भारत की मृदा: विविधता और वितरण

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मृदा क्या है? (What is Soil?)

सरल परिभाषा में:
मृदा (मिट्टी) पृथ्वी की सबसे ऊपरी असंगठित (loose) परत है, जो पौधों को उगने के लिए आधार प्रदान करती है। यह चट्टानों के छोटे-छोटे कणों और जैविक पदार्थों (सड़े-गले पौधे और जीव) का मिश्रण है।

एक विस्तृत वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार:
मृदा एक जटिल, गतिशील और प्राकृतिक पिंड (Natural Body) है, जिसका निर्माण चट्टानों के भौतिक, रासायनिक और जैविक अपक्षय (Weathering) की एक लंबी प्रक्रिया के माध्यम से होता है। इसमें विभिन्न आकारों के खनिज कण (Mineral Particles), जैविक पदार्थ (Organic Matter or Humus), जल (Water), वायु (Air) और अनगिनत सूक्ष्मजीव (Microorganisms) का एक जटिल मिश्रण होता है। यह एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है जो स्थलीय जीवन का समर्थन करता है।


मृदा के प्रमुख घटक (Key Components of Soil)

एक आदर्श और उपजाऊ मृदा में चार प्रमुख घटक होते हैं:

  1. खनिज पदार्थ (Mineral Matter) – लगभग 45%: यह मृदा का सबसे बड़ा हिस्सा है, जो मूल चट्टानों (Parent Rock) के टूटने से बनता है। इसमें रेत, गाद और चिकनी मिट्टी जैसे विभिन्न आकार के कण होते हैं। यही पौधों को आवश्यक पोषक तत्व (जैसे पोटाशियम, फॉस्फोरस) प्रदान करते हैं।
  2. जैविक पदार्थ या ह्यूमस (Organic Matter or Humus) – लगभग 5%: यह मृत पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों के विघटित (s decomposed) अवशेषों से बनता है। ह्यूमस मिट्टी को गहरा रंग, उर्वरता और अच्छी संरचना प्रदान करता है। यह पोषक तत्वों का भंडार है और मिट्टी की जल धारण क्षमता को बढ़ाता है।
  3. जल (Water) – लगभग 25%: जल, मिट्टी के कणों के बीच के छिद्रों (रंध्रों) में मौजूद होता है। यह पौधों के लिए एक आवश्यक विलायक (solvent) है, जो पोषक तत्वों को घोलकर जड़ों तक पहुँचाता है।
  4. वायु (Air) – लगभग 25%: मिट्टी के छिद्रों में जल के साथ-साथ वायु भी होती है। पौधों की जड़ों और मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को श्वसन (respiration) के लिए इस वायु (ऑक्सीजन) की आवश्यकता होती है।

मृदा के निर्माण की प्रक्रिया (Process of Soil Formation – Pedogenesis)

मृदा का निर्माण एक बहुत ही धीमी प्रक्रिया है, जिसे पीडोजेनेसिस (Pedogenesis) कहते हैं। कुछ इंच मोटी मिट्टी की परत बनने में हजारों साल लग सकते हैं। इसके निर्माण को पाँच प्रमुख कारक नियंत्रित करते हैं:

  1. मूल चट्टान (Parent Rock): मृदा का खनिज आधार और रासायनिक संरचना इसी पर निर्भर करती है। (जैसे बेसाल्ट से काली मिट्टी)।
  2. जलवायु (Climate): तापमान और वर्षा, अपक्षय की दर और प्रकार को नियंत्रित करते हैं। (जैसे भारी वर्षा से लैटेराइट मिट्टी)।
  3. जैविक गतिविधि (Biological Activity): पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव ह्यूमस का निर्माण करते हैं और मिट्टी की संरचना को प्रभावित करते हैं।
  4. स्थलाकृति (Topography): ढलान की तीव्रता मृदा के अपरदन और उसकी मोटाई को प्रभावित करती है। (जैसे ढलानों पर पतली और घाटियों में मोटी मिट्टी)।
  5. समय (Time): मृदा को एक परिपक्व और सुविकसित प्रोफाइल बनाने के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है।

मृदा क्यों महत्वपूर्ण है?

मृदा केवल “मिट्टी” नहीं है, यह पृथ्वी पर जीवन का आधार है।

संक्षेप में, मृदा एक अमूल्य और गैर-नवीकरणीय (Non-renewable) प्राकृतिक संसाधन है जो हमारे ग्रह के पारिस्थितिकी तंत्र की नींव है।


मृदा संस्तर (Soil Profile): मिट्टी की परतें

जब हम जमीन में एक सीधा गड्ढा खोदते हैं, तो हमें मिट्टी की अलग-अलग रंगों और बनावट वाली कई क्षैतिज परतें (Horizontal Layers) दिखाई देती हैं। इन्हीं परतों को “मृदा संस्तर” (Soil Horizons) कहा जाता है और इन सभी संस्तरों के ऊर्ध्वाधर (vertical) क्रम को “मृदा परिच्छेदिका” (Soil Profile) कहते हैं।

एक सुविकसित (mature) मृदा में मुख्य रूप से पाँच या छह संस्तर होते हैं, जिन्हें अंग्रेजी के बड़े अक्षरों O, A, E, B, C और R से दर्शाया जाता है।


मृदा के विभिन्न संस्तर (Layers of Soil Profile)

(यह एक सामान्य मृदा परिच्छेदिका का चित्र है)

1. O-संस्तर (O-Horizon) – जैविक परत (Organic Layer)


2. A-संस्तर (A-Horizon) – ऊपरी मृदा (Topsoil)


3. E-संस्तर (E-Horizon) – अपवाहन या निक्षालन परत (Eluviated or Leaching Layer)


4. B-संस्तर (B-Horizon) – उपमृदा (Subsoil)


5. C-संस्तर (C-Horizon) – अधःस्तर (Substratum)


6. R-संस्तर (R-Horizon) – आधारशैल या जनक चट्टान (Bedrock or Parent Rock)

संक्षेप में, R → C → B → E → A → O के क्रम में एक चट्टान धीरे-धीरे एक जीवंत और उपजाऊ मृदा में परिवर्तित होती है। यह प्रक्रिया प्रकृति में निरंतर चलती रहती है।


मृदा के पोषक तत्व एवं उनके कार्य

पौधों को अपने स्वस्थ विकास, वृद्धि और प्रजनन (फल, फूल, बीज बनाना) के लिए विभिन्न प्रकार के रासायनिक तत्वों की आवश्यकता होती है। ये तत्व पौधे मुख्य रूप से मृदा से जल के माध्यम से अपनी जड़ों द्वारा अवशोषित करते हैं। इन पोषक तत्वों को उनकी आवश्यकता की मात्रा के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients)
  2. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)

1. वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients)

ये वे तत्व हैं जिनकी पौधों को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। इन्हें पुनः दो उप-समूहों में विभाजित किया जाता है:

A) प्राथमिक पोषक तत्व (Primary Nutrients)

ये पौधे के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और अक्सर मिट्टी में इनकी कमी हो जाती है, इसलिए इन्हें उर्वरकों (जैसे NPK) के माध्यम से अलग से देना पड़ता है।

पोषक तत्वसंकेतपौधों में प्रमुख कार्यकमी के लक्षण
नाइट्रोजन (Nitrogen)N1. पत्तियों का विकास और क्लोरोफिल का निर्माण: यह पौधे को हरा रंग देता है। 2. प्रोटीन और अमीनो एसिड का मुख्य घटक: यह पौधे की वानस्पतिक वृद्धि (vegetative growth) के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। 3. DNA और RNA का हिस्सा।1. पौधे का पीला पड़ना (विशेषकर पुरानी पत्तियाँ)। 2. विकास का रुक जाना और पौधे का बौना रह जाना।
फॉस्फोरस (Phosphorus)P1. जड़ों का विकास: यह मजबूत जड़ प्रणाली स्थापित करता है। 2. ऊर्जा स्थानांतरण (ATP का घटक): पौधे की सभी चयापचय क्रियाओं के लिए आवश्यक। 3. फूल, फल और बीजों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका।1. पत्तियों का बैंगनी या गहरा हरा होना। 2. विकास का धीमा होना और देर से पकना। 3. कम फूल और फल लगना।
पोटेशियम (Potassium)K1. समग्र स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता: यह पौधे को बीमारियों, कीटों और तनाव (जैसे सूखा, पाला) से लड़ने में मदद करता है। 2. जल संतुलन: स्टोमेटा (रंध्रों) के खुलने और बंद होने को नियंत्रित करता है। 3. तनों की मजबूती और फलों की गुणवत्ता (आकार, स्वाद, रंग) को बढ़ाता है।1. पत्तियों के किनारे पीले और झुलसे हुए दिखाई देना। 2. कमजोर तने और पौधे का मुरझाना। 3. खराब गुणवत्ता वाले फल और बीज।

B) द्वितीयक पोषक तत्व (Secondary Nutrients)

इनकी आवश्यकता प्राथमिक पोषक तत्वों से कम, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों से अधिक होती है। ये सामान्यतः मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में होते हैं।

पोषक तत्वसंकेतपौधों में प्रमुख कार्यकमी के लक्षण
कैल्शियम (Calcium)Ca1. कोशिका भित्ति (Cell Wall) का निर्माण: पौधे को संरचनात्मक मजबूती देता है। 2. नई जड़ों और टहनियों के विकास के लिए आवश्यक।1. नई पत्तियाँ और वृद्धि बिंदु विकृत (deformed) या मृत हो जाना। 2. टमाटर में “ब्लॉसम-एंड रोट” (फल का निचला हिस्सा सड़ना)।
मैग्नीशियम (Magnesium)Mg1. क्लोरोफिल अणु का केंद्रीय भाग: इसके बिना प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) संभव नहीं है। 2. एंजाइमों को सक्रिय करता है।1. पुरानी पत्तियों की शिराओं (veins) के बीच का भाग पीला पड़ जाना, जबकि शिराएँ हरी रहती हैं।
सल्फर (गंधक) <br/>(Sulphur)S1. अमीनो एसिड और प्रोटीन का महत्वपूर्ण घटक। 2. तेल निर्माण: तिलहन फसलों (जैसे सरसों, सूरजमुखी) में तेल की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ाता है। 3. लहसुन और प्याज की विशेष गंध के लिए जिम्मेदार।1. नई पत्तियाँ हल्की हरी या पीली पड़ जाना (नाइट्रोजन की कमी जैसा)।

2. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients or Trace Elements)

ये वे तत्व हैं जिनकी पौधों को बहुत कम या सूक्ष्म मात्रा में आवश्यकता होती है, लेकिन इनकी कमी से भी पौधे का विकास बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

पोषक तत्वसंकेतपौधों में प्रमुख कार्य
लोहा (Iron)Feक्लोरोफिल निर्माण और श्वसन क्रिया में आवश्यक।
मैंगनीज (Manganese)Mnप्रकाश संश्लेषण और एंजाइमों की क्रिया में सहायक।
जस्ता (Zinc)Znहार्मोन (जैसे ऑक्सिन) के उत्पादन और एंजाइमों की क्रिया में सहायक। (धान में ‘खैरा’ रोग जिंक की कमी से होता है)
ताँबा (Copper)Cuश्वसन और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रियाओं में एंजाइमों का घटक।
बोरॉन (Boron)Bकोशिका विभाजन, परागण (Pollination) और शर्करा के परिवहन के लिए आवश्यक।
मोलिब्डेनम (Molybdenum)Moदलहनी फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) के लिए परम आवश्यक।
क्लोरीन (Chlorine)Clपरासरण (Osmosis) और आयनिक संतुलन बनाए रखता है।
निकल (Nickel)Niयूरिया को अमोनिया में बदलने वाले एंजाइम का घटक। (सबसे नवीनतम जोड़ा गया आवश्यक तत्व)

निष्कर्ष:
स्वस्थ फसल उत्पादन के लिए इन सभी पोषक तत्वों का संतुलित (balanced) मात्रा में उपलब्ध होना आवश्यक है। किसी एक भी तत्व की कमी, भले ही उसकी आवश्यकता बहुत कम क्यों न हो, पौधे के विकास को रोक सकती है (इसे “लिबिग का न्यूनतम का नियम” – Liebig’s Law of the Minimum कहते हैं)। इसलिए, मृदा परीक्षण (Soil Testing) के माध्यम से मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों का पता लगाना और उसी के अनुसार उचित उर्वरकों का प्रयोग करना स्थायी और उत्पादक कृषि के लिए महत्वपूर्ण है।


भारत, अपनी विशाल भू-आकृतिक और जलवायु संबंधी विविधताओं के कारण, विभिन्न प्रकार की मृदाओं का एक समृद्ध भंडार है। मृदा भूमि की सबसे ऊपरी परत होती है, जो चट्टानों के अपक्षय (टूटने-फूटने) और जैविक पदार्थों (ह्यूमस) के संश्लेषण से बनती है। यह भारत के कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है और फसल पैटर्न को सीधे तौर पर निर्धारित करती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारतीय मृदा को मुख्य रूप से आठ प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया है।

जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil): भारत का अन्न भंडार

जलोढ़ मृदा भारत में पाई जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण, सबसे उपजाऊ और सबसे व्यापक मृदा है। यह देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के लगभग 43% हिस्से पर फैली हुई है और भारत की लगभग आधी आबादी की आजीविका का आधार है। “जलोढ़” शब्द का अर्थ है “जल द्वारा ढोकर लाया गया”, जो इसके निर्माण की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है।


I. निर्माण प्रक्रिया (Formation)

जलोढ़ मृदा का निर्माण नदियों द्वारा बहाकर लाई गई महीन गाद, तलछट और अवसादों (Silt, Clay, and Sediments) के निक्षेपण (Deposition) से होता है।


II. जलोढ़ मृदा का वर्गीकरण (Classification)

जलोढ़ मृदा को मुख्य रूप से आयु (Age) और कणों के आकार (Texture) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

A. आयु के आधार पर:

  1. बांगर (Bangar) – पुरानी जलोढ़:
    • यह नदी के बाढ़ के मैदान से दूर, ऊँची भूमि पर पाई जाती है, जहाँ अब नदी का पानी नहीं पहुँचता।
    • यह पुरानी जलोढ़ है और इसमें कंकड़ (कैल्शियम कार्बोनेट की ग्रंथियाँ) पाए जाते हैं।
    • यह खादर की तुलना में कम उपजाऊ होती है और इसका रंग गहरा होता है।
  2. खादर (Khadar) – नवीन जलोढ़:
    • यह नदी के बाढ़ के मैदानों में और डेल्टा क्षेत्रों में पाई जाती है, जहाँ हर साल बाढ़ के दौरान नई मिट्टी की परत बिछ जाती है।
    • यह बहुत महीन कणों वाली, कंकड़ रहित और अत्यधिक उपजाऊ होती है।
    • इसमें नमी धारण करने की क्षमता बांगर से अधिक होती है।

B. कणों के आकार के आधार पर:

भाबर और तराई क्षेत्र: हिमालय के गिरिपाद मैदान की दो पट्टियाँ

हिमालय से निकलने वाली नदियाँ जब पहाड़ों से उतरकर मैदानों में प्रवेश करती हैं, तो वे अपनी गति में अचानक कमी के कारण अपने साथ लाए अवसादों (Sediments) को निक्षेपित (Deposit) करती हैं। इसी निक्षेपण से दो विशिष्ट भू-आकृतिक और मृदा क्षेत्रों का निर्माण होता है – भाबर और तराई।


1. भाबर की मृदा (Soil of Bhabar Region)


2. तराई की मृदा (Soil of Terai Region)


भाबर और तराई के बीच तुलनात्मक सारणी

आधारभाबरतराई
स्थानशिवालिक के ठीक दक्षिण में।भाबर के ठीक दक्षिण में।
अवसाद का आकारमोटे और भारी (पत्थर, कंकड़, बजरी)।महीन और छोटे (रेत, गाद, चिकनी मिट्टी)।
पारगम्यताअत्यधिक पारगम्य (Highly Porous)कम पारगम्य (Less Porous)
नदियाँसतह पर विलुप्त हो जाती हैं।सतह पर पुनः प्रकट होती हैं।
नमी की स्थितिसतह शुष्क रहती है।भूमि नम और दलदली रहती है।
उर्वरताअनुपजाऊ और कृषि के लिए अनुपयुक्त।अत्यधिक उपजाऊ और सघन कृषि के लिए उपयुक्त।
वनस्पतिबड़े पेड़ों वाले विरल जंगल।घने जंगल और लंबी घास (अब अधिकांश कृषि भूमि)।

III. रासायनिक और भौतिक विशेषताएँ (Chemical and Physical Properties)


IV. वितरण और प्रमुख क्षेत्र (Distribution and Major Regions)

जलोढ़ मृदा मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में पाई जाती है:

  1. सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान: यह एक विशाल और अविच्छिन्न क्षेत्र है जो पंजाब और हरियाणा से लेकर पश्चिम बंगाल और असम तक फैला हुआ है। इसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और उत्तराखंड के मैदानी भाग शामिल हैं।
  2. पूर्वी तटीय मैदान (Eastern Coastal Plains): महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा निर्मित डेल्टा क्षेत्रों में।
  3. कुछ आंतरिक घाटियाँ: नर्मदा और तापी नदी की घाटियों तथा गुजरात के कुछ मैदानों में भी यह मृदा पाई जाती है।

V. प्रमुख फसलें (Major Crops)

इसकी उच्च उर्वरता और अच्छी जल धारण क्षमता के कारण, जलोढ़ मृदा पर विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं। यह भारत का सघन कृषि क्षेत्र है।

निष्कर्ष:
जलोढ़ मृदा भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपदा है। यह देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है और करोड़ों किसानों की आजीविका को सहारा देती है। इसकी उच्च उत्पादकता के कारण ही इसके क्षेत्र भारत के सबसे घनी आबादी वाले और कृषि की दृष्टि से सबसे विकसित क्षेत्र हैं।


काली मृदा (Black Soil): दक्कन के पठार का काला सोना

काली मृदा भारत की एक विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण मृदा है, जो अपनी गहरी काली रंगत और असाधारण उत्पादकता के लिए जानी जाती है। यह भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग 15% हिस्से पर फैली है और देश की दूसरी सबसे प्रमुख मृदा है। इसे कई स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय नामों से भी जाना जाता है।


I. अन्य नाम (Other Names)


II. निर्माण प्रक्रिया (Formation)

काली मृदा का निर्माण दक्कन के पठार (Deccan Plateau) पर फैले बेसाल्टिक लावा (Basaltic Lava) की चट्टानों के अपक्षय (Weathering) और अपरदन से हुआ है।


III. भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ (Physical and Chemical Properties)

  1. रंग (Color):
    • इसका गहरा काला रंग मुख्य रूप से इसमें मौजूद टिटेनिफेरस मैग्नेटाइट (Titaniferous Magnetite) नामक एक लौह यौगिक और ह्यूमस की उपस्थिति के कारण होता है।
  2. गठन (Texture):
    • यह महीन कणों (Fine-grained) वाली और मृण्मय (Clayey) प्रकृति की होती है। इसमें चिकनी मिट्टी (Clay) की मात्रा बहुत अधिक (लगभग 60-80%) होती है।
  3. जल धारण क्षमता (Water Retention Capacity):
    • यह काली मृदा का सबसे विशिष्ट गुण है। अपने महीन गठन के कारण इसकी नमी (जल) धारण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है। यह गुण इसे उन शुष्क क्षेत्रों के लिए आदर्श बनाता है जहाँ सिंचाई की सुविधा कम होती है, क्योंकि यह लंबे समय तक नमी बनाए रखती है।
  4. प्रतिक्रिया (Reaction to Water):
    • गीली होने पर: जब यह गीली होती है, तो यह बहुत फैलती है और चिपचिपी हो जाती है, जिससे इस पर काम करना मुश्किल हो जाता है।
    • सूखने पर: शुष्क मौसम में, यह नमी खोकर सिकुड़ जाती है, जिससे इसकी सतह पर मोटी और गहरी दरारें (Deep Cracks) पड़ जाती हैं।
  5. स्वतः जुताई (Self-Ploughing):
    • सूखने पर बनी ये दरारें मृदा में वायु के परिसंचरण (Aeration) में मदद करती हैं, जैसे कि खेत की जुताई की गई हो। इसीलिए इसे “स्वतः जुताई वाली मृदा” (Self-ploughing Soil) कहा जाता है।
  6. रासायनिक संरचना:
    • समृद्ध: यह आयरन (Iron), चूना (Lime), कैल्शियम कार्बोनेट, पोटैशियम (Potash), एल्युमिनियम और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होती है।
    • कमी: इसमें नाइट्रोजन (Nitrogen), फॉस्फोरस (Phosphorus) और जैविक पदार्थों (Humus) की कमी होती है।

IV. वितरण और प्रमुख क्षेत्र (Distribution and Major Regions)

काली मृदा का विस्तार मुख्य रूप से दक्कन लावा पठार (Deccan Lava Plateau) पर है।


V. प्रमुख फसलें (Major Crops)

अपनी उच्च उर्वरता और उत्कृष्ट जल धारण क्षमता के कारण, इस पर कई महत्वपूर्ण फसलें उगाई जाती हैं:

निष्कर्ष:
काली मृदा भारत के लिए एक मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन है, जिसने दक्कन के पठार को एक प्रमुख कृषि क्षेत्र के रूप में स्थापित किया है। इसकी अनूठी भौतिक विशेषताएँ, जैसे उच्च जल धारण क्षमता और स्वतः जुताई, इसे विशेष रूप से कपास और गन्ने जैसी फसलों के लिए अद्वितीय बनाती हैं।


लाल और पीली मृदा (Red and Yellow Soil): प्रायद्वीप की प्राचीन चट्टानों की देन

लाल और पीली मृदा, जलोढ़ और काली मृदा के बाद, भारत का तीसरा सबसे बड़ा मृदा समूह है, जो देश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 18.5% हिस्से पर विस्तृत है। यह मिट्टी मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत के उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ कम वर्षा होती है। इसका रंग इसकी सबसे प्रमुख विशेषता है, जो इसकी निर्माण प्रक्रिया और रासायनिक संरचना को दर्शाता है।


I. निर्माण प्रक्रिया (Formation)

लाल और पीली मृदा का निर्माण कम वर्षा वाले क्षेत्रों में, प्राचीन रवेदार (Crystalline) आग्नेय चट्टानों (जैसे ग्रेनाइट) और कायांतरित चट्टानों (Metamorphic Rocks) (जैसे नीस और शिस्ट) के अपक्षय (Weathering) से होता है।


II. भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ (Physical and Chemical Properties)

  1. रंग (Color):
    • लाल रंग (Red Color): इसका लाल रंग लौह ऑक्साइड (Iron Oxide), विशेष रूप से फेरिक ऑक्साइड (Ferric Oxide), के व्यापक विसरण (Wide diffusion) के कारण होता है। यह लौह यौगिक मिट्टी के कणों पर एक पतली परत के रूप में चढ़ा रहता है। यह रंग चट्टानों की प्रकृति पर निर्भर करता है, इसलिए यह हल्के लाल से लेकर गहरे भूरे-लाल तक हो सकता है।
    • पीला रंग (Yellow Color): जब यही लाल मिट्टी पानी के संपर्क में आती है, यानी जलयोजित (Hydrated) होती है, तो फेरिक ऑक्साइड फेरिक हाइड्रॉक्साइड में बदल जाता है, जिससे इसका रंग पीला दिखाई देने लगता है। इसलिए, अक्सर एक ही क्षेत्र में लाल और पीली दोनों प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं।
  2. गठन (Texture):
    • इसका गठन विविध होता है, जो बलुई (Sandy) से लेकर दोमट (Loamy) और चिकनी (Clayey) तक हो सकता है।
    • यह सामान्यतः हल्की, भुरभुरी और रंध्रयुक्त (Porous) होती है, जिससे इसकी जल धारण क्षमता काली मिट्टी की तुलना में बहुत कम होती है।
  3. उर्वरता और रासायनिक संरचना:
    • सामान्यतः कम उपजाऊ: यह मिट्टी आमतौर पर कम उपजाऊ होती है और इसे उत्पादक बनाने के लिए उर्वरकों (Fertilizers) की आवश्यकता पड़ती है।
    • समृद्ध: इसमें आयरन (Iron), एल्युमिना (Alumina) और पोटाश (Potash) की मात्रा पर्याप्त होती है।
    • कमी: इसमें नाइट्रोजन (Nitrogen), फॉस्फोरस (Phosphorus), मैग्नीशियम (Magnesium) और जैविक पदार्थों (Humus) की भारी कमी होती है।

III. वितरण और प्रमुख क्षेत्र (Distribution and Major Regions)

लाल और पीली मृदा का विस्तार दक्कन के पठार के पूर्वी और दक्षिणी भागों में है। यह मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ काली मिट्टी का क्षेत्र समाप्त होता है।


IV. प्रमुख फसलें (Major Crops)

इसकी कम उर्वरता के बावजूद, सिंचाई और उर्वरकों के उचित उपयोग से इस पर कई प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं:

निष्कर्ष:
लाल और पीली मृदा भारत के एक बहुत बड़े हिस्से को कवर करती है और मुख्य रूप से मोटे अनाज आधारित कृषि का समर्थन करती है। हालाँकि यह जलोढ़ या काली मिट्टी जितनी उपजाऊ नहीं है, लेकिन आधुनिक कृषि तकनीकों, विशेषकर सिंचाई और उर्वरकों के प्रयोग ने, इसकी उत्पादकता को बढ़ाने और भारत की खाद्य सुरक्षा में योगदान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लैटेराइट मृदा (Laterite Soil): उष्णकटिबंधीय अपक्षय का उत्पाद

लैटेराइट मृदा भारत की एक विशिष्ट प्रकार की मृदा है, जो देश के लगभग 3.7% भू-भाग पर पाई जाती है। “लैटेराइट” शब्द लैटिन भाषा के शब्द ‘Later’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘ईंट’ (Brick)। यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि यह मिट्टी सूखने पर ईंट की तरह कठोर और मजबूत हो जाती है, जिस कारण इसका उपयोग परंपरागत रूप से भवन निर्माण सामग्री के रूप में किया जाता रहा है।


I. निर्माण प्रक्रिया (Formation)

लैटेराइट मृदा का निर्माण बहुत ही विशिष्ट जलवायु परिस्थितियों में होता है।


II. भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ (Physical and Chemical Properties)

  1. रंग (Color):
    • लौह ऑक्साइड की प्रचुरता के कारण इसका रंग आमतौर पर लाल या जंग जैसा लाल (Reddish-brown) होता है।
  2. उर्वरता (Fertility):
    • तीव्र निक्षालन के कारण, पोषक तत्वों (जैसे नाइट्रोजन, पोटाश, चूना, मैग्नीशियम) की इसमें भारी कमी होती है।
    • जैविक पदार्थ (Humus) भी कम होते हैं क्योंकि उच्च तापमान में बैक्टीरिया इन्हें तेजी से नष्ट कर देते हैं।
    • कुल मिलाकर, यह कृषि की दृष्टि से बहुत कम उपजाऊ (Infertile) होती है।
  3. प्रकृति (Nature):
    • यह अम्लीय (Acidic) प्रकृति की होती है क्योंकि क्षारीय तत्व (जैसे चूना) निक्षालित हो जाते हैं। इसकी अम्लता चाय और कॉफी जैसी फसलों के लिए उपयुक्त होती है।
    • इसकी संरचना खुरदरी और कंकड़ीली (Coarse and gravelly) होती है।
  4. पानी के प्रति प्रतिक्रिया:
    • गीली होने पर यह मुलायम हो जाती है।
    • सूखने पर यह बहुत कठोर और ढेलेदार बन जाती है।

III. वितरण और प्रमुख क्षेत्र (Distribution and Major Regions)

लैटेराइट मृदा मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय पठार के ऊँचे, शिखर वाले क्षेत्रों (Hill tops and Summits) पर पाई जाती है जहाँ भारी वर्षा होती है।


IV. प्रमुख फसलें (Major Crops)

इसकी कम उर्वरता के बावजूद, यह मिट्टी बागानी फसलों (Plantation Crops) के लिए अत्यधिक उपयुक्त है, क्योंकि इन फसलों को अम्लीय मृदा और अच्छी जल निकासी की आवश्यकता होती है। उचित उर्वरकों और मृदा संरक्षण तकनीकों का उपयोग करके इस पर सफलतापूर्वक खेती की जाती है।

निष्कर्ष:
लैटेराइट मृदा, हालाँकि पारंपरिक अनाज की खेती के लिए अनुपयुक्त है, लेकिन भारत की महत्वपूर्ण बागानी कृषि अर्थव्यवस्था का आधार है। यह चाय, कॉफी, काजू और रबर जैसी मूल्यवान नकदी फसलों का उत्पादन करती है, जिनका राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ा महत्व है। यह मिट्टी इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे एक कम उपजाऊ मृदा भी सही फसल चयन और प्रबंधन के माध्यम से आर्थिक रूप से अत्यंत उत्पादक हो सकती है।


मरुस्थलीय मृदा (Arid/Desert Soil): शुष्कता की पहचान

मरुस्थलीय मृदा, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, उन शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ वर्षा की मात्रा बहुत कम होती है और वाष्पीकरण की दर अत्यधिक उच्च होती है। यह मिट्टी भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के लगभग 4% हिस्से पर फैली हुई है और विशेष रूप से देश के पश्चिमी भागों तक सीमित है।


I. निर्माण प्रक्रिया (Formation)

मरुस्थलीय मृदा का निर्माण मुख्य रूप से भौतिक अपक्षय (Physical or Mechanical Weathering) और पवन क्रिया (Wind Action) द्वारा होता है।


II. भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ (Physical and Chemical Properties)

  1. रंग (Color):
    • इसका रंग लाल से लेकर हल्का भूरा (Reddish-brown) होता है।
  2. गठन (Texture):
    • यह मुख्य रूप से बलुई या रेतीली (Sandy) होती है, जिसमें बजरी के कण भी मिले हो सकते हैं।
    • यह अत्यधिक पारगम्य (Permeable) होती है, अर्थात पानी इसमें बहुत तेजी से नीचे चला जाता है, जिससे इसकी नमी धारण करने की क्षमता (Moisture retention capacity) बहुत कम होती है।
  3. रासायनिक संरचना और उर्वरता (Chemical Composition and Fertility):
    • लवणीय प्रकृति (Saline Nature): उच्च वाष्पीकरण के कारण, नीचे के लवण केशिका क्रिया (Capillary Action) द्वारा सतह पर आ जाते हैं, जिससे यह मिट्टी लवणीय (Saline) हो जाती है। कुछ क्षेत्रों में नमक की मात्रा इतनी अधिक होती है कि पानी को वाष्पित करके खाने योग्य नमक प्राप्त किया जा सकता है।
    • क्षारीयता (Alkalinity): इसमें सोडियम की मात्रा भी अधिक हो सकती है, जो इसे क्षारीय बनाती है।
    • पोषक तत्व: यह घुलनशील लवणों (Soluble Salts) और फॉस्फेट (Phosphate) में तो समृद्ध होती है, लेकिन इसमें नाइट्रोजन (Nitrogen) और जैविक पदार्थों (Humus) का लगभग पूर्ण अभाव होता है।
    • कमी: उच्च तापमान और नमी की कमी के कारण जीवाणु और अन्य सूक्ष्मजीव जीवित नहीं रह पाते, जिससे ह्यूमस का निर्माण नहीं हो पाता।
    • कुल मिलाकर, यह एक अनुपजाऊ मिट्टी है।
  4. कंकड़ परत (Kankar Layer):
    • इस मिट्टी की निचली परतों में अक्सर कैल्शियम कार्बोनेट की एक कठोर परत पाई जाती है, जिसे ‘कंकड़’ कहा जाता है। यह कंकड़ परत पानी के अंतःस्यंदन (Infiltration) को रोकती है, जिससे सिंचाई के दौरान भी नमी जड़ों तक नहीं पहुँच पाती।

III. वितरण और प्रमुख क्षेत्र (Distribution and Major Regions)

यह मिट्टी मुख्य रूप से भारत के उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 25-30 सेमी से कम होती है।


IV. प्रमुख फसलें (Major Crops)

अपनी प्राकृतिक अवस्था में, यह मिट्टी कृषि के लिए लगभग अनुपयोगी होती है। हालाँकि, जिन क्षेत्रों में सिंचाई (Irrigation) की सुविधा उपलब्ध है (जैसे इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में), वहाँ इस मिट्टी को कृषि योग्य बनाया गया है।

निष्कर्ष:
मरुस्थलीय मृदा भारत के शुष्क पश्चिमी भाग की एक विशिष्ट पहचान है। इसकी प्रमुख सीमाएँ नमी की कमी, उच्च लवणता और ह्यूमस का अभाव हैं, जो इसे स्वाभाविक रूप से अनुपजाऊ बनाती हैं। हालाँकि, आधुनिक सिंचाई तकनीकों के माध्यम से इस मिट्टी की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है, जिसने राजस्थान जैसे राज्यों के कृषि परिदृश्य को बदल दिया है।


पर्वतीय मृदा (Forest/Mountain Soil): ढलानों की नाजुक परत

पर्वतीय मृदा, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ पर्याप्त वर्षा और वनों का आवरण होता है। यह मृदा भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के लगभग 8% हिस्से पर फैली हुई है। यह एक अविकसित और अपरिपक्व (Immature) मिट्टी है, जिसकी विशेषताएँ स्थानीय स्थलाकृति, ढलान, वनस्पति और जलवायु के अनुसार बहुत अधिक बदलती रहती हैं।


I. निर्माण प्रक्रिया (Formation)

पर्वतीय मृदा का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है, जो मुख्य रूप से निम्नलिखित कारकों द्वारा नियंत्रित होती है:

  1. यांत्रिक अपक्षय (Mechanical Weathering):
    • पहाड़ों पर पाला (Frost), तापमान में परिवर्तन और बर्फ की क्रिया से चट्टानों का भौतिक विघटन प्रमुख होता है, जिससे मिट्टी के मोटे कण (जैसे बजरी) बनते हैं।
  2. जैविक गतिविधि (Biological Activity):
    • यह इस मिट्टी के निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। वनों के कारण, जमीन पर पत्तियों, टहनियों और अन्य जैविक पदार्थों की एक मोटी परत जमा हो जाती है।
    • जीवाणुओं और अन्य सूक्ष्मजीवों द्वारा इन जैविक पदार्थों के अपघटन (Decomposition) से ह्यूमस (Humus) का निर्माण होता है।
  3. स्थलाकृति (Topography):
    • चूँकि यह मिट्टी तीव्र ढलानों (Steep Slopes) पर बनती है, यह बहुत पतली परतों में होती है और गुरुत्वाकर्षण तथा जल के कारण लगातार नीचे की ओर खिसकती रहती है।

II. भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ (Physical and Chemical Properties)

  1. गठन और संरचना (Texture and Structure):
    • पर्वतीय मृदा की संरचना बहुत विविध होती है।
    • ऊपरी ढलानों (Upper Slopes): यहाँ मिट्टी अपरिपक्व, मोटी, पथरीली और बजरी युक्त होती है।
    • निचली घाटियों (Lower Valleys): घाटियों के तल और नदी-सोपानों (River terraces) पर, मिट्टी अधिक गहरी, महीन और दोमट या गादयुक्त (Loamy and silty) होती है। यह क्षेत्र कृषि के लिए अधिक उपजाऊ होता है।
  2. ह्यूमस और अम्लीयता (Humus and Acidity):
    • ह्यूमस की अधिकता: वनों से प्राप्त जैविक पदार्थों की प्रचुरता के कारण, यह मिट्टी ह्यूमस से भरपूर होती है।
    • अम्लीय प्रकृति (Acidic Nature): हालाँकि, ठंडी और आर्द्र परिस्थितियों में ह्यूमस का अपघटन धीमी गति से होता है, जिससे अम्ल (Acid) का निर्माण होता है। इसलिए, यह मिट्टी आमतौर पर अम्लीय होती है। ह्यूमस की अधिकता के बावजूद, यह कृषि के लिए पूरी तरह से उपजाऊ नहीं होती।
  3. रासायनिक संरचना और उर्वरता (Chemical Composition and Fertility):
    • कमी: यह मृदा पोटाश (Potash), फॉस्फोरस (Phosphorus) और चूना (Lime) जैसे खनिजों में बहुत गरीब होती है।
    • उर्वरता: इसकी उर्वरता बहुत हद तक इसकी स्थिति पर निर्भर करती है। ढलानों पर यह कम उपजाऊ होती है, जबकि निचली, कोमल ढलानों और घाटियों में यह काफी उपजाऊ हो सकती है।
  4. मृदा अपरदन (Soil Erosion):
    • तीव्र ढलानों के कारण, यह मिट्टी मृदा अपरदन, विशेषकर भूस्खलन और शीट अपरदन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है। वनों की कटाई इस समस्या को और भी गंभीर बना देती है।

III. वितरण और प्रमुख क्षेत्र (Distribution and Major Regions)

पर्वतीय मृदा मुख्य रूप से भारत के वनाच्छादित पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।


IV. प्रमुख फसलें (Major Crops)

इसकी विशेष प्रकृति और स्थलाकृति के कारण, पर्वतीय मृदा सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) और बागानी कृषि के लिए सबसे उपयुक्त है।

निष्कर्ष:
पर्वतीय मृदा भारत के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग है। यद्यपि यह पारंपरिक अनाज की खेती के लिए चुनौतीपूर्ण है, लेकिन यह देश की मूल्यवान बागवानी अर्थव्यवस्था (Horticulture Economy) की रीढ़ है, जो चाय, कॉफी, मसालों और विभिन्न प्रकार के फलों का उत्पादन करती है। इस मृदा का संरक्षण, विशेष रूप से वनीकरण के माध्यम से मृदा अपरदन को रोकना, पर्वतीय क्षेत्रों के सतत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


लवणीय एवं क्षारीय मृदा (Saline and Alkaline Soil): अनुपजाऊ भूमि

लवणीय और क्षारीय मृदाएँ समस्याग्रस्त मृदाएँ (Problematic Soils) हैं, जो प्राकृतिक या मानवीय गतिविधियों के कारण अनुपजाऊ हो जाती हैं। भारत में इन्हें कई स्थानीय नामों से जाना जाता है, जो इनकी बंजर प्रकृति को दर्शाते हैं।

अन्य स्थानीय नाम:


I. इन मृदाओं में अंतर (Difference between Saline and Alkaline Soils)

यद्यपि दोनों को अक्सर एक साथ संदर्भित किया जाता है, लेकिन इनमें रासायनिक अंतर होता है:

आधारलवणीय मृदा (Saline Soil)क्षारीय मृदा (Alkaline/Sodic Soil)
प्रमुख लवणइसमें कैल्शियम (Calcium), मैग्नीशियम (Magnesium) और पोटेशियम (Potassium) के घुलनशील लवण (सल्फेट, क्लोराइड) की अधिकता होती है।इसमें विनिमय योग्य सोडियम (Sodium) की अधिकता होती है। इसे ‘सोडिक’ मृदा भी कहते हैं।
pH मानइसका pH मान 8.5 से कम होता है।इसका pH मान 8.5 से अधिक होता है।
भौतिक स्थितिइसकी भौतिक दशा अपेक्षाकृत ठीक होती है।सोडियम की अधिकता के कारण मिट्टी के कण बिखर जाते हैं और इसकी संरचना खराब हो जाती है, जिससे यह बहुत कठोर और अभेद्य (impermeable) हो जाती है।
सुधारअतिरिक्त पानी से लवणों को निक्षालित (Leaching) करके इसे सुधारा जा सकता है।इसे सुधारना अधिक कठिन होता है। इसके लिए जिप्सम (Gypsum – Calcium Sulphate) या पाइराइट्स जैसे रासायनिक सुधारकों की आवश्यकता होती है, जो सोडियम को विस्थापित करते हैं।

II. निर्माण की प्रक्रिया (Process of Formation)

इन मृदाओं का निर्माण मुख्य रूप से शुष्क, अर्ध-शुष्क और खराब जल-निकासी (Poor Drainage) वाले क्षेत्रों में होता है।

  1. प्राकृतिक कारण (Natural Causes):
    • अपर्याप्त जल-निकासी: जिन क्षेत्रों में जल-निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होती, वहाँ पानी सतह पर या उसके नीचे जमा हो जाता है।
    • केशिका क्रिया (Capillary Action): शुष्क मौसम में, उच्च वाष्पीकरण के कारण यह जमा हुआ पानी केशिका क्रिया द्वारा मिट्टी की नलिकाओं से ऊपर की ओर चढ़ता है। अपने साथ यह घुले हुए लवणों को भी ऊपर ले आता है।
    • लवणों का जमाव: जब पानी वाष्पित हो जाता है, तो ये लवण मिट्टी की ऊपरी सतह पर एक सफेद, पपड़ीदार परत (White Salty Crust) के रूप में जमा हो जाते हैं।
  2. मानवीय कारण (Human-induced Causes):
    • अत्यधिक सिंचाई (Over-irrigation): हरित क्रांति के बाद पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में नहरों द्वारा की जाने वाली अत्यधिक सिंचाई इसका मुख्य मानवीय कारण है।
    • सिंचाई का अतिरिक्त पानी जल स्तर (Water table) को ऊपर उठाता है, जिससे जल-जमाव होता है और ऊपर वर्णित केशिका क्रिया तेज हो जाती है।
    • खेतों में बिना उचित जल-निकासी के लगातार पानी भरने से यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
    • तटीय क्षेत्रों में समुद्री जल का प्रवेश: तटीय क्षेत्रों में, उच्च ज्वार या सुनामी के दौरान समुद्री जल के भूमि में प्रवेश करने से भी मिट्टी लवणीय हो जाती है।

III. वितरण और प्रमुख क्षेत्र (Distribution and Major Regions)

यह मिट्टी बिखरे हुए क्षेत्रों में पाई जाती है, खासकर वहाँ जहाँ सिंचाई गहन है और जलवायु शुष्क है।


IV. कृषि पर प्रभाव और सुधार के उपाय (Impact on Agriculture and Reclamation Measures)

निष्कर्ष:
लवणीय और क्षारीय मृदा भारत में मृदा निम्नीकरण (Soil Degradation) का एक गंभीर रूप है, जो देश की कृषि उत्पादकता को प्रभावित करता है। यह समस्या, विशेष रूप से हरित क्रांति के क्षेत्रों में, स्थायी कृषि पद्धतियों और जल प्रबंधन के महत्व को रेखांकित करती है। उचित सुधार तकनीकों को अपनाकर, इन बंजर भूमियों को फिर से कृषि योग्य बनाया जा सकता है।


पीटमय एवं दलदली मृदा (Peaty and Marshy Soil): जलमग्न भूमि की पहचान

पीटमय और दलदली मृदाएँ विशेष प्रकार की मृदाएँ हैं जिनका निर्माण अत्यधिक नमी और जल-जमाव (Water-logging) वाली परिस्थितियों में होता है। ये मृदाएँ मुख्य रूप से जैविक पदार्थों के अपूर्ण अपघटन का परिणाम होती हैं और भारत में बहुत सीमित क्षेत्रों में पाई जाती हैं।


I. पीटमय मृदा (Peaty Soil)

1. निर्माण प्रक्रिया (Formation):

2. विशेषताएँ (Characteristics):

3. वितरण (Distribution):


II. दलदली मृदा (Marshy Soil)

1. निर्माण प्रक्रिया (Formation):

2. विशेषताएँ (Characteristics):

3. वितरण (Distribution):


III. कृषि उपयोग और फसलें

ये दोनों ही मृदाएँ अपनी विशिष्ट रासायनिक और भौतिक गुणों (उच्च अम्लता, खराब वायु-संचार, जल-जमाव) के कारण पारंपरिक कृषि के लिए चुनौतीपूर्ण होती हैं।

निष्कर्ष:
पीटमय और दलदली मृदाएँ भारत के जल-संतृप्त (water-saturated) पारिस्थितिकी तंत्र की अनूठी देन हैं। जैविक पदार्थों का भंडार होने के बावजूद, ये कृषि की दृष्टि से सीमित उपयोगिता रखती हैं। हालाँकि, ये मृदाएँ और इन पर पनपने वाले मैंग्रोव जैसे पारिस्थितिकी तंत्र, कार्बन भंडारण, तटीय सुरक्षा और जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो इनके संरक्षण को आवश्यक बनाता है।


संक्षेप में, भारत की मृदा विविधता देश की भूवैज्ञानिक और जलवायु संबंधी जटिलताओं का प्रतिबिंब है। प्रत्येक मिट्टी का प्रकार एक विशिष्ट कृषि पैटर्न को जन्म देता है, और मृदा संरक्षण तथा प्रबंधन भारत की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।


भारत की प्रमुख मृदाएँ: एक संक्षिप्त सारणी

क्र. सं.मृदा का प्रकारप्रमुख विशेषताएँनिर्माण प्रक्रियामुख्य क्षेत्रप्रमुख फसलें
1.जलोढ़ मृदा <br/> (Alluvial Soil)सर्वाधिक उपजाऊ, पोटाश व चूना युक्त। खादर (नई) और बांगर (पुरानी)।नदियों द्वारा लाई गई गाद से।उत्तर भारत का मैदान, तटीय मैदान।गेहूं, चावल, गन्ना, जूट, दालें।
2.काली मृदा <br/> (Black Soil)‘रेगुर’ मृदा, जल धारण क्षमता सर्वाधिक, सूखने पर दरारें (स्वतः जुताई)।दक्कन की लावा चट्टानों के अपक्षय से।महाराष्ट्र, म.प्र., गुजरात, कर्नाटक।कपास, गन्ना, गेहूं, ज्वार।
3.लाल और पीली मृदालौह ऑक्साइड से लाल रंग, जलयोजित होने पर पीली। कम उपजाऊ।प्राचीन रवेदार चट्टानों के अपक्षय से।तमिलनाडु, ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक।मोटे अनाज (बाजरा, रागी), मूंगफली, दालें।
4.लैटेराइट मृदानिक्षालन (Leaching) से निर्मित, अम्लीय, सूखने पर ईंट जैसी कठोर।उच्च तापमान व भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में।पश्चिमी व पूर्वी घाट के शिखर, केरल, कर्नाटक।चाय, कॉफी, काजू, रबर।
5.मरुस्थलीय मृदा<br/> (Arid Soil)रेतीली और लवणीय, नमी और ह्यूमस की भारी कमी, कंकड़ युक्त।भौतिक अपक्षय और पवन क्रिया से।पश्चिमी राजस्थान, गुजरात का कच्छ, द. हरियाणा।बाजरा, जौ, सरसों (सिंचाई से)।
6.पर्वतीय मृदा<br/>(Forest/Mountain Soil)ह्यूमस युक्त लेकिन अम्लीय, अपरिपक्व, अपरदन की अधिक संभावना।वनीय क्षेत्रों में जैविक पदार्थों के जमाव से।हिमालय क्षेत्र, पश्चिमी और पूर्वी घाट।चाय, कॉफी, मसाले, फल (सेब)।
7.लवणीय एवं क्षारीय मृदा‘रेह’, ‘कल्लर’ या ‘ऊसर’। अनुपजाऊ, सतह पर सफेद लवण की परत।अत्यधिक सिंचाई व खराब जल निकासी से।उ.प्र., हरियाणा, पंजाब, राजस्थान।बरसीम, धान (सुधार के बाद)।
8.पीटमय एवं दलदली मृदाजैविक पदार्थों से भरपूर (40-50%), अत्यधिक अम्लीय, जल-जमाव।जल-जमाव वाले क्षेत्रों में वनस्पतियों के अपूर्ण अपघटन से।केरल, सुंदरवन, उत्तराखंड, ओडिशा।धान (विशेष किस्में), मैंग्रोव वन।

मृदा गठन (Soil Texture)

मृदा गठन (Soil Texture) से तात्पर्य मृदा में मौजूद विभिन्न आकारों के खनिज कणों (Mineral Particles) के सापेक्ष अनुपात (Relative Proportion) से है। सरल शब्दों में, यह बताता है कि मिट्टी में रेत (Sand), गाद (Silt), और चिकनी मिट्टी (Clay) कितनी-कितनी मात्रा में मौजूद हैं।

मृदा गठन मिट्टी का एक स्थायी गुण (Permanent Property) है, जिसे सामान्य कृषि पद्धतियों से आसानी से नहीं बदला जा सकता। यह मिट्टी के कई महत्वपूर्ण गुणों को निर्धारित करता है, जैसे कि जल धारण क्षमता, वायु-संचार, और पोषक तत्व प्रदान करने की क्षमता।


मृदा कणों के आकार और उनका वर्गीकरण

मृदा के खनिज कणों को उनके व्यास (Diameter) के आधार पर मुख्य रूप से तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए दो प्रमुख प्रणालियाँ हैं – यूएसडीए (USDA – United States Department of Agriculture) और आईएसएसएस (ISSS – International Society of Soil Science)। भारत में सामान्यतः ISSS प्रणाली का भी अनुसरण किया जाता है।

कणों का नाम (Particle Name)यूएसडीए (USDA) प्रणाली के अनुसार व्यास (Diameter)आईएसएसएस (ISSS) प्रणाली के अनुसार व्यास (Diameter)विशेषताएँ
बजरी/कंकड़ (Gravel)> 2.0 mm> 2.0 mmये मृदा गठन का हिस्सा नहीं माने जाते, लेकिन मिट्टी में पाए जा सकते हैं।
रेत (Sand)0.05 mm से 2.0 mm0.02 mm से 2.0 mm<ul><li>सबसे बड़े कण।</li><li>महसूस करने में किरकिरा और दानेदार।</li><li>कणों के बीच बड़े रंध्र (Pores) होते हैं।</li><li>जल धारण क्षमता बहुत कम होती है, पानी तेजी से निकल जाता है।</li><li>पोषक तत्व प्रदान करने की क्षमता कम होती है।</li></ul>
गाद (Silt)0.002 mm से 0.05 mm0.002 mm से 0.02 mm<ul><li>रेत से छोटे लेकिन चिकनी मिट्टी से बड़े कण।</li><li>महसूस करने में रेशमी, चिकना या मुलायम (जैसे पाउडर)।</li><li>रेत से बेहतर जल धारण क्षमता होती है।</li><li>यह हवा और पानी से आसानी से अपरदित हो जाती है।</li></ul>
चिकनी मिट्टी (Clay)< 0.002 mm< 0.002 mm<ul><li>सबसे महीन और सूक्ष्म कण।</li><li>महसूस करने में चिपचिपा और प्लास्टिक जैसा (जब गीला हो)।</li><li>कणों के बीच सूक्ष्म रंध्र (Micro-pores) होते हैं।</li><li>जल धारण क्षमता सर्वाधिक होती है।</li><li>यह पोषक तत्वों का भंडार होती है।</li></ul>

मृदा गठन के प्रमुख वर्ग (Major Classes of Soil Texture)

मृदा में रेत, गाद और चिकनी मिट्टी के प्रतिशत के आधार पर उसे विभिन्न गठन वर्गों में बांटा गया है। इसके लिए मृदा गठन त्रिभुज (Soil Textural Triangle) का उपयोग किया जाता है। मुख्य वर्ग निम्नलिखित हैं:

  1. बलुई मिट्टी (Sandy Soil):
    • संरचना: इसमें रेत का प्रभुत्व होता है (80% से अधिक)।
    • विशेषता: इसमें जुताई करना आसान होता है (हल्की मिट्टी), लेकिन जल और पोषक तत्वों की कमी के कारण यह कम उपजाऊ होती है।
  2. चिकनी मिट्टी (Clayey Soil):
    • संरचना: इसमें चिकनी मिट्टी का प्रभुत्व होता है (40% से अधिक)।
    • विशेषता: यह बहुत भारी मिट्टी होती है, गीली होने पर इसमें काम करना मुश्किल होता है। जल धारण क्षमता और पोषक तत्व तो बहुत होते हैं, लेकिन खराब वायु-संचार जड़ों के लिए समस्या बन सकता है।
  3. सिल्टी मिट्टी (Silty Soil):
    • संरचना: इसमें गाद का प्रभुत्व होता है।
    • विशेषता: यह उपजाऊ होती है, लेकिन अपरदन के प्रति बहुत संवेदनशील होती है।
  4. दोमट मिट्टी (Loamy Soil):
    • संरचना: यह रेत, गाद और चिकनी मिट्टी का लगभग संतुलित मिश्रण (लगभग 40% रेत, 40% गाद, 20% चिकनी मिट्टी) है।
    • विशेषता: इसे कृषि के लिए सर्वोत्तम और सबसे आदर्श मिट्टी माना जाता है। इसमें बलुई मिट्टी के अच्छे जल-निकासी गुण और चिकनी मिट्टी के उत्कृष्ट जल-धारण तथा पोषक तत्व प्रदान करने के गुण, दोनों का संतुलन होता है। इसमें जुताई करना भी आसान होता है और यह पौधों की वृद्धि के लिए सर्वोत्तम वातावरण प्रदान करती है।

सारांश में:

किसी खेत की मिट्टी का गठन यह निर्धारित करने में मदद करता है कि वहाँ कौन सी फसलें सबसे अच्छी उगेंगी और किस प्रकार के सिंचाई तथा उर्वरक प्रबंधन की आवश्यकता होगी।


मृदा क्षरण (Soil Erosion): रेंगती हुई मृत्यु

परिभाषा:
मृदा क्षरण वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें मिट्टी की सबसे ऊपरी और सबसे उपजाऊ परत (जिसे Topsoil कहते हैं) जल (Water) और वायु (Wind) जैसे प्राकृतिक भौतिक बलों द्वारा एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर चली जाती है। हालाँकि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन मानवीय गतिविधियों (Human Activities) जैसे वनों की कटाई, अत्यधिक चराई और अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियों ने इसकी दर को खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिया है।

मृदा क्षरण को “रेंगती हुई मृत्यु” (Creeping Death) भी कहा जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे भूमि की उत्पादकता को नष्ट कर देती है, जिससे भूमि बंजर हो जाती है।


मृदा क्षरण के प्रकार (Types of Soil Erosion)

मृदा क्षरण मुख्य रूप से दो प्रमुख कारकों द्वारा होता है:

A) जल अपरदन (Water Erosion):
यह भारत में, विशेषकर भारी वर्षा और पहाड़ी ढलानों वाले क्षेत्रों में, मृदा क्षरण का सबसे आम और विनाशकारी रूप है। इसके निम्नलिखित चरण होते हैं:

  1. बूँद क्षरण (Splash Erosion): यह जल अपरदन का पहला चरण है। जब वर्षा की बूँदें सीधे नंगी मिट्टी पर पड़ती हैं, तो वे मिट्टी के कणों को अपनी जगह से उछालकर अलग कर देती हैं।
  2. परत क्षरण (Sheet Erosion): जब बारिश का पानी ढलान पर एक पतली परत के रूप में बहता है, तो वह अपने साथ मिट्टी की पूरी ऊपरी परत को समान रूप से बहा ले जाता है। यह एक अदृश्य और अत्यंत हानिकारक प्रकार का क्षरण है क्योंकि किसान अक्सर इस पर ध्यान नहीं दे पाते जब तक कि बहुत देर न हो जाए।
  3. क्षुद्रसरिता क्षरण (Rill Erosion): जब बहता हुआ पानी ढलान पर केंद्रित होकर छोटी-छोटी नालियाँ या उंगलियों जैसी संरचनाएँ बनाने लगता है, तो उसे क्षुद्रसरिता क्षरण कहते हैं। इन नालियों को सामान्य जुताई से हटाया जा सकता है।
  4. अवनालिका क्षरण (Gully Erosion): जब क्षुद्रसरिताएँ (Rills) और गहरी और चौड़ी होकर बड़े-बड़े नालों या खड्डों का रूप ले लेती हैं, तो उसे अवनालिका क्षरण कहते हैं। इन खड्डों को सामान्य जुताई से नहीं भरा जा सकता। चंबल घाटी के बीहड़ (Ravines of Chambal Valley) अवनालिका क्षरण का सबसे कुख्यात उदाहरण है। इससे भूमि पूरी तरह से कृषि के अयोग्य हो जाती है।
  5. सरिता-तट क्षरण (Stream-bank Erosion): नदियों द्वारा अपने किनारों को काटना और बहा ले जाना भी जल अपरदन का एक रूप है।

B) वायु अपरदन (Wind Erosion):
यह शुष्क, अर्ध-शुष्क और मरुस्थलीय क्षेत्रों (जैसे राजस्थान, गुजरात, हरियाणा) में मृदा क्षरण का मुख्य रूप है, जहाँ वनस्पति का आवरण कम होता है और मिट्टी ढीली होती है।

  1. निलंबन (Suspension): बहुत महीन और हल्के मिट्टी के कण (जैसे गाद) हवा के साथ ऊपर उठकर मीलों दूर तक ले जाए जाते हैं।
  2. उत्परिवर्तन (Saltation): मध्यम आकार के कण (जैसे रेत) जमीन के पास उछल-उछल कर आगे बढ़ते हैं। लगभग 50-75% वायु अपरदन इसी प्रक्रिया से होता है।
  3. सतह सर्पण (Surface Creep): भारी कण (जैसे बजरी) सतह पर लुढ़क-लुढ़क कर आगे बढ़ते हैं।

मृदा क्षरण के कारण (Causes of Soil Erosion)

A) प्राकृतिक कारण (Natural Causes):

B) मानवीय कारण (Anthropogenic Causes):

  1. वनों की कटाई (Deforestation): यह मृदा क्षरण का सबसे प्रमुख मानवीय कारण है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बाँधकर रखती हैं और उनकी पत्तियाँ वर्षा की बूँदों के सीधे प्रहार को रोकती हैं।
  2. अत्यधिक चराई (Overgrazing): पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से भूमि पर घास का आवरण नष्ट हो जाता है, जिससे मिट्टी जल और वायु के सीधे संपर्क में आ जाती है।
  3. अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ (Unscientific Agricultural Practices):
    • ढलानों पर गलत जुताई: ढलान के ऊपर-नीचे (Up and Down) जुताई करने से पानी के बहने के लिए नालियाँ बन जाती हैं।
    • झूम कृषि (Shifting Cultivation): पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित इस पद्धति में जंगलों को जलाकर खेत बनाए जाते हैं, जिससे मिट्टी अपरदन के प्रति संवेदनशील हो जाती है।
    • एक ही फसल को बार-बार उगाना।
  4. निर्माण कार्य: सड़कों, बांधों और शहरीकरण के लिए भूमि की खुदाई भी मिट्टी को ढीला करती है।

मृदा क्षरण के दुष्प्रभाव (Adverse Effects of Soil Erosion)


निष्कर्ष:
मृदा क्षरण एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है जो सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करती है। इसका मुकाबला करने के लिए मृदा संरक्षण (Soil Conservation) के उपाय, जैसे वनीकरण, समोच्च जुताई, सीढ़ीदार खेती, और नियंत्रित चराई को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।


मृदा निम्नीकरण (Soil Degradation): भूमि की घटती गुणवत्ता

परिभाषा:
मृदा निम्नीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें भूमि की गुणवत्ता और स्वास्थ्य में गिरावट आती है, जिससे उसकी पारिस्थितिक कार्यप्रणाली (Ecological functions) और उत्पादकता (Productivity) कम हो जाती है। यह एक व्यापक शब्द है जिसमें मृदा के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों का क्षय शामिल होता है।

यह मृदा क्षरण से एक व्यापक अवधारणा है। मृदा क्षरण (Soil Erosion), मृदा निम्नीकरण का ही एक प्रमुख और दृश्यमान रूप है, लेकिन मृदा निम्नीकरण में भूमि की गुणवत्ता में होने वाले अन्य अदृश्य बदलाव भी शामिल होते हैं।


मृदा निम्नीकरण के प्रमुख प्रकार (Major Types of Soil Degradation)

मृदा निम्नीकरण को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. भौतिक निम्नीकरण (Physical Degradation):
इसमें मृदा की भौतिक संरचना का क्षय होता है।

2. रासायनिक निम्नीकरण (Chemical Degradation):
इसमें मृदा के रासायनिक गुणों में गिरावट आती है।

3. जैविक निम्नीकरण (Biological Degradation):
इसमें मृदा के जीवित घटकों का क्षय होता है।


भारत में मृदा निम्नीकरण के प्रमुख कारण

भारत में मृदा निम्नीकरण एक गंभीर समस्या है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:


मृदा निम्नीकरण के दुष्प्रभाव

निष्कर्ष:
मृदा निम्नीकरण एक वैश्विक संकट है जो सतत विकास के लिए एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है। यह एक धीमी लेकिन विनाशकारी प्रक्रिया है जो भूमि की जीवन देने की क्षमता को नष्ट कर देती है। इसका मुकाबला करने के लिए स्थायी भूमि प्रबंधन प्रथाओं, जैसे जैविक खेती, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, वनीकरण, और मृदा संरक्षण तकनीकों को अपनाना अनिवार्य है।


मृदा अपरदन (Soil Erosion): भूमि की जीवन शक्ति का ह्रास

परिभाषा:
मृदा अपरदन (Soil Erosion) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा भूमि की ऊपरी, उपजाऊ परत (Topsoil) का प्राकृतिक शक्तियों, मुख्य रूप से जल (Water) और वायु (Wind), द्वारा कटाव और बहाव होता है। हालाँकि यह एक प्राकृतिक भूवैज्ञानिक प्रक्रिया है, लेकिन अनुचित भूमि उपयोग और मानवीय गतिविधियों ने इसकी गति को चिंताजनक स्तर तक बढ़ा दिया है।

यह मृदा निम्नीकरण (Soil Degradation) का एक प्रमुख रूप है, जो सीधे तौर पर भूमि की उत्पादकता और पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करता है।


मृदा अपरदन की प्रक्रिया के कारक

मृदा अपरदन मुख्य रूप से दो प्रकार के कारकों से नियंत्रित होता है:

A) जल अपरदन (Water Erosion):
यह भारत जैसे मानसूनी जलवायु वाले देश में अपरदन का सबसे प्रबल रूप है। इसके प्रमुख प्रकार हैं:

  1. बूँदा-बाँदी क्षरण (Splash Erosion): वर्षा की बूँदों का नंगी मिट्टी पर गिरना, जिससे मिट्टी के कण ढीले हो जाते हैं।
  2. परत अपरदन (Sheet Erosion): भूमि की ऊपरी परत का समान रूप से एक पतली चादर के रूप में बह जाना। यह सबसे खतरनाक है क्योंकि यह आसानी से दिखाई नहीं देता।
  3. क्षुद्रसरिता अपरदन (Rill Erosion): जब बहता पानी छोटी-छोटी उंगलियों जैसी नालियाँ बना देता है।
  4. अवनालिका अपरदन (Gully Erosion): जब छोटी नालियाँ बड़ी होकर गहरे खड्डों या बीहड़ों में बदल जाती हैं। चंबल के बीहड़ इसका सबसे प्रमुख उदाहरण हैं, जो भूमि को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।

B) वायु अपरदन (Wind Erosion):
यह शुष्क, अर्ध-शुष्क और रेतीले क्षेत्रों में प्रमुख है।

  1. उच्छलन (Saltation): मिट्टी के कणों का सतह के पास उछल-उछल कर आगे बढ़ना।
  2. निलंबन (Suspension): बहुत महीन कणों का हवा में उड़कर दूर तक जाना।
  3. सतह सर्पण (Surface Creep): भारी कणों का जमीन पर लुढ़कना।

मृदा अपरदन को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारण

  1. वनोन्मूलन (Deforestation): यह मृदा अपरदन का सर्वप्रमुख कारण है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को एक साथ बाँधकर रखती हैं और पेड़ का छत्र वर्षा की बूँदों की मारक क्षमता को कम करता है। वनों के कटने से मिट्टी असुरक्षित हो जाती है।
  2. अत्यधिक पशुचारण (Overgrazing): जब पशु एक ही स्थान पर अनियंत्रित रूप से चरते हैं, तो वे घास के आवरण को पूरी तरह से नष्ट कर देते हैं, जिससे भूमि जल और वायु अपरदन के सीधे संपर्क में आ जाती है।
  3. अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ (Unscientific Farming Practices):
    • ढलान पर गलत जुताई: पहाड़ी ढलानों पर ऊपर से नीचे की ओर जुताई करने से पानी के बहने के लिए सीधी नालियाँ बन जाती हैं, जो अपरदन को तीव्र करती हैं।
    • झूम कृषि (Shifting Cultivation): पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित इस पद्धति में वनों को जलाकर कुछ वर्षों तक खेती की जाती है और फिर भूमि को खाली छोड़ दिया जाता है, जिससे यह अपरदन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है।
  4. निर्माण गतिविधियाँ और शहरीकरण (Construction and Urbanization): सड़कों, भवनों और बांधों के निर्माण के लिए की जाने वाली खुदाई मिट्टी की संरचना को बिगाड़ देती है और उसे ढीला कर देती है।

भारत में मृदा अपरदन के प्रमुख क्षेत्र

भारत में मृदा अपरदन एक राष्ट्रव्यापी समस्या है, लेकिन कुछ क्षेत्र अपनी विशिष्ट भू-आकृतिक, जलवायु और मानवीय हस्तक्षेप के कारण इससे कहीं अधिक प्रभावित हैं। इन प्रमुख क्षेत्रों को अपरदन के प्रकार के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।


1. अवनालिका अपरदन (Gully Erosion) के प्रमुख क्षेत्र

यह मृदा अपरदन का सबसे विनाशकारी रूप है, जो भूमि को बड़े-बड़े खड्डों (बीहड़ों) में बदल देता है।


2. परत अपरदन (Sheet Erosion) के प्रमुख क्षेत्र

यह एक धीमा लेकिन व्यापक क्षरण है, जहाँ भूमि की ऊपरी उपजाऊ परत समान रूप से बह जाती है।


3. वायु अपरदन (Wind Erosion) के प्रमुख क्षेत्र

यह शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख समस्या है, जहाँ वनस्पति का आवरण कम होता है।


4. झूम कृषि (Jhum Cultivation) से प्रभावित क्षेत्र

इसे ‘काटो और जलाओ’ (Slash-and-burn) कृषि भी कहते हैं।


5. तटीय और नदी-तट अपरदन के क्षेत्र


सारांश तालिका: भारत में मृदा अपरदन के प्रमुख क्षेत्र

अपरदन का प्रकारप्रमुख प्रभावित क्षेत्रमुख्य कारण
अवनालिका अपरदनचंबल-यमुना घाटियाँ (म.प्र., राजस्थान, यू.पी.)नदियों का गहरा कटाव, मुलायम मिट्टी
परत अपरदनपश्चिमी हिमालय (शिवालिक), पश्चिमी घाटतीव्र ढलान, भारी वर्षा, वनों की कटाई
वायु अपरदनथार मरुस्थल (पश्चिमी राजस्थान, गुजरात)शुष्कता, रेतीली मिट्टी, तेज हवाएँ
झूम कृषि अपरदनपूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यवनों को जलाना, भूमि को खाली छोड़ना
तटीय/नदी-तट अपरदनकेरल, ओडिशा, असम (ब्रह्मपुत्र), बिहार (कोसी)समुद्री लहरें, नदियों का अनियंत्रित प्रवाह

मृदा अपरदन के विनाशकारी प्रभाव

  1. कृषि उत्पादकता में कमी: ऊपरी उपजाऊ मिट्टी के बह जाने से भूमि की उर्वरता और पैदावार घट जाती है।
  2. बाढ़ की आवृत्ति में वृद्धि: अपरदित मिट्टी नदियों और जलाशयों में जमा होकर उनकी गहराई कम कर देती है, जिससे उनकी जल धारण क्षमता घट जाती है और थोड़ी सी बारिश में ही बाढ़ आ जाती है।
  3. भूजल स्तर में गिरावट: कठोर निचली मिट्टी के उजागर होने से वर्षा का पानी जमीन में रिस नहीं पाता और बह जाता है, जिससे भूजल का पुनर्भरण नहीं हो पाता।
  4. मरुस्थलीकरण: निरंतर अपरदन से उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर होकर मरुस्थल में बदल जाती है।
  5. पारिस्थितिक असंतुलन: नदियों और झीलों में गाद भरने से जलीय जीवन प्रभावित होता है।

मृदा संरक्षण के उपाय (Measures for Soil Conservation)

मृदा अपरदन को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाते हैं:

  1. वानिकी उपाय (Forestry Measures):
    • वनीकरण और पुनर्वनीकरण: अधिक से अधिक पेड़ लगाना।
    • रक्षक मेखला (Shelterbelts): मरुस्थलीय क्षेत्रों में खेतों के चारों ओर पेड़ों की कतारें लगाना ताकि हवा की गति को कम किया जा सके।
  2. कृषि उपाय (Agronomic Measures):
    • समोच्च जुताई (Contour Ploughing): पहाड़ी ढलानों पर समोच्च रेखाओं (समान ऊँचाई वाले बिंदुओं) के साथ-साथ जुताई करना।
    • सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming): तीव्र ढलानों को काटकर सीढ़ियों में बदलना।
    • फसल चक्र (Crop Rotation): भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिए फसलें बदल-बदल कर उगाना।
    • मल्चिंग (Mulching): खेत को घास या पुआल से ढकना।
  3. यांत्रिक उपाय (Mechanical Measures):
    • अवनालिकाओं पर रोक (Gully Plugging): खड्डों और नालों में छोटे-छोटे बांध बनाना।
    • मेड़बंदी (Bundling): खेतों के चारों ओर मेड़ बनाना ताकि पानी रुक सके।

निष्कर्ष:
मृदा अपरदन एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती है जो सीधे तौर पर भारत की खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और पारिस्थितिक स्वास्थ्य को खतरे में डालती है। इसके नियंत्रण के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें सरकारी नीतियों, वैज्ञानिक तरीकों और सामुदायिक भागीदारी का समन्वय हो।


भारत में मृदा का वितरण: एक क्षेत्रीय अवलोकन

भारत में मृदा का वितरण देश की भूवैज्ञानिक संरचना (Geological Structure), उच्चावच (Relief), जलवायु (Climate) और प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation) में पाई जाने वाली व्यापक विविधता को दर्शाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वर्गीकरण के आधार पर, भारत की प्रमुख मृदाओं का क्षेत्रीय वितरण निम्नलिखित है:


1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)


2. काली मृदा (Black Soil)


3. लाल और पीली मृदा (Red and Yellow Soil)


4. लैटेराइट मृदा (Laterite Soil)


5. मरुस्थलीय मृदा (Arid Soil)


6. पर्वतीय मृदा (Forest/Mountain Soil)


अन्य मृदाएँ



वनस्पति क्या है? (What is Vegetation?)

सरल शब्दों में, वनस्पति किसी क्षेत्र विशेष में उगने वाले पेड़-पौधों, झाड़ियों, घासों और अन्य पादप जीवन के सामूहिक रूप को कहते हैं। यह किसी स्थान के पादप समुदाय (Plant Community) का समग्र आवरण है।

एक विस्तृत परिभाषा के अनुसार, वनस्पति पृथ्वी की सतह पर पादप जीवन का एक संयोजन (Assemblage) है। यह केवल पौधों की प्रजातियों की सूची नहीं है, बल्कि यह उन प्रजातियों की संरचना, घनत्व और स्वरूप को भी दर्शाता है। उदाहरण के लिए, “जंगल” एक प्रकार की वनस्पति है, जबकि “घास का मैदान” दूसरी प्रकार की।

वनस्पति (Vegetation) बनाम वनस्पति-जात (Flora)

यह एक महत्वपूर्ण अंतर है:

प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation)

प्राकृतिक वनस्पति उस पादप समुदाय को कहते हैं जो मनुष्य की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहायता के बिना प्राकृतिक रूप से उगता है और लंबे समय तक बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के अपना विकास करता है। इसे अक्षत वनस्पति (Virgin Vegetation) भी कहा जाता है।


वनस्पति को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Vegetation)

किसी भी क्षेत्र की वनस्पति (पेड़-पौधों, झाड़ियों और घासों का सामूहिक रूप) का प्रकार, घनत्व और संरचना कई परस्पर जुड़े हुए कारकों का परिणाम होती है। इन कारकों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

A) जलवायु संबंधी कारक (Climatic Factors)
B) गैर-जलवायु संबंधी कारक (Non-Climatic Factors)


A) जलवायु संबंधी कारक (Climatic Factors)

यह वनस्पति के वितरण और प्रकार को निर्धारित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण समूह है। जलवायु के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं:

1. वर्षा (Precipitation / Rainfall):
यह वनस्पति के प्रकार को निर्धारित करने वाला सर्वप्रथम और सबसे निर्णायक कारक है।

2. तापमान (Temperature):
यह पौधों की वृद्धि दर, भौगोलिक वितरण और जैविक प्रक्रियाओं (जैसे अंकुरण, प्रकाश संश्लेषण) को सीधे प्रभावित करता है।

3. सूर्य का प्रकाश (Sunlight / Photoperiod):
यह प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के लिए ऊर्जा का स्रोत है।


B) गैर-जलवायु संबंधी कारक (Non-Climatic Factors)

1. उच्चावच या स्थलाकृति (Relief or Topography):
यह स्थानीय स्तर पर वनस्पति को बहुत प्रभावित करता है।

2. मृदा (Soil):
मिट्टी पौधों के लिए लंगर (Anchorage), जल और पोषक तत्वों का आधार है।

3. जैविक कारक (Biotic Factors):
इसमें सभी जीवित जीव शामिल हैं, जिनमें मनुष्य सबसे महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष:
किसी भी स्थान की वनस्पति इन सभी कारकों की एक जटिल अंतःक्रिया (Complex Interaction) का परिणाम होती है। जलवायु एक वृहत पैमाने पर वनस्पति के प्रकार को निर्धारित करती है, जबकि स्थलाकृति और मृदा उसे स्थानीय स्तर पर संशोधित करते हैं। अंत में, जैविक कारक, विशेष रूप से मनुष्य, प्राकृतिक वनस्पति को सबसे अधिक परिवर्तित और प्रभावित करते हैं।


भारत में वनस्पति (Vegetation in India): विविधता और वितरण

भारत अपनी विशाल भौगोलिक संरचना, विविध जलवायु और विभिन्न उच्चावच के कारण प्राकृतिक वनस्पति की एक अत्यंत समृद्ध विविधता का घर है। यहाँ उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की घनी हरियाली से लेकर थार के मरुस्थल की कंटीली झाड़ियाँ, और हिमालय के अल्पाइन चारागाहों तक लगभग हर प्रकार का पादप समुदाय पाया जाता है।

जलवायु कारकों, विशेषकर वर्षा और तापमान के आधार पर, भारत की प्राकृतिक वनस्पति को मुख्य रूप से निम्नलिखित पाँच प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है:


1. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)


2. उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous Forests)

उप-प्रकार(A) आर्द्र पर्णपाती (Moist Deciduous)(B) शुष्क पर्णपाती (Dry Deciduous)
वर्षा100 से 200 सेमी70 से 100 सेमी
प्रमुख वृक्षसागवान (टीक), साल, चंदन, शीशम, महुआ, अर्जुनतेंदू, पलाश, अमलतास, खैर, नीम
वितरणहिमालय की तलहटी (भाबर-तराई), झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलानप्रायद्वीपीय पठार के वर्षा-छाया क्षेत्र, उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी भाग

3. उष्णकटिबंधीय कंटीले वन तथा झाड़ियाँ (Tropical Thorn Forests and Scrubs)


4. पर्वतीय वन (Montane Forests)


5. मैंग्रोव वन / ज्वारीय वन (Mangrove / Tidal Forests)

मैंग्रोव वन उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के अंतर्ज्वारीय (Intertidal) तटीय क्षेत्रों में उगने वाले नमक-सहिष्णु (Salt-tolerant) पेड़ों और झाड़ियों का एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है। ये वन उन स्थानों पर फलते-फूलते हैं जहाँ मीठे और खारे पानी का संगम होता है, जैसे नदियों के डेल्टा, ज्वारनदमुख (Estuaries) और लैगून।

इन्हें “समुद्र और भूमि के बीच के प्रहरी” कहा जाता है क्योंकि ये तटीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


 भारत में मैंग्रोव वनों का क्षेत्रफल (ISFR 2023 के अनुसार)

क्र.राज्य / केंद्र शासित प्रदेशमैंग्रोव क्षेत्र (वर्ग किमी, 2023)2021 क्षेत्र (वर्ग किमी)वृद्धि / कमी (वर्ग किमी)
1पश्चिम बंगाल2,119.162,117.75+1.41
2गुजरात1,164.061,200.45−36.39
3अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह608.29612.94−4.65
4आंध्र प्रदेश421.43408.42+13.01
5महाराष्ट्र315.09302.70+12.39
6ओडिशा259.06257.51+1.55
7तमिलनाडु48.9049.00−0.10
8गोवा31.3429.39+1.95
9कर्नाटक14.2011.66+2.54
10केरल9.009.000.00

🔹 कुल राष्ट्रीय मैंग्रोव क्षेत्र

वर्षकुल क्षेत्रफल (वर्ग किमी)परिवर्तन
20214,998.99
20234,991.68−7.31 (कुल मिलाकर लगभग स्थिर)

🔹 प्रमुख तथ्य


प्रमुख विशेषताएँ और अनुकूलन (Key Features and Adaptations)

मैंग्रोव पौधों ने खारे पानी, ऑक्सीजन-रहित कीचड़ और ज्वारीय उतार-चढ़ाव की कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए अद्वितीय अनुकूलन विकसित किए हैं:

  1. नमक सहिष्णुता (Salt Tolerance):
    • इनकी पत्तियों में विशेष नमक ग्रंथियाँ (Salt glands) होती हैं जो अतिरिक्त नमक को बाहर निकाल देती हैं।
    • कुछ प्रजातियाँ अपनी जड़ों के माध्यम से नमक के प्रवेश को रोकती हैं।
  2. श्वसन मूल या न्यूमेटोफोर्स (Pneumatophores):
    • चूंकि इनकी जड़ें ऑक्सीजन रहित कीचड़ में डूबी रहती हैं, इसलिए श्वसन के लिए विशेष जड़ें कीचड़ से बाहर, ऊपर की ओर (खूँटे की तरह) निकली होती हैं। इन जड़ों को न्यूमेटोफोर्स कहा जाता है, जो सीधे वायुमंडल से ऑक्सीजन लेती हैं।
  3. जरायुजता (Viviparity):
    • यह मैंग्रोव का एक अनूठा प्रजनन अनुकूलन है। इसमें फल के पेड़ से लगे हुए ही बीज का अंकुरण एक नए पौधे (Propagule) के रूप में हो जाता है। जब यह तैयार पौधा नीचे कीचड़ में गिरता है, तो वह तुरंत जड़ पकड़ लेता है और ज्वार के साथ बहकर जाने से बच जाता है।
  4. मजबूत और उलझी हुई जड़ें (Prop Roots and Stilt Roots):
    • ये मजबूत जड़ें एक जाल बनाती हैं जो नरम मिट्टी में पौधे को स्थिरता प्रदान करती हैं और समुद्री लहरों के बल को कम करती हैं।

भारत में मैंग्रोव वनों का महत्व (Importance in India)

  1. तटीय सुरक्षा (Coastal Protection):
    • ये घने वन और उनकी उलझी हुई जड़ें सुनामी, चक्रवात और तूफानी लहरों के लिए एक प्राकृतिक अवरोधक (Natural Barrier) का काम करती हैं। यह तटीय समुदायों की जान-माल की रक्षा करने वाली पहली रक्षा पंक्ति है।
    • उदाहरण: 2004 की सुनामी के दौरान, उन क्षेत्रों में कम नुकसान हुआ जहाँ घने मैंग्रोव वन मौजूद थे।
  2. पारिस्थितिक महत्व (Ecological Significance):
    • जैव विविधता का हॉटस्पॉट: मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र मछलियों, केकड़ों, झींगों और घोंघों की कई प्रजातियों के लिए नर्सरी (प्रजनन स्थल) का काम करता है।
    • यह रॉयल बंगाल टाइगर (सुंदरवन में), मगरमच्छ, डॉल्फिन और कई प्रकार के पक्षियों का आवास स्थल है।
  3. मृदा अपरदन को रोकना: इनकी जड़ें तटीय मिट्टी को बाँधकर रखती हैं और उसे समुद्री लहरों द्वारा होने वाले कटाव से बचाती हैं।
  4. कार्बन सिंक: मैंग्रोव वन, स्थलीय वनों की तुलना में प्रति हेक्टेयर पाँच गुना अधिक कार्बन संग्रहीत करने की क्षमता रखते हैं। वे जलवायु परिवर्तन को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  5. आजीविका का स्रोत: ये वन तटीय समुदायों को मछली, केकड़ा, शहद, लकड़ी और चारा प्रदान करके उनकी आजीविका का समर्थन करते हैं।

वितरण क्षेत्र (Distribution Areas)

  1. गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुंदरवन): यह विश्व का सबसे बड़ा एकल मैंग्रोव क्षेत्र है। इसका नाम यहाँ पाए जाने वाले “सुंदरी” वृक्ष के नाम पर पड़ा है।
  2. गुजरात: कच्छ की खाड़ी और खंभात की खाड़ी।
  3. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।
  4. अन्य डेल्टा क्षेत्र: महानदी (ओडिशा – भितरकनिका), गोदावरी-कृष्णा (आंध्र प्रदेश), और कावेरी (तमिलनाडु) के डेल्टा।
  5. महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक के तटों पर छोटे-छोटे मैंग्रोव क्षेत्र पाए जाते हैं।

निष्कर्ष:
मैंग्रोव वन भारत की तटीय सुरक्षा और पारिस्थितिक स्वास्थ्य के लिए अमूल्य हैं। उनके महत्व को देखते हुए, भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचनाओं और मैंग्रोव संरक्षण योजनाओं के माध्यम से उनके संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए सक्रिय प्रयास कर रही हैं। ‘MISHTI’ (तटरेखा आवास और मूर्त आय के लिए मैंग्रोव पहल) जैसी पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


भारत के प्रमुख मैंग्रोव वन स्थल (राज्यवार सूची)

क्र. सं.राज्य / केंद्र-शासित प्रदेशप्रमुख मैंग्रोव स्थल (वन)महत्वपूर्ण तथ्य
1.पश्चिम बंगालसुंदरवन (Sunderbans)भारत और विश्व का सबसे बड़ा एकल मैंग्रोव क्षेत्र। यह एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल और रामसर स्थल है। इसका नाम “सुंदरी” वृक्ष के नाम पर पड़ा है और यह रॉयल बंगाल टाइगर का एकमात्र मैंग्रोव आवास है।
2.गुजरातकच्छ की खाड़ी और खंभात की खाड़ीभारत का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र। यह कच्छ, जामनगर और सूरत जिलों के तटों पर फैला है। यहाँ एविसेनिया मरीना प्रजाति का प्रभुत्व है।
3.अंडमान और निकोबार द्वीप समूहउत्तरी और मध्य अंडमान, दक्षिण अंडमानभारत का तीसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र। यहाँ भारत में मैंग्रोव प्रजातियों की सर्वाधिक विविधता पाई जाती है। यहाँ के मैंग्रोव वन बहुत घने और प्राचीन अवस्था में हैं।
4.ओडिशाभितरकनिका (Bhitarkanika) और महानदी डेल्टाभारत का दूसरा सबसे बड़ा सघन मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र। यह खारे पानी के मगरमच्छों की भारत की सबसे बड़ी आबादी का घर है और एक महत्वपूर्ण रामसर स्थल है।
5.आंध्र प्रदेशगोदावरी-कृष्णा डेल्टा (कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य)कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य भारत के सबसे बड़े मैंग्रोव क्षेत्रों में से एक है। यहाँ गंभीर रूप से लुप्तप्राय सफेद पीठ वाले और लंबे बिल वाले गिद्ध पाए जाते हैं।
6.महाराष्ट्रविक्रोली, ठाणे क्रीक, सिंधुदुर्ग, रत्नागिरी, रायगढ़ठाणे क्रीक को एक महत्वपूर्ण फ्लेमिंगो अभयारण्य और रामसर स्थल घोषित किया गया है। राज्य सरकार और समुदाय इनके संरक्षण के लिए सक्रिय हैं।
7.तमिलनाडुपिचावरम (Pichavaram) और मुथुपेट रिजर्व वनपिचावरम अपनी जटिल नहर प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है और दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव वनों में से एक माना जाता है। यह कावेरी नदी डेल्टा के पास स्थित है।
8.केरलकन्नूर और वेम्बनाड झील के आसपासवेम्बनाड-कोल वेटलैंड्स (एक रामसर स्थल) में छोटे-छोटे मैंग्रोव क्षेत्र हैं। यहाँ मैंग्रोव का आवरण अपेक्षाकृत कम और बिखरा हुआ है।
9.गोवाजुआरी और मांडवी नदियों का मुहाना (चोराव द्वीप)प्रसिद्ध सलीम अली पक्षी अभयारण्य चोराव द्वीप पर स्थित है, जो एक मैंग्रोव आवास है।
10.कर्नाटककारवार और दक्षिण कन्नड़ (कुंडापुर के पास)काली, शरावती और अन्य छोटी नदियों के मुहानों पर मैंग्रोव के छोटे क्षेत्र पाए जाते हैं।


1. उष्णकटिबंधीय आर्द्र मानसूनी वनस्पति (Tropical Moist Deciduous Forests)

यह उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों का एक उप-प्रकार है और भारत के वनस्पति आवरण का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।


2. प्रायद्वीपीय भारत की वनस्पति (Vegetation of Peninsular India)

प्रायद्वीपीय भारत (दक्कन का पठार और आसपास के क्षेत्र) अपनी विशिष्ट स्थलाकृति और वृष्टि-छाया प्रभाव के कारण वनस्पतियों की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदर्शित करता है। यहाँ की वनस्पति मुख्य रूप से वर्षा की मात्रा द्वारा नियंत्रित होती है।

यहाँ पाई जाने वाली मुख्य वनस्पतियाँ निम्नलिखित हैं:

  1. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन: यह पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलानों पर सीमित है, जहाँ भारी मानसूनी वर्षा (200 सेमी से अधिक) होती है। (जैसे केरल, कर्नाटक का तटीय क्षेत्र)।
  2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन: यह पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलानों और उत्तर-पूर्वी प्रायद्वीपीय पठार (जैसे ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड) पर पाए जाते हैं, जहाँ मध्यम वर्षा (100-200 सेमी) होती है। सागवान और साल यहाँ के प्रमुख वृक्ष हैं।
  3. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन: यह प्रायद्वीपीय भारत का सबसे बड़ा वनस्पति प्रकार है। यह दक्कन के पठार के अधिकांश वृष्टि-छाया क्षेत्रों (Rain Shadow Areas) में पाया जाता है।
    • क्षेत्र: मध्य महाराष्ट्र, आंतरिक कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना।
    • वर्षा: 70-100 सेमी।
    • वृक्ष: तेंदू, पलाश, अमलतास।
  4. उष्णकटिबंधीय कंटीले वन: ये प्रायद्वीप के सबसे शुष्क भागों में पाए जाते हैं जहाँ वर्षा 70 सेमी से कम होती है।
    • क्षेत्र: मध्य महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र।
    • वृक्ष: बबूल, कीकर, बेर।
  5. पर्वतीय शीतोष्ण वन (‘शोला’): दक्षिण भारत में, नीलगिरी, अन्नामलाई और पलानी की पहाड़ियों के ऊँचे क्षेत्रों (1500 मीटर से ऊपर) पर पाए जाने वाले अद्वितीय शीतोष्ण वनों को “शोला वन” कहा जाता है। इन वनों के बीच-बीच में घास के मैदान होते हैं।

3. घास भूमि वनस्पति (Grassland Vegetation)

भारत में शुद्ध उष्णकटिबंधीय सवाना जैसे विस्तृत घास के मैदान प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते, जैसा कि अफ्रीका में है। भारत की मानसूनी जलवायु पेड़ों की वृद्धि के लिए इतनी अनुकूल है कि अधिकांश क्षेत्रों में वन ही विकसित होते हैं।

हालाँकि, भारत में घास भूमियाँ निम्नलिखित रूपों में पाई जाती हैं:

  1. मानव-जनित घास भूमियाँ:
    • अधिकांश भारतीय घास के मैदान प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव-जनित (Anthropogenic) हैं। इनका निर्माण वनों की कटाई, अत्यधिक चराई और आग लगाने के कारण हुआ है। ये मुख्य रूप से पर्णपाती और कंटीले वनों के अवक्रमित (degraded) रूप हैं।
  2. पर्वतीय या अल्पाइन चारागाह:
    • यह भारत में पाया जाने वाला सबसे प्रमुख प्राकृतिक घास का मैदान है।
    • स्थान: ये हिमालय में वृक्ष रेखा (Tree Line – लगभग 3600 मीटर) से ऊपर पाए जाते हैं, जहाँ कठोर जलवायु के कारण पेड़ नहीं उग पाते।
    • स्थानीय नाम: इन्हें ‘मर्ग’ (जैसे गुलमर्ग, सोनमर्ग – कश्मीर में), ‘बुग्याल’ या ‘पयार’ (उत्तराखंड में) कहा जाता है।
    • उपयोग: ये गुर्जर और बकरवाल जैसे घुमंतू चरवाहा समुदायों के लिए ग्रीष्मकालीन चरागाह के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  3. शोला वनों के घास के मैदान: दक्षिण भारत में पश्चिमी घाट की ऊँची पहाड़ियों पर ‘शोला’ वनों के बीच-बीच में प्राकृतिक शीतोष्ण घास के मैदान पाए जाते हैं।
  4. नदी तटीय घास भूमियाँ (Riverine Grasslands): उत्तर भारत के तराई क्षेत्र (जैसे असम के काजीरंगा में) में लंबी और घनी घास (जैसे हाथी घास) के मैदान पाए जाते हैं, जो वन्यजीवों के लिए एक महत्वपूर्ण आवास हैं।

राष्ट्रीय वन नीति (National Forest Policy): एक अवलोकन

परिभाषा:
राष्ट्रीय वन नीति एक व्यापक सरकारी दस्तावेज़ और दिशा-निर्देशों का समूह है जो देश के वनों के प्रबंधन, संरक्षण, उपयोग और विकास के लिए वैज्ञानिक और टिकाऊ सिद्धांतों को निर्धारित करता है। इसका मुख्य लक्ष्य पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना, जैव विविधता का संरक्षण करना और देश के लोगों की वर्तमान तथा भविष्य की जरूरतों को पूरा करना है।


भारत में राष्ट्रीय वन नीति का ऐतिहासिक विकास

भारत में वन नीति का विकास तीन महत्वपूर्ण चरणों में हुआ है:

  1. प्रथम राष्ट्रीय वन नीति, 1894 (ब्रिटिश काल):
    • उद्देश्य: इसका मुख्य और एकमात्र उद्देश्य वनों का व्यावसायिक दोहन करके राजस्व (Revenue) कमाना था।
    • दृष्टिकोण: इसने वनों को एक व्यावसायिक संसाधन माना, संरक्षण या स्थानीय अधिकारों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
  2. राष्ट्रीय वन नीति, 1952 (स्वतंत्र भारत की पहली नीति):
    • उद्देश्य: इसने राजस्व के बजाय पारिस्थितिक संतुलन और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी।
    • प्रमुख लक्ष्य: इसने पहली बार यह लक्ष्य निर्धारित किया कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के एक-तिहाई (33%) हिस्से पर वन आवरण होना चाहिए, जिसमें से पहाड़ी क्षेत्रों में 60% और मैदानी क्षेत्रों में 20% का लक्ष्य रखा गया।
    • सीमाएँ: हालाँकि इसका दृष्टिकोण अच्छा था, लेकिन इसने भी स्थानीय समुदायों की वनों पर निर्भरता को पूरी तरह से मान्यता नहीं दी और व्यावसायिक दोहन को पूरी तरह से नहीं रोका।

3. राष्ट्रीय वन नीति, 1988 (वर्तमान में लागू)

यह भारत की वर्तमान और सबसे महत्वपूर्ण वन नीति है। इसने वन प्रबंधन के दृष्टिकोण में एक युगांतकारी परिवर्तन (Paradigm Shift) किया।

मूल सिद्धांत और दृष्टिकोण:

प्रमुख उद्देश्य (Key Objectives):

  1. पारिस्थितिक संतुलन: देश में पर्यावरणीय स्थिरता और वायुमंडलीय संतुलन बनाए रखना।
  2. प्राकृतिक विरासत का संरक्षण: देश की प्राकृतिक धरोहर, जैव विविधता और आनुवंशिक पूल का संरक्षण करना।
  3. मृदा अपरदन और मरुस्थलीकरण की रोकथाम: नदियों, झीलों और जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्रों में मृदा अपरदन को नियंत्रित करना।
  4. वन आवरण में वृद्धि: व्यापक वनीकरण और सामाजिक वानिकी कार्यक्रमों के माध्यम से 33% के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करना।
  5. स्थानीय जरूरतों की पूर्ति: ग्रामीण और आदिवासी आबादी के लिए ईंधन की लकड़ी, चारा, लघु वनोपज और इमारती लकड़ी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना।
  6. जन आंदोलन का निर्माण: वनों के महत्व के बारे में जागरूकता पैदा करके और महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करके इसे एक जन आंदोलन (People’s Movement) बनाना।
  7. वन उत्पादकता में वृद्धि: वनों की उत्पादकता बढ़ाकर राष्ट्रीय जरूरतों के लिए लकड़ी की उपलब्धता सुनिश्चित करना।

प्रमुख प्रावधान और रणनीतियाँ (Key Provisions and Strategies):


प्रस्तावित राष्ट्रीय वन नीति, 2018 (Draft National Forest Policy, 2018)

1988 की नीति को वर्तमान की चुनौतियों, विशेषकर जलवायु परिवर्तन (Climate Change), के संदर्भ में संशोधित करने के लिए एक मसौदा नीति प्रस्तुत की गई है। इसके कुछ प्रमुख नए पहलू हैं:

निष्कर्ष:
भारत की राष्ट्रीय वन नीति 1894 के शुद्ध राजस्व-केंद्रित दृष्टिकोण से विकसित होकर 1952 में राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित हुई और अंततः 1988 में एक संरक्षण-उन्मुख और जन-भागीदारी आधारित मॉडल में परिणत हुई। 1988 की नीति आज भी भारतीय वन प्रबंधन की आधारशिला है, जबकि 2018 का मसौदा इसे जलवायु परिवर्तन और सतत विकास की आधुनिक चुनौतियों के अनुसार ढालने का एक प्रयास है।


भारत – वन स्थिति रिपोर्ट 2023: मुख्य तथ्य

विषयविवरण
वन + वृक्ष आवरण (Forest + Tree Cover)कुल = 8,27,356.95 वर्ग कि.मी. ≈ भारत की भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17%
वन आवरण (Forest Cover)7,15,342.61 वर्ग कि.मी. ≈ 21.76%
वृक्ष आवरण (Tree Cover outside forests)1,12,014.34 वर्ग कि.मी. ≈ 3.41%
2021 → 2023 परिवर्तनकुल में वृद्धि = 1,445.81 वर्ग कि.मी.वन आवरण बढ़ा = 156.41 वर्ग कि.मी.वृक्ष आवरण बढ़ा = 1,289.40 वर्ग कि.मी.
मैंग्रोव आवरण (Mangrove Cover)कुल = 4,991.68 वर्ग कि.मी.यह लगभग 0.15% है भारत की भौगोलिक क्षेत्रफल का
उगने वाला स्टॉक / वृद्धि स्टॉक (Growing Stock)कुल = 6,430 मिलियन घन मीटर (million cum)– वन क्षेत्र के अंदर = 4,479 million cum– वन क्षेत्र के बाहर = 1,951 million cum
कार्बन स्टॉक / कार्बन सिंकअनुमानित = 30.43 बिलियन टन CO₂ समतुल्य
बढ़ोतरी / घटाव — राज्य स्तर– सर्वाधिक वृद्धि (वन + वृक्ष आवरण): छत्तीसगढ़ (+684)– इसके बाद: उत्तर प्रदेश (+559), ओडिशा (+559), राजस्थान (+394)– सर्वाधिक कमी: मध्य प्रदेश (−612.41), कर्नाटक (−459.36), लद्दाख (−159.26), नागालैंड (−125.22)
वन प्रकार (canopy density के अनुसार विभाजन)– Very Dense Forest (70% से अधिक)– Moderately Dense Forest (40%–70%)– Open Forest (10%–40%)– रिपोर्ट में Very Dense forests बढ़े, जबकि Moderately Dense और Open forests में कमी हुई
वन अग्नि (Forest Fires / Fire Incidences)2023-24 सत्र में कुल 203,544 आग-हॉटस्पॉट्स (fire hotspots) पाए गए
विशेष आंकड़े– 19 राज्य / UTs का वन आवरण उनके कुल क्षेत्रफल का 33% से ऊपर है– 8 राज्य / UTs में वन आवरण 75% से अधिक है– बांस क्षेत्र (Bamboo bearing area) = 1,54,670 वर्ग कि.मी. (2021 की तुलना में वृद्धि)