भारत की जलवायु:
एक विस्तृत विश्लेषण (UPSC एवं अन्य परीक्षाओं के लिए)
भारत की जलवायु को मोटे तौर पर “उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु” (Tropical Monsoon Climate) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। “मानसून” शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘हवाओं का ऋतु के अनुसार उलट जाना’। यह भारत की जलवायु की सबसे प्रमुख विशेषता है, जो देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन को गहराई से प्रभावित करती है।
I. भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
भारत की जलवायु में व्यापक क्षेत्रीय विविधताएँ हैं, जिनके लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:
अक्षांशीय स्थिति (Latitudinal Position)
किसी भी देश की जलवायु का निर्धारण करने वाला सबसे आधारभूत कारक उसकी अक्षांशीय स्थिति है। इसका सीधा संबंध पृथ्वी पर सूर्य की किरणों के कोण से है, जिससे उस स्थान को प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा यानी सूर्यताप (Insolation) की मात्रा तय होती है।
- मूल सिद्धांत: भूमध्य रेखा (0° अक्षांश) पर सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं, जिससे यहाँ तापमान अधिक होता है। जैसे-जैसे हम ध्रुवों (90° अक्षांश) की ओर जाते हैं, सूर्य की किरणें तिरछी होती जाती हैं। ये तिरछी किरणें ऊर्जा को एक बड़े क्षेत्र में फैला देती हैं और उन्हें वायुमंडल की मोटी परत से गुजरना पड़ता है, जिससे तापमान कम हो जाता है।
भारत के संदर्भ में अक्षांशीय स्थिति का प्रभाव
भारत की जलवायु को समझने के लिए उसकी अक्षांशीय स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का विस्तार लगभग 8°4′ उत्तरी अक्षांश से लेकर 37°6′ उत्तरी अक्षांश तक है। इस विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कर्क रेखा (Tropic of Cancer – 23.5° N) है, जो देश के लगभग मध्य से होकर गुजरती है। यह रेखा भारत को स्पष्ट रूप से दो प्रमुख जलवायु कटिबंधों में विभाजित करती है:
1. कर्क रेखा के दक्षिण का क्षेत्र (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र – Tropical Zone)
यह क्षेत्र, जो प्रायद्वीपीय भारत का हिस्सा है, कर्क रेखा और भूमध्य रेखा के बीच स्थित है। इस क्षेत्र की जलवायु पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:
- उच्च तापमान: यह क्षेत्र भूमध्य रेखा के करीब है, इसलिए यहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत सीधी पड़ती हैं, जिससे तापमान ऊँचा बना रहता है।
- स्पष्ट शीत ऋतु का अभाव: यहाँ कोई स्पष्ट या कठोर शीत ऋतु नहीं होती है। गर्मियों और सर्दियों के तापमान में बहुत कम अंतर होता है, जिसे वार्षिक तापान्तर (Annual Range of Temperature) का कम होना कहते हैं।
- समुद्री प्रभाव: इस क्षेत्र के तीन ओर से समुद्र से घिरे होने के कारण जलवायु समकारी रहती है, यानी न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी।
उदाहरण: चेन्नई या मुंबई में साल भर तापमान लगभग एक जैसा गर्म और आर्द्र रहता है।
2. कर्क रेखा के उत्तर का क्षेत्र (उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र – Subtropical Zone)
यह क्षेत्र कर्क रेखा के उत्तर में स्थित है और इसमें उत्तर भारत का विशाल मैदान तथा पर्वतीय क्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्र की जलवायु पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:
- सूर्य की किरणों का तिरछापन: यहाँ सूर्य की किरणें दक्षिणी भारत की तुलना में अधिक तिरछी होती हैं, खासकर सर्दियों में।
- स्पष्ट और भिन्न ऋतुएँ: यहाँ ग्रीष्म, शीत, वर्षा और शरद ऋतुएँ बिल्कुल स्पष्ट होती हैं।
- अधिक वार्षिक तापान्तर: गर्मियों में तापमान बहुत अधिक (जैसे दिल्ली में 45°C) और सर्दियों में बहुत कम (कई बार 2-3°C) हो जाता है। इस प्रकार, वार्षिक तापान्तर बहुत अधिक होता है, जो महाद्वीपीय जलवायु (Continental Climate) का लक्षण है।
उदाहरण: दिल्ली या लखनऊ में अत्यधिक गर्मियाँ और काफी ठंडी सर्दियाँ होती हैं।
एक महत्वपूर्ण अपवाद: हिमालय का प्रभाव
यद्यपि अक्षांशीय स्थिति के अनुसार उत्तर भारत एक उपोष्णकटिबंधीय या शीतोष्ण क्षेत्र है, फिर भी इसकी जलवायु वैसी नहीं है जैसी कि इसी अक्षांश पर स्थित अन्य देशों (जैसे चीन या मध्य पूर्व) में है। इसका कारण हिमालय पर्वत है।
हिमालय एक शक्तिशाली जलवायु विभाजक के रूप में कार्य करता है और मध्य एशिया तथा साइबेरिया से आने वाली बर्फीली ध्रुवीय हवाओं को भारत में प्रवेश करने से रोकता है। यदि हिमालय न होता, तो उत्तर भारत सर्दियों में कहीं अधिक ठंडा होता। इसी कारण, अक्षांशीय विभाजन के बावजूद, पूरे भारत को समग्र रूप से एक उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु वाला देश माना जाता है।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, अक्षांशीय स्थिति भारत की जलवायु की आधारशिला रखती है, जो देश को एक गर्म उष्णकटिबंधीय दक्षिण और एक चरम मौसमी उपोष्णकटिबंधीय उत्तर में विभाजित करती है। हालाँकि, हिमालय जैसे अन्य कारक इस आधारभूत विभाजन को संशोधित करके भारत को एक अद्वितीय मानसूनी जलवायु प्रदान करते हैं।
हिमालय पर्वत श्रृंखला (The Himalayan Range): भारत का जलवायु विभाजक
हिमालय पर्वत श्रृंखला सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि यह भारत के लिए एक विशाल जलवायु विभाजक (Climate Divide) और सुरक्षा कवच (Protective Shield) के रूप में कार्य करती है। यह भारत की जलवायु को इस तरह से नियंत्रित और संशोधित करती है कि इसके बिना उत्तर भारत का मौसम, कृषि और जीवन पूरी तरह से भिन्न होता। भारत की मानसूनी जलवायु का अस्तित्व और स्वरूप काफी हद तक हिमालय पर ही निर्भर करता है।
इसके प्रभाव को निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. ठंडी ध्रुवीय हवाओं से सुरक्षा (Protection from Cold Polar Winds)
- कैसे?: हिमालय, उत्तर में एक विशाल और ऊँची दीवार की तरह खड़ा है, जो लगभग 2500 किलोमीटर तक फैली है। सर्दियों के मौसम में, साइबेरिया और मध्य एशिया के ठंडे और शुष्क ध्रुवीय पवनें (Polar Winds) दक्षिण की ओर बहती हैं।
- प्रभाव: हिमालय इन बर्फीली हवाओं के लिए एक अभेद्य अवरोधक का काम करता है और उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करने से रोकता है।
- परिणाम: इसी कारण, समान अक्षांशों पर स्थित अन्य एशियाई क्षेत्रों की तुलना में भारत में सर्दियाँ काफी हल्की और सहनीय होती हैं। यदि हिमालय नहीं होता, तो पूरा उत्तर भारत सर्दियों में अत्यधिक ठंडा होता और यहाँ रहना तथा कृषि करना बहुत कठिन हो जाता।
2. मानसूनी वर्षा का प्रमुख कारण (Crucial for Monsoon Rains)
- कैसे?: गर्मियों में, जब हिंद महासागर से नमी से लदी दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाएँ भारत के स्थल भाग की ओर बढ़ती हैं, तो हिमालय उनके मार्ग में एक प्राकृतिक बाधा उत्पन्न करता है।
- प्रभाव: ये हवाएँ हिमालय से टकराकर आगे नहीं जा पातीं और ऊपर उठने के लिए मजबूर हो जाती हैं। जैसे-जैसे ये नमी युक्त हवाएँ ऊपर उठती हैं, वे ठंडी होती हैं, संघनित होती हैं और अपनी नमी को वर्षा के रूप में गिरा देती हैं। इस प्रक्रिया को पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) कहते हैं।
- परिणाम: उत्तर भारत के विशाल मैदानों (गंगा, यमुना के मैदान) में होने वाली अधिकांश वर्षा इसी प्रक्रिया का परिणाम है। यदि हिमालय नहीं होता, तो ये मानसूनी पवनें शायद भारत को पार करके मध्य एशिया चली जातीं और उत्तर भारत का एक बड़ा हिस्सा शुष्क या अर्ध-शुष्क मरुस्थल होता।
3. वृष्टि-छाया क्षेत्र का निर्माण (Creation of a Rain Shadow Area)
- कैसे?: जब मानसूनी पवनें हिमालय के दक्षिणी ढलानों (पवन-सम्मुख ढाल) पर अपनी अधिकांश नमी वर्षा के रूप में गिरा देती हैं, तो वे पहाड़ के पार (पवन-विमुख ढाल) उतरते समय शुष्क हो जाती हैं।
- प्रभाव: हिमालय के उत्तरी हिस्से, यानी तिब्बती पठार और भारत के लद्दाख क्षेत्र, इन शुष्क हवाओं के प्रभाव में आते हैं।
- परिणाम: यह क्षेत्र वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) बन जाता है, जहाँ बहुत कम वर्षा होती है। यही कारण है कि तिब्बत एक ऊँचा और शुष्क पठार है और लद्दाख भारत का एक शीत मरुस्थल (Cold Desert) है।
4. पश्चिमी विक्षोभ और शीतकालीन वर्षा (Western Disturbances and Winter Rains)
- कैसे?: सर्दियों में भूमध्य सागर से उत्पन्न होने वाले शीतोष्ण चक्रवात, जिन्हें पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) कहा जाता है, पूर्व की ओर चलते हैं।
- प्रभाव: हिमालय इन चक्रवातों के मार्ग को निर्देशित करता है और उन्हें उत्तर-पश्चिम भारत की ओर मोड़ता है।
- परिणाम: इनके कारण पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सर्दियों में हल्की वर्षा होती है, जो रबी की फसलों (विशेषकर गेहूँ) के लिए “अमृत” मानी जाती है। इसके अलावा, हिमालय के ऊपरी हिस्सों में भारी हिमपात (Snowfall) होता है, जो गर्मियों में पिघलकर उत्तर भारत की सदानीरा नदियों (गंगा, यमुना) को वर्ष भर जल प्रदान करता है।
निष्कर्ष:
स्पष्ट रूप से, हिमालय पर्वत श्रृंखला भारत के जलवायु तंत्र की धुरी है। यह न केवल देश को मध्य एशिया की चरम जलवायु से बचाता है, बल्कि यह जीवनदायिनी मानसूनी वर्षा को भी सुनिश्चित करता है। यह भारत की मौसमी लय को बनाए रखता है, नदियों को पानी देता है, और उपजाऊ मैदानों का पोषण करता है। इस प्रकार, हिमालय भारत की भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान को आकार देने वाली एक निर्धारक शक्ति है।
जल और स्थल का वितरण: भारतीय मानसून का इंजन
जल और स्थल का वितरण भारत की मानसूनी जलवायु को जन्म देने वाला सबसे मौलिक और शक्तिशाली कारक है। इसका मूल सिद्धांत भूमि और जल के गर्म और ठंडा होने के अलग-अलग स्वभाव (Differential Heating and Cooling of Land and Sea) पर आधारित है। यह अंतर ही उस दाब-प्रणाली (Pressure System) को जन्म देता है जो मानसूनी हवाओं को चलाती है।
मूल वैज्ञानिक सिद्धांत
भूमि और जल की प्रकृति में कुछ आधारभूत अंतर होते हैं:
- भूमि: यह अपारदर्शी होती है, इसलिए सूर्य की गर्मी केवल इसकी ऊपरी सतह पर केंद्रित होती है। यह जल्दी गर्म होती है और रात में उतनी ही तेजी से अपनी ऊष्मा खोकर ठंडी हो जाती है।
- जल: यह पारदर्शी होता है, इसलिए सूर्य की गर्मी गहराई तक जाती है। साथ ही, जल अपनी ऊष्मा को संवहन (Convection) धाराओं के माध्यम से वितरित करता है और वाष्पीकरण (Evaporation) में भी ऊष्मा खर्च होती है। इन कारणों से, जल भूमि की तुलना में बहुत धीरे-धीरे गर्म होता है और धीरे-धीरे ही ठंडा होता है।
इसी सिद्धांत के कारण भारत की ऋतुओं के अनुसार हवा की दिशा में एक नाटकीय उलटफेर होता है। इसे हम दो प्रमुख परिदृश्यों में समझ सकते हैं:
1. ग्रीष्मकालीन परिदृश्य और दक्षिण-पश्चिम मानसून का जन्म (मार्च से सितंबर)
- घटना: ग्रीष्म ऋतु में, जब सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है, तो भारतीय उपमहाद्वीप और विशेष रूप से विशाल तिब्बती पठार बहुत तेजी से गर्म हो जाते हैं।
- निम्न दाब का निर्माण: अत्यधिक गर्मी के कारण, भूमि के ऊपर की हवा गर्म होकर फैलती है, हल्की हो जाती है और ऊपर उठ जाती है। इसके परिणामस्वरूप भारतीय भू-भाग पर एक शक्तिशाली निम्न वायुदाब क्षेत्र (Intense Low-Pressure Area) बन जाता है।
- उच्च दाब की स्थिति: इसी समय, भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण में स्थित हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी धीमी गति से गर्म होने के कारण अपेक्षाकृत ठंडे रहते हैं। ठंडे समुद्र के ऊपर की हवा भारी होती है और नीचे बैठती है, जिससे यहाँ एक उच्च वायुदाब क्षेत्र (High-Pressure Area) बना रहता है।
- पवनों का प्रवाह: प्रकृति का नियम है कि हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है। इस दाब-अंतर को भरने के लिए, हिंद महासागर के उच्च दाब क्षेत्र से नमी से भरी हवाएँ भारतीय भू-भाग के निम्न दाब क्षेत्र की ओर तेजी से आकर्षित होती हैं।
- परिणाम: यही नमी युक्त पवनें दक्षिण-पश्चिम मानसून कहलाती हैं, जो जून के पहले सप्ताह में भारत में प्रवेश करती हैं और देश भर में व्यापक वर्षा करती हैं।
संक्षेप में (ग्रीष्म ऋतु):
गर्म भूमि (निम्न दाब) <— ठंडे समुद्र (उच्च दाब) = समुद्र से स्थल की ओर नमी वाली हवाएँ (मानसून)
2. शीतकालीन परिदृश्य और उत्तर-पूर्वी मानसून का जन्म (अक्टूबर से फरवरी)
- घटना: शीत ऋतु में, जब सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में चला जाता है, तो भारतीय उपमहाद्वीप को कम सौर ऊर्जा प्राप्त होती है।
- उच्च दाब का निर्माण: भूमि अपनी ऊष्मा तेजी से खो देती है और बहुत ठंडी हो जाती है। विशेष रूप से, मध्य एशिया और तिब्बती पठार अत्यधिक ठंडे हो जाते हैं। ठंडी भूमि के ऊपर की हवा भी ठंडी, भारी और सघन हो जाती है, जिससे यहाँ एक शक्तिशाली उच्च वायुदाब क्षेत्र (High-Pressure Area) स्थापित हो जाता है।
- निम्न दाब की स्थिति: इस समय, आसपास के महासागर अपनी संचित गर्मी को धीरे-धीरे खोते हैं और भूमि की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म बने रहते हैं। गर्म समुद्र के ऊपर की हवा हल्की होने के कारण यहाँ एक निम्न वायुदाब क्षेत्र (Low-Pressure Area) बना रहता है।
- पवनों की दिशा का उलटना: अब दाब प्रणाली पूरी तरह से उलट चुकी है। हवा भारतीय भू-भाग के उच्च दाब क्षेत्र से हिंद महासागर के निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहने लगती है।
- परिणाम: चूँकि ये पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, इसलिए ये ठंडी और शुष्क होती हैं और भारत के अधिकांश हिस्सों में वर्षा नहीं करतीं। इन्हें उत्तर-पूर्वी मानसून या ‘लौटता हुआ मानसून’ कहा जाता है।
अपवाद: जब ये शुष्क हवाएँ बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं और तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर भारी शीतकालीन वर्षा करती हैं।
संक्षेप में (शीत ऋतु):
ठंडी भूमि (उच्च दाब) —> गर्म समुद्र (निम्न दाब) = स्थल से समुद्र की ओर शुष्क हवाएँ
निष्कर्ष:
इस प्रकार, भारत की अनूठी भौगोलिक स्थिति, जहाँ एक ओर विशाल भूभाग है और तीन ओर से विशाल महासागर, स्थल और जल के तापमान में मौसमी अंतर पैदा करती है। यही तापीय अंतर दाब-प्रवणता को जन्म देता है, जो मानसूनी हवाओं की दिशा को पूरी तरह उलट देता है और भारत की विशिष्ट मानसूनी जलवायु का निर्माण करता है।
समुद्र तट से दूरी (Distance from the Sea): जलवायु का समकारी प्रभाव
किसी स्थान की जलवायु इस बात से बहुत प्रभावित होती है कि वह समुद्र तट के कितना पास है या उससे कितनी दूर है। समुद्र का प्रभाव मुख्य रूप से तापमान को संतुलित और नियंत्रित करने वाला होता है। इस प्रभाव को जलवायु का समकारी या नरमकारी प्रभाव (Moderating Influence of the Sea) कहा जाता है।
मूल सिद्धांत: स्थल समीर और समुद्र समीर
इसका वैज्ञानिक आधार भूमि और जल के गर्म होने की अलग-अलग दरों पर टिका है:
- दिन के समय (समुद्र समीर): भूमि, समुद्र की तुलना में जल्दी गर्म होती है। गर्म भूमि के ऊपर निम्न दाब बनता है, जबकि ठंडे समुद्र पर उच्च दाब होता है। हवा ठंडे समुद्र से गर्म भूमि की ओर चलती है, जिसे समुद्र समीर (Sea Breeze) कहते हैं। यह ठंडी हवा तटीय क्षेत्रों के तापमान को बढ़ने से रोकती है।
- रात के समय (स्थल समीर): रात में, भूमि तेजी से ठंडी हो जाती है, जबकि समुद्र अपनी ऊष्मा बनाए रखता है। अब ठंडी भूमि पर उच्च दाब और गर्म समुद्र पर निम्न दाब बनता है। हवा ठंडी भूमि से गर्म समुद्र की ओर चलती है, जिसे स्थल समीर (Land Breeze) कहते हैं।
यह दैनिक चक्र तटीय क्षेत्रों के तापमान को वर्ष भर संतुलित रखता है।
भारत की जलवायु पर इसका प्रभाव: दो विपरीत जलवायु प्रकार
समुद्र तट से दूरी के आधार पर भारत में दो बिल्कुल भिन्न प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है:
1. तटीय क्षेत्रों की समकारी जलवायु (Equable or Maritime Climate)
जो क्षेत्र समुद्र के निकट हैं (जैसे मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, गोवा), वहाँ की जलवायु पर समुद्र का गहरा प्रभाव पड़ता है।
- कम दैनिक तापान्तर (Low Diurnal Range of Temperature): दिन और रात के तापमान में बहुत कम अंतर होता है। दिन में समुद्र समीर गर्मी को कम कर देती है और रात में स्थल समीर तापमान को बहुत अधिक गिरने नहीं देती।
- कम वार्षिक तापान्तर (Low Annual Range of Temperature): गर्मियों और सर्दियों के औसत तापमान में भी बहुत कम अंतर होता है। यहाँ न तो अत्यधिक गर्मियाँ होती हैं और न ही अत्यधिक सर्दियाँ।
- उच्च आर्द्रता (High Humidity): समुद्र के पास होने के कारण हवा में नमी की मात्रा अधिक होती है, जिससे मौसम उमस भरा रहता है।
- स्पष्ट ऋतुओं का अभाव: यहाँ उत्तर भारत की तरह बहुत ठंडी सर्दियाँ या बहुत गर्म गर्मियाँ नहीं होतीं। मौसम साल भर लगभग एक जैसा गर्म और आर्द्र बना रहता है।
उदाहरण: मुंबई का तापमान गर्मियों में शायद ही 35°C से बहुत ऊपर जाता है और सर्दियों में 18-20°C से नीचे नहीं जाता। साल भर मौसम लगभग एक जैसा महसूस होता है।
2. आंतरिक क्षेत्रों की महाद्वीपीय या चरम जलवायु (Continental or Extreme Climate)
जैसे-जैसे हम समुद्र तट से दूर भारत के भीतरी भागों (जैसे दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, नागपुर) की ओर बढ़ते हैं, समुद्र का समकारी प्रभाव खत्म हो जाता है।
- अधिक दैनिक तापान्तर (High Diurnal Range of Temperature): दिन में तापमान बहुत अधिक और रात में तेजी से कम हो जाता है। (उदाहरण: रेगिस्तान में दिन गर्म और रातें ठंडी)।
- अधिक वार्षिक तापान्तर (High Annual Range of Temperature): गर्मियों और सर्दियों के तापमान के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।
- ग्रीष्म ऋतु: गर्मियाँ बहुत लंबी, शुष्क और अत्यधिक गर्म होती हैं। दिल्ली में तापमान 45°C-47°C तक पहुँच सकता है।
- शीत ऋतु: सर्दियाँ काफी कठोर और ठंडी होती हैं। दिल्ली में तापमान 2°C-3°C तक गिर सकता है।
- कम आर्द्रता (Low Humidity): समुद्र से दूरी के कारण हवा में नमी कम होती है, जिससे मौसम शुष्क रहता है (सिवाय मानसून के)।
उदाहरण: दिल्ली में गर्मियों में झुलसाने वाली गर्मी और सर्दियों में कंपकंपाने वाली ठंड पड़ती है।
निष्कर्ष:
इस प्रकार, समुद्र तट से दूरी भारत की जलवायु में एक स्पष्ट विभाजन रेखा खींचती है। यह निर्धारित करती है कि किसी स्थान का मौसम साल भर संतुलित और नरम रहेगा या फिर वह मौसमी चरम सीमाओं (अत्यधिक गर्मी और अत्यधिक ठंड) का अनुभव करेगा। यह कारक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों के रहन-सहन, पहनावे और खान-पान को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
उच्चावच (Relief / Altitude): जलवायु को आकार देने वाली भू-आकृतियाँ
उच्चावच का अर्थ है किसी स्थान की भू-आकृति, विशेषकर उसकी ऊँचाई (Altitude) और ढलान की दिशा (Orientation of Slopes)। यह किसी भी क्षेत्र की जलवायु, विशेष रूप से तापमान और वर्षा को स्थानीय स्तर पर नियंत्रित करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली कारक है।
भारत जैसे भौगोलिक रूप से विविध देश में, जहाँ विशाल हिमालय पर्वत, पश्चिमी और पूर्वी घाट, और दक्कन का पठार जैसी संरचनाएँ हैं, उच्चावच का प्रभाव बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
I. ऊँचाई (Altitude) का प्रभाव: तापमान पर सीधा नियंत्रण
- मूल सिद्धांत: वायुमंडल में, जैसे-जैसे हम ऊँचाई पर जाते हैं, हवा का घनत्व और दबाव कम होता जाता है। विरल हवा (Thin Air) ऊष्मा को कम रोक पाती है, जिससे तापमान गिर जाता है। औसतन, प्रत्येक 165 मीटर की ऊँचाई पर 1°C तापमान कम हो जाता है। इसे सामान्य ह्रास दर (Normal Lapse Rate) कहते हैं।
- भारत में प्रभाव:
- पहाड़ी बनाम मैदानी क्षेत्र: इसी कारण, उत्तर भारत के मैदानी इलाके (जैसे दिल्ली, लखनऊ) गर्मियों में जब अत्यधिक गर्म होते हैं, तो उसी अक्षांश पर स्थित पहाड़ी क्षेत्र (जैसे शिमला, मसूरी, नैनीताल) ठंडे और सुखद बने रहते हैं।
- स्थायी हिमावरण (Permanent Snow Cover): हिमालय के बहुत ऊँचे क्षेत्रों में तापमान हिमांक (Freezing Point) से भी नीचे चला जाता है, जिसके कारण वहाँ वर्ष भर बर्फ जमी रहती है, जो गर्मियों में पिघलकर नदियों को जल प्रदान करती है।
- दक्षिण भारत में प्रभाव: दक्षिण भारत में, पश्चिमी घाट की ऊँची चोटियाँ (जैसे ऊटी, कोडैकनाल) अपने आसपास के गर्म मैदानी इलाकों की तुलना में ठंडी रहती हैं और लोकप्रिय हिल स्टेशन के रूप में विकसित हुई हैं।
II. पर्वतीय बाधा (Mountain Barrier) का प्रभाव: वर्षा पर निर्णायक नियंत्रण
पर्वत श्रृंखलाएँ हवाओं के मार्ग में बाधा के रूप में कार्य करती हैं और वर्षा के वितरण को नाटकीय रूप से प्रभावित करती हैं।
- पवन-सम्मुख ढाल (Windward Side): जब नमी से भरी मानसूनी पवनें किसी पर्वत से टकराती हैं, तो उन्हें ऊपर उठने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ऊपर उठने पर ये हवाएँ ठंडी होती हैं, संघनित होती हैं और अपनी सारी नमी वर्षा के रूप में गिरा देती हैं। यह क्षेत्र भारी वर्षा प्राप्त करता है।
- पवन-विमुख ढाल (Leeward Side) और वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area): जब ये हवाएँ पहाड़ को पार करके दूसरी तरफ (पवन-विमुख ढाल) उतरती हैं, तो वे अपनी अधिकांश नमी खो चुकी होती हैं। नीचे उतरते हुए ये हवाएँ गर्म हो जाती हैं और उनकी नमी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे वर्षा नहीं होती। यह क्षेत्र वृष्टि-छाया क्षेत्र कहलाता है, जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
- भारत में उदाहरण:
- पश्चिमी घाट: पश्चिमी घाट, अरब सागर से आने वाली मानसूनी पवनों के लिए एक आदर्श बाधा है।
- पवन-सम्मुख ढाल: इसके पश्चिमी ढलान (जैसे मुंबई, गोवा, मंगलुरु) पर 250 सेमी से भी अधिक भारी वर्षा होती है।
- वृष्टि-छाया क्षेत्र: इसके पूर्वी ढलान (पवन-विमुख ढाल) पर स्थित मध्य महाराष्ट्र (जैसे विदर्भ), उत्तरी कर्नाटक और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है, और ये क्षेत्र अक्सर सूखाग्रस्त रहते हैं।
- हिमालय: हिमालय मानसूनी पवनों को उत्तर की ओर जाने से रोककर पूरे उत्तरी मैदान में भारी वर्षा कराता है। वहीं इसके पार स्थित लद्दाख और तिब्बत वृष्टि-छाया क्षेत्र बन जाते हैं।
- अरावली पर्वत: अरावली श्रृंखला की दिशा दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा के समानांतर है। इसलिए, यह हवाओं को रोकने में असफल रहती है और पश्चिमी राजस्थान सूखा रह जाता है।
- पश्चिमी घाट: पश्चिमी घाट, अरब सागर से आने वाली मानसूनी पवनों के लिए एक आदर्श बाधा है।
निष्कर्ष:
इस प्रकार, उच्चावच भारत की जलवायु में स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर भारी विविधताएँ उत्पन्न करता है। यह निर्धारित करता है कि कौन सा क्षेत्र ठंडा होगा और कौन सा गर्म, कहाँ अत्यधिक वर्षा होगी और कहाँ सूखा पड़ेगा। मैदानों की समतल भूमि, पहाड़ों की ठंडी ऊँचाइयाँ, और घाटों के वर्षा-युक्त तथा वर्षा-हीन ढलान, सभी भारत की जलवायु पच्चीकारी के जटिल और अभिन्न अंग हैं, जिन्हें उच्चावच द्वारा ही आकार दिया गया है।
जेट स्ट्रीम और ऊपरी वायु परिसंचरण: भारतीय मानसून का नियंत्रक
जेट स्ट्रीम क्षोभमंडल (Troposphere) की ऊपरी परतों में, लगभग 9 से 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर, बहुत तेज गति (150-300 किमी/घंटा) से बहने वाली एक संकरी वायु-धारा है। ये पश्चिम से पूर्व की ओर एक लहरदार (Meandering) मार्ग में बहती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और विशेषकर मानसून के आगमन, तीव्रता और वापसी को नियंत्रित करने में इन ऊपरी वायु धाराओं की भूमिका निर्णायक होती है।
भारतीय मानसून के संदर्भ में दो प्रमुख जेट स्ट्रीम महत्वपूर्ण हैं:
- उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet Stream – STWJ)
- उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet Stream – TEJ)
1. उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (STWJ) और शीतकालीन मौसम
- स्थिति और प्रकृति: यह जेट स्ट्रीम साल भर 20° से 35° उत्तरी अक्षांशों के बीच बहती है। यह पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है।
- शीत ऋतु में भूमिका (अक्टूबर से मई):
- सर्दियों में, यह जेट स्ट्रीम हिमालय के दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर स्थित हो जाती है और इसका प्रभाव बहुत प्रबल होता है।
- पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) का आगमन: यह अपने साथ भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) से उत्पन्न होने वाले शीतोष्ण चक्रवातों को बहाकर लाती है। इन चक्रवातों को ही “पश्चिमी विक्षोभ” कहा जाता है।
- शीतकालीन वर्षा: ये विक्षोभ जब भारत पहुँचते हैं, तो उत्तर-पश्चिमी मैदानी इलाकों (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी यूपी) में हल्की वर्षा और हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड) में भारी हिमपात (Snowfall) करते हैं। यह वर्षा रबी की फसल (गेहूँ) के लिए अत्यंत लाभदायक होती है।
- मानसून के आगमन में भूमिका:
- मानसून के लिए बाधा: जब तक यह जेट स्ट्रीम हिमालय के दक्षिण में रहती है, तब तक यह भारतीय भू-भाग पर एक उच्च दाब क्षेत्र बनाए रखती है। यह सतह पर गर्म हवा को ऊपर उठने से रोकती है, जिससे मानसून के लिए आवश्यक निम्न दाब का क्षेत्र विकसित नहीं हो पाता।
- उत्तर की ओर खिसकना: मई के अंत और जून की शुरुआत में, जैसे-जैसे सूर्य कर्क रेखा की ओर बढ़ता है, यह जेट स्ट्रीम कमजोर पड़ जाती है और तिब्बती पठार की तीव्र गर्मी के कारण अचानक उत्तर की ओर (हिमालय के पार) खिसक जाती है।
- मानसून का विस्फोट (Monsoon Burst): इस जेट स्ट्रीम के उत्तर की ओर हटते ही, सतह पर दबाव तेजी से गिरता है और एक शक्तिशाली निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है। यह दक्षिणी गोलार्ध की मानसूनी पवनों को तेजी से अपनी ओर आकर्षित करता है, जिससे भारत में “मानसून का विस्फोट” होता है।
2. उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (TEJ) और ग्रीष्मकालीन मानसून
- उत्पत्ति और प्रकृति: यह जेट स्ट्रीम केवल ग्रीष्म ऋतु (जून से सितंबर) में ही विकसित होती है। इसका निर्माण तिब्बती पठार के अत्यधिक गर्म होने के कारण होता है। गर्म हवा ऊपर उठकर ऊपरी क्षोभमंडल में पूर्व की ओर बहने लगती है। यह पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।
- मानसून को सशक्त करने में भूमिका:
- उच्च दाब का निर्माण: यह पूर्वी जेट स्ट्रीम भारत के दक्षिण में, हिंद महासागर के ऊपर उतरती है और वहाँ एक उच्च दाब (High Pressure) क्षेत्र को और अधिक मजबूत करती है।
- मानसून का खिंचाव (Pull Mechanism): यह मजबूत उच्च दाब क्षेत्र सतह पर मौजूद नमी युक्त मानसूनी पवनों को और अधिक बल के साथ भारतीय भू-भाग के निम्न दाब की ओर धकेलता है। इससे मानसून की तीव्रता बढ़ती है और वह भारत के आंतरिक भागों तक पहुँच पाता है।
- उष्णकटिबंधीय अवदाबों का मार्गदर्शन: बंगाल की खाड़ी में बनने वाले मानसूनी अवदाब (Depressions), जो भारत में अधिकांश वर्षा करते हैं, के मार्ग को भी यह जेट स्ट्रीम पश्चिम की ओर निर्देशित करती है।
निष्कर्ष:
इस प्रकार, ऊपरी वायु परिसंचरण, विशेषकर जेट स्ट्रीम, भारतीय मानसून के लिए एक ‘ऑन-ऑफ’ स्विच की तरह काम करता है। पश्चिमी जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर खिसकना मानसून के आगमन के लिए हरा सिग्नल है, जबकि पूर्वी जेट स्ट्रीम का विकास मानसून को शक्ति और दिशा प्रदान करता है। इन जटिल वायुमंडलीय प्रक्रियाओं की समझ ने ही भारतीय मौसम वैज्ञानिकों को मानसून की भविष्यवाणी करने में अधिक सक्षम बनाया है।
मानसूनी पवनें: भारत की जीवनधारा
“मानसून” उन मौसमी पवनों को कहते हैं जिनकी दिशा ऋतु के अनुसार पूरी तरह उलट जाती है। ये पवनें भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की जलवायु का सबसे महत्वपूर्ण और निर्धारक तत्व हैं। भारत के लिए मानसून सिर्फ एक मौसम नहीं, बल्कि एक आर्थिक और सांस्कृतिक घटना है जो पूरे देश की कृषि, अर्थव्यवस्था और जीवन शैली को नियंत्रित करती है।
भारत में मानसूनी पवनों के दो मुख्य रूप देखने को मिलते हैं:
- दक्षिण-पश्चिम मानसून (ग्रीष्मकालीन मानसून)
- उत्तर-पूर्वी मानसून (शीतकालीन मानसून)
1. दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon): वर्षा का वाहक
यह भारत का मुख्य वर्षा ऋतु का मानसून है, जो देश की लगभग 80% वार्षिक वर्षा के लिए जिम्मेदार है।
- अवधि: जून से सितंबर तक।
- उत्पत्ति का कारण:
- भूमि का गर्म होना: गर्मियों में, भारतीय उपमहाद्वीप, विशेषकर थार मरुस्थल और तिब्बती पठार, अत्यधिक गर्म हो जाते हैं। इससे यहाँ एक शक्तिशाली निम्न वायुदाब (Low Pressure) का क्षेत्र बन जाता है।
- समुद्र का ठंडा रहना: इस समय, दक्षिण में स्थित हिंद महासागर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, जिससे वहाँ उच्च वायुदाब (High Pressure) का क्षेत्र बना रहता है।
- पवनों का प्रवाह: हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है। इसी नियम के अनुसार, हिंद महासागर से नमी से लदी हवाएँ भारतीय भू-भाग की ओर तेजी से आकर्षित होती हैं।
- भारत में प्रवेश:
- ये पवनें दक्षिणी गोलार्ध से आती हैं और भूमध्य रेखा को पार करते ही फेरल के नियम (Ferrel’s Law) के कारण दाहिनी ओर मुड़ जाती हैं।
- इनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर होने के कारण इन्हें दक्षिण-पश्चिम मानसून कहा जाता है।
- यह मानसून 1 जून के आसपास केरल के मालाबार तट पर पहुँचता है, जिसे “मानसून का प्रस्फोट या विस्फोट” (Monsoon Burst) कहते हैं।
- दो शाखाएँ:
प्रायद्वीपीय भारत की आकृति के कारण, यह मानसून दो शाखाओं में बँट जाता है:- अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch): यह एक शक्तिशाली शाखा है। यह पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तटीय मैदानों और महाराष्ट्र में भारी वर्षा करती है। इसके बाद यह गुजरात, राजस्थान और पश्चिमी हिमालय की ओर बढ़ती है।
- बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch): यह शाखा पूर्व की ओर बढ़ती है। यह म्यांमार की अराकान पहाड़ियों से टकराकर उत्तर की ओर मुड़ जाती है। यह मेघालय की गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों से टकराकर विश्व की सर्वाधिक वर्षा (मासिनराम में) करती है। इसके बाद यह हिमालय के समानांतर चलते हुए पश्चिम की ओर मुड़कर गंगा के मैदानों में वर्षा करती है।
2. उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon): मानसून का लौटना
यह शीतकालीन मानसून है, जब हवाओं की दिशा पूरी तरह उलट जाती है।
- अवधि: अक्टूबर से दिसंबर तक।
- उत्पत्ति का कारण:
- भूमि का ठंडा होना: सर्दियों में, सूर्य के दक्षिणी गोलार्ध में चले जाने से भारतीय भू-भाग, विशेषकर मध्य एशिया और तिब्बती पठार, बहुत ठंडे हो जाते हैं। इससे यहाँ उच्च वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है।
- समुद्र का गर्म रहना: इस समय, हिंद महासागर अपेक्षाकृत गर्म रहता है, जिससे वहाँ निम्न वायुदाब का क्षेत्र बना रहता है।
- पवनों का प्रवाह: अब हवा की दिशा उलट जाती है, और हवाएँ ठंडे भारतीय भू-भाग से गर्म हिंद महासागर की ओर चलने लगती हैं।
- प्रकृति और प्रभाव:
- इनकी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम होने के कारण इन्हें उत्तर-पूर्वी मानसून कहा जाता है।
- चूँकि ये पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, इसलिए ये शुष्क होती हैं और भारत के अधिकांश भागों में वर्षा नहीं करतीं। यह मुख्य रूप से एक शुष्क मौसम होता है, जिसमें आसमान साफ रहता है।
- अपवाद – कोरोमंडल तट पर वर्षा: जब ये शुष्क पवनें बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं। ये नमी युक्त पवनें जब तमिलनाडु, दक्षिणी आंध्र प्रदेश और दक्षिण-पूर्वी कर्नाटक के पूर्वी घाट से टकराती हैं, तो कोरोमंडल तट पर भारी शीतकालीन वर्षा करती हैं। यही कारण है कि चेन्नई में अधिकांश वर्षा सर्दियों में होती है। इसे “लौटता हुआ मानसून” (Retreating Monsoon) भी कहते हैं।
निष्कर्ष:
मानसूनी पवनें भारत की जलवायु प्रणाली की आत्मा हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून जहाँ पूरे देश को जल प्रदान कर कृषि को जीवन देता है, वहीं उत्तर-पूर्वी मानसून एक शुष्क और स्थिर मौसम लाता है, जो कुछ विशिष्ट क्षेत्रों के लिए वर्षा का स्रोत है। इन हवाओं का समय पर आना और सही मात्रा में बरसना भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए सर्वोपरि है।
1. पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव (मुख्यतः सकारात्मक)
पश्चिमी विक्षोभ एक शीतोष्ण चक्रवात है जो शीत ऋतु में भूमध्य सागर से उत्पन्न होता है और भारतीय उपमहाद्वीप में मौसम को प्रभावित करता है। इसके प्रभाव निम्नलिखित हैं:
- शीतकालीन वर्षा और कृषि के लिए वरदान:
- रबी की फसलें: इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव उत्तर-पश्चिमी मैदानी इलाकों (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में होने वाली हल्की से मध्यम शीतकालीन वर्षा है। यह वर्षा रबी की फसलों, विशेषकर गेहूँ, जौ और चने के लिए “अमृत” मानी जाती है क्योंकि यह फसलों के पकने के महत्वपूर्ण समय में सिंचाई प्रदान करती है।
- बागवानी: जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में सेब जैसी बागवानी फसलों के लिए भी यह वर्षा और हिमपात लाभदायक होता है।
- हिमपात और जल सुरक्षा:
- हिमनदों का पुनर्भरण: हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में भारी हिमपात (Snowfall) होता है। यह बर्फ सर्दियों में हिमनदों (ग्लेशियरों) पर जमा हो जाती है।
- सदानीरा नदियाँ: यही बर्फ गर्मियों में पिघलकर उत्तर भारत की प्रमुख सदानीरा नदियों (गंगा, यमुना, सिंधु और उनकी सहायक नदियों) को वर्ष भर जल प्रदान करती है, जिससे करोड़ों लोगों की पेयजल और सिंचाई की जरूरतें पूरी होती हैं।
- तापमान में परिवर्तन:
- अचानक गिरावट: विक्षोभ के आगमन से पहले, तापमान सामान्य से थोड़ा बढ़ जाता है, लेकिन इसके आने पर बादल छा जाते हैं और दिन के तापमान में गिरावट आती है। रातें अपेक्षाकृत गर्म हो जाती हैं।
- शीत लहर: विक्षोभ के गुजर जाने के बाद, आसमान साफ हो जाता है और बर्फीले हिमालय से ठंडी हवाएँ मैदानी इलाकों की ओर चलती हैं, जिससे शीत लहर (Cold Wave) और घने कोहरे की स्थिति बनती है।
- प्रदूषण में कमी:
- दिल्ली-एनसीआर जैसे अत्यधिक प्रदूषित शहरी क्षेत्रों में, पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली बारिश और हवाएँ प्रदूषक कणों (Pollutants) को हवा से साफ करने में मदद करती हैं, जिससे वायु गुणवत्ता में अस्थायी सुधार होता है।
संक्षेप में, पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत की पारिस्थितिकी, जल सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और अधिकांशतः लाभदायक है।
2. उष्णकटिबंधीय चक्रवात का प्रभाव (मुख्यतः नकारात्मक)
उष्णकटिबंधीय चक्रवात गर्म समुद्रों पर बनने वाले विनाशकारी तूफ़ान हैं जो भारत के तटीय क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। इसके प्रभाव विनाशकारी और दूरगामी होते हैं:
- जान-माल की व्यापक क्षति:
- तेज हवाएँ: 120 से 200 किमी/घंटा या उससे भी अधिक की गति से चलने वाली हवाएँ घरों, पेड़ों, बिजली के खंभों और संचार टावरों को उखाड़ फेंकती हैं, जिससे व्यापक विनाश होता है।
- मूसलाधार वर्षा: चक्रवातों के साथ बहुत कम समय में अत्यधिक भारी वर्षा (25-30 सेमी या अधिक) होती है, जिससे तटीय और निचले इलाकों में भीषण बाढ़ (Flash Floods) आ जाती है।
- तूफानी लहरें (Storm Surge): चक्रवात का सबसे विनाशकारी प्रभाव समुद्र के पानी का तट की ओर बढ़ना है, जिससे 5 से 10 मीटर ऊँची समुद्री लहरें उठती हैं। ये लहरें तटीय बस्तियों, कृषि भूमि और मैंग्रोव वनों को डुबो देती हैं।
- कृषि और आजीविका पर प्रभाव:
- खड़ी फसलें (जैसे धान) पूरी तरह से नष्ट हो जाती हैं।
- खेतों में समुद्री खारा पानी भर जाने से भूमि लवणीय (Saline) हो जाती है और कई वर्षों तक अनुपजाऊ बनी रह सकती है।
- मछुआरों की नावें और जाल नष्ट हो जाते हैं, जिससे उनकी आजीविका बुरी तरह प्रभावित होती है।
- पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर प्रभाव:
- तटीय पारिस्थितिकी तंत्र, विशेष रूप से मैंग्रोव वन और प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs), जो तटीय क्षेत्रों की रक्षा करते हैं, बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।
- वन्यजीवों के आवास नष्ट हो जाते हैं।
- अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव:
- आधारभूत ढाँचे (सड़कें, पुल, बिजली की लाइनें) को हुए नुकसान की मरम्मत में भारी लागत आती है, जिससे राज्य और केंद्र सरकारों पर वित्तीय बोझ पड़ता है।
- विस्थापन और पुनर्वास एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन जाती है।
अपवाद (सकारात्मक प्रभाव): चक्रवात अपने साथ भारी मात्रा में वर्षा लाते हैं, जिससे कभी-कभी सूखाग्रस्त क्षेत्रों के जलाशयों और भूजल स्तर को रिचार्ज करने में मदद मिलती है, लेकिन यह लाभ उनके द्वारा किए गए विनाश की तुलना में नगण्य होता है।
निष्कर्ष:
स्पष्ट है कि जहाँ पश्चिमी विक्षोभ भारतीय जलवायु में एक सौम्य और रचनात्मक भूमिका निभाता है, वहीं उष्णकटिबंधीय चक्रवात एक विनाशकारी और नकारात्मक शक्ति के रूप में कार्य करता है। एक जीवन देता है, तो दूसरा जीवन लेता है।
एल नीनो और भारतीय जलवायु: एक जटिल संबंध
एल नीनो (El Niño) एक जटिल और प्राकृतिक जलवायु घटना है जो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू तट के पास) में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी है। यह एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है “छोटा बालक” या “बालक ईसा”, क्योंकि यह अक्सर क्रिसमस के आसपास दिखाई देता है। यद्यपि यह घटना प्रशांत महासागर में होती है, इसका प्रभाव वॉकर परिसंचरण (Walker Circulation) के माध्यम से वैश्विक मौसम पैटर्न पर पड़ता है, और भारतीय मानसून पर इसका प्रभाव सबसे गहरा और अक्सर नकारात्मक होता है।
1. सामान्य परिस्थिति: वॉकर परिसंचरण (जब एल नीनो नहीं होता)
इसे समझे बिना एल नीनो के प्रभाव को समझना मुश्किल है। सामान्य वर्षों में:
- उच्च दाब: पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू तट) पर समुद्र का ठंडा पानी (अपवेलिंग के कारण) एक उच्च दाब (High Pressure) क्षेत्र बनाता है।
- निम्न दाब: पश्चिमी प्रशांत महासागर (इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया) पर गर्म पानी एक निम्न दाब (Low Pressure) क्षेत्र बनाता है।
- पवन प्रवाह: परिणामस्वरूप, शक्तिशाली व्यापारिक पवनें (Trade Winds) पूर्व से पश्चिम की ओर (पेरू से इंडोनेशिया की ओर) चलती हैं।
- भारत पर प्रभाव: यह प्रणाली भारतीय मानसून के लिए अनुकूल होती है क्योंकि यह भारतीय उपमहाद्वीप पर एक मजबूत निम्न दाब क्षेत्र को बनाए रखने में मदद करती है, जो मानसूनी हवाओं को आकर्षित करता है।
2. एल नीनो की परिस्थिति: वॉकर परिसंचरण का उलटना
एल नीनो वाले वर्षों में, यह सामान्य प्रणाली बाधित हो जाती है:
- व्यापारिक पवनों का कमजोर पड़ना: पूर्वी प्रशांत में व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ जाती हैं या कभी-कभी उलट जाती हैं।
- गर्म पानी का eastward प्रवाह: पश्चिमी प्रशांत का गर्म पानी पूर्व की ओर (पेरू की तरफ) प्रवाहित होने लगता है, जिससे पूर्वी प्रशांत महासागर असामान्य रूप से गर्म हो जाता है।
- दाब प्रणाली का उलटना: अब, गर्म पानी के कारण पूर्वी प्रशांत (पेरू) पर निम्न दाब और पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया) पर उच्च दाब बन जाता है। इस पूरी घटना को दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) कहते हैं। एल नीनो और दक्षिणी दोलन मिलकर ENSO कहलाते हैं।
3. भारतीय मानसून पर एल नीनो का प्रभाव
पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया) पर बना उच्च दाब क्षेत्र ही भारतीय मानसून के लिए सबसे बड़ी समस्या है। इसका प्रभाव इस प्रकार पड़ता है:
- उच्च दाब का विस्तार: यह उच्च दाब क्षेत्र पूर्व की ओर बढ़कर हिंद महासागर तक फैल जाता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप पर भी वायुदाब सामान्य से अधिक हो जाता है।
- मानसून द्रोणी (Trough) का कमजोर होना: भारत के मैदानी इलाकों में गर्मियों में बनने वाली मानसून द्रोणी (एक निम्न दाब का क्षेत्र) कमजोर पड़ जाती है। यह द्रोणी ही मानसूनी हवाओं को खींचने वाला मुख्य इंजन है।
- मानसून का कमजोर पड़ना: उच्च दाब और कमजोर द्रोणी के कारण हिंद महासागर से आने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें कमजोर पड़ जाती हैं।
- वर्षा में कमी और सूखा: कमजोर मानसून के कारण पूरे भारत में औसत से कम वर्षा होती है, जिससे व्यापक सूखे की स्थिति पैदा हो जाती है।
मुख्य प्रभाव (सारांश में):
- कमजोर मानसून: भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर हो जाता है।
- कम वर्षा: देश भर में वर्षा की मात्रा घट जाती है, जिससे जल संकट उत्पन्न होता है।
- सूखे की प्रबल संभावना: भारत में अधिकांश बड़े सूखे एल नीनो वर्षों से जुड़े हुए हैं (उदाहरण: 2002, 2009, 2015)।
- मानसून का देर से आगमन और जल्दी वापसी: मानसून के आने में देरी हो सकती है और उसकी वापसी जल्दी हो सकती है, जिससे फसलों के लिए वर्षा की कुल अवधि कम हो जाती है।
- उच्च तापमान: वर्षा की कमी और शुष्क मौसम के कारण गर्मियों और मानसून के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहता है।
4. भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
चूंकि भारतीय अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर निर्भर है, और कृषि मानसून पर, इसलिए एल नीनो के दूरगामी आर्थिक प्रभाव पड़ते हैं:
- कृषि उत्पादन में गिरावट: सूखे के कारण खरीफ फसलों (चावल, सोयाबीन, कपास, गन्ना) का उत्पादन घट जाता है।
- खाद्य मुद्रास्फीति: उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिससे महँगाई बढ़ती है।
- ग्रामीण मांग में कमी: किसानों की आय घटने से ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रैक्टर, FMCG उत्पाद और अन्य वस्तुओं की मांग घट जाती है।
- जलविद्युत उत्पादन में कमी: जलाशयों में पानी का स्तर गिरने से पनबिजली उत्पादन प्रभावित होता है।
महत्वपूर्ण अपवाद: इंडियन ओशन डायपोल (IOD)
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी एल नीनो वर्ष भारत में सूखे के वर्ष नहीं होते हैं।
- इंडियन ओशन डायपोल (IOD): यह हिंद महासागर की अपनी जलवायु घटना है। जब IOD सकारात्मक (Positive) होता है, तो अरब सागर (हिंद महासागर का पश्चिमी भाग) असामान्य रूप से गर्म हो जाता है।
- एल नीनो के प्रभाव को कम करना: एक मजबूत सकारात्मक IOD, एल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक बेअसर कर सकता है और भारत में सामान्य या सामान्य के करीब वर्षा लाने में मदद कर सकता है (उदाहरण: 1997)।
निष्कर्ष: एल नीनो भारतीय मानसून के लिए एक बड़ी नकारात्मक शक्ति है, जो अक्सर देश में सूखे और आर्थिक कठिनाइयों का कारण बनती है। हालाँकि, IOD जैसे अन्य क्षेत्रीय कारक कभी-कभी इसके प्रभाव को संशोधित कर सकते हैं, जिससे यह संबंध 100% निश्चित नहीं रहता।
दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation): भारतीय मानसून का वैश्विक नियंत्रक
दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) एक बड़े पैमाने वाली, आवधिक वायुमंडलीय घटना है, जिसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर (Tropical Pacific Ocean) के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के बीच सतही वायुदाब (Surface Air Pressure) में एक “उलटफेर” या “उतार-चढ़ाव” (See-Saw Pattern) देखने को मिलता है। इसकी खोज 20वीं सदी की शुरुआत में सर गिल्बर्ट वॉकर ने की थी, जब वह भारतीय मानसून की भविष्यवाणी करने के तरीकों का अध्ययन कर रहे थे।
यह भारतीय मानसून के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि इसे मानसून की तीव्रता का एक प्रमुख वैश्विक संकेतक माना जाता है।
दक्षिणी दोलन की दो अवस्थाएँ (Phases)
यह “उतार-चढ़ाव” दो मुख्य अवस्थाओं में होता है:
1. सकारात्मक अवस्था (Positive Phase) – ला नीना की स्थिति (La Niña Conditions)
- क्या होता है? इस अवस्था में, पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू और इक्वाडोर तट के पास) पर उच्च वायुदाब (High Pressure) होता है। इसके विपरीत, पश्चिमी प्रशांत महासागर (इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के पास) पर निम्न वायुदाब (Low Pressure) होता है।
- परिणाम: यह दाब-अंतर व्यापारिक पवनों (Trade Winds) को बहुत मजबूत बना देता है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं।
- भारतीय मानसून पर प्रभाव (सकारात्मक): पश्चिमी प्रशांत में बना यह मजबूत निम्न दाब क्षेत्र, भारतीय उपमहाद्वीप पर बनने वाले मानसूनी निम्न दाब क्षेत्र (Monsoon Trough) को और अधिक शक्तिशाली बना देता है। यह एक सहायक प्रणाली की तरह काम करता है, जो हिंद महासागर से आने वाली मानसूनी पवनों को और अधिक बल के साथ खींचता है।
- 결 luận: इसके परिणामस्वरूप भारतीय मानसून मजबूत होता है और भारत में औसत से अधिक या सामान्य वर्षा होने की प्रबल संभावना होती है।
2. नकारात्मक अवस्था (Negative Phase) – एल नीनो की स्थिति (El Niño Conditions)
- क्या होता है? इस अवस्था में, पूरी दाब प्रणाली उलट जाती है। पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू तट) पर निम्न वायुदाब (Low Pressure) स्थापित हो जाता है। इसके विपरीत, पश्चिमी प्रशांत महासागर (इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया) पर उच्च वायुदाब (High Pressure) बन जाता है।
- परिणाम: इस उलटफेर के कारण व्यापारिक पवनें बहुत कमजोर पड़ जाती हैं या कभी-कभी उनकी दिशा भी उलट जाती है।
- भारतीय मानसून पर प्रभाव (नकारात्मक): पश्चिमी प्रशांत में बना यह उच्च दाब क्षेत्र भारतीय मानसून के लिए सबसे बड़ी बाधा है। यह पूर्व की ओर फैलकर भारतीय उपमहाद्वीप पर भी वायुदाब को बढ़ा देता है। यह भारत के मानसूनी निम्न दाब क्षेत्र को कमजोर कर देता है।
- 결 luận: कमजोर निम्न दाब के कारण हिंद महासागर से आने वाली मानसूनी पवनें कमजोर पड़ जाती हैं। परिणामस्वरूप भारतीय मानसून कमजोर होता है, जिससे भारत में औसत से कम वर्षा और सूखे की स्थिति उत्पन्न होने की प्रबल आशंका रहती है।
ENSO: दोनों घटनाओं का संयुक्त रूप
वैज्ञानिकों ने पाया कि महासागरीय घटना एल नीनो (समुद्र का गर्म होना) और वायुमंडलीय घटना दक्षिणी दोलन (वायुदाब का उलटफेर) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक साथ घटित होते हैं। इसलिए, इस संयुक्त घटना को ENSO (El Niño-Southern Oscillation) कहा जाता है।
- El Niño = महासागर का गर्म होना (Oceanic Component)
- Southern Oscillation = वायुदाब में उतार-चढ़ाव (Atmospheric Component)
सारांश तालिका: दक्षिणी दोलन का भारतीय मानसून पर प्रभाव
| पैरामीटर | सकारात्मक अवस्था (Positive Phase) | नकारात्मक अवस्था (Negative Phase) |
| प्रशांत महासागर की स्थिति | ला नीना (La Niña) जैसी स्थिति | एल नीनो (El Niño) जैसी स्थिति |
| पूर्वी प्रशांत में वायुदाब | उच्च (High) | निम्न (Low) |
| पश्चिमी प्रशांत में वायुदाब | निम्न (Low) | उच्च (High) |
| व्यापारिक पवनें (Trade Winds) | मजबूत (Strong) | कमजोर या उलटी (Weak or Reversed) |
| वॉकर परिसंचरण | मजबूत (Intensified) | कमजोर या टूटा हुआ (Weakened or Broken) |
| भारतीय मानसून पर प्रभाव | सकारात्मक (Positive) – मानसून को शक्ति मिलती है | नकारात्मक (Negative) – मानसून कमजोर होता है |
| भारत में वर्षा की संभावना | सामान्य से अधिक वर्षा (बाढ़ की संभावना) | सामान्य से कम वर्षा (सूखे की संभावना) |
निष्कर्ष: दक्षिणी दोलन एक वैश्विक वायुदाब का पैमाना है जो सीधे तौर पर भारतीय मानसून की ताकत को नियंत्रित करता है। इसकी नकारात्मक अवस्था (जब पश्चिमी प्रशांत में उच्च दाब हो) भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चेतावनी होती है क्योंकि यह अक्सर मानसून की विफलता और सूखे से जुड़ी होती है।
भारतीय मानसून की उत्पत्ति: प्रमुख सिद्धांत
भारतीय मानसून एक अत्यंत जटिल वायुमंडलीय घटना है, जिसकी उत्पत्ति की व्याख्या करने के लिए समय के साथ विभिन्न सिद्धांत विकसित हुए हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- चिरसम्मत या तापीय सिद्धांत (Classical or Thermal Concept)
- आधुनिक या गतिक सिद्धांत (Modern or Dynamic Concept)
1. मानसून की उत्पत्ति का तापीय सिद्धांत (The Thermal Concept)
यह मानसून की उत्पत्ति का सबसे पुराना और सरल सिद्धांत है, जिसे 17वीं सदी में एडमंड हैली ने प्रतिपादित किया था। यह सिद्धांत पूरी तरह से जल और स्थल के विभेदी तापन (Differential Heating of Land and Sea) पर आधारित है। इसे एक वृहत पैमाने पर “स्थल समीर और समुद्र समीर” का ही रूप माना जाता है।
A) ग्रीष्मकालीन मानसून (दक्षिण-पश्चिम मानसून) की उत्पत्ति:
- स्थल का गर्म होना: ग्रीष्म ऋतु में, सूर्य के कर्क रेखा पर लंबवत होने के कारण, भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य एशिया का विशाल भू-भाग बहुत तेजी से गर्म हो जाता है।
- निम्न दाब का निर्माण: अत्यधिक गर्मी के कारण, इस भू-भाग पर एक शक्तिशाली निम्न वायुदाब (Low-Pressure) क्षेत्र बन जाता है।
- समुद्र का ठंडा रहना: इसकी तुलना में, दक्षिण में स्थित हिंद महासागर धीमी गति से गर्म होने के कारण अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, जिससे यहाँ उच्च वायुदाब (High-Pressure) क्षेत्र बना रहता है।
- पवनों का प्रवाह: हवाएँ हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती हैं। इस दाब-अंतर के कारण, हिंद महासागर से नमी से भरपूर हवाएँ (दक्षिण-पश्चिम मानसून) भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आकर्षित होती हैं और व्यापक वर्षा करती हैं।
B) शीतकालीन मानसून (उत्तर-पूर्वी मानसून) की उत्पत्ति:
- स्थल का ठंडा होना: शीत ऋतु में, स्थिति पूरी तरह उलट जाती है। भारतीय भू-भाग और मध्य एशिया अपनी ऊष्मा खोकर बहुत ठंडे हो जाते हैं, जिससे यहाँ एक उच्च वायुदाब क्षेत्र बन जाता है।
- समुद्र का गर्म रहना: इसकी तुलना में, हिंद महासागर अपेक्षाकृत गर्म रहता है, जिससे वहाँ निम्न वायुदाब क्षेत्र बना रहता है।
- पवनों का प्रवाह: अब हवाएँ स्थल के उच्च दाब क्षेत्र से समुद्र के निम्न दाब क्षेत्र की ओर चलने लगती हैं। चूँकि ये पवनें स्थल से आती हैं, इसलिए ये शुष्क होती हैं और वर्षा नहीं करतीं।
सीमाएँ: यह सिद्धांत मानसून की एक आधारभूत समझ तो देता है, लेकिन यह मानसून के “प्रस्फोट” (Burst), मानसून में आने वाले “विच्छेद” (Break) और इसकी जटिल प्रकृति की व्याख्या करने में असमर्थ है।
2. मानसून की उत्पत्ति का आधुनिक/गतिक सिद्धांत (The Modern/Dynamic Concept)
20वीं सदी में ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण की खोज के बाद, यह स्पष्ट हो गया कि मानसून केवल सतही तापन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक और अधिक जटिल वायुमंडलीय प्रक्रिया है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
A) तिब्बती पठार और हिमालय की भूमिका:
- ऊष्मा का स्रोत (Elevated Heat Source): गर्मियों में, विशाल और ऊँचा तिब्बती पठार बहुत गर्म हो जाता है। यह एक “ऊँचे हीटर” की तरह काम करता है, जो न केवल सतह पर, बल्कि ऊपरी वायुमंडल में भी एक शक्तिशाली ऊष्मीय निम्न दाब (Thermal Low) का निर्माण करता है। यह निम्न दाब मानसूनी हवाओं को बहुत तीव्रता से अपनी ओर खींचता है।
B) जेट स्ट्रीम की भूमिका:
- उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Westerly Jet Stream): सर्दियों में यह जेट स्ट्रीम हिमालय के दक्षिण में बहती है और मानसून के आगमन में बाधा डालती है। गर्मियों में, तिब्बती पठार के गर्म होने से यह जेट स्ट्रीम अचानक उत्तर की ओर (हिमालय के पार) खिसक जाती है। इसका उत्तर की ओर हटना ही मानसून के “प्रस्फोट” (Burst of Monsoon) के लिए एक ‘ग्रीन सिग्नल’ की तरह काम करता है।
- उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Easterly Jet Stream): पश्चिमी जेट स्ट्रीम के उत्तर की ओर खिसकने के बाद, तिब्बती पठार की गर्मी से एक पूर्वी जेट स्ट्रीम विकसित होती है। यह भारत के ऊपर से बहती है और भारतीय मानसून को और अधिक शक्तिशाली बनाती है तथा बंगाल की खाड़ी में बनने वाले अवदाबों को पश्चिम की ओर धकेलकर मैदानी इलाकों में वर्षा कराती है।
C) ENSO (एल नीनो और दक्षिणी दोलन) का प्रभाव:
- दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation): यह प्रशांत महासागर के पूर्वी और पश्चिमी भागों के बीच वायुदाब का एक उतार-चढ़ाव है।
- एल नीनो (El Niño): यह दक्षिणी दोलन की नकारात्मक अवस्था है। इस दौरान, पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया) पर उच्च दाब और पूर्वी प्रशांत (पेरू) पर निम्न दाब बन जाता है। पश्चिमी प्रशांत का उच्च दाब भारतीय मानसून को कमजोर करता है, जिससे अक्सर सूखे की स्थिति पैदा होती है।
- ला नीना (La Niña): यह दक्षिणी दोलन की सकारात्मक अवस्था है। इस दौरान, पश्चिमी प्रशांत पर निम्न दाब और मजबूत हो जाता है, जो भारतीय मानसून को सशक्त करता है और अक्सर अच्छी वर्षा या बाढ़ का कारण बनता है।
D) हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD):
- यह हिंद महासागर की अपनी जलवायु घटना है। जब IOD सकारात्मक होता है (अरब सागर गर्म), तो यह एल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कम करके भारतीय मानसून के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बना सकता है।
निष्कर्ष:
आधुनिक सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि भारतीय मानसून केवल स्थल और जल के तापन का परिणाम न होकर, ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण (जेट स्ट्रीम), वैश्विक घटनाओं (ENSO), और क्षेत्रीय कारकों (तिब्बती पठार, IOD) के बीच एक जटिल अंतःक्रिया का परिणाम है। तापीय सिद्धांत आधार प्रदान करता है, जबकि गतिक सिद्धांत मानसून की जटिलता और तीव्रता की विस्तृत व्याख्या करता है।
II. भारत की प्रमुख ऋतुएँ (The Four Seasons of India)
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, भारत में मुख्य रूप से चार ऋतुएँ होती हैं:
| ऋतु (Season) | अवधि (Period) | प्रमुख विशेषताएँ |
| 1. शीत ऋतु (Winter) | दिसंबर से फरवरी | हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। आकाश साफ और तापमान कम रहता है। पश्चिमी विक्षोभ के कारण उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा होती है, जो रबी की फसलों (गेहूँ) के लिए लाभदायक है। |
| 2. ग्रीष्म ऋतु (Summer) | मार्च से मई | तापमान तेजी से बढ़ता है और उत्तर भारत में ‘लू’ नामक गर्म हवाएँ चलती हैं। मानसून-पूर्व बौछारें पड़ती हैं, जिन्हें ‘काल बैशाखी’ (बंगाल) और ‘आम्र वर्षा’ (केरल) कहा जाता है। |
| 3. वर्षा ऋतु (Rainy Season) | जून से सितंबर | दक्षिण-पश्चिम मानसून का आगमन होता है। यह दो शाखाओं में बँटता है: अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी शाखा। देश की लगभग 80% वर्षा इसी ऋतु में होती है। |
| 4. शरद ऋतु (Autumn) | अक्टूबर से नवंबर | मानसून की वापसी होती है। आकाश साफ हो जाता है, लेकिन उत्तर भारत में ‘अक्टूबर की गर्मी’ महसूस होती है। इस समय उत्तर-पूर्वी मानसून से तमिलनाडु के तट पर भारी वर्षा होती है। |
भारत में शीत ऋतु (The Winter Season)
भारत में शीत ऋतु मध्य नवंबर से शुरू होकर फरवरी तक रहती है, जिसमें दिसंबर और जनवरी सबसे ठंडे महीने होते हैं। यह मौसम साफ आसमान, सुखद धूप, कम तापमान और कम आर्द्रता के लिए जाना जाता है। हालांकि, भारत की विशालता के कारण, इस ऋतु का अनुभव देश के विभिन्न हिस्सों में बहुत अलग-अलग होता है।
I. शीत ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ
- तापमान:
- उत्तर भारत: दक्षिण से उत्तर की ओर तापमान घटता जाता है। गंगा के मैदानों में औसत तापमान 10°C से 15°C के बीच रहता है, जबकि रात में यह हिमांक के करीब पहुँच सकता है।
- प्रायद्वीपीय भारत: समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण, प्रायद्वीपीय भारत में कोई स्पष्ट या कठोर शीत ऋतु नहीं होती है। तापमान 20°C से 25°C के बीच बना रहता है। यहाँ तापमान में बहुत कम गिरावट देखी जाती है।
- वायुदाब और पवनें:
- उच्च दाब का क्षेत्र: इस समय सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप ठंडा हो जाता है। ठंडी और भारी हवा के कारण उत्तर-पश्चिम भारत पर एक उच्च वायुदाब (High Pressure) का क्षेत्र विकसित हो जाता है।
- पवनों की दिशा: हवाएँ इस उच्च दाब क्षेत्र से दक्षिण में स्थित निम्न दाब वाले समुद्री क्षेत्रों की ओर बहती हैं। इन पवनों की दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है, इसलिए इन्हें उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon) कहा जाता है।
- पवनों की प्रकृति: चूँकि ये पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, इसलिए ये ठंडी और शुष्क होती हैं और देश के अधिकांश हिस्सों में वर्षा नहीं करतीं।
II. शीत ऋतु की प्रमुख मौसम घटनाएँ
- पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances):
- उत्पत्ति: यह शीत ऋतु की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। ये भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में उत्पन्न होने वाले शीतोष्ण चक्रवात हैं, जिन्हें पश्चिमी जेट स्ट्रीम पूर्व की ओर बहाकर भारत तक लाती है।
- प्रभाव क्षेत्र: ये मुख्य रूप से उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत को प्रभावित करते हैं।
- वर्षा और हिमपात:
- मैदानी इलाकों में वर्षा: इनके कारण पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हल्की से मध्यम शीतकालीन वर्षा होती है, जो रबी की फसलों (विशेषकर गेहूँ) के लिए “अमृत” मानी जाती है।
- पहाड़ों पर हिमपात: हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड) में भारी हिमपात (Snowfall) होता है। यह हिमपात गर्मियों में पिघलकर उत्तर भारत की नदियों को जल प्रदान करता है।
- शीत लहर और पाला (Cold Wave and Frost):
- पश्चिमी विक्षोभ के गुजर जाने के बाद, जब आसमान साफ हो जाता है, तो बर्फीले हिमालय से ठंडी हवाएँ मैदानी इलाकों की ओर चलती हैं, जिससे तापमान में भारी गिरावट आती है और शीत लहर की स्थिति उत्पन्न होती है।
- रात में तापमान के हिमांक बिंदु से नीचे चले जाने पर पाला (Frost) पड़ता है, जो फसलों के लिए हानिकारक हो सकता है।
- कोहरा (Fog):
- शांत हवाओं और भूमि की सतह के पास नमी के कारण उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, विशेषकर सिंधु-गंगा के मैदानों में, घना कोहरा छा जाता है। यह हवाई, रेल और सड़क यातायात को बुरी तरह प्रभावित करता है।
- उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा वर्षा:
- उत्तर-पूर्वी मानसून की पवनें जब बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं।
- ये नमी युक्त पवनें जब तमिलनाडु के तट से टकराती हैं, तो कोरोमंडल तट (तमिलनाडु, दक्षिणी आंध्र प्रदेश) पर भारी शीतकालीन वर्षा करती हैं। चेन्नई की अधिकांश वार्षिक वर्षा इसी मौसम में होती है।
📋 सारांश तालिका: शीत ऋतु का क्षेत्रीय प्रभाव
| क्षेत्र | तापमान | मौसम की घटनाएँ | प्रभाव |
| उत्तर भारत का मैदान | ठंडा (रातें बहुत ठंडी) | पश्चिमी विक्षोभ से वर्षा, शीत लहर, पाला, घना कोहरा | रबी की फसलों के लिए वर्षा लाभदायक, पाला हानिकारक, यातायात बाधित |
| हिमालयी क्षेत्र | बहुत ठंडा (हिमांक से नीचे) | भारी हिमपात, पश्चिमी विक्षोभ का सीधा प्रभाव | पर्यटन को बढ़ावा, गर्मियों के लिए जल संचयन, जनजीवन बाधित |
| प्रायद्वीपीय भारत | हल्का ठंडा / सुखद | कोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं, मौसम शुष्क | पर्यटन और बाहरी गतिविधियों के लिए उत्तम समय |
| तमिलनाडु तट (कोरोमंडल) | हल्का ठंडा और आर्द्र | उत्तर-पूर्वी मानसून से भारी वर्षा | राज्य की जल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण, कभी-कभी बाढ़ का कारण |
निष्कर्ष:
भारत में शीत ऋतु एक शांत और शुष्क मौसम है, लेकिन यह क्षेत्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण मौसम घटनाओं जैसे कि पश्चिमी विक्षोभ और उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा चिह्नित है, जो देश के कृषि और जल संसाधनों पर गहरा प्रभाव डालते हैं
भारत में ग्रीष्म ऋतु (The Summer Season)
भारत में ग्रीष्म ऋतु का आगमन मार्च में सूर्य के उत्तरायण (सूर्य का कर्क रेखा की ओर बढ़ना) होने के साथ होता है और यह मध्य जून तक रहता है। यह मौसम अत्यधिक तापमान, निम्न वायुदाब और स्थानीय तूफानों के लिए जाना जाता है। यह एक संक्रमण काल है जो शीत ऋतु की समाप्ति और जीवनदायिनी वर्षा ऋतु के आगमन की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
I. ग्रीष्म ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ
- तापमान:
- तापमान में वृद्धि: सूर्य के उत्तरायण होने के साथ-_साथ, पूरे देश में तापमान तेजी से बढ़ने लगता है।
- उच्चतम तापमान: मई का महीना सबसे गर्म होता है, विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों में, जहाँ तापमान 45°C से 48°C तक पहुँच जाता है। राजस्थान का थार मरुस्थल अत्यधिक गर्म हो जाता है।
- दक्षिण भारत में प्रभाव: समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण, प्रायद्वीपीय भारत में उत्तर भारत जैसी भीषण गर्मी नहीं पड़ती है। यहाँ का तापमान अपेक्षाकृत कम (30°C से 35°C) और स्थिर रहता है।
- वायुदाब और पवनें:
- निम्न दाब का क्षेत्र: अत्यधिक गर्मी के कारण, भारतीय उपमहाद्वीप पर, विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत में, एक शक्तिशाली निम्न वायुदाब का क्षेत्र (Low-Pressure Area) विकसित हो जाता है।
- मानसून द्रोणी: यह निम्न दाब क्षेत्र एक लम्बी द्रोणी (Trough) का रूप ले लेता है, जो पूर्व में छोटानागपुर पठार से लेकर पश्चिम में थार मरुस्थल तक फैली होती है। यही द्रोणी आगे चलकर मानसूनी पवनों को आकर्षित करने का मुख्य केंद्र बनती है।
- पवनों की प्रकृति: इस मौसम में धरातलीय पवनें हल्की और परिवर्तनशील होती हैं, लेकिन उत्तर भारत के मैदानों में गर्म और शुष्क पवनें ‘लू’ चलती हैं।
II. मानसून-पूर्व की बौछारें और स्थानीय तूफान
ग्रीष्म ऋतु के अंत में (अप्रैल-मई में), भारत के विभिन्न हिस्सों में संवहनीय क्रियाओं (Convectional activities) के कारण गरज और तेज हवाओं के साथ कुछ वर्षा होती है। इन बौछारों के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नाम हैं, जो परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- आम्र वर्षा (Mango Showers):
- क्षेत्र: केरल और कर्नाटक के तटीय क्षेत्र।
- प्रभाव: यह वर्षा आम की फसल के लिए बहुत लाभदायक होती है क्योंकि यह आमों को जल्दी पकने में मदद करती है। इसी कारण इसे आम्र वर्षा कहते हैं।
- फूलों वाली बौछार (Blossom Showers):
- क्षेत्र: केरल और आसपास के क्षेत्र।
- प्रभाव: यह वर्षा कहवा (कॉफी) के फूलों के खिलने में मदद करती है, इसलिए इसे फूलों वाली बौछार के नाम से जाना जाता है।
- काल बैशाखी (Kaal Baisakhi) / नॉर’वेस्टर्स (Nor’westers):
- क्षेत्र: पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड, ओडिशा।
- प्रभाव: यह एक तीव्र और विनाशकारी प्रकृति का तूफान है, जिसमें तेज हवाएँ, मूसलाधार वर्षा और ओलावृष्टि होती है। ‘काल’ का अर्थ है ‘विनाश’, जो बैशाख के महीने में आता है। हालाँकि यह विनाशकारी होता है, लेकिन यह चाय (असम में), जूट और चावल (पश्चिम बंगाल में) की खेती के लिए बहुत लाभदायक भी है।
- लू (Loo):
- क्षेत्र: उत्तरी मैदान (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार)।
- प्रभाव: यह एक गर्म, शुष्क और पीड़ादायक पवन है जो दोपहर के समय चलती है। इसके संपर्क में आने से हीटस्ट्रोक (ऊष्माघात) का खतरा रहता है।
सारांश तालिका: ग्रीष्म ऋतु का क्षेत्रीय प्रभाव
| क्षेत्र | तापमान | प्रमुख मौसमी घटनाएँ | प्रभाव |
| उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत | अत्यधिक गर्म (45°C+) | लू, धूल भरी आँधियाँ, निम्न दाब का केंद्र। | भीषण गर्मी, जनजीवन प्रभावित, मानसून को आकर्षित करने वाली प्रणाली का निर्माण। |
| पूर्वी भारत | गर्म और आर्द्र | काल बैशाखी (तीव्र तूफान)। | जान-माल की हानि, लेकिन चाय, जूट और चावल की फसल के लिए लाभदायक। |
| दक्षिणी भारत (तटीय) | गर्म (कम चरम) | आम्र वर्षा, फूलों वाली बौछार। | आम और कॉफी की फसलों के लिए अत्यधिक लाभदायक। |
| प्रायद्वीपीय पठार | गर्म (समुद्र से दूरी के कारण अधिक) | हल्की संवहनीय वर्षा। | गर्मी से थोड़ी राहत। |
निष्कर्ष:
भारत में ग्रीष्म ऋतु एक कठोर और शुष्क मौसम है, लेकिन यह केवल गर्मी और परेशानी का समय नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल है। इसी मौसम में बना तीव्र निम्न दाब का क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून को भारत की ओर खींचने के लिए एक शक्तिशाली “चुंबक” के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार, यह भीषण गर्मी ही आगामी जीवनदायिनी वर्षा ऋतु की पृष्ठभूमि तैयार करती है।
भारत में वर्षा ऋतु (The Rainy Season): दक्षिण-पश्चिम मानसून का आगमन
वर्षा ऋतु, जिसे दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम के रूप में भी जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे महत्वपूर्ण ऋतु है। यह जून की शुरुआत से मध्य सितंबर तक रहता है और भारत की लगभग 80% वार्षिक वर्षा इसी दौरान होती है। यह ऋतु देश की कृषि, अर्थव्यवस्था, जल सुरक्षा और पारिस्थितिकी के लिए जीवनदायिनी है।
I. वर्षा ऋतु की उत्पत्ति और आगमन
- उत्पत्ति का कारण:
- तीव्र निम्न दाब: ग्रीष्म ऋतु के दौरान, उत्तर-पश्चिम भारत और तिब्बती पठार पर बने तीव्र निम्न वायुदाब क्षेत्र के कारण।
- उच्च दाब: हिंद महासागर के अपेक्षाकृत ठंडे होने से वहाँ बने उच्च वायुदाब क्षेत्र के कारण।
- जेट स्ट्रीम का खिसकना: पश्चिमी जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर खिसकना और पूर्वी जेट स्ट्रीम का विकसित होना, जो मानसून को और शक्तिशाली बनाता है।
- मानसून का आगमन (Onset of Monsoon):
- इस शक्तिशाली दाब-प्रवणता के कारण, हिंद महासागर से नमी से भरपूर हवाएँ (दक्षिण-पश्चिम मानसून) भारतीय भू-भाग की ओर आकर्षित होती हैं।
- 1 जून के आसपास यह मानसून केरल के मालाबार तट पर पहुँचता है। इस पहली भारी वर्षा को “मानसून का प्रस्फोट या विस्फोट” (Monsoon Burst) कहा जाता है।
- दो शाखाओं में विभाजन:
प्रायद्वीपीय भारत की नोक पर पहुँचने के बाद, यह मानसून दो मुख्य शाखाओं में बँट जाता है:- अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch)
- बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch)
II. मानसून की दोनों शाखाओं का प्रभाव
| अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch) | बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch) |
| गति और शक्ति: यह अधिक शक्तिशाली होती है और बंगाल की खाड़ी की शाखा की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक नमी लाती है। | गति: यह धीमी गति से आगे बढ़ती है। |
| प्रथम प्रभाव: पश्चिमी घाट से टकराकर उसके पश्चिमी ढलानों पर भारी पर्वतीय वर्षा (250 सेमी से अधिक) करती है (जैसे मुंबई, गोवा)। | प्रथम प्रभाव: सीधे उत्तर की ओर बढ़ती है और म्यांमार की अराकान पहाड़ियों से टकराकर उत्तर-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। |
| अन्य क्षेत्रों में प्रभाव: एक शाखा गुजरात और राजस्थान से होकर गुजरती है, लेकिन अरावली पर्वत के समानांतर होने के कारण वहाँ बहुत कम वर्षा करती है। दूसरी शाखा मध्य भारत में वर्षा करती है। | उत्तर-पूर्व में प्रभाव: मेघालय की गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों से टकराकर यह विश्व की सर्वाधिक वर्षा करती है (मासिनराम और चेरापूँजी में)। |
| गंगा के मैदानों में प्रभाव: हिमालय के समानांतर चलते हुए यह पश्चिम की ओर बढ़ती है और गंगा के मैदानों में वर्षा करती है। जैसे-जैसे यह पश्चिम की ओर बढ़ती है, इसकी नमी कम होती जाती है, जिससे वर्षा की मात्रा भी घटती जाती है। | |
| विलय: पंजाब के मैदानों के पास जाकर यह अरब सागर की शाखा के साथ विलीन हो जाती है। | विलय: दिल्ली और पंजाब के पास यह अरब सागर की शाखा से मिल जाती है। |
III. वर्षा ऋतु की अन्य महत्वपूर्ण विशेषताएँ
- वर्षा में विच्छेद (Break in Monsoon):
- वर्षा ऋतु के दौरान ऐसा कई बार होता है जब कुछ दिनों या हफ्तों तक वर्षा नहीं होती। इस शुष्क दौर को “मानसून का विच्छेद” कहा जाता है।
- कारण: इसका मुख्य कारण मानसून द्रोणी (Monsoon Trough) का हिमालय की तलहटी की ओर खिसक जाना है। जब ऐसा होता है, तो मैदानों में वर्षा बंद हो जाती है और हिमालयी क्षेत्रों तथा उसके जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है।
- मानसूनी गर्त/द्रोणी (Monsoon Trough):
- यह निम्न दाब की एक लम्बी पट्टी होती है जो उत्तर-पश्चिम भारत (थार मरुस्थल) से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली होती है। मानसूनी वर्षा इसी द्रोणी की स्थिति पर निर्भर करती है।
- उष्णकटिबंधीय अवदाब (Tropical Depressions):
- बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले ये निम्न दाब के केंद्र मानसून की तीव्रता को बढ़ाते हैं और भारत के मुख्य भू-भाग पर वर्षा के वितरण को निर्धारित करते हैं।
निष्कर्ष
वर्षा ऋतु भारत के लिए केवल एक मौसम नहीं, बल्कि एक वार्षिक उत्सव और आर्थिक अनिवार्यता है। यह देश के जलाशयों को भरती है, भूजल को रिचार्ज करती है, और करोड़ों किसानों की खरीफ फसलों (चावल, कपास, सोयाबीन) को जीवन देती है। हालाँकि, इसकी अनिश्चितता, जैसे देर से आगमन, जल्दी वापसी या लंबा विच्छेद, अक्सर बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं का कारण भी बनती है। इसीलिए भारतीय मानसून को अक्सर “एक जुआ” (A Gamble) कहा जाता है।
भारत में शरद ऋतु (The Autumn Season): मानसून का निवर्तन (Retreating Monsoon)
भारत में शरद ऋतु, जिसे “मानसून की वापसी” या “लौटते हुए मानसून” (Retreating Monsoon) के मौसम के रूप में भी जाना जाता है, एक संक्रमणकालीन ऋतु है जो वर्षा ऋतु के अंत और शीत ऋतु के आगमन के बीच आती है। इसका समय मध्य सितंबर से नवंबर तक होता है। यह ऋतु साफ आसमान और दिन के समय हल्के बढ़े हुए तापमान के लिए जानी जाती है, लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू हवाओं की दिशा का उलटना और कोरोमंडल तट पर होने वाली वर्षा है।
I. शरद ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ
- मानसून की वापसी (Retreat of Monsoon):
- कारण: सितंबर के अंत तक, सूर्य दक्षिण की ओर (दक्षिणी गोलार्ध में) जाने लगता है। इसके कारण, भारतीय उपमहाद्वीप का तापमान कम होने लगता है और उत्तर-पश्चिम भारत में बना शक्तिशाली निम्न दाब क्षेत्र कमजोर पड़ने लगता है।
- उच्च दाब का निर्माण: इसकी जगह धीरे-धीरे एक उच्च दाब प्रणाली (High-Pressure System) विकसित होने लगती है।
- पवनों का उलटना: अब दाब प्रवणता उलट जाती है। दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें कमजोर पड़ जाती हैं और स्थल से समुद्र की ओर शुष्क और ठंडी उत्तर-पूर्वी पवनें बहने लगती हैं।
- क्रमिक वापसी: मानसून की वापसी एक क्रमिक प्रक्रिया है। यह सितंबर की शुरुआत में राजस्थान से शुरू होती है, मध्य अक्टूबर तक यह पूरे उत्तरी भारत से लौट चुकी होती है, और नवंबर के अंत तक यह पूरे देश से वापस चली जाती है।
- साफ आकाश और तापमान में वृद्धि:
- स्पष्ट मौसम: मानसून की वापसी के साथ, बादल छँट जाते हैं और आकाश पूरी तरह से साफ हो जाता है।
- तापमान में वृद्धि: साफ आकाश के कारण दिन में सौर विकिरण अधिक प्राप्त होता है, और भूमि में अभी भी वर्षा ऋतु की नमी मौजूद होती है। इस उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता के संयोजन से एक उमस भरी और असहनीय गर्मी का मौसम बनता है, जिसे “अक्टूबर की गर्मी” (October Heat) या ‘क्वार की उमस’ के नाम से जाना जाता है।
II. उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा वर्षा
यह शरद ऋतु की सबसे महत्वपूर्ण मौसम घटना है।
- उत्पत्ति: जब शुष्क और ठंडी उत्तर-पूर्वी पवनें स्थल से समुद्र की ओर लौटती हैं, तो वे बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरते समय भारी मात्रा में नमी ग्रहण कर लेती हैं।
- वर्षा का क्षेत्र: ये नमी युक्त पवनें जब भारत के दक्षिण-पूर्वी तट, विशेष रूप से पूर्वी घाट की पहाड़ियों से टकराती हैं, तो कोरोमंडल तट पर भारी वर्षा करती हैं।
- प्रमुख प्रभावित राज्य:
- तमिलनाडु: यह राज्य अपनी अधिकांश वार्षिक वर्षा इसी ऋतु में प्राप्त करता है। चेन्नई और अन्य तटीय क्षेत्रों में भारी वर्षा और कभी-कभी बाढ़ भी आती है।
- आंध्र प्रदेश (दक्षिणी तट)
- कर्नाटक (दक्षिण-पूर्वी भाग)
- केरल (दक्षिणी भाग)
- उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का समय: यह मौसम बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के बनने के लिए भी सबसे अनुकूल होता है। ये चक्रवात अक्सर पूर्वी तट पर भारी वर्षा, तेज हवाओं और विनाश का कारण बनते हैं।
सारांश तालिका: शरद ऋतु का क्षेत्रीय प्रभाव
| क्षेत्र | मौसम की स्थिति | प्रमुख घटनाएँ | प्रभाव |
| उत्तर भारत | साफ आसमान, शुष्क, दिन गर्म, रातें ठंडी | मानसून की वापसी, “अक्टूबर की गर्मी”। | मौसम सुखद होने लगता है, रबी की फसलों की बुवाई के लिए खेत तैयार होते हैं। |
| पूर्वी तट (कोरोमंडल) | आर्द्र, बादल छाए रहना | उत्तर-पूर्वी मानसून से भारी वर्षा, उष्णकटिबंधीय चक्रवात। | राज्य के जलाशयों और भूजल के लिए महत्वपूर्ण, लेकिन बाढ़ और चक्रवातों से जान-माल का खतरा। |
| प्रायद्वीपीय भारत का आंतरिक भाग | शुष्क, तापमान में कमी | – | मौसम सुखद होने लगता है। |
| बंगाल की खाड़ी / अरब सागर | अशांत | उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का निर्माण। | तटीय क्षेत्रों के लिए खतरा। |
निष्कर्ष:
शरद ऋतु भारत में दो बिल्कुल विपरीत मौसमी घटनाओं का संगम है। जहाँ एक ओर यह उत्तर भारत में सुखद और शांत मौसम की शुरुआत का संकेत देती है, वहीं दूसरी ओर यह दक्षिण-पूर्वी तट के लिए मुख्य वर्षा ऋतु और चक्रवातों का खतरनाक समय होता है। यह ऋतु स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि भारत की जलवायु में कितनी अधिक क्षेत्रीय विविधता है।
III. भारत में वर्षा का वितरण (Distribution of Rainfall in India)
भारत में वर्षा का वितरण अत्यधिक असमान (Uneven) और अनिश्चित (Uncertain) है। इसका मुख्य कारण मानसूनी पवनों की प्रकृति, देश का विशाल आकार और विभिन्न उच्चावच लक्षणों (Relief Features) जैसे हिमालय, पश्चिमी घाट आदि का प्रभाव है। भारत की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 118 से 125 सेमी है, लेकिन इसमें भारी क्षेत्रीय भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं।
वर्षा की मात्रा के आधार पर भारत को निम्नलिखित चार प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:
1. अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र (Regions of Heavy Rainfall)
- वर्षा की मात्रा: 200 सेंटीमीटर से अधिक (>200 cm)।
- क्षेत्र:
- पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढलान (Windward side of Western Ghats): इसमें केरल का मालाबार तट, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र का कोंकण तट शामिल है।
- उत्तर-पूर्वी भारत (North-East India): इसमें मेघालय (गारो, खासी, जयंतिया पहाड़ियाँ), अरुणाचल प्रदेश, असम की बराक घाटी और पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग शामिल हैं। मेघालय का मासिनराम (Mawsynram) विश्व में सर्वाधिक औसत वार्षिक वर्षा वाला स्थान है।
- अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप समूह।
- प्रमुख कारण:
- पर्वतीय वर्षा: इन क्षेत्रों में नमी से भरपूर मानसूनी पवनें सीधे ऊँचे पहाड़ों (पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर की पहाड़ियाँ) से टकराती हैं, जिससे वे ऊपर उठने को मजबूर होती हैं और भारी पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) करती हैं।
2. मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र (Regions of Moderate Rainfall)
- वर्षा की मात्रा: 100 से 200 सेंटीमीटर के बीच।
- क्षेत्र: यह एक وسیع क्षेत्र है, जिसमें शामिल हैं:
- गंगा के मध्य मैदानी भाग (पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार)।
- पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़।
- उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश और उत्तरी आंध्र प्रदेश।
- पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलान के कुछ हिस्से।
- पूर्वोत्तर भारत के कुछ आंतरिक क्षेत्र (जैसे त्रिपुरा, मणिपुर)।
- प्रमुख कारण: ये क्षेत्र मानसूनी पवनों के सीधे मार्ग में आते हैं, लेकिन यहाँ कोई बहुत ऊँची पर्वतीय बाधा नहीं है, इसलिए वर्षा मध्यम होती है।
3. न्यून वर्षा वाले क्षेत्र (Regions of Low Rainfall)
- वर्षा की मात्रा: 50 से 100 सेंटीमीटर के बीच।
- क्षेत्र:
- ऊपरी गंगा घाटी (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली)।
- पूर्वी राजस्थान और पूर्वी गुजरात।
- दक्कन के पठार का आंतरिक भाग (महाराष्ट्र का विदर्भ, कर्नाटक का आंतरिक भाग, तेलंगाना और पश्चिमी तमिलनाडु)।
- प्रमुख कारण:
- समुद्र से दूरी: गंगा के मैदानों में पूर्व से पश्चिम की ओर जाने पर बंगाल की खाड़ी की मानसूनी शाखा की नमी घटती जाती है।
- वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area): दक्कन का पठार पश्चिमी घाट के पूर्व में (पवन-विमुख ढाल) स्थित है, इसलिए यहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
4. अल्प या अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र (Regions of Scanty Rainfall)
- वर्षा की मात्रा: 50 सेंटीमीटर से कम (<50 cm)।
- क्षेत्र:
- पश्चिमी राजस्थान (थार का मरुस्थल) और गुजरात का कच्छ क्षेत्र।
- लद्दाख का ठंडा मरुस्थल।
- पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र के कुछ विशेष इलाके।
- प्रमुख कारण:
- अरावली की स्थिति: राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला मानसूनी पवनों के समानांतर स्थित है, इसलिए यह उन्हें रोक नहीं पाती।
- हिमालय का वृष्टि-छाया क्षेत्र: लद्दाख महान हिमालय के उत्तर में वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित है, जहाँ मानसूनी पवनें पहुँच ही नहीं पातीं।
सारांश तालिका
| वर्षा की मात्रा | क्षेत्र | प्रमुख कारण |
| अत्यधिक वर्षा (>200 cm) | पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढलान, उत्तर-पूर्वी भारत, द्वीप समूह | पर्वतीय बाधा (पवन-सम्मुख ढाल)। |
| मध्यम वर्षा (100-200 cm) | मध्य गंगा का मैदान, पूर्वी तटीय मैदान, मध्य भारत | मानसून के मार्ग में स्थित, लेकिन सीधी बाधा नहीं। |
| न्यून वर्षा (50-100 cm) | ऊपरी गंगा का मैदान, दक्कन का आंतरिक पठार, पूर्वी राजस्थान | समुद्र से दूरी, वृष्टि-छाया क्षेत्र। |
| अल्प वर्षा (<50 cm) | पश्चिमी राजस्थान, लद्दाख, कच्छ | पर्वत श्रृंखलाओं का समानांतर होना, वृष्टि-छाया क्षेत्र। |
वर्षा की परिवर्तनशीलता (Variability of Rainfall)
इसका अर्थ है किसी स्थान की औसत वार्षिक वर्षा से होने वाला विचलन।
- नियम: जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है, वहाँ परिवर्तनशीलता अधिक होती है (जैसे राजस्थान)। जहाँ वर्षा अधिक होती है, वहाँ परिवर्तनशीलता कम होती है (जैसे केरल)।
- प्रभाव: अधिक परिवर्तनशीलता वाले क्षेत्रों में सूखे और अकाल की संभावना हमेशा बनी रहती है, जो इन क्षेत्रों की कृषि को अत्यधिक जोखिम भरा बना देती है।
निष्कर्ष:
भारत की जलवायु अपनी ‘एकता और विविधता’ के लिए जानी जाती है। मानसूनी हवाएँ पूरे देश को एक जलवायु तंत्र में पिरोती हैं, फिर भी धरातलीय विभिन्नताओं के कारण यहाँ जलवायु के अनेक रूप देखने को मिलते हैं। यही कारण है कि मानसून को भारतीय कृषि का जुआ और भारत का “वास्तविक वित्त मंत्री” भी कहा जाता है।
भारत के जलवायु प्रदेश (Climate Regions of India)
जलवायु प्रदेश एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र होता है जहाँ जलवायु की दशाओं (मुख्यतः तापमान और वर्षा) में एकरूपता पाई जाती है। भारत के जलवायु प्रदेशों का वर्गीकरण कई भूगोलवेत्ताओं ने किया है, जिनमें कोपेन और थॉर्नथ्वेट प्रमुख हैं।
कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (Köppen’s Climate Classification)
कोपेन ने अपने वर्गीकरण का आधार तापमान (Temperature) और वर्षा (Precipitation) के मासिक औसत मानों को बनाया। उन्होंने जलवायु प्रदेशों को दर्शाने के लिए अंग्रेजी वर्णमाला के बड़े और छोटे अक्षरों का प्रयोग किया।
मुख्य सांकेतिक अक्षर:
- A: उष्णकटिबंधीय जलवायु (वर्ष के हर महीने औसत तापमान 18°C से अधिक)।
- B: शुष्क जलवायु (वर्षा बहुत कम)।
- C: कोष्ण शीतोष्ण जलवायु (सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18°C से अधिक लेकिन -3°C से कम नहीं)।
- D: शीत शीतोष्ण जलवायु (सबसे गर्म महीने का तापमान 10°C से अधिक, सबसे ठंडे का -3°C से कम)।
- E: ध्रुवीय जलवायु (सबसे गर्म महीने का तापमान 10°C से कम)।
छोटे सांकेतिक अक्षर (वर्षा के आधार पर):
- w: शुष्क शीत ऋतु (Winter Dry)
- s: शुष्क ग्रीष्म ऋतु (Summer Dry)
- m: मानसूनी जलवायु (Monsoon)
- f: कोई शुष्क ऋतु नहीं (Fully Humid)
- h: गर्म और शुष्क (Hot)
- g: गंगा के मैदान जैसी जलवायु
कोपेन का जलवायु वर्गीकरण विश्व की जलवायु को पाँच मुख्य समूहों में बाँटता है। इन समूहों को अंग्रेजी के बड़े अक्षरों (Capital Letters) A, B, C, D, और E से दर्शाया जाता है। ये वर्गीकरण का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्तर है, जो मुख्य रूप से तापमान और वर्षण की प्रकृति पर आधारित है।
कोपेन जलवायु वर्गीकरण के पाँच मुख्य समूह
| अक्षर | जलवायु समूह (Climate Group) | मुख्य विशेषता | भारत में उदाहरण |
| A | उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Tropical Humid Climate) | वर्ष के सभी 12 महीनों का औसत तापमान 18°C से अधिक रहता है। यहाँ कोई स्पष्ट शीत ऋतु नहीं होती। | भारत का दक्षिणी भाग, जैसे केरल, गोवा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, और तटीय महाराष्ट्र। |
| B | शुष्क जलवायु (Dry / Arid Climate) | यहाँ वर्षण (वर्षा) की तुलना में वाष्पीकरण अधिक होता है। पानी की स्थायी कमी रहती है। इसका निर्धारण तापमान के बजाय शुष्कता पर होता है। | राजस्थान का थार मरुस्थल, गुजरात का कच्छ क्षेत्र, लद्दाख का ठंडा मरुस्थल और पश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया क्षेत्र। |
| C | कोष्ण शीतोष्ण आर्द्र जलवायु (Warm Temperate Climate) | सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18°C और -3°C के बीच रहता है। यहाँ हल्की सर्दियाँ और स्पष्ट गर्मियाँ होती हैं। | उत्तर भारत का विशाल मैदान (गंगा का मैदान), जैसे दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब। यह भारत का सबसे बड़ा क्षेत्र कवर करता है। |
| D | शीत शीतोष्ण जलवायु (Cold Temperate / Continental Climate) | सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान -3°C से कम होता है, जबकि सबसे गर्म महीने का औसत 10°C से अधिक होता है। यहाँ कठोर, बर्फीली सर्दियाँ होती हैं। | यह भारत में बहुत दुर्लभ है, केवल हिमालय के कुछ ऊँचे क्षेत्रों जैसे अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में पाया जाता है। |
| E | ध्रुवीय जलवायु (Polar Climate) | सबसे गर्म महीने का औसत तापमान भी 10°C से कम रहता है। यहाँ कोई वास्तविक ग्रीष्म ऋतु नहीं होती और भूमि अधिकांश समय बर्फ से ढकी रहती है। | हिमालय के अत्यधिक ऊँचे क्षेत्र, जैसे लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के हिमाच्छादित (बर्फ से ढके) हिस्से। |
सारांश
यह पाँच मुख्य समूह कोपेन वर्गीकरण का आधार हैं। प्रत्येक समूह को वर्षण (वर्षा) के पैटर्न और तापमान की गंभीरता के आधार पर छोटे अक्षरों (जैसे m, w, s, a, b, c) का उपयोग करके और भी उप-भागों में विभाजित किया जाता है, जिससे जलवायु का अधिक विस्तृत और सटीक चित्र प्राप्त होता है।
1. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (Köppen’s Climate Classification)
कोपेन का वर्गीकरण तापमान और वर्षा के मासिक औसत मानों पर आधारित एक अनुभवजन्य प्रणाली है। यह सबसे अधिक मान्यता प्राप्त और व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला वर्गीकरण है।
कोपेन के अनुसार भारत के प्रमुख जलवायु प्रदेश
| कोड (Code) | जलवायु का प्रकार | विशेषताएँ | भारत में क्षेत्र |
| Amw | उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु | ग्रीष्मकाल में भारी मानसूनी वर्षा और एक छोटी, शुष्क शीत ऋतु। | केरल का मालाबार तट, गोवा, कोंकण तट और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह। |
| As | उष्णकटिबंधीय सवाना (शुष्क ग्रीष्म) | ग्रीष्मकाल शुष्क रहता है, जबकि अधिकांश वर्षा शीतकालीन या लौटते हुए मानसून से होती है। | तमिलनाडु का कोरोमंडल तट और दक्षिणी आंध्र प्रदेश। |
| Aw | उष्णकटिबंधीय सवाना (शुष्क शीत) | स्पष्ट शुष्क शीत ऋतु और ग्रीष्मकाल में वर्षा। Amw की तुलना में वर्षा कम होती है। | कर्क रेखा के दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार का अधिकांश भाग (महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक)। |
| BWhw | गर्म मरुस्थलीय जलवायु | वर्षा बहुत कम (<25 सेमी), तापमान बहुत अधिक, और प्राकृतिक वनस्पति नगण्य। | पश्चिमी राजस्थान (थार का मरुस्थल) और उत्तरी गुजरात (कच्छ)। |
| BShw | अर्ध-शुष्क स्टेपी जलवायु | मरुस्थलीय और आर्द्र जलवायु के बीच का संक्रमण क्षेत्र। वर्षा कम (25-50 सेमी)। | पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया क्षेत्र। |
| Cwg | कोष्ण शीतोष्ण जलवायु (गंगा तुल्य) | मानसून से प्रभावित, गर्मियों में अधिकांश वर्षा और शुष्क शीत ऋतु। | उत्तर भारत का विशाल मैदान, पूर्वी राजस्थान, असम, मध्य प्रदेश, मालवा पठार। |
| Dfc | शीत आर्द्र जलवायु (लघु ग्रीष्म) | छोटी, ठंडी गर्मियाँ और लंबी, ठंडी, बर्फीली सर्दियाँ। | उत्तर-पूर्वी भारत का हिमालयी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम)। |
| ET | टुंड्रा तुल्य जलवायु | कोई वास्तविक ग्रीष्म ऋतु नहीं, तापमान लगभग हिमांक के नीचे, भूमि बर्फ से ढकी रहती है। | उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र। |
| E | ध्रुवीय तुल्य जलवायु | तापमान हमेशा हिमांक से नीचे, स्थायी हिमावरण। | हिमालय की सबसे ऊँची चोटियाँ। |
2. थॉर्नथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण (Thornthwaite’s Climate Classification)
थॉर्नथ्वेट का वर्गीकरण अधिक जटिल है क्योंकि यह केवल तापमान और वर्षा पर ही नहीं, बल्कि वर्षण प्रभाविता और तापीय दक्षता की अवधारणा पर आधारित है। इसमें वाष्पीकरण-वाष्पोत्सर्जन एक महत्वपूर्ण कारक है, जो किसी क्षेत्र की शुष्कता या आर्द्रता को बेहतर ढंग से मापता है।
थॉर्नथ्वेट के अनुसार भारत के प्रमुख जलवायु प्रदेश
| कोड (Code) | जलवायु का प्रकार | विशेषताएँ | भारत में क्षेत्र |
| (A) | पर-आर्द्र (Per-Humid) | वर्ष भर भारी वर्षा, कोई जल की कमी नहीं। | पश्चिमी घाट के कुछ हिस्से (केरल और कर्नाटक तट) और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्से (मेघालय)। |
| (B) | आर्द्र (Humid) | वर्ष भर पर्याप्त वर्षा, बहुत कम या कोई जल की कमी नहीं। | पश्चिमी घाट के निकटवर्ती क्षेत्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा के कुछ हिस्से और पूर्वोत्तर का अधिकांश भाग। |
| (C) | उप-आर्द्र (Sub-Humid) | गर्मियों में पर्याप्त वर्षा लेकिन सर्दियों में पानी की कमी हो सकती है। | यह भारत का सबसे बड़ा जलवायु क्षेत्र है। इसमें गंगा के अधिकांश मैदानी भाग, पूर्वी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड शामिल हैं। |
| (D) | अर्ध-शुष्क (Semi-Arid) | नमी की स्पष्ट कमी, वाष्पीकरण वर्षा से अधिक होता है। | पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश का पश्चिमी भाग और पश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया क्षेत्र। |
| (E) | शुष्क (Arid) | नमी की बहुत अधिक कमी, बहुत कम वर्षा। | पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल) और कच्छ का रण। |
थॉर्नथ्वेट तापीय दक्षता के आधार पर इन क्षेत्रों को और उप-विभाजित करते हैं (जैसे, A’ उष्णकटिबंधीय, B’ मेसोथर्मल), जिससे वर्गीकरण और अधिक विस्तृत हो जाता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान को C A’w (उप-आर्द्र उष्णकटिबंधीय, शुष्क शीत ऋतु) के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
दोनों वर्गीकरणों की तुलना
- सरलता: कोपेन का वर्गीकरण समझना और लागू करना आसान है।
- वैज्ञानिक आधार: थॉर्नथ्वेट का वर्गीकरण जल संतुलन की अवधारणा पर आधारित होने के कारण अधिक वैज्ञानिक और तार्किक माना जाता है। यह किसी क्षेत्र की वास्तविक नमी की स्थिति को बेहतर ढंग से दर्शाता है।
- उपयोग: सामान्य उपयोग और समझ के लिए कोपेन का वर्गीकरण अधिक लोकप्रिय है, जबकि कृषि और जल संसाधन प्रबंधन जैसे विशिष्ट अध्ययनों के लिए थॉर्नथ्वेट का वर्गीकरण अधिक उपयोगी हो सकता है।
भारतीय मानसून की परिभाषा
सरल शब्दों में, भारतीय मानसून वृहत पैमाने पर चलने वाली उन मौसमी पवनों (Seasonal Winds) को कहते हैं जिनकी दिशा ऋतु के अनुसार पूरी तरह उलट जाती है।
एक विस्तृत और वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार, भारतीय मानसून एक जटिल वायुमंडलीय एवं महासागरीय परिघटना है, जो भारतीय उपमहाद्वीप और हिंद महासागर के बीच स्थल और जल के विभेदी तापन (Differential Heating) के कारण उत्पन्न होती है। इसके परिणामस्वरूप, हवाओं के प्रवाह में एक आवधिक उत्क्रमण (Periodic Reversal) होता है, जो ग्रीष्म ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर नमी युक्त पवनें (वर्षा लाने वाली) और शीत ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर शुष्क पवनें चलाता है।
यह मात्र एक मौसम नहीं, बल्कि एक जटिल जलवायु प्रणाली है जो भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु, कृषि, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और पारिस्थितिकी को गहराई से नियंत्रित करती है।
भारतीय मानसून का आगमन (Onset of the Indian Monsoon)
भारतीय मानसून का आगमन कोई एक अकेली घटना नहीं, बल्कि वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर होने वाली कई वायुमंडलीय और महासागरीय प्रक्रियाओं का एक समन्वित परिणाम है। यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण वार्षिक घटना है जो देश के कृषि चक्र और जल संसाधनों को सीधे तौर पर निर्धारित करती है।
मानसून के आगमन की तिथि और स्थान
- औसत तिथि: भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन की औसत तिथि 1 जून है।
- प्रथम प्रवेश स्थल: मानसून सबसे पहले केरल के मालाबार तट पर पहुँचता है।
- मानसून का प्रस्फोट (Monsoon Burst): मानसून के आगमन के साथ अचानक मौसम में परिवर्तन होता है। शांत और शुष्क मौसम की जगह तेज हवाओं के साथ गरज और बिजली की चमक के साथ भारी वर्षा शुरू हो जाती है। इस पहली मूसलाधार वर्षा को ही “मानसून का प्रस्फोट या विस्फोट” कहा जाता है।
मानसून के आगमन के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारक
मानसून का आगमन निम्नलिखित कारकों की एक जटिल अंतःक्रिया का परिणाम है:
1. स्थल और जल का विभेदी तापन (Differential Heating of Land and Sea):
यह मानसून का सबसे आधारभूत कारण है। गर्मियों में भारतीय भू-भाग, हिंद महासागर की तुलना में बहुत अधिक गर्म हो जाता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप पर एक शक्तिशाली निम्न दाब क्षेत्र बन जाता है। यही निम्न दाब हिंद महासागर से नमी युक्त हवाओं को अपनी ओर खींचता है।
2. ITCZ का उत्तर की ओर खिसकना (Northward Shift of ITCZ):
ITCZ (Inter-Tropical Convergence Zone) भूमध्य रेखा के पास निम्न दाब की एक द्रोणी होती है। गर्मियों में सूर्य के उत्तरायण होने के साथ, यह ITCZ भी उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान के ऊपर स्थित हो जाती है। इसे ही “मानसून द्रोणी” (Monsoon Trough) कहते हैं। यह निम्न दाब का क्षेत्र मानसूनी हवाओं को आकर्षित करता है।
3. तिब्बती पठार का गर्म होना:
विशाल और ऊँचा तिब्बती पठार गर्मियों में एक “ऊँचे हीटर” की तरह काम करता है। यह ऊपरी वायुमंडल में भी एक मजबूत ऊष्मीय निम्न दाब (Thermal Low) का निर्माण करता है, जो मानसूनी परिसंचरण को और अधिक तीव्रता प्रदान करता है।
4. जेट स्ट्रीम की भूमिका (Crucial Role of Jet Streams):
- पश्चिमी जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर हटना: सर्दियों में, पश्चिमी जेट स्ट्रीम हिमालय के दक्षिण में बहती है और मानसून के आगमन में बाधा डालती है। गर्मियों में, तिब्बती पठार के गर्म होने से यह जेट स्ट्रीम अचानक हिमालय के उत्तर की ओर खिसक जाती है। इसका हटना ही मानसून के प्रस्फोट के लिए एक ट्रिगर या ग्रीन सिग्नल का काम करता है।
- पूर्वी जेट स्ट्रीम का विकास: पश्चिमी जेट स्ट्रीम के हटने के बाद, तिब्बती पठार की गर्मी से एक उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम विकसित होती है। यह भारतीय मानसून को और अधिक शक्तिशाली बनाती है और उसे भारत के आंतरिक भागों तक धकेलती है।
मानसून का भारत में प्रवेश और प्रगति
एक बार केरल तट पर पहुँचने के बाद, मानसून दो शाखाओं में विभाजित होकर आगे बढ़ता है:
| शाखा (Branch) | अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch) | बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch) |
| प्रवेश और गति | यह एक शक्तिशाली और तेज शाखा है। यह 10 जून तक मुंबई पहुँच जाती है। | यह धीमी गति से आगे बढ़ती है। यह भी जून के पहले सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करती है। |
| मुख्य बाधाएँ | पश्चिमी घाट से टकराकर यह पश्चिमी तटीय मैदानों पर भारी पर्वतीय वर्षा करती है। | अराकान की पहाड़ियाँ (म्यांमार) और मेघालय की पहाड़ियाँ। |
| प्रगति का मार्ग | एक हिस्सा मध्य भारत की ओर बढ़ता है। दूसरा हिस्सा गुजरात-राजस्थान की ओर बढ़ता है, लेकिन अरावली के समानांतर होने से राजस्थान में कम वर्षा करता है। | यह अराकान पहाड़ियों से मुड़कर उत्तर-पश्चिम की ओर भारत में प्रवेश करती है। यह मेघालय की पहाड़ियों पर विश्व की सर्वाधिक वर्षा करती है और फिर पश्चिम की ओर गंगा के मैदान में बढ़ती है। |
| प्रभाव | कोंकण तट, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में वर्षा करती है। | पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली में वर्षा करती है। (पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है) |
मानसून के आगमन की सामान्य समय-सारणी
- 1 जून: केरल तट
- 5-10 जून: मुंबई और कोलकाता
- 15 जून: मध्य भारत (नागपुर)
- 20-25 जून: गुजरात, पूर्वी राजस्थान
- 29 जून – 1 जुलाई: दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश
- 15 जुलाई: लगभग संपूर्ण भारत मानसून के प्रभाव में आ जाता है।
निष्कर्ष: भारतीय मानसून का आगमन एक धीमी और पूर्वानुमानित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक गतिशील और विस्फोटक घटना है जो कई वैश्विक और क्षेत्रीय कारकों के सही समय पर एक साथ आने से संभव होती है। इसका समय पर और सही मात्रा में आगमन भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए सर्वोपरि है।
भारतीय मानसून के दो मुख्य रूप
मानसून की परिभाषा इसके दो मुख्य चक्रों के बिना अधूरी है:
दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon): भारत की जीवनधारा
दक्षिण-पश्चिम मानसून, जिसे ग्रीष्मकालीन मानसून भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु घटना है। यह जून से सितंबर तक की अवधि में सक्रिय रहता है और भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 80-90% हिस्सा इसी से प्राप्त होता है। यह पवन प्रणाली न केवल मौसम को परिभाषित करती है, बल्कि भारत की कृषि, अर्थव्यवस्था, समाज और पारिस्थितिकी को भी आकार देती है।
I. दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्पत्ति के कारण
- स्थल और जल का विभेदी तापन: गर्मियों में भारतीय भू-भाग, विशेषकर उत्तर-पश्चिम का थार मरुस्थल, अत्यधिक गर्म होकर एक तीव्र निम्न वायुदाब (Low Pressure) का केंद्र बनाता है। इसकी तुलना में, दक्षिण का हिंद महासागर ठंडा रहता है, जिससे वहाँ उच्च वायुदाब (High Pressure) बना रहता है।
- ITCZ का खिसकना: अंतरा-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान पर स्थापित हो जाता है, जिसे “मानसून द्रोणी” कहते हैं। यह निम्न दाब की पट्टी हवाओं को आकर्षित करती है।
- जेट स्ट्रीम की भूमिका: मई-जून में पश्चिमी जेट स्ट्रीम का हिमालय के उत्तर की ओर खिसक जाना मानसून के प्रस्फोट के लिए एक “ट्रिगर” का काम करता है। इसके साथ ही, पूर्वी जेट स्ट्रीम का विकास मानसून को और अधिक शक्ति प्रदान करता है।
II. मानसून का आगमन और प्रगति
- आगमन: यह मानसून लगभग 1 जून को केरल के मालाबार तट पर पहुँचता है, जिसे “मानसून का प्रस्फोट (Monsoon Burst)” कहते हैं।
- पवन की दिशा: ये पवनें दक्षिणी गोलार्ध से आती हैं और भूमध्य रेखा को पार करते ही कोरिओलिस बल के कारण अपनी दाहिनी ओर मुड़ जाती हैं। इससे इनकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर हो जाती है, इसीलिए इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून कहते हैं।
- प्रगति: लगभग 15 जुलाई तक यह मानसून पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को अपनी चपेट में ले लेता है।
III. दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएँ
प्रायद्वीपीय भारत की त्रिभुजाकार आकृति के कारण, यह मानसून दो मुख्य शाखाओं में विभाजित हो जाता है:
A. अरब सागर की शाखा (Arabian Sea Branch)
दक्षिण-पश्चिम मानसून जब भारतीय प्रायद्वीप की ओर बढ़ता है, तो उसकी एक बड़ी और शक्तिशाली धारा अरब सागर के ऊपर से गुजरती है। यह बंगाल की खाड़ी की शाखा की तुलना में अधिक शक्तिशाली होती है और लगभग तीन गुना अधिक नमी लेकर आती है। हालाँकि, भारत का उच्चावच (Relief) इसके द्वारा होने वाली वर्षा के वितरण को बहुत अधिक प्रभावित करता है।
प्रायद्वीपीय भारत में प्रवेश करने के बाद यह शाखा मुख्य रूप से तीन उप-शाखाओं में विभाजित हो जाती है:
1. पहली उप-शाखा: पश्चिमी घाट पर पर्वतीय वर्षा
- मार्ग: यह मानसून की सबसे पश्चिमी और पहली उप-शाखा है। यह सीधे आकर भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पश्चिमी घाट (Western Ghats) की ऊँची और अविच्छिन्न दीवार से टकराती है।
- प्रक्रिया: नमी से लदी ये पवनें पश्चिमी घाट से टकराकर तेजी से ऊपर उठने को मजबूर होती हैं। ऊपर उठने पर ये ठंडी होती हैं, संघनित होती हैं और अपनी अधिकांश नमी भारी वर्षा के रूप में गिरा देती हैं। इस प्रक्रिया को पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) कहते हैं।
- प्रभाव क्षेत्र (भारी वर्षा):
- पश्चिमी तटीय मैदान: केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में यह भारी से अत्यधिक भारी वर्षा (औसतन 250 से 400 सेमी) करती है। मुंबई, महाबलेश्वर, मंगलुरु जैसे शहर इसी शाखा से अत्यधिक वर्षा प्राप्त करते हैं।
- वृष्टि-छाया क्षेत्र का निर्माण:
- पश्चिमी घाट को पार करने के बाद, जब ये हवाएँ पूर्वी ढलानों पर नीचे उतरती हैं, तो वे गर्म हो जाती हैं और अपनी अधिकांश नमी खो चुकी होती हैं। इसलिए, पश्चिमी घाट का पूर्वी भाग वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) बन जाता है।
- प्रभाव क्षेत्र (बहुत कम वर्षा): मध्य महाराष्ट्र (विदर्भ, मराठवाड़ा), उत्तरी आंतरिक कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु के आंतरिक भागों में बहुत कम वर्षा (लगभग 50-60 सेमी) होती है, और ये क्षेत्र अक्सर सूखाग्रस्त रहते हैं।
2. दूसरी उप-शाखा: मध्य भारत में प्रवेश
- मार्ग: यह शाखा पश्चिमी घाट के उत्तर में, नर्मदा और तापी नदियों की घाटियों के बीच से होकर भारत के मध्य भागों में प्रवेश करती है।
- प्रभाव क्षेत्र:
- यह गुजरात के कुछ हिस्सों, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र, छत्तीसगढ़ और छोटानागपुर पठार (झारखंड) तक वर्षा करती है।
- जब यह बंगाल की खाड़ी की शाखा से मिलती है, तो दोनों मिलकर गंगा के मैदानों के आसपास के क्षेत्रों में वर्षा करती हैं।
3. तीसरी उप-शाखा: राजस्थान और उत्तर-पश्चिम भारत की ओर
- मार्ग: यह शाखा गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ के तटों से टकराती है और फिर अरावली पर्वत श्रृंखला की दिशा में उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ती है।
- राजस्थान में कम वर्षा का कारण:
- अरावली का समानांतर होना: अरावली पर्वत की दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है, जो इन मानसूनी पवनों की दिशा के लगभग समानांतर (Parallel) है। इसलिए, यह पर्वत श्रृंखला इन हवाओं के मार्ग में कोई प्रभावी बाधा उत्पन्न नहीं कर पाती और उन्हें रोक नहीं पाती, जिससे वे बिना वर्षा किए आगे बढ़ जाती हैं।
- कम ऊँचाई: अरावली की ऊँचाई भी हवाओं को ऊपर उठने और संघनित होने के लिए मजबूर करने हेतु पर्याप्त नहीं है।
- अत्यधिक गर्मी: राजस्थान की भीषण गर्मी हवा की नमी धारण करने की क्षमता को और बढ़ा देती है, जिससे वर्षा की संभावना कम हो जाती है।
- प्रभाव क्षेत्र: इसके कारण गुजरात और पश्चिमी राजस्थान के अधिकांश भाग शुष्क या अर्ध-शुष्क रह जाते हैं। यह शाखा आगे बढ़कर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी हिमालय में पहुँचती है, जहाँ यह बंगाल की खाड़ी की शाखा से मिलकर वर्षा करती है।
निष्कर्ष:
अरब सागर की शाखा भारतीय मानसून की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली धारा है, लेकिन इसका प्रभाव पूरी तरह से स्थलाकृति (Topography) द्वारा नियंत्रित होता है। यह पश्चिमी घाट के कारण एक ओर जहाँ भारत के कुछ सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों का निर्माण करती है, वहीं दूसरी ओर सबसे बड़े वृष्टि-छाया क्षेत्रों को भी जन्म देती है। अरावली के साथ इसकी समानांतर स्थिति पश्चिमी भारत के शुष्क होने का प्रमुख भौगोलिक कारण है।
B. बंगाल की खाड़ी की शाखा (Bay of Bengal Branch)
दक्षिण-पश्चिम मानसून की यह शाखा भूमध्य रेखा को पार करने के बाद बंगाल की खाड़ी से नमी ग्रहण करती है और भारत के पूर्वी तट, पूर्वोत्तर राज्यों तथा विशाल उत्तरी मैदानों में वर्षा के लिए जिम्मेदार होती है। हालाँकि यह अरब सागर की शाखा की तुलना में थोड़ी कमजोर होती है, लेकिन इसका प्रभाव क्षेत्र बहुत व्यापक है।
इसका मार्ग और प्रभाव मुख्य रूप से दो उप-शाखाओं में समझा जा सकता है:
1. पहली उप-शाखा: पूर्वोत्तर भारत में भारी वर्षा
- मार्ग: यह शाखा सीधे उत्तर-पूर्व दिशा में बढ़ती है और म्यांमार के तट पर स्थित अराकान की पहाड़ियों (Arakan Hills) से टकराती है। इन पहाड़ियों से टकराकर इस शाखा का एक बड़ा हिस्सा उत्तर और उत्तर-पश्चिम की ओर, भारतीय उपमहाद्वीप की तरफ मुड़ जाता है।
- मेघालय में विश्व की सर्वाधिक वर्षा:
- कीपाकार (Funnel-Shaped) संरचना: यह उप-शाखा जब मेघालय पठार पर पहुँचती है, तो वहाँ स्थित गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों की कीपाकार संरचना में फँस जाती है।
- तेजी से ऊपर उठना: यह संकरा मार्ग पवनों को अचानक और तेजी से बहुत अधिक ऊँचाई तक उठने के लिए मजबूर करता है।
- अत्यधिक वर्षा: तेजी से ठंडा होने और संघनित होने के कारण, ये पवनें अपनी लगभग सारी नमी यहीं गिरा देती हैं। इसी भौगोलिक विशेषता के कारण मासिनराम (Mawsynram) और चेरापूँजी में विश्व की सर्वाधिक वार्षिक वर्षा (1000 सेमी से भी अधिक) दर्ज की जाती है।
- अन्य क्षेत्रों में प्रभाव:
- यह उप-शाखा असम की ब्रह्मपुत्र घाटी और पश्चिम बंगाल के उत्तरी भागों में भी भारी वर्षा करती है।
2. दूसरी उप-शाखा: गंगा के मैदानों की ओर
- मार्ग: बंगाल की खाड़ी की एक दूसरी धारा, हिमालय की विशाल दीवार के कारण पूर्व या उत्तर की ओर आगे नहीं बढ़ पाती। यह हिमालय के समानांतर (दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम दिशा में) गंगा के मैदानों की ओर बढ़ने लगती है। इसे ही “मानसूनी द्रोणी (Monsoon Trough)” के सहारे आगे बढ़ना कहते हैं।
- पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा में कमी:
- सिद्धांत: जैसे-जैसे यह शाखा गंगा के मैदानों में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती है, यह लगातार वर्षा करती जाती है। इस प्रक्रिया में इसकी नमी की मात्रा धीरे-धीरे कम होती जाती है।
- परिणाम: इसके कारण, गंगा के मैदानों में वर्षा की मात्रा में पूर्व से पश्चिम की ओर एक स्पष्ट कमी देखने को मिलती है।
- वर्षा वितरण का उदाहरण:
- कोलकाता (पश्चिम बंगाल): लगभग 120 सेमी
- पटना (बिहार): लगभग 102 सेमी
- प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): लगभग 91 सेमी
- दिल्ली: लगभग 56 सेमी
- पश्चिमी राजस्थान: 25 सेमी से भी कम
- दोनों शाखाओं का विलय:
- यह शाखा जब पंजाब, हरियाणा और पूर्वी राजस्थान के मैदानों तक पहुँचती है, तब तक यह काफी हद तक अपनी नमी खो चुकी होती है। यहाँ यह कमजोर पड़ चुकी अरब सागर की शाखा के साथ मिल जाती है, और दोनों मिलकर पश्चिमी हिमालय के क्षेत्रों में वर्षा करती हैं।
निष्कर्ष:
बंगाल की खाड़ी की शाखा भारत के सबसे घनी आबादी वाले और कृषि की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, यानी उत्तरी मैदानों में वर्षा के लिए जिम्मेदार है। मेघालय में इसकी भूमिका जहाँ विश्व-रिकॉर्ड वर्षा कराती है, वहीं गंगा के मैदानों में इसका पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा को घटाने वाला पैटर्न पूरे उत्तर भारत के कृषि-जलवायु क्षेत्रों को निर्धारित करता है।
IV. दक्षिण-पश्चिम मानसून की प्रमुख विशेषताएँ
- अनिश्चितता: इसका आगमन और वापसी कभी-कभी समय से पहले या बाद में हो सकता है, जो फसलों को प्रभावित करता है।
- असमान वितरण: वर्षा का वितरण पूरे देश में एक समान नहीं होता।
- वर्षा में विच्छेद (Break in Monsoon): मानसून के दौरान कई-कई दिनों तक शुष्क दौर आता है, जब वर्षा नहीं होती।
- मूसलाधार प्रकृति: वर्षा हल्की फुहारों के रूप में लगातार न होकर, कुछ घंटों या दिनों की भारी और मूसलाधार बौछारों के रूप में होती है, जिससे मृदा अपरदन बढ़ता है।
निष्कर्ष:
दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की अर्थव्यवस्था की धुरी और इसकी जीवन रेखा है। देश की कृषि, जल आपूर्ति और समग्र आर्थिक समृद्धि पूरी तरह से इसकी सफलता पर निर्भर करती है। इसकी अनिश्चित और परिवर्तनशील प्रकृति ही इसे “भारतीय कृषि का जुआ” बनाती है।
मानसून की उत्पत्ति से संबंधित विचारधाराएँ और सिद्धांत
भारतीय मानसून एक अत्यंत जटिल वायुमंडलीय परिघटना है। इसकी उत्पत्ति को पूरी तरह से समझने के लिए समय के साथ विभिन्न सिद्धांतों का विकास हुआ है। इन सिद्धांतों को मुख्य रूप से दो प्रमुख विचारधाराओं में विभाजित किया जा सकता है:
- चिरसम्मत या तापीय विचारधारा (Classical or Thermal Concept)
- आधुनिक या गतिक विचारधारा (Modern or Dynamic Concept)
चिरसम्मत या तापीय विचारधारा (The Classical or Thermal Concept)
यह मानसून की उत्पत्ति को समझाने वाला सबसे पुराना, सरल और आधारभूत सिद्धांत है। इसका मूल विचार 17वीं सदी में प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और मौसम विज्ञानी सर एडमंड हैली द्वारा प्रस्तुत किया गया था। यह विचारधारा मानसून की पूरी प्रक्रिया को जल और स्थल के विभेदी तापन (Differential Heating and Cooling of Land and Sea) के एक बहुत बड़े और वार्षिक पैमाने पर होने वाले प्रभाव के रूप में देखती है।
सिद्धांत का मूल आधार
इस सिद्धांत का सार एक साधारण भौतिक नियम पर टिका है:
- स्थल (Land): यह जल्दी गर्म होता है और जल्दी ही ठंडा भी हो जाता है।
- जल (Sea): यह देर से गर्म होता है और देर से ही ठंडा होता है (अपनी ऊष्मा को अधिक समय तक बनाए रखता है)।
इस विभेदी तापन के कारण, वायुदाब (Air Pressure) में मौसमी परिवर्तन होता है, जो हवाओं की दिशा को पूरी तरह से उलट देता है। इस सिद्धांत के अनुसार, मानसून स्थल समीर और समुद्र समीर (Land and Sea Breezes) का ही एक वृहत, महाद्वीपीय और वार्षिक रूप है।
इस सिद्धांत के अनुसार मानसून की व्याख्या
1. ग्रीष्मकालीन मानसून (दक्षिण-पश्चिम मानसून) की उत्पत्ति:
- घटना: मार्च के बाद, जब सूर्य उत्तरी गोलार्ध में (कर्क रेखा की ओर) चमकता है, तो भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य एशिया का विशाल भू-भाग सूर्य की सीधी किरणों को प्राप्त करता है।
- तापन का प्रभाव: स्थल भाग, अपनी प्रकृति के अनुसार, बहुत तेजी से और अत्यधिक गर्म हो जाता है।
- निम्न दाब का निर्माण: इस तीव्र गर्मी के कारण, भूमि के संपर्क में आने वाली हवा गर्म होकर फैलती है, हल्की हो जाती है और ऊपर उठ जाती है। इसके परिणामस्वरूप भारतीय भू-भाग पर एक शक्तिशाली निम्न वायुदाब क्षेत्र (Intense Low-Pressure Area) बन जाता है।
- उच्च दाब की स्थिति: ठीक इसी समय, दक्षिण में स्थित हिंद महासागर, अपनी प्रकृति के अनुसार, धीमी गति से गर्म होता है और स्थल की तुलना में अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। इस ठंडे समुद्री सतह के ऊपर एक उच्च वायुदाब क्षेत्र (High-Pressure Area) बना रहता है।
- परिणामी पवन प्रवाह: प्रकृति का नियम है कि हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर बहती है। इस विशाल दाब-अंतर (Pressure Gradient) को भरने के लिए, हिंद महासागर के उच्च दाब क्षेत्र से नमी से भरी हवाएँ भारतीय भू-भाग के निम्न दाब क्षेत्र की ओर आकर्षित होती हैं। यही पवनें दक्षिण-पश्चिम मानसून कहलाती हैं, जो जून से सितंबर तक भारत में भारी वर्षा करती हैं।
2. शीतकालीन मानसून (उत्तर-पूर्वी मानसून) की उत्पत्ति:
- घटना: सितंबर के बाद, जब सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में जाने लगता है, तो भारतीय उपमहाद्वीप को कम सौर ऊर्जा प्राप्त होती है।
- तापन का प्रभाव: स्थल भाग, अपनी प्रकृति के अनुसार, बहुत तेजी से अपनी ऊष्मा खो देता है और ठंडा हो जाता है।
- उच्च दाब का निर्माण: इस शीतलन के कारण, भारतीय और एशियाई भू-भाग पर एक विशाल उच्च वायुदाब क्षेत्र स्थापित हो जाता है।
- निम्न दाब की स्थिति: इसकी तुलना में, हिंद महासागर, जो अपनी ऊष्मा को अधिक समय तक बनाए रखता है, स्थल की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म रहता है। इस गर्म समुद्री सतह पर एक निम्न वायुदाब क्षेत्र बना रहता है।
- परिणामी पवन प्रवाह: अब दाब प्रणाली पूरी तरह से उलट चुकी है। हवाएँ ठंडे स्थलीय उच्च दाब क्षेत्र से गर्म समुद्री निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहने लगती हैं। इन पवनों की दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है। चूँकि ये पवनें स्थल से आती हैं, इसलिए ये ठंडी और शुष्क होती हैं और भारत के अधिकांश हिस्सों में वर्षा नहीं करतीं।
तापीय सिद्धांत की आलोचना और सीमाएँ
हालाँकि यह सिद्धांत मानसून की एक बुनियादी समझ प्रदान करता है, लेकिन इसे अब अधूरा माना जाता है क्योंकि यह कई महत्वपूर्ण परिघटनाओं की व्याख्या करने में विफल रहता है:
- मानसून का प्रस्फोट (Burst of Monsoon): यह सिद्धांत यह नहीं समझा पाता कि मानसून का आगमन धीरे-धीरे न होकर एक विस्फोटक या अचानक घटना के रूप में क्यों होता है।
- मानसून में विच्छेद (Break in Monsoon): यह सिद्धांत वर्षा ऋतु के दौरान आने वाले शुष्क दौरों का कारण नहीं बता पाता।
- ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण: इसने जेट स्ट्रीम और ऊपरी वायुमंडल में होने वाली प्रक्रियाओं की भूमिका को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।
- ENSO का प्रभाव: यह सिद्धांत एल नीनो और ला नीना जैसी वैश्विक घटनाओं के प्रभाव की व्याख्या नहीं कर सकता, जो मानसून को बहुत प्रभावित करते हैं।
- तीव्रता में भिन्नता: यह सिद्धांत यह नहीं समझा पाता कि हर साल मानसून की तीव्रता में इतना अंतर क्यों होता है।
निष्कर्ष:
तापीय सिद्धांत मानसून को समझने के लिए एक ऐतिहासिक प्रारंभिक बिंदु है। यह मानसून की “क्यों” (Why) का एक सरल उत्तर देता है, लेकिन इसकी “कैसे” (How) की जटिल प्रक्रिया को समझाने में अपर्याप्त है। आधुनिक गतिक सिद्धांतों ने इन कमियों को दूर किया है और मानसून की एक अधिक पूर्ण और वैज्ञानिक तस्वीर प्रस्तुत की है।
आधुनिक या गतिक विचारधारा (The Modern or Dynamic Concept)
20वीं सदी के मध्य में, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद ऊपरी वायुमंडल के अध्ययन (जैसे जेट स्ट्रीम की खोज) के साथ, यह स्पष्ट हो गया कि मानसून केवल सतह के तापन का एक साधारण परिणाम नहीं है। आधुनिक या गतिक विचारधारा मानसून को एक जटिल, त्रि-आयामी (3-Dimensional) और वैश्विक वायुमंडलीय परिघटना के रूप में देखती है, जो धरातलीय कारकों के साथ–साथ ऊपरी वायुमंडल और वैश्विक जलवायु पैटर्न की अंतःक्रिया का परिणाम है।
यह विचारधारा तापीय सिद्धांत को खारिज नहीं करती, बल्कि उसे संशोधित और पूरक करती है। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
1. ऊपरी वायु परिसंचरण और जेट स्ट्रीम की भूमिका (Role of Upper Air Circulation and Jet Streams)
यह आधुनिक विचारधारा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह मानता है कि धरातलीय पवनों को नियंत्रित करने में ऊपरी वायुमंडल की पवन प्रणालियों की निर्णायक भूमिका होती है।
- A) उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet Stream):
- शीत ऋतु में स्थिति: सर्दियों में, यह शक्तिशाली जेट स्ट्रीम हिमालय के दक्षिण में, 20°-35° अक्षांशों पर, गंगा के मैदान के ऊपर बहती है। इसकी उपस्थिति भारतीय भू-भाग पर एक उच्च दाब क्षेत्र बनाए रखती है, जो हवा को नीचे की ओर धकेलती है। यह स्थिति मानसून के लिए प्रतिकूल होती है।
- मानसून के आगमन में भूमिका: मई के अंत और जून की शुरुआत में, तिब्बती पठार के तीव्र तापन के कारण, यह जेट स्ट्रीम कमजोर पड़ जाती है और अचानक नाटकीय रूप से हिमालय के उत्तर की ओर खिसक जाती है। इस जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर हटना ही मानसून के “प्रस्फोट” (Monsoon Burst) के लिए एक ट्रिगर या स्विच का काम करता है। इसके हटते ही, धरातलीय निम्न दाब प्रणाली तीव्र हो जाती है और मानसूनी पवनों को आकर्षित करती है।
- B) उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet Stream):
- उत्पत्ति: पश्चिमी जेट स्ट्रीम के उत्तर की ओर खिसकने के बाद, अत्यधिक गर्म तिब्बती पठार ऊपरी वायुमंडल में हवा को गर्म करके ऊपर उठाता है। यह हवा पूर्व की ओर बहने लगती है, जिससे एक अस्थायी पूर्वी जेट स्ट्रीम का निर्माण होता है। यह केवल गर्मियों में ही बनती है।
- मानसून को सशक्त बनाना: यह जेट स्ट्रीम भारत के प्रायद्वीपीय भाग के ऊपर से बहती है और हिंद महासागर में नीचे उतरकर वहाँ उच्च दाब को और मजबूत करती है। यह मजबूत उच्च दाब धरातलीय मानसूनी पवनों को और अधिक बल के साथ भारत की ओर धकेलता है, जिससे मानसून अधिक तीव्र और गहरा हो जाता है।
2. तिब्बती पठार का ऊष्मीय प्रभाव (Thermal Effect of the Tibetan Plateau)
यह आधुनिक विचारधारा का एक और महत्वपूर्ण घटक है, जिसे पी. कोटेश्वरम जैसे भारतीय मौसम वैज्ञानिकों ने उजागर किया।
- “ऊँचाई पर स्थित हीटर”: तिब्बती पठार बहुत विशाल (क्षेत्रफल में) और ऊँचा (औसत ऊँचाई 4.5 किमी) है। गर्मियों में यह सूर्य की तीव्र किरणों से बहुत अधिक गर्म हो जाता है।
- ऊपरी वायुमंडल में प्रभाव: यह पठार एक “ऊँचे हीटर” की तरह काम करता है, जो सीधे मध्य क्षोभमंडल को गर्म करता है। इसके कारण ऊपरी वायुमंडल में एक शक्तिशाली ऊष्मीय निम्न दाब (Thermal Low) और एक प्रति-चक्रवातीय (Anticyclonic) दशा बनती है।
- दोहरा प्रभाव: यह ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण ही (i) पश्चिमी जेट स्ट्रीम को उत्तर की ओर धकेलता है और (ii) पूर्वी जेट स्ट्रीम को जन्म देता है। इस प्रकार, तिब्बती पठार मानसून प्रणाली के इंजन के रूप में कार्य करता है।
3. वैश्विक परिघटनाओं की भूमिका (Role of Global Phenomena)
यह विचारधारा मानती है कि भारतीय मानसून एक पृथक घटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक जलवायु प्रणाली से जुड़ा हुआ है।
- A) ENSO (एल नीनो और दक्षिणी दोलन):
एल नीनो: भारतीय मानसून को कमजोर करने वाला वैश्विक कारक
एल नीनो (El Niño) एक वृहत पैमाने की, प्राकृतिक महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है, जो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर (पेरू तट के पास) में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने से संबंधित है। यद्यपि यह घटना भारत से हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में होती है, लेकिन इसका प्रभाव वैश्विक वायु परिसंचरण (Global Air Circulation) को बाधित करके भारतीय मानसून पर पड़ता है, जिससे वह अक्सर कमजोर हो जाता है।
इसे समझने के लिए, पहले सामान्य स्थिति (जब एल नीनो नहीं होता) को समझना आवश्यक है:
सामान्य वर्ष (La Niña or Neutral Conditions):
- तापमान: पूर्वी प्रशांत (पेरू तट) का पानी ठंडा रहता है, जबकि पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया/ऑस्ट्रेलिया) का पानी गर्म रहता है।
- वायुदाब: ठंडे पानी के कारण पूर्वी प्रशांत पर उच्च दाब (High Pressure) और गर्म पानी के कारण पश्चिमी प्रशांत पर निम्न दाब (Low Pressure) बनता है।
- परिणाम: इस दाब-अंतर के कारण, शक्तिशाली व्यापारिक पवनें (Trade Winds) पूर्व से पश्चिम (पेरू से इंडोनेशिया) की ओर चलती हैं।
- भारत के लिए लाभ: पश्चिमी प्रशांत का यह मजबूत निम्न दाब क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप पर बनने वाले मानसूनी निम्न दाब को और अधिक शक्तिशाली बनाता है। यह एक सहायक प्रणाली की तरह काम करता है, जिससे भारतीय मानसून मजबूत होता है और अच्छी वर्षा होती है।
एल नीनो वर्ष के दौरान क्या बदल जाता है? (The Mechanism)
एल नीनो के दौरान यह पूरी सामान्य प्रणाली उलट या बाधित हो जाती है।
- तापमान का उलटना: व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे पश्चिमी प्रशांत का गर्म पानी पूर्व की ओर, पेरू तट की तरफ फैलने लगता है। इससे पूर्वी प्रशांत असामान्य रूप से गर्म हो जाता है।
- वायुदाब का उलटना (Southern Oscillation): अब, गर्म पानी के कारण पूर्वी प्रशांत (पेरू) पर निम्न दाब और पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया/ऑस्ट्रेलिया) पर उच्च दाब बन जाता है।
इस उलटफेर का भारतीय मानसून पर सीधा प्रभाव
पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया के पास) में बना उच्च दाब क्षेत्र ही भारतीय मानसून को कमजोर करने वाला मुख्य खलनायक है।
- मानसूनी निम्न दाब का कमजोर होना:
गर्मियों में भारत के मैदानी इलाकों में जो “मानसूनी द्रोणी” (Monsoon Trough) बनती है, वह एक निम्न दाब का क्षेत्र होती है, जो मानसूनी हवाओं को खींचने वाले इंजन का काम करती है। इंडोनेशिया के पास बना उच्च दाब इस भारतीय निम्न दाब को कमजोर कर देता है। दाब-प्रणाली एक विशाल खेल है; एक जगह का उच्च दाब अपने पड़ोसी क्षेत्र के निम्न दाब की तीव्रता को कम कर देता है। - दाब-प्रवणता का कम होना (Reduced Pressure Gradient):
मानसून हिंद महासागर के उच्च दाब और भारतीय उपमहाद्वीप के निम्न दाब के बीच के अंतर से चलता है। एल नीनो के कारण, भारतीय उपमहाद्वीप पर निम्न दाब कमजोर हो जाता है, जिससे यह दाब-अंतर (Pressure Gradient) कम हो जाता है। - कमजोर मानसूनी पवनें:
कमजोर दाब-अंतर के कारण, हिंद महासागर से भारत की ओर बहने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें कमजोर पड़ जाती हैं। वे धीमी गति से चलती हैं और अपने साथ कम नमी लेकर आती हैं।
परिणामस्वरूप, भारत पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:
- कम वर्षा: देश भर में वर्षा की कुल मात्रा घट जाती है।
- सूखे की प्रबल संभावना: भारत में अधिकांश बड़े सूखे एल नीनो वर्षों के साथ जुड़े हुए हैं।
- मानसून के आगमन में देरी: मानसून का आगमन सामान्य तिथि से देर से हो सकता है।
- मानसून की जल्दी वापसी: मानसून सामान्य से पहले लौट सकता है, जिससे फसलों की सिंचाई की अवधि कम हो जाती है।
- लंबे “मानसून विच्छेद”: वर्षा ऋतु के दौरान बिना बारिश वाले शुष्क दौर लंबे हो सकते हैं।
- उच्च तापमान: बारिश की कमी और शुष्क मौसम के कारण तापमान सामान्य से अधिक बना रहता है।
आर्थिक प्रभाव
- कृषि: खरीफ फसलों (चावल, गन्ना, कपास, सोयाबीन) के उत्पादन में भारी गिरावट आती है।
- अर्थव्यवस्था: खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ती है। ग्रामीण मांग में कमी आती है और जलविद्युत उत्पादन घट जाता है।
निष्कर्ष:
एल नीनो वैश्विक वायु परिसंचरण (वॉकर सेल) को बाधित करके भारतीय उपमहाद्वीप पर बनने वाली मानसूनी निम्न दाब प्रणाली को सीधे तौर पर कमजोर कर देता है। कमजोर निम्न दाब, नमी युक्त पवनों को आकर्षित करने में कम सक्षम होता है, जिसके परिणामस्वरूप भारत में मानसून कमजोर हो जाता है, जिससे अक्सर सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न होती है।
ला नीना (La Niña): भारतीय मानसून को सशक्त करने वाला वैश्विक कारक
ला नीना (La Niña), एल नीनो की ठीक विपरीत जलवायु परिघटना है। यह एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है “छोटी बच्ची”। यह मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर (पेरू तट के पास) में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से ठंडा होने से संबंधित है।
ला नीना, एल नीनो के विपरीत, भारतीय मानसून पर सकारात्मक प्रभाव डालता है, जिससे अक्सर भारत में सामान्य से अधिक वर्षा होती है।
ला नीना के दौरान क्या होता है? (The Mechanism)
ला नीना वास्तव में प्रशांत महासागर की सामान्य (Normal) परिस्थितियों का ही एक और अधिक तीव्र या सशक्त (Intensified) रूप है।
- पूर्वी प्रशांत का अत्यधिक ठंडा होना:
- सामान्य वर्षों की तुलना में भी, पूर्वी प्रशांत महासागर (पेरू तट) का पानी और अधिक ठंडा हो जाता है। ऐसा गहरे समुद्र से ठंडे पानी के सतह पर आने की प्रक्रिया (अपवेलिंग) के तेज होने के कारण होता है।
- व्यापारिक पवनों का बहुत मजबूत होना:
- पूर्वी प्रशांत में ठंडक बढ़ने से वहाँ एक बहुत शक्तिशाली उच्च दाब (Very Strong High Pressure) का क्षेत्र बन जाता है।
- उसी समय, पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया/ऑस्ट्रेलिया) का पानी और अधिक गर्म हो जाता है, जिससे वहाँ एक बहुत गहरा निम्न दाब (Very Deep Low Pressure) का क्षेत्र बनता है।
- इस विशाल दाब-अंतर के कारण, व्यापारिक पवनें (Trade Winds) सामान्य से कहीं अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं और पूर्व से पश्चिम की ओर तेजी से बहती हैं।
- वॉकर परिसंचरण का तीव्र होना:
- इस पूरी प्रक्रिया के कारण, वैश्विक वॉकर परिसंचरण (Walker Circulation) बहुत अधिक तीव्र और सशक्त हो जाता है।
इस तीव्र प्रणाली का भारतीय मानसून पर सीधा प्रभाव (सकारात्मक)
पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया के पास) में बना बहुत गहरा निम्न दाब क्षेत्र ही भारतीय मानसून के लिए एक वरदान की तरह काम करता है।
- मानसूनी निम्न दाब का मजबूत होना:
- भारत के मैदानी इलाकों में गर्मियों में जो “मानसूनी द्रोणी” (Monsoon Trough) बनती है, वह एक निम्न दाब का क्षेत्र होती है। इंडोनेशिया के पास बना यह शक्तिशाली निम्न दाब, भारतीय निम्न दाब प्रणाली को और अधिक गहरा और शक्तिशाली बना देता है। यह एक सहायक इंजन की तरह काम करता है, जो पूरे तंत्र को और अधिक ताकत देता है।
- अधिक दाब-प्रवणता (Increased Pressure Gradient):
- ला नीना के कारण, हिंद महासागर के उच्च दाब और भारतीय उपमहाद्वीप के गहरे निम्न दाब के बीच का अंतर (Pressure Gradient) बहुत अधिक बढ़ जाता है।
- मजबूत और नमी युक्त मानसूनी पवनें:
- इस अत्यधिक दाब-अंतर के कारण, हिंद महासागर से भारत की ओर बहने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें बहुत मजबूत हो जाती हैं। वे अधिक तेजी से चलती हैं और अपने साथ बहुत अधिक नमी लेकर आती हैं।
परिणामस्वरूप, भारत पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:
- मजबूत और सक्रिय मानसून: पूरे भारत में मानसून बहुत सक्रिय और शक्तिशाली रहता है।
- औसत से अधिक वर्षा: देश भर में वर्षा की कुल मात्रा सामान्य से अधिक होने की प्रबल संभावना होती है।
- बाढ़ की प्रबल संभावना: अत्यधिक वर्षा के कारण देश के कई हिस्सों, विशेषकर मैदानी और नदी घाटियों में भीषण बाढ़ (Floods) का खतरा बढ़ जाता है।
- मानसून का समय पर या जल्दी आगमन: मानसून का आगमन सामान्य तिथि पर या उससे थोड़ा पहले हो सकता है।
- मानसून की देर से वापसी: मानसून सामान्य से अधिक समय तक सक्रिय रह सकता है, जिससे वर्षा की अवधि लंबी हो जाती है।
- कम तापमान: बादलों के छाए रहने और लगातार वर्षा के कारण ग्रीष्म ऋतु और मानसून के दौरान तापमान सामान्य से कम रहता है।
आर्थिक प्रभाव
- कृषि: अच्छी वर्षा से बंपर फसल उत्पादन की संभावना बढ़ जाती है, विशेषकर खरीफ फसलों (चावल, सोयाबीन, कपास) की।
- अर्थव्यवस्था: ग्रामीण मांग में वृद्धि होती है, खाद्य मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहती है, और जलविद्युत उत्पादन बढ़ता है।
- नकारात्मक पक्ष: अत्यधिक वर्षा और बाढ़ से फसलों, आधारभूत ढाँचे और जन-जीवन को भारी नुकसान भी हो सकता है।
निष्कर्ष:
ला नीना, वैश्विक वायु परिसंचरण (वॉकर सेल) को तीव्र करके, भारतीय उपमहाद्वीप पर बनने वाली मानसूनी निम्न दाब प्रणाली को सीधे तौर पर सशक्त करता है। एक गहरा निम्न दाब, अधिक शक्तिशाली और नमी युक्त पवनों को आकर्षित करता है, जिसके परिणामस्वरूप भारत में मानसून मजबूत होता है और अक्सर सामान्य से अधिक वर्षा होती है, जिससे कभी-कभी बाढ़ की स्थिति भी बन जाती है।
- B) हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD):
- यह हिंद महासागर की अपनी आंतरिक जलवायु घटना है, जिसमें अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के तापमान में अंतर आता है।
सकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (Positive Indian Ocean Dipole – IOD)
हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), जिसे “भारतीय नीनो” (Indian Niño) भी कहा जाता है, हिंद महासागर की अपनी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। यह उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी भागों के समुद्री सतह के तापमान (Sea Surface Temperature – SST) में होने वाले आवधिक उतार-चढ़ाव को संदर्भित करती है।
IOD की तीन अवस्थाएँ होती हैं: सकारात्मक, नकारात्मक और तटस्थ। इनमें से सकारात्मक IOD भारतीय मानसून के लिए सबसे महत्वपूर्ण और सहायक मानी जाती है।
सकारात्मक IOD की स्थिति क्या है?
एक सकारात्मक IOD घटना के दौरान, हिंद महासागर के तापमान में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं:
- पश्चिमी हिंद महासागर का गर्म होना:
- अरब सागर और अफ्रीका के तट के पास का समुद्री सतह का तापमान औसत से अधिक गर्म (Warmer than average) हो जाता है।
- पूर्वी हिंद महासागर का ठंडा होना:
- बंगाल की खाड़ी और इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के पास का समुद्री सतह का तापमान औसत से अधिक ठंडा (Cooler than average) हो जाता है।
इसे एक “द्विध्रुव” (Dipole) इसलिए कहा जाता है क्योंकि महासागर के दो सिरों (ध्रुवों) पर तापमान में विपरीत स्थितियाँ (एक तरफ गर्म, दूसरी तरफ ठंडा) विकसित हो जाती हैं।
सकारात्मक IOD का विकास और प्रक्रिया
- व्यापारिक पवनों में बदलाव: तापमान में इस अंतर के कारण, सतही व्यापारिक पवनें (Trade Winds) अपनी सामान्य दिशा बदलकर पूर्व से पश्चिम की ओर (इंडोनेशिया से अफ्रीका की ओर) बहने लगती हैं।
- गर्म जल का संचयन: ये पवनें सतह के गर्म पानी को अपने साथ बहाकर पश्चिमी हिंद महासागर (अरब सागर) में इकट्ठा कर देती हैं।
- ठंडे जल का ऊपर आना (Upwelling): पूर्वी हिंद महासागर (इंडोनेशिया तट) से जब गर्म पानी हटता है, तो उसकी जगह लेने के लिए समुद्र की गहराई से ठंडा, पोषक तत्वों से भरपूर पानी सतह पर आ जाता है।
सकारात्मक IOD का भारतीय मानसून पर प्रभाव (अनुकूल)
सकारात्मक IOD भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए बेहद अनुकूल और सहायक होता है। इसका प्रभाव इस प्रकार पड़ता है:
- संवहन (Convection) का स्थानांतरण:
- बादल बनने और बारिश होने की प्रक्रिया, जिसे संवहन कहते हैं, ठंडे पानी के बजाय गर्म पानी के ऊपर अधिक होती है।
- सकारात्मक IOD के दौरान, यह संवहन केंद्र पूर्वी हिंद महासागर से हटकर पश्चिमी हिंद महासागर (अरब सागर) में स्थानांतरित हो जाता है।
- मानसूनी पवनों को अतिरिक्त नमी:
- अरब सागर के औसत से अधिक गर्म होने के कारण वाष्पीकरण (Evaporation) की दर बढ़ जाती है।
- जब दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें भारत की ओर बढ़ती हैं, तो वे इस अत्यधिक गर्म अरब सागर से अधिक नमी (Moisture) ग्रहण करती हैं।
- मजबूत निम्न दाब:
- गर्म समुद्र की सतह अपने ऊपर की हवा को भी गर्म कर देती है, जिससे वहाँ एक मजबूत निम्न दाब (Low Pressure) का क्षेत्र विकसित होता है।
- यह निम्न दाब भारत के मुख्य भू-भाग पर बने मानसूनी निम्न दाब को और अधिक शक्तिशाली बना देता है, जिससे मानसूनी पवनें और अधिक तीव्रता से आकर्षित होती हैं।
परिणाम: इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से, एक सकारात्मक IOD वर्ष के दौरान:
- भारतीय मानसून मजबूत होता है।
- भारत में औसत से अधिक वर्षा होने की प्रबल संभावना होती है।
एल नीनो (El Niño) के प्रभाव को कम करने में भूमिका
यह सकारात्मक IOD की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक है।
- एल नीनो भारतीय मानसून को कमजोर करता है, जिससे सूखे की आशंका बढ़ती है।
- लेकिन, यदि किसी एल नीनो वर्ष में एक मजबूत सकारात्मक IOD भी विकसित हो जाए, तो वह एल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक बेअसर (Counteract) कर सकता है।
- IOD द्वारा प्रदान की गई अतिरिक्त नमी और मजबूत निम्न दाब, एल नीनो से उत्पन्न कमजोरी की भरपाई कर सकता है, जिससे भारत में सामान्य या सामान्य के करीब वर्षा हो सकती है।
- उदाहरण: वर्ष 1997 एक मजबूत एल नीनो का वर्ष था, लेकिन साथ ही एक बहुत मजबूत सकारात्मक IOD भी था, जिसके कारण भारत में सूखे के बजाय सामान्य से अधिक वर्षा हुई थी।
निष्कर्ष:
सकारात्मक IOD हिंद महासागर का एक ऐसा “सुरक्षा कवच” है जो भारतीय मानसून को शक्ति प्रदान करता है और प्रशांत महासागर से आने वाले नकारात्मक प्रभाव (एल नीनो) के खिलाफ एक बफर के रूप में कार्य करता है। यह भारतीय मौसम विज्ञानियों के लिए मानसून की भविष्यवाणी करने में एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
नकारात्मक हिंद महासागर द्विध्रुव (Negative Indian Ocean Dipole – IOD)
हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) हिंद महासागर की अपनी आंतरिक जलवायु परिघटना है, जो इसके पश्चिमी और पूर्वी भागों के समुद्री सतह के तापमान में होने वाले उतार-चढ़ाव पर आधारित है।
नकारात्मक IOD, सकारात्मक IOD की ठीक विपरीत स्थिति है और यह भारतीय मानसून के लिए प्रतिकूल या हानिकारक मानी जाती है।
नकारात्मक IOD की स्थिति क्या है?
एक नकारात्मक IOD घटना के दौरान, हिंद महासागर के तापमान में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं:
- पश्चिमी हिंद महासागर का ठंडा होना:
- अरब सागर और अफ्रीका के तट के पास का समुद्री सतह का तापमान औसत से अधिक ठंडा (Cooler than average) हो जाता है।
- पूर्वी हिंद महासागर का गर्म होना:
- बंगाल की खाड़ी का दक्षिणी हिस्सा और इंडोनेशिया के सुमात्रा तट के पास का समुद्री सतह का तापमान औसत से अधिक गर्म (Warmer than average) हो जाता है।
इस स्थिति में भी महासागर के दो सिरों पर तापमान में विपरीत स्थितियाँ (एक तरफ ठंडा, दूसरी तरफ गर्म) होती हैं, लेकिन यह सकारात्मक अवस्था का ठीक उलटा होता है।
नकारात्मक IOD का विकास और प्रक्रिया
- व्यापारिक पवनों का मजबूत होना: इस दौरान, उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर में बहने वाली सामान्य व्यापारिक पवनें (Trade Winds) और अधिक मजबूत हो जाती हैं।
- गर्म जल का संचयन: ये मजबूत पवनें सतह के गर्म पानी को पश्चिम से पूर्व की ओर धकेलती हैं, जिससे पूर्वी हिंद महासागर (इंडोनेशिया तट के पास) में गर्म पानी का एक बड़ा पूल बन जाता है।
- ठंडे जल का ऊपर आना (Upwelling): पश्चिमी हिंद महासागर (अरब सागर) से जब गर्म पानी पूर्व की ओर चला जाता है, तो उसकी जगह लेने के लिए समुद्र की गहराई से ठंडा पानी सतह पर आ जाता है।
नकारात्मक IOD का भारतीय मानसून पर प्रभाव (प्रतिकूल)
नकारात्मक IOD भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए प्रतिकूल या कमजोर करने वाला होता है। इसका प्रभाव इस प्रकार पड़ता है:
- संवहन (Convection) का दूर जाना:
- चूंकि संवहन (बादल बनने और बारिश होने की प्रक्रिया) गर्म पानी के ऊपर अधिक होता है, नकारात्मक IOD के दौरान यह संवहन केंद्र भारत से दूर, पूर्वी हिंद महासागर (इंडोनेशिया के पास) स्थानांतरित हो जाता है।
- इसका मतलब है कि बारिश कराने वाली मुख्य प्रणाली भारत से दूर चली जाती है।
- मानसूनी पवनों को कम नमी:
- चूंकि अरब सागर औसत से अधिक ठंडा होता है, इसलिए वाष्पीकरण (Evaporation) की दर घट जाती है।
- जब दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनें भारत की ओर बढ़ती हैं, तो उन्हें ठंडे अरब सागर से कम नमी (Less Moisture) मिल पाती है।
- उच्च दाब का निर्माण:
- ठंडी समुद्री सतह अपने ऊपर की हवा को भी ठंडा और भारी बना देती है, जिससे अरब सागर और भारत के पश्चिमी तट के पास एक उच्च दाब (High Pressure) का क्षेत्र विकसित होने लगता है।
- यह उच्च दाब क्षेत्र भारत के मुख्य भू-भाग पर बने मानसूनी निम्न दाब को कमजोर कर देता है।
परिणाम: इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से, एक नकारात्मक IOD वर्ष के दौरान:
- भारतीय मानसून कमजोर पड़ता है।
- भारत में औसत से कम वर्षा होने की संभावना बढ़ जाती है।
ला नीना (La Niña) के साथ अंतःक्रिया
- ला नीना भारतीय मानसून के लिए एक सकारात्मक (Positive) कारक है और अच्छी वर्षा लाती है।
- लेकिन, यदि किसी ला नीना वर्ष में एक मजबूत नकारात्मक IOD भी विकसित हो जाए, तो यह ला नीना के सकारात्मक प्रभाव को कमजोर या बेअसर (Counteract) कर सकता है।
- नकारात्मक IOD द्वारा पैदा की गई शुष्क परिस्थितियाँ, ला नीना द्वारा लाई गई नमी को संतुलित कर सकती हैं, जिससे भारत में वर्षा सामान्य या सामान्य से थोड़ी कम रह सकती है।
- इसी तरह, यदि एल नीनो (El Niño) (जो पहले से ही मानसून के लिए नकारात्मक है) के साथ एक नकारात्मक IOD भी आ जाए, तो यह स्थिति और भी खराब हो जाती है, जिससे भारत में गंभीर सूखे की आशंका बहुत अधिक बढ़ जाती है।
निष्कर्ष:
नकारात्मक IOD भारतीय मानसून के लिए एक प्रतिकूल कारक है, जो पवनों में नमी की कमी करता है और वर्षा प्रणाली को भारत से दूर ले जाता है। यह अक्सर भारत में औसत से कम वर्षा का कारण बनता है। जब यह एल नीनो जैसी अन्य नकारात्मक घटनाओं के साथ जुड़ता है, तो इसका प्रभाव और भी गंभीर हो सकता है।
निष्कर्ष:
आधुनिक या गतिक विचारधारा मानसून की एक बहुत अधिक व्यापक और वैज्ञानिक तस्वीर प्रस्तुत करती है। यह मानती है कि मानसून केवल धरातलीय तापन का परिणाम नहीं, बल्कि ऊपरी और निचले वायुमंडल, स्थलीय विशेषताओं (तिब्बती पठार), और महासागरीय धाराओं के बीच एक जटिल, गतिशील और अंतर-संबंधित (interconnected) प्रणाली है। यह मानसून की अनिश्चितता और वार्षिक भिन्नता की व्याख्या करने में भी अधिक सक्षम है।
पश्चिमी विक्षोभ की उत्पत्ति: एक वायुमंडलीय यात्रा
पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) भारतीय उपमहाद्वीप में शीत ऋतु के मौसम को प्रभावित करने वाली एक महत्वपूर्ण वायुमंडलीय परिघटना है। यह वास्तव में एक बहिरूष्णकटिबंधीय या शीतोष्ण चक्रवात (Extra-tropical or Temperate Cyclone) है, जिसकी उत्पत्ति भारत से हजारों किलोमीटर दूर पश्चिम में होती है।
इसकी उत्पत्ति और भारत तक की यात्रा को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:
चरण 1: उत्पत्ति का स्रोत क्षेत्र – भूमध्य सागर (Mediterranean Sea)
- मूल स्रोत: पश्चिमी विक्षोभ की उत्पत्ति का प्राथमिक स्रोत भूमध्य सागर और उसके आसपास के क्षेत्र हैं। कभी-कभी ये अटलांटिक महासागर के ऊपर भी उत्पन्न होते हैं और भूमध्य सागर से अतिरिक्त नमी ग्रहण करते हैं।
- परिस्थितियाँ: शीत ऋतु के दौरान, जब दक्षिणी यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के आसपास का क्षेत्र गर्म भूमध्य सागर के संपर्क में आता है, तो यहाँ एक विशेष वायुमंडलीय अस्थिरता उत्पन्न होती है।
चरण 2: वाताग्र जनन (Frontogenesis) – चक्रवात का निर्माण
- हवाओं का मिलना: इस क्षेत्र में उत्तर से आने वाली ठंडी और शुष्क ध्रुवीय पवनें (Cold & Dry Polar Winds) तथा दक्षिण से आने वाली गर्म और आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय पवनें (Warm & Humid Subtropical Winds) आपस में मिलती हैं।
- वाताग्र का निर्माण: जब ये दो विपरीत स्वभाव वाली वायुराशियाँ मिलती हैं, तो वे आसानी से मिश्रित नहीं होतीं, बल्कि उनके बीच एक ढलवाँ सीमा (Sloping Boundary) बन जाती है, जिसे वाताग्र (Front) कहते हैं।
- चक्रवात का जन्म: गर्म हवा, हल्की होने के कारण, ठंडी हवा के ऊपर चढ़ने लगती है। इस प्रक्रिया में एक कम दाब का केंद्र (Low-Pressure Center) विकसित हो जाता है और हवाएँ चक्रवातीय रूप में (उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में) घूमने लगती हैं। यहीं से एक शीतोष्ण चक्रवात के रूप में पश्चिमी विक्षोभ का जन्म होता है।
चरण 3: भारत की ओर यात्रा – जेट स्ट्रीम की भूमिका
- वाहक (Carrier): एक बार उत्पन्न होने के बाद, यह निम्न दाब प्रणाली केवल सतह पर नहीं रहती, बल्कि यह ऊपरी वायुमंडल में मौजूद एक शक्तिशाली वायु-धारा से जुड़ जाती है।
- उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet Stream): शीत ऋतु में, यह शक्तिशाली जेट स्ट्रीम लगभग 9-12 किलोमीटर की ऊँचाई पर पश्चिम से पूर्व की ओर तीव्र गति से बहती है।
- भारत की ओर धकेलना: यह जेट स्ट्रीम इन उत्पन्न हुए शीतोष्ण चक्रवातों (पश्चिमी विक्षोभ) को एक “कन्वेयर बेल्ट” (Conveyor Belt) की तरह अपने साथ बहाकर पूर्व की ओर ले जाती है।
- मार्ग: यह जेट स्ट्रीम इस विक्षोभ को ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के ऊपर से होते हुए भारतीय उपमहाद्वीप की ओर धकेलती है। अपनी यात्रा के दौरान यह कैस्पियन सागर और फारस की खाड़ी से कुछ अतिरिक्त नमी भी ग्रहण कर सकता है।
चरण 4: भारत पर प्रभाव – हिमालय से टकराव
- हिमालय की बाधा: जब यह नमी युक्त विक्षोभ उत्तर-पश्चिम भारत पहुँचता है, तो यह शक्तिशाली हिमालय पर्वत श्रृंखला से टकराता है।
- पर्वतीय वर्षा और हिमपात: हिमालय एक विशाल अवरोधक के रूप में कार्य करता है। हवाओं को ऊपर उठने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे वे ठंडी होती हैं, संघनित होती हैं और अपनी नमी को वर्षा और हिमपात के रूप में गिरा देती हैं।
- प्रभाव क्षेत्र:
- मैदानी इलाकों में वर्षा: इसके कारण पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हल्की से मध्यम शीतकालीन वर्षा होती है।
- पहाड़ों पर हिमपात: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में भारी हिमपात (Snowfall) होता है।
निष्कर्ष:
इस प्रकार, पश्चिमी विक्षोभ की उत्पत्ति की प्रक्रिया एक जटिल वायुमंडलीय यात्रा है जो भूमध्य सागर की गर्म सतह से शुरू होती है, वाताग्रों के निर्माण से चक्रवात का रूप लेती है, शक्तिशाली जेट स्ट्रीम द्वारा हजारों किलोमीटर की दूरी तय करती है, और अंत में हिमालय से टकराकर उत्तर भारत को अपना जीवनदायिनी जल (वर्षा और हिमपात के रूप में) प्रदान करती है।
मानसून-पूर्व वर्षा: आगमन की दस्तक
मानसून-पूर्व वर्षा उन गरज के साथ होने वाली बौछारों को कहते हैं जो ग्रीष्म ऋतु (मार्च से मई) के अंत में, दक्षिण-पश्चिम मानसून के वास्तविक आगमन से ठीक पहले भारत के विभिन्न हिस्सों में होती हैं। ये वर्षाएँ हल्की और स्थानीय प्रकृति की होती हैं, लेकिन क्षेत्रीय कृषि और मौसम के लिए इनका विशेष महत्व होता है।
I. मानसून-पूर्व वर्षा की उत्पत्ति (Origin)
इसकी उत्पत्ति का मुख्य कारण ग्रीष्म ऋतु के दौरान होने वाला तीव्र सतही तापन (Intense Surface Heating) और संवहनीय क्रियाएँ (Convectional Activities) हैं।
- तीव्र तापन और निम्न दाब:
- मार्च और अप्रैल के महीनों में, सूर्य की सीधी किरणों के कारण भूमि की सतह बहुत गर्म हो जाती है।
- इस गर्मी के कारण, सतह के संपर्क में आने वाली हवा गर्म, हल्की होकर तेजी से ऊपर की ओर उठती है। इससे सतह पर एक स्थानीय निम्न दाब (Low Pressure) का क्षेत्र बन जाता है।
- वायु का अस्थिर होना:
- जैसे ही यह गर्म और नम हवा ऊपर उठती है, यह ठंडी होती है और एक निश्चित ऊँचाई पर संतृप्ति बिंदु (Saturation Point) तक पहुँच जाती है।
- कपासी-वर्षी बादलों का निर्माण:
- हवा के तेजी से ऊपर उठने और संघनित होने की इस प्रक्रिया से कपासी-वर्षी बादलों (Cumulonimbus Clouds) का निर्माण होता है। ये बादल बहुत घने, ऊर्ध्वाधर और अस्थिर होते हैं।
- गरज के साथ वर्षा:
- जब इन बादलों में जल की बूँदें भारी हो जाती हैं, तो वे वर्षा के रूप में नीचे गिरती हैं। इन बादलों के भीतर होने वाली तीव्र वायु की गति के कारण बिजली (Lightning) और गरज (Thunder) भी उत्पन्न होती है।
II. मानसून-पूर्व वर्षा का वितरण और स्थानीय नाम
यह वर्षा पूरे भारत में एक समान नहीं होती, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में होती है और वहाँ इसे विशिष्ट स्थानीय नामों से जाना जाता है। ये नाम प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
| स्थानीय नाम (Local Name) | प्रभावित क्षेत्र (Region) | विशेषताएँ और प्रभाव |
| आम्र वर्षा (Mango Showers) | केरल, कर्नाटक, तटीय तमिलनाडु | यह हल्की वर्षा आम की फसल के लिए अत्यधिक लाभदायक होती है, क्योंकि यह आम के फलों को समय से पहले गिरने से रोकती है और उन्हें जल्दी पकने में मदद करती है। |
| फूलों वाली बौछार (Blossom Showers) | केरल और आसपास के कर्नाटक के क्षेत्र | यह वर्षा कहवा (कॉफी) के फूलों के खिलने के लिए बहुत अनुकूल होती है, जिससे कहवा का उत्पादन अच्छा होता है। |
| काल बैशाखी (Kaal Baisakhi)<br/>या नॉर’वेस्टर्स (Nor’westers) | पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड, ओडिशा | यह एक तीव्र और विनाशकारी स्थानीय तूफान है, जिसमें मूसलाधार वर्षा, तेज हवाएँ (तूफ़ानी गति से) और अक्सर ओलावृष्टि (Hailstorms) होती है।<br/> ‘काल’ का अर्थ ‘विनाश’ है जो बैशाख (अप्रैल-मई) के महीने में आता है।<br/> हालाँकि यह विनाशकारी होता है, लेकिन यह चाय (असम में), जूट और धान (पश्चिम बंगाल में) की फसलों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। |
| बारदोली छीड़ा (Bardoli Chheerha) | असम (विशेष रूप से) | यह “काल बैशाखी” का ही स्थानीय असमिया नाम है, जिसका प्रभाव चाय के बागानों के लिए लाभकारी होता है। |
| लू (Loo) और धूल भरी आँधियाँ | उत्तर भारत के मैदान<br/> (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली) | हालाँकि ‘लू’ एक गर्म और शुष्क पवन है जो वर्षा नहीं करती, लेकिन कभी-कभी शाम के समय यह अपने साथ धूल भरी आँधियाँ लाती है। इन आँधियों के साथ बहुत हल्की और अस्थायी बूँदा-बाँदी हो सकती है, जो प्रचंड गर्मी से क्षणिक राहत प्रदान करती है। |
III. मानसून-पूर्व वर्षा की सामान्य विशेषताएँ
- स्थानीय प्रकृति: ये वृहत मानसूनी वर्षा की तरह न होकर, स्थानीय स्तर पर विकसित होती हैं और एक छोटे क्षेत्र को प्रभावित करती हैं।
- कम अवधि: यह वर्षा आमतौर पर दोपहर या शाम के समय होती है और बहुत कम समय (कुछ मिनटों से एक-दो घंटे) तक चलती है।
- गरज और बिजली के साथ: ये हमेशा गरज और बिजली की चमक के साथ होती हैं।
- गर्मी से राहत: ये भीषण गर्मी और उमस से अस्थायी राहत प्रदान करती हैं।
- कृषि के लिए महत्व: ये खरीफ फसलों की बुवाई से पहले खेतों में आवश्यक नमी प्रदान करती हैं और बागवानी फसलों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।
- मानसून के आगमन का सूचक: इन बौछारों की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि को अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन का सूचक माना जाता है।
निष्कर्ष:
मानसून-पूर्व वर्षा ग्रीष्म ऋतु के कठोर मौसम और वर्षा ऋतु के जीवनदायिनी आगमन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह न केवल तापमान को कम करके राहत प्रदान करती है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण फसलों को समय पर नमी देकर उनकी वृद्धि में भी सहायता करती है। यह प्रकृति की एक सुंदर व्यवस्था है जो भूमि को आगामी मानसूनी वर्षा के लिए तैयार करती है।
मानसून में विच्छेद (Break in Monsoon)
मानसून में विच्छेद या मानसून का विराम, दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु (जून से सितंबर) के दौरान आने वाले उस शुष्क दौर (Dry Spell) को कहते हैं, जब एक सप्ताह या उससे अधिक समय तक वर्षा नहीं होती है। यह वर्षा ऋतु की एक सामान्य लेकिन महत्वपूर्ण विशेषता है।
यह एक ऐसी स्थिति है जब पूरे देश में मानसून सक्रिय नहीं रहता, बल्कि वर्षा कुछ विशेष क्षेत्रों में केंद्रित हो जाती है, जबकि देश का एक बड़ा हिस्सा सूखा रह जाता है।
मानसून में विच्छेद क्यों होता है? (The Primary Reason)
मानसून विच्छेद का सबसे प्रमुख और सीधा कारण “मानसून द्रोणी” (Monsoon Trough) या ITCZ की स्थिति में बदलाव आना है।
1. सामान्य स्थिति (जब वर्षा होती है):
सामान्य परिस्थितियों में, मानसून द्रोणी (एक निम्न दाब की पट्टी) उत्तर भारत के विशाल मैदानों (Indo-Gangetic Plains) के ऊपर से गुजरती है। इस द्रोणी की स्थिति मैदानों के ऊपर होने के कारण, हिंद महासागर से आने वाली नमी युक्त मानसूनी पवनें इसी क्षेत्र की ओर आकर्षित होती हैं और पूरे मैदानी इलाके में व्यापक वर्षा करती हैं।
2. विच्छेद की स्थिति (जब वर्षा रुक जाती है):
मानसून विच्छेद के दौरान, यह मानसून द्रोणी उत्तर की ओर खिसक जाती है और हिमालय की तलहटी (Foothills of the Himalayas) पर या उसके समानांतर स्थापित हो जाती है। जब यह “वर्षा की धुरी” उत्तर की ओर चली जाती है, तो मैदानी इलाकों में निम्न दाब का क्षेत्र समाप्त हो जाता है और वहाँ उच्च दाब की स्थिति बनने लगती है, जिससे पवनें नीचे की ओर बैठने लगती हैं। परिणामस्वरूप, मैदानी इलाकों में वर्षा कराने वाली प्रणाली निष्क्रिय हो जाती है और वहाँ शुष्क मौसम की शुरुआत हो जाती है।
मानसून विच्छेद के दौरान वर्षा का पैटर्न
यह एक बहुत ही रोचक और महत्वपूर्ण पहलू है। जब मैदानी इलाकों में सूखा पड़ता है, तब भी देश के कुछ हिस्सों में भारी वर्षा हो रही होती है।
| मौसम की स्थिति | प्रभावित क्षेत्र |
| शुष्क दौर (वर्षा नहीं होती) | उत्तर भारत के मैदान (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल)। मध्य भारत (मध्य प्रदेश, गुजरात)। प्रायद्वीपीय भारत का आंतरिक भाग। |
| अत्यधिक भारी वर्षा | हिमालय की तलहटी और पूर्वी हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी बिहार, सिक्किम, उत्तरी बंगाल)। पूर्वोत्तर भारत (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय)। गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी हिमालयी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र। |
| सामान्य वर्षा जारी رہنا | पश्चिमी घाट (पर्वतीय वर्षा के कारण यहाँ वर्षा जारी रहती है, लेकिन उसकी तीव्रता कम हो सकती है)। दक्षिण-पूर्वी तट (तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश) में कभी-कभी हल्की वर्षा हो सकती है। |
मानसून विच्छेद के प्रभाव (Impacts of the Monsoon Break)
मानसून विच्छेद का भारत पर दोहरा और अक्सर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है:
1. मैदानी इलाकों में सूखा:
कृषि पर प्रभाव: यदि विच्छेद लंबा खिंच जाए (दो सप्ताह से अधिक), तो मैदानी इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है। इससे खरीफ की फसलों, विशेषकर धान (चावल), जिसे बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है, को भारी नुकसान पहुँचता है।
जल संकट: जलाशयों में पानी का स्तर गिरने लगता है।
2. हिमालयी क्षेत्रों और नदियों में बाढ़:
जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा: चूँकि सारी वर्षा हिमालय की तलहटी और पहाड़ों में केंद्रित हो जाती है, इसलिए हिमालय से निकलने वाली नदियों (जैसे गंगा, यमुना, कोसी, गंडक, ब्रह्मपुत्र) के जलग्रहण क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है।
मैदानी इलाकों में बाढ़: पहाड़ों में हुई इस भारी वर्षा का पानी इन नदियों के माध्यम से मैदानी इलाकों में पहुँचता है और भीषण बाढ़ का कारण बनता है। कोसी नदी (“बिहार का शोक”) द्वारा लाई जाने वाली बाढ़ अक्सर मानसून विच्छेद के दौरान ही आती है।
निष्कर्ष
मानसून विच्छेद भारतीय मानसून की परिवर्तनशील प्रकृति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह एक विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न करता है जहाँ एक ही समय में देश के मैदानी भाग सूखे की मार झेल रहे होते हैं, जबकि उन्हीं मैदानों से होकर गुजरने वाली नदियाँ पहाड़ों में हुई बारिश के कारण बाढ़ से उफान पर होती हैं। इसका प्रबंधन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है।
उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon):
उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon): मानसून का निवर्तन
उत्तर-पूर्वी मानसून, जिसे “लौटता हुआ मानसून” (Retreating Monsoon) या शीतकालीन मानसून (Winter Monsoon) भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप में अक्टूबर से दिसंबर तक की अवधि में सक्रिय रहने वाली एक पवन प्रणाली है। यह दक्षिण-पश्चिम मानसून की तरह व्यापक वर्षा नहीं करता, बल्कि भारत के एक बहुत ही सीमित क्षेत्र, विशेषकर दक्षिण-पूर्वी तट के लिए, मुख्य वर्षा ऋतु के रूप में कार्य करता है।
I. उत्तर-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति (Origin)
इसकी उत्पत्ति पवन प्रणाली के पूरी तरह उलट जाने का परिणाम है, जो शरद ऋतु के दौरान होता है।
- स्थल का ठंडा होना:
- सितंबर के अंत तक, सूर्य दक्षिणी गोलार्ध की ओर जाने लगता है, जिससे भारतीय और एशियाई भू-भाग को कम सौर ऊर्जा प्राप्त होती है।
- भूमि, अपनी प्रकृति के अनुसार, बहुत तेजी से ठंडी हो जाती है। विशेष रूप से, मध्य एशिया और तिब्बती पठार पर एक शक्तिशाली उच्च वायुदाब (High-Pressure) केंद्र विकसित हो जाता है।
- समुद्र का अपेक्षाकृत गर्म रहना:
- इसकी तुलना में, हिंद महासागर (विशेषकर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर) अपनी संचित ऊष्मा को धीरे-धीरे खोता है और भूमि की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म बना रहता है।
- गर्म समुद्री सतह पर एक निम्न वायुदाब (Low-Pressure) क्षेत्र बना रहता है।
- पवनों की दिशा का उलटना:
- अब दाब-प्रवणता पूरी तरह उलट जाती है। पवनें अब स्थल के उच्च दाब क्षेत्र से समुद्र के निम्न दाब क्षेत्र की ओर बहने लगती हैं।
- पवन की दिशा (उत्तर-पूर्व):
- कोरिओलिस बल के कारण, उत्तरी गोलार्ध में ये पवनें अपनी दाहिनी ओर विक्षेपित हो जाती हैं। चूँकि ये पवनें मध्य एशिया और भारत के उत्तर-पूर्व से आ रही होती हैं, इसलिए इनकी प्रभावी दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर होती है। इसी कारण इन्हें “उत्तर-पूर्वी मानसून” कहा जाता है।
II. उत्तर-पूर्वी मानसून की विशेषताएँ और प्रभाव
- प्रकृति (Nature):
- शुष्क और ठंडी पवनें: चूँकि ये पवनें स्थल से उत्पन्न होती हैं, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से ठंडी और शुष्क होती हैं। इनमें नमी की बहुत कमी होती है।
- वर्षा का अभाव: इसी कारण, उत्तर-पूर्वी मानसून भारत के अधिकांश हिस्सों में वर्षा नहीं करता। इसके बजाय, यह एक शुष्क, शांत और सुखद मौसम लाता है, जिसमें आसमान साफ रहता है। यह उत्तर भारत में शीत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है।
- अपवाद: कोरोमंडल तट पर वर्षा (Rainfall on the Coromandel Coast)
- यह इस मानसून की सबसे महत्वपूर्ण और अनूठी विशेषता है।
- नमी का संग्रहण: जब ये शुष्क उत्तर-पूर्वी पवनें बंगाल की खाड़ी के गर्म पानी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे वाष्पीकरण के माध्यम से भारी मात्रा में नमी ग्रहण कर लेती हैं।
- पर्वतीय बाधा: जब ये नमी युक्त पवनें दक्षिण भारत के पूर्वी तट (कोरोमंडल तट) पर पहुँचती हैं, तो वे वहाँ स्थित पूर्वी घाट की पहाड़ियों से टकराती हैं।
- भारी वर्षा: पूर्वी घाट एक बाधा के रूप में कार्य करता है, जिससे ये पवनें ऊपर उठती हैं, ठंडी होती हैं और भारी पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall) करती हैं।
प्रभावित क्षेत्र:
- तमिलनाडु: यह राज्य अपनी वार्षिक वर्षा का लगभग 48% हिस्सा उत्तर-पूर्वी मानसून से ही प्राप्त करता है। यह राज्य के लिए मुख्य वर्षा ऋतु है।
- आंध्र प्रदेश (दक्षिणी तटीय भाग): इसे भी महत्वपूर्ण वर्षा प्राप्त होती है।
- कर्नाटक (दक्षिण-पूर्वी भाग) और केरल (दक्षिणी भाग): इन क्षेत्रों में भी हल्की से मध्यम वर्षा होती है।
III. उष्णकटिbandhiy चक्रवातों से संबंध
- अक्टूबर-नवंबर का महीना, जब मानसून लौट रहा होता है और समुद्र का तापमान अभी भी गर्म होता है, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों (Tropical Cyclones) के बनने के लिए सबसे अनुकूल समय होता है।
- ये विनाशकारी चक्रवात अक्सर पूर्वी तट (ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु) से टकराते हैं और बहुत कम समय में अत्यधिक भारी वर्षा और तेज हवाओं के साथ विनाश का कारण बनते हैं।
निष्कर्ष
उत्तर-पूर्वी मानसून, दक्षिण-पश्चिम मानसून की तरह एक अखिल भारतीय घटना नहीं है, बल्कि एक क्षेत्रीय महत्व वाली पवन प्रणाली है। यह उत्तर भारत में जहाँ शुष्क और शीतल मौसम का अग्रदूत है, वहीं यह दक्षिण-पूर्वी भारत, विशेषकर तमिलनाडु के लिए, “जीवनदायिनी” वर्षा ऋतु है जो वहाँ के जलाशयों, कृषि और पेयजल की जरूरतों को पूरा करती है।
भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ
- ऋतुनिष्ठ प्रकृति: इसका आगमन और निवर्तन ऋतुओं के चक्र से जुड़ा है।
- अनिश्चितता: इसके आगमन, वापसी और वर्षा की मात्रा में हर साल भिन्नता होती है। इसीलिए कहा जाता है, “भारतीय कृषि मानसून का जुआ है।”
- वर्षा का असमान वितरण: यह देश के सभी हिस्सों में समान रूप से वर्षा नहीं करता। कहीं बाढ़ (मेघालय, मुंबई) आती है तो कहीं सूखा (राजस्थान, महाराष्ट्र का विदर्भ) रहता है।
- मूसलाधार प्रकृति: मानसूनी वर्षा लगातार हल्की बौछारों के रूप में नहीं, बल्कि कुछ दिनों के अंतराल पर होने वाली भारी और मूसलाधार वर्षा के रूप में होती है।
निष्कर्ष
अतः, भारतीय मानसून केवल हवाओं का उलटना नहीं है, बल्कि यह एक जीवनदायिनी, लेकिन अनिश्चित, एकीकृत जलवायु प्रणाली है जो भारत के लिए जल का प्रमुख स्रोत है। इसे भारत का “वास्तविक वित्त मंत्री” (Real Finance Minister) भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी सफलता या विफलता सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है।
हिमालयी क्रायोस्फीयर (Himalayan Cryosphere)
क्रायोस्फीयर (Cryosphere) पृथ्वी की सतह के उन सभी हिस्सों को संदर्भित करता है जहाँ पानी जमे हुए (ठोस) रूप में मौजूद है। इसमें ग्लेशियर (हिमनद), आइस कैप, हिम (बर्फ), पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी हुई जमीन), झील की बर्फ और नदी की बर्फ शामिल हैं।
हिमालयी क्रायोस्फीयर, ध्रुवीय क्षेत्रों (उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव) के बाहर, विश्व का सबसे बड़ा क्रायोस्फीयर है। इसमें विशाल हिमनद (ग्लेशियर) और व्यापक हिम-आवरण (Snow Cover) शामिल हैं, जिसके कारण इस पूरे क्षेत्र को “तीसरा ध्रुव” (The Third Pole) भी कहा जाता है।
I. हिमालयी क्रायोस्फीयर के प्रमुख घटक
- हिमनद (Glaciers):
- परिभाषा: हिमनद, बर्फ की विशाल नदियाँ होती हैं जो गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे-धीरे पहाड़ों से नीचे की ओर बहती हैं। इनका निर्माण वर्षों तक भारी हिमपात के जमा होने और उसके संपीडित (compact) होने से होता है।
- विस्तार: हिमालय-काराकोरम-हिंदुकुश (HKH) क्षेत्र में लगभग 55,000 हिमनद हैं, जो इसे ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर बर्फ का सबसे बड़ा भंडार बनाते हैं।
- उदाहरण: सियाचिन ग्लेशियर (भारत का सबसे लंबा), गंगोत्री ग्लेशियर (गंगा का स्रोत), जेमू ग्लेशियर, मिलाम ग्लेशियर आदि।
- हिम-आवरण (Snow Cover):
- परिभाषा: यह भूमि की सतह पर अस्थायी या स्थायी रूप से जमी हुई बर्फ की परत होती है।
- महत्व: यह सर्दियों में जमा होती है और वसंत तथा गर्मियों में पिघलती है, जिससे नदियों को पानी मिलता है। इसका विस्तार और अवधि हर साल बदलती है और यह मानसून को भी प्रभावित करती है। एक व्यापक हिम-आवरण एल्बिडो (सूर्य के प्रकाश का परावर्तन) को बढ़ाता है, जिससे क्षेत्रीय तापमान नियंत्रित रहता है।
- पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost):
- परिभाषा: यह वह भूमि है जो कम से कम लगातार दो वर्षों तक 0°C (32°F) से नीचे के तापमान पर जमी रहती है।
- विस्तार: यह हिमालय के बहुत ऊँचे और ठंडे क्षेत्रों में पाया जाता है।
II. हिमालयी क्रायोस्फीयर का महत्व: “एशिया का जल मीनार”
हिमालयी क्रायोस्फीयर को “एशिया का जल मीनार” (Water Tower of Asia) कहा जाता है क्योंकि यह एशिया की दस सबसे बड़ी नदी प्रणालियों के लिए जल का स्रोत है, जिनमें शामिल हैं:
- सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, मेकांग, यांग्त्ज़ी, पीली नदी आदि।
इसका महत्व निम्नलिखित क्षेत्रों में है:
- जल सुरक्षा (Water Security):
- ये नदियाँ लगभग 1.9 बिलियन लोगों (विश्व की आबादी का लगभग एक-चौथाई) के लिए पेयजल, सिंचाई और स्वच्छता का प्राथमिक स्रोत हैं।
- शुष्क मौसम में, जब मानसूनी वर्षा नहीं होती, तब इन नदियों में पानी का प्रवाह लगभग पूरी तरह से ग्लेशियरों और बर्फ के पिघलने पर निर्भर करता है।
- कृषि और खाद्य सुरक्षा (Agriculture and Food Security):
- भारत का उपजाऊ उत्तरी मैदान (“भारत का अन्न भंडार”) पूरी तरह से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए पानी और गाद पर निर्भर है। इस पानी का स्रोत हिमालयी क्रायोस्फीयर है।
- जलविद्युत ऊर्जा (Hydropower Energy):
- पहाड़ों से नीचे बहने वाली इन नदियों में जलविद्युत उत्पादन की अपार क्षमता है, जो इस क्षेत्र की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण है।
- जलवायु नियंत्रक (Climate Regulator):
- विशाल हिम-आवरण अपने उच्च एल्बिडो (Albedo) के कारण सूर्य के विकिरण को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देता है, जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
- यह भारतीय मानसून सहित एशियाई मौसम प्रणालियों को भी प्रभावित करता है।
III. जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्रायोस्फीयर पर प्रभाव (एक गंभीर संकट)
वैश्विक तापन (Global Warming) के कारण हिमालयी क्रायोस्फीयर पर गहरा और खतरनाक प्रभाव पड़ रहा है।
- ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना (Rapid Melting of Glaciers):
- वैश्विक औसत की तुलना में हिमालय क्षेत्र अधिक तेजी से गर्म हो रहा है।
- इसके परिणामस्वरूप, ग्लेशियर अभूतपूर्व दर से पीछे हट रहे हैं और पतले हो रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 21वीं सदी के अंत तक हिमालय अपने एक-तिहाई से अधिक ग्लेशियर खो सकता है।
- खतरनाक परिणाम:
- अल्पकालिक (Short-term):
- बाढ़ का खतरा: ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) का खतरा बढ़ रहा है, जहाँ ग्लेशियरों के पिघले पानी से बनी झीलें अचानक फट जाती हैं और निचले इलाकों में विनाशकारी बाढ़ लाती हैं।
- नदियों में पानी का प्रवाह अस्थायी रूप से बढ़ सकता है।
- दीर्घकालिक (Long-term):
- जल का गंभीर संकट: एक बार जब ग्लेशियर काफी हद तक पिघल जाएँगे, तो गर्मियों और शुष्क मौसमों में नदियों में पानी का प्रवाह बहुत कम हो जाएगा, जिससे करोड़ों लोगों के लिए पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हो जाएगा।
- कृषि और खाद्य उत्पादन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा।
- अल्पकालिक (Short-term):
- पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव:
- पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से संग्रहीत कार्बन (मीथेन) वायुमंडल में मुक्त हो सकती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और तेज होगी।
- स्थानीय वनस्पतियों और जीवों के आवास नष्ट हो रहे हैं।
निष्कर्ष:
हिमालयी क्रायोस्फीयर केवल बर्फ का एक निष्क्रिय भंडार नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक जीवन-समर्थक प्रणाली है। जलवायु परिवर्तन के कारण इसका तेजी से क्षरण न केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा है, बल्कि यह इस क्षेत्र के लिए एक गंभीर जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और मानवीय संकट का भी कारण बन रहा है, जिसके लिए तत्काल वैश्विक और क्षेत्रीय ध्यान देने की आवश्यकता है।