📜 छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: भाग -1
📜 छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: भाग -2
📜 छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: भाग -3
छत्तीसगढ़ का इतिहास, भारत के इतिहास से काफी प्रभावित रहा है, जो मानव सभ्यता के प्रारंभिक विकास से लेकर आधुनिक काल तक के एक लंबे इतिहास का साक्षी है।
✍️ लिपि के विकास के आधार पर प्रदेश के इतिहास को तीन मुख्य भागों में वर्गीकृत किया गया है—
1️⃣ प्रागैतिहासिक काल
2️⃣ आद्यऐतिहासिक काल
3️⃣ ऐतिहासिक काल
[CGVyapam (ITIH)2023]
🕰️ छत्तीसगढ़ के इतिहास का वर्गीकरण
1. 🗿 प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Age)
- पूर्व-पाषाण काल
- मध्य-पाषाण काल
- उत्तर-पाषाण काल
- नव-पाषाण काल
2. 📖 आद्यऐतिहासिक काल (Proto-historic Age)
- इसके अंतर्गत सिंधुघाटी सभ्यता आती है।
3. 🏛️ ऐतिहासिक काल (Historic Age)
👑 प्राचीन इतिहास (Ancient History)
- वैदिक काल
- रामायण काल
- महाभारत काल
- महाजनपद काल
- मौर्यकाल
- सातवाहन काल
- कुषाण वंश
- मेघ वंश
- वाकाटक काल
- गुप्त वंश
- राजर्षितुल्य वंश (छत्तीसगढ़ का प्रथम स्थानीय राजवंश)
- नल वंश
- शरभपुरीय वंश
- शैल वंश
- पाण्डु वंश
- बाण वंश
- सोम वंश
🏰 मध्यकालीन इतिहास (Medieval History)
- कल्चुरी वंश: रतनपुर कल्चुरी, रायपुर कल्चुरी
- नाग वंश: फणीनाग वंश (कवर्धा), छिंदक नाग वंश (बस्तर)
- कांकेर के सोम वंश
- काकतीय वंश
- गंगवंश
आधुनिक इतिहास
- मराठा: अप्रत्यक्ष, प्रत्यक्ष
- सूबा व्यवस्था
- अप्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन
- पुनः मराठा शासन
- 1857 की क्रांति
- प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन
— राष्ट्रीय राजवंश
- मौर्य वंश
- सातवाहन वंश
- कुषाण वंश
- मेघ वंश
- वाकाटक वंश
- गुप्त वंश
🗓️ छत्तीसगढ़ के इतिहास का घटनाक्रम
| वंश क्रम | कालावधि | संस्थापक/प्रथम शासक | अंतिम शासक | राजधानी |
|---|---|---|---|---|
| पाषाण काल | – | – | – | – |
| वैदिक काल | 1500 ई.पू. – 600 ई.पू. | – | – | श्रावस्ती व कुशस्थली |
| रामायणकाल | – | – | – | – |
| महाभारतकाल | – | – | – | – |
| महाजनपदकाल | (छठवीं शताब्दी ई.पू.) | – | – | चेदि महाजनपद |
| नंद मौर्यकाल | 323 ई.पू. – 187 ई.पू. | चन्द्रगुप्त मौर्य | वृहद्रथ | पाटलिपुत्र |
| सातवाहन काल | – | सिमुक | विजय सातकर्णी | प्रतिष्ठान (महाराष्ट्र) |
| कुषाण वंश | 1-2 वीं शताब्दी | कुजुल कडफिसेस | वासुदेव प्रथम | – |
| मेघ वंश | 1-2 वीं शताब्दी | – | – | – |
| वाकाटक वंश | 3-4 वीं शताब्दी | विंध्यशक्ति | हरिषेण | नंदीवर्धन (नागपुर) |
| गुप्त वंश | 319-550 ई. तक | श्रीगुप्त | विष्णुगुप्त | पाटलिपुत्र |
| राजर्षितुल्य वंश | 4-6 वीं शताब्दी तक | शूरा | भीमसेन-II | आरंग |
| नलवंश | 5-12 वीं शताब्दी तक | शिशुक | नरेन्द्र थबल | पुष्करी / कोरापुट |
| शरभपुरीय वंश | 5-6वीं शताब्दी के उत्तरार्ध | शरभराज | प्रवरराज-II | सिरपुर / मल्हार / सारंगढ़ |
| शैल वंश | 7 – 8 वीं शताब्दी तक | श्रीवर्धन | – | – |
| मैकल का सोमवंश | – | जयबल | सूरबल | – |
| पाण्डुवंश | 6-7 वीं शताब्दी-8 वीं तक | उदयन | – | सिरपुर |
| बाण वंश | 9 वीं शताब्दी | महामण्डलेश्वर मल्लदेव | विक्रमादित्य | पाली (कोरबा) |
| सोमवंशीय शासक (ओडिशा) | 9-11 वीं शताब्दी | शिवगुप्त | कर्णकेसरी | – |
| नाग वंश (A) फणी नाग | 9 वीं से 15 वीं शताब्दी तक | अहिराज | मोनिंग देव | कवर्धा |
| नाग वंश (B) छिन्दक नाग | 1023 – 1324 ई. तक | नृपतिभूषण | हरिशचन्द्रदेव | चक्रकोट / भ्रमरकोट |
| कल्चुरी वंश | 1000 – 1741 ई. तक | कलिंगराज | मोहन सिंह | तुम्माण / रतनपुर |
| रायपुर कल्चुरी वंश | – | रामचन्द्रदेव | अमरसिंह देव | रायपुर |
| कांकेर के सोमवंश | 1191 – 1320 ई. | सिंहराज | – | कांकेर |
| काकतीय वंश | 14 वीं-20 वीं शताब्दी तक | अन्नमदेव | प्रवीरचंद्र भंजदेव | बस्तर / जगदलपुर |
| भोंसला शासन (A) अप्रत्यक्ष मराठा | 1741 – 1758 ई. | रघुनाथ सिंह | मोहन सिंह | रतनपुर |
| भोंसला शासन (B) प्रत्यक्ष मराठा | 1758 – 1787 ई. | बिम्बाजी भोंसले | – | रतनपुर |
| भोंसला शासन (C) सूबा व्यवस्था | 1787 – 1818 ई. | महिपत राव | यादवराव | रतनपुर |
| भोंसला शासन (D) अप्रत्यक्ष ब्रिटिश | 1818 – 1830 ई. | कै. एडमंड | क्रॉफर्ड | रतनपुर → रायपुर |
| भोंसला शासन (E) पुनः मराठा | 1830 – 1854 ई. | रघुजी तृतीय | – | रायपुर |
| अंग्रेजी शासन | 1854 – 1947 ई. | – | – | रायपुर |
🏞️ छत्तीसगढ़ के पाषाणकालीन स्थल
1. 🗿 पूर्व-पाषाणकाल
- सिंघनपुर (रायगढ़)
- छापामारा (रायगढ़)
- भंवरखोल (रायगढ़)
- गिधा (रायगढ़)
- सोनबरसा (रायगढ़) (अमरगुफा) [CGVyapam(CBAS)2023]
2. 🏹 मध्य-पाषाणकाल
- कबरा पहाड़ (रायगढ़)
- कालीपुर (बस्तर)
- खड़गघाट (बस्तर)
- गढ़चंदेला (बस्तर)
- घाटलोहांग (बस्तर)
- भातेवाड़ा (बस्तर)
- राजपुर (बस्तर)
- गढ़ घोघरा (बस्तर)
- जयमरगा (जशपुर)
- केराझर (रायगढ़)
3. 🏺 उत्तर-पाषाणकाल
- धनपुर (गौ.-पे.-म.)
- महानदी घाटी (रायगढ़)
4. 🌱 नव-पाषाणकाल
- चितवाडोंगरी (बालोद)
- अर्जुनी (बालोद)
- टेरम (रायगढ़)
- बोनटिला (राजनांदगांव)
- करमागढ़ (रायगढ़)
- बसनाझर (रायगढ़)
- ओंगना (रायगढ़) [CGPSC(HYD)2020]
- भैसगढ़ी (रायगढ़) [CGPSC(HYD)2020]
- लिखामाड़ा (रायगढ़)
- बेनीपाट (रायगढ़)
- बोतल्दा (रायगढ़)
🕵️♂️ गुफा, पुरातात्विक स्थल एवं खोजकर्ता
- सीता बेंगरा (सरगुजा): कर्नल आउस्ले (1848)
- सिंघनपुर एवं कबरा पहाड़ (रायगढ़): अंग्रेज इतिहासकार रॉबर्ट एंडरसन (1910)
- सिंघनपुर शैलचित्र का विस्तृत अध्ययन एवं सर्वेक्षण (1923-27): अमरनाथ दत्त
- महत्वपूर्ण जानकारी का एकत्रकर्ता: डॉ. एन. घोष, डी.एच. गार्डन एवं लोचन प्रसाद पाण्डेय
- नवपाषाणिक अवशेषों की सर्वप्रथम जानकारी: डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र व डॉ. भगवान सिंह बघेल
- चितवाडोंगरी में शैलचित्रों की खोज: रमेन्द्रनाथ मिश्र एवं भगवान सिंह बघेल [CGPSC(Pre)2020]
- गढ़धनौरा (कोण्डागांव): प्रो. काम्बले व रमेन्द्रनाथ मिश्र
- करकाभाटा महापाषाण का उत्खनन: अरूण कुमार शर्मा
💡 विशेष तथ्य
जशपुर का लेखापत्थर एवं बस्तर जिले का मटनार पाषाणकालीन स्थल है।
रायगढ़ जिले के 18 स्थानों से शैलचित्रों की प्राप्ति हुई है।
प्रमुख: करमागढ़, बसनाझर, ओंगना, भैसगढ़ी, लिखामाड़ा, बेनीपाट, बोतल्दा, अमरगुफा [CGVyapam (CBAS)2023][CGPSC(Asst. HYD)2020]
प्रदेश की प्राचीनतम गुफा – सिंघनपुर > कबरा पहाड़
प्रदेश की सबसे लम्बी गुफा – बोतल्दा की गुफा
साल्हे टेकरी (कांकेर) से 3 लाख वर्ष पुराने पाषाण उपकरण प्राप्त
चारामा (कांकेर) के प्राचीन शैलचित्रों में एलियंस के प्रमाण
सर्वाधिक महापाषाण घेरे – बालोद (लगभग-500)
प्रदेश में महापाषाणिक अवशेषों का सबसे बड़ा केन्द्र – मुजगहन
📜 पूर्व पाषाण काल (Paleolithic Age) –
🏞️ परिचय
- प्रागैतिहासिक काल के सबसे ज़्यादा शैलचित्र (rock shelters) रायगढ़ जिले से ही मिले हैं।
- पूर्व पाषाणकालीन स्थल भी यहीं स्थित हैं।
- इसी वजह से रायगढ़ को “शैलाश्रयों का गढ़” भी कहा जाता है।
- छत्तीसगढ़ में पूर्व पाषाणकाल से जुड़े प्रमुख स्थल:
[CGPSC(AG-3)2018], [CGPSC(VAS)2021]
📌 पूर्व पाषाणकालीन अन्य प्रमुख स्थल
| क्र. | स्थल | जिला |
|---|---|---|
| 1. | सिंघनपुर | रायगढ़ |
| 2. | छापामारा | रायगढ़ |
| 3. | भंवरखोल | रायगढ़ |
| 4. | गिधा | रायगढ़ |
| 5. | सोनबरसा / अमरगुफा | रायगढ़ |
🎨 सिंघनपुर की गुफा
- उपनाम: छत्तीसगढ़ का भीम बेटका [CGPSC(ADS)(Lib.)2017]
- 📍 जिला: रायगढ़
- 🗺️ स्थिति: चंवरढाल पहाड़ी के गिरिपाद पर (हसदेव नदी व माण्ड नदी बेसिन में स्थित पर्वतमाला)
[CGVyapam (SAAF)2021], [CGPSC(IMO)2020] - 🕵️♂️ खोजकर्ता: एंडरसन (1910 ई.), सहयोगी – सी.जे. वेल्लिंगटन (प्रकाशन 1918) [CGPSC(ARTO)2022]
- 📖 विस्तृत अध्ययन: अमरनाथ दत्त (1923-27 ई.)
- 🧠 जानकारी एकत्रकर्ता:
- लोचनप्रसाद पाण्डेय
- डॉ. एन. घोष
- डी.एच. गार्डन
🖌️ शैलचित्र
- लाल रंग → पशु, सरीसृप, टोटेमवादी आकृतियाँ
- गेरूआ रंग → मानव आकृति, सीढ़ी व दण्ड आकृति [CGVyapam (EBJE)2023]
- विशेष:
- प्रागैतिहासिक मानव (एवमेन) और मत्स्यांगना (Mermaid) का चित्र केवल यहाँ मिला।
- स्पेन, मैक्सिको और ऑस्ट्रेलिया के शैलचित्रों से समानता।
⛏️ औजार
- हस्तचलित कुदाल
- पाँच कुल्हाड़ियाँ (प्राप्तकर्ता – रायबहादुर मनोरंजन घोष)
💡 विशेषता
- यहाँ के शैलचित्र छत्तीसगढ़ के सबसे प्राचीन हैं। [CGPSC(ADS)2019,(AP)2009]
- गुफाओं में सबसे पुरानी मूर्तियाँ → मैक्सिकन और स्पेनिश मूर्तियों से समानता। [CGVS (AG-3)2021]
📝 नोट
- पण्डरिया (हाफ नदी) → अश्यूलीय पद्धति का हस्तकुठार
- सक्ती (गुंजी) → कतराना (चापर) प्रकार के बाटिकाश्म
🏞️ अन्य प्रमुख शैलाश्रय
| स्थान | जिला |
|---|---|
| हाथीमाड़ा, अरेतरा | कोरबा |
| बरहाझरिया, छातीबहार | कोरबा |
| जोगड़ादेव, गोटीटोला | कांकेर |
| बालेराव, खेरखेडा | कांकेर |
| उषा कोठी | रायगढ़ |
| लिखामाडा | रायगढ़ |
| हाथा, सोखामुड़ा | रायगढ़ |
| सिरोली डोंगरी | रायगढ़ |
🧗 2. मध्य पाषाण काल (Mesolithic Age) –
- मध्य पाषाणकालीन स्थलों को प्रकाश में लाने का श्रेय → अमरनाथ दत्त
- प्रमुख स्थल: रायगढ़ (कबरा पहाड़), बस्तर और अन्य जिले
📌 मध्य पाषाणकालीन स्थल
| क्र. | स्थल | जिला |
|---|---|---|
| 1. | कबरा पहाड़ | रायगढ़ [CGPSC(AP)2009] |
| 2. | कालीपुर | बस्तर |
| 3. | खडागघाट | बस्तर |
| 4. | गढ़चंदेला | बस्तर |
| 5. | घाटलोहांग | बस्तर |
| 6. | भातेवाडा | बस्तर |
| 7. | राजपुर | बस्तर |
| 8. | गढ घोघरा | बस्तर |
| 9. | जयमरगा | जशपुर |
| 10. | केराझर | रायगढ़ |
🎨 कबरा पहाड़
- 📍 जिला: रायगढ़ [CSPHCL 2019], [CGVyapam (LOI) 2023, (TET-2) 2024]
- 🕵️♂️ शोधकर्ता: अमरनाथ दत्त
- 🗺️ स्थिति: गजमार पहाड़ी
- 🖌️ शैलचित्र:
- लाल रंग → छिपकली, घड़ियाल, सांभर, मानव समूह
- गेरूआ रंग → कछुआ, घोड़ा, हिरण, जंगली भैंसा, बाघ से भयभीत मानव
- वर्गाकार मानव चित्र + लहरदार पंक्तियाँ
- 🐘 अभाव: हाथी का चित्र नहीं मिला
- ⛏️ औजार: [CGPSC (Mains) 2008]
- लघु पाषाण औजार (फलक, अर्द्धचंद्राकार)
- सूक्ष्म उपकरण (ल्यूनेट, ट्रेपेज, चकमक पत्थर)
- 💡 विशेषता: रायगढ़ जिले में सर्वाधिक शैलचित्र यहीं से मिले।
🗿 3. उत्तर पाषाण काल (Post Stone Age)
| स्थल | क्षेत्र | साक्ष्य |
|---|---|---|
| धनपुर | गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही [CGPSC(AP)2009] | मानव आकृतियों का चित्रण |
| महानदी घाटी | रायगढ़ [CGPSC(AP)2009] | टोटमवादी चिन्ह |
🌱 4. नव पाषाण काल (Neolithic Age) –
🔹 विशेषताएँ
इस काल में मानव ने सीखा –
- कृषि, पशुपालन
- गृह निर्माण
- बर्तन निर्माण
- कपास/ऊन कातना
📌 नव पाषाणकालीन स्थल
| क्र. | स्थल | जिला | विशेष |
|---|---|---|---|
| 1. | चितवाडोंगरी | बालोद | खोजकर्ता: डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र व भगवान सिंह बघेल [CGPSC(Pre)2020, (TSI)2024] |
| 2. | अर्जुनी | बालोद | हथौड़े जैसे शैलाश्रय [CGPSC(AP)2009, (TSI)2024] |
| 3. | बोनटिला | राजनांदगांव | उत्तर-नवपाषाणकालीन कराघातक पत्थर |
| 4. | टेरम | रायगढ़ | [CGPSC(TSI)2024] |
| 5. | करमागढ़ | रायगढ़ | – |
| 6. | बसनाझर | रायगढ़ | – |
| 7. | ओंगना | रायगढ़ | [CGPSC(HYD)2020] |
| 8. | भैसगढ़ी | रायगढ़ | [CGPSC(HYD)2020] |
| 9. | लिखामाड़ा | रायगढ़ | – |
| 10. | बेनीपाट | रायगढ़ | – |
| 11. | बोतल्दा | रायगढ़ | – |
🐉 चितवाडोंगरी
- 🕵️♂️ खोजकर्ता: डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र व भगवान सिंह बघेल [CGPSC(Pre)2020]
- 📍 स्थान: ग्राम सहगांव, डोंडीलोहारा, जिला – बालोद
- 🎨 शैलचित्र (27 गेरूआ रंग में):
- चीनी ड्रेगन → चीनी कला
- खच्चर पर सवार व्यक्ति → चीनी व्यापारियों से समानता
- नाविक → जलमार्ग उपयोग
- कृषि कार्य → खेत व स्त्री-पुरुष चित्र
- निष्कर्ष: चीन से जलमार्ग व्यापार का प्रमाण
🏞️ अन्य नवपाषाणकालीन स्थल एवं साक्ष्य –
🔹 करमागढ़
- जिला: रायगढ़
- स्थिति: ओडिशा सीमा
- शैलचित्र: बहुरंगी आकृतियाँ, मानव आकृतियाँ अनुपस्थित
🔹 बसनाझर
- जिला: रायगढ़ [CGVyapam (TET-2)2024]
- शैलचित्र: भैंसा, हाथी, गैंडा का शिकार
🔹 ओंगना
- जिला: रायगढ़ [CGPSC(Asst. HYD)2020]
- स्थिति: बानी पहाड़
🔹 भैंसगढ़ी
- जिला: रायगढ़ [CGPSC(Asst. HYD)2020]
✨ अन्य प्रागैतिहासिककालीन प्रमुख साक्ष्य
| जिला | स्थान | विशेष |
|---|---|---|
| रायगढ़ | खैरपुर | शैलचित्र अँधेरे में चमकते हैं |
| सूतीपाट (भंवरखोल) | पशु व किसान आकृति | |
| पझरापानी | त्रिभुज, वर्ग, अण्डाकार, सूर्य प्रतीक | |
| अन्य: छापामारा, सिरोली डोंगरी | – | |
| सारंगढ़ | गाताडीह | – |
| कांकेर | चारामा | शैलचित्रों में एलियंस के प्रमाण |
| अन्य: खैरखेड़ा, उरकुड़ा (चारामा), गाड़ा-गौरी | – |
।
🧱 महापाषाण काल (Megalithic Period) –
- ⛏️ ताम्र युग: नवपाषाण काल के बाद ताम्र युग आता है। दक्षिण कोसल क्षेत्र में ताम्रयुगीन काल के साक्ष्य का अभाव है, लेकिन मातृ राज्य मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के गुंगेरिया नामक स्थान से औजारों का एक बड़ा संग्रह मिला है जो तांबे से बना है।
- 🗿 महापाषाण काल / लौह युग: लौहयुगीन सभ्यताओं में शवों को दफनाने के लिए बड़े-बड़े शिलाखण्डों (पत्थरों) का प्रयोग किया जाता था, जिसे ‘महापाषाण स्मारक’ या महापाषाण पट्टतुंभ (डॉलमेन) कहते हैं। छत्तीसगढ़ में महापाषाण स्मारक के निम्न स्वरूप प्राप्त हुए हैं:
- मेनहिर (पाषाण स्तंभ)
- पिटसर्कल (गर्तवृत्त)
- शिष्ट (पेटिका)
🗺️ छत्तीसगढ़ में महापाषाणयुगीन सभ्यता के अवशेष
| क्र. | स्थान | जिला | विशेष |
| 1. | करकाभाटा | बालोद | महापाषाण घेरे के साथ लोहे के औजार और मृदभांड प्राप्त हुए हैं। उत्खननकर्ता – अरूण कुमार शर्मा पाषाणयुग का मेनहिर (पाषाण स्तंभ) प्राप्त हुआ है। [CGPSC(Registrar)2021] |
| 2. | करहीभदर | बालोद | पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।उत्खनन – मोरेश्वर गंगाधर दीक्षित |
| 3. | चिरचारी | बालोद | पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। |
| 4. | सोरर | बालोद | पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। |
| 5. | अर्जुनी | बालोद | पाषाण घेरों के साथ ताम्रकलश प्राप्त हुए हैं। |
| 6. | मुजगहन | बालोद | महापाषाण से बने केअर्न के स्मारक व पाषाण घेरे प्राप्त हुए हैं। |
| 7. | धनोरा | बालोद | पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।लगभग 500 महापाषाण स्मारक प्राप्त हुए हैं। सर्वेक्षण – डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र एवं जे.आर. काम्बले |
| 8. | गढ़धनौरा | कोण्डागांव | महापाषाणयुगीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। [CGPSC(Sci.off.)2022] |
| 9. | टेंगना | रायगढ़ | पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। |
| 10. | छोटे पेण्डरमुड़ा | रायगढ़ | पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। |
| 11. | मल्हार | बिलासपुर | महापाषाणयुगीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं। [CGPSC(Asst. HYD)2020] |
- 🪨 केअर्न / केयर्न: पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर बनाए गए पाषाण के ढेर या समूह को केअर्न कहते हैं। महापाषाण से बने केअर्न के स्मारक व पाषाण घेरे मुजगहन (बालोद) से प्राप्त हुए हैं।
- 🏛️ मेनहिर: महापाषाण काल से संबंधित साक्ष्य जिसमें विशाल खड़े पत्थरों को क्रमानुसार रखा गया है, उसे मेनहिर कहा जाता है। मेनहिर में विशाल पत्थर को सामान्यतः गोलाकार, अण्डाकार व घोड़े के नाल आकार में रखा जाता था। इसके साक्ष्य करकाभाटा से प्राप्त हुए हैं।
📜 आद्यऐतिहासिक काल (2300-1750 ई.पू.) –
इस काल के अंतर्गत सिंधुघाटी सभ्यता/हड़प्पा संस्कृति/कांस्ययुगीन सभ्यता को रखा गया है, जिसके साक्ष्य छत्तीसगढ़ में नहीं मिले हैं।
🕊️ वैदिक काल (1500-600 ई.पू.)
- 📖 परिचय: भारतीय इतिहास में वैदिक काल 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक माना जाता है। इस काल के ऐतिहासिक एवं साहित्यिक स्रोत वेद तथा अन्य वैदिक ग्रन्थ हैं। वैदिक काल में छत्तीसगढ़ से सम्बन्धित किसी भी प्रकार का प्रामाणिक साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है। [CGPSC(ACF)2016]
1. ऋग्वैदिक काल (1500 ई.पू.-1000 ई.पू.)
- निर्माता: आर्य
- विस्तार: सप्तसैंधव प्रदेश तक
- वर्णन: ऋग्वेद में कश्मीर के मुंज पर्वत से लेकर विन्ध्याचल पर्वत क्षेत्र के उत्तर तक के भू-भाग का ही वर्णन है। इस कारण छत्तीसगढ़ का वर्णन ऋग्वेद में नहीं मिलता।
2. उत्तर वैदिक काल (1000 ई.पू.-600 ई.पू.)
- वेदों में वर्णित बस्तर का नाम दक्खिन-दिक् है। [CGPSC(ADJE)2020]
- उत्तर वैदिक साहित्य में आए ‘दक्खिन-दिक्’ से सीतानाथ प्रधान ने दक्कन प्रदेश का बोध होना स्वीकार किया।
- उत्तर वैदिक काल के दौरान आर्यों का प्रसार मध्य भारत सहित दक्षिण भारत में भी हो चुका था।
- छत्तीसगढ़ भी इस काल की ऐतिहासिक घटनाओं से अछूता नहीं रहा। इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं:
- कौषीतकि नामक ब्राह्मण ग्रंथ में विन्ध्याचल पर्वत का वर्णन है।
- इस काल में नर्मदा नदी का उल्लेख रेवा नदी के रूप में किया गया।
- शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र का उल्लेख है।
- इस काल में आर्यों का प्रवेश तथा प्रसार छत्तीसगढ़ में हुआ था।
- पाणिनि के अष्टाध्यायी में प्रथम बार कोसल या दक्षिण कोसल का उल्लेख मिलता है।
📜 रामायण काल (Ramayan Period) –
🏹 रामायणकालीन किंवदंती (Legends from the Ramayan Era)
- 👑 इस क्षेत्र के शासक राजा कोसल थे, जिनके नाम पर इस क्षेत्र का नाम कोसल प्रदेश पड़ा।
- 🗣️ उस समय दक्षिण कोसल की भाषा कोसली थी, जिसे छत्तीसगढ़ की प्राचीन भाषा माना जाता है। [CG PSC (Pre)2016]
- कालांतर में, दक्षिण कोसल के राजा भानुमंत हुए।
- 📖 वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब राजा दशरथ का राज्याभिषेक हो रहा था, तब कोसल के राजा भानुमंत को भी अयोध्या आमंत्रित किया गया था। इस अवसर पर, युवराज दशरथ राजकुमारी भानुमति की सुंदरता पर मोहित हो गए और उन्होंने राजा भानुमंत से उनकी पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रखा। विवाह के बाद कोसल की राजकुमारी होने के कारण भानुमति को ‘कौशल्या’ कहा जाने लगा।
- भानुमंत की पुत्री कौशल्या का विवाह उत्तर कोसल के राजा दशरथ से हुआ। चूँकि भानुमंत का कोई पुत्र नहीं था, इसलिए यह राज्य भी राजा दशरथ को मिल गया।
- श्रीराम के बाद, उत्तर कोसल के राजा उनके ज्येष्ठ पुत्र लव बने, जिनकी राजधानी श्रावस्ती थी। जबकि, उनके छोटे पुत्र कुश को दक्षिण कोसल का राज्य मिला, जिसकी राजधानी कुशस्थली/कुशावती (कोसीर) थी।
- 🙏 जनश्रुति के अनुसार, भगवान राम ने अपने वनवास काल का सर्वाधिक समय इसी क्षेत्र में व्यतीत किया था, जिसके अनेक साक्ष्य आज भी उपलब्ध हैं।
- 📝 नोट: फुलबासन की गाथा का संबंध सीता एवं लक्ष्मण से है।
🕉️ माता कौशल्या का मंदिर (Mata Kaushalya Temple)
- 📍 स्थान: चन्दखुरी, रायपुर [CG Vyapam (SGST)2021] [CG PSC (ITI Prin.) 2022]
- 🕰️ मंदिर निर्माण: 8वीं-9वीं शताब्दी (पुरातात्विक दृष्टि से यह मंदिर सोमवंश के शासन काल में निर्मित है।)
- 🔧 मंदिर पुनर्निर्माण: 1973 (मंदिर का मूल ढांचा टूट जाने के कारण ग्रामवासियों द्वारा चंदा एकत्रित करके)।
- 🗺️ स्थित: चन्दखुरी में जलसेन सरोवर के मध्य एक टापू पर स्थित है।
- 🌉 सेतु: मंदिर को किनारे से जोड़ने के लिए सुषेण सेतु का निर्माण किया गया है।
- ✨ विशेष: यह विश्व में माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर है।
📜 त्रेतायुगीन नामकरण (Naming in the Treta Yug)
| क्र. | वर्तमान नाम | प्राचीन नाम | राजधानी | विशेष |
| 1. | छत्तीसगढ़ | दक्षिण कोसल | कुशस्थली | छत्तीसगढ़ की प्राचीन भाषा कोसली थी। [CGVyapam (Asst.Teach.)2023], [CG PSC(ARO, APO)20′ 1, (Pre)2016] |
| 2. | बस्तर | दण्डकारण्य | मधुमंत | इक्ष्वाकु के पुत्र दण्डक के नाम पर इस क्षेत्र का नाम दण्डकारण्य पड़ा। रामायण महाकाव्य में दण्डकारण्य का सर्वाधिक उल्लेख किया गया है। |
| 3. | चन्दखुरी | चन्द्रपुरी | – | यहाँ माता कौशल्या का मंदिर निर्मित है। |
🛣️ राम वनगमन पथ (Ram Van Gaman Path) –
🌳 सामान्य जानकारी
- 🌱 शुरुआत: 22 नवम्बर 2019 (चन्द्रखुरी, रायपुर)
- 🎉 उद्घाटन: 07 अक्टूबर 2021 (चन्द्रखुरी, रायपुर) [CG PSC (ARTO) 2022]
- 📍 चिन्हित स्थल: 75 स्थल [CGVyapam (VFM)2021]
- 🚶♂️ प्रथम चरण में शामिल: 10 स्थल
- 🛤️ द्वितीय चरण में शामिल: 42 स्थल (21 जिलों के)
- 📏 कुल लंबाई: 2260 कि.मी. [CG PSC (VAS) 2021]
- 📚 साहित्यिक आधार:
- मन्नूलाल यदु – “दण्डकारण्य रामायण”
- डॉ. हेमू यदु – “छत्तीसगढ़ पर्यटन में राम वनगमन पथ”
- 🔬 शोध: शोध के अनुसार, भगवान राम ने अपने वनवास काल के 14 वर्षों में से लगभग 10 वर्ष दण्डक वन (छत्तीसगढ़) में व्यतीत किए थे।
- 💡 विशेष: वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान राम छत्तीसगढ़ में बनास नदी से मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में प्रवेश किए। जहाँ उनका प्रथम चरण स्पर्श सीतामढ़ी हरचौका/घाघरा में हुआ। [CGVyapam (SAAF)2021, (SGST) 2021]
⭐ प्रथम चरण में विकास हेतु चयनित स्थल – 10
| स्थान | जिला | मान्यताएँ |
| 1. सीतामढ़ी हरचौका (घाघरा) | म.-चि.-भ. | भगवान श्रीराम के प्रथम चरण स्पर्श स्थल। अत्रिमुनि का आश्रम, सीता रसोई। [CGVyapam (SAAF), (SGST) 2021] [CG PSC (Sci. Off.) 2022] |
| 2. रामगढ़ की गुफा | सरगुजा | सीताबेंगरा व लक्ष्मणबेंगरा की गुफा स्थित है। |
| 3. शिवरीनारायण-खरौद | जांजगीर-चांपा | भगवान राम ने माता शबरी के जूठे बेर खाए थे। [CG PSC (VAS)2021] |
| 4. तुरतुरिया आश्रम | बलौदाबाजार | बारनवापारा अभ्यारण्य में स्थित तुरतुरिया वाल्मीकि ऋषि का आश्रम था, जहाँ लव-कुश का जन्म हुआ था। [CGPSC(SEE)2020, (Sci. Off.) 2022] |
| 5. चंदखुरी, चम्पारण | रायपुर | भगवान श्रीराम का ननिहाल, माता कौशल्या का मंदिर। |
| 6. राजिम | गरियाबंद | लोमश ऋषि आश्रम। [CG PSC (Sci. Off.) 2022] |
| 7. सप्तशृंगी ऋषि आश्रम | धमतरी | |
| 8. जगदलपुर | बस्तर | दलपतसागर-जगदलपुर, चित्रकोट, तीरथगढ़। |
| 9. रामाराम | सुकमा | श्रीराम द्वारा भूदेवी की पूजा। [CG PSC (Sci. Off.) 2022] |
| 10. मुकुन्दपुर-नगरी | धमतरी |
- 🌿 अन्य:
- खरौद को इंद्रपुर के नाम से जाना जाता था। यहाँ पर खर और दूषण का वध किया गया था।
- शिवरीनारायण: माता शबरी का आश्रम है।
- खरौद: माता शबरी का मंदिर है। [CG PSC(AP)201]
🗺️ राम वनगमन पर्यटन परिपथ में चिन्हित 75 स्थल
| जिला | चिन्हित स्थल | जिला | चिन्हित स्थल |
| मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर | 1. सीतामढ़ी-हरचौका, 2. सीतामढ़ी घाघरा, 3. कोटाडोल, 4. सीतामढ़ी कनवाई, 5. सिद्ध बाबा-आश्रम, 6. अमृतधारा, 7. जटाशंकरी गुफा | बिलासपुर | 40. मल्हार |
| कोरिया | 8. रामगढ़ (सोनहत), 9. बैकुण्ठपुर (पटवा-देवगढ़) | बलौदाबाजार | 41. नारायणपुर, 42. धमनी, 43. पलारी, 44. तुरतुरिया |
| सूरजपुर | 10. सीतालेखनी, 11. सूरजपुर, 12. विश्रामपुर, 13. मरहट्टा, 14. बिलद्वार गुफा, 15. सारासोर, 16. रक्सगण्डा | महासमुंद | 45. सिरपुर |
| सरगुजा | 17. देवगढ़, 18. सीताबेंगरा-जोगीमार गुफा, 19. रामगढ़ पहाड़ी, 20. सीताकुण्ड, 21. हाथीपोल गुफा, 22. लक्ष्मणगढ़, 23. महेशपुर, 24. केसरी वन, 25. मैनपाट, 26. सीतापुर, 27. मंगरेलगढ़, 28. महारानीपुर, 29. पम्पापुर | रायपुर | 46. आरंग, 47. माता कौशल्या मंदिर, चंद्रखुरी, 48. चम्पारण |
| जशपुर | 30. किलकिला (पत्थलगांव) | गरियाबंद | 49. फिंगेश्वर, 50. राजिम, 51. अतरमरा |
| रायगढ़ | 31. रामझरना, 32. धरमजयगढ़ | धमतरी | 52. रूद्री, 53. सिहावा, 54. सीतानदी |
| सक्ती | 33. चंद्रपुर (चंद्रहासिनी देवी) | कांकेर | 55. कांकेर, 56. जुनवानी |
| सारंगढ़-बिलाईगढ़ | 34. पुजारीपाली, 35. कोसीर | कोण्डागांव | 57. गढ़धनोरा, 58. जटायुशिला |
| जांजगीर-चांपा | 36. शिवरीनारायण, 37. पचरीघाट, 38. खरौद, 39. जांजगीर | बस्तर | 59. पंचाप्सर तीर्थ, 60. मधुपुरी, 61. चित्रकोट, 62. नारायणपाल, 63. जगदलपुर, 64. दंतेश्वरी मंदिर, 65. तीरथगढ़, 66. कुटुम्बसर |
| नारायणपुर | 67. नारायणपुर, 68. रक्साडोंगरी, 69. छोटेडोंगर | ||
| दंतेवाड़ा | 70. बारसूर, 71. दंतेवाड़ा, 72. गीदम | ||
| सुकमा | 73. रामाराम, 74. इंजरम, 75. कोन्टा |
🙏 रामायणकालीन ऋषियों के आश्रम
यह तालिका छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में स्थित उन आश्रमों और स्थानों को दर्शाती है जो रामायण काल के महान ऋषियों से संबंधित हैं।
| जिला | ऋषि आश्रम | स्थान |
| मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर | अत्रिमुनि | सीतामढ़ी हरचौका [CGPSC (Sci. Off.)2022] |
| सिद्धबाबा आश्रम | सीतामढी छतौडा | |
| महर्षि वामदेव | अमृतधारा | |
| मुनि निदाध | जटाशंकरी गुफा | |
| सूरजपुर | विश्रवा ऋषि | विश्रामपुर |
| सुतीक्ष्ण ऋषि | सीता लेखनी की पहाडी | |
| महरमण्डा ऋषि | बिलद्वार गुफा | |
| सरगुजा | वशिष्ठ ऋषि | रामगढ़ की पहाडी |
| शरभंग ऋषि | मैनपाट / दलदली | |
| महर्षि दंतोलि | मैनपाट | |
| जमदग्नि ऋषि | देवगढ | |
| जांजगीर-चांपा | मतंग ऋषि | शिवरीनारायण [CGVyapam (CBAS)2023] |
| शबरी आश्रम | शिवरीनारायण | |
| बलौदाबाजार-भाटापारा | वाल्मीकि ऋषि | तुरतुरिया [CG PSC (SEE)2020, (Sci. Off.) 2022] |
| गरियाबंद | लोमश ऋषि | राजिम [CGPSC (Sci. Off.)2022] |
| माण्डव्य ऋषि | फिंगेश्वर | |
| अत्रि ऋषि | अतरमरा (पाण्डुका) | |
| धमतरी | सप्त ऋषि | सिहावा (सप्त ऋषियों के नाम – 1. श्रृंगी 2. अगस्त्य 3. गौतम 4. मुचकंद 5. अंगिरा 6. कंक 7. शरभंग) |
| श्रृंगी ऋषि | सिहावा | |
| अगस्त्य ऋषि | हरी भाठा | |
| गौतम ऋषि | सिहावा क्षेत्र | |
| मुचकंद ऋषि | मेचका पहाड | |
| अंगिरा ऋषि | घटुला (सिहावा) | |
| कांकेर | कंक ऋषि | कांकेर [CGPSC (Sci. Off.)2022] |
| पुलस्त्य ऋषि | दुधवा | |
| बस्तर | माण्डकर्णी ऋषि | पंचाप्सर |
⚔️ महाभारत काल (Mahabharat Period)
📜 सामान्य जानकारी (General Information)
- 🌐 छत्तीसगढ़ का नामकरण: महाभारत काल में छत्तीसगढ़ क्षेत्र को विभिन्न नामों से जाना जाता था। सहदेव द्वारा विजित होने पर इसे प्राक्कोसल और कर्ण के दिग्विजय अभियान के दौरान इसे कोसल कहा गया।
- 🌳 क्षेत्रीय नाम: इसी काल में बस्तर के वन क्षेत्र को कान्तार तथा सरगुजा क्षेत्र को डान्डौर के नाम से संबोधित किया गया।
📖 महाभारत के पर्वों में वर्णन
- 🌊 भीष्म पर्व: महाभारत के भीष्म पर्व में महानदी का उल्लेख चित्रोत्पला के रूप में मिलता है।
- 🏛️ सभा पर्व: सभा पर्व में छत्तीसगढ़ को कोसल प्रदेश के नाम से वर्णित किया गया है।
- 🌲 वन पर्व: छत्तीसगढ़ के प्रख्यात साहित्यकार और पुरातत्ववेत्ता, पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय के अनुसार, महाभारत के वन पर्व में वर्णित ऋषभ तीर्थ की पहचान वर्तमान सक्ती जिले में स्थित गुंजी नामक स्थान से की गई है। [CGPSC(AP)2016]
🧠 विद्वानों की संज्ञा
- 🌍 मुकुटधर पाण्डेय: प्रसिद्ध साहित्यकार मुकुटधर पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ को “मानव की जन्मस्थली” की संज्ञा दी।
- 👑 प्यारेलाल गुप्त: प्यारेलाल गुप्त ने रतनपुर को “चारों युगों की राजधानी” के रूप में संबोधित किया।
🗺️ महाभारतकालीन प्रमुख स्थल
| स्थान | प्राचीन नाम | जिला | विशेष |
| 1. रतनपुर | मणिपुर / रत्नावलीपुरी | बिलासपुर | यह स्थल राजा मोरध्वज और उनके पुत्र ताम्रध्वज की राजधानी हुआ करता था। |
| 2. आरंग | भाण्डेर | रायपुर | यह स्थान राजा मोरध्वज की कथा से जुड़ा हुआ है। [CGPSC(CMO)2019] |
| 3. खल्लारी | खल्लवाटिका | महासमुंद | यहाँ लाक्षागृह, भीमखोह (भीम की गुफा) और भीम के पद-चिन्हों के साक्ष्य मिलते हैं। |
| 4. सिरपुर | चित्रांगदपुर | महासमुंद | यह अर्जुन के पुत्र भब्रुवाहन की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध था। |
| 5. गुंजी / दमउदहरा | ऋषभ तीर्थ | सक्ती | इसका उल्लेख महाभारत के वन पर्व में ऋषभ तीर्थ के रूप में किया गया है। |
🏛️ महाभारतकालीन स्थलों का विस्तृत विवरण –
1. रतनपुर (बिलासपुर)
- 📜 प्राचीन नाम: इसे रत्नावली या रत्नावलीपुरी के नाम से भी जाना जाता था। [CGPSC(SSE)2020]
- 👑 राजधानी: यह मणिपुर के रूप में प्रसिद्ध थी।
- 🤴 शासक: यहाँ के राजा मोरध्वज (मयूरध्वज) थे। एक जनश्रुति के अनुसार, उनका संबंध रतनपुर और आरंग, दोनों से था। [CGPSC(CMO)2019]
- 👨👦 पुत्र: ताम्रध्वज (धीरध्वज)।
- ⚔️ विशेष: मोरध्वज एवं ताम्रध्वज ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था।
2. खल्लारी (महासमुंद)
- 📜 प्राचीन नाम: इसका प्राचीन नाम खल्लवाटिका था। (शाब्दिक अर्थ – क्षलवाटिका)
- 👣 साक्ष्य: यहाँ से महाभारतकालीन लाक्षागृह (लाख का महल) और भीमखोह (भीम के पदचिन्ह) के पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं।
3. सिरपुर (महासमुंद)
- 📜 प्राचीन नाम: इसे चित्रांगदपुर के नाम से जाना जाता था।
- 👑 राजधानी: मान्यता है कि चेदी नरेश चित्रवाहन की पुत्री चित्रांगदा का विवाह अर्जुन से हुआ था। उनके पुत्र भब्रुवाहन ने ही सिरपुर को अपनी राजधानी बनाकर यहाँ से शासन किया था।
4. गुंजी / दमउदरहा (सक्ती)
- 📜 प्राचीन नाम: इसका प्राचीन नाम ऋषभतीर्थ है। [CGPSC(Horiclt)2015]
- 📖 ऐतिहासिक संदर्भ: इसका उल्लेख महाभारत के वन पर्व में मिलता है। [CGPSC(AP)2016]
- 👨🏫 पहचानकर्ता: पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने महाभारत में वर्णित ऋषभतीर्थ की पहचान इसी स्थान से की है।
5. आरंग (रायपुर)
- 📜 प्राचीन नाम: इसे भांडेर के नाम से जाना जाता था।
- 🏛️ राजधानी परिवर्तन: राजधानी को रतनपुर से आरंग स्थानांतरित किया गया था।
- 👑 शासक: यहाँ के शासक राजा मोरध्वज (मयूरध्वज) और उनके पुत्र ताम्रध्वज (धीरध्वज) थे।
- 🔗 संबंध: एक जनश्रुति के अनुसार, राजा मोरध्वज का संबंध रतनपुर एवं आरंग, दोनों ही स्थानों से था। [CGPSC(CMO)2019]
👑 आरंग से जुड़ी महाभारतकालीन किंवदंती –
महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद, श्री कृष्ण के सुझाव पर पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के पश्चात् छोड़े गए घोड़े की रक्षा का दायित्व धनुर्धर अर्जुन को सौंपा गया। वह घोड़ा निरंतर आगे बढ़ता हुआ कई राज्यों को पार कर अंततः रतनपुर राज्य की सीमा में जा पहुँचा।
उस समय रतनपुर के राजा, विष्णु के परम भक्त मोरध्वज (मयूरध्वज) थे। उनके पुत्र ताम्रध्वज, जो अल्प आयु में ही युद्ध कला में निपुण हो चुके थे, ने अश्वमेध के घोड़े को रोक लिया। इसके परिणामस्वरूप अर्जुन और ताम्रध्वज के बीच युद्ध हुआ, जिसमें ताम्रध्वज के एक तीर से महाबली अर्जुन मूर्छित हो गए। ताम्रध्वज, अर्जुन को वहीं छोड़कर घोड़े के साथ अपने नगर लौटे, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ।
जब अर्जुन को होश आया, तो उन्होंने श्री कृष्ण को अपने समक्ष पाया। अर्जुन ने श्री कृष्ण से अपने से भी बड़े और दानी भक्त को देखने की इच्छा व्यक्त की। इसी क्रम में, भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन ब्राह्मण का वेश धारण कर, तथा यमराज सिंह (शेर) का रूप लेकर रतनपुर की ओर बढ़े और राजा मयूरध्वज के दरबार में पहुँचे।
श्री कृष्ण ने राजा से कहा कि उनके साथ आया सिंह केवल मनुष्य का मांस खाता है। उन्होंने यह शर्त रखी कि राजा और रानी अपने इकलौते पुत्र ताम्रध्वज को आरे से चीरकर सिंह को भोजन कराएँ। राजा और रानी ने इस शर्त को स्वीकार कर वैसा ही किया। यह वृत्तांत देखकर अर्जुन उनके चरणों में गिर पड़े। तब श्रीकृष्ण ने अपने वास्तविक रूप में आकर उन्हें वरदान दिया और रानी के समक्ष उनके पुत्र को जीवित अवस्था में खड़ा कर दिया।
इसी किंवदंती के अनुसार, आरे से अंग को चीरने की घटना के कारण इस क्षेत्र का नाम आरंग पड़ा।
☸️ बौद्धकालीन छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh during the Buddhist Era)
📜 छत्तीसगढ़ में बौद्धकालीन साक्ष्य (Evidence of Buddhism in Chhattisgarh)
- ⏳ बौद्धकाल: इस युग का संबंध 6वीं सदी ई.पू. से है।
- 🌍 सम्मिलित क्षेत्र: छत्तीसगढ़ उस समय कोसल जनपद के अंतर्गत आता था।
- 🔑 साक्ष्य: बौद्धकाल को ऐतिहासिक काल माना जाता है क्योंकि इस अवधि से तीनों प्रकार के ऐतिहासिक साक्ष्य—पुरातात्विक, साहित्यिक और यात्रा वृत्तांत—प्राप्त होते हैं।
- पुरातात्विक: सिरपुर के उत्खनन से मिले अवशेष।
- साहित्यिक: अवदान शतक नामक ग्रंथ।
- यात्रा वृत्तांत: ह्वेनसांग का ‘सी-यू-की’।
- 📖 अवदान शतक: इस ग्रंथ के अनुसार, गौतम बुद्ध धर्म प्रचार के लिए दक्षिण कोसल आए थे। माना जाता है कि उन्होंने यहाँ की राजधानी में 3 महीने तक प्रवास किया था। महात्मा बुद्ध ने उत्तर कोसल के शासक प्रसेनजीत और दक्षिण कोसल के नरेश के बीच के विवाद को भी शांत कराया था।
- 🚶♂️ ‘सी-यू-की’: चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत से इस बात की पुष्टि होती है कि गौतम बुद्ध दक्षिण कोसल आए थे। ह्वेनसांग ने सिरपुर में अशोक द्वारा निर्मित एक स्तूप का वर्णन भी किया है।
- 🏛️ बौद्ध विहार: सिरपुर में स्थित प्रभु आनंद कुटी विहार तथा स्वास्तिक विहार से प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार, गौतम बुद्ध यहाँ आए थे।
- 🪙 सिक्के: 6वीं सदी ई.पू. (बौद्धकालीन) के कुल 253 चांदी के आहत सिक्के निम्नलिखित स्थानों से प्राप्त हुए हैं:
- तारापुर (रायपुर)
- ठठारी (सक्ती)
- बालाघाट (मध्यप्रदेश)
🗺️ छत्तीसगढ़ में स्थित प्राचीनतम बौद्धकालीन स्थल
1. सिरपुर (महासमुंद)
- ⛏️ उत्खननकर्ता: एम.जी. दीक्षित।
- 🏞️ उत्खनन से प्राप्त: स्वास्तिक विहार एवं प्रभु आनंद कुटी विहार।
- 🛕 मठ/मंदिर: यहाँ बौद्ध, हिन्दू और जैन मंदिर तथा मठों के स्मारक हैं। [CG PSC (Pre) 2021], [CGPSC(MI)2018]
- ☸️ बौद्ध विहार:
- स्वास्तिक विहार (1954-55): (बौद्ध केन्द्र) [CGVyapam (RI)2015]
- प्रभु आनंद कुटी विहार: (मुख्य प्रतिमा – गौतम बुद्ध की) [CGPSC(EAP)2016]
- तीवर विहार: (गौतम बुद्ध की मूर्ति स्थापित है)
- सनसुई बौद्ध विहार (1997-2002)
- राधिका विहार
- 👑 निर्माणकर्त्ता: पाण्डुवंशीय शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन ने सिरपुर क्षेत्र में अनेक बौद्ध विहारों का निर्माण करवाया और बौद्ध विहारों के लिए भूमि दान भी की। [CGPSC(AP)2009]
- ⛰️ बौद्ध टीला: यह सिरपुर में स्थित है।
- 🗿 प्रतिमाएँ: पीतल से निर्मित बौद्ध मूर्तियाँ। [CGPSC(ADH)2022]
- 🎨 शैली: बालचंद जैन के मतानुसार, सिरपुर की धातु प्रतिमाओं की निर्माण शैली नालंदा की शैली से प्रभावित है।
- 🧘♀️ मुद्रा: यहाँ प्राप्त बुद्ध प्रतिमा में बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में दिखाया गया है।
- 💡 विशेष: सिरपुर तथा मल्हार से बौद्ध धर्म के तंत्रवाद से प्रभावित शाखा वज्रयान एवं सहजयान के विकास के प्रमाण मिले हैं।
☸️ छत्तीसगढ़ के अन्य प्रमुख बौद्ध स्थल –
2. भोंगापाल (कोण्डागांव)
- 📍 जिला: कोण्डागांव।
- 🗿 प्रतिमा: यहाँ भगवान बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा स्थित है।
- 🏛️ प्रसिद्ध: यह स्थल बौद्ध विहार के लिए प्रसिद्ध है। [CGPSC(ACF) 2021, (ADJ)2018]
- 🔑 प्राप्ति: बौद्ध चैत्यगृह। [CGPSC(AMO)2022]
- ⛰️ बौद्ध टीला:
- डोकरा बाबा टीला: यहाँ स्थित चैत्यगृह को डोकरा बाबा टीला कहते हैं।
- रानी टीला: सप्तमातृका टीला को ‘रानी टीला’ कहा जाता है।
3. तुरतुरिया (बलौदाबाजार)
- 📍 जिला: बलौदाबाजार।
- ☸️ बौद्ध विहार: यह मौर्यकालीन बौद्ध भिक्षुणियों (महिलाओं) का विहार था, जो भारत में अपनी तरह का एकमात्र विहार है।
- 🙏 मूर्ति: यहाँ बुद्धदेव की विशाल मूर्ति आज भी विद्यमान है।
4. मल्हार (बिलासपुर)
- 📍 जिला: बिलासपुर।
- ⛏️ प्राप्ति: यहाँ उत्खनन से अनेक बौद्ध मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, साथ ही बौद्ध चैत्य के अवशेष भी मिले हैं। [CGPSC(ADPPO)2017]
5. सोंड्रा ग्राम (रायपुर)
- 📍 जिला: रायपुर।
- 🔑 प्राप्ति: उत्खनन के दौरान बुद्ध की प्रतिमा का ऊपरी भाग मिला है।
- 🕰️ काल: यह प्रतिमा पाण्डुवंशीय काल (6-9वीं शताब्दी ई.) की है।
6. मैनपाट (सरगुजा)
- 📍 जिला: सरगुजा।
- 🛕 स्थिति: यहाँ एक बौद्ध मंदिर स्थित है।
🕉️ जैनधर्मकालीन छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh during the Jain Era)
- 🕰️ स्थापना: छत्तीसगढ़ में जैन धर्म की स्थापना 6वीं शताब्दी में मानी जाती है।
- 📖 साहित्यिक स्त्रोत: छत्तीसगढ़ में ऋषभतीर्थ की जानकारी का साहित्यिक स्त्रोत महाभारत ग्रंथ है। [CGPSC(AP)2016]
🙏 प्रमुख तीर्थंकर
| प्रथम तीर्थंकर (ऋषभदेव/ऋषभनाथ) | 5वें तीर्थंकर (सुमतिनाथ) | 16वें तीर्थंकर (शांतिनाथ) | 23वें तीर्थंकर (पार्श्वनाथ) | 24वें तीर्थंकर (महावीर स्वामी) |
| ↓ | ↓ | ↓ | ↓ | ↓ |
| 1. गुंजी/दमाऊदहरा (सक्ती) [CG PSC(Pre)2014] 2. बूढ़ीखार (मल्हार, बिलासपुर) | आरंग (रायपुर) | भाटागुड़ा (बस्तर) | नगपुरा (दुर्ग) [CG V.S. (AG-3)2021] | आरंग (रायपुर) |
📜 जैन धर्म से संबंधित प्रमुख साक्ष्य एवं स्थल
| साक्ष्य | जिला | स्थान |
| 1. प्राचीन स्मारक | बिलासपुर | मल्हार [CG V.S. (AG-3)2021] |
| महासमुंद | सिरपुर [CG PSC(Pre)2021] | |
| सरगुजा | महेशपुर [CG V.S. (AG-3)2021] | |
| रायपुर | आरंग | |
| 2. जैन मूर्तियाँ | रायपुर | आरंग |
| सारंगढ़ | पुजारीपाली | |
| कबीरधाम | बकेला |
✨ जैन धर्म से संबंधित नवीनतम स्थल
- नवा रायपुर: यहाँ 15वें तीर्थंकर धर्मनाथ के मंदिर (जिनालय) का निर्माण किया गया है।
- नसिया तीर्थ (दुर्ग): शिवनाथ नदी के तट पर 8वें जैन तीर्थंकर भगवान चन्द्रप्रभु की प्रतिमा स्थापित की गयी है।
- राजिम: सोमेश्वर मंदिर (राजिम) के प्राचीर में पार्श्वनाथ की एक प्रतिमा उपलब्ध है।
- तीरथा (जगदलपुर): यह स्थल जैन तीर्थकरों की आराधना स्थली कहलाता है।
- भांडदेउल मंदिर (आरंग): इस मंदिर का संबंध जैन धर्म से है।
📍 छत्तीसगढ़ में जैनधर्म से संबंधित स्थल –
1. आरंग (रायपुर)
- 📍 जिला: रायपुर
- 📜 उपनाम: मंदिरों की नगरी [CGPSC(MI)2014, (ARO, APO) 2014]
- 🙏 तीर्थंकर: 5वें तीर्थंकर सुमतिनाथ एवं 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के साक्ष्य मिले हैं।
- 🔑 प्राप्ति: जैनधर्म के स्मारकों के प्राचीन भण्डार एवं मूर्तियाँ। [CGVS(AG3)2021] जैनधर्म से संबंधित प्राचीन स्मारक मल्हार, सिरपुर एवं महेशपुर से प्राप्त हुए हैं।
- 🛕 मंदिर: भांडलदेव जैन मंदिर। [CGPSC(APE)2016, (IMO)2020, (SEE) 2022] इस मंदिर में नेमीनाथ, महावीर स्वामी एवं श्रेयांश की मूर्ति स्थापित है।
2. नगपुरा (दुर्ग)
- 📍 जिला: दुर्ग
- 🙏 तीर्थंकर: 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ। [CGPSC(MI)2010] [CGVS (AG3)2021]
- 📜 उपनाम: श्री उवसग्गहंर पार्श्व तीर्थ। [CG CSPHCL 2022]
3. ऋषभतीर्थ (सक्ती)
- 📍 जिला: सक्ती [CGPSC(AP)2016, (Horticult. 2015)]
- 📜 वर्तमान नाम: गुंजी / दमउदहरा
- 🙏 तीर्थंकर: प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव / ऋषभनाथ।
4. भाटागुड़ा (बस्तर)
- 📍 जिला: बस्तर
- 🙏 तीर्थंकर: 16वें तीर्थंकर शांतिनाथ।
5. मल्हार (बिलासपुर)
- 📍 जिला: बिलासपुर
- 🙏 तीर्थंकर: प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव।
- 🔑 प्राप्ति: जैनधर्म के स्मारकों के प्राचीन भण्डार।
6. रतनपुर (बिलासपुर)
- 📍 जिला: बिलासपुर
- 🔑 प्राप्ति: रतनपुर में ऋषभनाथ एवं चन्द्रप्रभ की प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं, जो कल्चुरीकालीन हैं।
7. धनपुर (गौ-पे-म.)
- 📍 जिला: गौ-पे-म.
- 🏦 केन्द्र: जैन धर्मावलम्बियों के लिए अंचल का सबसे बड़ा प्राचीन व्यावसायिक केन्द्र था।
- 🙏 तीर्थंकर: प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव।
- 🗿 मूर्ति: छत्तीसगढ़ अंचल में यही एकमात्र शैलोत्कीर्ण जैन मूर्तिकला का उदाहरण है।
👑 महाजनपद काल (Mahajanpad Period)
- 📜 ऐतिहासिक महत्व: भारतीय इतिहास में यह काल अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहीं से भारत का एक व्यवस्थित और क्रमबद्ध इतिहास मिलना प्रारंभ होता है।
- 🌍 भारत का विभाजन: इस अवधि के दौरान संपूर्ण भारत को 16 महाजनपदों में विभाजित किया गया था।
- 📍 छत्तीसगढ़ की स्थिति: इस काल में, छत्तीसगढ़ चेदि महाजनपद के अंतर्गत शामिल था।
- 📖 साहित्यिक साक्ष्य: जैन ग्रंथ ‘भगवती सूत्र’ में 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है।
🏛️ चेदि महाजनपद (Chedi Mahajanpad)
- 👑 राजधानी: शुक्तिमति
- 🗺️ क्षेत्र: बुंदेलखण्ड का पठार
- 🗣️ नामकरण: इस काल में छत्तीसगढ़ को चेदिसगढ़ (Chedisgarh) के नाम से जाना जाता था। इतिहासकार रायबहादुर हीरालाल के अनुसार, समय के साथ इसी शब्द के अपभ्रंश से छत्तीसगढ़ नाम का उद्भव हुआ।
🏛️ मौर्य काल (Maurya Period) –
📜 चन्द्रगुप्त मौर्य कालीन छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh during Chandragupta Maurya’s Reign)
- 🗺️ प्रशासनिक विभाजन: चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में समूचा भारतवर्ष 4 प्रांतों में विभाजित था, जिसमें हमारे छत्तीसगढ़ का उत्तरी भाग ‘प्राची प्रांत’ के अधीन आता था। जबकि, मध्य एवं दक्षिण छत्तीसगढ़ संभवतः ‘कलिंग प्रांत’ के अधीन रहे होंगे।
- 🔗 मौर्य साम्राज्य में विलय: विभिन्न ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, मौर्य काल में छत्तीसगढ़ का उत्तरी भाग मौर्य साम्राज्य में सम्मिलित था। शेष छत्तीसगढ़, जो कलिंग प्रांत का हिस्सा था, अशोक के कलिंग विजय के पश्चात् ही मौर्य साम्राज्य का अंग बना। हालांकि, अशोक के कलिंग अभिलेख से इसकी सीधी पुष्टि नहीं होती है। [CGPSC(ADI)2016]
🪙 अशोककालीन छत्तीसगढ़ एवं अन्य मौर्यकालीन साक्ष्य
1️⃣ सिक्के (Coins)
छत्तीसगढ़ के विभिन्न स्थानों से मौर्यकालीन चांदी, तांबे के सिक्के एवं आहत मुद्रा (पंचमार्क सिक्के) प्राप्त हुए हैं।
📌 मौर्यकालीन सिक्कों के प्रमुख साक्ष्य:
| जिला | स्थान | विवरण |
|---|---|---|
| सक्ति | ठठारी | यहाँ से मौर्यकालीन रूपभाषक सिक्का प्राप्त हुआ है। |
| जांजगीर | अकलतरा | यहाँ चांदी के 259 आहत सिक्के प्राप्त हुए हैं। इसके समीप कोटगढ़ की बनावट व प्राचीनता भी मौर्यकाल की विशेषता को दर्शाती है। |
| सारंगढ़ | बार एवं देवगांव | यहाँ पर 15 आहत सिक्के प्राप्त हुए हैं। |
- ii. आहत मुद्रा / पंचमार्क मुद्रा:
- छत्तीसगढ़ में ई.पू. दूसरी सदी के मौर्यकालीन सिक्के पाए गए हैं, जिन्हें आहत मुद्रा या पंचमार्क मुद्रा कहते हैं। ये मुद्राएँ चाँदी से बनी होती थीं। इनकी प्राप्ति छत्तीसगढ़ के निम्न स्थानों से हुई है: [CG PSC(Registrar)2017]
- रायपुर: तारापुर, आरंग, उड़ेला
- 💡 विशेष: डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र ने 1969-70 में आरंग तथा गुजरा गांव में इन आहत सिक्कों की खोज की थी, जो सोनोगल श्रेणी के हैं।
2. यात्रा वृत्तान्त (Travelogue)
- 🚶♂️ ह्वेनसांग: चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरण के अनुसार, अशोक ने यहाँ अनेक बौद्ध स्तूपों का निर्माण करवाया था। तुरतुरिया (बलौदाबाजार) नामक स्थान पर मौर्यकालीन बौद्ध भिक्षुणियों का विहार था, जहाँ बुद्ध देव की विशाल मूर्ति विद्यमान है।
(पेज 26 पर मौर्यकालीन भारत के प्रांतों (उत्तरापथ, अवंति, प्राची, कलिंगप्रान्त, दक्षिणापथ) और छत्तीसगढ़ में मौर्यकालीन स्थलों (कोटाडोल, सीताबेंगरा, जोगीमारा, अकलतरा, ठठारी, आरंग, उड़ेला) का मानचित्र दर्शाया गया है।)
📜 मौर्यकालीन अभिलेखीय एवं अन्य साक्ष्य –
3. अभिलेखीय साक्ष्य (Epigraphic Evidence)
- 🏞️ जोगीमारा की गुफा (Jogimara Cave):
- 📍 स्थिति: रामगढ़ की पहाड़ी (सरगुजा)।
- 📜 उपनाम: भारतीय चित्रकला में ‘वरूण देव का मंदिर’।
- ✍️ अभिलेख: वरूण देव को समर्पित सुतनुका नामक देवदासी के निवास के कारण, इस गुफा में मौर्यकालीन एक उत्कीर्ण लेख (लिपि – ब्राम्ही, भाषा – पाली) प्राप्त हुआ है, जो सुतनुका नामक देवदासी एवं रूपदक्ष देवदीन (देवदत्त) के प्रेम का वर्णन करता है। [CGPSC(ADI)2016,(ADS)2019] रामगढ़ की पहाड़ी में स्थित जोगीमारा की गुफा में नर्तक देवदत्त एवं नर्तकी सुतनुका की प्रेमगाथा का वर्णन है। [CGPSC(AP)2019][CGPSC(Mains)2011]
- 🧐 अवलोकनकर्ता: कैप्टन टी. ब्लाश (1904 ई.)।
- 🎨 समानता: अजंता एवं बाघ के भित्ति चित्रों के समकक्ष।
- 📜 अन्य साक्ष्य: मौर्यकालीन अन्य शिलालेखों की प्राप्ति आरंग और रायगढ़ से हुई है, जिनकी लिपि ब्राम्ही है।
4. नाट्यशाला (Theatre)
- 🏞️ सीताबेंगरा की गुफा (Sitabengra Cave):
- 📍 स्थिति: रामगढ़ की पहाड़ी, सरगुजा।
- 🕵️♂️ खोजकर्ता: कर्नल आउस्ले (1848 ई.)।
- 📖 प्रकाशन: कैप्टन टी.ब्लाश।
- 👨🏫 अध्ययन: डॉ. सन्तलाल कटारे।
5. अशोककालीन मूर्ति की प्राप्ति (Ashokan Sculpture)
- 🗿 स्थान: कोटाडोल (मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर)। [CGPSC(ACF)2021, (ADPO) 2021]
6. अन्य साक्ष्य (Other Evidence)
- 🏛️ लाट (स्तंभ): कपाटपुरम् (सरगुजा) से अशोक का लाट (स्तंभ) प्राप्त हुआ है।
- 🪙 मल्हार: यहाँ के उत्खनन से मौर्यकालीन पुरावस्तुओं की प्राप्ति हुई हैं, जिनमें तांबे तथा सीसे के आहत तथा ढली मुद्रा प्राप्त हुई है। [CGVyapam (SET)2024]
- ⚓ बंदरगाह (गोदी): पैरी नदी के समीप सिरकट्टी नामक ग्राम के पास गोदी की प्राप्ति हुई है जो कि मौर्यकालीन है।
👑 सातवाहन वंश (Satavahana Dynasty)
- ** उदय:** मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात् दक्षिण कोसल में सातवाहन वंश की स्थापना हुई। दक्षिण कोसल का अधिकांश भाग सातवाहनों के प्रभाव में था।
- राजधानी: प्रतिष्ठान (महाराष्ट्र)।
- क्षेत्रीय राजधानी: मल्हार (प्रथम ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी तक), बुंदेलखण्ड प्रदेश की राजधानी – त्रिपुरी, मालवा प्रदेश की राजधानी – उज्जैनी।
- शासनकाल: 72-200 ई. (छ.ग. में)।
- प्रमुख शासक: अपीलक, वरदत्तश्री, वेदश्री।
📜 छत्तीसगढ़ में सातवाहनकालीन साक्ष्य
1. मुद्रा (Currency)
| जिला | स्थान | शासक |
| सक्ती | बालपुर | 1. अपीलक (चतुष्कोणीय सिक्का) 2. गौतमी पुत्र शातकर्णी (आवक्ष चाँदी के सिक्के प्राप्त) |
| बिलासपुर | मल्हार | 1. अपीलक (2 मुद्राएँ – 1 तांबा + 1 कांस्य) [CGPSC(Sci. off)2022] 2. वशिष्ठी पुत्र पुडुमावी / पुलुमावी (आवक्ष चाँदी का सिक्का) [CGPSC(Sci. off)2022] 3. वेदश्री/वेदसिरिस/ (सीसे का एक सिक्का) [CGPSC(Sci. off)2022, (Pre)2022] 4. शातकर्णी (सीसे (पोटीन) के चार सिक्के) नोट: मल्हार से सिमुक का सिक्का प्राप्त नहीं हुआ है। |
| चकरबेडा | रोम का सिक्का प्राप्त हुआ है जो सातवाहनकालीन शासकों के विदेशों से व्यापार को इंगित करता है। | |
| बेमेतरा | नवागांव | यहाँ से सिरि सात लेख युक्त ताम्र सिक्का प्राप्त हुआ है। |
2. शिलालेख (Inscription)
- 📍 स्थान: गुंजी / दमाऊदरहा (सक्ती), दमाऊदरहा नाला चट्टान लेख (सक्ती)। दमाऊदरहा को ऋषभ तीर्थ के नाम से जानते हैं क्योंकि यहाँ पर ऋषभ देव का मंदिर है।
- 🗣️ भाषा: प्राकृत भाषा।
- 📜 उल्लेख: इसमें कुमार वरदत्तश्री के गौ दान का उल्लेख मिलता है। [CGPSC(AMO)2022, (Asst. HYD)2022] उन्होंने अपनी आयु बढ़ाने के लिए ब्राह्मणों को 2 बार 1000 गायें दान में दी थीं। वरदत्तश्री का अन्य शिलालेख खैरागढ़ के विक्रमपुर गाँव से मिला है।
- 📜 अन्य लेख: कोनार, मल्हार, सेमरसाल से सातवाहनकालीन खण्डित लेख प्राप्त हुए हैं। सातवाहनकालीन सती स्तंभ लेख देवबलौदा से प्राप्त हुए है।
🏛️ सातवाहनकालीन प्रतिमा, स्थापत्य एवं अन्य साक्ष्य –
3. प्रतिमा (Idol)
- 📍 स्थान: बुढ़ीखार (बिलासपुर)।
- 🗿 प्रतिमा: विष्णुजी की लेखयुक्त चतुर्भुजी प्रतिमा।
- 📜 उल्लेख: इसमें राजा वेदश्री की जानकारी मिलती है।
- ✍️ निर्माण: यहाँ से प्राप्त शिलालेख में प्रजावती और भारद्वाजी नामक स्त्रियों द्वारा मूर्ति निर्माण की जानकारी मिलती है। इस प्रतिमा में लेख ब्राम्ही लिपि में है।
4. स्थापत्य (Architecture)
- 📍 स्थान: सिरपुर।
- 🏗️ निर्माण: पांच मंजिला संघाराम।
- 👑 द्वारा: सातवाहनकालीन शासकों ने।
- 🙏 किसके लिए: बौद्धभिक्षु नागार्जुन के लिए बनवाया था।
- 🤝 समकालीन शासक: सद्वाह।
5. यात्रा वृत्तांत (Travelogue)
- 🗺️ टॉलमी की यात्रा: इनके समय प्रसिद्ध विद्वान टॉलमी (मिस्र) ने छत्तीसगढ़ की यात्रा की थी। इन्होंने छत्तीसगढ़ को अधिष्ठी के रूप में उल्लेख किया।
- 💡 विशेष: दक्षिण कोसल का पूर्वी भाग चेदिवंशीय शासक खारवेल के क्षेत्राधिकार में था। [CGPSC(ADA)2023] सातवाहन शासक स्वयं को दक्षिणा-पथ स्वामी कहते थे।
6. अन्य साक्ष्य (Other Evidence)
- मल्हार से पुडुमावी (पुलुमावी) व इसिनाग के लेख प्राप्त हुए हैं।
- मल्हार के गढ़ी क्षेत्र से पक्की मिट्टी की एक सिलिंग (मृणमुद्रा) प्राप्त हुई है जिस पर वेदसिरिस लिखा हुआ है।
- सातवाहनकालीन शासकों ने बुढ़ीखार (मल्हार) में पोटानार नामक तालाब बनवाया था।
🌳 सातवाहनकालीन काष्ठ स्तंभ (Wooden Pillar) – (पेज 30)
- 📍 स्थान: किरारी ग्राम, सक्ती (पूर्व जांजगीर-चांपा)।
- 📜 उपनाम: यज्ञ स्तंभ लेख।
- 🗣️ भाषा: प्राकृत।
- ✍️ लिपि: ब्राम्ही।
- 🌊 तालाब: हीराबंध तालाब।
- 🗓️ खोज: अप्रैल 1921 में।
- 📜 घटनाक्रम: यहाँ तालाब से कांप मिट्टी निकालने के दौरान लकड़ी का स्तंभ मिला।
- 🏛️ वर्तमान में: महंत घासीदास संग्रहालय (रायपुर)।
- 🪵 लकड़ी: बीजा-साल लकड़ी।
- 🕰️ समकालीन: सातवाहन काल, दूसरी ईसवी।
- 🔗 समतुल्य: नासिक गुफा के।
- 👨🏫 अध्ययन:
- सबसे पहले लक्ष्मीप्रसाद उपाध्याय (349 अक्षर लिखे थे देखकर)।
- लोचन प्रसाद पाण्डेय + जॉन मार्शल → नागपुर संग्रहालय में उपचार।
- हीरानंद शास्त्री → एपिग्राफिका इंडिका के जिल्द अठारह (1925-26 में प्रकाशित हुआ)।
- प्यारेलाल गुप्त कृत बिलासपुर वैभव (1923) में वर्णित है।
- बालचंद्र जैन → उत्कीर्ण लेख (1961) “देवनागरी लिपि” में प्रकाशन हुआ।
- 📝 वर्णन: इसमें अधिकारियों के नाम एवं पदनाम का उल्लेख है, लेकिन सातवाहनकालीन शासकों का उल्लेख नहीं है।
📋 पद का नाम
| पद | कार्य |
| कुलपुत्रक | अभियंता / इंजीनियर [CGPSC(SEE)2021] |
| लेखहारिक | पत्रवाहक |
| धावक | डाकिया |
| महानासिका | भोजनालय प्रबंधक |
| गणक | गणना करने वाला (खजांची) |
| भाण्डागारिक | भण्डार गृह का अधिकारी |
| पलवीथिदपालक | मांस बाजार का अधिकारी |
| पादमूलिक | मंदिरों का रक्षक |
| महासेनानी | महासेनापति |
| गृहपति | राजमहल प्रबंधक |
| अश्वारोह | घोड़ों के गृह का अधिकारी |
| हस्तारोह | हाथी के गृह का अधिकारी |
| हस्तीपक | हाथी पकड़ने वाला अधिकारी |
| गोःमाण्डलिक | गौशालाओं का अधिकारी |
| यानशालायुद्धागारिक | रथ, अस्त्रों का रक्षा अधिकारी |
| रथिक | सारथी |
| सौगंधक | इत्र परीक्षण अधिकारी |
| प्रतिहार | द्वारपाल (निजी सचिव) |