेजी सह-राजभाषा है, जबकि राज्यों को अपनी राजभाषा चुनने की स्वतंत्रता है। यह राष्ट्रभाषा की भावनात्मक और सांस्कृतिक अवधारणा से पूरी तरह भिन्न है।
राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर (Difference between National Language and Official Language)
किसी भी देश के संदर्भ में राष्ट्रभाषा और राजभाषा दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं, जिनके अर्थ, स्वरूप और कार्यक्षेत्र में महत्वपूर्ण अंतर होता है। भारत के संदर्भ में यह अंतर और भी स्पष्ट हो जाता है।
परिभाषा के आधार पर अंतर
- राष्ट्रभाषा (National Language): राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है जो किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक, सामाजिक और भावनात्मक एकता का प्रतीक होती है। यह पूरे राष्ट्र में अधिकांश लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है तथा जन-जीवन से गहराई से जुड़ी होती है। इसका संबंध देश की पहचान और आत्मा से होता है।
- यह मुख्यतः “जनता की भाषा” है।
- राजभाषा (Official Language): राजभाषा वह भाषा होती है जिसे किसी देश के संविधान द्वारा सरकारी कामकाज, प्रशासन, संसद और न्यायपालिका के कार्यों के लिए आधिकारिक रूप से स्वीकृत किया जाता है। इसका संबंध सीधे तौर पर “राज-काज” या शासन-तंत्र से होता है।
- यह मुख्यतः “सरकार की भाषा” है।
स्वरूप और प्रकृति के आधार पर अंतर
- राष्ट्रभाषा:
- स्वरूप: स्वाभाविक, भावनात्मक और अनौपचारिक।
- विकास: इसका विकास समाज में स्वतः और स्वाभाविक रूप से होता है। इसे सरकार द्वारा थोपा नहीं जाता।
- संबंध: इसका सीधा संबंध देश की संस्कृति, इतिहास, साहित्य और लोगों की भावनाओं से होता है।
- राजभाषा:
- स्वरूप: औपचारिक, प्रशासनिक, कानूनी और नियमबद्ध।
- विकास: इसे संवैधानिक प्रावधानों के तहत सचेत रूप से अपनाया और लागू किया जाता है।
- संबंध: इसका सीधा संबंध सरकारी नीतियों, कानूनों, कार्यालयों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से होता है।
कार्यक्षेत्र के आधार पर अंतर
- राष्ट्रभाषा:
- क्षेत्र: इसका कार्यक्षेत्र अत्यंत व्यापक और अनौपचारिक होता है। यह पूरे देश में संपर्क भाषा (Lingua Franca) के रूप में कार्य करती है, जिससे अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग संवाद करते हैं।
- राजभाषा:
- क्षेत्र: इसका कार्यक्षेत्र सीमित और औपचारिक होता है। यह केवल सरकारी कार्यालयों, संसद, विधानमंडलों और न्यायालयों तक ही सीमित रहती है।
भारत के संदर्भ में अंतर
यह अंतर भारत के संदर्भ में सबसे अधिक प्रासंगिक है:
- राष्ट्रभाषा:
- संवैधानिक स्थिति: भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है।
- व्यावहारिक स्थिति: हिन्दी व्यावहारिक रूप से भारत की राष्ट्रभाषा की भूमिका निभाती है क्योंकि यह सर्वाधिक बोली जाने वाली संपर्क भाषा है और देश की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
- राजभाषा:
- संवैधानिक स्थिति: हिन्दी (अनुच्छेद 343 के तहत) संघ की राजभाषा है और अंग्रेजी सह-राजभाषा है।
- व्यावहारिक स्थिति: केंद्र सरकार के कामकाज में हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों का प्रयोग होता है। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों की अपनी-अपनी अलग राजभाषाएँ हैं (जैसे – महाराष्ट्र की मराठी, पंजाब की पंजाबी)।
तुलनात्मक सारणी: राष्ट्रभाषा बनाम राजभाषा
| आधार | राष्ट्रभाषा (National Language) | राजभाषा (Official Language) |
| अर्थ | राष्ट्र की पहचान और भावनात्मक एकता की भाषा। | सरकारी कामकाज और प्रशासन की भाषा। |
| प्रकृति | स्वाभाविक, भावनात्मक, सांस्कृतिक। | औपचारिक, प्रशासनिक, कानूनी। |
| चयन | जनता द्वारा स्वतः स्वीकृत। | संविधान द्वारा निर्धारित। |
| कार्यक्षेत्र | व्यापक (पूरा देश, जन-जीवन, संपर्क भाषा)। | सीमित (सरकारी कार्यालय, संसद)। |
| संबंध | देश की जनता और संस्कृति से। | देश के शासन-तंत्र से। |
| भारत में संवैधानिक स्थिति | किसी भाषा को दर्जा नहीं। | हिन्दी (संघ की) और राज्यों की अपनी भाषाएँ। |
| उदाहरण (भारत में) | हिन्दी (व्यावहारिक रूप से)। | हिन्दी, अंग्रेजी और अन्य 22 अनुसूचित भाषाएँ (राज्यों में)। |
निष्कर्ष
संक्षेप में, राष्ट्रभाषा का आधार भावनात्मक और सांस्कृतिक होता है, जबकि राजभाषा का आधार संवैधानिक और प्रशासनिक होता है। भारत में हिन्दी भले ही संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा न हो, पर व्यावहारिक रूप से वह इस पद पर आसीन है, जबकि राजभाषा का पद उसे कानूनी तौर पर प्राप्त है।
विभाषा / उपभाषा (Sub-language / Dialect Cluster)
परिभाषा:
विभाषा या उपभाषा, भाषा के विकास क्रम में बोली (Dialect) से उन्नत और मानक भाषा (Standard Language) से निम्न स्तर की भाषाई इकाई है।
जब कोई बोली भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक या साहित्यिक कारणों से अपने सीमित क्षेत्र से बाहर निकलकर एक विस्तृत भू-भाग में प्रचलित हो जाती है, उसमें साहित्य-रचना होने लगती है, और उसका अपना व्याकरणिक ढाँचा भी निश्चित होने लगता है, तो वह बोली न रहकर विभाषा या उपभाषा का दर्जा प्राप्त कर लेती है।
सरल शब्दों में, विभाषा ऐसी ‘विकसित बोली’ होती है, जो अभी पूर्ण रूप से भाषा नहीं बन पाई है। यह कई मिलती-जुलती बोलियों का एक समूह होती है।
विभाषा / उपभाषा की प्रमुख विशेषताएँ:
- बोली से विस्तृत क्षेत्र: इसका भौगोलिक क्षेत्र एक बोली की तुलना में बहुत बड़ा होता है और यह कई जिलों या एक पूरे क्षेत्र में फैली हो सकती है।
- साहित्यिक रचना: इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसमें साहित्य लिखा जाने लगता है। जैसे, मध्यकाल में ब्रजभाषा और अवधी, जो मूलतः बोलियाँ थीं, उनमें उच्च कोटि का साहित्य (सूरसागर, रामचरितमानस) लिखा गया, जिससे वे विभाषा बन गईं।
- एकाधिक बोलियों का समूह: एक उपभाषा के अंतर्गत प्रायः कई ऐसी बोलियाँ आती हैं, जिनमें आपसी समानता होती है।
- उदाहरण: बिहारी एक उपभाषा है, जिसके अंतर्गत भोजपुरी, मैथिली, और मगही जैसी बोलियाँ आती हैं। इन तीनों में बहुत सी समानताएँ हैं।
- अपना व्याकरणिक ढाँचा: इसका एक निश्चित व्याकरणिक ढाँचा विकसित होने लगता है, भले ही वह मानक भाषा जितना कठोर न हो।
- मानक भाषा का आधार: अक्सर किसी विभाषा की ही कोई एक बोली विकसित होकर मानक भाषा का रूप ले लेती है। जैसे पश्चिमी हिन्दी उपभाषा की खड़ी बोली ने आज की मानक हिन्दी का रूप लिया है।
भाषा के विकास का क्रम: बोली → विभाषा → भाषा
भाषा के विकास की यह प्रक्रिया एक पदानुक्रम (hierarchy) दर्शाती है:
- बोली (Dialect):
- सबसे छोटी और सीमित इकाई।
- केवल मौखिक और अनौपचारिक प्रयोग।
- कोई साहित्य नहीं।
- उदाहरण: मारवाड़ी, मेवाती।
- विभाषा / उपभाषा (Sub-language):
- बोली का विकसित और विस्तृत रूप।
- साहित्यिक रचना संभव।
- क्षेत्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा।
- कई मिलती-जुलती बोलियों का समूह।
- उदाहरण: राजस्थानी एक उपभाषा है, जिसके अंतर्गत मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी आदि बोलियाँ आती हैं।
- भाषा (Language):
- विभाषा का परिनिष्ठित, मानकीकृत और सर्वमान्य रूप।
- समृद्ध साहित्य, मानक व्याकरण।
- शिक्षा, प्रशासन और राजकाज में प्रयोग।
- उदाहरण: हिन्दी एक मानक भाषा है।
हिन्दी की प्रमुख उपभाषाएँ (विभाषाएँ) और उनकी बोलियाँ:
हिन्दी भाषा का विशाल क्षेत्र पाँच प्रमुख उपभाषाओं में विभाजित है। ये उपभाषाएँ ही विभाषाएँ हैं, जिनके अंतर्गत विभिन्न बोलियाँ आती हैं:
- पश्चिमी हिन्दी:
- बोलियाँ: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणवी (बाँगरू), बुंदेली, कन्नौजी।
- विशेषता: आज की मानक हिन्दी इसी की खड़ी बोली से विकसित हुई है।
- पूर्वी हिन्दी:
- बोलियाँ: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
- विशेषता: ‘रामचरितमानस’ की रचना अवधी में हुई।
- बिहारी हिन्दी:
- बोलियाँ: भोजपुरी, मगही, मैथिली।
- विशेषता: भोजपुरी और मैथिली अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बोली जाती हैं।
- राजस्थानी हिन्दी:
- बोलियाँ: मारवाड़ी, जयपुरी (ढूंढाड़ी), मेवाती, मालवी।
- पहाड़ी हिन्दी:
- बोलियाँ: कुमाऊँनी, गढ़वाली, पश्चिमी पहाड़ी।
निष्कर्ष
विभाषा या उपभाषा, भाषा और बोली के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह दर्शाती है कि भाषा स्थिर नहीं होती, बल्कि निरंतर विकास की प्रक्रिया में रहती है। यह क्षेत्रीय अस्मिताओं और साहित्यिक परंपराओं को सहेजकर रखती है और मानक भाषा को जीवंतता तथा विविधता प्रदान करती है। कोई बोली जब अपनी सीमाओं को लांघकर साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व प्राप्त कर लेती है, तो वह विभाषा के पद पर आसीन हो जाती है।
1. लक्ष्य भाषा (Target Language)
परिभाषा:
लक्ष्य भाषा वह भाषा है जिसे कोई व्यक्ति सीख रहा है या जिसमें किसी पाठ (text) का अनुवाद (translation) किया जा रहा है। यह “सीखने” या “अनुवाद करने” के लक्ष्य को दर्शाती है।
इसका प्रयोग मुख्य रूप से भाषा शिक्षण (Language Learning) और अनुवाद (Translation) के संदर्भ में किया जाता है।
- भाषा शिक्षण के संदर्भ में: यदि कोई हिन्दी भाषी व्यक्ति अंग्रेजी सीख रहा है, तो उसके लिए:
- मातृभाषा / स्रोत भाषा (Source Language): हिन्दी
- लक्ष्य भाषा (Target Language): अंग्रेजी
- अनुवाद के संदर्भ में: यदि “रामचरितमानस” का अंग्रेजी में अनुवाद किया जा रहा है, तो:
- स्रोत भाषा (Source Language): अवधी/हिन्दी (मूल पाठ की भाषा)
- लक्ष्य भाषा (Target Language): अंग्रेजी (जिस भाषा में अनुवाद हो रहा है)
विशेषताएँ:
- यह हमेशा सीखने वाले या अनुवादक के दृष्टिकोण पर निर्भर करती है।
- इसका उद्देश्य एक भाषा के विचारों को दूसरी भाषा में सफलतापूर्वक संप्रेषित करना होता है।
2. साहित्यिक भाषा (Literary Language)
परिभाषा:
साहित्यिक भाषा, किसी भी भाषा का वह परिमार्जित, अलंकृत, और कलात्मक रूप है जिसका प्रयोग साहित्य (कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास आदि) की रचना के लिए किया जाता है। यह आम बोलचाल की भाषा से भिन्न, अधिक सुसंस्कृत और प्रभावशाली होती है।
- उदाहरण: मध्यकाल में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख साहित्यिक भाषाएँ थीं, भले ही आम बोलचाल में अन्य बोलियों का प्रयोग होता था। आज की साहित्यिक हिन्दी, मानक खड़ी बोली है।
विशेषताएँ:
- कलात्मकता और सौंदर्य: इसमें रस, छंद, अलंकार, और अन्य काव्यशास्त्रीय तत्वों का प्रयोग किया जाता है ताकि भाषा सुंदर और प्रभावी लगे।
- प्रतीकात्मकता और व्यंजना: साहित्यिक भाषा में शब्द सीधे अर्थ देने के बजाय गहरे और सांकेतिक अर्थ (लक्षणा और व्यंजना) प्रकट करते हैं।
- मानक व्याकरण का प्रयोग: इसमें भाषा के मानक और शुद्ध रूप का प्रयोग होता है।
- शब्दावली: इसमें तत्सम (संस्कृतनिष्ठ) और परिष्कृत शब्दों का प्रयोग आम बोलचाल की भाषा की तुलना में अधिक होता है।
- स्थायित्व: साहित्यिक भाषा भाषा के स्वरूप को स्थिरता प्रदान करती है और उसे लंबे समय तक जीवंत बनाए रखती है।
3. व्यक्ति भाषा / व्यक्ति-बोली (Idiolect)
परिभाषा:
व्यक्ति भाषा या व्यक्ति-बोली, किसी एक विशेष व्यक्ति द्वारा बोली जाने वाली भाषा का अद्वितीय (unique) और विशिष्ट रूप है। यह प्रत्येक व्यक्ति की अपनी भाषाई पहचान होती है, जो उसकी शिक्षा, सामाजिक पृष्ठभूमि, आयु, भौगोलिक क्षेत्र और व्यक्तिगत आदतों से मिलकर बनती है।
- उदाहरण: एक ही परिवार में रहने वाले चार सदस्यों की हिंदी में भी सूक्ष्म अंतर मिल सकता है। किसी के बोलने में अंग्रेजी शब्दों का प्रभाव अधिक होगा, कोई खास मुहावरे का ज्यादा प्रयोग करेगा, किसी का लहजा अलग होगा—यह सब मिलकर उनकी व्यक्ति भाषा का निर्माण करते हैं। अमिताभ बच्चन की हिंदी बोलने की शैली उनकी व्यक्ति-बोली का उदाहरण है।
विशेषताएँ:
- अत्यंत व्यक्तिगत: यह भाषा का सबसे सूक्ष्म स्तर है, जो केवल एक व्यक्ति तक सीमित होता है।
- विशिष्ट शब्दावली और उच्चारण: हर व्यक्ति के पास अपनी पसंदीदा शब्दावली (vocabulary), तकियाकलाम (catchphrases), और उच्चारण का एक विशिष्ट तरीका होता है।
- सामाजिक पहचान का सूचक: किसी व्यक्ति की भाषा उसके व्यक्तित्व और पृष्ठभूमि का आईना होती है।
4. विशिष्ट भाषा / प्रयोजनमूलक भाषा (Special Language / Language for Specific Purposes – LSP)
परिभाषा:
विशिष्ट भाषा, जिसे प्रयोजनमूलक भाषा भी कहते हैं, भाषा का वह स्वरूप है जो किसी विशेष विषय, पेशे (profession), या कार्यक्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित होता है। इसकी शब्दावली और वाक्य-संरचना उस विशिष्ट क्षेत्र की अवधारणाओं को व्यक्त करने के लिए होती है।
- उदाहरण:
- विधि की भाषा (Legal Language): इसमें ‘मुकदमा’, ‘याचिका’, ‘अपील’, ‘मुल्जिम’, ‘समन’ जैसे विशिष्ट शब्द होते हैं।
- विज्ञान की भाषा (Scientific Language): इसमें ‘कोशिका’, ‘गुरुत्वाकर्षण’, ‘प्रकाश-संश्लेषण’, ‘अणु’ जैसी पारिभाषिक शब्दावली होती है।
- वाणिज्य की भाषा (Business Language): ‘बैलेंस शीट’, ‘देनदारी’, ‘शेयर बाजार’, ‘मुद्रास्फीति’ जैसे शब्द इसमें प्रयुक्त होते हैं।
- मीडिया की भाषा (Media Language): ‘ब्रेकिंग न्यूज़’, ‘हेडलाइन’, ‘लाइव टेलीकास्ट’ आदि।
विशेषताएँ:
- पारिभाषिक शब्दावली (Technical Terminology): इसमें ऐसे शब्द होते हैं जिनका अर्थ निश्चित और सुस्पष्ट होता है।
- औपचारिक और वस्तुनिष्ठ: यह भाषा व्यक्तिगत भावों से मुक्त और तथ्यों पर आधारित होती है।
- स्पष्टता और सटीकता: इसका मुख्य उद्देश्य विचारों को बिना किसी भ्रम के स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना होता है।
- कार्य-केंद्रित: यह भाषा किसी खास उद्देश्य या कार्य को पूरा करने के लिए ही प्रयोग की जाती है।
संपर्क भाषा (Link Language / Lingua Franca)
परिभाषा:
संपर्क भाषा वह भाषा होती है जिसका प्रयोग किसी ऐसे क्षेत्र में किया जाता है जहाँ लोग अलग-अलग मातृभाषाएँ बोलते हैं, ताकि वे एक-दूसरे से संवाद या संपर्क स्थापित कर सकें। यह एक सेतु (bridge) की तरह काम करती है, जो भाषाई विभिन्नता वाले समाज के लोगों को आपस में जोड़ती है।
इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिंग्वा फ़्रैंका (Lingua Franca) भी कहा जाता है। संपर्क भाषा किसी व्यक्ति की मातृभाषा न होते हुए भी, व्यापार, प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक मेलजोल के लिए एक साझा (common) भाषा के रूप में अपना ली जाती है।
सरल शब्दों में, संपर्क भाषा वह “कामचलाऊ भाषा” है जो अलग-अलग भाषा बोलने वालों को एक-दूसरे से बात करने में मदद करती है।
संपर्क भाषा की विशेषताएँ:
- बहुभाषी समाज में आवश्यकता: इसकी आवश्यकता केवल वहीं होती है, जहाँ कई भाषाएँ बोली जाती हैं।
- अर्जित भाषा: यह प्रायः लोगों की मातृभाषा नहीं होती, बल्कि वे इसे दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में सीखते हैं।
- व्याकरण में सरलता: संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग होने पर इसके व्याकरण और संरचना में अक्सर थोड़ा सरलीकरण आ जाता है ताकि इसे सीखना आसान हो सके।
- कार्य-केंद्रित: इसका मुख्य उद्देश्य विचारों का आदान-प्रदान करना और काम पूरा करना होता है, न कि साहित्यिक सौंदर्य प्रस्तुत करना।
- व्यापक स्वीकार्यता: इसे उस क्षेत्र के अधिकांश लोग संचार के माध्यम के रूप में स्वीकार करते हैं।
भारत के संदर्भ में संपर्क भाषा
भारत दुनिया के सबसे अधिक भाषाई विविधता वाले देशों में से एक है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ हैं। ऐसे में संपर्क भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत में संपर्क भाषा के दो स्तर हैं:
1. अखिल भारतीय स्तर पर संपर्क भाषा – हिन्दी
हिन्दी निस्संदेह भारत की सबसे बड़ी और सबसे प्रमुख संपर्क भाषा है। इसके निम्नलिखित कारण हैं:
- सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा: भारत में सबसे अधिक लोगों द्वारा (मातृभाषा या दूसरी भाषा के रूप में) हिन्दी बोली और समझी जाती है।
- भौगोलिक विस्तार: उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिम भारत के बड़े भू-भाग में यह मुख्य भाषा है, लेकिन इसकी समझ देश के लगभग हर कोने में है।
- बाजार और व्यापार की भाषा: देश के भीतर व्यापार करने के लिए हिन्दी सबसे कारगर भाषा है। एक तमिल व्यापारी, गुजराती व्यापारी से संवाद करने के लिए अक्सर हिन्दी का ही प्रयोग करता है।
- लोकप्रिय संस्कृति का प्रभाव: बॉलीवुड सिनेमा, टेलीविजन धारावाहिकों और संगीत ने हिन्दी को देश के गैर-हिन्दी भाषी क्षेत्रों, विशेषकर दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर में लोकप्रिय बनाया है और इसकी स्वीकार्यता बढ़ाई है।
- राष्ट्रीय एकता का प्रतीक: स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही हिन्दी ने पूरे देश को एक सूत्र में जोड़ने का काम किया है।
इसलिए, जब कोई भारतीय अपने राज्य से बाहर यात्रा करता है, तो संवाद के लिए वह सबसे पहले हिन्दी का ही सहारा लेता है।
2. सह-संपर्क भाषा – अंग्रेजी
अंग्रेजी भी भारत में एक महत्वपूर्ण संपर्क भाषा की भूमिका निभाती है, विशेषकर कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में:
- शिक्षित और शहरी वर्ग: उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों, शहरी पेशेवरों और अभिजात्य वर्ग के बीच अंग्रेजी एक प्रमुख संपर्क भाषा है।
- उच्च शिक्षा और विज्ञान: देश के विभिन्न हिस्सों से आए छात्र विश्वविद्यालयों में और वैज्ञानिक सम्मेलनों में संवाद के लिए अंग्रेजी का उपयोग करते हैं।
- कॉर्पोरेट और आईटी सेक्टर: बहुराष्ट्रीय कंपनियों और आईटी उद्योग की भाषा मुख्य रूप से अंग्रेजी है।
- प्रशासन और न्यायपालिका: केंद्र और राज्यों के बीच तथा उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में भी अंग्रेजी संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
- दक्षिण भारत में: दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में, जहाँ हिन्दी का प्रभाव कम है, वहां अलग-अलग राज्यों के लोग आपस में संपर्क के लिए अंग्रेजी को प्राथमिकता देते हैं।
विश्व के संदर्भ में संपर्क भाषा
विश्व स्तर पर, अंग्रेजी आज की निर्विवाद रूप से वैश्विक संपर्क भाषा (Global Lingua Franca) है। इसका प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कूटनीति, पर्यटन और इंटरनेट पर संवाद के लिए किया जाता है।
निष्कर्ष
संपर्क भाषा किसी भी बहुभाषी राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक एकता के लिए अनिवार्य है। भारत के संदर्भ में, हिन्दी आम जन-जीवन की सबसे बड़ी संपर्क भाषा है जो देश की विशाल आबादी को आपस में जोड़ती है, जबकि अंग्रेजी उच्च शिक्षा और पेशेवर दुनिया में एक महत्वपूर्ण सह-संपर्क भाषा की भूमिका निभाती है।
शास्त्रीय भाषा (Classical Language)
परिभाषा:
शास्त्रीय भाषा उस भाषा को कहा जाता है जिसका एक अत्यंत समृद्ध, प्राचीन और गौरवशाली साहित्यिक इतिहास होता है, जिसे उस भाषा को बोलने वाले लोग अपनी बहुमूल्य विरासत मानते हैं। यह एक ऐसी भाषा होती है जिसकी अपनी मौलिकता होती है और वह किसी अन्य भाषा परिवार से उत्पन्न नहीं होती।
यह केवल एक पुरानी भाषा नहीं है, बल्कि एक ऐसी भाषा है जिसने उच्च कोटि के साहित्य को जन्म दिया हो और जिसकी परंपरा आज भी जीवित हो। भारत सरकार कुछ विशेष मानदंडों के आधार पर भाषाओं को “शास्त्रीय भाषा” का दर्जा प्रदान करती है।
शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के लिए भारत सरकार के मानदंड (Criteria)
भारत सरकार ने वर्ष 2004 में भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के लिए निम्नलिखित चार प्रमुख मानदंड निर्धारित किए:
- प्राचीनता (Antiquity):
- उस भाषा के प्रारंभिक ग्रंथों का इतिहास 1500 से 2000 वर्ष से अधिक पुराना होना चाहिए।
- मौलिकता (Originality):
- उस भाषा का अपना एक मौलिक साहित्यिक परंपरा होनी चाहिए, जो किसी अन्य भाषा समुदाय से उधार न ली गई हो। वह किसी अन्य भाषा का विकसित रूप न हो।
- समृद्ध साहित्यिक विरासत (Rich Literary Heritage):
- उस भाषा में एक विशाल और मूल्यवान प्राचीन साहित्य या ग्रंथों का भंडार होना चाहिए, जिसे उसकी बोलने वाली पीढ़ियाँ एक अमूल्य विरासत के रूप में मानती हों।
- प्राचीन और आधुनिक रूप में भिन्नता (Discontinuity):
- शास्त्रीय भाषा का प्राचीन साहित्यिक रूप उसके आधुनिक रूप से भिन्न हो सकता है। यह भी संभव है कि शास्त्रीय भाषा और उसके बाद के रूपों में एक तरह की भिन्नता हो। (उदाहरण के लिए, शास्त्रीय संस्कृत और आज की बोलचाल की हिंदी में बहुत अंतर है)।
भारत की शास्त्रीय भाषाएँ (Classical Languages of India)
इन मानदंडों के आधार पर, भारत सरकार ने अब तक कुल 6 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया है। ये भाषाएँ निम्नलिखित हैं (दर्जा मिलने के क्रम में):
1. तमिल (Tamil)
- दर्जा मिला: 2004
- विवरण: तमिल भारत की पहली भाषा थी जिसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला। यह द्रविड़ भाषा परिवार की सबसे प्राचीन भाषा है और इसका साहित्य (संगम साहित्य) 2000 वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है।
2. संस्कृत (Sanskrit)
- दर्जा मिला: 2005
- विवरण: संस्कृत को “देववाणी” भी कहा जाता है और यह भारत-आर्य भाषा परिवार की सबसे प्राचीन और समृद्ध भाषा है। वेद, उपनिषद, पुराण और कालिदास जैसे कवियों की रचनाएँ इसकी साहित्यिक महानता का प्रमाण हैं। भारत की अधिकांश आधुनिक भाषाएँ इसी से जन्मी या प्रभावित हैं।
3. कन्नड़ (Kannada)
- दर्जा मिला: 2008
- विवरण: यह भी एक प्रमुख द्रविड़ भाषा है। कन्नड़ में लिखा गया सबसे पुराना ग्रंथ ‘कविराजमार्ग’ 9वीं शताब्दी का है, लेकिन इसके साहित्यिक साक्ष्य 2000 वर्ष पुराने माने जाते हैं।
4. तेलुगु (Telugu)
- दर्जा मिला: 2008
- विवरण: यह भी एक द्रविड़ भाषा है और इसे “इतालवी ऑफ द ईस्ट” (Italian of the East) भी कहा जाता है क्योंकि इसके शब्दों का अंत स्वरों से होता है। इसके साहित्यिक साक्ष्य भी लगभग 1500-2000 वर्ष पुराने हैं।
5. मलयालम (Malayalam)
- दर्जा मिला: 2013
- विवरण: यह द्रविड़ भाषा परिवार की सबसे युवा शास्त्रीय भाषा है। यद्यपि इसका विकास तमिल से हुआ माना जाता है, फिर भी इसका अपना एक स्वतंत्र और प्राचीन साहित्यिक इतिहास है, जिसके साक्ष्य लगभग 10वीं-12वीं शताब्दी से मिलते हैं।
6. ओड़िया (Odia)
- दर्जा मिला: 2014
- विवरण: ओड़िया शास्त्रीय भाषा का दर्जा पाने वाली पहली भारत-आर्य भाषा (संस्कृत के अलावा) है। इसके शिलालेखों का इतिहास बहुत पुराना है और इसका साहित्य भी 1000 वर्षों से अधिक प्राचीन है।
शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने के लाभ:
जिस भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाता है, उसे केंद्र सरकार द्वारा निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
- उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना: उस भाषा के अध्ययन के लिए “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस” स्थापित किए जाते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार: उस भाषा के प्रतिष्ठित विद्वानों के लिए दो प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा की जाती है।
- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से अनुरोध किया जाता है कि वह केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय भाषाओं के विद्वानों के लिए व्यावसायिक पीठ (Professional Chairs) स्थापित करे।
निष्कर्ष
शास्त्रीय भाषा का दर्जा किसी भाषा की प्राचीनता, मौलिकता और साहित्यिक समृद्धि को एक राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करता है। यह उस भाषा की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और उसके अध्ययन को बढ़ावा देने में मदद करता है। भारत की ये 6 शास्त्रीय भाषाएँ देश की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता की गहराई को दर्शाती हैं।
हिन्दी भाषा का इतिहास
हिन्दी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है। यह उस विशाल भाषा परिवार की एक महत्वपूर्ण कड़ी है जिसकी जड़ें प्राचीन भारत की संस्कृत भाषा में हैं। हिन्दी के विकास क्रम को समझना वास्तव में भारतीय भाषाओं की यात्रा को समझना है।
हिन्दी, भारोपीय (Indo-European) भाषा-परिवार की भारतीय-आर्य (Indo-Aryan) शाखा की एक प्रमुख भाषा है। इसके विकास क्रम को तीन प्रमुख कालों में बांटा जा सकता है:
विकास क्रम: संस्कृत से हिन्दी तक की यात्रा
1. प्राचीन भारतीय आर्य-भाषा काल (1500 ई.पू. – 500 ई.पू.)
- वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. – 1000 ई.पू.): यह हिन्दी की मूल स्रोत भाषा है। विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ, वेदों की रचना इसी भाषा में हुई थी। यह भाषा अत्यधिक नियमबद्ध और जटिल थी।
- लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. – 500 ई.पू.): समय के साथ वैदिक संस्कृत का रूप सरल होता गया और लौकिक संस्कृत का विकास हुआ। पाणिनि ने इसी भाषा का व्याकरण “अष्टाध्यायी” लिखा। रामायण, महाभारत और कालिदास की रचनाएँ इसी भाषा में हैं।
2. मध्यकालीन भारतीय आर्य-भाषा काल (500 ई.पू. – 1000 ई.)
जैसे-जैसे समय बीता, आम बोलचाल की भाषा संस्कृत से और सरल होती गई, जिससे नई भाषाओं का जन्म हुआ, जिन्हें प्राकृत भाषाएँ कहा गया।
- पालि (500 ई.पू. – 1 ई.): यह भारत की पहली देशभाषा मानी जाती है। महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेश इसी भाषा में दिए। बौद्ध धर्म के अधिकांश ग्रंथ “त्रिपिटक” पालि में ही लिखे गए हैं।
- प्राकृत (1 ई. – 500 ई.): पालि के बाद प्राकृत का विकास हुआ, जो उस समय की आम जनता की भाषा थी। महावीर स्वामी ने अपने उपदेश इसी में दिए और जैन साहित्य मुख्य रूप से प्राकृत में ही लिखा गया।
- अपभ्रंश (500 ई. – 1000 ई.): प्राकृत का रूप जब और बिगड़ा और साहित्यिक भाषा से दूर होकर आम बोलचाल के करीब आया, तो उसे “अपभ्रंश” (अर्थात् बिगड़ा हुआ रूप) कहा गया। यह मध्यकाल और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसी अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं (जैसे- हिन्दी, बंगला, गुजराती, मराठी) का जन्म हुआ।
- शौरसेनी अपभ्रंश: यह अपभ्रंश का सबसे प्रमुख रूप था जो मध्य देश (मथुरा के आसपास) में बोला जाता था। हिन्दी का जन्म इसी शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है।
3. आधुनिक भारतीय आर्य-भाषा काल (1000 ई. – अब तक)
लगभग 1000 ई. के आसपास, शौरसेनी अपभ्रंश से पश्चिमी हिन्दी का विकास हुआ, जिसकी एक प्रमुख बोली खड़ी बोली थी। यहीं से हिन्दी भाषा का आधुनिक रूप शुरू होता है, जिसे हम तीन चरणों में बाँट सकते हैं:
- आदिकालीन हिन्दी (1000 ई. – 1400 ई.):
- इस काल में हिन्दी का स्वरूप अपभ्रंश से बहुत मिलता-जुलता था, इसलिए इसे “अपभ्रंश का बढ़ाव” भी कहते हैं।
- पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), बीसलदेव रासो जैसी रचनाओं में इस काल की हिन्दी के प्रारंभिक रूप देखने को मिलते हैं, जिसमें वीरता और श्रृंगार का वर्णन है।
- मध्यकालीन हिन्दी (1400 ई. – 1850 ई.):
- इस काल में हिन्दी दो प्रमुख साहित्यिक रूपों में विकसित हुई:
- ब्रजभाषा: भक्ति काल में सूरदास, मीराबाई और बाद में रीतिकाल में बिहारी, केशवदास जैसे कवियों ने कृष्ण भक्ति और श्रृंगार का काव्य रचकर ब्रजभाषा को साहित्य के शिखर पर पहुँचा दिया।
- अवधी: संत कबीर ने जनभाषा में अपनी साखियाँ कहीं, मलिक मुहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत’ लिखा, और गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की रचना करके अवधी को घर-घर तक पहुँचा दिया।
- इस पूरे काल में खड़ी बोली मुख्यतः आम बोलचाल और सूफी-संतों की भाषा (जैसे अमीर खुसरो) तक सीमित रही।
- इस काल में हिन्दी दो प्रमुख साहित्यिक रूपों में विकसित हुई:
- आधुनिक कालीन हिन्दी (1850 ई. – अब तक):
- 19वीं शताब्दी हिन्दी के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ लेकर आई। अंग्रेजों के आगमन, प्रेस (छपाई) की शुरुआत, और नवीन ज्ञान-विज्ञान ने गद्य की आवश्यकता को जन्म दिया।
- भारतेंदु युग: भारतेंदु हरिश्चंद्र ने गद्य के लिए खड़ी बोली को अपनाया, जिससे खड़ी बोली गद्य प्रतिष्ठित हुआ, हालांकि कविता ब्रजभाषा में ही होती रही।
- द्विवेदी युग: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली को परिमार्जित किया और उसे कविता की भाषा के रूप में भी स्थापित कर दिया।
- छायावाद युग: प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा ने खड़ी बोली हिन्दी में उत्कृष्ट साहित्य रचा और इसे साहित्यिक भाषा के रूप में पूर्ण प्रतिष्ठा दिलाई।
- स्वतंत्रता के बाद: 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने खड़ी बोली पर आधारित हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। आज यह भारत की संपर्क भाषा, शिक्षा, साहित्य और मीडिया की भाषा बन चुकी है।
सार संक्षेप (Journey in brief):
वैदिक संस्कृत → लौकिक संस्कृत → पालि → प्राकृत → अपभ्रंश (शौरसेनी) → पश्चिमी हिन्दी → खड़ी बोली → मानक हिन्दी
इस तरह, संस्कृत की एक विशाल और गौरवशाली परंपरा से निकलकर, हिन्दी ने कई पड़ावों को पार करते हुए आज का आधुनिक स्वरूप प्राप्त किया है।
अपभ्रंश (Apabhransha)
परिभाषा:
अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ है – ‘बिगड़ा हुआ’ या ‘पथ से भटका हुआ’। भाषा विज्ञान के संदर्भ में, अपभ्रंश मध्यकालीन भारतीय आर्य-भाषा के उस अंतिम चरण को कहते हैं जो प्राकृत और आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच की एक संक्रमणकालीन कड़ी (transitional link) है।
इसका काल सामान्यतः 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है। यह उस समय की लोक-प्रचलित और साहित्यिक भाषा थी। इन्हीं क्षेत्रीय अपभ्रंशों से लगभग 1000 ई. के आसपास आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म हुआ।
प्रमुख अपभ्रंश और उनसे विकसित आधुनिक भाषाएँ एवं उपभाषाएँ
अलग-अलग क्षेत्रों में प्राकृत के भिन्न-भिन्न रूप प्रचलित थे, जिनसे क्षेत्रीय अपभ्रंशों का विकास हुआ। प्रमुख अपभ्रंश और उनसे विकसित भाषाएँ निम्नलिखित हैं:
1. शौरसेनी अपभ्रंश (Shaurseni Apabhransha)
यह अपभ्रंश का सबसे महत्वपूर्ण रूप था, जो ‘शूरसेन’ (आधुनिक मथुरा के आसपास का क्षेत्र) या मध्य देश में बोला जाता था। इससे आधुनिक भारतीय भाषाओं का सबसे बड़ा समूह विकसित हुआ।
- इससे विकसित भाषाएँ और उपभाषाएँ:
- पश्चिमी हिन्दी (Western Hindi): यह शौरसेनी का सीधा और केंद्रीय रूप है।
- बोलियाँ: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणवी (बाँगरू), बुंदेली, कन्नौजी।
- राजस्थानी (Rajasthani):
- बोलियाँ: मारवाड़ी, जयपुरी (ढूंढाड़ी), मेवाती, मालवी।
- गुजराती (Gujarati):
- पहाड़ी (Pahari) (कुछ विद्वान इसे खस अपभ्रंश से भी मानते हैं):
- बोलियाँ: कुमाऊँनी, गढ़वाली, पश्चिमी पहाड़ी।
- पश्चिमी हिन्दी (Western Hindi): यह शौरसेनी का सीधा और केंद्रीय रूप है।
2. मागधी अपभ्रंश (Magadhi Apabhransha)
यह मगध (आधुनिक दक्षिण बिहार) और उसके आसपास के पूर्वी क्षेत्रों में प्रचलित थी।
- इससे विकसित भाषाएँ और उपभाषाएँ:
- बिहारी हिन्दी (Bihari Hindi):
- बोलियाँ: भोजपुरी, मगही, मैथिली।
- बंगला (Bengali):
- ओड़िया (Odia):
- असमिया (Assamese):
- बिहारी हिन्दी (Bihari Hindi):
3. अर्धमागधी अपभ्रंश (Ardhamagadhi Apabhransha)
इसका क्षेत्र शौरसेनी (पश्चिम) और मागधी (पूर्व) के बीच में स्थित था, यानी ‘आधा मगध’। यह अवध और बघेलखंड के आसपास बोली जाती थी।
- इससे विकसित भाषाएँ और उपभाषाएँ:
- पूर्वी हिन्दी (Eastern Hindi):
- बोलियाँ: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
- पूर्वी हिन्दी (Eastern Hindi):
4. खस अपभ्रंश (Khas Apabhransha)
इसका प्रचलन हिमालय के तराई वाले इलाकों में रहने वाले ‘खस’ जाति के लोगों में था।
- इससे विकसित भाषाएँ और उपभाषाएँ:
- पहाड़ी हिन्दी (Pahari Hindi): अधिकांश विद्वान पहाड़ी हिन्दी का विकास खस अपभ्रansha से ही मानते हैं।
5. ब्राचड़ अपभ्रंश (Vrachada Apabhransha)
यह उत्तर-पश्चिम क्षेत्र, विशेषकर सिंध, में प्रचलित थी।
- इससे विकसित भाषा:
- सिंधी (Sindhi):
6. पैशाची अपभ्रंश (Paishachi Apabhransha)
इसका प्रयोग भी पश्चिमोत्तर भारत (पंजाब और कश्मीर के आसपास) में होता था। ‘पैशाच’ का अर्थ पिशाचों से नहीं, बल्कि यह एक जाति विशेष का नाम था।
- इससे विकसित भाषाएँ:
- लहँदा (Lahnda): (इसे पश्चिमी पंजाबी भी कहते हैं)
- पंजाबी (Punjabi):
7. महाराष्ट्री अपभ्रंश (Maharashtri Apabhransha)
यह अपभ्रंश आधुनिक महाराष्ट्र के क्षेत्र में बोली जाती थी।
- इससे विकसित भाषा:
- मराठी (Marathi):
सारणीबद्ध प्रस्तुति
| अपभ्रंश का नाम | विकसित आधुनिक भाषाएँ एवं उपभाषाएँ (उनके अंतर्गत आने वाली बोलियाँ) |
| 1. शौरसेनी अपभ्रंश | पश्चिमी हिन्दी (खड़ी बोली, ब्रज, हरियाणवी, बुंदेली, कन्नौजी) |
| राजस्थानी (मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती, मालवी) | |
| गुजराती | |
| पहाड़ी (कुमाऊँनी, गढ़वाली) | |
| 2. मागधी अपभ्रंश | बिहारी हिन्दी (भोजपुरी, मगही, मैथिली) |
| बंगला | |
| ओड़िया | |
| असमिया | |
| 3. अर्धमागधी अपभ्रंश | पूर्वी हिन्दी (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी) |
| 4. खस अपभ्रंश | पहाड़ी हिन्दी (प्रमुख रूप से) |
| 5. ब्राचड़ अपभ्रansha | सिंधी |
| 6. पैशाची अपभ्रंश | लहँदा और पंजाबी |
| 7. महाराष्ट्री अपभ्रंश | मराठी |
यह वर्गीकरण दर्शाता है कि भारत की अधिकांश आधुनिक आर्य भाषाएँ इन्हीं क्षेत्रीय अपभ्रंशों के गर्भ से जन्मी हैं, और हिन्दी भाषा का विशाल परिवार (जिसमें पश्चिमी, पूर्वी, बिहारी, राजस्थानी और पहाड़ी उपभाषाएँ शामिल हैं) मुख्य रूप से शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी अपभ्रंशों की देन है।
अपभ्रंश भाषा से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
नाम और अर्थ
- शाब्दिक अर्थ: “अपभ्रंश” का शाब्दिक अर्थ है ‘बिगड़ा हुआ’, ‘पतित’ या ‘गिरा हुआ’।
- नामकरण का कारण: प्रारंभिक भाषाविदों (जैसे पतंजलि) ने इसे संस्कृत के मानक रूप से “भ्रष्ट” या बिगड़ा हुआ माना था, इसलिए यह नाम प्रचलित हुआ। हालांकि, भाषा विज्ञान की दृष्टि से यह केवल भाषा का एक स्वाभाविक विकास था।
- अन्य नाम: अपभ्रंश को ‘अवहट्ठ’, ‘देशी भाषा’ और ‘ग्राम भाषा’ भी कहा गया है। ‘अवहट्ठ’ (जिसका अर्थ है ‘अपभ्रष्ट’) अपभ्रंश के परवर्ती या अंतिम रूप को कहा जाता है।
ऐतिहासिक और साहित्यिक तथ्य
- काल निर्धारण: इसका काल सामान्यतः 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है, हालांकि इसके साहित्यिक प्रयोग 12वीं-13वीं सदी तक भी मिलते रहे।
- संयोजक कड़ी: यह मध्यकालीन आर्य भाषाओं (प्राकृत) और आधुनिक आर्य भाषाओं (हिन्दी, बंगला, मराठी आदि) के बीच की एक महत्वपूर्ण संयोजक या संक्रमणकालीन कड़ी (transitional link) है।
- वियोगात्मक प्रवृत्ति: अपभ्रंश, संस्कृत और प्राकृत (जो संयोगात्मक थीं) की तुलना में अधिक वियोगात्मक (Analytical) भाषा बन गई थी। अर्थात्, इसमें विभक्तियों की जगह परसर्गों/सहायक क्रियाओं (जैसे – का, के, की) का प्रयोग शुरू हो गया था। (उदाहरण: संस्कृत का ‘रामेण’ हिन्दी में ‘राम ने’ हो गया)। यहीं से हिन्दी के व्याकरण की नींव पड़ी।
- प्रमुख साहित्यकार:
- स्वयंभू: इन्हें ‘अपभ्रंश का वाल्मीकि’ कहा जाता है। इनकी सबसे प्रसिद्ध रचना ‘पउमचरिउ’ (पद्मचरित) है, जो अपभ्रंश की रामायण मानी जाती है।
- पुष्पदंत: इन्हें ‘अपभ्रंश का वेदव्यास’ कहा जाता है। इनकी प्रमुख रचना ‘महापुराण’ है।
- धनपाल: इनकी रचना ‘भविस्सयत्तकहा’ (भविष्यदत्तकथा) प्रसिद्ध है।
- अब्दुर रहमान (अद्दहमाण): इनका ‘संदेश रासक’ किसी मुस्लिम कवि द्वारा भारतीय भाषा में लिखा गया पहला काव्य माना जाता है।
भाषाई विशेषताएँ
- स्वरों की संख्या: अपभ्रंश में मुख्य रूप से आठ स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ) थे। ‘ऐ’ और ‘औ’ स्वर नहीं थे, उनका उच्चारण ‘अइ’ और ‘अउ’ के रूप में होता था।
- नपुंसकलिंग का लोप: अपभ्रंश में नपुंसकलिंग समाप्त हो गया था, और केवल पुल्लिंग और स्त्रीलिंग – दो ही लिंग रह गए थे। यह विशेषता आधुनिक हिन्दी में भी विद्यमान है।
- ऋ (ऋषि वाला) स्वर का अभाव: ‘ऋ’ स्वर का प्रयोग समाप्त हो गया था। इसका उच्चारण या तो ‘रि’ होता था या ‘अ’। जैसे, ‘ऋतु’ को ‘रितु’ बोला जाने लगा।
- द्विवचन का लोप: संस्कृत की तरह इसमें द्विवचन नहीं था, केवल एकवचन और बहुवचन ही थे, जो हिन्दी में भी जारी रहा।
- शौरसेनी अपभ्रंश का प्रभुत्व: सभी अपभ्रंशों में, शौरसेनी अपभ्रंश सबसे महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह मध्य देश की भाषा थी, जो उस समय का सांस्कृतिक केंद्र था। आधुनिक हिन्दी इसी से विकसित हुई।
हिन्दी से संबंधित विशिष्ट तथ्य
- हिन्दी का जन्म: हिन्दी का जन्म सीधे संस्कृत से नहीं, बल्कि अपभ्रंश से हुआ है। हिन्दी की आदि जननी भले ही संस्कृत हो, पर उसकी निकटतम पूर्वज शौरसेनी अपभ्रंश है।
- पहला प्रयोग: “हिन्दी” शब्द का प्रयोग भाषा के अर्थ में सबसे पहले अमीर खुसरो ने किया, लेकिन अपभ्रंश में रचित ‘श्रावकाचार’ (देवसेन द्वारा) को अक्सर हिन्दी की पहली रचना माना जाता है क्योंकि उसका विषय और भाषा हिन्दी के बहुत निकट है।
- विद्यापति और अवहट्ठ: कवि विद्यापति ने अपनी रचना ‘कीर्तिलता’ की भाषा को ‘अवहट्ठ’ कहा है, जो यह दर्शाता है कि 14वीं सदी में भी अपभ्रंश का परवर्ती रूप साहित्य में प्रयोग हो रहा था।
लिपि (Script)
परिभाषा:
किसी भी भाषा की ध्वनियों (sounds) को लिखने के लिए जिन चिह्नों या प्रतीकों (signs or symbols) का प्रयोग किया जाता है, उन चिह्नों की व्यवस्थित प्रणाली को लिपि कहते हैं।
- सरल शब्दों में, भाषा बोलने का तरीका है और लिपि उसे लिखने का तरीका है।
- उदाहरण: यदि मैं “कमल” बोलता हूँ, तो यह भाषा (मौखिक रूप) है। जब मैं इसे ‘क’, ‘म’, ‘ल’ चिन्हों का प्रयोग करके लिखता हूँ, तो यह लिपि (लिखित रूप) है।
लिपि की आवश्यकता और महत्व:
- भाषा को स्थायित्व प्रदान करना: लिपि भाषा को स्थायी रूप देती है। इसके बिना, ज्ञान, विचार और इतिहास को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाना असंभव होता।
- ज्ञान का संचय और प्रसार: किताबें, ग्रंथ और आज का डिजिटल डेटा, सब कुछ लिपि के कारण ही संभव है। यह ज्ञान को सुरक्षित रखता है और दूर-दूर तक फैलाता है।
- भौगोलिक सीमा का विस्तार: लिपि के माध्यम से भाषा अपनी भौगोलिक सीमाओं को लांघकर पूरे विश्व में फैल सकती है।
- उच्चारण में एकरूपता: लिपि किसी शब्द के शुद्ध रूप को निश्चित करती है, जिससे उच्चारण में एकरूपता बनी रहती है।
देवनागरी लिपि (Devanagari Script)
परिभाषा:
देवनागरी, भारत की एक प्राचीन, वैज्ञानिक और सर्वाधिक प्रचलित लिपियों में से एक है। यह एक आक्षरिक लिपि (Abugida/Alphasyllabary) है, जिसका विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। यह बाएँ से दाएँ (left to right) लिखी जाती है।
यह केवल हिन्दी की ही नहीं, बल्कि भारत और नेपाल की अनेक भाषाओं की लिपि है।
देवनागरी लिपि का विकास क्रम:
इसका विकास क्रम इस प्रकार है:
ब्राह्मी लिपि (प्राचीन भारत) → गुप्त लिपि → कुटिल लिपि (सिद्धमातृका) → नागरी लिपि → देवनागरी लिपि (आधुनिक रूप)
- “नागरी” नाम गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा प्रयोग किए जाने के कारण पड़ा, और “देवभाषा” संस्कृत के लिए प्रयोग होने के कारण इसमें “देव” शब्द जुड़ गया, जिससे यह “देवनागरी” कहलाई।
देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली प्रमुख भाषाएँ:
- संस्कृत (मूल भाषा)
- हिन्दी
- मराठी
- नेपाली
- कोंकणी
- बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली (संविधान की 8वीं अनुसूची की भाषाएँ)
- इसके अलावा, भोजपुरी, मगही, गढ़वाली, कुमाऊँनी जैसी कई बोलियाँ और भाषाएँ भी इसी में लिखी जाती हैं।
देवनागरी लिपि की विशेषताएँ (Features of Devanagari Script)
देवनागरी को दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपियों (most scientific scripts) में से एक माना जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- ध्वन्यात्मक लिपि (Phonetic Script):
- जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है: इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जैसा उच्चारण किया जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। इसमें अंग्रेजी की तरह ‘know’ में ‘k’ या ‘psychology’ में ‘p’ जैसे मूक (silent) अक्षर नहीं होते।
- एक ध्वनि के लिए एक चिह्न: हर ध्वनि (sound) के लिए एक निश्चित और अद्वितीय वर्ण (चिह्न) है।
- वर्गीकरण में वैज्ञानिकता (Scientific Classification):
- इसके वर्णों का वर्गीकरण अत्यंत वैज्ञानिक है। स्वरों और व्यंजनों को अलग-अलग रखा गया है।
- व्यंजनों को उच्चारण स्थान (कंठ, तालु, मूर्धा आदि) और प्रयत्न (अल्पप्राण, महाप्राण) के आधार पर व्यवस्थित किया गया है, जो सीखने और समझने में बहुत आसान है। (जैसे – क, ख, ग, घ, ङ सभी कंठ से बोले जाते हैं)।
- आक्षरिक लिपि (Abugida System):
- देवनागरी में प्रत्येक व्यंजन वर्ण में अंतर्निहित (inherent) ‘अ’ स्वर माना जाता है (जैसे- ‘क्’ + ‘अ’ = ‘क’)।
- अन्य स्वरों को जोड़ने के लिए मात्राओं का प्रयोग किया जाता है, जो लिखने में समय और स्थान बचाती हैं।
- शिरोरेखा का प्रयोग (Use of Headstroke):
- शब्दों के ऊपर खींची जाने वाली सीधी रेखा (शिरोरेखा) देवनागरी की पहचान है। यह शब्दों को एक साथ बांधकर पढ़ने में सुगमता प्रदान करती है।
- व्यापकता:
- यह भारत की अनेक भाषाओं को लिखने में सक्षम है। इसमें लगभग सभी भारतीय ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए चिह्न मौजूद हैं।
देवनागरी लिपि की सीमाएँ / सुधार की आवश्यकताएँ:
इसकी वैज्ञानिकता के बावजूद, इसमें कुछ समस्याएँ हैं जिन पर सुधार के लिए चर्चा होती रहती है:
- कुछ वर्णों का दोहरा रूप: कुछ अक्षर दो तरह से लिखे जाते हैं, जैसे- ‘अ’ (अ vs. अ), ‘झ’ (झ vs. झ)। मानकीकरण द्वारा इसे ठीक करने का प्रयास किया गया है।
- टंकण और मुद्रण में कठिनाई: मात्राओं और संयुक्त अक्षरों के कारण टाइपिंग और प्रिंटिंग में थोड़ी जटिलता आती है। (हालांकि यूनिकोड ने इसे बहुत सरल बना दिया है)।
- संयुक्त अक्षरों की जटिलता: कुछ संयुक्त अक्षर (जैसे- क् + ष = क्ष, द् + य = द्य) अपने मूल वर्णों से बिल्कुल भिन्न दिखते हैं, जो सीखने में कठिनाई पैदा करते हैं।
- शिरोरेखा का अनावश्यक श्रम: कुछ लोगों का मानना है कि शिरोरेखा खींचने में अतिरिक्त समय लगता है।
निष्कर्ष
लिपि, भाषा के शरीर की तरह है, जो उसे एक मूर्त रूप देती है, जबकि भाषा उसकी आत्मा है। देवनागरी लिपि अपनी वैज्ञानिक संरचना और ध्वन्यात्मक सटीकता के कारण हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए एक आदर्श लिपि है। इसने भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को सदियों से संजोकर रखा है और आज भी यह देश की सबसे महत्वपूर्ण लिपियों में से एक है।
वर्ण-विचार
वर्ण-विचार (Orthography/Phonology)
वर्ण-विचार, हिंदी व्याकरण का वह पहला और सबसे महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें वर्णों (letters/sounds) के आकार, भेद, उनके उच्चारण स्थान, और उनके संयोग (मेल) से शब्द बनाने के नियमों का अध्ययन किया जाता है। यह व्याकरण की नींव है, क्योंकि भाषा की शुद्धता का आरंभ वर्णों के शुद्ध ज्ञान और उच्चारण से ही होता है।
1. वर्ण (Letter/Phoneme)
परिभाषा: भाषा की वह सबसे छोटी ध्वनि जिसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते, ‘वर्ण’ कहलाती है। वर्ण को ‘अक्षर’ भी कहा जाता है।
- उदाहरण: अ, इ, क्, ख्, च्, त् आदि। (हलंत लगे व्यंजन शुद्ध वर्ण हैं)।
वर्णमाला (Alphabet)
परिभाषा:
किसी भी भाषा में प्रयुक्त होने वाले सभी वर्णों (letters) के व्यवस्थित, क्रमबद्ध एवं संपूर्ण समूह को ‘वर्णमाला’ कहा जाता है। ‘वर्णमाला’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘वर्ण’ (अक्षर) और ‘माला’ (समूह/हार), जिसका अर्थ है ‘वर्णों का समूह या हार’।
हिन्दी वर्णमाला देवनागरी लिपि पर आधारित है और इसके वर्णों का वर्गीकरण अत्यंत वैज्ञानिक है।
मानक हिन्दी वर्णमाला (Standard Hindi Alphabet)
मानक हिन्दी वर्णमाला में कुल 52 वर्ण माने जाते हैं, जिनका वर्गीकरण इस प्रकार है:
| श्रेणी | उप-श्रेणी | वर्ण | संख्या |
| स्वर (Vowels) | – | अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ | 11 |
| अयोगवाह (Ayogvah) | – | अं (अनुस्वार), अः (विसर्ग) | 2 |
| व्यंजन (Consonants) | स्पर्श व्यंजन (K-varg to P-varg) | क, ख, ग, घ, ङ<br>च, छ, ज, झ, ञ<br>ट, ठ, ड, ढ, ण<br>त, थ, द, ध, न<br>प, फ, ब, भ, म | 25 |
| अंतःस्थ व्यंजन | य, र, ल, व | 4 | |
| ऊष्म व्यंजन | श, ष, स, ह | 4 | |
| उत्क्षिप्त / द्विगुण व्यंजन | ड़, ढ़ | 2 | |
| संयुक्त व्यंजन | क्ष, त्र, ज्ञ, श्र | 4 | |
| कुल वर्ण | 52 |
वर्णमाला का विस्तृत विश्लेषण:
स्वर (Vowels)
परिभाषा:
वे वर्ण जिनका उच्चारण स्वतंत्र रूप से, बिना किसी अन्य वर्ण (व्यंजन) की सहायता के होता है, स्वर कहलाते हैं। इनके उच्चारण के समय फेफड़ों से निकलने वाली हवा मुख में बिना किसी रुकावट या बाधा के बाहर निकल जाती है।
हिन्दी वर्णमाला में स्वरों की संख्या: 11
स्वर वर्ण:
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ
स्वरों का वर्गीकरण (Classification of Vowels)
स्वरों को अलग-अलग आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. उच्चारण में लगने वाले समय (मात्रा) के आधार पर
इस आधार पर स्वर के तीन भेद होते हैं:
- क) ह्रस्व स्वर (Short Vowels):
- परिभाषा: जिन स्वरों के उच्चारण में सबसे कम समय (एक मात्रा का समय) लगता है, वे ह्रस्व स्वर कहलाते हैं। इन्हें मूल स्वर भी कहा जाता है, क्योंकि बाकी सभी स्वर इन्हीं से मिलकर बनते हैं।
- संख्या: 4
- वर्ण: अ, इ, उ, ऋ
- ख) दीर्घ स्वर (Long Vowels):
- परिभाषा: जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से दोगुना समय (दो मात्रा का समय) लगता है, वे दीर्घ स्वर कहलाते हैं।
- संख्या: 7
- वर्ण:
- आ (अ + अ)
- ई (इ + इ)
- ऊ (उ + उ)
- ए (अ + इ) } संयुक्त स्वर
- ऐ (अ + ए) } (Compound Vowels)
- ओ (अ + उ) }
- औ (अ + ओ) }
- नोट: ए, ऐ, ओ, औ को संयुक्त स्वर (Compound Vowels) भी कहते हैं, क्योंकि ये दो भिन्न-भिन्न स्वरों के मेल से बने हैं।
- ग) प्लुत स्वर (Prolonged Vowels):
- परिभाषा: जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वर से तिगुना (तीन मात्रा का) समय लगता है, वे प्लुत स्वर कहलाते हैं।
- प्रयोग: इसका प्रयोग लेखन में नहीं, बल्कि किसी को दूर से पुकारने, संगीत या मंत्रों के उच्चारण में किया जाता है।
- चिह्न: इसे दिखाने के लिए हिंदी के अंक ‘३’ का प्रयोग किया जाता है।
- उदाहरण: ओ३म्, राऽऽम !, हे कृष्ण !
2. जिह्वा (जीभ) के प्रयोग के आधार पर
- अग्र स्वर (Front Vowels): जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का अगला भाग सक्रिय रहता है।
- वर्ण: इ, ई, ए, ऐ
- मध्य स्वर (Central Vowels): जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का मध्य भाग सक्रिय रहता है।
- वर्ण: अ
- पश्च स्वर (Back Vowels): जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का पिछला भाग सक्रिय रहता है।
- वर्ण: आ, उ, ऊ, ओ, औ
3. मुख खुलने (मुख-विवर) के आधार पर
- विवृत (Open): जिन स्वरों के उच्चारण में मुख लगभग पूरा खुलता है।
- वर्ण: आ
- अर्ध विवृत (Half-Open): जिन स्वरों के उच्चारण में मुख आधा खुलता है।
- वर्ण: अ, ऐ, औ
- संवृत (Closed): जिन स्वरों के उच्चारण में मुख लगभग बंद रहता है।
- वर्ण: इ, ई, उ, ऊ
- अर्ध संवृत (Half-Closed): जिन स्वरों के उच्चारण में मुख आधा बंद रहता है।
- वर्ण: ए, ओ
ओष्ठों की स्थिति / ओष्ठाकृति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण
(Classification of Vowels based on the position of Lips)
1. वृत्तमुखी / वृत्ताकार स्वर (Rounded Vowels)
परिभाषा:
जिन स्वरों के उच्चारण के समय हमारे होंठ गोलाकार (वृत्त के समान) हो जाते हैं, उन्हें वृत्तमुखी या वृत्ताकार स्वर कहा जाता है। ‘वृत्तमुखी’ का अर्थ है – ‘वृत्त के समान मुख वाला’।
- आप इन स्वरों का उच्चारण करके आईने में अपने होठों का आकार देख सकते हैं; वे एक ‘O’ की आकृति बना लेंगे।
- संख्या: हिन्दी में 4 वृत्तमुखी स्वर हैं।
- स्वर वर्ण:
- उ
- ऊ
- ओ
- औ
- उदाहरण (शब्दों में):
- उ → उल्लू, उधर, गुरु, मधु
- ऊ → ऊन, ऊपर, धूल, झूला
- ओ → ओस, ओखली, चोर, मोर
- औ → औरत, औजार, नौका, चौड़ा
2. अवृत्तमुखी / अवृत्ताकार स्वर (Unrounded Vowels)
परिभाषा:
जिन स्वरों के उच्चारण के समय हमारे होंठ गोलाकार न होकर सामान्य रूप में फैले रहते हैं, उन्हें अवृत्तमुखी या अवृत्ताकार स्वर कहा जाता है। ‘अवृत्तमुखी’ का अर्थ है – ‘बिना वृत्त (गोले) के मुख वाला’।
- इन स्वरों के उच्चारण के समय होंठ या तो उदासीन (neutral) रहते हैं या थोड़े फैल जाते हैं, लेकिन गोल नहीं होते।
- संख्या: हिन्दी में (ऋ को मिलाकर) 7 अवृत्तमुखी स्वर हैं।
- स्वर वर्ण:
- अ
- आ
- इ
- ई
- ऋ (ऋ का उच्चारण भी अवृत्तमुखी होता है)
- ए
- ऐ
- उदाहरण (शब्दों में):
- अ → अमर, अब, कमल
- आ → आम, आज, काम
- इ → इधर, इमली, दिन
- ई → ईख, ईमान, नदी
- ऋ → ऋषि, कृषि, नृप
- ए → एक, एड़ी, खेल
- ऐ → ऐनक, ऐरावत, मैदान
तुलनात्मक सारणी
| वर्गीकरण | होठों की स्थिति | स्वर वर्ण |
| वृत्तमुखी (Rounded) | होंठ गोलाकार हो जाते हैं | उ, ऊ, ओ, औ |
| अवृत्तमुखी (Unrounded) | होंठ सामान्य या फैले रहते हैं, गोल नहीं होते | अ, आ, इ, ई, ऋ, ए, ऐ |
एक अतिरिक्त वर्गीकरण
कभी-कभी अवृत्तमुखी को दो और भागों में बाँटा जाता है:
- उदासीन (Neutral): जहाँ होंठ लगभग अपनी सामान्य स्थिति में रहते हैं (जैसे – अ)।
- प्रसृत (Spread): जहाँ होंठ थोड़े फैल जाते हैं (जैसे – इ, ई, ए, ऐ)।
हालांकि, मुख्य वर्गीकरण वृत्तमुखी और अवृत्तमुखी ही है और यही सर्वाधिक मान्य है।
निष्कर्ष
ओष्ठों की स्थिति का यह वर्गीकरण स्वरों के उच्चारण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ‘उ’, ‘ऊ’, ‘ओ’, ‘औ’ बोलने के लिए होठों को गोल करना अनिवार्य है, जबकि ‘अ’, ‘आ’, ‘इ’, ‘ई’ जैसे स्वर बिना होठों को गोल किए ही बोले जा सकते हैं। यह स्वरों के बीच के सूक्ष्म उच्चारण-भेद को समझने में मदद करता है।
जाति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण
(Classification of Vowels based on Caste/Homogeneity of Articulation)
इस आधार पर स्वरों को दो मुख्य भागों में बांटा जाता है:
- सवर्ण / सजातीय स्वर (Homogeneous Vowels)
- असवर्ण / विजातीय स्वर (Heterogeneous Vowels)
1. सवर्ण / सजातीय स्वर (Homogeneous Vowels)
परिभाषा:
वे स्वर जिनका उच्चारण स्थान (Place of Articulation) और उच्चारण प्रयत्न (Manner of Articulation) एक समान होता है, सजातीय स्वर कहलाते हैं। ‘सजातीय’ का अर्थ है – ‘एक ही जाति (प्रकार) के’।
- ये स्वर जोड़े में होते हैं – एक ह्रस्व और एक दीर्घ।
- जब एक ही जैसे दो ह्रस्व स्वर मिलते हैं, तो उसी जाति का दीर्घ स्वर बनता है।
- इन्हें समझना बहुत सरल है क्योंकि ये एक ही “परिवार” के सदस्य होते हैं।
- सजातीय स्वरों के जोड़े:
- अ, आ:
- दोनों का उच्चारण स्थान कंठ (Guttural) है।
- (अ + अ = आ)
- इ, ई:
- दोनों का उच्चारण स्थान तालु (Palatal) है।
- (इ + इ = ई)
- उ, ऊ:
- दोनों का उच्चारण स्थान ओष्ठ (Labial) है।
- (उ + उ = ऊ)
- अ, आ:
- महत्व:
- संस्कृत और हिन्दी की दीर्घ स्वर संधि इन्हीं सजातीय स्वरों के मेल पर आधारित है।
- उदाहरण:
- धर्म + अर्थ = धर्मर्थ (अ + अ = आ)
- रवि + इंद्र = रवींद्र (इ + इ = ई)
- भानु + उदय = भानूदय (उ + उ = ऊ)
2. असवर्ण / विजातीय स्वर (Heterogeneous Vowels)
परिभाषा:
वे स्वर जिनका उच्चारण स्थान और उच्चारण प्रयत्न अलग-अलग होता है, विजातीय स्वर कहलाते हैं। ‘विजातीय’ का अर्थ है – ‘भिन्न जाति (प्रकार) के’।
- जब दो अलग-अलग उच्चारण स्थानों वाले स्वर मिलते हैं, तो एक नए स्वर का निर्माण होता है जो विजातीय कहलाता है।
- हिन्दी के सभी संयुक्त स्वर (Compound Vowels) इसी श्रेणी में आते हैं।
- विजातीय (संयुक्त) स्वर और उनकी संरचना:
- ए:
- निर्माण: अ (कंठ) + इ (तालु) = ए
- उच्चारण स्थान: कंठ-तालव्य (Guttural-Palatal)
- ऐ:
- निर्माण: अ (कंठ) + ए (कंठ-तालव्य) = ऐ
- उच्चारण स्थान: कंठ-तालव्य (Guttural-Palatal)
- ओ:
- निर्माण: अ (कंठ) + उ (ओष्ठ) = ओ
- उच्चारण स्थान: कंठोष्ठ्य (Guttural-Labial)
- औ:
- निर्माण: अ (कंठ) + ओ (कंठोष्ठ्य) = औ
- उच्चारण स्थान: कंठोष्ठ्य (Guttural-Labial)
- ए:
- महत्व:
- हिन्दी की गुण स्वर संधि और वृद्धि स्वर संधि इन्हीं विजातीय स्वरों के मेल पर आधारित है।
- उदाहरण (गुण संधि):
- नर + इंद्र = नरेंद्र (अ + इ = ए)
- सूर्य + उदय = सूर्योदय (अ + उ = ओ)
- उदाहरण (वृद्धि संधि):
- एक + एक = एकैक (अ + ए = ऐ)
- महा + औषधि = महौषधि (आ + ओ = औ)
तुलनात्मक सारणी
| आधार | सजातीय स्वर | विजातीय स्वर |
| परिभाषा | एक समान उच्चारण स्थान वाले स्वर। | भिन्न-भिन्न उच्चारण स्थान वाले स्वर। |
| संरचना | एक ही ह्रस्व स्वर के योग से बनते हैं। | दो भिन्न स्वरों के योग से बनते हैं। |
| वर्ण | (अ, आ), (इ, ई), (उ, ऊ) | ए, ऐ, ओ, औ |
| प्रकृति | मूल स्वरों के दीर्घ रूप। | संयुक्त स्वर (Compound Vowels) |
| संधि में भूमिका | दीर्घ संधि का आधार। | गुण संधि और वृद्धि संधि का आधार। |
निष्कर्ष
जाति के आधार पर स्वरों का यह वर्गीकरण केवल सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि यह हिन्दी की स्वर संधि प्रणाली को समझने की कुंजी है। यह स्पष्ट करता है कि जब समान प्रकृति के स्वर मिलते हैं तो वे उसी ध्वनि को लंबा (दीर्घ) कर देते हैं, जबकि जब भिन्न प्रकृति के स्वर मिलते हैं तो वे एक पूरी तरह से नई ध्वनि का निर्माण करते हैं।
अलिजिह्वा / कौवे की स्थिति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण
सबसे पहले, यह जानना आवश्यक है कि अलिजिह्वा (Uvula) क्या है?
अलिजिह्वा, जिसे आम भाषा में ‘कौवा’ या ‘गलशुंडिका’ भी कहते हैं, हमारे गले के पिछले भाग में, कोमल तालु (soft palate) से नीचे की ओर लटकता हुआ मांस का एक छोटा-सा टुकड़ा होता है। स्वरों और कुछ व्यंजनों के उच्चारण में इसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उच्चारण के समय कौवे की स्थिति के आधार पर हम स्वरों को दो मुख्य भागों में बाँट सकते हैं:
- मौखिक या निरनुनासिक स्वर (Oral Vowels)
- अनुनासिक स्वर (Nasalized Vowels)
1. मौखिक या निरनुनासिक स्वर (Oral Vowels)
परिभाषा:
जिन स्वरों के उच्चारण के समय फेफड़ों से आने वाली हवा केवल मुख (मुँह) से बाहर निकलती है, उन्हें मौखिक या निरनुनासिक स्वर कहते हैं। ‘निरनुनासिक’ का अर्थ है – ‘बिना नाक के’।
- कौवे की स्थिति (Position of the Uvula):
- इन स्वरों के उच्चारण के समय हमारा कोमल तालु (soft palate) और अलिजिह्वा (कौवा) ऊपर की ओर उठकर नासिका मार्ग (nasal passage) को पूरी तरह से बंद कर देते हैं।
- इससे हवा नाक से बाहर नहीं जा पाती और उसे पूरी तरह से मुँह के रास्ते ही निकलना पड़ता है।
- हिन्दी के सभी मूल स्वर (11 स्वर) इसी श्रेणी में आते हैं। जब उन पर अनुनासिक चिह्न (चंद्रबिंदु) नहीं लगा होता, तो वे मौखिक ही होते हैं।
- उदाहरण:
- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ
- शब्द: घर, इधर, उधर, अपना, पराया, एक, दो। (इन शब्दों में हवा केवल मुँह से निकल रही है)।
2. अनुनासिक स्वर (Nasalized Vowels)
परिभाषा:
जिन स्वरों के उच्चारण के समय हवा मुख (मुँह) और नासिका (नाक) दोनों से एक साथ बाहर निकलती है, उन्हें अनुनासिक स्वर कहते हैं। ‘अनुनासिक’ का अर्थ है – ‘नाक के साथ’।
- कौवे की स्थिति (Position of the Uvula):
- इन स्वरों के उच्चारण के समय हमारा कोमल तालु और अलिजिह्वा (कौवा) थोड़े नीचे आ जाते हैं और नासिका मार्ग को पूरी तरह से बंद नहीं करते।
- इस स्थिति में, हवा का कुछ हिस्सा नाक के रास्ते और कुछ हिस्सा मुँह के रास्ते, एक साथ बाहर निकलता है, जिससे ध्वनि में एक ‘अनुनासिकता’ (nasality) का गुण आ जाता है।
- लेखन में चिह्न:
- इन्हें लिखने के लिए शिरोरेखा के ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) का प्रयोग किया जाता है।
- जब शिरोरेखा के ऊपर कोई मात्रा हो (जैसे- ी, े, ै, ो, ौ), तो जगह की कमी के कारण चंद्रबिंदु की जगह केवल बिंदी (ं) लगा दी जाती है, लेकिन उसका उच्चारण अनुनासिक ही होता है।
- उदाहरण:
- चंद्रबिंदु (ँ) वाले: आँख, गाँव, चाँद, साँप, ऊँट, अँगूठी, धुआँ।
- बिंदी (ं) वाले, पर उच्चारण अनुनासिक: मैं, ईंट, गोंद, कहीं, हैं।
- (ध्यान दें, ‘मैं’ और ‘हैं’ का उच्चारण नासिक्य है, पर ‘हंस’ (पक्षी) में अनुस्वार का उच्चारण होता है जो केवल नाक से है)।
सारणी में तुलना
| आधार | मौखिक स्वर (Oral Vowel) | अनुनासिक स्वर (Nasalized Vowel) |
| वायु का निकास | केवल मुँह से | मुँह और नाक, दोनों से एक साथ |
| कौवे की स्थिति | ऊपर उठकर नासिका मार्ग बंद कर देता है | थोड़ा नीचे रहकर नासिका मार्ग खुला रखता है |
| ध्वनि की प्रकृति | शुद्ध और स्पष्ट | नासिक्यता युक्त, थोड़ी गहरी |
| लेखन चिह्न | कोई चिह्न नहीं | चंद्रबिंदु (ँ) या बिंदी (ं) (मात्रा के साथ) |
| उदाहरण | घर, आग, पानी, हवा | गाँव, आँख, पाँच, धुआँ, मैं |
| हिन्दी में महत्व | यह स्वरों का मूल रूप है | यह अर्थभेदक है (जैसे – हँस vs. हंस) |
निष्कर्ष
अलिजिह्वा या कौवे की स्थिति यह निर्धारित करती है कि ध्वनि का स्वरूप मौखिक होगा या अनुनासिक। कोमल तालु के ऊपर उठकर नासिका मार्ग को बंद कर देने से मौखिक स्वर बनते हैं, जबकि उसके थोड़ा शिथिल या नीचे रहने से, जिससे हवा मुँह और नाक दोनों से निकल सके, अनुनासिक स्वर बनते हैं। यह सूक्ष्म अंतर हिन्दी में कई शब्दों के अर्थ को बदलने की क्षमता रखता है।
मात्राएँ (Vowel Signs)
जब स्वरों को व्यंजनों के साथ मिलाकर लिखा जाता है, तो उनका मूल रूप नहीं लिखा जाता, बल्कि उनके स्थान पर उनके चिह्न प्रयोग किए जाते हैं। इन्हीं चिह्नों को ‘मात्रा’ कहते हैं।
- ‘अ’ स्वर की कोई मात्रा नहीं होती; यह प्रत्येक व्यंजन में अंतर्निहित (inherent) होता है।
- उदाहरण: क् + आ = का ( ा ), क् + इ = कि ( ि )
| स्वर | मात्रा चिह्न | उदाहरण |
| अ | (कोई नहीं) | क + अ = क |
| आ | ा | क + आ = का |
| इ | ि | क + इ = कि |
| ई | ी | क + ई = की |
| उ | ु | क + उ = कु |
| ऊ | ू | क + ऊ = कू |
| ऋ | ृ | क + ऋ = कृ |
| ए | े | क + ए = के |
| ऐ | ै | क + ऐ = कै |
| ओ | ो | क + ओ = को |
| औ | ौ | क + औ = कौ |
स्वर ध्वनि की प्रमुख विशेषताएँ
1. स्वतंत्र उच्चारण (Independent Articulation):
- यह स्वर की सबसे आधारभूत और महत्वपूर्ण विशेषता है।
- स्वर ध्वनियों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से, बिना किसी अन्य ध्वनि (वर्ण) की सहायता के किया जा सकता है। इसके विपरीत, व्यंजनों का शुद्ध उच्चारण स्वरों की सहायता के बिना संभव नहीं है (जैसे- क् + अ = क)।
2. अबाध वायु-प्रवाह (Unobstructed Airflow):
- स्वरों के उच्चारण के समय फेफड़ों से निकलने वाली हवा मुख-विवर (oral cavity) में बिना किसी बाधा या रुकावट के बाहर निकल जाती है।
- हवा न तो पूरी तरह से रुकती ہے (स्पर्श व्यंजन की तरह), न ہی تنگ راستے سے رگڑ کھا کر نکلتی ہے (ऊष्म व्यंजन کی طرح)۔ زبان، ہونٹ یا منہ کا کوئی اور حصہ ہوا کے راستے میں رکاوٹ نہیں ڈالتا۔
3. घोष/सघोष ध्वनि (Voiced Sounds):
- सभी स्वर ‘घोष’ या ‘सघोष’ ध्वनियाँ होते हैं।
- इसका अर्थ है कि स्वरों के उच्चारण के समय हमारी स्वर-तंत्रियों (vocal cords) में कंपन (vibration) होता है। आप अपने गले पर हाथ रखकर ‘अ’ या ‘ई’ का लंबा उच्चारण करके इस कंपन को महसूस कर सकते हैं।
4. नाद और माधुर्य (Sonority and Musicality):
- अबाध वायु-प्रवाह और स्वर-तंत्रियों में कंपन के कारण स्वर ध्वनियाँ सुरीली, मधुर और संगीतात्मक होती हैं।
- ये ध्वनियाँ व्यंजनों की तुलना में अधिक देर तक गूँज सकती हैं, इसी गुण के कारण संगीत और गायन में स्वरों का विशेष महत्व है।
5. अक्षर (Syllable) का केंद्र:
- प्रत्येक स्वर एक अक्षर (syllable) का निर्माण करता है या अक्षर का केंद्र होता है।
- कोई भी शब्द बिना स्वर के नहीं बन सकता। प्रत्येक शब्द में कम से कम एक स्वर अवश्य होता है। एक शब्द में उतने ही अक्षर होते हैं, जितने उसमें स्वर होते हैं।
- उदाहरण: ‘क-म-ल’ में तीन अक्षर हैं क्योंकि इसमें तीन ‘अ’ स्वर हैं (क्+अ+म्+अ+ल्+अ)। ‘रा-म’ में दो अक्षर हैं (आ और अ)।
6. दीर्घ उच्चारण की क्षमता (Ability to be Prolonged):
- स्वरों को बिना उनकी गुणवत्ता बदले लंबे समय तक खींचा या उच्चरित किया जा सकता है।
- उदाहरण: आप ‘आ……’ या ‘ई……’ को काफी देर तक बोल सकते हैं, लेकिन ‘क्’ या ‘प्’ जैसी व्यंजन ध्वनियों को खींचना संभव नहीं है। यही कारण है कि किसी को पुकारने के लिए हमेशा स्वर का ही प्रयोग होता है (जैसे – राऽऽम !)।
7. मात्रा का वाहक (Carrier of Matra/Duration):
- केवल स्वर ध्वनियाँ ही मात्रा (duration) की वाहक होती हैं। मात्रा का अर्थ है उच्चारण में लगने वाला समय।
- इसी आधार पर स्वरों को ह्रस्व (कम समय), दीर्घ (अधिक समय) और प्लुत (बहुत अधिक समय) में वर्गीकृत किया जाता है। व्यंजनों में यह गुण नहीं पाया जाता।
8. वर्गीकरण का आधार (Basis of Classification):
- स्वरों का वर्गीकरण व्यंजनों से बिलकुल भिन्न आधारों पर होता है, जैसे:
- जिह्वा की स्थिति (आगे, मध्य या पीछे)।
- मुख के खुलने का स्तर (बंद, आधा बंद, खुला)।
- होंठों की गोलाई (वृत्ताकार या अवृत्ताकार)।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, स्वर ध्वनियाँ भाषा की वे आधारभूत, संगीतात्मक और स्वतंत्र ध्वनियाँ हैं, जो व्यंजनों को उच्चारण प्रदान करती हैं और शब्दों की संरचना का केंद्र होती हैं। उनका अबाध प्रवाह, घोष गुण और अक्षरों का निर्माण करने की क्षमता उन्हें भाषा की ध्वनि-प्रणाली में एक विशिष्ट और अनिवार्य स्थान दिलाती है।
2. अयोगवाह (Ayogvah) – (संख्या: 2)
ये न तो पूर्ण स्वर हैं और न ही पूर्ण व्यंजन, फिर भी ये अर्थ वहन करते हैं। इनका स्थान हमेशा स्वर के बाद आता है।
- अं (अनुस्वार): इसका चिह्न (ं) है। उच्चारण नाक से होता है। (उदा. – अंग, कंठ, हंस)
- अः (विसर्ग): इसका चिह्न (ः) है। उच्चारण लगभग ‘ह’ के समान होता है। (उदा. – अतः, प्रातः, दुःख)
- अनुनासिक/चंद्रबिंदु (ँ): यह भी एक नासिक्य ध्वनि है, लेकिन इसे अलग से वर्णमाला में नहीं गिना जाता, बल्कि इसे स्वर का ही एक गुण माना जाता है। (उदा. – चाँद, आँख)
संयुक्त स्वर (Compound Vowels)
परिभाषा:
वे स्वर जो दो भिन्न-भिन्न (विजातीय) स्वरों के मेल या संयोग से बनते हैं, संयुक्त स्वर कहलाते हैं। इनका निर्माण एक ही जैसे स्वरों (सजातीय स्वरों) के योग से नहीं होता, बल्कि दो अलग-अलग उच्चारण स्थान वाले स्वरों को मिलाकर होता है।
हिन्दी वर्णमाला में कुल 4 संयुक्त स्वर हैं:
- ए (e)
- ऐ (ai)
- ओ (o)
- औ (au)
ये चारों स्वर दीर्घ स्वर की श्रेणी में भी आते हैं क्योंकि इनके उच्चारण में ह्रस्व स्वरों की तुलना में दोगुना समय लगता है।
संयुक्त स्वरों का निर्माण (Formation of Compound Vowels)
इनका निर्माण कैसे होता है, यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यही हिन्दी की गुण संधि और वृद्धि संधि का आधार है।
1. ए (e)
- संरचना: अ + इ = ए
- उच्चारण स्थान:
- अ का उच्चारण स्थान = कंठ (Throat)
- इ का उच्चारण स्थान = तालु (Palate)
- इसलिए, ‘ए’ का उच्चारण स्थान कंठ-तालव्य (Guttural-Palatal) होता है।
- उदाहरण (गुण संधि):
- नर + इंद्र = नरेंद्र (अ + इ = ए)
- महा + ईश = महेश (आ + ई = ए)
2. ऐ (ai)
- संरचना: अ + ए = ऐ
- उच्चारण स्थान:
- अ का उच्चारण स्थान = कंठ (Throat)
- ए का उच्चारण स्थान = कंठ-तालव्य (Guttural-Palatal)
- इसलिए, ‘ऐ’ का उच्चारण स्थान भी कंठ-तालव्य (Guttural-Palatal) ही होता है।
- उदाहरण (वृद्धि संधि):
- एक + एक = एकैक (अ + ए = ऐ)
- सदा + एव = सदैव (आ + ए = ऐ)
3. ओ (o)
- संरचना: अ + उ = ओ
- उच्चारण स्थान:
- अ का उच्चारण स्थान = कंठ (Throat)
- उ का उच्चारण स्थान = ओष्ठ (Lips)
- इसलिए, ‘ओ’ का उच्चारण स्थान कंठोष्ठ्य (Guttural-Labial) होता है।
- उदाहरण (गुण संधि):
- सूर्य + उदय = सूर्योदय (अ + उ = ओ)
- महा + उत्सव = महोत्सव (आ + उ = ओ)
4. औ (au)
- संरचना: अ + ओ = औ
- उच्चारण स्थान:
- अ का उच्चारण स्थान = कंठ (Throat)
- ओ का उच्चारण स्थान = कंठोष्ठ्य (Guttural-Labial)
- इसलिए, ‘औ’ का उच्चारण स्थान भी कंठोष्ठ्य (Guttural-Labial) ही होता है।
- उदाहरण (वृद्धि संधि):
- वन + औषधि = वनौषधि (अ + ओ = औ)
- महा + औषध = महौषध (आ + ओ = औ)
मूल दीर्घ स्वर और संयुक्त स्वर में अंतर
यह समझना महत्वपूर्ण है कि सभी दीर्घ स्वर संयुक्त नहीं होते।
| श्रेणी | वर्ण | निर्माण | प्रकृति |
| मूल दीर्घ स्वर | आ, ई, ऊ | सजातीय स्वरों के योग से<br>(अ+अ=आ, इ+इ=ई, उ+उ=ऊ) | ये सजातीय हैं |
| संयुक्त दीर्घ स्वर | ए, ऐ, ओ, औ | विजातीय (भिन्न) स्वरों के योग से<br>(अ+इ=ए, अ+उ=ओ) | ये विजातीय हैं |
सारांश सारणी
| संयुक्त स्वर | निर्माण | उच्चारण स्थान |
| ए | अ/आ + इ/ई | कंठ-तालव्य |
| ऐ | अ/आ + ए/ऐ | कंठ-तालव्य |
| ओ | अ/आ + उ/ऊ | कंठोष्ठ्य |
| औ | अ/आ + ओ/औ | कंठोष्ठ्य |
निष्कर्ष
संयुक्त स्वर वे विशेष दीर्घ स्वर हैं जो दो अलग-अलग ध्वनियों के मिलने से एक नई और एकल ध्वनि का निर्माण करते हैं। इनकी संरचना को समझना हिन्दी व्याकरण में संधि जैसे महत्वपूर्ण अध्यायों को आसानी से समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
2. अनुस्वार (Anuswar)
परिभाषा:
अनुस्वार (ं) एक नासिक्य ध्वनि (nasal sound) है जिसका उच्चारण केवल नाक से होता है और इसकी ध्वनि थोड़ी तीव्र और स्पष्ट होती है। यह अयोगवाह कहलाता है क्योंकि यह न तो स्वर है और न ही व्यंजन, पर स्वर के बाद आता है।
- चिह्न: शिरोरेखा के ऊपर एक बिंदी (ं)।
- उच्चारण: इसका उच्चारण अगले व्यंजन के वर्ग के पंचम वर्ण/पंचमाक्षर (ङ, ञ, ण, न, म) के समान होता है।
- नियम:
- ‘क’ वर्ग से पहले → ‘ङ्’ (जैसे- कङ्कण → कंकन)
- ‘च’ वर्ग से पहले → ‘ञ्’ (जैसे- चञ्चल → चंचल)
- ‘ट’ वर्ग से पहले → ‘ण्’ (जैसे- कण्ठ → कंठ)
- ‘त’ वर्ग से पहले → ‘न्’ (जैसे- दन्त → दंत)
- ‘प’ वर्ग से पहले → ‘म्’ (जैसे- चम्पा → चंपा)
- नियम:
- उदाहरण: हंस, पंखा, गंगा, चंचल, ठंडा, अंत, चंपा।
3. अनुनासिक (Anunasik)
परिभाषा:
अनुनासिक (ँ) भी एक नासिक्य ध्वनि है, लेकिन इसका उच्चारण नाक और मुँह दोनों से समान दबाव के साथ किया जाता है। इसकी ध्वनि कोमल और गहरी होती है। इसे चंद्रबिंदु भी कहते हैं। यह स्वर का एक गुण है, अलग वर्ण नहीं।
- चिह्न: शिरोरेखा के ऊपर चंद्रबिंदु (ँ)।
- नियम: जब शिरोरेखा के ऊपर कोई मात्रा न हो, तब चंद्रबिंदु (ँ) का प्रयोग होता है। लेकिन जब शिरोरेखा के ऊपर मात्रा लगी हो (जैसे- े, ै, ी, ो), तो जगह की कमी के कारण चंद्रबिंदु की जगह केवल बिंदी (अनुस्वार) का ही प्रयोग किया जाता है, पर उच्चारण अनुनासिक का ही होता है।
- उदाहरण (बिना मात्रा के): चाँद, आँख, गाँव, साँप, पाँच, हँसना।
- उदाहरण (मात्रा के साथ, उच्चारण अनुनासिक): मैं (उच्चारण ‘मैं’ है, ‘मैंन्’ नहीं), ईंट, गोंद, भौंकना।
अनुस्वार और अनुनासिक में मुख्य अंतर:
- अनुस्वार (ं): केवल नाक से ध्वनि। (जैसे- हंस)
- अनुनासिक (ँ): नाक और मुँह दोनों से ध्वनि। (जैसे- हँस)
- ‘हंस’ (एक पक्षी) और ‘हँस’ (हँसने की क्रिया) – दोनों शब्दों के अर्थ में भी अंतर आ जाता है।
4. विसर्ग (Visarg)
परिभाषा:
विसर्ग (ः) भी एक अयोगवाह ध्वनि है। इसका उच्चारण आधे ‘ह’ के समान होता है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से संस्कृत के तत्सम शब्दों में होता है।
- चिह्न: वर्ण के आगे दो बिंदियाँ (ः)।
- उच्चारण: जिस स्वर के बाद विसर्ग लगता है, उसी स्वर के साथ ‘ह’ की ध्वनि जुड़ जाती है। (जैसे- ‘अ:’ का उच्चारण ‘अह्’)।
- उदाहरण:
- प्रातः (प्रातह्)
- अतः (अतह्)
- पुनः (पुनह्)
- दुःख (दुह्ख)
- निःशुल्क (निह्शुल्क)
5. नासिक्य वर्ण / पंचमाक्षर (Nasal Letters / Panchamakshar)
परिभाषा:
नासिक्य वर्ण वे व्यंजन हैं जिनका उच्चारण मुख के साथ-साथ नाक (नासिका) की सहायता से भी होता है। हिन्दी वर्णमाला के प्रत्येक स्पर्श व्यंजन वर्ग (क, च, ट, त, प) का पाँचवाँ और अंतिम वर्ण नासिक्य वर्ण कहलाता है। इसीलिए इन्हें पंचमाक्षर भी कहते हैं।
ये 5 नासिक्य व्यंजन हैं:
- ङ (ṅa): क-वर्ग का नासिक्य (जैसे- वाङ्मय, दिङ्नाग)
- ञ (ña): च-वर्ग का नासिक्य (जैसे- वाञ्छनीय, चञ्चल)
- ण (ṇa): ट-वर्ग का नासिक्य (जैसे- कण्ठ, घण्टा)
- न (na): त-वर्ग का नासिक्य (जैसे- अन्त, हिन्दी)
- म (ma): प-वर्ग का नासिक्य (जैसे- सम्भव, अम्बा)
आधुनिक प्रयोग:
आधुनिक हिन्दी लेखन में मानकीकरण के नियम के अनुसार, जब पंचमाक्षर अपने ही वर्ग के किसी व्यंजन के साथ आता है, तो उसकी जगह पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग करने की सुविधा दी गई है। जैसे ‘हिन्दी’ को ‘हिंदी’ और ‘गङ्गा’ को ‘गंगा’ लिखना। लेकिन यह जानना महत्वपूर्ण है कि उस अनुस्वार का वास्तविक उच्चारण संबंधित पंचमाक्षर का ही होता है।
ट्रिक 1: व्यंजनों के पाँचों वर्ग (क, च, ट, त, प) याद करने की ट्रिक
याद रखें ये मज़ेदार वाक्य: “कचट-तप”
यह एक ही शब्द है जिसमें पाँचों वर्गों का पहला अक्षर क्रम से है:
- क → क-वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ)
- च → च-वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ)
- ट → ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण)
- त → त-वर्ग (त, थ, द, ध, न)
- प → प-वर्ग (प, फ, ब, भ, म)
बस “कचटतप” शब्द को याद कर लें, आपको पाँचों वर्ग क्रम से याद हो जाएँगे।
ट्रिक 2: उच्चारण स्थान याद करने की शानदार ट्रिक
अपने गले से होठों की तरफ के क्रम में उच्चारण स्थान याद करें।
ट्रिक-वाक्य: “एक तो मुर्गा दाँत-ओंठ पर” या एक सरल वाक्य “K T M दो (KTM DO)”
इस वाक्य के अक्षरों को “कचटतप” के क्रम से जोड़ दें:
| कचटतप (वर्ग) | KTM DO (उच्चारण स्थान) |
| क-वर्ग (क) | K – कंठ (गला) |
| च-वर्ग (च) | T – तालु (गले के ऊपर) |
| ट-वर्ग (ट) | M – मूर्धा (मुँह का ऊपरी छत) |
| त-वर्ग (त) | D – दंत (दाँत) |
| प-वर्ग (प) | O – ओष्ठ (होंठ) |
कैसे काम करता है:
- क वर्ग के सभी अक्षर कंठ से बोले जाते हैं (सबसे अंदर)।
- च वर्ग के सभी अक्षर तालु से (थोड़ा बाहर)।
- ट वर्ग के सभी अक्षर मूर्धा से (मुँह की छत से)।
- त वर्ग के सभी अक्षर दंत (दाँत) से (जीभ दाँतों को छूती है)।
- प वर्ग के सभी अक्षर ओष्ठ (होंठ) से (होंठ आपस में मिलते हैं, सबसे बाहर)।
ट्रिक 3: अल्पप्राण और महाप्राण पहचानने की गणितीय ट्रिक
प्राण = श्वास (साँस)
- अल्पप्राण: कम साँस लगे (बोलने में कम हवा निकले)।
- महाप्राण: ज्यादा साँस लगे (बोलने में ज्यादा हवा ‘h’ ध्वनि के साथ निकले)।
गणितीय नियम: अल्पप्राण = 1, 3, 5 और महाप्राण = 2, 4
प्रत्येक वर्ग (क, च, ट, त, प) के लिए यह नियम लागू करें:
- वर्ग का पहला, तीसरा, पाँचवाँ अक्षर = अल्पप्राण।
- वर्ग का दूसरा और चौथा अक्षर = महाप्राण।
| 1. अल्पप्राण | 2. महाप्राण | 3. अल्पप्राण | 4. महाप्राण | 5. अल्पप्राण |
| क | ख (kha) | ग | घ (gha) | ङ |
| च | छ (cha) | ज | झ (jha) | ञ |
| ट | ठ (tha) | ड | ढ (dha) | ण |
साथ में यह भी याद रखें:
- सभी स्वर (अ,आ…) → अल्पप्राण होते हैं।
- अंतःस्थ (य, र, ल, व) → अल्पप्राण होते हैं (नरम ध्वनियाँ)।
- ऊष्म (श, ष, स, ह) → महाप्राण होते हैं (हवा निकलती है)।
सरल ट्रिक: जिन व्यंजनों के अंग्रेजी उच्चारण में ‘h’ लगता है, वे अक्सर महाप्राण होते हैं (जैसे – kh, gh, ch(h), jh, th, dh)।
ट्रिक 4: सघोष (घोष) और अघोष पहचानने की ट्रिक
घोष = नाद/कंपन
- अघोष (No Vibration): जिनके उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कंपन नहीं होता।
- सघोष/घोष (Vibration): जिनके उच्चारण में कंपन होता है।
गणितीय नियम: अघोष = 1, 2 और सघोष = 3, 4, 5
प्रत्येक वर्ग के लिए यह नियम लागू करें:
- वर्ग का पहला और दूसरा अक्षर = अघोष।
- वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ अक्षर = सघोष।
| 1. अघोष | 2. अघोष | 3. सघोष | 4. सघोष | 5. सघोष |
| क | ख | ग | घ | ङ |
| च | छ | ज | झ | ञ |
साथ में यह भी याद रखें:
- सभी स्वर (अ,आ…) → सघोष होते हैं (गाते समय कंपन होता है)।
- अंतःस्थ (य, र, ल, व) → सघोष होते हैं (नरम ध्वनियाँ कंपन करती हैं)।
- ऊष्म में: ‘श, ष, स’ → अघोष (केवल हवा की ध्वनि) और ‘ह’ → सघोष (कंपन के साथ)। ‘ह’ एकमात्र अपवाद है जिसे याद रखना है।
सब कुछ एक टेबल में (SUPER TRICK TABLE)
बस इस टेबल को दिमाग में बिठा लें:
| 1 (क, च…) | 2 (ख, छ…) | 3 (ग, ज…) | 4 (घ, झ…) | 5 (ङ, ञ…) | |
| घोषत्व | अघोष | अघोष | सघोष | सघोष | सघोष |
| प्राणत्व | अल्पप्राण | महाप्राण | अल्पप्राण | महाप्राण | अल्पप्राण |
| याद करने का तरीका | शुरुआत कठोर (अघोष) और अंत मधुर (सघोष) | एक छोड़कर एक महाप्राण |
इन ट्रिक्स को एक या दो बार अभ्यास करें, और हिन्दी वर्णमाला का यह कठिन लगने वाला अध्याय आपको हमेशा के लिए याद हो जाएगा
3. व्यंजन (Consonants)
क) स्पर्श व्यंजन (Sparsh Vyanjan) – (संख्या: 25)
जिनके उच्चारण में जीभ मुख के अलग-अलग हिस्सों (कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ) को स्पर्श करती है। इन्हें पाँच वर्गों में बांटा गया है, और प्रत्येक वर्ग के अंतिम वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) को नासिक्य/पंचमाक्षर कहते हैं।
- क-वर्ग: क, ख, ग, घ, ङ (कंठ्य – Throat)
- च-वर्ग: च, छ, ज, झ, ञ (तालव्य – Palate)
- ट-वर्ग: ट, ठ, ड, ढ, ण (मूर्धन्य – Roof of the mouth)
- त-वर्ग: त, थ, द, ध, न (दंत्य – Teeth)
- प-वर्ग: प, फ, ब, भ, म (ओष्ठ्य – Lips)
ख) अंतःस्थ व्यंजन (Antasth Vyanjan) – (संख्या: 4)
इनका उच्चारण स्वर और व्यंजन के बीच का-सा होता है। जीभ मुख के किसी भाग को पूरी तरह स्पर्श नहीं करती।
- य, र, ल, व
ग) ऊष्म व्यंजन (Ushm Vyanjan) – (संख्या: 4)
इनके उच्चारण में मुख से हवा रगड़ खाकर निकलती है, जिससे ऊष्मा (गर्मी) पैदा होती है।
- श, ष, स, ह
घ) उत्क्षिप्त / द्विगुण व्यंजन (Utkshipt / Dwigun Vyanjan) – (संख्या: 2)
इनके उच्चारण में जीभ ऊपर उठकर झटके के साथ नीचे आती है। ये हिन्दी के अपने विकसित व्यंजन हैं। इनसे कोई शब्द शुरू नहीं होता।
- ड़ (जैसे – सड़क, घोड़ा)
- ढ़ (जैसे – पढ़ना, चढ़ना)
ङ) संयुक्त व्यंजन (Sanyukt Vyanjan) – (संख्या: 4)
ये दो व्यंजनों के मेल से बनते हैं।
- क्ष = क् + ष (जैसे – क्षमा, रक्षा)
- त्र = त् + र (जैसे – पत्र, त्रिशूल)
- ज्ञ = ज् + ञ (जैसे – ज्ञान, विज्ञान) (उच्चारण ‘ग्य’ जैसा होता है)
- श्र = श् + र (जैसे – श्रम, श्री)
आगत (गृहीत) ध्वनियाँ (Adopted Sounds):
हिन्दी ने कुछ विदेशी भाषाओं (अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी) से भी कुछ ध्वनियों को अपनाया है, जिन्हें वर्णमाला में सीधे तौर पर शामिल नहीं किया जाता, पर लेखन में प्रयोग होता है। इनके नीचे बिंदी (नुक्ता) लगाई जाती है।
- क़, ख़, ग़, ज़, फ़ (अरबी-फारसी से)
- ऑ (आ और ओ के बीच की ध्वनि): (अंग्रेज़ी से, जैसे – डॉक्टर, कॉलेज)
द्वित्व व्यंजन वाले कुछ शब्द हैं ‘बच्चा’ (च्+च), ‘अम्मा’ (म्+म), ‘कुत्ता’ (त्+त), ‘दिल्ली’ (ल्+ल), ‘सिक्का’ (क्+क), और ‘गद्दा’ (द्+द)। द्वित्व व्यंजन तब बनता है जब एक ही व्यंजन दो बार प्रयोग होता है, जिनमें से एक आधा और दूसरा पूरा होता है।
उदाहरण:
- क वर्ग से: कच्चा, मक्का, पक्का, शक्कर
- च वर्ग से: बच्चा, अच्छा, चक्की
- ट वर्ग से: पत्ता, लट्टू, गत्ता
- त वर्ग से: पत्ता, कुत्ता, गत्ता
- न वर्ग से: गन्ना, अन्न, प्रसन्न
- प वर्ग से: अम्मा, गुब्बारा
- ल वर्ग से: बिल्ली, उल्लू, पिल्ला
- स वर्ग से: रस्सी
- ड वर्ग से: लड्डू, गद्दा
समझने के लिए मुख्य बिंदु:
- समान व्यंजन: द्वित्व व्यंजन में दो समान व्यंजन साथ-साथ आते हैं।
- आधा और पूरा: पहले व्यंजन का रूप आधा (हलन्त) होता है और दूसरा व्यंजन पूरा होता है।
- उदाहरण: जब आप ‘बच्चा’ बोलते हैं, तो ‘च्’ (आधा च) और ‘च’ (पूरा च) की ध्वनि आती है, और इसी तरह अन्य द्वित्व व्यंजनों में भी होता है।
उच्चारण स्थान (Place of Articulation)
परिभाषा:
मुख के जिस भाग से किसी ध्वनि (वर्ण) का उच्चारण किया जाता है, उस भाग को उस ध्वनि का ‘उच्चारण स्थान’ कहते हैं। फेफड़ों से निकलने वाली हवा मुख के इन भागों से टकराकर या उनमें परिवर्तन करके भिन्न-भिन्न ध्वनियों को जन्म देती है।
हिन्दी ध्वनियों का उच्चारण स्थान के अनुसार वर्गीकरण
हिन्दी की ध्वनियों (स्वर और व्यंजन) को उनके उच्चारण स्थानों के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है:
1. कंठ्य (Guttural)
जिन ध्वनियों का उच्चारण कंठ (गले) से होता है।
- सूत्र (याद रखने के लिए): “अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः” (अ, क-वर्ग, ह, और विसर्ग का स्थान कंठ है)।
- वर्ण:
- स्वर: अ, आ
- व्यंजन: क, ख, ग, घ, ङ (क-वर्ग)
- ऊष्म: ह
- अयोगवाह: अः (विसर्ग)
2. तालव्य (Palatal)
जिन ध्वनियों का उच्चारण जीभ के तालु (मुँह के भीतर की छत का अगला हिस्सा) को स्पर्श करने से होता है।
- सूत्र: “इचुयशानां तालुः” (इ, च-वर्ग, य, और श का स्थान तालु है)।
- वर्ण:
- स्वर: इ, ई
- व्यंजन: च, छ, ज, झ, ञ (च-वर्ग)
- अंतःस्थ: य
- ऊष्म: श
3. मूर्धन्य (Retroflex)
जिन ध्वनियों का उच्चारण जीभ के अगले भाग द्वारा मूर्धा (मुँह के भीतर की छत का पिछला, कठोर हिस्सा) को स्पर्श करने से होता है।
- सूत्र: “ऋटुरषाणां मूर्धा” (ऋ, ट-वर्ग, र, और ष का स्थान मूर्धा है)।
- वर्ण:
- स्वर: ऋ
- व्यंजन: ट, ठ, ड, ढ, ण (ट-वर्ग)
- उत्क्षिप्त: ड़, ढ़
- अंतःस्थ: र
- ऊष्म: ष
4. दंत्य (Dental)
जिन ध्वनियों का उच्चारण जीभ के अग्र भाग के ऊपरी दाँतों को स्पर्श करने से होता है।
- सूत्र: “लृतुलसानां दन्ताः” (लृ, त-वर्ग, ल, और स का स्थान दंत है)।
- वर्ण:
- (स्वर ‘लृ’ संस्कृत में होता है, हिन्दी में नहीं)
- व्यंजन: त, थ, द, ध, न (त-वर्ग)
- अंतःस्थ: ल
- ऊष्म: स
5. ओष्ठ्य (Labial)
जिन ध्वनियों का उच्चारण दोनों होंठों (ओष्ठों) के मिलने से होता है।
- सूत्र: “उपूपध्मानीयानामोष्ठौ” (उ, और प-वर्ग का स्थान ओष्ठ है)।
- वर्ण:
- स्वर: उ, ऊ
- व्यंजन: प, फ, ब, भ, म (प-वर्ग)
संयुक्त उच्चारण स्थान वाली ध्वनियाँ
कुछ ध्वनियाँ ऐसी हैं जिनका उच्चारण मुख के दो भागों के संयोग से होता है।
6. कंठ-तालव्य (Guttural-Palatal)
जिनका उच्चारण कंठ और तालु, दोनों की सहायता से होता है।
- वर्ण:
- स्वर: ए (अ+इ), ऐ (अ+ए)
7. कंठोष्ठ्य (Guttural-Labial)
जिनका उच्चारण कंठ और होंठ, दोनों की सहायता से होता है।
- वर्ण:
- स्वर: ओ (अ+उ), औ (अ+ओ)
8. दंतोष्ठ्य (Denti-Labial)
जिनका उच्चारण ऊपरी दाँत और निचले होंठ के मिलने से होता है।
- वर्ण:
- व्यंजन: व
9. नासिक्य (Nasal)
जिन ध्वनियों के उच्चारण में हवा मुख के साथ-साथ नाक से भी बाहर निकलती है।
- वर्ण:
- व्यंजन (पंचमाक्षर): ङ, ञ, ण, न, म
- अयोगवाह: अं (अनुस्वार)
- स्वर का गुण: ँ (अनुनासिक)
10. वर्त्स्य (Alveolar) – एक विशिष्ट श्रेणी
कुछ भाषाविद् कुछ दंत्य ध्वनियों को वर्त्स्य (मसूड़ा) की श्रेणी में रखते हैं क्योंकि इनके उच्चारण में जीभ ऊपरी दाँतों के ठीक पीछे के कठोर मसूड़े को छूती है।
- वर्ण: न, स, ल, र (ये दंत्य या मूर्धन्य में भी गिने जाते हैं)।
उच्चारण स्थानों की सारणी
| क्र. सं. | उच्चारण स्थान का नाम | उच्चारण में सहायक अंग | उच्चारित वर्ण |
| 1. | कंठ्य | कंठ (गला) | अ, आ, क-वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), ह, अः |
| 2. | तालव्य | तालु और जीभ | इ, ई, च-वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ), य, श |
| 3. | मूर्धन्य | मूर्धा और जीभ | ऋ, ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण), ड़, ढ़, र, ष |
| 4. | दंत्य | दाँत और जीभ | त-वर्ग (त, थ, द, ध, न), ल, स |
| 5. | ओष्ठ्य | दोनों होंठ | उ, ऊ, प-वर्ग (प, फ, ब, भ, म) |
| 6. | कंठ-तालव्य | कंठ और तालु | ए, ऐ |
| 7. | कंठोष्ठ्य | कंठ और होंठ | ओ, औ |
| 8. | दंतोष्ठ्य | दाँत और होंठ | व |
| 9. | नासिक्य | नाक और मुख | ङ, ञ, ण, न, म, अं, अँ |
उच्चारण प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण
‘उच्चारण प्रयत्न’ का अर्थ है किसी ध्वनि (वर्ण) को बोलने के लिए मुख के अंगों द्वारा किया जाने वाला प्रयास या यत्न। जब हम व्यंजन बोलते हैं, तो हमारे मुख के अंग (जैसे- जीभ, होंठ, तालु) और स्वर-तंत्रियाँ कई तरह के प्रयास करती हैं।
उच्चारण प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों को मुख्य रूप से दो प्रमुख भागों में बाँटा जाता है:
- अभ्यंतर प्रयत्न (Internal Effort): ध्वनि के उच्चारण से ठीक पहले मुख के भीतर होने वाला प्रयत्न।
- बाह्य प्रयत्न (External Effort): ध्वनि के उच्चारण के समय होने वाले बाहरी प्रयत्न (जैसे – श्वास का प्रयोग, कंपन)।
हिन्दी में बाह्य प्रयत्न के आधार पर किया गया वर्गीकरण अधिक प्रचलित और महत्वपूर्ण है।
A. बाह्य प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण
बाह्य प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के दो मुख्य भेद हैं:
1. श्वास-वायु (प्राण) की मात्रा के आधार पर
2. स्वर-तंत्रियों में कंपन (नाद/घोष) के आधार पर
1. श्वास-वायु (प्राण) की मात्रा के आधार पर
इसका अर्थ है कि व्यंजन के उच्चारण में कितनी मात्रा में हवा (श्वास) फेफड़ों से बाहर निकलती है।
- क) अल्पप्राण व्यंजन (Unaspirated Consonants):
- परिभाषा: जिन व्यंजनों के उच्चारण में मुख से कम मात्रा में श्वास-वायु बाहर निकलती है, उन्हें अल्पप्राण कहते हैं। इनके उच्चारण में ‘हकार’ (h-sound) जैसी ध्वनि नहीं होती।
- कौन से हैं?
- प्रत्येक स्पर्श व्यंजन वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवाँ वर्ण (1, 3, 5)।
- सभी अंतःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व)।
- कुल संख्या: 19 (15 स्पर्श + 4 अंतःस्थ)
- वर्ण:
- क, ग, ङ
- च, ज, ञ
- ट, ड, ण
- त, द, न
- प, ब, म
- य, र, ल, व
- ख) महाप्राण व्यंजन (Aspirated Consonants):
- परिभाषा: जिन व्यंजनों के उच्चारण में मुख से अधिक मात्रा में श्वास-वायु बाहर निकलती है और एक ‘हकार’ (h-sound) जैसी ध्वनि सुनाई देती है, उन्हें महाप्राण कहते हैं।
- कौन से हैं?
- प्रत्येक स्पर्श व्यंजन वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण (2, 4)।
- सभी ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह)।
- कुल संख्या: 14 (10 स्पर्श + 4 ऊष्म)
- वर्ण:
- ख, घ
- छ, झ
- ठ, ढ
- थ, ध
- फ, भ
- श, ष, स, ह
- ट्रिक: जिनकी अंग्रेजी स्पेलिंग में प्रायः ‘h’ आता है (kh, gh, th, dh, sh…), वे महाप्राण होते हैं।
2. स्वर-तंत्रियों में कंपन (नाद/घोष) के आधार पर
इसका अर्थ है कि व्यंजन के उच्चारण के समय गले में स्थित स्वर-तंत्रियों (vocal cords) में कंपन होता है या नहीं।
- क) अघोष व्यंजन (Unvoiced Consonants):
- परिभाषा: जिन व्यंजनों के उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कंपन नहीं होता, उन्हें अघोष कहते हैं। इनमें केवल श्वास का उपयोग होता है।
- कौन से हैं?
- प्रत्येक स्पर्श व्यंजन वर्ग का पहला और दूसरा वर्ण (1, 2)।
- ऊष्म व्यंजन: श, ष, स।
- कुल संख्या: 13 (10 स्पर्श + 3 ऊष्म)
- वर्ण:
- क, ख
- च, छ
- ट, ठ
- त, थ
- प, फ
- श, ष, स
- ख) घोष / सघोष व्यंजन (Voiced Consonants):
- परिभाषा: जिन व्यंजनों के उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कंपन होता है, उन्हें घोष या सघोष कहते हैं।
- कौन से हैं?
- प्रत्येक स्पर्श व्यंजन वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ वर्ण (3, 4, 5)।
- सभी अंतःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व)।
- ऊष्म व्यंजन: ह।
- (इसके अतिरिक्त, सभी स्वर भी सघोष होते हैं)।
- कुल संख्या (केवल व्यंजन): 20 (15 स्पर्श + 4 अंतःस्थ + 1 ऊष्म)
- वर्ण:
- ग, घ, ङ
- ज, झ, ञ
- ड, ढ, ण
- द, ध, न
- ब, भ, म
- य, र, ल, व
- ह
- नोट: उत्क्षिप्त व्यंजन ‘ड़’ अल्पप्राण-सघोष है और ‘ढ़’ महाप्राण-सघोष है।
B. अभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण (संक्षिप्त)
यह वर्गीकरण मुख्य रूप से संस्कृत व्याकरण में अधिक प्रयोग होता है, पर हिन्दी में भी इसे समझा जा सकता है। यह बताता है कि ध्वनि उत्पन्न होने से पहले मुख के अंदर क्या-क्या प्रयास होते हैं।
- स्पर्शी: हवा उच्चारण स्थान को स्पर्श करके झटके से बाहर निकलती है (क, ट, त, प वर्गों के पहले चार वर्ण)।
- स्पर्श-संघर्षी: स्पर्श के बाद हवा घर्षण के साथ निकलती है (च, छ, ज, झ)।
- संघर्षी (ऊष्म): मुखांग इतने निकट आ जाते हैं कि हवा रगड़ या घर्षण के साथ निकलती है (श, ष, स, ह, ज़, फ़)।
- नासिक्य: हवा मुख के साथ-साथ नाक से भी निकलती है (ङ, ञ, ण, न, म)।
- पार्श्विक: हवा जीभ के बगल (पार्श्व) से निकलती है (ल)।
- प्रकंपित / लुंठित: जीभ में कंपन या लुढ़कन होती है (र)।
- उत्क्षिप्त: जीभ नोक को ऊपर उठाकर झटके से नीचे फेंकती है (ड़, ढ़)।
- अर्ध-स्वर: जो लगभग स्वरों की तरह उच्चारित होते हैं, हवा बिना घर्षण के निकलती है (य, व)।
उच्चारण प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण (सारणी)
यह सारणी बाह्य प्रयत्न (श्वास-वायु और स्वर-तंत्रियों में कंपन) पर आधारित है, जो हिन्दी व्याकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
| वर्ग | वर्ण | अघोष / सघोष? (कंपन) | अल्पप्राण / महाप्राण? (श्वास-वायु) | उच्चारण स्थान |
| क-वर्ग | क | अघोष (1) | अल्पप्राण (1) | कंठ्य |
| ख | अघोष (2) | महाप्राण (2) | कंठ्य | |
| ग | सघोष (3) | अल्पप्राण (3) | कंठ्य | |
| घ | सघोष (4) | महाप्राण (4) | कंठ्य | |
| ङ | सघोष (5) | अल्पप्राण (5) | कंठ्य/नासिक्य | |
| — | — | — | — | — |
| च-वर्ग | च | अघोष (1) | अल्पप्राण (1) | तालव्य |
| छ | अघोष (2) | महाप्राण (2) | तालव्य | |
| ज | सघोष (3) | अल्पप्राण (3) | तालव्य | |
| झ | सघोष (4) | महाप्राण (4) | तालव्य | |
| ञ | सघोष (5) | अल्पप्राण (5) | तालव्य/नासिक्य | |
| — | — | — | — | — |
| ट-वर्ग | ट | अघोष (1) | अल्पप्राण (1) | मूर्धन्य |
| ठ | अघोष (2) | महाप्राण (2) | मूर्धन्य | |
| ड | सघोष (3) | अल्पप्राण (3) | मूर्धन्य | |
| ढ | सघोष (4) | महाप्राण (4) | मूर्धन्य | |
| ण | सघोष (5) | अल्पप्राण (5) | मूर्धन्य/नासिक्य | |
| — | — | — | — | — |
| त-वर्ग | त | अघोष (1) | अल्पप्राण (1) | दंत्य |
| थ | अघोष (2) | महाप्राण (2) | दंत्य | |
| द | सघोष (3) | अल्पप्राण (3) | दंत्य | |
| ध | सघोष (4) | महाप्राण (4) | दंत्य | |
| न | सघोष (5) | अल्पप्राण (5) | दंत्य/नासिक्य | |
| — | — | — | — | — |
| प-वर्ग | प | अघोष (1) | अल्पप्राण (1) | ओष्ठ्य |
| फ | अघोष (2) | महाप्राण (2) | ओष्ठ्य | |
| ब | सघोष (3) | अल्पप्राण (3) | ओष्ठ्य | |
| भ | सघोष (4) | महाप्राण (4) | ओष्ठ्य | |
| म | सघोष (5) | अल्पप्राण (5) | ओष्ठ्य/नासिक्य | |
| — | — | — | — | — |
| अंतःस्थ | य | सघोष | अल्पप्राण | तालव्य |
| र | सघोष | अल्पप्राण | मूर्धन्य/वर्त्स्य | |
| ल | सघोष | अल्पप्राण | दंत्य/वर्त्स्य | |
| व | सघोष | अल्पप्राण | दंतोष्ठ्य | |
| — | — | — | — | — |
| ऊष्म | श | अघोष | महाप्राण | तालव्य |
| ष | अघोष | महाप्राण | मूर्धन्य | |
| स | अघोष | महाप्राण | दंत्य/वर्त्स्य | |
| ह | सघोष | महाप्राण | कंठ्य (स्वरयंत्रीय) | |
| — | — | — | — | — |
| उत्क्षिप्त | ड़ | सघोष | अल्पप्राण | मूर्धन्य |
| ढ़ | सघोष | महाप्राण | मूर्धन्य | |
| — | — | — | — | — |
| नोट | सभी स्वर | सघोष | अल्पप्राण | (भिन्न-भिन्न) |
ट्रिक के साथ संक्षिप्त सारणी (Easy-to-Remember Summary Table)
| प्रयत्न | वर्ण |
| अघोष (No Vibration) | प्रत्येक वर्ग का 1, 2 वर्ण + श, ष, स (कुल 13) |
| सघोष (Vibration) | प्रत्येक वर्ग का 3, 4, 5 वर्ण + य, र, ल, व, ह + सभी स्वर |
| अल्पप्राण (Less Air) | प्रत्येक वर्ग का 1, 3, 5 वर्ण + य, र, ल, व + सभी स्वर |
| महाप्राण (More Air) | प्रत्येक वर्ग का 2, 4 वर्ण + श, ष, स, ह (कुल 14) |
निष्कर्ष
हिन्दी की वर्णमाला अपने वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित वर्गीकरण के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। इसका प्रत्येक वर्ण एक विशिष्ट ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है, जो इसे सीखने और सिखाने में अत्यंत सुगम बनाता है। यह वर्णमाला भारत की भाषाई विविधता और उसके ऐतिहासिक विकास का प्रतीक है।
बारहखड़ी (Barahkhadi)
परिभाषा:
बारहखड़ी, देवनागरी लिपि और अन्य भारतीय लिपियों में व्यंजनों और स्वरों के संयोग (मेल) से बनने वाले अक्षरों के क्रमबद्ध समूह को कहते हैं। इसमें प्रत्येक व्यंजन के साथ बारह (या उससे अधिक) स्वरों (मात्राओं) को लगाकर उसके विभिन्न रूपों को दर्शाया जाता है।
यह वर्णमाला सीखने और शब्दों का सही उच्चारण करने का एक बुनियादी और परंपरागत तरीका है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों को यह सिखाना है कि व्यंजनों पर मात्राएँ कैसे लगाई जाती हैं और उनका उच्चारण कैसे बदलता है।
“बारहखड़ी” नाम “बारह अक्षरों की लड़ी (श्रृंखला)” से बना है, क्योंकि इसमें परंपरागत रूप से बारह स्वर रूपों को शामिल किया जाता था।
बारहखड़ी की संरचना
बारहखड़ी में एक व्यंजन के साथ निम्नलिखित ग्यारह (11) स्वरों और दो (2) अयोगवाहों को जोड़ा जाता है। आधुनिक बारहखड़ी में ‘ऋ’ की मात्रा को अक्सर शामिल नहीं किया जाता, क्योंकि इसका प्रयोग कुछ विशेष तत्सम शब्दों तक ही सीमित है।
एक व्यंजन (जैसे – ‘क’) के लिए बारहखड़ी इस प्रकार बनेगी:
- क (क् + अ) → (मूल रूप)
- का (क् + आ) → (ा की मात्रा)
- कि (क् + इ) → (ि की मात्रा)
- की (क् + ई) → (ी की मात्रा)
- कु (क् + उ) → (ु की मात्रा)
- कू (क् + ऊ) → (ू की मात्रा)
- के (क् + ए) → (े की मात्रा)
- कै (क् + ऐ) → (ै की मात्रा)
- को (क् + ओ) → (ो की मात्रा)
- कौ (क् + औ) → (ौ की मात्रा)
- कं (क् + अं) → (ं अनुस्वार)
- कः (क् + अः) → (ः विसर्ग)
एक साथ:
क, का, कि, की, कु, कू, के, कै, को, कौ, कं, कः
ऋ ( ृ ) की मात्रा के साथ:
अगर ‘ऋ’ की मात्रा को भी शामिल किया जाए, तो इसका रूप कृ (क् + ऋ) होगा। तब इसे ‘तेरहखड़ी’ कहा जा सकता है, लेकिन पारंपरिक नाम “बारहखड़ी” ही प्रचलित है।
बारहखड़ी का महत्व
- भाषा की बुनियाद: यह हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने का पहला कदम है।
- मात्राओं का ज्ञान: यह छात्रों को स्वरों और उनकी मात्राओं को पहचानने और उनका सही प्रयोग करने में मदद करती है।
- शुद्ध उच्चारण: बारहखड़ी के अभ्यास से शब्दों का शुद्ध उच्चारण करना आसान हो जाता है, विशेषकर ह्रस्व (इ, उ) और दीर्घ (ई, ऊ) मात्राओं के बीच के अंतर को समझना।
- पढ़ने और लिखने में सहायक: यह पढ़ने (reading) और लिखने (writing) के कौशल को विकसित करने का एक सिद्ध और प्रभावी तरीका है। शब्दों को अक्षरों में तोड़कर (syllabification) पढ़ने की क्षमता इसी से विकसित होती है।
आधुनिक संदर्भ और सीमाएँ
- आज के आधुनिक शिक्षा के तरीकों में कुछ लोग बारहखड़ी को रटने की प्रक्रिया मानते हैं और उसकी जगह सीधे शब्द और वाक्य सिखाने पर जोर देते हैं।
- यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हिन्दी में कई संयुक्त अक्षर और व्यंजन-गुच्छ (जैसे – प्र, क्र, द्य, क्क) होते हैं, जिन्हें बारहखड़ी सीधे तौर पर कवर नहीं करती है। इनके लिए अलग से अभ्यास की आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष
सीमाओं के बावजूद, बारहखड़ी आज भी देवनागरी लिपि आधारित भाषाओं को सिखाने के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली और आधारभूत उपकरण है। यह सीखने की प्रक्रिया को एक व्यवस्थित ढाँचा प्रदान करती है और बच्चों की भाषाई नींव को मजबूत करती है, जिससे वे आत्मविश्वास के साथ पढ़ना और लिखना सीख पाते हैं।