भारत में कृषि: अर्थव्यवस्था की रीढ़
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार और इसकी रीढ़ है। यह न केवल देश की एक विशाल आबादी के लिए आजीविका (Livelihood) का मुख्य स्रोत है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा (Food Security) को भी सुनिश्चित करती है और कई प्रमुख उद्योगों के लिए कच्चा माल (Raw Material) प्रदान करती है। अपनी विशाल जनसंख्या और विविध जलवायु के कारण, भारत कृषि उत्पादन के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में से एक है।
I. भारतीय कृषि का महत्व और विशेषताएँ
- रोजगार का मुख्य स्रोत:
- भारत की लगभग आधी (लगभग 47% – 50%) कार्यबल प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जो इसे देश का सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता क्षेत्र बनाता है।
- राष्ट्रीय आय में योगदान:
- देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों (पशुपालन, वानिकी, मत्स्य पालन) का योगदान लगभग 18-20% है।
- खाद्य सुरक्षा का आधार:
- 140 करोड़ से अधिक की आबादी को भोजन उपलब्ध कराने का विशाल दायित्व भारतीय कृषि पर है।
- औद्योगिक विकास में सहायक:
- यह कपड़ा उद्योग (कपास, जूट), चीनी उद्योग (गन्ना), खाद्य प्रसंस्करण उद्योग आदि के लिए कच्चा माल प्रदान करती है।
- मानसून पर निर्भरता:
- यह भारतीय कृषि की सबसे बड़ी विशेषता और कमजोरी दोनों है। आज भी देश का एक बड़ा कृषि क्षेत्र सिंचाई के लिए मानसून पर बहुत अधिक निर्भर है। इसीलिए भारतीय कृषि को “मानसून का जुआ” (A Gamble of Monsoon) कहा जाता है।
- छोटी जोतें और विखंडन:
- अधिकांश भारतीय किसान सीमांत (Marginal) और छोटे (Small) किसान हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम भूमि है। पीढ़ियों से भूमि का बँटवारा होने के कारण खेत छोटे और बिखरे हुए हैं।
II. भारतीय कृषि के प्रकार (Types of Farming in India)
- निर्वाह कृषि (Subsistence Farming):
- इसका मुख्य उद्देश्य किसान के अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करना होता है, न कि बाजार में बेचने के लिए उत्पादन करना। इसमें पारंपरिक तरीकों और उपकरणों का उपयोग होता है। यह भारत के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित है।
- गहन कृषि (Intensive Farming):
- जहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक है, वहाँ भूमि के छोटे टुकड़ों पर आधुनिक कृषि आदानों (जैसे उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, सिंचाई) का उपयोग करके अधिकतम उत्पादन करने का प्रयास किया जाता है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके उदाहरण हैं।
- व्यावसायिक या वाणिज्यिक कृषि (Commercial Farming):
- इसका मुख्य उद्देश्य बाजार में बेचने के लिए फसलें उगाना है। इसमें बड़े पैमाने पर पूंजी, मशीनरी और आधुनिक तकनीक का उपयोग होता है। गन्ना, कपास, चाय, कॉफी और रबर इसके उदाहरण हैं।
- बागानी कृषि (Plantation Farming):
- यह एक प्रकार की वाणिज्यिक कृषि है जिसमें एक बहुत बड़े क्षेत्र में एकल फसल (Single Crop) उगाई जाती है। चाय, कॉफी, रबर और काजू की खेती बागानी कृषि के अंतर्गत आती है।
III. भारत में फसल ऋतुएँ (Cropping Seasons in India)
भारत में कृषि वर्ष को मुख्य रूप से तीन फसल ऋतुओं में विभाजित किया गया है:
| फसल ऋतु | बुवाई का समय | कटाई का समय | प्रमुख फसलें | सिंचाई का स्रोत |
| 1. खरीफ (Kharif) | जून-जुलाई (मानसून की शुरुआत) | सितंबर-अक्टूबर | चावल (मुख्य), मक्का, ज्वार, बाजरा, कपास, मूंगफली, सोयाबीन, जूट | मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून |
| 2. रबी (Rabi) | अक्टूबर-दिसंबर (सर्दियों की शुरुआत) | अप्रैल-जून (गर्मियों की शुरुआत) | गेहूँ (मुख्य), जौ, चना, मटर, सरसों | सिंचाई (नहरें, ट्यूबवेल) और पश्चिमी विक्षोभ |
| 3. जायद (Zaid) | मार्च-अप्रैल (रबी और खरीफ के बीच) | जून-जुलाई | तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी, सब्जियाँ, मूंग दाल | मुख्य रूप से सिंचाई |
IV. भारतीय कृषि की प्रमुख चुनौतियाँ (Major Challenges)
- मानसून पर अत्यधिक निर्भरता: अनियमित मानसून से सूखा या बाढ़ की स्थिति बनती है।
- छोटी और खंडित भूमि जोतें: जिससे बड़े पैमाने पर मशीनीकरण और आधुनिक कृषि संभव नहीं हो पाती।
- निम्न उत्पादकता: कई फसलों की प्रति हेक्टेयर उपज अन्य विकसित देशों की तुलना में कम है।
- मृदा क्षरण और निम्नीकरण: उर्वरकों के असंतुलित उपयोग, वनों की कटाई और मृदा अपरदन से मिट्टी की गुणवत्ता घट रही है।
- वित्तीय संसाधनों की कमी: छोटे किसानों को ऋण और बीमा की सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती।
- भंडारण और विपणन की अपर्याप्त सुविधाएँ: उचित भंडारण सुविधाओं की कमी के कारण कटाई के बाद एक बड़ा हिस्सा खराब हो जाता है।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: तापमान में वृद्धि और वर्षा पैटर्न में बदलाव भारतीय कृषि के लिए एक बड़ा खतरा है।
V. कृषि में प्रमुख क्रांतियाँ (Major Revolutions in Agriculture)
| क्रांति | संबंधित है |
| हरित क्रांति (Green Revolution) | खाद्यान्न उत्पादन (विशेषकर गेहूं और चावल) |
| श्वेत क्रांति (White Revolution) | दुग्ध उत्पादन (ऑपरेशन फ्लड) |
| नीली क्रांति (Blue Revolution) | मत्स्य उत्पादन |
| पीली क्रांति (Yellow Revolution) | तिलहन उत्पादन |
| स्वर्ण क्रांति (Golden Revolution) | बागवानी और शहद उत्पादन |
निष्कर्ष:
भारतीय कृषि एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहाँ एक ओर इसे बढ़ती आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, तो वहीं दूसरी ओर इसे जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture), कृषि विविधीकरण (Crop Diversification), और प्रौद्योगिकी के एकीकरण की दिशा में काम करना अनिवार्य है।
कृषि प्रणाली (Farming System): एक समग्र दृष्टिकोण
परिभाषा:
कृषि प्रणाली (Farming System) कृषि करने का एक एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण (Integrated and Holistic Approach) है। यह केवल फसल उगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा तंत्र है जिसमें एक खेत पर उपलब्ध सभी संसाधनों – भूमि, जल, श्रम, पूंजी और विभिन्न कृषि उद्यमों – को इस तरह से संयोजित और प्रबंधित किया जाता है ताकि अधिकतम लाभ, उत्पादकता और स्थिरता प्राप्त की जा सके।
सरल शब्दों में, यह कृषि को अलग-अलग टुकड़ों में देखने के बजाय एक “संपूर्ण खेत (Whole Farm)” के रूप में देखने की विधि है, जहाँ हर घटक एक-दूसरे से जुड़ा और एक-दूसरे का पूरक होता है।
उद्देश्य:
- किसानों की आय बढ़ाना।
- संसाधनों का कुशलतम उपयोग सुनिश्चित करना।
- पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देना।
- जोखिम को कम करना।
कृषि प्रणाली के प्रमुख घटक (Components of a Farming System)
एक कृषि प्रणाली में विभिन्न उद्यम (Enterprises) शामिल हो सकते हैं, जो एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं। प्रमुख घटक हैं:
- फसल उत्पादन (Crop Production):
- मुख्य फसलें: अनाज (गेहूं, चावल), दालें, तिलहन।
- सहायक फसलें: सब्जियाँ, फल, चारा फसलें।
- पशुधन (Livestock):
- दुधारू पशु: गाय, भैंस।
- छोटे पशु: बकरी, भेड़।
- अन्य: मुर्गी पालन, सूअर पालन।
- मत्स्य पालन (Aquaculture/Fisheries):
- खेत में तालाब बनाकर मछली पालना।
- कृषि-वानिकी (Agroforestry):
- खेत की मेड़ों पर या फसलों के साथ पेड़ लगाना (जैसे इमारती लकड़ी, फल, चारे वाले पेड़)।
- अन्य उद्यम:
- मधुमक्खी पालन (Apiculture)
- रेशम कीट पालन (Sericulture)
- मशरूम उत्पादन (Mushroom Cultivation)
- खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) – जैसे फलों से जैम बनाना।
घटकों की परस्पर निर्भरता: कृषि प्रणाली का हृदय
कृषि प्रणाली की सफलता इसके विभिन्न घटकों के बीच सहजीवी संबंध (Symbiotic Relationship) पर निर्भर करती है। इसमें एक उद्यम का उत्पाद (Output) या अपशिष्ट (Waste) दूसरे उद्यम के लिए संसाधन या इनपुट (Input) का काम करता है।
उदाहरण के लिए, एक एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System – IFS):
- फसलें पशुओं के लिए चारा प्रदान करती हैं।
- पशु (गाय/भैंस) खेतों के लिए गोबर की खाद और बायोगैस प्रदान करते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों और ईंधन पर खर्च कम होता है।
- खेतों से निकलने वाला कृषि अपशिष्ट (पुआल आदि) पशुओं के चारे, मशरूम उत्पादन या कंपोस्टिंग के काम आता है।
- खेत में बना तालाब फसलों के लिए सिंचाई का स्रोत बनता है और साथ ही उसमें मछली पालन भी किया जा सकता है।
- खेत की मेड़ों पर लगे पेड़ इमारती लकड़ी/फल देते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और मधुमक्खी पालन के लिए मधु स्रोत बनते हैं।
यह चक्र बाहरी संसाधनों पर निर्भरता को कम करता है, लागत घटाता है, आय के स्रोत बढ़ाता है और कृषि को अधिक स्थिर और पर्यावरण-अनुकूल बनाता है।
भारत में कृषि प्रणालियों के प्रकार (Types of Farming Systems in India)
भारत की विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों के आधार पर, विभिन्न प्रकार की कृषि प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं:
- सिंचित कृषि प्रणाली (Irrigated Farming System):
- क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तटीय आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु।
- फोकस: चावल-गेहूं फसल चक्र, गन्ना। उच्च उत्पादकता लेकिन रासायनिक उर्वरकों और पानी का अत्यधिक उपयोग।
- वर्षा-आधारित या शुष्क भूमि कृषि प्रणाली (Rainfed or Dryland Farming System):
- क्षेत्र: भारत का लगभग 60% कृषि क्षेत्र। (महाराष्ट्र का विदर्भ-मराठवाड़ा, राजस्थान, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का पठारी भाग)।
- फोकस: सूखे के प्रति सहनशील फसलें जैसे मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी), दालें और तिलहन। यहाँ जोखिम अधिक होता है।
- पहाड़ी और पर्वतीय कृषि प्रणाली (Hill and Mountain Farming System):
- क्षेत्र: हिमालयी क्षेत्र (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश) और पूर्वोत्तर राज्य।
- फोकस: सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) के माध्यम से चावल, मक्का उगाना। इसके अलावा बागवानी (फल, सब्जियाँ) और पशुधन प्रमुख हैं।
- तटीय कृषि प्रणाली (Coastal Farming System):
- क्षेत्र: तटीय राज्य जैसे केरल, गोवा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश।
- फोकस: चावल-मछली की एकीकृत प्रणाली, नारियल के बागान, और मसालों की खेती।
- कृषि-वानिकी प्रणाली (Agroforestry System):
- फसलों के साथ पेड़ों को उगाया जाता है। यह मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने और आय बढ़ाने में मदद करता है। यह शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय हो रहा है।
- जैविक कृषि प्रणाली (Organic Farming System):
- इसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता। यह मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित है। सिक्किम भारत का पहला पूर्ण जैविक राज्य है।
कृषि प्रणालियों का महत्व
- आय सुरक्षा: एक उद्यम के विफल होने पर दूसरे से आय प्राप्त होती है, जिससे किसान की आय सुरक्षित रहती है।
- टिकाऊपन (Sustainability): यह संसाधनों के चक्रीय उपयोग को बढ़ावा देता है, जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य बना रहता है।
- खाद्य और पोषण सुरक्षा: एक ही खेत से अनाज, दालें, सब्जियाँ, फल, दूध और मछली प्राप्त होने से परिवार के लिए पोषण सुनिश्चित होता है।
- रोजगार सृजन: विभिन्न उद्यमों में साल भर काम बना रहता है।
निष्कर्ष:
कृषि प्रणाली, विशेष रूप से एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS), “प्रति बूँद, अधिक फसल” के सिद्धांत को साकार करने और 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने का एक प्रभावी और वैज्ञानिक तरीका है। यह भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन और बाजार की अनिश्चितताओं के प्रति अधिक लचीला बनाने की क्षमता रखता है।
प्रमुख कृषि विधियाँ (Major Farming Practices)
कृषि विधियों को उनके उद्देश्य, तकनीक और पर्यावरण पर प्रभाव के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
I. निर्वाह कृषि विधियाँ (Subsistence Farming Methods)
इनका मुख्य उद्देश्य किसान के अपने परिवार की खाद्य जरूरतों को पूरा करना होता है।
स्थानांतरण कृषि (Shifting Cultivation): एक आदिम कृषि पद्धति
परिभाषा:
स्थानांतरण कृषि एक आदिम निर्वाह कृषि (Primitive Subsistence Farming) पद्धति है, जिसमें किसान जंगल के एक छोटे से भूखंड (पैच) पर मौजूद वनस्पति को काटकर और जलाकर साफ करते हैं। जली हुई वनस्पति की राख मिट्टी के लिए पोटाश और अन्य पोषक तत्वों का काम करती है। इस साफ की गई भूमि पर कुछ वर्षों (आमतौर पर 2-3 वर्ष) तक पारंपरिक औजारों से खेती की जाती है। जब मिट्टी की उर्वरता प्राकृतिक रूप से कम हो जाती है, तो किसान उस भूखंड को छोड़कर जंगल के किसी नए स्थान पर चला जाता है और यही प्रक्रिया दोहराता है।
छोड़े गए पुराने भूखंड को परती (Fallow) छोड़ दिया जाता है ताकि वह प्राकृतिक रूप से अपनी उर्वरता और वनस्पति को पुनः प्राप्त कर सके। इस चक्र को परती चक्र (Fallow Cycle) कहते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- भूमि का चक्रीय उपयोग: इसमें स्थायी खेती के बजाय भूमि का चक्रीय और अस्थायी उपयोग होता है।
- काटो और जलाव (Slash-and-burn): यह इसकी मुख्य तकनीक है। जले हुए अवशेष (राख) ही एकमात्र उर्वरक होते हैं।
- प्राकृतिक उर्वरता पर निर्भरता: किसान किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक या आधुनिक कृषि इनपुट का उपयोग नहीं करते। खेती पूरी तरह से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और वर्षा पर निर्भर होती है।
- मानव श्रम और पारंपरिक औजार: खेती में मुख्य रूप से मानवीय श्रम का उपयोग होता है, और कुदाल, खुरपी और छड़ी जैसे बहुत ही साधारण और पारंपरिक औजारों का प्रयोग किया जाता है।
- मिश्रित फसलें: एक ही खेत में अक्सर कई तरह की फसलें एक साथ उगाई जाती हैं, जैसे अनाज, सब्जियाँ और कंद।
- पारिस्थितिक रूप से स्थायी (अतीत में): जब जनसंख्या घनत्व कम था और परती चक्र लंबा (20-25 वर्ष) होता था, तो यह एक टिकाऊ पद्धति मानी जाती थी क्योंकि जंगल को ठीक होने का पर्याप्त समय मिल जाता था।
स्थानांतरण कृषि के विभिन्न स्थानीय नाम (Various Local Names)
यह कृषि पद्धति दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्रों में विभिन्न आदिवासी समुदायों द्वारा अपनाई जाती है, और इसके कई स्थानीय नाम हैं जो परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं:
| क्षेत्र / देश | स्थानीय नाम |
| पूर्वोत्तर भारत | झूम (Jhum) |
| मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ | बेवर, दहियार, पेंडा |
| आंध्र प्रदेश और ओडिशा | पोडू, पेंदा, बरिगा |
| केरल (पश्चिमी घाट) | कुमारी (Kumari) |
| राजस्थान | वालरा या वालट्रे |
| हिमालयी क्षेत्र | खिल (Khil) |
| झारखंड | कुरुवा (Kuruwa) |
| अंतर्राष्ट्रीय | |
| इंडोनेशिया और मलेशिया | लादांग (Ladang) |
| मध्य अमेरिका और मैक्सिको | मिल्पा (Milpa) |
| ब्राजील | रोका (Roca) |
| वियतनाम | रे (Ray) |
| मध्य अफ्रीका | मसोल (Masole) |
आधुनिक समय में समस्याएँ और पर्यावरणीय प्रभाव
अतीत में टिकाऊ मानी जाने वाली यह पद्धति अब कई गंभीर समस्याओं का कारण बन गई है:
- वनों की कटाई (Deforestation): जनसंख्या के दबाव के कारण, हर साल जंगल के बड़े क्षेत्रों को काटा और जलाया जाता है, जो वनोन्मूलन का एक प्रमुख कारण है।
- छोटा परती चक्र: जनसंख्या वृद्धि के कारण अब किसानों को बहुत जल्दी पुराने भूखंड पर लौटना पड़ता है। परती चक्र छोटा (अब 5-7 वर्ष) हो गया है, जिससे जंगल और मिट्टी को अपनी उर्वरता पुनः प्राप्त करने का समय नहीं मिल पाता।
- मृदा अपरदन (Soil Erosion): वनों की सफाई के बाद, ढलान वाली भूमि बिना किसी वनस्पति आवरण के हो जाती है। भारी मानसूनी वर्षा इस असुरक्षित ऊपरी मिट्टी को आसानी से बहा ले जाती है, जिससे गंभीर मृदा अपरदन होता है।
- जैव विविधता का नुकसान (Loss of Biodiversity): जंगलों के जलने से अनगिनत वनस्पतियों और जीवों के आवास नष्ट हो जाते हैं।
- जलवायु परिवर्तन: जंगलों के जलने से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में मुक्त होती हैं।
- निम्न उत्पादकता: इस पद्धति से प्रति हेक्टेयर उपज बहुत कम होती है, जो बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करने में अक्षम है।
निष्कर्ष:
स्थानांतरण कृषि एक प्राचीन कृषि विरासत है जो प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित थी। हालाँकि, आधुनिक समय में जनसंख्या दबाव और छोटे होते परती चक्र के कारण यह पारिस्थितिक रूप से विनाशकारी और अतिकाऊ (Unsustainable) हो गई है। सरकारें अब इन क्षेत्रों में किसानों को स्थायी कृषि पद्धतियों, जैसे सीढ़ीदार खेती और कृषि-वानिकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं ताकि उनकी आजीविका को सुरक्षित करते हुए पर्यावरण का भी संरक्षण किया जा सके।
- गहन निर्वाह कृषि (Intensive Subsistence Farming):
- विधि: यह घनी आबादी वाले क्षेत्रों (जैसे भारत, चीन, बांग्लादेश) में प्रचलित है। इसमें भूमि के छोटे टुकड़ों पर साधारण औजारों, अधिक मानवीय श्रम और जैविक खाद का उपयोग करके वर्ष में एक से अधिक फसलें उगाई जाती हैं।
- प्रकार: चावल-प्रधान (जहाँ वर्षा अधिक हो) और गेहूँ-मोटे अनाज प्रधान (जहाँ वर्षा कम हो)।
II. वाणिज्यिक कृषि विधियाँ (Commercial Farming Methods)
इनका मुख्य उद्देश्य बाजार में बेचकर लाभ कमाना होता है।
- व्यापक या विस्तृत कृषि (Extensive Farming):
- विधि: यह कम आबादी वाले क्षेत्रों (जैसे अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया के प्रेयरी) में प्रचलित है जहाँ भूमि बहुत बड़ी और सस्ती होती है। इसमें बहुत बड़े खेतों पर आधुनिक मशीनों (जैसे हार्वेस्टर, ट्रैक्टर) की मदद से प्रति व्यक्ति उच्च उत्पादन प्राप्त किया जाता है। हालाँकि, प्रति हेक्टेयर उपज अक्सर कम होती है।
- फसल: मुख्य रूप से एक ही फसल (जैसे गेहूं, मक्का) उगाई जाती है।
- गहन वाणिज्यिक कृषि (Intensive Commercial Farming):
- विधि: इसमें भूमि के छोटे टुकड़ों पर अत्यधिक पूँजी, HYV बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और सिंचाई का उपयोग करके प्रति हेक्टेयर अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जाता है।
- क्षेत्र: भारत का हरित क्रांति क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा)।
- बागानी कृषि (Plantation Agriculture):
- विधि: यह एक प्रकार की वाणिज्यिक कृषि है जिसमें एक बहुत बड़े बागान (Estate) में लंबे समय तक के लिए एकल नकदी फसल (Single Cash Crop) उगाई जाती है। इसमें अत्यधिक पूँजी, प्रबंधन और तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
- फसलें: चाय, कॉफी, रबर, कोको, नारियल, केला।
- क्षेत्र: भारत का असम, नीलगिरी क्षेत्र; मलेशिया, ब्राजील।
- मिश्रित कृषि (Mixed Farming):
- विधि: इसमें फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता है। ये दोनों गतिविधियाँ एक-दूसरे की पूरक होती हैं। फसलें पशुओं के लिए चारा प्रदान करती हैं और पशु खेतों के लिए खाद और अतिरिक्त आय का स्रोत बनते हैं।
- क्षेत्र: यूरोप, पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका।
III. टिकाऊ और आधुनिक कृषि विधियाँ (Sustainable and Modern Farming Methods)
इनका उद्देश्य पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना उत्पादकता बढ़ाना है।
- जैविक कृषि (Organic Farming):
- विधि: इसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, और GMOs (आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों) का उपयोग पूरी तरह से वर्जित होता है। इसके बजाय, उर्वरता बनाए रखने के लिए फसल चक्र, हरी खाद, कंपोस्ट और जैविक खाद (जैसे गोबर, केंचुआ खाद) का उपयोग किया जाता है।
- उद्देश्य: मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखना, जैव विविधता का संरक्षण करना और स्वस्थ भोजन का उत्पादन करना।
- संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture):
- विधि: यह तीन सिद्धांतों पर आधारित है:
- न्यूनतम जुताई (Minimum Tillage): खेत की कम से कम जुताई करना।
- स्थायी मृदा आवरण (Permanent Soil Cover): मिट्टी को फसल अवशेषों (मल्चिंग) से ढककर रखना।
- फसल चक्र (Crop Rotation): विभिन्न फसलों को बारी-बारी से उगाना।
- उद्देश्य: मृदा अपरदन को रोकना, पानी का संरक्षण करना और मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाना।
- विधि: यह तीन सिद्धांतों पर आधारित है:
- एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System – IFS):
- विधि: यह एक समग्र दृष्टिकोण है जिसमें विभिन्न कृषि उद्यमों (जैसे फसलें, पशुधन, मत्स्य पालन, वानिकी) को एक साथ इस तरह से एकीकृत किया जाता है कि एक का अपशिष्ट दूसरे के लिए संसाधन बन जाए।
- उद्देश्य: लागत कम करना, आय के स्रोत बढ़ाना और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करना।
- सटीक कृषि (Precision Farming):
- विधि: इसमें GPS, ड्रोन, सेंसर और सैटेलाइट इमेजरी जैसी उन्नत तकनीक का उपयोग करके खेत के हर हिस्से की विशिष्ट जरूरतों (जैसे पानी, उर्वरक, कीटनाशक) की सटीक जानकारी प्राप्त की जाती है और केवल उतनी ही मात्रा में इनपुट दिया जाता है जितनी आवश्यकता हो।
- उद्देश्य: संसाधनों की बर्बादी को कम करना, दक्षता बढ़ाना और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव को न्यूनतम करना। इसे “सैटेलाइट फार्मिंग” भी कहते हैं।
- हाइड्रोपोनिक्स और एरोपोनिक्स (Hydroponics and Aeroponics):
- विधि: यह बिना मिट्टी के पौधे उगाने की तकनीक है। हाइड्रोपोनिक्स में पौधों को पोषक तत्व युक्त घोल में उगाया जाता है, जबकि एरोपोनिक्स में जड़ों को हवा में लटकाकर उन पर पोषक तत्वों का छिड़काव किया जाता है।
- उपयोग: शहरी कृषि (Urban Farming) और सीमित भूमि वाले क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी।
1. सहकारी कृषि (Cooperative Farming)
परिभाषा:
सहकारी कृषि एक ऐसी प्रणाली है जिसमें कई छोटे और सीमांत किसान स्वेच्छा से मिलकर एक सहकारी समिति (Cooperative Society) का गठन करते हैं और अपनी भूमि, श्रम और संसाधनों को एकत्रित करके सामूहिक रूप से खेती करते हैं। इस प्रणाली का मूल सिद्धांत “सबके लिए एक, एक के लिए सब” है।
इसमें भूमि का स्वामित्व व्यक्तिगत किसानों के पास ही बना रह सकता है या वे इसे समिति को सौंप सकते हैं, लेकिन कृषि से संबंधित सभी निर्णय (क्या उगाना है, कैसे बेचना है) और संचालन सामूहिक रूप से किए जाते हैं। लाभ को भूमि के अनुपात या किए गए श्रम के आधार पर सदस्यों में बाँट दिया जाता है।
उद्देश्य:
- छोटी और खंडित जोतों की समस्या का समाधान: छोटी-छोटी जमीनों को मिलाकर एक बड़ा और आर्थिक रूप से व्यवहार्य खेत बनाना।
- सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाना: सामूहिक रूप से बीज, उर्वरक और मशीनरी खरीदने से लागत कम होती है और सामूहिक रूप से फसल बेचने से बेहतर मूल्य मिलता है।
- आधुनिक तकनीक का उपयोग: बड़े खेत पर ट्रैक्टर, हार्वेस्टर जैसी मशीनों का उपयोग संभव हो पाता है।
- जोखिम का सामूहिक वहन: किसी एक किसान पर जोखिम का पूरा बोझ नहीं पड़ता।
- ऋण और सरकारी योजनाओं तक बेहतर पहुँच: सहकारी समितियों को बैंकों और सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिलता है।
भारत में उदाहरण:
भारत में सहकारी कृषि का मॉडल सीमित सफलता के साथ अपनाया गया है। दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में अमूल (Amul) एक अत्यंत सफल सहकारी मॉडल है, लेकिन विशुद्ध कृषि में इसके उदाहरण कम हैं। महाराष्ट्र में गन्ना और अंगूर की खेती में कुछ सफल सहकारी समितियाँ काम कर रही हैं।
चुनौतियाँ:
- सदस्यों के बीच समन्वय और विश्वास की कमी।
- कुशल प्रबंधन का अभाव।
- स्थानीय राजनीति और निहित स्वार्थ।
2. संविदा कृषि (Contract Farming)
परिभाषा:
संविदा या अनुबंध कृषि, किसानों और कृषि-आधारित व्यावसायिक खरीदारों (Agri-business firms) के बीच एक पूर्व-निर्धारित लिखित समझौते (Written Agreement) के तहत कृषि उत्पादन की एक प्रणाली है।
इस समझौते के तहत, कंपनी (खरीददार) किसान को फसल उगाने के लिए आवश्यक इनपुट (जैसे बीज, उर्वरक), तकनीकी मार्गदर्शन और कभी-कभी वित्तीय सहायता भी प्रदान करती है। बदले में, किसान एक पूर्व-निर्धारित गुणवत्ता और मात्रा के उत्पाद को एक पूर्व-निर्धारित मूल्य (Pre-determined price) पर कंपनी को बेचने के लिए सहमत होता है।
उदाहरण:
- पेप्सिको कंपनी आलू के चिप्स बनाने के लिए किसानों के साथ आलू उगाने का अनुबंध करती है।
- एक टमाटर सॉस बनाने वाली कंपनी किसानों से टमाटर खरीदने का अनुबंध करती है।
- एक पोल्ट्री कंपनी किसानों को चूजे, दाना और दवाइयाँ देकर मुर्गियां पालने का अनुबंध करती है।
उद्देश्य:
- किसानों के लिए:
- बाजार का सुनिश्चित आश्वासन: फसल बेचने के लिए बाजार खोजने का जोखिम समाप्त हो जाता है।
- मूल्य स्थिरता: बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलती है।
- बेहतर इनपुट और तकनीक तक पहुँच: कंपनी अच्छी गुणवत्ता वाले बीज और विशेषज्ञ सलाह प्रदान करती है, जिससे उत्पादकता बढ़ती है।
- कंपनियों (खरीददारों) के लिए:
- कच्चे माल की नियमित आपूर्ति: उन्हें अपने कारखानों के लिए एक विशिष्ट गुणवत्ता और मात्रा के कच्चे माल की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित हो जाती है।
- गुणवत्ता पर नियंत्रण: वे उत्पादन प्रक्रिया की निगरानी करके अपनी आवश्यकता के अनुसार गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं।
चुनौतियाँ:
- असमान सौदेबाजी शक्ति: अक्सर बड़ी कंपनियाँ किसानों पर अपनी शर्तें थोपती हैं और अनुबंध किसानों के पक्ष में नहीं होता।
- गुणवत्ता मानकों पर विवाद: कंपनियाँ कभी-कभी “खराब गुणवत्ता” का हवाला देकर फसल को खारिज कर सकती हैं।
- एकाधिकार का खतरा: किसान केवल एक ही खरीदार पर निर्भर हो जाता है।
सहकारी कृषि बनाम संविदा कृषि (तुलनात्मक सारणी)
| आधार | सहकारी कृषि (Cooperative Farming) | संविदा कृषि (Contract Farming) |
| मुख्य भागीदार | किसान से किसान (Farmers to Farmers) | किसान से कंपनी (Farmer to Corporate Buyer) |
| संगठन का आधार | स्वेच्छा और सहयोग पर आधारित। | लिखित कानूनी अनुबंध पर आधारित। |
| स्वामित्व और नियंत्रण | नियंत्रण और निर्णय लेने की शक्ति किसानों (समिति) के हाथ में होती है। | नियंत्रण और मानक अक्सर कंपनी (खरीददार) द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। |
| भूमि | भूमि को एकत्रित (pooled) किया जाता है। | किसान अपनी व्यक्तिगत भूमि पर खेती करता है। |
| जोखिम | उत्पादन और बाजार का जोखिम सभी सदस्यों द्वारा सामूहिक रूप से साझा किया जाता है। | किसान का उत्पादन जोखिम (फसल का खराब होना) बना रहता है, लेकिन बाजार का जोखिम कम हो जाता है। |
| उद्देश्य | लागत कम करना, सामूहिक सौदेबाजी से सदस्यों का कल्याण करना। | कंपनी के लिए सुनिश्चित कच्चा माल प्राप्त करना और किसान के लिए सुनिश्चित बाजार पाना। |
निष्कर्ष:
सहकारी कृषि एक सामाजिक-आर्थिक मॉडल है जिसका उद्देश्य छोटे किसानों को सशक्त बनाना है, जबकि संविदा कृषि एक शुद्ध व्यावसायिक मॉडल है जो कृषि और उद्योग के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। दोनों ही मॉडल भारतीय कृषि में सुधार की क्षमता रखते हैं, लेकिन उनकी सफलता उचित विनियमन, पारदर्शिता और किसानों के हितों की सुरक्षा पर निर्भर करती है।
1. शुष्क भूमि कृषि (Dryland Farming)
परिभाषा:
शुष्क भूमि कृषि, जिसे बारानी खेती (Rainfed Agriculture) भी कहा जाता है, उन शुष्क (Arid) और अर्ध-शुष्क (Semi-Arid) क्षेत्रों में फसल उगाने की एक विशेष कृषि प्रणाली है, जहाँ वार्षिक वर्षा बहुत कम होती है (आमतौर पर 75 सेमी से कम) और सिंचाई की कोई स्थायी सुविधा उपलब्ध नहीं होती है।
यह पूरी तरह से वर्षा के पानी पर निर्भर करती है और इसका मुख्य उद्देश्य उपलब्ध सीमित नमी का कुशलतम प्रबंधन और संरक्षण करके सफलतापूर्वक फसल उगाना है।
उद्देश्य:
- सीमित और अनिश्चित वर्षा की स्थिति में भी स्थिर फसल उत्पादन प्राप्त करना।
- वर्षा जल की प्रत्येक बूँद का अधिकतम उपयोग करना।
- मृदा में नमी का संरक्षण करना।
प्रमुख तकनीकें और सिद्धांत:
- नमी का संरक्षण (Moisture Conservation): यह इस कृषि का हृदय है।
- गहरी जुताई: मानसून से पहले खेतों की गहरी जुताई की जाती है ताकि वर्षा का अधिक से अधिक पानी जमीन सोख सके।
- कम जुताई (Minimum Tillage): जुताई कम से कम की जाती है ताकि मिट्टी की नमी का वाष्पीकरण न हो।
- मेड़बंदी (Bundling): खेतों के चारों ओर मेड़ें बनाकर वर्षा के पानी को खेत में ही रोका जाता है।
- मल्चिंग (Mulching): खेत की सतह को फसल अवशेषों (पुआल, सूखी घास) से ढक दिया जाता है ताकि सूर्य की सीधी गर्मी से नमी का वाष्पीकरण कम हो।
- उचित फसल का चुनाव (Appropriate Crop Selection):
- ऐसी फसलें उगाई जाती हैं जो सूखा-सहिष्णु (Drought-tolerant) हों, जिन्हें कम पानी की आवश्यकता हो और जिनकी जीवन-अवधि छोटी हो।
- उदाहरण: मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी), दालें (चना, अरहर), और तिलहन (सरसों)।
- अंतर-फसल (Intercropping) और मिश्रित फसल (Mixed Cropping):
- एक ही खेत में एक साथ दो या दो से अधिक फसलें उगाई जाती हैं। यदि एक फसल वर्षा की कमी के कारण विफल हो जाती है, तो दूसरी फसल से कुछ आय हो जाती है, जिससे कुल विफलता का जोखिम कम हो जाता है।
प्रमुख क्षेत्र:
- राजस्थान, गुजरात का कच्छ-सौराष्ट्र क्षेत्र, मध्य महाराष्ट्र (विदर्भ-मराठवाड़ा), आंतरिक कर्नाटक और रायलसीमा (आंध्र प्रदेश) – ये सभी पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र में आते हैं।
चुनौतियाँ:
- वर्षा की अत्यधिक अनिश्चितता, फसल विफलता का उच्च जोखिम, निम्न उत्पादकता।
2. ट्रक कृषि (Truck Farming)
परिभाषा:
ट्रक कृषि (Truck Farming) एक प्रकार की गहन वाणिज्यिक बागवानी (Intensive Commercial Horticulture) है, जिसमें विशेष रूप से सब्जियों (Vegetables) का उत्पादन बड़े पैमाने पर दूर स्थित शहरी बाजारों (Distant Urban Markets) में बेचने के लिए किया जाता है।
“ट्रक” शब्द का अर्थ माल ढोने वाले ट्रक से ही है। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उत्पादित सब्जियों को तुरंत ट्रकों में लादकर दूर के शहरों तक पहुँचाया जाता है।
उद्देश्य:
- बड़े शहरों और महानगरीय क्षेत्रों की ताजा सब्जियों की मांग को पूरा करना।
- बड़े पैमाने पर उत्पादन करके लाभ कमाना।
प्रमुख विशेषताएँ:
- विशिष्टीकरण (Specialization):
- इसमें केवल कुछ ही प्रकार की सब्जियों की खेती पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जिनकी बाजार में मांग अधिक हो और जिन्हें आसानी से ट्रांसपोर्ट किया जा सके (जैसे आलू, टमाटर, प्याज, गोभी)।
- शहरी क्षेत्रों से दूरी:
- यह खेत अक्सर शहर के ठीक बाहरी इलाके में न होकर, उससे कुछ दूरी पर होते हैं जहाँ भूमि अपेक्षाकृत सस्ती होती है। हालाँकि, यह दूरी इतनी होती है कि एक रात में ट्रक से शहर पहुँचा जा सके ताकि सब्जियाँ ताजा रहें।
- उच्च पूंजी और तकनीक का उपयोग:
- इसमें अत्यधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है।
- उच्च उपज वाले (HYV) बीज, सिंचाई, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और मशीनों का व्यापक उपयोग होता है।
- अक्सर कोल्ड स्टोरेज और अच्छी परिवहन सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
- वैज्ञानिक पद्धति:
- खेती पूरी तरह से वैज्ञानिक और बाजार-उन्मुख होती है। बाजार के रुझानों के अनुसार सब्जियों का चयन किया जाता है।
प्रमुख क्षेत्र:
- यह प्रणाली उन क्षेत्रों में विकसित हुई है जहाँ की जलवायु विशेष सब्जियों के उत्पादन के लिए अनुकूल है और जो बड़े शहरी केंद्रों से अच्छी तरह से जुड़े हुए हैं।
- उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका में फ्लोरिडा, टेक्सास, कैलिफोर्निया; भारत में नासिक (प्याज, अंगूर), पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब (आलू)।
शुष्क भूमि कृषि बनाम ट्रक कृषि (तुलनात्मक सारणी)
| आधार | शुष्क भूमि कृषि (Dryland Farming) | ट्रक कृषि (Truck Farming) |
| मुख्य उद्देश्य | निर्वाह और स्थानीय बाजार (अपने परिवार के लिए खाद्य सुरक्षा) | वाणिज्यिक (लाभ कमाना)। |
| मुख्य फसलें | मोटे अनाज, दालें, तिलहन (सूखा-सहिष्णु)। | सब्जियाँ (बाजार में मांग वाली)। |
| बाजार | स्थानीय और कभी-कभी निकटवर्ती। | दूर स्थित बड़े शहरी बाजार। |
| पूंजी और तकनीक | कम पूंजी और पारंपरिक तकनीक। | उच्च पूंजी और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक। |
| पानी की उपलब्धता | पानी की कमी (वर्षा पर निर्भर)। | सुनिश्चित सिंचाई की आवश्यकता। |
| जोखिम | जलवायु संबंधी जोखिम (सूखे का)। | बाजार संबंधी जोखिम (मूल्य में उतार-चढ़ाव, मांग में कमी)। |
| खेत का आकार | छोटे से लेकर बड़े तक। | सामान्यतः बड़े और संगठित। |
| उदाहरण क्षेत्र | महाराष्ट्र का विदर्भ, राजस्थान। | अमेरिका का कैलिफोर्निया, भारत का नासिक। |
कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों की विशिष्ट शाखाएँ
| क्र. सं. | नाम (Name) | संबंधित है (Deals with) | प्रमुख तथ्य / विवरण |
| 1. | सेरीकल्चर (Sericulture) | रेशम कीट पालन | शहतूत (Mulberry) के पत्तों पर रेशम के कीड़ों (Silkworms) को पालकर रेशम (Silk) का उत्पादन करना। भारत चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा रेशम उत्पादक है। |
| 2. | एपीकल्चर (Apiculture) | मधुमक्खी पालन | शहद (Honey) और मोम (Beeswax) के उत्पादन के लिए मधुमक्खियों को पालना। यह परागण (Pollination) में मदद करके फसलों की उपज भी बढ़ाता है। |
| 3. | पिसीकल्चर (Pisciculture) | मछली पालन | तालाबों, टैंकों या अन्य नियंत्रित जलीय वातावरण में व्यावसायिक रूप से मछली का प्रजनन और पालन करना। |
| 4. | एक्वाकल्चर (Aquaculture) | जलीय कृषि | यह एक व्यापक शब्द है जिसमें मीठे और खारे पानी में मछली, झींगा, घोंघा, शैवाल (Algae) और अन्य जलीय जीवों का पालन शामिल है। पिसीकल्चर इसी का एक हिस्सा है। |
| 5. | फ्लोरीकल्चर (Floriculture) | फूलों की खेती | व्यावसायिक रूप से फूलों (जैसे गुलाब, गेंदा, लिली) और अन्य सजावटी पौधों की खेती करना। |
| 6. | हॉर्टीकल्चर (Horticulture) | बागवानी | यह एक बहुत व्यापक शाखा है जिसमें फल (Pomology), सब्जियाँ (Olericulture), और फूल (Floriculture) की खेती के साथ-साथ मसालों, औषधीय पौधों और सजावटी बागवानी शामिल है। |
| 7. | पोमोलॉजी (Pomology) | फलों की खेती | फलों के उत्पादन और उनकी किस्मों के अध्ययन से संबंधित विज्ञान। |
| 8. | ओलेरीकल्चर (Olericulture) | सब्जियों की खेती | व्यावसायिक रूप से सब्जियों के उत्पादन से संबंधित विज्ञान। |
| 9. | विटीकल्चर (Viticulture) | अंगूर की खेती | विशेष रूप से अंगूरों की खेती और उनके उत्पादन से संबंधित विज्ञान। इसका मुख्य उद्देश्य वाइन बनाना, किशमिश बनाना या ताजे फल के रूप में बेचना होता है। |
| 10. | एग्रोनॉमी (Agronomy) | सस्य विज्ञान | यह फसल उत्पादन और मृदा प्रबंधन के सिद्धांतों और प्रथाओं का अध्ययन है। इसमें मुख्य रूप से अनाज, दालें और तिलहन जैसी मैदानी फसलें शामिल होती हैं। |
| 11. | सिल्वीकल्चर (Silviculture) | वन वर्धन | वनों को लगाना, उनके विकास, संरचना, स्वास्थ्य और गुणवत्ता का प्रबंधन करना। यह वानिकी (Forestry) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। |
| 12. | एग्रोफोरेस्ट्री (Agroforestry) | कृषि-वानिकी | एक ही भूमि पर कृषि फसलों के साथ-साथ पेड़-पौधों और/या पशुओं को एकीकृत करने की प्रणाली। |
| 13. | मोरीकल्चर (Moriculture) | शहतूत की खेती | सेरीकल्चर (रेशम उत्पादन) के लिए विशेष रूप से रेशम के कीड़ों के भोजन के रूप में शहतूत (Mulberry) के पौधों की खेती करना। |
| 14. | वर्मीकल्चर (Vermiculture) | केंचुआ पालन | जैविक कचरे को उच्च गुणवत्ता वाली खाद (जिसे वर्मीकंपोस्ट या केंचुआ खाद कहते हैं) में बदलने के लिए केंचुओं (Earthworms) का पालन करना। |
| 15. | एक्वापोनिक्स (Aquaponics) | एक्वापोनिक्स | यह एक्वाकल्चर (मछली पालन) और हाइड्रोपोनिक्स (बिना मिट्टी के पौधे उगाना) का एक संयोजन है। मछली का अपशिष्ट पौधों के लिए पोषक तत्व का काम करता है और पौधे पानी को साफ करते हैं। |
| 16. | ओलिविकल्चर (Oliviculture) | जैतून की खेती | व्यावसायिक रूप से जैतून (Olive) की खेती करना, मुख्य रूप से जैतून के तेल (Olive Oil) के उत्पादन के लिए। |
उत्पादकता और उपज: एक परिचय
कृषि के संदर्भ में, इन दो शब्दों का अक्सर प्रयोग होता है:
- उत्पादन (Production): इसका अर्थ है किसी फसल की कुल मात्रा (जैसे, टन या लाख टन में) जो एक निश्चित क्षेत्र (जैसे, पूरे देश) में उगाई गई है।
- उत्पादकता या उपज (Productivity or Yield): इसका अर्थ है प्रति इकाई क्षेत्रफल में फसल की कितनी मात्रा का उत्पादन हुआ है। इसे आमतौर पर “किलोग्राम प्रति हेक्टेयर” (Kg/Hectare) या “टन प्रति हेक्टेयर” में मापा जाता है।
किसी देश की कृषि सफलता का सही मापदंड कुल उत्पादन से अधिक उसकी उत्पादकता होती है, क्योंकि यह संसाधनों के कुशल उपयोग को दर्शाती है। भारत उत्पादन के मामले में तो विश्व में अग्रणी है, लेकिन कई फसलों की उत्पादकता में अभी भी वैश्विक औसत से पीछे है।
भारत में कृषि उत्पादकता का वर्गीकरण (अति उच्च से अति निम्न)
उत्पादकता (Productivity/Yield) का सीधा संबंध सिंचाई की उपलब्धता, आधुनिक कृषि आदानों (Inputs) का उपयोग, कृषि अवसंरचना (Infrastructure) और जलवायु से है।
1. अति उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्र (Very High Productivity Regions)
ये वे क्षेत्र हैं जिन्हें हरित क्रांति (Green Revolution) का गढ़ माना जाता है। यहाँ उत्पादकता वैश्विक मानकों के बराबर या उससे अधिक है।
- प्रमुख क्षेत्र:
- पंजाब: कृषि उत्पादकता में भारत का निर्विवाद नेता।
- हरियाणा: पंजाब के समान।
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश: विशेषकर तराई क्षेत्र।
- तटीय आंध्र प्रदेश का डेल्टा क्षेत्र (गोदावरी-कृष्णा डेल्टा): “दक्षिण भारत का अन्न भंडार”।
- तमिलनाडु का कावेरी डेल्टा क्षेत्र।
- विशेषताएँ और कारण:
- सिंचाई का लगभग शत-प्रतिशत कवरेज: नहरों और ट्यूबवेल का सघन नेटवर्क।
- गहन कृषि (Intensive Farming): भूमि के हर इंच का गहन उपयोग।
- आधुनिक आदानों का उच्च उपयोग: उच्च उपज वाले बीज (HYV seeds), रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का व्यापक और गहन उपयोग।
- उच्च स्तर का मशीनीकरण: ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर का लगभग पूर्ण उपयोग।
- मजबूत कृषि अवसंरचना: अच्छी सड़कें, बाजार (मंडियाँ), और कोल्ड स्टोरेज।
- प्रमुख फसलें: गेहूँ और चावल का रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन। तमिलनाडु में चावल और मक्के की उत्पादकता बहुत अधिक है।
- नकारात्मक पक्ष: इस उच्च उत्पादकता की कीमत अत्यधिक भूजल दोहन, मृदा निम्नीकरण, और रासायनिक प्रदूषण के रूप में चुकानी पड़ रही है।
2. उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्र (High Productivity Regions)
इन क्षेत्रों में कृषि उन्नत है लेकिन अति उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों जितनी गहन नहीं है।
- प्रमुख क्षेत्र:
- पश्चिम बंगाल (विशेषकर डेल्टा क्षेत्र): चावल उत्पादन में अग्रणी।
- केरल: नकदी फसलों (मसाले, रबर) और बागवानी में।
- गुजरात (सिंचित क्षेत्र): कपास और मूंगफली।
- मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार का सिंचित भाग।
- विशेषताएँ और कारण:
- सिंचाई की अच्छी सुविधा (लेकिन पंजाब/हरियाणा जैसी व्यापक नहीं)।
- उपजाऊ जलोढ़ मृदा।
- आधुनिक आदानों का अच्छा उपयोग।
3. मध्यम उत्पादकता वाले क्षेत्र (Moderate Productivity Regions)
ये भारत के सबसे बड़े कृषि क्षेत्रों में से हैं, जहाँ कृषि मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है, लेकिन कुछ सिंचाई की सुविधा भी उपलब्ध है।
- प्रमुख क्षेत्र:
- महाराष्ट्र: (तटीय और सिंचित क्षेत्रों को छोड़कर)।
- मध्य प्रदेश: (चंबल और नर्मदा घाटी के सिंचित क्षेत्रों को छोड़कर)।
- कर्नाटक (उत्तरी भाग)।
- झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा।
- विशेषताएँ और कारण:
- वर्षा आधारित कृषि का प्रभुत्व: सिंचाई का कवरेज 50% से कम।
- मानसून की अनिश्चितता का सीधा असर उपज पर पड़ता है।
- आधुनिक आदानों और मशीनीकरण का मध्यम स्तर का उपयोग।
- मिट्टी की उर्वरता बदलती रहती है (कहीं काली तो कहीं लाल)।
- प्रमुख फसलें: ज्वार, कपास, सोयाबीन, दालें, चावल।
4. निम्न से अति निम्न उत्पादकता वाले क्षेत्र (Low to Very Low Productivity Regions)
ये देश के सबसे गरीब और कृषि की दृष्टि से सबसे पिछड़े क्षेत्र हैं, जो पूरी तरह से प्रकृति की दया पर निर्भर हैं।
- प्रमुख क्षेत्र:
- शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र:
- पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल): अति निम्न उत्पादकता।
- गुजरात का कच्छ क्षेत्र।
- प्रायद्वीपीय भारत का वृष्टि-छाया क्षेत्र: मराठवाड़ा (महाराष्ट्र), रायलसीमा (आंध्र प्रदेश), उत्तरी आंतरिक कर्नाटक।
- अत्यधिक वर्षा और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र:
- पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियाँ: जहाँ झूम कृषि प्रचलित है।
- बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र।
- ऊँचे पर्वतीय और ठंडे मरुस्थलीय क्षेत्र:
- लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊँचे भाग।
- शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र:
- विशेषताएँ और कारण:
- प्रतिकूल जलवायु: बहुत कम या बहुत अधिक अनियंत्रित वर्षा।
- सिंचाई का पूर्ण अभाव: पूरी तरह से मानसून का जुआ।
- अनुपजाऊ मृदा: रेतीली, पथरीली या लवणीय मिट्टी।
- तकनीकी पिछड़ापन: आधुनिक आदानों और मशीनरी का लगभग कोई उपयोग नहीं।
- वित्तीय संसाधनों की भारी कमी और ऋण तक पहुँच न होना।
- जोखिम बहुत अधिक: फसल विफलता एक आम बात है।
- प्रमुख फसलें: बाजरा, ज्वार, रागी जैसे बहुत कठोर मोटे अनाज, दालें।
निष्कर्ष
भारत में कृषि उत्पादकता में भारी क्षेत्रीय विषमता है, जो मुख्य रूप से पानी की उपलब्धता से निर्धारित होती है। एक ओर पंजाब जैसा राज्य है जो रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन कर रहा है, तो दूसरी ओर राजस्थान या महाराष्ट्र का किसान है जो एक अच्छी बारिश के लिए आसमान की ओर देखता है। कृषि में क्षेत्रीय संतुलन लाना और शुष्क भूमि कृषि (Dryland Farming) की उत्पादकता को स्थायी तरीकों से बढ़ाना भारत की खाद्य सुरक्षा और समावेशी विकास के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत में प्रमुख खाद्य फसलों का उत्पादन और उपज
(नोट: आँकड़े कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के
A. अनाज (Cereals)
1. चावल (Paddy/Rice):
“भारत में प्रमुख खाद्य फसल – चावल (Rice / Paddy)” का विस्तृत विश्लेषण (UPSC / PCS परीक्षा हेतु उपयोगी और नवीनतम डेटा 2023-24 तक अद्यतन)
🌾 परिचय (Introduction)
- चावल भारत की मुख्य खाद्य फसल है, जो देश की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से के आहार का आधार है।
- यह एक खरीफ फसल है, जो मानसून की वर्षा पर निर्भर करती है।
- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है (पहला चीन)।
- चावल उत्पादन का देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 40% योगदान है।
📍 2023-24 के नवीनतम आँकड़े (Latest Data 2023-24)
- कुल उत्पादन: लगभग 136.7 मिलियन टन (1367 लाख टन) धान।
- कुल क्षेत्रफल: लगभग 440 लाख हेक्टेयर।
- औसत उपज (Yield): लगभग 3.1 टन प्रति हेक्टेयर।
- वैश्विक स्थिति: भारत चावल का सबसे बड़ा निर्यातक देश है — कुल विश्व निर्यात का लगभग 40% हिस्सा भारत का।
🌱 मुख्य उत्पादक राज्य (Top Producing States of Rice in India)
| क्रमांक | राज्य | उत्पादन (लाख टन) | विशेषताएँ |
| 1 | तेलंगाना | ~166 | सिंचाई आधारित खेती, आधुनिक बीज किस्मों का प्रयोग। |
| 2 | उत्तर प्रदेश | ~157 | गंगा के मैदानों में उपजाऊ दोमट मिट्टी, पर्याप्त सिंचाई। |
| 3 | पश्चिम बंगाल | ~151 | पारंपरिक धान क्षेत्र, उच्च वर्षा और उर्वर मिट्टी। |
| 4 | पंजाब | ~144 | हरित क्रांति का प्रमुख केंद्र, यंत्रीकृत खेती। |
| 5 | ओडिशा | ~101 | मानसूनी वर्षा पर निर्भर, धान की विविध पारंपरिक प्रजातियाँ। |
🗺️ क्षेत्रवार प्रमुखता (Area-wise Ranking)
- उत्तर प्रदेश – सर्वाधिक क्षेत्रफल (~59 लाख हेक्टेयर)
- पश्चिम बंगाल – (~52 लाख हेक्टेयर)
- तेलंगाना – (~45 लाख हेक्टेयर)
- मध्य प्रदेश – (~41 लाख हेक्टेयर)
- ओडिशा – (~38 लाख हेक्टेयर)
🌦️ उपयुक्त जलवायु (Climatic Requirements)
- तापमान: अंकुरण हेतु 20–25°C, विकास के लिए 25–35°C, पकने के समय 20–25°C।
- वर्षा: 100–200 सेंटीमीटर उपयुक्त, कुछ क्षेत्रों में सिंचाई आवश्यक।
- मिट्टी: दोमट, बलुई दोमट और जलभराव सहन करने वाली मिट्टी।
- ऊँचाई: समुद्र तल से 1500 मीटर तक उपयुक्त।
🚜 मुख्य चावल उत्पादक ऋतु (Rice Growing Seasons)
| ऋतु | बोआई का समय | कटाई का समय | प्रमुख राज्य |
| खरीफ (मुख्य फसल) | जून–जुलाई | अक्टूबर–नवंबर | पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल |
| रबी (दूसरी फसल) | नवंबर–दिसंबर | मार्च–अप्रैल | आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल |
| समर / ज़ायद (तीसरी फसल) | फरवरी–मार्च | जून–जुलाई | केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु |
🧬 मुख्य चावल की किस्में (Major Varieties)
- सांबा मसूरी, सोनामसूरी, IR-64, MTU-1010, सवित्री, Pusa Basmati-1121, Pusa Basmati-1509, PR-126 (Punjab) आदि।
- बासमती चावल भारत का प्रमुख निर्यात उत्पाद है — हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मुख्यतः उगाया जाता है।
💰 सरकारी नीतियाँ और समर्थन (Government Support & Schemes)
- MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य 2023-24): ₹2183 प्रति क्विंटल।
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN): किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): “हर खेत को पानी” के लक्ष्य हेतु सिंचाई सुधार।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM-Rice): उत्पादकता बढ़ाने हेतु विशेष कार्यक्रम।
- ई-नाम (e-NAM): किसानों के लिए डिजिटल बाजार सुविधा।
📊 2023-24 में चावल निर्यात (Rice Export from India)
- भारत से लगभग 22 मिलियन टन चावल निर्यात हुआ।
- प्रमुख आयातक देश — बांग्लादेश, नेपाल, चीन, सऊदी अरब, ईरान, नाइजीरिया, और बेनिन।
- भारत ने बासमती और गैर-बासमती दोनों प्रकार का चावल निर्यात किया।
⚙️ उत्पादन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक (Factors Affecting Rice Production)
- मानसून की अनिश्चितता
- सिंचाई सुविधाओं की उपलब्धता
- उर्वरकों और कृषि रसायनों का उपयोग
- उच्च उपज देने वाली किस्मों की पहुँच
- श्रम लागत और यंत्रीकरण का स्तर
📈 दीर्घकालीन प्रवृत्ति (Long-term Trend)
| वर्ष | उत्पादन (मिलियन टन) | क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर) | उपज (टन/हेक्टेयर) |
| 2018–19 | 116 | 438 | 2.65 |
| 2019–20 | 118 | 441 | 2.68 |
| 2020–21 | 122 | 443 | 2.75 |
| 2021–22 | 129 | 444 | 2.90 |
| 2022–23 | 135 | 439 | 3.05 |
| 2023–24 | 136.7 | 440 | 3.10 |
🧾 निष्कर्ष (Conclusion)
भारत में चावल उत्पादन कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जलवायु परिवर्तन और जल संकट जैसी चुनौतियों के बावजूद, उन्नत बीजों, सिंचाई तकनीकों और सरकारी नीतियों के सहयोग से उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो रही है। आने वाले वर्षों में सतत कृषि पद्धतियाँ, जल प्रबंधन, और जैविक खेती इस क्षेत्र की स्थिरता और उत्पादकता सुनिश्चित करेंगी।
2. गेहूँ (Wheat):
“भारत में प्रमुख खाद्य फसल – गेहूँ (Wheat)” का UPSC परीक्षा हेतु विस्तृत विश्लेषण (2023–24 के नवीनतम आँकड़ों सहित)
🌾 परिचय (Introduction)
- गेहूँ भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल है (चावल के बाद)।
- यह एक रबी फसल (Rabi Crop) है, जिसकी बोआई सर्दियों में होती है और कटाई गर्मियों के प्रारंभ में की जाती है।
- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूँ उत्पादक देश है (पहला चीन)।
- गेहूँ भारत की खाद्य सुरक्षा नीति का प्रमुख आधार है, क्योंकि इसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत करोड़ों लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में दिया जाता है।
📊 2023–24 के नवीनतम आँकड़े (Latest Data 2023–24)
| घटक | आँकड़ा |
| कुल उत्पादन | लगभग 114.0 मिलियन टन (1140 लाख टन) |
| कुल क्षेत्रफल | लगभग 304 लाख हेक्टेयर |
| औसत उपज | लगभग 3.75 टन प्रति हेक्टेयर |
| वैश्विक स्थान | विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक (चीन के बाद) |
| निर्यात | लगभग 3.5–4 मिलियन टन गेहूँ का निर्यात हुआ |
| MSP (2023–24) | ₹2275 प्रति क्विंटल |
🗺️ मुख्य गेहूँ उत्पादक राज्य (Top Wheat Producing States)
| क्रमांक | राज्य | उत्पादन (लाख टन) | प्रमुख विशेषताएँ |
| 1 | उत्तर प्रदेश | ~355 | सर्वाधिक क्षेत्रफल और उत्पादन दोनों में प्रथम। |
| 2 | मध्य प्रदेश | ~230 | उच्च उपज किस्मों (शरबती, लोकवन) का उत्पादन। |
| 3 | पंजाब | ~170 | यंत्रीकृत खेती, सिंचाई सुविधाओं का सर्वोत्तम उपयोग। |
| 4 | हरियाणा | ~120 | उच्च उत्पादकता, उर्वर दोमट मिट्टी। |
| 5 | राजस्थान | ~110 | शुष्क क्षेत्र में भी उन्नत किस्मों से उपज में वृद्धि। |
🌱 क्षेत्रवार (Area-wise) प्रमुख राज्य
- उत्तर प्रदेश — लगभग 97 लाख हेक्टेयर
- मध्य प्रदेश — लगभग 59 लाख हेक्टेयर
- पंजाब — लगभग 35 लाख हेक्टेयर
- राजस्थान — लगभग 31 लाख हेक्टेयर
- हरियाणा — लगभग 25 लाख हेक्टेयर
🌦️ उपयुक्त जलवायु (Climatic Requirements)
- फसल का प्रकार: रबी फसल (ठंडी ऋतु की फसल)
- तापमान:
- अंकुरण हेतु 10–15°C
- वृद्धि हेतु 20–25°C
- पकने के समय 25°C से अधिक नहीं होना चाहिए
- अंकुरण हेतु 10–15°C
- वर्षा: 75–100 सेंटीमीटर उपयुक्त
- मिट्टी: गंगा के मैदानी भाग की दोमट, जलनिकासी युक्त उपजाऊ मिट्टी।
- सिंचाई: 4–5 बार सिंचाई आवश्यक (विशेषकर पुष्पन और दाना भरने की अवस्था में)।
🧬 मुख्य गेहूँ की किस्में (Major Varieties of Wheat)
- HD-2967, HD-3086, PBW-343, PBW-725, HI-1544 (शरबती), Lok-1, WH-1105, DBW-187, HD-3226
- शरबती गेहूँ (मध्य प्रदेश में प्रसिद्ध) – उच्च गुणवत्ता वाला और निर्यात योग्य गेहूँ।
- बासमती की तरह, “शरबती गेहूँ” भारत के कुछ विशेष क्षेत्रों की भौगोलिक पहचान (GI Tag) के रूप में जाना जाता है।
🏛️ सरकारी योजनाएँ और समर्थन नीतियाँ
- MSP (2023–24): ₹2275 प्रति क्विंटल
- भारतीय खाद्य निगम (FCI) — सरकार द्वारा गेहूँ की खरीद और भंडारण।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM-Wheat): उपज और गुणवत्ता सुधार हेतु योजना।
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN): किसानों को आर्थिक सहायता।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): “हर खेत को पानी” अभियान से लाभ।
- ई-नाम (e-NAM): डिजिटल कृषि बाजार सुविधा।
⚙️ उत्पादन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Production)
- समय पर बुवाई एवं उचित सिंचाई।
- तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) — पकने के समय उच्च तापमान दानों की गुणवत्ता घटाता है।
- उर्वरक उपयोग का संतुलन।
- कीट एवं रोग नियंत्रण।
- यंत्रीकरण व आधुनिक तकनीक का उपयोग।
📈 पिछले वर्षों की प्रवृत्ति (Production Trend)
| वर्ष | उत्पादन (मिलियन टन) | क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर) | उपज (टन/हेक्टेयर) |
| 2018–19 | 102.2 | 298 | 3.43 |
| 2019–20 | 107.6 | 300 | 3.58 |
| 2020–21 | 109.6 | 301 | 3.63 |
| 2021–22 | 106.8 | 303 | 3.52 |
| 2022–23 | 112.7 | 304 | 3.70 |
| 2023–24 | 114.0 | 304 | 3.75 |
🌾 निर्यात स्थिति (Export Scenario)
- भारत ने वर्ष 2023–24 में लगभग 3.5–4 मिलियन टन गेहूँ का निर्यात किया।
- प्रमुख निर्यात गंतव्य देश: बांग्लादेश, नेपाल, इंडोनेशिया, श्रीलंका, केन्या, सोमालिया आदि।
- सरकार ने घरेलू आपूर्ति बनाए रखने हेतु कुछ समय के लिए निर्यात पर प्रतिबंध भी लगाया था।
⚠️ चुनौतियाँ (Major Challenges)
- जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि से फसल पर प्रतिकूल प्रभाव।
- जल संसाधनों की कमी।
- भंडारण में नुकसान (Storage Losses)।
- छोटे और सीमांत किसानों की लागत में वृद्धि।
- टिकाऊ खेती की आवश्यकता (Sustainable Agriculture Practices)।
🧾 निष्कर्ष (Conclusion)
भारत में गेहूँ उत्पादन स्थिरता और खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है।
उन्नत बीज किस्मों, सिंचाई प्रबंधन, और सरकारी समर्थन योजनाओं के माध्यम से भारत आने वाले वर्षों में उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में विश्व स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत बनाए रख सकता है।
भविष्य में क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि, जल संरक्षण, और फसल विविधीकरण इस क्षेत्र की प्रगति की कुंजी होंगे।
B. मोटे अनाज (Millets / Coarse Cereals) – (अब इन्हें “पोषक-अनाज” या “श्री अन्न” कहा जाता है)
1. ज्वार (Sorghum):
- विवरण: यह क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से देश की तीसरी महत्वपूर्ण खाद्य फसल है। यह मुख्य रूप से वर्षा-आधारित (बारानी) फसल है।
- कुल उत्पादन: 4.1 मिलियन टन (2022-23)।
- प्रमुख उत्पादक राज्य:
- महाराष्ट्र
- कर्नाटक
- राजस्थान
2. बाजरा (Pearl Millet):
- विवरण: यह बलुई और उथली काली मिट्टी पर अच्छी तरह से उगता है। यह शुष्क क्षेत्रों की एक महत्वपूर्ण फसल है।
- कुल उत्पादन: 11.6 मिलियन टन (2022-23)।
- प्रमुख उत्पादक राज्य:
- राजस्थान (देश के उत्पादन का बड़ा हिस्सा)
- उत्तर प्रदेश
- हरियाणा
3. मक्का (Maize):
“भारत में प्रमुख खाद्य फसल – मक्का (Maize / Corn)” का UPSC परीक्षा हेतु विस्तृत विश्लेषण (2023–24 के नवीनतम आँकड़ों सहित)
🌽 परिचय (Introduction)
- मक्का भारत की एक महत्वपूर्ण अनाज फसल (Cereal Crop) है, जिसे “कॉर्न” या “मकई” भी कहा जाता है।
- यह एक खरीफ फसल है, परंतु कुछ क्षेत्रों में रबी और ज़ायद मौसम में भी उगाई जाती है।
- भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा मक्का उत्पादक देश है।
- मक्का का उपयोग न केवल खाद्य अनाज के रूप में, बल्कि पशु आहार (Feed), स्टार्च, तेल, एथेनॉल और औद्योगिक उपयोगों में भी किया जाता है।
📊 2023–24 के नवीनतम आँकड़े (Latest Data 2023–24)
| घटक | आँकड़ा |
| कुल उत्पादन | लगभग 36.8 मिलियन टन (368 लाख टन) |
| कुल क्षेत्रफल | लगभग 101 लाख हेक्टेयर |
| औसत उपज (Yield) | लगभग 3.64 टन प्रति हेक्टेयर |
| वैश्विक स्थान | विश्व में 7वाँ स्थान (उत्पादन के आधार पर) |
| निर्यात | लगभग 4 मिलियन टन (मुख्यतः दक्षिण-पूर्व एशिया को) |
| MSP (2023–24) | ₹2090 प्रति क्विंटल |
🗺️ मुख्य मक्का उत्पादक राज्य (Top Maize Producing States)
| क्रमांक | राज्य | उत्पादन (लाख टन) | प्रमुख विशेषताएँ |
| 1 | कर्नाटक | ~55 | सबसे बड़ा उत्पादक राज्य; रबी और खरीफ दोनों मौसम में खेती। |
| 2 | मध्य प्रदेश | ~47 | सिंचित क्षेत्र में उच्च उपज देने वाली किस्में; औद्योगिक उपयोग हेतु मक्का। |
| 3 | बिहार | ~35 | मानसून आधारित खेती, उच्च घनत्व बोआई तकनीक। |
| 4 | तेलंगाना | ~33 | आधुनिक तकनीकों से उपज में निरंतर वृद्धि। |
| 5 | राजस्थान | ~30 | शुष्क क्षेत्र में सूखा प्रतिरोधी किस्में अपनाई जा रही हैं। |
🌱 क्षेत्रवार प्रमुख राज्य (Area-wise Ranking)
- मध्य प्रदेश — लगभग 17 लाख हेक्टेयर
- कर्नाटक — लगभग 16 लाख हेक्टेयर
- बिहार — लगभग 9 लाख हेक्टेयर
- राजस्थान — लगभग 8 लाख हेक्टेयर
- तेलंगाना — लगभग 7 लाख हेक्टेयर
🌦️ उपयुक्त जलवायु (Climatic Requirements)
- फसल का प्रकार: खरीफ प्रमुख, परंतु रबी और ज़ायद में भी उगाई जाती है।
- तापमान: 21°C–30°C आदर्श (अंकुरण के लिए न्यूनतम 18°C आवश्यक)।
- वर्षा: 50–100 सेंटीमीटर उपयुक्त।
- मिट्टी: दोमट, जलनिकासी युक्त, pH 6.0–7.5 वाली मिट्टी सर्वोत्तम।
- ऊँचाई: समुद्र तल से 1800 मीटर तक उगाई जा सकती है।
🧬 मुख्य किस्में (Important Varieties of Maize)
- Hybrid Varieties: DKC-9125, NMH-731, HQPM-1, Bio-9637, HM-8, Ganga-5
- Improved Varieties: Vivek Hybrid-9, Prabhat, Navjot, Deccan-103, Shaktiman-1 to 5
- उच्च प्रोटीन युक्त किस्में: QPM (Quality Protein Maize) जैसे HQPM-1 और HQPM-5।
- कई राज्य बीज क्रांति (Seed Replacement Program) के तहत उन्नत हाइब्रिड किस्मों को बढ़ावा दे रहे हैं।
🚜 खेती के मौसम (Cropping Seasons)
| ऋतु | बोआई का समय | कटाई का समय | प्रमुख राज्य |
| खरीफ (मुख्य फसल) | जून–जुलाई | अक्टूबर–नवंबर | कर्नाटक, मध्य प्रदेश, बिहार |
| रबी | नवंबर–दिसंबर | मार्च–अप्रैल | आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु |
| ज़ायद (तीसरी फसल) | फरवरी–मार्च | जून–जुलाई | बिहार, पश्चिम बंगाल |
🏛️ सरकारी नीतियाँ और योजनाएँ
- MSP (2023–24): ₹2090 प्रति क्विंटल
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM–Maize): मक्का उत्पादन में आत्मनिर्भरता हेतु।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): “हर खेत को पानी”।
- राष्ट्रीय बीज निगम (NSC): उच्च गुणवत्ता वाले बीज वितरण।
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY): आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देना।
- एथेनॉल नीति 2023: मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहन — “Ethanol Blending Program” में मक्का का बड़ा योगदान।
📈 पिछले वर्षों की प्रवृत्ति (Production Trend)
| वर्ष | उत्पादन (मिलियन टन) | क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर) | उपज (टन/हेक्टेयर) |
| 2018–19 | 27.3 | 96 | 2.85 |
| 2019–20 | 28.8 | 97 | 2.97 |
| 2020–21 | 31.6 | 98 | 3.22 |
| 2021–22 | 33.9 | 99 | 3.42 |
| 2022–23 | 35.9 | 100 | 3.55 |
| 2023–24 | 36.8 | 101 | 3.64 |
📦 निर्यात (Export Scenario)
- भारत से 2023–24 में लगभग 4 मिलियन टन मक्का निर्यात हुआ।
- मुख्य निर्यात देश: नेपाल, बांग्लादेश, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया।
- मक्का का उपयोग एथेनॉल उत्पादन में भी बढ़ा है, जिससे घरेलू माँग तेजी से बढ़ रही है।
⚠️ मुख्य चुनौतियाँ (Major Challenges)
- अस्थिर मानसून और जलवायु परिवर्तन।
- कीट और रोग जैसे “फॉल आर्मीवर्म (Fall Armyworm)” का प्रकोप।
- सिंचाई की सीमित उपलब्धता।
- विपणन और मूल्य अस्थिरता।
- उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की कमी कुछ क्षेत्रों में।
🧾 निष्कर्ष (Conclusion)
भारत में मक्का न केवल खाद्य फसल के रूप में बल्कि औद्योगिक और जैव-ईंधन (Biofuel) फसल के रूप में भी महत्वपूर्ण होती जा रही है।
सरकारी नीतियों, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम, और कृषि तकनीकी नवाचारों के चलते मक्का का उत्पादन और मूल्य स्थिरता दोनों में सुधार की संभावना है।
आने वाले वर्षों में हाइब्रिड बीज तकनीक, जल-संवेदनशील सिंचाई, और फसल विविधीकरण मक्का की उत्पादकता बढ़ाने की कुंजी साबित होंगे।
C. दालें (Pulses)
- विवरण: भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता दोनों है। ये फलीदार फसलें होती हैं और नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) करके मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती हैं।
- प्रमुख दालें: चना, अरहर (तूर), उड़द, मूंग, मसूर।
- कुल उत्पादन: 27.5 मिलियन टन (रिकॉर्ड उत्पादन) (2022-23)।
- प्रमुख उत्पादक राज्य (कुल उत्पादन में):
- मध्य प्रदेश
- महाराष्ट्र
- राजस्थान
भारतीय कृषि उत्पादकता की स्थिति और चुनौतियाँ
- सकारात्मक पक्ष: हरित क्रांति के बाद, भारत की प्रमुख फसलों, विशेषकर चावल और गेहूं, की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारत आज खाद्यान्न में आत्मनिर्भर (Self-sufficient) है।
- चुनौतियाँ:
- क्षेत्रीय असमानता: पंजाब, हरियाणा जैसे सिंचित राज्यों की उत्पादकता, वर्षा-आधारित क्षेत्रों (जैसे महाराष्ट्र, राजस्थान) की तुलना में बहुत अधिक है।
- वैश्विक तुलना: चीन, अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों की तुलना में भारत में अभी भी कई फसलों की प्रति हेक्टेयर उपज कम है।
- टिकाऊपन (Sustainability): पंजाब जैसे राज्यों में उच्च उत्पादकता रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और भूजल के अत्यधिक दोहन की कीमत पर हासिल की गई है, जो अब मृदा निम्नीकरण और जल संकट जैसी गंभीर समस्याएँ पैदा कर रही है।
- जलवायु परिवर्तन: वर्षा के पैटर्न में बदलाव और बढ़ता तापमान उत्पादकता के लिए एक बड़ा खतरा है।
आगे की राह: उत्पादकता बढ़ाने के लिए अब ध्यान हरित क्रांति 2.0 या सदाबहार क्रांति (Evergreen Revolution) पर है, जिसका उद्देश्य केवल उपज बढ़ाना नहीं, बल्कि इसे पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ तरीकों से बढ़ाना है। इसमें सूखा-प्रतिरोधी बीजों का विकास, सटीक कृषि, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और जल संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है।
भारतीय कृषि को प्रभावित करने वाले कारक
भारतीय कृषि एक जटिल प्रणाली है, जिसकी सफलता और विफलता कई परस्पर जुड़े हुए कारकों पर निर्भर करती है। इन कारकों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
- भौतिक या प्राकृतिक कारक (Physical or Natural Factors)
- संस्थागत कारक (Institutional Factors)
- अवसंरचनात्मक कारक (Infrastructural Factors)
- तकनीकी कारक (Technological Factors)
1. भौतिक या प्राकृतिक कारक (Physical Factors)
ये वे प्राकृतिक दशाएँ हैं जिन पर मनुष्य का बहुत कम या कोई नियंत्रण नहीं होता। ये कृषि के लिए आधार तैयार करते हैं।
- A) जलवायु (Climate): यह भारतीय कृषि को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक है।
- मानसून: भारतीय कृषि की लगभग 60% खेती आज भी सिंचाई के लिए पूरी तरह से मानसून पर निर्भर है। मानसून का समय पर आना, उसकी मात्रा और वितरण सीधे तौर पर फसल की सफलता या विफलता को निर्धारित करता है। इसीलिए भारतीय कृषि को “मानसून का जुआ” कहा जाता है।
- तापमान: प्रत्येक फसल को एक विशेष तापमान सीमा की आवश्यकता होती है। बढ़ता तापमान और लू (Heatwaves) फसलों, विशेषकर गेहूं, को नुकसान पहुँचा सकती हैं।
- प्राकृतिक आपदाएँ: सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, पाला और चक्रवात जैसी घटनाएँ खड़ी फसलों को पूरी तरह से नष्ट कर सकती हैं।
- B) उच्चावच या स्थलाकृति (Relief or Topography):
- समतल मैदान: गंगा के समतल और उपजाऊ मैदान सघन कृषि और मशीनीकरण के लिए आदर्श हैं।
- पहाड़ी ढलान: पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि करना कठिन होता है और यहाँ मुख्य रूप से सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) या बागवानी ही संभव हो पाती है।
- C) मृदा (Soil):
- मिट्टी का प्रकार और उसकी उर्वरता यह निर्धारित करती है कि कौन सी फसल उगाई जा सकती है।
- उदाहरण: कपास के लिए काली मिट्टी, गेहूं-चावल के लिए जलोढ़ मिट्टी, और चाय-कॉफी के लिए लैटेराइट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। मृदा का स्वास्थ्य और पोषक तत्वों की उपलब्धता सीधे तौर पर उत्पादकता को प्रभावित करती है।
2. संस्थागत कारक (Institutional Factors)
ये वे नीतियाँ, कानून और सामाजिक संरचनाएँ हैं जो कृषि को प्रभावित करती हैं।
- A) जोत का आकार (Size of Land Holdings):
- भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास छोटी और बिखरी हुई (Fragmented) जोतें हैं। यह मशीनीकरण, आधुनिक तकनीक के उपयोग और बड़े पैमाने पर निवेश में एक बड़ी बाधा है।
- B) भू-स्वामित्व प्रणाली (Land Tenure System):
- यद्यपि जमींदारी प्रथा समाप्त हो चुकी है, फिर भी भूमि का असमान वितरण और किरायेदारी से संबंधित मुद्दे किसानों के निवेश करने की क्षमता और इच्छा को प्रभावित करते हैं।
- C) सरकारी नीतियाँ (Government Policies):
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): यह किसानों को उनकी उपज के लिए एक निश्चित मूल्य की गारंटी देकर उन्हें प्रोत्साहित करता है।
- कृषि ऋण और बीमा: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाएँ किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती हैं।
- सब्सिडी: उर्वरक, बीज और बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी लागत को कम करती है।
3. अवसंरचनात्मक कारक (Infrastructural Factors)
यह कृषि के लिए आवश्यक भौतिक सुविधाओं और सेवाओं को संदर्भित करता है।
- A) सिंचाई (Irrigation):
- सिंचाई की उपलब्धता कृषि को मानसून की अनिश्चितता से बचाती है और एक वर्ष में कई फसलें लेना संभव बनाती है। नहरों, ट्यूबवेल और तालाबों का नेटवर्क उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- B) साख (Credit):
- किसानों को बीज, उर्वरक और मशीनरी खरीदने के लिए समय पर और सस्ती दरों पर ऋण की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- C) विपणन और भंडारण (Marketing and Storage):
- APMC मंडियाँ: किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए एक संगठित बाजार प्रदान करती हैं।
- भंडारण सुविधाएँ: कोल्ड स्टोरेज और गोदामों की कमी के कारण कटाई के बाद एक बड़ा हिस्सा (विशेषकर फल और सब्जियाँ) खराब हो जाता है।
- परिवहन: गाँवों को बाजारों से जोड़ने वाली अच्छी सड़कों का नेटवर्क उपज को समय पर बाजार तक पहुँचाने के लिए आवश्यक है।
- D) विद्युतीकरण (Electrification):
- सिंचाई के लिए ट्यूबवेल चलाने और कृषि आधारित ग्रामीण उद्योगों के लिए बिजली एक महत्वपूर्ण इनपुट है।
4. तकनीकी कारक (Technological Factors)
ये कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए उपयोग की जाने वाली वैज्ञानिक विधियाँ और उपकरण हैं।
- A) उच्च उपज वाले बीज (High Yielding Variety – HYV Seeds):
- हरित क्रांति का आधार HYV बीजों ने ही रखा था, जिन्होंने गेहूं और चावल की उत्पादकता को कई गुना बढ़ा दिया।
- B) रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक:
- ये मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं और फसलों को कीटों तथा बीमारियों से बचाते हैं। हालाँकि, इनके असंतुलित उपयोग ने मृदा निम्नीकरण और प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी पैदा की हैं।
- C) मशीनीकरण (Mechanization):
- ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर और ड्रिप सिंचाई जैसी मशीनों और तकनीकों का उपयोग श्रम की लागत को कम करता है, दक्षता बढ़ाता है और समय की बचत करता है।
- D) कृषि अनुसंधान:
- नए और बेहतर बीजों का विकास, कीट प्रतिरोधी किस्मों का निर्माण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर शोध उत्पादकता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष:
भारतीय कृषि इन सभी कारकों का एक जटिल ताना-बाना है। केवल एक कारक (जैसे अच्छा मानसून) सफलता की गारंटी नहीं दे सकता। स्थायी और लाभदायक कृषि के लिए, इन सभी कारकों – भौतिक, संस्थागत, अवसंरचनात्मक और तकनीकी – में एक साथ सुधार करने की आवश्यकता है।
कृषि जोत एवं आकार: भारतीय कृषि की संरचनात्मक वास्तविकता
परिभाषा:
कृषि जोत (Agricultural Holding) से तात्पर्य उस कुल भूमि क्षेत्र से है जिसका उपयोग कृषि उत्पादन के लिए पूरी तरह या आंशिक रूप से एक एकल इकाई के रूप में किया जाता है, और इसका प्रबंधन एक व्यक्ति, एक परिवार या एक समूह द्वारा किया जाता है, भले ही उसका स्वामित्व एक हो या अलग-अलग।
सरल शब्दों में, यह वह जमीन का टुकड़ा है जिस पर एक किसान या उसका परिवार खेती करता है।
जोत का आकार (Size of Holding) उस भूमि के क्षेत्रफल को संदर्भित करता है।
भारत में कृषि जोतों का वर्गीकरण (Classification in India)
भारत में, कृषि जोतों को उनके आकार के आधार पर निम्नलिखित पाँच श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। यह वर्गीकरण कृषि संगणना (Agriculture Census) द्वारा किया जाता है, जो हर पाँच साल में होती है।
| श्रेणी (Category) | जोत का आकार (Hectares में) | किसानों का प्रकार |
| 1. | 1.0 हेक्टेयर से कम | सीमांत किसान (Marginal Farmers) |
| 2. | 1.0 से 2.0 हेक्टेयर के बीच | छोटे किसान (Small Farmers) |
| 3. | 2.0 से 4.0 हेक्टेयर के बीच | अर्ध-मध्यम किसान (Semi-medium Farmers) |
| 4. | 4.0 से 10.0 हेक्टेयर के बीच | मध्यम किसान (Medium Farmers) |
| 5. | 10.0 हेक्टेयर से अधिक | बड़े किसान (Large Farmers) |
भारतीय कृषि जोतों की प्रमुख विशेषताएँ और नवीनतम आँकड़े
(स्रोत: कृषि संगणना 2015-16, जो नवीनतम उपलब्ध विस्तृत आँकड़े हैं)
- छोटे और सीमांत किसानों का प्रभुत्व:
- यह भारतीय कृषि की सबसे प्रमुख और परिभाषित विशेषता है।
- सीमांत किसान (1 हेक्टेयर से कम): कुल किसानों में इनकी संख्या 68.5% है।
- छोटे किसान (1-2 हेक्टेयर): कुल किसानों में इनकी संख्या 17.6% है।
- निष्कर्ष: कुल मिलाकर, भारत के 86% से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम भूमि है।
- भूमि वितरण में भारी असमानता:
- छोटे और सीमांत किसान (कुल 86%): इनके पास देश की कुल कृषि भूमि का केवल 47.3% हिस्सा ही है।
- बड़े किसान (कुल 1% से भी कम): इनके पास देश की कुल कृषि भूमि का 10% से अधिक हिस्सा है।
- यह दर्शाता है कि किसानों की एक बहुत बड़ी संख्या बहुत कम भूमि पर निर्भर है।
- औसत जोत आकार में लगातार गिरावट:
- भारत में औसत जोत का आकार (Average size of holding) लगातार घट रहा है।
- 2010-11: औसत आकार 1.15 हेक्टेयर था।
- 2015-16: औसत आकार घटकर 1.08 हेक्टेयर हो गया।
- कारण: इसका मुख्य कारण जनसंख्या वृद्धि और विरासत के कानून हैं, जिनके तहत पिता की भूमि उसकी संतानों में विभाजित हो जाती है, जिससे पीढ़ियों से खेत छोटे और छोटे होते जाते हैं।
- भूमि का विखंडन (Fragmentation of Land):
- समस्या केवल जोतों के छोटे होने की नहीं है, बल्कि उनके विखंडित होने की भी है।
- एक ही किसान के छोटे-छोटे खेत एक जगह होने के बजाय कई अलग-अलग, बिखरे हुए स्थानों पर होते हैं।
- उदाहरण: एक किसान के पास कुल 1.5 हेक्टेयर भूमि हो सकती है, लेकिन यह 0.5 हेक्टेयर के तीन अलग-अलग टुकड़ों में हो सकती है जो एक-दूसरे से दूर हों।
छोटे और विखंडित जोतों के नकारात्मक प्रभाव (Adverse Impacts)
छोटे और बिखरे हुए खेत भारतीय कृषि की कई समस्याओं की जड़ हैं:
- आर्थिक अव्यवहार्यता (Economic Non-viability):
- छोटे खेतों से होने वाली आय इतनी कम होती है कि किसान के परिवार का भरण-पोषण मुश्किल से हो पाता है, जिससे वे गरीबी और ऋण के दुष्चक्र में फँसे रहते हैं।
- मशीनीकरण में बाधा (Hinders Mechanization):
- ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और अन्य बड़ी मशीनों का उपयोग छोटे और बिखरे हुए खेतों पर असंभव और महंगा होता है। इससे श्रम लागत बढ़ती है।
- संसाधनों की बर्बादी (Wastage of Resources):
- खेतों के बीच की मेड़ों (Boundaries) में काफी भूमि बर्बाद हो जाती है।
- बिखरे हुए खेतों तक सिंचाई का पानी, उर्वरक और अन्य इनपुट ले जाने में समय, श्रम और धन की बर्बादी होती है।
- आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने में कठिनाई:
- छोटे किसान अक्सर नई तकनीक, उन्नत बीज या ड्रिप सिंचाई जैसी पद्धतियों में निवेश करने का जोखिम नहीं उठा पाते।
- कृषि विविधीकरण में बाधा:
- किसान अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से केवल अनाज उगाने पर मजबूर होता है और उच्च-मूल्य वाली फसलों (जैसे फल, सब्जियाँ) की ओर विविधिकरण नहीं कर पाता।
समस्या के समाधान के उपाय (Solutions)
- चकबंदी (Consolidation of Holdings):
- यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक किसान के बिखरे हुए खेतों को एक स्थान पर एक बड़े खेत के रूप में पुनर्गठित किया जाता है।
- अनिवार्य चकबंदी पंजाब और हरियाणा में सफल रही है, लेकिन भारत के कई अन्य हिस्सों में सामाजिक और कानूनी बाधाओं के कारण यह सफल नहीं हो पाई है।
- सहकारी कृषि (Cooperative Farming):
- छोटे किसानों को स्वेच्छा से मिलकर अपनी भूमि को একত্রিত करके सामूहिक रूप से खेती करने के लिए प्रोत्साहित करना।
- किसान उत्पादक संगठन (Farmer Producer Organizations – FPOs):
- FPOs के माध्यम से, छोटे किसान सामूहिक रूप से इनपुट खरीद सकते हैं, मशीनरी किराए पर ले सकते हैं और अपनी उपज बेच सकते हैं, जिससे उनकी सौदेबाजी की शक्ति बढ़ जाती है।
- भूमि पट्टे पर देने के कानूनों में सुधार (Land Leasing Reforms):
- किसानों को अपनी भूमि दूसरों को पट्टे (Lease) पर देने के लिए एक सुरक्षित और कानूनी ढाँचा प्रदान करना ताकि वे गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार खोज सकें।
निष्कर्ष:
छोटे और घटते जोत आकार भारतीय कृषि की सबसे बड़ी संरचनात्मक चुनौती है। यह न केवल किसानों की आय को सीमित करता है बल्कि देश की कृषि उत्पादकता को भी प्रभावित करता है। इस समस्या से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें कानूनी सुधारों से लेकर सहकारी मॉडल और प्रौद्योगिकी के उपयोग तक सब कुछ शामिल हो।
कृषि-जलवायु प्रदेश (Agro-Climatic Zones): कृषि नियोजन का आधार
परिभाषा:
एक कृषि-जलवायु प्रदेश एक ऐसा भूमि क्षेत्र (Land Unit) होता है जिसकी जलवायु (Climate) और भौतिक विशेषताओं (Physiography), विशेषकर तापमान, वर्षा, और मृदा के प्रकार में काफी हद तक समानता पाई जाती है। यह क्षेत्र एक विशेष प्रकार की फसल प्रणाली (Cropping Pattern) और कृषि पद्धतियों के लिए उपयुक्त होता है।
सरल शब्दों में, यह देश को ऐसे क्षेत्रों में विभाजित करने का एक वैज्ञानिक तरीका है जहाँ की कृषि संबंधी परिस्थितियाँ (मिट्टी, पानी, मौसम) लगभग एक जैसी हों।
उद्देश्य:
इस वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र-विशिष्ट (Area-specific) और संसाधन-आधारित (Resource-based) कृषि योजना बनाना है। इसका लक्ष्य है:
- प्रत्येक क्षेत्र की क्षमता के अनुसार उपयुक्त फसलों का चयन करना।
- प्राकृतिक संसाधनों (भूमि, जल) का कुशलतम और टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करना।
- क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना और कृषि उत्पादकता में वृद्धि करना।
भारत के कृषि-जलवायु प्रदेश: योजना आयोग का वर्गीकरण
भारत में, योजना आयोग (Planning Commission) ने 1988 में देश को 15 कृषि-जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया। यह वर्गीकरण वर्षा, तापमान, स्थलाकृति, मृदा और फसल प्रणाली जैसे प्रमुख कारकों पर आधारित है।
यह भारत में कृषि नियोजन और अनुसंधान के लिए सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत वर्गीकरण है।
भारत के 15 कृषि-जलवायु प्रदेशों की सूची
| क्र. सं. | प्रदेश का नाम (Zone Name) | प्रमुख राज्य / क्षेत्र | विशेषताएँ |
| 1. | पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र | जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड | पहाड़ी स्थलाकृति, शीतोष्ण जलवायु, बागवानी (सेब, आड़ू), सीढ़ीदार खेती। |
| 2. | पूर्वी हिमालयी क्षेत्र | सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, पूर्वोत्तर की पहाड़ियाँ | अत्यधिक वर्षा, उच्च वन आवरण, झूम कृषि की समस्या, चाय और चावल की खेती। |
| 3. | निचला गंगा का मैदान | पश्चिम बंगाल, पूर्वी बिहार | उच्च वर्षा, उपजाऊ जलोढ़ मृदा, चावल और जूट प्रमुख फसलें। |
| **4. ** | मध्य गंगा का मैदान | पूर्वी उत्तर प्रदेश, अधिकांश बिहार | उपजाऊ जलोढ़ मृदा, सघन जनसंख्या, चावल-गेहूँ फसल प्रणाली, सिंचाई पर निर्भरता। |
| 5. | ऊपरी गंगा का मैदान | मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली | अच्छी सिंचाई सुविधाएँ, गहन कृषि, गेहूँ-चावल-गन्ना प्रमुख फसलें। |
| 6. | गंगा-पार का मैदान (Trans-Ganga Plains) | पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तरी राजस्थान | हरित क्रांति का केंद्र, अत्यधिक सिंचित, गहन कृषि, गेहूँ-चावल-कपास, भूजल का अत्यधिक दोहन। |
| 7. | पूर्वी पठार और पहाड़ियाँ | छोटानागपुर पठार (झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़), दंडकारण्य | लाल-पीली मृदा, वर्षा आधारित कृषि, चावल, मोटे अनाज, दालें, खनिज समृद्ध। |
| 8. | मध्य पठार और पहाड़ियाँ | बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा पठार (अधिकांश मध्य प्रदेश) | काली और लाल-पीली मृदा का मिश्रण, वर्षा आधारित, सोयाबीन, चना, गेहूँ। |
| 9. | पश्चिमी पठार और पहाड़ियाँ | दक्कन का पठार (अधिकांश महाराष्ट्र) और मालवा का हिस्सा | काली मृदा (रेगुर), कम वर्षा, कपास, ज्वार, गन्ना, मूंगफली। |
| 10. | दक्षिणी पठार और पहाड़ियाँ | आंतरिक कर्नाटक, रायलसीमा (आंध्र प्रदेश), पश्चिमी तमिलनाडु | शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र, वृष्टि-छाया क्षेत्र, मोटे अनाज (रागी, ज्वार), दालें, तिलहन। |
| 11. | पूर्वी तटीय मैदान और घाटियाँ | कोरोमंडल तट (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश), ओडिशा तट | डेल्टाई जलोढ़ मृदा, चावल की सघन खेती (“दक्षिण भारत का अन्न भंडार”), लौटते मानसून से वर्षा। |
| 12. | पश्चिमी तटीय मैदान और घाटियाँ | मालाबार और कोंकण तट (केरल, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र) | अत्यधिक वर्षा, लैटेराइट और जलोढ़ मृदा, बागानी फसलें (नारियल, रबर, मसाले), चावल। |
| 13. | गुजरात के मैदान और पहाड़ियाँ | गुजरात (सौराष्ट्र और कच्छ) | अर्ध-शुष्क, काली और मरुस्थलीय मृदा, कपास, मूंगफली, बाजरा। |
| 14. | पश्चिमी शुष्क क्षेत्र | पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल) | बहुत कम वर्षा, रेतीली मरुस्थलीय मृदा, वायु अपरदन, बाजरा और दालें (वर्षा आधारित)। |
| 15. | द्वीप क्षेत्र | अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप | उष्णकटिबंधीय जलवायु, उच्च वर्षा, सदाबहार वन, नारियल और मसाले, चावल। |
राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परियोजना (NARP) का वर्गीकरण
योजना आयोग के वर्गीकरण के अलावा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परियोजना (National Agricultural Research Project – NARP) के तहत, कृषि अनुसंधान और विस्तार सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए देश को और भी अधिक सूक्ष्म स्तर पर 127 कृषि-जलवायु उप-प्रदेशों (Agro-Climatic Sub-zones) में विभाजित किया है। यह वर्गीकरण और भी अधिक विस्तृत और स्थानीयकृत है।
निष्कर्ष:
कृषि-जलवायु प्रदेशों का वर्गीकरण एक “एक आकार सभी पर फिट नहीं होता” (One-size-doesn’t-fit-all) के सिद्धांत पर आधारित है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि भारत के हर क्षेत्र की अपनी अनूठी कृषि क्षमताएँ और चुनौतियाँ हैं। इन क्षेत्रों के आधार पर लक्षित नीतियाँ और योजनाएँ बनाकर ही भारत अपनी कृषि उत्पादकता को बढ़ा सकता है और टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
भारत में कृषि क्रांतियाँ: उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि
“कृषि क्रांति” का तात्पर्य कृषि उत्पादन की किसी विशेष शाखा में नई तकनीक, सरकारी नीतियों और वैज्ञानिक अनुसंधानों के माध्यम से हुई अभूतपूर्व और तीव्र वृद्धि से है। इन क्रांतियों ने भारत को न केवल खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि दुग्ध, मत्स्य, और बागवानी जैसे क्षेत्रों में भी एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
प्रमुख कृषि क्रांतियों की सूची
| क्रांति का नाम | संबंधित क्षेत्र | जनक / प्रमुख व्यक्ति | प्रमुख तथ्य और प्रभाव |
| हरित क्रांति (Green Revolution) | खाद्यान्न उत्पादन <br/> (विशेषकर गेहूँ और चावल) | एम. एस. स्वामीनाथन (भारत में)<br/> नॉर्मन बोरलॉग (विश्व में) | <ul><li>1960 के दशक के मध्य में शुरू हुई।</li><li>HYV (उच्च उपज वाले) बीज, रासायनिक उर्वरक, सिंचाई और मशीनीकरण पर आधारित थी।</li><li>भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया और अकाल की समस्या को समाप्त किया।</li><li>पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इसके मुख्य लाभार्थी रहे।</li></ul> |
| श्वेत क्रांति (White Revolution) | दुग्ध उत्पादन (Milk) | वर्गीज कुरियन | <ul><li>इसे “ऑपरेशन फ्लड” (Operation Flood) के नाम से भी जाना जाता है।</li><li>1970 में शुरू हुई, इसने सहकारी समितियों (जैसे अमूल) के माध्यम से दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा दिया।</li><li>भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बना।</li><li>किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</li></ul> |
| नीली क्रांति (Blue Revolution) | मत्स्य उत्पादन (Fisheries) | डॉ. अरुण कृष्णन और डॉ. हीरालाल चौधरी | <ul><li>मत्स्य पालन और जलीय कृषि (Aquaculture) को बढ़ावा देने पर केंद्रित।</li><li>आधुनिक तकनीकों के उपयोग से मछली उत्पादन में भारी वृद्धि हुई।</li></ul> |
| पीली क्रांति (Yellow Revolution) | तिलहन उत्पादन (Oilseeds) <br/> (विशेषकर सरसों और सूरजमुखी) | सैम पित्रोदा | <ul><li>भारत को खाद्य तेलों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुरू की गई।</li><li>तिलहन उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।</li></ul> |
| स्वर्ण (सुनहरी) क्रांति (Golden Revolution) | बागवानी (Horticulture) – फल, सब्जियाँ <br/> और शहद (Honey) | निरपख तुतेज | <ul><li>1991 से 2003 तक चली।</li><li>भारत को फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बनाया।</li><li>शहद उत्पादन को भी बढ़ावा मिला।</li></ul> |
| स्वर्ण रेशा क्रांति (Golden Fibre Revolution) | जूट उत्पादन (Jute) | – | <ul><li>जूट के उत्पादन और उसकी गुणवत्ता में सुधार पर केंद्रित।</li><li>पश्चिम बंगाल इसका मुख्य केंद्र है।</li></ul> |
| रजत (चाँदी) क्रांति (Silver Revolution) | अंडा और मुर्गी उत्पादन (Egg and Poultry) | इंदिरा गांधी | <ul><li>देश में अंडे की उपलब्धता और पोल्ट्री उद्योग को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई।</li></ul> |
| रजत रेशा क्रांति (Silver Fibre Revolution) | कपास उत्पादन (Cotton) | – | <ul><li>कपास के उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि पर केंद्रित।</li></ul> |
| लाल क्रांति (Red Revolution) | मांस उत्पादन (Meat) और टमाटर उत्पादन (Tomato) | विशाल तिवारी | <ul><li>मांस और टमाटर दोनों के उत्पादन में वृद्धि पर केंद्रित।</li></ul> |
| गुलाबी क्रांति (Pink Revolution) | प्याज (Onion), झींगा मछली (Prawn) और फार्मास्यूटिकल्स | दुर्गेश पटेल | <ul><li>विशेष रूप से झींगा मछली के निर्यात को बढ़ावा देने में सफल रही।</li></ul> |
| भूरी क्रांति (Brown Revolution) | चमड़ा, कोको और गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत | – | <ul><li>खाद्य प्रसंस्करण और उर्वरकों के उत्पादन से भी संबंधित।</li></ul> |
| गोल क्रांति (Round Revolution) | आलू उत्पादन (Potato) | – | <ul><li>आलू की उत्पादकता बढ़ाने और उसे पूरे वर्ष उपलब्ध कराने पर केंद्रित।</li></ul> |
| धूसर/स्लेटी क्रांति (Grey Revolution) | उर्वरक उत्पादन (Fertilizers) | – | <ul><li>देश में रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन को बढ़ाने पर केंद्रित।</li></ul> |
| प्रोटीन क्रांति (Protein Revolution) | उच्च प्रोटीन वाली दालों सहित समग्र कृषि उत्पादन | (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली द्वारा गढ़ा गया) | <ul><li>यह “दूसरी हरित क्रांति” का नारा है, जिसका उद्देश्य प्रौद्योगिकी-संचालित विकास से समग्र कृषि उत्पादन बढ़ाना है, विशेषकर प्रोटीन युक्त फसलों का।</li></ul> |
| सदाबहार क्रांति (Evergreen Revolution) | समग्र कृषि का सतत विकास | एम. एस. स्वामीनाथन | <ul><li>यह हरित क्रांति के दुष्प्रभावों को कम करने और कृषि का पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ (Sustainable) विकास सुनिश्चित करने की अवधारणा है। इसमें जैविक खेती और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पर जोर दिया गया है।</li></ul> |
निष्कर्ष:
इन क्रांतियों ने भारत के कृषि परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है। जहाँ हरित और श्वेत क्रांति ने देश को आत्मनिर्भर बनाया, वहीं अन्य क्रांतियों ने कृषि का विविधीकरण (Diversification) किया और किसानों की आय के नए स्रोत खोले। अब ध्यान “सदाबहार क्रांति” की ओर है, जो न केवल उत्पादन बढ़ाने पर, बल्कि इसे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना स्थायी रूप से करने पर केंद्रित है।
हरित क्रांति (Green Revolution): भारत की खाद्य सुरक्षा का आधार
परिभाषा:
हरित क्रांति उस अवधि को संदर्भित करती है, विशेषकर 1960 के दशक के मध्य (1966-67) में, जब भारतीय कृषि में नई तकनीक और आधुनिक कृषि आदानों (Inputs) को अपनाने के कारण खाद्यान्न उत्पादन, विशेषकर गेहूँ और चावल, में अभूतपूर्व और तीव्र वृद्धि हुई। यह एक ऐसी क्रांति थी जिसने भारत को खाद्यान्न की कमी और अकाल की स्थिति से निकालकर एक आत्मनिर्भर और निर्यातक देश में बदल दिया।
हरित क्रांति के जनक (Fathers of the Green Revolution)
- विश्व में: डॉ. नॉर्मन बोरलॉग (Dr. Norman Borlaug), एक अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक, जिन्हें 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने मेक्सिको में गेहूँ की उच्च उपज वाली बौनी किस्में विकसित की थीं।
- भारत में: डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन (Dr. M.S. Swaminathan), एक भारतीय कृषि वैज्ञानिक, जिन्हें “भारत में हरित क्रांति का जनक” कहा जाता है। उन्होंने नॉर्मन बोरलॉग द्वारा विकसित बीजों को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाया और इस क्रांति का नेतृत्व किया।
हरित क्रांति के प्रमुख घटक (Key Components)
हरित क्रांति कोई एक अकेली तकनीक नहीं थी, बल्कि यह निम्नलिखित घटकों का एक “पैकेज प्रोग्राम” था, जिनकी सफलता एक-दूसरे पर निर्भर थी:
- उच्च उपज वाले बीज (High Yielding Variety – HYV Seeds):
- यह क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय घटक था।
- ये बौनी (dwarf) किस्मों के बीज थे (जैसे मेक्सिकन गेहूँ और फिलीपींस से IR-8 चावल) जो परंपरागत बीजों की तुलना में प्रति हेक्टेयर कई गुना अधिक उपज देते थे।
- इनकी विशेषता यह थी कि ये उर्वरकों के प्रति बहुत संवेदनशील थे (यानी, अधिक उर्वरक देने पर अधिक उपज देते थे) और इनके तने मजबूत होते थे, जिससे ये गिरते नहीं थे।
- रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizers):
- HYV बीजों को अपनी पूरी क्षमता से उपज देने के लिए भारी मात्रा में रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम (NPK) की आवश्यकता होती थी।
- सिंचाई (Irrigation):
- HYV बीजों और उर्वरकों के प्रभावी उपयोग के लिए नियमित और सुनिश्चित जल आपूर्ति अनिवार्य थी। इसलिए, यह क्रांति केवल उन क्षेत्रों में सफल हुई जहाँ सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएँ (नहरें, ट्यूबवेल) मौजूद थीं।
- कीटनाशक और खरपतवारनाशक (Pesticides and Herbicides):
- HYV किस्में स्थानीय कीटों और बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील थीं, इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए रासायनिक कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का उपयोग आवश्यक हो गया।
- मशीनीकरण (Mechanization):
- बड़े पैमाने पर खेती, सिंचाई और फसल की कटाई के लिए ट्रैक्टर, ट्यूबवेल, थ्रेशर और हार्वेस्टर जैसी मशीनों के उपयोग को बढ़ावा मिला।
- साख (Credit) और विपणन सुविधाएँ:
- किसानों को महंगे बीज, उर्वरक और मशीनरी खरीदने के लिए सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराया गया और उनकी उपज को बेचने के लिए मंडियों का विकास किया गया।
हरित क्रांति के प्रभाव (Impacts of the Green Revolution)
A) सकारात्मक प्रभाव (Positive Impacts):
- खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि: भारत का खाद्यान्न उत्पादन 1960 के दशक के लगभग 82 मिलियन टन से बढ़कर 1990 तक 176 मिलियन टन हो गया।
- खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता: भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन गया और उसे विदेशों (विशेषकर अमेरिका) से अनाज का आयात बंद करना पड़ा। देश में अकाल की स्थिति समाप्त हो गई।
- किसानों की आय में वृद्धि: विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की आय में भारी वृद्धि हुई और वे समृद्ध हुए।
- कृषि का व्यावसायीकरण: निर्वाह कृषि धीरे-धीरे वाणिज्यिक कृषि में बदलने लगी।
- औद्योगिक विकास: उर्वरक, कीटनाशक और कृषि मशीनरी बनाने वाले उद्योगों को बढ़ावा मिला।
B) नकारात्मक प्रभाव (Negative Impacts):
- क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि:
- इसका लाभ केवल उन्हीं राज्यों को मिला जहाँ सिंचाई की सुविधा थी (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, तटीय आंध्र)।
- वर्षा-आधारित शुष्क क्षेत्र (जैसे महाराष्ट्र, राजस्थान) पीछे रह गए, जिससे क्षेत्रीय असमानता बढ़ी।
- फसलों तक सीमित:
- इसका प्रभाव मुख्य रूप से केवल गेहूँ और चावल तक ही सीमित रहा। दालें, तिलहन और मोटे अनाज जैसी अन्य फसलें पीछे रह गईं।
- किसानों के बीच असमानता:
- इसका लाभ केवल बड़े किसानों को ही मिला जो महंगे इनपुट खरीद सकते थे। छोटे और सीमांत किसान इसका पूरा लाभ नहीं उठा पाए, जिससे अमीर और गरीब किसानों के बीच की खाई बढ़ी।
- पर्यावरणीय दुष्प्रभाव (Most Critical):
- मृदा निम्नीकरण: रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता नष्ट हो गई और उसमें पोषक तत्वों का असंतुलन हो गया।
- भूजल का अत्यधिक दोहन: सिंचाई के लिए ट्यूबवेल द्वारा पानी के अत्यधिक दोहन से पंजाब और हरियाणा में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया।
- जल प्रदूषण: उर्वरकों और कीटनाशकों के अवशेष बहकर नदियों और भूजल में मिल गए, जिससे जल प्रदूषित हो गया।
- जैव विविधता का नुकसान: स्थानीय और पारंपरिक किस्मों के बीज लुप्त हो गए।
निष्कर्ष:
हरित क्रांति निस्संदेह भारत को खाद्य संकट से उबारने और एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने में एक ऐतिहासिक सफलता थी। हालाँकि, इसकी आर्थिक और पर्यावरणीय कीमत भी चुकानी पड़ी है। अब भारत “दूसरी हरित क्रांति” या “सदाबहार क्रांति (Evergreen Revolution)” की ओर देख रहा है, जिसका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि इसे पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ (Ecologically Sustainable) और क्षेत्रीय रूप से समावेशी (Regionally Inclusive) बनाना है।
NPK अनुपात क्या है?
NPK अनुपात का अर्थ है उर्वरक (Fertilizer) में मौजूद तीन प्राथमिक वृहत् पोषक तत्वों (Primary Macronutrients) के प्रतिशत का अनुपात। ये तीन तत्व हैं:
- N – नाइट्रोजन (Nitrogen)
- P – फॉस्फोरस (Phosphorus) (फॉस्फेट P₂O₅ के रूप में)
- K – पोटेशियम (Potassium) (पोटाश K₂O के रूप में)
यह अनुपात उर्वरक के बैग पर “N-P-K” के रूप में तीन संख्याओं द्वारा दर्शाया जाता है। उदाहरण के लिए, एक उर्वरक बैग पर “12-32-16” लिखा है, तो इसका अर्थ है:
- 12% नाइट्रोजन (N)
- 32% फॉस्फोरस (P₂O₅)
- 16% पोटेशियम (K₂O)
यह अनुपात किसानों को यह समझने में मदद करता है कि वे अपनी फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार कौन सा उर्वरक और कितनी मात्रा में डालें।
भारत में आदर्श और वास्तविक NPK उपयोग का अनुपात
फसलों की स्वस्थ वृद्धि और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए इन तीनों पोषक तत्वों का एक संतुलित उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आदर्श NPK अनुपात (Ideal NPK Ratio):
- अनाज वाली फसलों के लिए: भारत की अधिकांश मिट्टी और अनाज वाली फसलों (जैसे गेहूं, चावल) के लिए वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित (recommended) आदर्श अनुपात 4:2:1 है।
- अर्थ: इसका मतलब है कि मिट्टी में नाइट्रोजन के हर 4 किलोग्राम के लिए, 2 किलोग्राम फॉस्फोरस और 1 किलोग्राम पोटेशियम डाला जाना चाहिए।
- दलहनी फसलों के लिए: चूँकि दलहनी फसलें वायुमंडल से नाइट्रोजन खुद स्थिर कर लेती हैं, उनके लिए यह अनुपात 1:2:1 या 1:2:2 हो सकता है।
भारत में वास्तविक NPK उपयोग का अनुपात (Actual NPK Use Ratio):
भारत में उर्वरकों का उपयोग अत्यधिक असंतुलित है। किसान अक्सर नाइट्रोजन युक्त उर्वरक (यूरिया) का बहुत अधिक उपयोग करते हैं, जबकि फॉस्फोरस और विशेष रूप से पोटेशियम की उपेक्षा करते हैं।
- अखिल भारतीय औसत (2021-22 के आंकड़ों के अनुसार): भारत में NPK के उपयोग का वास्तविक औसत अनुपात लगभग 7.7 : 3.1 : 1 है।
- क्षेत्रीय भिन्नता: यह असंतुलन राज्यों के बीच और भी अधिक है:
- पंजाब: अनुपात लगभग 31.4 : 8.0 : 1 तक पहुँच गया है।
- हरियाणा: लगभग 24.5 : 7.6 : 1।
- राजस्थान: लगभग 42.2 : 12.8 : 1।
- (ये आँकड़े दर्शाते हैं कि इन राज्यों में यूरिया (नाइट्रोजन) का कितना अंधाधुंध उपयोग हो रहा है)।
असंतुलित NPK उपयोग के नकारात्मक प्रभाव
आदर्श अनुपात (4:2:1) की तुलना में नाइट्रोजन का अत्यधिक और असंतुलित उपयोग भारतीय कृषि के लिए कई गंभीर समस्याएँ पैदा कर रहा है:
- मृदा स्वास्थ्य में गिरावट (Decline in Soil Health):
- मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन हो जाता है।
- नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी अम्लीय (Acidic) हो जाती है, जिससे उसकी उर्वरता कम हो जाती है।
- सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे जिंक, बोरॉन) की कमी हो जाती है।
- उत्पादकता में ठहराव या कमी:
- शुरुआत में तो उपज बढ़ती है, लेकिन लंबे समय में मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट के कारण फसलों की उत्पादकता स्थिर हो जाती है या घटने लगती है।
- पर्यावरणीय प्रदूषण (Environmental Pollution):
- अतिरिक्त नाइट्रोजन मिट्टी में रुकने के बजाय पानी के साथ बहकर (Leaching) भूजल और नदियों में मिल जाता है, जिससे जल प्रदूषण (Water Pollution) होता है।
- यह नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) के रूप में वायुमंडल में भी उत्सर्जित होता है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
- किसानों की लागत में वृद्धि:
- असंतुलित उपयोग से फसलों में कीटों और बीमारियों का प्रकोप बढ़ता है, जिससे कीटनाशकों पर खर्च बढ़ जाता है।
- अनुपयोगी उर्वरक पर पैसा बर्बाद होता है।
सुधार के लिए सरकारी पहल
इस असंतुलन को दूर करने के लिए सरकार कई कदम उठा रही है:
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) योजना: किसानों को उनकी मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी देना ताकि वे आवश्यकतानुसार उर्वरकों का उपयोग करें।
- नीम-लेपित यूरिया (Neem Coated Urea): यूरिया के धीरे-धीरे घुलने की प्रक्रिया को सुनिश्चित करना ताकि उसका दुरुपयोग और बर्बादी कम हो।
- पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (Nutrient Based Subsidy – NBS): P और K उर्वरकों पर सब्सिडी देना ताकि किसान केवल यूरिया पर निर्भर न रहें।
निष्कर्ष:
भारत में NPK का असंतुलित उपयोग, विशेष रूप से यूरिया का अत्यधिक प्रयोग, हरित क्रांति का एक प्रमुख दुष्प्रभाव है। यह न केवल मिट्टी के स्वास्थ्य को नष्ट कर रहा है बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचा रहा है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजनाओं और किसानों में जागरूकता बढ़ाकर संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) के लिए अत्यंत आवश्यक है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS): खाद्य सुरक्षा का आधार
परिभाषा:
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) भारत सरकार द्वारा प्रबंधित एक खाद्य सुरक्षा प्रणाली (Food Security System) है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के गरीब और कमजोर वर्गों को सब्सिडी युक्त (रियायती) दरों पर आवश्यक खाद्य वस्तुओं, मुख्य रूप से अनाज (गेहूं और चावल), का वितरण सुनिश्चित करना है।
यह प्रणाली केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त उत्तरदायित्व के तहत संचालित होती है।
PDS प्रणाली की कार्यप्रणाली (How it Works)
PDS की पूरी प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में काम करती है:
- अधिप्राप्ति (Procurement):
- भारतीय खाद्य निगम (Food Corporation of India – FCI), केंद्र सरकार की ओर से, किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price – MSP) पर गेहूं और चावल जैसे अधिशेष (Surplus) अनाज की खरीद करता है।
- यह खरीद मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे अधिशेष उत्पादन वाले राज्यों से की जाती है।
- भंडारण (Storage):
- FCI खरीदे गए अनाज को अपने गोदामों में सुरक्षित रूप से संग्रहीत करता है। इसे केंद्रीय पूल (Central Pool) कहा जाता है।
- आवंटन (Allocation):
- केंद्र सरकार, विभिन्न राज्यों में गरीबी के अनुमान के आधार पर, प्रत्येक राज्य को एक निर्धारित मात्रा में अनाज का आवंटन करती है।
- यह आवंटन केंद्रीय निर्गम मूल्य (Central Issue Price – CIP) पर किया जाता है, जो एक रियायती दर होती है।
- वितरण (Distribution):
- राज्य सरकारें केंद्रीय पूल से प्राप्त अनाज को अपने गोदामों तक पहुँचाती हैं।
- राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे पात्र परिवारों की पहचान करें, उन्हें राशन कार्ड (Ration Cards) जारी करें और इन परिवारों तक अनाज का वितरण करें।
- यह वितरण देश भर में फैली लगभग 5 लाख उचित मूल्य की दुकानों (Fair Price Shops – FPS) के नेटवर्क के माध्यम से किया जाता है, जिन्हें आम भाषा में “राशन की दुकान” कहा जाता है।
PDS का विकास और प्रमुख सुधार (Evolution and Key Reforms)
PDS प्रणाली समय के साथ विकसित हुई है और इसमें कई महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं:
- सार्वभौमिक PDS (Universal PDS – 1992 तक):
- शुरुआत में, PDS सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध थी, जिसमें अमीर और गरीब के बीच कोई भेद नहीं था।
- संशोधित PDS (Revamped PDS – 1992):
- इसका फोकस दूर-दराज और पिछड़े क्षेत्रों पर किया गया, लेकिन यह अभी भी सार्वभौमिक थी।
- लक्षित PDS (Targeted PDS – TPDS – 1997):
- यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसमें पहली बार लाभार्थियों को गरीबी रेखा से नीचे (Below Poverty Line – BPL) और गरीबी रेखा से ऊपर (Above Poverty Line – APL) की दो श्रेणियों में बांटा गया।
- BPL परिवारों को APL परिवारों की तुलना में बहुत अधिक सब्सिडी युक्त दरों पर अनाज दिया जाने लगा।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (National Food Security Act – NFSA, 2013):
- यह PDS के इतिहास का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी सुधार है। इसने खाद्य सुरक्षा को एक कानूनी अधिकार (Legal Right) बना दिया।
- प्रमुख प्रावधान:
- इसके तहत, देश की दो-तिहाई आबादी (लगभग 67%) को कवर करने का लक्ष्य रखा गया (ग्रामीण क्षेत्रों में 75% और शहरी क्षेत्रों में 50%)।
- पात्र परिवारों (जिन्हें “प्राथमिकता वाले परिवार” – Priority Households कहा जाता है) को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम अनाज अत्यधिक रियायती दरों पर प्राप्त करने का कानूनी अधिकार है:
- चावल: ₹3 प्रति किलोग्राम
- गेहूँ: ₹2 प्रति किलोग्राम
- मोटे अनाज: ₹1 प्रति किलोग्राम
- अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के तहत सबसे गरीब परिवारों को प्रति परिवार प्रति माह 35 किलोग्राम अनाज मिलना जारी है।
PDS प्रणाली की चुनौतियाँ और मुद्दे (Challenges and Issues)
- लक्षित करने में त्रुटियाँ (Targeting Errors):
- समावेशन त्रुटि (Inclusion Error): कई अपात्र (अमीर) लोग गलत तरीके से लाभ उठा रहे हैं।
- बहिष्करण त्रुटि (Exclusion Error): कई पात्र (गरीब) परिवार प्रणाली से बाहर रह गए हैं।
- अनाज का रिसाव और भ्रष्टाचार (Leakage and Corruption):
- अनाज का एक बड़ा हिस्सा परिवहन और वितरण के दौरान चोरी हो जाता है और खुले बाजार में बेच दिया जाता है।
- खराब गुणवत्ता वाला अनाज:
- अक्सर लाभार्थियों को घटिया गुणवत्ता वाला अनाज मिलता है जो खाने योग्य नहीं होता।
- आर्थिक लागत:
- अनाज पर दी जाने वाली भारी खाद्य सब्सिडी (Food Subsidy) सरकार के बजट पर एक बड़ा बोझ है।
- पर्यावरणीय प्रभाव:
- MSP प्रणाली ने किसानों को केवल गेहूं और चावल उगाने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिससे फसल विविधीकरण कम हुआ है और पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ है।
सुधार के लिए उठाए गए कदम (Steps for Reform)
- PDS का डिजिटलीकरण: लाभार्थियों और राशन कार्डों का आधार से जुड़ाव ताकि नकली लाभार्थियों को हटाया जा सके।
- e-PoS मशीनें: उचित मूल्य की दुकानों पर इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ सेल (ePoS) मशीनों का उपयोग ताकि वितरण में पारदर्शिता आए।
- प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer – DBT): कुछ क्षेत्रों में, सब्सिडी की राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में स्थानांतरित की जा रही है।
- एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड (One Nation, One Ration Card): प्रवासी मजदूरों को देश की किसी भी उचित मूल्य की दुकान से अपना राशन लेने की सुविधा देना।
निष्कर्ष:
PDS प्रणाली भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गरीबी कम करने में एक महत्वपूर्ण उपकरण रही है। हालाँकि इसमें भ्रष्टाचार और रिसाव जैसी कई गंभीर चुनौतियाँ हैं, लेकिन NFSA और तकनीकी सुधारों के माध्यम से सरकार इसे अधिक पारदर्शी, कुशल और लक्षित बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
भारत में भूमि सुधार (Land Reforms in India): एक सिंहावलोकन
परिभाषा:
भूमि सुधार का तात्पर्य भूमि के स्वामित्व (Ownership), संचालन (Operation), पट्टेदारी (Leasing), बिक्री और विरासत से संबंधित नियमों और संस्थाओं में सुधार लाने के उद्देश्य से किए गए संस्थागत उपायों से है। इसका व्यापक लक्ष्य भूमि के असमान वितरण को कम करना, कृषि उत्पादकता को बढ़ाना और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है।
स्वतंत्रता के समय, भारत की कृषि संरचना अर्ध-सामंती (Semi-feudal) थी, जहाँ भूमि का स्वामित्व कुछ जमींदारों के हाथों में केंद्रित था और वास्तविक किसान (काश्तकार) शोषण का शिकार थे। इसी समस्या को दूर करने के लिए भूमि सुधारों की शुरुआत की गई।
भूमि सुधार के प्रमुख उद्देश्य (Key Objectives)
- सामाजिक न्याय: भूमि के स्वामित्व का पुनर्वितरण करके भूमिहीनों और छोटे किसानों को भूमि प्रदान करना तथा शोषणकारी संबंधों को समाप्त करना।
- आर्थिक दक्षता: कृषि उत्पादकता और उत्पादन में वृद्धि करना। यह माना गया कि जब किसान अपनी भूमि का मालिक होगा, तो वह उसमें अधिक निवेश करेगा और उत्पादन बढ़ाएगा।
- राजनीतिक उद्देश्य: ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों और साहूकारों के प्रभुत्व को समाप्त करके एक समतावादी सामाजिक संरचना का निर्माण करना।
भूमि सुधार के प्रमुख घटक (Major Components of Land Reforms in India)
भारत में भूमि सुधारों को मुख्य रूप से चार घटकों में विभाजित किया जा सकता है:
- बिचौलियों का उन्मूलन (Abolition of Intermediaries):
- पृष्ठभूमि: ब्रिटिश शासन के दौरान, जमींदारी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी जैसी प्रणालियों ने सरकार और वास्तविक किसानों के बीच बिचौलियों (जमींदारों, जागीरदारों) का एक वर्ग बना दिया था। ये बिचौलिए किसानों से भारी लगान वसूलते थे और कृषि सुधार में कोई रुचि नहीं रखते थे।
- उपाय: स्वतंत्रता के बाद, लगभग सभी राज्यों ने कानून बनाकर इन बिचौलियों का उन्मूलन कर दिया। इससे लगभग 2 करोड़ काश्तकारों का सरकार से सीधा संपर्क स्थापित हुआ और वे अपनी भूमि के मालिक बन गए।
- परिणाम: यह भूमि सुधार का सबसे सफल घटक माना जाता है।
- काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms):
- पृष्ठभूमि: जो किसान दूसरों की भूमि पर किराये (लगान) पर खेती करते थे, उन्हें काश्तकार (Tenant) कहा जाता था। उनकी स्थिति बहुत असुरक्षित थी; लगान की दरें बहुत अधिक थीं और उन्हें कभी भी जमीन से बेदखल किया जा सकता था।
- उपाय: इसके तहत तीन प्रमुख सुधार किए गए:
- लगान का नियमन (Regulation of Rent): लगान की अधिकतम दर कुल उपज के एक-चौथाई (25%) से एक-तिहाई (33%) तक तय कर दी गई।
- काश्त की सुरक्षा (Security of Tenure): काश्तकारों को जमीन से मनमाने ढंग से बेदखल करने पर रोक लगा दी गई।
- काश्तकारों को स्वामित्व का अधिकार (Ownership Rights for Tenants): कई राज्यों में कानून बनाए गए ताकि जो काश्तकार एक निश्चित अवधि से किसी भूमि पर खेती कर रहे हैं, वे उसका मालिकाना हक़ खरीद सकें।
- परिणाम: यह सुधार आंशिक रूप से ही सफल रहा क्योंकि जमींदारों ने कई कानूनी खामियों का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर काश्तकारों को बेदखल कर दिया।
- भूमि हदबंदी (Land Ceiling):
- पृष्ठभूमि: इसका उद्देश्य भूमि के स्वामित्व की असमानता को कम करना था।
- उपाय: इसके तहत, एक व्यक्ति या परिवार द्वारा रखी जा सकने वाली कृषि भूमि की अधिकतम सीमा (Ceiling) तय कर दी गई। इस सीमा से अधिक की भूमि को अधिशेष (Surplus) भूमि घोषित करके सरकार द्वारा अधिग्रहित किया जाना था और फिर उसे भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों में वितरित किया जाना था।
- परिणाम: यह भूमि सुधार का सबसे असफल घटक साबित हुआ।
- विफलता के कारण:
- कानून बनने में देरी, जिससे जमींदारों को अपनी अतिरिक्त भूमि को रिश्तेदारों या फर्जी नामों पर हस्तांतरित करने का समय मिल गया।
- कानून में कई तरह की छूटें (जैसे बागानों, धार्मिक ट्रस्टों की भूमि को छूट)।
- राजनेताओं और नौकरशाहों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, क्योंकि कई स्वयं बड़े भू-स्वामी थे।
- विफलता के कारण:
- कृषि का पुनर्गठन – चकबंदी (Consolidation of Holdings):
- पृष्ठभूमि: विरासत के कानूनों के कारण, एक किसान की भूमि कई छोटे और बिखरे हुए टुकड़ों में बँट जाती थी, जिससे खेती करना अव्यावहारिक और महंगा हो जाता था।
- उपाय: चकबंदी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक किसान के गाँव में बिखरे हुए छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर उसे एक ही स्थान पर एक बड़ा और व्यवहार्य खेत दे दिया जाता है।
- परिणाम: यह सुधार पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी सफल रहा, जिससे वहाँ मशीनीकरण और कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई। लेकिन भारत के अन्य हिस्सों में सामाजिक और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण यह बहुत सफल नहीं हो सका।
भूमि सुधारों का समग्र मूल्यांकन (Overall Evaluation)
- सकारात्मक:
- बिचौलियों के उन्मूलन ने लाखों किसानों को शोषण से मुक्त किया और उन्हें भूमि का मालिक बनाया।
- पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में चकबंदी ने हरित क्रांति की सफलता की नींव रखी।
- नकारात्मक:
- भूमि हदबंदी लगभग पूरी तरह से विफल रही और भूमि के वितरण में असमानता आज भी एक बड़ी समस्या है।
- काश्तकारी सुधारों को पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका।
- सुधारों के कार्यान्वयन में भारी क्षेत्रीय असमानताएँ थीं।
वर्तमान में भूमि सुधार (Land Reforms in the Present Context)
आज भूमि सुधारों का स्वरूप बदल गया है। अब फोकस निम्नलिखित पर है:
- भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण (Digitization of Land Records): भूमि के स्वामित्व को पारदर्शी बनाने और विवादों को कम करने के लिए (जैसे SVAMITVA योजना)।
- भूमि पट्टे पर देने के कानूनों में सुधार (Land Leasing Reforms): एक कुशल और पारदर्शी पट्टेदारी बाजार बनाना ताकि भूमि का सर्वोत्तम उपयोग हो सके।
- महिलाओं को भूमि अधिकार: भूमि स्वामित्व में लैंगिक समानता को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष:
भारत में भूमि सुधारों की कहानी मिश्रित सफलताओं और विफलताओं की रही है। जहाँ एक ओर इसने सामंती कृषि संरचना को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं दूसरी ओर यह भूमि के समान वितरण के अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने में काफी हद तक असफल रहा। आज भी, भारतीय कृषि की कई समस्याओं की जड़ भूमि से जुड़े संरचनात्मक मुद्दों में निहित है।
हाँ, बिलकुल। भारत में भूमि सुधारों को लागू करने के लिए स्वतंत्रता के तुरंत बाद से लेकर आज तक कई महत्वपूर्ण कानून बनाए गए हैं। ये कानून मुख्य रूप से राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए हैं, क्योंकि भारतीय संविधान के तहत “भूमि” और “कृषि” राज्य सूची (State List) के विषय हैं।
इसका मतलब है कि प्रत्येक राज्य ने अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपने-अपने भूमि सुधार कानून बनाए, जिसके कारण इन कानूनों और उनके कार्यान्वयन में पूरे देश में काफी भिन्नता देखने को मिलती है।
यहाँ भूमि सुधारों के प्रत्येक घटक से संबंधित प्रमुख कानूनों का एक अवलोकन दिया गया है:
1. बिचौलियों के उन्मूलन के लिए कानून (Laws for Abolition of Intermediaries)
स्वतंत्रता के तुरंत बाद, लगभग सभी राज्यों ने जमींदारी, जागीरदारी और अन्य बिचौलिया प्रणालियों को समाप्त करने के लिए कानून पारित किए।
- उदाहरण:
- उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (U.P. Zamindari Abolition and Land Reforms Act, 1950): यह इस क्षेत्र के सबसे पहले और सबसे व्यापक कानूनों में से एक था, जो कई अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल बना।
- बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950
- पश्चिम बंगाल संपदा अधिग्रहण अधिनियम, 1953
- संवैधानिक संरक्षण: जमींदारों ने इन कानूनों को “संपत्ति के अधिकार” (जो उस समय एक मौलिक अधिकार था) का उल्लंघन बताकर अदालतों में चुनौती दी। इससे बचने के लिए, सरकार ने प्रथम संविधान संशोधन (1951) किया और नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule) को संविधान में जोड़ा। नौवीं अनुसूची में डाले गए कानूनों को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) से संरक्षण प्राप्त हो गया, जिससे भूमि सुधार कानूनों को सफलतापूर्वक लागू किया जा सका।
2. काश्तकारी सुधारों के लिए कानून (Laws for Tenancy Reforms)
इन कानूनों का उद्देश्य काश्तकारों (किराये पर खेती करने वाले) को सुरक्षा प्रदान करना था।
- लगान के नियमन के लिए कानून: लगभग सभी राज्यों ने कानून बनाकर लगान की अधिकतम सीमा तय कर दी (आमतौर पर कुल उपज का 25% से 33%)।
- काश्त की सुरक्षा के लिए कानून: कानूनों में यह प्रावधान किया गया कि कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर काश्तकारों को उनकी भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता।
- स्वामित्व के अधिकार के लिए कानून:
- उदाहरण: केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 और पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम, 1955 (ऑपरेशन बर्गा के तहत)। इन राज्यों में काश्तकारों को स्वामित्व का अधिकार देने में काफी सफलता मिली।
3. भूमि हदबंदी के लिए कानून (Laws for Land Ceiling)
इन कानूनों का उद्देश्य भूमि के स्वामित्व पर एक अधिकतम सीमा लगाना था। यह दो चरणों में हुआ:
- पहला चरण (1960-72): इस दौरान बनाए गए कानून बहुत उदार थे और उनमें कई खामियाँ थीं। सीमाएँ बहुत ऊँची रखी गई थीं और व्यक्ति को इकाई माना गया था, न कि परिवार को।
- दूसरा चरण (1972 के बाद): केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के बाद, कानूनों को और अधिक सख्त बनाया गया।
- सीमाएँ कम कर दी गईं: सिंचित और असिंचित भूमि के लिए अलग-अलग सीमाएँ तय की गईं।
- परिवार को इकाई माना गया: एक परिवार (पति, पत्नी और तीन नाबालिग बच्चे) द्वारा रखी जा सकने वाली भूमि की सीमा तय की गई।
- उदाहरण: प्रत्येक राज्य का अपना हदबंदी कानून है, जैसे “महाराष्ट्र कृषि भूमि (जोतों पर सीमा) अधिनियम, 1961” या “पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम, 1955″।
4. चकबंदी के लिए कानून (Laws for Consolidation of Holdings)
- लगभग सभी राज्यों ने चकबंदी के लिए कानून बनाए, लेकिन इसे अनिवार्य (Compulsory) और स्वैच्छिक (Voluntary) आधार पर लागू किया गया।
- अनिवार्य चकबंदी: पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने अनिवार्य चकबंदी के लिए कानून बनाए, जहाँ यह काफी हद- तक सफल रहा।
- स्वैच्छिक चकबंदी: अधिकांश अन्य राज्यों में यह स्वैच्छिक था, जिसके कारण यह बहुत सफल नहीं हो पाया क्योंकि सभी किसान अपनी बिखरी हुई जोतों को बदलने के लिए सहमत नहीं हुए।
वर्तमान में प्रासंगिक कानून और योजनाएँ
- भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013): यह भूमि अधिग्रहण से संबंधित एक महत्वपूर्ण केंद्रीय कानून है, जो यह सुनिश्चित करता है कि भूमि अधिग्रहण के समय भू-मालिकों को उचित मुआवजा और पुनर्वास मिले।
- स्वामित्व (SVAMITVA) योजना: यह एक केंद्रीय योजना है, जो ड्रोन तकनीक का उपयोग करके ग्रामीण आबादी वाले क्षेत्रों में भूमि का मानचित्रण कर रही है ताकि लोगों को उनकी संपत्ति का “अधिकारों का रिकॉर्ड” (Record of Rights) या प्रॉपर्टी कार्ड प्रदान किया जा सके। यह एक प्रकार का आधुनिक भूमि सुधार है।
निष्कर्ष:
हाँ, भारत में भूमि सुधारों के लिए व्यापक कानूनी ढाँचा मौजूद है। हालाँकि, इन कानूनों का निर्माण जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही महत्वपूर्ण उनका कार्यान्वयन भी था। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, नौकरशाही की उदासीनता और कानूनी खामियों के कारण, बिचौलियों के उन्मूलन को छोड़कर, अधिकांश भूमि सुधार कानून अपने इच्छित लक्ष्यों को पूरी तरह से प्राप्त करने में असफल रहे।