
# h13

- Link: https://parikshahall.com/h13/
- Published: 2025-09-12T14:28:47+05:30
- Author: Rakesh Kumar

# 󠀁[📜 छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: भाग -3](https://parikshahall.com/h13/)󠁿

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 * [📜 छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: भाग -3](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%9B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B8%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A8_%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_-3)
 * [📜  छत्तीसगढ़ के राजवंशों का अवलोकन](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%9B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B8%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8)
 * [📜  राजर्षितुल्य वंश / शूरवंश / सुरावंश](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6_%E0%A4%B6%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6)
 * [📜पर्वतद्वारक वंश और शैल वंश](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%95_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B6%E0%A5%88%E0%A4%B2_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6)
 * [☀️ शैल वंश](https://parikshahall.com/h13/#%E2%98%80%EF%B8%8F_%E0%A4%B6%E0%A5%88%E0%A4%B2_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6)
 * [📜  शरभपुरीय वंश का परिचय](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF)
 * [📜  नलवंश का परिचय](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%A8%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF)
 * [📜  सोम वंश/पाण्डु वंश](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%AE_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A5%81_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6)
 * [🏹 बाण वंश](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%8F%B9_%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A3_%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6)
 * [📜 कलिंग का सोमवंश (9वीं-11वीं सदी)](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6_9%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%82-11%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%82_%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%80)
 * [📜  क्षेत्रीय राजवंशों की स्थापत्य कला और उपाधियाँ](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81)
 * [👑 शासकों द्वारा धारण की गईं उपाधियाँ](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%91%91_%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%97%E0%A4%88%E0%A4%82_%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81)
 * [📜 प्राचीनकालीन शासकों की मुद्राएँ](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%A8_%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81)
 * [📜  शहरों के वर्तमान और प्राचीन नाम](https://parikshahall.com/h13/#%F0%9F%93%9C_%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A8_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE)

#### 󠀁[📜 छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: भाग -1 ](https://parikshahall.com/h11/)󠁿

#### 󠀁[📜 छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: भाग -2](https://parikshahall.com/h12/)󠁿

# 📜 ** छत्तीसगढ़ के राजवंशों का अवलोकन**

#### **छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्थानीय राजवंश**

 छत्तीसगढ़ में शासन करने वाले विभिन्न राजवंशों को दो मुख्य क्षेत्रों में विभाजित
करता है:

**1. दक्षिण कोसल के राजवंश 🗺️**

 * **राजर्षितुल्यवंश** (चौथी से छठवीं सदी)
 * **शरभपुरीयवंश** (पांचवीं से छठवीं सदी)
 * **शैलवंश** (सातवीं से आठवीं सदी)
 * **सोम/पाण्डु वंश**
 * **बाण वंश** (नौंवीं सदी)
 * **फणीनागवंश** (ग्यारहवीं से चौदहवीं सदी)

**सोम/पाण्डु वंश की शाखाएं:**

 * **मैकल के सोम वंश** (पांचवीं सदी)
 * **दक्षिण कोसल के पाण्डु वंश** (छठवीं से आठवीं सदी)
 * **कलिंग के सोम वंश** (नौंवीं से ग्यारहवीं सदी)

**2. बस्तर के राजवंश 🏹**

 * **नलवंश** (चौथी से बारहवीं सदी)
 * **छिंदकनागवंश** (ग्यारहवीं से चौदहवीं सदी)
 * **काकतीयवंश** (चौदहवीं से बीसवीं सदी)

**कांकेर की शाखा:**

 * **कांकेर के सोम वंश** (बारहवीं सदी)

#### ** छत्तीसगढ़ के स्थानीय राजवंश 🗺️**

 * **शरभपुरीय वंश (5वीं शताब्दी):** इनकी राजधानी शरभपुर, सम्बलपुर, सारंगढ़, मल्हार,
   और सिरपुर थी।
 * **मैकल श्रेणी का सोमवंश (5वीं शताब्दी):** इस वंश की राजधानी अमरकंटक थी।
 * **बाण वंश (9वीं शताब्दी):** इन्होंने पाली को अपनी राजधानी बनाया।
 * **फणीनाग वंश (11-14वीं शताब्दी):** इनका शासन कवर्धा क्षेत्र पर केंद्रित था।
 * **पाण्डु वंश (6-8वीं शताब्दी):** इनकी राजधानी सिरपुर थी।
 * **राजर्षितुल्य वंश (4-6वीं शताब्दी):** इनकी राजधानी आरंग थी।
 * **कलिंग (ओडिशा) का सोमवंश (9-11 वीं शताब्दी):** इन्होंने पश्चिमी ओडिशा क्षेत्र
   में शासन किया।
 * **शैल वंश (7-8वीं शताब्दी):** इन्होंने दुर्ग क्षेत्र में शासन किया।
 * **पर्वतद्वारक वंश (5वीं शताब्दी):** इनकी राजधानी गरियाबंद थी।
 * **कांकेर के सोमवंश (12वीं शताब्दी):** इन्होंने कांकेर में शासन किया।
 * **काकतीय वंश (14-20वीं शताब्दी):** इनकी राजधानियाँ मंधोता, चक्रकोट, बस्तर और 
   जगदलपुर थीं।
 * **नल वंश (4-12वीं शताब्दी):** इस वंश की राजधानी कोरापुट और पुष्करी थी।

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# 📜 ** राजर्षितुल्य वंश / शूरवंश / सुरावंश**

#### **वंश की सामान्य जानकारी** 🔑

 * **जानकारी का स्रोत:** भीमसेन-II का आरंग ताम्रपत्र इस वंश की जानकारी का मुख्य 
   स्रोत है।
 * **संस्थापक:** इस वंश की स्थापना सुरा या शूर ने की थी।
 * **राजधानी:** इनकी राजधानी आरंग (रायपुर) थी।
 * **शासन अवधि:** इन्होंने चौथी से छठवीं शताब्दी तक शासन किया।
 * **समकालीन राजवंश:** ये शरभपुरीय वंश और शैलवंश के समकालीन थे।
 * **उपाधि:** ये ‘राजयोगी’ या ‘राज्ययोगी’ जैसी उपाधियाँ धारण करते थे और स्वयं को‘
   महाराज’ भी कहते थे।
 * **राजकीय चिह्न:** इनके राजमुद्राओं पर सिंह का चिह्न अंकित होता था।

#### **आरंग ताम्रपत्र का विश्लेषण** 📝

 * **प्रमुख अभिलेख:** यह एकमात्र अभिलेख है जिससे राजर्षितुल्य वंश के शासकों के विषय
   में सूचना मिलती है।
 * **शासकों की वंशावली:**
    - शूर/सुरा (संस्थापक)
    - ↓
    - दायित/दयित वर्मा (प्रथम)
    - ↓
    - विभीषण
    - ↓
    - भीमसेन (प्रथम)
    - ↓
    - दायित/दयित वर्मा (द्वितीय)
    - ↓
    - भीमसेन (द्वितीय)
 * **ग्रामदान का उल्लेख:** भीमसेन द्वितीय द्वारा हरिस्वामी और बप्पस्वामी को दोण्डा
   में स्थित भट्टपल्ली गाँव दान में देने का जिक्र मिलता है।
 * **अन्य जानकारियाँ:**
    - आरंग ताम्रपत्र का आरंभ “आमे स्वस्ति सुवर्ण नद्या सर्वसद्राजर्षि तुल्य कुल 
      प्रभवा कीतैः” से होता है।
    - इस लेख में भीमसेन और उनसे पहले की पाँच पीढ़ियों के शासकों के नाम मिलते हैं।
    - यह ताम्रपत्र भीमसेन द्वितीय ने स्वर्ण (सोन) नदी के किनारे से जारी किया था।
 * **अभाव:** इस ताम्रपत्र में किसी भी रानी, मंत्री या सेनापति का कोई उल्लेख नहीं
   मिलता है। राजधानी का भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है, परन्तु इसके आरंग से जारी होने 
   के कारण यह माना जाता है कि उनकी राजधानी आरंग ही रही होगी।
 * **संबंध:** प्रोफ़ेसर हीरालाल का मानना है कि राजर्षितुल्य वंश का संबंध कलिंग नरेश
   खारवेल के वंश से था, जिसका समर्थन हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलने वाले ‘राजर्षिवंशकुलविनसृत’
   संबोधन से होता है।
 * **अधीनता:** इस वंश द्वारा गुप्त संवत् का उपयोग यह दर्शाता है कि उन्होंने गुप्तों
   की अधीनता को स्वीकार कर लिया था।
 * **विशेष तथ्य:**
    - यह प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ पर शासन करने वाला पहला स्थानीय राजवंश था।
    - इस लेख पर अंकित तिथि गुप्त संवत् 182 या 282 है।

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# 📜**पर्वतद्वारक वंश और शैल वंश**

#### **🏔️ पर्वतद्वारक वंश **

 * **शासनकाल:** 5वीं शताब्दी।
 * **क्षेत्र:** देवभोग (गरियाबंद)।
 * **स्रोत:** राजा तुष्टिकर के तेरासिंघा ताम्रपत्र से इस वंश की जानकारी मिलती है।
 * **उपासक:** इस वंश के शासक स्तंभेश्वरी देवी की पूजा करते थे।
 * **शुरुआत:** पर्वत दान करने की प्रथा की शुरुआत इन्होंने की, जिसके कारण इस वंश 
   का नाम पर्वतद्वारक पड़ा।
 * **शासक:**
    1. **कौस्तुम्भेश्वरी देवी:** ये राजमाता थीं।
    2. **सोमन्नराज:** ये प्रथम शासक थे। अपनी माता कौस्तुम्भेश्वरी के अस्वस्थ होने पर,
       राजा सोमन्नराज ने देवभोग क्षेत्र कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण द्रोणास्वामी को दान 
       में दे दिया था।
    3. **तुष्टिकर:** इनकी राजधानी तारंभक थी, जैसा कि तेरासिंघा ताम्रपत्र में उल्लेख
       है।

# **☀️ शैल वंश **

 * **पृष्ठभूमि:** इन्होंने शरभपुरीय वंश के बाद छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर शासन 
   स्थापित किया।
 * **शासनकाल:** 7वीं-8वीं शताब्दी।
 * **वंश:** ये सूर्यवंशी थे।
 * **समकालीन:** ये शरभपुरीय वंश के समकालीन थे।
 * **क्षेत्र:** इनका शासन दुर्ग क्षेत्र में था।
 * **उपाधि:** ये ‘महाराजाधिराज’ और ‘परमेश्वर’ जैसी उपाधियाँ धारण करते थे।
 * **जानकारी का स्रोत:** दुर्ग और बालाघाट की सीमा पर स्थित राघोली गाँव से मिले ताम्रपत्र
   से जानकारी मिलती है।
 * **प्रमुख शासक:**
    1. **श्रीवर्द्धन:** वंश के संस्थापक।
    2. **श्रीपृथ्वीवर्द्धन:** श्रीवर्द्धन के पुत्र।
    3. **जयवर्द्धन:** श्रीवर्द्धन के पौत्र, इन्होंने विन्ध्य प्रदेश पर विजय प्राप्त
       की थी। इनका राघोली ताम्रपत्र भी प्राप्त हुआ है।
    4. **श्रीवर्द्धन द्वितीय**
    5. **जयवर्द्धन द्वितीय**
 * **स्थापत्य:** श्रीवर्द्धन ने सातवीं शताब्दी में एक सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया
   था।
 * **विशेष:** ऐसा अनुमान है कि इस वंश में उत्तराधिकारी न होने के कारण इसका पतन हो
   गया।

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# 📜 ** शरभपुरीय वंश का परिचय**

#### **🏹 शरभपुरीय वंश (35.1.20)**

 * **संस्थापक:** इस वंश की स्थापना का श्रेय **शरभराज** को दिया जाता है।
 * **शासनकाल:** इस राजवंश ने 5वीं से 6वीं शताब्दी के बीच शासन किया।
 * **राजधानी:** इस वंश की राजधानियाँ समय-समय पर बदलती रहीं:

| शासक | राजधानी | 
| शरभराज | शरभपुर | 
| प्रसन्नमात्र | मल्हार / प्रसन्नपुर | 
| प्रवरराज प्रथम | सिरपुर / श्रीपुर |

 * **अन्य नाम:** व्याघ्रराज के मल्हार ताम्रपत्र में इस वंश को **अमरार्य कुल** या**
   अमरज कुल** के नाम से भी संबोधित किया गया है।
 * **राजचिन्ह:** इनके सभी अधिकार पत्रों की मुहर पर **गजलक्ष्मी** का राजचिन्ह अंकित
   होता था। 👑
 * **धर्म:** ये **वैष्णव धर्म** के अनुयायी थे।
 * **उपाधि:** ये शासक **‘परमभागवत’** की उपाधि धारण करते थे।
 * **ऐतिहासिकता:** भानुगुप्त के एरण अभिलेख (510 ई.) में इस वंश का उल्लेख मिलता है।
 * **पृष्ठभूमि:** शरभपुरीय वंश के शासक स्थानीय निवासी थे। शुरुआत में वे वाकाटकों
   के सामंत थे, परंतु बाद में उनकी आंतरिक कलह का लाभ उठाकर उन्होंने एक स्वतंत्र 
   सत्ता की स्थापना की।
 * **ताम्रपत्र:** **कुरूद ताम्रपत्र**, जो नरेन्द्र द्वारा जारी किया गया था, एक महत्वपूर्ण
   स्रोत है। इसमें ब्राह्मण शंख स्वामी को सनद (शासन) लिखकर देने का वर्णन है।
 * **शिल्पी:** श्रीदत्त, अचलसिंह, ज्येष्ठसिंह, द्रोणसिंह, और गोलसिंह जैसे शिल्पी
   इस काल में सक्रिय थे।

#### **शासकों का वंश क्रम** 📜

 * शरभराज (संस्थापक)
    - ↓
 * नरेन्द्रसेन
    - ↓
 * प्रसन्न द्वितीय (प्रसन्नमात्र)
    - ↓
 * जयराज (मानमात्र, दुर्गराज)
    - ↓
 * सुदेवराज प्रथम → प्रवरराज प्रथम → व्याघ्रराज
    - ↓
 * प्रवरराज द्वितीय (अंतिम शासक)

---

### 📜 ** शरभपुरीय वंश के प्रमुख शासक **

#### **👑 शरभराज (460-480 ई.)**

 * **संस्थापक:** यह शरभपुरीय राजवंश के संस्थापक थे।
 * **राजधानी:** इन्होंने शरभपुर (वर्तमान में सम्बलपुर-सारंगढ़) को अपनी राजधानी बनाया।
   इसी शासक के नाम पर राजवंश और राजधानी का नामकरण हुआ।
 * **सामंत:** शरभराज, वाकाटक नरेश प्रवरसेन प्रथम के सामंत के रूप में कार्य करते 
   थे।
 * **सिक्का:** इन्होंने पहली बार प्राकृत भाषा के स्थान पर संस्कृत भाषा का प्रयोग
   अपने सिक्कों पर किया। 🪙
 * **उल्लेख:** गुप्त शासक भानुगुप्त के एरण अभिलेख में शरभराज का जिक्र मिलता है, 
   जहाँ उन्हें भानुगुप्त के सामंत गोपराज का नाना बताया गया है।
 * **शासनक्षेत्र:** शरभराज महानदी के उत्तरी भू-भाग पर शासन करते थे और एक कुशल शासक
   माने जाते थे।

#### **👑 नरेन्द्र (480-505 ई.)**

 * **उपाधि:** रावनप्लेट में इन्हें **‘परम्भागवत’** की उपाधि दी गई है।
 * **अनुयायी:** ये वैष्णव धर्म को मानते थे।
 * **मुद्रा:** इनके द्वारा जारी की गई मुद्राओं पर ‘गजभिषिक्तलक्ष्मी’ का अंकन मिलता
   है।
 * **ताम्रपत्र:** इन्होंने कुल 3 ताम्रपत्र जारी किए थे:
    1. **पीपरदुला ताम्रपत्र, सारंगढ़:** यह शासन के तीसरे वर्ष में जारी किया गया था।
       इसके अनुसार, भोगपति राहुदेव ने नन्दपुर भोग के शर्कराप्रद नामक गाँव को दान में
       दिया था। इस ताम्रपत्र में उन्होंने स्वयं को शरभराज का पुत्र बताया है।
    2. **कुरूद ताम्रपत्र, धमतरी:** यह उनके शासन के 24वें वर्ष में जारी हुआ। इससे पता
       चलता है कि उन्होंने लंबे समय तक, लगभग अपनी रजत जयंती तक शासन किया होगा। इसमें
       चुल्लाडासीमा-भोग के केशवक गाँव को परमभट्टारक द्वारा भाश्रुतस्वामी नामक ब्राह्मण
       को दान में देने का उल्लेख है।
    3. **मल्हार/रांवा/रावन ताम्रपत्र:** यह ताम्रपत्र बिना तिथि के और अधूरा है।
 * **विशेष:** नरेन्द्र के ताम्रपत्रों में **“विजय स्कंधवाद कुरूद”** जैसे शब्द मिलते
   हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि उन्होंने सैन्य अभियानों के माध्यम से विजय प्राप्त
   की थी। उन्होंने अपने ताम्रपत्र पर **“खड़गधारा जितभुवै”** (तलवार की धार से सारे
   विश्व को जीत लेने वाला) खुदवाया।

#### **👑 प्रसन्नमात्र (525-545 ई.)**

 * **राजधानी:** इन्होंने प्रसन्नपुर (मल्हार) को अपनी राजधानी बनाया।
 * **नगर स्थापना:** इन्होंने निडिला (लीलागर) नदी के तट पर प्रसन्नपुर (मल्हार) शहर
   की स्थापना की। 🏙️
 * **सिक्का:** इन्होंने **गरूड़, शंख, और चक्र** के चिह्नों वाले सोने के सिक्के जारी
   करवाए। डॉ. श्याम कुमार पाण्डेय का मानना है कि ये सिक्के मल्हार स्थित टकसाल में
   निर्मित होते थे। इन सिक्कों पर पेटिका शीर्ष लिपि का उपयोग किया गया था।

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### 📜 ** शरभपुरीय वंश के प्रमुख शासक **

 * **स्थापत्य:** प्रसन्नमात्र के स्वर्ण सिक्के पूर्व में ओडिशा के कटक और पश्चिम 
   में महाराष्ट्र के चांदा तक मिले हैं, जो उनके साम्राज्य के विस्तार को दर्शाता 
   है। सिरपुर से भी एक स्वर्ण मुद्रा मिली है, जिस पर गजलक्ष्मी का अंकन है। इनके 
   काल में तालागाँव का **जेठानी मंदिर** भी बना। 🏛️

#### **👑 जयराज (545-560 ई.)**

 * **अन्य नाम:** इन्हें **मानमात्र** एवं **दुर्गराज** के नाम से भी जाना जाता था।
 * **मुद्रा:** इनकी मुद्राओं पर भी गजलक्ष्मी का चिह्न मिलता है।
 * **ताम्रपत्र:**
    1. **आरंग:** शासन के 5वें वर्ष में जारी हुआ, इसमें “पूर्व राष्ट्र” शब्द का उल्लेख
       है।
    2. **मल्हार:** शासन के 5वें और 9वें वर्ष में जारी किया गया, इस पर ‘परमभागवत’ लिखा
       है।
    3. **अंगूरा ताम्रपत्र:** यह शासन के तीसरे वर्ष में जारी हुआ।
 * **अभिलेख:** कौआताल अभिलेख में जयराज का नाम पहली बार दुर्गराज के रूप में उल्लेखित
   है।
 * **स्थापत्य:** पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय के अनुसार, इन्होंने शिवनाथ नदी के किनारे
   दुर्ग नामक नगर की स्थापना की। हालांकि, रायबहादुर हीरालाल का मानना है कि दुर्ग
   का संबंध शिवदुर्ग नामक शासक से था। देवरानी (जयेश्वर भट्टारक) मंदिर का निर्माण
   भी इन्हीं के शासनकाल में हुआ।
 * **विस्तार:** इनके समय में शरभपुरियों का शासन पहली बार मल्हार के पश्चिम की ओर 
   फैला।
 * **विशेष:** यह राजवंश ब्राह्मणों को दान देने की प्रथा का पालन करता था। संपराज/
   पम्पराज भुक्ति के अंतर्गत आने वाले राज्यग्राम को विष्णुस्वामी नामक ब्राह्मण को
   दान दिया गया।
 * **पुत्र:** इनके तीन पुत्र थे: 1. सुदेवराज, 2. प्रवरराज, 3. व्याघ्रराज।

#### **👑 सुदेवराज / महासुदेवराज (560-580 ई.)**

 * **ताम्रपत्र:** इनके शासनकाल के सर्वाधिक 8 ताम्रपत्र मिले हैं (प्रमुख ताम्रपत्र–
   रायपुर, शरभपुर, सिरपुर)। इन पर तिथि, वर्ष, लेखक और शासक का उल्लेख तो है, लेकिन
   चित्र नहीं मिलता।
 * **उपाधि:** ‘परमभागवत’।
 * **राजधानी:** मल्हार।
 * **उपराजधानी:** इन्होंने सिरपुर (श्रीपुर) को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
 * **विस्तार:** आरंग से प्राप्त अभिलेख के अनुसार सुदेवराज का अधिकार आरंग पर भी था।
 * **युद्ध:** इनके शासनकाल में भीमसेन द्वितीय ने आक्रमण किया था। इस युद्ध में प्रवरराज
   प्रथम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसे पराजित किया। इसके बाद, महासुदेवराज ने
   प्रवरराज प्रथम को सिरपुर का गवर्नर (सामंत) नियुक्त किया। ⚔️
 * **विशेष:** शरभपुरीय राजकुमारी लोकप्रकाशा का सुदेवराज से क्या संबंध (बहन या पुत्री)
   था, यह आज भी स्पष्ट नहीं है। हालांकि, ‘समग्र छत्तीसगढ़ (2017)’ के अनुसार लोकप्रकाशा
   नरेन्द्र की बहन थीं और उनका विवाह मैकल के सोमवंशी शासक भरतबल से हुआ था।

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### 📜 ** शरभपुरीय वंश का विभाजन और अंतिम शासक**

#### **पारिवारिक संबंध एवं सत्ता हस्तांतरण**

 * **विवाह संबंध:** मैकल के सोमवंशी राजा नागबल और रानी इन्द्रभट्टारिका के पुत्र **
   भरतबल/इन्द्रबल** का विवाह शरभपुरीय राजकुमारी **लोकप्रकाशा** से हुआ।
 * **दूतक की नियुक्ति:** इस रिश्ते के कारण, सुदेवराज ने भरतबल के वंशज इन्द्रबल को**
   सर्वाधिकाराधिकर्ता/दूतक/मंत्री** के पद पर नियुक्त किया था, जिसका उल्लेख कौआताल
   और धमतरी ताम्रपत्रों में मिलता है।
 * **राज्य का बंटवारा:** महासुदेव राज ने अपनी मृत्यु से पहले राज्य को तीन हिस्सों
   में बाँट दिया:
    1. महानदी का दक्षिणी भाग छोटे भाई **प्रवरराज प्रथम** को दिया गया।
    2. महानदी का उत्तरी-पूर्वी ‘पूर्व राष्ट्र’ **व्याघ्रराज** को सौंपा गया।
    3. शरभपुर की मुख्य शाखा **भरतबल-सूरबल** (मैकल का सोमवंशी शासक) को दी गई।
 * **सत्ता संघर्ष:** इस बंटवारे से प्रवरराज प्रथम और व्याघ्रराज असंतुष्ट थे। उन्होंने
   सत्ता पाने के लिए सूरबल पर आक्रमण कर उसे पराजित कर दिया। सूरबल की हार का बदला
   इन्द्रबलराज ने लिया। उसने प्रवरराज और व्याघ्रराज को हराकर शरभपुरीय वंश के राज्य
   पर अधिकार कर लिया और दक्षिण कोसल में **पाण्डुवंश की नींव** रखी तथा सिरपुर को 
   अपनी राजधानी बनाया।

#### **👑 प्रवरराज प्रथम (580-590 ई.)**

 * **राजधानी:** सिरपुर।
 * **शासनक्षेत्र:** महानदी का दक्षिणी भू-भाग।
 * **ताम्रपत्र:** इनके दो ताम्रपत्र मिले हैं, जो शासन के तीसरे वर्ष जारी किए गए:
    1. ठाकुरदिया (सारंगढ़)
    2. मल्हार (नोट: श्याम कुमार पाण्डेय के अनुसार ये दोनों शिलालेख प्रवरराज प्रथम के
       हैं।)
 * **विशेष:** इनके शासनकाल में, शरभपुर पर पाण्डुवंशी शासक सूरबल ने अधिकार कर लिया
   था। प्रवरराज ने युद्ध में उसे पराजित कर पुनः अपना राज्य प्राप्त किया और अपने 
   भाई व्याघ्रराज को शरभपुर में शासन व सुरक्षा के लिए तैनात कर दिया।

#### **👑 व्याघ्रराज/व्याधराज (590-600 ई.)**

 * **उपाधि:** भट्टारक।
 * **राजधानी:** प्रसन्नपुर (मल्हार)।
 * **शासनक्षेत्र:** महानदी के उत्तर में मल्हार के पूर्वी (पूर्वीराष्ट्र) भाग पर 
   शासन था।
 * **विशेष:** इनके मल्हार ताम्रपत्र में शरभपुरी वंश का एक और नाम **अमरार्य (अम्रज)
   कुल** मिलता है। ये केवल अपने भाई प्रवरराज प्रथम के एक सामंत थे।

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### 📜 **शरभपुरीय वंश का अंत और क्षेत्रीय नामकरण**

#### **👑 प्रवरराज द्वितीय (600-620 ई.)**

 * **अंतिम शासक:** ये शरभपुरीय वंश के अंतिम शासक थे।
 * **सत्ता का अंत:** मलगा (बिलासपुर) ताम्रपत्र से पता चलता है कि इन्द्रबल ने शरभपुरी
   क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। सुदेवराज के सामंत इन्द्रबल ने उनके पुत्र प्रवरराज(
   द्वितीय) की हत्या करके इस क्षेत्र में **पाण्डुवंश की स्थापना** की।

#### **शरभकालीन वंश की विशेषताएँ 💡**

 * शरभकालीन शासक **संस्कृत भाषा** और **ब्राह्मणों** को विशेष महत्व देते थे।
 * वे अपने लेखों में **‘पूर्वी राष्ट्र’** शब्द का प्रयोग करते थे, जिससे यह पता चलता
   है कि प्रशासन के दो प्रमुख केंद्र थे:
    1. एक केंद्र जो सीधे राजा के अधिकार में होता था।
    2. दूसरा केंद्र जो उनके किसी निकट संबंधी के अधिकार में होता था।
 * इस काल में राजा केवल **ताम्रपत्रों के माध्यम से** ही भूमि दान करते थे।
 * **प्रमुख शरभपुरीकालीन अधिकारी:** सर्वाधिकाराधिकर्ता, प्रतिहार, हरप्पग्राह, चाट-
   भाट, सामंत, दूतक, कार्णिक आदि थे।

#### **📜 विभिन्न कालखंडों में क्षेत्रों के नाम**

| काल | मध्य छत्तीसगढ़ | बस्तर क्षेत्र | 
| **वैदिक काल** | — | दछिक दिक् | 
| **रामायणकाल** | दक्षिण कोसल | दण्डकारण्य | 
| **महाभारत काल** | प्राक्कोसल | कान्तार | 
| **सातवाहन काल** | अधिष्ठि (मिस्र यात्री टॉलमी के अनुसार) | — | 
| **गुप्तकाल** | दक्षिणापथ / कोसल | महाकान्तार | 
| **मुगलकाल** | रतनपुर क्षेत्र |

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# 📜 ** नलवंश का परिचय**

#### **🏛️ नलवंश **

 * **शासनकाल:** इस वंश का शासन चौथी से बारहवीं शताब्दी तक चला।
 * **शासन क्षेत्र:** इनका अधिकार **दण्डकारण्य क्षेत्र** पर था।
 * **राजधानी:** इनकी राजधानी **पुष्करी (पुष्करगढ़) / कोरापुट** थी। 🏰
 * **संस्थापक:** इस वंश की नींव **शिशुक** ने रखी थी।
 * **वास्तविक संस्थापक:** **वराहराज** को नलवंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
 * **अंतिम शासक:** इस वंश के अंतिम शासक **नरेन्द्र थबल** थे।
 * **वर्णन:** वायु पुराण में नल वंश के शासकों को कोसल और नैषध प्रदेश का स्वामी बताया
   गया है।
 * **समकालीन राजवंश:** ये **वाकाटक** और **गुप्तवंश** के समकालीन थे।
 * **मुद्रा (सिक्के):** 💰
    1. **कोंडागांव के अडेंगा ग्राम:** यहाँ से **32 स्वर्ण सिक्के** प्राप्त हुए हैं।
    2.  - **वराहराज:** 29 स्वर्ण सिक्के
        - **भवदत्त वर्मन:** 1 स्वर्ण सिक्का
        - **अर्थपति भट्टारक:** 2 स्वर्ण सिक्के
 *  - **विशेषताएँ:**
       * नल वंश के स्वर्ण सिक्कों का अध्ययन **डॉ. वासुदेव मिराशी** द्वारा किया गया।
       * इन सिक्कों के केवल मुख्य भाग पर चित्र बने हैं, जबकि पिछला भाग पूरी तरह 
         से खाली है।
       * ये सिक्के वर्तमान में नागपुर संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं।
 *  1. **कुलिया (बालोद):** यहाँ से **स्तम्भराज** के 55 स्वर्ण सिक्के मिले हैं, जिनका
       अध्ययन **लक्ष्मीशंकर निगम** द्वारा किया गया।

#### **नलवंश की जानकारी के स्रोत** 📜

 * **ऋद्धिपुर ताम्रपत्र (अमरावती, महाराष्ट्र):** भवदत्त वर्मन
 * **केसरीबेड़ा (ओडिशा):** अर्थपति भट्टारक
 * **पोड़ागढ़ अभिलेख (जैपुर, ओडिशा):** स्कंदवर्मन
 * **राजिम शिलालेख (छत्तीसगढ़):** विलासतुंग
 * **पड़ियापाथर (ओडिशा):** भीमसेनदेव
 * **गुंजाम ताम्रपत्र (कोरापुट, ओड़िशा):** भीमसेनदेव
 * **कुलिया अभिलेख (बालोद, छत्तीसगढ़):** स्तम्भराज
 * **प्रयाग प्रशस्ति:** समुद्रगुप्त (हरिषेण द्वारा रचित)
 * **एहोल प्रशस्ति:** चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय
 * **उदयेन्दिरम ताम्रपत्र:** पल्लव वंश के नंदीवर्धन
 * **गुप्तवंशीय प्रभावती के ताम्रपत्र**

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### 📜 **नल वंश के प्रमुख शासक **

#### **👑 नल वंश के प्रमुख शासक**

 1.  **शिशुक:**
 2.   * यह नलवंश के संस्थापक और आदिपुरुष थे।
 3.  **व्याघ्रराज:**
 4.   * हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार, समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिणापथ विजय अभियान
        के दौरान नलवंशीय राजा व्याघ्रराज को पराजित किया और ‘व्याघ्रहंता’ की उपाधि धारण
        की। इसके बाद, व्याघ्रराज ने गुप्तों की अधीनता में शासन किया।
 5.  **वृषभराज:**
 6.   * इन्होंने सत्ता का संचालन किया और इनका एक अन्य नाम ‘वृषध्वज’ भी मिलता है।
 7.  **वराहराज:**
 8.   * **वास्तविक संस्थापक:** इन्हें नलवंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
      * **मुद्रा:** कोंडागांव के अडेंगा गाँव से इनके 29 स्वर्ण सिक्के मिले हैं, जिन
        पर “श्रीवराहराजस्य” उत्कीर्ण है। इन सिक्कों पर नंदी का अंकन है, जो उनके शैव
        मतानुयायी होने का प्रमाण है।
      * **युद्ध:** इनके वैभव से प्रभावित होकर वाकाटकवंशीय शासक नरेन्द्रसेन ने इन्हें
        हराकर इनके कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया था।
 9.  **भवदत्त वर्मन:**
 10.  * **उपाधि:** ‘महाराजा’ और ‘भट्टारक’।
      * **परिवार:** इनकी पत्नी का नाम अचाली भट्टारिका और पुत्रों का नाम अर्थपति भट्टारक(
        ज्येष्ठ) व स्कंद वर्मन (कनिष्ठ) था।
      * **ताम्रपत्र:** इनके ऋद्धिपुर, मोराशी और रीठा ताम्रपत्र मिलते हैं।
      * **साम्राज्य विस्तार:** इनका साम्राज्य बरार से कोरापुट तक फैला हुआ था।
      * **स्वर्ण सिक्के:** अडेंगा से इनका भी एक स्वर्ण सिक्का मिला है, जिस पर ‘श्रीभवदत्तराजस्य’
        लिखा है।
      * **विजय अभियान:** ⚔️ इन्होंने सत्ता संभालने के बाद वाकाटक शासक नरेन्द्र सेन 
        पर आक्रमण करके उसे पराजित किया, उसकी राजधानी नंदीवर्धन को नष्ट कर दिया और अपने
        राज्य को शत्रुओं से मुक्त कराया।
 11. **अर्थपति भट्टारक:**
 12.  * **उपाधि:** महेश्वर, महासेनापति, त्रिपताका ध्वज, नलनृपति कुलावन्य।
      * **सिक्के:** अडेंगा से इनके 2 स्वर्ण सिक्के मिले हैं, जिन पर ‘अर्थपतिराजस्य’
        अंकित है।
      * **ताम्रपत्र:** केसरीबेड़ा।
      * **युद्ध:** 🛡️ वाकाटक शासक पृथ्वीसेन द्वितीय ने अवसर पाकर अर्थपति भट्टारक को
        पराजित किया और उनकी राजधानी पुष्करी को तहस-नहस कर दिया।
 13. **स्कन्द वर्मन:**
 14.  * **शिलालेख:** पोड़ागढ़ (यह नलों का पहला शिलालेख है)। इसकी शुरुआत “विजयी था, 
        विजयी है और विजयी रहेगा” पंक्तियों से होती है। पोड़ागढ़ शिलालेख के अनुसार, 
        छत्तीसगढ़ में नल शासकों में सबसे बड़ा साम्राज्य स्कन्द वर्मन का था।
      * **स्थापत्य:** स्कंद वर्मन ने नष्ट हो चुकी पुष्करी को पुनः बसाया और उसका नाम
        पोड़ागढ़ कर दिया। उन्होंने पोड़ागढ़ में एक विष्णु मंदिर का निर्माण भी करवाया।
      * **युद्ध:** इन्होंने वाकाटक नरेश देवसेन को पराजित किया।
      * **सूत्रपात:** इन्होंने अग्रहार परंपरा की शुरुआत की।

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### 📜 ** नल वंश के प्रमुख शासक और समापन**

 1.  **स्तम्भराज:**
 2.   * **सिक्का:** इनके स्वर्ण सिक्के कुलिया (बालोद) से प्राप्त हुए हैं।
      * **अभिलेख:** कुलिया अभिलेख से पता चलता है कि वेंगी के चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन
        प्रथम ने नलवंश पर आक्रमण किया था।
 3.  **नंदराज:**
 4.   * इनके शासनकाल में भी वेंगी के राजा कीर्तिवर्मन प्रथम ने नलों पर हमला किया था।
 5.  **पृथ्वीराज**
 6.  **विरुपाक्ष**
 7.  **विलासतुंग:**
 8.   * **उपासक:** ये वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, जबकि नल वंश के अधिकांश अन्य शासक शैव
        धर्म को मानते थे। 🙏
      * **शिलालेख:** इनका **राजिम शिलालेख** (700-740 ई., 7वीं-8वीं सदी) प्रसिद्ध है।
        यह संस्कृत भाषा और कुटिलनागरी लिपि में लिखा गया है। इसमें इनके पिता विरूपाक्ष
        और पितामह पृथ्वीराज का उल्लेख है, जो छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास की जानकारी
        देता है।
      * **मंदिर निर्माण:** 🏛️ इन्होंने अपने दिवंगत पुत्र की स्मृति में **राजीवलोचन 
        मंदिर** का निर्माण करवाया। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और **पंचायतन
        शैली** में बना है। बाद में, कल्चुरी शासक पृथ्वीदेव द्वितीय के सेनापति **जगतपाल**
        ने इसका जीर्णोद्धार करवाया।
      * **समकालीन:** ये पाण्डुवंशीय शासक **महाशिवगुप्त बालार्जुन** के समकालीन थे।
 9.  **पृथ्वीव्याघ्र:**
 10.  * पल्लव शासक नंदीवर्धन के उदयेन्दिरम् दानपत्र के अनुसार, विलासतुंग के बाद **पृथ्वीव्याघ्र**
        नामक नल राजा ने शासन संभाला।
 11. **भीमसेन देव:**
 12.  * **स्थापत्य:** इन्होंने भीमपुर नामक नगर बसाया।
      * **उपासक:** यह शैव धर्म के अनुयायी थे।
      * **ताम्रपत्र:** गुंजाम ताम्रपत्र और पडियापाथर ताम्रपत्र।
 13. **नरेन्द्र धबल:**
 14.  * यह नल वंश के **अंतिम ज्ञात शासक** थे।

#### ** वंश संबंधी विशेष नोट** 📝

 * नल वंश का अंत **कल्चुरियों** के हाथों हुआ।
 * राजिम के अभिलेख से ज्ञात होता है कि नलवंश का आरम्भ **नल नामक राजा** से हुआ था।
 * विलासतुंग और उनके पूर्वजों को **नलवंश** कहा गया है।
 * कोंडागांव के पास स्थित **नलवाड़ी ग्राम** का संबंध नल वंश से माना जाता है।

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# 📜 ** सोम वंश/पाण्डु वंश**

#### **🌙 सोम वंश/पाण्डु वंश: एक परिचय**

 * **उत्पत्ति:** अभिलेखों के अनुसार, पाण्डुवंश के शासक क्षत्रिय थे और उनका संबंध**
   चन्द्रवंश** से था। वे स्वयं को **शशिकुल, शशिवंश, सोमवंश, शीतांशुवंश, चन्द्रान्वय,**
   और **शशधरान्वय** जैसे नामों से संबोधित करते थे, जो सभी चन्द्रवंश के ही पर्याय
   हैं।
 * **स्थापना:** **इंद्रबल** ने शरभपुरीय वंश का अंत करके छत्तीसगढ़ में **पाण्डु वंश
   की स्थापना** की। इस वंश की कई शाखाएँ थीं।

#### ** वंश की शाखाएँ**

 * मैकल का सोम वंश
 * कलिंग का सोम वंश
 * सिरपुर का पाण्डु वंश
 * कांकेर के सोम वंश

#### **🏞️ मैकल का सोमवंश **

 * **जानकारी के स्रोत:** मल्हार और बम्हनी (शहडोल) ताम्रपत्र।
 * **राजधानी:** अमरकंटक।
 * **शासन क्षेत्र:** मैकल क्षेत्र।
 * **शासनकाल:** लगभग 5वीं शताब्दी के आसपास।

#### ** मैकल सोमवंश के प्रमुख शासक** 👑

 1. **जयबल:** ये एक आरंभिक शासक थे, जिन्होंने कोई उपाधि धारण नहीं की।
 2. **वत्सबल:** ये भी एक आरंभिक शासक थे और कोई उपाधि धारण नहीं की।
 3. **नागबल:**
 4.  * **उपाधि:** ‘परममाहेश्वर’।
     * **विवाह:** इनका विवाह **इन्द्रभट्टारिका** से हुआ।
 5. **भरतबल:**
 6.  * **अन्य नाम:** इन्हें **इन्द्रबल** भी कहा जाता है।
     * **विवाह:** इनका विवाह शरभपुरीय राजकुमारी **लोकप्रकाशा** से हुआ।
     * **पुत्र:** इनके दो पुत्र थे – **सूरबल** (उत्तराधिकारी) और **उदयन** (सिरपुर के
       आदिपुरुष)।
 7. **सूरबल:**
 8.  * यह भरतबल के पुत्र थे। इनके ताम्रपत्र दो स्थानों से मिले हैं:
        - **(i) मल्हार ताम्रपत्र:** इसमें सूरबल का नाम **‘उदीर्णवैर्य’** उत्कीर्ण है।
          इस ताम्रपत्र के अनुसार, सूरबल ने **जयेश्वर भट्टारक मंदिर (देवरानी मंदिर)**
          के लिए संगमग्राम (तालागांव) दान में दिया था।
        - **(ii) बम्हनी ताम्रपत्र:** इसमें वर्णित **‘उदीर्णवैर्य’** नाम भी सूरबल का
          ही है।

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#### **वंश की सामान्य विशेषताएँ** 🏛️

 * **राजधानी:** 🏰 इनकी राजधानी सिरपुर थी, जिसे प्राचीन काल में चित्रांगदपुर के 
   नाम से भी जाना जाता था।
 * **उपाधि:** 👑 शासक ‘परमभागवत’ की उपाधि धारण करते थे।
 * **ताम्रपत्र जारी करने का स्थान:** इनके ताम्रपत्र सिरपुर से जारी होते थे।
 * **आदिपुरुष:** इस वंश के आदिपुरुष **उदयन** थे, जिनका उल्लेख कालिंजर शिलालेख में
   मिलता है।
 * **संस्थापक:** इस वंश की स्थापना **इंद्रबल** ने की थी।
 * **साहित्यिक भाषा:** इनकी राजभाषा **संस्कृत** थी।
 * **लिपि का प्रयोग:** ✍️ इनके लेखन में दो प्रकार की लिपियों का उपयोग मिलता है:
    - ताम्रपत्रों पर **पेटिका शीर्ष लिपि**।
    - शिलालेखों पर **कीलाक्षर लिपि**।

#### **छत्तीसगढ़ के इतिहास में पाण्डु वंश का महत्व** 🌟

 * **छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग:** महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल को छत्तीसगढ़ के
   इतिहास का स्वर्ण काल माना जाता है।
 * **छत्तीसगढ़ का उत्कर्ष काल:** महाशिव तीवरदेव के समय को इस क्षेत्र का उत्कर्ष 
   काल कहा जाता है।
 * **स्मारकों का स्वर्ण युग:** पाण्डु वंश के शासनकाल को स्मारकों के निर्माण का स्वर्ण
   युग माना जाता है।
 * **मंदिरों के निर्माण का काल:** यह अवधि मंदिरों के निर्माण के लिए विशेष रूप से
   प्रसिद्ध है।

#### **प्रमुख शासकों का परिचय** 👑

 * **उदयन:**
    - यह पाण्डुवंश के आदिपुरुष और प्रथम शासक थे, जैसा कि कालिंजर शिलालेख से ज्ञात
      होता है।
    - इन्होंने कालिंजर में **भद्रेश्वर शिवमंदिर** का निर्माण करवाया था।
    - इनकी पत्नी का नाम **द्रोण भट्टारिका** था।
 * **इंद्रबल:**
    - **पृष्ठभूमि:** ये शरभपुरीय शासक सुदेवराज के अधीन **सर्वाधिकाराधिकर्ता** और**
      दूतक** के पद पर कार्यरत थे।
    - **सत्ता स्थापना:** ⚔️ इन्होंने शरभपुरीय वंश के अंतिम राजा, प्रवरराज द्वितीय,
      की हत्या करके सिरपुर क्षेत्र में पाण्डु वंश की नींव डाली।
    - **योगदान:** इन्हें छत्तीसगढ़ में पाण्डुवंश का **वास्तविक संस्थापक** माना जाता
      है।
    - **राजधानी:** इन्होंने सिरपुर को अपनी राजधानी बनाया।
    - **नगर निर्माण:** इन्होंने वर्तमान खरौद शहर को **इन्द्रपुर** के नाम से बसाया।
    - **निर्माण:** इनके दूसरे पुत्र ईशान देव ने खरौद में **लक्ष्मणेश्वर मंदिर** 
      का निर्माण करवाया, जिसे ‘लाखा चाउर मंदिर’ भी कहा जाता है।
    - **उत्तराधिकारी:** इनके तीन पुत्र थे: नन्नराज प्रथम, ईशान देव, और भवदेव रणकेसरी।
 * **नन्नराज प्रथम:**
    - **धर्म:** ये शैव धर्म के अनुयायी थे।
    - **शासन:** इन्होंने अपने दोनों भाइयों (ईशानदेव व भवदेव रणकेसरी) को **मंडलाधिपति**(
      क्षेत्रीय गवर्नर) नियुक्त किया।
 * **भवदेव रणकेशरी:**
    - इनके विषय में जानकारी भांदक शिलालेख से प्राप्त होती है।
    - इन्होंने **सूर्यघोष** द्वारा निर्मित एक बौद्ध विहार (सुगत मंदिर) का जीर्णोद्धार
      करवाया था।

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### 📜 **पाण्डु वंश के प्रतापी शासक**

 * **महाशिव तीवरदेव:**
    - **उपाधि:** 👑 इन्होंने **‘सकलकोसलाधिपति’** (अभिलेखों के अनुसार) और **‘कोसलाधिपति’**(
      राजमुद्रा के अनुसार) जैसी शक्तिशाली उपाधियाँ धारण कीं।
    - **धर्म:** ये परम वैष्णव थे और वैष्णव धर्म के अनुयायी थे।
    - **ताम्रपत्र:** इनके तीन प्रमुख ताम्रपत्र मिले हैं: बोडा (शासन के 5वें वर्ष),
      राजिम (7वें वर्ष), और बालोद (9वें वर्ष)।
    - **उपलब्धि:** इनका शासनकाल पाण्डु वंश की सत्ता का **उत्कर्ष काल** माना जाता
      है। इन्होंने कोसल, उत्कल और अन्य राज्यों तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया
      था।
    - **राजमुद्रा:** तीवरदेव ने अपनी राजमुद्रा पर **‘गरुड़’** का चिह्न उत्कीर्ण 
      करवाया था।
    - **पराजय:** ⚔️ इनका संघर्ष विष्णुकुण्डी नरेश माधववर्मन द्वितीय जनाश्रय के साथ
      हुआ, जिनसे ये पराजित हुए, जिसकी जानकारी ईपुर और पोलाम्बर ताम्रपत्रों से मिलती
      है।
 * **नन्नराज द्वितीय:**
    - **उपाधि:** इन्होंने ‘कोसल मंडलाधिपति’ की उपाधि धारण की।
    - **ताम्रपत्र:** इनका अड़भार (सक्ती) से एक ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है।
    - **निर्माण:** इन्होंने अड़भार स्थित शिव मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
    - **विशेष:** इनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए इनकी मृत्यु के बाद इनके चाचा **चन्द्रगुप्त**
      शासक बने।
 * **चन्द्रगुप्त:**
    - इनका उल्लेख सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर शिलालेख में मिलता है।
 * **हर्षगुप्त:**
    - **उपाधि:** ‘प्राक्रमहेश्वर’।
    - **विवाह संबंध:** 🏛️ इनका विवाह मगध के मौखरी वंश के शासक सूर्यवर्मा की पुत्री,**
      रानी वासटा** के साथ हुआ था।
    - **लक्ष्मण मंदिर:** हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद, उनकी स्मृति को स्थायी बनाने
      के लिए रानी वासटा ने सिरपुर में **लक्ष्मण मंदिर** का निर्माण शुरू करवाया था।
    - **मंदिर की विशेषताएँ:**
       * यह मंदिर भगवान **विष्णु** को समर्पित है।
       * यह **नागर शैली** में **लाल ईंटों** से निर्मित है।
       * इसका निर्माण कार्य **महाशिवगुप्त बालार्जुन** के शासनकाल में पूरा हुआ।
       * मंदिर की प्रशस्ति (स्तुति) **कवि ईशान** ने लिखी थी, जो बाणभट्ट के समकालीन
         थे।

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### 📜 ** साक्ष्य और समकालीन शक्तियाँ**

#### **ऐतिहासिक साक्ष्यों का विवरण** 📝

यह तालिका दर्शाती है कि किस शासक की जानकारी किन अभिलेखों से मिलती है:

| अभिलेख / शिलालेख | संबंधित शासक | 
| कालिंजर शिलालेख | उदयन | 
| खरौद शिलालेख | इन्द्रबल, ईशानदेव | 
| कौआताल अभिलेख | इन्द्रबल | 
| भांदक शिलालेख | भवदेव रणकेसरी | 
| राजिम शिलालेख | महाशिव तीवरदेव | 
| बालोद शिलालेख | महाशिव तीवरदेव | 
| सिरपुर अभिलेख | चन्द्रगुप्त, हर्षगुप्त, महाशिवगुप्त बालार्जुन | 
| अड़भार शिलालेख | नन्नराज द्वितीय |

#### **मानचित्र का विश्लेषण: बालार्जुन का युग** 🗺️

 * **महाशिवगुप्त बालार्जुन (पाण्डु वंश):** ये मध्य भारत में एक प्रमुख शक्ति थे।
 * **हर्षवर्धन (वर्धन वंश):** उत्तर में कन्नौज पर शासन कर रहे थे।
 * **पुलकेशिन-II (चालुक्य वंश):** दक्षिण में एक शक्तिशाली शासक थे।
 * **नरसिंह वर्मन-I (पल्लव वंश):** सुदूर दक्षिण में शासन कर रहे थे।
 * **विलासतुंग (नलवंश):** बालार्जुन के समकालीन एक क्षेत्रीय शासक थे।

इस मानचित्र से यह स्पष्ट होता है कि बालार्जुन का शासनकाल एक ऐसे दौर में था जब भारत
में कई शक्तिशाली राजवंशों का उदय हो रहा था, और सत्ता के लिए संघर्ष आम बात थी।

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### 📜 ** महाशिवगुप्त बालार्जुन (स्वर्ण युग के शासक)**

 * **नामकरण:** बचपन में धनुर्विद्या में निपुण होने के कारण इन्हें **बालार्जुन** 
   कहा गया। 🏹
 * **शासनकाल:** 595-655 ई. (इन्होंने पाण्डुवंशीय शासकों में सबसे लंबे समय तक शासन
   किया)।
 * **उपाधि:** परम महेश्वर।
 * **धार्मिक नीति:** 🤝 वे स्वयं शैव धर्म के अनुयायी थे (जबकि सिरपुर का पाण्डु वंश
   मुख्यतः वैष्णव धर्म का अनुयायी था), लेकिन उनका शासन धार्मिक सहिष्णुता के लिए 
   विख्यात है। उन्होंने सभी धर्मों को स्वतंत्रतापूर्वक विकसित होने का अवसर दिया:
    - **बौद्ध धर्म:** सिरपुर में अनेक बौद्ध विहारों का निर्माण करवाया।
    - **वैष्णव धर्म:** प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर का निर्माण कार्य पूरा करवाया।
    - **शैव धर्म:** अनेक शिव मंदिरों का निर्माण करवाया।
 * **अभिलेख और ताम्रपत्र:**
    - सिरपुर से इनके **27 ताम्रपत्र** मिले हैं।
    - इनके अभिलेखों की शुरुआत **‘ओम नमः शिवाय’** से होती थी, जो उनकी शैव आस्था को
      दर्शाता है।
 * **मुद्रा:** 💰 केसरी लेख वाली स्वर्ण मुद्रा बालपुर (सक्ती) से मिली है, जिसमें
   गजलक्ष्मी के स्थान पर **नंदी (वृषभ) और त्रिशूल** का अंकन है।
 * **उपलब्धि:** 🌟 इनके शासनकाल को छत्तीसगढ़ के इतिहास का **स्वर्णकाल** कहा जाता
   है क्योंकि इस दौरान कला, साहित्य, धर्म और वास्तुकला का चहुंमुखी विकास हुआ।
 * **प्रमुख निर्माण कार्य:** 🏛️
    - **शिव मंदिर:** गंधेश्वर महादेव (सिरपुर), बालेश्वर भट्टारक, सिद्धेश्वर महादेव(
      पलारी), अण्डलदेव मंदिर (खरौद)।
    - **ग्राम दान:** बौद्ध आचार्य बुद्धघोष के सिरपुर अभिलेख के अनुसार, उन्होंने **
      जिनघोष** को ग्राम दान दिया था।
 * **समकालीन शासक:**
    1. पुष्यभूति (वर्धन) वंश के **हर्षवर्धन**।
    2. चालुक्य वंश के **पुलकेशिन द्वितीय**।
    3. नलवंशीय शासक **विलासतुंग**।
 * **वंश का पतन:**
    - एहोल अभिलेख के अनुसार, चालुक्य शासक **पुलकेशिन द्वितीय** ने दक्षिण कोसल पर
      आक्रमण करके पाण्डुवंश के शासन को समाप्त कर दिया।
    - बालार्जुन के बाद, कुछ समय के लिए उनके भाई **रणकेसरी** और पुत्र **शिवनंदी**
      ने शासन किया।

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### 📜 ** ह्वेनसांग का आगमन और प्रमुख मंदिर**

#### **यात्री का आगमन 🌏 ह्वेनसांग का यात्रा वृत्तांत**

 * **परिचय:** ह्वेनसांग एक **चीनी बौद्ध यात्री** थे।
 * **उद्देश्य:** उनका भारत आने का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म से संबंधित ज्ञान प्राप्त
   करना था।
 * **यात्रा वर्ष:** उन्होंने **639 ई. (7वीं शताब्दी)** में छत्तीसगढ़ की यात्रा की।
 * **तत्कालीन शासक:** उनकी यात्रा के समय सिरपुर क्षेत्र में **महाशिवगुप्त बालार्जुन**
   का शासन था।
 * **रचना:** उन्होंने अपनी पुस्तक **‘सी-यू-की’** में छत्तीसगढ़ को **‘किया-स-लो’**
   नाम से संबोधित किया है।
 * **विवरण:**
    - ह्वेनसांग ने लिखा कि यहाँ का राजा क्षत्रिय होते हुए भी बौद्ध धर्म में गहरी
      आस्था रखता था।
    - उनके अनुसार, राज्य में 100 संघाराम (बौद्ध विहार) थे, जहाँ लगभग 10,000 महायान
      बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।
    - उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सिरपुर में सम्राट **अशोक** द्वारा निर्मित एक
      बौद्ध विहार स्थित है।

#### **छत्तीसगढ़ में वास्तुकला का स्वर्णयुग** 🏛️

महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल के दौरान 22 शिव मंदिर, 4 विष्णु मंदिर, 10 बौद्ध
विहार, 3 जैन विहार और प्रधानमंत्री निवास जैसे अनेक निर्माण हुए, जिनके प्रमाण आज 
भी मिलते हैं।

#### **दो महान मंदिरों की तुलना**

| विशेषता | लक्ष्मण मंदिर (विष्णु मंदिर) | लक्ष्मणेश्वर मंदिर (शिव मंदिर) | 
| **स्थान** | सिरपुर (महासमुंद) | खरौद (जांजगीर-चांपा) | 
| **निर्माण प्रारंभ** | रानी वासटादेवी द्वारा | ईशान देव द्वारा | 
| **निर्माण पूर्ण** | महाशिवगुप्त बालार्जुन द्वारा | – | 
| **समर्पित देव** | भगवान विष्णु (बैकुंठनारायण) | भगवान शिव | 
| **शैली** | नागर शैली, लाल ईंटों से निर्मित | नागर शैली | 
| **उपनाम/प्रसिद्धि** | – | **लाखा चाऊर मंदिर** (1 लाख चावल के छिद्रों के लिए प्रसिद्ध) | 
| **कथन/तुलना** | रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे ‘अद्भुत रत्न’ कहा, एडविन अर्नाल्ड ने इसकी तुलना ‘ताजमहल’ से की। | – | 
| **जीर्णोद्धार** | – | कल्चुरी शासक रत्नदेव तृतीय के सेनापति गंगाधर राव द्वारा | 
| **अन्य नाम** | – | लखेश्वर महादेव, कालेश्वर महादेव, लक्षलिंग महादेव, ईशानेश्वर मंदिर |

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### 📜 ** स्वर्णयुग के स्मारक और बाण वंश**

#### **छत्तीसगढ़ के स्वर्णयुग के प्रमुख स्मारक** ✨

 * तीवरदेव बौद्ध विहार
 * पद्मपाणि बौद्ध विहार
 * भिक्षुणी विहार
 * राम मंदिर
 * त्रिदेव मंदिर
 * बालेश्वर महादेव मंदिर
 * आनंदप्रभु बौद्ध विहार (निर्माण: आनंदप्रभु)
 * बौद्ध सुरंग टीला मंदिर
 * लक्ष्मण मंदिर
 * जैन विहार
 * गंधेश्वर महादेव मंदिर
 * सिद्धेश्वर महादेव मंदिर (पलारी)
 * भद्रेश्वर शिव मंदिर (कालिंजर)

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# **🏹 बाण वंश **

 * **शासनकाल:** ⏳ इन्होंने **9वीं सदी** के दौरान एक संक्षिप्त अवधि के लिए शासन 
   किया।
 * **संस्थापक:** 👑 इस वंश की स्थापना **महामण्डलेश्वर मल्लदेव** ने की थी।
 * **राजधानी:** इनकी राजधानी **पाली (कोरबा)** थी।
 * **मूल स्थान:** बाणवंशी मूल रूप से **आंध्र प्रदेश** के निवासी थे।

#### **प्रमुख शासक: विक्रमादित्य** 👑

 * **निर्माण:** 🏛️ इन्होंने 9वीं सदी में पाली में एक विशाल **प्रस्तर (पत्थर) शिव
   मंदिर** का निर्माण करवाया। बाद में, कल्चुरी शासक **जाजल्यदेव प्रथम** ने इसका 
   जीर्णोद्धार करवाया।
 * **पहचान:** बाण वंश के शिलालेखों में विक्रमादित्य की पहचान **“जयमेरु”** या **“
   जयमऊ”** के रूप में की गई है।
 * **वंश का अंत:** ⚔️ त्रिपुरी के कल्चुरी शासक **शंकरगण द्वितीय** ने विक्रमादित्य
   को पराजित कर इस वंश का अंत कर दिया।

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# 📜 **कलिंग का सोमवंश (9वीं-11वीं सदी)**

#### **वंश का समग्र परिचय** 🌏

 * **शासन अवधि:** ⏳ इन्होंने 9वीं से 11वीं शताब्दी के बीच एक महत्वपूर्ण राजवंश 
   ने शासन किया।
 * **वंश के प्रणेता:** 👑 इस वंश की स्थापना का श्रेय **शिवगुप्त** को जाता है।
 * **उपाधि:**
    - **त्रिकलिंगाधिपति:** संस्थापक शिवगुप्त को छोड़कर, लगभग सभी सोमवंशी शासकों 
      ने यह गौरवशाली उपाधि धारण की।
    - **कौसलेन्द्र:** यह उपाधि भी इनके शासकों द्वारा धारण की गई।
 * **शासन क्षेत्र:** इनका साम्राज्य **कोसल, कलिंग, और उत्कल**—इन तीन प्रमुख क्षेत्रों
   में फैला हुआ था।
 * **समकालीन राजवंश:** ये **भौमकर राजवंश (ओड्र क्षेत्र)** के समकालीन थे।
 * **उत्पत्ति का रहस्य:** 🤔 इस वंश की उत्पत्ति को लेकर एक दिलचस्प मत है। ऐतिहासिक
   साक्ष्यों से पता चलता है कि महाशिवगुप्त के पुत्र ने स्वयं को पाण्डुवंशी कहने 
   के बजाय सोमवंशी कहना शुरू कर दिया, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे या तो पाण्डुवंश
   की एक शाखा थे या एक नए स्वतंत्र राजवंश के रूप में उभरे।
 * **नामकरण की परंपरा:** 👑 इस वंश में शासक राजा बनने पर अपने व्यक्तिगत नाम के साथ
   एक राजकीय नाम (या तो **महाभवगुप्त** या **महाशिवगुप्त**) भी धारण करते थे। यह परंपरा
   क्रमानुसार चलती थी—अर्थात्, महाशिवगुप्त के पुत्र का राजकीय नाम महाभवगुप्त होता
   था, और उसके पुत्र का फिर से महाशिवगुप्त।

#### **सोमवंश की वंशावली** 📜

 * **शिवगुप्त (संस्थापक)**
    - ↓
 * **महाभवगुप्त-I जनमेजय**
    - ↓
    - **शाखा 1:** महाशिवगुप्त-I ययाति
       * ↓
       * **महाभवगुप्त-II भीमरथ**
          - ↓
          - **महाशिवगुप्त-II धर्मरथ**
          - **महाभवगुप्त-III नहुष**
          - **इन्द्ररथ**
    - **शाखा 2:** विचित्रवीर्य
       * ↓
       * **अभिमन्यु**
          - ↓
          - **महाशिवगुप्त-III चंडीहर ययाति**
             * ↓
             * **महाभवगुप्त-IV उद्योतकेसरी**
                - ↓
                - **महाशिवगुप्त-IV जनमेजय**
                   * ↓
                   * **महाभवगुप्त-V पुरंजय**
                   * **महाशिवगुप्त-V कर्ण**

---

### 📜 **सोमवंश के प्रमुख शासक **

आइए, इस वंश के प्रभावशाली शासकों और उनके योगदान को जानते हैं:

#### **👑 शिवगुप्त**

 * **भूमिका:** ये इस वंश के **संस्थापक** और प्रथम शासक थे।
 * **संघर्ष:** ⚔️ इनके शासनकाल में त्रिपुरी के कल्चुरी राजा **मुग्धतुंग** ने कोसल
   पर आक्रमण किया और पाली (कोरबा) क्षेत्र को इनसे छीन लिया।

#### **👑 महाभवगुप्त प्रथम – जनमेजय (880 से 920 ई.)**

 * **अन्य नाम:** इन्हें **धर्मकंदर्प** और **स्वभावतुंग** के नामों से भी जाना जाता
   है।
 * **उपाधियाँ:** इन्होंने परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, त्रिकलिंगाधिपति, और
   कौसलेन्द्र जैसी कई उपाधियाँ धारण कीं।
 * **मुख्य कार्य:**
    - 🛡️ इन्होंने कल्चुरियों को पराजित कर अपने खोए हुए क्षेत्रों को **पुनः प्राप्त**
      किया।
    - इनके शासनकाल से जुड़े **13 ताम्रपत्र** मिले हैं, जो इनके प्रभाव को दर्शाते
      हैं।
    - ये **त्रिकलिंगाधिपति** की उपाधि धारण करने वाले **प्रथम सोमवंशी** शासक थे, 
      जो बाद में वंश की पहचान बन गई।
 * **राजधानी:** सुवर्णपुर (सोनपुर)।

#### **👑 महाशिवगुप्त प्रथम – ययाति (920 से 955 ई.)**

 * **साम्राज्य विस्तार:** इन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार **सम्पूर्ण ओडिशा क्षेत्र**
   तक किया।
 * **नगर का नामकरण:** इन्होंने विनीतपुर का नाम बदलकर **ययाति नगर** कर दिया, जहाँ
   से ये दान पत्र जारी करते थे।
 * **युद्ध:** ⚔️ इन्होंने चेदि नरेश **दुर्गराज** को पराजित किया और उसे युद्ध में
   जला दिया।

#### **👑 महाभवगुप्त द्वितीय – भीमरथ (955 से 975 ई.)**

 * **राजधानी:** ययाति नगर।
 * **धर्म:** ये **शैव धर्म** के अनुयायी थे।
 * **संघर्ष:** 🛡️ इनके समय में त्रिपुरी के कल्चुरी शासक **लक्ष्मणराज द्वितीय** (
   945-970 ई.) ने कोसल और ओड्र पर आक्रमण किया। हालांकि, भीमरथ ने सफलतापूर्वक अपने
   साम्राज्य की रक्षा की।
 * **प्रशंसा:** इन्हें **“पृथ्वी का भूषण”** और **“कलि का कल्पवृक्ष”** जैसी संज्ञाएँ
   दी गई हैं, जो उनकी महानता को दर्शाती हैं।

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### 📜 **पेज 21: सोमवंश के शासक (भाग-2) और पतन**

#### **👑 महाशिवगुप्त द्वितीय – धर्मरथ (975 से 995 ई.)**

 * **उपाधि:** सोमकुलतिलक और त्रिकलिंगाधिपति।
 * **मुद्रा:** इनकी राजमुद्रा में कमल पर बैठी लक्ष्मी (पद्मलक्ष्मी) का अंकन मिलता
   है।
 * **विजय अभियान:** ⚔️ **महुलपारा अभिलेख** के अनुसार, धर्मरथ ने आंध्र और गौड़ (बंगाल)
   के नगरों को जला दिया था, जो इनके साम्राज्य के व्यापक विस्तार को दिखाता है।
 * **प्रशंसा:** ब्रम्हेश्वर मंदिर शिलालेख में इन्हें **द्वितीय परशुराम** की संज्ञा
   दी गई है।

#### **👑 महाभवगुप्त तृतीय – नहुष (995 से 1010 ई.)**

 * **शासनकाल:** इनका शासनकाल **अशांतियों से भरा** रहा। साम्राज्य पर अधिकार के लिए
   इनके संबंधियों ने ही विद्रोह कर दिया था।

#### **👑 इन्द्ररथ (1010 से 1022 ई.)**

 * **पराजय और अंत:** ⚔️ 1022 ई. में चोल शासक **राजेन्द्र प्रथम** ने ययाति नगर पर
   आक्रमण कर इन्द्ररथ को बंदी बना लिया और बाद में उनकी हत्या कर दी। इस घटना से सोमवंशियों
   ने एक बड़ा भू-भाग खो दिया।

#### **👑 महाशिवगुप्त तृतीय – चंडीहर ययाति**

 * **योगदान:** इन्होंने सोमवंश के खोए हुए गौरव और साम्राज्य के वैभव को **पुनः स्थापित**
   किया।

#### **👑 महाभवगुप्त चतुर्थ – उद्योतकेसरी (1040 से 1065 ई.)**

 * **जानकारी का स्रोत:** इनकी माता **कोलावती** के भुवनेश्वर अभिलेख से इनके विजय 
   अभियानों की जानकारी मिलती है।
 * **शासन क्षेत्र:** इन्होंने कोसल और उत्कल, दोनों क्षेत्रों पर सफलतापूर्वक शासन
   किया।

#### **👑 महाशिवगुप्त चतुर्थ – जनमेजय**

 * **संघर्ष:** इनका युद्ध छिंदकनागवंशीय शासक **सोमेश्वर देव** के साथ हुआ था।
 * **उपाधि:** त्रिकलिंगाधिपति।

#### **👑 कर्णकेसरी**

 * **भूमिका:** ये सोमवंश के **अंतिम शासक** थे।
 * **अभिलेख:** रत्नागिरि अभिलेख में इनका उल्लेख मिलता है।

#### **📉 वंश का पतन**

इस शक्तिशाली वंश का अंत दो प्रमुख शक्तियों के आक्रमण से हुआ:

 1. **उत्कल क्षेत्र** से गंगवंशीय शासक **अनंतवर्मन चोडगंग** ने इन्हें पराजित किया।
 2. **कोसल क्षेत्र** से कल्चुरी नरेश **जाजल्यदेव-प्रथम** ने सोमवंश के शासन को समाप्त
    कर दिया।

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# 📜 ** क्षेत्रीय राजवंशों की स्थापत्य कला और उपाधियाँ**

#### **🏛️ क्षेत्रीय राजवंशों द्वारा निर्मित प्रमुख स्थापत्य**

यहाँ विभिन्न राजवंशों द्वारा निर्मित महत्वपूर्ण मंदिरों और महलों की सूची दी गई है,
जो उनकी कला और संस्कृति की अमिट छाप छोड़ते हैं:

| राजवंश | शासक का नाम | स्थापत्य / निर्माण | स्थान | शताब्दी | 
| **1. पांडु वंश** | इन्द्रबल / ईशानदेव | लक्ष्मणेश्वर मंदिर | खरौद | 6वीं सदी | 
|  | रानी वासटा एवं बालार्जुन | लक्ष्मण मंदिर | सिरपुर | 7वीं सदी | 
| **2. नल वंश** | विलासतुंग | राजीव लोचन मंदिर | राजिम | 7-8वीं सदी | 
| **3. बाण वंश** | विक्रमादित्य | पाली का शिवमंदिर (प्रस्तर मंदिर) | पाली (कोरबा) | 9वीं सदी | 
| **4. छिंदकनाग वंश** | धारावर्ष | शिवमंदिर | बारसूर | 11वीं सदी | 
|  | सोमेश्वरदेव | विष्णु मंदिर | नारायणपाल | 11वीं सदी | 
| **5. फणीनाग वंश** | गोपालदेव व लक्ष्मण देवराय | भोरमदेव मंदिर | चौरा ग्राम (कवर्धा) | 11वीं सदी | 
|  | रामचन्द्रदेव | मण्डवा (मड़वा) महल | छपरी ग्राम | 14वीं सदी | 
|  |  | छेरकी महल | चौरा ग्राम | 14वीं सदी | 
| **6. सोम वंश** | कर्णराज | कर्णेश्वर महादेव मंदिर | सिहावा | 12वीं सदी | 
|  |  | राम मंदिर | कांकेर | 12वीं सदी |

# **👑 शासकों द्वारा धारण की गईं उपाधियाँ**

यह तालिका विभिन्न राजवंशों के शासकों द्वारा धारण की गई प्रमुख उपाधियों को दर्शाती
है, जो उनके प्रभाव और प्रतिष्ठा का प्रतीक थीं:

| क्र. | उपाधि | शासक का नाम और वंश | 
| **1.** | **त्रिकलिंगाधिपति** | महाशिवगुप्त-चतुर्थ, सोमवंशी शासक धर्मरथ (ओडिशा के) | 
| **2.** | **सकलकोसलाधिपति** | तीवरदेव (पाण्डुवंश), पृथ्वीदेव प्रथम (कल्चुरीवंश) | 
| **3.** | **भोगवतीपुरेश्वर** | छिंदकनागवंशीय शासक | 
| **4.** | **परममहेश्वर** | महाशिवगुप्त बालार्जुन (पाण्डुवंश) | 
| **5.** | **सेंट ऑफ जेरूसलम** | रूद्र प्रतापदेव (काकतीय वंश) | 
| **6.** | **परमभागवत** | पाण्डुवंशीय शासक | 
| **7.** | **भट्टारक** | भवदत्तवर्मन (नलवंश) | 
| **8.** | **राजयोगी / राज्ययोगी** | राजर्षितुल्यकुल वंश | 
| **9.** | **प्राक् परमेश्वर** | हर्ष गुप्त |

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# 📜** प्राचीनकालीन शासकों की मुद्राएँ**

#### **💰 प्राचीन शासकों द्वारा जारी सिक्के**

यह तालिका छत्तीसगढ़ के विभिन्न स्थानों से प्राप्त प्राचीन मुद्राओं और सिक्कों का
विवरण देती है, जो तत्कालीन आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर प्रकाश डालते हैं:

| वंश | जिला | स्थान | सिक्के की विशेषताएँ | 
| **1. मौर्य काल** | जांजगीर-चांपा, सक्ती, सारंगढ़, रायपुर | अकलतरा, ठठारी, बार व देवगांव, तारापुर, आरंग, उडेला | रूपभाषक और आहत मुद्राएँ; कोटगढ़ की प्राचीन बनावट। | 
| **2. शुंग वंश** | बिलासपुर | मल्हार | वसुमित्र के तांबे के सिक्के। | 
| **3. सातवाहन वंश** | बिलासपुर, सक्ती | मल्हार, बालपुर, चकरबेड़ा | राजा अपीलक, पुडुमावी, वेदसिरिस, और शातकर्णी के सिक्के। रोम की मुद्राएँ भी मिलीं। | 
| **4. कुषाण वंश** | बिलासपुर, रायगढ़, कोरबा | पेंडरवा/झाझापुरी, तेलीकोट (खरसिया), कोरबा | कुषाणकालीन सिक्के (खोजकर्ता: डॉ. सी. के. साहू)। | 
| **5. गुप्तकाल** | दुर्ग, रायपुर, बालोद, रायगढ़, गरियाबंद, बलौदाबाजार | बानाबरद, आरंग, पिटईवल्द, खैरताल, कुलिया, खरसिया, पितेबन्दगाँव (राजिम), खेरनाल ग्राम | कुमारगुप्त, स्कंदगुप्त, काँचगुप्त, विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त द्वितीय के सिक्के, जिनमें रत्नजड़ित मयूर और धनुर्धारी प्रकार शामिल हैं। | 
| **6. नल वंश** | कोण्डागांव, बालोद | अडेंगा (32 स्वर्ण सिक्के), कुलिया (55 स्वर्ण सिक्के) | वराहराज (29), भवदत्तवर्मन (1), अर्थपति भट्टारक (2) और स्तंभराज के स्वर्ण सिक्के। | 
| **7. शरभपुरीय वंश** | बिलासपुर | मल्हार | प्रसन्नमात्र के स्वर्ण सिक्के। | 
| **8. मित्रवंश** | बिलासपुर | मल्हार | मल्हार टकसाल में निर्मित; ‘गामसकोसलीय’ ब्राम्ही लिपि में वर्णित। |

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# 📜 ** शहरों के वर्तमान और प्राचीन नाम**

#### **🏛️ नगरों के बदलते नाम और उनके संस्थापक**

यह सूची छत्तीसगढ़ के प्रमुख नगरों के वर्तमान नामों को उनके प्राचीन नामों और उन्हें
बसाने वाले शासकों (या वंश) से जोड़ती है:

| वर्तमान नगर | प्राचीन नाम | बसाने वाले शासक (वंश) | 
| मल्हार | प्रसन्नपुर / मल्हारिपत्तन | प्रसन्नमात्र (शरभपुरी) | 
| दुर्ग | दुर्गराज / मानमात्र | (शरभपुरी) | 
| सिरपुर | चित्रांगदपुर / श्रीपुर | महासुदेवराज (शरभपुरी) | 
| खरौद | इंद्रपुर / खदिरप्रद | इन्द्रबल (पाण्डुवंश) | 
| रतनपुर | रतनपुर | रत्नदेव प्रथम (कल्चुरी वंश) | 
| जांजगीर | जाजल्यपुर / जाजल्यनगरी | जाजल्यदेव प्रथम (कल्चुरी वंश) | 
| तखतपुर | — | तखतसिंह (कल्चुरी वंश) | 
| राजपुर / जूनानगर | — | राजसिंह (कल्चुरी वंश) | 
| रायपुर | — | रामचंद्र देव (रायपुर कल्चुरी वंश) | 
| बस्तर | भ्रमरकोट | [CG PSC(ACF)2016] | 
| सरगुजा रियासत | डान्डोर / डान्डोरा / झारखण्ड | — | 
| कांकेर रियासत | काकरय / कंकण / कंकणाय / कंक नगरी | — | 
| बस्तर रियासत | दण्डकारण्य / महाकांतार / भ्रमरवद्र / भ्रमरकोट | — | 
| भोपालपट्टनम | पुष्करी | — | 
| कवर्धा रियासत | पौरागढ़ तालुका | — | 
| राजनांदगांव | नांदगांव, नंदीग्राम | — | 
| छुईखदान क्षेत्र | कोंडका इलाका | — | 
| पंडरिया जमींदारी | मुकुटपुर / मुक्तापुर, प्रतापगढ़ | [CG PSC(HLL)2017] | 
| बिन्द्रानवागढ़ जमींदारी | नवागढ़ | — | 
| मल्हार (कल्चुरीकाल) | तलहारि मण्डल / मल्हारीपत्तन | — | 
| सारंगढ़ | सरहरागढ़ / सारंगपुर | — | 
| जूनाशहर | राजपुर | — | 
| धरमजयगढ़ | रबकोन / राभको | — | 
| चंपारण | चांपाझर | — | 
| जशपुर नगर | जगदीशपुर | — | 
| खल्लारी | मृत्कागढ़, खल्लवाटिका | — | 
| शिवरीनारायण | शौरी नारायण | — | 
| धमतरी | धर्मतराई | — | 
| चित्रकूट | चक्रकोट | — | 
| राजिम | पदमपुर, कमलक्षेत्र | — | 
| पेंड्रा | पंडरा | — | 
| डोंगरगढ़ | कामावतीपुरम | — | 
| धमधा | धर्मधाम | — |
