भारत की जलवायु:

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 एक विस्तृत विश्लेषण (UPSC एवं अन्य परीक्षाओं के लिए)

भारत की जलवायु को मोटे तौर पर “उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु” (Tropical Monsoon Climate) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। “मानसून” शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘हवाओं का ऋतु के अनुसार उलट जाना’। यह भारत की जलवायु की सबसे प्रमुख विशेषता है, जो देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन को गहराई से प्रभावित करती है।


I. भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

भारत की जलवायु में व्यापक क्षेत्रीय विविधताएँ हैं, जिनके लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:

अक्षांशीय स्थिति (Latitudinal Position)

किसी भी देश की जलवायु का निर्धारण करने वाला सबसे आधारभूत कारक उसकी अक्षांशीय स्थिति है। इसका सीधा संबंध पृथ्वी पर सूर्य की किरणों के कोण से है, जिससे उस स्थान को प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा यानी सूर्यताप (Insolation) की मात्रा तय होती है।


भारत के संदर्भ में अक्षांशीय स्थिति का प्रभाव

भारत की जलवायु को समझने के लिए उसकी अक्षांशीय स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का विस्तार लगभग 8°4′ उत्तरी अक्षांश से लेकर 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक है। इस विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कर्क रेखा (Tropic of Cancer – 23.5° N) है, जो देश के लगभग मध्य से होकर गुजरती है। यह रेखा भारत को स्पष्ट रूप से दो प्रमुख जलवायु कटिबंधों में विभाजित करती है:

1. कर्क रेखा के दक्षिण का क्षेत्र (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र – Tropical Zone)

यह क्षेत्र, जो प्रायद्वीपीय भारत का हिस्सा है, कर्क रेखा और भूमध्य रेखा के बीच स्थित है। इस क्षेत्र की जलवायु पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:

उदाहरण: चेन्नई या मुंबई में साल भर तापमान लगभग एक जैसा गर्म और आर्द्र रहता है।

2. कर्क रेखा के उत्तर का क्षेत्र (उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र – Subtropical Zone)

यह क्षेत्र कर्क रेखा के उत्तर में स्थित है और इसमें उत्तर भारत का विशाल मैदान तथा पर्वतीय क्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्र की जलवायु पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:

उदाहरण: दिल्ली या लखनऊ में अत्यधिक गर्मियाँ और काफी ठंडी सर्दियाँ होती हैं।

एक महत्वपूर्ण अपवाद: हिमालय का प्रभाव

यद्यपि अक्षांशीय स्थिति के अनुसार उत्तर भारत एक उपोष्णकटिबंधीय या शीतोष्ण क्षेत्र है, फिर भी इसकी जलवायु वैसी नहीं है जैसी कि इसी अक्षांश पर स्थित अन्य देशों (जैसे चीन या मध्य पूर्व) में है। इसका कारण हिमालय पर्वत है।

हिमालय एक शक्तिशाली जलवायु विभाजक के रूप में कार्य करता है और मध्य एशिया तथा साइबेरिया से आने वाली बर्फीली ध्रुवीय हवाओं को भारत में प्रवेश करने से रोकता है। यदि हिमालय न होता, तो उत्तर भारत सर्दियों में कहीं अधिक ठंडा होता। इसी कारण, अक्षांशीय विभाजन के बावजूद, पूरे भारत को समग्र रूप से एक उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु वाला देश माना जाता है।

निष्कर्ष:
संक्षेप में, अक्षांशीय स्थिति भारत की जलवायु की आधारशिला रखती है, जो देश को एक गर्म उष्णकटिबंधीय दक्षिण और एक चरम मौसमी उपोष्णकटिबंधीय उत्तर में विभाजित करती है। हालाँकि, हिमालय जैसे अन्य कारक इस आधारभूत विभाजन को संशोधित करके भारत को एक अद्वितीय मानसूनी जलवायु प्रदान करते हैं।


हिमालय पर्वत श्रृंखला (The Himalayan Range): भारत का जलवायु विभाजक

हिमालय पर्वत श्रृंखला सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि यह भारत के लिए एक विशाल जलवायु विभाजक (Climate Divide) और सुरक्षा कवच (Protective Shield) के रूप में कार्य करती है। यह भारत की जलवायु को इस तरह से नियंत्रित और संशोधित करती है कि इसके बिना उत्तर भारत का मौसम, कृषि और जीवन पूरी तरह से भिन्न होता। भारत की मानसूनी जलवायु का अस्तित्व और स्वरूप काफी हद तक हिमालय पर ही निर्भर करता है।

इसके प्रभाव को निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है:

1. ठंडी ध्रुवीय हवाओं से सुरक्षा (Protection from Cold Polar Winds)

2. मानसूनी वर्षा का प्रमुख कारण (Crucial for Monsoon Rains)

3. वृष्टि-छाया क्षेत्र का निर्माण (Creation of a Rain Shadow Area)

4. पश्चिमी विक्षोभ और शीतकालीन वर्षा (Western Disturbances and Winter Rains)

निष्कर्ष:
स्पष्ट रूप से, हिमालय पर्वत श्रृंखला भारत के जलवायु तंत्र की धुरी है। यह न केवल देश को मध्य एशिया की चरम जलवायु से बचाता है, बल्कि यह जीवनदायिनी मानसूनी वर्षा को भी सुनिश्चित करता है। यह भारत की मौसमी लय को बनाए रखता है, नदियों को पानी देता है, और उपजाऊ मैदानों का पोषण करता है। इस प्रकार, हिमालय भारत की भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान को आकार देने वाली एक निर्धारक शक्ति है।


जल और स्थल का वितरण: भारतीय मानसून का इंजन

जल और स्थल का वितरण भारत की मानसूनी जलवायु को जन्म देने वाला सबसे मौलिक और शक्तिशाली कारक है। इसका मूल सिद्धांत भूमि और जल के गर्म और ठंडा होने के अलग-अलग स्वभाव (Differential Heating and Cooling of Land and Sea) पर आधारित है। यह अंतर ही उस दाब-प्रणाली (Pressure System) को जन्म देता है जो मानसूनी हवाओं को चलाती है।

मूल वैज्ञानिक सिद्धांत

भूमि और जल की प्रकृति में कुछ आधारभूत अंतर होते हैं:

इसी सिद्धांत के कारण भारत की ऋतुओं के अनुसार हवा की दिशा में एक नाटकीय उलटफेर होता है। इसे हम दो प्रमुख परिदृश्यों में समझ सकते हैं:


1. ग्रीष्मकालीन परिदृश्य और दक्षिण-पश्चिम मानसून का जन्म (मार्च से सितंबर)

संक्षेप में (ग्रीष्म ऋतु):
गर्म भूमि (निम्न दाब) <— ठंडे समुद्र (उच्च दाब) = समुद्र से स्थल की ओर नमी वाली हवाएँ (मानसून)


2. शीतकालीन परिदृश्य और उत्तर-पूर्वी मानसून का जन्म (अक्टूबर से फरवरी)

अपवाद: जब ये शुष्क हवाएँ बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं और तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर भारी शीतकालीन वर्षा करती हैं।

संक्षेप में (शीत ऋतु):
ठंडी भूमि (उच्च दाब) —> गर्म समुद्र (निम्न दाब) = स्थल से समुद्र की ओर शुष्क हवाएँ

निष्कर्ष:
इस प्रकार, भारत की अनूठी भौगोलिक स्थिति, जहाँ एक ओर विशाल भूभाग है और तीन ओर से विशाल महासागर, स्थल और जल के तापमान में मौसमी अंतर पैदा करती है। यही तापीय अंतर दाब-प्रवणता को जन्म देता है, जो मानसूनी हवाओं की दिशा को पूरी तरह उलट देता है और भारत की विशिष्ट मानसूनी जलवायु का निर्माण करता है।


समुद्र तट से दूरी (Distance from the Sea): जलवायु का समकारी प्रभाव

किसी स्थान की जलवायु इस बात से बहुत प्रभावित होती है कि वह समुद्र तट के कितना पास है या उससे कितनी दूर है। समुद्र का प्रभाव मुख्य रूप से तापमान को संतुलित और नियंत्रित करने वाला होता है। इस प्रभाव को जलवायु का समकारी या नरमकारी प्रभाव (Moderating Influence of the Sea) कहा जाता है।

मूल सिद्धांत: स्थल समीर और समुद्र समीर

इसका वैज्ञानिक आधार भूमि और जल के गर्म होने की अलग-अलग दरों पर टिका है:

यह दैनिक चक्र तटीय क्षेत्रों के तापमान को वर्ष भर संतुलित रखता है।


भारत की जलवायु पर इसका प्रभाव: दो विपरीत जलवायु प्रकार

समुद्र तट से दूरी के आधार पर भारत में दो बिल्कुल भिन्न प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है:

1. तटीय क्षेत्रों की समकारी जलवायु (Equable or Maritime Climate)

जो क्षेत्र समुद्र के निकट हैं (जैसे मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, गोवा), वहाँ की जलवायु पर समुद्र का गहरा प्रभाव पड़ता है।

उदाहरण: मुंबई का तापमान गर्मियों में शायद ही 35°C से बहुत ऊपर जाता है और सर्दियों में 18-20°C से नीचे नहीं जाता। साल भर मौसम लगभग एक जैसा महसूस होता है।

2. आंतरिक क्षेत्रों की महाद्वीपीय या चरम जलवायु (Continental or Extreme Climate)

जैसे-जैसे हम समुद्र तट से दूर भारत के भीतरी भागों (जैसे दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, नागपुर) की ओर बढ़ते हैं, समुद्र का समकारी प्रभाव खत्म हो जाता है।

उदाहरण: दिल्ली में गर्मियों में झुलसाने वाली गर्मी और सर्दियों में कंपकंपाने वाली ठंड पड़ती है।

निष्कर्ष:
इस प्रकार, समुद्र तट से दूरी भारत की जलवायु में एक स्पष्ट विभाजन रेखा खींचती है। यह निर्धारित करती है कि किसी स्थान का मौसम साल भर संतुलित और नरम रहेगा या फिर वह मौसमी चरम सीमाओं (अत्यधिक गर्मी और अत्यधिक ठंड) का अनुभव करेगा। यह कारक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों के रहन-सहन, पहनावे और खान-पान को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है।


उच्चावच (Relief / Altitude): जलवायु को आकार देने वाली भू-आकृतियाँ

उच्चावच का अर्थ है किसी स्थान की भू-आकृति, विशेषकर उसकी ऊँचाई (Altitude) और ढलान की दिशा (Orientation of Slopes)। यह किसी भी क्षेत्र की जलवायु, विशेष रूप से तापमान और वर्षा को स्थानीय स्तर पर नियंत्रित करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली कारक है।

भारत जैसे भौगोलिक रूप से विविध देश में, जहाँ विशाल हिमालय पर्वत, पश्चिमी और पूर्वी घाट, और दक्कन का पठार जैसी संरचनाएँ हैं, उच्चावच का प्रभाव बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।


I. ऊँचाई (Altitude) का प्रभाव: तापमान पर सीधा नियंत्रण


II. पर्वतीय बाधा (Mountain Barrier) का प्रभाव: वर्षा पर निर्णायक नियंत्रण

पर्वत श्रृंखलाएँ हवाओं के मार्ग में बाधा के रूप में कार्य करती हैं और वर्षा के वितरण को नाटकीय रूप से प्रभावित करती हैं।

निष्कर्ष:
इस प्रकार, उच्चावच भारत की जलवायु में स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर भारी विविधताएँ उत्पन्न करता है। यह निर्धारित करता है कि कौन सा क्षेत्र ठंडा होगा और कौन सा गर्म, कहाँ अत्यधिक वर्षा होगी और कहाँ सूखा पड़ेगा। मैदानों की समतल भूमि, पहाड़ों की ठंडी ऊँचाइयाँ, और घाटों के वर्षा-युक्त तथा वर्षा-हीन ढलान, सभी भारत की जलवायु पच्चीकारी के जटिल और अभिन्न अंग हैं, जिन्हें उच्चावच द्वारा ही आकार दिया गया है।


जेट स्ट्रीम और ऊपरी वायु परिसंचरण: भारतीय मानसून का नियंत्रक

जेट स्ट्रीम क्षोभमंडल (Troposphere) की ऊपरी परतों में, लगभग 9 से 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर, बहुत तेज गति (150-300 किमी/घंटा) से बहने वाली एक संकरी वायु-धारा है। ये पश्चिम से पूर्व की ओर एक लहरदार (Meandering) मार्ग में बहती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और विशेषकर मानसून के आगमन, तीव्रता और वापसी को नियंत्रित करने में इन ऊपरी वायु धाराओं की भूमिका निर्णायक होती है।

भारतीय मानसून के संदर्भ में दो प्रमुख जेट स्ट्रीम महत्वपूर्ण हैं:

  1. उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet Stream – STWJ)
  2. उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet Stream – TEJ)

1. उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (STWJ) और शीतकालीन मौसम


2. उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (TEJ) और ग्रीष्मकालीन मानसून

निष्कर्ष:
इस प्रकार, ऊपरी वायु परिसंचरण, विशेषकर जेट स्ट्रीम, भारतीय मानसून के लिए एक ‘ऑन-ऑफ’ स्विच की तरह काम करता है। पश्चिमी जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर खिसकना मानसून के आगमन के लिए हरा सिग्नल है, जबकि पूर्वी जेट स्ट्रीम का विकास मानसून को शक्ति और दिशा प्रदान करता है। इन जटिल वायुमंडलीय प्रक्रियाओं की समझ ने ही भारतीय मौसम वैज्ञानिकों को मानसून की भविष्यवाणी करने में अधिक सक्षम बनाया है।


मानसूनी पवनें: भारत की जीवनधारा

“मानसून” उन मौसमी पवनों को कहते हैं जिनकी दिशा ऋतु के अनुसार पूरी तरह उलट जाती है। ये पवनें भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की जलवायु का सबसे महत्वपूर्ण और निर्धारक तत्व हैं। भारत के लिए मानसून सिर्फ एक मौसम नहीं, बल्कि एक आर्थिक और सांस्कृतिक घटना है जो पूरे देश की कृषि, अर्थव्यवस्था और जीवन शैली को नियंत्रित करती है।

भारत में मानसूनी पवनों के दो मुख्य रूप देखने को मिलते हैं:

  1. दक्षिण-पश्चिम मानसून (ग्रीष्मकालीन मानसून)
  2. उत्तर-पूर्वी मानसून (शीतकालीन मानसून)

1. दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon): वर्षा का वाहक

यह भारत का मुख्य वर्षा ऋतु का मानसून है, जो देश की लगभग 80% वार्षिक वर्षा के लिए जिम्मेदार है।


2. उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon): मानसून का लौटना

यह शीतकालीन मानसून है, जब हवाओं की दिशा पूरी तरह उलट जाती है।

निष्कर्ष:
मानसूनी पवनें भारत की जलवायु प्रणाली की आत्मा हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून जहाँ पूरे देश को जल प्रदान कर कृषि को जीवन देता है, वहीं उत्तर-पूर्वी मानसून एक शुष्क और स्थिर मौसम लाता है, जो कुछ विशिष्ट क्षेत्रों के लिए वर्षा का स्रोत है। इन हवाओं का समय पर आना और सही मात्रा में बरसना भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए सर्वोपरि है।


1. पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव (मुख्यतः सकारात्मक)

पश्चिमी विक्षोभ एक शीतोष्ण चक्रवात है जो शीत ऋतु में भूमध्य सागर से उत्पन्न होता है और भारतीय उपमहाद्वीप में मौसम को प्रभावित करता है। इसके प्रभाव निम्नलिखित हैं:

संक्षेप में, पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत की पारिस्थितिकी, जल सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और अधिकांशतः लाभदायक है।


2. उष्णकटिबंधीय चक्रवात का प्रभाव (मुख्यतः नकारात्मक)

उष्णकटिबंधीय चक्रवात गर्म समुद्रों पर बनने वाले विनाशकारी तूफ़ान हैं जो भारत के तटीय क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। इसके प्रभाव विनाशकारी और दूरगामी होते हैं:

अपवाद (सकारात्मक प्रभाव): चक्रवात अपने साथ भारी मात्रा में वर्षा लाते हैं, जिससे कभी-कभी सूखाग्रस्त क्षेत्रों के जलाशयों और भूजल स्तर को रिचार्ज करने में मदद मिलती है, लेकिन यह लाभ उनके द्वारा किए गए विनाश की तुलना में नगण्य होता है।

निष्कर्ष:
स्पष्ट है कि जहाँ पश्चिमी विक्षोभ भारतीय जलवायु में एक सौम्य और रचनात्मक भूमिका निभाता है, वहीं उष्णकटिबंधीय चक्रवात एक विनाशकारी और नकारात्मक शक्ति के रूप में कार्य करता है। एक जीवन देता है, तो दूसरा जीवन लेता है।


एल नीनो और भारतीय जलवायु: एक जटिल संबंध

एल नीनो (El Niño) एक जटिल और प्राकृतिक जलवायु घटना है जो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू तट के पास) में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी है। यह एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है “छोटा बालक” या “बालक ईसा”, क्योंकि यह अक्सर क्रिसमस के आसपास दिखाई देता है। यद्यपि यह घटना प्रशांत महासागर में होती है, इसका प्रभाव वॉकर परिसंचरण (Walker Circulation) के माध्यम से वैश्विक मौसम पैटर्न पर पड़ता है, और भारतीय मानसून पर इसका प्रभाव सबसे गहरा और अक्सर नकारात्मक होता है।


1. सामान्य परिस्थिति: वॉकर परिसंचरण (जब एल नीनो नहीं होता)

इसे समझे बिना एल नीनो के प्रभाव को समझना मुश्किल है। सामान्य वर्षों में:


2. एल नीनो की परिस्थिति: वॉकर परिसंचरण का उलटना

एल नीनो वाले वर्षों में, यह सामान्य प्रणाली बाधित हो जाती है:


3. भारतीय मानसून पर एल नीनो का प्रभाव

पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया) पर बना उच्च दाब क्षेत्र ही भारतीय मानसून के लिए सबसे बड़ी समस्या है। इसका प्रभाव इस प्रकार पड़ता है:

मुख्य प्रभाव (सारांश में):

  1. कमजोर मानसून: भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर हो जाता है।
  2. कम वर्षा: देश भर में वर्षा की मात्रा घट जाती है, जिससे जल संकट उत्पन्न होता है।
  3. सूखे की प्रबल संभावना: भारत में अधिकांश बड़े सूखे एल नीनो वर्षों से जुड़े हुए हैं (उदाहरण: 2002, 2009, 2015)।
  4. मानसून का देर से आगमन और जल्दी वापसी: मानसून के आने में देरी हो सकती है और उसकी वापसी जल्दी हो सकती है, जिससे फसलों के लिए वर्षा की कुल अवधि कम हो जाती है।
  5. उच्च तापमान: वर्षा की कमी और शुष्क मौसम के कारण गर्मियों और मानसून के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहता है।

4. भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

चूंकि भारतीय अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर निर्भर है, और कृषि मानसून पर, इसलिए एल नीनो के दूरगामी आर्थिक प्रभाव पड़ते हैं:


महत्वपूर्ण अपवाद: इंडियन ओशन डायपोल (IOD)

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी एल नीनो वर्ष भारत में सूखे के वर्ष नहीं होते हैं।

निष्कर्ष: एल नीनो भारतीय मानसून के लिए एक बड़ी नकारात्मक शक्ति है, जो अक्सर देश में सूखे और आर्थिक कठिनाइयों का कारण बनती है। हालाँकि, IOD जैसे अन्य क्षेत्रीय कारक कभी-कभी इसके प्रभाव को संशोधित कर सकते हैं, जिससे यह संबंध 100% निश्चित नहीं रहता।


दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation): भारतीय मानसून का वैश्विक नियंत्रक

दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) एक बड़े पैमाने वाली, आवधिक वायुमंडलीय घटना है, जिसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर (Tropical Pacific Ocean) के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के बीच सतही वायुदाब (Surface Air Pressure) में एक “उलटफेर” या “उतार-चढ़ाव” (See-Saw Pattern) देखने को मिलता है। इसकी खोज 20वीं सदी की शुरुआत में सर गिल्बर्ट वॉकर ने की थी, जब वह भारतीय मानसून की भविष्यवाणी करने के तरीकों का अध्ययन कर रहे थे।

यह भारतीय मानसून के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि इसे मानसून की तीव्रता का एक प्रमुख वैश्विक संकेतक माना जाता है।


दक्षिणी दोलन की दो अवस्थाएँ (Phases)

यह “उतार-चढ़ाव” दो मुख्य अवस्थाओं में होता है:

1. सकारात्मक अवस्था (Positive Phase) – ला नीना की स्थिति (La Niña Conditions)

2. नकारात्मक अवस्था (Negative Phase) – एल नीनो की स्थिति (El Niño Conditions)


ENSO: दोनों घटनाओं का संयुक्त रूप

वैज्ञानिकों ने पाया कि महासागरीय घटना एल नीनो (समुद्र का गर्म होना) और वायुमंडलीय घटना दक्षिणी दोलन (वायुदाब का उलटफेर) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक साथ घटित होते हैं। इसलिए, इस संयुक्त घटना को ENSO (El Niño-Southern Oscillation) कहा जाता है।


सारांश तालिका: दक्षिणी दोलन का भारतीय मानसून पर प्रभाव

पैरामीटरसकारात्मक अवस्था (Positive Phase)नकारात्मक अवस्था (Negative Phase)
प्रशांत महासागर की स्थितिला नीना (La Niña) जैसी स्थितिएल नीनो (El Niño) जैसी स्थिति
पूर्वी प्रशांत में वायुदाबउच्च (High)निम्न (Low)
पश्चिमी प्रशांत में वायुदाबनिम्न (Low)उच्च (High)
व्यापारिक पवनें (Trade Winds)मजबूत (Strong)कमजोर या उलटी (Weak or Reversed)
वॉकर परिसंचरणमजबूत (Intensified)कमजोर या टूटा हुआ (Weakened or Broken)
भारतीय मानसून पर प्रभावसकारात्मक (Positive) – मानसून को शक्ति मिलती हैनकारात्मक (Negative) – मानसून कमजोर होता है
भारत में वर्षा की संभावनासामान्य से अधिक वर्षा (बाढ़ की संभावना)सामान्य से कम वर्षा (सूखे की संभावना)

निष्कर्ष: दक्षिणी दोलन एक वैश्विक वायुदाब का पैमाना है जो सीधे तौर पर भारतीय मानसून की ताकत को नियंत्रित करता है। इसकी नकारात्मक अवस्था (जब पश्चिमी प्रशांत में उच्च दाब हो) भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चेतावनी होती है क्योंकि यह अक्सर मानसून की विफलता और सूखे से जुड़ी होती है।



भारतीय मानसून की उत्पत्ति: प्रमुख सिद्धांत

भारतीय मानसून एक अत्यंत जटिल वायुमंडलीय घटना है, जिसकी उत्पत्ति की व्याख्या करने के लिए समय के साथ विभिन्न सिद्धांत विकसित हुए हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

  1. चिरसम्मत या तापीय सिद्धांत (Classical or Thermal Concept)
  2. आधुनिक या गतिक सिद्धांत (Modern or Dynamic Concept)

1. मानसून की उत्पत्ति का तापीय सिद्धांत (The Thermal Concept)

यह मानसून की उत्पत्ति का सबसे पुराना और सरल सिद्धांत है, जिसे 17वीं सदी में एडमंड हैली ने प्रतिपादित किया था। यह सिद्धांत पूरी तरह से जल और स्थल के विभेदी तापन (Differential Heating of Land and Sea) पर आधारित है। इसे एक वृहत पैमाने पर “स्थल समीर और समुद्र समीर” का ही रूप माना जाता है।

A) ग्रीष्मकालीन मानसून (दक्षिण-पश्चिम मानसून) की उत्पत्ति:

B) शीतकालीन मानसून (उत्तर-पूर्वी मानसून) की उत्पत्ति:

सीमाएँ: यह सिद्धांत मानसून की एक आधारभूत समझ तो देता है, लेकिन यह मानसून के “प्रस्फोट” (Burst), मानसून में आने वाले “विच्छेद” (Break) और इसकी जटिल प्रकृति की व्याख्या करने में असमर्थ है।

2. मानसून की उत्पत्ति का आधुनिक/गतिक सिद्धांत (The Modern/Dynamic Concept)

20वीं सदी में ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण की खोज के बाद, यह स्पष्ट हो गया कि मानसून केवल सतही तापन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक और अधिक जटिल वायुमंडलीय प्रक्रिया है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:

A) तिब्बती पठार और हिमालय की भूमिका:

B) जेट स्ट्रीम की भूमिका:

C) ENSO (एल नीनो और दक्षिणी दोलन) का प्रभाव:

D) हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD):

निष्कर्ष:
आधुनिक सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि भारतीय मानसून केवल स्थल और जल के तापन का परिणाम न होकर, ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण (जेट स्ट्रीम), वैश्विक घटनाओं (ENSO), और क्षेत्रीय कारकों (तिब्बती पठार, IOD) के बीच एक जटिल अंतःक्रिया का परिणाम है। तापीय सिद्धांत आधार प्रदान करता है, जबकि गतिक सिद्धांत मानसून की जटिलता और तीव्रता की विस्तृत व्याख्या करता है।

II. भारत की प्रमुख ऋतुएँ (The Four Seasons of India)

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, भारत में मुख्य रूप से चार ऋतुएँ होती हैं:

ऋतु (Season)अवधि (Period)प्रमुख विशेषताएँ
1. शीत ऋतु (Winter)दिसंबर से फरवरीहवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। आकाश साफ और तापमान कम रहता है। पश्चिमी विक्षोभ के कारण उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा होती है, जो रबी की फसलों (गेहूँ) के लिए लाभदायक है।
2. ग्रीष्म ऋतु (Summer)मार्च से मईतापमान तेजी से बढ़ता है और उत्तर भारत में ‘लू’ नामक गर्म हवाएँ चलती हैं। मानसून-पूर्व बौछारें पड़ती हैं, जिन्हें ‘काल बैशाखी’ (बंगाल) और ‘आम्र वर्षा’ (केरल) कहा जाता है।
3. वर्षा ऋतु (Rainy Season)जून से सितंबरदक्षिण-पश्चिम मानसून का आगमन होता है। यह दो शाखाओं में बँटता है: अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी शाखा। देश की लगभग 80% वर्षा इसी ऋतु में होती है।
4. शरद ऋतु (Autumn)अक्टूबर से नवंबरमानसून की वापसी होती है। आकाश साफ हो जाता है, लेकिन उत्तर भारत में ‘अक्टूबर की गर्मी’ महसूस होती है। इस समय उत्तर-पूर्वी मानसून से तमिलनाडु के तट पर भारी वर्षा होती है।

भारत में शीत ऋतु (The Winter Season)

भारत में शीत ऋतु मध्य नवंबर से शुरू होकर फरवरी तक रहती है, जिसमें दिसंबर और जनवरी सबसे ठंडे महीने होते हैं। यह मौसम साफ आसमान, सुखद धूप, कम तापमान और कम आर्द्रता के लिए जाना जाता है। हालांकि, भारत की विशालता के कारण, इस ऋतु का अनुभव देश के विभिन्न हिस्सों में बहुत अलग-अलग होता है।

I. शीत ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ

  1. तापमान:
    • उत्तर भारत: दक्षिण से उत्तर की ओर तापमान घटता जाता है। गंगा के मैदानों में औसत तापमान 10°C से 15°C के बीच रहता है, जबकि रात में यह हिमांक के करीब पहुँच सकता है।
    • प्रायद्वीपीय भारत: समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण, प्रायद्वीपीय भारत में कोई स्पष्ट या कठोर शीत ऋतु नहीं होती है। तापमान 20°C से 25°C के बीच बना रहता है। यहाँ तापमान में बहुत कम गिरावट देखी जाती है।
  2. वायुदाब और पवनें:
    • उच्च दाब का क्षेत्र: इस समय सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप ठंडा हो जाता है। ठंडी और भारी हवा के कारण उत्तर-पश्चिम भारत पर एक उच्च वायुदाब (High Pressure) का क्षेत्र विकसित हो जाता है।
    • पवनों की दिशा: हवाएँ इस उच्च दाब क्षेत्र से दक्षिण में स्थित निम्न दाब वाले समुद्री क्षेत्रों की ओर बहती हैं। इन पवनों की दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है, इसलिए इन्हें उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon) कहा जाता है।
    • पवनों की प्रकृति: चूँकि ये पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, इसलिए ये ठंडी और शुष्क होती हैं और देश के अधिकांश हिस्सों में वर्षा नहीं करतीं।

II. शीत ऋतु की प्रमुख मौसम घटनाएँ

  1. पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances):
    • उत्पत्ति: यह शीत ऋतु की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। ये भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में उत्पन्न होने वाले शीतोष्ण चक्रवात हैं, जिन्हें पश्चिमी जेट स्ट्रीम पूर्व की ओर बहाकर भारत तक लाती है।
    • प्रभाव क्षेत्र: ये मुख्य रूप से उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत को प्रभावित करते हैं।
    • वर्षा और हिमपात:
      • मैदानी इलाकों में वर्षा: इनके कारण पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हल्की से मध्यम शीतकालीन वर्षा होती है, जो रबी की फसलों (विशेषकर गेहूँ) के लिए “अमृत” मानी जाती है।
      • पहाड़ों पर हिमपात: हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड) में भारी हिमपात (Snowfall) होता है। यह हिमपात गर्मियों में पिघलकर उत्तर भारत की नदियों को जल प्रदान करता है।
  2. शीत लहर और पाला (Cold Wave and Frost):
    • पश्चिमी विक्षोभ के गुजर जाने के बाद, जब आसमान साफ हो जाता है, तो बर्फीले हिमालय से ठंडी हवाएँ मैदानी इलाकों की ओर चलती हैं, जिससे तापमान में भारी गिरावट आती है और शीत लहर की स्थिति उत्पन्न होती है।
    • रात में तापमान के हिमांक बिंदु से नीचे चले जाने पर पाला (Frost) पड़ता है, जो फसलों के लिए हानिकारक हो सकता है।
  3. कोहरा (Fog):
    • शांत हवाओं और भूमि की सतह के पास नमी के कारण उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, विशेषकर सिंधु-गंगा के मैदानों में, घना कोहरा छा जाता है। यह हवाई, रेल और सड़क यातायात को बुरी तरह प्रभावित करता है।
  4. उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा वर्षा:
    • उत्तर-पूर्वी मानसून की पवनें जब बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं।
    • ये नमी युक्त पवनें जब तमिलनाडु के तट से टकराती हैं, तो कोरोमंडल तट (तमिलनाडु, दक्षिणी आंध्र प्रदेश) पर भारी शीतकालीन वर्षा करती हैं। चेन्नई की अधिकांश वार्षिक वर्षा इसी मौसम में होती है।

📋 सारांश तालिका: शीत ऋतु का क्षेत्रीय प्रभाव

क्षेत्रतापमानमौसम की घटनाएँप्रभाव
उत्तर भारत का मैदानठंडा (रातें बहुत ठंडी)पश्चिमी विक्षोभ से वर्षा, शीत लहर, पाला, घना कोहरारबी की फसलों के लिए वर्षा लाभदायक, पाला हानिकारक, यातायात बाधित
हिमालयी क्षेत्रबहुत ठंडा (हिमांक से नीचे)भारी हिमपात, पश्चिमी विक्षोभ का सीधा प्रभावपर्यटन को बढ़ावा, गर्मियों के लिए जल संचयन, जनजीवन बाधित
प्रायद्वीपीय भारतहल्का ठंडा / सुखदकोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं, मौसम शुष्कपर्यटन और बाहरी गतिविधियों के लिए उत्तम समय
तमिलनाडु तट (कोरोमंडल)हल्का ठंडा और आर्द्रउत्तर-पूर्वी मानसून से भारी वर्षाराज्य की जल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण, कभी-कभी बाढ़ का कारण

निष्कर्ष:

भारत में शीत ऋतु एक शांत और शुष्क मौसम है, लेकिन यह क्षेत्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण मौसम घटनाओं जैसे कि पश्चिमी विक्षोभ और उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा चिह्नित है, जो देश के कृषि और जल संसाधनों पर गहरा प्रभाव डालते हैं


भारत में ग्रीष्म ऋतु (The Summer Season)

भारत में ग्रीष्म ऋतु का आगमन मार्च में सूर्य के उत्तरायण (सूर्य का कर्क रेखा की ओर बढ़ना) होने के साथ होता है और यह मध्य जून तक रहता है। यह मौसम अत्यधिक तापमान, निम्न वायुदाब और स्थानीय तूफानों के लिए जाना जाता है। यह एक संक्रमण काल है जो शीत ऋतु की समाप्ति और जीवनदायिनी वर्षा ऋतु के आगमन की पृष्ठभूमि तैयार करता है।


I. ग्रीष्म ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ

  1. तापमान:
    • तापमान में वृद्धि: सूर्य के उत्तरायण होने के साथ-_साथ, पूरे देश में तापमान तेजी से बढ़ने लगता है।
    • उच्चतम तापमान: मई का महीना सबसे गर्म होता है, विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों में, जहाँ तापमान 45°C से 48°C तक पहुँच जाता है। राजस्थान का थार मरुस्थल अत्यधिक गर्म हो जाता है।
    • दक्षिण भारत में प्रभाव: समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण, प्रायद्वीपीय भारत में उत्तर भारत जैसी भीषण गर्मी नहीं पड़ती है। यहाँ का तापमान अपेक्षाकृत कम (30°C से 35°C) और स्थिर रहता है।
  2. वायुदाब और पवनें:
    • निम्न दाब का क्षेत्र: अत्यधिक गर्मी के कारण, भारतीय उपमहाद्वीप पर, विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत में, एक शक्तिशाली निम्न वायुदाब का क्षेत्र (Low-Pressure Area) विकसित हो जाता है।
    • मानसून द्रोणी: यह निम्न दाब क्षेत्र एक लम्बी द्रोणी (Trough) का रूप ले लेता है, जो पूर्व में छोटानागपुर पठार से लेकर पश्चिम में थार मरुस्थल तक फैली होती है। यही द्रोणी आगे चलकर मानसूनी पवनों को आकर्षित करने का मुख्य केंद्र बनती है।
    • पवनों की प्रकृति: इस मौसम में धरातलीय पवनें हल्की और परिवर्तनशील होती हैं, लेकिन उत्तर भारत के मैदानों में गर्म और शुष्क पवनें ‘लू’ चलती हैं।

II. मानसून-पूर्व की बौछारें और स्थानीय तूफान

ग्रीष्म ऋतु के अंत में (अप्रैल-मई में), भारत के विभिन्न हिस्सों में संवहनीय क्रियाओं (Convectional activities) के कारण गरज और तेज हवाओं के साथ कुछ वर्षा होती है। इन बौछारों के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नाम हैं, जो परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

  1. आम्र वर्षा (Mango Showers):
    • क्षेत्र: केरल और कर्नाटक के तटीय क्षेत्र।
    • प्रभाव: यह वर्षा आम की फसल के लिए बहुत लाभदायक होती है क्योंकि यह आमों को जल्दी पकने में मदद करती है। इसी कारण इसे आम्र वर्षा कहते हैं।
  2. फूलों वाली बौछार (Blossom Showers):
    • क्षेत्र: केरल और आसपास के क्षेत्र।
    • प्रभाव: यह वर्षा कहवा (कॉफी) के फूलों के खिलने में मदद करती है, इसलिए इसे फूलों वाली बौछार के नाम से जाना जाता है।
  3. काल बैशाखी (Kaal Baisakhi) / नॉर’वेस्टर्स (Nor’westers):
    • क्षेत्र: पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड, ओडिशा।
    • प्रभाव: यह एक तीव्र और विनाशकारी प्रकृति का तूफान है, जिसमें तेज हवाएँ, मूसलाधार वर्षा और ओलावृष्टि होती है। ‘काल’ का अर्थ है ‘विनाश’, जो बैशाख के महीने में आता है। हालाँकि यह विनाशकारी होता है, लेकिन यह चाय (असम में), जूट और चावल (पश्चिम बंगाल में) की खेती के लिए बहुत लाभदायक भी है।
  4. लू (Loo):
    • क्षेत्र: उत्तरी मैदान (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार)।
    • प्रभाव: यह एक गर्म, शुष्क और पीड़ादायक पवन है जो दोपहर के समय चलती है। इसके संपर्क में आने से हीटस्ट्रोक (ऊष्माघात) का खतरा रहता है।

सारांश तालिका: ग्रीष्म ऋतु का क्षेत्रीय प्रभाव

क्षेत्रतापमानप्रमुख मौसमी घटनाएँप्रभाव
उत्तर-पश्चिम और मध्य भारतअत्यधिक गर्म (45°C+)लू, धूल भरी आँधियाँ, निम्न दाब का केंद्र।भीषण गर्मी, जनजीवन प्रभावित, मानसून को आकर्षित करने वाली प्रणाली का निर्माण।
पूर्वी भारतगर्म और आर्द्रकाल बैशाखी (तीव्र तूफान)।जान-माल की हानि, लेकिन चाय, जूट और चावल की फसल के लिए लाभदायक।
दक्षिणी भारत (तटीय)गर्म (कम चरम)आम्र वर्षा, फूलों वाली बौछारआम और कॉफी की फसलों के लिए अत्यधिक लाभदायक।
प्रायद्वीपीय पठारगर्म (समुद्र से दूरी के कारण अधिक)हल्की संवहनीय वर्षा।गर्मी से थोड़ी राहत।

निष्कर्ष:
भारत में ग्रीष्म ऋतु एक कठोर और शुष्क मौसम है, लेकिन यह केवल गर्मी और परेशानी का समय नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल है। इसी मौसम में बना तीव्र निम्न दाब का क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून को भारत की ओर खींचने के लिए एक शक्तिशाली “चुंबक” के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार, यह भीषण गर्मी ही आगामी जीवनदायिनी वर्षा ऋतु की पृष्ठभूमि तैयार करती है।


भारत में वर्षा ऋतु (The Rainy Season): दक्षिण-पश्चिम मानसून का आगमन

वर्षा ऋतु, जिसे दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम के रूप में भी जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे महत्वपूर्ण ऋतु है। यह जून की शुरुआत से मध्य सितंबर तक रहता है और भारत की लगभग 80% वार्षिक वर्षा इसी दौरान होती है। यह ऋतु देश की कृषि, अर्थव्यवस्था, जल सुरक्षा और पारिस्थितिकी के लिए जीवनदायिनी है।


I. वर्षा ऋतु की उत्पत्ति और आगमन

  1. उत्पत्ति का कारण:
    • तीव्र निम्न दाब: ग्रीष्म ऋतु के दौरान, उत्तर-पश्चिम भारत और तिब्बती पठार पर बने तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र के कारण।
    • उच्च दाब: हिंद महासागर के अपेक्षाकृत ठंडे होने से वहाँ बने उच्च वायुदाब क्षेत्र के कारण।
    • जेट स्ट्रीम का खिसकना: पश्चिमी जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर खिसकना और पूर्वी जेट स्ट्रीम का विकसित होना, जो मानसून को और शक्तिशाली बनाता है।
  2. मानसून का आगमन (Onset of Monsoon):
    • इस शक्तिशाली दाब-प्रवणता के कारण, हिंद महासागर से नमी से भरपूर हवाएँ (दक्षिण-पश्चिम मानसून) भारतीय भू-भाग की ओर आकर्षित होती हैं।
    • 1 जून के आसपास यह मानसून केरल के मालाबार तट पर पहुँचता है। इस पहली भारी वर्षा को “मानसून का प्रस्फोट या विस्फोट” (Monsoon Burst) कहा जाता है।
  3. दो शाखाओं में विभाजन:
    प्रायद्वीपीय भारत की नोक पर पहुँचने के बाद, यह मानसून दो मुख्य शाखाओं में बँट जाता है:
    • अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch)
    • बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch)

II. मानसून की दोनों शाखाओं का प्रभाव

अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch)बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch)
गति और शक्ति: यह अधिक शक्तिशाली होती है और बंगाल की खाड़ी की शाखा की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक नमी लाती है।गति: यह धीमी गति से आगे बढ़ती है।
प्रथम प्रभाव: पश्चिमी घाट से टकराकर उसके पश्चिमी ढलानों पर भारी पर्वतीय वर्षा (250 सेमी से अधिक) करती है (जैसे मुंबई, गोवा)।प्रथम प्रभाव: सीधे उत्तर की ओर बढ़ती है और म्यांमार की अराकान पहाड़ियों से टकराकर उत्तर-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है।
अन्य क्षेत्रों में प्रभाव: एक शाखा गुजरात और राजस्थान से होकर गुजरती है, लेकिन अरावली पर्वत के समानांतर होने के कारण वहाँ बहुत कम वर्षा करती है। दूसरी शाखा मध्य भारत में वर्षा करती है।उत्तर-पूर्व में प्रभाव: मेघालय की गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों से टकराकर यह विश्व की सर्वाधिक वर्षा करती है (मासिनराम और चेरापूँजी में)।
गंगा के मैदानों में प्रभाव: हिमालय के समानांतर चलते हुए यह पश्चिम की ओर बढ़ती है और गंगा के मैदानों में वर्षा करती है। जैसे-जैसे यह पश्चिम की ओर बढ़ती है, इसकी नमी कम होती जाती है, जिससे वर्षा की मात्रा भी घटती जाती है।
विलय: पंजाब के मैदानों के पास जाकर यह अरब सागर की शाखा के साथ विलीन हो जाती है।विलय: दिल्ली और पंजाब के पास यह अरब सागर की शाखा से मिल जाती है।

III. वर्षा ऋतु की अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएँ

  1. वर्षा में विच्छेद (Break in Monsoon):
    • वर्षा ऋतु के दौरान ऐसा कई बार होता है जब कुछ दिनों या हफ्तों तक वर्षा नहीं होती। इस शुष्क दौर को “मानसून का विच्छेद” कहा जाता है।
    • कारण: इसका मुख्य कारण मानसून द्रोणी (Monsoon Trough) का हिमालय की तलहटी की ओर खिसक जाना है। जब ऐसा होता है, तो मैदानों में वर्षा बंद हो जाती है और हिमालयी क्षेत्रों तथा उसके जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है।
  2. मानसूनी गर्त/द्रोणी (Monsoon Trough):
    • यह निम्न दाब की एक लम्बी पट्टी होती है जो उत्तर-पश्चिम भारत (थार मरुस्थल) से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली होती है। मानसूनी वर्षा इसी द्रोणी की स्थिति पर निर्भर करती है।
  3. उष्णकटिबंधीय अवदाब (Tropical Depressions):
    • बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले ये निम्न दाब के केंद्र मानसून की तीव्रता को बढ़ाते हैं और भारत के मुख्य भू-भाग पर वर्षा के वितरण को निर्धारित करते हैं।

निष्कर्ष

वर्षा ऋतु भारत के लिए केवल एक मौसम नहीं, बल्कि एक वार्षिक उत्सव और आर्थिक अनिवार्यता है। यह देश के जलाशयों को भरती है, भूजल को रिचार्ज करती है, और करोड़ों किसानों की खरीफ फसलों (चावल, कपास, सोयाबीन) को जीवन देती है। हालाँकि, इसकी अनिश्चितता, जैसे देर से आगमन, जल्दी वापसी या लंबा विच्छेद, अक्सर बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं का कारण भी बनती है। इसीलिए भारतीय मानसून को अक्सर “एक जुआ” (A Gamble) कहा जाता है।


भारत में शरद ऋतु (The Autumn Season): मानसून का निवर्तन (Retreating Monsoon)

भारत में शरद ऋतु, जिसे “मानसून की वापसी” या “लौटते हुए मानसून” (Retreating Monsoon) के मौसम के रूप में भी जाना जाता है, एक संक्रमणकालीन ऋतु है जो वर्षा ऋतु के अंत और शीत ऋतु के आगमन के बीच आती है। इसका समय मध्य सितंबर से नवंबर तक होता है। यह ऋतु साफ आसमान और दिन के समय हल्के बढ़े हुए तापमान के लिए जानी जाती है, लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू हवाओं की दिशा का उलटना और कोरोमंडल तट पर होने वाली वर्षा है।


I. शरद ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ

  1. मानसून की वापसी (Retreat of Monsoon):
    • कारण: सितंबर के अंत तक, सूर्य दक्षिण की ओर (दक्षिणी गोलार्ध में) जाने लगता है। इसके कारण, भारतीय उपमहाद्वीप का तापमान कम होने लगता है और उत्तर-पश्चिम भारत में बना शक्तिशाली निम्न दाब क्षेत्र कमजोर पड़ने लगता है।
    • उच्च दाब का निर्माण: इसकी जगह धीरे-धीरे एक उच्च दाब प्रणाली (High-Pressure System) विकसित होने लगती है।
    • पवनों का उलटना: अब दाब प्रवणता उलट जाती है। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें कमजोर पड़ जाती हैं और स्थल से समुद्र की ओर शुष्क और ठंडी उत्तर-पूर्वी पवनें बहने लगती हैं।
    • क्रमिक वापसी: मानसून की वापसी एक क्रमिक प्रक्रिया है। यह सितंबर की शुरुआत में राजस्थान से शुरू होती है, मध्य अक्टूबर तक यह पूरे उत्तरी भारत से लौट चुकी होती है, और नवंबर के अंत तक यह पूरे देश से वापस चली जाती है।
  2. साफ आकाश और तापमान में वृद्धि:
    • स्पष्ट मौसम: मानसून की वापसी के साथ, बादल छँट जाते हैं और आकाश पूरी तरह से साफ हो जाता है।
    • तापमान में वृद्धि: साफ आकाश के कारण दिन में सौर विकिरण अधिक प्राप्त होता है, और भूमि में अभी भी वर्षा ऋतु की नमी मौजूद होती है। इस उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता के संयोजन से एक उमस भरी और असहनीय गर्मी का मौसम बनता है, जिसे “अक्टूबर की गर्मी” (October Heat) या ‘क्वार की उमस’ के नाम से जाना जाता है।

II. उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा वर्षा

यह शरद ऋतु की सबसे महत्वपूर्ण मौसम घटना है।


सारांश तालिका: शरद ऋतु का क्षेत्रीय प्रभाव

क्षेत्रमौसम की स्थितिप्रमुख घटनाएँप्रभाव
उत्तर भारतसाफ आसमान, शुष्क, दिन गर्म, रातें ठंडीमानसून की वापसी, “अक्टूबर की गर्मी”मौसम सुखद होने लगता है, रबी की फसलों की बुवाई के लिए खेत तैयार होते हैं।
पूर्वी तट (कोरोमंडल)आर्द्र, बादल छाए रहनाउत्तर-पूर्वी मानसून से भारी वर्षा, उष्णकटिबंधीय चक्रवात।राज्य के जलाशयों और भूजल के लिए महत्वपूर्ण, लेकिन बाढ़ और चक्रवातों से जान-माल का खतरा।
प्रायद्वीपीय भारत का आंतरिक भागशुष्क, तापमान में कमीमौसम सुखद होने लगता है।
बंगाल की खाड़ी / अरब सागरअशांतउष्णकटिबंधीय चक्रवातों का निर्माण।तटीय क्षेत्रों के लिए खतरा।

निष्कर्ष:
शरद ऋतु भारत में दो बिल्कुल विपरीत मौसमी घटनाओं का संगम है। जहाँ एक ओर यह उत्तर भारत में सुखद और शांत मौसम की शुरुआत का संकेत देती है, वहीं दूसरी ओर यह दक्षिण-पूर्वी तट के लिए मुख्य वर्षा ऋतु और चक्रवातों का खतरनाक समय होता है। यह ऋतु स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि भारत की जलवायु में कितनी अधिक क्षेत्रीय विविधता है।


III. भारत में वर्षा का वितरण (Distribution of Rainfall in India)

भारत में वर्षा का वितरण अत्यधिक असमान (Uneven) और अनिश्चित (Uncertain) है। इसका मुख्य कारण मानसूनी पवनों की प्रकृति, देश का विशाल आकार और विभिन्न उच्चावच लक्षणों (Relief Features) जैसे हिमालय, पश्चिमी घाट आदि का प्रभाव है। भारत की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 118 से 125 सेमी है, लेकिन इसमें भारी क्षेत्रीय भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं।

वर्षा की मात्रा के आधार पर भारत को निम्नलिखित चार प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:


1. अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र (Regions of Heavy Rainfall)


2. मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र (Regions of Moderate Rainfall)


3. न्यून वर्षा वाले क्षेत्र (Regions of Low Rainfall)


4. अल्प या अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र (Regions of Scanty Rainfall)


सारांश तालिका

वर्षा की मात्राक्षेत्रप्रमुख कारण
अत्यधिक वर्षा (>200 cm)पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढलान, उत्तर-पूर्वी भारत, द्वीप समूहपर्वतीय बाधा (पवन-सम्मुख ढाल)।
मध्यम वर्षा (100-200 cm)मध्य गंगा का मैदान, पूर्वी तटीय मैदान, मध्य भारतमानसून के मार्ग में स्थित, लेकिन सीधी बाधा नहीं।
न्यून वर्षा (50-100 cm)ऊपरी गंगा का मैदान, दक्कन का आंतरिक पठार, पूर्वी राजस्थानसमुद्र से दूरी, वृष्टि-छाया क्षेत्र।
अल्प वर्षा (<50 cm)पश्चिमी राजस्थान, लद्दाख, कच्छपर्वत श्रृंखलाओं का समानांतर होना, वृष्टि-छाया क्षेत्र।

वर्षा की परिवर्तनशीलता (Variability of Rainfall)

इसका अर्थ है किसी स्थान की औसत वार्षिक वर्षा से होने वाला विचलन।


निष्कर्ष:
भारत की जलवायु अपनी ‘एकता और विविधता’ के लिए जानी जाती है। मानसूनी हवाएँ पूरे देश को एक जलवायु तंत्र में पिरोती हैं, फिर भी धरातलीय विभिन्नताओं के कारण यहाँ जलवायु के अनेक रूप देखने को मिलते हैं। यही कारण है कि मानसून को भारतीय कृषि का जुआ और भारत का “वास्तविक वित्त मंत्री” भी कहा जाता है।


भारत के जलवायु प्रदेश (Climate Regions of India)

जलवायु प्रदेश एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र होता है जहाँ जलवायु की दशाओं (मुख्यतः तापमान और वर्षा) में एकरूपता पाई जाती है। भारत के जलवायु प्रदेशों का वर्गीकरण कई भूगोलवेत्ताओं ने किया है, जिनमें कोपेन और थॉर्नथ्वेट प्रमुख हैं।


कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (Köppen’s Climate Classification)

कोपेन ने अपने वर्गीकरण का आधार तापमान (Temperature) और वर्षा (Precipitation) के मासिक औसत मानों को बनाया। उन्होंने जलवायु प्रदेशों को दर्शाने के लिए अंग्रेजी वर्णमाला के बड़े और छोटे अक्षरों का प्रयोग किया।

मुख्य सांकेतिक अक्षर:

छोटे सांकेतिक अक्षर (वर्षा के आधार पर):


कोपेन का जलवायु वर्गीकरण विश्व की जलवायु को पाँच मुख्य समूहों में बाँटता है। इन समूहों को अंग्रेजी के बड़े अक्षरों (Capital Letters) A, B, C, D, और E से दर्शाया जाता है। ये वर्गीकरण का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्तर है, जो मुख्य रूप से तापमान और वर्षण की प्रकृति पर आधारित है।


कोपेन जलवायु वर्गीकरण के पाँच मुख्य समूह

अक्षरजलवायु समूह (Climate Group)मुख्य विशेषताभारत में उदाहरण
Aउष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Tropical Humid Climate)वर्ष के सभी 12 महीनों का औसत तापमान 18°C से अधिक रहता है। यहाँ कोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं होती।भारत का दक्षिणी भाग, जैसे केरल, गोवा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, और तटीय महाराष्ट्र।
Bशुष्क जलवायु (Dry / Arid Climate)यहाँ वर्षण (वर्षा) की तुलना में वाष्पीकरण अधिक होता है। पानी की स्थायी कमी रहती है। इसका निर्धारण तापमान के बजाय शुष्कता पर होता है।राजस्थान का थार मरुस्थल, गुजरात का कच्छ क्षेत्र, लद्दाख का ठंडा मरुस्थल और पश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया क्षेत्र।
Cकोष्ण शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Warm Temperate Climate)सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18°C और -3°C के बीच रहता है। यहाँ हल्की सर्दियाँ और स्पष्ट गर्मियाँ होती हैं।उत्तर भारत का विशाल मैदान (गंगा का मैदान), जैसे दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब। यह भारत का सबसे बड़ा क्षेत्र कवर करता है।
Dशीत शीतोष्ण जलवायु (Cold Temperate / Continental Climate)सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान -3°C से कम होता है, जबकि सबसे गर्म महीने का औसत 10°C से अधिक होता है। यहाँ कठोर, बर्फीली सर्दियाँ होती हैं।यह भारत में बहुत दुर्लभ है, केवल हिमालय के कुछ ऊँचे क्षेत्रों जैसे अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में पाया जाता है।
Eध्रुवीय जलवायु (Polar Climate)सबसे गर्म महीने का औसत तापमान भी 10°C से कम रहता है। यहाँ कोई वास्तविक ग्रीष्म ऋतु नहीं होती और भूमि अधिकांश समय बर्फ से ढकी रहती है।हिमालय के अत्यधिक ऊँचे क्षेत्र, जैसे लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के हिमाच्छादित (बर्फ से ढके) हिस्से।

सारांश

यह पाँच मुख्य समूह कोपेन वर्गीकरण का आधार हैं। प्रत्येक समूह को वर्षण (वर्षा) के पैटर्न और तापमान की गंभीरता के आधार पर छोटे अक्षरों (जैसे m, w, s, a, b, c) का उपयोग करके और भी उप-भागों में विभाजित किया जाता है, जिससे जलवायु का अधिक विस्तृत और सटीक चित्र प्राप्त होता है।


1. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (Köppen’s Climate Classification)

कोपेन का वर्गीकरण तापमान और वर्षा के मासिक औसत मानों पर आधारित एक अनुभवजन्य प्रणाली है। यह सबसे अधिक मान्यता प्राप्त और व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला वर्गीकरण है।

कोपेन के अनुसार भारत के प्रमुख जलवायु प्रदेश

कोड (Code)जलवायु का प्रकारविशेषताएँभारत में क्षेत्र
Amwउष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायुग्रीष्मकाल में भारी मानसूनी वर्षा और एक छोटी, शुष्क शीत ऋतु।केरल का मालाबार तट, गोवा, कोंकण तट और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह।
Asउष्णकटिबंधीय सवाना (शुष्क ग्रीष्म)ग्रीष्मकाल शुष्क रहता है, जबकि अधिकांश वर्षा शीतकालीन या लौटते हुए मानसून से होती है।तमिलनाडु का कोरोमंडल तट और दक्षिणी आंध्र प्रदेश।
Awउष्णकटिबंधीय सवाना (शुष्क शीत)स्पष्ट शुष्क शीत ऋतु और ग्रीष्मकाल में वर्षा। Amw की तुलना में वर्षा कम होती है।कर्क रेखा के दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार का अधिकांश भाग (महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक)।
BWhwगर्म मरुस्थलीय जलवायुवर्षा बहुत कम (<25 सेमी), तापमान बहुत अधिक, और प्राकृतिक वनस्पति नगण्य।पश्चिमी राजस्थान (थार का मरुस्थल) और उत्तरी गुजरात (कच्छ)।
BShwअर्ध-शुष्क स्टेपी जलवायुमरुस्थलीय और आर्द्र जलवायु के बीच का संक्रमण क्षेत्र। वर्षा कम (25-50 सेमी)।पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया क्षेत्र।
Cwgकोष्ण शीतोष्ण जलवायु (गंगा तुल्य)मानसून से प्रभावित, गर्मियों में अधिकांश वर्षा और शुष्क शीत ऋतु।उत्तर भारत का विशाल मैदान, पूर्वी राजस्थान, असम, मध्य प्रदेश, मालवा पठार।
Dfcशीत आर्द्र जलवायु (लघु ग्रीष्म)छोटी, ठंडी गर्मियाँ और लंबी, ठंडी, बर्फीली सर्दियाँ।उत्तर-पूर्वी भारत का हिमालयी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम)।
ETटुंड्रा तुल्य जलवायुकोई वास्तविक ग्रीष्म ऋतु नहीं, तापमान लगभग हिमांक के नीचे, भूमि बर्फ से ढकी रहती है।उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र।
Eध्रुवीय तुल्य जलवायुतापमान हमेशा हिमांक से नीचे, स्थायी हिमावरण।हिमालय की सबसे ऊँची चोटियाँ।

2. थॉर्नथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण (Thornthwaite’s Climate Classification)

थॉर्नथ्वेट का वर्गीकरण अधिक जटिल है क्योंकि यह केवल तापमान और वर्षा पर ही नहीं, बल्कि वर्षण प्रभाविता और तापीय दक्षता की अवधारणा पर आधारित है। इसमें वाष्पीकरण-वाष्पोत्सर्जन एक महत्वपूर्ण कारक है, जो किसी क्षेत्र की शुष्कता या आर्द्रता को बेहतर ढंग से मापता है।

थॉर्नथ्वेट के अनुसार भारत के प्रमुख जलवायु प्रदेश

कोड (Code)जलवायु का प्रकारविशेषताएँभारत में क्षेत्र
(A)पर-आर्द्र (Per-Humid)वर्ष भर भारी वर्षा, कोई जल की कमी नहीं।पश्चिमी घाट के कुछ हिस्से (केरल और कर्नाटक तट) और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्से (मेघालय)।
(B)आर्द्र (Humid)वर्ष भर पर्याप्त वर्षा, बहुत कम या कोई जल की कमी नहीं।पश्चिमी घाट के निकटवर्ती क्षेत्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा के कुछ हिस्से और पूर्वोत्तर का अधिकांश भाग।
(C)उप-आर्द्र (Sub-Humid)गर्मियों में पर्याप्त वर्षा लेकिन सर्दियों में पानी की कमी हो सकती है।यह भारत का सबसे बड़ा जलवायु क्षेत्र है। इसमें गंगा के अधिकांश मैदानी भाग, पूर्वी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड शामिल हैं।
(D)अर्ध-शुष्क (Semi-Arid)नमी की स्पष्ट कमी, वाष्पीकरण वर्षा से अधिक होता है।पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश का पश्चिमी भाग और पश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया क्षेत्र।
(E)शुष्क (Arid)नमी की बहुत अधिक कमी, बहुत कम वर्षा।पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल) और कच्छ का रण।

थॉर्नथ्वेट तापीय दक्षता के आधार पर इन क्षेत्रों को और उप-विभाजित करते हैं (जैसे, A’ उष्णकटिबंधीय, B’ मेसोथर्मल), जिससे वर्गीकरण और अधिक विस्तृत हो जाता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान को C A’w (उप-आर्द्र उष्णकटिबंधीय, शुष्क शीत ऋतु) के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।


दोनों वर्गीकरणों की तुलना


भारतीय मानसून की परिभाषा

सरल शब्दों में, भारतीय मानसून वृहत पैमाने पर चलने वाली उन मौसमी पवनों (Seasonal Winds) को कहते हैं जिनकी दिशा ऋतु के अनुसार पूरी तरह उलट जाती है

एक विस्तृत और वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार, भारतीय मानसून एक जटिल वायुमंडलीय एवं महासागरीय परिघटना है, जो भारतीय उपमहाद्वीप और हिंद महासागर के बीच स्थल और जल के विभेदी तापन (Differential Heating) के कारण उत्पन्न होती है। इसके परिणामस्वरूप, हवाओं के प्रवाह में एक आवधिक उत्क्रमण (Periodic Reversal) होता है, जो ग्रीष्म ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर नमी युक्त पवनें (वर्षा लाने वाली) और शीत ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर शुष्क पवनें चलाता है।

यह मात्र एक मौसम नहीं, बल्कि एक जटिल जलवायु प्रणाली है जो भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु, कृषि, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और पारिस्थितिकी को गहराई से नियंत्रित करती है।


भारतीय मानसून का आगमन (Onset of the Indian Monsoon)

भारतीय मानसून का आगमन कोई एक अकेली घटना नहीं, बल्कि वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर होने वाली कई वायुमंडलीय और महासागरीय प्रक्रियाओं का एक समन्वित परिणाम है। यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण वार्षिक घटना है जो देश के कृषि चक्र और जल संसाधनों को सीधे तौर पर निर्धारित करती है।


मानसून के आगमन की तिथि और स्थान


मानसून के आगमन के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारक

मानसून का आगमन निम्नलिखित कारकों की एक जटिल अंतःक्रिया का परिणाम है:

1. स्थल और जल का विभेदी तापन (Differential Heating of Land and Sea):
यह मानसून का सबसे आधारभूत कारण है। गर्मियों में भारतीय भू-भाग, हिंद महासागर की तुलना में बहुत अधिक गर्म हो जाता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप पर एक शक्तिशाली निम्न दाब क्षेत्र बन जाता है। यही निम्न दाब हिंद महासागर से नमी युक्त हवाओं को अपनी ओर खींचता है।

2. ITCZ का उत्तर की ओर खिसकना (Northward Shift of ITCZ):
ITCZ (Inter-Tropical Convergence Zone) भूमध्य रेखा के पास निम्न दाब की एक द्रोणी होती है। गर्मियों में सूर्य के उत्तरायण होने के साथ, यह ITCZ भी उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान के ऊपर स्थित हो जाती है। इसे ही “मानसून द्रोणी” (Monsoon Trough) कहते हैं। यह निम्न दाब का क्षेत्र मानसूनी हवाओं को आकर्षित करता है।

3. तिब्बती पठार का गर्म होना:
विशाल और ऊँचा तिब्बती पठार गर्मियों में एक “ऊँचे हीटर” की तरह काम करता है। यह ऊपरी वायुमंडल में भी एक मजबूत ऊष्मीय निम्न दाब (Thermal Low) का निर्माण करता है, जो मानसूनी परिसंचरण को और अधिक तीव्रता प्रदान करता है।

4. जेट स्ट्रीम की भूमिका (Crucial Role of Jet Streams):


मानसून का भारत में प्रवेश और प्रगति

एक बार केरल तट पर पहुँचने के बाद, मानसून दो शाखाओं में विभाजित होकर आगे बढ़ता है:

शाखा (Branch)अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch)बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch)
प्रवेश और गतियह एक शक्तिशाली और तेज शाखा है। यह 10 जून तक मुंबई पहुँच जाती है।यह धीमी गति से आगे बढ़ती है। यह भी जून के पहले सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करती है।
मुख्य बाधाएँपश्चिमी घाट से टकराकर यह पश्चिमी तटीय मैदानों पर भारी पर्वतीय वर्षा करती है।अराकान की पहाड़ियाँ (म्यांमार) और मेघालय की पहाड़ियाँ
प्रगति का मार्गएक हिस्सा मध्य भारत की ओर बढ़ता है। दूसरा हिस्सा गुजरात-राजस्थान की ओर बढ़ता है, लेकिन अरावली के समानांतर होने से राजस्थान में कम वर्षा करता है।यह अराकान पहाड़ियों से मुड़कर उत्तर-पश्चिम की ओर भारत में प्रवेश करती है। यह मेघालय की पहाड़ियों पर विश्व की सर्वाधिक वर्षा करती है और फिर पश्चिम की ओर गंगा के मैदान में बढ़ती है।
प्रभावकोंकण तट, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में वर्षा करती है।पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली में वर्षा करती है। (पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है)

मानसून के आगमन की सामान्य समय-सारणी

निष्कर्ष: भारतीय मानसून का आगमन एक धीमी और पूर्वानुमानित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक गतिशील और विस्फोटक घटना है जो कई वैश्विक और क्षेत्रीय कारकों के सही समय पर एक साथ आने से संभव होती है। इसका समय पर और सही मात्रा में आगमन भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए सर्वोपरि है।


भारतीय मानसून के दो मुख्य रूप

मानसून की परिभाषा इसके दो मुख्य चक्रों के बिना अधूरी है:

दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon): भारत की जीवनधारा

दक्षिण-पश्चिम मानसून, जिसे ग्रीष्मकालीन मानसून भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु घटना है। यह जून से सितंबर तक की अवधि में सक्रिय रहता है और भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 80-90% हिस्सा इसी से प्राप्त होता है। यह पवन प्रणाली न केवल मौसम को परिभाषित करती है, बल्कि भारत की कृषि, अर्थव्यवस्था, समाज और पारिस्थितिकी को भी आकार देती है।


I. दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्पत्ति के कारण

  1. स्थल और जल का विभेदी तापन: गर्मियों में भारतीय भू-भाग, विशेषकर उत्तर-पश्चिम का थार मरुस्थल, अत्यधिक गर्म होकर एक तीव्र निम्न वायुदाब (Low Pressure) का केंद्र बनाता है। इसकी तुलना में, दक्षिण का हिंद महासागर ठंडा रहता है, जिससे वहाँ उच्च वायुदाब (High Pressure) बना रहता है।
  2. ITCZ का खिसकना: अंतरा-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान पर स्थापित हो जाता है, जिसे “मानसून द्रोणी” कहते हैं। यह निम्न दाब की पट्टी हवाओं को आकर्षित करती है।
  3. जेट स्ट्रीम की भूमिका: मई-जून में पश्चिमी जेट स्ट्रीम का हिमालय के उत्तर की ओर खिसक जाना मानसून के प्रस्फोट के लिए एक “ट्रिगर” का काम करता है। इसके साथ ही, पूर्वी जेट स्ट्रीम का विकास मानसून को और अधिक शक्ति प्रदान करता है।

II. मानसून का आगमन और प्रगति


III. दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएँ

प्रायद्वीपीय भारत की त्रिभुजाकार आकृति के कारण, यह मानसून दो मुख्य शाखाओं में विभाजित हो जाता है:

A. अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch)

दक्षिण-पश्चिम मानसून जब भारतीय प्रायद्वीप की ओर बढ़ता है, तो उसकी एक बड़ी और शक्तिशाली धारा अरब सागर के ऊपर से गुजरती है। यह बंगाल की खाड़ी की शाखा की तुलना में अधिक शक्तिशाली होती है और लगभग तीन गुना अधिक नमी लेकर आती है। हालाँकि, भारत का उच्चावच (Relief) इसके द्वारा होने वाली वर्षा के वितरण को बहुत अधिक प्रभावित करता है।

प्रायद्वीपीय भारत में प्रवेश करने के बाद यह शाखा मुख्य रूप से तीन उप-शाखाओं में विभाजित हो जाती है:


1. पहली उप-शाखा: पश्चिमी घाट पर पर्वतीय वर्षा


2. दूसरी उप-शाखा: मध्य भारत में प्रवेश


3. तीसरी उप-शाखा: राजस्थान और उत्तर-पश्चिम भारत की ओर

निष्कर्ष:
अरब सागर की शाखा भारतीय मानसून की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली धारा है, लेकिन इसका प्रभाव पूरी तरह से स्थलाकृति (Topography) द्वारा नियंत्रित होता है। यह पश्चिमी घाट के कारण एक ओर जहाँ भारत के कुछ सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों का निर्माण करती है, वहीं दूसरी ओर सबसे बड़े वृष्टि-छाया क्षेत्रों को भी जन्म देती है। अरावली के साथ इसकी समानांतर स्थिति पश्चिमी भारत के शुष्क होने का प्रमुख भौगोलिक कारण है।


B. बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch)

दक्षिण-पश्चिम मानसून की यह शाखा भूमध्य रेखा को पार करने के बाद बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण करती है और भारत के पूर्वी तट, पूर्वोत्तर राज्यों तथा विशाल उत्तरी मैदानों में वर्षा के लिए जिम्मेदार होती है। हालाँकि यह अरब सागर की शाखा की तुलना में थोड़ी कमजोर होती है, लेकिन इसका प्रभाव क्षेत्र बहुत व्यापक है।

इसका मार्ग और प्रभाव मुख्य रूप से दो उप-शाखाओं में समझा जा सकता है:


1. पहली उप-शाखा: पूर्वोत्तर भारत में भारी वर्षा


2. दूसरी उप-शाखा: गंगा के मैदानों की ओर

निष्कर्ष:
बंगाल की खाड़ी की शाखा भारत के सबसे घनी आबादी वाले और कृषि की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, यानी उत्तरी मैदानों में वर्षा के लिए जिम्मेदार है। मेघालय में इसकी भूमिका जहाँ विश्व-रिकॉर्ड वर्षा कराती है, वहीं गंगा के मैदानों में इसका पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा को घटाने वाला पैटर्न पूरे उत्तर भारत के कृषि-जलवायु क्षेत्रों को निर्धारित करता है।


IV. दक्षिण-पश्चिम मानसून की प्रमुख विशेषताएँ

  1. अनिश्चितता: इसका आगमन और वापसी कभी-कभी समय से पहले या बाद में हो सकता है, जो फसलों को प्रभावित करता है।
  2. असमान वितरण: वर्षा का वितरण पूरे देश में एक समान नहीं होता।
  3. वर्षा में विच्छेद (Break in Monsoon): मानसून के दौरान कई-कई दिनों तक शुष्क दौर आता है, जब वर्षा नहीं होती।
  4. मूसलाधार प्रकृति: वर्षा हल्की फुहारों के रूप में लगातार न होकर, कुछ घंटों या दिनों की भारी और मूसलाधार बौछारों के रूप में होती है, जिससे मृदा अपरदन बढ़ता है।

निष्कर्ष:
दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की अर्थव्यवस्था की धुरी और इसकी जीवन रेखा है। देश की कृषि, जल आपूर्ति और समग्र आर्थिक समृद्धि पूरी तरह से इसकी सफलता पर निर्भर करती है। इसकी अनिश्चित और परिवर्तनशील प्रकृति ही इसे “भारतीय कृषि का जुआ” बनाती है।


मानसून की उत्पत्ति से संबंधित विचारधाराएँ और सिद्धांत

भारतीय मानसून एक अत्यंत जटिल वायुमंडलीय परिघटना है। इसकी उत्पत्ति को पूरी तरह से समझने के लिए समय के साथ विभिन्न सिद्धांतों का विकास हुआ है। इन सिद्धांतों को मुख्य रूप से दो प्रमुख विचारधाराओं में विभाजित किया जा सकता है:

  1. चिरसम्मत या तापीय विचारधारा (Classical or Thermal Concept)
  2. आधुनिक या गतिक विचारधारा (Modern or Dynamic Concept)

चिरसम्मत या तापीय विचारधारा (The Classical or Thermal Concept)

यह मानसून की उत्पत्ति को समझाने वाला सबसे पुराना, सरल और आधारभूत सिद्धांत है। इसका मूल विचार 17वीं सदी में प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और मौसम विज्ञानी सर एडमंड हैली द्वारा प्रस्तुत किया गया था। यह विचारधारा मानसून की पूरी प्रक्रिया को जल और स्थल के विभेदी तापन (Differential Heating and Cooling of Land and Sea) के एक बहुत बड़े और वार्षिक पैमाने पर होने वाले प्रभाव के रूप में देखती है।


सिद्धांत का मूल आधार

इस सिद्धांत का सार एक साधारण भौतिक नियम पर टिका है:

इस विभेदी तापन के कारण, वायुदाब (Air Pressure) में मौसमी परिवर्तन होता है, जो हवाओं की दिशा को पूरी तरह से उलट देता है। इस सिद्धांत के अनुसार, मानसून स्थल समीर और समुद्र समीर (Land and Sea Breezes) का ही एक वृहत, महाद्वीपीय और वार्षिक रूप है।


इस सिद्धांत के अनुसार मानसून की व्याख्या

1. ग्रीष्मकालीन मानसून (दक्षिण-पश्चिम मानसून) की उत्पत्ति:

2. शीतकालीन मानसून (उत्तर-पूर्वी मानसून) की उत्पत्ति:


तापीय सिद्धांत की आलोचना और सीमाएँ

हालाँकि यह सिद्धांत मानसून की एक बुनियादी समझ प्रदान करता है, लेकिन इसे अब अधूरा माना जाता है क्योंकि यह कई महत्वपूर्ण परिघटनाओं की व्याख्या करने में विफल रहता है:

  1. मानसून का प्रस्फोट (Burst of Monsoon): यह सिद्धांत यह नहीं समझा पाता कि मानसून का आगमन धीरे-धीरे न होकर एक विस्फोटक या अचानक घटना के रूप में क्यों होता है।
  2. मानसून में विच्छेद (Break in Monsoon): यह सिद्धांत वर्षा ऋतु के दौरान आने वाले शुष्क दौरों का कारण नहीं बता पाता।
  3. ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण: इसने जेट स्ट्रीम और ऊपरी वायुमंडल में होने वाली प्रक्रियाओं की भूमिका को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।
  4. ENSO का प्रभाव: यह सिद्धांत एल नीनो और ला नीना जैसी वैश्विक घटनाओं के प्रभाव की व्याख्या नहीं कर सकता, जो मानसून को बहुत प्रभावित करते हैं।
  5. तीव्रता में भिन्नता: यह सिद्धांत यह नहीं समझा पाता कि हर साल मानसून की तीव्रता में इतना अंतर क्यों होता है।

निष्कर्ष:
तापीय सिद्धांत मानसून को समझने के लिए एक ऐतिहासिक प्रारंभिक बिंदु है। यह मानसून की “क्यों” (Why) का एक सरल उत्तर देता है, लेकिन इसकी “कैसे” (How) की जटिल प्रक्रिया को समझाने में अपर्याप्त है। आधुनिक गतिक सिद्धांतों ने इन कमियों को दूर किया है और मानसून की एक अधिक पूर्ण और वैज्ञानिक तस्वीर प्रस्तुत की है।


आधुनिक या गतिक विचारधारा (The Modern or Dynamic Concept)

20वीं सदी के मध्य में, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद ऊपरी वायुमंडल के अध्ययन (जैसे जेट स्ट्रीम की खोज) के साथ, यह स्पष्ट हो गया कि मानसून केवल सतह के तापन का एक साधारण परिणाम नहीं है। आधुनिक या गतिक विचारधारा मानसून को एक जटिल, त्रि-आयामी (3-Dimensional) और वैश्विक वायुमंडलीय परिघटना के रूप में देखती है, जो धरातलीय कारकों के साथ–साथ ऊपरी वायुमंडल और वैश्विक जलवायु पैटर्न की अंतःक्रिया का परिणाम है।

यह विचारधारा तापीय सिद्धांत को खारिज नहीं करती, बल्कि उसे संशोधित और पूरक करती है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:


1. ऊपरी वायु परिसंचरण और जेट स्ट्रीम की भूमिका (Role of Upper Air Circulation and Jet Streams)

यह आधुनिक विचारधारा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह मानता है कि धरातलीय पवनों को नियंत्रित करने में ऊपरी वायुमंडल की पवन प्रणालियों की निर्णायक भूमिका होती है।


2. तिब्बती पठार का ऊष्मीय प्रभाव (Thermal Effect of the Tibetan Plateau)

यह आधुनिक विचारधारा का एक और महत्वपूर्ण घटक है, जिसे पी. कोटेश्वरम जैसे भारतीय मौसम वैज्ञानिकों ने उजागर किया।


3. वैश्विक परिघटनाओं की भूमिका (Role of Global Phenomena)

यह विचारधारा मानती है कि भारतीय मानसून एक पृथक घटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक जलवायु प्रणाली से जुड़ा हुआ है।

एल नीनो: भारतीय मानसून को कमजोर करने वाला वैश्विक कारक

एल नीनो (El Niño) एक वृहत पैमाने की, प्राकृतिक महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है, जो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर (पेरू तट के पास) में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने से संबंधित है। यद्यपि यह घटना भारत से हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में होती है, लेकिन इसका प्रभाव वैश्विक वायु परिसंचरण (Global Air Circulation) को बाधित करके भारतीय मानसून पर पड़ता है, जिससे वह अक्सर कमजोर हो जाता है।


इसे समझने के लिए, पहले सामान्य स्थिति (जब एल नीनो नहीं होता) को समझना आवश्यक है:

सामान्य वर्ष (La Niña or Neutral Conditions):

  1. तापमान: पूर्वी प्रशांत (पेरू तट) का पानी ठंडा रहता है, जबकि पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया/ऑस्ट्रेलिया) का पानी गर्म रहता है।
  2. वायुदाब: ठंडे पानी के कारण पूर्वी प्रशांत पर उच्च दाब (High Pressure) और गर्म पानी के कारण पश्चिमी प्रशांत पर निम्न दाब (Low Pressure) बनता है।
  3. परिणाम: इस दाब-अंतर के कारण, शक्तिशाली व्यापारिक पवनें (Trade Winds) पूर्व से पश्चिम (पेरू से इंडोनेशिया) की ओर चलती हैं।
  4. भारत के लिए लाभ: पश्चिमी प्रशांत का यह मजबूत निम्न दाब क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप पर बनने वाले मानसूनी निम्न दाब को और अधिक शक्तिशाली बनाता है। यह एक सहायक प्रणाली की तरह काम करता है, जिससे भारतीय मानसून मजबूत होता है और अच्छी वर्षा होती है।

एल नीनो वर्ष के दौरान क्या बदल जाता है? (The Mechanism)

एल नीनो के दौरान यह पूरी सामान्य प्रणाली उलट या बाधित हो जाती है।

  1. तापमान का उलटना: व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे पश्चिमी प्रशांत का गर्म पानी पूर्व की ओर, पेरू तट की तरफ फैलने लगता है। इससे पूर्वी प्रशांत असामान्य रूप से गर्म हो जाता है।
  2. वायुदाब का उलटना (Southern Oscillation): अब, गर्म पानी के कारण पूर्वी प्रशांत (पेरू) पर निम्न दाब और पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया/ऑस्ट्रेलिया) पर उच्च दाब बन जाता है।

इस उलटफेर का भारतीय मानसून पर सीधा प्रभाव

पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया के पास) में बना उच्च दाब क्षेत्र ही भारतीय मानसून को कमजोर करने वाला मुख्य खलनायक है।

  1. मानसूनी निम्न दाब का कमजोर होना:
    गर्मियों में भारत के मैदानी इलाकों में जो “मानसूनी द्रोणी” (Monsoon Trough) बनती है, वह एक निम्न दाब का क्षेत्र होती है, जो मानसूनी हवाओं को खींचने वाले इंजन का काम करती है। इंडोनेशिया के पास बना उच्च दाब इस भारतीय निम्न दाब को कमजोर कर देता है। दाब-प्रणाली एक विशाल खेल है; एक जगह का उच्च दाब अपने पड़ोसी क्षेत्र के निम्न दाब की तीव्रता को कम कर देता है।
  2. दाब-प्रवणता का कम होना (Reduced Pressure Gradient):
    मानसून हिंद महासागर के उच्च दाब और भारतीय उपमहाद्वीप के निम्न दाब के बीच के अंतर से चलता है। एल नीनो के कारण, भारतीय उपमहाद्वीप पर निम्न दाब कमजोर हो जाता है, जिससे यह दाब-अंतर (Pressure Gradient) कम हो जाता है।
  3. कमजोर मानसूनी पवनें:
    कमजोर दाब-अंतर के कारण, हिंद महासागर से भारत की ओर बहने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें कमजोर पड़ जाती हैं। वे धीमी गति से चलती हैं और अपने साथ कम नमी लेकर आती हैं।

परिणामस्वरूप, भारत पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:


आर्थिक प्रभाव

निष्कर्ष:
एल नीनो वैश्विक वायु परिसंचरण (वॉकर सेल) को बाधित करके भारतीय उपमहाद्वीप पर बनने वाली मानसूनी निम्न दाब प्रणाली को सीधे तौर पर कमजोर कर देता है। कमजोर निम्न दाब, नमी युक्त पवनों को आकर्षित करने में कम सक्षम होता है, जिसके परिणामस्वरूप भारत में मानसून कमजोर हो जाता है, जिससे अक्सर सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न होती है।


ला नीना (La Niña): भारतीय मानसून को सशक्त करने वाला वैश्विक कारक

ला नीना (La Niña), एल नीनो की ठीक विपरीत जलवायु परिघटना है। यह एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है “छोटी बच्ची”। यह मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर (पेरू तट के पास) में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से ठंडा होने से संबंधित है।

ला नीना, एल नीनो के विपरीत, भारतीय मानसून पर सकारात्मक प्रभाव डालता है, जिससे अक्सर भारत में सामान्य से अधिक वर्षा होती है।


ला नीना के दौरान क्या होता है? (The Mechanism)

ला नीना वास्तव में प्रशांत महासागर की सामान्य (Normal) परिस्थितियों का ही एक और अधिक तीव्र या सशक्त (Intensified) रूप है।

  1. पूर्वी प्रशांत का अत्यधिक ठंडा होना:
    • सामान्य वर्षों की तुलना में भी, पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू तट) का पानी और अधिक ठंडा हो जाता है। ऐसा गहरे समुद्र से ठंडे पानी के सतह पर आने की प्रक्रिया (अपवेलिंग) के तेज होने के कारण होता है।
  2. व्यापारिक पवनों का बहुत मजबूत होना:
    • पूर्वी प्रशांत में ठंडक बढ़ने से वहाँ एक बहुत शक्तिशाली उच्च दाब (Very Strong High Pressure) का क्षेत्र बन जाता है।
    • उसी समय, पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया/ऑस्ट्रेलिया) का पानी और अधिक गर्म हो जाता है, जिससे वहाँ एक बहुत गहरा निम्न दाब (Very Deep Low Pressure) का क्षेत्र बनता है।
    • इस विशाल दाब-अंतर के कारण, व्यापारिक पवनें (Trade Winds) सामान्य से कहीं अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं और पूर्व से पश्चिम की ओर तेजी से बहती हैं।
  3. वॉकर परिसंचरण का तीव्र होना:
    • इस पूरी प्रक्रिया के कारण, वैश्विक वॉकर परिसंचरण (Walker Circulation) बहुत अधिक तीव्र और सशक्त हो जाता है।

इस तीव्र प्रणाली का भारतीय मानसून पर सीधा प्रभाव (सकारात्मक)

पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया के पास) में बना बहुत गहरा निम्न दाब क्षेत्र ही भारतीय मानसून के लिए एक वरदान की तरह काम करता है।

  1. मानसूनी निम्न दाब का मजबूत होना:
    • भारत के मैदानी इलाकों में गर्मियों में जो “मानसूनी द्रोणी” (Monsoon Trough) बनती है, वह एक निम्न दाब का क्षेत्र होती है। इंडोनेशिया के पास बना यह शक्तिशाली निम्न दाब, भारतीय निम्न दाब प्रणाली को और अधिक गहरा और शक्तिशाली बना देता है। यह एक सहायक इंजन की तरह काम करता है, जो पूरे तंत्र को और अधिक ताकत देता है।
  2. अधिक दाब-प्रवणता (Increased Pressure Gradient):
    • ला नीना के कारण, हिंद महासागर के उच्च दाब और भारतीय उपमहाद्वीप के गहरे निम्न दाब के बीच का अंतर (Pressure Gradient) बहुत अधिक बढ़ जाता है।
  3. मजबूत और नमी युक्त मानसूनी पवनें:
    • इस अत्यधिक दाब-अंतर के कारण, हिंद महासागर से भारत की ओर बहने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें बहुत मजबूत हो जाती हैं। वे अधिक तेजी से चलती हैं और अपने साथ बहुत अधिक नमी लेकर आती हैं।

परिणामस्वरूप, भारत पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:


आर्थिक प्रभाव

निष्कर्ष:
ला नीना, वैश्विक वायु परिसंचरण (वॉकर सेल) को तीव्र करके, भारतीय उपमहाद्वीप पर बनने वाली मानसूनी निम्न दाब प्रणाली को सीधे तौर पर सशक्त करता है। एक गहरा निम्न दाब, अधिक शक्तिशाली और नमी युक्त पवनों को आकर्षित करता है, जिसके परिणामस्वरूप भारत में मानसून मजबूत होता है और अक्सर सामान्य से अधिक वर्षा होती है, जिससे कभी-कभी बाढ़ की स्थिति भी बन जाती है।


सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (Positive Indian Ocean Dipole – IOD)

हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), जिसे “भारतीय नीनो” (Indian Niño) भी कहा जाता है, हिंद महासागर की अपनी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। यह उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी भागों के समुद्री सतह के तापमान (Sea Surface Temperature – SST) में होने वाले आवधिक उतार-चढ़ाव को संदर्भित करती है।

IOD की तीन अवस्थाएँ होती हैं: सकारात्मक, नकारात्मक और तटस्थ। इनमें से सकारात्मक IOD भारतीय मानसून के लिए सबसे महत्वपूर्ण और सहायक मानी जाती है।


सकारात्मक IOD की स्थिति क्या है?

एक सकारात्मक IOD घटना के दौरान, हिंद महासागर के तापमान में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं:

  1. पश्चिमी हिंद महासागर का गर्म होना:
    • अरब सागर और अफ्रीका के तट के पास का समुद्री सतह का तापमान औसत से अधिक गर्म (Warmer than average) हो जाता है।
  2. पूर्वी हिंद महासागर का ठंडा होना:
    • बंगाल की खाड़ी और इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के पास का समुद्री सतह का तापमान औसत से अधिक ठंडा (Cooler than average) हो जाता है।

इसे एक “द्विध्रुव” (Dipole) इसलिए कहा जाता है क्योंकि महासागर के दो सिरों (ध्रुवों) पर तापमान में विपरीत स्थितियाँ (एक तरफ गर्म, दूसरी तरफ ठंडा) विकसित हो जाती हैं।


सकारात्मक IOD का विकास और प्रक्रिया


सकारात्मक IOD का भारतीय मानसून पर प्रभाव (अनुकूल)

सकारात्मक IOD भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए बेहद अनुकूल और सहायक होता है। इसका प्रभाव इस प्रकार पड़ता है:

  1. संवहन (Convection) का स्थानांतरण:
    • बादल बनने और बारिश होने की प्रक्रिया, जिसे संवहन कहते हैं, ठंडे पानी के बजाय गर्म पानी के ऊपर अधिक होती है।
    • सकारात्मक IOD के दौरान, यह संवहन केंद्र पूर्वी हिंद महासागर से हटकर पश्चिमी हिंद महासागर (अरब सागर) में स्थानांतरित हो जाता है।
  2. मानसूनी पवनों को अतिरिक्त नमी:
    • अरब सागर के औसत से अधिक गर्म होने के कारण वाष्पीकरण (Evaporation) की दर बढ़ जाती है।
    • जब दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें भारत की ओर बढ़ती हैं, तो वे इस अत्यधिक गर्म अरब सागर से अधिक नमी (Moisture) ग्रहण करती हैं।
  3. मजबूत निम्न दाब:
    • गर्म समुद्र की सतह अपने ऊपर की हवा को भी गर्म कर देती है, जिससे वहाँ एक मजबूत निम्न दाब (Low Pressure) का क्षेत्र विकसित होता है।
    • यह निम्न दाब भारत के मुख्य भू-भाग पर बने मानसूनी निम्न दाब को और अधिक शक्तिशाली बना देता है, जिससे मानसूनी पवनें और अधिक तीव्रता से आकर्षित होती हैं।

परिणाम: इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से, एक सकारात्मक IOD वर्ष के दौरान:


एल नीनो (El Niño) के प्रभाव को कम करने में भूमिका

यह सकारात्मक IOD की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक है।

निष्कर्ष:
सकारात्मक IOD हिंद महासागर का एक ऐसा “सुरक्षा कवच” है जो भारतीय मानसून को शक्ति प्रदान करता है और प्रशांत महासागर से आने वाले नकारात्मक प्रभाव (एल नीनो) के खिलाफ एक बफर के रूप में कार्य करता है। यह भारतीय मौसम विज्ञानियों के लिए मानसून की भविष्यवाणी करने में एक महत्वपूर्ण संकेतक है।


नकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (Negative Indian Ocean Dipole – IOD)

हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) हिंद महासागर की अपनी आंतरिक जलवायु परिघटना है, जो इसके पश्चिमी और पूर्वी भागों के समुद्री सतह के तापमान में होने वाले उतार-चढ़ाव पर आधारित है।

नकारात्मक IOD, सकारात्मक IOD की ठीक विपरीत स्थिति है और यह भारतीय मानसून के लिए प्रतिकूल या हानिकारक मानी जाती है।


नकारात्मक IOD की स्थिति क्या है?

एक नकारात्मक IOD घटना के दौरान, हिंद महासागर के तापमान में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं:

  1. पश्चिमी हिंद महासागर का ठंडा होना:
    • अरब सागर और अफ्रीका के तट के पास का समुद्री सतह का तापमान औसत से अधिक ठंडा (Cooler than average) हो जाता है।
  2. पूर्वी हिंद महासागर का गर्म होना:
    • बंगाल की खाड़ी का दक्षिणी हिस्सा और इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के पास का समुद्री सतह का तापमान औसत से अधिक गर्म (Warmer than average) हो जाता है।

इस स्थिति में भी महासागर के दो सिरों पर तापमान में विपरीत स्थितियाँ (एक तरफ ठंडा, दूसरी तरफ गर्म) होती हैं, लेकिन यह सकारात्मक अवस्था का ठीक उलटा होता है।


नकारात्मक IOD का विकास और प्रक्रिया


नकारात्मक IOD का भारतीय मानसून पर प्रभाव (प्रतिकूल)

नकारात्मक IOD भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए प्रतिकूल या कमजोर करने वाला होता है। इसका प्रभाव इस प्रकार पड़ता है:

  1. संवहन (Convection) का दूर जाना:
    • चूंकि संवहन (बादल बनने और बारिश होने की प्रक्रिया) गर्म पानी के ऊपर अधिक होता है, नकारात्मक IOD के दौरान यह संवहन केंद्र भारत से दूर, पूर्वी हिंद महासागर (इंडोनेशिया के पास) स्थानांतरित हो जाता है।
    • इसका मतलब है कि बारिश कराने वाली मुख्य प्रणाली भारत से दूर चली जाती है।
  2. मानसूनी पवनों को कम नमी:
    • चूंकि अरब सागर औसत से अधिक ठंडा होता है, इसलिए वाष्पीकरण (Evaporation) की दर घट जाती है।
    • जब दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें भारत की ओर बढ़ती हैं, तो उन्हें ठंडे अरब सागर से कम नमी (Less Moisture) मिल पाती है।
  3. उच्च दाब का निर्माण:
    • ठंडी समुद्री सतह अपने ऊपर की हवा को भी ठंडा और भारी बना देती है, जिससे अरब सागर और भारत के पश्चिमी तट के पास एक उच्च दाब (High Pressure) का क्षेत्र विकसित होने लगता है।
    • यह उच्च दाब क्षेत्र भारत के मुख्य भू-भाग पर बने मानसूनी निम्न दाब को कमजोर कर देता है।

परिणाम: इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से, एक नकारात्मक IOD वर्ष के दौरान:


ला नीना (La Niña) के साथ अंतःक्रिया

निष्कर्ष:
नकारात्मक IOD भारतीय मानसून के लिए एक प्रतिकूल कारक है, जो पवनों में नमी की कमी करता है और वर्षा प्रणाली को भारत से दूर ले जाता है। यह अक्सर भारत में औसत से कम वर्षा का कारण बनता है। जब यह एल नीनो जैसी अन्य नकारात्मक घटनाओं के साथ जुड़ता है, तो इसका प्रभाव और भी गंभीर हो सकता है।


निष्कर्ष:
आधुनिक या गतिक विचारधारा मानसून की एक बहुत अधिक व्यापक और वैज्ञानिक तस्वीर प्रस्तुत करती है। यह मानती है कि मानसून केवल धरातलीय तापन का परिणाम नहीं, बल्कि ऊपरी और निचले वायुमंडल, स्थलीय विशेषताओं (तिब्बती पठार), और महासागरीय धाराओं के बीच एक जटिल, गतिशील और अंतर-संबंधित (interconnected) प्रणाली है। यह मानसून की अनिश्चितता और वार्षिक भिन्नता की व्याख्या करने में भी अधिक सक्षम है।



पश्चिमी विक्षोभ की उत्पत्ति: एक वायुमंडलीय यात्रा

पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) भारतीय उपमहाद्वीप में शीत ऋतु के मौसम को प्रभावित करने वाली एक महत्वपूर्ण वायुमंडलीय परिघटना है। यह वास्तव में एक बहिरूष्णकटिबंधीय या शीतोष्ण चक्रवात (Extra-tropical or Temperate Cyclone) है, जिसकी उत्पत्ति भारत से हजारों किलोमीटर दूर पश्चिम में होती है।

इसकी उत्पत्ति और भारत तक की यात्रा को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:

चरण 1: उत्पत्ति का स्रोत क्षेत्र – भूमध्य सागर (Mediterranean Sea)

चरण 2: वाताग्र जनन (Frontogenesis) – चक्रवात का निर्माण

चरण 3: भारत की ओर यात्रा – जेट स्ट्रीम की भूमिका

चरण 4: भारत पर प्रभाव – हिमालय से टकराव

निष्कर्ष:
इस प्रकार, पश्चिमी विक्षोभ की उत्पत्ति की प्रक्रिया एक जटिल वायुमंडलीय यात्रा है जो भूमध्य सागर की गर्म सतह से शुरू होती है, वाताग्रों के निर्माण से चक्रवात का रूप लेती है, शक्तिशाली जेट स्ट्रीम द्वारा हजारों किलोमीटर की दूरी तय करती है, और अंत में हिमालय से टकराकर उत्तर भारत को अपना जीवनदायिनी जल (वर्षा और हिमपात के रूप में) प्रदान करती है।

मानसून-पूर्व वर्षा: आगमन की दस्तक

मानसून-पूर्व वर्षा उन गरज के साथ होने वाली बौछारों को कहते हैं जो ग्रीष्म ऋतु (मार्च से मई) के अंत में, दक्षिण-पश्चिम मानसून के वास्तविक आगमन से ठीक पहले भारत के विभिन्न हिस्सों में होती हैं। ये वर्षाएँ हल्की और स्थानीय प्रकृति की होती हैं, लेकिन क्षेत्रीय कृषि और मौसम के लिए इनका विशेष महत्व होता है।

I. मानसून-पूर्व वर्षा की उत्पत्ति (Origin)

इसकी उत्पत्ति का मुख्य कारण ग्रीष्म ऋतु के दौरान होने वाला तीव्र सतही तापन (Intense Surface Heating) और संवहनीय क्रियाएँ (Convectional Activities) हैं।

  1. तीव्र तापन और निम्न दाब:
    • मार्च और अप्रैल के महीनों में, सूर्य की सीधी किरणों के कारण भूमि की सतह बहुत गर्म हो जाती है।
    • इस गर्मी के कारण, सतह के संपर्क में आने वाली हवा गर्म, हल्की होकर तेजी से ऊपर की ओर उठती है। इससे सतह पर एक स्थानीय निम्न दाब (Low Pressure) का क्षेत्र बन जाता है।
  2. वायु का अस्थिर होना:
    • जैसे ही यह गर्म और नम हवा ऊपर उठती है, यह ठंडी होती है और एक निश्चित ऊँचाई पर संतृप्ति बिंदु (Saturation Point) तक पहुँच जाती है।
  3. कपासी-वर्षी बादलों का निर्माण:
    • हवा के तेजी से ऊपर उठने और संघनित होने की इस प्रक्रिया से कपासी-वर्षी बादलों (Cumulonimbus Clouds) का निर्माण होता है। ये बादल बहुत घने, ऊर्ध्वाधर और अस्थिर होते हैं।
  4. गरज के साथ वर्षा:
    • जब इन बादलों में जल की बूँदें भारी हो जाती हैं, तो वे वर्षा के रूप में नीचे गिरती हैं। इन बादलों के भीतर होने वाली तीव्र वायु की गति के कारण बिजली (Lightning) और गरज (Thunder) भी उत्पन्न होती है।

II. मानसून-पूर्व वर्षा का वितरण और स्थानीय नाम

यह वर्षा पूरे भारत में एक समान नहीं होती, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में होती है और वहाँ इसे विशिष्ट स्थानीय नामों से जाना जाता है। ये नाम प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

स्थानीय नाम (Local Name)प्रभावित क्षेत्र (Region)विशेषताएँ और प्रभाव
आम्र वर्षा (Mango Showers)केरल, कर्नाटक, तटीय तमिलनाडुयह हल्की वर्षा आम की फसल के लिए अत्यधिक लाभदायक होती है, क्योंकि यह आम के फलों को समय से पहले गिरने से रोकती है और उन्हें जल्दी पकने में मदद करती है।
फूलों वाली बौछार (Blossom Showers)केरल और आसपास के कर्नाटक के क्षेत्रयह वर्षा कहवा (कॉफी) के फूलों के खिलने के लिए बहुत अनुकूल होती है, जिससे कहवा का उत्पादन अच्छा होता है।
काल बैशाखी (Kaal Baisakhi)<br/>या नॉर’वेस्टर्स (Nor’westers)पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड, ओडिशायह एक तीव्र और विनाशकारी स्थानीय तूफान है, जिसमें मूसलाधार वर्षा, तेज हवाएँ (तूफ़ानी गति से) और अक्सर ओलावृष्टि (Hailstorms) होती है।<br/> ‘काल’ का अर्थ ‘विनाश’ है जो बैशाख (अप्रैल-मई) के महीने में आता है।<br/> हालाँकि यह विनाशकारी होता है, लेकिन यह चाय (असम में), जूट और धान (पश्चिम बंगाल में) की फसलों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
बारदोली छीड़ा (Bardoli Chheerha)असम (विशेष रूप से)यह “काल बैशाखी” का ही स्थानीय असमिया नाम है, जिसका प्रभाव चाय के बागानों के लिए लाभकारी होता है।
लू (Loo) और धूल भरी आँधियाँउत्तर भारत के मैदान<br/> (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली)हालाँकि ‘लू’ एक गर्म और शुष्क पवन है जो वर्षा नहीं करती, लेकिन कभी-कभी शाम के समय यह अपने साथ धूल भरी आँधियाँ लाती है। इन आँधियों के साथ बहुत हल्की और अस्थायी बूँदा-बाँदी हो सकती है, जो प्रचंड गर्मी से क्षणिक राहत प्रदान करती है।

III. मानसून-पूर्व वर्षा की सामान्य विशेषताएँ

  1. स्थानीय प्रकृति: ये वृहत मानसूनी वर्षा की तरह न होकर, स्थानीय स्तर पर विकसित होती हैं और एक छोटे क्षेत्र को प्रभावित करती हैं।
  2. कम अवधि: यह वर्षा आमतौर पर दोपहर या शाम के समय होती है और बहुत कम समय (कुछ मिनटों से एक-दो घंटे) तक चलती है।
  3. गरज और बिजली के साथ: ये हमेशा गरज और बिजली की चमक के साथ होती हैं।
  4. गर्मी से राहत: ये भीषण गर्मी और उमस से अस्थायी राहत प्रदान करती हैं।
  5. कृषि के लिए महत्व: ये खरीफ फसलों की बुवाई से पहले खेतों में आवश्यक नमी प्रदान करती हैं और बागवानी फसलों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।
  6. मानसून के आगमन का सूचक: इन बौछारों की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि को अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन का सूचक माना जाता है।

निष्कर्ष:
मानसून-पूर्व वर्षा ग्रीष्म ऋतु के कठोर मौसम और वर्षा ऋतु के जीवनदायिनी आगमन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह न केवल तापमान को कम करके राहत प्रदान करती है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण फसलों को समय पर नमी देकर उनकी वृद्धि में भी सहायता करती है। यह प्रकृति की एक सुंदर व्यवस्था है जो भूमि को आगामी मानसूनी वर्षा के लिए तैयार करती है।

मानसून में विच्छेद (Break in Monsoon)

मानसून में विच्छेद या मानसून का विराम, दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु (जून से सितंबर) के दौरान आने वाले उस शुष्क दौर (Dry Spell) को कहते हैं, जब एक सप्ताह या उससे अधिक समय तक वर्षा नहीं होती है। यह वर्षा ऋतु की एक सामान्य लेकिन महत्वपूर्ण विशेषता है।

यह एक ऐसी स्थिति है जब पूरे देश में मानसून सक्रिय नहीं रहता, बल्कि वर्षा कुछ विशेष क्षेत्रों में केंद्रित हो जाती है, जबकि देश का एक बड़ा हिस्सा सूखा रह जाता है।

मानसून में विच्छेद क्यों होता है? (The Primary Reason)

मानसून विच्छेद का सबसे प्रमुख और सीधा कारण “मानसून द्रोणी” (Monsoon Trough) या ITCZ की स्थिति में बदलाव आना है।

1. सामान्य स्थिति (जब वर्षा होती है):
सामान्य परिस्थितियों में, मानसून द्रोणी (एक निम्न दाब की पट्टी) उत्तर भारत के विशाल मैदानों (Indo-Gangetic Plains) के ऊपर से गुजरती है। इस द्रोणी की स्थिति मैदानों के ऊपर होने के कारण, हिंद महासागर से आने वाली नमी युक्त मानसूनी पवनें इसी क्षेत्र की ओर आकर्षित होती हैं और पूरे मैदानी इलाके में व्यापक वर्षा करती हैं।

2. विच्छेद की स्थिति (जब वर्षा रुक जाती है):
मानसून विच्छेद के दौरान, यह मानसून द्रोणी उत्तर की ओर खिसक जाती है और हिमालय की तलहटी (Foothills of the Himalayas) पर या उसके समानांतर स्थापित हो जाती है। जब यह “वर्षा की धुरी” उत्तर की ओर चली जाती है, तो मैदानी इलाकों में निम्न दाब का क्षेत्र समाप्त हो जाता है और वहाँ उच्च दाब की स्थिति बनने लगती है, जिससे पवनें नीचे की ओर बैठने लगती हैं। परिणामस्वरूप, मैदानी इलाकों में वर्षा कराने वाली प्रणाली निष्क्रिय हो जाती है और वहाँ शुष्क मौसम की शुरुआत हो जाती है।

मानसून विच्छेद के दौरान वर्षा का पैटर्न

यह एक बहुत ही रोचक और महत्वपूर्ण पहलू है। जब मैदानी इलाकों में सूखा पड़ता है, तब भी देश के कुछ हिस्सों में भारी वर्षा हो रही होती है।

मौसम की स्थितिप्रभावित क्षेत्र
शुष्क दौर (वर्षा नहीं होती)उत्तर भारत के मैदान (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल)। मध्य भारत (मध्य प्रदेश, गुजरात)। प्रायद्वीपीय भारत का आंतरिक भाग।
अत्यधिक भारी वर्षाहिमालय की तलहटी और पूर्वी हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी बिहार, सिक्किम, उत्तरी बंगाल)। पूर्वोत्तर भारत (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय)। गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी हिमालयी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र।
सामान्य वर्षा जारी رہناपश्चिमी घाट (पर्वतीय वर्षा के कारण यहाँ वर्षा जारी रहती है, लेकिन उसकी तीव्रता कम हो सकती है)। दक्षिण-पूर्वी तट (तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश) में कभी-कभी हल्की वर्षा हो सकती है।

मानसून विच्छेद के प्रभाव (Impacts of the Monsoon Break)

मानसून विच्छेद का भारत पर दोहरा और अक्सर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है:

1. मैदानी इलाकों में सूखा:
कृषि पर प्रभाव: यदि विच्छेद लंबा खिंच जाए (दो सप्ताह से अधिक), तो मैदानी इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है। इससे खरीफ की फसलों, विशेषकर धान (चावल), जिसे बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है, को भारी नुकसान पहुँचता है।
जल संकट: जलाशयों में पानी का स्तर गिरने लगता है।

2. हिमालयी क्षेत्रों और नदियों में बाढ़:
जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा: चूँकि सारी वर्षा हिमालय की तलहटी और पहाड़ों में केंद्रित हो जाती है, इसलिए हिमालय से निकलने वाली नदियों (जैसे गंगा, यमुना, कोसी, गंडक, ब्रह्मपुत्र) के जलग्रहण क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है।
मैदानी इलाकों में बाढ़: पहाड़ों में हुई इस भारी वर्षा का पानी इन नदियों के माध्यम से मैदानी इलाकों में पहुँचता है और भीषण बाढ़ का कारण बनता है। कोसी नदी (“बिहार का शोक”) द्वारा लाई जाने वाली बाढ़ अक्सर मानसून विच्छेद के दौरान ही आती है।

निष्कर्ष

मानसून विच्छेद भारतीय मानसून की परिवर्तनशील प्रकृति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह एक विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न करता है जहाँ एक ही समय में देश के मैदानी भाग सूखे की मार झेल रहे होते हैं, जबकि उन्हीं मैदानों से होकर गुजरने वाली नदियाँ पहाड़ों में हुई बारिश के कारण बाढ़ से उफान पर होती हैं। इसका प्रबंधन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है।

उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon):

उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon): मानसून का निवर्तन

उत्तर-पूर्वी मानसून, जिसे “लौटता हुआ मानसून” (Retreating Monsoon) या शीतकालीन मानसून (Winter Monsoon) भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप में अक्टूबर से दिसंबर तक की अवधि में सक्रिय रहने वाली एक पवन प्रणाली है। यह दक्षिण-पश्चिम मानसून की तरह व्यापक वर्षा नहीं करता, बल्कि भारत के एक बहुत ही सीमित क्षेत्र, विशेषकर दक्षिण-पूर्वी तट के लिए, मुख्य वर्षा ऋतु के रूप में कार्य करता है।


I. उत्तर-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति (Origin)

इसकी उत्पत्ति पवन प्रणाली के पूरी तरह उलट जाने का परिणाम है, जो शरद ऋतु के दौरान होता है।

  1. स्थल का ठंडा होना:
    • सितंबर के अंत तक, सूर्य दक्षिणी गोलार्ध की ओर जाने लगता है, जिससे भारतीय और एशियाई भू-भाग को कम सौर ऊर्जा प्राप्त होती है।
    • भूमि, अपनी प्रकृति के अनुसार, बहुत तेजी से ठंडी हो जाती है। विशेष रूप से, मध्य एशिया और तिब्बती पठार पर एक शक्तिशाली उच्च वायुदाब (High-Pressure) केंद्र विकसित हो जाता है।
  2. समुद्र का अपेक्षाकृत गर्म रहना:
    • इसकी तुलना में, हिंद महासागर (विशेषकर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर) अपनी संचित ऊष्मा को धीरे-धीरे खोता है और भूमि की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म बना रहता है।
    • गर्म समुद्री सतह पर एक निम्न वायुदाब (Low-Pressure) क्षेत्र बना रहता है।
  3. पवनों की दिशा का उलटना:
    • अब दाब-प्रवणता पूरी तरह उलट जाती है। पवनें अब स्थल के उच्च दाब क्षेत्र से समुद्र के निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहने लगती हैं।
  4. पवन की दिशा (उत्तर-पूर्व):
    • कोरिओलिस बल के कारण, उत्तरी गोलार्ध में ये पवनें अपनी दाहिनी ओर विक्षेपित हो जाती हैं। चूँकि ये पवनें मध्य एशिया और भारत के उत्तर-पूर्व से आ रही होती हैं, इसलिए इनकी प्रभावी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है। इसी कारण इन्हें “उत्तर-पूर्वी मानसून” कहा जाता है।

II. उत्तर-पूर्वी मानसून की विशेषताएँ और प्रभाव

  1. प्रकृति (Nature):
    • शुष्क और ठंडी पवनें: चूँकि ये पवनें स्थल से उत्पन्न होती हैं, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से ठंडी और शुष्क होती हैं। इनमें नमी की बहुत कमी होती है।
    • वर्षा का अभाव: इसी कारण, उत्तर-पूर्वी मानसून भारत के अधिकांश हिस्सों में वर्षा नहीं करता। इसके बजाय, यह एक शुष्क, शांत और सुखद मौसम लाता है, जिसमें आसमान साफ रहता है। यह उत्तर भारत में शीत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है।
  2. अपवाद: कोरोमंडल तट पर वर्षा (Rainfall on the Coromandel Coast)
    • यह इस मानसून की सबसे महत्वपूर्ण और अनूठी विशेषता है।
    • नमी का संग्रहण: जब ये शुष्क उत्तर-पूर्वी पवनें बंगाल की खाड़ी के गर्म पानी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे वाष्पीकरण के माध्यम से भारी मात्रा में नमी ग्रहण कर लेती हैं
    • पर्वतीय बाधा: जब ये नमी युक्त पवनें दक्षिण भारत के पूर्वी तट (कोरोमंडल तट) पर पहुँचती हैं, तो वे वहाँ स्थित पूर्वी घाट की पहाड़ियों से टकराती हैं।
    • भारी वर्षा: पूर्वी घाट एक बाधा के रूप में कार्य करता है, जिससे ये पवनें ऊपर उठती हैं, ठंडी होती हैं और भारी पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) करती हैं।

प्रभावित क्षेत्र:


III. उष्णकटिbandhiy चक्रवातों से संबंध


निष्कर्ष
उत्तर-पूर्वी मानसून, दक्षिण-पश्चिम मानसून की तरह एक अखिल भारतीय घटना नहीं है, बल्कि एक क्षेत्रीय महत्व वाली पवन प्रणाली है। यह उत्तर भारत में जहाँ शुष्क और शीतल मौसम का अग्रदूत है, वहीं यह दक्षिण-पूर्वी भारत, विशेषकर तमिलनाडु के लिए, “जीवनदायिनी” वर्षा ऋतु है जो वहाँ के जलाशयों, कृषि और पेयजल की जरूरतों को पूरा करती है।

भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ

  1. ऋतुनिष्ठ प्रकृति: इसका आगमन और निवर्तन ऋतुओं के चक्र से जुड़ा है।
  2. अनिश्चितता: इसके आगमन, वापसी और वर्षा की मात्रा में हर साल भिन्नता होती है। इसीलिए कहा जाता है, “भारतीय कृषि मानसून का जुआ है।”
  3. वर्षा का असमान वितरण: यह देश के सभी हिस्सों में समान रूप से वर्षा नहीं करता। कहीं बाढ़ (मेघालय, मुंबई) आती है तो कहीं सूखा (राजस्थान, महाराष्ट्र का विदर्भ) रहता है।
  4. मूसलाधार प्रकृति: मानसूनी वर्षा लगातार हल्की बौछारों के रूप में नहीं, बल्कि कुछ दिनों के अंतराल पर होने वाली भारी और मूसलाधार वर्षा के रूप में होती है।

निष्कर्ष

अतः, भारतीय मानसून केवल हवाओं का उलटना नहीं है, बल्कि यह एक जीवनदायिनी, लेकिन अनिश्चित, एकीकृत जलवायु प्रणाली है जो भारत के लिए जल का प्रमुख स्रोत है। इसे भारत का “वास्तविक वित्त मंत्री” (Real Finance Minister) भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी सफलता या विफलता सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है।


हिमालयी क्रायोस्फीयर (Himalayan Cryosphere)

क्रायोस्फीयर (Cryosphere) पृथ्वी की सतह के उन सभी हिस्सों को संदर्भित करता है जहाँ पानी जमे हुए (ठोस) रूप में मौजूद है। इसमें ग्लेशियर (हिमनद), आइस कैप, हिम (बर्फ), पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी हुई जमीन), झील की बर्फ और नदी की बर्फ शामिल हैं।

हिमालयी क्रायोस्फीयर, ध्रुवीय क्षेत्रों (उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव) के बाहर, विश्व का सबसे बड़ा क्रायोस्फीयर है। इसमें विशाल हिमनद (ग्लेशियर) और व्यापक हिम-आवरण (Snow Cover) शामिल हैं, जिसके कारण इस पूरे क्षेत्र को “तीसरा ध्रुव” (The Third Pole) भी कहा जाता है।


I. हिमालयी क्रायोस्फीयर के प्रमुख घटक

  1. हिमनद (Glaciers):
    • परिभाषा: हिमनद, बर्फ की विशाल नदियाँ होती हैं जो गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे-धीरे पहाड़ों से नीचे की ओर बहती हैं। इनका निर्माण वर्षों तक भारी हिमपात के जमा होने और उसके संपीडित (compact) होने से होता है।
    • विस्तार: हिमालय-काराकोरम-हिंदुकुश (HKH) क्षेत्र में लगभग 55,000 हिमनद हैं, जो इसे ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर बर्फ का सबसे बड़ा भंडार बनाते हैं।
    • उदाहरण: सियाचिन ग्लेशियर (भारत का सबसे लंबा), गंगोत्री ग्लेशियर (गंगा का स्रोत), जेमू ग्लेशियर, मिलाम ग्लेशियर आदि।
  2. हिम-आवरण (Snow Cover):
    • परिभाषा: यह भूमि की सतह पर अस्थायी या स्थायी रूप से जमी हुई बर्फ की परत होती है।
    • महत्व: यह सर्दियों में जमा होती है और वसंत तथा गर्मियों में पिघलती है, जिससे नदियों को पानी मिलता है। इसका विस्तार और अवधि हर साल बदलती है और यह मानसून को भी प्रभावित करती है। एक व्यापक हिम-आवरण एल्बिडो (सूर्य के प्रकाश का परावर्तन) को बढ़ाता है, जिससे क्षेत्रीय तापमान नियंत्रित रहता है।
  3. पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost):
    • परिभाषा: यह वह भूमि है जो कम से कम लगातार दो वर्षों तक 0°C (32°F) से नीचे के तापमान पर जमी रहती है।
    • विस्तार: यह हिमालय के बहुत ऊँचे और ठंडे क्षेत्रों में पाया जाता है।

II. हिमालयी क्रायोस्फीयर का महत्व: “एशिया का जल मीनार”

हिमालयी क्रायोस्फीयर को “एशिया का जल मीनार” (Water Tower of Asia) कहा जाता है क्योंकि यह एशिया की दस सबसे बड़ी नदी प्रणालियों के लिए जल का स्रोत है, जिनमें शामिल हैं:

इसका महत्व निम्नलिखित क्षेत्रों में है:

  1. जल सुरक्षा (Water Security):
    • ये नदियाँ लगभग 1.9 बिलियन लोगों (विश्व की आबादी का लगभग एक-चौथाई) के लिए पेयजल, सिंचाई और स्वच्छता का प्राथमिक स्रोत हैं।
    • शुष्क मौसम में, जब मानसूनी वर्षा नहीं होती, तब इन नदियों में पानी का प्रवाह लगभग पूरी तरह से ग्लेशियरों और बर्फ के पिघलने पर निर्भर करता है।
  2. कृषि और खाद्य सुरक्षा (Agriculture and Food Security):
    • भारत का उपजाऊ उत्तरी मैदान (“भारत का अन्न भंडार”) पूरी तरह से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए पानी और गाद पर निर्भर है। इस पानी का स्रोत हिमालयी क्रायोस्फीयर है।
  3. जलविद्युत ऊर्जा (Hydropower Energy):
    • पहाड़ों से नीचे बहने वाली इन नदियों में जलविद्युत उत्पादन की अपार क्षमता है, जो इस क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण है।
  4. जलवायु नियंत्रक (Climate Regulator):
    • विशाल हिम-आवरण अपने उच्च एल्बिडो (Albedo) के कारण सूर्य के विकिरण को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देता है, जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
    • यह भारतीय मानसून सहित एशियाई मौसम प्रणालियों को भी प्रभावित करता है।

III. जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्रायोस्फीयर पर प्रभाव (एक गंभीर संकट)

वैश्विक तापन (Global Warming) के कारण हिमालयी क्रायोस्फीयर पर गहरा और खतरनाक प्रभाव पड़ रहा है।

  1. ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना (Rapid Melting of Glaciers):
    • वैश्विक औसत की तुलना में हिमालय क्षेत्र अधिक तेजी से गर्म हो रहा है।
    • इसके परिणामस्वरूप, ग्लेशियर अभूतपूर्व दर से पीछे हट रहे हैं और पतले हो रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 21वीं सदी के अंत तक हिमालय अपने एक-तिहाई से अधिक ग्लेशियर खो सकता है।
  2. खतरनाक परिणाम:
    • अल्पकालिक (Short-term):
      • बाढ़ का खतरा: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) का खतरा बढ़ रहा है, जहाँ ग्लेशियरों के पिघले पानी से बनी झीलें अचानक फट जाती हैं और निचले इलाकों में विनाशकारी बाढ़ लाती हैं।
      • नदियों में पानी का प्रवाह अस्थायी रूप से बढ़ सकता है।
    • दीर्घकालिक (Long-term):
      • जल का गंभीर संकट: एक बार जब ग्लेशियर काफी हद तक पिघल जाएँगे, तो गर्मियों और शुष्क मौसमों में नदियों में पानी का प्रवाह बहुत कम हो जाएगा, जिससे करोड़ों लोगों के लिए पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हो जाएगा।
      • कृषि और खाद्य उत्पादन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा।
  3. पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव:
    • पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से संग्रहीत कार्बन (मीथेन) वायुमंडल में मुक्त हो सकती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और तेज होगी।
    • स्थानीय वनस्पतियों और जीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं।

निष्कर्ष:
हिमालयी क्रायोस्फीयर केवल बर्फ का एक निष्क्रिय भंडार नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक जीवन-समर्थक प्रणाली है। जलवायु परिवर्तन के कारण इसका तेजी से क्षरण न केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा है, बल्कि यह इस क्षेत्र के लिए एक गंभीर जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और मानवीय संकट का भी कारण बन रहा है, जिसके लिए तत्काल वैश्विक और क्षेत्रीय ध्यान देने की आवश्यकता है।