भारत में परिवहन
भारत में परिवहन का वर्गीकरण
परिवहन किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा (Lifeline) होता है। यह न केवल लोगों और वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाता है, बल्कि उद्योगों को कच्चा माल और बाजारों को तैयार माल उपलब्ध कराकर आर्थिक विकास को भी गति देता है।
भारत में परिवहन के साधनों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. स्थल परिवहन (Land Transport)
2. जल परिवहन (Water Transport)
3. वायु परिवहन (Air Transport)
इनके अलावा, पाइपलाइन परिवहन भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
1. स्थल परिवहन (Land Transport)
यह भारत में परिवहन का सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक माध्यम है, जो देश के कोने-कोने को जोड़ता है।
A) सड़क परिवहन (Road Transport)
- महत्व: यह छोटी से मध्यम दूरी के लिए सबसे उपयुक्त, लचीला और “घर-घर” (Door-to-door) सेवा प्रदान करने वाला माध्यम है।
- नेटवर्क:
🛣️ भारत का सड़क नेटवर्क – नवीनतम आँकड़े (2025)
🔹 कुल सड़क नेटवर्क
- कुल लंबाई: 63 लाख किलोमीटर से अधिक
- दुनिया में स्थान: दूसरा सबसे बड़ा (पहला: अमेरिका)
🔹 राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highways)
- वर्ष 2014 में: 91,000 किमी
- मार्च 2025 तक: 1.46 लाख किमी से अधिक
🔹 हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे
- 2025 में मौजूदा हाई-स्पीड सड़कें: 4,500 किमी
- 2033 तक लक्ष्य: 21,500 किमी हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे
🔹 महत्वपूर्ण परियोजनाएँ
- स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना: दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता को जोड़ती है
- उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गलियारा: श्रीनगर–कन्याकुमारी और सिलचर–पोरबंदर
- भारतमाला परियोजना: सीमावर्ती और आर्थिक गलियारों को जोड़ने के लिए
🔹 वित्तीय निवेश
- 2013–14 से 2024–25 के बीच: सड़क अवसंरचना पर 6.4 गुना अधिक खर्च
- 2025 में घोषित योजना: ₹11 लाख करोड़ (~$125 अरब) का निवेश
🔹 रोजगार प्रभाव
- 532 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजन हुआ है सड़क निर्माण से
📌 परीक्षा के लिए उपयोगी तथ्य
| बिंदु | विवरण |
| कुल सड़क नेटवर्क | 63 लाख किमी |
| राष्ट्रीय राजमार्ग | 1.46 लाख किमी |
| हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे | 4,500 किमी (2025), लक्ष्य: 21,500 किमी (2033) |
| प्रमुख परियोजना | भारतमाला, स्वर्णिम चतुर्भुज |
| निवेश | ₹11 लाख करोड़ |
| रोजगार सृजन | 532 करोड़ मानव दिवस |
सड़कों का वर्गीकरण (Classification of Roads):
🛣️ स्वर्णिम चतुर्भुज महा राजमार्ग (Golden Quadrilateral Highway Project)
स्वर्णिम चतुर्भुज (Golden Quadrilateral – GQ) भारत की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में से एक है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (NHDP) का पहला चरण था, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 में शुरू किया और 2001 में निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।
🔹 मुख्य तथ्य (Exam-Oriented)
- उद्देश्य: भारत के चार प्रमुख महानगरों – दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को 4/6 लेन वाले राजमार्गों से जोड़ना।
- कुल लंबाई: लगभग 5,846 किमी
- लागत: लगभग ₹60,000 करोड़ (₹600 बिलियन)
- पूर्णता वर्ष: 2012
- राज्य: यह परियोजना 13 राज्यों से होकर गुजरती है।
- महत्व:
- औद्योगिक, कृषि और सांस्कृतिक नगरों को जोड़ा
- माल परिवहन और व्यापार को गति
- यात्रा समय और लागत में कमी
🔹 मार्ग का विभाजन
| खंड | मार्ग | लंबाई (किमी) | प्रमुख शहर |
| भाग 1 | दिल्ली → कोलकाता | 1,454 | आगरा, कानपुर, वाराणसी, पटना |
| भाग 2 | कोलकाता → चेन्नई | 1,684 | भुवनेश्वर, विशाखापत्तनम |
| भाग 3 | चेन्नई → मुंबई | 1,290 | बेंगलुरु, पुणे |
| भाग 4 | मुंबई → दिल्ली | 1,419 | सूरत, अहमदाबाद, जयपुर |
🔹 महत्व
- यह परियोजना भारत की सबसे बड़ी सड़क परियोजना और दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी राजमार्ग परियोजना मानी जाती है।
- इसने लॉजिस्टिक्स, व्यापार और पर्यटन को नई दिशा दी।
- स्वर्णिम चतुर्भुज + उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गलियारा मिलकर भारत का सबसे बड़ा हाईवे नेटवर्क बनाते हैं।
📌 PYQ (पिछले प्रश्न पत्रों से)
- [UPSC Prelims 2017] प्रश्न: स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना किन चार महानगरों को जोड़ती है?
- [SSC CGL 2019] प्रश्न: स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की कुल लंबाई कितनी है?
उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गलियारियाँ
परिचय
उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गलियारा भारत के राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (NHDP) के पहले चरण का एक मुख्य भाग है। इसमें दो एक्सप्रेसवे शामिल हैं: उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर जो श्रीनगर से कन्याकुमारी तक 4,000 कि.मी. तक फैला है, और पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर जो सिलचर से पोर्बंदर तक 3,300 कि.मी. तक जाता है।
मार्ग विवरण
उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर मुख्यतः राष्ट्रीय राजमार्ग 44 (NH-44) और शाखा मार्ग NH-544 पर चला है:
- NH-44: श्रीनगर → उधमपुर → जम्मू → जालंधर → दिल्ली → आगरा → ग्वालियर → झाँसी → नरसिंहपुर → लखनादौन → नागपुर → हैदराबाद → बेंगलुरु → सेलम → मदुरै → कन्याकुमारी
- NH-544 (ब्रांच): सेलम → कोयंबटूर → पलक्कड़ → कोच्चि
पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर राष्ट्रीय राजमार्ग 27 (NH-27) पर फैला है:
- NH-27: पोर्बंदर → राजकोट → समाखियाली → राधनपुर → कोटा → झाँसी → कानपुर → लखनऊ → अयोध्या → मुज़फ़्फरपुर → दरभंगा → सुपौल → पूर्णिया → किशनगंज → गलगालिया → बिजनी → गुवाहाटी → नागाँओ → दबाका → सिलचर।
निर्माण एवं प्रबंधन
इन दोनों एक्सप्रेसवे का निर्माण एवं रखरखाव राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के तहत भारत सरकार के मार्ग परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा किया गया। प्रारंभ में इनका 2007 तक पूर्ण होने का लक्ष्य था, लेकिन कई कारणों से देरी हुई और 2017 तक लगभग 6,579 कि.मी. की चौड़ीकरण एवं लेन जोड़ने का कार्य पूरा हुआ। इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत लगभग 12.32 बिलियन अमरीकी डालर थी।
महत्व और जंक्शन
दोनों गलियारों का मुख्य क्रॉसिंग पॉइंट झाँसी में स्थित है, जहाँ से उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम मार्गें आपस में मिलती हैं। यह जंक्शन देश के मध्य में माल और यात्रियों के सुचारु प्रवाह के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जिससे व्यापार लागत घटती है और आर्थिक सम्बद्धता को बढ़ावा मिलता है।
अग्रिम पहलें:
- इन कॉरिडोरों से राज्य मुख्यालयों और बंदरगाहों के बीच कनेक्टिविटी मजबूत हुई है।
- भविष्य में इन्हें पूर्ण एक्सप्रेसवे (access-controlled) में अपग्रेड करने की योजनाएँ हैं।
- सामरिक दृष्टिकोण से सीमा क्षेत्रों तक तेज़ आपूर्ति चैनल सुनिश्चित करने में मद्द मिलती है।
राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highways – NH)
परिचय
राष्ट्रीय राजमार्ग देश की रीढ़ हैं—ये अंतर-राज्यीय माल और यात्री परिवहन के लिए मुख्य मार्ग प्रदान करते हैं। इन्हें भारत सरकार के मार्ग परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अंतर्गत विकसित और संधारित किया जाता है, ताकि देशभर के प्रमुख शहरों, बंदरगाहों, राज्य व राष्ट्रीय राजधानियों और सीमावर्ती क्षेत्रों को तेज़, सुरक्षित कनेक्टिविटी मिले।
प्रमुख विशेषताएँ
- डिज़ाइन मानक: चौड़ी लेन, डिवाइडेड कैरिजवे, फ्लाईओवर/ग्रेड सेपरेशन, बेहतर सतह और सुरक्षा सुविधाएँ।
- गति क्षमता: सामान्यतः उच्च गति यातायात को ध्यान में रखकर निर्मित, लंबी दूरी के ट्रक और बस यातायात के लिए उपयुक्त।
- कनेक्टिविटी: प्रमुख औद्योगिक केंद्र, लॉजिस्टिक्स हब, बंदरगाह, रेल-जंक्शन और पर्यटन स्थलों को जोड़ते हैं।
- टोल और रखरखाव: कई खंड टोल-आधारित हैं; रखरखाव और संचालन के लिए निजी और सार्वजनिक मॉडल (PPP/EPC) अपनाए जाते हैं।
प्रशासन और प्रबंधन
- नीति एवं स्वामित्व: मार्ग परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा अधिसूचित और संचालित।
- निर्माण/संधारण एजेंसियाँ:
- NHAI: अधिकतर NH नेटवर्क का निर्माण, उन्नयन, टोलिंग और रखरखाव।
- NHIDCL: रणनीतिक/सीमावर्ती एवं पहाड़ी क्षेत्रों में हाईवे विकास।
- CPWD/राज्य PWD: चयनित खंडों का निर्माण और देखरेख।
- मानक निर्धारण: भारतीय रोड कांग्रेस (IRC) और BIS के मानकों के अनुसार डिजाइन व क्रियान्वयन।
क्रमांककरण (न्यू नंबरिंग सिस्टम)
- उत्तर–दक्षिण मार्ग (North–South): विषम संख्या (Odd) वाले NH, संख्या पूर्व से पश्चिम बढ़ती है।
- पूर्व–पश्चिम मार्ग (East–West): सम संख्या (Even) वाले NH, संख्या उत्तर से दक्षिण बढ़ती है।
- लंबे कॉरिडोरों के लिए एकीकृत नंबर: पुनर क्रमांकित प्रणाली में लंबे, सतत मार्गों को एक ही NH नंबर दिया गया है (जैसे NH-44, NH-27) ताकि मार्ग-परिचय सरल हो।
महत्वपूर्ण राजमार्गों के उदाहरण
- NH-44 (श्रीनगर–कन्याकुमारी): देश का सबसे लंबा उत्तर–दक्षिण कॉरिडोर; दिल्ली, नागपुर, बेंगलुरु, मदुरै को जोड़ता है।
- NH-27 (पोर्बंदर–सिलचर): प्रमुख पूर्व–पश्चिम कॉरिडोर; गुजरात, राजस्थान, यूपी, बिहार, असम के बड़े शहरों को जोड़ता है।
- NH-48 (दिल्ली–मुंबई): जयपुर, अहमदाबाद, वडोदरा के माध्यम से राजधानी को वित्तीय राजधानी से जोड़ता है।
- NH-16 (चennai–कोलकाता): पूर्वी तट पर प्रमुख समुद्री-औद्योगिक कनेक्टिविटी।
- NH-19 (दिल्ली–कोलकाता): उत्तर भारत को पूर्वी भारत के औद्योगिक बेल्ट से जोड़ता है।
- गोल्डन क्वाड्रिलैटरल: दिल्ली–मुंबई–चेन्नई–कोलकाता–दिल्ली के बीच चार-कोणीय नेटवर्क, मुख्यतः NH-48, NH-16, NH-19 आदि पर आधारित।
महत्व
- आर्थिक गति: माल-ढुलाई लागत और समय में कमी, सप्लाई चेन विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी बनती है।
- यात्रा सुरक्षा: बेहतर डिज़ाइन और प्रबंधन से दुर्घटना-जोखिम घटता, आपातकालीन प्रतिक्रिया तेज़ होती है।
- क्षेत्रीय संतुलन: दूरदराज़/सीमावर्ती इलाकों तक पहुँच से निवेश, पर्यटन और आजीविका अवसर बढ़ते हैं।
- सामरिक उपयोग: आपूर्ति एवं तैनाती में तेजी, प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य आसान।
वर्तमान पहलें और भविष्य की दिशा
- एक्सेस-कंट्रोल्ड अपग्रेड: चयनित NH खंडों को एक्सप्रेसवे मानकों पर उन्नत किया जा रहा है।
- स्मार्ट हाईवे: इलेक्ट्रॉनिक टोल, ट्रैफिक मॉनिटरिंग, ITS, वे-इन-मोशन और EV चार्जिंग अवसंरचना।
- लॉजिस्टिक्स हब/इकोनॉमिक कॉरिडोर: औद्योगिक गलियारों, बंदरगाहों और मल्टी-मोडल पार्क्स से एकीकृत कनेक्टिविटी।
- ग्रीनफील्ड परियोजनाएँ: नई, सीधी रेखाओं वाले हाईवे ताकि दूरी और समय दोनों घटें।
देशव्यापी प्रमुख राजमार्ग (Primary NHs)
- NH-44: श्रीनगर–जम्मू–दिल्ली–नागपुर–बेंगलुरु–मदुरै–कन्याकुमारी
- NH-27: पोर्बंदर–राजकोट–कोटा–झांसी–लखनऊ–गुवाहाटी–सिलचर
- NH-48: दिल्ली–जयपुर–उदयपुर–अहमदाबाद–वडोदरा–सूरत–मुंबई–पुणे–कोल्हापुर–बेलगावी–बेंगलुरु
- NH-19: आगरा–कानपुर–इलाहाबाद/प्रयागराज–वाराणसी–धनबाद–दुर्गापुर–दांकुनी (कोलकाता के पास)
- NH-16: चेन्नई–नेल्लोर–विजयवाड़ा–विशाखापत्तनम–भुवनेश्वर–बालासोर–कोलकाता
- NH-9: पंजाब–हरियाणा–दिल्ली–मेरठ–रुड़की–हल्द्वानी–पिथौरागढ़
- NH-12: दक्षिण 24 परगना (बक्कखाली)–कोलकाता–एनएच-19/एनएच-16 से जोड़
- NH-8: असम–त्रिपुरा सीमा तक (मैत्री सेतु)
- NH-3: अमृतसर–मंडी–लाहौल–लेह
- NH-2: ऊपरी असम–नागालैंड–मणिपुर–मिजोरम (दीर्घ उत्तर–पूर्व धुरी)
गोल्डन क्वाड्रिलैटरल के मुख्य खंड
- दिल्ली–मुंबई: NH-48
- मुंबई–चेन्नई: NH-48 और दक्षिणी जोड़
- चेन्नई–कोलकाता: NH-16
- कोलकाता–दिल्ली: NH-19
उत्तर–दक्षिण और पूर्व–पश्चिम गलियारे के आधारभूत NH
- उत्तर–दक्षिण (NS) का मेरुदंड: NH-44 (+ कुछ शाखाएँ जैसे NH-544)
- पूर्व–पश्चिम (EW) का मेरुदंड: NH-27 (+ क्षेत्रीय जोड़ जैसे NH-727, NH-927 आदि)
छत्तीसगढ़/दुर्ग क्षेत्र के लिए उपयोगी NH
- NH-53: हजीरा (सूरत)–नागपुर–भिलाई/दुर्ग–राजनांदगांव–रायपुर–महासमुंद–(ओडिशा की ओर)
- NH-30: प्रयागराज/रीवा–बिलासपुर–रायपुर–बस्तर–जगदलपुर–कोण्डागांव–(आंध्र/तेलंगाना की ओर)
- NH-130: रायपुर–बिलासपुर–कोरबा–कटघोरा (रायपुर–बिलासपुर आर्थिक धुरी)
- NH-130B/130C (स्पर्स): दुर्ग–बालोद–कांकेर/स्थानीय जोड़
- NH-49 (पुराना क्रमांक, अब भाग NH-43/30/130 में): रायपुर–बिलासपुर–अंबिकापुर–धनबाद धुरी के हिस्से
व्यवस्थित क्रमांककरण (समझने के लिए काम का नियम)
- उत्तर–दक्षिण उन्मुख मार्ग: विषम/सम के नए नियम के अनुसार बड़े कॉरिडोरों को एकीकृत नंबर (जैसे NH-44, NH-27) दिए गए हैं।
- तीन-अंकीय NH: बड़े NH के शाखा/स्पर होते हैं (उदा. NH-130, NH-344A), जो क्षेत्रीय कनेक्टिविटी देते हैं।
राज्य राजमार्ग (State Highways – SH): इनका निर्माण और रखरखाव राज्य सरकारों (PWD द्वारा) द्वारा किया जाता है। ये राज्य की राजधानी को जिला मुख्यालयों और अन्य महत्वपूर्ण शहरों से जोड़ते हैं।
- जिला सड़कें (District Roads): ये जिले के विभिन्न प्रशासनिक केंद्रों को जिला मुख्यालय से जोड़ती हैं। इनका रखरखाव जिला परिषद द्वारा किया जाता है।
- ग्रामीण सड़कें (Rural Roads): ये गाँवों को शहरों और कस्बों से जोड़ती हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत इनके विकास को विशेष बढ़ावा दिया गया है।
- सीमा सड़कें (Border Roads): इनका निर्माण और रखरखाव सीमा सड़क संगठन (Border Roads Organisation – BRO) द्वारा किया जाता है। ये देश के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक महत्व की सड़कें बनाती हैं।
सीमा सड़क संगठन (Border Roads Organisation – BRO): दुर्गम में सुगम मार्ग
परिभाषा:
सीमा सड़क संगठन (BRO) भारत का एक अग्रणी सड़क निर्माण संगठन है जो मुख्य रूप से भारत के सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सड़क अवसंरचना का विकास और रखरखाव करता है। यह एक अनूठी संस्था है जो रक्षा और विकास की भूमिकाओं का एक साथ निर्वहन करती है।
हालाँकि यह पूरी तरह से रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) के अधीन कार्य करता है, लेकिन इसका कार्य न केवल सैन्य महत्व का है, बल्कि यह उन दूर-दराज और दुर्गम इलाकों में रहने वाले नागरिकों के आर्थिक विकास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
स्थापना और उद्देश्य (Establishment and Objectives)
- स्थापना: इसकी स्थापना 7 मई 1960 को भारत के पहले प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई थी।
- स्थापना का उद्देश्य:
- भारत के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क का तेजी से विकास करना ताकि सशस्त्र बलों की रणनीतिक जरूरतों (Strategic Needs) को पूरा किया जा सके।
- इन सीमावर्ती क्षेत्रों के आर्थिक और सामाजिक विकास को गति देना, ताकि वहाँ के लोग देश की मुख्य धारा से जुड़ सकें।
- सीमावर्ती क्षेत्रों पर भारत की संप्रभुता को मजबूत करना।
BRO के प्रमुख कार्य और भूमिकाएँ (Major Functions and Roles)
- रणनीतिक सड़कों का निर्माण:
- इसका मुख्य कार्य सेना की लॉजिस्टिक्स और आवाजाही (Movement of troops and supplies) के लिए हर मौसम में खुली रहने वाली सड़कों का निर्माण करना है, विशेषकर चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर।
- ऊँचे पर्वतीय दर्रों पर विशेषज्ञता:
- BRO को दुनिया के कुछ सबसे ऊँचे और सबसे चुनौतीपूर्ण पर्वतीय दर्रों पर सड़क बनाने में विशेषज्ञता हासिल है। ये सड़कें अक्सर बर्फ से ढकी रहती हैं और यहाँ का तापमान शून्य से बहुत नीचे होता है।
- पुलों और सुरंगों का निर्माण:
- पहाड़ी नदियों और भूस्खलन-संभावित क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बनाए रखने के लिए यह संगठन अत्याधुनिक पुलों और सुरंगों का निर्माण करता है।
- बर्फ की निकासी (Snow Clearance):
- सर्दियों के दौरान भारी हिमपात के कारण बंद हो जाने वाले रणनीतिक मार्गों (जैसे श्रीनगर-लेह राजमार्ग, मनाली-लेह राजमार्ग) को रिकॉर्ड समय में खोलना BRO की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
- पड़ोसी देशों में परियोजनाएँ:
- BRO भारत सरकार की “पड़ोसी पहले” (Neighbourhood First) नीति के तहत मित्र देशों, जैसे भूटान, म्यांमार, अफ़गानिस्तान, और तजाकिस्तान, में भी सड़क और अवसंरचना परियोजनाओं का निर्माण करता है।
- आपदा राहत कार्य:
- भूकंप, भूस्खलन या बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान, BRO कनेक्टिविटी बहाल करने और राहत एवं बचाव कार्यों में सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
BRO की ऐतिहासिक और विश्व-रिकॉर्ड उपलब्धियाँ (Landmark Achievements)
BRO को अक्सर “पर्वतों के विजेता” (Conquerors of Mountains) कहा जाता है। इसकी कुछ प्रमुख उपलब्धियाँ हैं:
- अटल टनल (Atal Tunnel):
- यह हिमाचल प्रदेश में रोहतांग दर्रे के नीचे बनाई गई दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग (9.02 किमी, 10,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर) है। इसने मनाली और लेह के बीच की दूरी को काफी कम कर दिया है और लाहौल घाटी को साल भर कनेक्टिविटी प्रदान की है।
- उमलिंग-ला दर्रा सड़क (Umling La Pass Road):
- BRO ने पूर्वी लद्दाख में 19,300 फीट की ऊँचाई पर स्थित उमलिंग-ला दर्रे पर दुनिया की सबसे ऊँची मोटर योग्य सड़क (Highest Motorable Road) का निर्माण करके एक विश्व रिकॉर्ड बनाया है।
- ज़ोजिला टनल (Zoji La Tunnel):
- श्रीनगर को लेह से जोड़ने वाली इस निर्माणाधीन सुरंग से ज़ोजिला दर्रे पर साल भर कनेक्टिविटी सुनिश्चित होगी, जो सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण बंद हो जाता है।
- प्रोजेक्ट दंतक (Project DANTAK):
- भूटान में 1961 से चल रही इस परियोजना के तहत, BRO ने भूटान में सड़कों, पुलों और हवाई अड्डों का एक विशाल नेटवर्क बनाया है, जो उस देश के विकास में एक मील का पत्थर है।
संगठनात्मक संरचना (Organizational Structure):
- इसका नेतृत्व महानिदेशक सीमा सड़क (Director General Border Roads – DGBR) करते हैं, जो एक लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के सैन्य अधिकारी होते हैं।
- इसके अधिकांश कर्मी जनरल रिजर्व इंजीनियर फोर्स (GREF) से आते हैं, लेकिन इसमें भारतीय सेना की कोर ऑफ इंजीनियर्स के अधिकारी और जवान भी शामिल होते हैं।
आदर्श वाक्य (Motto):
- “श्रमेण सर्वम् साध्यम्” (Shramena Sarvam Sadhyam), जिसका अर्थ है “श्रम से सब कुछ संभव है”।
निष्कर्ष:
सीमा सड़क संगठन (BRO) केवल एक सड़क निर्माण एजेंसी नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक क्षमता और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास का एक अभिन्न अंग है। विपरीत मौसम और दुर्गम इलाकों में असाधारण इंजीनियरिंग कौशल का प्रदर्शन करते हुए, BRO भारत की सीमाओं का प्रहरी और दूर-दराज के समुदायों के लिए विकास का अग्रदूत है।
BRO के प्रमुख प्रोजेक्ट्स (Major Projects of BRO)
BRO अपने कार्यों को विभिन्न “प्रोजेक्ट्स” के माध्यम से क्रियान्वित करता है। प्रत्येक प्रोजेक्ट का एक विशिष्ट नाम होता है और यह एक या एक से अधिक राज्यों में रणनीतिक अवसंरचना के निर्माण के लिए जिम्मेदार होता है।
| प्रोजेक्ट का नाम | स्थापना वर्ष | मुख्यालय (HQ) | कार्य क्षेत्र (State/UT) | प्रमुख उपलब्धियाँ / कार्य |
| प्रोजेक्ट बीकन | 1960 | श्रीनगर | जम्मू और कश्मीर | BRO का सबसे पुराना प्रोजेक्ट। ज़ोजिला दर्रा को खोलना, श्रीनगर-लेह राजमार्ग का रखरखाव, और ज़ोजिला टनल का निर्माण। |
| प्रोजेक्ट चेतक | 1962 | बीकानेर | राजस्थान, पंजाब, हरियाणा | पश्चिमी सीमाओं (पाकिस्तान सीमा) के साथ रणनीतिक सड़कों का निर्माण। रेगिस्तानी इलाकों में सड़क निर्माण में विशेषज्ञता। |
| प्रोजेक्ट हिमांक | 1985 | लेह | लद्दाख | “पर्वत विजेता” के रूप में जाना जाता है। खरदुंग-ला, तांगलांग-ला और उमलिंग-ला दर्रे पर दुनिया की सबसे ऊँची सड़कों का निर्माण। |
| प्रोजेक्ट वर्तक | 1964 | तेजपुर | अरुणाचल प्रदेश, असम | सेला टनल का निर्माण, जो तवांग को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करेगी। अरुणाचल प्रदेश में चीन सीमा के साथ सड़कों का जाल। |
| प्रोजेक्ट अरुणक | 2008 | नाहरलागुन | अरुणाचल प्रदेश | विशेष रूप से दूर-दराज और दुर्गम अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्रों में कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए बनाया गया है। दापोरिजो पुल का निर्माण। |
| प्रोजेक्ट दंतक | 1961 | सिम्टोकॉन्ग | भूटान | विदेशी धरती पर BRO का सबसे पुराना और सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट। भूटान में सड़कों, हवाई अड्डों और अन्य बुनियादी ढाँचों का निर्माण। |
| प्रोजेक्ट दीपक | 1963 | शिमला | हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड | मनाली-लेह राजमार्ग का निर्माण और रखरखाव। अटल टनल के दक्षिणी पोर्टल का निर्माण। चारधाम परियोजना के तहत सड़कों का उन्नयन। |
| प्रोजेक्ट शिवालिक | 2009 | देहरादून | उत्तराखंड | विशेष रूप से उत्तराखंड में चारधाम महामार्ग विकास परियोजना के तहत सड़कों और सुरंगों का निर्माण। चीन सीमा के पास सड़कों का निर्माण। |
| प्रोजेक्ट संपर्क | 1975 | जम्मू | दक्षिणी जम्मू और कश्मीर | अखनूर-पुंछ क्षेत्र में नियंत्रण रेखा (LOC) के साथ महत्वपूर्ण सड़कों और पुलों का निर्माण। |
| प्रोजेक्ट स्वस्तिक | 2008 | गंगटोक | सिक्किम | चीन सीमा के पास, विशेषकर नाथू-ला और डोका-ला क्षेत्र में हर मौसम में कनेक्टिविटी बनाए रखना। |
| प्रोजेक्ट योजक | 2021 | – | लद्दाख | BRO के सबसे नए प्रोजेक्ट्स में से एक। लद्दाख के लिए एक वैकल्पिक, तीसरे एक्सिस (निम्मु-पदम-दारचा सड़क) का निर्माण। शिंकू-ला टनल का निर्माण। |
| प्रोजेक्ट उदयक | 1990 | डूमडूमा | असम, अरुणाचल प्रदेश | पूर्वी असम और अरुणाचल प्रदेश में सड़कों का विकास। |
राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (NHDP): भारत में सड़क क्रांति
परिभाषा:
राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (NHDP), भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (National Highways Authority of India – NHAI) द्वारा शुरू की गई अब तक की सबसे बड़ी और सबसे महत्वाकांक्षी राजमार्ग विकास परियोजना है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के प्रमुख राजमार्गों का उन्नयन (Upgrade), पुनर्वास (Rehabilitate), और चौड़ीकरण (Widen) करके उन्हें विश्व स्तरीय मानकों पर लाना था।
यह परियोजना भारत में सड़क परिवहन के बुनियादी ढाँचे में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आई, जिसने देश की आर्थिक वृद्धि, कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स को नई गति प्रदान की।
NHDP की शुरुआत और उद्देश्य (Launch and Objectives)
- शुरुआत: इस परियोजना को 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा लॉन्च किया गया था।
- मुख्य उद्देश्य:
- देश भर में सड़क संपर्क (Connectivity) में सुधार करके यात्रा के समय को कम करना और परिवहन लागत को घटाना।
- आर्थिक विकास को गति देने के लिए देश के प्रमुख महानगरों, औद्योगिक केंद्रों और बंदरगाहों को एक उच्च गति वाले सड़क नेटवर्क से जोड़ना।
- निर्माण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करना।
- सड़क सुरक्षा में सुधार करना और यातायात की भीड़ को कम करना।
NHDP के प्रमुख घटक (Major Components of NHDP)
NHDP को विभिन्न चरणों (Phases) में लागू किया गया, जिसके प्रत्येक चरण के अपने विशिष्ट लक्ष्य थे। इसके सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण घटक निम्नलिखित हैं:
1. स्वर्णिम चतुर्भुज (Golden Quadrilateral – GQ) – (NHDP चरण-I)
- क्या है?: यह NHDP का पहला, सबसे प्रसिद्ध और आधारभूत घटक है। यह देश के चार प्रमुख महानगरों – दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता – को जोड़ने वाली एक उच्च घनत्व वाली 6-लेन की राजमार्ग परियोजना है।
- कुल लंबाई: लगभग 5,846 किलोमीटर।
- महत्व:
- इसने भारत के चार प्रमुख औद्योगिक, कृषि और सांस्कृतिक केंद्रों को एक साथ जोड़ा।
- यह देश की कुल सड़क लंबाई का केवल एक छोटा सा हिस्सा है, लेकिन यह भारत के यातायात के एक बड़े हिस्से को संभालता है।
- इसने देश की लॉजिस्टिक्स दक्षता में क्रांति ला दी और माल तथा यात्रियों की आवाजाही को बहुत तेज कर दिया।
2. उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गलियारा (North-South and East-West Corridors – NS-EW) – (NHDP चरण-II)
- क्या है?: यह NHDP का दूसरा प्रमुख घटक है, जो भारत को शाब्दिक रूप से उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक जोड़ता है।
- उत्तर-दक्षिण गलियारा (North-South Corridor):
- मार्ग: श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर) को कन्याकुमारी (तमिलनाडु) से जोड़ता है।
- लंबाई: लगभग 4,000 किलोमीटर।
- पूर्व-पश्चिम गलियारा (East-West Corridor):
- मार्ग: सिल्चर (असम) को पोरबंदर (गुजरात) से जोड़ता है।
- लंबाई: लगभग 3,300 किलोमीटर।
- झाँसी में क्रॉसिंग: ये दोनों गलियारे उत्तर प्रदेश के झाँसी शहर में एक-दूसरे को काटते हैं (क्रॉस करते हैं)।
3. बंदरगाह संपर्क (Port Connectivity) – (NHDP चरण-I और II का हिस्सा)
- इसका उद्देश्य देश के 13 प्रमुख बंदरगाहों को 4-लेन/6-लेन राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से जोड़ना था ताकि बंदरगाहों तक और वहाँ से माल की आवाजाही को सुगम बनाया जा सके।
अन्य चरण (Other Phases):
- NHDP चरण-III: उच्च यातायात घनत्व वाले मौजूदा राष्ट्रीय राजमार्गों का 4-लेन में उन्नयन।
- NHDP चरण-IV: मौजूदा 2-लेन राजमार्गों को पक्की कंधों (Paved Shoulders) के साथ उन्नत करना।
- NHDP चरण-V: स्वर्णिम चतुर्भुज और अन्य चयनित 4-लेन राजमार्गों का 6-लेन में उन्नयन।
- NHDP चरण-VI: चयनित एक्सप्रेसवे का विकास।
- NHDP चरण-VII: रिंग रोड, बाईपास और फ्लाईओवरों का निर्माण।
NHDP का प्रभाव और महत्व
- आर्थिक वृद्धि: बेहतर कनेक्टिविटी ने उद्योगों के लिए कच्चे माल तक पहुँच और बाजारों तक तैयार माल की डिलीवरी को तेज और सस्ता बना दिया।
- लॉजिस्टिक्स में सुधार: इसने ट्रकों के टर्न-अराउंड समय को कम कर दिया और माल ढुलाई की दक्षता में भारी सुधार किया।
- समय और ईंधन की बचत: यात्रा के समय और वाहनों के ईंधन की खपत में उल्लेखनीय कमी आई।
- रोजगार सृजन: सड़क निर्माण और उससे जुड़ी गतिविधियों (जैसे ढाबे, होटल) में लाखों लोगों को रोजगार मिला।
- कृषि को बढ़ावा: इसने किसानों को अपनी खराब होने वाली उपज (फल, सब्जियाँ) को दूर के बाजारों तक जल्दी पहुँचाने में सक्षम बनाया।
- राष्ट्रीय एकीकरण: इसने देश के विभिन्न हिस्सों के बीच लोगों की आवाजाही को सुगम बनाकर सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण को मजबूत किया।
NHDP से भारतमाला परियोजना तक (Transition to Bharatmala Pariyojana)
NHDP के अधिकांश घटकों के पूरा हो जाने के बाद, भारत सरकार ने सड़क अवसंरचना के विकास के लिए एक और भी अधिक महत्वाकांक्षी और व्यापक कार्यक्रम शुरू किया है, जिसे “भारतमाला परियोजना” कहा जाता है।
भारतमाला परियोजना NHDP का उत्तराधिकारी है और इसका फोकस केवल मौजूदा राजमार्गों के उन्नयन पर नहीं, बल्कि आर्थिक गलियारों, फीडर मार्गों, सीमा और अंतरराष्ट्रीय सड़कों तथा तटीय सड़कों के एक एकीकृत नेटवर्क का निर्माण करके लॉजिस्टिक्स दक्षता को अधिकतम करना है।
निष्कर्ष:
NHDP ने भारत के सड़क बुनियादी ढाँचे का चेहरा बदल दिया। स्वर्णिम चतुर्भुज और NS-EW गलियारे जैसी इसकी प्रमुख परियोजनाओं ने देश के आर्थिक विकास के लिए एक ठोस आधार प्रदान किया है। यह परियोजना आधुनिक भारत के निर्माण में एक मील का पत्थर साबित हुई है, जिसके लाभ आज देश के हर नागरिक तक पहुँच रहे हैं।
शेरशाह सूरी और ‘सड़क-ए-आज़म’ (The Grand Trunk Road)
शेरशाह सूरी (शासनकाल 1540-1545) सूर साम्राज्य के संस्थापक थे। हालाँकि उनका शासनकाल बहुत छोटा था, लेकिन वे अपने प्रशासनिक, राजस्व और अवसंरचनात्मक सुधारों के लिए जाने जाते हैं। उनका सबसे प्रसिद्ध और स्थायी कार्य एक विशाल राजमार्ग का पुनर्निर्माण और उन्नयन था, जो साम्राज्य को एक साथ जोड़ता था।
- प्राचीन जड़ें: यह मार्ग कोई नया निर्माण नहीं था। इसके अस्तित्व के प्रमाण मौर्य काल (चंद्रगुप्त मौर्य के समय) में भी मिलते हैं, जब इसे “उत्तरापथ” (उत्तरी मार्ग) कहा जाता था। यह मार्ग तब तक्षशिला से पाटलिपुत्र और ताम्रलिप्ति (बंगाल में एक बंदरगाह) तक जाता था।
- शेरशाह सूरी का योगदान:
- पुनर्निर्माण और विस्तार: शेरशाह ने इस प्राचीन मार्ग का जीर्णोद्धार किया और इसे सोनारगांव (अब बांग्लादेश में) से अटक (अब पाकिस्तान में), पंजाब तक, और फिर आगरा, दिल्ली और मुल्तान तक विस्तारित किया। उन्होंने इसे “सड़क-ए-आज़म” (The Great Road) नाम दिया।
- यात्री सुविधाएँ: यह केवल एक सड़क नहीं थी, बल्कि एक पूरी व्यवस्था थी। शेरशाह ने मार्ग पर हर दो कोस (लगभग 8 किलोमीटर) पर एक “सराय” (Sarai) या विश्राम गृह बनवाया। इन सरायों में यात्रियों के रुकने, भोजन करने और उनके जानवरों के लिए चारे और पानी की व्यवस्था होती थी। ये सराय व्यापार और संचार के केंद्र भी बन गए।
- सुरक्षा और संचार: उन्होंने मार्ग पर सुरक्षा सुनिश्चित की और एक कुशल डाक प्रणाली (घोड़ों द्वारा डाक ले जाना) स्थापित की, जिससे साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों के बीच संचार बहुत तेज हो गया।
- वृक्षारोपण: यात्रियों को छाया प्रदान करने के लिए सड़क के दोनों ओर फलदार और छायादार वृक्ष लगवाए गए।
- कोस मीनारें: दूरी को इंगित करने के लिए हर कोस पर “कोस मीनारें” बनवाई गईं।
- ब्रिटिश काल में नामकरण: अंग्रेजों ने इस सड़क के महत्व को पहचाना और इसका और विस्तार किया। उन्होंने ही इसे “ग्रैंड ट्रंक रोड” (Grand Trunk Road – GT Road) नाम दिया। आज भी, भारत में राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-19, पुराना NH-2) का एक बड़ा हिस्सा इसी ऐतिहासिक GT रोड के संरेखण (alignment) पर है।
NHDP और शेरशाह सूरी के दृष्टिकोण में समानता
यद्यपि दोनों के बीच लगभग 450 वर्षों का अंतर है, NHDP और शेरशाह सूरी की ‘सड़क-ए-आज़म’ के पीछे का मूल दर्शन और उद्देश्य आश्चर्यजनक रूप से समान हैं:
- साम्राज्य/राष्ट्र का एकीकरण (Integration of the Nation):
- शेरशाह: उनकी सड़क-ए-आज़म का उद्देश्य अपने विशाल साम्राज्य के विभिन्न प्रशासनिक और वाणिज्यिक केंद्रों (बंगाल, दिल्ली, पंजाब) को जोड़ना था ताकि प्रशासन और सेना की आवाजाही को सुगम बनाया जा सके।
- NHDP: स्वर्णिम चतुर्भुज (GQ) का उद्देश्य भारत के चार प्रमुख महानगरों (दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता) को जोड़कर देश के आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्रों को एकीकृत करना था।
- व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देना (Boosting Trade and Commerce):
- शेरशाह: सरायों, सुरक्षित मार्गों और एक समान मुद्रा ने व्यापारियों के लिए लंबी दूरी की यात्रा को आसान और सुरक्षित बना दिया, जिससे वाणिज्य को बढ़ावा मिला।
- NHDP: उच्च गति वाले, बहु-लेन राजमार्गों ने माल ढुलाई (लॉजिस्टिक्स) की लागत और समय को कम कर दिया, जिससे व्यापार और औद्योगिक विकास को अभूतपूर्व गति मिली।
- रणनीतिक महत्व (Strategic Importance):
- शेरशाह: यह मार्ग सेनाओं को तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए महत्वपूर्ण था।
- NHDP (विशेषकर NS-EW गलियारा): ये गलियारे देश के संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों (श्रीनगर) को मुख्य भूमि से जोड़कर सेना की रणनीतिक गतिशीलता को बढ़ाते हैं।
- संचार में सुधार (Improving Communication):
- शेरशाह: उनकी डाक प्रणाली ने संचार को तेज कर दिया।
- NHDP: आधुनिक सड़कों ने लोगों और सूचनाओं की आवाजाही को आसान और तेज बना दिया।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (NHDP) को आधुनिक भारत की “इलेक्ट्रॉनिक सड़क-ए-आज़म” कहा जा सकता है। यह शेरशाह सूरी के उसी दूरदर्शी विचार का 21वीं सदी का संस्करण है, जिसमें माना गया कि एक कुशल और अच्छी तरह से जुड़ा हुआ परिवहन नेटवर्क ही किसी राष्ट्र की प्रशासनिक एकता, आर्थिक समृद्धि और रणनीतिक शक्ति की रीढ़ होता है।
जिस प्रकार शेरशाह सूरी की सड़क ने मध्यकालीन भारत के एकीकरण और व्यापार में क्रांति ला दी, उसी प्रकार NHDP ने आधुनिक भारत की अर्थव्यवस्था और कनेक्टिविटी में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया है। यह इस बात का प्रमाण है कि बुनियादी ढाँचे के विकास का महत्व समय और प्रौद्योगिकी के साथ नहीं बदलता।
हरित राजमार्ग (वृक्षारोपण, प्रत्यारोपण, सौंदर्यीकरण एवं रखरखाव) नीति, 2015
परिचय:
हरित राजमार्ग नीति, 2015, जिसे सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (Ministry of Road Transport and Highways) द्वारा लॉन्च किया गया था, भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों को पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ (Environmentally Sustainable) और सौंदर्य की दृष्टि से आकर्षक बनाने की एक महत्वाकांक्षी पहल है।
इस नीति का मुख्य उद्देश्य केवल सड़कों का निर्माण करना नहीं, बल्कि उन्हें हरियाली, पारिस्थितिक संतुलन और स्थानीय समुदायों के सशक्तिकरण से जोड़ना है।
नीति के प्रमुख उद्देश्य (Key Objectives)
- हरित गलियारों का विकास (Development of Green Corridors):
- राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे वृक्षारोपण और भू-दृश्यीकरण (Landscaping) के माध्यम से हरित गलियारे विकसित करना।
- वायु प्रदूषण और धूल को कम करना (Reducing Air and Dust Pollution):
- पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) जैसे प्रदूषकों को सोखते हैं और धूल के कणों को रोकते हैं, जिससे राजमार्गों के किनारे वायु की गुणवत्ता में सुधार होता है।
- सड़क सुरक्षा में सुधार (Improving Road Safety):
- पेड़ हेडलाइट की चकाचौंध (Headlight Glare) को कम करते हैं और एक दृश्य अवरोधक (Visual Barrier) के रूप में कार्य करके ड्राइवरों का ध्यान केंद्रित रखने में मदद करते हैं।
- यह ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) को भी कम करते हैं।
- पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता का संरक्षण:
- स्थानीय और देशज प्रजातियों के पेड़ लगाने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने और पक्षियों तथा छोटे जानवरों के लिए आवास बनाने में मदद मिलती है।
- स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार सृजन:
- वृक्षारोपण, पौधों के रखरखाव (नर्सरी), और निगरानी जैसी गतिविधियों में स्थानीय समुदायों, गैर सरकारी संगठनों (NGOs), स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और निजी क्षेत्र को शामिल करके रोजगार के अवसर पैदा करना।
- कार्बन सिंक का निर्माण:
- बड़ी संख्या में पेड़ लगाकर कार्बन सिंक का निर्माण करना, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद करेगा।
नीति के प्रमुख प्रावधान और कार्यप्रणाली (Key Provisions and Mechanism)
- ‘ग्रीन हाईवे फंड’ का निर्माण:
- इस नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि सड़क निर्माण की कुल परियोजना लागत (Total Project Cost – TPC) का 1% हिस्सा “ग्रीन हाईवे फंड” में जमा करना अनिवार्य कर दिया गया है।
- इस फंड का उपयोग विशेष रूप से वृक्षारोपण और उसके रखरखाव के लिए किया जाता है।
- एक मजबूत निगरानी तंत्र (Robust Monitoring Mechanism):
- पेड़ों के जीवित रहने की दर सुनिश्चित करने के लिए, नीति में सैटेलाइट-आधारित निगरानी (ISRO के भुवन और गगन प्लेटफॉर्म का उपयोग) और ऑडिटिंग का प्रावधान है।
- ठेकेदारों को भुगतान पेड़ों की जीवित रहने की दर से जोड़ा जाता है। यदि पेड़ जीवित नहीं रहते हैं, तो ठेकेदार पर जुर्माना लगाया जाता है।
- रोपित किए जाने वाले पौधों का प्रकार:
- नीति में स्पष्ट रूप से स्थानीय, देशज (Native) और पर्यावरण के अनुकूल प्रजातियों को लगाने पर जोर दिया गया है, जो उस क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के लिए उपयुक्त हों।
- इसमें छायादार वृक्ष, फलदार वृक्ष और औषधीय पौधे शामिल हैं।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और सामुदायिक भागीदारी:
- नीति केवल सरकारी एजेंसियों द्वारा वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है। यह निजी कंपनियों, गैर सरकारी संगठनों, किसानों और स्थानीय समुदायों को वृक्षारोपण और रखरखाव के कार्यों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- राष्ट्रीय हरित राजमार्ग मिशन (National Green Highways Mission – NGHM):
- इस नीति के लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए NGHM की स्थापना की गई।
- प्रत्यारोपण (Transplantation) पर जोर:
- सड़क चौड़ीकरण परियोजनाओं के दौरान पेड़ों को काटने के बजाय, जहाँ भी संभव हो, उन्हें आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रत्यारोपित करने पर जोर दिया गया है।
अपेक्षित लाभ और प्रभाव (Expected Benefits and Impact)
- पर्यावरणीय लाभ: वायु और ध्वनि प्रदूषण में कमी, जैव विविधता में वृद्धि, कार्बन अवशोषण।
- आर्थिक लाभ: स्थानीय समुदायों के लिए लगभग 10 लाख से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना। लघु वनोपज (जैसे फल, शहद) से अतिरिक्त आय।
- सामाजिक लाभ: राजमार्गों का सौंदर्यीकरण, यात्रियों के लिए सुखद अनुभव, और पर्यावरण के प्रति सामुदायिक जागरूकता में वृद्धि।
- सुरक्षा लाभ: दुर्घटनाओं में कमी और सड़क सुरक्षा में सुधार।
निष्कर्ष:
हरित राजमार्ग नीति, 2015, सड़क निर्माण को केवल एक इंजीनियरिंग गतिविधि के रूप में देखने के बजाय उसे एक समग्र और टिकाऊ विकास की प्रक्रिया के रूप में देखती है। यह “विकास बनाम पर्यावरण” की बहस को संबोधित करती है और यह दर्शाती है कि कैसे अवसंरचना विकास और पर्यावरण संरक्षण एक साथ चल सकते हैं। इस नीति का प्रभावी कार्यान्वयन न केवल भारत के राजमार्गों को हरा-भरा बनाएगा, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन से निपटने और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने में भी एक महत्वपूर्ण योगदान देगा।
भारतमाला परियोजना: नए भारत के लिए सड़कों का एकीकृत नेटवर्क
परिभाषा:
भारतमाला परियोजना सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (Ministry of Road Transport and Highways) द्वारा शुरू किया गया एक छाता कार्यक्रम (Umbrella Program) और अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (NHDP) का उत्तराधिकारी है।
इसका उद्देश्य केवल सड़कों का निर्माण या चौड़ीकरण करना नहीं है, बल्कि देश भर में सड़क नेटवर्क के बुनियादी ढाँचे में मौजूद खामियों को दूर करके माल और यात्री परिवहन की दक्षता को अनुकूलित (Optimize) करना है।
लॉन्च: इस परियोजना को 31 जुलाई 2015 को अनुमोदित किया गया था।
भारतमाला परियोजना का उद्देश्य (Objectives of Bharatmala)
- निर्बाध कार्गो आवाजाही (Seamless Cargo Movement): माल ढुलाई की गति बढ़ाना और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना ताकि भारतीय उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकें।
- महत्वपूर्ण अवसंरचना अंतरालों को भरना: उन क्षेत्रों तक सड़क पहुँचाना जहाँ अभी भी कनेक्टिविटी की कमी है।
- आर्थिक गलियारों का विकास: प्रमुख आर्थिक केंद्रों को जोड़कर व्यापार और वाणिज्य को गति देना।
- रोजगार सृजन: सड़क निर्माण गतिविधियों के माध्यम से बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा करना।
- कनेक्टिविटी में सुधार: देश के पिछड़े, आदिवासी और सीमावर्ती क्षेत्रों को सड़क नेटवर्क से बेहतर ढंग से जोड़ना।
भारतमाला परियोजना के प्रमुख घटक (Key Components)
भारतमाला परियोजना एक बहुआयामी कार्यक्रम है जिसमें विभिन्न प्रकार की सड़क परियोजनाओं को एक साथ एकीकृत किया गया है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
- आर्थिक गलियारे (Economic Corridors – EC):
- लक्ष्य: प्रमुख विनिर्माण और वाणिज्यिक केंद्रों को जोड़ना।
- विवरण: इसके तहत लगभग 9,000 किलोमीटर लंबे आर्थिक गलियारे विकसित किए जाएंगे (जैसे मुंबई-कोलकाता, दिल्ली-देहरादून)।
- अंतर-गलियारा और फीडर मार्ग (Inter-corridor and Feeder Routes):
- लक्ष्य: राष्ट्रीय और आर्थिक गलियारों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना।
- विवरण: लगभग 15,000 किलोमीटर के फीडर और इंटर-कनेक्टिंग मार्गों का विकास किया जाएगा ताकि छोटे शहरों और उत्पादन केंद्रों को मुख्य नेटवर्क से जोड़ा जा सके।
- राष्ट्रीय गलियारा दक्षता सुधार (National Corridor Efficiency Improvement):
- लक्ष्य: स्वर्णिम चतुर्भुज और उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम गलियारों जैसे उच्च घनत्व वाले राष्ट्रीय गलियारों पर भीड़ को कम करना।
- विवरण: इसके तहत मौजूदा 4-लेन राजमार्गों को 6/8-लेन में अपग्रेड करना, रिंग रोड, बाईपास और एलिवेटेड कॉरिडोर बनाना शामिल है।
- सीमा और अंतर्राष्ट्रीय संपर्क सड़कें (Border & International Connectivity Roads):
- लक्ष्य: पड़ोसी देशों (नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार) के साथ व्यापार को बढ़ावा देने और सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक कनेक्टिविटी में सुधार करना।
- विवरण: इसके तहत लगभग 2,000 किलोमीटर की सड़कों का विकास किया जाएगा।
- तटीय और बंदरगाह संपर्क सड़कें (Coastal & Port Connectivity Roads):
- लक्ष्य: बंदरगाहों तक माल की आवाजाही को तेज करना और तटीय क्षेत्रों के विकास को बढ़ावा देना।
- विवरण: इसके तहत लगभग 2,000 किलोमीटर की सड़कों का विकास किया जाएगा (जैसे सागरमाला परियोजना के पूरक के रूप में)।
- ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे (Greenfield Expressways):
- लक्ष्य: प्रमुख शहरों के बीच यात्रा के समय को नाटकीय रूप से कम करने के लिए बिल्कुल नए, उच्च गति वाले एक्सप्रेसवे का निर्माण करना।
- उदाहरण: दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे, अहमदाबाद-धोलेरा एक्सप्रेसवे।
कुल लंबाई: इन सभी घटकों को मिलाकर, भारतमाला चरण-I के तहत लगभग 34,800 किलोमीटर सड़कों का विकास किया जाना है।
भारतमाला और NHDP में अंतर (Difference between Bharatmala and NHDP)
| आधार | NHDP | भारतमाला परियोजना |
| दृष्टिकोण | मुख्य रूप से मौजूदा राजमार्गों का चौड़ीकरण और उन्नयन। | एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण। केवल उन्नयन नहीं, बल्कि अवसंरचना के अंतरालों को भरना। |
| फोकस | शहरों को जोड़ना (Point-to-point connectivity)। | आर्थिक गलियारों और लॉजिस्टिक्स दक्षता पर केंद्रित। |
| प्रौद्योगिकी | पारंपरिक तरीके। | उपग्रह मानचित्रण, वैज्ञानिक सर्वेक्षण और प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग। |
| दायरा | मुख्यतः स्वर्णिम चतुर्भुज और NS-EW गलियारे। | इसमें आर्थिक गलियारे, फीडर मार्ग, सीमा, तटीय सड़कें और एक्सप्रेसवे सब कुछ शामिल है। |
परियोजना का महत्व और लाभ
- अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: अनुमान है कि इससे लॉजिस्टिक्स लागत GDP के 13% से घटकर 8-9% तक आ सकती है, जिससे भारतीय उत्पाद सस्ते और अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।
- कनेक्टिविटी में क्रांति: यह पूर्वोत्तर भारत और अन्य दूर-दराज के क्षेत्रों को देश की मुख्य धारा से जोड़ेगा।
- बढ़ी हुई दक्षता: यात्रा के समय और ईंधन की खपत में भारी कमी आएगी।
- मेक इन इंडिया को समर्थन: कुशल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण पूर्वापेक्षा है।
- पर्यटन को बढ़ावा: बेहतर सड़क नेटवर्क देश भर में पर्यटन को सुगम बनाएगा।
निष्कर्ष:
भारतमाला परियोजना सिर्फ एक सड़क निर्माण कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह न्यू इंडिया के लिए एक एकीकृत अवसंरचना दृष्टि है। यह लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक में भारत की रैंकिंग में सुधार करने, आर्थिक विकास को गति देने और देश के हर कोने को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। यह NHDP की विरासत को एक नए और अधिक व्यापक स्तर पर ले जा रही है।
सेतु भारतम योजना: सुरक्षित और निर्बाध राजमार्गों की ओर एक कदम
परिचय:
सेतु भारतम योजना, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (Ministry of Road Transport and Highways) द्वारा शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) को रेलवे क्रॉसिंग से मुक्त (Railway Crossing free) बनाना है ताकि सड़क यात्रा को अधिक सुरक्षित और निर्बाध (Safe and Seamless) बनाया जा सके।
लॉन्च: इस योजना का शुभारंभ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा 4 मार्च 2016 को किया गया था।
सेतु भारतम योजना के प्रमुख उद्देश्य (Key Objectives)
- सड़क सुरक्षा बढ़ाना (Enhancing Road Safety):
- इस योजना का प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थित रेलवे क्रॉसिंग पर होने वाली दुर्घटनाओं को रोकना है। रेलवे क्रॉसिंग अक्सर सड़क हादसों के प्रमुख केंद्र होते हैं।
- निर्बाध और तीव्र यात्रा सुनिश्चित करना (Ensuring Seamless and Fast Travel):
- रेलवे क्रॉसिंग पर फाटक (gate) बंद होने के कारण वाहनों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है, जिससे यातायात जाम (Traffic Congestion) लगता है और यात्रा में देरी होती है। ओवरब्रिज या अंडरब्रिज के निर्माण से यातायात बिना रुके चल सकता है।
- ईंधन और समय की बचत (Saving Fuel and Time):
- ट्रैफिक जाम में फंसने से वाहनों का ईंधन बर्बाद होता है और लोगों का कीमती समय भी नष्ट होता है। निर्बाध यात्रा से इन दोनों की बचत होती है।
- लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार (Improving Logistics Efficiency):
- माल ढुलाई करने वाले ट्रकों की गति बढ़ने और समय पर अपने गंतव्य तक पहुँचने से देश की लॉजिस्टिक्स लागत कम होती है और आर्थिक दक्षता में सुधार होता है।
योजना के दो प्रमुख घटक (Two Major Components of the Scheme)
इस योजना को दो मुख्य भागों में क्रियान्वित किया जा रहा है:
1. रेल ओवर ब्रिज (ROBs) और रेल अंडर ब्रिज (RUBs) का निर्माण:
- लक्ष्य: राष्ट्रीय राजमार्गों पर मौजूद सभी रेलवे लेवल क्रॉसिंग (Railway Level Crossings) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना।
- क्रियान्वयन: इन क्रॉसिंग को बदलने के लिए रेल ओवर ब्रिज (Rail Over Bridges – ROBs) – यानी पटरियों के ऊपर से गुजरने वाले पुल – या रेल अंडर ब्रिज (Rail Under Bridges – RUBs) – यानी पटरियों के नीचे से गुजरने वाले सबवे – का निर्माण किया जा रहा है।
- पहचान किए गए स्थल: योजना के तहत, देश भर में लगभग 208 स्थानों पर ROBs/RUBs के निर्माण की पहचान की गई थी।
2. पुराने और जीर्ण-शीर्ण पुलों का पुनर्निर्माण और सुधार:
- लक्ष्य: राष्ट्रीय राजमार्गों पर मौजूद लगभग 1500 पुराने और कमजोर पुलों का चरणबद्ध तरीके से पुनर्निर्माण, चौड़ीकरण, या मजबूतीकरण (Reconstruction, Widening, or Strengthening) करना।
- क्रियान्वयन: इसके लिए भारतीय पुल प्रबंधन प्रणाली (Indian Bridge Management System – IBMS) नामक एक डेटाबेस बनाया गया है, जो देश के सभी पुलों और संरचनाओं की वैज्ञानिक सर्वेक्षण और रेटिंग करता है। यह प्रणाली पुराने, खतरनाक और मरम्मत की आवश्यकता वाले पुलों की पहचान करने में मदद करती है ताकि उन्हें प्राथमिकता के आधार पर ठीक किया जा सके।
बजट और वित्त पोषण (Budget and Funding)
- योजना के शुरुआती चरण में इसके लिए लगभग ₹50,800 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया था, जिसमें ROBs/RUBs के निर्माण और पुराने पुलों के सुधार की लागत शामिल थी।
सेतु भारतम योजना का महत्व और लाभ
- दुर्घटनाओं में कमी: यह राष्ट्रीय राजमार्गों पर मानवयुक्त और मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर होने वाली घातक दुर्घटनाओं को खत्म करके हजारों जिंदगियों को बचाएगा।
- आर्थिक लाभ: ईंधन की बर्बादी को रोककर और यात्रा के समय को कम करके, यह योजना देश को सालाना हजारों करोड़ रुपये बचाने में मदद करेगी।
- ‘मेक इन इंडिया’ और व्यापार सुगमता को बढ़ावा: बेहतर और तेज परिवहन नेटवर्क उद्योगों के लिए कच्चे माल और तैयार उत्पादों की आवाजाही को आसान बनाता है, जिससे व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) में सुधार होता है।
- अवसंरचना का आधुनिकीकरण: पुराने और खतरनाक पुलों को बदलकर या उनकी मरम्मत करके, यह योजना देश के राजमार्गों के बुनियादी ढाँचे को मजबूत और भविष्य के लिए तैयार कर रही है।
निष्कर्ष:
सेतु भारतम योजना केवल पुल बनाने की एक परियोजना नहीं है, बल्कि यह सड़क सुरक्षा, आर्थिक दक्षता और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देने वाला एक बहुआयामी प्रयास है। यह भारतमाला परियोजना जैसी बड़ी अवसंरचना योजनाओं की पूरक है और इसका लक्ष्य भारतीय राष्ट्रीय राजमार्गों पर यात्रा को पहले से कहीं अधिक तेज, सुरक्षित और सुगम बनाना है।
मोटर यान (संशोधन) अधिनियम, 2019
परिचय:
मोटर यान (संशोधन) अधिनियम, 2019, मूल मोटर यान अधिनियम, 1988 में किए गए व्यापक संशोधनों का एक समूह है। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य भारत में सड़क सुरक्षा में सुधार करना, यातायात नियमों के उल्लंघन को कम करना, प्रौद्योगिकी का उपयोग करके परिवहन विभाग को पारदर्शी बनाना, और सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों और चोटों की संख्या को कम करना है।
इसे सितंबर 2019 में लागू किया गया था और यह यातायात नियमों के उल्लंघन के लिए जुर्माने में की गई भारी वृद्धि के लिए सबसे अधिक चर्चा में रहा।
अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य (Key Objectives)
- सड़क सुरक्षा में सुधार: सड़क दुर्घटनाओं और उनसे होने वाली मौतों को कम करना।
- उल्लंघनकर्ताओं पर नकेल कसना: भारी जुर्माने का प्रावधान करके यातायात नियमों के प्रति लोगों में भय और सम्मान पैदा करना।
- नागरिकों की सुविधा: लाइसेंस और पंजीकरण जैसी प्रक्रियाओं को सरल और कम्प्यूटरीकृत बनाना।
- भ्रष्टाचार को कम करना: प्रौद्योगिकी के उपयोग से RTO (क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय) में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना।
- ग्रामीण परिवहन में सुधार: अंतिम-मील कनेक्टिविटी (Last-mile connectivity) में सुधार करना।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान और संशोधन (Key Provisions and Amendments)
1. यातायात उल्लंघन के लिए भारी जुर्माना (Hefty Penalties for Traffic Violations):
यह इस अधिनियम का सबसे प्रमुख और चर्चित प्रावधान है। लगभग सभी प्रकार के यातायात उल्लंघनों के लिए जुर्माने की राशि में 5 से 10 गुना तक की भारी वृद्धि की गई।
- उदाहरण:
- बिना हेलमेट: ₹1,000 जुर्माना और 3 महीने के लिए लाइसेंस का निलंबन।
- बिना सीट बेल्ट: ₹1,000 जुर्माना।
- शराब पीकर गाड़ी चलाना (Drunk Driving): ₹10,000 जुर्माना और/या 6 महीने की जेल।
- खतरनाक ड्राइविंग: ₹5,000 जुर्माना।
- बिना लाइसेंस के ड्राइविंग: ₹5,000 जुर्माना।
- एम्बुलेंस जैसे आपातकालीन वाहनों को रास्ता न देना: ₹10,000 जुर्माना।
2. ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन पंजीकरण का डिजिटलीकरण:
- ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन पंजीकरण प्रमाणपत्र (RC) जारी करने और उनके नवीनीकरण की प्रक्रिया को ऑनलाइन और कम्प्यूटरीकृत बनाया गया।
- नकली लाइसेंस को रोकने के लिए लाइसेंस को आधार से जोड़ना अनिवार्य किया गया।
- डिजिलॉकर (DigiLocker) या mParivahan जैसे इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर रखे गए दस्तावेजों को मूल दस्तावेजों के बराबर कानूनी मान्यता दी गई।
3. “गोल्डन आवर” (Golden Hour) का प्रावधान:
- सड़क दुर्घटना के बाद का पहला एक घंटा “गोल्डन आवर” के रूप में परिभाषित किया गया है।
- इस दौरान घायल व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा उपचार सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है, क्योंकि इस समय में जान बचाने की संभावना सबसे अधिक होती है।
4. “नेक मददगार” (Good Samaritan) का संरक्षण:
- अधिनियम में “नेक मददगार” (यानी, जो सड़क दुर्घटना पीड़ितों की मदद करता है) को कानूनी और पुलिसिया उत्पीड़न से बचाने का प्रावधान किया गया है।
- उनसे कोई भी सिविल या आपराधिक कार्यवाही के बिना पूछताछ नहीं की जा सकती, और उन्हें गवाह बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
5. किशोरों द्वारा ड्राइविंग (Driving by Juveniles):
- यदि कोई किशोर (18 वर्ष से कम) गाड़ी चलाते हुए कोई अपराध करता है, तो उसके अभिभावक या वाहन के मालिक को दोषी माना जाएगा।
- उन्हें ₹25,000 का जुर्माना और 3 साल तक की कैद हो सकती है, और उस वाहन का पंजीकरण भी रद्द किया जा सकता है।
6. “हिट एंड रन” मामलों में मुआवजा:
- “हिट एंड रन” मामले में पीड़ित की मृत्यु होने पर मुआवजे की राशि ₹25,000 से बढ़ाकर ₹2 लाख कर दी गई है।
- गंभीर रूप से घायल होने पर मुआवजे की राशि ₹12,500 से बढ़ाकर ₹50,000 कर दी गई है।
7. सड़क सुरक्षा बोर्ड का गठन:
- सड़क सुरक्षा और यातायात प्रबंधन पर केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देने के लिए राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड (National Road Safety Board) के गठन का प्रावधान किया गया है।
8. वाहनों की फिटनेस:
- वाहनों के लिए स्वचालित फिटनेस परीक्षण को अनिवार्य करने का प्रावधान किया गया है।
- खराब और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को सड़क से हटाने में मदद मिलेगी।
9. थर्ड पार्टी इंश्योरेंस:
- मोटर वाहन दुर्घटना कोष का निर्माण किया जाएगा, जो हिट-एंड-रन मामलों सहित सभी सड़क उपयोगकर्ताओं को अनिवार्य बीमा कवर प्रदान करेगा।
प्रभाव और आलोचना
- प्रभाव:
- अधिनियम के लागू होने के शुरुआती महीनों में यातायात नियमों के पालन में उल्लेखनीय सुधार देखा गया।
- हेलमेट और सीट बेल्ट के उपयोग में वृद्धि हुई।
- डिजिटलीकरण ने RTO कार्यालयों में पारदर्शिता बढ़ाई है।
- आलोचना:
- अत्यधिक भारी जुर्माना: कई लोगों और कुछ राज्य सरकारों ने जुर्माने की राशि को “अत्यधिक” और “अव्यावहारिक” बताया। कुछ राज्यों ने इसे अपने यहाँ कम दरों पर लागू किया।
- भ्रष्टाचार की संभावना: यह तर्क दिया गया कि बहुत अधिक जुर्माना ट्रैफिक पुलिस द्वारा भ्रष्टाचार को बढ़ा सकता है।
- अवसंरचना की कमी: आलोचकों का कहना है कि भारी जुर्माना लगाने से पहले सरकार को बेहतर सड़कें, संकेत और पार्किंग सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिए।
निष्कर्ष:
मोटर यान (संशोधन) अधिनियम, 2019 भारत में सड़क सुरक्षा को लेकर सरकार के गंभीर दृष्टिकोण को दर्शाता है। भारी जुर्माने से लेकर नेक मददगारों की सुरक्षा तक, इसके प्रावधानों का उद्देश्य मानवीय व्यवहार में बदलाव लाना और परिवहन प्रणाली को अधिक आधुनिक और जवाबदेह बनाना है। हालाँकि इसके कार्यान्वयन और जुर्मानों की राशि को लेकर कुछ बहसें हुई हैं, लेकिन यह अधिनियम सड़क दुर्घटनाओं की महामारी को रोकने की दिशा में एक ऐतिहासिक और आवश्यक कदम माना जाता है।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY): ग्रामीण भारत को जोड़ती सड़कें
परिचय:
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एक अत्यंत सफल और महत्वाकांक्षी राष्ट्रव्यापी योजना है। इसका एकमात्र और स्पष्ट उद्देश्य देश के उन अసంබන්ධित (Unconnected) गाँवों को हर मौसम में खुली रहने वाली (All-weather) सड़कों के एक गुणवत्तापूर्ण नेटवर्क से जोड़ना है, जो अभी तक मुख्य सड़क नेटवर्क से नहीं जुड़े हैं।
यह योजना ग्रामीण विकास, गरीबी उन्मूलन और समावेशी विकास के लिए एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक (Catalyst) मानी जाती है।
लॉन्च: इस योजना का शुभारंभ 25 दिसंबर 2000 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा किया गया था।
PMGSY के प्रमुख उद्देश्य (Key Objectives)
- ग्रामीण संपर्क (Rural Connectivity):
- इसका प्राथमिक उद्देश्य निर्धारित पात्रता के अनुसार, देश के सभी योग्य असंबद्ध बसावटों (Habitations) को बारहमासी सड़क संपर्क प्रदान करना है।
- बाजारों तक पहुँच (Access to Markets):
- किसानों को अपनी उपज (फल, सब्जियाँ, दूध) को नजदीकी बाजारों तक आसानी से और जल्दी पहुँचाने में सक्षम बनाना, जिससे उन्हें बेहतर मूल्य मिल सके और फसल के बाद का नुकसान कम हो।
- बुनियादी सेवाओं तक पहुँच (Access to Basic Services):
- गाँव के लोगों के लिए शिक्षा (स्कूल), स्वास्थ्य सेवा (अस्पताल), और अन्य प्रशासनिक तथा सामाजिक सेवाओं तक पहुँच को सुगम बनाना।
- रोजगार सृजन (Employment Generation):
- सड़क निर्माण गतिविधियों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा करना।
- ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन:
- सड़क संपर्क के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना, गैर-कृषि आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना और इस प्रकार गरीबी को कम करना।
पात्रता मानदंड (Eligibility Criteria)
इस योजना के तहत, बसावटों (Habitations) को जोड़ने का लक्ष्य उनकी जनसंख्या के आधार पर निर्धारित किया गया है:
- मैदानी क्षेत्रों में (in Plain Areas): 500 या उससे अधिक की आबादी वाली सभी असंबद्ध बसावटें।
- पहाड़ी, रेगिस्तानी और जनजातीय क्षेत्रों में (in Hilly, Desert, and Tribal Areas): 250 या उससे अधिक की आबादी वाली सभी असंबद्ध बसावटें।
PMGSY के चरण और विकास (Phases and Evolution of PMGSY)
यह योजना समय के साथ विकसित हुई है और इसके दायरे का विस्तार किया गया है:
1. PMGSY – चरण I (Phase-I):
- फोकस: मुख्य रूप से नई सड़कों का निर्माण करके पात्र असंबद्ध बसावटों को जोड़ना।
- अवधि: 2000 में शुरू।
2. PMGSY – चरण II (Phase-II):
- फोकस: केवल नई सड़कों पर ही नहीं, बल्कि मौजूदा ग्रामीण सड़क नेटवर्क के उन्नयन (Upgradation) पर भी ध्यान केंद्रित करना।
- अवधि: 2013 में अनुमोदित।
- लक्ष्य: राज्यों द्वारा निर्मित लगभग 50,000 किलोमीटर मौजूदा ग्रामीण सड़कों का उन्नयन करना ताकि वे यातायात के बढ़ते घनत्व को संभाल सकें।
3. वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क संपर्क परियोजना (Road Connectivity Project for Left Wing Extremism – LWE Areas):
- फोकस: यह एक अलग वर्टिकल है, जिसे सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील और विकासात्मक रूप से महत्वपूर्ण वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित 9 राज्यों के 44 जिलों में सड़क संपर्क में सुधार के लिए शुरू किया गया है।
4. PMGSY – चरण III (Phase-III):
- फोकस: नई बसावटों को जोड़ने के बजाय, अब प्रमुख ग्रामीण लिंक मार्गों (Major Rural Links) और ग्रामीण बाजारों (GrAMs), उच्च माध्यमिक विद्यालयों तथा अस्पतालों को जोड़ने वाली सड़कों पर ध्यान केंद्रित करना।
- अवधि: 2019 में अनुमोदित।
- लक्ष्य: 1,25,000 किलोमीटर सड़कों का समेकन और सुधार करना ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि बाजारों तक पहुँच आसान हो सके।
PMGSY की प्रमुख विशेषताएँ और कार्यान्वयन
- केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme): यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसका अर्थ है कि इसका वित्त पोषण केंद्र और राज्य सरकारें दोनों मिलकर करती हैं। (अधिकांश राज्यों के लिए 60:40 का अनुपात; पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10)।
- गुणवत्ता पर जोर: यह योजना केवल सड़कों के निर्माण पर ही नहीं, बल्कि उनकी उच्च गुणवत्ता और रखरखाव पर भी बहुत जोर देती है।
- तकनीकी मानक: सड़कों का डिजाइन भारतीय सड़क कांग्रेस (Indian Roads Congress – IRC) के मानकों के अनुसार किया जाता है।
- ऑनलाइन निगरानी: योजना की प्रगति की निगरानी के लिए एक ऑनलाइन प्रबंधन और निगरानी प्रणाली OMMAS (Online Management, Monitoring and Accounting System) का उपयोग किया जाता है। इसमें नागरिक सूचना बोर्ड और जियो-टैगिंग के माध्यम से पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है।
PMGSY का प्रभाव और सफलता
PMGSY को भारत की सबसे सफल ग्रामीण विकास योजनाओं में से एक माना जाता है। इसके गहरे और बहुआयामी प्रभाव हुए हैं:
- आर्थिक प्रभाव: कृषि आय में वृद्धि, गैर-कृषि रोजगार के अवसरों में वृद्धि।
- सामाजिक प्रभाव: स्कूली शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच, विशेषकर लड़कियों और महिलाओं के लिए।
- जीवन स्तर में सुधार: ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के जीवन स्तर में समग्र सुधार हुआ है।
- उदाहरण: कई अध्ययनों से पता चला है कि PMGSY सड़कों वाले गाँवों में गैर-कृषि रोजगार में वृद्धि हुई है और बच्चों, विशेषकर लड़कियों, के स्कूल छोड़ने की दर में कमी आई है।
निष्कर्ष:
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना ने शाब्दिक रूप से भारत के ग्रामीण परिदृश्य को बदल दिया है। यह सिर्फ डामर और कंक्रीट बिछाने की योजना नहीं है, बल्कि यह विकास, अवसरों और प्रगति को भारत के दूर-दराज के गाँवों तक पहुँचाने का एक शक्तिशाली माध्यम है। इसने ग्रामीण भारत को न केवल भौतिक रूप से, बल्कि आर्थिक और सामाजिक रूप से भी देश की मुख्य धारा से जोड़ने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
B) रेल परिवहन (Rail Transport): राष्ट्र की जीवन रेखा
परिचय:
रेल परिवहन भारत में लंबी दूरी के लिए यात्रियों और भारी माल ढुलाई का सबसे प्रमुख, सस्ता और महत्वपूर्ण साधन है। भारतीय रेलवे न केवल देश का सबसे बड़ा परिवहन नेटवर्क है, बल्कि यह भारत का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (Public Sector Undertaking – PSU) और दुनिया के सबसे बड़े नियोक्ताओं (Employers) में से एक है।
इसकी व्यापक पहुँच और आर्थिक महत्व के कारण, भारतीय रेलवे को अक्सर “राष्ट्र की जीवन रेखा” (Lifeline of the Nation) कहा जाता है।
I. भारत में रेल परिवहन का ऐतिहासिक विकास
- प्रथम ट्रेन: भारत में पहली यात्री ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को मुंबई (बोरी बंदर) और ठाणे के बीच (34 किलोमीटर) चलाई गई थी।
- राष्ट्रीयकरण (Nationalization): 1951 में, देश की सभी निजी और सरकारी रेल कंपनियों का विलय करके “भारतीय रेलवे (Indian Railways)” का गठन किया गया और इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
- रेलवे ज़ोन: प्रशासनिक सुविधा के लिए, भारतीय रेलवे को अब 18 ज़ोन (Zones) और 70 डिवीजनों में विभाजित किया गया है। 18वाँ और नवीनतम ज़ोन ‘दक्षिण तट रेलवे’ (South Coast Railway) है, जिसका मुख्यालय विशाखापत्तनम में है।
II. भारतीय रेलवे नेटवर्क की प्रमुख विशेषताएँ
- नेटवर्क का आकार: भारतीय रेलवे दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है (संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और रूस के बाद)।
- रेलवे गेज (Railway Gauge): यह रेलवे पटरियों के बीच की आंतरिक दूरी होती है।
- ब्रॉड गेज (Broad Gauge):
- दूरी: 1.676 मीटर (5 फीट 6 इंच)
- विशेषता: यह भारतीय रेलवे का मानक गेज (Standard Gauge) है। लगभग पूरे नेटवर्क को इसी गेज में बदलने के लिए “प्रोजेक्ट यूनीगेज” (Project Unigauge) चलाया गया था। यह अधिक स्थिरता और क्षमता प्रदान करता है।
- मीटर गेज (Metre Gauge):
- दूरी: 1.000 मीटर
- विशेषता: अब इसका उपयोग बहुत सीमित हो गया है।
- नैरो गेज (Narrow Gauge):
- दूरी: 0.762 मीटर या 0.610 मीटर
- विशेषता: इसका उपयोग मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में चलने वाली “टॉय ट्रेनों” (Toy Trains) के लिए किया जाता है, जैसे कालका-शिमला रेलवे, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और नीलगिरी माउन्टेन रेलवे, जिन्हें यूनेस्को की विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है।
- ब्रॉड गेज (Broad Gauge):
- विद्युतीकरण (Electrification):
- भारतीय रेलवे ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, प्रदूषण कम करने और लागत घटाने के लिए अपने पूरे ब्रॉड गेज नेटवर्क का शत-प्रतिशत विद्युतीकरण करने के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
III. भारत में रेल परिवहन का महत्व
- आर्थिक एकीकरण: रेलवे देश के विभिन्न हिस्सों – उत्पादन केंद्रों (जैसे छोटानागपुर पठार), कृषि क्षेत्रों (जैसे पंजाब), और बाजारों (जैसे दिल्ली, मुंबई) – को एक साथ जोड़कर आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देता है।
- भारी माल ढुलाई: यह कोयला, लौह अयस्क, सीमेंट, खाद्यान्न और उर्वरक जैसे भारी और विशाल सामानों की लंबी दूरी की ढुलाई के लिए सबसे उपयुक्त है।
- यात्री परिवहन: यह करोड़ों लोगों के लिए लंबी दूरी की यात्रा का सबसे सस्ता और सुलभ साधन है।
- राष्ट्रीय एकता: रेलवे देश के विभिन्न संस्कृतियों और क्षेत्रों के लोगों को एक साथ लाकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में मदद करता है।
- रणनीतिक महत्व: रक्षा के समय, सैनिकों और सैन्य उपकरणों को सीमावर्ती क्षेत्रों तक तेजी से पहुँचाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
IV. आधुनिक विकास और भविष्य की परियोजनाएँ
- समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (Dedicated Freight Corridors – DFCs):
- यह भारतीय रेलवे की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। इसका उद्देश्य केवल मालगाड़ियों के लिए उच्च गति वाले, उच्च क्षमता वाले ट्रैक बनाना है ताकि माल ढुलाई में तेजी लाई जा सके और यात्री ट्रेनों के लिए मौजूदा ट्रैक खाली हो सकें।
- प्रमुख कॉरिडोर: पश्चिमी DFC (दादरी से JNPT) और पूर्वी DFC (लुधियाना से दानकुनी)।
- उच्च गति रेल (High-Speed Rail) / बुलेट ट्रेन:
- मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना है, जिसे जापान के सहयोग से बनाया जा रहा है।
- वंदे भारत एक्सप्रेस (Vande Bharat Express):
- यह भारत की पहली स्वदेशी रूप से विकसित, सेमी-हाई-स्पीड (160-180 किमी/घंटा) ट्रेन है। यह आधुनिक सुविधाओं से लैस है और प्रमुख शहरों के बीच यात्रा के समय को कम कर रही है।
- स्टेशनों का आधुनिकीकरण:
- “अमृत भारत स्टेशन योजना” के तहत देश भर के रेलवे स्टेशनों को विश्व स्तरीय सुविधाओं के साथ पुनर्विकसित किया जा रहा है।
- रेलवे सुरक्षा:
- टक्कर-रोधी प्रणाली “कवच” (Kavach) को ट्रेनों में लगाया जा रहा है ताकि मानवीय त्रुटियों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सके।
V. चुनौतियाँ (Challenges)
- अवसंरचना का दबाव: मौजूदा नेटवर्क पर क्षमता से अधिक यातायात का दबाव है।
- वित्तीय स्वास्थ्य: रेलवे का परिचालन अनुपात (Operating Ratio) अक्सर बहुत अधिक रहता है, जिससे लाभप्रदता प्रभावित होती है।
- सुरक्षा: दुर्घटनाएँ, हालांकि कम हुई हैं, फिर भी एक बड़ी चिंता का विषय हैं।
- समय की पाबंदी (Punctuality): ट्रेनों का देरी से चलना एक आम समस्या है।
निष्कर्ष:
भारतीय रेलवे भारत की सामाजिक-आर्थिक प्रगति का एक अविभाज्य अंग है। हालाँकि यह कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, लेकिन समर्पित फ्रेट कॉरिडोर, वंदे भारत ट्रेनों और व्यापक आधुनिकीकरण जैसी भविष्य की परियोजनाओं के साथ, यह 21वीं सदी की जरूरतों को पूरा करने और भारत के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को बनाए रखने के लिए खुद को रूपांतरित कर रहा है।
भारतीय रेलवे के 18 ज़ोन और उनके मुख्यालय
| क्र. सं. | रेलवे ज़ोन (Railway Zone) | संक्षेप (Abbreviation) | मुख्यालय (Headquarter) | प्रमुख राज्य / क्षेत्र |
| उत्तर रेलवे | ||||
| 1. | उत्तर रेलवे <br/> (Northern Railway) | NR | नई दिल्ली | दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड |
| 2. | उत्तर मध्य रेलवे<br/> (North Central Railway) | NCR | प्रयागराज (इलाहाबाद) | उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान |
| 3. | उत्तर पश्चिम रेलवे<br/>(North Western Railway) | NWR | जयपुर | राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा |
| 4. | पूर्वोत्तर रेलवे<br/>(North Eastern Railway) | NER | गोरखपुर | उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड |
| पूर्व रेलवे | ||||
| 5. | पूर्व रेलवे<br/>(Eastern Railway) | ER | कोलकाता | पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार |
| 6. | पूर्व मध्य रेलवे<br/>(East Central Railway) | ECR | हाजीपुर | बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश |
| 7. | पूर्व तट रेलवे<br/>(East Coast Railway) | ECoR | भुवनेश्वर | ओडिशा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ |
| 8. | उत्तर पूर्व सीमांत रेलवे <br/>(Northeast Frontier Railway) | NFR | मालिगांव (गुवाहाटी) | पूर्वोत्तर के सभी राज्य (सात बहनें), पश्चिम बंगाल, बिहार |
| दक्षिण रेलवे | ||||
| 9. | दक्षिण रेलवे<br/>(Southern Railway) | SR | चेन्नई | तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक |
| 10. | दक्षिण मध्य रेलवे<br/>(South Central Railway) | SCR | सिकंदराबाद | तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश |
| 11. | दक्षिण पश्चिम रेलवे <br/> (South Western Railway) | SWR | हुबली | कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु |
| 12. | दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे <br/>(South East Central Railway) | SECR | बिलासपुर | छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र |
| 13. | दक्षिण तट रेलवे<br/> (South Coast Railway) | SCoR | विशाखापत्तनम | नवीनतम (18वाँ) ज़ोन; मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश |
| पश्चिम रेलवे | ||||
| 14. | पश्चिम रेलवे <br/>(Western Railway) | WR | मुंबई (चर्चगेट) | महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश |
| 15. | पश्चिम मध्य रेलवे<br/>(West Central Railway) | WCR | जबलपुर | मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान |
| 16. | दक्षिण पूर्व रेलवे <br/>(South Eastern Railway) | SER | गार्डन रीच (कोलकाता) | पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा |
| अन्य | ||||
| 17. | मध्य रेलवे<br/>(Central Railway) | CR | मुंबई (छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस) | महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक |
| 18. | कोलकाता मेट्रो<br/>(Kolkata Metro) | कोलकाता | यह भारत का एकमात्र मेट्रो सिस्टम है जिसे भारतीय रेलवे के एक अलग ज़ोन का दर्जा प्राप्त है। |
भारत में विशेष रेल प्रणालियाँ: पर्यटन और विरासत का सफ़र
भारतीय रेलवे केवल परिवहन का एक साधन नहीं है, बल्कि यह देश की समृद्ध विरासत, संस्कृति और अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव करने का एक माध्यम भी है। इस उद्देश्य के लिए, भारतीय रेलवे कई विशेष प्रकार की ट्रेनें और रेल प्रणालियाँ संचालित करता है, जिन्हें तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1. भारत के पर्वतीय रेलवे (Mountain Railways of India)
ये नैरो-गेज लाइनें हैं जो भारत के खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्रों में धीमी गति से चलती हैं और यात्रियों को लुभावने दृश्यों का अनुभव कराती हैं। इनमें से तीन को संयुक्त रूप से “भारत के पर्वतीय रेलवे” के नाम से यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) का दर्जा प्राप्त है।
| रेलवे का नाम | मार्ग | राज्य | यूनेस्को दर्जा | प्रमुख विशेषताएँ |
| A) दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे | न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग | पश्चिम बंगाल | 1999 | इसे “टॉय ट्रेन” के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत की पहली पर्वतीय रेलवे है और घूम स्टेशन (भारत का सबसे ऊँचा स्टेशन) तथा बटासिया लूप जैसे इंजीनियरिंग मोड़ों के लिए प्रसिद्ध है। |
| B) नीलगिरी माउंटेन रेलवे | मेट्टुपलायम से ऊटी (उदगमंडलम) | तमिलनाडु | 2005 | यह भारत की एकमात्र रैक और पिनियन प्रणाली वाली रेलवे है, जो इसे तीव्र ढलानों पर चढ़ने में मदद करती है। यह नीलगिरी (“नीले पहाड़”) की पहाड़ियों के मनोरम दृश्यों के लिए जानी जाती है। |
| C) कालका-शिमला रेलवे | कालका से शिमला | हिमाचल प्रदेश | 2008 | यह अपनी 96 किलोमीटर की यात्रा में 103 सुरंगों, 864 पुलों, और 919 तीखे मोड़ों से होकर गुजरती है, जो इसे एक रोमांचक और अविस्मरणीय अनुभव बनाता है। |
अन्य पर्वतीय रेलवे: माथेरान हिल रेलवे (महाराष्ट्र) और कांगड़ा वैली रेलवे (हिमाचल प्रदेश) भी महत्वपूर्ण पर्वतीय रेल लाइनें हैं।
2. लक्जरी पर्यटक ट्रेनें (Luxury Tourist Trains)
ये ट्रेनें किसी चलते-फिरते “फाइव-स्टार होटल” की तरह होती हैं, जो यात्रियों को शाही अंदाज में भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों की यात्रा कराती हैं।
| ट्रेन का नाम | संचालक / क्षेत्र | प्रमुख विशेषताएँ |
| पैलेस ऑन व्हील्स | राजस्थान पर्यटन और भारतीय रेलवे | यह भारत की पहली और सबसे प्रसिद्ध लक्जरी पर्यटक ट्रेन है। यह राजस्थान के शाही रजवाड़ों के अनुभव को फिर से जीवंत करती है और प्रमुख स्थलों की यात्रा कराती है। |
| महाराजा एक्सप्रेस | IRCTC | यह भारत की सबसे महंगी और सबसे शानदार लक्जरी ट्रेन है, जिसे “विश्व की अग्रणी लक्जरी ट्रेन” का पुरस्कार मिला है। यह उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत के विभिन्न यात्रा маршрутов की पेशकश करती है। |
| डेक्कन ओडिसी | महाराष्ट्र पर्यटन और भारतीय रेलवे | इसे “ब्लू ट्रेन” भी कहा जाता है। यह महाराष्ट्र के प्रमुख पर्यटन स्थलों जैसे अजंता-एलोरा की गुफाएँ, गोवा, और दक्कन के पठार की यात्रा कराती है। |
| गोल्डन चैरियट | कर्नाटक पर्यटन और भारतीय रेलवे | यह दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक, के विरासत स्थलों जैसे हम्पी, मैसूर और गोवा की यात्रा कराती है। |
3. थीम-आधारित रेलवे और सर्किट ट्रेनें (Theme-based Railways and Circuit Trains)
ये ट्रेनें विशेष विषयों या पर्यटन सर्किटों पर आधारित होती हैं, जो यात्रियों को एक विशेष अनुभव प्रदान करती हैं।
| ट्रेन का नाम / प्रकार | विषय / थीम | प्रमुख विशेषताएँ |
| बुद्धिस्ट सर्किट टूरिस्ट ट्रेन | बौद्ध धर्म से जुड़े स्थल | यह ट्रेन भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थानों जैसे बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, और लुम्बिनी की तीर्थयात्रा कराती है। |
| रामायण एक्सप्रेस | भगवान राम के जीवन से जुड़े स्थल | यह ट्रेन “श्री रामायण यात्रा” थीम पर आधारित है और भगवान राम के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों जैसे अयोध्या, चित्रकूट, और रामेश्वरम की यात्रा कराती है। |
| भारत गौरव ट्रेनें | देखो अपना देश (Dekho Apna Desh) | यह भारतीय रेलवे की एक नई पहल है जिसके तहत निजी ऑपरेटर भी विशेष थीम पर आधारित पर्यटन सर्किट ट्रेनें चला सकते हैं। इसका उद्देश्य भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को प्रदर्शित करना है। |
| फेयरी क्वीन | विरासत और स्टीम इंजन | यह दुनिया का सबसे पुराना चालू हालत में मौजूद स्टीम इंजन है (गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स)। यह दिल्ली और अलवर (राजस्थान) के बीच एक विशेष हेरिटेज टूर कराती है। |
निष्कर्ष:
ये विशेष रेल प्रणालियाँ भारतीय रेलवे के एक अद्वितीय और आकर्षक पहलू को दर्शाती हैं, जो केवल परिवहन से आगे बढ़कर पर्यटन, संस्कृति और विरासत के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल भारतीय रेलवे
1. दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (Darjeeling Himalayan Railway)
- शामिल होने का वर्ष: 1999
- विशेषता: यह भारत की पहली रेलवे लाइन थी जिसे यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला।
- राज्य: पश्चिम बंगाल
- मार्ग: न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग तक (लगभग 88 किलोमीटर)
- गेज: नैरो गेज (Narrow Gauge – 2 फीट / 610 मिमी)
- प्रसिद्ध उपनाम: टॉय ट्रेन (Toy Train)
- प्रमुख आकर्षण और इंजीनियरिंग चमत्कार:
- बटासिया लूप (Batasia Loop): दार्जिलिंग से ठीक पहले, ट्रेन एक गोलाकार लूप में घूमती है, जो न केवल ऊँचाई प्राप्त करने का एक चतुर इंजीनियरिंग समाधान है, बल्कि यहाँ से कंचनजंगा पर्वत का 360-डिग्री का मनोरम दृश्य भी दिखाई देता है।
- ज़ेड-रिवर्स और स्पाइरल (Z-Reverses and Spirals): तीव्र चढ़ाई से निपटने के लिए, ट्रेन कई जगहों पर आगे और पीछे की ओर चलती है (ज़िग-ज़ैग पैटर्न में)।
- घूम स्टेशन (Ghum Station): यह 7,407 फीट की ऊँचाई पर स्थित भारत का सबसे ऊँचा रेलवे स्टेशन है।
- स्टीम इंजन: आज भी इस मार्ग पर ऐतिहासिक भाप के इंजनों का उपयोग किया जाता है, जो इसे एक अनूठा विरासत अनुभव बनाता है।
2. नीलगिरी माउंटेन रेलवे (Nilgiri Mountain Railway)
- शामिल होने का वर्ष: 2005 (इसे दार्जिलिंग रेलवे के विस्तार के रूप में शामिल किया गया)
- राज्य: तमिलनाडु
- मार्ग: मेट्टुपलायम से कुन्नूर और ऊटी (उदगमंडलम) तक (लगभग 46 किलोमीटर)
- गेज: मीटर गेज (Metre Gauge)
- प्रमुख आकर्षण और इंजीनियरिंग चमत्कार:
- एब्ट रैक और पिनियन प्रणाली (Abt Rack and Pinion System): यह इस रेलवे की सबसे अनूठी विशेषता है। मेट्टुपलायम से कुन्नूर तक की तीव्र चढ़ाई के लिए, यह भारत की एकमात्र रेलवे है जो रैक और पिनियन प्रणाली का उपयोग करती है। इसमें पटरियों के बीच एक दाँतेदार रैक होती है और इंजन में एक दाँतेदार पहिया (पिनियन) होता है, जो आपस में फंसकर ट्रेन को तीव्र ढलान पर फिसलने से रोकते हैं और चढ़ने में मदद करते हैं।
- सुरम्य मार्ग: यह चाय के बागानों, घने जंगलों और चट्टानी इलाकों से होकर गुजरता है, जिसमें 250 से अधिक पुल और 16 सुरंगें शामिल हैं।
3. कालका-शिमला रेलवे (Kalka-Shimla Railway)
- शामिल होने का वर्ष: 2008 (इसे भी “भारत के पर्वतीय रेलवे” के विस्तार के रूप में शामिल किया गया)
- राज्य: हरियाणा (कालका) से हिमाचल प्रदेश (शिमला) तक
- मार्ग: कालका से शिमला तक (लगभग 96 किलोमीटर)
- गेज: नैरो गेज (Narrow Gauge – 2 फीट 6 इंच)
- प्रमुख आकर्षण और इंजीनियरिंग चमत्कार:
- सुरंगों और पुलों की भूमि (Land of Tunnels and Bridges): यह रेलवे लाइन अपनी अविश्वसनीय संख्या में सुरंगों और पुलों के लिए जानी जाती है।
- 103 सुरंगें: इसमें बड़ोग सुरंग (टनल नंबर 33) सबसे लंबी है, जो अपनी एक डरावनी कहानी के लिए भी जानी जाती है।
- 864 पुल: इनमें से कई बहु-मंजिला मेहराबदार पुल (Multi-arched Viaducts) हैं, जो रोमन एक्वाडक्ट्स की याद दिलाते हैं।
- तीखे मोड़: 96 किलोमीटर की छोटी यात्रा में इसमें 919 तीखे मोड़ हैं, जो इंजीनियरिंग के कौशल का अद्भुत उदाहरण हैं।
- विश्व रिकॉर्ड: यह दुनिया में 4,800 फीट से अधिक की चढ़ाई के लिए बनाया गया सबसे लंबा नैरो-गेज रेलवे है।
- सुरंगों और पुलों की भूमि (Land of Tunnels and Bridges): यह रेलवे लाइन अपनी अविश्वसनीय संख्या में सुरंगों और पुलों के लिए जानी जाती है।
निष्कर्ष:
ये तीनों पर्वतीय रेलवे सिर्फ परिवहन के साधन नहीं हैं, बल्कि ये “जीवित विरासत” (Living Heritage) हैं। ये उस समय की इंजीनियरिंग और मानवीय दृढ़ता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिन्होंने दुर्गम पहाड़ों पर भी रेलवे लाइनें बिछा दीं। यूनेस्को का दर्जा इनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देता है और इनके संरक्षण को सुनिश्चित करने में मदद करता है।
मेट्रो रेल: भारत में शहरी परिवहन की क्रांति
परिभाषा:
मेट्रो रेल एक उच्च क्षमता वाली, तीव्र जन पारगमन प्रणाली (Mass Rapid Transit System – MRTS) है जो बड़े महानगरीय क्षेत्रों (Metropolitan Areas) में यातायात की भीड़ को कम करने, यात्रा के समय को घटाने और एक पर्यावरण-अनुकूल परिवहन विकल्प प्रदान करने के लिए डिज़ाइन की गई है।
यह आमतौर पर जमीन से ऊपर एलिवेटेड (Elevated) कॉरिडोर, जमीन के नीचे भूमिगत (Underground) सुरंगों, या जमीन पर सतही (At-grade) पटरियों पर चलती है। यह आधुनिक, वातानुकूलित और तेज गति वाली ट्रेनों का उपयोग करती है।
भारत में मेट्रो रेल का विकास और महत्व
भारत के शहर तेजी से बढ़ रही आबादी, वाहनों की संख्या और यातायात जाम की गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं। इस संदर्भ में, मेट्रो रेल शहरी परिवहन की रीढ़ के रूप में उभरी है।
महत्व:
- यातायात की भीड़ में कमी: यह सड़क से बड़ी संख्या में निजी वाहनों को हटाती है।
- समय की बचत: यह तेज, विश्वसनीय और समय पर चलने वाली सेवा है, जो लोगों के यात्रा समय को कम करती है।
- पर्यावरण संरक्षण: यह ईंधन की खपत और वायु प्रदूषण (Greenhouse Gas Emissions) को कम करने में मदद करती है।
- सड़क सुरक्षा: सड़क दुर्घटनाओं की संख्या को कम करने में सहायक।
- आर्थिक विकास: यह कनेक्टिविटी बढ़ाकर व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा देती है और शहरों के आर्थिक विकास को गति देती है।
- ईंधन आयात में कमी: सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देकर देश के तेल आयात बिल को कम करने में मदद करती है।
भारत में प्रमुख मेट्रो रेल नेटवर्क (स्थिति: 2023-24 तक)
1. कोलकाता मेट्रो (Kolkata Metro):
- प्रारंभ: 1984
- विशेषता: यह भारत की पहली मेट्रो प्रणाली है।
- नवीनतम उपलब्धि: मार्च 2024 में, भारत की पहली अंडरवाटर मेट्रो (Underwater Metro) का उद्घाटन कोलकाता में हुगली नदी के नीचे किया गया, जो हावड़ा मैदान को एस्प्लेनेड से जोड़ती है।
- ज़ोन का दर्जा: यह भारत का एकमात्र मेट्रो सिस्टम है जिसे भारतीय रेलवे के एक अलग ज़ोन (17वें ज़ोन के रूप में, अब 18वें) का दर्जा प्राप्त है।
2. दिल्ली मेट्रो (Delhi Metro):
- प्रारंभ: 2002
- विशेषता: यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे व्यस्त मेट्रो नेटवर्क है।
- महत्व: इसने दिल्ली-एनसीआर (गुरुग्राम, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद) में शहरी परिवहन की तस्वीर को पूरी तरह से बदल दिया है।
- संचालक: दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC)।
3. नम्मा मेट्रो, बेंगलुरु (Namma Metro, Bengaluru):
- प्रारंभ: 2011
- विशेषता: यह दक्षिण भारत की पहली मेट्रो प्रणाली है। यह शहर के यातायात को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
4. मुंबई मेट्रो (Mumbai Metro):
- प्रारंभ: 2014
- विशेषता: भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेनों पर दबाव कम करने के लिए एक बहु-चरणीय परियोजना। इसमें पूरी तरह से परिचालन और निर्माणाधीन कई लाइनें शामिल हैं।
5. चेन्नई मेट्रो (Chennai Metro):
- प्रारंभ: 2015
- विशेषता: यह दिल्ली और हैदराबाद के बाद भारत की तीसरी सबसे बड़ी मेट्रो प्रणाली है।
6. हैदराबाद मेट्रो (Hyderabad Metro):
- प्रारंभ: 2017
- विशेषता: यह सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership – PPP) मॉडल के तहत निर्मित दुनिया की सबसे बड़ी मेट्रो प्रणालियों में से एक है।
भारत में अन्य परिचालन वाले मेट्रो नेटवर्क की सूची
| शहर | मेट्रो का नाम | प्रारंभ वर्ष | प्रमुख विशेषता |
| जयपुर | जयपुर मेट्रो | 2015 | डबल-डेकर एलिवेटेड कॉरिडोर के लिए प्रसिद्ध। |
| गुरुग्राम | रैपिड मेट्रो | 2013 | भारत की पहली पूरी तरह से निजी तौर पर वित्त पोषित मेट्रो। |
| कोच्चि | कोच्चि मेट्रो | 2017 | फीडर सेवाओं (बस, नाव) के साथ एकीकृत प्रणाली। |
| लखनऊ | लखनऊ मेट्रो | 2017 | रिकॉर्ड समय में निर्माण के लिए जाना जाता है। |
| अहमदाबाद | अहमदाबाद मेट्रो | 2019 | – |
| नागपुर | नागपुर मेट्रो (महा मेट्रो) | 2019 | “ग्रीन मेट्रो” के रूप में प्रसिद्ध (सौर ऊर्जा का व्यापक उपयोग)। |
| कानपुर | कानपुर मेट्रो | 2021 | – |
| पुणे | पुणे मेट्रो | 2022 | – |
निर्माण-अधीन और प्रस्तावित मेट्रो परियोजनाएँ
भारत में मेट्रो क्रांति तेजी से फैल रही है। कई अन्य शहरों में मेट्रो परियोजनाएँ या तो निर्माणाधीन हैं या योजना के उन्नत चरण में हैं, जिनमें शामिल हैं:
- निर्माणाधीन: आगरा, पटना, इंदौर, भोपाल, सूरत, मेरठ।
- प्रस्तावित: देहरादून, विशाखापत्तनम, तिरुवनंतपुरम, गोरखपुर, वाराणसी, गुवाहाटी।
मेट्रो लाइट (Metro Lite) और मेट्रो नियो (Metro Neo)
छोटे (Tier-II और Tier-III) शहरों के लिए, सरकार कम लागत वाले और हल्के मेट्रो सिस्टम के मॉडल भी विकसित कर रही है:
- मेट्रो लाइट: कम क्षमता वाली एक हल्की रेल प्रणाली जो पारंपरिक मेट्रो से सस्ती होती है।
- मेट्रो नियो: यह रबर-टायर वाले इलेक्ट्रिक कोच (ट्रॉलीबस की तरह) का उपयोग करती है जो ओवरहेड तारों से बिजली लेते हैं और समर्पित एलिवेटेड कॉरिडोर पर चलते हैं।
निष्कर्ष:
मेट्रो रेल भारत के शहरी परिवहन के भविष्य का प्रतीक है। यह न केवल शहरों को आधुनिक और कुशल बना रही है, बल्कि यह उन्हें अधिक रहने योग्य, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में भी मदद कर रही है। देश भर में नए नेटवर्कों के तेजी से विस्तार के साथ, मेट्रो प्रणाली 21वीं सदी के भारत के शहरी विकास की कहानी का एक अभिन्न अंग बन चुकी है।
भारत में बुलेट ट्रेन: मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (MAHSR)
परिचय:
“बुलेट ट्रेन” हाई-स्पीड रेल (High-Speed Rail – HSR) का लोकप्रिय नाम है। भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (Mumbai-Ahmedabad High-Speed Rail Corridor – MAHSR) है। यह भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी और परिवर्तनकारी (Transformative) अवसंरचना परियोजना है, जिसका उद्देश्य भारत में रेल यात्रा के अनुभव को फिर से परिभाषित करना और देश को आधुनिक, उच्च गति वाले परिवहन के युग में ले जाना है।
I. परियोजना का अवलोकन (Project Overview)
- परियोजना का नाम: मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) परियोजना।
- मार्ग: यह कॉरिडोर महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई को गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद से जोड़ेगा।
- कुल लंबाई: 508.17 किलोमीटर।
- ऑपरेटिंग गति: 320 किलोमीटर प्रति घंटा।
- अधिकतम डिजाइन गति: 350 किलोमीटर प्रति घंटा।
- यात्रा का समय: इस कॉरिडोर के बनने के बाद, मुंबई और अहमदाबाद के बीच की यात्रा का समय वर्तमान के 7-8 घंटे (ट्रेन से) से घटकर लगभग 2 घंटे 7 मिनट (सीमित स्टॉप के साथ) और 2 घंटे 58 मिनट (सभी स्टॉप के साथ) रह जाएगा।
- कार्यान्वयन एजेंसी (Implementing Agency): नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (National High-Speed Rail Corporation Limited – NHSRCL), जो भारतीय रेल और भाग लेने वाले राज्य सरकारों (महाराष्ट्र और गुजरात) का एक संयुक्त उद्यम है।
II. तकनीकी सहयोग और वित्त पोषण (Technical Cooperation and Funding)
- तकनीकी भागीदार: यह परियोजना जापान के सहयोग से बनाई जा रही है और इसमें जापान की विश्व प्रसिद्ध शिंकानसेन (Shinkansen) बुलेट ट्रेन तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।
- शिंकानसेन क्यों?: यह दुनिया की सबसे सुरक्षित और विश्वसनीय हाई-स्पीड रेल प्रणालियों में से एक है, जिसमें आज तक संचालन के दौरान कोई भी घातक दुर्घटना नहीं हुई है।
- वित्त पोषण (Funding):
- परियोजना की कुल अनुमानित लागत का लगभग 81% हिस्सा जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (Japan International Cooperation Agency – JICA) द्वारा बहुत कम ब्याज दर (0.1%) पर 50 वर्षों की अवधि के लिए एक सॉफ्ट लोन (Soft Loan) के रूप में प्रदान किया जा रहा है।
- शेष राशि भारत सरकार और महाराष्ट्र तथा गुजरात की राज्य सरकारों द्वारा वहन की जाएगी।
III. कॉरिडोर की प्रमुख विशेषताएँ (Key Features of the Corridor)
- स्टेशनों की संख्या: कुल 12 स्टेशन प्रस्तावित हैं:
- महाराष्ट्र में: मुंबई (BKC), ठाणे, विरार, बोईसर।
- गुजरात में: वापी, बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वडोदरा, आणंद, अहमदाबाद, साबरमती।
- मार्ग का स्वरूप:
- कुल मार्ग का अधिकांश हिस्सा (लगभग 92%) एलिवेटेड (Elevated) यानी जमीन के ऊपर खंभों पर होगा, ताकि भूमि अधिग्रहण कम हो और कृषि भूमि को बचाया जा सके।
- लगभग 2% हिस्सा सुरंगों (Tunnels) में होगा और शेष हिस्सा जमीन पर।
- भारत की पहली समुद्री सुरंग (India’s First Undersea Tunnel):
- इस परियोजना की एक मुख्य विशेषता ठाणे क्रीक (Thane Creek) में 7 किलोमीटर लंबी समुद्री सुरंग का निर्माण है। यह भारत की पहली अंडर-सी (Undersea) रेल सुरंग होगी।
- ट्रेन सेट (Trainset):
- जापान से E5 सीरीज शिंकानसेन ट्रेनों का अधिग्रहण किया जाएगा। प्रत्येक ट्रेन में 10 कोच होंगे और इसमें लगभग 750 यात्री बैठ सकेंगे।
IV. परियोजना की वर्तमान स्थिति और समय-सीमा (Current Status and Timeline)
- निर्माण कार्य: परियोजना पर काम तेजी से चल रहा है, खासकर गुजरात में। गुजरात खंड में खंभों (Piers) का निर्माण और गर्डरों (Girders) की लॉन्चिंग का काम उन्नत चरण में है।
- भूमि अधिग्रहण: गुजरात में भूमि अधिग्रहण लगभग पूरा हो चुका है, जबकि महाराष्ट्र में कुछ शुरुआती बाधाओं के बाद अब इसमें भी तेजी आई है।
- पहला खंड: सरकार का लक्ष्य सूरत से बिलिमोरा (गुजरात) के बीच लगभग 50 किलोमीटर के पहले खंड को 2026 तक चालू करने का है।
- पूरी परियोजना की समय-सीमा: पूरी परियोजना के पूरा होने के लिए अभी कोई निश्चित आधिकारिक समय-सीमा घोषित नहीं की गई है, लेकिन यह अनुमान है कि यह दशक के अंत तक पूरी हो सकती है।
V. बुलेट ट्रेन परियोजना के अपेक्षित लाभ (Expected Benefits)
- आर्थिक विकास को बढ़ावा: यह परियोजना गुजरात और महाराष्ट्र के बीच एक मेगा-आर्थिक क्षेत्र (Mega-Economic Region) का निर्माण करेगी, जिससे व्यापार, वाणिज्य और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
- रोजगार सृजन: निर्माण और संचालन के चरणों में हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे।
- तकनीकी उन्नति और कौशल विकास: “मेक इन इंडिया” के तहत, ट्रेन सेट और घटकों के कुछ हिस्सों का निर्माण भारत में किया जाएगा, जिससे देश में हाई-स्पीड रेल तकनीक का हस्तांतरण होगा और कौशल विकास होगा।
- शहरी विकास: स्टेशनों के आसपास नए शहरी केंद्र विकसित होंगे।
- पर्यावरण के अनुकूल: यह परिवहन का एक अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल साधन है, जो हवाई यात्रा और सड़क यात्रा की तुलना में प्रति यात्री कम कार्बन उत्सर्जन करता है।
- राष्ट्रीय गौरव: यह परियोजना भारत की तकनीकी शक्ति और आधुनिक अवसंरचना के विकास में एक मील का पत्थर साबित होगी।
निष्कर्ष:
मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना सिर्फ एक तेज गति वाली ट्रेन नहीं है, बल्कि यह एक आर्थिक उत्प्रेरक है जिसमें भारत के शहरी परिदृश्य, औद्योगिक विकास और परिवहन प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता है। इसकी सफलता भविष्य में देश भर में और अधिक हाई-स्पीड रेल गलियारों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी।
मोनोरेल (Monorail): एक विशिष्ट शहरी परिवहन प्रणाली
परिभाषा:
मोनोरेल एक रेल-आधारित परिवहन प्रणाली है जिसमें ट्रेन पारंपरिक दो पटरियों (Tracks) पर चलने के बजाय केवल एक ही बीम या पटरी (Single Beam or Rail) पर चलती है या उससे लटकती है। “मोनो” का अर्थ है “एक”, और “रेल” का अर्थ है पटरी।
यह आमतौर पर एक एलिवेटेड (Elevated) प्रणाली होती है, जिसमें ट्रेनें जमीन के ऊपर बने एक संकरे कंक्रीट के बीम पर चलती हैं। यह प्रणाली भीड़भाड़ वाले शहरी क्षेत्रों के लिए डिज़ाइन की गई है, जहाँ पारंपरिक मेट्रो के लिए चौड़ी जगह उपलब्ध नहीं होती।
मोनोरेल प्रणाली के प्रकार (Types of Monorail Systems)
मोनोरेल के डिज़ाइन मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
- स्ट्रैडल-बीम मोनोरेल (Straddle-beam Monorail):
- यह सबसे आम प्रकार है। इसमें ट्रेन का ढाँचा एक काठी (Saddle) की तरह बीम के ऊपर बैठता है और उसे दोनों तरफ से जकड़ लेता है। ट्रेन के पहिए बीम के ऊपर और किनारों पर चलते हैं।
- उदाहरण: मुंबई मोनोरेल, कुआलालंपुर मोनोरेल।
- सस्पेंडेड मोनोरेल (Suspended Monorail):
- यह कम आम है। इसमें ट्रेन बीम के नीचे लटकती (Hangs) हुई चलती है।
- उदाहरण: जर्मनी का वुपर्टल सस्पेंशन रेलवे (Wuppertal Suspension Railway), जापान में चिबा अर्बन मोनोरेल (Chiba Urban Monorail)।
मोनोरेल के लाभ (Advantages of Monorail)
- कम जगह की आवश्यकता (Less Space Requirement):
- मोनोरेल के खंभे (Pillars) और बीम बहुत संकरे होते हैं, जिससे यह अत्यधिक भीड़भाड़ वाले और संकरे शहरी गलियारों के लिए बहुत उपयुक्त है जहाँ पारंपरिक मेट्रो के लिए जगह नहीं होती।
- तेज निर्माण और कम व्यवधान:
- इसके खंभों और बीम के हिस्से पहले से तैयार (Pre-fabricated) किए जा सकते हैं और उन्हें साइट पर जल्दी से स्थापित किया जा सकता है, जिससे निर्माण के दौरान सड़कों पर कम व्यवधान होता है।
- बेहतर सौंदर्यशास्त्र (Better Aesthetics):
- इसका चिकना और संकरा डिजाइन पारंपरिक एलिवेटेड मेट्रो या फ्लाईओवरों की तुलना में कम भारी-भरकम दिखता है और शहर के परिदृश्य पर कम दृश्य प्रभाव डालता है।
- तीव्र ढलान और मोड़ लेने की क्षमता:
- मेट्रो की तुलना में, मोनोरेल अधिक तीव्र ढलान (Steeper Gradients) पर चढ़ सकती है और अधिक तीखे मोड़ (Tighter Turns) ले सकती है, जिससे इसे मौजूदा शहरी लेआउट में फिट करना आसान हो जाता है।
- शांत संचालन:
- इसके रबर के टायर स्टील के पहियों की तुलना में कम शोर करते हैं, जिससे ध्वनि प्रदूषण कम होता है।
मोनोरेल की सीमाएँ और नुकसान (Limitations and Disadvantages)
- कम यात्री क्षमता (Lower Passenger Capacity):
- मोनोरेल की बोगियाँ छोटी होती हैं और इसकी यात्री ले जाने की क्षमता पारंपरिक मेट्रो प्रणालियों की तुलना में बहुत कम होती है। इसलिए, यह बहुत उच्च घनत्व वाले गलियारों के लिए उपयुक्त नहीं है।
- धीमी गति (Slower Speed):
- इसकी औसत गति मेट्रो की तुलना में कम होती है।
- गैर-मानकीकृत तकनीक (Non-standardized Technology):
- दुनिया भर में मोनोरेल प्रणालियों का कोई एक मानक नहीं है। प्रत्येक प्रणाली अक्सर मालिकाना (Proprietary) होती है, जिसका अर्थ है कि एक निर्माता के हिस्से दूसरे के साथ संगत नहीं होते। इससे रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और भविष्य के विस्तार में कठिनाई होती है।
- उच्च परिचालन लागत (High Operational Cost):
- इसकी विशेष तकनीक के कारण रखरखाव और संचालन की लागत अधिक हो सकती है।
- स्विचिंग की जटिलता:
- एक बीम से दूसरी बीम पर ट्रेनों को स्विच (लाइन बदलना) करना मेट्रो की तुलना में बहुत अधिक जटिल, धीमा और महंगा होता है।
भारत में मोनोरेल: मुंबई मोनोरेल का केस स्टडी
भारत में, मोनोरेल को एक व्यवहार्य शहरी परिवहन विकल्प के रूप में देखा गया था, लेकिन इसका अनुभव बहुत मिश्रित रहा है।
- मुंबई मोनोरेल (Mumbai Monorail):
- स्थिति: यह भारत की पहली और एकमात्र परिचालन वाली मोनोरेल प्रणाली है।
- लॉन्च: इसका पहला चरण (चेंबूर से वडाला डिपो तक) 2014 में शुरू किया गया था। दूसरा चरण (वडाला से जैकब सर्कल तक) 2019 में शुरू हुआ।
- कुल लंबाई: लगभग 19.54 किलोमीटर।
- उद्देश्य: इसे मुंबई के उन घनी आबादी वाले और संकरे क्षेत्रों के लिए एक फीडर सेवा (Feeder Service) के रूप में डिज़ाइन किया गया था, जहाँ मेट्रो या लोकल ट्रेनों की सीधी पहुँच नहीं है।
- चुनौतियाँ और प्रदर्शन:
- मुंबई मोनोरेल को अपनी शुरुआत से ही कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है, जैसे कम सवारियाँ (Low ridership), लगातार तकनीकी खराबियाँ, आग लगने की घटनाएँ, और उच्च परिचालन घाटा।
- इसकी कम गति और कम क्षमता इसे शहर के परिवहन बोझ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संभालने में अक्षम बनाती है।
- रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की समस्या (इसके कोच मलेशियाई कंपनी द्वारा बनाए गए हैं) एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
- अन्य प्रस्तावित परियोजनाएँ: दिल्ली, चेन्नई, कोझीकोड और तिरुवनंतपुरम जैसे अन्य शहरों में भी मोनोरेल की योजना बनाई गई थी, लेकिन मुंबई के अनुभव और मेट्रो की तुलना में इसकी कमियों को देखते हुए, अधिकांश परियोजनाओं को या तो रद्द कर दिया गया है या “मेट्रो लाइट / मेट्रो नियो” जैसे बेहतर विकल्पों में बदल दिया गया है।
निष्कर्ष:
मोनोरेल, सैद्धांतिक रूप से, कुछ विशिष्ट शहरी परिस्थितियों के लिए एक आकर्षक समाधान लगता है, विशेषकर संकरे गलियारों के लिए। हालाँकि, भारत में मुंबई मोनोरेल के मिश्रित अनुभव और इसकी अंतर्निहित सीमाओं (जैसे कम क्षमता, गैर-मानकीकृत तकनीक) ने यह दर्शाया है कि यह बड़े और उच्च घनत्व वाले भारतीय शहरों के लिए एक व्यापक समाधान नहीं है। अब देश का ध्यान अधिक कुशल और मानकीकृत प्रणालियों, जैसे पारंपरिक मेट्रो, मेट्रो लाइट और मेट्रो नियो, पर केंद्रित हो गया है।
मैग्लेव ट्रेन (Maglev Train): भविष्य की गति
परिभाषा:
मैग्लेव, जो “मैग्नेटिक लेविटेशन” (Magnetic Levitation) का संक्षिप्त रूप है, एक प्रकार की रेल परिवहन प्रणाली है जिसमें पारंपरिक ट्रेनों की तरह पहियों (Wheels) का उपयोग नहीं होता है। इसके बजाय, यह ट्रेन चुंबकों (Magnets) की शक्ति का उपयोग करके पटरी के ऊपर हवा में तैरती (Levitates or Floats) हुई चलती है और आगे बढ़ती है।
चूँकि ट्रेन और पटरी के बीच कोई सीधा संपर्क नहीं होता, इसलिए घर्षण (Friction) लगभग समाप्त हो जाता है। यह मैग्लेव ट्रेनों को अविश्वसनीय रूप से उच्च गति प्राप्त करने, बहुत कम शोर करने और एक अत्यंत सहज (smooth) यात्रा का अनुभव प्रदान करने की अनुमति देता है।
मैग्लेव तकनीक कैसे काम करती है? (How Maglev Technology Works)
मैग्लेव प्रणाली तीन मूलभूत सिद्धांतों पर काम करती है, जिनके लिए शक्तिशाली विद्युत चुम्बकों (Electromagnets) का उपयोग किया जाता है:
- लेविटेशन (उत्थापन):
- सिद्धांत: चुंबकत्व का मूल नियम – समान ध्रुव एक-दूसरे को प्रतिकर्षित (Repel) करते हैं (जैसे North-North) और विपरीत ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित (Attract) करते हैं (North-South)।
- प्रक्रिया: ट्रेन के निचले हिस्से में और गाइडवे (पटरी) पर शक्तिशाली चुंबक लगाए जाते हैं। इन चुम्बकों के ध्रुवों को इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि वे एक-दूसरे को लगातार प्रतिकर्षित करें। यह प्रतिकर्षण बल इतना मजबूत होता है कि वह पूरी ट्रेन को गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध उठाकर गाइडवे से लगभग 1 से 10 सेंटीमीटर ऊपर हवा में तैरा देता है।
- प्रणोदन (Propulsion):
- सिद्धांत: गाइडवे के साथ लगे चुम्बकीय कॉइल्स में विद्युत धारा प्रवाहित करके एक गतिशील, बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र (Shifting Magnetic Field) बनाया जाता है।
- प्रक्रिया: यह बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र ट्रेन पर लगे चुम्बकों को अपनी ओर आकर्षित (pulls) और फिर प्रतिकर्षित (pushes) करता है। यह “आकर्षण और प्रतिकर्षण” का चक्र लगातार और बहुत तेजी से दोहराया जाता है, जिससे ट्रेन एक निश्चित दिशा में आगे की ओर धकेल दी जाती है। विद्युत धारा की आवृत्ति (frequency) को बदलकर ट्रेन की गति को नियंत्रित किया जाता है।
- मार्गदर्शन (Guidance):
- ट्रेन को गाइडवे के केंद्र में बनाए रखने के लिए किनारों पर भी चुंबक लगे होते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि ट्रेन पार्श्व (sideways) रूप से न हिले और अपनी सीधी रेखा में बनी रहे।
मैग्लेव के लाभ (Advantages of Maglev)
- अत्यधिक उच्च गति (Extremely High Speed): घर्षण न होने के कारण, मैग्लेव ट्रेनें 600 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक की गति प्राप्त कर सकती हैं, जो उन्हें बुलेट ट्रेनों (High-Speed Rail) से भी बहुत तेज बनाती है।
- कम रखरखाव (Lower Maintenance): चूँकि इसमें पहियों, एक्सल, और बियरिंग जैसे चलने वाले हिस्से नहीं होते हैं, इसलिए टूट-फूट बहुत कम होती है, जिससे ट्रैक और ट्रेन दोनों की रखरखाव लागत कम हो जाती है।
- शांत और आरामदायक यात्रा (Quiet and Smooth Ride): पहियों और पटरी के बीच संपर्क न होने से कंपन और शोर लगभग समाप्त हो जाता है, जिससे यात्रा बहुत शांत और आरामदायक होती है।
- उच्च ऊर्जा दक्षता (Higher Energy Efficiency): उच्च गति पर, घर्षण न होने के कारण, मैग्लेव पारंपरिक हाई-स्पीड ट्रेनों की तुलना में कम ऊर्जा की खपत करती है।
- अधिक सुरक्षा (Greater Safety): ट्रेन गाइडवे को “जकड़” लेती है, जिससे इसके पटरी से उतरने (Derailment) की संभावना लगभग शून्य होती है।
- मौसम से अप्रभावित: यह बर्फ, बारिश या पत्तों से अप्रभावित रहती है, जो पारंपरिक रेलवे के लिए समस्याएँ पैदा कर सकते हैं।
मैग्लेव की चुनौतियाँ और नुकसान (Challenges and Disadvantages)
- अत्यधिक उच्च निर्माण लागत (Extremely High Construction Cost):
- यह मैग्लेव की सबसे बड़ी बाधा है। मैग्लेव गाइडवे का निर्माण पारंपरिक रेलवे लाइनों की तुलना में कई गुना अधिक महंगा होता है क्योंकि इसके लिए विशेष तकनीक, शक्तिशाली चुंबक और बहुत सटीक निर्माण की आवश्यकता होती है।
- मौजूदा बुनियादी ढाँचे के साथ असंगति (Incompatibility):
- मैग्लेव ट्रेनें मौजूदा रेलवे नेटवर्क पर नहीं चल सकतीं। इनके लिए बिल्कुल नया और समर्पित बुनियादी ढाँचा बनाना पड़ता है। इसके विपरीत, एक हाई-स्पीड रेलगाड़ी आवश्यकता पड़ने पर सामान्य पटरियों पर भी धीमी गति से चल सकती है।
- उच्च ऊर्जा खपत (Low Speed): कम गति पर, हवा में ट्रेन को उठाने (levitate) के लिए आवश्यक ऊर्जा पारंपरिक ट्रेनों की तुलना में अधिक हो सकती है।
विश्व में मैग्लेव ट्रेनें
मैग्लेव तकनीक का वाणिज्यिक उपयोग अभी भी बहुत सीमित है।
- शंघाई मैग्लेव (Shanghai Maglev), चीन:
- यह दुनिया की पहली और सबसे तेज वाणिज्यिक मैग्लेव लाइन है।
- यह शंघाई पुडोंग अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को शहर से जोड़ती है और 431 किमी/घंटा की परिचालन गति से चलती है।
- SCMaglev (Chūō Shinkansen), जापान:
- जापान टोक्यो और नागोया के बीच एक लंबी दूरी की SCMaglev लाइन का निर्माण कर रहा है।
- इसने परीक्षण के दौरान 603 किमी/घंटा की गति का विश्व रिकॉर्ड बनाया है।
- इंचियोन एयरपोर्ट मैग्लेव (Incheon Airport Maglev), दक्षिण कोरिया: यह एक धीमी गति की शहरी मैग्लेव लाइन है।
भारत में मैग्लेव ट्रेन की स्थिति
- भारत में मैग्लेव ट्रेनों की योजना और प्रस्ताव के कई दौर हो चुके हैं, लेकिन उच्च लागत हमेशा एक बड़ी बाधा रही है।
- प्रस्तावित मार्ग: मुंबई-दिल्ली, मुंबई-नागपुर, चेन्नई-बेंगलुरु-मैसूर जैसे कई मार्गों पर व्यवहार्यता अध्ययन (feasibility studies) के प्रस्ताव दिए गए हैं।
- BHEL की भूमिका: भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) स्वदेशी मैग्लेव तकनीक विकसित करने पर काम कर रहा है।
- वर्तमान स्थिति: फिलहाल, भारत सरकार का पूरा ध्यान हाई-स्पीड रेल (बुलेट ट्रेन) और सेमी-हाई-स्पीड (वंदे भारत) नेटवर्क के विस्तार पर है। उच्च लागत और जटिल तकनीक के कारण, भारत में निकट भविष्य में वाणिज्यिक मैग्लेव परियोजना के शुरू होने की संभावना कम है। सरकार का दृष्टिकोण पहले सिद्ध हो चुकी हाई-स्पीड रेल तकनीक को अपनाने का है।
समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (Dedicated Freight Corridor – DFC): भारतीय रेल का भविष्य
परिभाषा:
समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (DFC) एक उच्च क्षमता वाला, उच्च गति वाला और विशेष रूप से केवल मालगाड़ियों (Freight Trains) के परिवहन के लिए बनाया गया एक रेलवे ट्रैक (रेल मार्ग) है। “समर्पि” (Dedicated) शब्द का अर्थ है कि इस ट्रैक पर यात्री ट्रेनें (Passenger Trains) नहीं चलेंगी, जिससे यह पूरी तरह से माल ढुलाई के लिए समर्पित होगा।
यह भारतीय रेलवे के इतिहास की सबसे बड़ी और सबसे परिवर्तनकारी अवसंरचना परियोजनाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य भारत की लॉजिस्टिक्स और परिवहन प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाना है।
DFC की आवश्यकता क्यों पड़ी? (Why was DFC Needed?)
भारत का मौजूदा रेलवे नेटवर्क अत्यधिक संतृप्त (Oversaturated) और मिश्रित-यातायात वाला है। इसी ट्रैक पर धीमी गति वाली मालगाड़ियां और तेज गति वाली यात्री ट्रेनें एक साथ चलती हैं, जिससे निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न होती हैं:
- कम गति: मालगाड़ियों को अक्सर यात्री ट्रेनों को रास्ता देने के लिए रोक दिया जाता है, जिससे उनकी औसत गति मात्र 25 किलोमीटर प्रति घंटा रह जाती है।
- अनिश्चित पारगमन समय: गति कम होने और बार-बार रुकने के कारण माल को अपने गंतव्य तक पहुँचने में बहुत अधिक और अनिश्चित समय लगता है।
- कम वहन क्षमता: मौजूदा ट्रैक अधिक वजन और लंबी ट्रेनों को संभालने के लिए डिज़ाइन नहीं किए गए हैं।
- उच्च लॉजिस्टिक्स लागत: धीमी और अक्षम रेल प्रणाली के कारण, भारत का अधिकांश माल (लगभग 65%) सड़कों के माध्यम से ट्रकों द्वारा ले जाया जाता है, जो महंगा और पर्यावरण के लिए हानिकारक है।
DFC इन सभी समस्याओं का एक प्रभावी समाधान है।
DFC के प्रमुख उद्देश्य (Key Objectives)
- गति बढ़ाना: मालगाड़ियों की औसत गति को 25 किमी/घंटा से बढ़ाकर 70-75 किमी/घंटा तक करना और अधिकतम गति को 100 किमी/घंटा तक ले जाना।
- क्षमता बढ़ाना: DFC ट्रैक भारी भार (Heavy Axle Load) और डबल-स्टैक कंटेनर (Double-stack containers) वाली 1.5 किलोमीटर तक लंबी ट्रेनों को चलाने में सक्षम हैं, जिससे एक बार में बहुत अधिक माल ले जाया जा सकता है।
- पारगमन समय को कम करना: माल के परिवहन में लगने वाले समय को नाटकीय रूप से कम करना।
- लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना: रेल द्वारा माल ढुलाई को तेज और सस्ता बनाकर सड़कों पर निर्भरता कम करना।
- यात्री नेटवर्क को भीड़-मुक्त करना: मौजूदा पटरियों को मालगाड़ियों से मुक्त करके यात्री ट्रेनों की गति और समय-पालन (Punctuality) में सुधार करना।
प्रमुख समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (Major DFCs in India)
इस परियोजना का क्रियान्वयन समर्पि फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (Dedicated Freight Corridor Corporation of India Limited – DFCCIL) द्वारा किया जा रहा है।
प्रथम चरण में दो कॉरिडोर:
1. पश्चिमी समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (Western Dedicated Freight Corridor – WDFC):
- मार्ग: दादरी (उत्तर प्रदेश) से जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट – JNPT (मुंबई) तक।
- लंबाई: लगभग 1,504 किलोमीटर।
- राज्य: उत्तर प्रदेश, दिल्ली एनसीआर, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र।
- विशेषता: यह भारत के प्रमुख बंदरगाहों (JNPT, मुंद्रा, कांडला) को देश के उत्तरी भीतरी इलाकों से जोड़ता है। यह डबल-स्टैक कंटेनरों के परिवहन के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- वित्त पोषण: इसका एक बड़ा हिस्सा जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) द्वारा वित्त पोषित है।
2. पूर्वी समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (Eastern Dedicated Freight Corridor – EDFC):
- मार्ग: लुधियाना (पंजाब) से दानकुनी (पश्चिम बंगाल) तक।
- लंबाई: लगभग 1,875 किलोमीटर।
- राज्य: पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल।
- विशेषता: यह मुख्य रूप से देश के कोयला क्षेत्रों, ताप विद्युत संयंत्रों और औद्योगिक केंद्रों को जोड़ता है। यह मुख्य रूप से कोयला, इस्पात और खाद्यान्न जैसे भारी थोक माल का परिवहन करेगा।
- वित्त पोषण: इसका एक बड़ा हिस्सा विश्व बैंक (World Bank) द्वारा वित्त पोषित है।
DFC का महत्व और प्रभाव
- औद्योगिक गलियारों का आधार: ये दोनों कॉरिडोर दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा (DMIC) और अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक गलियारा (AKIC) के लिए रीढ़ की हड्डी (Backbone) का काम करते हैं, जिनके दोनों ओर नए औद्योगिक शहरों और विनिर्माण केंद्रों का विकास किया जा रहा है।
- मेक इन इंडिया को बढ़ावा: तेज और कुशल लॉजिस्टिक्स प्रणाली भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को सफल बनाने के लिए अनिवार्य है।
- पर्यावरण संरक्षण: सड़क परिवहन से रेल परिवहन की ओर माल के हस्तांतरण से कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emissions) में भारी कमी आएगी।
- आर्थिक विकास: अनुमान है कि DFC भारत की GDP वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देगा और लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक (Logistics Performance Index) में भारत की रैंकिंग में सुधार करेगा।
- क्षेत्रीय विकास: ये गलियारे जिन राज्यों से होकर गुजर रहे हैं, वहाँ नए निवेश और रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
भविष्य के प्रस्तावित कॉरिडोर
DFC की सफलता को देखते हुए, सरकार ने कई और कॉरिडोर की योजना बनाई है, जिन्हें “गोल्डन क्वाड्रिलेटरल फ्रेट कॉरिडोर” (Golden Quadrilateral Freight Corridor) का हिस्सा माना जाता है:
- ईस्ट कोस्ट कॉरिडोर: खड़गपुर से विजयवाड़ा तक।
- ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर: दानकुनी से भुसावल तक।
- नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर: इटारसी से विजयवाड़ा तक।
निष्कर्ष:
समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (DFC) परियोजना भारतीय अवसंरचना के परिदृश्य में एक गेम-चेंजर है। यह न केवल भारतीय रेलवे को आधुनिक बनाएगी और उसकी क्षमता का विस्तार करेगी, बल्कि यह भारत की औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाकर और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करके पूरे देश की अर्थव्यवस्था के लिए विकास का एक नया इंजन साबित होगी।
2. जल परिवहन (Water Transport)
यह परिवहन का सबसे सस्ता साधन है, जो भारी और विशाल सामान (जैसे कोयला, लौह अयस्क) की लंबी दूरी की ढुलाई के लिए सबसे उपयुक्त है।
A) आंतरिक जलमार्ग (Inland Waterways)
- महत्व: यह एक पर्यावरण-अनुकूल और ईंधन-कुशल माध्यम है, लेकिन भारत में इसका उपयोग अभी भी बहुत सीमित है।
भारत में अंतर्देशीय जल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए कई नदियों और नहरों को राष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में विकसित किया गया है। ये जलमार्ग व्यापार और आवागमन के लिए एक महत्वपूर्ण और पर्यावरण-अनुकूल साधन प्रदान करते हैं।
यहाँ भारत के कुछ प्रमुख राष्ट्रीय जलमार्ग हैं:
- राष्ट्रीय जलमार्ग 1 (NW-1): यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण और लंबा जलमार्ग है। यह उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) से पश्चिम बंगाल के हल्दिया तक गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली पर 1620 किलोमीटर तक फैला हुआ है। यह उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल राज्यों से होकर गुजरता है।
- राष्ट्रीय जलमार्ग 2 (NW-2): यह जलमार्ग असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर स्थित है। यह सदिया से धुबरी तक 891 किलोमीटर की दूरी तय करता है और पूर्वोत्तर भारत के लिए एक प्रमुख संपर्क मार्ग है।
- राष्ट्रीय जलमार्ग 3 (NW-3): यह जलमार्ग केरल में स्थित है और इसे पश्चिमी तट नहर के रूप में भी जाना जाता है। यह कोट्टापुरम को कोल्लम से जोड़ता है और इसकी कुल लंबाई 205 किलोमीटर है, जिसमें उद्योगमंडल और चंपकारा नहरें भी शामिल हैं।
- राष्ट्रीय जलमार्ग 4 (NW-4): यह जलमार्ग आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पुडुचेरी में फैला हुआ है। यह काकीनाडा को पुडुचेरी से जोड़ता है और गोदावरी एवं कृष्णा नदियों के कुछ हिस्सों को नहरों से जोड़कर बनाया गया है।
- राष्ट्रीय जलमार्ग 5 (NW-5): यह जलमार्ग ओडिशा और पश्चिम बंगाल राज्यों में ब्राह्मणी नदी, मताई नदी और महानदी डेल्टा को जोड़ता है। इसका उद्देश्य पूर्वी तट पर स्थित उद्योगों के लिए कोयले और अन्य सामानों के परिवहन को आसान बनाना है।
B) समुद्री परिवहन (Oceanic / Sea Transport)
- महत्व: भारत का लगभग 95% विदेशी व्यापार (मात्रा में) समुद्री मार्गों से ही होता है।
- तटरेखा: भारत की तटरेखा बहुत लंबी (लगभग 7,517 किमी) है।
- प्रमुख बंदरगाह (Major Ports): भारत में 13 प्रमुख बंदरगाह हैं, जिनका प्रबंधन केंद्र सरकार करती है।
- पश्चिमी तट पर: कांडला (अब दीनदयाल पोर्ट), मुंबई (सबसे बड़ा), JNPT (नहावा शेवा – सबसे बड़ा कंटेनर पोर्ट), मर्मुगाओ, न्यू मंगलौर, कोच्चि।
भारत के पश्चिमी तट पर कुल 6 प्रमुख बंदरगाह स्थित हैं। प्रमुख बंदरगाह वे होते हैं जिनका प्रबंधन और प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के अधीन होता है।
भारत के पश्चिमी तट पर स्थित 6 प्रमुख बंदरगाह
1. कांडला बंदरगाह (अब दीनदयाल पोर्ट ट्रस्ट)
- स्थान: कच्छ की खाड़ी के शीर्ष पर, गुजरात।
- प्रकार: ज्वारीय बंदरगाह (Tidal Port)। जहाजों को ज्वार के समय बंदरगाह में प्रवेश करने और बाहर निकलने की आवश्यकता होती है।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह मात्रा (Volume) की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह है, जो सबसे अधिक कार्गो (माल) संभालता है।
- स्वतंत्रता के बाद विकसित पहला प्रमुख बंदरगाह: इसका विकास 1947 में देश के विभाजन के बाद किया गया था ताकि कराची बंदरगाह की कमी को पूरा किया जा सके, जो पाकिस्तान में चला गया था।
- यह उत्तर भारत (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान) के लिए मुख्य आयात-निर्यात द्वार के रूप में कार्य करता है।
- प्रमुख आयात: पेट्रोलियम और उर्वरक।
- प्रमुख निर्यात: खाद्यान्न, नमक, कपड़ा।
- यह भारत का पहला निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र (Export Processing Zone – EPZ) था। अब इसे विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) का दर्जा प्राप्त है।
2. मुंबई बंदरगाह (Mumbai Port)
- स्थान: मुंबई, महाराष्ट्र।
- प्रकार: प्राकृतिक और सबसे बड़ा बंदरगाह (Natural and Largest Port)।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह भारत का सबसे बड़ा प्राकृतिक पोताश्रय (Natural Harbour) है।
- यह भारत का सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक है और इसे “भारत का प्रवेश द्वार” (Gateway of India) कहा जाता है।
- यह सामान्य कार्गो और पेट्रोलियम उत्पादों के व्यापार में एक प्रमुख भूमिका निभाता है।
- इस बंदरगाह पर यातायात के अत्यधिक दबाव को कम करने के लिए ही इसके दक्षिण में न्हावा शेवा (JNPT) बंदरगाह का विकास किया गया।
3. जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) / न्हावा शेवा
- स्थान: मुंबई के पास, न्हावा शेवा, महाराष्ट्र।
- प्रकार: कृत्रिम, आधुनिक और यंत्रीकृत बंदरगाह (Artificial, Modern, and Mechanized Port)।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह (Largest Container Port) है, जो देश के कुल कंटेनर यातायात का लगभग आधा हिस्सा संभालता है।
- इसे मुंबई बंदरगाह के दबाव को कम करने के लिए एक उपग्रह बंदरगाह (Satellite Port) के रूप में विकसित किया गया था।
- यह अपनी आधुनिक सुविधाओं, गहरे ड्राफ्ट और तेज कार्गो हैंडलिंग के लिए जाना जाता है।
4. मर्मुगाओ बंदरगाह (Marmugao Port)
- स्थान: जुआरी नदी के मुहाने पर, गोवा।
- प्रकार: प्राकृतिक पोताश्रय (Natural Harbour)।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह भारत का प्रमुख लौह अयस्क निर्यातक बंदरगाह (Premier Iron Ore Exporting Port) है।
- यह देश के कुल लौह अयस्क निर्यात का लगभग 50% हिस्सा संभालता है।
- गोवा की लौह अयस्क खदानों से प्राप्त अयस्क इसी बंदरगाह से मुख्य रूप से जापान और अन्य देशों को निर्यात किया जाता है।
5. न्यू मंगलौर बंदरगाह (New Mangalore Port)
- स्थान: मंगलौर, कर्नाटक।
- प्रकार: लैगून बंदरगाह (Lagoon Port), कृत्रिम बाहरी अवरोधों के साथ।
- महत्व और विशेषताएँ:
- इसका विकास मुख्य रूप से कुद्रेमुख की लौह अयस्क खदानों से लौह अयस्क के निर्यात के लिए किया गया था।
- लौह अयस्क के अलावा, यह ग्रेनाइट पत्थर, कॉफी, काजू और मसालों का भी निर्यात करता है।
- यह उर्वरकों और पेट्रोलियम उत्पादों का आयात भी करता है।
6. कोच्चि बंदरगाह (Kochi Port)
- स्थान: वेम्बनाड झील (बैकवाटर्स) के मुहाने पर, कोच्चि, केरल।
- प्रकार: प्राकृतिक पोताश्रय (Natural Harbour), लैगून पर स्थित।
- महत्व और विशेषताएँ:
- इसे “अरब सागर की रानी” (Queen of the Arabian Sea) भी कहा जाता है।
- यह एक “फीर वेदर” बंदरगाह नहीं है, यानी यह साल भर चालू रहता है क्योंकि यह समुद्री तूफानों से सुरक्षित एक शांत लैगून में स्थित है।
- यह मसालों, चाय, और कॉफी के निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
- यहाँ एक बड़ी तेल रिफाइनरी और जहाज निर्माण यार्ड भी स्थित है।
सारांश तालिका: पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाह (उत्तर से दक्षिण)
| बंदरगाह | राज्य | प्रमुख विशेषता |
| कांडला (दीनदयाल पोर्ट) | गुजरात | ज्वारीय बंदरगाह; कार्गो की मात्रा में सबसे बड़ा। |
| मुंबई | महाराष्ट्र | भारत का सबसे बड़ा प्राकृतिक बंदरगाह; “भारत का प्रवेश द्वार”। |
| JNPT (न्हावा शेवा) | महाराष्ट्र | भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह। |
| मर्मुगाओ | गोवा | प्रमुख लौह अयस्क निर्यातक बंदरगाह। |
| न्यू मंगलौर | कर्नाटक | कुद्रेमुख लौह अयस्क के निर्यात के लिए। |
| कोच्चि | केरल | प्राकृतिक लैगून बंदरगाह; “अरब सागर की रानी”। |
- पूर्वी तट पर: तूतीकोरिन, चेन्नई (दूसरा सबसे बड़ा), एन्नोर, विशाखापत्तनम (सबसे गहरा), पारादीप, हल्दिया-कोलकाता।
भारत के पूर्वी तट पर कुल 6 प्रमुख बंदरगाह स्थित हैं। इनके अलावा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित पोर्ट ब्लेयर को भी 2010 में प्रमुख बंदरगाह का दर्जा दिया गया था, जिससे पूर्वी तट से संबंधित प्रमुख बंदरगाहों की संख्या 7 हो जाती है।
भारत के पूर्वी तट पर स्थित 7 प्रमुख बंदरगाह
1. कोलकाता-हल्दिया बंदरगाह (Kolkata-Haldia Port)
- स्थान: हुगली नदी पर, कोलकाता, पश्चिम बंगाल (समुद्र तट से लगभग 128 किमी अंदर)।
- प्रकार: नदीय बंदरगाह (Riverine Port) और एक ज्वारीय बंदरगाह (Tidal Port)।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह भारत का एकमात्र प्रमुख नदीय बंदरगाह है।
- ऐतिहासिक महत्व: ब्रिटिश भारत का यह सबसे प्रमुख बंदरगाह था।
- समस्या: हुगली नदी में गाद (silt) के लगातार जमाव की समस्या से ग्रस्त है, जिससे इसकी गहराई कम हो जाती है और बड़े जहाजों का आना मुश्किल हो जाता है। इसके लिए नियमित रूप से ड्रेजिंग (गाद निकालना) की आवश्यकता पड़ती है।
- हल्दिया: कोलकाता बंदरगाह के दबाव को कम करने और बड़े जहाजों को संभालने के लिए इसके दक्षिण में हुगली नदी के मुहाने पर हल्दिया में एक गहरे पानी का सहायक (satellite) बंदरगाह विकसित किया गया है।
- पृष्ठ प्रदेश: यह पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत (बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पूर्वोत्तर राज्य) के खनिज और कृषि-समृद्ध पृष्ठ प्रदेश को सेवा प्रदान करता है।
2. पारादीप बंदरगाह (Paradip Port)
- स्थान: महानदी के मुहाने पर, ओडिशा।
- प्रकार: प्राकृतिक, गहरा और लैगून-प्रकार (Natural, Deep, Lagoon-type) का बंदरगाह।
- महत्व और विशेषताएँ:
- इसे मुख्य रूप से ओडिशा और झारखंड की खदानों से लौह अयस्क (Iron Ore) के निर्यात के लिए विकसित किया गया है।
- यह जापान को लौह अयस्क निर्यात करने वाला एक प्रमुख बंदरगाह है।
- यह कोयला, कच्चा तेल और अन्य शुष्क कार्गो भी संभालता है।
3. विशाखापत्तनम बंदरगाह (Visakhapatnam Port)
- स्थान: विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश।
- प्रकार: भारत का सबसे गहरा, भूमि से घिरा और प्राकृतिक बंदरगाह (Deepest, Landlocked, and Natural Port)।
- महत्व और विशेषताएँ:
- भूमि से घिरा (Land-locked): यह चट्टानी पहाड़ियों (डॉल्फिन नोज पहाड़ी) से घिरा होने के कारण समुद्री तूफानों से पूरी तरह सुरक्षित है।
- इसका निर्माण बैलाडीला (छत्तीसगढ़) की खदानों से लौह अयस्क के निर्यात के लिए किया गया था।
- यहाँ जहाज निर्माण और मरम्मत (हिंदुस्तान शिपयार्ड) तथा तेल रिफाइनरी की भी सुविधा है।
- भारत के पूर्वी तट का यह एक प्रमुख औद्योगिक और कार्गो बंदरगाह है।
4. एन्नोर बंदरगाह (अब कामराजर पोर्ट लिमिटेड)
- स्थान: चेन्नई के पास, तमिलनाडु।
- प्रकार: कॉर्पोरेटाइज्ड बंदरगाह (Corporatised Port)।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह भारत का पहला प्रमुख बंदरगाह है जो सार्वजनिक कंपनी के रूप में पंजीकृत है (कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत)। यह एक ट्रस्ट द्वारा नहीं, बल्कि एक कॉर्पोरेट बोर्ड द्वारा प्रबंधित होता है।
- इसका विकास मुख्य रूप से चेन्नई बंदरगाह के दबाव को कम करने और थर्मल कोयले तथा पेट्रो-केमिकल उत्पादों की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया था।
- यह अपनी आधुनिक और उच्च-तकनीकी कार्गो हैंडलिंग सुविधाओं के लिए जाना जाता है।
5. चेन्नई बंदरगाह (Chennai Port)
- स्थान: चेन्नई, तमिलनाडु।
- प्रकार: कृत्रिम बंदरगाह (Artificial Port)।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह भारत के सबसे पुराने कृत्रिम बंदरगाहों में से एक है।
- यह मुंबई के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह (समग्र यातायात में) है और पूर्वी तट का सबसे बड़ा बंदरगाह है।
- यह कंटेनर, कारें (ऑटोमोबाइल), पेट्रोलियम उत्पाद और उर्वरक संभालता है।
6. तूतीकोरिन बंदरगाह (अब वी. ओ. चिदंबरनार पोर्ट)
- स्थान: मन्नार की खाड़ी में, तमिलनाडु।
- प्रकार: कृत्रिम और गहरा समुद्री बंदरगाह।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह एक प्राकृतिक बंदरगाह है जिसमें जहाजों को संभालने के लिए गहरा समुद्री हार्बर बनाया गया है।
- यह मुख्य रूप से श्रीलंका, मालदीव और भारत के तटीय क्षेत्रों के साथ व्यापार करता है।
- यह मुख्य रूप से कोयला, नमक, खाद्य तेल और उर्वरक जैसे कार्गो को संभालता है।
7. पोर्ट ब्लेयर बंदरगाह (Port Blair Port)
- स्थान: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।
- दर्जा: इसे 2010 में भारत के 13वें प्रमुख बंदरगाह के रूप में घोषित किया गया था।
- महत्व और विशेषताएँ:
- यह भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और हिंद महासागर क्षेत्र में देश के रणनीतिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- यह इस द्वीप समूह और देश की मुख्य भूमि के बीच माल और यात्रियों की आवाजाही का मुख्य केंद्र है।
सारांश तालिका: पूर्वी तट के प्रमुख बंदरगाह (उत्तर से दक्षिण)
| बंदरगाह | राज्य | प्रमुख विशेषता |
| कोलकाता-हल्दिया | पश्चिम बंगाल | भारत का एकमात्र प्रमुख नदीय बंदरगाह। |
| पारादीप | ओडिशा | प्रमुख लौह अयस्क निर्यातक बंदरगाह। |
| विशाखापत्तनम | आंध्र प्रदेश | सबसे गहरा, भूमि से घिरा प्राकृतिक बंदरगाह। |
| एन्नोर (कामराजर) | तमिलनाडु | भारत का पहला कॉर्पोरेटाइज्ड बंदरगाह। |
| चेन्नई | तमिलनाडु | भारत का दूसरा सबसे बड़ा और पूर्वी तट का सबसे बड़ा कृत्रिम बंदरगाह। |
| तूतीकोरिन (चिदंबरनार) | तमिलनाडु | मुख्य रूप से श्रीलंका के साथ व्यापार। |
| पोर्ट ब्लेयर | अंडमान और निकोबार | रणनीतिक महत्व का बंदरगाह। |
- परिवहन का सबसे सस्ता साधन: जल परिवहन को माना जाता है।
- राष्ट्रीय जलमार्ग – 1 (NW-1): यह गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली पर प्रयागराज से हल्दिया तक है और भारत का सबसे लंबा परिचालन जलमार्ग है।
- प्रमुख बंदरगाह (Major Ports): भारत में 13 प्रमुख बंदरगाह हैं, जिनका नियंत्रण केंद्र सरकार के पास है।
- सबसे बड़ा बंदरगाह: मुंबई बंदरगाह (प्राकृतिक और कुल यातायात में)।
- सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह: जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) / न्हावा शेवा (महाराष्ट्र)।
- सबसे गहरा बंदरगाह: विशाखापत्तनम बंदरगाह (आंध्र प्रदेश)।
- सबसे बड़ा कृत्रिम बंदरगाह: चेन्नई बंदरगाह।
- ज्वारीय बंदरगाह (Tidal Port): कांडला (दीनदयाल पोर्ट), गुजरात।
- भारत का पहला कॉर्पोरेटाइज्ड बंदरगाह: एन्नोर (कामराजर पोर्ट), तमिलनाडु।
3. वायु परिवहन (Air Transport)
- महत्व: यह परिवहन का सबसे तीव्र (Fastest), सबसे आरामदायक और प्रतिष्ठित साधन है। यह लंबी दूरी की यात्रा, विशेषकर दुर्गम क्षेत्रों (जैसे पहाड़, मरुस्थल) और अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए आदर्श है।
- राष्ट्रीयकरण: 1953 में भारत में वायु परिवहन का राष्ट्रीयकरण किया गया।
- प्रमुख एयरलाइंस: एयर इंडिया (अब टाटा के स्वामित्व में), इंडिगो, स्पाइसजेट, विस्तारा आदि।
- प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे: दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद।
- पवन हंस (Pawan Hans): यह एक हेलीकॉप्टर सेवा है, जो दुर्गम क्षेत्रों और तेल खोज कार्यों (ONGC के लिए) में सेवा प्रदान करती है।
भारत के प्रमुख हवाई अड्डे
भारत में हवाई अड्डों का एक विस्तृत नेटवर्क है जो देश के भीतर और दुनिया भर में लाखों यात्रियों को सेवा प्रदान करता है। ये हवाई अड्डे न केवल परिवहन के केंद्र हैं बल्कि आर्थिक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं। भारत के कुछ प्रमुख और सबसे व्यस्त हवाई अड्डे निम्नलिखित हैं:
1. इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली (DEL)
यह भारत का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है और यात्रियों तथा कार्गो आवाजाही, दोनों के मामले में शीर्ष पर है। दिल्ली हवाई अड्डे को अपनी विश्वस्तरीय सुविधाओं और उत्कृष्ट कनेक्टिविटी के लिए कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। यह कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और घरेलू एयरलाइनों के लिए एक प्रमुख हब है।
2. छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, मुंबई (BOM)
मुंबई का हवाई अड्डा देश का दूसरा सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है। यह शहर के केंद्र में स्थित है और एक साथ दो रनवे संचालित करने की अपनी क्षमता के लिए जाना जाता है, जो इसे दुनिया के सबसे कुशल सिंगल-रनवे हवाई अड्डों में से एक बनाता है। यह वित्तीय राजधानी को दुनिया भर से जोड़ता है।
3. केम्पेगौड़ा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, बेंगलुरु (BLR)
दक्षिण भारत का यह सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है और कुल यात्री यातायात के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है। बेंगलुरु, जिसे भारत की “सिलिकॉन वैली” के रूप में जाना जाता है, का यह हवाई अड्डा आधुनिक वास्तुकला और तकनीकी सुविधाओं से लैस है। इसने अपने यात्री-अनुकूल डिज़ाइन और सेवाओं के लिए प्रशंसा प्राप्त की है।
4. राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, हैदराबाद (HYD)
हैदराबाद का हवाई अड्डा अपनी उत्कृष्ट यात्री सुविधाओं और कुशल संचालन के लिए प्रसिद्ध है। क्षेत्रफल के हिसाब से यह भारत का सबसे बड़ा हवाई अड्डा है। इसे अक्सर सेवा की गुणवत्ता के लिए दुनिया के सर्वश्रेष्ठ हवाई अड्डों में स्थान दिया जाता है।
5. नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, कोलकाता (CCU)
कोलकाता का हवाई अड्डा पूर्वी भारत का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण हवाई अड्डा है। यह पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में कार्य करता है और दक्षिण पूर्व एशिया के लिए उड़ानों का एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है।
6. चेन्नई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, चेन्नई (MAA)
यह दक्षिण भारत के सबसे पुराने हवाई अड्डों में से एक है और देश के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में गिना जाता है। यह यात्रियों और कार्गो, दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों के लिए।
7. सरदार वल्लभभाई पटेल अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, अहमदाबाद (AMD)
गुजरात का यह सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है और भारत के पश्चिमी हिस्से में एक महत्वपूर्ण विमानन केंद्र है। यह तेजी से बढ़ते औद्योगिक और वाणिज्यिक केंद्रों में से एक को सेवा प्रदान करता है।
8. कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, कोच्चि (COK)
यह दुनिया का पहला हवाई अड्डा है जो पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर संचालित होता है। यह केरल और आसपास के क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है, और विशेष रूप से मध्य पूर्व से आने वाले अंतरराष्ट्रीय यातायात के लिए जाना जाता है।
| हवाई अड्डे का नाम | शहर | IATA कोड |
| इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा | दिल्ली | DEL |
| छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा | मुंबई | BOM |
| केम्पेगौड़ा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा | बेंगलुरु | BLR |
| राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा | हैदराबाद | HYD |
| नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा | कोलकाता | CCU |
| चेन्नई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा | चेन्नई | MAA |
| सरदार वल्लभभाई पटेल अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा | अहमदाबाद | AMD |
| कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा | कोच्चि | COK |
उड़ान योजना (उड़े देश का आम नागरिक)
उड़ान (UDAN – Ude Desh ka Aam Nagrik) भारत सरकार की एक प्रमुख योजना है जिसका उद्देश्य देश के छोटे और मझौले शहरों को हवाई नेटवर्क से जोड़ना और आम आदमी के लिए हवाई यात्रा को सस्ता और सुलभ बनाना है। यह योजना क्षेत्रीय हवाई संपर्क को बढ़ावा देने के लिए 2016 में शुरू की गई राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
योजना के मुख्य उद्देश्य:
- क्षेत्रीय संपर्क: देश के उन हवाई अड्डों को फिर से चालू करना जहाँ से उड़ानें बंद हो चुकी हैं (कम सेवित) या कभी शुरू ही नहीं हुईं (असेवित), और उन्हें देश के विमानन मानचित्र पर लाना।
- किफायती यात्रा: हवाई यात्रा को इतना सस्ता बनाना कि आम नागरिक भी इसका लाभ उठा सकें। इसके तहत लगभग 500 किलोमीटर की दूरी या एक घंटे की उड़ान के लिए किराया लगभग 2,500 रुपये तक सीमित किया गया है।
- आर्थिक विकास: जब छोटे शहर हवाई मार्ग से जुड़ते हैं, तो इससे वहां व्यापार, पर्यटन और निवेश को बढ़ावा मिलता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
योजना कैसे काम करती है:
यह योजना व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (Viability Gap Funding – VGF) के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि जिन मार्गों पर एयरलाइंस को यात्री कम मिलने के कारण नुकसान होने की आशंका होती है, उस नुकसान की भरपाई सरकार वित्तीय सहायता देकर करती है।
- रियायती दरें: योजना के तहत चुनी गई उड़ानों में लगभग 50% सीटों का किराया रियायती दर पर बेचा जाता है। बाकी सीटों का किराया बाजार दर के अनुसार तय करने की छूट एयरलाइंस को होती है।
- सरकारों द्वारा सब्सिडी: एयरलाइंस को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।
- अन्य छूटें: इस योजना के तहत उड़ान भरने वाली एयरलाइंस को हवाई अड्डों पर लैंडिंग और पार्किंग शुल्क में छूट दी जाती है। इसके अलावा, विमान ईंधन (ATF) पर लगने वाले कर में भी राज्य सरकारों द्वारा कटौती की जाती है।
योजना की उपलब्धियाँ:
उड़ान योजना ने भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाया है। इसके माध्यम से कई छोटे शहर जैसे दरभंगा, किशनगढ़, बिलासपुर, और हुबली आदि हवाई नेटवर्क से जुड़ गए हैं, जिससे लाखों लोगों को लाभ हुआ है। इस योजना ने न केवल यात्रा को आसान बनाया है, बल्कि यह देश के संतुलित क्षेत्रीय विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। यह सही मायनों में “उड़े देश का आम नागरिक” के सपने को साकार कर रही है।
4. पाइपलाइन परिवहन (Pipeline Transport)
- महत्व: यह मुख्य रूप से तरल (Crude Oil, Petroleum Products) और गैसीय (Natural Gas) पदार्थों के परिवहन के लिए उपयोग किया जाता है। एक बार स्थापित हो जाने के बाद, यह एक बहुत ही सस्ता और कुशल साधन है, जिसमें पारगमन हानियाँ (Transit losses) लगभग शून्य होती हैं।
भारत में प्रमुख पाइपलाइनें
भारत में पाइपलाइन परिवहन, ऊर्जा संसाधनों जैसे कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और प्राकृतिक गैस के परिवहन का एक महत्वपूर्ण और कुशल साधन है। यह परिवहन का एक अदृश्य लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण नेटवर्क है जो देश के औद्योगिक और घरेलू ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करता है।
पाइपलाइन परिवहन का महत्व:
- निर्बाध आपूर्ति: यह बिना किसी रुकावट के तरल और गैसीय पदार्थों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करता है।
- सुरक्षित और सस्ता: एक बार स्थापित होने के बाद, इसका संचालन खर्च सड़क या रेल परिवहन की तुलना में कम होता है और यह अधिक सुरक्षित भी है।
- पर्यावरण के अनुकूल: इसमें कार्बन उत्सर्जन कम होता है और रिसाव की संभावना भी कम होती है।
- दुर्गम क्षेत्रों के लिए उपयुक्त: यह पहाड़ी, जंगली या घनी आबादी वाले क्षेत्रों के लिए परिवहन का सबसे उपयुक्त साधन है।
भारत की प्रमुख पाइपलाइनें:
इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1. कच्चे तेल की पाइपलाइनें (Crude Oil Pipelines)
ये पाइपलाइनें तेल क्षेत्रों या बंदरगाहों से तेल शोधनशालाओं (Refineries) तक कच्चा तेल पहुंचाती हैं।
- नाहरकटिया-नुनमाटी-बरौनी पाइपलाइन: यह भारत की पहली प्रमुख पाइपलाइनों में से एक है। यह असम के नाहरकटिया तेल क्षेत्र से शुरू होकर गुवाहाटी की नुनमाटी रिफाइनरी और फिर बिहार की बरौनी रिफाइनरी तक कच्चा तेल पहुंचाती है।
- सलाया-कोयली-मथुरा पाइपलाइन: यह गुजरात के सलाया (कांडला बंदरगाह के पास) से शुरू होती है और वीरमगाम, मथुरा, पानीपत और जालंधर तक तेल पहुंचाती है। यह देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित रिफाइनरियों के लिए आयातित तेल की आपूर्ति का मुख्य स्रोत है।
- मुंबई हाई-मुंबई-अंकलेश्वर-कोयली पाइपलाइन: यह मुंबई हाई के अपतटीय तेल क्षेत्रों से निकाले गए कच्चे तेल को मुंबई और गुजरात की कोयली रिफाइनरी तक पहुंचाती है।
2. पेट्रोलियम उत्पाद पाइपलाइनें (Petroleum Product Pipelines)
ये पाइपलाइनें रिफाइनरियों से तैयार उत्पादों जैसे पेट्रोल, डीजल, केरोसीन और एलपीजी को देश के विभिन्न बाजारों और खपत केंद्रों तक पहुंचाती हैं।
- कांडला-भटिंडा पाइपलाइन: यह भारत की सबसे लंबी पेट्रोलियम उत्पाद पाइपलाइनों में से एक है। यह गुजरात के कांडला से शुरू होकर पंजाब के भटिंडा तक जाती है, और उत्तरी भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करती है।
- बरौनी-कानपुर पाइपलाइन: यह बरौनी रिफाइनरी से उत्तर प्रदेश के कानपुर तक पेट्रोलियम उत्पादों का परिवहन करती है।
- नुमालीगढ़-सिलीगुड़ी पाइपलाइन: यह असम की नुमालीगढ़ रिफाइनरी से पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी तक उत्पादों की आपूर्ति करती है।
3. प्राकृतिक गैस पाइपलाइनें (Natural Gas Pipelines)
यह भारत का सबसे तेजी से बढ़ता पाइपलाइन नेटवर्क है। इसका प्रबंधन मुख्य रूप से गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL) द्वारा किया जाता है।
- हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (HVJ) पाइपलाइन: इसे भारत की “गैस धमनी” (Gas Artery) भी कहा जाता है। यह 1750 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन गुजरात के हजीरा से शुरू होकर मध्य प्रदेश के विजयपुर होते हुए उत्तर प्रदेश के जगदीशपुर तक जाती है। यह मार्ग में स्थित उर्वरक संयंत्रों, बिजली घरों और अन्य उद्योगों को गैस की आपूर्ति करती है। इसकी शाखाएं राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक भी फैली हुई हैं।
- दाहेज-विजयपुर पाइपलाइन: यह दाहेज LNG टर्मिनल से गैस लेकर राष्ट्रीय गैस ग्रिड से जुड़ती है।
- जगदीशपुर-हल्दिया और बोकारो-धामरा पाइपलाइन (ऊर्जा गंगा परियोजना): यह एक विशाल परियोजना है जिसका उद्देश्य पूर्वी भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा को राष्ट्रीय गैस ग्रिड से जोड़ना है। इसका लक्ष्य इन क्षेत्रों में उद्योगों और घरों तक स्वच्छ ऊर्जा पहुंचाना है।
प्रमुख पाइपलाइनों की तालिका
| पाइपलाइन का नाम | क्या परिवहन करती है | प्रमुख मार्ग |
| नाहरकटिया-बरौनी | कच्चा तेल | असम से बिहार |
| सलाया-मथुरा | कच्चा तेल | गुजरात से उत्तर प्रदेश, पंजाब |
| HVJ पाइपलाइन | प्राकृतिक गैस | गुजरात से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश |
| कांडला-भटिंडा | पेट्रोलियम उत्पाद | गुजरात से पंजाब |
| ऊर्जा गंगा परियोजना | प्राकृतिक गैस | पूर्वी भारत को राष्ट्रीय गैस ग्रिड से जोड़ना |
भारत में संसाधन
संसाधन वे सभी स्रोत हैं जो मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोग किए जा सकते हैं। भारत प्राकृतिक और मानवीय, दोनों प्रकार के संसाधनों की दृष्टि से एक अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण देश है। इन संसाधनों का सही उपयोग देश के आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति का आधार है।
भारत के संसाधनों को मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1. प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)
ये वे संसाधन हैं जो हमें प्रकृति से प्राप्त होते हैं। भारत में इनका विशाल भंडार है।
क) भूमि संसाधन (Land Resources)
भारत में भूमि का विविध स्वरूप है, जिसमें उपजाऊ मैदान, पठार, पर्वत और मरुस्थल शामिल हैं।
- कृषि भूमि: सिंधु-गंगा के विशाल मैदान और तटीय क्षेत्रों की जलोढ़ मिट्टी कृषि के लिए विश्व की सबसे उपजाऊ भूमियों में से एक है। यहाँ गेहूं, चावल, गन्ना और दालों जैसी प्रमुख फसलें उगाई जाती हैं। दक्कन के पठार की काली मिट्टी कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
- वन भूमि: देश का लगभग 24% हिस्सा वनों से ढका है, जो लकड़ी, जड़ी-बूटियाँ और अन्य वन्य उत्पाद प्रदान करते हैं।
- पर्वतीय क्षेत्र: हिमालय जैसे पर्वत जल संसाधनों के स्रोत हैं और पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।
ख) जल संसाधन (Water Resources)
भारत में जल के प्रचुर स्रोत हैं, हालांकि इसका वितरण असमान है।
- नदियाँ: गंगा, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा और कावेरी जैसी प्रमुख नदियाँ सिंचाई, पीने के पानी, जलविद्युत उत्पादन और परिवहन का आधार हैं।
- भूजल: भारत कृषि और घरेलू उपयोग के लिए भूजल पर बहुत अधिक निर्भर है।
- मानसून: भारत की अधिकांश वर्षा मानसून पर निर्भर करती है, जो जल स्रोतों को फिर से भरने का काम करता है।
ग) खनिज संसाधन (Mineral Resources)
खनिज ऐसे प्राकृतिक पदार्थ हैं जिनका एक निश्चित रासायनिक संघटन होता है और जिन्हें पृथ्वी के गर्भ से खनन द्वारा प्राप्त किया जाता है। ये किसी भी देश के औद्योगिक विकास की रीढ़ होते हैं। भारत खनिज संपदा की दृष्टि से एक धनी और विविधतापूर्ण देश है, हालाँकि इसका वितरण पूरे देश में असमान है।
भारत के खनिज संसाधनों को मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1. धात्विक खनिज (Metallic Minerals)
इन खनिजों से हमें धातुएँ प्राप्त होती हैं। इन्हें भी दो भागों में बांटा जा सकता है:
i) लौह-युक्त धात्विक खनिज (Ferrous Minerals)
इनमें लोहे का अंश पाया जाता है। ये लौह और इस्पात उद्योग का आधार हैं।
लौह अयस्क (Iron Ore)
लौह अयस्क एक धात्विक खनिज है और किसी भी देश के औद्योगिक विकास की रीढ़ माना जाता है। यह लोहा और इस्पात उद्योग के लिए सबसे बुनियादी कच्चा माल है। भारत उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के विशाल भंडार से संपन्न है और दुनिया के प्रमुख लौह अयस्क उत्पादक देशों में से एक है।
भारत में पाए जाने वाले लौह अयस्क के प्रकार:
भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार के उच्च कोटि के लौह अयस्क पाए जाते हैं:
- हेमाटाइट (Hematite):
- यह भारत में पाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण और उच्चतम गुणवत्ता वाला लौह अयस्क है।
- इसमें लोहे की मात्रा 60 से 70 प्रतिशत तक होती है।
- इसका रंग लाल होता है, जिसके कारण इसे “लाल अयस्क” भी कहा जाता है। देश के अधिकांश इस्पात संयंत्र इसी अयस्क का उपयोग करते हैं।
- मैग्नेटाइट (Magnetite):
- यह हेमाटाइट से भी बेहतर गुणवत्ता वाला लौह अयस्क है, जिसमें लोहे की मात्रा 70 प्रतिशत से अधिक होती है।
- इसमें उत्कृष्ट चुंबकीय गुण होते हैं, जो इसे विद्युत उद्योग के लिए विशेष रूप से मूल्यवान बनाते हैं।
- भारत में इसके भंडार हेमाटाइट की तुलना में कम हैं।
प्रमुख उत्पादक क्षेत्र और राज्य:
भारत में लौह अयस्क का वितरण मुख्य रूप से कुछ प्रमुख पेटियों (Belts) में केंद्रित है:
- ओडिशा-झारखंड पेटी:
- ओडिशा: यह भारत का सबसे बड़ा लौह अयस्क उत्पादक राज्य है। यहां के मयूरभंज, सुंदरगढ़ और केंदुझर (क्योंझर) जिलों में उच्च कोटि के हेमाटाइट अयस्क की खदानें हैं। बादामपहाड़ की खदानें इसी क्षेत्र में स्थित हैं।
- झारखंड: यहाँ का सिंहभूम जिला लौह अयस्क के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ गुआ और नोआमुंडी जैसी प्रमुख खदानें हैं।
- दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर पेटी:
- छत्तीसगढ़: यह देश का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यहाँ के बस्तर जिले में स्थित बैलाडीला की पहाड़ियां विश्व प्रसिद्ध उच्च कोटि के हेमाटाइट अयस्क के लिए जानी जाती हैं। यहाँ से निकाले गए अयस्क का एक बड़ा हिस्सा जापान और दक्षिण कोरिया को विशाखापत्तनम बंदरगाह के माध्यम से निर्यात किया जाता है।
- यह पेटी महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले तक फैली हुई है।
- बेल्लारी-चित्रदुर्ग-चिकमगलूर-तुमकुरु पेटी:
- कर्नाटक: इस राज्य में लौह अयस्क का विशाल भंडार है। कुद्रेमुख की खदानें विश्व के सबसे बड़े भंडारों में से एक मानी जाती थीं, हालांकि अब वहां खनन बंद हो गया है। बेल्लारी क्षेत्र भी लौह अयस्क उत्पादन का एक प्रमुख केंद्र है।
- महाराष्ट्र-गोवा पेटी:
- गोवा और महाराष्ट्र: यहाँ के रत्नागिरी जिले में लौह अयस्क की खदानें हैं। हालांकि यहाँ का अयस्क बहुत उच्च कोटि का नहीं है, फिर भी इसका खनन और निर्यात किया जाता है।
लौह अयस्क का महत्व:
- इस्पात उद्योग का आधार: लोहा और इस्पात का उत्पादन पूरी तरह से लौह अयस्क पर निर्भर है।
- औद्योगिक विकास: मशीनें, औजार, वाहन और लगभग सभी औद्योगिक ढाँचे इस्पात से बनते हैं।
- बुनियादी ढाँचा: रेलवे, पुल, बांध, सड़कें और भवन निर्माण के लिए इस्पात अनिवार्य है।
- निर्यात: भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के बाद लौह अयस्क का निर्यात भी करता है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जित होती है।
मैंगनीज (Manganese)
मैंगनीज एक धात्विक खनिज है जो लौह और इस्पात उद्योग के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कच्चा माल है। यह एक कठोर, भूरे-चांदी रंग की धातु है और इसे मुख्य रूप से लौह-मिश्र धातु (Ferro-alloy) के रूप में उपयोग किया जाता है।
मैंगनीज का महत्व और उपयोग:
मैंगनीज को एक रणनीतिक खनिज माना जाता है क्योंकि इसका कोई संतोषजनक विकल्प नहीं है। इसके प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं:
- इस्पात निर्माण: यह इसका सबसे प्रमुख उपयोग है। इस्पात बनाने की प्रक्रिया में मैंगनीज एक अनिवार्य घटक है।
- शोधक के रूप में: यह इस्पात से अशुद्धियों, विशेषकर ऑक्सीजन और सल्फर, को हटाने का काम करता है।
- मिश्र धातु के रूप में: यह इस्पात को मजबूती, कठोरता और घिसाव-प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है। एक टन इस्पात बनाने के लिए लगभग 10 किलोग्राम मैंगनीज की आवश्यकता होती है।
- रासायनिक उद्योग: इसका उपयोग ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक, और पोटेशियम परमैंगनेट जैसे रसायन बनाने में किया जाता है।
- सूखी सेल बैटरी (Dry Cell Batteries): मैंगनीज डाइऑक्साइड का उपयोग सूखी बैटरियों के निर्माण में किया जाता है।
- पेंट और वार्निश: इसका उपयोग पेंट और शीशे को रंग देने (विशेषकर बैंगनी रंग) और सुखाने वाले एजेंट के रूप में किया जाता है।
- कांच उद्योग: इसका उपयोग कांच को साफ करने (रंगहीन बनाने) के लिए किया जाता है।
भारत में प्रमुख उत्पादक क्षेत्र और राज्य:
भारत मैंगनीज अयस्क के अच्छे भंडार से संपन्न है और दुनिया के प्रमुख उत्पादक देशों में से एक है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं:
- मध्य प्रदेश: यह भारत का सबसे बड़ा मैंगनीज उत्पादक राज्य है। यहाँ का बालाघाट जिला मैंगनीज की खदानों के लिए प्रसिद्ध है। भरवेली खान, जो बालाघाट में स्थित है, एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत मैंगनीज खदान है।
- महाराष्ट्र: यह देश का दूसरा प्रमुख उत्पादक राज्य है। यहाँ के नागपुर और भंडारा जिले प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं, जो मध्य प्रदेश के बालाघाट क्षेत्र से सटे हुए हैं।
- ओडिशा: यह मैंगनीज का एक महत्वपूर्ण उत्पादक है। सुंदरगढ़, केंदुझर (क्योंझर) और कोरापुट जिलों में इसकी प्रमुख खदानें स्थित हैं।
- कर्नाटक: यहाँ भी मैंगनीज का उत्पादन होता है। बेल्लारी, शिमोगा, चित्रदुर्ग और तुमकुरु जिलों में इसके भंडार पाए जाते हैं।
- आंध्र प्रदेश: श्रीकाकुलम और विजयनगरम जिलों में मैंगनीज का खनन किया जाता है।
संक्षेप में, मैंगनीज भारत के लिए एक अनिवार्य खनिज है, जो सीधे तौर पर देश के इस्पात उद्योग और औद्योगिक विकास से जुड़ा हुआ है।
क्रोमाइट (Chromite) – क्रोमियम का अयस्क
क्रोमाइट, क्रोमियम धातु का एक ऑक्साइड अयस्क है। क्रोमियम एक कठोर, चमकदार और जंग-रोधी (corrosion-resistant) धातु है, जो इसे कई महत्वपूर्ण औद्योगिक उपयोगों के लिए बहुमूल्य बनाती है। क्रोमाइट भारत के लिए एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खनिज है।
क्रोमाइट का महत्व और उपयोग:
क्रोमाइट का उपयोग मुख्य रूप से तीन प्रमुख उद्योगों में किया जाता है:
- धातुकर्म उद्योग (Metallurgical Industry):
- इसका सबसे बड़ा उपयोग फेरो-क्रोम (ferro-chrome) बनाने में होता है, जो लौह और क्रोमियम का एक मिश्र धातु है।
- फेरो-क्रोम का उपयोग स्टेनलेस स्टील (Stainless Steel) के निर्माण में किया जाता है। क्रोमियम ही स्टेनलेस स्टील को कठोरता, मजबूती और जंग न लगने का गुण प्रदान करता है।
- इसका उपयोग विशेष प्रकार के प्रतिरोधी और ऊष्मा-उपचारित इस्पात बनाने के लिए भी किया जाता है।
- तापसह उद्योग (Refractory Industry):
- क्रोमाइट का गलनांक बहुत अधिक होता है, यानी यह बहुत उच्च तापमान को सहन कर सकता है।
- इस गुण के कारण, इसका उपयोग लोहा और इस्पात बनाने वाली भट्टियों (furnaces) और भस्मक (incinerators) के अंदरूनी परत के लिए उच्च-तापमान-सहनीय ईंटें बनाने में किया जाता है।
- रासायनिक उद्योग (Chemical Industry):
- क्रोमाइट का उपयोग सोडियम डाइक्रोमेट, क्रोमिक एसिड और अन्य क्रोमियम-आधारित रसायन बनाने के लिए किया जाता है।
- इन रसायनों का उपयोग चमड़ा शोधन (leather tanning), वस्त्रों की रंगाई, पेंट, पिगमेंट (रंजक) और लकड़ी के परिरक्षण में होता है।
भारत में प्रमुख उत्पादक क्षेत्र और राज्य:
भारत में क्रोमाइट के उत्पादन और भंडार के मामले में ओडिशा का लगभग एकाधिकार है।
- ओडिशा: यह भारत का सबसे बड़ा क्रोमाइट उत्पादक राज्य है। देश के कुल क्रोमाइट भंडार का 95% से अधिक हिस्सा अकेले ओडिशा में ही केंद्रित है।
- यहाँ की सुकिंदा घाटी (Sukinda Valley), जो जाजपुर और क्योंझर जिलों में फैली हुई है, क्रोमाइट के सबसे बड़े और समृद्ध भंडारों में से एक है।
- अन्य राज्य: ओडिशा के अलावा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड, और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी क्रोमाइट के छोटे-छोटे भंडार पाए जाते हैं, लेकिन उनका उत्पादन बहुत ही सीमित मात्रा में होता है।
भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ क्रोमाइट और फेरो-क्रोम का एक प्रमुख निर्यातक भी है, जिससे देश को महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
निकेल (Nickel)
निकेल एक कठोर, चांदी जैसी सफेद धात्विक खनिज है। यह अत्यधिक मजबूत, लचीला (malleable), और जंग-रोधी (corrosion-resistant) होता है। इन गुणों के कारण, निकेल आधुनिक उद्योगों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक धातु है।
निकेल का महत्व और उपयोग:
- स्टेनलेस स्टील का निर्माण: निकेल का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण उपयोग स्टेनलेस स्टील बनाने में होता है। यह स्टेनलेस स्टील को मजबूती, टिकाऊपन और सबसे महत्वपूर्ण, जंग न लगने का गुण प्रदान करता है। लगभग दो-तिहाई निकेल का उपयोग इसी काम में होता है।
- मिश्र धातुओं का निर्माण (Alloys): इसका उपयोग कई अन्य प्रकार की मिश्र धातुएँ बनाने में किया जाता है, जिन्हें “सुपर-अलॉय” कहते हैं। इन सुपर-अलॉय का उपयोग अत्यधिक तापमान और दबाव वाली जगहों पर किया जाता है, जैसे:
- जेट इंजन और गैस टर्बाइन के पुर्जे।
- रासायनिक रिएक्टर और बिजली संयंत्र।
- इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की बैटरी: यह निकेल का एक तेजी से बढ़ता हुआ उपयोग है। आधुनिक लिथियम-आयन बैटरी, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उपयोग होती हैं, के कैथोड में निकेल एक महत्वपूर्ण घटक है। यह बैटरी को अधिक ऊर्जा घनत्व (energy density) और लंबी आयु प्रदान करता है।
- इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating): अन्य धातुओं पर निकेल की एक पतली परत चढ़ाई जाती है ताकि उन्हें जंग से बचाया जा सके और एक चमकदार, आकर्षक फिनिश दी जा सके।
- सिक्कों का निर्माण: इसका उपयोग तांबे के साथ मिलाकर सिक्के बनाने में किया जाता है।
भारत में निकेल की स्थिति:
- आयात पर निर्भरता: लंबे समय तक भारत अपनी निकेल की जरूरतों के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर रहा है। देश में निकेल का प्राथमिक उत्पादन (अयस्क से) नगण्य रहा है।
- भंडार और उत्पादन:
- भारत में निकेल के भंडार बहुत सीमित हैं, लेकिन जो भी हैं, उनका लगभग 93% हिस्सा अकेले ओडिशा राज्य में पाया जाता है।
- ओडिशा की सुकिंदा घाटी, जो क्रोमाइट के लिए भी प्रसिद्ध है, भारत का सबसे बड़ा निकेल अयस्क भंडार क्षेत्र है। यहां के जाजपुर और क्योंझर जिलों में इसके भंडार हैं।
- ओडिशा के अलावा, झारखंड और नागालैंड में भी इसके कुछ छोटे भंडार पाए जाते हैं।
- चुनौतियां और भविष्य:
- भंडार होने के बावजूद, इन अयस्कों से निकेल निकालना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण और महंगा रहा है, जिसके कारण भारत में बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू नहीं हो पाया है।
- हालांकि, “आत्मनिर्भर भारत” अभियान के तहत और इलेक्ट्रिक वाहनों पर बढ़ते फोकस के कारण, सरकार घरेलू निकेल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नई तकनीकों और निवेश को प्रोत्साहित कर रही है। ओडिशा में इन भंडारों का विकास देश की निकेल पर आयात निर्भरता को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है।
कोबाल्ट (Cobalt)
कोबाल्ट एक कठोर, चांदी-सफेद रंग की धात्विक खनिज है जो रासायनिक रूप से लोहे और निकेल के समान है। यह एक रणनीतिक और अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है, विशेषकर आधुनिक प्रौद्योगिकी और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में इसकी बढ़ती मांग के कारण।
कोबाल्ट का महत्व और उपयोग:
कोबाल्ट का उपयोग कई उच्च-तकनीकी और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाता है:
- रिचार्जेबल बैटरी का निर्माण: यह कोबाल्ट का सबसे प्रमुख और तेजी से बढ़ता हुआ उपयोग है। इसका उपयोग लिथियम-आयन बैटरी (Lithium-ion batteries) के कैथोड में एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में किया जाता है।
- ये बैटरियां स्मार्टफोन, लैपटॉप, और विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) में इस्तेमाल होती हैं।
- कोबाल्ट बैटरी को स्थिरता, लंबी आयु और उच्च ऊर्जा घनत्व प्रदान करता है, जिससे वाहन एक बार चार्ज करने पर लंबी दूरी तय कर पाते हैं।
- सुपर-अलॉय का निर्माण (Superalloys): कोबाल्ट को अन्य धातुओं के साथ मिलाकर उच्च-प्रदर्शन वाली मिश्र धातुएँ (सुपर-अलॉय) बनाई जाती हैं।
- ये सुपर-अलॉय अत्यधिक उच्च तापमान और दबाव को सहन कर सकते हैं।
- इस कारण इनका उपयोग जेट इंजन, गैस टर्बाइन, रॉकेट इंजन, और परमाणु रिएक्टरों के पुर्जे बनाने में किया जाता है।
- चुंबक (Magnets): कोबाल्ट का उपयोग शक्तिशाली और स्थायी चुंबक बनाने में किया जाता है जो उच्च तापमान पर भी अपने चुंबकीय गुण नहीं खोते।
- रंजक (Pigments): ऐतिहासिक रूप से, कोबाल्ट का उपयोग कांच, सिरेमिक और पेंट को गहरा नीला रंग देने के लिए एक रंजक के रूप में किया जाता रहा है।
- चिकित्सा क्षेत्र: रेडियोधर्मी समस्थानिक कोबाल्ट-60 का उपयोग कैंसर के इलाज (रेडियोथेरेपी) और चिकित्सा उपकरणों को स्टरलाइज़ करने में किया जाता है।
भारत में कोबाल्ट की स्थिति:
भारत में कोबाल्ट के प्राथमिक भंडार बहुत सीमित हैं, और देश अपनी जरूरतों के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है।
- भंडार:
- भारत में कोबाल्ट स्वतंत्र रूप से नहीं पाया जाता, बल्कि यह निकेल, तांबा, और लेड के अयस्कों के साथ सह-उत्पाद (by-product) के रूप में बहुत कम मात्रा में मौजूद होता है।
- इसके अल्प भंडार मुख्य रूप से ओडिशा, झारखंड, और नागालैंड में पाए जाते हैं।
- ओडिशा का जाजपुर जिला, झारखंड का सिंहभूम जिला और नागालैंड के कुछ क्षेत्रों में इसके भंडार होने का अनुमान है।
- उत्पादन और चुनौतियां:
- वर्तमान में, भारत में कोबाल्ट का प्राथमिक उत्पादन लगभग शून्य है। देश अपनी पूरी मांग चीन, बेल्जियम और अन्य देशों से आयात करके पूरी करता है।
- इलेक्ट्रिक वाहनों पर बढ़ते जोर के कारण भारत में कोबाल्ट की मांग तेजी से बढ़ रही है। इस आयात निर्भरता को कम करना एक बड़ी चुनौती है।
- भविष्य की संभावनाएं:
- भारत सरकार विदेशों में, विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका के खनिज-समृद्ध देशों में, कोबाल्ट की खदानों में हिस्सेदारी हासिल करने के लिए प्रयास कर रही है।
- घरेलू स्तर पर, भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग (GSI) कोबाल्ट के नए भंडारों की खोज के लिए सर्वेक्षण कर रहा है।
- इसके अलावा, पुरानी बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से कोबाल्ट के पुनर्चक्रण (recycling) को बढ़ावा दिया जा रहा है।
टंगस्टन (Tungsten)
टंगस्टन, जिसका प्रतीक ‘W’ (जर्मन शब्द ‘वोल्फ्राम’ से लिया गया) है, एक दुर्लभ और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण धात्विक खनिज है। यह अपनी अद्वितीय विशेषताओं के लिए जाना जाता है, जिनमें से सबसे प्रमुख हैं:
- अत्यधिक उच्च गलनांक: सभी शुद्ध धातुओं में इसका गलनांक (Melting Point) सबसे अधिक (3,422 °C) होता है।
- अत्यधिक कठोरता और घनत्व: यह अत्यंत कठोर और भारी (उच्च घनत्व) धातु है।
- मजबूती: उच्च तापमान पर भी यह अपनी मजबूती बनाए रखता है।
इसका मुख्य अयस्क वोल्फ्रेमाइट (Wolframite) और शीलाइट (Scheelite) हैं।
टंगस्टन का महत्व और उपयोग:
अपने असाधारण गुणों के कारण, टंगस्टन का उपयोग कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाता है:
- कटिंग टूल्स का निर्माण: टंगस्टन का सबसे बड़ा उपयोग टंगस्टन कार्बाइड बनाने में होता है, जो हीरे के बाद सबसे कठोर पदार्थों में से एक है। इसका उपयोग उद्योगों में काटने, ड्रिल करने और घिसने वाले औजार (Cutting Tools, Drilling Bits) बनाने के लिए किया जाता है, जो स्टील को भी आसानी से काट सकते हैं।
- मिश्र धातुओं का निर्माण (Alloys): जब टंगस्टन को स्टील में मिलाया जाता है, तो यह उसे अत्यधिक मजबूती और उच्च तापमान सहने की क्षमता प्रदान करता है। इन “हाई-स्पीड स्टील” का उपयोग उच्च तापमान पर काम करने वाले उपकरणों, जैसे रॉकेट नोजल और हीटिंग एलीमेंट्स में होता है।
- सैन्य उपयोग: इसके उच्च घनत्व और कठोरता के कारण, इसका उपयोग रक्षा क्षेत्र में कवच-भेदन करने वाली गोलियां (Armor-piercing projectiles) और मिसाइलों के पुर्जे बनाने में किया जाता है।
- इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग:
- फिलामेंट: इसके उच्च गलनांक के कारण, पुराने तापदीप्त बल्बों (Incandescent Light Bulbs) का फिलामेंट टंगस्टन का बना होता था। यह बिना पिघले अत्यधिक गर्म होकर प्रकाश उत्पन्न कर सकता है। (हालांकि, LED के आने से यह उपयोग कम हो गया है)।
- इसका उपयोग X-ray ट्यूब, टेलीविजन सेट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में भी किया जाता है।
भारत में टंगस्टन की स्थिति:
भारत में टंगस्टन के भंडार बहुत सीमित हैं, और देश अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है।
- भंडार और उत्पादन:
- राजस्थान: भारत में टंगस्टन का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण भंडार राजस्थान के नागौर जिले में डेगाना (Degana) की पहाड़ियों में था। डेगाना खान देश में टंगस्टन की एकमात्र प्रमुख उत्पादक खान थी, लेकिन अयस्क की गुणवत्ता में कमी और उत्पादन महंगा होने के कारण यह अब कई वर्षों से बंद है।
- अन्य क्षेत्र: राजस्थान के अलावा, पश्चिम बंगाल (बांकुरा जिला), आंध्र प्रदेश, और महाराष्ट्र में भी इसके कुछ छोटे भंडार पाए जाते हैं, लेकिन उनका व्यावसायिक रूप से खनन नहीं किया जाता है।
- वर्तमान में, भारत में टंगस्टन का घरेलू उत्पादन लगभग शून्य है।
- चुनौतियां और आयात:
- घरेलू उत्पादन न होने के कारण, भारत अपनी टंगस्टन की पूरी मांग चीन, वियतनाम और रूस जैसे देशों से आयात करके पूरी करता है।
- रक्षा और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए एक रणनीतिक खनिज होने के कारण, आयात पर यह अत्यधिक निर्भरता एक चिंता का विषय है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) देश में टंगस्टन के नए और आर्थिक रूप से व्यवहार्य भंडारों की खोज के लिए लगातार प्रयास कर रहा है ताकि इस रणनीतिक धातु पर विदेशी निर्भरता को कम किया जा सके।
लौह-युक्त (Non-ferrous) धात्विक खनिज
ताँबा (Copper)
ताँबा एक अलौह-युक्त (Non-ferrous) धात्विक खनिज है। यह मानव सभ्यता द्वारा उपयोग की जाने वाली पहली धातुओं में से एक है। अपने विशिष्ट गुणों के कारण यह आज के औद्योगिक और तकनीकी युग में एक अत्यंत महत्वपूर्ण धातु बना हुआ है।
ताँबे का महत्व और उपयोग:
ताँबा अपने दो प्रमुख गुणों – उत्कृष्ट विद्युत चालकता (excellent electrical conductivity) और उच्च तन्यता एवं अघातवर्धनीयता (high ductility and malleability) – के लिए जाना जाता है। इसका अर्थ है कि यह बिजली का बहुत अच्छा सुचालक है और इसे आसानी से खींचकर पतले तार और पीटकर पतली चादरें बनाई जा सकती हैं।
इसके प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं:
- विद्युत उद्योग (Electrical Industry): यह ताँबे का सबसे बड़ा उपयोग क्षेत्र है।
- बिजली के तार और केबल बनाने में।
- मोटर, ट्रांसफार्मर, और जनरेटर की वाइंडिंग में।
- इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग (Electronics Industry):
- कंप्यूटर और स्मार्टफोन के सर्किट बोर्ड (PCBs) में।
- हीट सिंक (जो प्रोसेसर को ठंडा रखते हैं) बनाने में।
- निर्माण उद्योग (Construction Industry): पानी की पाइपलाइन और छत की सामग्री के रूप में इसका उपयोग होता है।
- मिश्र धातु का निर्माण (Alloys): ताँबे को अन्य धातुओं के साथ मिलाकर कई महत्वपूर्ण मिश्र धातुएँ बनाई जाती हैं, जैसे:
- पीतल (Brass): ताँबा और जस्ता (Zinc) का मिश्रण।
- काँसा (Bronze): ताँबा और टिन (Tin) का मिश्रण।
- रासायनिक उद्योग: विभिन्न प्रकार के रसायन बनाने में इसका उपयोग होता है।
भारत में स्थिति और उत्पादन:
भारत में ताँबे के भंडार और उत्पादन, दोनों ही देश की मांग की तुलना में अपर्याप्त हैं। इस कारण भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ताँबे का आयात करता है।
प्रमुख उत्पादक राज्य और खदानें:
भारत में ताँबे का उत्पादन मुख्य रूप से तीन राज्यों में केंद्रित है:
- मध्य प्रदेश:
- यह भारत का सबसे बड़ा ताँबा उत्पादक राज्य है, जो देश के कुल उत्पादन का 50% से अधिक हिस्सा पैदा करता है।
- यहाँ के बालाघाट जिले में स्थित मलाजखंड (Malanjkhand) की खदान भारत की सबसे बड़ी ताँबा खदान है।
- राजस्थान:
- यह उत्पादन में दूसरे स्थान पर है।
- यहाँ की खेतड़ी ताँबा पट्टी (Khetri Copper Belt), जो झुंझुनूं और अलवर जिलों में फैली हुई है, ताँबा खनन के लिए प्राचीन काल से प्रसिद्ध है।
- झारखंड:
- यह देश का तीसरा प्रमुख उत्पादक राज्य है।
- यहाँ का सिंहभूम जिला ताँबा खनन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इस क्षेत्र में मोसाबनी, राखा, और घाटशिला प्रमुख खनन क्षेत्र हैं।
संक्षेप में, ताँबा भारत के लिए एक अनिवार्य औद्योगिक धातु है, लेकिन इसकी घरेलू उपलब्धता सीमित होने के कारण देश को अपनी मांग पूरी करने के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर रहना पड़ता है।
एल्युमिनियम (Aluminium)
एल्युमिनियम एक हल्की, मजबूत, और जंग-रोधी अलौह-युक्त धातु है। यह प्रकृति में स्वतंत्र रूप से (शुद्ध धातु के रूप में) नहीं पाया जाता है, बल्कि इसे इसके अयस्क बॉक्साइट (Bauxite) से निकाला जाता है। बॉक्साइट एक चिकनी मिट्टी जैसा पदार्थ होता है, जिसका रंग गुलाबी या लाल हो सकता है, और यही एल्युमिनियम का प्राथमिक स्रोत है।
संक्षेप में, बॉक्साइट अयस्क है, और एल्युमिनियम उससे निकाली गई धातु है।
एल्युमिनियम का महत्व और उपयोग:
एल्युमिनियम अपने अद्वितीय गुणों के कारण आज के समय में लोहे के बाद सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली धातुओं में से एक है।
- हल्कापन और मजबूती: यह स्टील की तुलना में बहुत हल्का होता है, लेकिन फिर भी काफी मजबूत होता है। इसी गुण के कारण इसका उपयोग हवाई जहाज, गाड़ियों (मेट्रो, बुलेट ट्रेन), और ऑटोमोबाइल के पुर्जे बनाने में किया जाता है, जिससे ईंधन की खपत कम होती है।
- उत्कृष्ट विद्युत चालकता: यह बिजली का बहुत अच्छा सुचालक होता है। ताँबे की तुलना में सस्ता और हल्का होने के कारण इसका उपयोग बिजली के ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन तारों (Power Lines) में बड़े पैमाने पर होता है।
- जंग प्रतिरोधक क्षमता (Corrosion Resistance): जब एल्युमिनियम हवा के संपर्क में आता है, तो इसकी सतह पर ऑक्साइड की एक पतली और मजबूत परत बन जाती है, जो इसे जंग लगने से बचाती है। इसी कारण इसका उपयोग बर्तन, पेय पदार्थों के कैन, दरवाजे, खिड़कियों के फ्रेम, और बिल्डिंग निर्माण में किया जाता है।
- ऊष्मा का अच्छा सुचालक: यह गर्मी का अच्छा सुचालक है, इसलिए इसका उपयोग खाना पकाने के बर्तनों और फॉयल पेपर बनाने में होता है।
- अत्यधिक पुनर्चक्रणीय (Highly Recyclable): एल्युमिनियम को बिना किसी गुणवत्ता में कमी के बार-बार रिसाइकिल किया जा सकता है। इसे रिसाइकिल करने में बॉक्साइट से नया एल्युमिनियम बनाने की तुलना में 95% कम ऊर्जा लगती है।
भारत में एल्युमिनियम (बॉक्साइट) का उत्पादन:
भारत बॉक्साइट के विशाल भंडार से संपन्न है और दुनिया के प्रमुख बॉक्साइट उत्पादक देशों में से एक है।
प्रमुख बॉक्साइट उत्पादक राज्य:
- ओडिशा:
- यह भारत का सबसे बड़ा बॉक्साइट उत्पादक राज्य है। देश के आधे से अधिक बॉक्साइट का भंडार और उत्पादन अकेले ओडिशा में होता है।
- यहाँ के कालाहांडी और कोरापुट जिले (पंचपटमाली की खदानें) प्रमुख उत्पादन केंद्र हैं।
- गुजरात: यह उत्पादन में दूसरे स्थान पर है, विशेषकर जामनगर क्षेत्र में।
- झारखंड: लोहरदगा जिले में बॉक्साइट की समृद्ध खदानें हैं।
- महाराष्ट्र: कोल्हापुर और रत्नागिरी में इसका उत्पादन होता है।
- छत्तीसगढ़: सरगुजा और कोरबा क्षेत्रों में इसके भंडार हैं।
भारत में प्रमुख एल्युमिनियम उत्पादक कंपनियों में नाल्को (NALCO – National Aluminium Company Limited) और हिंडाल्को (HINDALCO – Hindalco Industries) शामिल हैं, जो इन राज्यों से प्राप्त बॉक्साइट को रिफाइन करके एल्युमिनियम का उत्पादन करती हैं।
ii) अलौह-युक्त धात्विक खनिज (Non-Ferrous Minerals)
इनमें लोहे का अंश नहीं होता है, लेकिन ये इंजीनियरिंग और विद्युत जैसे कई महत्वपूर्ण उद्योगों के लिए आवश्यक हैं।
टिन (Tin)
टिन एक चांदी जैसी सफेद और नरम धातु है। यह अत्यधिक लचीला और अघातवर्धनीय होता है, यानी इसे आसानी से पतली चादरों और तारों में बदला जा सकता है। इसका एक प्रमुख गुण जंग-प्रतिरोधकता (corrosion resistance) है।
टिन का महत्व और उपयोग:
- टिन प्लेटिंग (कलाई करना): यह टिन का सबसे आम उपयोग है। स्टील या लोहे की चादरों पर टिन की एक पतली परत चढ़ाई जाती है ताकि उन्हें जंग लगने से बचाया जा सके।
- इस टिन-प्लेटेड स्टील का उपयोग खाद्य और पेय पदार्थों की पैकिंग के लिए कैन (Cans) और डिब्बे बनाने में किया जाता है, क्योंकि टिन गैर-विषैला होता है।
- मिश्र धातु बनाना (Alloys): टिन को अन्य धातुओं के साथ मिलाकर कई महत्वपूर्ण मिश्र धातुएँ बनाई जाती हैं:
- काँसा (Bronze): ताँबे के साथ टिन को मिलाकर बनाया जाता है, जो मूर्तियों, सिक्कों और बर्तनों के लिए उपयोग होता है।
- सोल्डर (Solder): टिन और सीसा (लेड) का मिश्रण, जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में टांका लगाने (धातुओं को जोड़ने) के लिए किया जाता है।
- रासायनिक उद्योग: टिन के यौगिकों का उपयोग टूथपेस्ट, पिगमेंट (रंग) और कीटनाशकों में किया जाता है।
भारत में टिन की स्थिति:
- भंडार और उत्पादन: भारत में टिन के भंडार बहुत ही दुर्लभ हैं। छत्तीसगढ़ भारत का एकमात्र टिन उत्पादक राज्य है।
- यहाँ के बस्तर जिले में टिन अयस्क, जिसे कैसिटेराइट (Cassiterite) कहा जाता है, के भंडार पाए जाते हैं और यहीं पर इसका एकमात्र व्यावसायिक उत्पादन होता है।
- आयात पर निर्भरता: घरेलू उत्पादन देश की मांग का एक बहुत छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाता है। इसलिए, भारत अपनी टिन की अधिकांश जरूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
सीसा (Lead)
सीसा (या लेड) एक भारी, नरम, और नीले-भूरे रंग की धातु है। यह अत्यधिक लचीला होता है और जंग का एक उत्कृष्ट प्रतिरोधी है। इसका घनत्व बहुत अधिक होता है। सीसा का मुख्य अयस्क गैलेना (Galena) है।
सीसा का महत्व और उपयोग:
- लेड-एसिड बैटरी (Lead-Acid Batteries): यह सीसा का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण उपयोग है। लगभग 80% सीसे का उपयोग गाड़ियों, ट्रकों और इन्वर्टर में इस्तेमाल होने वाली रिचार्जेबल लेड-एसिड बैटरियों के निर्माण में किया जाता है।
- विकिरण परिरक्षण (Radiation Shielding): सीसा का उच्च घनत्व इसे एक्स-रे और गामा किरणों जैसी हानिकारक विकिरणों को रोकने में बहुत प्रभावी बनाता है। इसी कारण इसका उपयोग एक्स-रे मशीनों, परमाणु रिएक्टरों और अस्पतालों में विकिरण-रोधी दीवारों, एप्रन और शीशे बनाने में होता है।
- मिश्र धातु बनाना: इसका उपयोग सोल्डर (टिन के साथ) और पीतल (Brass) में मजबूती बढ़ाने के लिए किया जाता है।
- केबल शीथिंग: भूमिगत बिजली और संचार केबलों को नमी और जंग से बचाने के लिए उन पर सीसे की परत चढ़ाई जाती है।
- गोला-बारूद: इसका उपयोग गोलियों और छर्रों के निर्माण में किया जाता है।
भारत में सीसा की स्थिति:
- भंडार और उत्पादन: सीसे का अयस्क गैलेना अक्सर जिंक (जस्ता) के अयस्क स्फेलेराइट (Sphalerite) के साथ पाया जाता है। इसलिए, इन दोनों धातुओं का खनन एक साथ होता है।
- राजस्थान भारत में सीसा और जस्ता का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। यहाँ के उदयपुर (जावर की खदानें), भीलवाड़ा (रामपुरा-अगुचा), और राजसमंद जिले प्रमुख उत्पादन केंद्र हैं। जावर की खदानें सीसा और जस्ता खनन के लिए ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध हैं।
- आयात: हालांकि भारत में उत्पादन होता है, फिर भी मांग को पूरा करने के लिए सीसे का भी आयात किया जाता है। पुनर्चक्रण (Recycling), विशेष रूप से पुरानी बैटरियों से, भारत में सीसे की आपूर्ति का एक प्रमुख स्रोत है।
टिन (Tin)
टिन एक चांदी जैसी सफेद और नरम धातु है। यह अत्यधिक लचीला और अघातवर्धनीय होता है, यानी इसे आसानी से पतली चादरों और तारों में बदला जा सकता है। इसका एक प्रमुख गुण जंग-प्रतिरोधकता (corrosion resistance) है।
टिन का महत्व और उपयोग:
- टिन प्लेटिंग (कलाई करना): यह टिन का सबसे आम उपयोग है। स्टील या लोहे की चादरों पर टिन की एक पतली परत चढ़ाई जाती है ताकि उन्हें जंग लगने से बचाया जा सके।
- इस टिन-प्लेटेड स्टील का उपयोग खाद्य और पेय पदार्थों की पैकिंग के लिए कैन (Cans) और डिब्बे बनाने में किया जाता है, क्योंकि टिन गैर-विषैला होता है।
- मिश्र धातु बनाना (Alloys): टिन को अन्य धातुओं के साथ मिलाकर कई महत्वपूर्ण मिश्र धातुएँ बनाई जाती हैं:
- काँसा (Bronze): ताँबे के साथ टिन को मिलाकर बनाया जाता है, जो मूर्तियों, सिक्कों और बर्तनों के लिए उपयोग होता है।
- सोल्डर (Solder): टिन और सीसा (लेड) का मिश्रण, जिसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में टांका लगाने (धातुओं को जोड़ने) के लिए किया जाता है।
- रासायनिक उद्योग: टिन के यौगिकों का उपयोग टूथपेस्ट, पिगमेंट (रंग) और कीटनाशकों में किया जाता है।
भारत में टिन की स्थिति:
- भंडार और उत्पादन: भारत में टिन के भंडार बहुत ही दुर्लभ हैं। छत्तीसगढ़ भारत का एकमात्र टिन उत्पादक राज्य है।
- यहाँ के बस्तर जिले में टिन अयस्क, जिसे कैसिटेराइट (Cassiterite) कहा जाता है, के भंडार पाए जाते हैं और यहीं पर इसका एकमात्र व्यावसायिक उत्पादन होता है।
- आयात पर निर्भरता: घरेलू उत्पादन देश की मांग का एक बहुत छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाता है। इसलिए, भारत अपनी टिन की अधिकांश जरूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है।
चाँदी (Silver)
चाँदी एक बहुमूल्य, चमकदार, और सफेद धातु है। यह ऊष्मा और विद्युत की सर्वश्रेष्ठ सुचालक (best conductor) है, यहाँ तक कि ताँबे से भी बेहतर। यह अत्यधिक लचीली और अघातवर्धनीय होती है, जिसके कारण इसे आसानी से आभूषणों और अन्य उत्पादों में ढाला जा सकता है।
चाँदी का महत्व और उपयोग:
- आभूषण और सजावटी वस्तुएं: यह चाँदी का सबसे पारंपरिक और प्रसिद्ध उपयोग है। इसका उपयोग गहने, बर्तन और सजावटी सामान बनाने में किया जाता है।
- निवेश: सोने की तरह, चाँदी को भी सिक्कों और सिल्लियों (bars) के रूप में एक सुरक्षित निवेश माना जाता है।
- औद्योगिक उपयोग: यह चाँदी का एक बहुत बड़ा और बढ़ता हुआ क्षेत्र है:
- इलेक्ट्रॉनिक्स: इसकी उत्कृष्ट चालकता के कारण इसका उपयोग बिजली के स्विच, सर्किट बोर्ड (PCBs) और अन्य इलेक्ट्रॉनिक घटकों में किया जाता है।
- सौर ऊर्जा: सोलर पैनलों में फोटोवोल्टिक कोशिकाओं पर चाँदी का उपयोग बिजली को कुशलतापूर्वक संचालित करने के लिए किया जाता है।
- चिकित्सा: चाँदी में जीवाणुरोधी (antibacterial) गुण होते हैं, जिस कारण इसका उपयोग चिकित्सा उपकरणों, पट्टियों और क्रीम में किया जाता है।
- फोटोग्राफी: पारंपरिक फोटोग्राफिक फिल्म और पेपर बनाने में सिल्वर नाइट्रेट का उपयोग होता था।
भारत में चाँदी की स्थिति:
- उत्पादन: भारत में चाँदी का खनन सीधे तौर पर नहीं होता है। यह मुख्य रूप से सीसा (Lead) और जस्ता (Zinc) के अयस्कों से एक सह-उत्पाद (by-product) के रूप में प्राप्त की जाती है।
- प्रमुख उत्पादक राज्य: चूँकि यह सीसा-जस्ता के साथ मिलती है, इसका लगभग पूरा उत्पादन राजस्थान से होता है।
- उदयपुर की जावर खदानें (Zawar Mines) चाँदी उत्पादन का प्रमुख केंद्र हैं।
- आयात पर निर्भरता: भारत चाँदी का एक बहुत बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन घरेलू उत्पादन मांग की तुलना में बहुत कम है। इसलिए, भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए दुनिया के सबसे बड़े चाँदी आयातकों में से एक है।
प्लैटिनम (Platinum)
प्लैटिनम एक अत्यंत दुर्लभ, भारी, और रासायनिक रूप से लगभग अक्रिय (non-reactive) बहुमूल्य धातु है। यह चांदी जैसी सफेद होती है, लेकिन उससे कहीं अधिक कठोर, सघन और महंगी होती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आसानी से धूमिल नहीं होती और न ही इस पर जंग लगता है।
प्लैटिनम का महत्व और उपयोग:
- उत्प्रेरक परिवर्तक (Catalytic Converters): यह प्लैटिनम का सबसे बड़ा उपयोग है। इसे गाड़ियों के एग्जॉस्ट सिस्टम में लगाया जाता है, जहाँ यह एक उत्प्रेरक (catalyst) के रूप में काम करता है और इंजन से निकलने वाले हानिकारक प्रदूषकों (जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड) को कम हानिकारक गैसों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड) में बदल देता है।
- आभूषण: इसकी दुर्लभता, शुद्धता, और स्थायित्व के कारण, इसका उपयोग प्रीमियम और उच्च-स्तरीय आभूषण बनाने में किया जाता है।
- निवेश: सोने और चाँदी की तरह, प्लैटिनम में भी सिक्कों और बार के रूप में निवेश किया जाता है।
- औद्योगिक और चिकित्सा उपयोग: इसके उच्च गलनांक और रासायनिक स्थिरता के कारण इसका उपयोग प्रयोगशाला के उपकरणों, चिकित्सा उपकरणों (जैसे पेसमेकर) और कुछ कैंसर-रोधी दवाओं में भी किया जाता है।
भारत में प्लैटिनम की स्थिति:
- उत्पादन और भंडार: भारत में प्लैटिनम का व्यावसायिक उत्पादन लगभग शून्य है।
- इसके बहुत छोटे भंडार ओडिशा में निकेल और क्रोमाइट अयस्कों के साथ पाए जाते हैं, लेकिन उनका बड़े पैमाने पर खनन नहीं किया जाता है।
- पूर्ण आयात निर्भरता: घरेलू उत्पादन न होने के कारण, भारत अपनी प्लैटिनम की शत-प्रतिशत जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है।
ज़िंक / जस्ता (Zinc)
जिंक एक नीले-सफेद रंग की धातु है। इसका सबसे महत्वपूर्ण गुण लोहे और स्टील को जंग लगने से बचाने की क्षमता है।
जिंक का महत्व और उपयोग:
- गैल्वेनाइजेशन (जस्तीकरण): यह जिंक का सबसे प्रमुख उपयोग है। इसमें लोहे या स्टील की वस्तुओं पर जिंक की एक पतली परत चढ़ाई जाती है, जो उन्हें हवा और नमी के संपर्क में आने से बचाती है और जंग लगने नहीं देती। इसका उपयोग पाइप, चादरें (sheets), तार और ऑटोमोबाइल के पुर्जे बनाने में होता है।
- मिश्र धातु बनाना:
- पीतल (Brass): यह ताँबे और जिंक का एक महत्वपूर्ण मिश्र धातु है।
- डाई-कास्टिंग (Die-Casting): जिंक का उपयोग डाई-कास्टिंग द्वारा जटिल आकार के पुर्जे बनाने में किया जाता है, खासकर ऑटोमोबाइल उद्योग में।
- बैटरी: ड्राई-सेल बैटरियों का बाहरी खोल (casing) जिंक का बना होता है।
- रसायन: जिंक ऑक्साइड का उपयोग रबर, सिरेमिक, पेंट, मलहम और सनस्क्रीन में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
भारत में जिंक की स्थिति:
- उत्पादन और भंडार: सीसा की तरह, भारत जिंक के अयस्क और उत्पादन के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर है।
- प्रमुख उत्पादक राज्य: राजस्थान भारत का सबसे बड़ा जिंक उत्पादक है, जहाँ देश के अधिकांश भंडार और उत्पादन केंद्रित हैं।
- भीलवाड़ा की रामपुरा-अगुचा खान (Rampura-Agucha Mine) दुनिया की सबसे बड़ी जिंक खानों में से एक है।
- उदयपुर की जावर खदानें भी जिंक उत्पादन का एक प्रमुख केंद्र हैं।
2. अधात्विक खनिज (Non-Metallic Minerals)
इन खनिजों में धातुएँ नहीं होती हैं।
हीरा (Diamond)
हीरा कार्बन का एक शुद्ध और सबसे कठोर प्राकृतिक रूप है। यह एक अत्यंत बहुमूल्य रत्न है, जो अपनी असाधारण कठोरता, अद्वितीय चमक (brilliance) और दुर्लभता के लिए जाना जाता है।
हीरे का महत्व और उपयोग:
हीरे के दो मुख्य उपयोग क्षेत्र हैं – एक रत्न के रूप में और दूसरा एक औद्योगिक पदार्थ के रूप में।
- आभूषण (Gemstone):
- यह हीरे का सबसे प्रसिद्ध उपयोग है। इसकी अद्वितीय चमक, कटाई के बाद प्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता, और स्थायित्व इसे दुनिया के सबसे कीमती रत्नों में से एक बनाते हैं।
- इसका उपयोग अंगूठियों, हार, और अन्य आभूषणों में किया जाता है और इसे अक्सर प्रेम, शुद्धता और विलासिता का प्रतीक माना जाता है।
- औद्योगिक उपयोग (Industrial Use):
- हीरा दुनिया का सबसे कठोर ज्ञात प्राकृतिक पदार्थ है। इस गुण के कारण, इसका उपयोग उन जगहों पर किया जाता है जहाँ अत्यधिक सटीकता और मजबूती की आवश्यकता होती है।
- काटने और पीसने के औजार: इसका उपयोग कांच काटने, पत्थर की ड्रिलिंग, और अन्य कठोर धातुओं को काटने और पॉलिश करने वाले औजारों की नोक (tip) बनाने में होता है।
- खनन और तेल की खोज: तेल की खोज के लिए चट्टानों में ड्रिल करने वाले विशाल बरमों के किनारों पर हीरे लगे होते हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक्स: यह ऊष्मा का अच्छा सुचालक है, इसलिए इसका उपयोग उच्च-शक्ति वाले लेजर और प्रोसेसर को ठंडा रखने के लिए हीट सिंक के रूप में भी किया जाता है।
भारत में हीरे की स्थिति:
- ऐतिहासिक महत्व: भारत ऐतिहासिक रूप से दुनिया का पहला और सबसे महत्वपूर्ण हीरा उत्पादक था। प्रसिद्ध कोह-इ-नूर हीरा भी भारत की गोलकोंडा खानों से ही निकला था।
- वर्तमान उत्पादन: आज, भारत में हीरे का उत्पादन बहुत सीमित है।
- मध्य प्रदेश भारत का एकमात्र हीरा उत्पादक राज्य है। यहाँ के पन्ना जिले में हीरे की खदानें स्थित हैं, जो देश का लगभग पूरा हीरा उत्पादन करती हैं।
- कटाई और पॉलिशिंग का केंद्र: भले ही भारत कच्चे हीरे का बड़ा उत्पादक नहीं है, लेकिन यह दुनिया का सबसे बड़ा हीरा कटाई और पॉलिशिंग केंद्र है। दुनिया के 10 में से 9 से अधिक हीरों को भारत के सूरत और मुंबई जैसे शहरों में तराशा और पॉलिश किया जाता है, जिसके बाद उन्हें दुनिया भर में निर्यात किया जाता है।
अभ्रक (Mica)
अभ्रक एक सिलिकेट खनिज है जो अपनी अनूठी विशेषता के लिए जाना जाता है – इसे आसानी से पतली, लचीली, और पारदर्शी परतों या चादरों में विभाजित किया जा सकता है। यह ऊष्मा और बिजली का एक उत्कृष्ट कुचालक (insulator) है।
अभ्रक का महत्व और उपयोग:
अपने अद्वितीय गुणों के कारण, अभ्रक कई उद्योगों के लिए एक अनिवार्य खनिज है।
- विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग:
- यह अभ्रक का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग है। बिजली का कुचालक होने के कारण, इसका उपयोग कैपेसिटर, इंसुलेटर, और अन्य इलेक्ट्रॉनिक घटकों में किया जाता है, जहाँ उच्च वोल्टेज और तापमान से सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
- सौंदर्य प्रसाधन (Cosmetics):
- पिसे हुए अभ्रक का उपयोग सौंदर्य प्रसाधनों जैसे लिपस्टिक, आई-शैडो, नेल पॉलिश, और फाउंडेशन में चमक और झिलमिलाहट (shimmer) पैदा करने के लिए किया जाता है।
- पेंट और कोटिंग्स:
- पेंट में अभ्रक मिलाने से उसकी मजबूती बढ़ती है, नमी से बचाव होता है, और एक चमकदार फिनिश मिलती है।
- निर्माण उद्योग:
- इसका उपयोग सीमेंट, डामर और जिप्सम बोर्ड (जैसे ड्राईवॉल) में भराव के रूप में किया जाता है ताकि दरारों को रोका जा सके और मजबूती बढ़ाई जा सके।
भारत में अभ्रक की स्थिति:
- विश्व में स्थान: भारत ऐतिहासिक रूप से शीट अभ्रक (sheet mica) का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक रहा है।
- प्रमुख उत्पादक राज्य और पेटियाँ (Belts): भारत में अभ्रक के विशाल भंडार तीन प्रमुख पेटियों में पाए जाते हैं:
- झारखंड-बिहार पेटी: झारखंड का कोडरमा जिला, जिसे कभी “भारत की अभ्रक राजधानी” कहा जाता था, इस पेटी का केंद्र है। यह बिहार के गया और नवादा जिलों तक फैली हुई है। यहाँ उच्च गुणवत्ता वाला रूबी अभ्रक पाया जाता है।
- आंध्र प्रदेश: यहाँ का नेल्लोर जिला अभ्रक उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
- राजस्थान: अजमेर और भीलवाड़ा जिलों के आसपास अभ्रक का उत्पादन होता है।
हालांकि, सिंथेटिक विकल्पों के आने और कुछ खनन संबंधी चिंताओं के कारण हाल के वर्षों में शीट अभ्रक के उत्पादन में कुछ कमी आई है, फिर भी भारत अभ्रक के प्रमुख उत्पादकों में से एक बना हुआ है।
चूना पत्थर (Limestone)
- यह क्या है?: यह एक अवसादी चट्टान (Sedimentary Rock) है। इसका निर्माण मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) से होता है, जो लाखों वर्षों तक समुद्र या झीलों के तल पर समुद्री जीवों (जैसे सीप, घोंघे, और मूंगा) के कंकालों और अवशेषों के जमा होने और दबाव से ठोस होने के कारण बनता है।
- गुण और विशेषताएँ:
- यह संगमरमर और ग्रेनाइट की तुलना में एक नरम पत्थर होता है।
- यह अक्सर छिद्रपूर्ण (porous) होता है, यानी इसमें पानी आसानी से रिस सकता है।
- इसमें अक्सर समुद्री जीवों के जीवाश्म (Fossils) पाए जाते हैं।
- इसका रंग आमतौर पर सफेद, क्रीम या हल्का भूरा होता है।
- प्रमुख उपयोग:
- सीमेंट उद्योग: यह चूना पत्थर का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण उपयोग है। यह सीमेंट बनाने का आधारभूत कच्चा माल है।
- इस्पात उद्योग: इसका उपयोग ब्लास्ट फर्नेस में लोहे को गलाने के लिए एक फ्लक्स (flux) के रूप में किया जाता है ताकि अशुद्धियों को हटाया जा सके।
- निर्माण सामग्री: इसका उपयोग इमारत बनाने के लिए पत्थरों और फर्श के रूप में किया जाता है, हालांकि यह ग्रेनाइट जितना टिकाऊ नहीं होता।
- रासायनिक उद्योग: इसका उपयोग सोडा ऐश, कास्टिक सोडा, और ब्लीचिंग पाउडर बनाने में होता है।
- भारत में प्रमुख क्षेत्र: भारत में चूना पत्थर का भंडार व्यापक रूप से फैला हुआ है। प्रमुख उत्पादक राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, और कर्नाटक हैं।
संगमरमर (Marble)
- यह क्या है?: यह एक कायांतरित चट्टान (Metamorphic Rock) है। इसका निर्माण तब होता है जब चूना पत्थर पृथ्वी के अंदर अत्यधिक गर्मी और दबाव के संपर्क में आता है, जिससे उसके क्रिस्टल फिर से संगठित हो जाते हैं और वह और अधिक कठोर और सघन बन जाता है। संक्षेप में, संगमरमर चूना पत्थर का ही बदला हुआ रूप है।
- गुण और विशेषताएँ:
- यह अपनी सुंदरता, चिकनी सतह और चमकदार पॉलिश के लिए प्रसिद्ध है।
- यह चूना पत्थर से अधिक कठोर और कम छिद्रपूर्ण होता है।
- इसमें अक्सर आकर्षक रंग और नसें/धारियाँ (Veins) होती हैं, जो इसे एक अनूठी पहचान देती हैं।
- यह विभिन्न रंगों में आता है, जैसे सफेद, गुलाबी, हरा, काला और पीला।
- प्रमुख उपयोग:
- इमारतें और स्मारक: इसका उपयोग मुख्य रूप से प्रतिष्ठित इमारतों, मंदिरों और स्मारकों के निर्माण में किया जाता है। आगरा का ताजमहल विश्व प्रसिद्ध मकराना संगमरमर से ही बना है।
- फर्श और दीवारें: इसका उपयोग घरों, होटलों और कार्यालयों में फर्श और दीवारों पर सजावटी टाइल्स के रूप में किया जाता है।
- मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ: इसकी चिकनी बनावट इसे मूर्तिकला के लिए एक उत्कृष्ट पत्थर बनाती है।
- काउंटरटॉप और सजावटी वस्तुएं: इसका उपयोग किचन काउंटरटॉप, टेबल टॉप और अन्य सजावटी सामान बनाने में भी होता है।
- भारत में प्रमुख क्षेत्र: राजस्थान भारत का सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध संगमरमर उत्पादक राज्य है। मकराना, किशनगढ़, राजसमंद, और उदयपुर इसके प्रमुख केंद्र हैं।
ग्रेनाइट (Granite)
- यह क्या है?: यह एक आग्नेय चट्टान (Igneous Rock) है। इसका निर्माण पृथ्वी की सतह के नीचे पिघले हुए मैग्मा के धीरे-धीरे ठंडा होकर ठोस होने से होता है। यह मुख्य रूप से क्वार्ट्ज (Quartz) और फेल्डस्पार (Feldspar) जैसे खनिजों के कणों से मिलकर बना होता है।
- गुण और विशेषताएँ:
- यह एक अत्यंत कठोर, मजबूत और टिकाऊ पत्थर है।
- यह मौसम, खरोंच और अम्ल के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है।
- इसकी सतह पर विभिन्न खनिजों के छोटे-छोटे दाने या क्रिस्टल स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
- यह काले, गुलाबी, भूरे, और सफेद जैसे कई आकर्षक रंगों में उपलब्ध होता है।
- प्रमुख उपयोग:
- निर्माण कार्य: इसकी मजबूती के कारण इसका उपयोग इमारतों की नींव, बाहरी दीवारों और पुलों के निर्माण में किया जाता है।
- रसोई के काउंटरटॉप (Kitchen Countertops): खरोंच और गर्मी प्रतिरोधी होने के कारण यह रसोई के काउंटरटॉप के लिए सबसे लोकप्रिय विकल्पों में से एक है।
- फर्श (Flooring): इसका उपयोग उन जगहों पर फर्श के लिए किया जाता है जहाँ भारी आवाजाही होती है, जैसे हवाई अड्डे, शॉपिंग मॉल और व्यावसायिक इमारतें।
- स्मारक और कब्रिस्तान: इसकी स्थायित्व के कारण इसका उपयोग स्मारक, मकबरे और समाधि-शिला (headstones) बनाने में किया जाता है।
- भारत में प्रमुख क्षेत्र: भारत में ग्रेनाइट का अधिकांश उत्पादन और भंडार दक्षिण भारत के राज्यों में केंद्रित है, जो दक्कन के पठार का हिस्सा हैं। प्रमुख राज्य कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, और तेलंगाना हैं।
जिप्सम (Gypsum)
- यह क्या है?: जिप्सम एक नरम सल्फेट खनिज है जो मुख्य रूप से कैल्शियम सल्फेट डाइहाइड्रेट (CaSO₄·2H₂O) से बना होता है। यह एक अवसादी चट्टान है, जो अक्सर पानी के वाष्पीकरण से बनने वाली झीलों और समुद्रों के तलछट में पाई जाती है।
- गुण और विशेषताएँ:
- यह बहुत नरम होता है (इसे नाखून से खुरचा जा सकता है)।
- इसका रंग आमतौर पर सफेद, धूसर या पारदर्शी होता है।
- जब जिप्सम को गर्म किया जाता है, तो यह अपने पानी के अणुओं को खो देता है और एक महीन सफेद पाउडर में बदल जाता है, जिसे प्लास्टर ऑफ पेरिस (Plaster of Paris – POP) कहते हैं।
- प्रमुख उपयोग:
- सीमेंट उद्योग: यह जिप्सम का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग है। इसे सीमेंट के क्लिंकर में मिलाकर पीसा जाता है ताकि सीमेंट के जमने की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सके। बिना जिप्सम के सीमेंट बहुत जल्दी जम जाएगा।
- प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP): इसका उपयोग दीवारों की सतह को चिकना करने (पुट्टी), सजावटी डिजाइन (छत आदि) बनाने, मूर्तियाँ बनाने और टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने के लिए प्लास्टर चढ़ाने में किया जाता है।
- कृषि: इसे भूमि सुधारक के रूप में क्षारीय या खारी मिट्टी में मिलाया जाता है ताकि मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हो सके।
- अन्य उपयोग: इसका उपयोग वॉल-बोर्ड या ड्राईवॉल बनाने में और कुछ खाद्य उत्पादों में एक योजक के रूप में भी होता है।
- भारत में प्रमुख क्षेत्र: राजस्थान भारत का सबसे बड़ा जिप्सम उत्पादक राज्य है, जहाँ देश का लगभग 90% से अधिक जिप्सम का उत्पादन होता है। बीकानेर, जोधपुर, नागौर और जैसलमेर इसके प्रमुख उत्पादक जिले हैं। इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु और गुजरात में भी इसके भंडार हैं।
गंधक / सल्फर (Sulphur)
- यह क्या है?: गंधक (सल्फर) एक अधात्विक तत्व है। यह प्रकृति में अपने शुद्ध रूप में पाया जाता है (आमतौर पर ज्वालामुखी क्षेत्रों के पास) और सल्फाइड और सल्फेट खनिजों के रूप में भी मौजूद होता है। आज के समय में, अधिकांश सल्फर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के शोधन के दौरान एक सह-उत्पाद (by-product) के रूप में प्राप्त किया जाता है।
- गुण और विशेषताएँ:
- यह एक चमकदार पीले रंग का ठोस पदार्थ होता है।
- इसमें एक विशिष्ट गंध होती है।
- प्रमुख उपयोग:
- सल्फ्यूरिक एसिड का उत्पादन: गंधक का लगभग 90% उपयोग सल्फ्यूरिक एसिड (H₂SO₄) बनाने में किया जाता है, जिसे “रसायनों का राजा” कहा जाता है।
- उर्वरक उद्योग: सल्फ्यूरिक एसिड का उपयोग फॉस्फेट उर्वरकों (जैसे सुपरफॉस्फेट) और अमोनियम सल्फेट बनाने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। यह इसका सबसे बड़ा उपयोग है।
- अन्य उपयोग: इसका उपयोग कीटनाशक, माचिस, बारूद, रबर के वल्कनीकरण (रबर को कठोर बनाने की प्रक्रिया) और डिटर्जेंट बनाने में किया जाता है।
- भारत में स्थिति: भारत में प्राकृतिक गंधक के भंडार लगभग न के बराबर हैं। भारत अपनी आवश्यकता को मुख्य रूप से पेट्रोलियम रिफाइनरियों से सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त करके और बाकी आयात करके पूरा करता है।
पाइराइट (Pyrite)
- यह क्या है?: पाइराइट एक आयरन सल्फाइड (FeS₂) खनिज है। अपने पीले धात्विक चमक के कारण यह दिखने में सोने जैसा लगता है, इसीलिए इसे “मूर्खों का सोना” (Fool’s Gold) भी कहा जाता है।
- गुण और विशेषताएँ:
- रंग पीला-सुनहरा, चमक धातु जैसी।
- यह सोने से अधिक कठोर लेकिन भंगुर होता है।
- प्रमुख उपयोग:
- सल्फ्यूरिक एसिड का उत्पादन: पाइराइट का मुख्य व्यावसायिक उपयोग गंधक (सल्फर) के स्रोत के रूप में होता है। इसे भूनकर सल्फर डाइऑक्साइड गैस प्राप्त की जाती है, जिससे सल्फ्यूरिक एसिड बनाया जाता है।
- लौह अयस्क के रूप में उपयोग नहीं: इसमें सल्फर की मौजूदगी के कारण, इसे आमतौर पर लोहे के स्रोत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाता है, क्योंकि सल्फर स्टील की गुणवत्ता को खराब कर देता है।
- भारत में स्थिति: भारत में पाइराइट का अच्छा भंडार है। बिहार का रोहतास जिला (अमझोर क्षेत्र) पाइराइट के लिए प्रसिद्ध है।
एस्बेस्टस (Asbestos)
- यह क्या है?: एस्बेस्टस प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रेशेदार सिलिकेट खनिजों का एक समूह है। इसके रेशे बहुत मजबूत, लचीले और आग, गर्मी तथा बिजली के प्रतिरोधी होते हैं।
- गुण और विशेषताएँ:
- अत्यंत खतरनाक: यह ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि एस्बेस्टस एक खतरनाक खनिज है। इसके महीन रेशे सांस के साथ फेफड़ों में जाकर मेसोथेलियोमा और एस्बेस्टोसिस जैसे जानलेवा कैंसर का कारण बन सकते हैं।
- गुण: यह ऊष्मा और बिजली का कुचालक है, और इसमें आग न पकड़ने का गुण होता है।
- प्रमुख उपयोग (अब प्रतिबंधित/विनियमित):
- अपने गुणों के कारण, इसका उपयोग अतीत में बहुत बड़े पैमाने पर होता था, जैसे:
- निर्माण: सीमेंट की नालीदार चादरें (छत के लिए), पाइप, और इन्सुलेशन सामग्री बनाने में।
- ऑटोमोबाइल: ब्रेक लाइनिंग और क्लच पैड बनाने में।
- अन्य: अग्निरोधी कपड़े और फर्श की टाइल्स बनाने में।
- वर्तमान स्थिति: इसके गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों के कारण, दुनिया के अधिकांश देशों ने एस्बेस्टस के खनन और उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है या इसे कड़ाई से नियंत्रित किया है।
- भारत में स्थिति: भारत में मुख्य रूप से क्रिइसोटाइल (सफेद एस्बेस्टस) प्रकार का खनन किया जाता है। राजस्थान और आंध्र प्रदेश इसके प्रमुख उत्पादक राज्य रहे हैं। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण भारत में भी इसके उपयोग को लेकर कड़े नियम और विवाद हैं।
3. ऊर्जा खनिज (Energy Minerals)
ये खनिज ऊर्जा या शक्ति प्रदान करते हैं, जिनका उपयोग उद्योगों, परिवहन और घरेलू जरूरतों के लिए किया जाता है।
- कोयला (Coal): यह भारत में ऊर्जा का सबसे प्रमुख स्रोत है और इसका उपयोग मुख्य रूप से ताप विद्युत उत्पादन और उद्योगों में किया जाता है। इसे “काला सोना” भी कहते हैं।
- प्रमुख उत्पादक राज्य: झारखंड (झरिया, बोकारो), ओडिशा, छत्तीसगढ़, और पश्चिम बंगाल (रानीगंज)।
- पेट्रोलियम (Petroleum): इसे “तरल सोना” भी कहा जाता है। यह परिवहन, उद्योगों और विभिन्न उत्पादों (जैसे प्लास्टिक, स्नेहक) के लिए ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है।
- प्रमुख उत्पादक क्षेत्र: मुंबई हाई (अपतटीय क्षेत्र जो देश का सबसे बड़ा उत्पादक है), गुजरात (अंकलेश्वर), और असम (डिग्बोई, नाहरकटिया)।
- प्राकृतिक गैस (Natural Gas): यह एक स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है। इसका उपयोग बिजली उत्पादन, उद्योगों और शहरी गैस वितरण (सीएनजी) में किया जाता है।
- प्रमुख उत्पादक क्षेत्र: कृष्णा-गोदावरी बेसिन, मुंबई हाई, और खंभात की खाड़ी।
- यूरेनियम और थोरियम (Uranium and Thorium): ये आणविक या परमाणु ऊर्जा के स्रोत हैं।
- प्रमुख उत्पादक क्षेत्र: यूरेनियम के लिए झारखंड और आंध्र प्रदेश; थोरियम के लिए केरल के तटीय रेत।
खनिज संसाधनों का संरक्षण
खनिज अनवीकरणीय संसाधन हैं, यानी इन्हें बनने में लाखों वर्ष लगते हैं और इनका भंडार सीमित है। इसलिए, इनका विवेकपूर्ण और योजनाबद्ध तरीके से उपयोग करना तथा पुनर्चक्रण (recycling) जैसी तकनीकों को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
घ) ऊर्जा संसाधन (Energy Resources)
- परंपरागत ऊर्जा: इसमें कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस शामिल हैं, जो आज भी ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं।
- नवीकरणीय (अक्षय) ऊर्जा: भारत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जलविद्युत ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है।
- सौर ऊर्जा: भारत की भौगोलिक स्थिति सौर ऊर्जा के लिए बहुत अनुकूल है।
- पवन ऊर्जा: गुजरात, तमिलनाडु और राजस्थान जैसे राज्यों में पवन चक्कियों से ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है।
2. मानव संसाधन (Human Resources)
किसी भी देश का सबसे महत्वपूर्ण संसाधन वहाँ के लोग होते हैं। भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, और यहाँ की एक बड़ी आबादी युवा है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend): भारत में कार्यशील आयु (15-64 वर्ष) की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा है। यदि इस युवा आबादी को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल प्रदान किया जाए, तो यह देश के आर्थिक विकास में एक शक्तिशाली इंजन की भूमिका निभा सकती है।
- कौशल और ज्ञान: भारतीय डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर पेशेवर पूरी दुनिया में अपनी योग्यता के लिए जाने जाते हैं।
3. मानव-निर्मित संसाधन (Man-made Resources)
ये वे संसाधन हैं जिन्हें मनुष्यों ने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके अपनी आवश्यकताओं के लिए बनाया है।
- बुनियादी ढाँचा: सड़कें, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे और संचार नेटवर्क देश के विकास के लिए आवश्यक हैं।
- प्रौद्योगिकी और मशीनरी: उद्योग और कृषि के विकास के लिए प्रौद्योगिकी एक महत्वपूर्ण संसाधन है।
- सामाजिक और राजनीतिक संस्थाएं: एक स्थिर सरकार, कानून व्यवस्था और शिक्षा प्रणाली भी देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण संसाधन हैं।
निष्कर्ष
भारत संसाधनों से संपन्न देश है, लेकिन इन संसाधनों के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जैसे असमान वितरण, अत्यधिक दोहन, और प्रदूषण। भविष्य के विकास के लिए इन बहुमूल्य संसाधनों का सतत (Sustainable) तरीके से संरक्षण और प्रबंधन करना अत्यंत आवश्यक है।
भारत की प्रमुख खनिज पेटियाँ (Major Mineral Belts of India)
भारत में खनिजों का वितरण बहुत असमान है। अधिकांश खनिज पुराने पठारी चट्टानों में केंद्रित हैं, जो विशिष्ट क्षेत्रों या ‘पेटियों’ में पाए जाते हैं। इन खनिज-समृद्ध क्षेत्रों को खनिज पेटी कहा जाता है। ये पेटियाँ अपनी विशिष्ट भूवैज्ञानिक संरचना के कारण विशेष प्रकार के खनिजों के लिए जानी जाती हैं।
भारत की प्रमुख खनिज पेटियाँ निम्नलिखित हैं:
1. उत्तर-पूर्वी पठारी पेटी (The North-Eastern Plateau Belt)
यह भारत की सबसे समृद्ध खनिज पेटी है और इसे “भारत का खनिज हृदय-स्थल” (Mineral Heartland of India) भी कहा जाता है।
- क्षेत्र: इस पेटी के अंतर्गत छोटानागपुर का पठार (झारखंड), ओडिशा का पठार, पश्चिम बंगाल, और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्से आते हैं।
- प्रमुख खनिज:
- ऊर्जा खनिज: इस क्षेत्र में भारत का 90% से अधिक कोयला भंडार है (गोंडवाना कोयला)।
- धात्विक खनिज (लौह): यहाँ उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क, मैंगनीज, और क्रोमाइट के विशाल भंडार हैं।
- धात्विक खनिज (अलौह): यह बॉक्साइट का सबसे बड़ा क्षेत्र है। इसके अलावा, यहाँ ताँबा, अभ्रक (Mica), और यूरेनियम (जादूगोड़ा की खदानें) भी पाए जाते हैं।
- विशेषता: यह पेटी देश के लौह-इस्पात, एल्युमिनियम और भारी इंजीनियरिंग उद्योगों का केंद्र है क्योंकि यहाँ आवश्यक कच्चे माल और ऊर्जा (कोयला) दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
2. मध्य पेटी (The Central Belt)
यह पेटी उत्तर-पूर्वी पेटी के पश्चिम में फैली हुई है और भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खनिज पेटी मानी जाती है।
- क्षेत्र: इस पेटी में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, और पूर्वी महाराष्ट्र के हिस्से शामिल हैं।
- प्रमुख खनिज:
- मैंगनीज: मध्य प्रदेश के बालाघाट और महाराष्ट्र के भंडारा क्षेत्र में मैंगनीज का विशाल भंडार है।
- बॉक्साइट: इस क्षेत्र में भी बॉक्साइट का अच्छा भंडार है।
- चूना पत्थर: यह क्षेत्र सीमेंट उद्योग के लिए उच्च गुणवत्ता वाले चूना पत्थर के लिए प्रसिद्ध है।
- अन्य खनिज: यहाँ ताँबा (मलाजखंड), कोयला, और हीरा (पन्ना) भी पाया जाता है।
3. दक्षिणी पेटी (The Southern Belt)
यह पेटी मुख्य रूप से कर्नाटक के पठार और आसपास के क्षेत्रों में फैली हुई है।
- क्षेत्र: इसके अंतर्गत कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु, और केरल आते हैं।
- प्रमुख खनिज:
- लौह अयस्क: कर्नाटक उच्च कोटि के लौह अयस्क के लिए प्रसिद्ध है (कुद्रेमुख, बेल्लारी क्षेत्र)।
- सोना (Gold): यह पेटी भारत के लगभग पूरे सोने के भंडार के लिए जानी जाती है। कर्नाटक की कोलार और हट्टी की खदानें इसी क्षेत्र में हैं।
- अन्य खनिज: यहाँ बॉक्साइट, क्रोमाइट, मैंगनीज, जिप्सम, और चूना पत्थर भी पाए जाते हैं।
- विशेषता: इस पेटी में कोयले के भंडार नहीं हैं, जो इसे उत्तर-पूर्वी पेटी से अलग करता है।
4. उत्तर-पश्चिमी पेटी (The North-Western Belt)
यह पेटी राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला के साथ-साथ गुजरात के कुछ हिस्सों में फैली हुई है।
- क्षेत्र: राजस्थान और गुजरात।
- प्रमुख खनिज:
- अलौह खनिज: यह पेटी मुख्य रूप से अलौह खनिजों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ ताँबा (खेतड़ी), सीसा (Lead), और जस्ता (Zinc) का सबसे बड़ा भंडार है।
- भवन निर्माण पत्थर: राजस्थान संगमरमर, ग्रेनाइट, और बलुआ पत्थर जैसे भवन निर्माण पत्थरों का प्रमुख उत्पादक है।
- अन्य खनिज: यहाँ अभ्रक, जिप्सम, मुल्तानी मिट्टी, नमक, और कीमती पत्थर भी पाए जाते हैं।
- ऊर्जा खनिज: गुजरात और राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के महत्वपूर्ण भंडार हैं।
इन प्रमुख पेटियों के अलावा कुछ अन्य क्षेत्र भी हैं:
- हिमालयी पेटी: यह एक उभरती हुई पेटी है। इसकी जटिल भूवैज्ञानिक संरचना के कारण यहाँ खनन मुश्किल है, लेकिन इसमें ताँबा, सीसा, जस्ता, कोबाल्ट, और कीमती पत्थरों के भंडार होने की संभावना है।
- अपतटीय क्षेत्र (Offshore Area): अरब सागर में मुंबई हाई और कृष्णा-गोदावरी बेसिन जैसे अपतटीyA क्षेत्रों में पेट्रोलियम (कच्चा तेल) और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं।
सारणी में प्रमुख खनिज पेटियाँ
| खनिज पेटी | प्रमुख राज्य | मुख्य खनिज |
| उत्तर-पूर्वी पेटी | झारखंड, ओडिशा, प. बंगाल, छत्तीसगढ़ | कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, मैंगनीज, अभ्रक, यूरेनियम |
| मध्य पेटी | मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र | मैंगनीज, बॉक्साइट, चूना पत्थर, ताँबा, हीरा |
| दक्षिणी पेटी | कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु | सोना, लौह अयस्क, बॉक्साइट, मैंगनीज |
| उत्तर-पश्चिमी पेटी | राजस्थान, गुजरात | ताँबा, सीसा-जस्ता, संगमरमर, जिप्सम, पेट्रोलियम |