भारत का भौतिक स्वरूप 2
तटीय मैदान (The Coastal Plains)
भारत के प्रायद्वीपीय पठार के दोनों ओर, अर्थात पूर्व और पश्चिम में, समुद्र तट के किनारे संकरे मैदानी क्षेत्र फैले हुए हैं, जिन्हें तटीय मैदान (Coastal Plains) कहा जाता है। इनका निर्माण मुख्य रूप से समुद्री लहरों द्वारा निक्षेपण और अपरदन की क्रिया तथा प्रायद्वीपीय नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से हुआ है।
इन मैदानों को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है:
1. पश्चिमी तटीय मैदान (The Western Coastal Plains)
2. पूर्वी तटीय मैदान (The Eastern Coastal Plains)
🌊 पश्चिमी तटीय मैदान (The Western Coastal Plains)
परिभाषा (Definition)
पश्चिमी तटीय मैदान भारत के पश्चिमी तट पर अरब सागर और पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित एक संकरी, लंबी और जलोढ़ निर्मित मैदानी पट्टी है।
इसका विस्तार उत्तर में गुजरात के कच्छ के रण से लेकर दक्षिण में तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक है।
यह मैदान अपनी संकीर्णता, कटी-फटी तटरेखा और प्राकृतिक बंदरगाहों के लिए प्रसिद्ध है।
निर्माण (Formation)
इसका निर्माण मुख्य रूप से समुद्री क्रियाओं (लहरों द्वारा अपरदन एवं निक्षेपण) तथा पश्चिमी घाट से निकलने वाली छोटी, तीव्रगामी नदियों द्वारा लाए गए सीमित अवसादों के जमाव से हुआ है।
इसका एक बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे जलमग्न (Submergence) होने और फिर आंशिक रूप से उभरने की प्रक्रिया का परिणाम है, जिसके कारण इसकी तटरेखा कटी-फटी और गहरी हो गई है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
1. संकीर्णता (Narrowness)
- यह पूर्वी तटीय मैदान की तुलना में बहुत संकरा है।
- इसकी औसत चौड़ाई केवल 60 से 65 किलोमीटर के बीच है।
- यह मध्य भाग (कर्नाटक तट) पर सबसे अधिक संकरा है, जबकि उत्तर (गुजरात) और दक्षिण (केरल) में अपेक्षाकृत चौड़ा हो जाता है।
2. तीव्र ढाल वाली छोटी नदियाँ (Short and Swift Rivers)
- पश्चिमी घाट की ऊँचाई और समुद्र से निकटता के कारण यहाँ से निकलने वाली नदियाँ बहुत छोटी, सीधी और तीव्र गति वाली होती हैं।
- इन नदियों के पास इतना समय या दूरी नहीं होती कि वे बड़े मैदान या डेल्टा का निर्माण कर सकें।
3. ज्वारनदमुखों का निर्माण (Formation of Estuaries)
- नदियाँ तेज गति से और कम अवसाद के साथ समुद्र में मिलती हैं, इसलिए वे अपने मुहाने पर अवसादों का जमाव नहीं कर पातीं।
- इसके बजाय, वे अपने मुहाने को साफ रखती हैं और एक कीप (Funnel) के आकार की गहरी घाटी बनाती हैं, जिसमें समुद्र का पानी अंदर तक आ जाता है।
- इस स्थलाकृति को ज्वारनदमुख (Estuary) कहा जाता है।
- नर्मदा और तापी भारत की सबसे बड़ी ज्वारनदमुख बनाने वाली नदियाँ हैं।
4. कटी-फटी तटरेखा (Indented Coastline)
- तट के जलमग्न होने के कारण यहाँ की तटरेखा बहुत कटी-फटी (Indented) है, जिसमें कई खाड़ियाँ (Creeks) और इनलेट्स (Inlets) पाई जाती हैं।
5. उत्कृष्ट प्राकृतिक बंदरगाह (Excellent Natural Harbours)
- इसी कटी-फटी और गहरी तटरेखा के कारण यहाँ जहाजों के लंगर डालने के लिए आदर्श स्थितियाँ उपलब्ध हैं।
- इसने भारत के कुछ प्रमुख प्राकृतिक बंदरगाहों के विकास में योगदान दिया है — जैसे:
कांडला, मुंबई, न्हावा शेवा (जेएनपीटी), मार्मगाओ और कोच्चि।
6. पश्चजल या ‘कयाल’ (Backwaters or ‘Kayals’)
- इस मैदान की सबसे अनूठी विशेषता इसके दक्षिणी भाग, विशेषकर मालाबार तट (केरल) में पाई जाने वाली लैगून झीलें हैं, जिन्हें स्थानीय रूप से ‘कयाल’ (Kayals) कहा जाता है।
- ये झीलें समुद्र के समानांतर स्थित होती हैं और रेत के टीलों द्वारा समुद्र से अलग हो जाती हैं।
- वेम्बनाड झील भारत की सबसे लंबी और प्रसिद्ध कयाल है।
- ये कयाल नौकायन, मत्स्य पालन और पर्यटन (विशेषकर हाउसबोट) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
7. भारी वर्षा (Heavy Rainfall)
- पश्चिमी घाट के पवन-सम्मुख ढाल (Windward Slope) पर स्थित होने के कारण यह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून से बहुत भारी वर्षा (200 सेमी से अधिक) प्राप्त करता है।
- परिणामस्वरूप, यहाँ की जलवायु आर्द्र उष्णकटिबंधीय (Humid Tropical Climate) है।
पश्चिमी तटीय मैदान के उप-भाग (उत्तर से दक्षिण):
| उप-भाग | विस्तार | राज्य | प्रमुख विशेषताएँ |
| कच्छ और काठियावाड़ का मैदान | कच्छ और काठियावाड़ प्रायद्वीप | गुजरात | कच्छ का रण एक नमकीन दलदली क्षेत्र है। काठियावाड़ लावा निर्मित है। |
| गुजरात का मैदान | नर्मदा, तापी, साबरमती नदियों का मुहाना | गुजरात | सबसे चौड़ा हिस्सा। |
| कोंकण तट | दमन से गोवा तक | महाराष्ट्र, गोवा | तटरेखा कटी-फटी है। चावल और काजू की खेती के लिए प्रसिद्ध। मुंबई यहीं स्थित है। |
| कन्नड़ या कनारा तट | गोवा से मंगलौर (कर्नाटक) तक | कर्नाटक | अत्यंत संकरा है। शरावती नदी पर जोग फॉल्स पास में ही है। लौह अयस्क के भंडार हैं। |
| मालाबार तट | मंगलौर से कन्याकुमारी तक | केरल, तमिलनाडु | यहाँ कई लैगून और पश्चजल (Backwaters) पाए जाते हैं, जिन्हें केरल में ‘कयाल’ (Kayals) कहते हैं (जैसे वेम्बनाड और अष्टमुडी झील)। ये नौकायन और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध हैं। मसालों की खेती के लिए भी जाना जाता है। |
🗺️ कच्छ और काठियावाड़ का मैदान (The Plains of Kutch and Kathiawar)
परिचय (Introduction):
कच्छ और काठियावाड़ का मैदान भारत के पश्चिमी तटीय मैदान का सबसे उत्तरी भाग है, जो मुख्यतः गुजरात राज्य में स्थित है। यह क्षेत्र प्रायद्वीपीय और तटीय दोनों विशेषताओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। भौगोलिक रूप से ये दो निकटवर्ती प्रायद्वीप हैं, परंतु उनकी स्थलरचना और उत्पत्ति में विशिष्ट अंतर पाया जाता है।
🌾 1. कच्छ का मैदान (Plains of Kutch)
स्थिति:
कच्छ का मैदान कच्छ प्रायद्वीप तथा इसके उत्तर और पूर्व में स्थित महान रण (Great Rann of Kutch) एवं छोटा रण (Little Rann of Kutch) से मिलकर बना है।
- प्राचीन काल में कच्छ एक द्वीप था, जो बाद में सिंधु और अन्य नदियों के अवसादों से मुख्य भूमि से जुड़ गया।
- इसके उत्तर और पूर्व में रण, तथा दक्षिण में कच्छ की खाड़ी (Gulf of Kutch) स्थित है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Features):
(1) कच्छ का रण (Rann of Kutch):
- 🌍 विश्व का सबसे बड़ा नमक मरुस्थल (Largest Salt Desert)
- उत्पत्ति: यह मूल रूप से समुद्र का उथला भाग था, जो भूवैज्ञानिक उत्थान और नदीय अवसादों के कारण समुद्र से कट गया।
- दो भाग:
- महान रण (Great Rann) — उत्तर में
- छोटा रण (Little Rann) — दक्षिण-पूर्व में
- महान रण (Great Rann) — उत्तर में
- मानसून में जलमग्न: जून–सितंबर के दौरान समुद्री और नदीय जल के कारण यह क्षेत्र उथले पानी में डूब जाता है।
- सूखने पर: सतह पर सफेद नमक की परत जम जाती है, जिससे यह “सफेद मरुस्थल (White Desert)” कहलाता है।
(2) बन्नी घासभूमि (Banni Grasslands):
- रण के दक्षिणी किनारे पर एशिया की सबसे बड़ी उष्णकटिबंधीय घासभूमियों में से एक।
- यह क्षेत्र पशुपालन और जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(3) अर्थव्यवस्था एवं पर्यटन:
- नमक उत्पादन: भारत के प्रमुख नमक उत्पादक क्षेत्रों में से एक।
- पर्यटन: प्रसिद्ध “रण उत्सव” के कारण यह एक प्रमुख पर्यटन स्थल बन चुका है।
- वन्यजीव: छोटा रण भारतीय जंगली गधे (Wild Ass) का एकमात्र प्राकृतिक आवास है।
🌋 2. काठियावाड़ का मैदान (Plains of Kathiawar)
स्थिति:
काठियावाड़ का मैदान कच्छ के दक्षिण में, खंभात की खाड़ी (Gulf of Khambhat) और अरब सागर के बीच स्थित है। यह मुख्यतः काठियावाड़ प्रायद्वीप (Kathiawar Peninsula) के तटीय भागों को शामिल करता है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Features):
(1) ज्वालामुखीय उत्पत्ति (Volcanic Origin):
- इस क्षेत्र का मध्य भाग दक्कन ट्रैप (Deccan Trap) के बेसाल्टिक लावा से निर्मित है।
- केंद्रीय उच्चभूमि: इसमें कई पहाड़ियाँ हैं, जिनमें प्रमुख है — गिरनार की पहाड़ियाँ (Girnar Hills)।
(2) अपवाह तंत्र (Drainage System):
- नदियाँ इस केंद्रीय उच्चभूमि से सभी दिशाओं में बहती हैं, जिससे अरीय अपवाह प्रतिरूप (Radial Drainage Pattern) बनता है।
- मुख्य नदियाँ: भद्र और शतरुंजी।
(3) तटीय मैदान (Coastal Plains):
- तटीय किनारे संकरे हैं और नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से बने हैं।
- ये मैदान नर्मदा–तापी के मैदान से मिल जाते हैं।
(4) गिर राष्ट्रीय उद्यान (Gir National Park):
- यह क्षेत्र एशियाई शेरों (Asiatic Lions) का दुनिया का एकमात्र प्राकृतिक आवास है।
(5) आर्थिक महत्व:
- कृषि: कपास और मूंगफली की खेती के लिए प्रसिद्ध।
- बंदरगाह: कांडला (कच्छ की खाड़ी के पास) और पोरबंदर जैसे प्रमुख बंदरगाह यहाँ स्थित हैं।
🧭 निष्कर्ष (Conclusion):
कच्छ और काठियावाड़ भारत के पश्चिमी तटीय मैदान के दो विशिष्ट क्षेत्र हैं।
- कच्छ अपनी अनोखी सफेद नमक भूमि और जंगली गधे के अभयारण्य के लिए प्रसिद्ध है।
- काठियावाड़ अपनी ज्वालामुखीय स्थलाकृति, अरीय अपवाह तंत्र, और गिर के शेरों के कारण विशेष पहचान रखता है।
दोनों क्षेत्र मिलकर पश्चिमी भारत की भौगोलिक विविधता और प्राकृतिक संपदा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
गुजरात का मैदान (The Gujarat Plains)
गुजरात का मैदान, पश्चिमी तटी-य मैदान का सबसे उत्तरी और सबसे चौड़ा हिस्सा है। यह मैदान कच्छ और काठियावाड़ प्रायद्वीपों के पूर्व में स्थित है और राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र की सीमाओं तक फैला हुआ है। इसका निर्माण मुख्य रूप से नर्मदा, तापी, माही और साबरमती जैसी बड़ी और शक्तिशाली नदियों द्वारा लाए गए जलो-ढ़ निक्षेपों से हुआ है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह मैदान पूर्वी गुजरात में विस्तृत है।
- पश्चिम में: इसके कच्छ का छोटा रण और काठियावाड़ प्रायद्वीप हैं।
- पूर्व में: विंध्य और सतपुड़ा श्रेणियों के पश्चिमी ढलान और मालवा का पठार इसकी सीमा बनाते हैं।
- उत्तर में: इसकी सीमा अरावली श्रृंखला और राजस्थान के मैदानों से लगती है।
- दक्षिण में: यह महाराष्ट्र के कोंकण तट में विलीन हो जाता है।
- चौड़ाई: यह पश्चिमी तटीय मैदान का सबसे चौड़ा भाग है, जिसकी चौड़ाई औसतन 100 से 150 किलोमीटर है, विशेषकर खंभात की खाड़ी के पास।
निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)
- यह मैदान चार प्रमुख नदियों – नर्मदा, तापी, माही और साबरमती – द्वारा बहाकर लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) के जमाव का परिणाम है।
- ये सभी नदियाँ अपना मुहाना खंभात की खाड़ी (Gulf of Khambhat) में बनाती हैं, जिससे इस क्षेत्र में एक विशाल और अत्यंत उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ है।
- हवा द्वारा लाए गए लोएस (Loess) के बारीक कणों का भी इस मैदान के निर्माण में योगदान है, जो इसे एक विशिष्ट संरचना प्रदान करते हैं।
गुजरात के मैदान की प्रमुख विशेषताएँ
- उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (Fertile Alluvial Soil):
- इस मैदान की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी अत्यंत उपजाऊ मिट्टी है, जिसमें जलोढ़ के साथ-साथ काली मिट्टी के अंश भी पाए जाते हैं, जो पास के मालवा और काठियावाड़ के लावा पठारों से आई है।
- यह उपजाऊ भूमि इसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों में से एक बनाती है।
- प्रमुख कृषि क्षेत्र:
- यह मैदान व्यावसायिक फसलों के उत्पादन का एक प्रमुख केंद्र है।
- यहाँ कपास (Cotton), तम्बाकू (Tobacco), और मूंगफली (Groundnut) की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।
- इसके अलावा, सिंचित क्षेत्रों में चावल और गेहूं का भी उत्पादन होता है।
- अपवाह तंत्र (Drainage System):
- नर्मदा और तापी नदियाँ पूर्व से पश्चिम की ओर एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) में बहती हुई यहाँ खंभात की खाड़ी में गिरती हैं और ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं।
- माही और साबरमती नदियाँ मध्य भारत की उच्च भूमि से निकलकर दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती हुई इसी खाड़ी में मिलती हैं।
- इन नदियों के मुहानों के पास का क्षेत्र दलदली है और यहाँ नमक के मैदान या ‘सॉल्ट पैन’ (Salt Pans) पाए जाते हैं।
- समतल भू-भाग:
- मैदान का अधिकांश भाग लगभग समतल है और इसका ढाल पूर्व से पश्चिम की ओर (खंभात की खाड़ी की ओर) बहुत मंद है।
- औद्योगिक और शहरी केंद्र:
- कृषि की समृद्धि और तट पर स्थित होने के कारण, यह मैदान सघन आबादी वाला है और भारत के सबसे अधिक औद्योगिकृत क्षेत्रों में से एक है।
- अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, भरूच, और आणंद जैसे प्रमुख औद्योगिक, व्यावसायिक और शहरी केंद्र इसी मैदान पर स्थित हैं।
- इस क्षेत्र में कपड़ा, पेट्रोकेमिकल्स, डेयरी (आणंद – अमूल का घर), और फार्मास्यूटिकल्स जैसे उद्योग अत्यधिक विकसित हैं।
निष्कर्ष: गुजरात का मैदान, बड़ी नदियों द्वारा निर्मित एक चौड़ा और उपजाऊ जलोढ़ मैदान है। यह न केवल गुजरात की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, बल्कि अपने महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्रों और घनी आबादी के साथ भारत के सबसे गतिशील और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।
कोंकण तट (The Konkan Coast)
कोंकण तट, पश्चिमी तटीय मैदान का वह हिस्सा है जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र और गोवा राज्यों में फैला हुआ है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक किलों, खूबसूरत समुद्र तटों (beaches), कटी-फटी तटरेखा और भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई की उपस्थिति के लिए प्रसिद्ध है।
भौगोलिक विस्तार एवं सीमा (Geographical Extent and Boundaries)
- विस्तार: कोंकण तट उत्तर में दमन से लेकर दक्षिण में गोवा तक लगभग 500 से 530 किलोमीटर की लंबाई में फैला हुआ है।
- उत्तर में: इसकी सीमा गुजरात के मैदान से लगती है।
- पूर्व में: पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) इसकी पूर्वी सीमा बनाता है।
- दक्षिण में: इसकी सीमा कर्नाटक के कन्नड़ तट से लगती है।
- पश्चिम में: अरब सागर स्थित है।
- चौड़ाई: यह एक संकरा तटीय मैदान है, जिसकी चौड़ाई 50 से 80 किलोमीटर के बीच है।
कोंकण तट की प्रमुख विशेषताएँ
- कटी-फटी तटरेखा (Highly Indented Coastline):
- कोंकण तट की सबसे विशिष्ट विशेषता इसकी तटरेखा का बहुत अधिक कटा-फटा होना है। यह “रिया तट” (Ria Coast) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो जलमग्न नदी घाटियों के कारण बनता है।
- इस कटी-फटी तटरेखा में कई छोटी-छोटी खाड़ियाँ (Creeks) और ज्वारनदमुख (Estuaries) पाए जाते हैं।
- उत्कृष्ट प्राकृतिक बंदरगाह (Excellent Natural Harbours):
- इसी कटी-फटी और गहरी तटरेखा के कारण, यहाँ जहाजों को सुरक्षित लंगर डालने के लिए आदर्श स्थितियाँ हैं, जिसने भारत के कुछ सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक बंदरगाहों के विकास में मदद की है।
- मुंबई बंदरगाह (Mumbai Port) भारत का सबसे बड़ा प्राकृतिक बंदरगाह है। इसके भार को कम करने के लिए न्हावा शेवा (जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट – JNPT) को विकसित किया गया है।
- समुद्री चट्टानें और द्वीप (Cliffs and Islands):
- तट के किनारे कई स्थानों पर समुद्री चट्टानें (Cliffs) और छोटे-छोटे चट्टानी द्वीप पाए जाते हैं, जो इसकी प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाते हैं।
- अपवाह तंत्र (Drainage System):
- यहाँ बहने वाली नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलती हैं और बहुत छोटी तथा तीव्र गति वाली होती हैं। उल्हास और वैतरणा यहाँ की प्रमुख नदियाँ हैं।
- ये नदियाँ अपने मुहाने पर ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं, डेल्टा का नहीं।
- भूगर्भिक संरचना:
- इसका निर्माण समुद्री निक्षेपों (Marine deposits) के साथ-साथ नदीय जलोढ़ (Riverine alluvium) से हुआ है। कुछ स्थानों पर दक्कन ट्रैप के लावा के प्रमाण भी मिलते हैं।
आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व
- कृषि:
- यह क्षेत्र अपनी बागवानी (Horticulture) के लिए प्रसिद्ध है।
- यहाँ उच्च गुणवत्ता वाले अल्फांसो आम (Alphonso Mangoes), काजू (Cashew nuts), नारियल और सुपारी का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है।
- तटीय क्षेत्रों में चावल (Paddy) मुख्य फसल है।
- मत्स्य पालन (Fisheries):
- लंबी और कटी-फटी तटरेखा तथा कई खाड़ियाँ होने के कारण यह एक प्रमुख मत्स्य पालन केंद्र है।
- पर्यटन:
- कोंकण तट अपने मनोरम समुद्र तटों (beaches) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। गोवा के समुद्र तट (जैसे कैलंगुट, बागा), और महाराष्ट्र के समुद्र तट (जैसे गणपतिपुले, अलीबाग) हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
- ऐतिहासिक किले: यह तट छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा बनाए गए कई प्रसिद्ध समुद्री किलों (Sea Forts) जैसे सिंधुदुर्ग और मुरुड-जंजीरा के लिए भी जाना जाता है, जो इसके सामरिक महत्व को दर्शाते हैं।
- कोंकण रेलवे (Konkan Railway): इस दुर्गम तटीय क्षेत्र से होकर गुजरने वाली कोंकण रेलवे इंजीनियरिंग का एक अद्भुत नमूना है, जो कई पुलों और सुरंगों से होकर गुजरती है और एक मनमोहक यात्रा का अनुभव कराती है।
- भारत का आर्थिक केंद्र:
- भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई इसी तट पर स्थित है, जो देश का सबसे बड़ा वाणिज्यिक, वित्तीय और औद्योगिक केंद्र है।
निष्कर्ष: कोंकण तट एक संकरा, कटा-फटा और प्राकृतिक रूप से सुंदर तटीय मैदान है, जो भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यटन परिदृश्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
कन्नड़ या कनारा तट (Kannada or Kanara Coast)
कन्नड़ तट, जिसे कनारा तट भी कहा जाता है, पश्चिमी तटीय मैदान का मध्य भाग है। यह कोंकण तट और मालाबार तट के बीच स्थित एक अपेक्षाकृत संकरा लेकिन विशिष्ट भू-आकृतिक विशेषताओं वाला तटीय क्षेत्र है।
भौगोलिक विस्तार एवं सीमा (Geographical Extent and Boundaries)
- विस्तार: कन्नड़ तट उत्तर में गोवा से लेकर दक्षिण में मंगलौर (Mangaluru), कर्नाटक तक फैला हुआ है।
- राज्य: यह तटीय मैदान पूरी तरह से कर्नाटक राज्य में स्थित है।
- चौड़ाई: यह पश्चिमी तटीय मैदान का सबसे संकरा हिस्सा है। इसकी औसत चौड़ाई केवल 30 से 50 किलोमीटर है। कुछ स्थानों पर पश्चिमी घाट समुद्र के बहुत करीब आ जाते हैं, जिससे इसकी चौड़ाई और भी कम हो जाती है।
कन्नड़ तट की प्रमुख विशेषताएँ
- अत्यधिक संकीर्णता (Extreme Narrowness):
- इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसकी अत्यधिक संकीर्णता है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ यहाँ समुद्र तट के बहुत निकट हैं, जिससे मैदान के विकास के लिए बहुत कम जगह बची है।
- ऊँची और चट्टानी स्थलाकृति (Elevated and Rocky Topography):
- कोंकण और मालाबार के रेतीले मैदानों के विपरीत, कन्नड़ तट का बड़ा हिस्सा पठारी और चट्टानी है। यह पश्चिमी घाट की तलहटी जैसा प्रतीत होता है जो सीधे समुद्र में उतरती है।
- यहाँ रेतीले समुद्र तट (beaches) कम और चट्टानी तटरेखा (rocky coastline) अधिक है।
- शानदार जलप्रपात (Spectacular Waterfalls):
- पश्चिमी घाट के तीव्र ढलान से उतरने वाली नदियाँ इस तट पर शानदार जलप्रपातों का निर्माण करती हैं।
- जोग या गरसोप्पा जलप्रपात (Jog or Gersoppa Falls): शरावती नदी पर स्थित यह जलप्रपात भारत के सबसे ऊँचे और सबसे प्रसिद्ध जलप्रपातों में से एक है। यह इसी तटीय क्षेत्र की एक प्रमुख पहचान है।
- लौह अयस्क के भंडार (Iron Ore Deposits):
- यह तटीय क्षेत्र उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के समृद्ध भंडारों से युक्त है।
- पश्चिमी घाट की कुद्रेमुख खदानों से निकाला गया लौह अयस्क पाइपलाइन के माध्यम से न्यू मंगलौर बंदरगाह (New Mangalore Port) तक पहुँचाया जाता है और वहाँ से निर्यात किया जाता है।
- तीव्र गति वाली नदियाँ (Swift-flowing Rivers):
- यहाँ की नदियाँ (जैसे शरावती, काली, नेत्रावती) छोटी और बहुत तेज गति से बहती हैं।
- कोंकण तट की तरह ही, ये नदियाँ भी डेल्टा न बनाकर छोटे ज्वारनदमुख (Estuaries) का निर्माण करती हैं।
आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व
- बंदरगाह (Ports):
- न्यू मंगलौर बंदरगाह इस तट का सबसे प्रमुख और भारत के प्रमुख बंदरगाहों में से एक है। यह मुख्य रूप से लौह अयस्क के निर्यात के लिए महत्वपूर्ण है।
- कारवार बंदरगाह एक अन्य महत्वपूर्ण बंदरगाह है, जिसका उपयोग नौसैनिक अड्डे (Naval Base) के रूप में भी होता है।
- कृषि:
- यहाँ की प्रमुख फसलों में चावल, नारियल, सुपारी (Areca nut) और मसाले (जैसे काली मिर्च) शामिल हैं।
- मत्स्य पालन (Fisheries):
- यह एक महत्वपूर्ण मत्स्य पालन केंद्र है। मैकेरल (Mackerel) यहाँ की एक प्रमुख मछली है। भटकल और कारवार मछली पकड़ने के प्रमुख केंद्र हैं।
- पर्यटन:
- यद्यपि यहाँ कोंकण या मालाबार जैसे प्रसिद्ध रेतीले समुद्र तट कम हैं, फिर भी कुछ खूबसूरत बीच हैं जैसे मरवंथे बीच (Maravanthe Beach) (जहाँ एक तरफ राष्ट्रीय राजमार्ग और दूसरी तरफ समुद्र है) और गोकर्ण बीच (Gokarna Beach) (जो एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल भी है)।
निष्कर्ष: कन्नड़ तट, पश्चिमी तटीय मैदान का सबसे संकरा, चट्टानी और ऊँचा हिस्सा है। यह अपने शानदार जोग फॉल्स, समृद्ध लौह अयस्क भंडारों और महत्वपूर्ण न्यू मंगलौर बंदरगाह के लिए जाना जाता है। इसकी स्थलाकृति पठारी होने के कारण यह कृषि की तुलना में खनन और बंदरगाह गतिविधियों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।
मालाबार तट (The Malabar Coast)
मालाबार तट, पश्चिमी तटीय मैदान का सबसे दक्षिणी भाग है। यह अपनी अनूठी प्राकृतिक सुंदरता, हरे-भरे परिदृश्य, मसालों के बागानों, और विशेष रूप से अपनी पश्चजल या ‘कयाल’ (Backwaters or ‘Kayals’) की प्रणाली के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पर्यटन केंद्र है।
भौगोलिक विस्तार एवं सीमा (Geographical Extent and Boundaries)
- विस्तार: मालाबार तट उत्तर में मंगलौर (कर्नाटक) से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी (तमिलनाडु) तक फैला हुआ है।
- राज्य: इसका अधिकांश और सबसे प्रमुख हिस्सा केरल राज्य में है, तथा इसका कुछ विस्तार दक्षिणी कर्नाटक और दक्षिणी तमिलनाडु में भी है।
- चौड़ाई: यह तट कन्नड़ तट की तुलना में अधिक चौड़ा है, और इसके दक्षिणी भाग में इसकी चौड़ाई बढ़ जाती है।
मालाबार तट की प्रमुख विशेषताएँ
- कयाल या पश्चजल (Kayals or Backwaters):
- यह मालाबार तट की सबसे प्रमुख और अनूठी विशेषता है।
- ‘कयाल’ खारे पानी की लैगून (Lagoon) झीलें होती हैं, जो तट के समानांतर चलती हैं और संकरे रेत के टीलों या बालुका रोधिकाओं (Sand Bars) द्वारा समुद्र से अलग हो जाती हैं।
- यह कयाल आपस में नहरों द्वारा जुड़े हुए हैं, जिससे लगभग 300 किलोमीटर लंबा एक अंतर्देशीय जलमार्ग (Inland Waterway) का नेटवर्क बनता है।
- प्रमुख कयाल:
- वेम्बनाड झील (Vembanad Lake): यह भारत की सबसे लंबी झील और केरल की सबसे बड़ी कयाल है। प्रसिद्ध नेहरू ट्रॉफी बोट रेस (वल्लम काली) इसी झील में आयोजित की जाती है। कोच्चि बंदरगाह इसी के मुहाने पर स्थित है।
- अष्टमुडी झील (Ashtamudi Lake): यह एक और प्रमुख कयाल है, जिसका आकार आठ भुजाओं वाले तारे जैसा है। इसे इसके पारिस्थितिक महत्व के कारण रामसर साइट (Ramsar Site) घोषित किया गया है।
- बालुका रोधिकाएँ (Sand Bars):
- कयाल का निर्माण समुद्री लहरों द्वारा रेत के निक्षेपण से बनी लंबी और संकरी बालुका रोधिकाओं या स्पिट्स (Spits) के कारण होता है। ये रोधिकाएँ समुद्र और लैगून के बीच एक अवरोधक का काम करती हैं।
- अपेक्षाकृत चौड़ा मैदान:
- कोंकण और कन्नड़ तटों की तुलना में यह तटीय मैदान अधिक चौड़ा और समतल है।
- उच्च वर्षा:
- यह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा से बहुत भारी वर्षा (250-300 सेमी से अधिक) प्राप्त करता है। यह भारत के सबसे आर्द्र क्षेत्रों में से एक है।
आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व
- मसालों का तट (Spice Coast):
- प्राचीन काल से ही मालाबार तट अपने मसालों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध रहा है।
- यहाँ काली मिर्च, इलायची, लौंग, दालचीनी, और जायफल जैसे मसालों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसी कारण इसे “मसालों का बगीचा” भी कहा जाता है।
- यही मसालों का व्यापार था जिसने वास्को डी गामा जैसे यूरोपीय खोजकर्ताओं को यहाँ आने के लिए आकर्षित किया।
- कृषि:
- मसालों के अलावा, यह तट चावल, नारियल, काजू, केला और रबर के उत्पादन का भी प्रमुख केंद्र है।
- पर्यटन:
- मालाबार तट, विशेषकर केरल का हिस्सा, भारत के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है।
- यहाँ के कयाल (बैकवाटर) में हाउसबोट (Houseboat) यात्रा, हरे-भरे परिदृश्य, शांत समुद्र तट (जैसे कोवलम और वर्कला), और आयुर्वेदिक उपचार दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
- मत्स्य पालन (Fisheries):
- कयाल और समुद्र तट एक समृद्ध मत्स्य उद्योग का आधार हैं।
- परिवहन (Transportation):
- कयाल का नेटवर्क स्थानीय परिवहन और माल ढुलाई के लिए एक महत्वपूर्ण और सस्ता अंतर्देशीय जलमार्ग प्रदान करता है।
निष्कर्ष: मालाबार तट, अपनी शांत और सुरम्य कयाल प्रणाली के साथ पश्चिमी तटीय मैदान का एक अनूठा खंड है। यह न केवल मसालों के ऐतिहासिक व्यापार का केंद्र रहा है, बल्कि आज अपनी प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध संस्कृति और जीवंत पर्यटन उद्योग के कारण भारत के सबसे आकर्षक क्षेत्रों में से एक है।
पूर्वी तटीय मैदान (The Eastern Coastal Plains)
परिभाषा (Definition)
पूर्वी तटीय मैदान, भारत के पूर्वी तट पर बंगाल की खाड़ी और पूर्वी घाट पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित एक चौड़ा, समतल और उपजाऊ मैदानी भूभाग है। इसका विस्तार उत्तर में पश्चिम बंगाल से लेकर ओडिशा और आंध्र प्रदेश से होते हुए दक्षिण में तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक है। यह मैदान अपनी चौड़ाई, उपजाऊ डेल्टाओं और कृषि की समृद्धि के लिए जाना जाता है।
निर्माण (Formation)
- इसका निर्माण मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत की बड़ी, पूर्व की ओर बहने वाली नदियों – महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी – द्वारा लाए गए भारी मात्रा में जलोढ़ निक्षेपों (Alluvial Deposits) से हुआ है।
- समुद्री क्रियाओं, विशेषकर लहरों द्वारा अवसादों के निक्षेपण, ने भी इसके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- भूवैज्ञानिक रूप से, इसे एक ‘उभरता हुआ तट’ (Coast of Emergence) माना जाता है, जिसका अर्थ है कि यह समुद्र तल से धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है या समुद्र का जल स्तर पीछे हट रहा है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- अत्यधिक चौड़ाई और समतलता (Greater Width and Flatness):
- यह पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में बहुत अधिक चौड़ा और समतल है। इसकी औसत चौड़ाई 100 से 130 किलोमीटर तक है, जो नदी डेल्टाओं के पास और भी बढ़ जाती है।
- तमिलनाडु में इसकी चौड़ाई सबसे अधिक है।
- उपजाऊ डेल्टाओं का निर्माण (Formation of Fertile Deltas):
- यह इस मैदान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
- पूर्वी घाट से निकलकर मंद ढाल पर बहने वाली बड़ी नदियाँ (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) अपने मुहाने पर विशाल और अत्यंत उपजाऊ डेल्टाओं (Deltas) का निर्माण करती हैं।
- ये डेल्टा क्षेत्र सघन आबादी वाले और गहन कृषि के केंद्र हैं, विशेषकर चावल की खेती के लिए। कृष्णा-गोदावरी डेल्टा को “दक्षिण भारत का अन्न भंडार” (Granary of South India) भी कहा जाता है।
- सीधी और सपाट तटरेखा (Straight and Smooth Coastline):
- पश्चिमी तट के विपरीत, यहाँ की तटरेखा सीधी और सपाट है। इसमें बहुत कम कटाव या मोड़ हैं।
- प्राकृतिक बंदरगाहों का अभाव (Lack of Natural Harbours):
- इसी सीधी और उथली तटरेखा के कारण, यहाँ जहाजों के सुरक्षित लंगर डालने के लिए उपयुक्त गहरी और संरक्षित खाड़ियाँ नहीं हैं।
- परिणामस्वरूप, यहाँ प्राकृतिक बंदरगाहों का अभाव है। अधिकांश प्रमुख बंदरगाह (जैसे चेन्नई, तूतीकोरिन, पारादीप) कृत्रिम (Artificial) रूप से बनाए गए हैं।
- विशाखापत्तनम और पारादीप कुछ हद तक प्राकृतिक बंदरगाहों के अपवाद हैं, जो चट्टानी उभारों द्वारा संरक्षित हैं।
- बड़ी लैगून झीलें (Large Lagoon Lakes):
- डेल्टाओं के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान, तट के किनारे बड़ी और उथली खारे पानी की लैगून झीलें बन गई हैं।
- चिल्का झील (ओडिशा): यह भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील है।
- कोलेरू झील (आंध्र प्रदेश): यह गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टा के बीच स्थित एक मीठे पानी की झील है।
- पुलिकट झील (आंध्र प्रदेश-तमिलनाडु सीमा): यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील है। श्रीहरिकोटा द्वीप, जहाँ भारत का सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र है, इसी झील को बंगाल की खाड़ी से अलग करता है।
- वर्षा की प्रकृति (Nature of Rainfall):
- यह मैदान दक्षिण-पश्चिम मानसून से वर्षा प्राप्त करता है।
- इसके अतिरिक्त, इसका दक्षिणी भाग, विशेषकर कोरोमंडल तट (तमिलनाडु), उत्तर-पूर्वी मानसून या लौटते हुए मानसून (Retreating Monsoon) से सर्दियों (अक्टूबर-दिसंबर) में भी महत्वपूर्ण वर्षा प्राप्त करता है।
पूर्वी तटीय मैदान के उप-भाग (उत्तर से दक्षिण):
| उप-भाग | विस्तार | राज्य | प्रमुख विशेषताएँ |
| उत्कल तट | चिल्का झील से कोलेरू झील तक (महानदी डेल्टा सहित) | ओडिशा, आंध्र प्रदेश | चिल्का झील (भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील) यहीं है। महानदी का डेल्टा यहाँ स्थित है। |
| उत्तरी सरकार तट | कोलेरू झील से पुलिकट झील तक | आंध्र प्रदेश | यह पूर्वी तट का मध्य भाग है। गोदावरी और कृष्णा नदियों का विशाल और उपजाऊ डेल्टा यहीं बनता है। |
| कोरोमंडल तट | पुलिकट झील से कन्याकुमारी तक | तमिलनाडु | यह उत्तर-पूर्वी मानसून (लौटते हुए मानसून) से सर्दियों में वर्षा प्राप्त करता है। कावेरी नदी का डेल्टा यहीं है। |
उत्कल तट (The Utkal Coast)
उत्कल तट, पूर्वी तटीय मैदान का सबसे उत्तरी भाग है। इसका नाम उड़ीसा के प्राचीन नाम ‘उत्कल’ पर रखा गया है। यह तट मुख्य रूप से अपनी चौड़ी समतल भूमि, महानदी के विशाल डेल्टा और भारत की सबसे बड़ी तटीय झील ‘चिल्का’ के लिए प्रसिद्ध है।
भौगोलिक विस्तार एवं सीमा (Geographical Extent and Boundaries)
- विस्तार: उत्कल तट उत्तर में सुवर्णरेखा नदी (पश्चिम बंगाल-ओडिशा सीमा) से लेकर दक्षिण में ऋषिकुल्या नदी या चिल्का झील तक फैला हुआ है। कुछ भूगोलवेत्ता इसे कोलेरू झील (आंध्र प्रदेश) तक भी विस्तृत मानते हैं, जिसमें पूरा महानदी डेल्टा शामिल हो जाता है।
- राज्य: इसका संपूर्ण विस्तार मुख्य रूप से ओडिशा राज्य के तटीय क्षेत्रों में है।
- चौड़ाई: यह पूर्वी तटीय मैदान का एक बहुत चौड़ा हिस्सा है, विशेषकर महानदी डेल्टा के पास, जहाँ इसकी चौड़ाई 100 किलोमीटर से भी अधिक हो जाती है।
उत्कल तट की प्रमुख विशेषताएँ
- महानदी डेल्टा (Mahanadi Delta):
- यह उत्कल तट की सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण स्थलाकृति है।
- महानदी नदी और उसकी सहायक नदियाँ (जैसे ब्राह्मणी, वैतरणी) पूर्वी घाट से उतरकर इस मैदान में प्रवेश करती हैं और समुद्र में मिलने से पहले एक विशाल और अत्यंत उपजाऊ डेल्टा का निर्माण करती हैं।
- यह डेल्टा क्षेत्र सघन आबादी वाला और गहन कृषि का केंद्र है, विशेषकर चावल (Paddy) की खेती के लिए। इसी कारण इसे “ओडिशा का अन्न भंडार” भी कहा जाता है।
- चिल्का झील (Chilika Lake):
- यह उत्कल तट के दक्षिणी भाग में स्थित भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील है।
- यह महानदी डेल्टा के ठीक दक्षिण में स्थित है और एक संकरी बालुका रोधिका (Sand bar) द्वारा बंगाल की खाड़ी से अलग होती है।
- यह एक रामसर साइट (Ramsar Site) है और प्रवासी पक्षियों (विशेषकर सर्दियों में) के लिए एशिया का सबसे बड़ा आश्रय स्थल है। यह अपनी समृद्ध जैव-विविधता और मछली पकड़ने के उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।
- सीधी और रेतीली तटरेखा (Straight and Sandy Coastline):
- उत्कल तट की तटरेखा सीधी है और यहाँ लंबे, चौड़े और रेतीले समुद्र तट (Beaches) पाए जाते हैं।
- पुरी बीच और कोणार्क बीच प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हैं।
- बंदरगाह (Ports):
- पारादीप बंदरगाह (Paradip Port): यह उत्कल तट पर स्थित एक गहरा और प्रमुख प्राकृतिक बंदरगाह है। यह मुख्य रूप से छोटानागपुर पठार और ओडिशा के भीतरी इलाकों से लौह अयस्क, कोयला और अन्य खनिजों के निर्यात के लिए उपयोग किया जाता है।
- गोपालपुर बंदरगाह और धामरा बंदरगाह भी यहाँ के अन्य महत्वपूर्ण बंदरगाह हैं।
- चक्रवातों का प्रभाव (Influence of Cyclones):
- बंगाल की खाड़ी में बनने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones) से यह तट बहुत अधिक प्रभावित होता है। हर साल यहाँ चक्रवाती तूफानों से भारी वर्षा, तेज हवाएं और बाढ़ आती है, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है।
सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व
- कृषि: महानदी डेल्टा में सघन चावल की खेती यहाँ की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। इसके अलावा नारियल, सुपारी और दालों की खेती भी होती है।
- पर्यटन और तीर्थाटन:
- पुरी: यहाँ प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर स्थित है, जो हिंदुओं के चार धामों में से एक है। पुरी का समुद्र तट भी एक बड़ा आकर्षण है।
- कोणार्क: यहाँ विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर (Sun Temple) स्थित है, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
- खनिज और उद्योग: यद्यपि तट पर खनिज नहीं हैं, लेकिन यह अपने भीतरी इलाकों (hinterland) जैसे छोटानागपुर और दंडकारण्य पठारों से खनिजों के निर्यात का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
निष्कर्ष: उत्कल तट, महानदी के उपजाऊ डेल्टा, विशाल चिल्का झील और महत्वपूर्ण पारादीप बंदरगाह का घर है। यह सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, कृषि प्रधान क्षेत्र होने के साथ-साथ चक्रवातों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भी अत्यंत संवेदनशील है।
उत्तरी सरकार तट (The Northern Circars Coast)
उत्तरी सरकार तट, पूर्वी तटीय मैदान का मध्य भाग है, जो उत्कल तट (उत्तर में) और कोरोमंडल तट (दक्षिण में) के बीच स्थित है। यह तट मुख्य रूप से दो विशाल और उपजाऊ नदी डेल्टाओं के निर्माण के लिए जाना जाता है, जो इसे दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों में से एक बनाते हैं।
“सरकार” (Circar) शब्द ब्रिटिश काल के एक प्रशासनिक जिले को संदर्भित करता है, और उसी के नाम पर इस तटीय क्षेत्र का नाम पड़ा।
भौगोलिक विस्तार एवं सीमा (Geographical Extent and Boundaries)
- विस्तार: उत्तरी सरकार तट उत्तर में ऋषिकुल्या नदी (ओडिशा) या कोलेरू झील से लेकर दक्षिण में पुलिकट झील या कृष्णा नदी के डेल्टा तक फैला हुआ है। (भूगोलवेत्ताओं के बीच इसकी सटीक सीमाओं को लेकर थोड़ा मतभेद है)।
- राज्य: इसका विस्तार मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश राज्य के तटीय क्षेत्रों में और दक्षिणी ओडिशा के कुछ हिस्सों में है।
- चौड़ाई: यह एक बहुत चौड़ा मैदान है, खासकर नदी डेल्टाओं के पास इसकी चौड़ाई काफी बढ़ जाती है।
उत्तरी सरकार तट की प्रमुख विशेषताएँ
- दो विशाल डेल्टाओं का मैदान (Plain of Two Major Deltas):
- इस तट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता दो प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियों – गोदावरी और कृष्णा – द्वारा बनाए गए विशाल और उपजाऊ डेल्टा हैं।
- गोदावरी डेल्टा और कृष्णा डेल्टा आपस में लगभग मिल गए हैं, जिससे एक बहुत बड़ा, लगभग निरंतर जलोढ़ मैदान बन गया है।
- “दक्षिण भारत का अन्न भंडार” (Granary of South India):
- गोदावरी-कृष्णा डेल्टा (K-G Delta) की अत्यधिक उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी और विकसित नहर सिंचाई प्रणाली ने इसे भारत के सबसे गहन कृषि क्षेत्रों में से एक बना दिया है।
- यह क्षेत्र चावल (Paddy) और तम्बाकू (Tobacco) के उत्पादन में अग्रणी है। इसी सघन कृषि के कारण इस क्षेत्र को “दक्षिण भारत का अन्न भंडार” की संज्ञा दी जाती है।
- इसके अलावा यहाँ गन्ना, नारियल और केले की भी खेती होती है।
- कोलेरू झील (Kolleru Lake):
- यह उत्तरी सरकार तट की एक प्रमुख स्थलाकृति है।
- कोलेरू झील गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टा के बीच स्थित भारत की सबसे बड़ी उथली मीठे पानी की झीलों (Shallow Freshwater Lakes) में से एक है।
- यह एक रामसर साइट है और पक्षियों, विशेषकर प्रवासी पक्षियों, के लिए एक महत्वपूर्ण आवास है।
- प्राकृतिक बंदरगाह (Natural Harbour):
- हालांकि पूर्वी तट पर प्राकृतिक बंदरगाह कम हैं, लेकिन उत्तरी सरकार तट पर स्थित विशाखापत्तनम बंदरगाह (Visakhapatnam Port) एक अपवाद है।
- यह भारत का सबसे गहरा, भूमि से घिरा (landlocked) और सबसे सुरक्षित बंदरगाह है। यह एक चट्टानी उभार, जिसे ‘डॉल्फिन नोज’ (Dolphin’s Nose) कहते हैं, के द्वारा समुद्री तूफानों से प्राकृतिक रूप से संरक्षित है।
- गैस और पेट्रोलियम के भंडार:
- कृष्णा-गोदावरी बेसिन (K-G Basin), जो इस तटीय क्षेत्र के अपतटीय (offshore) हिस्से में स्थित है, प्राकृतिक गैस (Natural Gas) और पेट्रोलियम के विशाल भंडार के लिए प्रसिद्ध है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व
- कृषि: यह तट आंध्र प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
- उद्योग:
- विशाखापत्तनम एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र है जहाँ इस्पात संयंत्र (Steel Plant), शिपयार्ड (Shipyard), और तेल रिफाइनरी (Oil Refinery) स्थित हैं।
- काकीनाडा एक अन्य महत्वपूर्ण बंदरगाह और औद्योगिक शहर है।
- मत्स्य पालन (Fisheries): लंबी तटरेखा और नदी डेल्टा मत्स्य उद्योग के लिए अनुकूल दशाएँ प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष: उत्तरी सरकार तट, गोदावरी और कृष्णा के उपजाऊ डेल्टाओं द्वारा निर्मित एक अत्यंत समृद्ध कृषि क्षेत्र है। विशाखापत्तनम जैसे रणनीतिक बंदरगाह और कृष्णा-गोदावरी बेसिन में ऊर्जा संसाधनों की उपस्थिति इसे आर्थिक और सामरिक रूप से भारत के सबसे महत्वपूर्ण तटीय क्षेत्रों में से एक बनाती है।
कोरोमंडल तट (The Coromandel Coast)
कोरोमंडल तट, पूर्वी तटीय मैदान का सबसे दक्षिणी भाग है। यह अपनी अनूठी वर्षा प्रणाली (सर्दियों की बारिश), समृद्ध इतिहास, प्राचीन मंदिरों और जीवंत संस्कृति के लिए जाना जाता है।
“कोरोमंडल” नाम संभवतः तमिल शब्द “चोल मंडलम” (Chola Mandalam), अर्थात “चोल राजाओं का क्षेत्र,” का एक विकृत रूप है।
भौगोलिक विस्तार एवं सीमा (Geographical Extent and Boundaries)
- विस्तार: कोरोमंडल तट उत्तर में कृष्णा नदी डेल्टा या पुलिकट झील से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी (Cape Comorin) तक फैला हुआ है।
- राज्य: इसका लगभग संपूर्ण विस्तार तमिलनाडु राज्य के तटीय क्षेत्रों में है, तथा इसका कुछ हिस्सा दक्षिणी आंध्र प्रदेश तक भी आता है।
- चौड़ाई: यह एक चौड़ा तटीय मैदान है, जिसकी औसत चौड़ाई लगभग 100-120 किलोमीटर है। कावेरी नदी के डेल्टा के पास यह और भी चौड़ा हो जाता है।
कोरोमंडल तट की प्रमुख विशेषताएँ
- सर्दियों की वर्षा (Winter Rainfall):
- यह कोरोमंडल तट की सबसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण जलवायु संबंधी विशेषता है।
- यह भारत का एकमात्र प्रमुख क्षेत्र है जो उत्तर-पूर्वी मानसून या लौटते हुए मानसून (Retreating Monsoon) से सर्दियों (अक्टूबर से दिसंबर) में महत्वपूर्ण वर्षा प्राप्त करता है।
- कारण: लौटती हुई मानसूनी हवाएँ जब बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं और पूर्वी घाट की पहाड़ियों से टकराकर इस तट पर भारी वर्षा करती हैं।
- इसके विपरीत, गर्मियों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान यह क्षेत्र पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow Area) में पड़ता है, जिसके कारण यहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
- कावेरी डेल्टा (Kaveri Delta):
- प्रसिद्ध कावेरी नदी का अत्यंत उपजाऊ और हरा-भरा डेल्टा इसी तट पर स्थित है।
- यह डेल्टा सघन सिंचाई और नहर प्रणालियों के कारण कृषि का एक प्रमुख केंद्र है, विशेषकर चावल (Paddy) की खेती के लिए। इसे “दक्षिण भारत का बगीचा” (Garden of Southern India) भी कहा जाता है।
- पुलिकट झील (Pulicat Lake):
- यह कोरोमंडल तट की उत्तरी सीमा पर स्थित भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील है।
- श्रीहरिकोटा द्वीप (Sriharikota Island), जहाँ भारत का सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (Satish Dhawan Space Centre) है, इसी झील को बंगाल की खाड़ी से अलग करता है।
- सीधी तटरेखा और कृत्रिम बंदरगाह:
- उत्तरी सरकार तट की तरह ही, यहाँ की तटरेखा भी सीधी और सपाट है।
- इस कारण यहाँ प्राकृतिक बंदरगाहों का अभाव है। चेन्नई बंदरगाह (Chennai Port) भारत के सबसे पुराने और सबसे बड़े कृत्रिम बंदरगाहों (Artificial Harbours) में से एक है। तूतीकोरिन (Tuticorin) भी एक अन्य प्रमुख कृत्रिम बंदरगाह है।
- उभरता हुआ तट:
- भूवैज्ञानिक रूप से, इसे भी एक उभरता हुआ तट (Coast of Emergence) माना जाता है।
आर्थिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
- कृषि: कावेरी डेल्टा और अन्य सिंचित क्षेत्रों में चावल, गन्ना और नारियल की गहन खेती की जाती है।
- ऐतिहासिक व्यापार केंद्र: कोरोमंडल तट प्राचीन और मध्यकाल में मसालों, वस्त्रों और अन्य वस्तुओं के समुद्री व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेजों ने यहाँ अपने व्यापारिक केंद्र (Factory) स्थापित किए थे।
- औद्योगिक केंद्र: चेन्नई, जिसे “दक्षिण भारत का डेट्रॉइट” भी कहा जाता है, भारत का एक प्रमुख ऑटोमोबाइल विनिर्माण, औद्योगिक और आईटी केंद्र है।
- सांस्कृतिक धरोहर: यह तट द्रविड़ संस्कृति और वास्तुकला का हृदय स्थल है। महाबलीपुरम के मंदिर (यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल), कांचीपुरम के मंदिर, और तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर जैसे कई विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल यहीं स्थित हैं।
निष्कर्ष: कोरोमंडल तट एक अद्वितीय तटीय मैदान है जो अपनी सर्दियों की मानसूनी वर्षा के लिए जाना जाता है। यह कावेरी के उपजाऊ डेल्टा के कारण कृषि में समृद्ध है और चेन्नई जैसे बड़े औद्योगिक केंद्र के साथ आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसकी समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत इसे भारत के सबसे जीवंत क्षेत्रों में से एक बनाती है।
पश्चिमी और पूर्वी तटीय मैदानों में तुलना
| आधार | पश्चिमी तटीय मैदान | पूर्वी तटीय मैदान |
| चौड़ाई | संकरा | चौड़ा और समतल |
| नदियाँ | छोटी, तीव्र गति वाली | लंबी, मंद गति वाली |
| डेल्टा निर्माण | डेल्टा नहीं बनाती, ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं। | बड़े और उपजाऊ डेल्टा बनाती हैं। |
| बंदरगाह | कई प्राकृतिक बंदरगाह हैं (कटी-फटी तटरेखा)। | प्राकृतिक बंदरगाह कम हैं, कृत्रिम बंदरगाह अधिक हैं (सीधी तटरेखा)। |
| वर्षा | दक्षिण-पश्चिम मानसून से भारी वर्षा। | उत्तर-पूर्वी मानसून (लौटते मानसून) से भी वर्षा (कोरोमंडल तट पर)। |
| उप-भाग | कोंकण, कन्नड़, मालाबार | उत्कल, उत्तरी सरकार, कोरोमंडल |
भारत के प्रमुख द्वीप समूह (Major Island Groups of India)
भारत की विशाल तटरेखा के अलावा, इसके पास दो प्रमुख और कई छोटे-छोटे द्वीप समूह हैं, जो अपनी अनूठी भौगोलिक संरचना, समृद्ध जैव-विविधता और सामरिक महत्व के लिए जाने जाते हैं। भारत के द्वीप समूहों को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (बंगाल की खाड़ी में)
2. लक्षद्वीप द्वीप समूह (अरब सागर में)
इनके अलावा, तट के निकट भी कुछ महत्वपूर्ण द्वीप स्थित हैं।
1. अंडमान और निकोर्बा द्वीप समूह (Andaman and Nicobar Islands)
यह बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीपों की एक लंबी, उत्तर-से-दक्षिण दिशा में फैली हुई श्रृंखला है। यह भारत का सबसे बड़ा द्वीप समूह है और एक केंद्र शासित प्रदेश है।
उत्पत्ति (Origin):
- यह द्वीप समूह वास्तव में समुद्र में डूबी हुई एक पर्वत श्रृंखला का ही उभरा हुआ हिस्सा है।
- यह पर्वत श्रृंखला अराकान योमा पर्वत (म्यांमार में) का दक्षिणी विस्तार है, जो स्वयं हिमालय का ही एक विस्तार है।
- कुछ छोटे द्वीप ज्वालामुखी (Volcanic) क्रिया द्वारा भी निर्मित हुए हैं। बैरन द्वीप (Barren Island) भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी यहीं स्थित है। नारकोंडम (Narcondam) एक सुप्त ज्वालामुखी है।
भौगोलिक विभाजन (Geographical Division):
इस द्वीप समूह को दस डिग्री चैनल (Ten Degree Channel), जो एक 150 किमी चौड़ा समुद्री मार्ग है, दो मुख्य भागों में विभाजित करता है:
क) अंडमान द्वीप समूह (The Andaman Islands)
अंडमान द्वीप समूह, बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का उत्तरी भाग है। यह दस डिग्री चैनल (Ten Degree Channel) द्वारा दक्षिण में स्थित निकोबार द्वीप समूह से अलग होता है। यह अपनी घने उष्णकटिबंधीय वनों, खूबसूरत समुद्र तटों, समृद्ध समुद्री जीवन, ऐतिहासिक सेलुलर जेल और स्थानिक जनजातियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
उत्पत्ति और भूविज्ञान (Origin and Geology)
- जलमग्न पर्वत श्रृंखला: अंडमान द्वीप समूह वास्तव में एक जलमग्न पर्वत श्रृंखला (Submerged Mountain Range) का उभरा हुआ हिस्सा हैं।
- अराकान योमा का विस्तार: यह पर्वत श्रृंखला म्यांमार की अराकान योमा पर्वतमाला का दक्षिणी विस्तार है, जो स्वयं हिमालय पर्वत प्रणाली का एक हिस्सा मानी जाती है।
- चट्टानी संरचना: ये द्वीप मुख्य रूप से बलुआ पत्थर (Sandstone), चूना पत्थर (Limestone), और शेल (Shale) जैसी तृतीयक (Tertiary) चट्टानों से बने हैं।
अंडमान द्वीप समूह का विभाजन (Division of the Andaman Islands)
अंडमान द्वीप समूह लगभग 572 द्वीपों का एक समूह है, जिन्हें मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है:
1. ग्रेट अंडमान (The Great Andamans)
2. लिटिल अंडमान (The Little Andaman)
1. ग्रेट अंडमान (The Great Andamans)
यह अंडमान का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख द्वीपों का समूह है, जो उत्तर से दक्षिण तक एक-दूसरे से संकरे समुद्री मार्गों द्वारा अलग होते हैं। इसे आगे चार मुख्य द्वीपों में विभाजित किया गया है:
- यह ग्रेट अंडमान का सबसे उत्तरी द्वीप है।
- सैडल पीक (Saddle Peak – 732 मीटर): पूरे अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की सबसे ऊँची चोटी इसी द्वीप पर स्थित है। सैडल पीक नेशनल पार्क भी यहीं है।
- डिगलीपुर (Diglipur): यह उत्तरी अंडमान का प्रमुख शहर है।
- यह क्षेत्रफल की दृष्टि से अंडमान द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है।
- यह अपनी घने मैंग्रोव वनों और समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है।
- रंगत (Rangat) और मायाबंदर (Mayabunder) यहाँ के प्रमुख शहर हैं।
- बैरन द्वीप (Barren Island), भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी, मध्य अंडमान के पूर्व में स्थित है।
- यह अंडमान का सबसे अधिक आबादी वाला और सबसे अधिक विकसित द्वीप है।
- पोर्ट ब्लेयर (Port Blair): अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की राजधानी इसी द्वीप पर स्थित है। वीर सावरकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा भी यहीं है।
- ऐतिहासिक स्थल: प्रसिद्ध सेलुलर जेल (काला पानी) और रॉस आइलैंड (अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप) जैसे ऐतिहासिक स्थल यहीं स्थित हैं।
- माउंट हैरियट (अब माउंट मणिपुर): यह यहाँ की एक प्रमुख चोटी और राष्ट्रीय उद्यान है।
- यह एक 50 किलोमीटर चौड़ा समुद्री मार्ग है जो ग्रेट अंडमान (दक्षिणी अंडमान) को लिटिल अंडमान से अलग करता है।
2. लिटिल अंडमान (The Little Andaman)
- यह ग्रेट अंडमान के दक्षिण में स्थित एक अलग और बड़ा द्वीप है।
- यह अपनी सर्फिंग के लिए प्रसिद्ध समुद्र तटों, झरनों और ओंगे जनजाति (Onge Tribe) के निवास स्थान के लिए जाना जाता है।
- हट बे (Hut Bay) यहाँ का प्रमुख बंदरगाह है।
अंडमान की अन्य प्रमुख विशेषताएँ
- रिची द्वीपसमूह (Ritchie’s Archipelago): यह ग्रेट अंडमान के पूर्व में स्थित छोटे द्वीपों का एक समूह है। हैवलॉक द्वीप (अब स्वराज द्वीप) और नील द्वीप (अब शहीद द्वीप), जो अपने खूबसूरत समुद्र तटों और स्कूबा डाइविंग के लिए प्रसिद्ध हैं, इसी का हिस्सा हैं।
- जलवायु: यहाँ उष्णकटिबंधीय समुद्री जलवायु (Tropical Marine Climate) पाई जाती है, जिसमें पूरे साल तापमान लगभग समान रहता है और भारी वर्षा होती है।
- वनस्पति: ये द्वीप उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों (Tropical Evergreen Forests) से ढके हुए हैं।
- जनजातियाँ: ग्रेट अंडमानीज, जारवा, और सेंटिनलीज जैसी नेग्रिटो जनजातियाँ ग्रेट अंडमान में निवास करती हैं। सेंटिनलीज जनजाति बाहरी दुनिया से पूरी तरह से अलग-थलग रहती है।
सामरिक महत्व: हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण, अंडमान द्वीप समूह भारत के लिए अत्यधिक सामरिक महत्व रखता है। यह भारत की पूर्वी नौसेना कमान (Eastern Naval Command) का एक महत्वपूर्ण अड्डा है।
ख) निको-बार द्वीप समूह (The Nicobar Islands)
निको-बार द्वीप समूह, अंडमान और निको-बार द्वीपसमूह का दक्षिणी भाग है। यह दस डिग्री चैनल (Ten Degree Channel) द्वारा उत्तर में स्थित अंडमान द्वीप समूह से अलग होता है। “निको-बार” का अर्थ संभवतः “नग्न लोगों की भूमि” (Land of the Naked People) है। यह द्वीप समूह अपनी अनूठी मंगोलॉयड जनजातियों, हरे-भरे नारियल के पेड़ों से ढके परिदृश्य और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इंदिरा पॉइंट के लिए जाना जाता है।
उत्पत्ति और भूविज्ञान (Origin and Geology)
- अंडमान द्वीप समूह की तरह ही, निको-बार द्वीप भी अराकान योमा पर्वतमाला के जलमग्न दक्षिणी विस्तार का हिस्सा हैं।
- यहाँ की चट्टानी संरचना में बलुआ पत्थर के साथ-साथ ज्वालामुखी मूल की चट्टानें भी मिलती हैं, लेकिन यहाँ सक्रिय ज्वालामुखी नहीं हैं। नारकोंडम (Narcondam), एक सुप्त ज्वालामुखी, इसके उत्तर-पूर्व में स्थित है।
निको-बार द्वीप समूह का विभाजन (Division of the Nicobar Islands)
निको-बार द्वीप समूह लगभग 22 द्वीपों का एक समूह है, जिन्हें मुख्य रूप से तीन समूहों में विभाजित किया जाता है (उत्तर से दक्षिण):
1. उत्तरी निको-बार समूह (Northern Nicobar Group)
- कार निको-बार (Car Nicobar):
- यह निको-बार द्वीपसमूह का सबसे उत्तरी द्वीप है। दस डिग्री चैनल को पार करने पर यह पहला द्वीप है।
- यह निको-बार द्वीपसमूह का प्रशासनिक मुख्यालय (Administrative Headquarters) और सबसे अधिक आबादी वाला द्वीप है।
- इसकी सतह लगभग समतल और उपजाऊ है।
- बत्तीमाल्व (Batti Malv): कार निको-बार के दक्षिण में एक छोटा और निर्जन द्वीप।
2. मध्य निको-बार समूह (Central Nicobar Group)
यह कई छोटे-छोटे द्वीपों का समूह है। यहाँ के कुछ प्रमुख द्वीप हैं:
- तेरेस्सा (Teressa)
- बोमपोका (Bompoka)
- कचाल (Katchal)
- नैनकॉरी (Nancowry): यहाँ एक बहुत ही सुरक्षित प्राकृतिक बंदरगाह है।
- ट्रिन्केट (Trinket)
3. दक्षिणी निको-बार समूह (Southern Nicobar Group)
यह निको-बार का सबसे दक्षिणी और सबसे बड़ा हिस्सा है।
- लिटिल निको-बार (Little Nicobar): ग्रेट निको-बार के उत्तर में स्थित है।
- ग्रेट निको-बार (Great Nicobar):
- यह निको-बार द्वीपसमूह का सबसे बड़ा और भारत का सबसे दक्षिणी द्वीप है।
- माउंट थुलियर (Mount Thullier – 642 मीटर): यह निको-बार द्वीपसमूह की सबसे ऊँची चोटी है।
- इंदिरा पॉइंट (Indira Point): भारत गणराज्य का सबसे दक्षिणी बिंदु (Southernmost Point) इसी द्वीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित है। इसे पहले ‘पिग्मेलियन पॉइंट’ (Pygmalion Point) या ‘पारसन्स पॉइंट’ (Parsons Point) के नाम से जाना जाता था। 2004 की सुनामी में, इस पर बना लाइटहाउस और यह बिंदु आंशिक रूप से जलमग्न हो गया था।
- ग्रेट निको-बार बायोस्फीयर रिजर्व: यह अपनी अद्वितीय जैव-विविधता के लिए प्रसिद्ध है और इसे यूनेस्को द्वारा बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया है।
निको-बार की अन्य प्रमुख विशेषताएँ
- जलवायु: अंडमान की तरह ही यहाँ भी उष्णकटिबंधीय समुद्री जलवायु है, जिसमें वर्ष भर तापमान समान और वर्षा अधिक होती है।
- वनस्पति: यहाँ के द्वीप घने उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों (Tropical Evergreen Forests) से आच्छादित हैं। नारियल, सुपारी और केले यहाँ की प्रमुख व्यावसायिक फसलें हैं।
- जनजातियाँ:
- यहाँ की मूल जनजातियाँ अंडमान की नेग्रिटो जनजातियों से भिन्न हैं और ये मंगोलॉयड (Mongoloid) प्रजाति से संबंधित हैं।
- निको-बारी (Nicobarese) और शोम्पेन (Shompen) यहाँ की दो प्रमुख जनजातियाँ हैं। शोम्पेन जनजाति आज भी ग्रेट निको-बार के घने जंगलों में शिकार और संग्रह पर निर्भर एक आदिम जीवन शैली जीती है।
- सामरिक महत्व:
- ग्रेट निको-बार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के मुहाने पर स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। इस कारण, यह द्वीप भारत के लिए अत्यधिक सामरिक और सैन्य महत्व रखता है। यहाँ भारतीय नौसेना का एक महत्वपूर्ण अड्डा ‘INS बाज’ स्थित है।
विशेषताएँ:
- यह अपनी समृद्ध जैव-विविधता, उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (Tropical Rainforests), और मूंगा चट्टानों (Coral Reefs) के लिए प्रसिद्ध है।
- यहाँ की कई जनजातियाँ (जैसे जारवा, ओंगे, सेंटिनलीज) आज भी बाहरी दुनिया से लगभग अलग-थलग रहती हैं।
- भारत के लिए इसका अत्यधिक सामरिक (Strategic) महत्व है।
2. लक्षद्वीप द्वीप समूह (Lakshadweep Islands)
लक्षद्वीप, भारत के दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर में स्थित 36 छोटे द्वीपों का एक खूबसूरत द्वीपसमूह है। यह क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों की दृष्टि से भारत का सबसे छोटा केंद्र शासित प्रदेश है। इसका नाम “लक्षद्वीप” का अर्थ है “एक लाख द्वीप”, हालांकि इसमें केवल 36 द्वीप ही शामिल हैं। यह द्वीपसमूह अपनी आश्चर्यजनक प्राकृतिक सुंदरता, शांत लैगून, सफेद रेतीले समुद्र तटों और विशेष रूप से अपनी प्रवाल या मूंगा चट्टानों (Coral Reefs) की अनूठी उत्पत्ति के लिए जाना जाता है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह द्वीपसमूह भारत के केरल के मालाबार तट से लगभग 200 से 440 किलोमीटर दूर अरब सागर में बिखरा हुआ है।
- क्षेत्रफल: इसका कुल सतही क्षेत्रफल मात्र 32 वर्ग किलोमीटर है।
- अक्षांशीय विस्तार: यह मोटे तौर पर 8° से 12° उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित है।
- प्रशासनिक केंद्र: इस द्वीपसमूह की राजधानी और प्रशासनिक मुख्यालय कवरत्ती (Kavaratti) द्वीप पर स्थित है।
उत्पत्ति और भूविज्ञान (Origin and Geology)
लक्षद्वीप की उत्पत्ति अंडमान और निकोबार से पूरी तरह से भिन्न है:
- प्रवाल द्वीप (Coral Islands): ये द्वीप ज्वालामुखी या महाद्वीपीय मूल के नहीं हैं। इनका निर्माण पूरी तरह से प्रवाल (Corals) नामक सूक्ष्म समुद्री जीवों के कंकालों के लाखों वर्षों तक जमा होने और संघनित होने से हुआ है।
- अटॉल (Atoll): लक्षद्वीप के अधिकांश द्वीप ‘अटॉल’ (Atoll) प्रकार के हैं। अटॉल एक गोलाकार या घोड़े की नाल (horse-shoe) के आकार की मूंगा चट्टान होती है जो अपने केंद्र में एक उथले लैगून (Lagoon) को घेरे रहती है। यह शांत और क्रिस्टल-क्लियर पानी वाला लैगून इन द्वीपों की पहचान है।
- अरावली का विस्तार?: कुछ भूवैज्ञानिकों का मानना है कि ये प्रवाल द्वीप समुद्र में डूबे हुए अरावली पर्वत श्रृंखला के दक्षिणी विस्तार के ऊपर विकसित हुए हैं।
लक्षद्वीप के प्रमुख द्वीप और विशेषताएँ
- प्रमुख चैनल (Major Channels): समुद्री चैनल लक्षद्वीप को भौगोलिक रूप से विभाजित करते हैं:
- आठ डिग्री चैनल (Eight Degree Channel): यह चैनल लक्षद्वीप समूह (मिनिकॉय) को मालदीव देश से अलग करता है।
- नौ डिग्री चैनल (Nine Degree Channel): यह चैनल मिनिकॉय द्वीप को मुख्य लक्षद्वीप समूह (कवरत्ती आदि) से अलग करता है।
- दस डिग्री चैनल अंडमान और निकोबार को अलग करता है, न कि लक्षद्वीप को।
- मुख्य द्वीपसमूह का विभाजन:
- अमीनदीवी द्वीप (Amindivi Islands): यह सबसे उत्तरी द्वीपों का समूह है।
- लक्कादीव द्वीप (Laccadive Islands): यह मध्य का द्वीप समूह है, जिसमें राजधानी कवरत्ती और एंद्रोत (Andrott) द्वीप शामिल हैं।
- मिनिकॉय द्वीप (Minicoy Island): यह सबसे दक्षिणी और मुख्य समूह से अलग-थलग द्वीप है। सांस्कृतिक रूप से यह मालदीव के अधिक निकट है।
- महत्वपूर्ण द्वीप:
- कुल द्वीप: 36
- मानव बसावट वाले द्वीप: केवल 10 (जैसे कवरत्ती, मिनिकॉय, अगाती, अमिनी, कल्पेनी)।
- कवरत्ती (Kavaratti): केंद्र शासित प्रदेश की राजधानी।
- मिनिकॉय (Minicoy): क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा द्वीप और सबसे दक्षिणी द्वीप।
- एंद्रोत (Andrott): जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा द्वीप।
- अगाती (Agatti): लक्षद्वीप का एकमात्र हवाई अड्डा यहीं स्थित है।
- पिट्टी द्वीप (Pitti Island): यह एक निर्जन द्वीप है और इसे एक पक्षी अभयारण्य (Bird Sanctuary) के रूप में विकसित किया गया है।
आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व
- मत्स्य पालन (Fisheries): यहाँ के लोगों का पारंपरिक और मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना है। ट्यूना मछली (Tuna fish) का यहाँ से बड़े पैमाने पर निर्यात किया जाता है।
- नारियल की खेती (Coconut Cultivation): नारियल यहाँ की एकमात्र प्रमुख व्यावसायिक फसल है। नारियल का रेशा (Coir) उद्योग भी एक महत्वपूर्ण गतिविधि है।
- पर्यटन:
- लक्षद्वीप भारत का एक प्रमुख इको-टूरिज्म केंद्र बन रहा है।
- यहाँ के साफ-सुथरे समुद्र तट, शांत लैगून और जीवंत मूंगा चट्टानें पर्यटकों को स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग और अन्य जल क्रीड़ाओं के लिए आकर्षित करती हैं।
- पर्यटन को नियंत्रित तरीके से बढ़ावा दिया जाता है ताकि यहाँ के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित रखा जा सके। बंगारम (Bangaram) द्वीप विशेष रूप से पर्यटकों के लिए लोकप्रिय है।
- संस्कृति:
- मिनिकॉय को छोड़कर, यहाँ के अधिकांश निवासी केरल से आकर बसे लोगों के वंशज हैं और मलयालम भाषा बोलते हैं।
- मिनिकॉय में माह्ल (Mahl) भाषा बोली जाती है, जो मालदीव की दिवेही भाषा से मिलती-जुलती है।
- अधिकांश जनसंख्या इस्लाम धर्म का पालन करती है।
पारिस्थितिक महत्व: लक्षद्वीप की मूंगा चट्टानें समुद्री जैव-विविधता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भंडार हैं। ये न केवल कई समुद्री जीवों को आवास प्रदान करती हैं, बल्कि तटीय कटाव को भी रोकती हैं। जलवायु परिवर्तन और समुद्री प्रदूषण से इन नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों को गंभीर खतरा है।
भारत के अन्य महत्वपूर्ण तटीय द्वीप (Other Important Coastal Islands)
इन दो प्रमुख समूहों के अलावा, भारत की तटरेखा के पास कई अन्य महत्वपूर्ण द्वीप भी हैं:
| द्वीप का नाम | अवस्थिति | राज्य | महत्व |
| श्रीहरिकोटा (Sriharikota) | पूर्वी तट (पुलिकट झील के पास) | आंध्र प्रदेश | भारत का प्रमुख उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र यहीं स्थित है। |
| व्हीलर द्वीप (डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वीप) | पूर्वी तट (महानदी मुहाने के पास) | ओडिशा | भारत का मिसाइल परीक्षण केंद्र है। |
| पंबन द्वीप (Pamban Island) | भारत और श्रीलंका के बीच (मन्नार की खाड़ी) | तमिलनाडु | प्रसिद्ध रामेश्वरम तीर्थ स्थल इसी द्वीप पर है। यह एडम्स ब्रिज (राम सेतु) का एक हिस्सा है। |
| न्यू मूर द्वीप (New Moore Island) | बंगाल की खाड़ी (गंगा डेल्टा में) | भारत और बांग्लादेश के बीच विवादित था। अब यह समुद्र में विलीन हो चुका है। | |
| एलिफेंटा द्वीप (Elephanta Island) | अरब सागर (मुंबई के पास) | महाराष्ट्र | अपनी प्राचीन गुफा मंदिरों (यूनेस्को विश्व धरोहर) के लिए प्रसिद्ध है। |
| सालसेट द्वीप (Salsette Island) | अरब सागर | महाराष्ट्र | भारत का सबसे घनी आबादी वाला द्वीप। मुंबई शहर और ठाणे इसी पर बसे हैं। |
| दीव (Diu) | अरब सागर (काठियावाड़ तट के दक्षिण में) | दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव | एक पूर्व पुर्तगाली उपनिवेश और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल। |
श्रीहरिकोटा द्वीप (Sriharikota Island)
श्रीहरिकोटा द्वीप, भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के पूर्वी तट पर स्थित एक रोधिका द्वीप (Barrier Island) है। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का हृदय स्थल है और देश की वैज्ञानिक प्रगति का प्रतीक है।
भौगोलिक स्थिति:
- अवस्थिति: यह बंगाल की खाड़ी और पुलिकट झील (Pulicat Lake) के बीच स्थित है। यह द्वीप पुलिकट झील को समुद्र से अलग करता है, जिससे एक शांत लैगून का निर्माण होता है।
- राज्य: यह आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले (पहले नेल्लोर जिले का हिस्सा) में आता है।
- निकटतम शहर: निकटतम शहर सुल्लुरपेटा (Sullurpeta) है।
सामरिक और वैज्ञानिक महत्व:
- सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (Satish Dhawan Space Centre – SDSC):
- श्रीहरिकोटा द्वीप की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यहाँ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का मुख्य उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र (Satellite Launch Centre) स्थित है, जिसे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR) कहा जाता है।
- भारत के सभी प्रमुख उपग्रह प्रक्षेपण यान (Launch Vehicles) जैसे PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) और GSLV (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle) यहीं से लॉन्च किए जाते हैं। प्रसिद्ध मिशन जैसे चंद्रयान और मंगलयान भी यहीं से प्रक्षेपित किए गए थे।
- प्रक्षेपण के लिए आदर्श स्थान क्यों है?
- भूमध्य रेखा से निकटता (Proximity to Equator): यह द्वीप भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत करीब है। पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, और भूमध्य रेखा के पास इसका घूर्णन वेग सबसे अधिक होता है। यहाँ से पूर्व की ओर रॉकेट लॉन्च करने पर पृथ्वी के घूर्णन से मिलने वाला अतिरिक्त वेग (extra velocity) रॉकेट को मिलता है, जिससे ईंधन की बचत होती है।
- पूर्वी तट पर स्थिति: इसका पूर्वी तट पर होना एक सुरक्षात्मक उपाय है। प्रक्षेपण के बाद, रॉकेट के विभिन्न चरण समुद्र (बंगाल की खाड़ी) में गिरते हैं, जिससे किसी भी भू-भाग पर जान-माल का खतरा नहीं होता।
- निर्जन क्षेत्र: यह एक बहुत कम आबादी वाला क्षेत्र है, जो सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
- ठोस भूमि: प्रक्षेपण पैड के निर्माण के लिए यहाँ की भूमि स्थिर और मजबूत है।
व्हीलर द्वीप / डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वीप (Wheeler Island / Dr. A. P. J. Abdul Kalam Island)
यह द्वीप भारत के ओडिशा राज्य के तट से लगभग 10 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में स्थित है। यह भारत के मिसाइल कार्यक्रम का एक अभिन्न अंग है और देश की रक्षा क्षमताओं का केंद्र है।
भौगोलिक स्थिति:
- अवस्थिति: यह ओडिशा के भद्रक जिले में, धामरा नदी के मुहाने के पास बंगाल की खाड़ी में स्थित है।
- राज्य: ओडिशा।
सामरिक और वैज्ञानिक महत्व:
- एकीकृत परीक्षण रेंज (Integrated Test Range – ITR):
- यह द्वीप रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक प्रमुख मिसाइल परीक्षण केंद्र है।
- भारत की लगभग सभी मिसाइलों, जिनमें सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें (जैसे अग्नि, पृथ्वी), सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें (जैसे आकाश), और अन्य सामरिक मिसाइलें शामिल हैं, का परीक्षण और विकास यहीं किया जाता है।
- नाम परिवर्तन:
- इस द्वीप का नाम पहले एक ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट व्हीलर के नाम पर था।
- सितंबर 2015 में, भारत के महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के सम्मान में, जिन्होंने इस परीक्षण रेंज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इस द्वीप का नाम बदलकर “डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वीप” कर दिया गया।
- परीक्षण के लिए आदर्श स्थान क्यों है?
- सुरक्षित दूरी: यह मुख्य भूमि से सुरक्षित दूरी पर स्थित है। मिसाइल परीक्षण के दौरान यदि कोई दुर्घटना होती है, तो मुख्य भूमि पर कोई खतरा नहीं होता।
- निर्जन क्षेत्र: यह द्वीप लगभग निर्जन है, जो परीक्षणों के लिए एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है।
- खुला समुद्री क्षेत्र: मिसाइल को एक लंबी दूरी तक ट्रैक करने और उसके उड़ान पथ का अध्ययन करने के लिए सामने एक विशाल और खुला समुद्री क्षेत्र (बंगाल की खाड़ी) है।
- मौसम: यहाँ का मौसम साल के अधिकांश समय परीक्षणों के लिए अनुकूल रहता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
श्रीहरिकोटा जहाँ भारत की “अंतरिक्ष की खिड़की” है, जो हमें ब्रह्मांड से जोड़ती है, वहीं डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वीप भारत की “रक्षा की ढाल” है, जो देश की संप्रभुता और सुरक्षा को सुनिश्चित करती है। ये दोनों द्वीप भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
पंबन द्वीप (Pamban Island)
पंबन द्वीप, जिसे रामेश्वरम द्वीप के नाम से भी जाना जाता है, भारत के दक्षिणी सिरे पर तमिलनाडु राज्य के तट और श्रीलंका के बीच मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) में स्थित है। यह अपने धार्मिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।
भौगोलिक स्थिति और संपर्क:
- अवस्थिति: यह भारत की मुख्य भूमि और श्रीलंका के बीच स्थित है।
- एडम्स ब्रिज (राम सेतु): यह द्वीप चूना पत्थर की शोलों (shoals) की एक श्रृंखला, जिसे एडम्स ब्रिज या राम सेतु कहते हैं, का सबसे पश्चिमी हिस्सा है। यह श्रृंखला पंबन द्वीप से श्रीलंका के मन्नार द्वीप तक फैली हुई है।
- मुख्य भूमि से संपर्क:
- पंबन ब्रिज (Pamban Bridge): यह द्वीप भारत की मुख्य भूमि से प्रसिद्ध पंबन ब्रिज द्वारा जुड़ा हुआ है। यह भारत का पहला समुद्री पुल था (1914 में खोला गया) और इसमें एक अनूठा खंड है जो जहाजों को गुजरने देने के लिए ऊपर की ओर खुलता (bascule) है।
- अब इसके समानांतर एक नया, आधुनिक सड़क और रेल पुल भी बनाया जा रहा है।
महत्व और प्रमुख विशेषताएँ:
- धार्मिक महत्व (रामेश्वरम):
- पंबन द्वीप पर हिंदुओं का एक अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थल, रामेश्वरम स्थित है। यह भगवान शिव को समर्पित रामनाथस्वामी मंदिर का घर है, जो चार धामों और बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
- माना जाता है कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले शिव की पूजा की थी।
- धनुषकोडी (Dhanushkodi):
- यह द्वीप के दक्षिण-पूर्वी सिरे पर स्थित एक वीरान शहर है, जिसे “भूतिया शहर” (ghost town) भी कहा जाता है।
- 1964 के एक विनाशकारी चक्रवात में यह शहर पूरी तरह से नष्ट हो गया था और तब से निर्जन है। यहीं से राम सेतु स्पष्ट रूप से दिखाई देता है और श्रीलंका यहाँ से मात्र 29 किलोमीटर दूर है।
न्यू मूर द्वीप (New Moore Island)
न्यू मूर द्वीप बंगाल की खाड़ी में, गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा क्षेत्र में स्थित एक छोटा, निर्जन अपतटीय (offshore) द्वीप था। यह भारत और बांग्लादेश के बीच एक लंबे समय तक चले क्षेत्रीय विवाद (Territorial Dispute) का कारण बना रहा।
उत्पत्ति और विवाद:
- उत्पत्ति: इस द्वीप का निर्माण 1970 के भोला चक्रवात (Bhola Cyclone) के बाद नदी के मुहाने पर गाद के जमाव से हुआ था।
- विवाद: इसके उभरने के तुरंत बाद, भारत और बांग्लादेश दोनों ने इस पर अपनी संप्रभुता का दावा किया।
- भारत में इसे न्यू मूर द्वीप कहा जाता था और इसे अपनी सीमा का हिस्सा मानता था।
- बांग्लादेश में इसे दक्षिण तलपट्टी (South Talpatti) कहा जाता था और वे इसे अपना क्षेत्र मानते थे।
द्वीप का विलोपन (Disappearance of the Island):
- जलमग्न होना: पिछले कुछ दशकों में, समुद्र के बढ़ते जल स्तर, कटाव और डेल्टा क्षेत्र में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण यह द्वीप धीरे-धीरे समुद्र में विलीन हो गया।
- विवाद का अंत: 2010 में, समुद्री वैज्ञानिकों ने पुष्टि की कि यह द्वीप अब पानी के नीचे पूरी तरह से डूब चुका है। इसके जलमग्न होने के साथ ही दोनों देशों के बीच इस द्वीप को लेकर चला आ रहा दशकों पुराना विवाद प्राकृतिक रूप से समाप्त हो गया।
एलिफेंटा द्वीप (Elephanta Island)
एलिफेंटा द्वीप, जिसे स्थानीय रूप से घारापुरी द्वीप (Gharapuri Island) के नाम से जाना जाता है, महाराष्ट्र राज्य में, मुंबई बंदरगाह के पास अरब सागर में स्थित एक छोटा द्वीप है। यह अपनी प्राचीन और शानदार गुफा मंदिरों (Cave Temples) के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
भौगोलिक स्थिति और नामकरण:
- अवस्थिति: यह मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से लगभग 10 किलोमीटर पूर्व में स्थित है।
- नामकरण: “एलिफेंटा” नाम 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों द्वारा दिया गया था। उन्होंने द्वीप पर उतरते समय पत्थर से बनी एक विशाल हाथी (Elephant) की मूर्ति देखी थी, जिसके कारण उन्होंने इसका नाम एलिफेंटा रख दिया। (यह मूर्ति अब मुंबई के डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय में है)।
महत्व और प्रमुख विशेषताएँ:
- एलिफेंटा की गुफाएँ (Elephanta Caves):
- यह द्वीप अपनी शानदार चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं के एक समूह के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें 5वीं से 6वीं शताब्दी के बीच बनाया गया था।
- यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल: 1987 में, इन गुफाओं को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) घोषित किया गया।
- मुख्य गुफा और त्रिमूर्ति सदाशिव:
- यहाँ की सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध गुफा, गुफा संख्या 1 (मुख्य गुफा) है, जो भगवान शिव को समर्पित है।
- इसी गुफा के अंदर भगवान शिव की विशाल, तीन सिरों वाली प्रतिमा स्थित है, जिसे ‘त्रिमूर्ति सदाशिव’ (Trimurti Sadashiva) कहा जाता है।
- यह 20 फीट ऊँची प्रतिमा शिव के तीन रूपों को दर्शाती है: निर्माता (Creator), संरक्षक (Preserver), और विनाशक (Destroyer)। यह भारतीय मूर्तिकला के सबसे उत्कृष्ट नमूनों में से एक है।
- पर्यटन: यह मुंबई का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जहाँ गेटवे ऑफ इंडिया से नौका (ferry) द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
सालसेट द्वीप (Salsette Island)
सालसेट द्वीप, भारत के पश्चिमी तट पर महाराष्ट्र राज्य में स्थित है। यह दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले द्वीपों में से एक है और भारत के सबसे महत्वपूर्ण शहरी समूह का घर है। इसका नाम पुर्तगाली शब्द ‘साल्सेते’ (Salcete) से लिया गया है।
भौगोलिक स्थिति एवं विशेषताएँ:
- अवस्थिति: यह द्वीप महाराष्ट्र के कोंकण तट पर, उल्हास नदी के मुहाने के पास स्थित है।
- भू-आकृति: यह पूरी तरह से एक प्राकृतिक द्वीप नहीं है, बल्कि इसका निर्माण कई छोटे-छोटे द्वीपों को भूमि-सुधार (Land Reclamation) और पुलों के माध्यम से जोड़कर किया गया है।
- वसई क्रीक (Vasai Creek) इसे मुख्य भूमि से अलग करती है।
- इस द्वीप पर कान्हेरी गुफाओं (Kanheri Caves) जैसे ऐतिहासिक स्थल और बोरीवली राष्ट्रीय उद्यान (संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान) जैसा विशाल वन क्षेत्र भी मौजूद है।
- द्वीप पर मीठे पानी की आपूर्ति करने वाली तुलसी, विहार और पवई जैसी झीलें भी स्थित हैं।
महत्व और प्रमुख विशेषताएँ:
- मुंबई महानगर का घर (Home to Mumbai Metropolis):
- सालसेट द्वीप की सबसे बड़ी पहचान यह है कि भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई शहर पूरी तरह से इसी द्वीप पर बसा हुआ है।
- इसके अलावा, ठाणे शहर और मीरा-भायंदर शहर भी इसी द्वीप का हिस्सा हैं, जो मुंबई महानगर क्षेत्र (Mumbai Metropolitan Region – MMR) का निर्माण करते हैं।
- विश्व का सबसे घनी आबादी वाला द्वीप:
- 2 करोड़ से अधिक की आबादी के साथ, सालसेट द्वीप जावा (इंडोनेशिया) के बाद दुनिया का दूसरा सबसे घनी आबादी वाला द्वीप है। (कई स्रोतों में इसे प्रथम भी माना जाता है)।
- भारत का आर्थिक इंजन:
- चूंकि मुंबई शहर इस पर स्थित है, यह द्वीप भारत का सबसे बड़ा वाणिज्यिक, वित्तीय, औद्योगिक और मनोरंजन केंद्र है।
- बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE), नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE), भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालय यहीं स्थित हैं।
दीव द्वीप (Diu Island)
दीव द्वीप, भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे के पास अरब सागर में स्थित एक छोटा द्वीप है। यह ऐतिहासिक रूप से एक महत्वपूर्ण पुर्तगाली उपनिवेश था और आज एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है।
भौगोलिक स्थिति एवं विशेषताएँ:
- अवस्थिति: यह काठियावाड़ तट के निकट, वेरावल बंदरगाह के पास स्थित है।
- संपर्क: यह द्वीप मुख्य भूमि से एक छोटी खाड़ी (Creek) द्वारा अलग होता है और एक पुल द्वारा मुख्य भूमि से जुड़ा हुआ है।
- प्रशासनिक इकाई: दीव द्वीप दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा है। दीव स्वयं एक जिला है जिसमें यह द्वीप और मुख्य भूमि पर स्थित घोघला और सिम्बोर के छोटे क्षेत्र शामिल हैं।
महत्व और प्रमुख विशेषताएँ:
- ऐतिहासिक पुर्तगाली वास्तुकला:
- दीव पर लगभग 450 वर्षों (1535 से 1961 तक) तक पुर्तगालियों का शासन रहा।
- इस लंबे औपनिवेशिक काल के कारण, यहाँ आज भी पुर्तगाली वास्तुकला के शानदार नमूने देखे जा सकते हैं, जिनमें दीव का किला (Diu Fort) और सेंट पॉल चर्च (St. Paul’s Church) सबसे प्रमुख हैं।
- यह किला समुद्र के किनारे बना एक विशाल और प्रभावशाली दुर्ग है, जो अपने लाइटहाउस के लिए भी जाना जाता है।
- खूबसूरत समुद्र तट (Beaches):
- दीव अपने शांत, साफ और सुंदर समुद्र तटों के लिए प्रसिद्ध है।
- नागोवा बीच (Nagoa Beach): यह घोड़े की नाल (Horse-shoe) के आकार का एक बहुत ही सुंदर और लोकप्रिय बीच है।
- घोगला बीच (Ghoghla Beach) को ‘ब्लू फ्लैग’ (Blue Flag) सर्टिफिकेशन भी मिला है, जो इसकी स्वच्छता और सुरक्षा का प्रतीक है।
- पर्यटन स्थल:
- अपने किलों, चर्चों, खूबसूरत समुद्र तटों और शांत वातावरण के कारण, दीव गुजरात और आसपास के क्षेत्रों के लिए एक लोकप्रिय सप्ताहांत पर्यटन स्थल है।
- मत्स्य पालन:
- यह मछली पकड़ने का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है।
माजुली द्वीप (Majuli Island)
माजुली, भारत के असम राज्य में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित एक विशाल और अनूठा नदीय द्वीप (Riverine Island) है। यह न केवल अपनी भौगोलिक विशिष्टता के लिए, बल्कि अपनी समृद्ध और जीवंत वैष्णव संस्कृति के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। इसे अक्सर “असम की सांस्कृतिक राजधानी” कहा जाता है।
भौगोलिक स्थिति एवं निर्माण (Geographical Location and Formation)
- अवस्थिति: यह द्वीप असम के ऊपरी भाग में, ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी एक दक्षिणी शाखा, खेरकुटिया सूती (Kherkutia Xuti), के बीच स्थित है।
- निर्माण:
- माजुली का निर्माण ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों, विशेषकर लोहित नदी, द्वारा लाए गए भारी मात्रा में गाद और अवसादों (Silt and Sediments) के जमाव से हुआ है।
- माना जाता है कि 1750 में आए एक विनाशकारी भूकंप और उसके बाद की बाढ़ के कारण ब्रह्मपुत्र नदी का मुख्य मार्ग बदल गया, जिससे इस विशाल द्वीप का निर्माण हुआ।
- विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप?:
- माजुली को अक्सर विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप कहा जाता है, और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी इसे यह दर्जा दिया गया था। हालांकि, ब्राजील के कुछ द्वीपों (जैसे इल्हा डो बानानल) का क्षेत्रफल इससे अधिक है। फिर भी, यह निर्विवाद रूप से भारत का सबसे बड़ा और दुनिया के सबसे बड़े बसावट वाले नदी द्वीपों में से एक है।
पर्यावरणीय विशेषताएँ और चुनौतियाँ
- अत्यधिक भू-कटाव (Severe Soil Erosion):
- माजुली की सबसे गंभीर और विनाशकारी समस्या ब्रह्मपुत्र नदी द्वारा होने वाला तीव्र भू-कटाव है।
- हर साल मानसून की बाढ़ के दौरान, नदी अपने किनारों को काटती है, जिससे द्वीप का क्षेत्रफल लगातार कम होता जा रहा है। पिछले 100 वर्षों में, द्वीप अपना लगभग आधा क्षेत्रफल खो चुका है।
- इस कटाव के कारण कई गाँव, खेत और सांस्कृतिक स्थल नदी में समा चुके हैं, जिससे यहाँ के निवासियों को विस्थापन का सामना करना पड़ता है।
- समृद्ध जैव-विविधता:
- कटाव की समस्या के बावजूद, माजुली कई आर्द्रभूमियों (Wetlands) का घर है और प्रवासी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण आश्रय स्थल है।
- यहाँ की आर्द्रभूमियाँ स्थानीय मछली पकड़ने के उद्योग और पारिस्थितिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
- नव-वैष्णव संस्कृति का केंद्र:
- माजुली को असम की नव-वैष्णव संस्कृति का हृदय स्थल माना जाता है, जिसकी स्थापना 15वीं-16वीं शताब्दी में महान संत और सुधारक श्रीमंत शंकरदेव (Srimanta Sankardeva) और उनके शिष्य माधवदेव ने की थी।
- यह संस्कृति एक ईश्वर (भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण) की भक्ति पर जोर देती है और इसने असम के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने पर गहरी छाप छोड़ी है।
- ‘सत्र’ (Satra):
- माजुली अपनी ‘सत्र’ नामक अनूठी मठवासी संस्थाओं के लिए प्रसिद्ध है।
- सत्र मठों की तरह होते हैं जहाँ कला, संगीत, नृत्य और रंगमंच के माध्यम से भगवान कृष्ण की भक्ति की जाती है।
- ये सत्र सत्रीया नृत्य (Sattriya Dance), जो अब भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में से एक है, और भाओना (Bhaona) नामक नाट्य प्रस्तुतियों का केंद्र हैं।
- आउनीआटी सत्र, दक्षिणपाट सत्र और कमलाबाड़ी सत्र यहाँ के कुछ प्रमुख और प्राचीन सत्र हैं।
- कला और शिल्प:
- यह द्वीप अपनी अनूठी हस्तकलाओं के लिए भी जाना जाता है, जिनमें मुखौटा बनाना (Mask-making), मिट्टी के बर्तन बनाना और नाव बनाना प्रमुख हैं। यहाँ के मुखौटे ‘भाओना’ प्रदर्शनों में उपयोग किए जाते हैं और अपनी कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध हैं।
आधुनिक स्थिति
- भारत का पहला द्वीपीय जिला: माजुली के महत्व और चुनौतियों को देखते हुए, 2016 में इसे एक पूर्ण जिले (District) का दर्जा दिया गया, जिससे यह भारत का पहला और एकमात्र द्वीपीय जिला बन गया।
- यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की दौड़ में: इसकी अनूठी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को देखते हुए, इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) की अस्थायी सूची में शामिल किया गया है।
- कनेक्टिविटी: माजुली मुख्य रूप से नौका सेवाओं (Ferry services) द्वारा जोरहाट (निमाती घाट) से जुड़ा हुआ है।
निष्कर्ष: माजुली केवल एक नदी द्वीप नहीं है, बल्कि यह असम की आत्मा, उसकी जीवंत संस्कृति, कला और आध्यात्मिकता का एक अनमोल भंडार है। हालांकि, यह ब्रह्मपुत्र नदी के लगातार कटाव के कारण अपने अस्तित्व के लिए एक गंभीर संकट का सामना कर रहा है, और इसके संरक्षण के लिए तत्काल और प्रभावी प्रयासों की आवश्यकता है।
अपवाह तंत्र (Drainage System) –
परिभाषा
सरल परिभाषा:
किसी क्षेत्र की नदी प्रणाली को अपवाह तंत्र कहा जाता है। इसमें एक मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियाँ शामिल होती हैं जो मिलकर एक एकीकृत जल निकासी व्यवस्था बनाती हैं। यह एक नेटवर्क की तरह काम करता है, जो वर्षा या पिघलने वाली बर्फ के पानी को एकत्र करके अंततः एक बड़े जल निकाय, जैसे समुद्र, झील या महासागर, तक पहुँचाता है।
विस्तृत परिभाषा:
अपवाह तंत्र (Drainage System) एक परिभाषित क्षेत्र, जिसे अपवाह द्रोणी (Drainage Basin) या जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area) कहा जाता है, के भीतर नदियों, सरिताओं (streams) और झीलों का एक संगठित नेटवर्क है, जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में जल का संग्रह और परिवहन करता है। इस तंत्र में एक मुख्य नदी (master stream) होती है, जिसमें विभिन्न दिशाओं से आकर कई सहायक नदियाँ (tributaries) मिलती हैं। ये सभी मिलकर सतह के जल को एक निश्चित दिशा में प्रवाहित करते हुए निकास बिंदु (outlet) तक ले जाती हैं, जो सामान्यतः कोई सागर या महासागर होता है।
अपवाह तंत्र के प्रमुख घटक (Key Components of a Drainage System):
- मुख्य नदी (Main River / Master Stream):
- यह अपवाह तंत्र की सबसे बड़ी और सबसे लंबी नदी होती है जो सीधे समुद्र या झील में मिलती है। उदाहरण: गंगा, ब्रह्मपुत्र, अमेज़ॅन।
- सहायक नदियाँ (Tributaries):
- ये छोटी नदियाँ होती हैं जो अपना पानी मुख्य नदी में डालती हैं। ये नदी के जल की मात्रा को बढ़ाती हैं। उदाहरण: यमुना, सोन, गंडक (गंगा की सहायक नदियाँ)।
- वितरिकाएँ (Distributaries):
- ये वे नदी धाराएँ हैं जो मुख्य नदी से अलग होकर बहती हैं, खासकर डेल्टा क्षेत्रों में। ये अपना पानी मुख्य नदी में वापस नहीं डालतीं। उदाहरण: हुगली नदी (गंगा की वितरिका)।
- अपवाह द्रोणी / बेसिन (Drainage Basin):
- यह वह संपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ से एक नदी और उसकी सहायक नदियाँ जल प्राप्त करती हैं। एक अपवाह द्रोणी का पानी एक ही निकास बिंदु की ओर बहता है। अमेज़ॅन बेसिन दुनिया का सबसे बड़ा नदी बेसिन है।
- जल विभाजक (Water Divide / Watershed):
- यह एक उच्च भूमि क्षेत्र, जैसे कोई पर्वत, रिज या पठार होता है, जो दो अलग-अलग अपवाह द्रोणियों को एक-दूसरे से अलग करता है। उदाहरण: अरावली श्रेणी सिंधु और गंगा नदी तंत्र के बीच एक जल विभाजक का काम करती है।
- नदी का मुहाना (Mouth of the River):
- यह वह स्थान है जहाँ नदी अपना पानी किसी बड़े जल निकाय जैसे समुद्र, महासागर या झील में विसर्जित करती है।
अपवाह प्रतिरूप (Drainage Pattern)
किसी क्षेत्र की भूगर्भिक संरचना, चट्टानों की प्रकृति, स्थलाकृति और ढाल यह निर्धारित करते हैं कि नदियाँ किस पैटर्न या ज्यामितीय स्वरूप में बहेंगी। इसे अपवाह प्रतिरूप (Drainage Pattern) कहते हैं। कुछ प्रमुख प्रतिरूप हैं:
द्रुमाकृतिक या वृक्षाकार अपवाह प्रतिरूप (Dendritic Drainage Pattern)
परिभाषा:
द्रुमाकृतिक अपवाह प्रतिरूप, जिसे वृक्षाकार प्रतिरूप भी कहा जाता है, नदी अपवाह प्रणालियों का सबसे आम और स्वाभाविक रूप से पाया जाने वाला पैटर्न है। इस पैटर्न में, एक मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियाँ मिलकर एक ऐसी आकृति बनाती हैं जो पेड़ की शाखाओं (branches of a tree) या पौधे की जड़ों के समान दिखाई देती है।
“Dendritic” शब्द ग्रीक भाषा के शब्द “Dendron” से लिया गया है, जिसका अर्थ ही “पेड़” (tree) होता है।
निर्माण और आवश्यक भौगोलिक दशाएँ (Formation and Necessary Geological Conditions)
यह अपवाह प्रतिरूप किसी विशेष योजना या संरचना के बिना, प्राकृतिक रूप से विकसित होता है। इसके निर्माण के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाएँ आवश्यक हैं:
- समान प्रतिरोधी चट्टानें (Homogeneous Resistant Rocks):
- यह प्रतिरूप उन क्षेत्रों में विकसित होता है जहाँ की भूगर्भिक संरचना एक समान होती है।
- इसका अर्थ है कि पूरे क्षेत्र में पाई जाने वाली चट्टानें अपरदन के प्रति लगभग एक समान प्रतिरोध रखती हैं। कोई विशेष रूप से कठोर या नरम चट्टानी परतें समानांतर रूप में नहीं होतीं जो नदी के मार्ग को नियंत्रित कर सकें।
- उदाहरण के लिए, विशाल ग्रेनाइट की चट्टानों या मोटी जलोढ़ मिट्टी के समतल मैदानों पर यह पैटर्न आसानी से विकसित होता है।
- समान संरचनात्मक नियंत्रण का अभाव (Lack of Uniform Structural Control):
- क्षेत्र में कोई विशेष भूवैज्ञानिक संरचना जैसे भ्रंश (faults), मोड़ (folds) या जोड़ों (joints) का प्रभाव नहीं होता जो नदियों को एक निश्चित दिशा में बहने के लिए मजबूर करे।
- नदियाँ अपनी सहायक नदियों के साथ मिलकर भू-भाग के सामान्य ढाल (General Slope) का अनुसरण करती हैं।
विशेषताएँ (Characteristics)
- पेड़ जैसी आकृति (Tree-like Pattern):
- सहायक नदियाँ मुख्य नदी में किसी भी दिशा से आकर मिल सकती हैं और वे स्वयं भी अपनी छोटी सहायक नदियों से इसी प्रकार मिलती हैं। इससे एक घना, शाखाओं वाला नेटवर्क बनता है।
- अनियमित संगम कोण (Irregular Angles of Meeting):
- सहायक नदियाँ मुख्य नदी में किसी निश्चित कोण पर नहीं मिलती हैं। वे आमतौर पर न्यूनकोण (acute angle) पर, यानी 90 डिग्री से कम के कोण पर मिलती हैं।
- सतही ढाल का अनुसरण:
- पूरा नदी तंत्र क्षेत्र के समग्र ढाल का अनुसरण करता है। पानी उच्चतम बिंदु से निम्नतम बिंदु की ओर बहता है, ठीक वैसे ही जैसे एक ढलान पर पानी बहता है।
- सर्वाधिक सामान्य प्रतिरूप:
- क्योंकि दुनिया के अधिकांश भूभागों पर चट्टानें या तो समान रूप से प्रतिरोधी हैं या उन पर कोई मजबूत संरचनात्मक नियंत्रण नहीं है, यह पैटर्न पृथ्वी पर सबसे अधिक पाया जाने वाला अपवाह प्रतिरूप है।
उदाहरण (Examples)
- उत्तर भारत का विशाल मैदान: गंगा नदी प्रणाली और सिंधु नदी प्रणाली अपने मैदानी भागों में द्रुमाकृतिक प्रतिरूप का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। गंगा और उसकी सहायक नदियाँ (यमुना, घाघरा, गंडक) एक पेड़ की शाखाओं की तरह विशाल नेटवर्क बनाती हैं, क्योंकि वे हिमालय से लाए गए जलोढ़ के एक समान मैदान पर बहती हैं।
- दक्षिण भारत का पठारी भाग: गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी अधिकांश प्रायद्वीपीय नदियाँ भी अपनी द्रोणियों में द्रुमाकृतिक प्रतिरूप दिखाती हैं, क्योंकि वे कठोर क्रिस्टलीय चट्टानों के एक विशाल और लगभग समान भूभाग पर बहती हैं।
- वैश्विक उदाहरण:
- उत्तरी अमेरिका में मिसिसिपी-मिसौरी नदी प्रणाली।
- दक्षिण अमेरिका में अमेज़ॅन नदी प्रणाली।
निष्कर्ष: द्रुमाकृतिक अपवाह प्रतिरूप नदियों द्वारा बनाया गया सबसे सरल और सबसे सामान्य डिज़ाइन है। यह उन परिदृश्यों को इंगित करता है जहाँ की अंतर्निहित भूविज्ञान (underlying geology) एक समान है और सतह पर जल के प्रवाह को निर्देशित करने के लिए कोई विशिष्ट संरचनात्मक दोष नहीं हैं।
जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप (Trellis Drainage Pattern)
परिभाषा:
जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप एक विशिष्ट प्रकार का ज्यामितीय अपवाह पैटर्न है, जिसमें मुख्य नदियाँ एक-दूसरे के लगभग समानांतर बहती हैं और उनकी सहायक नदियाँ उनसे आकर समकोण (लगभग 90 डिग्री) पर मिलती हैं। इस व्यवस्था के कारण पूरा नदी तंत्र एक आयताकार जाली या ‘ट्रेलिस’ (अंगूर की बेल को सहारा देने वाली जाली) जैसा दिखाई देता है।
निर्माण और आवश्यक भौगोलिक दशाएँ (Formation and Necessary Geological Conditions)
यह अपवाह प्रतिरूप विशेष भूवैज्ञानिक संरचना वाले क्षेत्रों में ही विकसित होता है। इसके निर्माण के लिए निम्नलिखित दशाएँ आवश्यक हैं:
- वलित स्थलाकृति (Folded Topography):
- यह पैटर्न मुख्य रूप से वलित पर्वतीय क्षेत्रों (Folded Mountainous Regions) में पाया जाता है, जहाँ चट्टानों की परतें मुड़कर अपनति (Anticline – ऊपर की ओर मुड़ी परत) और अभिनति (Syncline – नीचे की ओर मुड़ी परत) का निर्माण करती हैं।
- वैकल्पिक कठोर और नरम चट्टानें (Alternate Hard and Soft Rocks):
- इस वलित संरचना में कठोर (प्रतिरोधी) और नरम (कम प्रतिरोधी) चट्टानों की परतें एक-दूसरे के समानांतर, एक के बाद एक (वैकल्पिक रूप से) पाई जाती हैं।
- नरम चट्टानें (जैसे शेल, चूना पत्थर) का अपरदन आसानी से और तेजी से हो जाता है।
- कठोर चट्टानें (जैसे बलुआ पत्थर, क्वार्टजाइट) अपरदन का अधिक प्रतिरोध करती हैं और रिज (ridges) या कटक के रूप में खड़ी रह जाती हैं।
विकास की प्रक्रिया (Process of Development):
- मुख्य नदियों का विकास:
- मुख्य और लंबी नदियाँ, जिन्हें अनुवर्ती नदियाँ (Consequent Rivers) कहते हैं, अक्सर नरम चट्टानों से बनी अभिनतियों (synclinal valleys) या घाटियों में अपना मार्ग बनाती हैं। ये नदियाँ क्षेत्र के सामान्य ढाल का अनुसरण करती हुई एक-दूसरे के समानांतर बहती हैं।
- सहायक नदियों का विकास:
- कठोर चट्टानों से बनी अपनतियों (anticlinal ridges) के ढलानों से छोटी-छोटी सहायक नदियाँ निकलती हैं। इन्हें परवर्ती नदियाँ (Subsequent Rivers) कहा जाता है।
- ये नदियाँ नरम चट्टानों को आसानी से काटती हुई नीचे उतरती हैं और मुख्य नदी में लगभग समकोण पर मिलती हैं।
- जाली जैसी संरचना का निर्माण:
- समानांतर बहने वाली मुख्य नदियाँ और उनसे समकोण पर आकर मिलने वाली सहायक नदियाँ मिलकर एक सीधी रेखाओं वाली, जाली जैसी संरचना का निर्माण करती हैं। कभी-कभी बहुत छोटी नदियाँ मुख्य कटक के समानांतर बहती हैं और परवर्ती नदियों में मिलती हैं, जिससे यह जाली और भी घनी हो जाती है।
उदाहरण (Examples)
- हिमालय क्षेत्र: भारत में इस प्रकार का अपवाह प्रतिरूप हिमालय की वलित पर्वत श्रृंखलाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
- सिंधु नदी प्रणाली की ऊपरी सहायक नदियाँ: हिमालय के ऊपरी हिस्सों में, सिंधु, झेलम, चिनाब जैसी मुख्य नदियाँ लंबी घाटियों में बहती हैं और उनकी सहायक नदियाँ रिज से उतरकर लगभग समकोण पर उनसे मिलती हैं।
- छोटा नागपुर पठार: इस क्षेत्र के पुराने वलित संरचना वाले भागों में भी यह पैटर्न पाया जाता है।
- वैश्विक उदाहरण:
- एपलाशियन पर्वत (Appalachian Mountains), संयुक्त राज्य अमेरिका: यह जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप का सर्वश्रेष्ठ और क्लासिक उदाहरण माना जाता है। यहाँ वलित संरचना और समानांतर कठोर व नरम चट्टानी परतें बहुत स्पष्ट हैं।
- उत्तरी फ्रांस और दक्षिणी जर्मनी के कुछ हिस्से।
निष्कर्ष: जालीनुमा अपवाह प्रतिरूप एक अत्यधिक संरचनात्मक रूप से नियंत्रित पैटर्न है। इसे देखकर एक भूगोलवेत्ता तुरंत यह अनुमान लगा सकता है कि इस क्षेत्र की अंतर्निहित भूविज्ञान (underlying geology) वलित (folded) है और इसमें कठोर तथा नरम चट्टानों की समानांतर परतें मौजूद हैं। यह भू-भाग की संरचना को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
अरीय या केन्द्रापसारी अपवाह प्रतिरूप (Radial or Centrifugal Drainage Pattern)
परिभाषा:
अरीय अपवाह प्रतिरूप, जिसे केन्द्रापसारी प्रतिरूप (Centrifugal Pattern) भी कहा जाता है, एक ऐसा पैटर्न है जिसमें नदियाँ एक केंद्रीय उच्च बिंदु (Central High Point) से निकलकर सभी दिशाओं में बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे किसी पहिये की तीलियाँ (spokes) उसके केंद्र से बाहर की ओर निकलती हैं।
“Centrifugal” का अर्थ ही होता है “केंद्र से बाहर की ओर जाने वाला”।
निर्माण और आवश्यक भौगोलिक दशाएँ (Formation and Necessary Geological Conditions)
यह अपवाह प्रतिरूप विशिष्ट प्रकार की भू-आकृतियों पर ही विकसित होता है। इसके निर्माण के लिए निम्नलिखित दशाएँ आवश्यक हैं:
- एकल केंद्रीय उच्च भू-आकृति (Single, Central Elevated Landform):
- इस पैटर्न के केंद्र में एक गुंबद के आकार की या शंक्वाकार (conical) उच्च भूमि का होना आवश्यक है, जो आसपास के क्षेत्र से स्पष्ट रूप से ऊँची हो।
- यह उच्च भू-आकृति हो सकती है:
- ज्वालामुखी शंकु (Volcanic Cone): एक ज्वालामुखी पर्वत के शिखर से नदियाँ चारों ओर नीचे की ओर बहती हैं।
- गुंबद (Dome): भूगर्भिक हलचलों से ऊपर उठी हुई एक गोलाकार भूमि।
- पठार का उठा हुआ भाग (Uplifted Plateau or Batholith): एक कठोर चट्टानी पिंड जो आसपास की नरम चट्टानों के अपरदन के बाद एक उच्च भूमि के रूप में रह गया हो।
- पहाड़ का शिखर: एक अलग-थलग (isolated) पर्वत शिखर।
विकास की प्रक्रिया (Process of Development):
- गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव: इस केंद्रीय उच्च बिंदु पर होने वाली वर्षा या बर्फ पिघलने से उत्पन्न जल, गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी दिशाओं में सबसे सीधे और छोटे रास्ते से नीचे की ओर बहना शुरू कर देता है।
- नदियों का निर्माण: समय के साथ, जल के इस प्रवाह से छोटी-छोटी धाराएँ बनती हैं, जो मिलकर बड़ी नदियों का रूप ले लेती हैं।
- सभी दिशाओं में प्रवाह: चूँकि ढलान केंद्र से सभी दिशाओं में बाहर की ओर होता है, इसलिए नदियाँ भी एक ही बिंदु से निकलकर चारों ओर प्रवाहित होती हैं।
उदाहरण (Examples)
- अमरकंटक का पठार, भारत: यह भारत में अरीय अपवाह प्रतिरूप का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
- मैकाल श्रेणी पर स्थित अमरकंटक के शिखर से तीन प्रमुख नदियाँ तीन अलग-अलग दिशाओं में निकलती हैं:
- नर्मदा नदी: पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में मिलती है।
- सोन नदी: उत्तर की ओर बहकर गंगा नदी में मिलती है।
- महानदी: (कुछ स्रोतों के अनुसार सिहावा के पास से) दक्षिण-पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है।
- मैकाल श्रेणी पर स्थित अमरकंटक के शिखर से तीन प्रमुख नदियाँ तीन अलग-अलग दिशाओं में निकलती हैं:
- छोटा नागपुर का पठार, भारत: इस पठार के मध्य भाग, विशेषकर राँची और हजारीबाग के पठार, एक गुंबद के रूप में उठे हुए हैं। यहाँ से दामोदर, सुवर्णरेखा, उत्तरी कोयल, और दक्षिणी कोयल जैसी नदियाँ निकलकर अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं।
- गिरनार की पहाड़ियाँ, गुजरात: गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में स्थित गिरनार की पहाड़ियाँ भी अरीय अपवाह का एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करती हैं, जहाँ से नदियाँ चारों ओर निकलती हैं।
- वैश्विक उदाहरण:
- ज्वालामुखी पर्वत: दुनिया भर में कई ज्वालामुखी शंकु, जैसे जापान में माउंट फूजी (Mt. Fuji) और संयुक्त राज्य अमेरिका में माउंट रेनियर (Mt. Rainier), पर अरीय अपवाह प्रतिरूप देखा जा सकता है।
- ब्लैक हिल्स (Black Hills), साउथ डकोटा, USA: यह एक गुंबदाकार उत्थान (domal uplift) है, जहाँ से नदियाँ सभी दिशाओं में बाहर की ओर बहती हैं।
निष्कर्ष: अरीय अपवाह प्रतिरूप को देखकर एक भूगोलवेत्ता तुरंत यह अनुमान लगा सकता है कि इस क्षेत्र के केंद्र में कोई प्रमुख उच्च भू-भाग (prominent upland) जैसे कि एक गुंबद, पठार या ज्वालामुखी स्थित है। यह भू-आकृति विज्ञान में स्थलाकृति और अपवाह के बीच सीधे संबंध को दर्शाने वाला एक बहुत ही स्पष्ट पैटर्न है।
अभिकेंद्रीय या केन्द्राभिमुख अपवाह प्रतिरूप (Centripetal or Inland Drainage Pattern)
परिभाषा:
अभिकेंद्रीय अपवाह प्रतिरूप, जिसे केन्द्राभिमुख या अंतःस्थलीय अपवाह प्रतिरूप (Inland Drainage Pattern) भी कहा जाता है, अरीय (Radial) प्रतिरूप का ठीक उल्टा होता है। इस पैटर्न में, नदियाँ चारों दिशाओं से बहकर एक केंद्रीय निम्न भूमि (Central Depression), गर्त (trough) या झील में आकर मिलती हैं।
“Centripetal” का अर्थ ही होता है “केंद्र की ओर आने वाला”।
निर्माण और आवश्यक भौगोलिक दशाएँ (Formation and Necessary Geological Conditions)
यह अपवाह प्रतिरूप एक बहुत ही विशिष्ट प्रकार की स्थलाकृति पर ही विकसित होता है। इसके निर्माण के लिए निम्नलिखित दशाएँ आवश्यक हैं:
- केंद्रीय निम्न भू-भाग (Central Lowland Area):
- इस पैटर्न के केंद्र में एक कटोरे या बेसिन (Basin) के आकार की निम्न भूमि का होना अनिवार्य है, जो चारों ओर से ऊँची भूमि से घिरी हो।
- यह केंद्रीय निम्न भूमि हो सकती है:
- झील (Lake): एक बड़ी झील जो आसपास के ऊँचे क्षेत्रों से आने वाली नदियों के पानी को जमा करती है।
- प्लाया (Playa): शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाने वाली एक अस्थायी, उथली खारी झील।
- गर्त या बेसिन (Depression or Basin): विवर्तनिक हलचलों (Tectonic Activities) के कारण बना एक धँसा हुआ भूभाग।
विकास की प्रक्रिया (Process of Development):
- चारों ओर से प्रवाह: आसपास की ऊँची भूमि पर होने वाली वर्षा का पानी गुरुत्वाकर्षण के कारण ढाल का अनुसरण करता हुआ केंद्रीय निम्न भूमि की ओर बहना शुरू कर देता है।
- नदियों का संगम: अलग-अलग दिशाओं से आने वाली ये नदियाँ और सरिताएँ अंततः उस केंद्रीय झील या गर्त में अपना पानी विसर्जित कर देती हैं।
- समुद्र तक पहुँच नहीं: इस प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इन नदियों का पानी समुद्र या महासागर तक नहीं पहुँच पाता है। वे भूमि से घिरे एक बेसिन में ही समाप्त हो जाती हैं, इसीलिए इसे अंतःस्थलीय अपवाह (Inland Drainage) भी कहते हैं।
उदाहरण (Examples)
- नेपाल की काठमांडू घाटी (Kathmandu Valley, Nepal): यह अभिकेंद्रीय अपवाह प्रतिरूप का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। काठमांडू घाटी चारों ओर से महाभारत और शिवालिक श्रेणियों से घिरी एक कटोरीनुमा घाटी है। बागमती नदी और उसकी सहायक नदियाँ चारों ओर की पहाड़ियों से निकलकर घाटी के केंद्र में मिलती हैं और फिर एक संकरे गॉर्ज से होकर बाहर निकलती हैं।
- मणिपुर की लोकटक झील (Loktak Lake, Manipur): मणिपुर घाटी, जो चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरी है, अभिकेंद्रीय अपवाह का एक अच्छा उदाहरण है। इंफाल नदी और अन्य छोटी नदियाँ पहाड़ियों से उतरकर लोकटक झील में गिरती हैं।
- राजस्थान की सांभर झील (Sambhar Lake, Rajasthan): शुष्क क्षेत्रों में, यह पैटर्न बहुत आम है। सांभर झील एक गर्त में स्थित है और इसके चारों ओर से मेन्था और रूपनगढ़ जैसी कई छोटी मौसमी नदियाँ आकर इसी में विलीन हो जाती हैं।
- लद्दाख, भारत: लद्दाख के कई बेसिन अभिकेंद्रीय अपवाह का प्रदर्शन करते हैं, जहाँ नदियाँ पिघले हुए ग्लेशियरों से निकलकर खारी झीलों (जैसे पैंगोंग त्सो, त्सो मोरीरी) में समाप्त हो जाती हैं।
- वैश्विक उदाहरण:
- ग्रेट बेसिन (Great Basin), संयुक्त राज्य अमेरिका: यह पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका का एक विशाल अंतःस्थलीय अपवाह क्षेत्र है, जहाँ नदियाँ समुद्र तक नहीं पहुँचतीं, बल्कि ग्रेट साल्ट लेक (Great Salt Lake) जैसी झीलों में समाप्त हो जाती हैं।
- चाड झील बेसिन (Lake Chad Basin), अफ्रीका: चाड झील में चारों ओर से नदियाँ आकर मिलती हैं।
- तारिम बेसिन (Tarim Basin), चीन: यहाँ की नदियाँ तकलामाकन मरुस्थल (Taklamakan Desert) में ही लुप्त हो जाती हैं।
निष्कर्ष: अभिकेंद्रीय अपवाह प्रतिरूप को देखकर यह तुरंत अनुमान लगाया जा सकता है कि यह क्षेत्र एक बंद जल निकासी प्रणाली (Closed Drainage System) है, जिसके केंद्र में एक निम्न भूमि (Depression) जैसे झील या गर्त स्थित है। यह आमतौर पर या तो विवर्तनिक रूप से सक्रिय घाटियों में या शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है।
आयताकार अपवाह प्रतिरूप (Rectangular Drainage Pattern)
परिभाषा:
आयताकार अपवाह प्रतिरूप एक ऐसा पैटर्न है जिसमें मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियाँ तीखे मोड़ (sharp bends) बनाती हैं और एक-दूसरे से लगभग समकोण (90 डिग्री) पर मिलती हैं। इस पैटर्न में नदियों के मार्ग एक आयताकार ग्रिड या जाली के समान दिखाई देते हैं। यह जालीनुमा (Trellis) प्रतिरूप का ही एक रूपांतर है, लेकिन यह वलित चट्टानों के बजाय जोड़ों और भ्रंशों (Joints and Faults) वाली चट्टानी संरचना पर विकसित होता है।
निर्माण और आवश्यक भौगोलिक दशाएँ (Formation and Necessary Geological Conditions)
यह अपवाह प्रतिरूप केवल उन क्षेत्रों में विकसित होता है जहाँ की चट्टानों में एक विशेष प्रकार की संरचनात्मक कमजोरी मौजूद हो। इसके निर्माण के लिए निम्नलिखित दशाएँ आवश्यक हैं:
- चट्टानों में जोड़ (Joints) और भ्रंश (Faults) का नेटवर्क:
- इस पैटर्न का निर्माण उन कठोर, क्रिस्टलीय चट्टानों (जैसे ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर) पर होता है जिनमें संरचनात्मक कमजोरी की रेखाएँ मौजूद होती हैं।
- ये कमजोरियाँ जोड़ों (Joints) – यानि चट्टानों में पड़ी दरारें जिनके सहारे कोई हलचल न हुई हो, और भ्रंशों (Faults) – यानि वे दरारें जिनके सहारे चट्टानी खंडों में हलचल हुई हो, के रूप में होती हैं।
- समकोणीय जोड़ों का तंत्र (Right-angled Joint System):
- आयताकार पैटर्न के विकास के लिए यह आवश्यक है कि ये जोड़ और भ्रंश एक-दूसरे को लगभग समकोण (90 डिग्री) पर काटते हों, जिससे चट्टान में एक चेकर्ड-बोर्ड (checkerboard) या ग्रिड जैसा पैटर्न बना हो।
विकास की प्रक्रिया (Process of Development):
- कमजोरियों का अनुसरण: पानी हमेशा सबसे कम प्रतिरोध का रास्ता अपनाता है। जब इन चट्टानी क्षेत्रों में वर्षा होती है, तो पानी इन पहले से मौजूद जोड़ों और भ्रंशों की कमजोर रेखाओं के साथ-साथ बहना शुरू कर देता है क्योंकि इन दरारों का अपरदन करना ठोस चट्टान की तुलना में बहुत आसान होता है।
- नदियों द्वारा घाटी का निर्माण: समय के साथ, नदी इन दरारों को गहरा और चौड़ा करके एक घाटी का निर्माण कर लेती है।
- तीखे, समकोणीय मोड़: जब एक नदी एक जोड़ के सहारे बह रही होती है और उसका सामना एक दूसरे जोड़ से होता है जो उसे समकोण पर काटता है, तो नदी अचानक 90 डिग्री पर मुड़कर उस दूसरे जोड़ के सहारे बहने लगती है।
- समकोण पर संगम: इसी प्रकार, सहायक नदियाँ भी इन जोड़ों का अनुसरण करती हैं और मुख्य नदी में लगभग समकोण पर आकर मिलती हैं।
- आयताकार ग्रिड का निर्माण: नदियों के बार-बार तीखे, समकोणीय मोड़ लेने और सहायक नदियों के समकोण पर मिलने से पूरा नदी तंत्र एक आयताकार ग्रिड जैसा दिखने लगता है।
जालीनुमा (Trellis) और आयताकार (Rectangular) प्रतिरूप में अंतर
हालांकि दोनों में सहायक नदियाँ समकोण पर मिलती हैं, लेकिन दोनों की उत्पत्ति का आधार अलग है:
| आधार | जालीनुमा प्रतिरूप (Trellis Pattern) | आयताकार प्रतिरूप (Rectangular Pattern) |
| उत्पत्ति | यह वलित (folded) स्थलाकृति पर बनता है, जहाँ नरम और कठोर चट्टानों की समानांतर परतें होती हैं। | यह कठोर क्रिस्टलीय चट्टानों पर बनता है, जहाँ जोड़ (Joints) और भ्रंश (Faults) का नेटवर्क होता है। |
| नदियों का प्रवाह | मुख्य नदियाँ समानांतर और सीधी बहती हैं। सहायक नदियाँ सीधी आकर मिलती हैं। | मुख्य नदी और सहायक नदियाँ दोनों ही टेढ़े-मेढ़े रास्ते (zig-zag) अपनाती हैं और कई तीखे मोड़ लेती हैं। |
उदाहरण (Examples)
- विंध्य पर्वत श्रृंखला, भारत: भारत के विंध्य और सतपुड़ा के पठारी क्षेत्रों में, जहाँ कठोर बलुआ पत्थर की चट्टानों में जोड़ों का नेटवर्क है, वहाँ यह पैटर्न पाया जा सकता है। चंबल नदी और उसकी कुछ सहायक नदियाँ बीहड़ों में इस तरह का पैटर्न बनाती हैं।
- प्रायद्वीपीय भारत का पठारी भाग: प्रायद्वीपीय भारत के कठोर क्रिस्टलीय चट्टानी क्षेत्रों में भी कहीं-कहीं यह पैटर्न देखने को मिलता है।
- वैश्विक उदाहरण:
- नॉर्वे के तटीय क्षेत्र: यहाँ की कठोर चट्टानों में भ्रंशों का प्रभाव स्पष्ट है।
- एडिरोंडैक पर्वत (Adirondack Mountains), न्यूयॉर्क, USA: यह भी एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ जोड़ों और भ्रंशों ने नदी के मार्ग को नियंत्रित किया है।
निष्कर्ष: आयताकार अपवाह प्रतिरूप एक दृढ़ता से संरचनात्मक रूप से नियंत्रित पैटर्न है। इसे देखकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस क्षेत्र की आधारभूत चट्टानें कठोर हैं और उनमें जोड़ों और भ्रंशों का एक ग्रिड जैसा नेटवर्क मौजूद है, जिसने नदियों को अपने मार्ग का अनुसरण करने के लिए मजबूर किया है।
वलयाकार या वलयाकृति अपवाह प्रतिरूप (Annular Drainage Pattern)
परिभाषा:
वलयाकार अपवाह प्रतिरूप, जिसे अंगूठीनुमा प्रतिरूप (Ring-like Pattern) भी कहा जाता है, एक ऐसा पैटर्न है जिसमें मुख्य नदियाँ एक टूटे हुए या खंडित वृत्ताकार या वलयाकार (Circular or Annular) मार्ग का अनुसरण करती हैं, और उनकी सहायक नदियाँ या तो केंद्र से बाहर की ओर (अरीय रूप में) या बाहर से केंद्र की ओर (अभिकेंद्रीय रूप में) बहती हैं।
यह एक दुर्लभ और बहुत ही विशिष्ट अपवाह प्रतिरूप है, जो अरीय (Radial) और द्रुमाकृतिक (Dendritic) पैटर्न का एक मिश्रित और संशोधित रूप जैसा प्रतीत होता है।
निर्माण और आवश्यक भौगोलिक दशाएँ (Formation and Necessary Geological Conditions)
यह अपवाह प्रतिरूप केवल एक विशेष प्रकार की भूवैज्ञानिक संरचना पर ही विकसित होता है, जिसे अपरदित गुंबद (Eroded Dome) या बेसिन (Basin) कहते हैं।
- गुंबदाकार या बेसिन संरचना (Dome or Basin Structure):
- इस पैटर्न के विकास के लिए एक गुंबद (Dome) – जहाँ चट्टानी परतें केंद्र से बाहर की ओर झुकी होती हैं, या एक बेसिन (Basin) – जहाँ चट्टानी परतें केंद्र की ओर झुकी होती हैं, का होना आवश्यक है।
- वैकल्पिक कठोर और नरम चट्टानी परतें (Alternate Hard and Soft Rock Layers):
- सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इस गुंबद या बेसिन की संरचना में कठोर और नरम चट्टानों की संकेंद्रित (Concentric) यानी एक ही केंद्र वाली वृत्ताकार परतें हों।
विकास की प्रक्रिया (Process of Development):
- गुंबद का अपरदन: कल्पना कीजिए कि एक विशाल गुंबद है जिसमें कठोर बलुआ पत्थर और नरम शेल की वृत्ताकार परतें एक के बाद एक हैं। जब इस गुंबद की ऊपरी परत का अपरदन होता है, तो नीचे की वृत्ताकार चट्टानी परतें सतह पर दिखाई देने लगती हैं।
- नरम चट्टानों का कटना: नदियाँ और वर्षा का पानी नरम चट्टानों (जैसे शेल) को आसानी से और तेजी से काट देते हैं, जिससे इन परतों के ऊपर वृत्ताकार घाटियाँ (Circular Valleys) बन जाती हैं।
- मुख्य नदी का वृत्ताकार मार्ग: मुख्य नदियाँ (जिन्हें परवर्ती नदियाँ कहते हैं) इन्हीं नरम चट्टानों से बनी वृत्ताकार घाटियों में अपना मार्ग बना लेती हैं। इस कारण वे एक वृत्ताकार या वलयाकार पथ पर बहने लगती हैं।
- कठोर चट्टानों का रिज के रूप में रहना: कठोर चट्टानें (जैसे बलुआ पत्थर) अपरदन का प्रतिरोध करती हैं और नरम चट्टानी घाटियों के बीच वृत्ताकार कटक या रिज (Circular Ridges or Cuestas) के रूप में खड़ी रह जाती हैं।
- सहायक नदियों का प्रवाह:
- इन वृत्ताकार कटकों (ridges) से छोटी-छोटी सहायक नदियाँ निकलती हैं।
- ये नदियाँ कटक के ढलान के सहारे बहती हुई मुख्य वलयाकार नदी में समकोण पर मिलती हैं, ठीक जालीनुमा (Trellis) पैटर्न की तरह।
- इन सहायक नदियों का प्रवाह या तो केंद्र से बाहर की ओर (गुंबद की स्थिति में) या बाहर से केंद्र की ओर (बेसिन की स्थिति में) हो सकता है।
उदाहरण (Examples)
यह एक बहुत ही दुर्लभ पैटर्न है और इसके क्लासिक उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।
- विंध्य पर्वत श्रृंखला, भारत: भारत में विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ या सोनार-बियरमा बेसिन में कुछ स्थानों पर वलयाकार प्रतिरूप के लक्षण देखे गए हैं।
- पिथौरागढ़, उत्तराखंड: पिथौरागढ़ शहर के आसपास की घाटी भी कुछ हद तक एक संरचनात्मक बेसिन है और वलयाकार प्रतिरूप प्रदर्शित करती है।
- वैश्विक उदाहरण:
- ब्लैक हिल्स (Black Hills), साउथ डकोटा, संयुक्त राज्य अमेरिका: यह एक अपरदित गुंबद का विश्व प्रसिद्ध उदाहरण है, जहाँ वलयाकार अपवाह प्रतिरूप स्पष्ट रूप से विकसित हुआ है। यहाँ की ‘रेड वैली’ (Red Valley) एक नरम चट्टानी परत द्वारा निर्मित एक पूर्ण वृत्ताकार घाटी है।
- वल्ड (The Weald), दक्षिणी इंग्लैंड: यह भी एक अपरदित गुंबद है जो वलयाकार पैटर्न प्रदर्शित करता है।
निष्कर्ष: वलयाकार अपवाह प्रतिरूप को देखकर एक भूगोलवेत्ता यह निश्चित रूप से कह सकता है कि उस क्षेत्र की भूवैज्ञानिक संरचना एक अपरदित गुंबद या बेसिन है जिसमें कठोर और नरम चट्टानों की संकेंद्रित परतें मौजूद हैं। यह भू-आकृति विज्ञान और संरचनात्मक भूविज्ञान के बीच घनिष्ठ संबंध का एक शानदार उदाहरण है।
भूगोल और भू-आकृति विज्ञान में, “गुंबदाकार अपवाह प्रतिरूप” कोई अलग से वर्गीकृत पैटर्न नहीं है। बल्कि, “गुंबद” (Dome) एक भू-आकृति (landform) है जिस पर एक विशेष प्रकार का अपवाह प्रतिरूप विकसित होता है।
गुंबदाकार संरचना पर विकसित होने वाला सबसे प्रमुख और स्वाभाविक अपवाह प्रतिरूप अरीय या केन्द्रापसारी अपवाह प्रतिरूप (Radial or Centrifugal Drainage Pattern) है।
चलिए इसे विस्तार से समझते हैं।
गुंबदाकार भू-आकृति पर विकसित अपवाह प्रतिरूप (Drainage Pattern Developed on a Domed Structure)
1. गुंबद क्या है? (What is a Dome?)
- भूविज्ञान में, गुंबद एक ऐसी संरचना होती है जहाँ चट्टानों की परतें एक केंद्रीय बिंदु से सभी दिशाओं में बाहर की ओर झुकी होती हैं, जिससे एक कटोरे को उल्टा रखने जैसी आकृति बनती है।
- यह भू-भाग के ऊपर उठने (Upliftment) के कारण बनता है। जब यह गुंबद अपर्दित (eroded) होता है, तो सतह पर वृत्ताकार या अंडाकार रूप में चट्टानी परतें दिखाई देती हैं, जिसमें सबसे पुरानी चट्टानें केंद्र में होती हैं।
2. इस पर कौन सा अपवाह प्रतिरूप बनता है?
एक गुंबद के शिखर पर, जो आसपास के क्षेत्र से ऊँचा होता है, अरीय या केन्द्रापसारी अपवाह प्रतिरूप (Radial Pattern) का निर्माण होता है।
विकास की प्रक्रिया:
- केंद्रीय उच्च बिंदु: गुंबद का शिखर उस क्षेत्र का सबसे ऊँचा बिंदु होता है।
- सभी दिशाओं में ढलान: इस शिखर से ढलान सभी दिशाओं में बाहर की ओर होता है।
- जल का प्रवाह: जब इस शिखर पर वर्षा होती है या बर्फ पिघलती है, तो पानी गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी दिशाओं में नीचे की ओर बहना शुरू कर देता है।
- नदियों का निर्माण: समय के साथ, यह बहता हुआ पानी धाराएँ और फिर नदियाँ बना लेता है। चूँकि प्रवाह सभी दिशाओं में है, इसलिए नदियाँ भी एक पहिये की तीलियों (spokes of a wheel) की तरह केंद्र से निकलकर चारों ओर बहती हैं।
एक और संभावना: वलयाकार अपवाह प्रतिरूप (Annular Drainage Pattern)
यदि गुंबदाकार संरचना बहुत पुरानी और गहराई से अपर्दित हो, और उसमें कठोर तथा नरम चट्टानों की वैकल्पिक (alternate) वृत्ताकार परतें मौजूद हों, तो समय के साथ अरीय पैटर्न वलयाकार अपवाह प्रतिरूप (Annular Pattern) में बदल सकता है।
यह कैसे होता है:
- गुंबद के ऊपरी हिस्से का अपरदन हो जाता है।
- नदियाँ नरम चट्टानों की वृत्ताकार परतों को आसानी से काट देती हैं और वृत्ताकार घाटियों (circular valleys) का निर्माण करती हैं।
- मुख्य नदियाँ इन्हीं वृत्ताकार घाटियों में बहने लगती हैं, जिससे एक अंगूठीनुमा (ring-like) पैटर्न बनता है।
- कठोर चट्टानें वृत्ताकार रिज (ridges) के रूप में खड़ी रह जाती हैं।
ब्लैक हिल्स, साउथ डकोटा (USA) इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। यह मूल रूप से एक गुंबद था जिस पर पहले अरीय पैटर्न था, लेकिन गहरे अपरदन के बाद अब यहाँ एक आदर्श वलयाकार पैटर्न विकसित हो गया है।
निष्कर्ष
- “गुंबदाकार अपवाह प्रतिरूप” वास्तव में अरीय या केन्द्रापसारी (Radial) अपवाह प्रतिरूप का ही दूसरा नाम है, क्योंकि यह प्रतिरूप गुंबद जैसी भू-आकृतियों पर ही बनता है।
- प्रारंभिक अवस्था में: एक नए या कम अपर्दित गुंबद पर अरीय (Radial) पैटर्न बनता है।
- विकसित या वृद्धावस्था में: यदि गुंबद में कठोर और नरम चट्टानों की परतें हों, तो गहरे अपरदन के बाद अरीय पैटर्न वलयाकार (Annular) पैटर्न में बदल सकता है।
अपवाह तंत्र (Drainage System)
परिभाषा:
किसी क्षेत्र की नदी प्रणाली को अपवाह तंत्र कहा जाता है। इसमें एक मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियाँ शामिल होती हैं जो मिलकर एक एकीकृत जल निकासी व्यवस्था बनाती हैं। यह एक नेटवर्क की तरह काम करता है, जो वर्षा या पिघलने वाली बर्फ के पानी को एकत्र करके अंततः एक बड़े जल निकाय, जैसे समुद्र, झील या महासागर, तक पहुँचाता है।
अपवाह तंत्र के प्रकार (Types of Drainage System)
अपवाह तंत्र को मुख्य रूप से दो आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
I. समुद्र में जल विसर्जन के आधार पर (Based on Discharge of Water)
II. उत्पत्ति एवं भू-आकृति के आधार पर (Based on Origin and Geomorphology)
I. समुद्र में जल विसर्जन के आधार पर
भारत के संदर्भ में, इसे दो मुख्य भागों में बांटा जाता है:
1. अरब सागर का अपवाह तंत्र (Arabian Sea Drainage System):
- अर्थ: वे नदियाँ जो अपना जल अरब सागर में गिराती हैं।
- क्षेत्र: यह भारत के कुल अपवाह क्षेत्र का लगभग 23% हिस्सा है।
- प्रमुख नदियाँ: सिंधु (और उसकी सहायक नदियाँ झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलज), नर्मदा, तापी, साबरमती, माही और पश्चिमी घाट से निकलने वाली कई छोटी नदियाँ (जैसे पेरियार, शरावती)।
- विशेषताएँ:
- प्रायद्वीपीय नदियाँ (नर्मदा, तापी) छोटी हैं और ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं।
- सिंधु प्रणाली एक बहुत बड़ा डेल्टा बनाती है, लेकिन उसका अधिकांश भाग पाकिस्तान में है।
2. बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र (Bay of Bengal Drainage System):
- अर्थ: वे नदियाँ जो अपना जल बंगाल की खाड़ी में गिराती हैं।
- क्षेत्र: यह भारत का सबसे बड़ा अपवाह तंत्र है, जो कुल क्षेत्र का लगभग 77% हिस्सा कवर करता है।
- प्रमुख नदियाँ: गंगा (और उसकी सहायक नदियाँ यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी, सोन), ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी।
- विशेषताएँ:
- यहाँ की नदियाँ लंबी हैं और अपने मुहाने पर विशाल और उपजाऊ डेल्टा (Delta) का निर्माण करती हैं।
- गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है।
II. उत्पत्ति एवं भू-आकृति के आधार पर
यह वर्गीकरण इस बात पर आधारित है कि नदी की उत्पत्ति और उसका प्रवाह उस क्षेत्र की भूगर्भिक संरचना और ढाल से कैसे संबंधित है। इसे दो मुख्य समूहों में बांटा जाता है:
A. अनुवर्ती या क्रमागत अपवाह तंत्र (Consequent or Sequential Drainage System)
परिभाषा:
क्रमागत अपवाह तंत्र एक ऐसा नदी तंत्र है जिसमें नदियों की उत्पत्ति और उनका विकास उस भू-भाग की प्रारंभिक संरचना और ढाल (Initial Structure and Slope) का अनुसरण करता है। ये नदियाँ भू-भाग के निर्माण के बाद विकसित होती हैं और उसकी स्थलाकृति के पूरी तरह से अनुरूप होती हैं।
सरल शब्दों में, ये वे नदियाँ हैं जो गुरुत्वाकर्षण के नियम का सीधा पालन करती हैं और भूमि जैसी ढलान वाली होती है, बस उसी दिशा में बहने लगती हैं। “क्रमागत” या “Sequential” का अर्थ ही है कि ये एक क्रम में, एक के बाद एक (मुख्य नदी के बाद सहायक नदियाँ) विकसित होती हैं।
यह अ-क्रमागत अपवाह तंत्र (जैसे पूर्ववर्ती नदियाँ) के ठीक विपरीत है, जो भूमि की संरचना की परवाह किए बिना उसे काटकर अपना मार्ग बनाती हैं।
क्रमागत अपवाह तंत्र के प्रकार (Types of Sequential Drainage)
इस तंत्र के भीतर, नदियों को उनकी उत्पत्ति के क्रम और मुख्य नदी के साथ उनके संबंध के आधार पर चार मुख्य प्रकारों में विभाजित किया जाता है:
1. अनुवर्ती नदी (Consequent River)
- परिभाषा: यह किसी भी क्रमागत अपवाह तंत्र की पहली और मुख्य नदी होती है। यह उस भू-भाग के प्रारंभिक और सामान्य ढाल का अनुसरण करते हुए बहती है।
- विकास: जब कोई नया भू-भाग (जैसे तटीय मैदान या पठार का उत्थान) बनता है, तो उस पर सबसे पहले विकसित होने वाली नदी अनुवर्ती नदी होती है।
- उदाहरण:
- प्रायद्वीपीय भारत की अधिकांश नदियाँ: दक्कन के पठार का सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। इसलिए, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियाँ, जो पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं, अनुवर्ती नदियों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
- तटीय मैदानों की छोटी नदियाँ: पश्चिमी और पूर्वी तटों पर घाट से निकलकर सीधे समुद्र में मिलने वाली छोटी नदियाँ भी अनुवर्ती होती हैं।
2. परवर्ती नदी (Subsequent River)
- परिभाषा: यह अनुवर्ती नदी के बाद विकसित होने वाली एक सहायक नदी है। यह अपना मार्ग नरम चट्टानी परतों, भ्रंश रेखाओं या अन्य संरचनात्मक कमजोरियों के साथ-साथ बनाती है, जिनका अपरदन करना आसान होता है।
- विकास: यह मुख्य अनुवर्ती नदी में लगभग समकोण (90 डिग्री) पर आकर मिलती है।
- अपवाह प्रतिरूप: परवर्ती नदियाँ जालीनुमा (Trellis) और आयताकार (Rectangular) अपवाह प्रतिरूपों के निर्माण के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी होती हैं।
- उदाहरण:
- चंबल, सिंध, बेतवा, केन: ये नदियाँ प्रायद्वीपीय पठार की नरम विंध्यन चट्टानों को काटती हुई मुख्य अनुवर्ती नदियों (गंगा-यमुना) में मिलती हैं।
- हिमालय क्षेत्र में: वलित संरचनाओं में, नरम चट्टानों से बनी घाटियों में बहने वाली सहायक नदियाँ परवर्ती नदियों का उदाहरण हैं।
3. प्रति-अनुवर्ती नदी (Obsequent River)
- परिभाषा: यह एक ऐसी नदी है जो मुख्य अनुवर्ती नदी की प्रवाह दिशा के ठीक विपरीत दिशा में बहती है। ‘Obsequent’ का अर्थ ही है ‘विपरीत’।
- विकास: यह आमतौर पर एक कटक या भ्रंश-कगार (escarpment) के खड़े ढलान से नीचे की ओर बहती है। इसका ढाल स्थानीय होता है, लेकिन क्षेत्रीय ढाल के विपरीत होता है।
- उदाहरण: यह एक दुर्लभ प्रकार की नदी है। प्रायद्वीपीय भारत में, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलानों (मंद ढलान) पर अनुवर्ती नदियाँ बहती हैं, जबकि पश्चिमी ढलानों (खड़े ढलान) से निकलकर अरब सागर में गिरने वाली कुछ छोटी, तीव्रगामी नदियाँ प्रति-अनुवर्ती नदियों का व्यवहार दर्शाती हैं।
4. नवानुवर्ती नदी (Resequent River)
- परिभाषा: यह एक ऐसी सहायक नदी है जो मुख्य अनुवर्ती नदी के समानांतर और उसी की दिशा में बहती है, लेकिन यह बाद में और एक निचले स्तर पर विकसित होती है।
- विकास: यह परवर्ती नदी द्वारा घाटी के गहरा होने की प्रक्रिया के दौरान विकसित हो सकती है। यह मूल ढाल का ही अनुसरण करती है, इसलिए इसे “Resequent” (पुनः अनुवर्ती) कहा जाता है।
- उदाहरण: यह भी एक अकादमिक और तकनीकी वर्गीकरण है, जिसके स्पष्ट उदाहरण कम मिलते हैं। छोटानागपुर पठार या दक्कन के पठार की कुछ छोटी घाटियों में ऐसी नदियाँ देखी जा सकती हैं।
निष्कर्ष:
क्रमागत अपवाह तंत्र हमें यह बताता है कि किसी क्षेत्र की नदियाँ वहाँ की स्थलाकृति और चट्टानी संरचना से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह एक ऐसा तंत्र है जो भू-भाग के ढाल और संरचना के “नियमों का पालन” करता है, जिससे हमें उस क्षेत्र के भू-आकृतिक इतिहास को समझने में मदद मिलती है।
B. अ-अनुवर्ती या अ-क्रमागत अपवाह तंत्र (Inconsequent or Insequential Drainage System)
परिभाषा:
अ-क्रमागत अपवाह तंत्र एक ऐसा नदी तंत्र है जिसमें नदियों का प्रवाह उस भू-भाग की वर्तमान स्थलाकृति, ढाल और भूगर्भिक संरचना का अनुसरण नहीं करता है। ये नदियाँ भू-भाग के “नियमों को तोड़ती” हैं और अपनी घाटियों को कठोर चट्टानों या उभरते हुए पहाड़ों को काटकर बनाती हैं, ताकि वे अपना पुराना मार्ग बनाए रख सकें।
“Inconsequent” का अर्थ ही है “परिणामस्वरूप न होना”, यानी इन नदियों का मार्ग उस भू-भाग का परिणाम नहीं है जिस पर वे बह रही हैं, बल्कि वे उस भू-भाग से भी पुरानी या उससे स्वतंत्र हो सकती हैं।
अ-क्रमागत अपवाह तंत्र के प्रकार (Types of Insequential Drainage)
इस तंत्र के दो मुख्य और बहुत ही महत्वपूर्ण प्रकार हैं:
1. पूर्ववर्ती अपवाह या नदी (Antecedent Drainage or River)
- परिभाषा:
“Antecedent” का अर्थ है “पहले से विद्यमान” (pre-existing)। पूर्ववर्ती नदी वह नदी होती है जो किसी भू-भाग (जैसे पर्वत श्रृंखला) के उत्थान (Upliftment) से पहले से ही वहाँ बह रही होती है, और उस भू-भाग के धीरे-धीरे ऊपर उठने के बावजूद, वह अपनी घाटी को नीचे की ओर काटकर (downcutting) अपना पुराना मार्ग बनाए रखती है। - विकास की प्रक्रिया:
- एक नदी एक समतल या कम ऊँचे भू-भाग पर बह रही होती है।
- विवर्तनिक हलचलों (Tectonic movements) के कारण, उस नदी के मार्ग में भूमि धीरे-धीरे ऊपर उठना शुरू हो जाती है (जैसे हिमालय का उत्थान)।
- यदि नदी के अपरदन (erosion) की दर भूमि के उत्थान की दर से अधिक या उसके बराबर होती है, तो नदी उठते हुए भू-भाग को लगातार काटती रहती है और अपनी घाटी को गहरा करती जाती है।
- अंततः, एक विशाल पर्वत श्रृंखला खड़ी हो जाती है, लेकिन नदी उसे सीधे काटकर बहती है, जैसे कि वह पर्वत वहाँ है ही नहीं।
- प्रमुख भू-आकृति:
पूर्ववर्ती नदियाँ अपने मार्ग में आने वाली पर्वत श्रृंखलाओं को काटकर अत्यंत गहरे और संकरे महाखड्ड या गॉर्ज (Gorge) या I-आकार की घाटी का निर्माण करती हैं। - उदाहरण (बहुत महत्वपूर्ण):
- हिमालय की नदियाँ: सिंधु, सतलज, और ब्रह्मपुत्र पूर्ववर्ती नदियों के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। ये नदियाँ हिमालय के निर्माण से पहले तिब्बत के पठार से बहती थीं और जैसे-जैसे हिमालय ऊपर उठा, इन नदियों ने उसे काटकर गहरे गॉर्ज (जैसे सिंधु गॉर्ज, शिपकी ला गॉर्ज) बनाए और अपना रास्ता बनाए रखा।
- गंगा की कुछ सहायक नदियाँ: गंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, और तीस्ता भी पूर्ववर्ती नदियाँ हैं जिन्होंने हिमालय की निचली श्रृंखलाओं को काटकर अपना मार्ग बनाया है।
2. अध्यारोपित अपवाह या नदी (Superimposed Drainage or River)
- परिभाषा:
“Superimposed” का अर्थ है “ऊपर से आरोपित” (imposed from above)। अध्यारोपित नदी वह नदी होती है जो पहले एक ऊपरी चट्टानी सतह पर अपना मार्ग विकसित करती है और अपनी घाटी को गहरा करते हुए, नीचे स्थित एक पूरी तरह से भिन्न और पुरानी चट्टानी संरचना पर पहुँच जाती है और उस पर भी अपना मार्ग बनाए रखती है, भले ही वह नई (निचली) संरचना के ढाल या प्रकृति के अनुकूल न हो। - विकास की प्रक्रिया:
- कल्पना कीजिए कि एक कठोर, पुरानी, मुड़ी हुई चट्टानी संरचना के ऊपर नरम, समतल, परतदार चट्टानों की एक मोटी परत जमा हो गई है।
- एक नदी इस ऊपरी नरम सतह पर अपना अपवाह तंत्र (जैसे द्रुमाकृतिक पैटर्न) विकसित करती है, जो इस सतह के ढाल के अनुकूल होता है।
- धीरे-धीरे नदी अपनी घाटी को गहरा करती है और ऊपरी नरम परत को पूरी तरह से काटकर नीचे की कठोर, पुरानी और असमान संरचना तक पहुँच जाती है।
- नदी अपने पुराने, स्थापित मार्ग को नहीं छोड़ती और नीचे की कठोर चट्टानों को भी उसी मार्ग पर काटना शुरू कर देती है। इस प्रकार, उसका अपवाह पैटर्न नीचे की भू-संरचना पर “अध्यारोपित” हो जाता है।
- प्रमुख भू-आकृति:
अध्यारोपित नदियाँ अक्सर उन स्थानों पर घाटियाँ बनाती हैं जहाँ कठोर चट्टानें होती हैं, जो कि सामान्य परिस्थितियों में नहीं होता। - उदाहरण:
- प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ: चंबल, सोन, दामोदर, सुवर्णरेखा और बनास नदियाँ अध्यारोपित अपवाह का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये नदियाँ पहले विंध्यन प्रणाली की परतदार चट्टानों पर विकसित हुईं और अब नीचे स्थित आर्कियन युग की कठोर ग्रेनाइट और नीस चट्टानों पर बह रही हैं, जिनकी संरचना बिल्कुल अलग है।
- गोदावरी और कृष्णा नदियाँ भी अपने कुछ हिस्सों में यह विशेषता दिखाती हैं।
निष्कर्ष
अ-क्रमागत अपवाह तंत्र हमें किसी क्षेत्र के लंबे और जटिल भूवैज्ञानिक इतिहास के बारे में बताता है।
- पूर्ववर्ती नदियाँ यह दर्शाती हैं कि नदी उस क्षेत्र के पर्वत या पठार से भी पुरानी है और वहाँ एक सक्रिय विवर्तनिक उत्थान हुआ है।
- अध्यारोपित नदियाँ यह दर्शाती हैं कि उस क्षेत्र का भू-इतिहास दो-चरणों वाला रहा है, जिसमें एक पुरानी, जटिल संरचना के ऊपर एक नई चट्टानी परत का जमाव और फिर उसका अपरदन हुआ है।
निष्कर्ष: अपवाह तंत्र किसी भी क्षेत्र के भूगोल, जल विज्ञान और पारिस्थितिकी का एक मौलिक तत्व है। यह न केवल पानी के प्रवाह को नियंत्रित करता है, बल्कि भूमि के आकार को बदलने (अपरदन और निक्षेपण द्वारा), मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने और मानव सभ्यताओं के विकास को प्रभावित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत के प्रमुख अपवाह तंत्र (Major Drainage Systems of India)
भारत की नदी प्रणालियों, यानी अपवाह तंत्रों को, उनकी उत्पत्ति और विशेषताओं के आधार पर मुख्य रूप से दो प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. हिमालयी अपवाह तंत्र (The Himalayan Drainage System)
2. प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (The Peninsular Drainage System)
1. हिमालयी अपवाह तंत्र (Himalayan Drainage System)
ये वे नदियाँ हैं जो हिमालय पर्वत श्रृंखला से निकलती हैं। ये नदियाँ बर्फ पिघलने और वर्षा दोनों से जल प्राप्त करती हैं, इसलिए ये बारहमासी या सदानीरा (Perennial) होती हैं, यानी इनमें साल भर पानी रहता है।
इस तंत्र को आगे तीन प्रमुख नदी तंत्रों में विभाजित किया गया है:
क) सिंधु नदी तंत्र (The Indus River System)
सिंधु नदी तंत्र दुनिया के सबसे बड़े नदी तंत्रों में से एक है। यह भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग और पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से को अपवाहित करता है। इसी नदी के नाम पर हमारे देश का नाम “इंडिया” पड़ा।
1. सिंधु नदी (Main Indus River)
- उद्गम (Origin): सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत में कैलाश पर्वत श्रेणी के उत्तरी ढलानों पर स्थित बोखर चू (Bokhar Chu) हिमनद के पास से होता है।
- अन्य नाम: तिब्बत में इसे ‘सिंगी खंबन’ (Singi Khamban) अर्थात् ‘शेर का मुख’ (Lion’s Mouth) कहा जाता है।
- प्रवाह मार्ग:
- तिब्बत से निकलकर, यह उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हुई भारत के लद्दाख क्षेत्र में दमचौक (Damchok) के पास प्रवेश करती है।
- लद्दाख में यह लद्दाख और जास्कर श्रेणियों के बीच एक espectacular गॉर्ज (Gorge) का निर्माण करते हुए बहती है। लेह शहर इसी नदी के किनारे स्थित है।
- यह लद्दाख क्षेत्र को पार कर, बाल्टिस्तान (गिलगित-बाल्टिस्तान) क्षेत्र में नंगा पर्वत के पास एक बहुत गहरा महाखड्ड (Grand Canyon जैसा) बनाती है और दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है।
- गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र के बाद, यह पाकिस्तान में दर्दिस्तान क्षेत्र के पास चिल्लस (Chillas) से प्रवेश करती है।
- लंबाई: इसकी कुल लंबाई लगभग 2,880 किलोमीटर है, जिसमें से भारत में इसकी लंबाई लगभग 1,114 किलोमीटर है।
- समुद्र में मिलन: अंततः यह दक्षिण की ओर बहती हुई पाकिस्तान के कराची शहर के पूर्व में अरब सागर (Arabian Sea) में मिल जाती है।
सिंधु नदी तंत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ
पूर्वी सहायक नदियाँ (पंजाब की पाँच नदियाँ – ‘पंजनद’)
(उत्तर से दक्षिण के क्रम में)
- झेलम (Jhelum)
- चिनाब (Chenab)
- रावी (Ravi)
- ब्यास (Beas)
- सतलज (Sutlej)
पश्चिमी और उत्तरी सहायक नदियाँ (मुख्यतः हिमालयी)
(ये नदियाँ सीधे सिंधु नदी में मिलती हैं)
6. श्योक (Shyok)
7. नुब्रा (Nubra)
8. जास्कर (Zaskar)
9. गिलगित (Gilgit)
10. काबुल (Kabul) – (अफगानिस्तान से आती है)
11. गोमल (Gomal) और कुर्रम (Kurram) – (पाकिस्तान में मिलती हैं)
प्रमुख सहायक नदियों का विस्तृत विवरण
1. झेलम नदी (Jhelum River)
- प्राचीन वैदिक नाम: वितस्ता (Vitasta)
- कश्मीरी नाम: व्यथ (Vyath)
- यूनानी नाम: हाइडस्पेश (Hydaspes) (इसी नदी के किनारे सिकंदर और पोरस के बीच प्रसिद्ध ‘हाइडस्पेश का युद्ध’ हुआ था)
उद्गम (Origin):
झेलम नदी का उद्गम कश्मीर घाटी के दक्षिण-पूर्वी भाग में, पीर पंजाल श्रेणी की तलहटी (foot hills) में स्थित वेरीनाग झरने (Verinag Spring) से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- कश्मीर घाटी में प्रवाह:
- उद्गम के बाद, यह उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हुई प्रसिद्ध श्रीनगर शहर से होकर गुजरती है।
- इसके बाद यह भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील, वुलर झील (Wular Lake) में प्रवेश करती है और फिर उससे आगे निकलती है।
- कश्मीर घाटी में इसका ढाल बहुत मंद है, जिसके कारण यह नदी विसर्प (Meanders) बनाती हुई एक युवावस्था में वृद्धावस्था जैसी विशेषताएँ प्रदर्शित करती है।
- गहरे गॉर्ज का निर्माण:
- बारामूला के पास, यह एक संकरी और गहरी घाटी या महाखड्ड (Gorge) का निर्माण करती है, जहाँ यह पीर पंजाल श्रेणी को काटती है। यहाँ इसका प्रवाह बहुत तीव्र हो जाता है।
- भारत-पाकिस्तान सीमा:
- गॉर्ज से निकलने के बाद, यह मुजफ्फराबाद (PoK) से मीरपुर (PoK) तक लगभग 170 किलोमीटर तक भारत और पाकिस्तान के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है।
- चिनाब में संगम:
- अंत में, यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में झंग (Jhang) नामक स्थान के पास चिनाब नदी में मिल जाती है।
- कुल लंबाई: लगभग 725 किलोमीटर।
- प्रमुख सहायक नदी: किशनगंगा (Kishanganga), जिसे पाकिस्तान में नीलम (Neelum) नदी कहा जाता है।
2. चिनाब नदी (Chenab River)
- प्राचीन वैदिक नाम: असिक्नी (Askini)
- स्थानीय नाम: चंद्रभागा (Chandrabhaga)
उद्गम (Origin):
चिनाब नदी का निर्माण दो प्रमुख धाराओं – चंद्रा (Chandra) और भागा (Bhaga) – के संगम से होता है।
- ये दोनों धाराएँ हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में, बारालाचा ला दर्रे (Bara-lacha La Pass) के विपरीत ढलानों से निकलती हैं।
- इनका संगम तांडी (Tandi) नामक स्थान पर होता है, जहाँ से यह ‘चिनाब’ या ‘चंद्रभागा’ कहलाती है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी:
- यह जल की मात्रा और प्रवाह (Volume and flow) की दृष्टि से सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
- हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में प्रवाह:
- हिमाचल में यह पांगी घाटी से होकर बहती है।
- यह जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में किश्तवाड़ के पास प्रवेश करती है, जहाँ यह एक गहरा गॉर्ज बनाती है।
- रियासी के पास यह पीर पंजाल श्रेणी को काटती है।
- पाकिस्तान में प्रवेश:
- अखनूर के पास यह मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है और फिर पाकिस्तान में चली जाती है।
- पाकिस्तान में, यह झेलम और रावी नदियों के जल को अपने में समाहित करती है और फिर सतलज नदी में मिल जाती है।
- कुल लंबाई: लगभग 960 किलोमीटर।
- प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएँ: दुल हस्ती, बगलिहार और सलाल जलविद्युत परियोजनाएँ इसी नदी पर स्थित हैं।
3. रावी नदी (Ravi River)
- प्राचीन वैदिक नाम: परुष्णी (Parushni)
- यूनानी नाम: हाइड्रोटस (Hydraotes)
उद्गम (Origin):
रावी नदी का उद्गम हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में, रोहतांग दर्रे (Rohtang Pass) के पश्चिमी ढलानों से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- चम्बा घाटी में प्रवाह:
- यह उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हुई पीर पंजाल और धौलाधार श्रेणियों के बीच स्थित प्रसिद्ध चम्बा घाटी (Chamba Valley) का निर्माण करती है।
- गॉर्ज का निर्माण:
- धौलाधार श्रेणी में यह एक गहरा गॉर्ज बनाती है और फिर दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है।
- पंजाब के मैदान में प्रवेश:
- माधोपुर के पास यह पंजाब के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
- चिनाब में संगम:
- भारत-पाकिस्तान सीमा के साथ कुछ दूरी तक बहने के बाद, यह पाकिस्तान में प्रवेश करती है और सराय सिद्धू (Sarai Sidhu) के पास चिनाब नदी में मिल जाती है।
- कुल लंबाई: लगभग 720 किलोमीटर।
- प्रमुख परियोजनाएँ: रणजीत सागर बांध (थीन बांध) इसी नदी पर स्थित है।
1. ब्यास नदी (Beas River)
- प्राचीन वैदिक नाम: विपाशा (Vipasha)
- यूनानी नाम: हाइफेसिस (Hyphasis)
उद्गम (Origin):
ब्यास नदी का उद्गम हिमाचल प्रदेश में पीर पंजाल श्रेणी पर स्थित रोहतांग दर्रे (Rohtang Pass) के दक्षिणी किनारे पर स्थित ब्यास कुंड (Beas Kund) से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- पूरी तरह से भारत में:
- यह सिंधु नदी तंत्र की पाँच प्रमुख सहायक नदियों में से एकमात्र ऐसी नदी है जो पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र में बहती है और पाकिस्तान में प्रवेश नहीं करती।
- कुल्लू घाटी और गॉर्ज:
- अपने उद्गम के बाद, यह कुल्लू घाटी (Kullu Valley) से होकर बहती है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।
- यह धौलाधार श्रेणी को काटती हुई काटी और लार्गी नामक स्थानों पर गहरे और शानदार महाखड्ड (Gorges) का निर्माण करती है।
- पंजाब के मैदान में प्रवेश:
- पहाड़ों से उतरकर यह पंजाब के होशियारपुर जिले में मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
- सतलज में संगम:
- दक्षिण की ओर बहती हुई यह पंजाब के कपूरथला जिले में हरिके (Harike) नामक स्थान पर सतलज नदी में मिल जाती है।
- हरिके बैराज: इसी संगम स्थल पर हरिके बैराज का निर्माण किया गया है, जहाँ से भारत की सबसे लंबी नहर, इंदिरा गांधी नहर, निकलती है जो राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों तक पानी पहुँचाती है।
- कुल लंबाई: लगभग 470 किलोमीटर।
- प्रमुख परियोजना: पोंग बांध (महाराणा प्रताप सागर) इसी नदी पर बनाया गया है।
2. सतलज नदी (Sutlej River)
- प्राचीन वैदिक नाम: शतद्रु (Shatadru)
- तिब्बती नाम: लांगचेन खंबाब (Langchen Khambab)
उद्गम (Origin):
सतलज नदी का उद्गम तिब्बत में, कैलाश पर्वत के दक्षिणी ढलानों पर, मानसरोवर झील के पास स्थित राकस ताल (Rakshas Tal) या राक्षस झील से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- पूर्ववर्ती नदी (Antecedent River):
- सिंधु और ब्रह्मपुत्र की तरह ही, सतलज भी एक पूर्ववर्ती नदी है, जिसका अर्थ है कि यह हिमालय के उत्थान से भी पुरानी है। इसने हिमालय के उठने के साथ-साथ उसे काटकर अपना मार्ग बनाए रखा।
- भारत में प्रवेश:
- यह तिब्बत में सिंधु के समानांतर लगभग 400 किमी तक बहती है और फिर हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला दर्रे (Shipki La Pass) के पास से भारत में प्रवेश करती है। यह हिमालय को काटकर एक बहुत गहरा गॉर्ज बनाती है।
- भाखड़ा-नांगल बांध:
- विश्व प्रसिद्ध और भारत के सबसे महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय बांधों में से एक, भाखड़ा-नांगल बांध, इसी नदी पर बनाया गया है। इससे बनने वाले जलाशय को गोबिंद सागर झील कहते हैं।
- ‘पंजनद’ का संगम:
- पंजाब के मैदानों में बहने के बाद, यह पाकिस्तान में प्रवेश करती है और चिनाब नदी (जिसमें पहले से झेलम और रावी मिल चुकी होती हैं) के संयुक्त जल को अपने में समाहित कर लेती है।
- सिंधु में संगम:
- अंततः यह संयुक्त धारा (जिसे पंजनद कहते हैं), पाकिस्तान के मिठानकोट (Mithankot) के पास सिंधु नदी में मिल जाती है।
- कुल लंबाई: लगभग 1,450 किलोमीटर (भारत में लगभग 1,050 किलोमीटर)।
3. श्योक नदी (Shyok River)
- उपनाम:“मृत्यु की नदी” (River of Death)
- यह नाम संभवतः प्राचीन व्यापारियों द्वारा मध्य एशिया के यारकंद से लद्दाख आने के लिए उपयोग किए जाने वाले कठिन मार्ग के कारण पड़ा, जिसमें इस नदी को कई बार पार करना पड़ता था।
उद्गम (Origin):
श्योक नदी का उद्गम काराकोरम श्रेणी के रिमो ग्लेशियर (Rimo Glacier) से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- उत्तरी सहायक नदी: यह सिंधु नदी की एक प्रमुख उत्तरी (दाहिने हाथ की) सहायक नदी है।
- काराकोरम के समानांतर: उद्गम के बाद, यह पहले दक्षिण-पूर्व दिशा में बहती है और फिर एक हेयरपिन जैसा तीव्र मोड़ लेकर उत्तर-पश्चिम दिशा में काराकोरम श्रेणी के समानांतर बहने लगती है।
- सिंधु में संगम: यह लद्दाख में स्र्दू (Skardu) के पास सिंधु नदी में मिल जाती है।
- नुब्रा का संगम: प्रसिद्ध नुब्रा नदी इसी में आकर मिलती है।
4. नुब्रा नदी (Nubra River)
उद्गम (Origin):
नुब्रा नदी का उद्गम काराकोरम श्रेणी में स्थित विश्व के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्र, सियाचिन ग्लेशियर (Siachen Glacier), से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- नुब्रा घाटी का निर्माण:
- यह नदी दक्षिण-पूर्व दिशा में बहती हुई प्रसिद्ध नुब्रा घाटी (Nubra Valley) का निर्माण करती है, जो लद्दाख के सबसे खूबसूरत और लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। इसे “लद्दाख का बगीचा” (Orchard of Ladakh) भी कहा जाता है।
- श्योक में संगम:
- यह नुब्रा घाटी के अंत में श्योक नदी में मिल जाती है।
- पर्यटन: यह घाटी अपने दो-कूबड़ वाले बैक्टीरियन ऊँटों (Bactrian Camels) और दिस्कित मठ (Diskit Monastery) के लिए प्रसिद्ध है।
8. जास्कर नदी (Zaskar River)
उद्गम (Origin):
जास्कर नदी का निर्माण दो प्रमुख धाराओं के संगम से होता है:
- डोडा नदी (Doda River): इसका उद्गम जम्मू और कश्मीर के पेन्सी ला दर्रे (Pensi La pass) के पास से होता है।
- कर्ग्याग नदी (Kargyag River): इसका उद्गम हिमाचल प्रदेश के शिन्गो ला दर्रे (Shingo La pass) के पास से होता है।
इन दोनों नदियों का संगम पादुम (Padum) के पास होता है, जो जास्कर घाटी का प्रशासनिक केंद्र है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- जास्कर घाटी से प्रवाह: यह नदी उत्तर-पूर्व दिशा में लद्दाख की खूबसूरत और दुर्गम जास्कर घाटी से होकर बहती है।
- सिंधु में संगम: यह निम्मू (Nimmu) नामक स्थान पर, जो लेह के पास है, सिंधु नदी में मिल जाती है। यह सिंधु की एक प्रमुख दक्षिणी (बाएँ हाथ की) सहायक नदी है।
- ‘चादर ट्रैक’ (Chadar Trek):
- जास्कर नदी की सबसे बड़ी प्रसिद्धि “चादर ट्रैक” के लिए है।
- सर्दियों के चरम पर (जनवरी-फरवरी में), जब भारी बर्फबारी के कारण जास्कर घाटी के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, तब यह नदी पूरी तरह से जम जाती है।
- स्थानीय लोग और साहसिक पर्यटक इस जमी हुई नदी की बर्फ की मोटी चादर पर चलकर यात्रा करते हैं, जिसे ‘चादर ट्रैक’ कहा जाता है। यह दुनिया के सबसे अनोखे और चुनौतीपूर्ण ट्रैक्स में से एक है।
9. गिलगित नदी (Gilgit River)
उद्गम (Origin):
गिलगित नदी का उद्गम गिलगित-बाल्टिस्तान (पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर) क्षेत्र की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित झीलों से होता है। इसकी प्रमुख सहायक नदी हुंजा नदी है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- प्रमुख उत्तरी सहायक नदी: यह सिंधु नदी की एक महत्वपूर्ण उत्तरी (दाहिने हाथ की) सहायक नदी है।
- गिलगित-बाल्टिस्तान में प्रवाह: यह नदी गिलगित शहर से होकर बहती है, जो इस क्षेत्र का सबसे बड़ा शहरी केंद्र है।
- सिंधु में संगम: यह बुन्जी (Bunji) नामक स्थान के पास, जहाँ तीन महान पर्वत श्रृंखलाएँ – हिमालय, काराकोरम और हिंदू कुश – मिलती हैं, सिंधु नदी में मिल जाती है।
- सामरिक महत्व: यह क्षेत्र अपनी सामरिक स्थिति के कारण बहुत महत्वपूर्ण है।
10. काबुल नदी (Kabul River)
- प्राचीन नाम: कुभा (Kubha)
उद्गम (Origin):
काबुल नदी का उद्गम अफगानिस्तान में हिंदू कुश पर्वत श्रृंखला की संगलाख श्रेणी (Sanglakh Range) से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- प्रमुख पश्चिमी सहायक नदी: यह सिंधु नदी की एक प्रमुख पश्चिमी (दाहिने हाथ की) सहायक नदी है।
- अफगानिस्तान की जीवनरेखा: यह पूर्वी अफगानिस्तान की मुख्य नदी है और काबुल (अफगानिस्तान की राजधानी) तथा जलालाबाद जैसे प्रमुख शहरों से होकर बहती है।
- पाकिस्तान में प्रवेश: यह खैबर दर्रे (Khyber Pass) के पास से पाकिस्तान में प्रवेश करती है।
- सिंधु में संगम: यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में अटक (Attock) शहर के पास सिंधु नदी में मिल जाती है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ: इसकी प्रमुख सहायक नदियों में पंजशीर, कुनार, स्वात और बाड़ा शामिल हैं।
11. कुर्रम और गोमल नदियाँ (Kurram and Gomal Rivers)
ये दोनों नदियाँ भी सिंधु की पश्चिमी (दाहिने हाथ की) सहायक नदियाँ हैं, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों से निकलती हैं।
क) कुर्रम नदी (Kurram River)
- उद्गम: इसका उद्गम अफगानिस्तान की सफेद कोह पर्वत श्रृंखला (Safed Koh mountain range) से होता है।
- प्रवाह मार्ग: यह पाकिस्तान में प्रवेश करती है और सिंधु के मैदानों से होकर बहती हुई सिंधु नदी में मिल जाती है। ऐतिहासिक कुर्रम दर्रा इसी घाटी में स्थित है।
ख) गोमल नदी (Gomal River)
- उद्गम: इसका उद्गम भी अफगानिस्तान में ही होता है।
- प्रवाह मार्ग: यह पाकिस्तान में डेरा इस्माइल खान (Dera Ismail Khan) के पास से गुजरती हुई सिंधु नदी में मिलती है।
- महत्व: इस नदी की घाटी, गोमल दर्रे (Gomal Pass) का निर्माण करती है, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग रहा है।
निष्कर्ष: ये पश्चिमी सहायक नदियाँ सिंधु नदी तंत्र के अपवाह क्षेत्र को मध्य एशिया की पर्वत श्रृंखलाओं तक विस्तारित करती हैं और ऐतिहासिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण मार्ग प्रदान करती रही हैं।
ख) गंगा नदी तंत्र (The Ganga River System)
गंगा नदी तंत्र भारत का सबसे बड़ा, सबसे महत्वपूर्ण और सबसे पवित्र नदी तंत्र है। यह न केवल देश के सबसे बड़े अपवाह बेसिन (Drainage Basin) का निर्माण करता है, बल्कि भारत की लगभग 40% आबादी को सहारा देता है, जिससे यह भारत की सांस्कृतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक जीवनरेखा बन जाता है।
1. गंगा नदी (Main Ganga River)
- उद्गम (Origin): गंगा नदी का उद्गम उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में, गौमुख के पास गंगोत्री हिमनद (Gangotri Glacier) से होता है।
- अपने उद्गम स्थल पर, इसे भागीरथी (Bhagirathi) के नाम से जाना जाता है।
- ‘गंगा’ का निर्माण:देवप्रयाग नामक स्थान पर, भागीरथी नदी एक और प्रमुख हिमालयी नदी अलकनंदा (Alaknanda) से मिलती है। इसी संगम के बाद संयुक्त धारा को ‘गंगा’ (Ganga) के नाम से जाना जाता है।
- पंच प्रयाग (Panch Prayag): अलकनंदा नदी अपने मार्ग में पाँच पवित्र संगम बनाती है, जिनमें देवप्रयाग अंतिम है। अन्य चार हैं:
- विष्णुप्रयाग: अलकनंदा + धौलीगंगा
- नंदप्रयाग: अलकनंदा + नंदाकिनी
- कर्णप्रयाग: अलकनंदा + पिंडर
- रुद्रप्रयाग: अलकनंदा + मंदाकिनी (जो केदारनाथ से आती है)
- पंच प्रयाग (Panch Prayag): अलकनंदा नदी अपने मार्ग में पाँच पवित्र संगम बनाती है, जिनमें देवप्रयाग अंतिम है। अन्य चार हैं:
- प्रवाह मार्ग:
- पहाड़ों में: उत्तराखंड में पहाड़ों से बहने के बाद, गंगा हरिद्वार में मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
- मैदानी भाग में: यहाँ से यह दक्षिण और फिर दक्षिण-पूर्व दिशा में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल राज्यों से होकर बहती है।
- दो भागों में विभाजन: पश्चिम बंगाल के फरक्का (Farakka) नामक स्थान पर, गंगा दो वितरिकाओं (Distributaries) में बँट जाती है:
- हुगली (Hooghly): यह दक्षिणी शाखा है जो कोलकाता से होकर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- पद्मा (Padma): यह मुख्य धारा है जो बांग्लादेश में प्रवेश करती है और वहाँ ‘पद्मा’ कहलाती है।
- लंबाई: इसकी कुल लंबाई लगभग 2,525 किलोमीटर है, जो इसे भारत में बहने वाली सबसे लंबी नदी बनाती है।
- समुद्र में मिलन: बांग्लादेश में, पद्मा (गंगा) जमुना (ब्रह्मपुत्र) से मिलती है, और फिर यह संयुक्त धारा मेघना नदी से मिलकर ‘मेघना’ के नाम से बंगाल की खाड़ी में गिरती है। यहाँ यह ब्रह्मपुत्र के साथ मिलकर विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा, सुंदरबन डेल्टा (Sundarban Delta), बनाती है।
2. गंगा की प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries of Ganga)
गंगा की सहायक नदियों को दो भागों में बांटा जा सकता है:
(पश्चिम से पूर्व के क्रम में)
1. रामगंगा नदी (Ramganga River)
रामगंगा, गंगा की पहली प्रमुख सहायक नदी है जो हिमालय से निकलकर मैदानी इलाकों में गंगा से मिलती है। यह उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में बहने वाली एक महत्वपूर्ण नदी है।
उद्गम (Origin):
- रामगंगा नदी का उद्गम उत्तराखंड राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले में, दूधातोली श्रेणी (Dudhatoli Range) के दक्षिणी ढलानों से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- उत्तराखंड में प्रवाह:
- अपने उद्गम के बाद, यह दक्षिण-पश्चिम दिशा में शिवालिक श्रेणियों को पार करती है।
- यह कॉर्बेट नेशनल पार्क (Corbett National Park) के मध्य से होकर बहती है, जो इस राष्ट्रीय उद्यान की जीवनरेखा है। वन्यजीवों को देखने के लिए यह नदी एक प्रमुख स्थल है।
- उत्तराखंड के कालागढ़ नामक स्थान पर इस नदी पर एक बांध (रामगंगा बांध) बनाया गया है, जिसके जलाशय से सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन होता है।
- उत्तर प्रदेश में मैदानी प्रवेश:
- कालागढ़ के बाद यह उत्तराखंड के पहाड़ों को छोड़कर उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
- गंगा में संगम (Confluence with Ganga):
- मैदानी भाग में दक्षिण-पूर्व दिशा में बहते हुए यह बरेली, बदायूं, शाहजहाँपुर, और हरदोई जैसे जिलों से होकर गुजरती है।
- अंत में, यह उत्तर प्रदेश के कन्नौज शहर के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
आर्थिक और पर्यावरणीय महत्व:
- सिंचाई का स्रोत: यह उत्तर प्रदेश के ऊपरी-मध्य मैदानी क्षेत्र, जिसे रुहेलखंड कहा जाता है, के लिए सिंचाई का एक प्रमुख स्रोत है।
- प्रदूषण: मैदानी इलाकों में, विशेषकर बरेली और मुरादाबाद के पास, औद्योगिक और शहरी अपशिष्टों के कारण यह नदी अत्यधिक प्रदूषित हो गई है।
2. गोमती नदी (Gomti River)
गोमती, गंगा की एक अनूठी सहायक नदी है क्योंकि यह हिमालय की अन्य सहायक नदियों की तरह पहाड़ों से नहीं, बल्कि मैदानी क्षेत्र से ही निकलती है। यह उत्तर प्रदेश की एक प्रमुख और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण नदी है।
उद्गम (Origin):
- गोमती नदी का उद्गम उत्तर प्रदेश राज्य के पीलीभीत जिले में स्थित ‘गोमत ताल’ (Gomat Taal) से होता है, जिसे पहले ‘फुलहर झील’ (Fulhaar Jheel) के नाम से जाना जाता था। यह एक मैदानी झील है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- पूरी तरह से मैदानी नदी:
- यह गंगा की एकमात्र प्रमुख हिमालयी (बाएँ तट की) सहायक नदी है जो पूरी तरह से मैदानी क्षेत्र में बहती है।
- इसका प्रवाह मानसून की वर्षा पर बहुत अधिक निर्भर करता है, जिस कारण गर्मियों में इसका जल स्तर काफी कम हो जाता है।
- प्रमुख शहरों से प्रवाह:
- यह अपने मार्ग में उत्तर प्रदेश के कई महत्वपूर्ण शहरों से होकर बहती है, जिनमें लखनऊ (उत्तर प्रदेश की राजधानी), सुल्तानपुर और जौनपुर प्रमुख हैं। ये शहर पूरी तरह से इसी नदी के किनारे बसे हैं।
- सहायक नदी ‘सई’:
- सई नदी (Sai River) इसकी एक प्रमुख सहायक नदी है, जो जौनपुर के पास गोमती में मिलती है।
- गंगा में संगम (Confluence with Ganga):
- यह लगभग 960 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद, वाराणसी जिले के कैथी नामक स्थान पर (गाजीपुर-वाराणसी सीमा के पास) गंगा नदी में मिल जाती है।
आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व:
- सांस्कृतिक जीवनरेखा: लखनऊ और जौनपुर जैसे शहरों के लिए यह केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का एक अभिन्न अंग है।
- प्रदूषण की गंभीर समस्या:
- गोमती भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है।
- इसके पूरे मार्ग में, विशेषकर लखनऊ और जौनपुर के पास, इसमें बड़ी मात्रा में अशोधित औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू सीवेज डाला जाता है, जिससे इसका पानी अत्यंत जहरीला हो गया है।
- इसकी धीमी प्रवाह गति के कारण प्रदूषण और भी बढ़ जाता है। इसके पुनरुद्धार के लिए कई परियोजनाएँ चलाई जा रही हैं।
1. घाघरा नदी (Ghaghara River)
घाघरा नदी, गंगा की एक विशाल और शक्तिशाली हिमालयी सहायक नदी है। यह जल की मात्रा (Volume) की दृष्टि से गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह तिब्बत, नेपाल और भारत में बहती है।
- नेपाल में नाम: कर्णाली (Karnali)
- मैदानी भाग में नाम: घाघरा (Ghaghara)
- अयोध्या के पास नाम: सरयू (Saryu) (यह वास्तव में इसकी एक सहायक नदी का नाम है, लेकिन स्थानीय रूप से घाघरा को भी सरयू कहा जाता है)
उद्गम (Origin):
- घाघरा नदी का उद्गम तिब्बत के पठार पर, मानसरोवर झील के पास स्थित मापचाचुंगो हिमनद (Mapchachungo Glacier) से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- नेपाल में प्रवाह:
- उद्गम के बाद, यह दक्षिण की ओर बहती हुई नेपाल में प्रवेश करती है, जहाँ इसे ‘कर्णाली’ के नाम से जाना जाता है।
- नेपाल के पहाड़ों में यह एक गहरा गॉर्ज बनाती है।
- सहायक नदियों का संगम:
- भारत में प्रवेश करने से पहले, इसमें कई सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं। इसकी दो प्रमुख सहायक नदियाँ हैं:
- शारदा नदी (Sharda River): इसे काली (Kali) या महाकाली (Mahakali) नदी भी कहते हैं। यह नेपाल-उत्तराखंड सीमा बनाती हुई बहती है। यह घाघरा में भारत के मैदानी भाग में मिलती है।
- राप्ती नदी (Rapti River): यह गोरखपुर शहर से होकर बहने वाली एक प्रमुख नदी है जो घाघरा में मिलती है।
- भारत में प्रवेश करने से पहले, इसमें कई सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं। इसकी दो प्रमुख सहायक नदियाँ हैं:
- भारत में मैदानी प्रवेश:
- पहाड़ों से उतरकर यह भारत में उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है, जहाँ इसका नाम ‘घाघरा’ हो जाता है।
- अयोध्या और सरयू:
- पवित्र शहर अयोध्या इसी नदी के तट पर बसा हुआ है, जहाँ इसे श्रद्धापूर्वक सरयू नदी के नाम से जाना जाता है।
- गंगा में संगम (Confluence with Ganga):
- उत्तर प्रदेश और बिहार में बहने के बाद, यह बिहार के छपरा जिले के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
2. गंडक नदी (Gandak River)
गंडक, गंगा की एक और महत्वपूर्ण बाएँ तट की सहायक नदी है, जो नेपाल और भारत में बहती है। यह अपनी तीव्र धारा और मार्ग परिवर्तन के लिए जानी जाती है।
- नेपाल में नाम: ‘नारायणी’ (Narayani)
- मैदानी भाग में नाम: ‘गंडकी’ या ‘गंडक’
- अन्य नाम: इसे ‘शालीग्रामी’ (Shaligrami) भी कहा जाता है क्योंकि इसके तल में ‘शालीग्राम’ नामक पवित्र काले पत्थर पाए जाते हैं।
उद्गम (Origin):
- गंडक नदी का निर्माण दो मुख्य धाराओं – काली गंडक और त्रिशूलगंगा – के संगम से होता है।
- इसका मुख्य स्रोत नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित धौलागिरी और माउंट एवरेस्ट के बीच के वृहद् हिमालय क्षेत्र में है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- नेपाल में प्रवाह:
- यह नेपाल की एक प्रमुख नदी है। यह नेपाल के मध्य से होकर बहती है और पहाड़ों में गहरे गॉर्ज बनाती है।
- चितवन नेशनल पार्क (नेपाल) इसी नदी के किनारे स्थित है।
- भारत में प्रवेश:
- यह नेपाल-भारत सीमा पर स्थित त्रिवेणी (Triveni) नामक स्थान पर मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
- बिहार में प्रवाह:
- यह उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों के बीच सीमा बनाती हुई बहती है और फिर पूरी तरह से बिहार में प्रवेश करती है।
- यह उत्तर-पश्चिम बिहार के जिलों (जैसे पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण) से होकर बहती है।
- मार्ग परिवर्तन और बाढ़:
- कोसी नदी की तरह ही, गंडक भी मैदानी इलाकों में अपने मार्ग में भारी मात्रा में अवसाद जमा करती है, जिसके कारण यह अपना मार्ग बदलने और बाढ़ लाने के लिए जानी जाती है, जिससे बिहार के मैदानी इलाकों में काफी नुकसान होता है।
- गंगा में संगम (Confluence with Ganga):
- यह पटना के सामने, प्रसिद्ध सोनपुर (जहाँ एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है) के पास हाजीपुर में गंगा नदी से मिल जाती है।
1. कोसी नदी (Kosi River)
कोसी नदी गंगा की सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध बाएँ तट की सहायक नदियों में से एक है। यह अपनी विनाशकारी बाढ़ों और बार-बार मार्ग बदलने की प्रवृत्ति के कारण अत्यधिक कुख्यात है, जिसके कारण इसे “बिहार का शोक” (Sorrow of Bihar) कहा जाता है।
- प्राचीन नाम: कौशिकी (Kaushiki)
उद्गम (Origin):
- कोसी नदी एक नदी नहीं, बल्कि सात प्रमुख धाराओं (Saptakoshi) के संगम से बनी एक विशाल नदी प्रणाली है।
- इसका मुख्य स्रोत नेपाल और तिब्बत की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में है, जो माउंट एवरेस्ट के उत्तर से शुरू होता है।
- इसकी मुख्य धारा ‘अरुण’ (Arun) है, जो तिब्बत से निकलती है। नेपाल में, इसमें पूर्व से ‘तमोर’ (Tamor) और पश्चिम से ‘सोन कोसी’ (Sun Koshi) जैसी अन्य धाराएँ मिलती हैं, जिससे सप्तकोसी (Saptakoshi) का निर्माण होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- हिमालय में गॉर्ज:
- नेपाल के पहाड़ों में यह एक बहुत ही गहरी और संकरी घाटी (Gorge) का निर्माण करती है।
- भारी मात्रा में गाद (अवसाद):
- हिमालय की युवा और मुलायम चट्टानों से होकर गुजरने के कारण, यह अपने साथ भारी मात्रा में गाद (Silt) और अवसाद बहाकर लाती है। दुनिया की बड़ी नदियों में यह सबसे अधिक गाद लाने वाली नदियों में से एक है।
- भारत में प्रवेश और विशाल जलोढ़ पंखा:
- यह भीमनगर (नेपाल-बिहार सीमा) के पास भारत में प्रवेश करती है।
- पहाड़ों से मैदानी इलाकों में अचानक उतरने के कारण इसका वेग कम हो जाता है और यह लाए गए भारी अवसादों को एक विशाल जलोढ़ पंखे (Alluvial Fan) के रूप में जमा कर देती है।
- मार्ग परिवर्तन और विनाशकारी बाढ़:
- यही अवसादों का जमाव इसके मुख्य मार्ग को अवरुद्ध कर देता है, जिससे नदी को अपना रास्ता बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
- पिछले 200 वर्षों में, यह पश्चिम की ओर लगभग 120 किलोमीटर खिसक चुकी है।
- यह अप्रत्याशित मार्ग परिवर्तन और भारी जल प्रवाह ही बिहार के मैदानी इलाकों में हर साल भयानक बाढ़ का कारण बनता है।
- गंगा में संगम (Confluence with Ganga):
- यह दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती हुई बिहार के कुर्सेला (Kurse’a) के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
2. महानंदा नदी (Mahananda River)
महानंदा नदी गंगा नदी तंत्र की सबसे पूर्वी और अंतिम (last) महत्वपूर्ण सहायक नदी है जो हिमालय से निकलती है।
उद्गम (Origin):
- महानंदा नदी का उद्गम पश्चिम बंगाल राज्य के दार्जिलिंग जिले की पहाड़ियों में, महलधिराम हिल (Mahaldiram Hill) पर स्थित पगलाझोरा जलप्रपात (Paglajhora Falls) के पास से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- सबसे पूर्वी सहायक नदी:
- यह गंगा के बाएँ तट पर मिलने वाली अंतिम प्रमुख हिमालयी सहायक नदी है। इसके पूर्व में गंगा में कोई अन्य बड़ी हिमालयी सहायक नदी नहीं मिलती।
- पश्चिम बंगाल और बिहार में प्रवाह:
- यह दक्षिण दिशा में बहती हुई पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों (सिलीगुड़ी के पास) में प्रवेश करती है।
- यह बिहार के किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार जिलों तथा पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर और मालदा जिलों से होकर बहती है। यह कुछ दूरी तक बिहार और पश्चिम बंगाल के बीच सीमा भी बनाती है।
- दो देशों में संगम:
- यह एक अनूठी नदी है जो अपना जल दो अलग-अलग देशों में मुख्य नदी में विसर्जित करती है:
- इसकी एक शाखा बांग्लादेश में प्रवेश करती है और गोदागिरी नामक स्थान पर गंगा (पद्मा) नदी में मिल जाती है।
- इसकी दूसरी प्रमुख शाखा पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में गंगा में मिलती है, जो फरक्का बैराज से कुछ पहले है।
- यह एक अनूठी नदी है जो अपना जल दो अलग-अलग देशों में मुख्य नदी में विसर्जित करती है:
- सहायक नदियाँ: इसकी प्रमुख सहायक नदियों में बालान, मेची और कनकई शामिल हैं।
आर्थिक महत्व: यह नदी उत्तर बंगाल और पूर्वी बिहार के कृषि क्षेत्रों, विशेषकर चावल, जूट और चाय के बागानों के लिए सिंचाई का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
यमुना नदी (Yamuna River)
यमुना नदी, गंगा नदी तंत्र की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे लंबी सहायक नदी है। यह न केवल भारत के एक विशाल भूभाग को सिंचित करती है, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली सहित कई प्रमुख शहरों की जीवनरेखा है। सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से भी यह गंगा के समान ही पूजनीय मानी जाती है।
- प्राचीन नाम: कालिंदी (Kalindi)
- अन्य नाम: इसे ‘सूर्यपुत्री’ (सूर्य की बेटी) और ‘यम की बहन’ भी कहा जाता है।
उद्गम (Origin):
- यमुना नदी का उद्गम उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में, निम्न हिमालय की बंदरपूंछ श्रेणी (Bandarpunch Range) के पश्चिमी ढलानों पर स्थित यमुनोत्री हिमनद (Yamunotri Glacier) से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- पहाड़ी मार्ग:
- अपने उद्गम के बाद, यह लगभग 200 किलोमीटर तक हिमालय की घाटियों में बहती है।
- इसकी सबसे बड़ी पहाड़ी सहायक नदी टोंस (Tons) है, जो देहरादून के पास कालसी में इससे मिलती है। टोंस नदी में यमुना से भी अधिक जल होता है।
- मैदानी प्रवेश:
- यह उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच सीमा बनाती हुई डाकपत्थर में पहाड़ों से उतरती है और सहारनपुर जिले (उत्तर प्रदेश) के फैजाबाद के पास मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
- गंगा के समानांतर प्रवाह:
- मैदानी इलाकों में यह दक्षिण दिशा में, गंगा नदी के लगभग समानांतर बहती है। यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे उपजाऊ दोआब क्षेत्र – गंगा-यमुना दोआब – का निर्माण करती है।
- प्रमुख शहरों से प्रवाह:
- यह अपने मार्ग में भारत के कुछ सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और आधुनिक शहरों से होकर गुजरती है, जिनमें शामिल हैं:
- दिल्ली (भारत की राजधानी)
- आगरा (ताजमहल का शहर)
- मथुरा (भगवान कृष्ण की जन्मस्थली)
- इटावा
- यह अपने मार्ग में भारत के कुछ सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और आधुनिक शहरों से होकर गुजरती है, जिनमें शामिल हैं:
- गंगा में संगम (Confluence with Ganga):
- यह उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) शहर में गंगा नदी से मिल जाती है।
- यह संगम स्थल हिंदुओं का एक अत्यंत पवित्र तीर्थ है, जिसे ‘त्रिवेणी संगम’ (Triveni Sangam) कहा जाता है (जहाँ पौराणिक सरस्वती नदी के भी मिलने की मान्यता है)।
- कुल लंबाई: लगभग 1,376 किलोमीटर।
यमुना की प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries of Yamuna)
यमुना की अधिकांश प्रमुख सहायक नदियाँ प्रायद्वीपीय पठार (मालवा पठार) से निकलती हैं और दाहिने तट (Right-Bank) पर इसमें मिलती हैं। ये नदियाँ उत्तर-पूर्व दिशा में बहती हैं, जो प्रायद्वीपीय पठार के ढाल को दर्शाती हैं।
(मुख्य सहायक नदियों का क्रम पश्चिम से पूर्व है)
1. चंबल नदी (Chambal River)
चंबल नदी, यमुना नदी की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण सहायक नदी है, और गंगा नदी तंत्र का एक अभिन्न अंग है। यह अपनी गहरी घाटियों (बीहड़ों), स्वच्छ पानी, समृद्ध जलीय जीवन और महत्वपूर्ण बांधों के लिए प्रसिद्ध है।
- प्राचीन नाम: चर्मण्वती (Charmanvati), जिसका उल्लेख महाभारत में मिलता है।
उद्गम (Origin):
- चंबल नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के मालवा पठार पर, इंदौर शहर के पास स्थित महू (Mhow) के निकट विंध्य श्रेणी की जानापाव की पहाड़ियों (Janapav Hills) से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- प्रवाह की दिशा: अपने उद्गम से, यह उत्तर दिशा में बहती है, फिर उत्तर-पूर्व और अंत में दक्षिण-पूर्व दिशा में मुड़कर यमुना में मिल जाती है।
- राज्य: यह नदी तीन प्रमुख राज्यों – मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश – से होकर बहती है। यह मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीच, और फिर राजस्थान और उत्तर प्रदेश के बीच एक लंबी प्राकृतिक सीमा बनाती है।
- बीहड़ों का निर्माण (Formation of Ravines/Badlands):
- यह चंबल नदी की सबसे कुख्यात और विशिष्ट विशेषता है।
- जब नदी पठारी क्षेत्र से मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है, तो यह अपने किनारों पर जलोढ़ मिट्टी का अत्यधिक और तीव्र कटाव (gully erosion) करती है।
- इस प्रक्रिया ने सैकड़ों वर्षों में एक अत्यंत ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम स्थलाकृति का निर्माण किया है, जिसे चंबल का बीहड़ (Chambal Ravines) कहते हैं। यह क्षेत्र धौलपुर (राजस्थान) से लेकर इटावा (उत्तर प्रदेश) तक फैला है और ऐतिहासिक रूप से डाकुओं की शरणस्थली के रूप में जाना जाता रहा है।
- भारत की सबसे स्वच्छ नदियों में से एक:
- चंबल नदी के बेसिन में बड़े औद्योगिक शहरों का अभाव है और इसमें प्रदूषण का स्तर बहुत कम है।
- इसकी तेज धारा भी प्रदूषण को जमा नहीं होने देती, जिसके कारण इसे भारत की सबसे स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त नदियों में से एक माना जाता है।
- समृद्ध जलीय जीवन (Rich Aquatic Life):
- अपने स्वच्छ पानी के कारण, चंबल नदी कई लुप्तप्राय जलीय जीवों के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास है।
- राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (National Chambal Sanctuary) की स्थापना इन जीवों के संरक्षण के लिए की गई है। यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख जीव हैं:
- घड़ियाल (Gharial): यह घड़ियालों की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का घर है।
- गंगा डॉल्फिन (Gangetic Dolphin): भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव।
- लाल सिर वाला कछुआ (Red-crowned roof turtle)
- मगरमच्छ (Mugger crocodile)
प्रमुख बांध और जलविद्युत परियोजनाएँ (Major Dams and Hydroelectric Projects):
चंबल नदी पर सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए “चंबल घाटी परियोजना” के तहत एक श्रृंखला में तीन महत्वपूर्ण बांध बनाए गए हैं (दक्षिण से उत्तर के क्रम में):
- गांधी सागर बांध (Gandhi Sagar Dam):
- स्थान: मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में।
- यह इस श्रृंखला का पहला और सबसे बड़ा बांध है।
- राणा प्रताप सागर बांध (Rana Pratap Sagar Dam):
- स्थान: राजस्थान के रावतभाटा (चित्तौड़गढ़ जिले) में।
- यह गांधी सागर बांध के नीचे स्थित है।
- जवाहर सागर बांध (Jawahar Sagar Dam):
- स्थान: राजस्थान के कोटा जिले में।
- यह एक पिक-अप बांध के रूप में कार्य करता है।
- कोटा बैराज (Kota Barrage):
- स्थान: राजस्थान के कोटा शहर में।
- यह सिंचाई के लिए बनाया गया है और इससे राजस्थान तथा मध्य प्रदेश के लिए नहरें निकलती हैं।
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
- इसकी प्रमुख सहायक नदियों में बनास, कालीसिंध, पार्वती और शिप्रा (जिसके तट पर उज्जैन शहर स्थित है) शामिल हैं। बनास इसकी मुख्य बाएँ तट की सहायक नदी है जो अरावली से निकलती है।
यमुना में संगम (Confluence with Yamuna):
- यह लगभग 960 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में मुरादगंज के पास यमुना नदी में मिल जाती है।
2. सिंध नदी (Sindh River)
(यह सिंधु (Indus) नदी से पूरी तरह अलग है।)
उद्गम (Origin):
- सिंध नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में, मालवा के पठार से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- प्रवाह की दिशा: यह उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा में बहती है।
- राज्य: यह नदी मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्यों से होकर गुजरती है।
- चंबल और बेतवा के बीच: इसका प्रवाह मार्ग चंबल नदी (पश्चिम में) और बेतवा नदी (पूर्व में) के बीच स्थित है।
- सहायक नदियाँ: इसकी प्रमुख सहायक नदियों में पहुज, कुँवारी और माहुर शामिल हैं।
- परियोजना: मणिखेड़ा बांध (Manikheda Dam) मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में इसी नदी पर बनाया गया है।
यमुना में संगम (Confluence with Yamuna):
- यह लगभग 470 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद, उत्तर प्रदेश के जालौन जिले और इटावा जिले की सीमा पर (चंबल नदी के संगम के बाद) यमुना नदी में मिल जाती है।
3. बेतवा नदी (Betwa River)
- प्राचीन नाम: वेत्रवती (Vetravati), जिसका उल्लेख महाभारत में है।
उद्गम (Origin):
- बेतवा नदी का उद्गम मध्य प्रदेश में, भोपाल के दक्षिण-पश्चिम में, विंध्य पर्वत श्रृंखला की कुमरागाँव नामक पहाड़ी से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- प्रवाह की दिशा: यह अपने स्रोत से उत्तर-पूर्व दिशा में बहती है।
- राज्य: यह नदी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्यों से होकर गुजरती है।
- प्रसिद्ध शहर: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर ओरछा, साँची और विदिशा इसी नदी के किनारे बसे हैं।
- प्रमुख बांध: इस नदी पर कई महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय परियोजनाएँ हैं:
- राजघाट बांध (Rajghat Dam): यह उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की एक अंतर-राज्यीय परियोजना है, जो ललितपुर जिले के पास है।
- माताटीला बांध (Matatila Dam): यह भी ललितपुर जिले में स्थित है और सिंचाई तथा जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।
- पारिछा बांध (Parichha Dam): झाँसी के पास स्थित है।
- केन-बेतवा लिंक परियोजना:
- यह भारत की पहली नदी-जोड़ो परियोजना (River Interlinking Project) है, जिसका उद्देश्य केन नदी के अतिरिक्त जल को नहर के माध्यम से बेतवा नदी में स्थानांतरित करना है, ताकि बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा प्रदान की जा सके।
यमुना में संगम (Confluence with Yamuna):
- यह लगभग 590 किलोमीटर बहने के बाद उत्तर प्रदेश के हमीरपुर शहर के पास यमुना नदी में मिल जाती है।
4. केन नदी (Ken River)
- प्राचीन नाम: कर्णवती (Karnavati)
उद्गम (Origin):
- केन नदी का उद्गम मध्य प्रदेश में, कटनी जिले के पास कैमूर पहाड़ियों (विंध्य श्रेणी का पूर्वी विस्तार) से होता है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- बुंदेलखंड क्षेत्र में प्रवाह:
- यह बुंदेलखंड क्षेत्र से होकर बहने वाली एक प्रमुख नदी है और इस क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती है।
- पन्ना राष्ट्रीय उद्यान:
- यह नदी पन्ना राष्ट्रीय उद्यान (Panna National Park) के मध्य से होकर गुजरती है, जो इस पार्क की जैव-विविधता का एक प्रमुख आधार है।
- खूबसूरत गॉर्ज और झरने:
- यह नदी अपने मार्ग में कई खूबसूरत महाखड्ड (Gorges) और जलप्रपातों (Waterfalls) का निर्माण करती है। रनेह जलप्रपात (Raneh Falls), जो बहुरंगी ग्रेनाइट की चट्टानों से बना एक शानदार कैनियन है, इसी नदी पर स्थित है।
- शजर पत्थर:
- केन नदी शजर पत्थर (Shajar Stone) नामक एक विशेष प्रकार के रत्न-पत्थर के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसमें पेड़ों और पत्तियों जैसे पैटर्न बने होते हैं।
यमुना में संगम (Confluence with Yamuna):
- यह लगभग 427 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में चिल्ला नामक स्थान पर यमुना नदी में मिल जाती है।
पर्यावरणीय चिंता:
यमुना नदी दिल्ली और आगरा के बीच भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है। इन शहरों से निकलने वाला भारी मात्रा में औद्योगिक कचरा और अशोधित सीवेज इसे लगभग एक “जैविक मृत नदी” (biologically dead river) में बदल देता है।
सोन नदी (Son River)
सोन नदी, गंगा नदी तंत्र की एक अनूठी और महत्वपूर्ण दाहिने तट (Right-Bank) की सहायक नदी है। इसकी विशिष्टता यह है कि यह प्रायद्वीपीय पठार से निकलकर सीधे गंगा में मिलने वाली सबसे बड़ी और दूसरी सबसे लंबी (यमुना के बाद) सहायक नदी है।
- प्राचीन नाम: ‘हिरण्यवाह’ (Hiranyavah) और ‘सोनभद्र’ (Sonbhadra), संभवतः इसकी रेत में पाए जाने वाले सोने के कणों के कारण।
उद्गम (Origin):
- सोन नदी का उद्गम मध्य प्रदेश राज्य में, मैकाल श्रेणी (Maikal Range) पर स्थित अमरकंटक के पठार (Amarkantak Plateau) से होता है।
- यह उद्गम स्थल बहुत ही खास है क्योंकि यहीं से भारत की दो प्रमुख नदियाँ विपरीत दिशाओं में निकलती हैं:
- नर्मदा नदी पश्चिम की ओर बहती है।
- सोन नदी उत्तर की ओर बहती है।
यह अरीय अपवाह प्रतिरूप (Radial Drainage Pattern) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):
- प्रवाह की दिशा और राज्य:
- अपने उद्गम के बाद, सोन नदी पहले उत्तर दिशा में बहती है, फिर कैमूर श्रेणी से टकराकर अचानक पूर्व की ओर मुड़ जाती है और विंध्य तथा कैमूर श्रेणियों के समानांतर बहती है।
- यह मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और झारखंड से होकर बिहार में प्रवेश करती है।
- जलप्रपात:
- पठारी क्षेत्र से बहने के कारण, यह अपने ऊपरी मार्ग में कई छोटे-छोटे जलप्रपातों (Waterfalls) का निर्माण करती है।
- विशाल और चौड़ा पाट:
- मैदानी इलाकों में, विशेषकर बिहार में, सोन नदी का पाट (river bed) बहुत चौड़ा (लगभग 5 किमी) हो जाता है, लेकिन इसकी धारा संकरी रहती है।
- यह अपने साथ मोटी बालू या रेत (coarse sand) की भारी मात्रा बहाकर लाती है, जो इसके किनारों पर जमा हो जाती है। यह रेत भवन निर्माण के लिए बहुत प्रसिद्ध है।
- मार्ग परिवर्तन और बाढ़:
- अत्यधिक अवसाद के कारण, सोन नदी भी अपना मार्ग बदलती रही है। ऐतिहासिक रूप से, यह पटना से और भी पश्चिम में बहती थी, लेकिन अब यह पूर्व की ओर खिसक गई है।
- मानसून के दौरान इसमें अचानक और विनाशकारी बाढ़ भी आती है।
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
- इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ प्रायद्वीपीय पठार से ही आती हैं:
- रिहंद (Rihand): यह सोन की सबसे प्रमुख सहायक नदी है। प्रसिद्ध गोविंद बल्लभ पंत सागर, जो भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील है, इसी नदी पर बने रिहंद बांध का जलाशय है।
- उत्तरी कोयल (North Koel): यह झारखंड से निकलती है।
- गोपद, बनास और जोहिला इसकी अन्य सहायक नदियाँ हैं।
गंगा में संगम (Confluence with Ganga):
- यह लगभग 784 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद बिहार की राजधानी पटना के पास, दानापुर (Danapur) में गंगा नदी से मिल जाती है।
- गंगा और सोन का संगम स्थल, सोनपुर के निकट, ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, जहाँ एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला, सोनपुर मेला, लगता है।
सिंचाई में महत्व:
- सोन नदी पर सिंचाई के लिए नहर प्रणाली का विकास बहुत पहले ही कर लिया गया था।
- बिहार के डेहरी-ऑन-सोन के पास बनाया गया इंद्रपुरी बैराज (Indrapuri Barrage) सोन नहर प्रणाली का एक प्रमुख हिस्सा है, जो दक्षिण बिहार के सूखाग्रस्त क्षेत्रों (जैसे रोहतास, भोजपुर) में सिंचाई के लिए “चावल का कटोरा” बनाने में मदद करता है।
दामोदर नदी (Damodar River)
दामोदर नदी, गंगा नदी तंत्र के निचले भाग की एक महत्वपूर्ण नदी है, जो मुख्य रूप से झारखंड और पश्चिम बंगाल राज्यों में बहती है। यह अपनी खनिज संपदा से भरपूर घाटी और विनाशकारी बाढ़ों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के लिए प्रसिद्ध है।
- उपनाम: अपनी भयानक और विनाशकारी बाढ़ों के कारण, इसे अतीत में “बंगाल का शोक” (Sorrow of Bengal) कहा जाता था।
उद्गम (Origin):
- दामोदर नदी का उद्गम झारखंड राज्य के छोटानागपुर के पठार से होता है, जो लातेहार जिले के पास स्थित है।
प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ (Course and Key Features):-
- भ्रंश घाटी में प्रवाह (Flows in a Rift Valley):
- दामोदर नदी की सबसे महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक विशेषता यह है कि यह छोटानागपुर पठार को दो भागों (उत्तर में हजारीबाग पठार और दक्षिण में राँची पठार) में विभाजित करती हुई एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) में पूर्व की ओर बहती है।
- नर्मदा और तापी के बाद, यह भ्रंश घाटी में बहने वाली भारत की प्रमुख नदियों में से एक है।
- भारत का रूर प्रदेश (Ruhr Region of India):
- दामोदर नदी की घाटी गोंडवाना क्रम की चट्टानों से समृद्ध है, जिसमें भारत का उच्च गुणवत्ता वाला कोकिंग कोल (Coking Coal) का सबसे बड़ा भंडार है।
- झरिया, रानीगंज, बोकारो और करनपुरा जैसे भारत के प्रमुख कोयला क्षेत्र इसी नदी घाटी में स्थित हैं।
- इसी खनिज संपदा और औद्योगिक विकास के कारण इस घाटी को “भारत का रूर प्रदेश” (Ruhr of India) कहा जाता है।
- जैविक मरुस्थल (Biological Desert):
- कोयला खदानों, ताप विद्युत संयंत्रों और अन्य उद्योगों से निकलने वाले औद्योगिक अपशिष्टों और कचरे के कारण, यह नदी अपने ऊपरी मार्ग में भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक बन गई है।
- प्रदूषण के उच्च स्तर के कारण इसमें जलीय जीवन लगभग समाप्त हो गया है, जिसके कारण इसे कभी-कभी “जैविक मरुस्थल” (Biological Desert) भी कहा जाता है।
- गंगा/हुगली में संगम (Confluence with Ganga/Hooghly):
- यह नदी झारखंड से पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
- यह सीधे गंगा नदी में नहीं मिलती, बल्कि दुर्गापुर के बाद दक्षिण की ओर मुड़कर कोलकाता के पास उसकी वितरिका (Distributary), हुगली नदी (Hooghly River), में मिल जाती है।
- कुल लंबाई: लगभग 592 किलोमीटर।
प्रमुख सहायक नदी (Major Tributary):
- इसकी सबसे प्रमुख और सबसे बड़ी सहायक नदी बराकर नदी (Barakar River) है। बराकर भी कोयला क्षेत्रों से होकर बहती है।
दामोदर घाटी निगम (Damodar Valley Corporation – DVC)
दामोदर नदी की बाढ़ की विनाशकारी प्रकृति को नियंत्रित करने, सिंचाई की सुविधा प्रदान करने और क्षेत्र का आर्थिक विकास करने के लिए 1948 में भारत सरकार ने दामोदर घाटी निगम (DVC) की स्थापना की।
- भारत की पहली बहुउद्देशीय परियोजना: DVC स्वतंत्र भारत की पहली प्रमुख बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना (Multipurpose River Valley Project) थी।
- USA की TVA पर आधारित: इस परियोजना का मॉडल संयुक्त राज्य अमेरिका की टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA) पर आधारित था।
- प्रमुख बांध:
- इस परियोजना के तहत दामोदर और उसकी सहायक नदियों (विशेषकर बराकर) पर एक श्रृंखला में कई बांध और बैराज बनाए गए।
- प्रमुख बांधों में तिलैया, कोनार, मैथन (बराकर नदी पर) और पंचेत (दामोदर नदी पर) शामिल हैं।
- इसके अलावा दुर्गापुर बैराज से सिंचाई के लिए नहरें निकाली गई हैं।
- उद्देश्य: इस परियोजना ने न केवल बाढ़ नियंत्रण में सफलता पाई, बल्कि इस क्षेत्र में सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, औद्योगीकरण और मत्स्य पालन को भी बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया।
ग) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र (The Brahmaputra River System)
ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र दुनिया के सबसे शक्तिशाली और गतिशील नदी तंत्रों में से एक है। यह अपनी विशाल जल राशि, भारी मात्रा में अवसाद (गाद) लाने की क्षमता और विनाशकारी बाढ़ों के लिए जाना जाता है। यह नदी तीन देशों – चीन (तिब्बत), भारत और बांग्लादेश – से होकर बहती है, जहाँ इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
1. ब्रह्मपुत्र नदी (Main Brahmaputra River)
- ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत में कैलाश पर्वत श्रेणी पर स्थित चेमायुंगडुंग हिमनद (Chemayungdung Glacier) से होता है। यह उद्गम स्थल सिंधु और सतलज के स्रोतों के बहुत निकट है।
A) तिब्बत में – ‘सांगपो’ (Tsangpo)
- अर्थ: ‘सांगपो’ का तिब्बती भाषा में अर्थ है “शोधक” (The Purifier)।
- प्रवाह: उद्गम के बाद, यह नदी तिब्बत के शुष्क और समतल पठार पर पूर्व दिशा में, मुख्य हिमालय श्रृंखला के समानांतर, लगभग 1,200 किलोमीटर तक बहती है।
- विशेषता: इस भाग में इसका ढाल बहुत मंद होता है और इसमें जल की मात्रा भी कम होती है, क्योंकि यह एक ठंडे मरुस्थलीय क्षेत्र से होकर गुजरती है। इसलिए, यहाँ यह एक शांत और संकरी नदी होती है।
B) भारत में – ‘दिहांग’, ‘ब्रह्मपुत्र’
- प्रवेश: नामचा बरवा पर्वत (Namcha Barwa) के पास, यह नदी अचानक दक्षिण की ओर एक तीव्र, हेयरपिन जैसा मोड़ (Syntaxial Bend) लेती है और एक गहरे महाखड्ड (Gorge) का निर्माण करती हुई अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है।
- ‘दिहांग’ या ‘सियांग’ (Dihang or Siang): अरुणाचल प्रदेश में इसे दिहांग या सियांग के नाम से जाना जाता है।
- ‘ब्रह्मपुत्र’ का निर्माण:
- अरुणाचल प्रदेश से उतरकर जब यह असम की समतल घाटी में सदिया (Sadiya) शहर के पास प्रवेश करती है, तो इसमें दो प्रमुख सहायक नदियाँ – दिबांग (Dibang) और लोहित (Lohit) – आकर मिलती हैं।
- इसी संगम के बाद, संयुक्त धारा को ‘ब्रह्मपुत्र’ (Brahmaputra) के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है “ब्रह्मा का पुत्र” (Son of Brahma)।
- असम में विशेषताएँ:
- गुंफित जलमार्ग (Braided Channel): असम की चौड़ी और समतल घाटी में इसका ढाल अत्यंत मंद हो जाता है। अपने साथ लाए गए भारी मात्रा में अवसादों के जमाव के कारण, यह नदी कई छोटी-छोटी, आपस में गुंथी हुई धाराओं में बँट जाती है, जिसे गुंफित जलमार्ग कहते हैं।
- नदीय द्वीप: इसी निक्षेपण के कारण यहाँ माजुली (Majuli) जैसे विश्व के सबसे बड़े नदीय द्वीपों का निर्माण हुआ है।
- विनाशकारी बाढ़: असम में यह एक अत्यंत विशाल और शक्तिशाली नदी बन जाती है और मानसून के दौरान इसमें अक्सर विनाशकारी बाढ़ आती है।
C) बांग्लादेश में – ‘जमुना’, ‘पद्मा’, ‘मेघना’
- प्रवेश: असम में धुबरी के पास दक्षिण की ओर मुड़कर यह बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहाँ इसका नाम ‘जमुना’ (Jamuna) हो जाता है। (यमुना (Yamuna) और जमुना (Jamuna) अलग-अलग नदियाँ हैं)।
- पद्मा के साथ संगम: जमुना दक्षिण की ओर बहती है और पद्मा (गंगा का नाम) नदी से मिलती है।
- मेघना का निर्माण: इसके बाद यह संयुक्त धारा मेघना (Meghna) नदी से मिलती है, और अंत में ‘मेघना’ के नाम से ही बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
2. ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries of Brahmaputra)
ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियाँ बड़ी हैं और अपने साथ भारी मात्रा में जल और अवसाद लाती हैं।
(ये नदियाँ दक्षिण से आकर मिलती हैं)
1. दिबांग नदी (Dibang River)
- उद्गम (Origin): दिबांग नदी का उद्गम भारत-चीन सीमा के पास, अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी दिबांग घाटी जिले में केया दर्रे (Keya Pass) के निकट से होता है।
- प्रवाह मार्ग:
- यह दक्षिण-पश्चिम दिशा में अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों से होकर तेज गति से बहती है और गहरे गॉर्ज बनाती है।
- यह मिश्मी पहाड़ियों (Mishmi Hills) से होकर गुजरती है।
- यह सदिया (असम) के पास, मैदानी इलाकों में दिहांग (ब्रह्मपुत्र की मुख्य धारा) से लगभग मिलती है। दिबांग, दिहांग और लोहित का संगम ही ब्रह्मपुत्र नदी को जन्म देता है।
- महत्व: यह ब्रह्मपुत्र में भारी मात्रा में जल और अवसाद लाती है। निजामघाट इस नदी पर एक महत्वपूर्ण स्थान है।
2. लोहित नदी (Lohit River)
- उपनाम: “खून की नदी” (River of Blood)
- यह नाम इसे अपने तल की लाल और लेटराइट मिट्टी (lateritic soil) के कारण मिला है, जिससे इसका पानी अक्सर लाल रंग का दिखाई देता है।
- उद्गम (Origin): लोहित नदी का उद्गम पूर्वी तिब्बत की जायल चू पर्वत श्रृंखला (Zayal Chu range) से होता है।
- प्रवाह मार्ग:
- यह तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है और लगभग 200 किलोमीटर तक अशांत और तीव्र प्रवाह के साथ बहती है।
- यह असम के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है, जहाँ यह सदिया शहर के पास दिहांग नदी से मिल जाती है।
- भारत का सबसे लंबा पुल:
- ढोला-सदिया पुल (Dhola-Sadiya Bridge), जिसे आधिकारिक तौर पर भूपेन हजारिका सेतु (Bhupen Hazarika Setu) कहा जाता है, इसी लोहित नदी पर बना है।
- 9.15 किलोमीटर की लंबाई के साथ, यह भारत का सबसे लंबा सड़क पुल है। यह असम को अरुणाचल प्रदेश से जोड़ता है और इसका अत्यधिक सामरिक महत्व है।
- महत्व: यह भी ब्रह्मपुत्र में भारी जल राशि और अवसाद का योगदान करती है।
3. बूढ़ी दिहिंग नदी (Burhi Dihing River)
- ‘दिहिंग’ (Dihing) या ‘दिखो’ (Dikhow) नदी के नाम से भी जाना जाता है। “बूढ़ी” (अर्थात् पुरानी) शब्द इसे दिबांग से अलग करने के लिए जोड़ा गया है।
- उद्गम (Origin): इसका उद्गम अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी हिस्से में, म्यांमार सीमा के पास पटकाई बुम पहाड़ियों (Patkai Bum Hills) से होता है।
- प्रवाह मार्ग:
- यह ब्रह्मपुत्र के लगभग समानांतर एक टेढ़े-मेढ़े (meandering) रास्ते पर बहती है।
- यह ऊपरी असम के प्रमुख तेल क्षेत्रों (जैसे डिगबोई, दुलियाजान) के पास से होकर गुजरती है, जिसके कारण यह औद्योगिक प्रदूषण से प्रभावित है।
- यह अंत में दिसांगमुख (Disangmukh) के पास ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है।
- महत्व: यह ऊपरी असम के तेल-समृद्ध क्षेत्र की जीवनरेखा है।
4. धनसिरी नदी (Dhansiri River)
- उद्गम (Origin): धनसिरी नदी का उद्गम नागालैंड की लाइसंग चोटी (Laisang Peak) से होता है।
- प्रवाह मार्ग:
- यह नागालैंड और असम राज्यों में बहती है।
- अपने प्रारंभिक मार्ग में, यह नागालैंड और असम के बीच एक सीमा बनाती है।
- यह असम के गोलाघाट जिले और नागांव जिले से होकर गुजरती है।
- यह दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली कुछ प्रमुख नदियों में से एक है।
- अंत में, यह धनसिरीमुख के पास ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है।
- जैव-विविधता: इसके किनारे इन्तान्की नेशनल पार्क (नागालैंड) और काजीरंगा नेशनल पार्क (असम) के कुछ हिस्से पड़ते हैं, जो इसे जैव-विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं।
5. कोपिली नदी (Kopili River)
- उद्गम (Origin): कोपिली नदी का उद्गम मेघालय के पठार से होता है।
- प्रवाह मार्ग:
- यह मेघालय और असम राज्यों से होकर बहती है।
- यह मेघालय पठार और कार्बी-आंगलोंग पठार को अलग करने वाली एक सीमा घाटी से होकर गुजरती है।
- अपने मार्ग में, यह कई शानदार जलप्रपातों (Waterfalls) और रैपिड्स का निर्माण करती है।
- असम में प्रवेश करने के बाद, यह कलंग नदी (ब्रह्मपुत्र की एक वितरिका) में मिलती है और अंत में संयुक्त धारा ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है।
- जलविद्युत क्षमता: अपने तीव्र ढाल के कारण, इस नदी पर कई जलविद्युत परियोजनाएँ (Hydroelectric Projects) स्थापित की गई हैं, जैसे कोपिली जलविद्युत परियोजना, जो उत्तर-पूर्व भारत की पहली बड़ी जलविद्युत परियोजना थी।
- प्रदूषण: असम के कुछ हिस्सों में अवैध कोयला खनन (‘rat-hole mining’) के कारण यह अम्लीय प्रदूषण (acidic pollution) से गंभीर रूप से ग्रस्त है।
(ये नदियाँ उत्तर में हिमालय से आकर मिलती हैं)
1. सुबनसिरी नदी (Subansiri River)
- उद्गम (Origin): सुबनसिरी नदी का उद्गम तिब्बत में हिमालय की ऊँचाइयों से होता है।
- प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ:
- पूर्ववर्ती नदी (Antecedent River): यह ब्रह्मपुत्र और सतलज की तरह ही एक पूर्ववर्ती नदी है। यह हिमालय के उत्थान से भी पुरानी है और इसने अपना मार्ग बनाए रखने के लिए हिमालय में एक बहुत गहरा और संकरा महाखड्ड (Gorge) बनाया है।
- ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदी: यह जल की मात्रा (Volume) और लंबाई दोनों की दृष्टि से ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
- भारत में प्रवेश: यह अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले से भारत में प्रवेश करती है।
- स्वर्ण नदी: इस नदी की रेत में सोने के कण (Gold Dust) पाए जाते हैं, जिसके कारण इसे “स्वर्ण नदी” (Gold River) भी कहा जाता है। ‘सुबनसिरी’ नाम ‘स्वर्ण’ शब्द से ही बना है।
- ब्रह्मपुत्र में संगम: यह असम के लखीमपुर जिले में ब्रह्मपुत्र से मिलती है।
- बाढ़: यह अपने निचले हिस्सों में विनाशकारी बाढ़ लाने के लिए भी जानी जाती है। इस पर लोअर सुबनसिरी जलविद्युत परियोजना निर्माणाधीन है।
2. जिया भरेली / कामेंग नदी (Jia Bhoreli / Kameng River)
- दो नाम: इसे अरुणाचल प्रदेश में ‘कामेंग’ और असम के मैदानी इलाकों में ‘जिया भरेली’ के नाम से जाना जाता है।
- उद्गम (Origin): इसका उद्गम तिब्बत के साथ सीमा के पास, पूर्वी हिमालय में तवांग जिले (अरुणाचल प्रदेश) के एक ग्लेशियर से होता है।
- प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ:
- यह अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी कामेंग जिले से होकर बहती है, जिसे इसी नदी से नाम मिला है।
- यह सेसा ऑर्किड अभयारण्य (Sessa Orchid Sanctuary) और ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य (Eaglenest Wildlife Sanctuary) के बीच एक सीमा बनाती है।
- यह पक्के टाइगर रिजर्व (Pakhui Tiger Reserve) से होकर गुजरती है।
- ब्रह्मपुत्र में संगम: यह असम के सोनितपुर जिले में तेजपुर के पास ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है।
- साहसिक खेल: यह नदी अपनी तीव्र धारा के कारण व्हाइट-वॉटर राफ्टिंग (White-water Rafting) और काएकिंग (Kayaking) जैसे साहसिक खेलों के लिए बहुत लोकप्रिय है।
3. मानस नदी (Manas River)
- उद्गम (Origin): मानस नदी एक सीमा-पारीय नदी (transboundary river) है, जिसका उद्गम दक्षिणी तिब्बत में हिमालय से होता है।
- प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ:
- भूटान की जीवनरेखा: यह भूटान से होकर बहने वाली सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण नदी प्रणाली है। यह भूटान की एक प्रमुख जीवनरेखा है।
- भारत में प्रवेश: यह असम के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
- मानस नेशनल पार्क: प्रसिद्ध मानस नेशनल पार्क, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, एक टाइगर रिजर्व और एक हाथी रिजर्व है, इसी नदी के नाम पर रखा गया है और यह इसी के बेसिन में स्थित है। यह पार्क अपनी समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है।
- ब्रह्मपुत्र में संगम: यह जोगीघोपा के पास ब्रह्मपुत्र नदी में मिल जाती है।
- जैव-विविधता का केंद्र: इस नदी का बेसिन हिमालय की तलहटी में स्थित सबसे समृद्ध जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में से एक है।
4. संकोश नदी (Sankosh River)
- उद्गम (Origin): इसका उद्गम उत्तरी भूटान की ऊँचाइयों से होता है, जहाँ इसे ‘पुना त्सांग छु’ (Puna Tsang Chu) के नाम से जाना जाता है।
- प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ:
- यह भी भूटान से होकर भारत में प्रवेश करती है।
- यह असम और पश्चिम बंगाल के बीच एक लंबी प्राकृतिक सीमा बनाती है।
- ब्रह्मपुत्र में संगम: यह असम के धुबरी जिले में ब्रह्मपुत्र नदी में मिल जाती है, ठीक उस स्थान से पहले जहाँ ब्रह्मपुत्र बांग्लादेश में प्रवेश करती है।
- महत्व: यह जलविद्युत उत्पादन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण नदी है।
5. तिस्ता नदी (Teesta River)
- उद्गम (Origin): तिस्ता नदी का उद्गम उत्तरी सिक्किम में हिमालय की ऊँचाइयों पर स्थित कंचनजंघा पर्वत के पास के जेमू ग्लेशियर (Zemu Glacier) और त्सो ल्हामो झील (Tso Lhamo Lake) से होता है।
- प्रवाह मार्ग और प्रमुख विशेषताएँ:
- सिक्किम और पश्चिम बंगाल की जीवनरेखा: यह सिक्किम और पश्चिम बंगाल (उत्तरी भाग) की एक प्रमुख जीवनरेखा है। प्रसिद्ध शहर दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और जलपाईगुड़ी इसी के बेसिन में स्थित हैं।
- मार्ग परिवर्तन: यह नदी अपने मार्ग परिवर्तन के लिए प्रसिद्ध है। 1787 की एक विनाशकारी बाढ़ से पहले, यह गंगा की एक सहायक नदी (पद्मा में) के रूप में बहती थी। बाढ़ के बाद, इसने अपना मार्ग पूर्व की ओर बदल लिया और अब यह सीधे ब्रह्मपुत्र (जमुना) में मिलती है।
- भारत-बांग्लादेश जल विवाद: यह भारत और बांग्लादेश के बीच जल-बँटवारे को लेकर एक लंबे समय से चला आ रहा विवाद का विषय है, जिसका अभी तक कोई स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
- ब्रह्मपुत्र में संगम: यह पश्चिम बंगाल से बहकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है और चिलमारी के पास जमुना (ब्रह्मपुत्र) नदी में मिल जाती है।
- जलविद्युत क्षमता: अपनी तीव्र ढलान के कारण इस पर कई जलविद्युत परियोजनाएँ बनाई गई हैं।
2. प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र (The Peninsular Drainage System)
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र, प्रायद्वीपीय पठार पर बहने वाली नदियों की प्रणाली को संदर्भित करता है। यह नदी तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र से बहुत पुराना है और इसकी नदियाँ अपनी प्रौढ़ावस्था (mature stage) में हैं, जिनकी घाटियाँ चौड़ी और उथली होती हैं।
उत्पत्ति और प्रकृति (Origin and Nature):
- उद्गम: इन नदियों का उद्गम मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय पठार की उच्च भूमियों – जैसे केन्द्रीय उच्चभूमि (विंध्य, सतपुड़ा) और पश्चिमी घाट – से होता है।
- मौसमी नदियाँ (Seasonal or Non-Perennial): हिमालयी नदियों के विपरीत, इन नदियों का स्रोत ग्लेशियर नहीं है, बल्कि ये पूरी तरह से मानसून की वर्षा पर निर्भर हैं।
- इसलिए, ये मौसमी या गैर-बारहमासी होती हैं। मानसून के दौरान इनमें बाढ़ आ जाती है, जबकि शुष्क ग्रीष्म ऋतु में इनका जल प्रवाह बहुत कम हो जाता है या कुछ छोटी नदियाँ पूरी तरह सूख जाती हैं।
- अपवाद: कावेरी नदी इसका एक अपवाद है, क्योंकि इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून (ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र) और उत्तर-पूर्वी मानसून (निचले जलग्रहण क्षेत्र) दोनों से जल प्राप्त होता है, जिससे इसमें वर्ष भर अपेक्षाकृत स्थिर प्रवाह बना रहता है।
प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र का वर्गीकरण (Classification)
प्रायद्वीपीय पठार के सामान्य ढाल और जल-विभाजकों की स्थिति के आधार पर, यहाँ की नदियों को दो मुख्य समूहों में विभाजित किया जाता है:
1. पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ (East Flowing Rivers)
2. पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (West Flowing Rivers)
प्रमुख जल-विभाजक (Major Water Divide):
पश्चिमी घाट प्रायद्वीपीय भारत का मुख्य जल-विभाजक है। यह पूर्व और पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों के बीच पानी का बँटवारा करता है।
क) पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ (East Flowing Rivers)
ये वे नदियाँ हैं जो प्रायद्वीपीय पठार के सामान्य ढाल (पश्चिम से पूर्व) का अनुसरण करती हैं और अपना जल बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में गिराती हैं।
विशेषताएँ:
- लंबी और विस्तृत बेसिन: ये नदियाँ अपेक्षाकृत लंबी होती हैं और एक बड़े जलग्रहण क्षेत्र को अपवाहित करती हैं।
- डेल्टा का निर्माण: अपने साथ भारी मात्रा में अवसाद (गाद) लाने और मुहाने पर मंद ढाल के कारण, ये नदियाँ बड़े और उपजाऊ डेल्टा (Deltas) का निर्माण करती हैं।
प्रमुख पूर्व-प्रवाही नदियाँ (उत्तर से दक्षिण):
सुवर्णरेखा नदी (Subarnarekha River)
सुवर्णरेखा, प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में बहने वाली एक पूर्व-प्रवाही (East-flowing) नदी है। यह अपनी खनिज समृद्ध घाटी और औद्योगिक प्रदूषण के लिए जानी जाती है। यह उन कुछ प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियों में से एक है जो किसी अन्य बड़ी नदी (जैसे गंगा) में मिलने के बजाय स्वतंत्र रूप से सीधे बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
नामकरण (Etymology):
- “सुवर्णरेखा” शब्द का शाब्दिक अर्थ है “सोने की रेखा” (Streak of Gold)।
- इसका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि ऐतिहासिक रूप से इसकी रेत में सोने के कण (Placer Gold) पाए जाते थे। स्थानीय आदिवासी समुदाय आज भी पारंपरिक तरीकों से इसकी रेत छानकर थोड़ी मात्रा में सोना निकालते हैं, हालांकि अब इसकी मात्रा बहुत कम हो गई है।
उद्गम (Origin):
- सुवर्णरेखा नदी का उद्गम झारखंड की राजधानी रांची के पास, छोटानागपुर के पठार से होता है। यह पिसका / नगरी गाँव के पास से निकलती है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
यह नदी तीन राज्यों से होकर बहती है:
- झारखंड: उद्गम के बाद, यह झारखंड के एक बड़े हिस्से, विशेषकर औद्योगिक क्षेत्रों से होकर गुजरती है।
- पश्चिम बंगाल: इसके बाद यह पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।
- ओडिशा: अंत में यह ओडिशा के उत्तरी तटीय क्षेत्रों से होकर बहती है।
- कुल लंबाई: लगभग 395 किलोमीटर।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- यह ओडिशा के बालेश्वर जिले के पास कीर्तनिया बंदरगाह (Kirtania Port) के निकट बंगाल की खाड़ी में अपना मुहाना बनाती है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- अरीय अपवाह प्रतिरूप का हिस्सा: यह रांची पठार से निकलने वाली उन नदियों में से एक है जो अरीय या केन्द्रापसारी अपवाह प्रतिरूप (Radial Drainage Pattern) का निर्माण करती हैं (जहाँ नदियाँ एक केंद्रीय बिंदु से अलग-अलग दिशाओं में निकलती हैं)।
- हुंडरू जलप्रपात (Hundru Falls):
- अपनी यात्रा के दौरान, सुवर्णरेखा नदी रांची के पास पठारी किनारों से गिरती है और एक शानदार जलप्रपात (Waterfall) का निर्माण करती है, जिसे हुंडरू फॉल्स के नाम से जाना जाता है।
- लगभग 98 मीटर (322 फीट) की ऊँचाई से गिरने वाला यह झरना झारखंड के सबसे ऊँचे और सबसे प्रसिद्ध झरनों में से एक है, जो एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है।
- औद्योगिक प्रदूषण:
- सुवर्णरेखा नदी का बेसिन खनिज संसाधनों (जैसे तांबा, यूरेनियम, लोहा) से अत्यंत समृद्ध है।
- इसके किनारे कई महत्वपूर्ण औद्योगिक और खनन केंद्र स्थित हैं, जैसे जमशेदपुर (टाटानगर), घाटशिला और जादूगुड़ा (यूरेनियम की खदानें)।
- इन उद्योगों और खदानों से निकलने वाले अशोधित औद्योगिक कचरे और रेडियोधर्मी अपशिष्टों को सीधे नदी में बहा दिए जाने के कारण, यह भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक बन गई है। प्रदूषण ने इसके जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया है।
- वर्षा आधारित नदी:
- अन्य प्रायद्वीपीय नदियों की तरह, सुवर्णरेखा भी पूरी तरह से मानसून की वर्षा पर निर्भर है। गर्मियों में इसका जल स्तर बहुत कम हो जाता है, जबकि मानसून में इसमें अक्सर बाढ़ आ जाती है।
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
- इसकी प्रमुख सहायक नदियों में कांची, खरकई, और राढ़ू शामिल हैं।
- जमशेदपुर शहर सुवर्णरेखा और खरकई नदियों के संगम पर स्थित है, जो टाटा स्टील प्लांट को पानी उपलब्ध कराता है।
महानदी (Mahanadi River)
महानदी, प्रायद्वीपीय भारत के पूर्वी भाग में बहने वाली एक प्रमुख और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण नदी है। यह छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों की जीवनरेखा मानी जाती है। जल की मात्रा और अपवाह क्षेत्र की दृष्टि से यह गोदावरी और कृष्णा के बाद प्रायद्वीप की तीसरी सबसे बड़ी नदी है।
उद्गम (Origin):
- महानदी का उद्गम छत्तीसगढ़ राज्य के धमतरी जिले में, रायपुर के पास स्थित सिहावा (Sihawa) नामक पहाड़ी श्रृंखला से होता है, जो दंडकारण्य पठार का हिस्सा है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
यह नदी मुख्य रूप से दो राज्यों से होकर बहती है:
- छत्तीसगढ़: उद्गम के बाद, यह पहले उत्तर दिशा में बहती है, फिर पूर्व की ओर मुड़कर छत्तीसगढ़ के मैदान से होकर गुजरती है। यह छत्तीसगढ़ की सबसे लंबी नदी है।
- ओडिशा: इसके बाद यह ओडिशा राज्य में प्रवेश करती है, जहाँ यह पहाड़ों को काटकर सतकोसिया गॉर्ज (Satkosia Gorge) नामक एक गहरे महाखड्ड का निर्माण करती है। मैदानी इलाकों में बहने के बाद यह बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
- कुल लंबाई: लगभग 851 किलोमीटर।
- अपवाह बेसिन: इसका बेसिन छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में फैला है।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- महानदी ओडिशा में, पारादीप बंदरगाह के पास, एक विशाल और उपजाऊ डेल्टा (Delta) का निर्माण करती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। यह डेल्टा भारत के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- छत्तीसगढ़ का मैदान (“धान का कटोरा”):
- अपने ऊपरी मार्ग में, महानदी और उसकी सहायक नदियाँ छत्तीसगढ़ के मैदान का निर्माण करती हैं।
- यह मैदान, जिसे “भारत का धान का कटोरा” (Rice Bowl of India) कहा जाता है, अपनी उपजाऊ मिट्टी और सघन चावल की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
- “ओडिशा का शोक” से “वरदान” तक का सफर:
- अतीत में, महानदी अपने निचले हिस्से (ओडिशा) में मानसून के दौरान विनाशकारी बाढ़ लाने के लिए कुख्यात थी, जिसके कारण इसे “ओडिशा का शोक” (Sorrow of Odisha) कहा जाता था।
- हीराकुंड बांध (Hirakud Dam):
- इसी बाढ़ को नियंत्रित करने, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए, संबलपुर (ओडिशा) के पास महानदी पर हीराकुंड बांध का निर्माण किया गया है।
- मुख्य बांध की लंबाई लगभग 4.8 किलोमीटर और कुल तटबंधों को मिलाकर लगभग 25.8 किलोमीटर है, जो इसे विश्व के सबसे लंबे बांधों में से एक बनाता है।
- हीराकुंड बांध ने महानदी को “ओडिशा के शोक” से “ओडिशा के वरदान” में बदल दिया है।
- सतकोसिया गॉर्ज:
- ओडिशा में, महानदी पूर्वी घाट की पहाड़ियों को काटकर लगभग 60 किलोमीटर लंबा एक शानदार गॉर्ज बनाती है। यह क्षेत्र सतकोसिया टाइगर रिजर्व का हिस्सा है और अपनी समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है।
- विशाल डेल्टा:
- बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले, यह कई वितरिकाओं (जैसे काठजोड़ी, बिरूपा) में बँट जाती है और एक बहुत बड़ा और उपजाऊ डेल्टा बनाती है। कटक शहर इसी डेल्टा के शीर्ष पर स्थित है।
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
महानदी की एक संतुलित सहायक नदी प्रणाली है, जिसमें नदियाँ दोनों तरफ से आकर मिलती हैं।
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ (Left-Bank Tributaries):
- शिवनाथ (Seonath): यह इसकी सबसे लंबी सहायक नदी है।
- हसदो (Hasdeo)
- मांड (Mand)
- इब (Ib)
- दाएँ तट की सहायक नदियाँ (Right-Bank Tributaries):
- जोंक (Jonk)
- ओंग (Ong)
- तेल (Tel)
आर्थिक महत्व: महानदी बेसिन कृषि (विशेषकर चावल), जलविद्युत उत्पादन, और औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका डेल्टा एक प्रमुख कृषि क्षेत्र है, और इसके बेसिन में कोयला, लोहा और बॉक्साइट जैसे खनिज भी पाए जाते हैं।
गोदावरी नदी (Godavari River)
गोदावरी नदी, गंगा नदी के बाद, भारत की दूसरी सबसे लंबी नदी है और प्रायद्वीपीय भारत (Peninsular India) की सबसे लंबी नदी है। अपने विशाल आकार, अपवाह क्षेत्र और सांस्कृतिक महत्व के कारण, इसे कई सम्मानजनक नामों से जाना जाता है।
- उपनाम:
- “दक्षिण गंगा” (Dakshin Ganga): अपने विशाल आकार और गंगा के समान सांस्कृतिक महत्व के कारण।
- “वृद्ध गंगा” (Vridha Ganga / Old Ganga): अपनी प्राचीन उत्पत्ति और प्रायद्वीपीय पठार की एक प्रौढ़ नदी होने के कारण।
उद्गम (Origin):
- गोदावरी नदी का उद्गम महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में, पश्चिमी घाट की त्र्यंबकेश्वर (Trimbakeshwar) नामक पहाड़ी से होता है, जो प्रसिद्ध त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के पास है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
यह एक पूर्व-प्रवाही नदी है और कई राज्यों से होकर बहती है:
- महाराष्ट्र: उद्गम के बाद, यह दक्कन के पठार पर एक बड़े हिस्से को अपवाहित करती है।
- तेलंगाना: यह तेलंगाना राज्य में प्रवेश करती है।
- आंध्र प्रदेश: अंत में, यह आंध्र प्रदेश में प्रवेश करती है और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
- इसका अपवाह बेसिन महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों तक फैला है, जो गंगा के बाद दूसरा सबसे बड़ा बेसिन है।
- कुल लंबाई: लगभग 1,465 किलोमीटर।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- आंध्र प्रदेश में राजमुंद्री (Rajahmundry) के पास, यह एक विशाल और उपजाऊ डेल्टा (Delta) का निर्माण करती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
- डेल्टा में यह दो प्रमुख वितरिकाओं – गौतमी (Gautami) और वशिष्ठ (Vashishta) – में बँट जाती है। यह डेल्टा कृष्णा नदी के डेल्टा के साथ मिलकर एक बड़ा जलोढ़ मैदान बनाता है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- प्रायद्वीप की सबसे बड़ी नदी: यह अपवाह क्षेत्र और लंबाई दोनों की दृष्टि से प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है।
- विशाल डेल्टा और के-जी बेसिन (K-G Basin):
- गोदावरी का डेल्टा कृषि के लिए अत्यंत उपजाऊ है, विशेषकर चावल की खेती के लिए।
- कृष्णा-गोदावरी बेसिन (K-G Basin), जो इसके और कृष्णा नदी के डेल्टा क्षेत्र में स्थित है, प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम के विशाल भंडार के लिए प्रसिद्ध है।
- धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व:
- यह हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र नदी मानी जाती है। इसके तट पर कई प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं, जैसे:
- त्र्यंबकेश्वर (नासिक, महाराष्ट्र): उद्गम स्थल और ज्योतिर्लिंग।
- नासिक (महाराष्ट्र): यहाँ कुंभ मेले का आयोजन होता है।
- नांदेड़ (महाराष्ट्र): यहाँ सिखों का पवित्र हजूर साहिब गुरुद्वारा है।
- भद्रचलम (तेलंगाना): भगवान राम का प्रसिद्ध मंदिर।
- यह हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र नदी मानी जाती है। इसके तट पर कई प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं, जैसे:
- प्रमुख परियोजनाएँ:
- गोदावरी नदी पर कई महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय परियोजनाएँ बनाई गई हैं:
- पोलावरम परियोजना (Polavaram Project): आंध्र प्रदेश में निर्माणाधीन एक विशाल राष्ट्रीय परियोजना।
- श्रीराम सागर परियोजना (Sriram Sagar Project): तेलंगाना में।
- जायकवाड़ी बांध (Jayakwadi Dam): महाराष्ट्र में।
- गोदावरी नदी पर कई महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय परियोजनाएँ बनाई गई हैं:
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
गोदावरी की एक विशाल और सुविकसित सहायक नदी प्रणाली है।
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ (Left-Bank Tributaries) – (उत्तर से आने वाली): ये अधिक लंबी और बड़ी हैं।
- पूर्णा (Purna)
- प्राणहिता (Pranhita): यह तीन नदियों – पेनगंगा, वेनगंगा, और वर्धा – की संयुक्त धारा है। वेनगंगा इनमें सबसे लंबी है।
- इंद्रावती (Indravati): यह दंडकारण्य पठार से निकलती है और प्रसिद्ध चित्रकूट जलप्रपात बनाती है।
- शबरी (Sabari)
- दाएँ तट की सहायक नदियाँ (Right-Bank Tributaries) – (दक्षिण से आने वाली):
- प्रवरा (Pravara)
- मूला (Mula)
- मंजरा (Manjra): यह इसकी एकमात्र प्रमुख दाहिने तट की सहायक नदी है, जो बहुत लंबी है और तेलंगाना में निजाम सागर बांध बनाती है।
कृष्णा नदी (Krishna River)
कृष्णा नदी, प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे लंबी नदी (गोदावरी के बाद) है। यह जल प्रवाह और बेसिन क्षेत्र की दृष्टि से भी भारत की चौथी सबसे बड़ी नदी (गंगा, गोदावरी और ब्रह्मपुत्र के बाद) है। यह दक्षिण-मध्य भारत की सिंचाई और जल आपूर्ति के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण नदी है।
- प्राचीन नाम: कृष्णावेणी (Krishnaveni)
उद्गम (Origin):
- कृष्णा नदी का उद्गम महाराष्ट्र राज्य में पश्चिमी घाट की सह्याद्रि श्रेणी पर स्थित प्रसिद्ध हिल स्टेशन, महाबलेश्वर (Mahabaleshwar) के पास एक झरने से होता है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
यह एक पूर्व-प्रवाही नदी है और भारत के चार प्रमुख राज्यों से होकर बहती है:
- महाराष्ट्र: उद्गम के बाद, यह महाराष्ट्र के एक महत्वपूर्ण हिस्से को सिंचित करती है।
- कर्नाटक: यह उत्तरी कर्नाटक के एक बड़े भूभाग से होकर गुजरती है।
- तेलंगाना: यह तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच एक लंबी सीमा बनाती है।
- आंध्र प्रदेश: अंत में, यह आंध्र प्रदेश के तटीय मैदानों से होकर बहती है।
- कुल लंबाई: लगभग 1,400 किलोमीटर।
- अपवाह बेसिन: इसका बेसिन इन चार राज्यों में फैला हुआ है।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- कृष्णा नदी आंध्र प्रदेश में, विजयवाड़ा के पास, एक बहुत बड़ा और उपजाऊ डेल्टा (Delta) बनाती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
- यह डेल्टा गोदावरी नदी के डेल्टा के साथ मिलकर एक विशाल और लगभग सतत मैदानी क्षेत्र का निर्माण करता है, जिसे कृष्णा-गोदावरी डेल्टा (K-G Delta) कहा जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- कृष्णा-गोदावरी डेल्टा (K-G Delta):
- यह डेल्टा क्षेत्र अपनी अत्यधिक उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी के कारण चावल और तम्बाकू की खेती के लिए प्रसिद्ध है और इसे “दक्षिण भारत का अन्न भंडार” भी कहा जाता है।
- इस डेल्टा के अपतटीय क्षेत्र (के-जी बेसिन) में प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम के विशाल भंडार हैं, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ और बांध:
- कृष्णा और उसकी सहायक नदियों पर कई विशाल और महत्वपूर्ण बांध बनाए गए हैं, जो सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन का प्रमुख स्रोत हैं।
- नागार्जुन सागर बांध (Nagarjuna Sagar Dam): यह तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सीमा पर स्थित एक विशाल बांध है। यह दुनिया के सबसे बड़े चिनाई वाले बांधों में से एक है।
- श्रीशैलम बांध (Srisailam Dam): यह भी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सीमा पर स्थित है। यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी क्षमता वाली जलविद्युत परियोजना है।
- अलमाटी बांध (Almatti Dam): यह उत्तरी कर्नाटक में स्थित है।
- तुंगभद्रा बांध (Tungabhadra Dam): यह इसकी सबसे बड़ी सहायक नदी तुंगभद्रा पर बना एक महत्वपूर्ण बांध है।
- कृष्णा और उसकी सहायक नदियों पर कई विशाल और महत्वपूर्ण बांध बनाए गए हैं, जो सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन का प्रमुख स्रोत हैं।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद:
- कृष्णा नदी के जल का बँटवारा महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बीच एक लंबे समय से चले आ रहे अंतर-राज्यीय जल विवाद का विषय रहा है।
- धार्मिक महत्व:
- इसके तट पर श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश), जो एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ है, तथा विजयवाड़ा (आंध्र प्रदेश), जहाँ कनक दुर्गा मंदिर है, जैसे कई प्रसिद्ध तीर्थ स्थल स्थित हैं।
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
कृष्णा की एक विस्तृत सहायक नदी प्रणाली है, जिनमें से कई स्वयं बड़ी नदियाँ हैं।
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ (Left-Bank Tributaries):
- भीमा (Bhima): यह इसकी सबसे लंबी सहायक नदी है। इसका उद्गम भीमाशंकर (महाराष्ट्र) से होता है।
- डिंडी (Dindi)
- मूसी (Musi): हैदराबाद शहर इसी नदी के किनारे बसा हुआ है।
- पलेरू (Paleru)
- मुन्नेरु (Munneru)
- दाएँ तट की सहायक नदियाँ (Right-Bank Tributaries):
- वेन्ना (Venna)
- कोयना (Koyna): प्रसिद्ध कोयना बांध इसी पर बना है, जो महाराष्ट्र को बड़ी मात्रा में पनबिजली प्रदान करता है।
- पंचगंगा (Panchganga)
- दूधगंगा (Dudhganga)
- घाटप्रभा (Ghataprabha)
- मालप्रभा (Malprabha)
- तुंगभद्रा (Tungabhadra): यह आयतन की दृष्टि से कृष्णा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। इसका निर्माण तुंगा और भद्रा नदियों के संगम से होता है। ऐतिहासिक विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी इसी नदी के तट पर स्थित है।
पेन्नेरु नदी (Penneru River)
पेन्नेरु नदी, जिसे पेन्नार (Pennar), पेन्ना (Penna) या पिनाकिनी के नाम से भी जाना जाता है, प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिणी भाग में बहने वाली एक महत्वपूर्ण पूर्व-प्रवाही नदी है। यह कृष्णा और कावेरी नदियों के बीच के भू-भाग को अपवाहित करती है।
उद्गम (Origin):
- पेन्नेरु नदी का उद्गम कर्नाटक राज्य के चिक्कबल्लापुर जिले में स्थित नंदी पहाड़ियों (Nandi Hills) से होता है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
यह एक अंतर-राज्यीय नदी है जो मुख्य रूप से दो राज्यों से होकर बहती है:
- कर्नाटक: अपने उद्गम के बाद, यह उत्तर और फिर पूर्व दिशा में कर्नाटक के एक बड़े अर्ध-शुष्क पठारी क्षेत्र से होकर बहती है।
- आंध्र प्रदेश: इसके बाद यह आंध्र प्रदेश में प्रवेश करती है, जहाँ यह एक लंबी दूरी तय करती हुई तटीय मैदानों में पहुँचती है।
- कुल लंबाई: लगभग 597 किलोमीटर।
अपवाह बेसिन (Drainage Basin):
- पेन्नेरु नदी का बेसिन एक विशिष्ट नाव या दोने (boat-shaped) के आकार का है।
- यह बेसिन पूर्वी घाट द्वारा तीन तरफ से घिरा हुआ है और यह पूर्वी और पश्चिमी घाट दोनों के वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow Area) में पड़ता है।
- इस कारण, यह एक जल-अभाव (water-deficit) वाला बेसिन है और पूरी तरह से मानसून की वर्षा पर निर्भर है।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- पेन्नेरु नदी आंध्र प्रदेश में नेल्लोर शहर के पास, ऊटुक्कूरु (Utukuru) नामक स्थान पर एक छोटा डेल्टा बनाती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- मौसमी और बाढ़ प्रवण नदी:
- अन्य प्रायद्वीपीय नदियों की तरह, यह एक मौसमी नदी है। गर्मियों में इसका प्रवाह बहुत कम हो जाता है।
- हालांकि, मानसून के दौरान और विशेषकर उत्तर-पूर्वी मानसून के प्रभाव में, इसमें अचानक और विनाशकारी बाढ़ भी आती है।
- वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित बेसिन:
- इसका पूरा बेसिन कम वर्षा वाला क्षेत्र है, जिसके कारण इसमें जल का प्रवाह गोदावरी या कृष्णा जैसी नदियों की तुलना में बहुत कम होता है।
- इस क्षेत्र की कृषि सिंचाई पर बहुत अधिक निर्भर है, जिसके लिए नदी पर कई जलाशय बनाए गए हैं।
- कंडलेरु-पेन्ना लिंक नहर (Kandaleru-Poondi Canal):
- इस नदी का जल तेलुगु गंगा परियोजना (Telugu Ganga Project) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके तहत पेन्नेरु और अन्य नदियों के पानी को चेन्नई शहर तक पीने के लिए पहुँचाया जाता है।
- पूर्वी घाट को काटना:
- यह नदी पूर्वी घाट की वेलीकोंडा और नल्लमल्ला पहाड़ियों को काटकर अपना मार्ग बनाती है। आंध्र प्रदेश के कडपा के पास यह एक गहरा गॉर्ज भी बनाती है।
- प्रमुख शहर:
- नेल्लोर, आंध्र प्रदेश का एक प्रमुख शहर, इसी नदी के तट पर बसा है।
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
पेन्नेरु की सहायक नदियाँ छोटी और मौसमी हैं।
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ (Left-Bank Tributaries):
- जयमंगली (Jayamangali)
- कुंदेरू (Kunderu)
- दाएँ तट की सहायक नदियाँ (Right-Bank Tributaries):
- चित्रावती (Chitravati): यह इसकी सबसे बड़ी सहायक नदी है।
- पापाघ्नी (Papaghni)
- चेय्येरू (Cheyyeru)
आर्थिक महत्व:
पेन्नेरु नदी अपने बेसिन में कृषि के लिए सिंचाई और शहरी क्षेत्रों के लिए पीने के पानी का मुख्य स्रोत है। सोमशिला बांध (Somasila Dam) आंध्र प्रदेश में इस नदी पर बनी एक प्रमुख सिंचाई परियोजना है। इसके डेल्टा क्षेत्र में उपजाऊ भूमि है, लेकिन यह नदी जल विवादों और प्रदूषण की समस्याओं का भी सामना कर रही है।
कावेरी नदी (Kaveri / Cauvery River)
कावेरी नदी, जिसे अक्सर कावेरी भी लिखा जाता है, दक्षिण भारत की एक प्रमुख और अत्यंत पवित्र नदी है। यह अपने लगभग साल भर बने रहने वाले प्रवाह, उपजाऊ डेल्टा और गहरे सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व के लिए जानी जाती है। यह नदी जल-बँटवारे को लेकर अपने उद्गम और निचले राज्यों के बीच एक लंबे समय से चले आ रहे विवाद का केंद्र भी रही है।
- उपनाम:“दक्षिण भारत की गंगा” (Ganga of South India)
- यह नाम इसे इसकी अत्यधिक पवित्रता और डेल्टा क्षेत्र की समृद्धि और पवित्रता के कारण दिया गया है, न कि इसकी लंबाई के कारण। (गोदावरी को “दक्षिण गंगा” उसकी लंबाई के कारण कहते हैं)।
उद्गम (Origin):
- कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक राज्य के कोडागु (कुर्ग) जिले में, पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि पहाड़ियों (Brahmagiri Hills) पर स्थित तालकावेरी (Talakaveri) नामक स्थान से होता है, जिसे एक पवित्र स्थल माना जाता है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
यह नदी मुख्य रूप से दो राज्यों से होकर बहती है:
- कर्नाटक: अपने उद्गम के बाद, यह दक्कन के पठार पर पूर्व दिशा में बहती है।
- तमिलनाडु: इसके बाद यह तमिलनाडु के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
- इसका अपवाह बेसिन कर्नाटक (41%), तमिलनाडु (56%), और केरल (3%) तथा पुडुचेरी के छोटे से हिस्से में फैला हुआ है।
- कुल लंबाई: लगभग 800 किलोमीटर।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- यह तमिलनाडु में, पूमपुहार (Poompuhar) के पास, एक विशाल, हरा-भरा और अत्यंत उपजाऊ डेल्टा (Delta) बनाती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
- कावेरी डेल्टा को “दक्षिण भारत का बगीचा” (Garden of Southern India) भी कहा जाता है और यह क्षेत्र तमिलनाडु का प्रमुख चावल उत्पादक क्षेत्र है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- लगभग बारहमासी प्रवाह (Near-Perennial Flow):
- यह कावेरी की सबसे अनूठी विशेषता है जो इसे अन्य प्रायद्वीपीय नदियों से अलग करती है।
- कारण: कावेरी नदी को दो अलग-अलग मानसूनों से जल प्राप्त होता है:
- ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र (कर्नाटक): इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून से गर्मियों में भारी वर्षा प्राप्त होती है।
- निचला जलग्रहण क्षेत्र (तमिलनाडु): इसे उत्तर-पूर्वी (लौटते हुए) मानसून से सर्दियों में वर्षा प्राप्त होती है।
- इस दोहरी वर्षा प्रणाली के कारण, इसमें वर्ष भर अपेक्षाकृत स्थिर जल प्रवाह बना रहता है, जो सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए बहुत अनुकूल है।
- तीन द्वीपों का निर्माण:
- अपने मार्ग में, कावेरी नदी तीन प्रमुख द्वीपों का निर्माण करती है:
- श्रीरंगपटना (Srirangapatna): कर्नाटक में, टीपू सुल्तान की ऐतिहासिक राजधानी।
- शिवसमुद्रम (Sivasamudram): कर्नाटक में।
- श्रीरंगम (Srirangam): तमिलनाडु में, प्रसिद्ध श्री रंगनाथस्वामी मंदिर का घर।
- अपने मार्ग में, कावेरी नदी तीन प्रमुख द्वीपों का निर्माण करती है:
- प्रमुख जलप्रपात (Major Waterfalls):
- शिवसमुद्रम जलप्रपात (Sivasamudram Falls): यह कर्नाटक में कावेरी नदी पर स्थित एक शानदार, खंडों वाला (segmented) जलप्रपात है।
- भारत की पहली जलविद्युत परियोजना: इसी जलप्रपात पर 1902 में भारत की पहली बड़ी जलविद्युत परियोजना स्थापित की गई थी, जिसका उद्देश्य कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) को बिजली की आपूर्ति करना था।
- होगेनक्कल जलप्रपात (Hogenakkal Falls): यह तमिलनाडु में स्थित है और इसे “भारत का नियाग्रा” भी कहा जाता है।
- कावेरी जल विवाद (Cauvery Water Dispute):
- यह भारत का सबसे पुराना और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय जल विवाद है, जो मुख्य रूप से कर्नाटक (ऊपरी राज्य) और तमिलनाडु (निचला राज्य) के बीच नदी के पानी के बँटवारे को लेकर है। केरल और पुडुचेरी भी इस विवाद के पक्षकार हैं।
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
- बाएँ तट की सहायक नदियाँ (Left-Bank Tributaries):
- हारांगी (Harangi)
- हेमावती (Hemavati)
- शिमशा (Shimsha)
- अर्कावती (Arkavathi)
- दाएँ तट की सहायक नदियाँ (Right-Bank Tributaries):
- लक्ष्मण तीर्थ (Lakshmana Tirtha)
- कबनी (Kabini)
- सुवर्णावती (Suvarnavathy)
- भवानी (Bhavani)
- नोय्यल (Noyyal)
- अमरावती (Amaravati)
आर्थिक महत्व: कावेरी नदी दक्षिण भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसका जल सघन सिंचाई (विशेषकर चावल और गन्ने के लिए), पीने के पानी की आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका डेल्टा तमिलनाडु का सबसे समृद्ध कृषि क्षेत्र है।
वैगई नदी (Vaigai River)
वैगई, तमिलनाडु राज्य में बहने वाली एक महत्वपूर्ण, लेकिन मौसमी नदी है। यह अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, विशेष रूप से क्योंकि प्राचीन और जीवंत शहर मदुरै इसी नदी के तट पर बसा हुआ है।
उद्गम (Origin):
- वैगई नदी का उद्गम पश्चिमी घाट की वरुशनाद पहाड़ियों (Varushanad Hills) से होता है, जो तमिलनाडु के थेनी जिले में स्थित है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
- यह नदी पूरी तरह से तमिलनाडु राज्य के भीतर ही बहती है।
- उद्गम के बाद, यह कम्बम घाटी (Cumbum Valley), जो थेनी और मदुरै जिलों के बीच एक उपजाऊ क्षेत्र है, से होकर बहती है।
- यह मुख्य रूप- से थेनी, डिंडीगुल, मदुरै, शिवगंगा और रामनाथपुरम जिलों से होकर गुजरती है।
- कुल लंबाई: लगभग 258 किलोमीटर।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- वैगई नदी पूर्व की ओर बहती हुई, रामनाथपुरम जिले के पास, पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) में अपना जल विसर्जित करती है।
- उथुक्कोट्टई के पास यह एक छोटा सा मुहाना बनाती है और फिर समुद्र में मिल जाती है।
- अपने अंतिम भाग में, शुष्क मौसम के दौरान यह अक्सर सूख जाती है और इसकी धारा समुद्र तक नहीं पहुँच पाती, जो इसके मौसमी स्वरूप को दर्शाता है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- पूर्णतः वर्षा-आधारित नदी (Entirely Rain-fed River):
- यह एक विशिष्ट मौसमी नदी है, जो पूरी तरह से मानसून की वर्षा पर निर्भर है।
- यह पश्चिमी घाट के पूर्वी (वृष्टि-छाया) ढलान से निकलती है, जिसके कारण इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून से बहुत कम पानी मिलता है।
- इसका मुख्य जल स्रोत उत्तर-पूर्वी मानसून (लौटता हुआ मानसून) है, जो सर्दियों में इस क्षेत्र में वर्षा करता है।
- इसी कारण, गर्मियों में यह नदी लगभग सूख जाती है और इसका प्रवाह बहुत कम हो जाता है।
- मदुरै की जीवनरेखा (Lifeline of Madurai):
- प्राचीन काल से ही वैगई नदी को पांड्य साम्राज्य की राजधानी, मदुरै की जीवनरेखा माना जाता रहा है।
- मदुरै का विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी अम्मन मंदिर इसी नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है।
- शहर की पेयजल आपूर्ति और कृषि सिंचाई पूरी तरह से इसी नदी पर निर्भर है।
- संगम साहित्य में उल्लेख:
- प्राचीन तमिल संगम साहित्य में वैगई नदी और इसके तट पर बसे मदुरै शहर का बहुत ही विशद और गौरवशाली वर्णन मिलता है।
- वैगई बांध (Vaigai Dam):
- थेनी जिले के अंदीपट्टी के पास, इस नदी पर एक महत्वपूर्ण वैगई बांध बनाया गया है।
- यह बांध मुख्य रूप से मदुरै और डिंडीगुल जिलों में सिंचाई और पीने के पानी की आपूर्ति के लिए जल का भंडारण करता है।
- पर्यावरणीय चुनौतियाँ:
- आज यह नदी कई गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है:
- प्रदूषण: शहरी और औद्योगिक कचरे के कारण मदुरै के पास इसका पानी बहुत प्रदूषित हो गया है।
- अवैध रेत खनन: बड़े पैमाने पर हो रहे रेत खनन ने नदी के तल को गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
- जल का अभाव: कम वर्षा और अत्यधिक उपयोग के कारण इसमें पानी का प्रवाह बहुत कम हो गया है।
- आज यह नदी कई गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है:
प्रमुख सहायक नदियाँ (Major Tributaries):
- इसकी सहायक नदियाँ बहुत छोटी और मौसमी हैं, जिनमें सुरुलीयारु, सिरुमलैयारु, और तेनारु शामिल हैं।
निष्कर्ष: वैगई एक छोटी लेकिन सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण नदी है, जिसका इतिहास मदुरै शहर और पांड्य साम्राज्य के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में, यह नदी गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों और जल संकट से जूझ रही है, जिसके संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
1. वैतरणी नदी (Baitarani River)
वैतरणी, ओडिशा की प्रमुख नदियों में से एक है। इसे हिंदू धर्म में एक पवित्र नदी माना जाता है और इसे पौराणिक कथाओं में अक्सर नरक (यमलोक) की सीमा बनाने वाली ‘वैतरणी’ नदी से जोड़ा जाता है, जिसे पार करके ही आत्मा को आगे जाना होता है।
उद्गम (Origin):
- वैतरणी नदी का उद्गम ओडिशा राज्य के क्योंझर (केंदुझर) पठार पर स्थित गुप्तागंगा पहाड़ियों (Guptaganga Hills) से होता है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
- यह नदी मुख्य रूप से ओडिशा में बहती है, हालांकि इसका कुछ जलग्रहण क्षेत्र झारखंड (सिंहभूम पठार) में भी पड़ता है।
- यह ओडिशा के क्योंझर, मयूरभंज, भद्रक और जाजपुर जिलों से होकर गुजरती है।
- कुल लंबाई: लगभग 360 किलोमीटर।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- वैतरणी नदी ब्राह्मणी नदी (Brahmani River) के साथ मिलकर धामरा नदी के मुहाने पर एक संयुक्त डेल्टा (Combined Delta) का निर्माण करती है।
- यह संयुक्त धारा ओडिशा में धामरा बंदरगाह के पास बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- “ओडिशा की गंगा”:
- अपने धार्मिक महत्व और राज्य के लिए उपयोगिता के कारण, इसे कभी-कभी “ओडिशा की गंगा” भी कहा जाता है।
- खनिज समृद्ध बेसिन:
- इसका बेसिन खनिज संसाधनों, विशेषकर लौह अयस्क और क्रोमाइट, से अत्यंत समृद्ध है। यह भारत के प्रमुख खनन क्षेत्रों में से एक है।
- भीतरकनिका मैंग्रोव (Bhitarkanika Mangroves):
- वैतरणी और ब्राह्मणी का डेल्टा क्षेत्र भीतरकनिका राष्ट्रीय उद्यान का घर है, जो सुंदरबन के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र (Mangrove Ecosystem) है।
- यह खारे पानी के मगरमच्छ (Saltwater Crocodile) की सबसे बड़ी आबादी और ओलिव रिडले समुद्री कछुओं (Olive Ridley sea turtles) के प्रजनन स्थल (गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य) के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
- बाढ़ की समस्या:
- मानसून के दौरान, यह नदी भी अपने निचले इलाकों में अक्सर बाढ़ का कारण बनती है।
प्रमुख सहायक नदियाँ:
- इसकी प्रमुख सहायक नदियों में सालांदी (Salandi) शामिल है।
2. वंशधारा नदी (Vamshadhara River)
वंशधारा, पूर्वी भारत की एक और महत्वपूर्ण पूर्व-प्रवाही अंतर-राज्यीय नदी है, जो मुख्य रूप से ओडिशा और आंध्र प्रदेश में बहती है। यह महानदी और गोदावरी नदियों के बीच के भू-भाग को अपवाहित करती है।
उद्गम (Origin):
- वंशधारा नदी का उद्गम ओडिशा के कालाहांडी जिले में पूर्वी घाट की थुआमूल रामपुर (Thuamul Rampur) पहाड़ियों से होता है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
- यह नदी मुख्य रूप से दो राज्यों में बहती है:
- ओडिशा: अपने उद्गम से यह ओडिशा के कालाहांडी और रायगडा जिलों में बहती है।
- आंध्र प्रदेश: इसके बाद यह आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में प्रवेश करती है, और कुछ दूरी तक दोनों राज्यों के बीच सीमा भी बनाती है।
- कुल लंबाई: लगभग 254 किलोमीटर।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- वंशधारा नदी आंध्र प्रदेश के कलिंगपट्टनम (Kalingapatnam) के पास सीधे बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- अंतर-राज्यीय जल विवाद:
- वंशधारा नदी का जल, विशेष रूप से नेरडी बैराज (Neradi Barrage) और कटरागड्डा साइड वियर के निर्माण को लेकर, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के बीच एक अंतर-राज्यीय जल विवाद का विषय रहा है।
- मानसून पर निर्भरता:
- अन्य प्रायद्वीपीय नदियों की तरह ही, यह भी पूरी तरह से मानसून की वर्षा पर निर्भर है। गर्मियों में इसका प्रवाह काफी कम हो जाता है, जबकि मानसून में इसमें विनाशकारी बाढ़ भी आती है।
- वर्ष 2006 में आई बाढ़ से दोनों राज्यों में भारी तबाही हुई थी।
- सिंचाई का महत्व:
- यह नदी अपने बेसिन में, विशेषकर आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले और ओडिशा के गजपति जिले के लिए, सिंचाई का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। गोट्टा बैराज (Gotta Barrage) इस पर बनी एक प्रमुख सिंचाई परियोजना है।
- पारिस्थितिक महत्व:
- इसके मुहाने का क्षेत्र छोटी मैंग्रोव वनस्पतियों और समृद्ध तटीय पारिस्थितिकी का समर्थन करता है।
1. पालार नदी (Palar River)
पालार, दक्षिण भारत की एक पूर्व-प्रवाही नदी है, जो मुख्य रूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों से होकर बहती है। यह एक अत्यंत मौसमी नदी है, जो वर्ष के अधिकांश समय सूखी रहती है।
उद्गम (Origin):
- पालार नदी का उद्गम कर्नाटक राज्य के चिक्कबल्लापुर जिले में स्थित नंदी पहाड़ियों (Nandi Hills) से होता है।
- पेन्नेरु और कावेरी जैसी अन्य महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम भी इसी पहाड़ी क्षेत्र के पास से होता है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
यह नदी तीन राज्यों से होकर गुजरती है:
- कर्नाटक: उद्गम के बाद, यह लगभग 93 किलोमीटर तक कर्नाटक में बहती है।
- आंध्र प्रदेश: इसके बाद यह आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में प्रवेश करती है और लगभग 33 किलोमीटर बहती है।
- तमिलनाडु: अंत में, यह तमिलनाडु में प्रवेश करती है, जहाँ यह अपने प्रवाह का सबसे लंबा हिस्सा (लगभग 222 किलोमीटर) तय करती है।
- कुल लंबाई: लगभग 348 किलोमीटर।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- पालार नदी तमिलनाडु में कलपक्कम (Kalpakkam) के पास वयलूर (Vayalur) नामक स्थान पर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- अत्यंत मौसमी नदी:
- पालार को “आज की तारीख में एक नदी जो रेत का एक लंबा, चौड़ा बिस्तर मात्र है” के रूप में वर्णित किया जाता है।
- यह पूरी तरह से मानसून पर निर्भर है और साल के 300 से अधिक दिनों तक सूखी रहती है। इसमें केवल उत्तर-पूर्वी मानसून के दौरान कुछ दिनों के लिए ही महत्वपूर्ण प्रवाह होता है।
- भूमिगत जल का स्रोत:
- भले ही सतह पर पानी न हो, लेकिन इसकी रेत के नीचे भूमिगत जल (Groundwater) का विशाल भंडार है, जिसे ‘पालार बेसिन’ कहा जाता है।
- यह भूमिगत जल इस नदी के किनारे बसे कई शहरों और कस्बों, विशेषकर वेल्लोर, के लिए पीने के पानी और सिंचाई का एकमात्र स्रोत है।
- अत्यधिक दोहन और विवाद:
- इसकी रेत से अनियंत्रित रूप से पानी के अत्यधिक दोहन और अवैध रेत खनन (Illegal sand mining) ने इसके पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया है और जल स्तर को बहुत नीचे कर दिया है।
- नदी के जल बँटवारे को लेकर कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के बीच विवाद भी रहा है।
- प्रमुख शहर:
- तमिलनाडु के महत्वपूर्ण शहर जैसे वेल्लोर, आरकॉट, और कांचीपुरम इसी नदी के तट पर स्थित हैं।
2. ताम्रपर्णी नदी (Thamirabarani / Tamraparni River)
ताम्रपर्णी (या थामिरबरानी) नदी, प्रायद्वीपीय भारत की सबसे दक्षिणी प्रमुख नदी है। यह एक बारहमासी (Perennial) प्रायद्वीपीय नदी है और इसका सांस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है।
- प्राचीन नाम: इसका प्राचीन नाम ‘पोरुनई’ (Porunai) था, और इसका उल्लेख तमिल संगम साहित्य और महाभारत में भी मिलता है।
उद्गम (Origin):
- ताम्रपर्णी नदी का उद्गम पश्चिमी घाट की अगस्त्यमलाई पहाड़ियों (Agastyamalai Hills) से होता है, जो कलक्कड़ मुंडनथुराई टाइगर रिजर्व (Kalakkad Mundanthurai Tiger Reserve) का हिस्सा है।
- माना जाता है कि यह अगस्त्य मुनि के आश्रम के पास से निकलती है, जो इसके पवित्र माने जाने का एक कारण है।
प्रवाह मार्ग और राज्य (Course and States):
- यह नदी पूरी तरह से तमिलनाडु राज्य के भीतर ही बहती है।
- यह मुख्य रूप से तिरुनेलवेली और थूथुकुडी (तूतीकोरिन) जिलों से होकर गुजरती है।
- कुल लंबाई: लगभग 128 किलोमीटर।
समुद्र में संगम (Confluence with Sea):
- यह नदी मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) में पुन्नईकायल (Punnaikayal) के पास अपना जल विसर्जित करती है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics):
- बारहमासी प्रायद्वीपीय नदी:
- कावेरी की तरह ही, ताम्रपर्णी भी एक बारहमासी (Perennial) नदी है, जिसमें साल भर पानी रहता है।
- कारण: इसे दोनों मानसूनों – दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-पूर्वी मानसून – से वर्षा का जल प्राप्त होता है, जो इसे वर्ष भर प्रवाहित रखता है।
- लाल मिट्टी और नामकरण:
- इस नदी का बेसिन लाल मिट्टी से समृद्ध है। जब यह मिट्टी पानी में घुलती है, तो नदी का रंग थोड़ा तांबे (Copper) जैसा हो जाता है।
- माना जाता है कि “ताम्रपर्णी” नाम इसी “ताम्र” (Copper) रंग के कारण पड़ा है।
- सभ्यता का उद्गम स्थल:
- तिरुनेलवेली जिले में इसके तट पर आदिचनल्लूर (Adichanallur) नामक स्थान पर एक बहुत ही प्राचीन (लगभग 900 ईसा पूर्व) महापाषाणकालीन (Megalithic) पुरातात्विक स्थल मिला है, जो दर्शाता है कि इस नदी के किनारे एक उन्नत सभ्यता का विकास हुआ था।
- सिंचाई और बांध:
- यह नदी तिरुनेलवेली और थूथुकुडी जिलों की कृषि और पेयजल की जीवनरेखा है। इस पर सिंचाई के लिए नहरों का एक प्राचीन और सघन नेटवर्क (18वीं सदी का) बना हुआ है। पापनासम बांध इस पर बना एक प्रमुख बांध है।
- प्रमुख शहर:
- तिरुनेलवेली और श्रीवैकुंठम जैसे महत्वपूर्ण शहर इसी नदी के किनारे बसे हैं।
ख) पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (West Flowing Rivers)
पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ वे नदियाँ हैं जो प्रायद्वीपीय पठार और भारत के पश्चिमी भागों से निकलकर अपना जल अरब सागर (Arabian Sea) में गिराती हैं। ये नदियाँ संख्या में तो बहुत हैं, लेकिन लंबाई और अपवाह क्षेत्र की दृष्टि से केवल कुछ ही बड़ी हैं। ये नदियाँ पूर्व की ओर बहने वाली नदियों से कई मायनों में भिन्न होती हैं।
पश्चिम-प्रवाही नदियों की सामान्य विशेषताएँ
- ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण:
- ये नदियाँ अपने मुहाने पर डेल्टा (Delta) नहीं बनातीं।
- कारण:
- ये कठोर चट्टानों से होकर गुजरती हैं, जिससे अपने साथ बहुत कम गाद या अवसाद (sediment) लाती हैं।
- इनका ढाल तीव्र होता है, जिससे इनका प्रवाह तेज होता है और अवसाद मुहाने पर जमा नहीं हो पाते।
- समुद्री धाराएँ और ज्वार भी अवसादों को बहा ले जाते हैं।
- इसके बजाय, ये एक गहरी, कीप के आकार की घाटी बनाती हैं, जिसे ज्वारनदमुख या एस्चुएरी कहते हैं।
- छोटी लंबाई और संकीर्ण बेसिन:
- नर्मदा और तापी को छोड़कर, पश्चिम की ओर बहने वाली अधिकांश नदियाँ बहुत छोटी होती हैं।
- इनका जलग्रहण क्षेत्र या बेसिन भी बहुत संकीर्ण होता है, क्योंकि इनका स्रोत (जैसे पश्चिमी घाट) समुद्र से बहुत अधिक दूर नहीं है।
- तीव्र प्रवाह:
- इन नदियों का प्रवाह, विशेषकर पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियों का, अपनी छोटी लंबाई में तीव्र ढलान के कारण बहुत तेज होता है।
प्रमुख पश्चिम-प्रवाही नदियाँ (उत्तर से दक्षिण के क्रम में)
पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों को दो समूहों में बांटा जा सकता है: (i) प्रायद्वीपीय पठार की बड़ी नदियाँ, और (ii) पश्चिमी घाट से निकलने वाली छोटी नदियाँ।
i) प्रायद्वीपीय पठार की प्रमुख नदियाँ
लूनी नदी: एक अंतर्देशीय अपवाह प्रणाली
लूनी नदी, जिसका प्राचीन नाम ‘लवणवरी’ (नमक की नदी) है, थार मरुस्थल की सबसे महत्वपूर्ण नदी प्रणाली है। यह एक मौसमी और अंतर्देशीय अपवाह का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- उद्गम एवं प्रवाह मार्ग: इसका उद्गम राजस्थान के अजमेर जिले में अरावली श्रेणी की नागा पहाड़ियों से ‘सागरमती’ के रूप में होता है। पुष्कर से निकलने वाली इसकी सहायक नदी ‘सरस्वती’ के गोविंदगढ़ में मिलने के बाद यह ‘लूनी’ कहलाती है। लगभग 495 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए यह राजस्थान के नागौर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर और जालोर जिलों से होकर गुजरात में प्रवेश करती है और अंततः कच्छ के रण के दलदली क्षेत्र में विलीन हो जाती है।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- अंतर्देशीय अपवाह: यह नदी समुद्र तक नहीं पहुँच पाती और कच्छ के रण में ही लुप्त हो जाती है।
- खारा पानी: उद्गम से लेकर बालोतरा (बाड़मेर) तक इसका जल मीठा होता है, પરંતુ इसके बाद रेगिस्तानी सतह की लवणता के कारण इसका जल खारा हो जाता है।
- सहायक नदियाँ: इसकी अधिकांश सहायक नदियाँ जैसे सुकरी, मिथरी, बांडी, खारी, और जवाई अरावली से निकलती हैं। ‘जोजरी’ एकमात्र ऐसी सहायक नदी है जो दाईं ओर से इसमें मिलती है और इसका उद्गम अरावली से नहीं होता।
- महत्व: यह शुष्क पश्चिमी राजस्थान के लिए जल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
साबरमती नदी: गुजरात की जीवन रेखा
साबरमती गुजरात की प्रमुख नदियों में से एक है, जो राज्य के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है।
- उद्गम एवं प्रवाह मार्ग: इस नदी का उद्गम राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित अरावली की पहाड़ियों से होता है। कुल 371 किलोमीटर की लंबाई में से प्रारंभिक 48 किलोमीटर यह राजस्थान में और शेष 323 किलोमीटर गुजरात में बहती है। अंत में यह अरब सागर में खंभात की खाड़ी में गिरती है।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- समुद्रीय निकास: लूनी के विपरीत, साबरमती एक पूर्ण नदी प्रणाली है जो समुद्र तक पहुँचती है।
- मानसूनी प्रवाह: यह एक मानसूनी नदी है, जिसके जल का अधिकांश स्रोत दक्षिण-पश्चिम मानसून होता है।
- सहायक नदियाँ: वाकल, सेई, हाथमती, और वात्रक इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।
- महत्व: गुजरात के दो प्रमुख शहर, अहमदाबाद और राजधानी गांधीनगर, इसके तट पर बसे हैं। અમદાવાદ में ‘साबरमती रिवरफ्रंट’ परियोजना ने शहरी विकास, पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण का एक सफल मॉडल प्रस्तुत किया है। यह नदी गुजरात के कई क्षेत्रों के लिए पेयजल और सिंचाई का मुख्य स्रोत है।
माही (Mahi): कर्क रेखा को दो बार काटने वाली नदी
माही नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के धार जिले में विंध्याचल पर्वत श्रेणी की ढलानों में स्थित ‘मिंडा’ नामक गाँव के पास एक झील से होता है। यह एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण नदी है जिसका प्रवाह तीन राज्यों – मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात – से होकर गुजरता है।
- उद्गम और प्रवाह मार्ग:
- मध्य प्रदेश में अपने उद्गम के बाद यह उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हुई राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में प्रवेश करती है।
- राजस्थान में यह उत्तर की ओर बहते हुए डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिलों की सीमा बनाती है। यहाँ से यह दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक तीव्र मोड़ (U-टर्न) लेती है और गुजरात राज्य में प्रवेश करती है।
- गुजरात में बहते हुए यह अंततः खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में विलीन हो जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 583 किलोमीटर है।
- अद्वितीय विशेषता: माही भारत की एकमात्र प्रमुख नदी है जो कर्क रेखा (Tropic of Cancer) को दो बार काटती है – पहली बार मध्य प्रदेश से राजस्थान में प्रवेश करते समय और दूसरी बार जब यह गुजरात की ओर मुड़ती है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ और बांध:
- इसकी प्रमुख सहायक नदियों में सोम, जाखम, अनस और पनम शामिल हैं। सोम और जाखम के साथ इसका संगम राजस्थान के बेणेश्वर में होता है, जो एक प्रसिद्ध त्रिवेणी संगम स्थल है।
- माही नदी पर माही बजाज सागर बांध (राजस्थान) और कडाणा बांध (गुजरात) प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएं हैं जो सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्व:
- बेणेश्वर (डूंगरपुर, राजस्थान) में लगने वाला मेला एक बड़ा आदिवासी मेला है, जो माही, सोम और जाखम के संगम पर आयोजित होता है।
- यह नदी मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के बड़े कृषि क्षेत्रों के लिए सिंचाई का मुख्य स्रोत है और इन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
नर्मदा (Narmada): भ्रंश घाटी में बहने वाली ‘मध्य भारत की जीवन रेखा’
नर्मदा, जिसे ‘रेवा’ के नाम से भी जाना जाता है, प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी पश्चिम की ओर बहने वाली नदी है। यह पारंपरिक रूप से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक सीमा के रूप में मानी जाती है। इसका प्रवाह एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) में होने के कारण यह अपने मार्ग में गहरे गॉर्ज और खूबसूरत जलप्रपातों का निर्माण करती है।
- उद्गम और प्रवाह मार्ग:
- नर्मदा का उद्गम मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में मैकल पर्वत श्रेणी पर स्थित अमरकंटक पठार से होता है।
- यह पश्चिम की ओर बहते हुए मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों से होकर गुजरती है। इसका लगभग 87% प्रवाह क्षेत्र मध्य प्रदेश में है।
- लगभग 1,312 किलोमीटर की लंबी यात्रा तय करने के बाद यह गुजरात के भरूच जिले के पास खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में मिल जाती है। नर्मदा नदी डेल्टा के बजाय एक ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती है।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- भ्रंश घाटी प्रवाह: नर्मदा, विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक दरार घाटी में बहती है, जो इसके सीधे और गहरे मार्ग का मुख्य कारण है।
- धुआँधार जलप्रपात: जबलपुर के पास भेड़ाघाट में, नर्मदा संगमरमर की चट्टानों के बीच से बहते हुए एक शक्तिशाली झरने का निर्माण करती है जिसे ‘धुआँधार जलप्रपात’ के नाम से जाना जाता है।
- नदी द्वीप: इसके मुहाने के पास ‘अलियाबेट’ नामक एक बड़ा नदी द्वीप स्थित है।
- प्रमुख सहायक नदियाँ और बांध:
- इसकी 41 प्रमुख सहायक नदियाँ हैं, जिनमें शेर, शक्कर, दूधी, तवा, हिरन, बरना, कोलार और ओरसंग शामिल हैं।
- नर्मदा घाटी परियोजना के तहत इस पर कई महत्वपूर्ण बांध बनाए गए हैं, जिनमें मध्य प्रदेश में इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर बांध तथा गुजरात में सरदार सरोवर बांध सबसे प्रमुख हैं। ये परियोजनाएं सिंचाई, बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।
- धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व:
- हिंदू धर्म में नर्मदा को गंगा के समान ही पवित्र माना जाता है। इसके तट पर बसे ओंकारेश्वर और महेश्वर प्रमुख तीर्थस्थल हैं।
- ‘नर्मदा परिक्रमा’ एक अत्यंत पुण्यदायी तीर्थयात्रा मानी जाती है, जिसमें श्रद्धालु नदी के उद्गम से मुहाने तक और फिर वापस पैदल यात्रा करते हैं। इसे “मध्य प्रदेश की जीवन रेखा” भी कहा जाता है।
तापी (ताप्ती) नदी: नर्मदा की ‘जुड़वां’, एक प्रायद्वीपीय दरार घाटी नदी
तापी, जिसे ताप्ती के नाम से भी जाना जाता है, मध्य भारत की एक प्रमुख नदी है और प्रायद्वीपीय भारत की तीन मुख्य नदियों (नर्मदा और माही के साथ) में से एक है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। भौगोलिक रूप से, यह सतपुड़ा और अजंता पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक दरार घाटी में बहती है, और नर्मदा के समानांतर इसके दक्षिण में बहने के कारण इसे अक्सर “नर्मदा की जुड़वां” या “हैंडमेड” कहा जाता है।
भौगोलिक स्वरूप एवं प्रवाह मार्ग
- उद्गम: तापी नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में स्थित सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला की मुलताई नामक जगह से होता है। संस्कृत में ‘मुलतापी’ का अर्थ है ‘तापी का मूल’ या ‘तापी का उद्गम’।
- प्रवाह पथ: अपने उद्गम से यह नदी पश्चिम दिशा की ओर बहती है और तीन राज्यों से होकर गुजरती है:
- मध्य प्रदेश: यह अपने उद्गम स्थल बैतूल से बहना शुरू करती है।
- महाराष्ट्र: यह महाराष्ट्र के विदर्भ और खानदेश क्षेत्रों में प्रवेश करती है, जहाँ इसका बेसिन सबसे विस्तृत है। नदी की कुल लंबाई का एक बड़ा हिस्सा इसी राज्य में आता है।
- गुजरात: अंत में, यह गुजरात के सूरत शहर से होकर गुजरती है और अरब सागर में खंभात की खाड़ी में विलीन हो जाती है।
- लंबाई और बेसिन: तापी नदी की कुल लंबाई लगभग 724 किलोमीटर (450 मील) है। इसका जल निकासी बेसिन 65,145 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसका बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र (लगभग 51,504 वर्ग किमी) में, उसके बाद मध्य प्रदेश (9,804 वर्ग किमी) और गुजरात (3,837 वर्ग किमी) में है।
प्रमुख विशेषताएँ
- दरार घाटी प्रवाह: नर्मदा की तरह, तापी भी एक दरार घाटी (Rift Valley) में बहती है, जो इसके सीधे और गहरे प्रवाह पथ का मुख्य कारण है। यह उत्तर में सतपुड़ा श्रेणी और दक्षिण में अजंता और सतमाला पहाड़ियों के बीच बहती है।
- ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण: पश्चिम की ओर बहने वाली अन्य प्रायद्वीपीय नदियों के समान, तापी भी डेल्टा के बजाय एक ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती है। इसका कारण इसका तीव्र ढलान और कठोर चट्टानी भू-भाग है, जो नदी को अपने मुहाने पर तलछट फैलाने से रोकता है।
- सूरत बंदरगाह: ऐतिहासिक रूप से, तापी नदी का मुहाना और सूरत शहर एक महत्वपूर्ण बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र रहा है, विशेष रूप से मुगल काल के दौरान।
प्रमुख सहायक नदियाँ और बांध
तापी नदी प्रणाली में कई सहायक नदियाँ हैं जो इसके जलग्रहण क्षेत्र को सिंचित करती हैं।
- मुख्य सहायक नदियाँ: इसकी दाहिनी ओर से मिलने वाली प्रमुख सहायक नदी अरुणावती है। बाईं ओर से मिलने वाली प्रमुख नदियों में पूर्णा, गिरना और पंजारा शामिल हैं। पूर्णा नदी इसकी सबसे लंबी और मुख्य सहायक नदी है।
- प्रमुख बांध और परियोजनाएँ:
- हथनूर बांध: यह बांध महाराष्ट्र के जलगांव जिले में स्थित है।
- उकाई बांध: यह गुजरात के तापी जिले में स्थित है और तापी नदी पर बनी सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना है। उकाई बांध द्वारा निर्मित जलाशय को ‘वल्लभ सागर’ के नाम से जाना जाता है। यह परियोजना सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।
- काकरापार बांध: यह गुजरात में सूरत के पास स्थित है और मुख्य रूप से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराता है।
सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व
- अर्थव्यवस्था: तापी नदी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के बड़े कृषि क्षेत्रों के लिए जीवन रेखा है। इसकी नहर प्रणाली लाखों हेक्टेयर भूमि को सिंचित करती है।
- औद्योगिक आपूर्ति: नदी बेसिन में स्थित प्रमुख औद्योगिक केंद्र, विशेषकर सूरत, अपने जल की आवश्यकताओं के लिए तापी पर निर्भर हैं।
- धार्मिक महत्व: हिंदू धर्म में तापी को सूर्य की पुत्री माना जाता है और इसे पवित्र नदी का दर्जा प्राप्त है। इसके तट पर कई तीर्थस्थल स्थित हैं।
निष्कर्ष: तापी नदी न केवल एक महत्वपूर्ण भौगोलिक इकाई है, बल्कि यह मध्य भारत और पश्चिमी गुजरात के लाखों लोगों के लिए जीवन का स्रोत है। इसका दरार घाटी में प्रवाह और ज्वारनदमुख का निर्माण इसे भारत की अन्य नदियों से विशिष्ट बनाता है, जो प्रायद्वीपीय भारत की भूवैज्ञानिक जटिलता को दर्शाता है।
ii) पश्चिमी घाट से निकलने वाली छोटी नदियाँ
ये बहुत छोटी और तीव्र गति वाली तटीय नदियाँ हैं।
शतरुंजी और भद्रा नदी: एक विस्तृत विवरण
शतरुंजी और भद्रा, भारत की दो महत्वपूर्ण नदियाँ हैं, लेकिन वे देश के दो अलग-अलग क्षेत्रों में बहती हैं और उनकी अपनी विशिष्ट भौगोलिक पहचान और महत्व है। शतरुंजी जहाँ पश्चिमी भारत के गुजरात के सौराष्ट्र प्रायद्वीप की सबसे बड़ी नदी है, वहीं भद्रा नाम की दो प्रमुख नदियाँ हैं – एक दक्षिण भारत के कर्नाटक में और दूसरी गुजरात के सौराष्ट्र में।
शतरुंजी नदी: सौराष्ट्र की जीवन रेखा
शतरुंजी नदी गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र की सबसे लंबी और महत्वपूर्ण नदी प्रणाली है। यह इस शुष्क क्षेत्र के लिए जल का एक प्रमुख स्रोत है।
- उद्गम एवं प्रवाह मार्ग:
- इस नदी का उद्गम गुजरात के अमरेली जिले में गीर की पहाड़ियों में स्थित ढलकानिया नामक स्थान से होता है।
- अपने उद्गम से यह पूर्व दिशा की ओर बहती है और सौराष्ट्र के अमरेली तथा भावनगर जिलों से होकर गुजरती है।
- लगभग 172 किलोमीटर की यात्रा के बाद, यह भावनगर के पास खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में मिल जाती है।
- प्रमुख विशेषताएँ और बांध:
- यह एक मौसमी नदी है जिसमें प्रवाह मुख्य रूप से मानसून की वर्षा पर निर्भर करता है।
- इस नदी पर भावनगर जिले में शतरुंजी बांध का निर्माण किया गया है, जो सौराष्ट्र का सबसे बड़ा बांध है। यह बांध भावनगर और अमरेली जिलों के लिए सिंचाई और पेयजल आपूर्ति का मुख्य स्रोत है।
- यह नदी पालिताना शहर के पास से होकर गुजरती है, जहाँ शत्रुंजय पहाड़ियाँ स्थित हैं, जो जैन धर्म का एक विश्व प्रसिद्ध और पवित्र तीर्थस्थल है।
- आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्व:
- यह सौराष्ट्र के एक बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचित करती है, जिससे यह इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
- धार्मिक रूप से, पालिताना के पास होने के कारण इसका अत्यधिक महत्व है।
भद्रा नदी: दो अलग-अलग भौगोलिक पहचान
भारत में “भद्रा” नाम से दो महत्वपूर्ण नदियाँ जानी जाती हैं, जिनका एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है।
1. भद्रा नदी (कर्नाटक): तुंगभद्रा की एक प्रमुख धारा
यह दक्षिण भारत की एक प्रमुख नदी है और कृष्णा नदी की सहायक नदी, तुंगभद्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- उद्गम एवं प्रवाह मार्ग:
- इसका उद्गम पश्चिमी घाट में कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले में स्थित कुद्रेमुख की गंगाकुला नामक चोटी से होता है।
- यह दक्कन के पठार से होकर बहती है और शिवमोग्गा (शिमोगा) शहर के पास कूडली नामक स्थान पर तुंगा नदी में मिल जाती है। यहीं से इन दोनों नदियों की संयुक्त धारा तुंगभद्रा कहलाती है, जो आगे चलकर कृष्णा नदी में मिलती है।
- प्रमुख बांध एवं अभयारण्य:
- इस नदी पर चिकमंगलूर जिले में भद्रा बांध (लक्कवल्ली बांध) बनाया गया है। इसके द्वारा निर्मित विशाल जलाशय सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।
- इसी जलाशय के चारों ओर भद्रा वन्यजीव अभयारण्य स्थित है, जो एक प्रसिद्ध बाघ अभयारण्य (टाइगर रिजर्व) भी है।
- महत्व: यह मध्य कर्नाटक के कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो लाखों लोगों को जल और बिजली प्रदान करती है।
2. भद्रा नदी (गुजरात): सौराष्ट्र की एक और महत्वपूर्ण नदी
यह शतरुंजी के बाद सौराष्ट्र क्षेत्र की दूसरी सबसे लंबी नदी है और अरब सागर में गिरती है।
- उद्गम एवं प्रवाह मार्ग:
- इसका उद्गम गुजरात के राजकोट जिले में जसदन के पास की पहाड़ियों से होता है।
- यह राजकोट और पोरबंदर जिलों से होकर बहती है और अंत में पोरबंदर के पास नवीबंदर नामक स्थान पर अरब सागर में विलीन हो जाती है।
- प्रमुख बांध:
- इस नदी पर भादर-I और भादर-II नामक दो महत्वपूर्ण बांध बनाए गए हैं, जो राजकोट और पोरबंदर क्षेत्र में सिंचाई तथा पेयजल की जरूरतों को पूरा करते हैं।
- महत्व: यह सौराष्ट्र के उन हिस्सों में पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है जहाँ शतरुंजी का पानी नहीं पहुँचता, विशेषकर राजकोट और पोरबंदर जिलों के लिए।
तुलनात्मक सारांश
| आधार | शतरुंजी नदी | भद्रा नदी (कर्नाटक) | भद्रा नदी (गुजरात) |
| उद्गम स्थल | गीर की पहाड़ियाँ (अमरेली, गुजरात) | कुद्रेमुख, पश्चिमी घाट (कर्नाटक) | जसदन के पास की पहाड़ियाँ (राजकोट, गुजरात) |
| अंतिम गंतव्य | खंभात की खाड़ी (अरब सागर) | तुंगा नदी (आगे कृष्णा नदी प्रणाली) | अरब सागर |
| प्रमुख राज्य | गुजरात (सौराष्ट्र) | कर्नाटक | गुजरात (सौराष्ट्र) |
| महत्वपूर्ण विशेषता | सौराष्ट्र की सबसे लंबी नदी | तुंगभद्रा नदी का निर्माण करती है | सौराष्ट्र की दूसरी सबसे लंबी नदी |
| प्रमुख बांध | शतरुंजी बांध | भद्रा बांध (लक्कवल्ली) | भादर-I और भादर-II बांध |
मांडवी और जुआरी: गोवा की जुड़वां जीवन रेखाएँ
मांडवी (Mandovi) और जुआरी (Zuari) गोवा की दो सबसे महत्वपूर्ण नदियाँ हैं, जिन्हें राज्य की “जीवन रेखा” कहा जाता है। यद्यपि ये दो अलग-अलग नदी प्रणालियाँ हैं, फिर भी ये एक नहर के माध्यम से आपस में जुड़ी हुई हैं और गोवा के भूगोल, अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डालती हैं। ये दोनों मिलकर गोवा के प्रमुख बंदरगाह, मोरमुगाओ के मुहाने (Estuary) का निर्माण करती हैं।
मांडवी नदी: उत्तरी गोवा की आत्मा
मांडवी, जिसे महादयी (Mahadayi) भी कहा जाता है, गोवा की सबसे प्रसिद्ध नदी है। राज्य की राजधानी पणजी (Panjim) इसी के तट पर बसी है।
- उद्गम: मांडवी नदी का उद्गम कर्नाटक के बेलगावी (बेलगाम) जिले में पश्चिमी घाट की भीमगढ़ की पहाड़ियों से होता है।
- प्रवाह मार्ग:
- कर्नाटक से निकलकर यह नदी गोवा में प्रवेश करती है। अपने मार्ग में यह कई शानदार झरनों का निर्माण करती है, जिनमें दूधसागर जलप्रपात सबसे प्रसिद्ध है, जो भारत के सबसे ऊँचे झरनों में से एक है। यह जलप्रपात मांडवी की एक सहायक नदी पर स्थित है।
- यह उत्तरी गोवा से होकर बहती है और अंत में पणजी के पास अरब सागर में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 81 किलोमीटर है।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- राजधानी का तट: गोवा की राजधानी पणजी और ऐतिहासिक शहर पुराना गोवा (Old Goa) इसके बाएं तट पर स्थित हैं।
- नदी द्वीप: मांडवी नदी अपने मार्ग में कई द्वीपों का निर्माण करती है, जिनमें चोराव (Chorão) और दिवाड़ (Divar) प्रमुख हैं। प्रसिद्ध सलीम अली पक्षी अभयारण्य चोराव द्वीप पर ही स्थित है।
- नौगम्यता (Navigability): मांडवी नदी नौगम्य है, जिसका उपयोग लौह अयस्क के परिवहन और पर्यटन के लिए किया जाता है। प्रसिद्ध फ्लोटिंग केसिनो भी इसी नदी में स्थित हैं।
- प्रसिद्ध पुल: मांडवी पर बने तीन पुल – मांडवी ब्रिज, अटल सेतु और नया मांडवी ब्रिज – पणजी को उत्तरी गोवा से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग हैं।
- महत्व: यह उत्तरी गोवा के लिए पीने के पानी, सिंचाई और मछली पकड़ने का एक प्रमुख स्रोत है। साथ ही, इसका पर्यटन उद्योग में अत्यधिक महत्व है।
जुआरी नदी: दक्षिण गोवा की सबसे लंबी नदी
जुआरी (Zuari) गोवा की सबसे लंबी नदी है और राज्य के आर्थिक दृष्टिकोण से, विशेषकर खनिज परिवहन के लिए, अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
- उद्गम: जुआरी नदी का उद्गम भी पूरी तरह से गोवा के भीतर ही पश्चिमी घाट की हेमाड-बार्शेम पहाड़ियों में होता है।
- प्रवाह मार्ग:
- यह एक ज्वारीय नदी है, जिसका अर्थ है कि समुद्र के ज्वार का प्रभाव इसके अंदर तक महसूस होता है।
- यह दक्षिण गोवा से बहती हुई मोरमुगाओ बंदरगाह के पास अरब सागर में मिलती है। इसकी लंबाई लगभग 92 किलोमीटर है।
- प्रमुख विशेषताएँ:
- व्यापक मुहाना: जुआरी का मुहाना बहुत चौड़ा है और यह एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करता है।
- खनिज परिवहन: यह गोवा के लौह अयस्क निर्यात के लिए एक प्रमुख जलमार्ग है। अयस्क से भरी बड़ी-बड़ी नौकाएं (Barges) इसके माध्यम से मोरमुगाओ बंदरगाह तक पहुँचती हैं।
- प्रमुख शहर: वास्को डी गामा (Vasco da Gama) और मारगाओ (Margao) जैसे प्रमुख शहर इसके बेसिन में स्थित हैं।
- नया जुआरी ब्रिज: हाल ही में बना नया जुआरी ब्रिज भारत के सबसे चौड़े केबल-स्टे ब्रिज में से एक है और यह उत्तर और दक्षिण गोवा के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
मांडवी और जुआरी का संगम: एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र
हालांकि मांडवी और जुआरी सीधे तौर पर नहीं मिलतीं, लेकिन वे एक प्राकृतिक नहर, कुम्बरजुआ नहर (Cumbarjua Canal), के माध्यम से आपस में जुड़ी हुई हैं। यह नहर दोनों नदी प्रणालियों को जोड़ती है, जिससे एक एकीकृत अंतर्देशीय जलमार्ग नेटवर्क बनता है।
- संयुक्त मुहाना: इन दोनों नदियों का मुहाना मिलकर मोरमुगाओ-तिस्वाड़ी मुहाना (Mormugao-Tiswadi estuarine complex) बनाता है, जो भारत के सबसे महत्वपूर्ण मुहानों में से एक है।
- मोरमुगाओ बंदरगाह: इसी संयुक्त मुहाने पर भारत का प्रमुख प्राकृतिक बंदरगाह, मोरमुगाओ पोर्ट, स्थित है, जो इन नदियों को आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
निष्कर्ष: मांडवी और जुआरी न केवल पानी के स्रोत हैं, बल्कि वे गोवा की पहचान के अभिन्न अंग हैं। ये नदियाँ राज्य के परिवहन, व्यापार, पर्यटन और पारिस्थितिकी को आकार देती हैं और मिलकर एक जटिल एवं जीवंत जलीय प्रणाली का निर्माण करती हैं, जो गोवा के जीवन को हर पहलू में प्रभावित करती है।
कर्नाटक की पश्चिम-प्रवाही नदियाँ: काली, शरावती और नेत्रावती
कर्नाटक राज्य पश्चिमी घाट की पहाड़ियों से निकलने वाली कई तीव्र और सुन्दर पश्चिम-प्रवाही नदियों का घर है। ये नदियाँ राज्य की पारिस्थितिकी, ऊर्जा उत्पादन और तटीय क्षेत्रों की जीवन रेखा हैं। इनमें काली (या कालीनाडी), शरावती और नेत्रावती विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
काली नदी (कालीनाडी): उत्तर कन्नड़ की ऊर्जा रेखा
काली नदी, जिसे ‘कालीनाडी’ के नाम से भी जाना जाता है, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले की एक प्रमुख नदी है। यह नदी अपने काले रंग के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रचंडता और ऊर्जा उत्पादन क्षमता के लिए जानी जाती है।
उद्गम और प्रवाह मार्ग:
इसका उद्गम उत्तर कन्नड़ जिले के डिग्गी नामक गाँव के पास पश्चिमी घाट की पहाड़ियों से होता है।
वहाँ से यह लगभग 184 किलोमीटर तक पश्चिम दिशा की ओर बहती है। अपने तेज बहाव के कारण यह घने जंगलों और घाटियों से होकर गुजरती है।
अंत में, यह कारवार (Karwar) शहर के पास अरब सागर में विलीन हो जाती है, जहाँ यह एक खूबसूरत मुहाना (Estuary) बनाती है।
प्रमुख विशेषताएँ और महत्व:
जलविद्युत उत्पादन का केंद्र: काली नदी कर्नाटक के लिए बिजली उत्पादन का एक पावरहाउस है। इस नदी पर कई बांध और बिजली संयंत्र बनाए गए हैं, जिनमें सूपा बांध (Supa Dam) सबसे महत्वपूर्ण है। यह कर्नाटक के सबसे ऊँचे बांधों में से एक है। गणेशगुड़ी और कोडसल्ली बांध भी इसी नदी पर स्थित हैं। ये सभी मिलकर राज्य की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पूरा करते हैं।
पारिस्थितिक महत्व: नदी का बेसिन घने उष्णकटिबंधीय वर्षावनों से आच्छादित है, जो विविध वनस्पतियों और जीवों का घर है। यह क्षेत्र दांदेली-अंशी टाइगर रिजर्व का भी हिस्सा है।
सांस्कृतिक महत्व: इसके तट पर ‘सदाशिवगढ़ किला’ स्थित है, जो एक ऐतिहासिक धरोहर है।
चुनौतियाँ: अवैध रेत खनन और प्रदूषण इस नदी के लिए एक गंभीर खतरा बना हुआ है।
शरावती (Sharavati): जोग प्रपात की जननी
शरावती नदी विश्व प्रसिद्ध जोग जलप्रपात (Jog Falls) के निर्माण के लिए जानी जाती है, जो भारत के सबसे ऊँचे और शानदार झरनों में से एक है। यह नदी भी पूरी तरह से कर्नाटक राज्य के भीतर ही बहती है।
उद्गम और प्रवाह मार्ग:
शरावती नदी का उद्गम शिवमोग्गा (शिमोगा) जिले के तीर्थहल्ली तालुक में अंबुतीर्थ नामक स्थान से होता है।
यह लगभग 128 किलोमीटर की दूरी तक पश्चिम दिशा में बहती है।
यह होन्नावर (Honnavar) शहर के पास अरब सागर में मिल जाती है, जहाँ यह एक विस्तृत और सुरम्य मुहाना बनाती है।
प्रमुख विशेषताएँ और महत्व:
जोग जलप्रपात: अपने मार्ग में, गेरुसोप्पा के पास, शरावती नदी 253 मीटर (830 फीट) की ऊँचाई से गिरकर जोग जलप्रपात का निर्माण करती है। यह चार अलग-अलग धाराओं – राजा, रानी, रोवर और रॉकेट – में गिरती है, जो एक अविस्मरणीय दृश्य प्रस्तुत करता है।
लिंगनमक्की बांध: जोग प्रपात से कुछ किलोमीटर पहले, इस नदी पर लिंगनमक्की बांध बनाया गया है। यह कर्नाटक की एक प्रमुख जलविद्युत परियोजना है और इसका जलाशय राज्य के सबसे बड़े जलाशयों में से एक है।
नदी द्वीप: इसके मुहाने के पास कई छोटे द्वीप हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘मावनी’ कहा जाता है।
आर्थिक महत्व: पर्यटन (जोग जलप्रपात) और जलविद्युत उत्पादन इस नदी के आर्थिक महत्व के दो मुख्य स्तंभ हैं।
नेत्रावती नदी: दक्षिण कन्नड़ की पवित्र जीवन धारा
नेत्रावती नदी दक्षिण कन्नड़ (तटीय कर्नाटक) क्षेत्र की एक प्रमुख और पवित्र नदी है। यह अपने साफ पानी और धार्मिक महत्व के लिए जानी जाती है।
उद्गम और प्रवाह मार्ग:
इसका उद्गम पश्चिमी घाट में चिकमंगलूर जिले की येल्लानाइरु घाट की बंगराबालिके घाटी से होता है, जो कुद्रेमुख का हिस्सा है।
यह पश्चिम की ओर बहते हुए दक्षिण कन्नड़ जिले में प्रवेश करती है और प्रसिद्ध तीर्थस्थल धर्मस्थल के पास से गुजरती है।
उप्पिनंगडी नामक स्थान पर, यह अपनी प्रमुख सहायक नदी, कुमारधारा, से मिलती है, जो कुक्के सुब्रमण्या से होकर आती है।
अंत में, यह मंगलुरु (Mangalore) शहर के पास अरब सागर में विलीन हो जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ और महत्व:
धार्मिक पवित्रता: नेत्रावती नदी को दक्षिण कन्नड़ के लोग অত্যন্ত পবিত্র मानते हैं। प्रसिद्ध मंजुनाथ स्वामी मंदिर (धर्मस्थल) इसी नदी के तट पर स्थित है, और श्रद्धालु स्नान के लिए इसके जल का उपयोग करते हैं।
मंगलुरु की जीवन रेखा: यह नदी मंगलुरु शहर और आसपास के क्षेत्रों के लिए पीने के पानी का मुख्य स्रोत है।
पारिस्थितिक संवेदनशीलता: इसका उद्गम स्थल पश्चिमी घाट का एक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र है। येथिनाहोल परियोजना (नेत्रावती नदी मोड़ परियोजना) को लेकर पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के बीच गंभीर चिंताएँ और विरोध है, क्योंकि इससे नदी के प्रवाह और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
निष्कर्ष: काली, शरावती और नेत्रावती, ये तीनों नदियाँ कर्नाटक के तटीय क्षेत्र के लिए अमूल्य हैं। वे न केवल बिजली, पानी और आजीविका प्रदान करती हैं, बल्कि इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक पहचान को भी समृद्ध करती हैं। इन नदियों का संरक्षण सतत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
केरल की जीवनधाराएँ: भरतपुझा, पेरियार और पम्बा
“ईश्वर का अपना देश” (God’s Own Country) कहे जाने वाले केरल की सुंदरता और समृद्धि में उसकी नदियों का अमूल्य योगदान है। पश्चिमी घाट से निकलकर अरब सागर की ओर बहने वाली ये नदियाँ राज्य के लिए जल, ऊर्जा और सांस्कृतिक पहचान का स्रोत हैं। इनमें भरतपुझा, पेरियार और पम्बा सबसे प्रमुख हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी एक विशिष्ट पहचान है।
भरतपुझा (Bharathapuzha): केरल की सांस्कृतिक नदी
भरतपुझा, जिसे “नीला” के नाम से भी जाना जाता है, पेरियार के बाद केरल की दूसरी सबसे लंबी नदी है। लेकिन लंबाई से कहीं अधिक, इसका महत्व केरल की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत से जुड़ा है, जिस कारण इसे राज्य की सांस्कृतिक जीवन रेखा कहा जाता है।
- उद्गम और प्रवाह मार्ग:
- इस नदी का उद्गम तमिलनाडु में अन्नामलाई पहाड़ियों से होता है। यह पलक्कड़ दर्रे (Palakkad Gap) के माध्यम से केरल में प्रवेश करती है, जो पश्चिमी घाट का एक महत्वपूर्ण दर्रा है।
- यह केरल के पलक्कड़, त्रिशूर और मलप्पुरम जिलों से होकर बहती है और अंत में पोन्नानी (Ponnani) के पास अरब सागर में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 209 किलोमीटर है।
- प्रमुख विशेषताएँ और सांस्कृतिक महत्व:
- सांस्कृतिक आत्मा: भरतपुझा का तट मलयालम भाषा और साहित्य का पालना रहा है। मलयालम भाषा के पिता कहे जाने वाले थुंचत्थु रामानुजन एझुथச்சन का जन्म इसी नदी के किनारे हुआ था।
- कला का केंद्र: विश्व प्रसिद्ध केरल कलामंडलम, जो कथकली, मोहिनीअट्टम और अन्य पारंपरिक कलाओं का प्रमुख संस्थान है, इसके तट पर स्थित है।
- धार्मिक स्थल: इसके तट पर कई प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं, जिनमें थिरुनावया का नव मुकुंद मंदिर प्रमुख है, जो ऐतिहासिक मामांकम उत्सव के लिए प्रसिद्ध था।
- चुनौतियाँ: दुर्भाग्य से, अवैध रेत खनन, वनों की कटाई और प्रदूषण के कारण यह नदी आज गंभीर पारिस्थितिक संकट का सामना कर रही है, और मानसून के बाद अक्सर सूख जाती है।
पेरियार (Periyar): केरल की जीवन रेखा
पेरियार, 244 किलोमीटर की लंबाई के साथ, केरल की सबसे लंबी और सबसे अधिक जल-प्रवाह वाली नदी है। यह नदी केरल के एक बड़े हिस्से के लिए पीने के पानी, सिंचाई और बिजली का मुख्य स्रोत है, जिसके कारण इसे “केरल की जीवन रेखा” (Lifeline of Kerala) कहा जाता है।
- उद्गम और प्रवाह मार्ग:
- पेरियार का उद्गम पश्चिमी घाट में तमिलनाडु की सीमा पर स्थित शिवगिरि पहाड़ियों से होता है।
- यह प्रसिद्ध पेरियार राष्ट्रीय उद्यान (Periyar National Park and Tiger Reserve) से होकर बहती है, जो इसके जलग्रहण क्षेत्र की रक्षा करता है।
- यह इडुक्की और एर्नाकुलम जिलों से होकर बहती है और अलुवा के पास दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है। अंत में, यह अरब सागर और वेम्बनाड झील दोनों में मिलती है।
- प्रमुख विशेषताएँ और आर्थिक महत्व:
- जलविद्युत का पावरहाउस: पेरियार पर बने बांध केरल की बिजली की अधिकांश जरूरतों को पूरा करते हैं। इडुक्की बांध, जो भारत का सबसे बड़ा आर्च डैम (चाप बांध) है, इसी नदी पर स्थित है। इसके अलावा मुल्लापेरियार बांध भी इसी नदी प्रणाली का हिस्सा है, जो केरल और तमिलनाडु के बीच एक संवेदनशील मुद्दा है।
- औद्योगिक और पेयजल आपूर्ति: यह कोच्चि शहर और उसके आसपास के बड़े औद्योगिक क्षेत्र (जैसे अलुवा) के लिए पीने के पानी और औद्योगिक उपयोग के लिए पानी का मुख्य स्रोत है।
- पारिस्थितिक महत्व: पेरियार टाइगर रिजर्व इसके पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पम्बा (Pamba): दक्षिण की गंगा और सबरीमाला की पुण्य नदी
पम्बा केरल की तीसरी सबसे लंबी नदी है और इसका महत्व मुख्य रूप से धार्मिक है। यह विश्व प्रसिद्ध सबरीमाला अयप्पा मंदिर के कारण लाखों श्रद्धालुओं के लिए गंगा के समान पवित्र मानी जाती है, जिस कारण इसे ‘दक्षिण गंगा’ भी कहा जाता है।
- उद्गम और प्रवाह मार्ग:
- पम्बा नदी का उद्गम पश्चिमी घाट की पुलाचिमालई पहाड़ियों से होता है।
- यह पत्तनमतिट्टा और अलप्पुझा जिलों से होकर बहती है और कुट्टनाड के प्रसिद्ध बैकवॉटर्स से गुजरती है।
- अन्य नदियों के विपरीत, यह सीधे समुद्र में नहीं मिलती, बल्कि केरल की सबसे बड़ी झील, वेम्बनाड झील (Vembanad Lake) में विलीन हो जाती है।
- प्रमुख विशेषताएँ और महत्व:
- सबरीमाला तीर्थयात्रा: सबरीमाला मंदिर जाने वाले करोड़ों श्रद्धालु इस नदी में डुबकी लगाना एक पवित्र अनुष्ठान मानते हैं। यह नदी इस तीर्थयात्रा का एक अभिन्न अंग है।
- अरनमुला नौका दौड़: विश्व प्रसिद्ध अरनमुला उथ्रट्टथी वल्लम काली (सर्प नौका दौड़) पम्बा नदी पर ही आयोजित की जाती है, जो एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव है।
- कुट्टनाड की समृद्धि: यह नदी कुट्टनाड क्षेत्र के लिए पानी का एक प्रमुख स्रोत है, जो ‘केरल का चावल का कटोरा’ कहलाता है और अपनी अनूठी ‘समुद्र तल से नीचे’ की खेती के लिए जाना जाता है।
निष्कर्ष: केरल की ये तीन नदियाँ सिर्फ जलधाराएँ नहीं हैं, बल्कि वे राज्य की पहचान को परिभाषित करती हैं। भरतपुझा केरल को उसकी सांस्कृतिक जड़ें देती है, पेरियार उसकी आर्थिक नब्ज है, और पम्बा उसकी आध्यात्मिक आत्मा का प्रतीक है।
हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियाँ: एक तुलनात्मक विश्लेषण
भारत की नदी प्रणालियों को मोटे तौर पर उनकी उत्पत्ति के आधार पर दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया जा सकता है: हिमालय से निकलने वाली नदियाँ और प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियाँ। इन दोनों नदी प्रणालियों की अपनी विशिष्ट विशेषताएँ हैं, जो उनके उद्गम, प्रवाह क्षेत्र और भूवैज्ञानिक संरचना से निर्धारित होती हैं।
तुलनात्मक तालिका
| तुलना का आधार | हिमालयी नदियाँ | प्रायद्वीपीय नदियाँ |
| 1. उद्गम स्रोत | इनका उद्गम हिमालय की ऊँची, बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं और ग्लेशियरों (हिमनदों) से होता है। | इनका उद्गम प्रायद्वीपीय पठार और मध्य भारत की उच्चभूमि से होता है। यहाँ कोई ग्लेशियर नहीं हैं। |
| 2. जल का स्रोत एवं प्रवाह | ये बारहमासी (Perennial) होती हैं क्योंकि इन्हें वर्षा और पिघलने वाले ग्लेशियर, दोनों से जल प्राप्त होता है। | ये मौसमी (Seasonal) होती हैं क्योंकि ये पूरी तरह से मानसूनी वर्षा पर निर्भर हैं। गर्मी के मौसम में इनका जल स्तर बहुत कम हो जाता है या कुछ छोटी नदियाँ सूख भी जाती हैं। |
| 3. नदी की आयु एवं अवस्था | ये भूवैज्ञानिक रूप से युवा (Young) नदियाँ हैं और अभी भी अपनी युवावस्था में बहती हैं, जिससे ये घाटियों को गहरा कर रही हैं। | ये भूवैज्ञानिक रूप से पुरानी (Old) नदियाँ हैं और अपनी प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था में पहुँच चुकी हैं। इनकी घाटियाँ चौड़ी और उथली हो चुकी हैं। |
| 4. अपवाह बेसिन (Basin) | इनके अपवाह बेसिन बहुत बड़े और विस्तृत होते हैं। (उदाहरण- गंगा, सिंधु का मैदान) | इनके अपवाह बेसिन अपेक्षाकृत छोटे होते हैं। |
| 5. मार्ग की लंबाई | ये नदियाँ बहुत लंबी होती हैं और मैदानी इलाकों में लंबा, घुमावदार मार्ग (Meanders) बनाती हैं। | इनकी लंबाई हिमालयी नदियों की तुलना में काफी कम होती है और इनका मार्ग अपेक्षाकृत सीधा होता है। |
| 6. घाटी का स्वरूप | पर्वतीय क्षेत्रों में ये ‘V’ आकार की गहरी घाटियों और गॉर्ज (Gorges) का निर्माण करती हैं। | ये चौड़ी और उथली ‘U’ आकार की घाटियों में बहती हैं क्योंकि ये कठोर चट्टानी सतह पर बहती हैं और इनकी अपारदन शक्ति कम होती है। |
| 7. अपारदन (Erosion) क्षमता | इनकी अपारदन क्षमता बहुत अधिक होती है और ये अपने साथ भारी मात्रा में गाद (Silt) और अवसाद बहाकर लाती हैं। | इनकी अपारदन क्षमता बहुत कम होती है क्योंकि इनका वेग कम और सतह कठोर होती है। ये कम अवसाद लेकर चलती हैं। |
| 8. डेल्टा/मुहाना निर्माण | ये अपने मुहाने पर विश्व के सबसे बड़े और उपजाऊ डेल्टाओं का निर्माण करती हैं। (जैसे- गंगा-ब्रह्मपुत्र का सुंदरवन डेल्टा) | अधिकांश पूर्व-प्रवाही नदियाँ (गोदावरी, कृष्णा) डेल्टा बनाती हैं, लेकिन पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (नर्मदा, तापी) ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं। |
| 9. उपयोगिता | ये सिंचाई, पेयजल और नौकायन (Navigation) के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं (विशेषकर मैदानी भागों में)। | ये जलविद्युत उत्पादन और सिंचाई के लिए उपयोगी हैं, लेकिन इनका मार्ग पथरीला और जल प्रवाह मौसमी होने के कारण ये नौकायन के लिए उपयुक्त नहीं हैं। |
| 10. प्रमुख उदाहरण | गंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, घाघरा। | गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, तापी, महानदी। |
निष्कर्ष:
संक्षेप में, हिमालयी नदियाँ युवा, बारहमासी और विशाल मैदानों का निर्माण करने वाली हैं, जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ पुरानी, मौसमी और कठोर पठारी भू-भाग पर बहने वाली हैं। यह अंतर भारत की भौगोलिक विविधता और जलवायु को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
भारत की प्रमुख झीलें: राज्यवार सूची
भारत विविध प्रकार की झीलों का देश है, जिनमें मीठे पानी की झीलों से लेकर खारे पानी की झीलें, प्राकृतिक झीलों से लेकर मानव निर्मित जलाशय, और ऊँचाई पर स्थित हिमनद झीलों से लेकर तटीय लैगून तक शामिल हैं। नीचे राज्य और केंद्र-शासित प्रदेशों के अनुसार प्रमुख झीलों का वर्गीकरण दिया गया है।
| राज्य / केंद्र-शासित प्रदेश | झील का नाम | प्रकार / महत्वपूर्ण तथ्य |
| जम्मू और कश्मीर | वुलर झील | भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील; एक रामसर स्थल। |
| डल झील | ‘श्रीनगर का गहना’ कहा जाता है; हाउसबोट (शिकारा) के लिए प्रसिद्ध। | |
| शेषनाग, अनंतनाग, मानसबल | उच्च ऊँचाई पर स्थित हिमनद (Glacial) झीलें। | |
| लद्दाख | पैंगोंग त्सो | दुनिया की सबसे ऊँची खारे पानी की झीलों में से एक; भारत और चीन में फैली है। |
| त्सो मोरीरी | भारत में एक रामसर स्थल; उच्च ऊँचाई पर स्थित खारे पानी की झील। | |
| हिमाचल प्रदेश | महाराणा प्रताप सागर (पोंग झील) | मानव निर्मित जलाशय; एक प्रसिद्ध पक्षी अभयारण्य और रामसर स्थल। |
| चंद्रताल एवं सूरज ताल | उच्च ऊँचाई पर स्थित मीठे पानी की झीलें; “चंद्रमा की झील” और “सूर्य की झील”। | |
| रेणुका झील | हिमाचल की सबसे बड़ी प्राकृतिक झील। | |
| उत्तराखंड | नैनीताल, भीमताल, सातताल | कुमाऊँ क्षेत्र की प्रमुख पर्यटक झीलें। |
| रूपकुंड झील | ‘रहस्यमयी झील’ या ‘कंकाल झील’ के रूप में प्रसिद्ध। | |
| चंडीगढ़ | सुखना झील | शिवालिक की तलहटी में स्थित एक सुंदर मानव निर्मित झील। |
| राजस्थान | सांभर झील | भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय (Inland) खारे पानी की झील; नमक उत्पादन का प्रमुख केंद्र; रामसर स्थल। |
| पिछोला झील, फतेह सागर झील | उदयपुर (‘झीलों का शहर’) की प्रसिद्ध मानव निर्मित झीलें। | |
| पुष्कर झील | हिंदुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल। | |
| नक्की झील | माउंट आबू में स्थित एक सुंदर पर्यटन झील। | |
| ओडिशा | चिल्का झील | भारत की सबसे बड़ी तटीय लैगून (खारे पानी की झील); प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग; भारत का पहला रामसर स्थल। |
| मणिपुर | लोकटक झील | पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील; तैरते हुए द्वीपों (‘फुम्डी’) के लिए प्रसिद्ध; दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ नेशनल पार्क (कीबुल लामजाओ) यहीं है। |
| सिक्किम | गुरुडोंगमार झील | भारत की सबसे ऊँची झीलों में से एक; बौद्धों और सिखों के लिए पवित्र स्थल। |
| त्सोम्गो झील (चांगु झील) | ग्लेशियर से निर्मित झील; एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल। | |
| महाराष्ट्र | लोनार झील | उल्कापिंड के प्रभाव से निर्मित एक खारे पानी की क्रेटर झील। |
| शिवसागर झील (कोयना) | कोयना बांध द्वारा निर्मित एक विशाल जलाशय। | |
| पोवई झील | मुंबई में स्थित एक कृत्रिम झील। | |
| केरल | वेम्बनाड झील | भारत की सबसे लंबी और केरल की सबसे बड़ी झील; नेहरू ट्रॉफी नौका दौड़ यहीं होती है; एक रामसर स्थल। |
| अष्टमुडी झील | “आठ भुजाओं वाली” झील; एक प्रसिद्ध लैगून और रामसर स्थल। | |
| सस्थामकोट्टा झील | केरल की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील। | |
| आंध्र प्रदेश | कोल्लेरू झील | कृष्णा और गोदावरी डेल्टा के बीच स्थित मीठे पानी की विशाल झील; एक रामसर स्थल। |
| पुलिकट झील | भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील (आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की सीमा पर); श्रीहरिकोटा द्वीप इसे समुद्र से अलग करता है। | |
| तेलंगाना | हुसैन सागर | हैदराबाद और सिकंदराबाद को जोड़ने वाली हृदय के आकार की झील; बीच में बुद्ध की विशाल प्रतिमा है। |
| उस्मान सागर, हिमायत सागर | हैदराबाद के लिए पेयजल आपूर्ति करने वाले कृत्रिम जलाशय। | |
| कर्नाटक | उल्सूर झील | बेंगलुरु शहर में स्थित। |
| पम्पा सरोवर | हम्पी के पास स्थित एक ऐतिहासिक और पवित्र झील। | |
| तमिलनाडु | कोड़ाईकनाल झील, ऊटी झील | मानव निर्मित तारे के आकार की झीलें जो प्रसिद्ध हिल स्टेशनों पर स्थित हैं। |
| चेम्बरमबक्कम झील | चेन्नई शहर के लिए पानी का एक प्रमुख स्रोत। | |
| मध्य प्रदेश | भोजताल (बड़ा तालाब) | भोपाल में स्थित भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक; एक रामसर स्थल। |
| गुजरात | नल सरोवर | एक विशाल उथली झील; एक प्रसिद्ध पक्षी अभयारण्य और रामसर स्थल। |
| कांकरिया झील | अहमदाबाद में स्थित एक मानव निर्मित झील। |
निष्कर्ष: पश्चिम-प्रवाही नदियाँ अपनी तीव्र गति, ज्वारनदमुख निर्माण और भ्रंश घाटियों में प्रवाह के लिए विशिष्ट हैं, जो उन्हें पूर्व की ओर बहने वाली डेल्टा-निर्माता नदियों से बिल्कुल अलग बनाती हैं।
भारतीय नदी एवं झीलें: परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
यहाँ भारतीय नदियों और झीलों से जुड़े वे प्रमुख तथ्य दिए गए हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं:
I. भारत की नदी प्रणालियाँ (River Systems of India)
हिमालयी नदियाँ (Himalayan Rivers)
- गंगा नदी: भारत की सबसे लंबी नदी (2525 किमी)। इसका उद्गम गंगोत्री हिमनद के गोमुख से भागीरथी के रूप में होता है। देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम के बाद यह गंगा कहलाती है।
- ब्रह्मपुत्र नदी: तिब्बत के चेमायुंगडुंग ग्लेशियर से निकलती है। इसके विभिन्न नाम हैं:
- तिब्बत में – सांगपो (Tsangpo)
- अरुणाचल प्रदेश में – दिहांग (Dihang)
- असम में – ब्रह्मपुत्र
- बांग्लादेश में – जमुना
- माजुली द्वीप: ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप (असम में)।
- सुंदरवन डेल्टा: गंगा और ब्रह्मपुत्र द्वारा निर्मित विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा।
- सिंधु नदी (Indus): तिब्बत में मानसरोवर झील के पास से निकलती है। भारत में यह केवल लद्दाख से बहती है।
प्रायद्वीपीय नदियाँ (Peninsular Rivers)
- गोदावरी नदी: प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी (1465 किमी)। इसे ‘वृद्ध गंगा’ या ‘दक्षिण गंगा’ भी कहा जाता है। इसका उद्गम त्र्यंबकेश्वर (नासिक) से होता है।
- कावेरी नदी: इसे ‘दक्षिण भारत की गंगा’ कहा जाता है। यह अपनी पवित्रता के लिए प्रसिद्ध है। यह दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व, दोनों मानसूनों से जल प्राप्त करती है, इसलिए इसमें वर्ष भर जल प्रवाह बना रहता है।
- नर्मदा और तापी: ये दो प्रमुख नदियाँ हैं जो पूर्व से पश्चिम की ओर भ्रंश घाटियों (Rift Valleys) में बहती हैं और डेल्टा के बजाय ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं। नर्मदा अमरकंटक पठार से निकलती है।
- धुआँधार जलप्रपात: नर्मदा नदी पर जबलपुर (मध्य प्रदेश) के पास स्थित प्रसिद्ध झरना।
- माही नदी: कर्क रेखा (Tropic of Cancer) को दो बार पार करने वाली भारत की एकमात्र नदी।
- लूनी नदी: एकमात्र प्रमुख नदी जो अंतर्देशीय अपवाह वाली है। यह कच्छ के रण में विलीन हो जाती है और इसका पानी बालोतरा के बाद खारा हो जाता है।
- महानदी: इस पर हीराकुंड बांध स्थित है, जो भारत का सबसे लंबा मुख्यधारा बांध है।
II. भारत की प्रमुख झीलें (Major Lakes of India)
प्राकृतिक विशेषता के आधार पर:
- वुलर झील (जम्मू-कश्मीर): भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी (Freshwater) की झील।
- चिल्का झील (ओडिशा): भारत की सबसे बड़ी तटीय लैगून (Lagoon) एवं खारे पानी (Saline Water) की झील। यह भारत का पहला रामसर स्थल भी है।
- सांभर झील (राजस्थान): भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय (Inland) खारे पानी की झील।
- लोकटक झील (मणिपुर): पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील। विश्व का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान ‘कीबुल लामजाओ’ इसी झील पर स्थित है।
- लोनार झील (महाराष्ट्र): एक उल्कापिंड (Meteorite) के पृथ्वी से टकराने से बनी क्रेटर झील। इसका पानी गुलाबी रंग का हो जाता है।
- वेम्बनाड झील (केरल): भारत की सबसे लंबी झील। प्रसिद्ध नेहरू ट्रॉफी नौका दौड़ यहीं होती है।
- पैंगोंग त्सो (लद्दाख): विश्व की सबसे ऊँचाई पर स्थित खारे पानी की झीलों में से एक।
- गुरुडोंगमार झील (सिक्किम): भारत की सबसे ऊँची झीलों में से एक।
मानव निर्मित विशेषता:
- गोविंद बल्लभ पंत सागर: रिहंद नदी (उत्तर प्रदेश) पर स्थित भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम (Artificial) झील।
- हुसैन सागर (तेलंगाना): हैदराबाद और सिकंदराबाद के बीच स्थित हृदय के आकार की झील।
- पिछोला झील (राजस्थान): उदयपुर (“झीलों का शहर”) में स्थित एक प्रसिद्ध कृत्रिम झील।
भारत के प्रमुख जलप्रपात (Waterfalls of India): एक विस्तृत अवलोकन
भारत अपनी भौगोलिक विविधता के लिए जाना जाता है, जिसमें विशाल पर्वत, पठार और नदियाँ शामिल हैं। इन्हीं नदियों द्वारा निर्मित जलप्रपात न केवल प्राकृतिक सौंदर्य के अद्भुत केंद्र हैं, बल्कि पर्यटन और जलविद्युत उत्पादन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं।
भारत के सबसे ऊँचे जलप्रपात पर महत्वपूर्ण नोट
पहले जोग जलप्रपात (Jog Falls) को भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात माना जाता था। लेकिन, यह एक सीधे गिरने वाला (Plunge) झरना नहीं है, बल्कि कई हिस्सों में गिरता है। आधिकारिक तौर पर, भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात कुंचिकल जलप्रपात (Kunchikal Falls) है, जो एक बहु-स्तरीय (Tiered) झरना है।
- सबसे ऊँचा जलप्रपात (Tiered): कुंचिकल जलप्रपात (लगभग 455 मीटर)
- सबसे ऊँचा सीधा गिरने वाला (Plunge) जलप्रपात: नोहकलिकाई जलप्रपात (लगभग 340 मीटर)
कुछ प्रमुख जलप्रपातों का विस्तृत विवरण
- कुंचिकल जलप्रपात (Kunchikal Falls)
- नदी: वाराही नदी
- राज्य: कर्नाटक (शिमोगा जिला)
- तथ्य: यह भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात है। यह एक बहु-स्तरीय झरना है जो चट्टानों से कैस्केड के रूप में नीचे गिरता है। यहाँ एक जलविद्युत परियोजना होने के कारण इसका प्रवाह नियंत्रित रहता है।
- जोग या गरसोप्पा जलप्रपात (Jog or Gersoppa Falls)
- नदी: शरावती नदी
- राज्य: कर्नाटक (शिमोगा जिला)
- तथ्य: यह भारत का दूसरा सबसे ऊँचा (सीधे गिरने वाला) और सबसे प्रसिद्ध जलप्रपातों में से एक है। यह चार अलग-अलग धाराओं में बँटकर गिरता है, जिनके नाम हैं – राजा, रानी, रोवर और रॉकेट।
- दूधसागर जलप्रपात (Dudhsagar Falls)
- नदी: मांडवी नदी
- राज्य: गोवा (गोवा और कर्नाटक की सीमा पर)
- तथ्य: इसका नाम “दूध का सागर” है क्योंकि इसका गिरता हुआ पानी दूध की तरह सफेद दिखाई देता है। यह एक बहु-स्तरीय झरना है जिसके सामने से मडगांव-बेलगावी रेल लाइन गुजरती है, जो एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है।
- शिवसमुद्रम जलप्रपात (Shivasamudram Falls)
- नदी: कावेरी नदी
- राज्य: कर्नाटक (मांड्या जिला)
- तथ्य: यह एक द्वीप शहर पर स्थित है, जहाँ कावेरी नदी दो शाखाओं में बँटकर दो झरने – गगनचुक्की और बाराचुक्की – बनाती है। एशिया का पहला जलविद्युत गृह (1902) यहीं स्थापित किया गया था।
- चित्रकूट जलप्रपात (Chitrakoot Falls)
- नदी: इंद्रावती नदी
- राज्य: छत्तीसगढ़ (बस्तर जिला)
- तथ्य: अपने घोड़े की नाल जैसे चौड़े मुख के कारण इसे “भारत का नियाग्रा फॉल्स” कहा जाता है। मानसून के दौरान यह भारत का सबसे चौड़ा जलप्रपात होता है।
- धुआँधार जलप्रपात (Dhuandhar Falls)
- नदी: नर्मदा नदी
- राज्य: मध्य प्रदेश (जबलपुर, भेड़ाघाट)
- तथ्य: यह झरना संगमरमर की चट्टानों के बीच से बहती नर्मदा नदी पर स्थित है। पानी के गिरने से उठने वाला धुंध जैसा दृश्य इसके “धुआँधार” नाम का कारण है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण जलप्रपातों की सारणी
| जलप्रपात का नाम | नदी | राज्य | ऊंचाई (लगभग) | महत्वपूर्ण तथ्य |
| कुंचिकल जलप्रपात | वाराही | कर्नाटक | 455 मीटर | भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात (Tiered)। |
| बरेहीपानी जलप्रपात | बुधबलंगा | ओडिशा | 399 मीटर | सिमलिपाल राष्ट्रीय उद्यान के भीतर स्थित है। |
| नोहकलिकाई जलप्रपात | (वर्षा पर निर्भर) | मेघालय | 340 मीटर | भारत का सबसे ऊँचा सीधा गिरने (Plunge) वाला जलप्रपात। |
| दूधसागर जलप्रपात | मांडवी | गोवा | 310 मीटर | “दूध का सागर”; रेलवे ट्रैक इसके सामने से गुजरता है। |
| जोग/गरसोप्पा जलप्रपात | शरावती | कर्नाटक | 253 मीटर | चार धाराओं (राजा, रानी, रोवर, रॉकेट) से मिलकर बना है। |
| शिवसमुद्रम जलप्रपात | कावेरी | कर्नाटक | 98 मीटर | एशिया की पहली जलविद्युत परियोजना; गगनचुक्की और बाराचुक्की। |
| हुंडरू जलप्रपात | सुवर्णरेखा | झारखंड | 98 मीटर | रांची के पास स्थित एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल। |
| चित्रकूट जलप्रपात | इंद्रावती | छत्तीसगढ़ | 29 मीटर | “भारत का नियाग्रा फॉल्स”; भारत का सबसे चौड़ा। |
| धुआँधार जलप्रपात | नर्मदा | मध्य प्रदेश | 30 मीटर | भेड़ाघाट में संगमरमर की चट्टानों पर स्थित। |
| होगेनक्कल जलप्रपात | कावेरी | तमिलनाडु | 20 मीटर | “दक्षिण भारत का नियाग्रा” भी कहा जाता है; औषधीय स्नान के लिए प्रसिद्ध। |
| कपिलधारा जलप्रपात | नर्मदा | मध्य प्रदेश | 30 मीटर | नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक के पास स्थित है। |
| चूलिया जलप्रपात | चंबल | राजस्थान | 18 मीटर | कोटा के पास भैंसरोड़गढ़ में स्थित। |
| गोकक जलप्रपात | घाटप्रभा | कर्नाटक | 52 मीटर | बेलगावी के पास स्थित; आकार में नियाग्रा जैसा दिखता है। |
उत्तर भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ
उत्तर भारत, जिसमें हिमालय से निकलने वाली सदानीरा नदियाँ बहती हैं, भारत की कुछ सबसे महत्वपूर्ण और विशाल बहुउद्देशीय परियोजनाओं का केंद्र है। इन परियोजनाओं ने देश के विकास में, विशेषकर सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण और पेयजल आपूर्ति के क्षेत्र में, महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
“बहुउद्देशीय परियोजना” का अर्थ एक ऐसी नदी घाटी परियोजना से है जिसके एक साथ कई उद्देश्य होते हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू, ने इन परियोजनाओं को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था।
उत्तर भारत की प्रमुख परियोजनाओं का विस्तृत विवरण
यहाँ उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में स्थित प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाओं का विवरण दिया गया है:
1. भाखड़ा-नांगल परियोजना (Bhakra-Nangal Project)
- नदी: सतलुज नदी
- लाभान्वित राज्य: पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश (संयुक्त उद्यम)।
- प्रमुख बांध:
- भाखड़ा बांध (हिमाचल प्रदेश): यह एक कंक्रीट ग्रेविटी बांध है और भारत के सबसे ऊँचे बांधों में से एक है। इसके द्वारा निर्मित जलाशय को ‘गोबिंद सागर झील’ कहा जाता है।
- नांगल बांध (पंजाब): यह भाखड़ा बांध से नीचे की ओर स्थित है और भाखड़ा से छोड़े गए पानी के प्रवाह को नियंत्रित करता है।
- उद्देश्य: यह भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना है। इसका मुख्य उद्देश्य सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण है।
2. टिहरी बांध परियोजना (Tehri Dam Project)
- नदी: भागीरथी नदी (और भिलंगना नदी के संगम पर)।
- राज्य: उत्तराखंड।
- तथ्य: यह भारत का सबसे ऊँचा बांध (260.5 मीटर) और दुनिया के सबसे ऊँचे बांधों में से एक है। यह एक चट्टान और मिट्टी से भरा तटबंध बांध (Earth and Rock-fill Dam) है।
- उद्देश्य: जलविद्युत उत्पादन, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति (विशेषकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश को), और बाढ़ नियंत्रण।
3. दामोदर घाटी परियोजना (Damodar Valley Corporation – DVC)
- नदी: दामोदर नदी (जिसे पहले ‘बंगाल का शोक’ कहा जाता था)।
- लाभान्वित राज्य: झारखंड और पश्चिम बंगाल।
- तथ्य: यह स्वतंत्र भारत की पहली बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसे अमेरिका की ‘टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA)’ के मॉडल पर बनाया गया था। इसके तहत तिलैया, कोनार, मैथन और पंचेत जैसे कई बांधों का निर्माण किया गया है।
- उद्देश्य: बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन, औद्योगिक विकास और मत्स्य पालन।
4. रिहंद बांध परियोजना (Rihand Dam Project)
- नदी: रिहंद नदी (सोन नदी की सहायक नदी)।
- राज्य: उत्तर प्रदेश (सोनभद्र जिला)।
- तथ्य: इस बांध के जलाशय का नाम ‘गोबिंद बल्लभ पंत सागर’ है, जो भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील है।
- उद्देश्य: जलविद्युत उत्पादन (विशेषकर आसपास के एल्युमिनियम और सीमेंट उद्योगों के लिए), सिंचाई और मत्स्य पालन।
5. चंबल घाटी परियोजना (Chambal Valley Project)
- नदी: चंबल नदी।
- लाभान्वित राज्य: मध्य प्रदेश और राजस्थान (संयुक्त परियोजना)।
- प्रमुख बांध:
- गांधी सागर बांध (मध्य प्रदेश)
- राणा प्रताप सागर बांध (राजस्थान)
- जवाहर सागर बांध (राजस्थान)
- कोटा बैराज (राजस्थान) – मुख्य रूप से सिंचाई के लिए।
- उद्देश्य: मिट्टी के कटाव को रोकना, जलविद्युत उत्पादन और सिंचाई।
उत्तर भारत की प्रमुख परियोजनाओं की सारणी
| परियोजना का नाम | नदी | स्थान / राज्य | लाभान्वित राज्य | प्रमुख तथ्य / उद्देश्य |
| भाखड़ा-नांगल परियोजना | सतलुज | हिमाचल प्रदेश, पंजाब | पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल | भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना; गोबिंद सागर झील का निर्माण। |
| टिहरी बांध परियोजना | भागीरथी और भिलंगना | उत्तराखंड | उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली | भारत का सबसे ऊँचा बांध; जलविद्युत और पेयजल आपूर्ति। |
| दामोदर घाटी परियोजना | दामोदर | झारखंड, पश्चिम बंगाल | झारखंड, पश्चिम बंगाल | स्वतंत्र भारत की पहली परियोजना; ‘बंगाल के शोक’ पर नियंत्रण। |
| रिहंद बांध (गोबिंद बल्लभ पंत सागर) | रिहंद (सोन की सहायक) | उत्तर प्रदेश | उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश | भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील का निर्माण; औद्योगिक बिजली आपूर्ति। |
| चंबल घाटी परियोजना | चंबल | मध्य प्रदेश, राजस्थान | मध्य प्रदेश, राजस्थान | गांधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर बांधों का समूह। |
| ब्यास परियोजना | ब्यास | पंजाब, हिमाचल प्रदेश | पंजाब, हरियाणा, राजस्थान | पोंग और पंडोह बांध प्रमुख हैं; इंदिरा गांधी नहर को जल आपूर्ति। |
| नाथपा झाकड़ी परियोजना | सतलुज | हिमाचल प्रदेश | – (राष्ट्रीय ग्रिड को बिजली) | भूमिगत पावरहाउस के लिए प्रसिद्ध एक प्रमुख जलविद्युत परियोजना। |
| माताटीला बांध | बेतवा | उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश | उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश | सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन। |
उत्तर भारत की अन्य प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ
ये परियोजनाएँ उन बड़ी परियोजनाओं (जैसे भाखड़ा-नांगल, टिहरी) के अतिरिक्त हैं जिनका उल्लेख पहले किया जा चुका है।
| परियोजना का नाम | नदी | राज्य / स्थान | लाभान्वित राज्य / क्षेत्र | प्रमुख तथ्य एवं उद्देश्य |
| सलाल परियोजना | चेनाब | जम्मू और कश्मीर (रियासी) | जम्मू-कश्मीर, उत्तरी ग्रिड | यह चेनाब नदी पर भारत द्वारा निर्मित पहली प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं में से एक है। |
| दुलहस्ती परियोजना | चेनाब | जम्मू और कश्मीर (किश्तवाड़) | जम्मू-कश्मीर, उत्तरी ग्रिड | यह एक रन-ऑफ-द-रिवर प्रकार की परियोजना है जो मुख्य रूप से जलविद्युत उत्पादन पर केंद्रित है। |
| बगलिहार बांध | चेनाब | जम्मू और कश्मीर (डोडा) | जम्मू-कश्मीर | जलविद्युत उत्पादन इसका मुख्य उद्देश्य है। सिंधु जल समझौते के तहत यह एक चर्चित परियोजना रही है। |
| उरी परियोजना | झेलम | जम्मू और कश्मीर (बारामूला) | जम्मू-कश्मीर, उत्तरी ग्रिड | यह भी एक रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना है जो बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। |
| किशनगंगा परियोजना | किशनगंगा (झेलम की सहायक) | जम्मू और कश्मीर (बांदीपोरा) | जम्मू-कश्मीर | जलविद्युत उत्पादन के लिए बनाई गई एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना। |
| रणजीत सागर बांध (थीन बांध) | रावी | पंजाब-जम्मू और कश्मीर सीमा | पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश | इसका मुख्य उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन और पंजाब तथा जम्मू-कश्मीर में सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराना है। |
| पोंग बांध (महाराणा प्रताप सागर) | ब्यास | हिमाचल प्रदेश | राजस्थान, पंजाब, हरियाणा | इसका जलाशय इंदिरा गांधी नहर को जल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है। यह एक रामसर स्थल भी है। |
| रामगंगा परियोजना (कालागढ़ बांध) | रामगंगा (गंगा की सहायक) | उत्तराखंड (पौड़ी गढ़वाल) | उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश | जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के भीतर स्थित है। यूपी के मैदानी इलाकों में सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और बिजली उत्पादन। |
| शारदा परियोजना | शारदा (घाघरा की सहायक) | उत्तर प्रदेश | उत्तर प्रदेश | यह मुख्य रूप से सिंचाई पर केंद्रित है और यूपी की सबसे बड़ी नहर प्रणालियों में से एक को पानी प्रदान करती है। |
| टनकपुर परियोजना | शारदा (महाकाली) | उत्तराखंड (भारत-नेपाल सीमा) | भारत और नेपाल | यह एक महत्वपूर्ण भारत-नेपाल द्विपक्षीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य सिंचाई और बिजली उत्पादन है। |
| बाणसागर परियोजना | सोन | मध्य प्रदेश (शहडोल) | मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार | यह तीन राज्यों की एक संयुक्त परियोजना है जिसका मुख्य उद्देश्य सूखा-प्रवण क्षेत्रों में सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन है। |
प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ
प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ, हिमालयी नदियों के विपरीत, मौसमी होती हैं और पूरी तरह से मानसून पर निर्भर करती हैं। इसलिए, जल का संचयन और प्रबंधन यहाँ की कृषि, उद्योग और पेयजल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। इन नदियों पर बनी बहुउद्देशीय परियोजनाएँ इस क्षेत्र के आर्थिक विकास की रीढ़ हैं।
प्रायद्वीपीय भारत की कुछ सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं का विस्तृत विवरण
1. हीराकुंड बांध परियोजना (Hirakud Dam Project)
- नदी: महानदी
- राज्य: ओडिशा (संबलपुर के पास)
- तथ्य: यह भारत का सबसे लंबा मुख्यधारा बांध (Longest Mainstream Dam) है, जिसकी कुल लंबाई 25 किलोमीटर से अधिक है। महानदी को पहले ‘ओडिशा का शोक’ कहा जाता था क्योंकि यह विनाशकारी बाढ़ लाती थी। इस बांध ने बाढ़ नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- उद्देश्य: बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन।
2. नागार्जुन सागर परियोजना (Nagarjuna Sagar Project)
- नदी: कृष्णा नदी
- राज्य: तेलंगाना और आंध्र प्रदेश (दोनों राज्यों की सीमा पर स्थित)।
- तथ्य: यह दुनिया का सबसे बड़ा चिनाई वाला बांध (Masonry Dam) है। इसका नाम प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान नागार्जुन के नाम पर रखा गया है। इसका जलाशय सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है।
- उद्देश्य: सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और पेयजल आपूर्ति।
3. सरदार सरोवर परियोजना (Sardar Sarovar Project)
- नदी: नर्मदा नदी
- राज्य: गुजरात (नवागाम के पास)
- लाभान्वित राज्य: गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र।
- तथ्य: यह नर्मदा घाटी परियोजना का हिस्सा है और भारत की सबसे बड़ी और सबसे विवादास्पद परियोजनाओं में से एक है। इसे “गुजरात की जीवन रेखा” कहा जाता है क्योंकि यह राज्य के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पानी पहुँचाती है।
- उद्देश्य: सिंचाई (विशेषकर राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी इलाकों में), जलविद्युत उत्पादन और पेयजल आपूर्ति।
4. कोयना परियोजना (Koyna Project)
- नदी: कोयना नदी (कृष्णा की सहायक नदी)
- राज्य: महाराष्ट्र (सतारा जिला)
- तथ्य: यह भारत की सबसे बड़ी पूर्ण पनबिजली परियोजनाओं में से एक है और इसे “महाराष्ट्र की जीवन रेखा” भी कहा जाता है क्योंकि यह राज्य की औद्योगिक और घरेलू बिजली की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पूरा करती है। इसके द्वारा निर्मित जलाशय को ‘शिवसागर झील’ कहते हैं।
- उद्देश्य: केवल जलविद्युत उत्पादन पर केंद्रित।
5. मेट्टूर बांध (Mettur Dam)
- नदी: कावेरी नदी
- राज्य: तमिलनाडु (सलेम जिला)
- तथ्य: यह भारत के सबसे पुराने बांधों में से एक है, जिसे 1934 में बनाया गया था। इसके जलाशय का नाम ‘स्टेनली जलाशय’ है। यह तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र (‘तमिलनाडु का चावल का कटोरा’) के लिए सिंचाई का मुख्य स्रोत है।
- उद्देश्य: सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और पेयजल आपूर्ति।
6. तुंगभद्रा परियोजना (Tungabhadra Project)
- नदी: तुंगभद्रा नदी (कृष्णा की सहायक नदी)
- लाभान्वित राज्य: कर्नाटक और आंध्र प्रदेश (संयुक्त परियोजना)।
- तथ्य: यह दक्षिण भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजनाओं में से एक है। इसका जलाशय, जिसे ‘पम्पा सागर’ भी कहा जाता है, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हम्पी के पास स्थित है।
- उद्देश्य: सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जलविद्युत उत्पादन।
प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख परियोजनाओं की सारणी
| परियोजना का नाम | नदी | राज्य / स्थान | लाभान्वित राज्य | प्रमुख तथ्य एवं उद्देश्य |
| हीराकुंड बांध | महानदी | ओडिशा | ओडिशा | भारत का सबसे लंबा बांध; ‘ओडिशा के शोक’ पर नियंत्रण। |
| नागार्जुन सागर परियोजना | कृष्णा | तेलंगाना / आंध्र प्रदेश | तेलंगाना, आंध्र प्रदेश | विश्व का सबसे बड़ा चिनाई बांध; सिंचाई एवं बिजली उत्पादन। |
| सरदार सरोवर परियोजना | नर्मदा | गुजरात | गुजरात, म.प्र., राजस्थान, महाराष्ट्र | ‘गुजरात की जीवन रेखा’; नर्मदा घाटी परियोजना का हिस्सा। |
| श्रीशैलम परियोजना | कृष्णा | आंध्र प्रदेश / तेलंगाना | आंध्र प्रदेश, तेलंगाना | भारत की दूसरी सबसे बड़ी क्षमता वाली जलविद्युत परियोजना। |
| अलमट्टी बांध | कृष्णा | कर्नाटक | कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना | उत्तरी कर्नाटक के लिए सिंचाई का मुख्य स्रोत; जलविद्युत उत्पादन। |
| कोयना परियोजना | कोयना (कृष्णा की सहायक) | महाराष्ट्र | महाराष्ट्र | ‘महाराष्ट्र की जीवन रेखा’; भारत की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजनाओं में से एक। |
| मेट्टूर बांध (स्टेनली जलाशय) | कावेरी | तमिलनाडु | तमिलनाडु | कावेरी डेल्टा के लिए सिंचाई का मुख्य स्रोत; भारत के सबसे पुराने बांधों में से एक। |
| शिवसमुद्रम परियोजना | कावेरी | कर्नाटक | कर्नाटक | एशिया की पहली जलविद्युत परियोजना (1902)। |
| कृष्णराज सागर (KRS) बांध | कावेरी | कर्नाटक | कर्नाटक, तमिलनाडु | मैसूर के पास स्थित; प्रसिद्ध वृंदावन गार्डन यहीं है। |
| इंदिरा सागर परियोजना | नर्मदा | मध्य प्रदेश | मध्य प्रदेश | भारत में सबसे बड़ी जल भंडारण क्षमता (आयतन) वाला जलाशय। |
| तुंगभद्रा परियोजना | तुंगभद्रा (कृष्णा की सहायक) | कर्नाटक | कर्नाटक, आंध्र प्रदेश | दक्षिण भारत की प्रमुख संयुक्त परियोजना; हम्पी के पास स्थित है। |
| उकाई परियोजना | तापी | गुजरात | गुजरात | सरदार सरोवर के बाद गुजरात की दूसरी सबसे बड़ी परियोजना। |
| जायकवाड़ी परियोजना | गोदावरी | महाराष्ट्र | महाराष्ट्र | मराठवाड़ा क्षेत्र में सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण। |
| पोचम्पाद (श्री राम सागर) | गोदावरी | तेलंगाना | तेलंगाना | उत्तरी तेलंगाना के सूखा-प्रवण क्षेत्रों के लिए जीवन रेखा। |
| इडुक्की परियोजना | पेरियार | केरल | केरल | भारत का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध चाप बांध (Arch Dam); जलविद्युत उत्पादन। |
प्रायद्वीपीय भारत की अन्य महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय परियोजनाएँ
| परियोजना का नाम | नदी | राज्य / स्थान | लाभान्वित राज्य / क्षेत्र | प्रमुख तथ्य एवं उद्देश्य |
| पोलावरम परियोजना | गोदावरी | आंध्र प्रदेश | आंध्र प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ | एक निर्माणाधीन राष्ट्रीय परियोजना; गोदावरी और कृष्णा नदियों को जोड़ने, सिंचाई और बिजली उत्पादन का लक्ष्य। |
| घाटप्रभा परियोजना | घाटप्रभा (कृष्णा की सहायक) | कर्नाटक | कर्नाटक | उत्तरी कर्नाटक के सूखा-प्रवण क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण। |
| मालप्रभा परियोजना | मालप्रभा (कृष्णा की सहायक) | कर्नाटक | कर्नाटक | इसका मुख्य उद्देश्य उत्तरी कर्नाटक में सिंचाई की सुविधा प्रदान करना है। |
| भद्रा परियोजना | भद्रा (तुंगभद्रा की सहायक) | कर्नाटक | कर्नाटक | भद्रा वन्यजीव अभयारण्य के पास स्थित; सिंचाई, बिजली और पेयजल मुख्य उद्देश्य। |
| ऊपरी कृष्णा परियोजना (UKP) | कृष्णा | कर्नाटक | कर्नाटक | उत्तरी कर्नाटक की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में से एक, जिसमें अलमट्टी और नारायणपुर बांध शामिल हैं। |
| परम्बिकुलम-अलियार परियोजना | (कई छोटी नदियाँ) | तमिलनाडु / केरल | तमिलनाडु और केरल | यह एक अन्तर-राज्यीय और अन्तर-बेसिन जल अंतरण परियोजना का उत्कृष्ट उदाहरण है; तमिलनाडु के सूखाग्रस्त क्षेत्रों को पानी पहुँचाना। |
| मचकुंड परियोजना | मचकुंड (गोदावरी की उप-सहायक) | ओडिशा-आंध्र प्रदेश सीमा | ओडिशा और आंध्र प्रदेश | यह दोनों राज्यों की एक संयुक्त जलविद्युत परियोजना है। |
| कालिंदी परियोजना | काली नदी (कालीनाडी) | कर्नाटक | कर्नाटक | इसमें सूपा बांध शामिल है, जो कर्नाटक के सबसे ऊँचे बांधों में से एक है; राज्य के लिए प्रमुख बिजली स्रोत। |
| पायकारा परियोजना | पायकारा | तमिलनाडु | तमिलनाडु | नीलगिरि पहाड़ियों में स्थित; तमिलनाडु की सबसे पुरानी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक। |
| शबरीगिरी परियोजना | पम्बा | केरल | केरल | केरल की दूसरी सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना; पम्बा नदी के बेसिन में स्थित। |
| निजाम सागर परियोजना | मंजीरा (गोदावरी की सहायक) | तेलंगाना | तेलंगाना | हैदराबाद और सिकंदराबाद के लिए पीने के पानी का एक ऐतिहासिक स्रोत रहा है। |
| काकरापार परियोजना | तापी | गुजरात | गुजरात | सूरत के पास स्थित; मुख्य रूप से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराती है। |
| भवानी सागर बांध | भवानी (कावेरी की सहायक) | तमिलनाडु | तमिलनाडु | दुनिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांधों में से एक; कोयंबटूर और इरोड में सिंचाई। |
| ओंकारेश्वर परियोजना | नर्मदा | मध्य प्रदेश | मध्य प्रदेश | इंदिरा सागर परियोजना के निचले हिस्से में स्थित है और इसके पानी के प्रवाह को नियंत्रित कर बिजली पैदा करती है। |
| मयूराक्षी परियोजना | मयूराक्षी | झारखंड / पश्चिम बंगाल | झारखंड, पश्चिम बंगाल | मुख्य रूप से सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए, विशेषकर पश्चिम बंगाल के लिए। |
नदियों के तट पर बसे भारत के प्रमुख नगर
भारत में प्राचीन काल से ही नदियों का सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अधिकांश प्राचीन शहर और व्यापारिक केंद्र नदियों के किनारे ही विकसित हुए क्योंकि नदियाँ पीने के पानी, सिंचाई, परिवहन और आजीविका का प्रमुख स्रोत थीं। आज भी भारत के कई प्रमुख शहर इन जीवनदायिनी नदियों के तट पर स्थित हैं।
| नगर (City) | नदी (River) | राज्य / केंद्र-शासित प्रदेश (State / UT) |
| दिल्ली | यमुना | दिल्ली |
| आगरा | यमुना | उत्तर प्रदेश |
| मथुरा | यमुना | उत्तर प्रदेश |
| प्रयागराज (इलाहाबाद) | गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम | उत्तर प्रदेश |
| वाराणसी (काशी) | गंगा | उत्तर प्रदेश |
| कानपुर | गंगा | उत्तर प्रदेश |
| हरिद्वार | गंगा | उत्तराखंड |
| पटना | गंगा | बिहार |
| कोलकाता | हुगली (गंगा की वितरिका) | पश्चिम बंगाल |
| गुवाहाटी | ब्रह्मपुत्र | असम |
| डिब्रूगढ़ | ब्रह्मपुत्र | असम |
| लखनऊ | गोमती (गंगा की सहायक) | उत्तर प्रदेश |
| अयोध्या | सरयू (घाघरा) | उत्तर प्रदेश |
| श्रीनगर | झेलम | जम्मू और कश्मीर |
| लेह | सिंधु | लद्दाख |
| अहमदाबाद | साबरमती | गुजरात |
| गांधीनगर | साबरमती | गुजरात |
| सूरत | तापी (ताप्ती) | गुजरात |
| जबलपुर | नर्मदा | मध्य प्रदेश |
| भरूच | नर्मदा | गुजरात |
| उज्जैन | क्षिप्रा (शिप्रा) (चंबल की सहायक) | मध्य प्रदेश |
| कोटा | चंबल | राजस्थान |
| जमशेदपुर | सुवर्णरेखा और खरकई का संगम | झारखंड |
| रांची | सुवर्णरेखा | झारखंड |
| कटक | महानदी | ओडिशा |
| संबलपुर | महानदी | ओडिशा |
| हैदराबाद | मूसी (कृष्णा की सहायक) | तेलंगाना |
| पुणे | मूला-मुठा (भीमा की सहायक) | महाराष्ट्र |
| नासिक | गोदावरी | महाराष्ट्र |
| विजयवाड़ा | कृष्णा | आंध्र प्रदेश |
| राजमुंदरी | गोदावरी | आंध्र प्रदेश |
| तिरuchirappalli (त्रिची) | कावेरी | तमिलनाडु |
| मदुरै | वैगई | तमिलनाडु |
| चेन्नई | अड्यार, कूवम | तमिलनाडु |
| लुधियाना | सतलुज | पंजाब |
| फिरोजपुर | सतलुज | पंजाब |
| बद्रीनाथ | अलकनंदा | उत्तराखंड |
| कुरनूल | तुंगभद्रा | आंध्र प्रदेश |
भारत में आर्द्रभूमियाँ (Wetlands in India): एक समग्र अवलोकन
आर्द्रभूमियाँ या वेटलैंड्स ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र हैं जहाँ भूमि स्थायी या अस्थायी रूप से पानी से संतृप्त (saturated) होती है। ये जलीय और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के बीच का एक संक्रमण क्षेत्र होती हैं। इनमें झीलें, नदियाँ, डेल्टा, दलदल (swamps and marshes), मैंग्रोव, तटीय लैगून और मानव निर्मित जलाशय जैसे तालाब और टैंक शामिल हैं।
आर्द्रभूमियों का महत्व: “प्रकृति की किडनी”
आर्द्रभूमियों को उनके महत्वपूर्ण पारिस्थितिक कार्यों के कारण “प्रकृति की किडनी” (Kidneys of Nature) भी कहा जाता है। इनका महत्व निम्नलिखित है:
- जैव विविधता का संरक्षण: ये वनस्पतियों और जीवों की एक समृद्ध विविधता का समर्थन करती हैं। ये प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आश्रय स्थल हैं।
- जल शोधन: ये एक प्राकृतिक फिल्टर के रूप में कार्य करती हैं, प्रदूषकों को पानी से हटाती हैं।
- बाढ़ नियंत्रण: ये स्पंज की तरह कार्य करती हैं, भारी वर्षा के दौरान अतिरिक्त पानी सोख लेती हैं और बाढ़ के प्रभाव को कम करती हैं।
- भूजल पुनर्भरण: ये पानी को धीरे-धीरे जमीन में रिसने देती हैं, जिससे भूजल स्तर बना रहता है।
- कार्बन सिंक: ये वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
- आजीविका का स्रोत: ये मछली पकड़ने, कृषि, पर्यटन और अन्य गतिविधियों के माध्यम से लाखों लोगों को आजीविका प्रदान करती हैं।
रामसर कन्वेंशन (Ramsar Convention) और भारत
यह आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
- स्थापना: इसे 2 फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में अपनाया गया था।
- विश्व आर्द्रभूमि दिवस: इसीलिए हर साल 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाता है।
- भारत की भूमिका: भारत ने 1 फरवरी 1982 को इस संधि पर हस्ताक्षर किए।
नवीनतम तथ्य (Current Affairs):
- कुल रामसर स्थल: भारत में वर्तमान में कुल 93 (सितंबर 2025 तक) रामसर स्थल हैं, जो एशिया में किसी भी देश के लिए सबसे अधिक संख्या है।
- सर्वाधिक स्थल वाला राज्य: तमिलनाडु (16 स्थल) में भारत के सबसे अधिक रामसर स्थल हैं, इसके बाद उत्तर प्रदेश (10 स्थल) का स्थान है।
भारत के प्रमुख रामसर स्थल (परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण)
यहाँ कुछ सबसे महत्वपूर्ण रामसर स्थलों की सूची दी गई है:
| रामसर स्थल का नाम | राज्य / केंद्र-शासित प्रदेश | महत्वपूर्ण तथ्य |
| चिल्का झील | ओडिशा | भारत का पहला रामसर स्थल। भारत की सबसे बड़ी तटीय लैगून (खारे पानी की) झील। इरावदी डॉल्फिन के लिए प्रसिद्ध। |
| सुंदरवन वेटलैंड | पश्चिम बंगाल | भारत का सबसे बड़ा रामसर स्थल। यह दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन भी है। |
| लोकटक झील | मणिपुर | विश्व का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान (कीबुल लामजाओ) इसी झील पर स्थित है। तैरते द्वीपों (‘फुम्डी’) के लिए प्रसिद्ध। |
| केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान | राजस्थान | एक प्रसिद्ध पक्षी अभयारण्य और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल। साइबेरियन क्रेन के लिए प्रसिद्ध। |
| वुलर झील | जम्मू और कश्मीर | भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील। |
| सांभर झील | राजस्थान | भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय (Inland) खारे पानी की झील। |
| रेणुका झील | हिमाचल प्रदेश | भारत का सबसे छोटा रामसर स्थल। |
| अष्टमुडी झील | केरल | एक प्रसिद्ध लैगून और बैकवाटर प्रणाली। |
| पोंग बांध झील (महाराणा प्रताप सागर) | हिमाचल प्रदेश | एक मानव निर्मित जलाशय। |
| त्सो मोरीरी झील | लद्दाख | भारत में एक उच्च ऊँचाई पर स्थित सुंदर झील। |
| भोज वेटलैंड (बड़ा तालाब) | मध्य प्रदेश | भोपाल में स्थित एक विशाल मानव निर्मित झील। |
| नल सरोवर पक्षी अभयारण्य | गुजरात | प्रवासी जलपक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल। |
भारत में आर्द्रभूमियों के लिए खतरे
- शहरीकरण और अतिक्रमण: शहरों के विस्तार के कारण आर्द्रभूमियों को भरा जा रहा है।
- कृषि विस्तार: कृषि भूमि के लिए आर्द्रभूमियों को सुखाया जा रहा है।
- प्रदूषण: औद्योगिक अपशिष्टों और घरेलू सीवेज से जल की गुणवत्ता खराब हो रही है।
- अतिक्रमणकारी प्रजातियाँ: जलकुंभी जैसी विदेशी प्रजातियाँ स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रही हैं।
- जलवायु परिवर्तन: वर्षा पैटर्न में बदलाव और तापमान वृद्धि से आर्द्रभूमियाँ प्रभावित हो रही हैं।
संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास
- राष्ट्रीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण योजना (NPCA): यह झीलों और आर्द्रभूमियों दोनों के संरक्षण के लिए एक एकीकृत योजना है।
- आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017: यह आर्द्रभूमियों की पहचान करने, अधिसूचित करने और उनके संरक्षण के लिए एक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- अमृत धरोहर योजना: यह योजना रामसर स्थलों के अद्वितीय संरक्षण मूल्यों को बढ़ावा देने और स्थानीय समुदायों की मदद से उनके विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ाने के लिए शुरू की गई है।