भारत का सामान्य परिचय
भारत का सामान्य परिचय – अवस्थिति और विस्तार
(General Introduction of India – Location and Extent)
यह खंड UPSC परीक्षा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए “भारत का सामान्य परिचय: अवस्थिति और विस्तार” विषय को भूमिका, संरचित विवरण, और विगत वर्षों के प्रश्नों (PYQs) सहित प्रस्तुत करता है।
I. भूमिका (Introduction / Prelude)
भारतीय उपमहाद्वीप अपने विशाल क्षेत्रफल, विविध जलवायु, और सांस्कृतिक विषमता के कारण ‘एक महाद्वीप का लघुरूप’ (Miniature Continent) कहलाता है।
इसकी विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति इसके राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और जलवायु स्वरूप को गहराई से प्रभावित करती है।
यह मुख्यतः उत्तरी गोलार्ध के पूर्वी भाग में, भूमध्य रेखा के निकट स्थित है।
II. भौगोलिक अवस्थिति और विस्तार का व्यवस्थित विवरण
(Systematic Description of Geographical Location and Extent)
A. भारत की विश्वव्यापी स्थिति (Global Position of India)
भारत उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) और पूर्वी गोलार्ध (Eastern Hemisphere) में स्थित है।
इसका दक्षिणी भाग उष्णकटिबंधीय (Tropical) और उत्तरी भाग उपोष्णकटिबंधीय (Sub-Tropical) या समशीतोष्ण (Temperate) क्षेत्र में आता है।
| मापदण्ड (Parameter) | विस्तार (Extent) | चरम बिंदु (Extreme Point / Importance) |
| मुख्य अक्षांशीय विस्तार | 8°4′ उत्तर (N) से 37°6′ उत्तर (N) | 37°6′ N पर इंदिरा कोल (उत्तरीतम बिंदु) |
| सम्पूर्ण अक्षांशीय विस्तार | 6°45′ उत्तर (N) से 37°6′ उत्तर (N) | 6°45′ N पर इंदिरा प्वाइंट (दक्षिणीतम बिंदु – ग्रेट निकोबार) |
| देशांतरीय विस्तार | 68°7′ पूर्व (E) से 97°25′ पूर्व (E) | 97°25′ E पर किबिथु (पूर्वीतम बिंदु – अरुणाचल प्रदेश) |
| अक्षांशीय एवं देशांतरीय अंतर | लगभग 29° (37°6′ N – 8°4′ N और 97°25′ E – 68°7′ E) | यह अंतर भारत की जलवायु एवं समय विविधता का प्रमुख कारण है। |
📘 PYQ 1 (अवस्थिति):
मुख्य भूमि का सबसे दक्षिणी बिंदु क्या है?
उत्तर: केप कोमोरिन (कन्याकुमारी)
[Prelims 2012]
B. आयाम, आकार और क्षेत्रफल
(Dimensions, Shape, and Area)
| मापदण्ड (Parameter) | आँकड़े (Data) | विवरण / वैश्विक क्रम (Rank) |
| आकार (Shape) | मोटे तौर पर चतुष्कोणीय (Quadrangular) | विविध जलवायु और भौगोलिक संरचना |
| कुल क्षेत्रफल (Total Area) | 32,87,263 वर्ग किमी (≈ 32.8 लाख किमी²) | विश्व का 7वाँ सबसे बड़ा देश (2.4%) |
| उत्तर-दक्षिण विस्तार | 3,214 किमी | इंदिरा कोल से कन्याकुमारी (केप कोमोरिन) तक |
| पूर्व-पश्चिम विस्तार | 2,933 किमी | किबिथु (अरुणाचल) से गुहार मोती (गुजरात) तक |
| तटरेखा की कुल लंबाई | 7,516.6 किमी | मुख्यभूमि (6,100 किमी) + द्वीप समूह (अंडमान, लक्षद्वीप) |
C. समय और तिथि का निर्धारण
(Determination of Time and Date)
भारत के देशांतरीय विस्तार (68°7′ E – 97°25′ E) से लगभग 2 घंटे (116 मिनट) का स्थानीय समय अंतर होता है।
इस समस्या के समाधान हेतु भारतीय मानक समय (IST) अपनाया गया है।
| मापदण्ड (Parameter) | विवरण (Description) | प्रभाव / महत्व (Significance) |
| भारतीय मानक समय रेखा (IST) | 82°30′ पूर्व देशांतर | यह GMT से 5 घंटे 30 मिनट आगे है। |
| राज्य जिनसे गुजरती है | उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश | यह रेखा मिर्ज़ापुर (U.P.) के पास से गुजरती है। |
📘 PYQ 2 (समय):
यदि अरुणाचल प्रदेश में सूर्योदय 5:00 बजे होता है,
तो गुजरात में यह लगभग 7:00 बजे होगा।
[Conceptual PYQ – Based on Time Difference]
III. अवस्थिति का महत्व और निहितार्थ
(Significance and Implications of India’s Location)
यह भाग विशेष रूप से मुख्य परीक्षा (Mains) के लिए महत्वपूर्ण है।
| आयाम (Dimension) | महत्त्व / निहितार्थ (Significance / Implication) |
| 1. जलवायु और कटिबंध | कर्क रेखा भारत को लगभग दो भागों में बाँटती है, जिससे दक्षिण में उष्णकटिबंधीय मानसूनी और उत्तर में समशीतोष्ण जलवायु मिलती है। इससे कृषि, जैव-विविधता एवं वर्षा-पैटर्न में विविधता आती है। |
| 2. भू-सामरिक स्थिति (Geostrategic) | हिंद महासागर के शीर्ष पर भारत की केंद्रीय स्थिति उसे समुद्री मार्गों के व्यापार, नौसैनिक नियंत्रण (Naval Control) और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए विशेष बनाती है। |
| 3. प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources) | 7,500 किमी लंबी तटरेखा भारत को एक विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) प्रदान करती है, जिसमें खनिज, मत्स्य और अपतटीय ऊर्जा संसाधनों की प्रचुरता है। |
| 4. सांस्कृतिक संपर्क (Cultural Linkages) | भारत की सामुद्रिक अवस्थिति ने मसालों, धर्मों, और विचारों के वैश्विक प्रसार को संभव बनाया है, जिससे दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व से ऐतिहासिक संबंध स्थापित हुए। |
📘 PYQ 3 (सामरिक):
“भारत का प्रायद्वीपीय भाग हिंद महासागर की ओर विस्तारित एक महत्वपूर्ण अंग है।”
इस कथन की, देश के वाणिज्यिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक लाभों को ध्यान में रखते हुए विवेचना कीजिए।
[Mains GS I – 2020 आधारित]
IV. कर्क रेखा एवं उसका प्रतिच्छेदन
(Tropic of Cancer and Its Intersection)
कर्क रेखा भारत के भौगोलिक अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
| विवरण (Description) | तथ्य / राज्य (Facts / States) |
| कर्क रेखा जिन 8 राज्यों से गुजरती है | गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मिज़ोरम |
| IST और कर्क रेखा का प्रतिच्छेदन | ये दोनों रेखाएँ छत्तीसगढ़ राज्य में एक-दूसरे को काटती हैं। |
📘 PYQ 4 (राज्य):
कर्क रेखा निम्नलिखित में से किस राज्य से होकर नहीं गुजरती है?
(विकल्पों में से एक — ओडिशा)
उत्तर: ओडिशा
[Prelims 2013 आधारित]
📘 PYQ 5 (अवस्थिति):
“सूर्य के ऊर्ध्वाधर प्रकाश (Vertical Sun Rays) कभी भी चेन्नई (13°N) और कोलकाता (22.5°N) पर नहीं पड़ते हैं।”
क्या यह कथन सत्य है?
उत्तर: असत्य — कर्क रेखा के दक्षिण स्थित सभी स्थानों पर सूर्य की ऊर्ध्व किरणें पड़ती हैं।
[Prelims – Conceptual]
1.2: भारत की सीमाएँ और पड़ोसी देश (Boundaries and Neighboring Countries)
भारत अपनी अवस्थिति के कारण दक्षिण एशिया के मध्य में स्थित है। यह उत्तर, उत्तर-पूर्व और पूर्व में एशियाई मुख्य भू-भाग (Mainland Asia) और दक्षिण में हिंद महासागर (Indian Ocean) से घिरा है, जो इसे विशिष्ट सामरिक और भौगोलिक महत्व प्रदान करता है।
I. सीमा रेखाओं का परिचय (Introduction to Boundaries)
भारत के पास विश्व की सबसे लंबी और सबसे अधिक आबादी वाली सीमाओं में से कुछ हैं, जिनमें मैदानी क्षेत्र, मरुस्थल, उच्च पर्वत श्रृंखलाएँ, दलदली भूमि और समुद्र शामिल हैं।
| सीमा का प्रकार | कुल अनुमानित लम्बाई | सीमा रेखा पर प्रमुख चुनौती |
| स्थलीय सीमा | लगभग 15,20015,200 किलोमीटर | विविध भूभाग, तस्करी, घुसपैठ। |
| तटीय सीमा (मुख्य भूमि) | 6,1006,100 किलोमीटर | |
| तटीय सीमा (कुल, द्वीप समूहों सहित) | 7,516.67,516.6 किलोमीटर | अपतटीय सुरक्षा, मछली पकड़ने के विवाद। |
II. पड़ोसी देश और स्थलीय सीमाएँ (Neighboring Countries and Land Boundaries)
भारत अपनी सबसे लंबी स्थलीय सीमा बांग्लादेश के साथ और सबसे छोटी अफगानिस्तान के साथ साझा करता है (POK क्षेत्र में)। भारत कुल सात (7) देशों के साथ स्थलीय सीमाएँ साझा करता है:
| पड़ोसी देश (Neighbouring Country) | लम्बाई (km में) | अंतर्राष्ट्रीय सीमा का नाम (जहाँ लागू हो) |
| 1. बांग्लादेश | 4096.74096.7 | |
| 2. चीन | 34883488 | मैकमोहन रेखा (पूर्वी भाग), LAC |
| 3. पाकिस्तान | 33233323 | रैडक्लिफ रेखा, LoC (नियंत्रण रेखा) |
| 4. नेपाल | 17511751 | खुली सीमा |
| 5. म्यांमार (बर्मा) | 16431643 | पहाड़ी सीमाएँ (पटकई, नागा, आदि) |
| 6. भूटान | 699699 | |
| 7. अफगानिस्तान | 106106 | डूरंड रेखा (वर्तमान में POK क्षेत्र से लगी हुई) |
A. अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित भारतीय राज्य (Indian States on International Borders)
सीमा साझा करने वाले कुल
16
16
राज्य और
2
2
केंद्र शासित प्रदेश (UTs) हैं।
- पाकिस्तान से सटे राज्य: गुजरात, राजस्थान, पंजाब; केंद्र शासित प्रदेश: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख।
- चीन से सटे राज्य: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश; केंद्र शासित प्रदेश: लद्दाख।
- नेपाल से सटे राज्य: उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम।
- भूटान से सटे राज्य: सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश।
- म्यांमार से सटे राज्य: अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम।
- बांग्लादेश से सटे राज्य: पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम।
नोट: त्रिपुरा एकमात्र भारतीय राज्य है जो तीन तरफ से बांग्लादेश से घिरा हुआ है।
III. जलीय और सामुद्रिक पड़ोसी (Water and Maritime Neighbors)
भारत दो (2) देशों के साथ समुद्री सीमाएँ साझा करता है।
- दक्षिण में: श्रीलंका, जो पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) और मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) द्वारा अलग होता है।
- दक्षिण-पूर्व में: मालदीव, जो भारत से आठ डिग्री चैनल (Eight Degree Channel) द्वारा अलग होता है (मालदीव का मिनिकॉय द्वीप लक्षद्वीप से)।
IV. सीमा और क्षेत्र संबंधी विवाद (Boundary and Territorial Disputes)
सीमाएँ हमेशा सामरिक तनाव और भू-राजनीतिक चिंता का क्षेत्र रही हैं।
| पड़ोसी देश | प्रमुख विवादित क्षेत्र/सीमाएँ |
| चीन | 1. LAC (वास्तविक नियंत्रण रेखा): लद्दाख में, मैकमोहन रेखा का विवादित क्षेत्र (खासकर अरुणाचल प्रदेश)। |
| 2. अक्साई चिन (Aksai Chin): चीन के कब्जे वाला लद्दाख का क्षेत्र। | |
| पाकिस्तान | 1. PoK (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर): 19471947 से पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जाया गया क्षेत्र। |
| 2. LoC (नियंत्रण रेखा): जम्मू-कश्मीर में विवादित सैन्यीकृत सीमा। | |
| 3. सर्क्रीक (Sir Creek): गुजरात और सिंध के बीच ज्वारीय क्रीक में विवाद। (सीमा निर्धारण पर विवाद)। | |
| श्रीलंका | कच्चातिवु द्वीप (Katchatheevu Island): एक छोटा सा निर्जन द्वीप जिस पर भारत और श्रीलंका के बीच विवाद रहा है। (वर्तमान में, यह 19741974 और 19761976 के समझौतों के तहत श्रीलंका का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक मुद्दा बना रहता है)। |
| नेपाल | कालापानी, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख क्षेत्र: उत्तराखंड और नेपाल की सीमा पर स्थित ये तीन क्षेत्र नेपाल द्वारा मानचित्रण में अपने क्षेत्र के रूप में दावा किए जाते हैं। |
V. विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)
| PYQ (प्रश्न) | वर्ष/परीक्षा | उत्तर (संक्षिप्त) |
| भारत की सबसे लंबी सीमा निम्नलिखित में से किस देश के साथ लगी हुई है? | Prelims 2008-आधारित | बांग्लादेश |
| कौन सा राज्य तीनों ओर से बांग्लादेश से घिरा हुआ है? | Prelims (विभिन्न राज्य PSC) | त्रिपुरा |
| सर्क्रीक विवाद किन दो देशों के बीच है और इसका कारण क्या है? | Mains GS I (Conceptual) | भारत और पाकिस्तान; दलदली/ज्वारीय क्रीक क्षेत्र में सीमा निर्धारण। |
| निम्नलिखित में से कौन से भारतीय राज्य क्रमशः नेपाल, चीन और म्यांमार की सीमाओं को स्पर्श करते हैं? (Multiple choice question) | Prelims (Conceptual) | जैसे: उत्तर प्रदेश (नेपाल), हिमाचल प्रदेश/सिक्किम (चीन), मिजोरम (म्यांमार) |
| भारतीय सीमाओं पर संघर्षों में प्राकृतिक भूभाग के प्रभावों की व्याख्या कीजिए। (Explain the influence of physical geography on conflicts along Indian borders.) | Mains GS I (Conceptual) | (Ans: हिमालय: शीत, उच्च अक्षांशीय युद्ध; कच्छ की खाड़ी: दलदल, पहुंच में कठिनाई आदि।) |
1.2: भारत की सीमाएँ और पड़ोसी देश (Boundaries and Neighboring Countries)
भारत दक्षिण एशिया के मध्य में स्थित है। यह उत्तर, उत्तर-पूर्व और पूर्व में एशियाई मुख्य भू-भाग (Mainland Asia) से तथा दक्षिण में हिंद महासागर (Indian Ocean) से घिरा हुआ है। इस कारण इसकी भौगोलिक और सामरिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।
🧭 I. सीमा रेखाओं का परिचय (Introduction to Boundaries)
भारत के पास विश्व की सबसे विविधतापूर्ण और जनसंख्या-सघन सीमाएँ हैं — जिनमें पर्वत, मैदानी क्षेत्र, मरुस्थल, दलदल, और तटरेखाएँ शामिल हैं।
| सीमा का प्रकार | कुल अनुमानित लंबाई | प्रमुख चुनौती |
| स्थलीय सीमा (Land Boundary) | लगभग 15,200 किमी | विविध भू-आकृतियाँ, तस्करी, घुसपैठ |
| तटीय सीमा (मुख्य भूमि) | लगभग 6,100 किमी | तटीय सुरक्षा और नौवहन |
| कुल तटीय सीमा (द्वीपों सहित) | लगभग 7,516.6 किमी | अपतटीय सुरक्षा, मत्स्य विवाद |
🌏 II. पड़ोसी देश और स्थलीय सीमाएँ (Neighboring Countries and Land Boundaries)
भारत 7 देशों के साथ अपनी स्थलीय सीमाएँ साझा करता है — जिनमें से सबसे लंबी बांग्लादेश के साथ और सबसे छोटी अफगानिस्तान के साथ (POK क्षेत्र में) है।
| क्रम | पड़ोसी देश | सीमा लंबाई (किमी) | सीमा रेखा का नाम / विवरण |
| 1 | बांग्लादेश | 4,096.7 | सबसे लंबी स्थलीय सीमा |
| 2 | चीन | 3,488 | मैकमोहन रेखा (पूर्व), LAC |
| 3 | पाकिस्तान | 3,323 | रैडक्लिफ रेखा, LoC |
| 4 | नेपाल | 1,751 | खुली सीमा |
| 5 | म्यांमार | 1,643 | पटकई, नागा, लुशाई पर्वत क्षेत्र |
| 6 | भूटान | 699 | हिमालयी सीमा क्षेत्र |
| 7 | अफगानिस्तान | 106 | डूरंड रेखा (POK क्षेत्र से जुड़ी) |
🗺️ अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगे भारतीय राज्य
भारत के 16 राज्य और 2 केंद्रशासित प्रदेश (UTs) अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से लगे हैं।
| देश | संबंधित भारतीय राज्य/UT |
| पाकिस्तान | गुजरात, राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख |
| चीन | हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख |
| नेपाल | उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम |
| भूटान | सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश |
| म्यांमार | अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम |
| बांग्लादेश | पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम |
नोट: त्रिपुरा एकमात्र ऐसा राज्य है जो तीन ओर से बांग्लादेश से घिरा है।
🌊 III. जलीय और सामुद्रिक पड़ोसी (Water & Maritime Neighbors)
भारत दो देशों के साथ समुद्री सीमाएँ (Maritime Borders) साझा करता है।
| देश | विभाजन का जलसंधि क्षेत्र |
| श्रीलंका | पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) एवं मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) द्वारा अलग |
| मालदीव | 8° चैनल (Eight Degree Channel) द्वारा लक्षद्वीप से अलग |
⚔️ IV. सीमा और क्षेत्रीय विवाद (Boundary & Territorial Disputes)
| पड़ोसी देश | प्रमुख विवादित क्षेत्र / रेखा |
| चीन | ① LAC (लद्दाख क्षेत्र) ② अक्साई चिन ③ मैकमोहन रेखा (अरुणाचल प्रदेश) |
| पाकिस्तान | ① PoK (पाक-अधिकृत कश्मीर) ② LoC ③ सर्क्रीक विवाद (गुजरात-सिंध सीमा) |
| श्रीलंका | कच्चातिवु द्वीप – 1974 व 1976 के समझौते में श्रीलंका को हस्तांतरित |
| नेपाल | कालापानी, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख (उत्तराखंड सीमा विवाद) |
📚 V. विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)
| प्रश्न | परीक्षा/वर्ष | उत्तर |
| भारत की सबसे लंबी सीमा किस देश से लगती है? | Prelims 2008 | बांग्लादेश |
| कौन-सा राज्य तीनों ओर से बांग्लादेश से घिरा है? | State PSC / Prelims | त्रिपुरा |
| सर्क्रीक विवाद किन देशों के बीच है? | Mains GS-I | भारत और पाकिस्तान |
| कौन-से राज्य क्रमशः नेपाल, चीन और म्यांमार से सीमाएँ साझा करते हैं? | Prelims (Conceptual) | उत्तर प्रदेश (नेपाल), सिक्किम (चीन), मिज़ोरम (म्यांमार) |
| “भारतीय सीमाओं पर संघर्षों में प्राकृतिक भूभाग की भूमिका” पर टिप्पणी कीजिए। | Mains GS-I | हिमालयी ऊँचाई, मरुस्थलीय सीमाएँ, दलदली क्षेत्र आदि ने रणनीतिक कठिनाइयाँ उत्पन्न की हैं। |
1.3: भारत का राजनीतिक और प्रशासनिक विभाजन (Political and Administrative Division of India)
भारत को शासन एवं प्रशासनिक सुगमता के लिए राज्यों (States) और केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories – UTs) में बाँटा गया है।
वर्तमान में भारत में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं।
इन इकाइयों की सीमाएँ और अवस्थिति भारत के संघीय ढाँचे (Federal Structure) को दर्शाती हैं।
🏛️ I. विभाजन की संरचना (Structure of Division)
भारत में शासन की दो-स्तरीय प्रशासनिक प्रणाली है:
| इकाई | विवरण |
| राज्य (States) | प्रमुख प्रशासनिक इकाइयाँ, जिनकी अपनी निर्वाचित सरकारें होती हैं। सीमांकन में भौगोलिक, भाषाई और प्रशासनिक कारक महत्त्वपूर्ण रहे हैं। |
| केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories – UTs) | ये सीधे केंद्र सरकार (राष्ट्रपति/प्रशासक) के अधीन आते हैं। इनका गठन सामरिक, ऐतिहासिक या प्रशासनिक कारणों से किया जाता है। (उदाहरण: चंडीगढ़ – दो राज्यों की साझा राजधानी) |
🗺️ II. भारतीय राज्य (28 States)
भारत के राज्यों को भौगोलिक और क्षेत्रीय आधार पर समझना प्रशासनिक दृष्टि से उपयोगी है।
| क्षेत्र | प्रमुख राज्य |
| उत्तर / हिमालयी राज्य | हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, (उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब) |
| पश्चिमी / मध्य राज्य | राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ |
| पूर्वी / पूर्वोत्तर राज्य | बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, सिक्किम |
| सप्त भगिनी (Seven Sisters) | अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, मेघालय, असम (सिक्किम इसमें शामिल नहीं है) |
| दक्षिणी राज्य | आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु |
PYQ (Conceptual):
प्रश्न: राज्य पुनर्गठन के समय भारत के राजनीतिक मानचित्र में प्रमुख विचार कौन-से थे — भाषाई समानता या भौगोलिक सुविधा?
उत्तर: प्रारम्भ में प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता दी गई; 1953 के बाद राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर हुआ।
(उदाहरण: आंध्र प्रदेश – पहला भाषाई राज्य)
🏢 III. केंद्र शासित प्रदेश (8 Union Territories)
भारत के केंद्र शासित प्रदेश सामरिक, ऐतिहासिक और प्रशासनिक दृष्टि से विशिष्ट हैं।
| क्रमांक | केंद्र शासित प्रदेश (UT) | राजधानी | भौगोलिक अवस्थिति / विशेषता |
| 1 | राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (NCT Delhi) | नई दिल्ली | हरियाणा और उत्तर प्रदेश से घिरा हुआ |
| 2 | चंडीगढ़ | चंडीगढ़ | पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी |
| 3 | दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली | दमन | पश्चिमी तट पर; 2020 में दोनों का विलय |
| 4 | पुदुचेरी (पांडिचेरी) | पुदुचेरी | चार जिले (पुदुचेरी, कराईकल, माहे, यानम) — तीन राज्यों में फैले |
| 5 | जम्मू और कश्मीर | श्रीनगर (ग्रीष्म), जम्मू (शीत) | पश्चिमी हिमालय; LoC पर स्थित |
| 6 | लद्दाख | लेह | उच्च हिमालय; चीन (LAC) और पाकिस्तान (PoK) से सटी सीमा |
| 7 | लक्षद्वीप | कवरेत्ती | अरब सागर में मूंगे के द्वीप समूह |
| 8 | अंडमान और निकोबार द्वीप समूह | पोर्ट ब्लेयर | बंगाल की खाड़ी में; सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण |
नोट:
2019 में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के बाद भारत में राज्यों की संख्या 29 से घटकर 28 और UTs की संख्या 7 से बढ़कर 9 हुई।
2020 में दमन और दीव तथा दादरा और नगर हवेली के विलय से UTs की कुल संख्या 8 रह गई।
⚖️ IV. प्रशासनिक विभाजन के निहितार्थ (Implications of Administrative Divisions)
| पहलू | विवरण |
| सुशासन (Good Governance) | छोटे राज्यों व UTs से प्रशासनिक दक्षता बढ़ती है; स्थानीय समस्याओं के समाधान में तेजी आती है। |
| भू-राजनीतिक महत्त्व (Geopolitical Importance) | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को UT का दर्जा सामरिक नियंत्रण हेतु दिया गया ताकि सीमाओं पर केंद्र का सीधा अधिकार रहे। |
| विशिष्ट कानूनी/भौगोलिक पहचान | द्वीप समूह (लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार) और विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्र (पुदुचेरी) को विशेष कानूनों से संरक्षित किया गया है। |
PYQ (Mains-Relevant):
प्रश्न: भारत में प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने हेतु नए राज्यों के गठन और मौजूदा केंद्र शासित प्रदेशों की स्थिति बदलने के पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: छोटे राज्य स्थानीय शासन सुधारते हैं, परंतु अत्यधिक विखंडन संसाधन व नीति-समन्वय को कठिन बना सकता है। (GS-II: Polity & Governance)
भारत का भौतिक स्वरूप
भारत की भूगर्भिक संरचना: एक व्यवस्थित अध्ययन
परिचय
भारत की भूगर्भिक संरचना अत्यंत जटिल एवं विविधतापूर्ण है, जिसमें पृथ्वी के इतिहास के प्राचीनतम ‘आर्कियन’ काल की चट्टानों से लेकर वर्तमान ‘नवीनतम’ जलोढ़ निक्षेपों तक का समावेश है। किसी भी क्षेत्र की स्थलाकृति, मृदा के प्रकार, खनिज संपदा और आर्थिक गतिविधियाँ उसकी भूगर्भिक संरचना द्वारा ही निर्धारित होती हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए, भारत की भूगर्भिक संरचना को दो मुख्य आधारों पर समझा जा सकता है:
- भौतिक लक्षणों के आधार पर भूगर्भिक खंड
- चट्टानों के निर्माण क्रम के आधार पर भूवैज्ञानिक वर्गीकरण
1. प्रमुख भूगर्भिक खंड
भौतिक एवं संरचनात्मक विशेषताओं के आधार पर भारत को तीन प्रमुख भूगर्भिक खंडों में विभाजित किया गया है:
क) प्रायद्वीपीय खंड
यह भारत का सबसे प्राचीन एवं स्थिर भूभाग है जो प्राचीन गोंडवानालैंड का हिस्सा था। इसका निर्माण मुख्य रूप से आर्कियन काल की प्राचीन नाइस और ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों से हुआ है। यह पठार एक कठोर खंड के रूप में खड़ा है और पुराकैम्ब्रियन काल से ही विवर्तनिक रूप से largely स्थिर रहा है।
- विशेषताएँ:
- इसमें चौड़ी तथा उथली घाटियाँ एवं गोलाकार पहाड़ियाँ मिलती हैं, जो अपरदन के लंबे इतिहास का प्रतीक हैं।
- यह धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के विशाल भंडार से संपन्न है।
- नर्मदा, तापी और महानदी की रिफ्ट घाटियों के अलावा यह क्षेत्र सामान्यतः भूकंपीय गतिविधियों से मुक्त है।
- इस खंड में दक्कन ट्रैप का निर्माण ज्वालामुखी क्रिया का परिणाम है।
ख) हिमालय और अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ
यह एक नवीन, अस्थिर और लचीली पर्वत श्रृंखला है। इसका निर्माण टर्शियरी (तृतीयक) युग में भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के अभिसरण के परिणामस्वरूप टेथिस सागर में जमा अवसादों के वलन से हुआ है।
- विशेषताएँ:
- ऊँची चोटियाँ, गहरी घाटियाँ, V-आकार की घाटियाँ और तेज बहने वाली नदियाँ इसकी युवावस्था का प्रमाण हैं।
- यह क्षेत्र विवर्तनिक रूप से सक्रिय है, जिसके कारण यहाँ भूकंप, भूस्खलन और भ्रंशन सामान्य घटनाएँ हैं।
- ये परतदार चट्टानों से निर्मित हैं, जिनमें जीवाश्म पाए जाते हैं।
ग) सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान
यह एक भू-अभिनति (Geosyncline) या गर्त है जिसका निर्माण हिमालय की उत्पत्ति के बाद हुआ। इसे हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों ने धीरे-धीरे पाटकर एक समतल एवं उपजाऊ मैदान में बदल दिया।
- विशेषताएँ:
- यह विश्व के सबसे विस्तृत और उपजाऊ जलोढ़ मैदानों में से एक है।
- इस मैदान में जलोढ़ की औसत गहराई 1000 से 2000 मीटर तक है।
- यह संरचनात्मक रूप से एक समतल और नीरस क्षेत्र है।
2. भूवैज्ञानिक कालक्रम के अनुसार चट्टानों का वर्गीकरण
भारत में पाई जाने वाली चट्टानों को उनके निर्माण काल के आधार पर निम्नलिखित क्रम में वर्गीकृत किया गया है (प्राचीन से नवीन):
क) आर्कियन क्रम की चट्टानें (प्री-कैम्ब्रियन)
- ये पृथ्वी की सबसे प्राचीन और प्राथमिक चट्टानें हैं, जिनका निर्माण पृथ्वी के ठंडा होने के समय हुआ।
- ये रवेदार हैं और अत्यधिक कायांतरण (Metamorphism) के कारण अपना मूल स्वरूप खो चुकी हैं। इन्हें ‘आधारभूत कॉम्प्लेक्स’ (Basement Complex) भी कहते हैं।
- इनमें जीवाश्मों का पूर्ण अभाव है।
- ये चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत के लगभग दो-तिहाई हिस्से में पाई जाती हैं और इनमें निकेल, लोहा, तांबा, मैंगनीज जैसे धात्विक खनिज पाए जाते हैं।
- उदाहरण: बंगाल नीस, बुंदेलखंड नीस, नीलगिरि नीस।
ख) धारवाड़ क्रम की चट्टानें
- ये भारत की प्राचीनतम अवसादी चट्टानें हैं, जिनका निर्माण आर्कियन चट्टानों के अपरदन और निक्षेपण से हुआ।
- इनमें भी जीवाश्म नहीं मिलते हैं, संभवतः क्योंकि उस समय तक जीवों का विकास नहीं हुआ था या कायांतरण के कारण वे नष्ट हो गए।
- ये आर्थिक दृष्टि से भारत की सबसे महत्वपूर्ण चट्टानें हैं क्योंकि भारत की लगभग सभी प्रमुख धातुएँ (लोहा, सोना, मैंगनीज, तांबा, जस्ता, टंगस्टन) इन्हीं में मिलती हैं।
- क्षेत्र: कर्नाटक का धारवाड़-बेल्लारी क्षेत्र, छोटानागपुर पठार, अरावली श्रृंखला।
ग) कुडप्पा क्रम की चट्टानें
- इनका निर्माण धारवाड़ क्रम की चट्टानों के अपरदन व निक्षेपण से हुआ है।
- ये भी परतदार चट्टानें हैं और इनमें भी जीवाश्म नहीं पाए जाते हैं।
- ये धात्विक गुणवत्ता में धारवाड़ चट्टानों से कमतर हैं।
- ये बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, एस्बेस्टस और संगमरमर जैसे भवन निर्माण सामग्री के लिए प्रसिद्ध हैं।
- क्षेत्र: मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के कुडप्पा जिले में, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी।
घ) विंध्यन क्रम की चट्टानें
- ये कुडप्पा चट्टानों के बाद बनी परतदार चट्टानें हैं जिनका निर्माण जल निक्षेपों द्वारा हुआ है।
- कुछ निचले स्तरों को छोड़कर ये जीवाश्म रहित हैं।
- इन चट्टानों में धात्विक खनिजों का अभाव होता है, परन्तु ये उच्च गुणवत्ता वाले भवन निर्माण सामग्री के लिए विख्यात हैं।
- इनसे बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, सजावटी पत्थर और हीरे (पन्ना और गोलकुंडा की खदानें) प्राप्त होते हैं।
- क्षेत्र: राजस्थान के चित्तौड़गढ़ से लेकर बिहार के सासाराम तक फैली विंध्य पर्वतमाला।
ङ) गोंडवाना क्रम की चट्टानें (कार्बोनिफेरस से जुरासिक काल)
- इन चट्टानों का निर्माण ऊपरी कार्बोनिफेरस युग में हुआ था। प्रायद्वीप में भ्रंशन के कारण बनी द्रोणियों में नदियों द्वारा विशाल वनस्पतियों के दबने से इन चट्टानों का निर्माण हुआ।
- भारत का 98% कोयला इन्हीं चट्टानों में संचित है। यह कोयला उच्च गुणवत्ता का बिटुमिनस कोयला है।
- इनमें जीवाश्म प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
- क्षेत्र: मुख्यतः दामोदर, सोन, महानदी और गोदावरी नदी घाटियाँ।
च) दक्कन ट्रैप (क्रिटेशियस काल)
- इसका निर्माण मेसोजोइक महाकल्प के अंत में हुए दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन से निकले बेसाल्टिक लावा के जमने से हुआ।
- ये अत्यंत कठोर चट्टानें हैं और सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का निर्माण करती हैं।
- इनके विखंडन से उपजाऊ काली या रेगुर मिट्टी का निर्माण हुआ है, जो कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
- क्षेत्र: महाराष्ट्र का अधिकांश भाग, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्से।
छ) टर्शियरी (तृतीयक) क्रम की चट्टानें (सेनोजोइक)
- यह काल हिमालय के निर्माण से संबंधित है। भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव से टेथिस सागर के अवसाद वलित होकर हिमालय बने।
- इस क्रम की चट्टानों में भारत के महत्वपूर्ण पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस भंडार पाए जाते हैं।
- क्षेत्र: हिमालयी क्षेत्र, असम, गुजरात और राजस्थान।
ज) क्वार्टरनरी (चतुर्थक) क्रम की चट्टानें (नूतन)
- यह भूगर्भिक इतिहास का सबसे नवीन काल है।
- इसमें सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र के विशाल मैदानों का निर्माण हुआ। इन मैदानों का निर्माण हिमालय और प्रायद्वीप से निकली नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ (बांगर और खादर) से हुआ है।
- कश्मीर घाटी में हिमोढ़ निक्षेप से बनी ‘करेवा’ संरचना भी इसी काल की है, जो जाफरान (केसर) की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
- थार मरुस्थल का निर्माण भी इसी युग में हुआ।
निष्कर्ष
भारत की भूगर्भिक संरचना में काल और प्रकृति की व्यापक विविधता परिलक्षित होती है। यह विविधता ही देश की खनिज संपदा की प्रचुरता, विभिन्न प्रकार की मृदाओं की उपस्थिति, और विविध स्थलाकृतिक स्वरूपों का मूल कारण है। प्राचीन स्थिर प्रायद्वीप जहाँ खनिजों का भंडार है, वहीं नवीन वलित हिमालय सदानीरा नदियों का स्रोत है, और नवीनतम मैदानी भाग देश का अन्न भंडार हैं। इस प्रकार, भूगर्भिक संरचना भारत के भौतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य की आधारशिला है।
उत्तरी और उत्तर-पूर्वी पर्वतमाला (हिमालय)
भारत के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित हिमालय पर्वतमाला भूवैज्ञानिक रूप से नवीन और संरचनात्मक रूप से एक मोड़दार (वलित) पर्वत श्रृंखला है। यह पश्चिम में सिंधु नदी के मोड़ से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक एक विशाल चाप के रूप में लगभग 2,400 किलोमीटर की लंबाई में फैली है। इसकी चौड़ाई पश्चिम में (कश्मीर) 400 किलोमीटर और पूर्व में (अरुणाचल प्रदेश) 150 किलोमीटर तक है। यह विश्व की सबसे ऊँची और सबसे उबड़-खाबड़ पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है।
हिमालय की उत्पत्ति
हिमालय का निर्माण प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार हुआ है। लगभग 7 करोड़ वर्ष पहले, भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन प्लेट से टकराई। इस टकराव के कारण दोनों प्लेटों के बीच स्थित टेथिस भू-अभिनति (Tethys Geosyncline) में जमा अवसादों में वलन (Folding) पड़ गया, जिससे हिमालय का उत्थान हुआ। यह प्रक्रिया आज भी जारी है, यही कारण है कि हिमालय भूवैज्ञानिक रूप से एक अस्थिर क्षेत्र है और इसकी ऊँचाई लगातार बढ़ रही है।
हिमालय का भौगोलिक वर्गीकरण
हिमालय को दो प्रमुख आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
- उत्तर से दक्षिण (समानांतर श्रेणियाँ)
- पश्चिम से पूर्व (क्षेत्रीय विभाजन)
हिमालय का उत्तर से दक्षिण समानांतर श्रेणियों में विभाजन (अनुदैर्ध्य विभाजन)
हिमालय पर्वत प्रणाली अपने आप में कोई एक अकेली पर्वत श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह लगभग समानांतर चलने वाली कई पर्वत श्रृंखलाओं का एक समूह है। उत्तर से दक्षिण की ओर, इन श्रृंखलाओं को उनकी विशिष्ट भूवैज्ञानिक संरचना, ऊँचाई और निर्माण काल के आधार पर चार मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है।
यह विभाजन इस प्रकार है:
- ट्रांस-हिमालय (परा-हिमालय या तिब्बती हिमालय)
- वृहद् हिमालय (महान हिमालय या हिमाद्रि)
- लघु हिमालय (मध्य हिमालय या हिमाचल)
- बाह्य हिमालय (उप-हिमालय या शिवालिक)
1. ट्रांस-हिमालय (परा-हिमालय या तिब्बती हिमालय)
ट्रांस-हिमालय, हिमालय की सबसे उत्तरी और भूवैज्ञानिक रूप से सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह वृहद् हिमालय (Great Himalaya) के उत्तर में स्थित है और भारतीय उपमहाद्वीप को तिब्बत के पठार से अलग करती है।
अवस्थिति एवं विस्तार
- भौगोलिक स्थिति: यह महान हिमालय के उत्तर में, उसके समानांतर एक विशाल क्षेत्र में फैली हुई है। इन दोनों पर्वत श्रृंखलाओं को एक गहरी विवर्तनिक घाटी द्वारा अलग किया जाता है जिसे ‘इंडस-सांगपो सचर ज़ोन’ (Indus-Tsangpo Suture Zone – ITSZ) कहते हैं। यह वह क्षेत्र है जहाँ भारतीय प्लेट, यूरेशियन प्लेट के नीचे क्षेपित हुई थी (subducted)।
- विस्तार: ट्रांस-हिमालय पश्चिम से पूर्व तक लगभग 1,000 किलोमीटर की लंबाई में फैला है। इसकी औसत चौड़ाई पूर्वी और पश्चिमी किनारों पर लगभग 40 किलोमीटर तथा मध्य भाग में लगभग 225 किलोमीटर है।
- क्षेत्रीय विस्तार: इसका अधिकांश हिस्सा तिब्बत में पड़ता है, इसीलिए इसे ‘तिब्बती हिमालय’ के नाम से भी जाना जाता है। भारत में इसका विस्तार मुख्य रूप से लद्दाख और उत्तरी हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में है।
उत्पत्ति एवं भूगर्भिक संरचना
- उत्पत्ति: ट्रांस-हिमालय का निर्माण वृहद् हिमालय के उत्थान से पहले, टर्शियरी (तृतीयक) और क्रिटेशियस काल के दौरान हुआ था। इसका निर्माण सीधे तौर पर भारतीय और यूरेशियन प्लेट के टकराव से नहीं, बल्कि यूरेशियन प्लेट के किनारे पर ज्वालामुखी गतिविधियों और अवसादों के जमाव से हुआ था।
- भूगर्भिक संरचना:
- इसकी चट्टानों में टेथिस सागर के समुद्री अवसादों के जीवाश्म युक्त अंश बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि यह क्षेत्र कभी एक विशाल महासागर का हिस्सा था।
- इसका कोर (आंतरिक भाग) ग्रेनाइट और वॉल्केनिक चट्टानों से बना है। इसे “बाथोलिथ” (Batholith) कहा जाता है, जो जमे हुए मैग्मा के विशाल पिंड होते हैं।
प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ
ट्रांस-हिमालय मुख्य रूप से चार प्रमुख और समानांतर पर्वत श्रेणियों से मिलकर बना है, जिनका क्रम उत्तर से दक्षिण इस प्रकार है:
- काराकोरम श्रेणी (Karakoram Range):
- यह ट्रांस-हिमालय की सबसे उत्तरी और सबसे ऊँची श्रेणी है।
- इसे ‘एशिया की रीढ़’ (Backbone of High Asia) के रूप में भी जाना जाता है।
- भारत की सबसे ऊँची और विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी K2 (गॉडविन ऑस्टिन, 8611 मीटर) इसी श्रेणी में स्थित है।
- ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर विश्व के कुछ सबसे लंबे ग्लेशियर यहीं पाए जाते हैं, जैसे सियाचिन (76 किमी), बाल्टोरो, बियाफो, और हिस्पर।
- लद्दाख श्रेणी (Ladakh Range):
- यह काराकोरम श्रेणी के दक्षिण में स्थित है और सिंधु तथा श्योक नदियों के बीच जल-विभाजक का कार्य करती है।
- सिंधु नदी इसके और जास्कर श्रेणी के बीच एक गहरी घाटी से होकर बहती है।
- विश्व की सबसे तीव्र ढाल वाली चोटियों में से एक, राकापोशी (7788 मीटर), इसी श्रेणी का हिस्सा है।
- प्रसिद्ध खारदुंग ला दर्रा इसी श्रेणी में स्थित है।
- जास्कर श्रेणी (Zaskar Range):
- यह लद्दाख श्रेणी के दक्षिण में और वृहद् हिमालय के उत्तर में स्थित है।
- यह लद्दाख को शेष भारत के पर्वतीय क्षेत्रों से अलग करती है।
- कैलाश श्रेणी (Kailash Range):
- यह लद्दाख श्रेणी की एक पूर्वी शाखा है, जो भारत के बाहर मुख्यतः पश्चिमी तिब्बत में स्थित है।
- प्रसिद्ध माउंट कैलाश और पवित्र मानसरोवर झील इसी श्रेणी के निकट स्थित हैं।
- सिंधु, सतलज और ब्रह्मपुत्र जैसी महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम स्थल इसी श्रेणी के आसपास है।
जलवायु एवं वनस्पति
- जलवायु: ट्रांस-हिमालय वृहद् हिमालय के वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow Area) में पड़ता है। मानसूनी हवाएँ वृहद् हिमालय की ऊँची दीवारों को पार नहीं कर पाती हैं, जिसके कारण इस क्षेत्र में बहुत कम वर्षा (लगभग 10-25 सेमी वार्षिक) होती है। यहाँ की जलवायु अत्यंत शुष्क, ठंडी और मरुस्थलीय है, जिसे शीत मरुस्थल (Cold Desert) कहा जाता है।
- वनस्पति: अत्यधिक शुष्कता और ठंड के कारण यहाँ वनस्पति का लगभग अभाव है। केवल नदी घाटियों के निचले हिस्सों में जहाँ थोड़ी नमी उपलब्ध होती है, वहाँ छोटी झाड़ियाँ और घास उगती हैं।
महत्व
- सामरिक महत्व: काराकोरम दर्रा और अन्य दर्रे प्राचीन काल से मध्य एशिया के साथ व्यापार मार्गों का हिस्सा रहे हैं। वर्तमान में सियाचिन जैसे क्षेत्रों के कारण इसका अत्यधिक सामरिक महत्व है।
- जल स्रोत: यहाँ स्थित विशाल ग्लेशियर सिंधु और उसकी सहायक नदियों जैसे श्योक, नुब्रा आदि के लिए जल का प्रमुख स्रोत हैं।
- खनिज संसाधन: इस क्षेत्र में कुछ खनिज संसाधनों की उपस्थिति की संभावना है, हालांकि दुर्गम इलाका होने के कारण इनका व्यापक सर्वेक्षण नहीं हो पाया है।
2. वृहद् हिमालय (महान हिमालय या हिमाद्रि – Great Himalaya or Himadri)
वृहद् हिमालय, जिसे महान हिमालय, आंतरिक हिमालय या हिमाद्रि के नाम से भी जाना जाता है, हिमालय पर्वत प्रणाली की सबसे केंद्रीय, सबसे ऊँची और सबसे प्रमुख श्रृंखला है। यह हिमालय की धुरी या ‘रीढ़’ का निर्माण करती है।
अवस्थिति एवं विस्तार
- भौगोलिक स्थिति: यह श्रृंखला ट्रांस-हिमालय के दक्षिण में और लघु (मध्य) हिमालय के उत्तर में स्थित है। इसे लघु हिमालय से ‘मेन सेंट्रल थ्रस्ट’ (Main Central Thrust – MCT) नामक एक प्रमुख विवर्तनिक भ्रंश रेखा अलग करती है।
- विस्तार: यह पश्चिम में जम्मू-कश्मीर के नंगा पर्वत (8,126 मीटर) से लेकर पूर्व में अरुणाचल प्रदेश-तिब्बत सीमा पर स्थित नामचा बरवा (7,782 मीटर) तक एक विशाल चाप (arc) के रूप में लगभग 2,400 किलोमीटर की लंबाई में अविच्छिन्न रूप से फैली हुई है।
- आयाम: इसकी औसत ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 6,000 मीटर है, जो इसे विश्व की सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला बनाती है। इसकी औसत चौड़ाई लगभग 120 से 190 किलोमीटर के बीच है।
भूगर्भिक संरचना एवं विशेषताएँ
- संरचना: वृहद् हिमालय का आंतरिक या केंद्रीय भाग (Core) ग्रेनाइट, नीस और शिस्ट जैसी प्राचीन रवेदार और कायांतरित चट्टानों से बना है। इसके किनारों पर अवसादी चट्टानें पाई जाती हैं।
- असममित वलन (Asymmetrical Folds): इस श्रृंखला के वलन असममित हैं, जिसका अर्थ है कि भारत की ओर इसका दक्षिणी ढलान अत्यंत तीव्र है, जबकि तिब्बत की ओर उत्तरी ढलान अपेक्षाकृत मंद है।
- निरंतरता: यह हिमालय की सबसे निरंतर (continuous) श्रृंखला है। इसे पार करना अत्यंत कठिन है और केवल कुछ ऊँचे पर्वतीय दर्रों के माध्यम से ही संभव है।
- ‘हिमाद्रि’ नाम: इसकी अधिकांश चोटियाँ स्थायी हिम-रेखा (Permanent Snow-line) से ऊपर हैं, जिसके कारण यह वर्ष भर बर्फ से ढकी रहती हैं। इसी शाश्वत हिम के आवरण के कारण इसे ‘हिमाद्रि’ (अर्थात् ‘बर्फ का घर’) कहा जाता है।
प्रमुख पर्वत शिखर
विश्व की अधिकांश सर्वोच्च पर्वत चोटियाँ इसी श्रृंखला का हिस्सा हैं। कुछ प्रमुख शिखर (पश्चिम से पूर्व की ओर) निम्नलिखित हैं:
| शिखर | ऊँचाई (मीटर में) | स्थिति |
| नंगा पर्वत | 8,126 | जम्मू और कश्मीर, भारत |
| कामेत | 7,756 | उत्तराखंड, भारत |
| नंदा देवी | 7,816 | उत्तराखंड, भारत (भारत में स्थित सर्वोच्च चोटी जो पूरी तरह देश के भीतर है) |
| धौलागिरी | 8,172 | नेपाल |
| अन्नपूर्णा | 8,091 | नेपाल |
| माउंट एवरेस्ट | 8,848.86 | नेपाल-चीन सीमा (विश्व का सर्वोच्च शिखर) |
| मकालू | 8,481 | नेपाल-चीन सीमा |
| कंचनजंघा | 8,598 | सिक्किम-नेपाल सीमा (भारत की सबसे ऊँची और विश्व की तीसरी सबसे ऊँची चोटी) |
| नामचा बरवा | 7,782 | तिब्बत/अरुणाचल प्रदेश सीमा |
प्रमुख हिमनद (Glaciers) एवं नदियाँ
- यह श्रृंखला विशाल हिमनदों का घर है, जो उत्तर भारत की कई सदानीरा (Perennial) नदियों को जन्म देते हैं।
- प्रमुख हिमनद: गंगोत्री, यमुनोत्री, पिंडारी, मिलाम, जेमू और सतोपंथ।
- उद्गमित नदियाँ: इन्हीं हिमनदों से गंगा, यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी और ब्रह्मपुत्र (तिब्बत से) जैसी विशाल नदियों का उद्गम होता है, जो भारत के उत्तरी मैदानों के लिए जीवनरेखा हैं।
प्रमुख दर्रे (Passes)
चूंकि यह एक निरंतर श्रृंखला है, इसमें मौजूद दर्रे ही तिब्बत के पठार के साथ संपर्क का एकमात्र साधन प्रदान करते हैं।
- जम्मू-कश्मीर: बुर्जिल दर्रा, जोजिला दर्रा।
- हिमाचल प्रदेश: बारालाचा ला, शिपकी ला (जिससे सतलज नदी भारत में प्रवेश करती है)।
- उत्तराखंड: थागा ला, नीति दर्रा, लिपुलेख।
- सिक्किम: नाथू ला, जेलेप ला (जो भारत को ल्हासा से जोड़ते हैं)।
महत्व
- जलवायु विभाजक: यह एक प्रभावी जलवायु विभाजक के रूप में कार्य करता है, जो मध्य एशिया से आने वाली बर्फीली हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करने से रोकता है।
- मानसून के लिए अवरोध: यह दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के लिए एक अवरोधक के रूप में कार्य करता है, जिससे उन्हें अपनी नमी उत्तर भारत के मैदानों में वर्षा के रूप में छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
- नदियों का स्रोत: यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों का स्रोत है, जो पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत के लिए आवश्यक हैं।
3. लघु हिमालय (मध्य हिमालय या हिमाचल – Lesser or Middle Himalaya or Himachal)
लघु हिमालय, जिसे मध्य हिमालय या हिमाचल श्रेणी के नाम से भी जाना जाता है, वृहद् हिमालय (हिमाद्रि) के दक्षिण में और शिवालिक श्रेणी के उत्तर में लगभग समानांतर स्थित एक जटिल और विखंडित पर्वत श्रृंखला है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता, स्वास्थ्यवर्धक जलवायु और प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों के लिए विख्यात है।
अवस्थिति एवं विस्तार
- भौगोलिक स्थिति: यह श्रृंखला वृहद् हिमालय और शिवालिक के बीच में स्थित है। वृहद् हिमालय से इसे ‘मेन सेंट्रल थ्रस्ट’ (Main Central Thrust – MCT) नामक भ्रंश रेखा अलग करती है, जबकि शिवालिक श्रेणी से यह ‘मेन बाउंड्री फॉल्ट’ (Main Boundary Fault – MBF) द्वारा अलग होती है।
- आयाम: इसकी औसत चौड़ाई लगभग 50 से 80 किलोमीटर है। ऊँचाई में काफी भिन्नता पाई जाती है, जो औसतन 3,700 से 4,500 मीटर के बीच है।
भूगर्भिक संरचना एवं विशेषताएँ
- संरचना: इसका निर्माण मुख्य रूप से अत्यधिक संपीड़ित (Compressed) और कायांतरित (Metamorphosed) चट्टानों जैसे- स्लेट, चूना पत्थर, क्वार्टजाइट और कांग्लोमरेट से हुआ है।
- विखंडित स्वरूप: वृहद् हिमालय के विपरीत, यह एक निरंतर श्रृंखला नहीं है। हिमालय से निकलने वाली तेज-प्रवाह वाली नदियों ने इसे कई स्थानों पर काटकर गहरी घाटियों और गॉर्ज का निर्माण किया है, जिससे यह कई छोटी-छोटी श्रेणियों में विभाजित हो गई है।
- स्थलाकृति: इसके ढलान घने जंगलों से आच्छादित हैं। उत्तरी ढलान सामान्यतः मंद हैं और वनों से ढके हैं, जबकि दक्षिणी ढलान तीव्र और खड़े हैं, जिन पर वनस्पति कम पाई जाती है।
प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ (पश्चिम से पूर्व)
लघु हिमालय कई महत्वपूर्ण श्रेणियों में विभाजित है:
- पीर पंजाल श्रेणी (Pir Panjal Range):
- यह लघु हिमालय की सबसे लंबी और सबसे महत्वपूर्ण श्रृंखला है।
- इसका विस्तार मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में है।
- झेलम और ब्यास नदियाँ इसे काटती हैं। प्रसिद्ध बनिहाल दर्रा (जिससे जवाहर सुरंग गुजरती है) और पीर पंजाल दर्रा इसी श्रेणी में हैं।
- धौलाधार श्रेणी (Dhauladhar Range):
- यह पीर पंजाल के दक्षिण में स्थित है और इसका अधिकांश विस्तार हिमाचल प्रदेश में है।
- यह कांगड़ा और कुल्लू घाटियों के ऊपर अचानक ऊँचाई प्राप्त करती है। धर्मशाला और शिमला इसी श्रेणी की तलहटी में स्थित हैं।
- मसूरी श्रेणी (Mussoorie Range):
- इसका विस्तार मुख्यतः उत्तराखंड में है। प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मसूरी इसी पर स्थित है।
- नाग टिब्बा श्रेणी (Nag Tibba Range):
- यह भी उत्तराखंड में स्थित मसूरी श्रेणी का ही पूर्वी भाग है।
- महाभारत श्रेणी (Mahabharat Range):
- जब यह श्रृंखला नेपाल में प्रवेश करती है, तो इसे महाभारत श्रेणी के नाम से जाना जाता है।
प्रमुख घाटियाँ
लघु हिमालय और वृहद् हिमालय के बीच कई विस्तृत, समतल और उपजाऊ घाटियाँ स्थित हैं। ये घाटियाँ सघन आबादी वाली हैं और कृषि के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- कश्मीर घाटी: पीर पंजाल और वृहद् हिमालय के बीच स्थित है, जिसमें झेलम नदी बहती है।
- कांगड़ा और कुल्लू घाटी: हिमाचल प्रदेश में स्थित हैं और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं।
- काठमांडू घाटी: नेपाल में स्थित एक महत्वपूर्ण और सघन आबादी वाली घाटी है।
प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन स्थल (Hill Stations)
भारत के अधिकांश प्रसिद्ध हिल स्टेशन इसी श्रेणी में स्थित हैं, जिनकी स्थापना ब्रिटिश काल में हुई थी। यहाँ की ठंडी और सुखद जलवायु गर्मियों में पर्यटकों को आकर्षित करती है।
- हिमाचल प्रदेश: शिमला, डलहौजी, धर्मशाला, कुल्लू-मनाली।
- उत्तराखंड: मसूरी, नैनीताल, रानीखेत, अल्मोड़ा।
- पश्चिम बंगाल: दार्जिलिंग।
वनस्पति एवं जलवायु (Alpine Pastures)
- इस श्रेणी पर कोणधारी (Coniferous) वनों की प्रधानता है। ऊँचाई पर देवदार, चीड़, स्प्रूस और फर के वृक्ष पाए जाते हैं।
- वृक्ष रेखा (Tree Line) के ऊपर, ग्रीष्मकाल में मुलायम घास के मैदान उग आते हैं, जिन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है:
- मर्ग (Marg) – कश्मीर में (जैसे: सोनमर्ग, गुलमर्ग)।
- बुग्याल और पयार (Bugyal & Payar) – उत्तराखंड में।
4. बाह्य हिमालय (उप-हिमालय या शिवालिक – Outer Himalaya or Shiwalik)
बाह्य हिमालय, जिसे सामान्यतः शिवालिक श्रेणी के नाम से जाना जाता है, हिमालय पर्वत प्रणाली की सबसे दक्षिणी, सबसे नवीन और सबसे कम ऊँची श्रृंखला है। यह उत्तर भारत के विशाल मैदानों और लघु हिमालय के बीच एक संक्रमणकालीन क्षेत्र (transitional zone) का निर्माण करती है।
अवस्थिति एवं विस्तार
- भौगोलिक स्थिति: यह श्रृंखला लघु (मध्य) हिमालय के दक्षिण में स्थित है और उत्तर भारत के मैदानों से सटी हुई है। इसे लघु हिमालय से ‘मेन बाउंड्री फॉल्ट’ (Main Boundary Fault – MBF) नामक एक भ्रंश रेखा अलग करती है। वहीं, यह उत्तरी मैदानों से ‘हिमालयन फ्रंटल फॉल्ट’ (Himalayan Frontal Fault – HFF) द्वारा पृथक होती है।
- विस्तार: यह पश्चिम में पाकिस्तान के पोतवार पठार से लेकर पूर्व में अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी तक लगभग 2,400 किलोमीटर की लंबाई में फैली है। हालांकि, पूर्व में तिस्ता और रैदक नदियों के बीच लगभग 80-90 किलोमीटर का क्षेत्र ऐसा है जहाँ यह विलुप्त हो जाती है और लघु हिमालय के साथ मिल जाती है।
- आयाम: यह हिमालय की सबसे कम ऊँची श्रृंखला है। इसकी औसत ऊँचाई 900 से 1,100 मीटर के बीच है और इसकी चौड़ाई में काफी भिन्नता है, जो हिमाचल प्रदेश में लगभग 50 किलोमीटर से लेकर अरुणाचल प्रदेश में मात्र 15 किलोमीटर रह जाती है।
उत्पत्ति एवं भूगर्भिक संरचना
- उत्पत्ति: शिवालिक का निर्माण हिमालय के उत्थान के सबसे अंतिम चरण में, लगभग 2 से 20 मिलियन वर्ष पूर्व (मायोसीन से प्लायोसीन काल में) हुआ था। इसका निर्माण वृहद् और लघु हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए असंघठित अवसादों (Unconsolidated Sediments) के निक्षेपण और बाद में उनमें पड़े वलन (folding) के कारण हुआ।
- भूगर्भिक संरचना: यह श्रृंखला मुख्य रूप से बलुआ पत्थर (Sandstone), चीका-मिट्टी (Clay) और गोलाश्म-कांग्लोमरेट (Boulder-Conglomerate) जैसी मुलायम और असंगठित अवसादी चट्टानों से बनी है। ये अवसाद हिमालय की नदियों द्वारा बहाकर लाए गए थे, इसलिए इन्हें ‘मोलास’ (Molasse) भी कहा जाता है।
- अपरदन और भूस्खलन: अपनी मुलायम और असंगठित चट्टानी संरचना के कारण, यह श्रृंखला अपरदन (Erosion) और भूस्खलन (Landslides) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, खासकर भारी वर्षा के दौरान।
प्रमुख स्थलाकृतियाँ – दून एवं द्वार (Duns and Duars)
शिवालिक की सबसे विशिष्ट स्थलाकृतिक विशेषता यहाँ पाई जाने वाली अनुदैर्ध्य घाटियाँ (Longitudinal Valleys) हैं। ये घाटियाँ शिवालिक और लघु हिमालय के बीच स्थित हैं।
- निर्माण प्रक्रिया: ऐसा माना जाता है कि इन घाटियों का निर्माण तब हुआ जब नदियों के मार्ग अस्थायी रूप से अवरुद्ध हो गए, जिससे झीलों का निर्माण हुआ। इन झीलों में धीरे-धीरे कंकड़, पत्थर और जलोढ़ जमा होते गए। बाद में, जब नदियों ने अपना मार्ग पुनः बनाया, तो ये झीलें सूख गईं और समतल सतह वाली उपजाऊ घाटियाँ पीछे रह गईं।
- क्षेत्रीय नाम:
- दून (Dun): पश्चिम में इन घाटियों को ‘दून’ कहा जाता है। देहरादून इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। अन्य दून में कोटली दून, ऊधमपुर दून और पतली दून शामिल हैं।
- द्वार (Duar): पूर्व में इन्हें ‘द्वार’ कहा जाता है। हरिद्वार इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
ये घाटियाँ घनी आबादी वाली और गहन कृषि (विशेषकर बासमती चावल) के लिए प्रसिद्ध हैं।
क्षेत्रीय नाम
शिवालिक को अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नामों से जाना जाता है:
- जम्मू क्षेत्र: जम्मू पहाड़ियाँ (Jammu Hills)
- उत्तराखंड: धांग श्रेणी और Dundwa रेंज
- नेपाल: चुरिया-मुरिया या चुरे पहाड़ियाँ (Churia-Muria or Chure Hills)
- अरुणाचल प्रदेश: यहाँ इसे डाफला, मिरी, अबोर और मिश्मी पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है (हालांकि, ये पूर्वांचल का हिस्सा मानी जाती हैं, पर शिवालिक की सीध में स्थित हैं)।
महत्व
- मानसूनी वर्षा: यह मानसून की पहली बाधा के रूप में कार्य करती है, जिससे इसकी दक्षिणी ढलानों पर भारी वर्षा होती है।
- वनस्पति: यहाँ उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन पाए जाते हैं। ये वन क्षेत्र वन्यजीवों के लिए एक महत्वपूर्ण आवास हैं (जैसे- राजाजी और कॉर्बेट नेशनल पार्क)।
- कृषि और बसावट: दून जैसी उपजाऊ घाटियाँ कृषि और मानव बस्तियों के लिए आदर्श दशाएँ प्रदान करती हैं।
- प्राकृतिक आपदा: भूवैज्ञानिक रूप से अस्थिर और मुलायम चट्टानों से बने होने के कारण यह क्षेत्र भूकंप और भूस्खलन जैसी आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
हिमालय का पश्चिम से पूर्व क्षेत्रीय विभाजन
हिमालय के समानांतर अनुदैर्ध्य विभाजन के अलावा, इसे पश्चिम से पूर्व तक नदी घाटियों द्वारा सीमांकित क्षेत्रों में भी विभाजित किया जाता है। यह वर्गीकरण सर सिडनी बुरार्ड (Sir Sydney Burrard) द्वारा प्रस्तावित किया गया था और यह हिमालय की क्षेत्रीय विशेषताओं को समझने में मदद करता है। यह विभाजन मुख्य रूप से चार खंडों में किया गया है:
1. पंजाब हिमालय (या कश्मीर और हिमाचल हिमालय)
पंजाब हिमालय, हिमालय के पश्चिम से पूर्व क्षेत्रीय विभाजन का सबसे पश्चिमी खंड है। इसका यह नाम पंजाब क्षेत्र में बहने वाली पाँच प्रमुख नदियों के आधार पर पड़ा है। चूंकि इसका अधिकांश विस्तार जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश राज्यों में है, इसलिए इसे कश्मीर हिमालय और हिमाचल हिमालय के नाम से भी जाना जाता है।
सीमा और विस्तार
- नदी सीमा: यह हिमालयी खंड पश्चिम में सिंधु नदी (Indus River) और पूर्व में सतलज नदी (Sutlej River) के बीच स्थित है।
- लंबाई: पश्चिम से पूर्व तक इसकी कुल लंबाई लगभग 560 किलोमीटर है।
- चौड़ाई: यह हिमालय का सबसे चौड़ा हिस्सा है, जिसकी चौड़ाई 250 से 400 किलोमीटर तक है।
प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ एवं श्रेणियाँ
इस खंड में हिमालय की सभी समानांतर श्रेणियाँ (ट्रांस, वृहद्, लघु और शिवालिक) स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जिनकी अपनी विशिष्टताएँ हैं:
- ट्रांस-हिमालयी श्रेणियाँ:
- पंजाब हिमालय के सबसे उत्तरी भाग में ट्रांस-हिमालय की काराकोरम, लद्दाख और जास्कर श्रेणियाँ स्थित हैं।
- लद्दाख का ठंडा मरुस्थल, जो वृहद् हिमालय की वृष्टि-छाया में पड़ता है, इसी क्षेत्र का हिस्सा है।
- वृहद् हिमालय (Great Himalaya):
- जास्कर श्रेणी के दक्षिण में वृहद् हिमालय की श्रृंखला है। यहाँ के कुछ महत्वपूर्ण दर्रों में जोजिला (Zoji La) शामिल है।
- लघु हिमालय (Lesser Himalaya):
- यह इस क्षेत्र का सबसे प्रमुख और जटिल भाग है। यहाँ पीर पंजाल श्रेणी और धौलाधार श्रेणी स्थित हैं।
- पीर पंजाल श्रेणी लघु हिमालय की सबसे लंबी श्रृंखला है और वृहद् हिमालय के समानांतर चलती है।
- धौलाधार श्रेणी मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश में स्थित है।
- शिवालिक श्रेणी:
- यह इस खंड की सबसे दक्षिणी श्रेणी है और इसे स्थानीय रूप से ‘जम्मू पहाड़ियाँ’ के नाम से जाना जाता है।
अनूठी स्थलाकृतियाँ और विशेषताएँ
- कश्मीर घाटी (Vale of Kashmir):
- यह इस क्षेत्र की सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण विशेषता है। यह एक विशाल अंडाकार बेसिन है जो वृहद् हिमालय और पीर पंजाल श्रेणी के बीच स्थित है।
- इसका निर्माण प्लीस्टोसीन युग में एक विशाल झील के निक्षेपों से हुआ है, जिसे झेलम नदी ने अपने प्रवाह से एक घाटी में बदल दिया।
- करेवा (Karewas):
- कश्मीर घाटी में पाए जाने वाले हिमोढ़ निक्षेपों (Glacial Deposits) को करेवा कहा जाता है। ये निक्षेप बहुत उपजाऊ होते हैं।
- करेवा की भूमि विश्व प्रसिद्ध जाफरान (केसर) की खेती के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा यहाँ सेब, बादाम, अखरोट और अन्य फलों का भी उत्पादन होता है।
- प्रमुख दर्रे (Passes):
- इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण दर्रे हैं जो सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख: ज़ोजिला, बनिहाल (जिससे जवाहर सुरंग गुजरती है), खारदुंग ला, फोटू ला।
- हिमाचल प्रदेश: बारालाचा ला, रोहतांग दर्रा, शिपकी ला (जिससे सतलज नदी भारत में प्रवेश करती है)।
- प्रमुख हिमनद और झीलें:
- यह क्षेत्र बड़े-बड़े हिमनदों का घर है, जैसे सियाचिन, बाल्टोरो, हिस्पर।
- यहाँ डल और वुलर जैसी प्रसिद्ध मीठे पानी की झीलें हैं, तथा पैंगोंग त्सो और त्सो मोरीरी जैसी खारे पानी की झीलें भी लद्दाख में स्थित हैं।
अपवाह तंत्र (Drainage System)
- यह क्षेत्र सिंधु नदी और उसकी पाँच प्रमुख सहायक नदियों – झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलज – द्वारा अपवाहित होता है। इन्हीं नदियों के कारण इसे ‘पंजाब’ हिमालय नाम दिया गया।
महत्व
- कृषि और बागवानी: केसर की खेती, सेब और अन्य मेवों के बागानों के लिए यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- पर्यटन: कश्मीर घाटी (‘पृथ्वी पर स्वर्ग’), शिमला, मनाली, डलहौजी जैसे पर्यटन स्थल और वैष्णो देवी, अमरनाथ जैसे पवित्र तीर्थ स्थल होने के कारण यह पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र है।
- सामरिक महत्व: पाकिस्तान और चीन के साथ सीमाएँ लगने के कारण यह क्षेत्र भारत के लिए सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. कुमाऊँ हिमालय (Kumaon Himalaya)
कुमाऊँ हिमालय, हिमालय के पश्चिम-से-पूर्व क्षेत्रीय वर्गीकरण का दूसरा और अपेक्षाकृत छोटा खंड है। यह अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक सुंदरता के लिए भारत में विशेष महत्व रखता है।
सीमा और विस्तार
- नदी सीमा: यह हिमालयी खंड पश्चिम में सतलज नदी (Sutlej River) और पूर्व में काली या शारदा नदी (Kali or Sharda River) के बीच स्थित है। काली नदी भारत और नेपाल के बीच सीमा बनाती है।
- लंबाई: पश्चिम से पूर्व तक इसकी कुल लंबाई लगभग 320 किलोमीटर है। यह क्षेत्रीय विभाजनों में सबसे छोटा खंड है।
- क्षेत्र: इसका विस्तार मुख्य रूप से उत्तराखंड राज्य में है, जिसे दो प्रशासनिक मंडलों – कुमाऊँ और गढ़वाल में विभाजित किया गया है। इसलिए, भौगोलिक रूप से इस खंड में गढ़वाल हिमालय भी शामिल है।
प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ
- पर्वत शिखर (Mountain Peaks):
- यद्यपि यह नेपाल हिमालय जितना ऊँचा नहीं है, फिर भी इसमें कई महत्वपूर्ण और ऊँची चोटियाँ स्थित हैं।
- इस खंड की सर्वोच्च चोटी नंदा देवी (7,816 मीटर) है। यह भारत में स्थित सबसे ऊँची चोटी है जो पूरी तरह से देश की सीमाओं के भीतर है।
- अन्य प्रमुख चोटियों में कामेत, त्रिशूल, बद्रीनाथ, केदारनाथ, द्रोणगिरि और गंगोत्री शामिल हैं।
- हिमनद एवं नदियाँ (Glaciers and Rivers):
- यह क्षेत्र भारत की दो सबसे पवित्र और जीवनदायिनी नदियों, गंगा और यमुना, का उद्गम स्थल है।
- यहाँ कई विशाल हिमनद (ग्लेशियर) मौजूद हैं, जिनमें गंगोत्री, यमुनोत्री, पिंडारी और मिलाम प्रमुख हैं।
- इसी क्षेत्र में प्रसिद्ध पंच प्रयाग (विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग) स्थित हैं, जहाँ विभिन्न नदियों के संगम होते हैं और अंततः देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम से गंगा नदी का निर्माण होता है।
- झीलें (‘ताल’):
- कुमाऊँ हिमालय अपनी सुन्दर हिमनद-निर्मित झीलों के लिए भी प्रसिद्ध है, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘ताल’ कहा जाता है।
- प्रमुख झीलों में नैनीताल, भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल और रूपकुंड (रहस्यमयी झील) शामिल हैं।
- दून घाटियाँ (Dun Valleys):
- पंजाब हिमालय की तरह यहाँ भी शिवालिक और लघु हिमालय के बीच अनुदैर्ध्य घाटियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें ‘दून’ कहते हैं। देहरादून इस क्षेत्र की सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध दून घाटी है।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
- यह क्षेत्र “देवभूमि” के नाम से विख्यात है क्योंकि यह हिंदू धर्म के कुछ सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों का घर है।
- प्रसिद्ध छोटा चार धाम यात्रा के चारों पवित्र स्थल यहीं स्थित हैं: यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ।
- हेमकुंड साहिब, जो सिखों का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, वह भी इसी क्षेत्र में स्थित है।
- प्रयागों का संगम और ऋषिकेश-हरिद्वार जैसे आध्यात्मिक केंद्र इसे भारत का सबसे महत्वपूर्ण तीर्थाटन क्षेत्र बनाते हैं।
पर्यटन और जैव-विविधता
- यह क्षेत्र अपने खूबसूरत हिल स्टेशनों के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें नैनीताल, मसूरी, अल्मोड़ा और रानीखेत प्रमुख हैं।
- यहाँ फूलों की घाटी (Valley of Flowers) राष्ट्रीय उद्यान और नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व स्थित हैं, जिन्हें यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव-विविधता, विशेष रूप से अल्पाइन वनस्पतियों के लिए जाना जाता है।
3. नेपाल हिमालय (Nepal Himalaya)
नेपाल हिमालय, हिमालय के पश्चिम-से-पूर्व क्षेत्रीय विभाजन का तीसरा, सबसे लंबा और सबसे ऊँचा खंड है। यह अपनी विश्व प्रसिद्ध ऊँची पर्वत चोटियों के लिए जाना जाता है, जो इसे पर्वतारोहियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक वैश्विक आकर्षण का केंद्र बनाती हैं।
सीमा और विस्तार
- नदी सीमा: यह हिमालयी खंड पश्चिम में काली नदी (Kali River), जो कुमाऊँ हिमालय के साथ इसकी सीमा बनाती है, और पूर्व में तिस्ता नदी (Tista River) के बीच स्थित है, जो इसे असम हिमालय से अलग करती है।
- लंबाई: पश्चिम से पूर्व तक इसकी कुल लंबाई लगभग 800 किलोमीटर है। यह हिमालय के चारों क्षेत्रीय विभाजनों में सबसे लंबा खंड है।
- क्षेत्र: जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसका अधिकांश विस्तार नेपाल देश में है। हालांकि, इसका पूर्वी भाग भारत के सिक्किम और पश्चिम बंगाल राज्यों को भी छूता है।
प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ
- विश्व के सर्वोच्च पर्वत शिखर:
- यह हिमालय का सबसे ऊँचा भाग है। विश्व की 10 सर्वोच्च चोटियों में से 8 इसी खंड में स्थित हैं।
- यहाँ स्थित पर्वत श्रृंखलाओं को ‘हिमालय’ शब्द का पर्याय माना जाता है।
- प्रमुख शिखर:
| शिखर | ऊँचाई (मीटर में) | स्थिति | टिप्पणी |
| माउंट एवरेस्ट | 8,848.86 | नेपाल-चीन सीमा | विश्व का सर्वोच्च शिखर; नेपाल में ‘सगरमाथा’, तिब्बत में ‘चोमोलुंगमा’ |
| कंचनजंघा | 8,598 | नेपाल-सिक्किम सीमा | विश्व का तीसरा सबसे ऊँचा शिखर; भारत की सबसे ऊँची चोटी |
| ल्होत्से | 8,516 | नेपाल-चीन सीमा | विश्व का चौथा सबसे ऊँचा शिखर |
| मकालू | 8,481 | नेपाल-चीन सीमा | विश्व का पाँचवाँ सबसे ऊँचा शिखर |
| धौलागिरी | 8,172 | नेपाल | |
| मनास्लु | 8,163 | नेपाल | |
| अन्नपूर्णा | 8,091 | नेपाल |
प्रमुख घाटियाँ:- इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण और सघन आबादी वाली घाटियाँ हैं, जो वृहद् और लघु हिमालय के बीच स्थित हैं।
- काठमांडू घाटी (Kathmandu Valley): यह नेपाल की सबसे प्रसिद्ध, सबसे बड़ी और सबसे घनी आबादी वाली घाटी है। यह एक सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र है।
- अपवाह तंत्र (Drainage System):
- यह खंड भारत की कुछ प्रमुख नदी प्रणालियों का स्रोत है, जो उत्तरी मैदानों में विशाल जलराशि लेकर पहुँचती हैं।
- प्रमुख नदियाँ: घाघरा (कर्णाली), गंडक (नारायणी), और कोसी (सप्तकोसी)।
- कोसी नदी अपने मार्ग परिवर्तन और विनाशकारी बाढ़ के लिए कुख्यात है, जिसके कारण इसे “बिहार का शोक” भी कहा जाता है।
महत्व
- जल संसाधन: यह क्षेत्र उत्तर भारत के मैदानी इलाकों के लिए जल का एक विशाल स्रोत है, जो सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए महत्वपूर्ण है।
- जलविद्युत क्षमता: इन नदियों की खड़ी ढलानों और विशाल जल प्रवाह के कारण यहाँ जलविद्युत उत्पादन की अपार क्षमता है, जिसका नेपाल और भारत मिलकर विकास कर रहे हैं।
- पर्यटन एवं पर्वतारोहण: माउंट एवरेस्ट और अन्य ऊँची चोटियाँ दुनिया भर के पर्वतारोहियों और ट्रेकर्स को आकर्षित करती हैं, जो नेपाल की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार है।
- जैव-विविधता: ऊँचाई में अत्यधिक भिन्नता के कारण यहाँ उपोष्णकटिबंधीय जंगलों से लेकर अल्पाइन टुंड्रा तक विविध प्रकार की वनस्पतियाँ और जीव-जंतु पाए जाते हैं। सागरमाथा राष्ट्रीय उद्यान इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
4. असम हिमालय (Assam Himalaya)
असम हिमालय, हिमालय के पश्चिम-से-पूर्व क्षेत्रीय विभाजन का सबसे पूर्वी खंड है। यह अपनी अनूठी स्थलाकृति, अत्यधिक वर्षा, सघन वनों और समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है।
सीमा और विस्तार
- नदी सीमा: यह हिमालयी खंड पश्चिम में तिस्ता नदी (Tista River), जो नेपाल हिमालय के साथ इसकी सीमा बनाती है, और पूर्व में दिहांग नदी (Dihang River) या ब्रह्मपुत्र नदी के महाखड्ड (Gorge) के बीच स्थित है।
- लंबाई: पश्चिम से पूर्व तक इसकी कुल लंबाई लगभग 720-750 किलोमीटर है।
- क्षेत्र: इसका विस्तार भारत के सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश राज्यों के साथ-साथ भूटान देश में भी है।
प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ
- पर्वत शिखर (Mountain Peaks):
- असम हिमालय की ऊँचाई नेपाल हिमालय की तुलना में कम है, और यहाँ की बर्फ-रेखा (snowline) भी अधिक ऊँचाई पर पाई जाती है।
- इस खंड की सबसे महत्वपूर्ण और पूर्वी चोटी नामचा बरवा (Namcha Barwa, 7,782 मीटर) है, जो तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ के ठीक उत्तर में स्थित है।
- भूटान में कुला कांगड़ी (Kula Kangri) और जोमोलहारी (Jomolhari) जैसी अन्य महत्वपूर्ण चोटियाँ हैं।
- अक्षसंधीय मोड़ (Syntaxial Bend):
- असम हिमालय की सबसे विशिष्ट भू-आकृतिक विशेषता इसका पूर्वी सिरा है। नामचा बरवा शिखर के पास, हिमालय पर्वतमाला अचानक दक्षिण की ओर एक तीव्र, हेयरपिन जैसा मोड़ लेती है।
- इस मोड़ को अक्षसंधीय मोड़ कहा जाता है। यहीं से हिमालय अपनी पूर्व-पश्चिम दिशा छोड़कर उत्तर-दक्षिण दिशा में पूर्वांचल की पहाड़ियों (पटकाई, नागा, मिज़ो आदि) के रूप में आगे बढ़ता है।
- ब्रह्मपुत्र और दिहांग गॉर्ज:
- तिब्बत के पठार से बहने वाली त्सांगपो नदी, नामचा बरवा को काटकर एक अत्यंत गहरे महाखड्ड (Gorge) का निर्माण करती है, जिसे दिहांग गॉर्ज कहते हैं। इसी गॉर्ज के माध्यम से यह नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश में ‘दिहांग’ नाम से प्रवेश करती है और आगे असम में ‘ब्रह्मपुत्र’ कहलाती है।
- कमजोर शिवालिक संरचना:
- इस क्षेत्र में शिवालिक श्रेणी काफी संकरी है और कई स्थानों पर लघु हिमालय में विलीन हो जाती है। अरुणाचल प्रदेश में शिवालिक की सीध में स्थित पहाड़ियों को स्थानीय जनजातियों के नाम पर जाना जाता है, जैसे डाफला, मिरी, अबोर और मिश्मी पहाड़ियाँ।
जलवायु, वनस्पति और जैव-विविधता
- जलवायु: बंगाल की खाड़ी से निकटता के कारण यह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून से अत्यधिक वर्षा प्राप्त करता है। यहाँ की जलवायु बहुत आर्द्र और नम है।
- वनस्पति: भारी वर्षा के कारण, यह क्षेत्र घने उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों (Evergreen Forests) से आच्छादित है। यहाँ वनस्पति की सघनता हिमालय के किसी भी अन्य भाग से अधिक है।
- जैव-विविधता: यह क्षेत्र जैव-विविधता का एक प्रमुख हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot) है। यहाँ वनस्पतियों और जीवों की असंख्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
अपवाह तंत्र (Drainage System)
- इस क्षेत्र की प्रमुख नदी ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ हैं।
- यहाँ की नदियाँ खड़ी ढलानों से उतरती हैं, जिससे वे अपने साथ भारी मात्रा में जल और अवसाद लाती हैं। यही कारण है कि असम के मैदानी इलाकों में ब्रह्मपुत्र नदी अक्सर विनाशकारी बाढ़ लाती है।
- प्रमुख सहायक नदियों में सुबनसिरी, मानस, लोहित, दिबांग और कामेंग शामिल हैं।
महत्व
- जलविद्युत क्षमता: तीव्र ढाल वाली और विशाल जलराशि वाली नदियों के कारण इस क्षेत्र में जलविद्युत उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं।
- जनजातीय संस्कृति: यह क्षेत्र विविध जनजातीय समूहों का घर है, जिनकी अपनी अनूठी संस्कृति और जीवन शैली है, जो प्रकृति के साथ गहराई से जुड़ी हुई है।
- सामरिक महत्व: चीन (तिब्बत) के साथ एक लंबी सीमा साझा करने के कारण अरुणाचल प्रदेश सहित यह पूरा क्षेत्र भारत के लिए अत्यधिक सामरिक महत्व रखता है।
सारांश तालिका
| हिमालय का खंड | नदी सीमा | लंबाई (लगभग) | मुख्य विशेषताएँ |
| पंजाब हिमालय | सिंधु से सतलज | 560 किमी | सबसे चौड़ा भाग, करेवा का निर्माण, कश्मीर घाटी। |
| कुमाऊँ हिमालय | सतलज से काली | 320 किमी | गंगा-यमुना का उद्गम, नंदा देवी शिखर, झीलें (ताल)। |
| नेपाल हिमालय | काली से तिस्ता | 800 किमी | सबसे लंबा और सबसे ऊँचा भाग, माउंट एवरेस्ट सहित विश्व की सर्वोच्च चोटियाँ। |
| असम हिमालय | तिस्ता से दिहांग | 720 किमी | नामचा बरवा शिखर, अक्षसंधीय मोड़, अत्यधिक वर्षा और जैव-विविधता। |
🏔️ उत्तर-पूर्वी पर्वतमाला (पूर्वांचल – The Purvanchal)
पूर्वांचल, जिसे पूर्वी पहाड़ियाँ भी कहा जाता है, हिमालय पर्वत श्रृंखला का वह भाग है जो भारत के उत्तर-पूर्वी सिरे पर स्थित है। यह हिमालय के मुख्य पूर्व-पश्चिम विस्तार का हिस्सा न होकर, उसका दक्षिण की ओर मुड़ा हुआ विस्तार है।
🧭 उत्पत्ति एवं अवस्थिति
अक्षसंधीय मोड़ (Syntaxial Bend):
अरुणाचल प्रदेश में दिहांग नदी (ब्रह्मपुत्र) के महाखड्ड (Gorge) के पास हिमालय पर्वत श्रृंखला अचानक दक्षिण की ओर एक तीव्र ‘हेयरपिन’ जैसा मोड़ लेती है।
इसी मोड़ के बाद ये पहाड़ियाँ भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा के साथ उत्तर से दक्षिण दिशा में म्यांमार की सीमा के समानांतर फैल जाती हैं।
अवस्थिति:
पूर्वांचल की पहाड़ियाँ भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों — अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिज़ोरम — में फैली हुई हैं।
🪨 भूगर्भिक संरचना एवं प्रमुख विशेषताएँ
- भूगर्भिक संरचना:
पूर्वांचल की पहाड़ियाँ मुख्य रूप से मजबूत बलुआ पत्थर (Sandstone) जैसी अवसादी चट्टानों से बनी हैं। ये चट्टानें हिमालय की मुख्य श्रेणियों की तुलना में कम कायांतरित (Metamorphosed) हैं। - स्वरूप:
वृहद् हिमालय की विशाल चोटियों के विपरीत, पूर्वांचल मुख्यतः पहाड़ियों और घाटियों की समानांतर श्रृंखलाओं (Parallel Ranges and Valleys) के रूप में विस्तृत है।
इनकी ऊँचाई मुख्य हिमालय की तुलना में बहुत कम है। - ऊँचाई:
इनकी औसत ऊँचाई 500 से 3,000 मीटर के बीच होती है। - वनस्पति:
ये पहाड़ियाँ मानसूनी हवाओं से भारी वर्षा प्राप्त करती हैं, जिसके कारण ये अत्यंत सघन वनों से ढकी रहती हैं। यहाँ बांस के जंगल बहुतायत में पाए जाते हैं। - कृषि:
इन क्षेत्रों में रहने वाली जनजातियाँ झूम खेती या स्थानान्तरी कृषि (Jhum or Shifting Cultivation) करती हैं, जिसमें वनों को जलाकर भूमि को कृषि के लिए तैयार किया जाता है।
🏞️ पूर्वांचल की प्रमुख पहाड़ियाँ (उत्तर से दक्षिण के क्रम में)
पूर्वांचल कई छोटी-बड़ी पर्वत श्रेणियों से मिलकर बना है, जिन्हें स्थानीय नामों से जाना जाता है —
🏔️ 1. पटकाई बुम (Patkai Bum):
- यह पूर्वांचल की सबसे उत्तरी श्रृंखला है।
- यह अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार के बीच सीमा बनाती है।
- यह भारत और म्यांमार के बीच एक प्रमुख जल-विभाजक (Watershed) के रूप में कार्य करती है।
🏔️ 2. नागा पहाड़ियाँ (Naga Hills):
- यह पटकाई बुम के दक्षिण में नागालैंड राज्य में स्थित हैं।
- इनकी सबसे ऊँची चोटी माउंट सारामती (Mt. Saramati – 3,826 मीटर) है, जो नागालैंड और म्यांमार की सीमा पर स्थित है।
🏔️ 3. मणिपुर पहाड़ियाँ (Manipur Hills):
- ये नागा पहाड़ियों के दक्षिण में मणिपुर राज्य में स्थित हैं।
- ये पहाड़ियाँ एक विशाल बेसिन (Basin) को घेरे हुए हैं, जिसके केंद्र में प्रसिद्ध लोकटक झील (Loktak Lake) स्थित है।
- इंफाल इसी बेसिन में बसा हुआ है।
🏔️ 4. मिज़ो पहाड़ियाँ (Mizo Hills):
- यह पूर्वांचल की सबसे दक्षिणी श्रृंखला है, जो मिज़ोरम राज्य में स्थित है।
- इन्हें पहले लुशाई पहाड़ियाँ (Lushai Hills) के नाम से भी जाना जाता था।
- इनकी ऊँचाई अपेक्षाकृत कम (अधिकतर 1,500 मीटर से कम) होती है।
- मिज़ोरम की सबसे ऊँची चोटी ‘ब्लू माउंटेन’ या ‘फवंगपुई’ (Phawngpui) इसी श्रृंखला में स्थित है।
🏔️ 5. बरेल श्रेणी (Barail Range):
- यह एक महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला है जो नागा पहाड़ियों और मणिपुर पहाड़ियों को अलग करती है।
- इसका विस्तार असम, नागालैंड और मणिपुर तीनों राज्यों में है।
⚠️ महत्वपूर्ण बिंदु — मेघालय का पठार पूर्वांचल का हिस्सा नहीं है
- अक्सर यह भ्रम होता है कि मेघालय में स्थित गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियाँ पूर्वांचल का हिस्सा हैं,
लेकिन यह सही नहीं है। - भूवैज्ञानिक दृष्टि से ये पहाड़ियाँ प्रायद्वीपीय पठार (Deccan Plateau) का ही एक पूर्वी विस्तार हैं।
- यह पठार मालदा गैप (Malda Gap) या राजमहल–गारो गैप के कारण मुख्य प्रायद्वीपीय खंड से अलग हो गया है।
- यह गैप गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों (Alluvial Deposits) से भर गया है।
🌊 प्रमुख नदी
- बराक नदी इस क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण नदी है, जो मणिपुर और मिज़ोरम से बहती हुई असम और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है।
भारत के लिए हिमालय का महत्व
हिमालय पर्वत श्रृंखला भारत के लिए केवल एक भौतिक इकाई नहीं, बल्कि यह देश की जलवायु, अपवाह तंत्र, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा की जीवनरेखा है। इसके बिना भारत का भूगोल, इतिहास और वर्तमान स्वरूप पूरी तरह से भिन्न होता। भारत के लिए हिमालय के बहुआयामी महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. जलवायु नियंत्रक के रूप में
- प्राकृतिक जलवायु अवरोधक: हिमालय मध्य एशिया, साइबेरिया और तिब्बत से आने वाली बर्फीली और शुष्क ध्रुवीय हवाओं के लिए एक विशाल दीवार के रूप में कार्य करता है। यह इन ठंडी हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करने से रोकता है, जिससे उत्तर भारत की सर्दियाँ उतनी कठोर नहीं होतीं जितनी समान अक्षांश पर स्थित अन्य देशों में होती हैं।
- मानसून का संचालक: यह दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं को उत्तर की ओर जाने से रोकता है। यह अवरोध इन नमी से भरी हवाओं को ऊपर उठने के लिए मजबूर करता है, जिससे संघनन होता है और उत्तर भारत के विशाल मैदानों में व्यापक वर्षा होती है। हिमालय के बिना, मानसूनी हवाएं बिना वर्षा किए मध्य एशिया तक चली जातीं और उत्तर भारत एक शुष्क मरुस्थल होता।
2. जल संसाधनों का स्रोत (भारत की जल मीनार)
- सदानीरा नदियों का उद्गम: हिमालय विशाल हिमनदों (ग्लेशियरों) का घर है, जिन्हें “तीसरा ध्रुव” भी कहा जाता है। इन्हीं हिमनदों से भारत की विशाल और सदानीरा (Perennial) नदियाँ जैसे गंगा, यमुना, सिंधु, और ब्रह्मपुत्र निकलती हैं। ये नदियाँ न केवल गर्मियों में पिघलने वाले बर्फ से, बल्कि मानसून की वर्षा से भी जल प्राप्त करती हैं, जिससे इनमें वर्ष भर जल प्रवाह बना रहता है।
- जलविद्युत उत्पादन: हिमालय से निकलने वाली नदियों का प्रवाह तीव्र होता है और वे खड़ी ढलानों से नीचे उतरती हैं, जिससे यहाँ जलविद्युत (Hydroelectricity) उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। भारत की कई प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएँ इन्हीं नदियों पर स्थित हैं।
3. उपजाऊ मैदानों का निर्माता
- हिमालय से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ भारी मात्रा में जलोढ़ मिट्टी (Alluvium), गाद और खनिज बहाकर लाती हैं। लाखों वर्षों से इन निक्षेपों के जमाव के कारण ही विश्व के सबसे उपजाऊ और सघन आबादी वाले मैदानों में से एक, उत्तर भारत के विशाल मैदान (सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान) का निर्माण हुआ है। यह मैदान भारत का “अन्न भंडार” है।
4. सामरिक एवं रक्षात्मक महत्व
- प्राकृतिक सीमा: प्राचीन काल से ही हिमालय ने एक अजय प्राकृतिक दीवार के रूप में भारत को उत्तरी आक्रमणों से बचाया है। इसकी दुर्गम ऊँचाई और विस्तार ने इसे पार करना लगभग असंभव बना दिया था, जिससे भारत की एक विशिष्ट संस्कृति को विकसित होने का अवसर मिला।
- आधुनिक सुरक्षा: आज भी यह भारत की उत्तरी सीमा पर एक महत्वपूर्ण रक्षा पंक्ति के रूप में कार्य करता है और देश की संप्रभुता की रक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
5. आर्थिक महत्व
- पर्यटन: हिमालय अपनी प्राकृतिक सुंदरता, हिल स्टेशनों (शिमला, मसूरी, दार्जिलिंग), साहसिक खेलों (पर्वतारोहण, ट्रेकिंग, स्कीइंग) और धार्मिक स्थलों के लिए एक प्रमुख पर्यटन केंद्र है, जो लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
- वन संपदा: हिमालयी क्षेत्र घने वनों से आच्छादित है, जहाँ से मूल्यवान लकड़ी, ईंधन, और कई प्रकार के कच्चा माल प्राप्त होता है।
- औषधीय जड़ी-बूटियाँ: यह क्षेत्र विभिन्न प्रकार की दुर्लभ और मूल्यवान औषधीय जड़ी-बूटियों (संजीवनी) का भंडार है, जिनका उपयोग पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा में किया जाता है।
- कृषि एवं बागवानी: हिमालय के ढलानों पर चाय के बागान (दार्जिलिंग, असम), सेब, खुबानी, अखरोट, और केसर (कश्मीर) जैसी नकदी फसलों की खेती की जाती है।
- खनिज संसाधन: कुछ क्षेत्रों में चूना पत्थर, डोलोमाइट, रॉक साल्ट, और तांबे जैसे खनिज पाए जाते हैं।
6. जैव-विविधता का भंडार
- हिमालय ऊँचाई के साथ बदलती जलवायु के कारण वनस्पतियों और जीवों की एक विशाल विविधता का घर है। इसे वैश्विक जैव-विविधता हॉटस्पॉट (Global Biodiversity Hotspot) में से एक माना जाता है। यहाँ कई राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभ्यारण्य हैं जो हिम तेंदुए, कस्तूरी मृग और कई दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण करते हैं।
7. धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व
- हिमालय को सदियों से “देवभूमि” (देवताओं का निवास) माना जाता रहा है और यह भारत की पौराणिक कथाओं, धर्म और आध्यात्मिकता का एक अभिन्न अंग है।
- यह हिंदुओं, बौद्धों और सिखों के लिए एक पवित्र स्थान है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री (चार धाम), अमरनाथ, और हेमकुंड साहिब जैसे अनगिनत पवित्र तीर्थ स्थल यहीं स्थित हैं।
निष्कर्ष में, हिमालय भारत के लिए एक अमूल्य प्राकृतिक वरदान है। यह न केवल देश के भौतिक और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखता है, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन, आजीविका और आस्था को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
हिमालय की प्रमुख पर्वत चोटियाँ
हिमालय पर्वत श्रृंखला “विश्व की छत” के रूप में जानी जाती है और यह दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत चोटियों का घर है। यहाँ विश्व के 8,000 मीटर से ऊँचे सभी 14 पर्वत स्थित हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए, हम इन चोटियों को दो भागों में देख सकते हैं: विश्व के संदर्भ में हिमालय की सर्वोच्च चोटियाँ और भारत में स्थित प्रमुख चोटियाँ।
विश्व की सर्वोच्च पर्वत चोटियाँ (मुख्यतः नेपाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में)
यह सूची दुनिया की शीर्ष चोटियों को दर्शाती है, जिनमें से अधिकांश नेपाल-चीन या नेपाल-भारत की सीमा पर स्थित हैं।
| क्रम | चोटी का नाम | ऊँचाई (मीटर में) | स्थिति | विशेष तथ्य |
| 1 | माउंट एवरेस्ट | 8,848.86 | नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमा | विश्व की सर्वोच्च चोटी। इसे नेपाल में ‘सगरमाथा’ और तिब्बत में ‘चोमोलुंगमा’ कहते हैं। |
| 2 | K2 (गॉडविन ऑस्टिन) | 8,611 | पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK)-चीन सीमा | विश्व की दूसरी सर्वोच्च चोटी। यह तकनीकी रूप से काराकोरम श्रेणी में है। |
| 3 | कंचनजंघा | 8,598 | भारत (सिक्किम)-नेपाल सीमा | विश्व की तीसरी सर्वोच्च और भारत की सबसे ऊँची चोटी। |
| 4 | ल्होत्से | 8,516 | नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमा | विश्व की चौथी सर्वोच्च चोटी, एवरेस्ट के बहुत करीब स्थित है। |
| 5 | मकालू | 8,485 | नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमा | विश्व की पाँचवीं सर्वोच्च चोटी। |
| 6 | चो ओयू | 8,201 | नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमा | विश्व की छठी सर्वोच्च चोटी। |
| 7 | धौलागिरी | 8,167 | नेपाल | विश्व की सातवीं सर्वोच्च चोटी। |
| 8 | मनास्लु | 8,163 | नेपाल | विश्व की आठवीं सर्वोच्च चोटी। |
| 9 | नंगा पर्वत | 8,126 | पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) | विश्व की नवीं सर्वोच्च चोटी, इसे ‘किलर माउंटेन’ भी कहते हैं। |
| 10 | अन्नपूर्णा I | 8,091 | नेपाल | विश्व की दसवीं सर्वोच्च चोटी। |
भारत की प्रमुख हिमालयी पर्वत चोटियाँ
भारत में हिमालय की सबसे ऊँची चोटियों को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति रहती है। यहाँ स्पष्टीकरण दिया गया है:
- K2 (8,611 मीटर): यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे ऊँची चोटी है, लेकिन यह पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थित है। भारत इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है, लेकिन वर्तमान में यह भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में नहीं है।
- कंचनजंघा (8,598 मीटर): यह भारत की निर्विवाद रूप से सबसे ऊँची चोटी है, जो भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में है। यह सिक्किम राज्य और नेपाल की सीमा पर स्थित है।
- नंदा देवी (7,816 मीटर): यह भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है और पूरी तरह से भारत की सीमाओं के भीतर (उत्तराखंड में) स्थित सबसे ऊँची चोटी है।
भारत स्थित प्रमुख चोटियों की सूची:
| चोटी का नाम | ऊँचाई (मीटर में) | राज्य / स्थिति | महत्व / विशेष तथ्य |
| कंचनजंघा | 8,598 | सिक्किम-नेपाल सीमा | भारत की सबसे ऊँची और विश्व की तीसरी सबसे ऊँची चोटी। |
| नंदा देवी | 7,816 | उत्तराखंड | पूरी तरह से भारत में स्थित सर्वोच्च चोटी। यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। |
| कामेत | 7,756 | उत्तराखंड | यह नंदा देवी के बाद उत्तराखंड की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। |
| साल्तोरो कांगड़ी | 7,742 | लद्दाख (काराकोरम) | सियाचिन ग्लेशियर के पास स्थित है। |
| ससेर कांगड़ी | 7,672 | लद्दाख (काराकोरम) | ससेर मुजतघ श्रेणी की सबसे ऊँची चोटी है। |
| मामोस्तोंग कांगड़ी | 7,516 | लद्दाख (काराकोरम) | रिमो ग्लेशियर के पास स्थित है। |
| रिमो I | 7,385 | लद्दाख (काराकोरम) | सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र का हिस्सा है। |
| त्रिशूल | 7,120 | उत्तराखंड | तीन चोटियों का एक समूह जो भगवान शिव के त्रिशूल जैसा दिखता है। |
| चौखम्बा | 7,138 | उत्तराखंड | गंगोत्री समूह की सबसे ऊँची चोटी है। |
| केदारनाथ | 6,940 | उत्तराखंड | पवित्र केदारनाथ मंदिर के पीछे स्थित शिखर। |
🏔️ हिमालय पर्वत की प्रमुख श्रेणियाँ एवं प्रमुख चोटियाँ
🔹 महत्वपूर्ण बिंदु:
हिमालय पर्वत एक सीधी रेखा में नहीं, बल्कि एक विशाल चाप (Arc) के रूप में फैला है।
इसलिए इसका वर्गीकरण भौगोलिक दिशा (उत्तर-दक्षिण या पूर्व-पश्चिम) के अनुसार किया जाता है।
🌄 1. उत्तर से दक्षिण क्रम (North to South Arrangement)
यह व्यवस्था पर्वत श्रेणियों पर आधारित है, जो स्वाभाविक रूप से उत्तर से दक्षिण की ओर फैली हैं।
🏔️ I. ट्रांस-हिमालय (Trans-Himalaya / काराकोरम श्रेणी – सबसे उत्तरी)
- यह भारत की सबसे उत्तरी पर्वत श्रृंखला है, जो मुख्य हिमालय के भी उत्तर में स्थित है।
- मुख्य चोटी:
- K2 (गॉडविन ऑस्टिन) – 8,611 मीटर
- स्थान: काराकोरम श्रेणी (पाक-अधिकृत कश्मीर)
- विशेषता: भारत की सबसे उत्तरी एवं विश्व की दूसरी सर्वोच्च चोटी।
- K2 (गॉडविन ऑस्टिन) – 8,611 मीटर
🏔️ II. वृहद् हिमालय (Great Himalaya / हिमाद्रि श्रृंखला)
यह ट्रांस-हिमालय के दक्षिण में स्थित मुख्य और सबसे ऊँची श्रृंखला है। इसकी चोटियाँ एक चाप में फैली हैं।
| चोटी का नाम | ऊँचाई (मीटर में) | स्थान | विवरण |
| नंगा पर्वत | 8,126 | पाक-अधिकृत कश्मीर | वृहद् हिमालय की सबसे पश्चिमी विशाल चोटी |
| कामेत | 7,756 | उत्तराखंड | नंदा देवी के उत्तर-पश्चिम में स्थित प्रमुख शिखर |
| नंदा देवी | 7,816 | उत्तराखंड | पूरी तरह भारत में स्थित सर्वोच्च चोटी |
| धौलागिरी | 8,167 | नेपाल | नेपाल के पश्चिमी भाग में स्थित |
| अन्नपूर्णा | 8,091 | नेपाल | धौलागिरी के पूर्व में स्थित |
| माउंट एवरेस्ट | 8,848.86 | नेपाल/चीन सीमा | विश्व की सर्वोच्च चोटी |
| कंचनजंघा | 8,598 | सिक्किम/नेपाल सीमा | भारत की सबसे ऊँची चोटी |
| नामचा बरवा | 7,782 | तिब्बत/अरुणाचल सीमा | वृहद् हिमालय का सबसे पूर्वी छोर |
🌏 2. पूर्व से पश्चिम क्रम (East to West Arrangement)
यह व्यवस्था हिमालय की भौगोलिक यात्रा को दर्शाती है — अरुणाचल से कश्मीर तक।
| क्षेत्र / देश | मुख्य चोटी | ऊँचाई (मीटर) | विवरण |
| I. अरुणाचल प्रदेश / तिब्बत (सबसे पूर्वी) | नामचा बरवा | 7,782 | हिमालय चाप की सबसे पूर्वी चोटी |
| II. सिक्किम / नेपाल क्षेत्र | कंचनजंघा | 8,598 | नामचा बरवा के पश्चिम में, भारत की सर्वोच्च चोटी |
| III. नेपाल हिमालय (पूर्व से पश्चिम) | मकालू – 8,485ल्होत्से – 8,516माउंट एवरेस्ट – 8,848.86चो ओयू – 8,201मनास्लु – 8,163अन्नपूर्णा – 8,091धौलागिरी – 8,167 | — | विश्व की प्रमुख 8,000 मीटर से ऊँची चोटियाँ, बहुत पास-पास स्थित |
| IV. उत्तराखंड (भारत) | नंदा देवी – 7,816कामेत – 7,756 | — | भारत की प्रमुख और पूर्णतः स्वदेशी चोटियाँ |
| V. पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) | नंगा पर्वत | 8,126 | वृहद् हिमालय का सबसे पश्चिमी विशाल शिखर |
| VI. काराकोरम श्रेणी (सबसे पश्चिमी एवं उत्तरी) | K2 (गॉडविन ऑस्टिन) | 8,611 | सभी प्रमुख चोटियों में सबसे पश्चिम-उत्तर में स्थित |
🏁 निष्कर्ष:
हिमालय की पर्वत श्रेणियाँ और चोटियाँ भारत की भौगोलिक, जलवायु तथा सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला हैं।
यह केवल प्राकृतिक सीमा नहीं, बल्कि भारत की जलवायु, नदियों और सुरक्षा की जीवंत ढाल (Living Shield) है।
हिमालय के प्रमुख दर्रे (Major Passes of the Himalayas)
पर्वतीय दर्रे, पहाड़ों के बीच स्थित प्राकृतिक संकरे रास्ते होते हैं जो परिवहन, व्यापार, प्रवास और सैन्य अभियानों के लिए महत्वपूर्ण मार्ग प्रदान करते हैं। हिमालय की विशाल श्रृंखला में अनगिनत दर्रे हैं जो भारत को मध्य एशिया, तिब्बत और म्यांमार से जोड़ते हैं, साथ ही देश के भीतर भी दुर्गम क्षेत्रों के बीच संपर्क स्थापित करते हैं।
इन्हें राज्य/केंद्र-शासित प्रदेश के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. लद्दाख (Ladakh)
| दर्रे का नाम | स्थिति / जोड़ता है | विशेष तथ्य / महत्व |
| काराकोरम दर्रा | लद्दाख को चीन के शिनजियांग प्रांत से | भारत का सबसे ऊँचा दर्रा। प्राचीन रेशम मार्ग (Silk Route) की एक शाखा यहाँ से गुजरती थी। वर्तमान में बंद है। |
| खारदुंग ला | लेह को नुब्रा और श्योक घाटियों से | दुनिया के सबसे ऊँचे मोटर-योग्य दर्रों में से एक। सियाचिन ग्लेशियर जाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण मार्ग है। |
| ज़ोजिला दर्रा | श्रीनगर (कश्मीर) को लेह (लद्दाख) से | वृहद् हिमालय में स्थित है। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण बंद रहता है। NH-1 इस पर से गुजरता है। इस पर ‘ज़ोजिला सुरंग’ का निर्माण हो रहा है। |
| चांग ला | लेह को पैंगोंग त्सो झील से | यह भी एक बहुत ऊँचा मोटर-योग्य दर्रा है। यहाँ विश्व का दूसरा सबसे ऊँचा अनुसंधान केंद्र स्थित है। |
| अघिल दर्रा | लद्दाख को चीन के शिनजियांग प्रांत से | काराकोरम श्रेणी के उत्तर में स्थित है। अत्यंत दुर्गम और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है। |
| तांगलंग ला | मनाली-लेह राजमार्ग पर स्थित है | यह भी विश्व के सबसे ऊँचे मोटर-योग्य दर्रों में से एक है। |
2. जम्मू और कश्मीर (Jammu & Kashmir)
| दर्रे का नाम | स्थिति / जोड़ता है | विशेष तथ्य / महत्व |
| बनिहाल दर्रा | जम्मू को श्रीनगर से | पीर पंजाल श्रेणी में स्थित है। जवाहर सुरंग इसी दर्रे से होकर गुजरती है। यह जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-44) का हिस्सा है। अब ‘बनिहाल-काजीगुंड सड़क सुरंग’ भी बन गई है। |
| पीर पंजाल दर्रा | राजौरी और पुंछ को कश्मीर घाटी से | ऐतिहासिक मुगल रोड इसी दर्रे से होकर गुजरती है। |
| बुर्जिल दर्रा | श्रीनगर को गिलगित (PoK) के अस्तोर घाटी से | वर्तमान में यह नियंत्रण रेखा (LOC) के पास होने के कारण बंद है। |
3. हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh)
| दर्रे का नाम | स्थिति / जोड़ता है | विशेष तथ्य / महत्व |
| रोहतांग दर्रा | कुल्लू घाटी को लाहौल और स्पीति घाटियों से | यह मनाली-लेह राजमार्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारी बर्फबारी के कारण सर्दियों में बंद रहता है। अब इसके नीचे से अटल सुरंग का निर्माण हो चुका है, जो वर्ष भर संपर्क बनाए रखती है। |
| बारालाचा ला | हिमाचल के लाहौल को लद्दाख के लेह से | यह भी मनाली-लेह राजमार्ग पर स्थित है। जास्कर श्रेणी में स्थित यह दर्रा चंद्रा और भागा नदियों का उद्गम स्थल है। |
| शिपकी ला | किन्नौर जिले को तिब्बत (चीन) से | सतलज नदी इसी दर्रे के पास से भारत में प्रवेश करती है। यह भारत-चीन व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है। |
4. उत्तराखंड (Uttarakhand)
| दर्रे का नाम | स्थिति / जोड़ता है | विशेष तथ्य / महत्व |
| लिपुलेख दर्रा | पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) को तिब्बत के तकलाकोट से | यह भारत-चीन-नेपाल का ट्राई-जंक्शन है। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तीर्थयात्री इस दर्रे का उपयोग करते हैं। |
| माना दर्रा | उत्तराखंड को तिब्बत से | यह भारत का दूसरा सबसे ऊँचा मोटर-योग्य दर्रा है। यह बद्रीनाथ मंदिर के पास स्थित है। |
| नीति दर्रा | उत्तराखंड को तिब्बत से | सर्दियों के दौरान यह दर्रा भी बंद हो जाता है। |
5. सिक्किम (Sikkim)
| दर्रे का नाम | स्थिति / जोड़ता है | विशेष तथ्य / महत्व |
| नाथू ला | सिक्किम को तिब्बत की चुम्बी घाटी से | यह प्राचीन रेशम मार्ग का एक हिस्सा था। 1962 के युद्ध के बाद बंद कर दिया गया था, जिसे 2006 में व्यापार के लिए फिर से खोला गया। |
| जेलेप ला | सिक्किम को चुम्बी घाटी (तिब्बत) से | यह दार्जिलिंग और चुम्बी घाटी के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग था। इसका निर्माण तिस्ता नदी द्वारा किया गया है। |
6. अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh)
| दर्रे का नाम | स्थिति / जोड़ता है | विशेष तथ्य / महत्व |
| बोम डि ला | असम के मैदानी इलाकों को तवांग घाटी से | यह तवांग मठ के लिए मार्ग प्रदान करता है। |
| सेला दर्रा | तवांग को शेष अरुणाचल और देश से | यह तवांग की जीवनरेखा है। सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण। इसके नीचे सेला सुरंग का निर्माण किया गया है। |
| योंगग्याप दर्रा | अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत से | यह ब्रह्मपुत्र (त्सांगपो) नदी के भारत में प्रवेश करने के स्थान के निकट है। |
| दिफू (या दिफर) दर्रा | अरुणाचल प्रदेश को म्यांमार के मांडले से | यह भारत-चीन-म्यांमार का ट्राई-जंक्शन है। यह वर्ष भर खुला रहने वाला एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है। |
महत्वपूर्ण नोट: यह एक सामान्यीकृत व्यवस्था है। चूँकि हिमालय एक सीधी रेखा में नहीं है, इसलिए कुछ दर्रों की सटीक स्थिति थोड़ी भिन्न हो सकती है (उदाहरण के लिए, हिमाचल का एक पूर्वी दर्रा उत्तराखंड के पश्चिमी दर्रे से पूर्व में हो सकता है)। लेकिन यह वर्गीकरण राज्यों की भौगोलिक स्थिति के आधार पर एक स्पष्ट खाका प्रस्तुत करता है।
1. उत्तर से दक्षिण क्रम (North to South Arrangement)
इस व्यवस्था में हम सबसे उत्तरी क्षेत्र (लद्दाख) से शुरू होकर दक्षिण की ओर बढ़ेंगे।
I. लद्दाख (सबसे उत्तरी)
- काराकोरम दर्रा: भारत का सबसे उत्तरी दर्रा।
- खारदुंग ला: लेह के उत्तर में, नुब्रा घाटी का प्रवेश द्वार।
- चांग ला: लेह के पूर्व में, पैंगोंग झील का मार्ग।
- ज़ोजिला दर्रा: वृहद् हिमालय पर, कश्मीर घाटी को लद्दाख से जोड़ता है।
- बारालाचा ला: जास्कर श्रेणी में, हिमाचल और लद्दाख की सीमा पर।
II. जम्मू और कश्मीर
- बुर्जिल दर्रा: वृहद् हिमालय पर, श्रीनगर को गिलगित से जोड़ता है।
- पीर पंजाल दर्रा: पीर पंजाल श्रेणी में।
- बनिहाल दर्रा: पीर पंजाल श्रेणी में, जम्मू को श्रीनगर से जोड़ता है।
III. हिमाचल प्रदेश
- रोहतांग दर्रा: पीर पंजाल श्रेणी में, कुल्लू को लाहौल-स्पीति से जोड़ता है।
- शिपकी ला: जास्कर श्रेणी में, किन्नौर को तिब्बत से जोड़ता है।
IV. उत्तराखंड (सबसे दक्षिणी)
- माना दर्रा: वृहद् हिमालय में, उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ता है।
- नीति दर्रा: उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ता है।
- लिपुलेख दर्रा: उत्तराखंड, नेपाल और चीन के ट्राई-जंक्शन पर स्थित।
2. पूर्व से पश्चिम क्रम (East to West Arrangement)
इस व्यवस्था में हम सबसे पूर्वी राज्य (अरुणाचल प्रदेश) से शुरू होकर पश्चिम की ओर बढ़ेंगे।
I. अरुणाचल प्रदेश (सबसे पूर्वी)
- दिफू दर्रा: भारत, चीन और म्यांमार के ट्राई-जंक्शन पर सबसे पूर्व में स्थित।
- योंगग्याप दर्रा: भारत को तिब्बत से जोड़ता है।
- बोम डि ला: तवांग को असम से जोड़ता है।
- सेला दर्रा: तवांग घाटी के पश्चिम में स्थित है।
II. सिक्किम
- जेलेप ला: सिक्किम को तिब्बत की चुम्बी घाटी से जोड़ता है।
- नाथू ला: जेलेप ला के उत्तर-पश्चिम में, यह भी सिक्किम को चुम्बी घाटी से जोड़ता है।
III. उत्तराखंड
- लिपुलेख दर्रा: उत्तराखंड का सबसे पूर्वी दर्रा, नेपाल सीमा के पास।
- नीति दर्रा: लिपुलेख के पश्चिम में।
- माना दर्रा: नीति दर्रे के पश्चिम में, बद्रीनाथ के पास।
IV. हिमाचल प्रदेश
- शिपकी ला: हिमाचल का पूर्वी दर्रा, तिब्बत सीमा पर।
- रोहतांग दर्रा: शिपकी ला के पश्चिम में, कुल्लू और लाहौल-स्पीति के बीच।
- बारालाचा ला: रोहतांग के उत्तर-पश्चिम में।
V. जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख (सबसे पश्चिमी)
- ज़ोजिला दर्रा: लद्दाख का पूर्वी प्रवेश द्वार।
- खारदुंग ला: ज़ोजिला के पश्चिम में (लेह के उत्तर में)।
- बनिहाल दर्रा: जम्मू-कश्मीर में ज़ोजिला के दक्षिण-पश्चिम में।
- बुर्जिल दर्रा: श्रीनगर के उत्तर-पश्चिम में।
- काराकोरम दर्रा: सबसे उत्तर-पश्चिम में स्थित दर्रा।
उत्तर का विशाल मैदान (The Great Northern Plains)
उत्तर का विशाल मैदान, जिसे सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान भी कहा जाता है, हिमालय पर्वत और प्रायद्वीपीय पठार के बीच स्थित एक विशाल और समतल भूभाग है। यह दुनिया के सबसे बड़े और सबसे उपजाऊ जलोढ़ निक्षेपित मैदानों में से एक है, जो भारत की सघन आबादी, कृषि और अर्थव्यवस्था का आधार है।
उत्तर के मैदान का निर्माण (Formation of the Plains)
उत्तर के विशाल मैदान का निर्माण एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम है:
- हिमालय का उत्थान: लगभग 6-7 करोड़ वर्ष पहले, जब भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराई, तो टेथिस सागर के अवसादों के वलन से हिमालय पर्वत श्रृंखला का उत्थान हुआ।
- गर्त (Trough) का निर्माण: हिमालय के उत्थान और दक्षिण में स्थित कठोर प्रायद्वीपीय पठार के बीच एक विशाल अग्रगर्त (Foredeep) या द्रोणी का निर्माण हुआ। यह एक बहुत गहरा बेसिन था।
- जलोढ़ निक्षेपण: हिमालय से निकलने वाली तेज-प्रवाह वाली नदियों (जैसे सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियाँ) और प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियों (जैसे सोन, चंबल, बेतवा) ने करोड़ों वर्षों तक अपने साथ लाए गए भारी मात्रा में जलोढ़ (Alluvium) – यानी गाद, रेत और मिट्टी – को इस गर्त में जमा करना शुरू कर दिया।
- समतल मैदान का विकास: इस निरंतर निक्षेपण की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे उस विशाल गर्त को पाट दिया, जिससे एक विस्तृत, समतल और अत्यधिक उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ। इस जलोढ़ की गहराई कुछ स्थानों पर 1000 से 2000 मीटर तक है।
उत्तर के मैदान का विभाजन (उच्चावच के आधार पर)
पर्वत से मैदान की ओर आते समय निक्षेपण की विशेषताओं में भिन्नता के कारण उत्तर के मैदान को उत्तर से दक्षिण दिशा में चार प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है। यह विभाजन ढाल, कंकड़-पत्थर और मिट्टी की प्रकृति पर आधारित है।
1. भाबर (Bhabar)
- अवस्थिति: यह शिवालिक की तलहटी (foothills) के ठीक दक्षिण में स्थित एक संकरी पट्टी है, जो पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में तिस्ता नदी तक फैली हुई है। इसकी चौड़ाई 8 से 16 किलोमीटर है।
- विशेषताएँ:
- जब नदियाँ पहाड़ों से तेज ढाल से उतरती हैं, तो वे अपने साथ लाए गए भारी और बड़े कंकड़-पत्थरों और गोलाश्मों (Pebbles and Boulders) को यहीं जमा कर देती हैं।
- इस क्षेत्र की पारगम्यता (porosity) बहुत अधिक होती है, जिसके कारण छोटी नदियाँ और सरिताएँ इन कंकड़-पत्थरों के नीचे भूमिगत होकर अदृश्य हो जाती हैं। केवल बड़ी नदियाँ ही सतह पर दिखाई देती हैं।
- उपयोगिता: बड़े-बड़े कंकड़-पत्थरों के कारण यह क्षेत्र कृषि के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त होता है। यहाँ केवल बड़े पेड़ों की जड़ें ही नीचे तक पहुँच पाती हैं।
2. तराई (Terai)
- अवस्थिति: यह भाबर के दक्षिण में स्थित एक नम और दलदली पट्टी है। इसकी चौड़ाई 15 से 30 किलोमीटर तक होती है।
- विशेषताएँ:
- भाबर में जो नदियाँ भूमिगत हो गई थीं, वे इस क्षेत्र में पुनः सतह पर प्रकट हो जाती हैं।
- क्योंकि यहाँ नदियों का कोई निश्चित मार्ग नहीं होता, पानी चारों ओर फैल जाता है, जिससे एक नम, दलदली (marshy and swampy) क्षेत्र का निर्माण होता है।
- उपयोगिता: पहले यह क्षेत्र घने जंगलों और वन्यजीवों से भरा हुआ था। लेकिन अब, वनों को साफ करके इस भूमि को कृषि योग्य बनाया गया है। यहाँ की उपजाऊ भूमि गन्ना, चावल और गेहूं की खेती के लिए उत्तम है। प्रसिद्ध दुधवा नेशनल पार्क इसी क्षेत्र में स्थित है।
3. भांगर (Bhangar)
- अवस्थिति: यह उत्तरी मैदान का वह विशालतम भाग है जो पुरानी जलोढ़ मिट्टी (Older Alluvium) से बना है। यह नदी के बाढ़ वाले मैदान की सीमा से दूर, ऊँचे चबूतरे जैसी संरचना पर स्थित है।
- विशेषताएँ:
- चूंकि यह ऊँचाई पर स्थित होता है, इसलिए यहाँ नदियों की बाढ़ का पानी नहीं पहुँच पाता।
- इसकी मिट्टी में कैल्शियम कार्बोनेट की ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘कंकर’ (Kankar) कहते हैं। इन कंकरों की मौजूदगी के कारण यह खादर की तुलना में कम उपजाऊ होती है।
- यह उत्तरी मैदान का सबसे बड़ा हिस्सा बनाता है।
4. खादर (Khadar)
- अवस्थिति: यह बाढ़ वाले मैदानों का निचला हिस्सा है, जो नवीन और युवा जलोढ़ मिट्टी (Newer and Younger Alluvium) से बना है।
- विशेषताएँ:
- यह क्षेत्र नदियों के ठीक पास स्थित होता है।
- नदियाँ हर साल बाढ़ के दौरान अपने साथ लाई गई उपजाऊ मिट्टी की एक नई परत यहाँ बिछा देती हैं। इससे मिट्टी का नवीनीकरण होता रहता है।
- इसमें कंकर नहीं पाए जाते और यह बहुत महीन कणों वाली मिट्टी होती है।
- उपयोगिता: यह उत्तरी मैदान का सबसे उपजाऊ क्षेत्र होता है और गहन कृषि (Intensive Agriculture) के लिए आदर्श है। यहाँ चावल, गेहूं, गन्ना और दालों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।
सारांश तालिका
| क्षेत्र | मिट्टी का प्रकार | अवस्थिति | उर्वरता | मुख्य विशेषता |
| भाबर | बड़े कंकड़-पत्थर | शिवालिक की तलहटी | अनुपजाऊ | नदियाँ लुप्त हो जाती हैं। |
| तराई | महीन गाद, मिट्टी | भाबर के दक्षिण में | उपजाऊ (अब) | नदियाँ पुनः प्रकट होती हैं, दलदली क्षेत्र। |
| भांगर | पुरानी जलोढ़ (कंकर युक्त) | बाढ़ के मैदान से दूर, ऊँचा भाग | मध्यम उपजाऊ | उत्तरी मैदान का सबसे बड़ा हिस्सा। |
| खादर | नवीन जलोढ़ (कंकर रहित) | बाढ़ का मैदान, नदी के पास | अत्यधिक उपजाऊ | मिट्टी का प्रतिवर्ष नवीनीकरण होता है। |
डेल्टा (Delta)
डेल्टा एक नदीय भू-आकृति (Fluvial Landform) है, जिसका निर्माण नदी के मुहाने पर (जहाँ नदी समुद्र या झील में मिलती है) उसके द्वारा लाए गए अवसादों (गाद, मिट्टी, रेत) के निक्षेपण (जमाव) से होता है। इसका आकार अक्सर त्रिभुजाकार (Triangular) होता है, जो ग्रीक अक्षर ‘डेल्टा’ (Δ) जैसा दिखता है, और इसी कारण इसका यह नाम पड़ा।
डेल्टा, उत्तरी मैदान की सबसे अंतिम और सबसे नवीन संरचना होती है। यह मैदान के खादर क्षेत्र का ही विस्तार है जो समुद्र तक पहुँच जाता है।
डेल्टा के निर्माण की प्रक्रिया (Process of Delta Formation)
डेल्टा का निर्माण एक धीमी लेकिन निरंतर प्रक्रिया है, जिसके प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:
- नदी के वेग में कमी: जब नदी अपने अंतिम चरण में मैदानी इलाकों से बहकर समुद्र के पास पहुँचती है, तो ढाल (Slope) लगभग समाप्त हो जाता है। ढाल की कमी के कारण नदी के प्रवाह का वेग बहुत कम हो जाता है।
- अवसादों का जमाव (निक्षेपण): नदी का वेग कम होने से उसकी अवसाद (Sediment) ढोने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप, नदी अपने साथ लाए गए भारी मात्रा में गाद, मिट्टी और बालू को अपने मुहाने पर ही जमा करना शुरू कर देती है।
- नदी का शाखाओं में विभाजन (वितरिकाएँ): जब नदी के मुख्य मार्ग में अवसाद जमा हो जाते हैं, तो उसका रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। इस रुकावट के कारण नदी को समुद्र तक पहुँचने के लिए कई छोटी-छोटी शाखाओं या धाराओं में बँटना पड़ता है। इन शाखाओं को वितरिकाएँ (Distributaries) कहा जाता है।
- नए भूभाग का निर्माण: ये वितरिकाएँ अपने-अपने मुहानों पर अवसाद जमा करती रहती हैं। लाखों वर्षों तक यह प्रक्रिया चलने से एक विशाल, पंखे के आकार का, त्रिभुजाकार और दलदली उपजाऊ मैदान समुद्र के किनारे बन जाता है। इसी नए भूभाग को डेल्टा कहते हैं।
डेल्टा निर्माण के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ
हर नदी डेल्टा का निर्माण नहीं करती। इसके लिए कुछ विशिष्ट भौगोलिक दशाएँ आवश्यक हैं:
- नदी में अवसादों की अधिक मात्रा: नदी अपने साथ भारी मात्रा में गाद और मिट्टी लेकर आए।
- उथला समुद्र या महाद्वीपीय शेल्फ: नदी का मुहाना उथला होना चाहिए ताकि अवसाद आसानी से जमा हो सकें।
- शांत समुद्र और ज्वार-भाटे की कम क्रियाशीलता: नदी के मुहाने पर समुद्र शांत होना चाहिए। तेज लहरें और ज्वार-भाटा अवसादों को बहाकर गहरे समुद्र में ले जाते हैं, जिससे डेल्टा नहीं बन पाता।
- स्थिर तट रेखा: तटरेखा स्थिर होनी चाहिए ताकि अवसादों को जमने का पर्याप्त समय मिल सके।
(यही कारण है कि भारत की पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) बंगाल की खाड़ी में बड़े-बड़े डेल्टा बनाती हैं, क्योंकि यहाँ समुद्र उथला और शांत है। इसके विपरीत, पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (नर्मदा, तापी) अरब सागर में डेल्टा न बनाकर ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं, क्योंकि यहाँ का तट खड़ा और गहरा है।)
डेल्टा क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएँ
- अत्यंत उपजाऊ भूमि: डेल्टा की मिट्टी जलोढ़ होती है और इसमें पोषक तत्वों की प्रचुरता होती है, जिससे यह कृषि के लिए विश्व के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है।
- दलदली और कच्छ भूमि: यह क्षेत्र नीचा, समतल और दलदली होता है। यहाँ अनेक झीलें और कच्छ क्षेत्र पाए जाते हैं।
- सघन जनसंख्या: उपजाऊ भूमि के कारण डेल्टा क्षेत्र कृषि आधारित घनी आबादी वाले होते हैं।
- समृद्ध जैव-विविधता: यहाँ विशेष प्रकार की वनस्पतियाँ (जैसे मैंग्रोव) और जीव-जंतु पाए जाते हैं।
- बाढ़ प्रवण क्षेत्र: नीची भूमि होने के कारण इन क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा हमेशा बना रहता है।
विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा: गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुंदरबन)
- भारत और बांग्लादेश में फैला गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है।
- इसका निर्माण गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों द्वारा लाए गए अवसादों से हुआ है।
- इसके दक्षिणी भाग में विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन (Mangrove Forest) स्थित है, जिसे सुंदरबन कहते हैं। इसका यह नाम यहाँ पाए जाने वाले ‘सुंदरी’ नामक वृक्ष के कारण पड़ा है।
- सुंदरबन को रॉयल बंगाल टाइगर के प्राकृतिक आवास के रूप में भी जाना जाता है। इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।
ज्वारनदमुख / एस्चुएरी (Estuary)
परिभाषा:
ज्वारनदमुख, जिसे एस्चुएरी भी कहते हैं, नदी का वह मुहाना होता है जहाँ नदी का मीठा पानी समुद्र के खारे पानी से मिलता है। यह एक अर्ध-संलग्न (semi-enclosed) तटीय जल निकाय है जो एक या एक से अधिक नदियों द्वारा समुद्र में खुलता है।
सरल शब्दों में, यह नदी का चौड़ा और गहरा कीप (funnel) के आकार का मुहाना होता है जिसमें समुद्र का पानी ज्वार (tide) के समय अंदर तक आ जाता है। “ज्वारनदमुख” शब्द का अर्थ ही है- “ज्वार वाली नदी का मुख”। इस क्षेत्र के पानी को खारा पानी (Brackish Water) कहते हैं क्योंकि यह मीठे और खारे पानी का मिश्रण होता है।
ज्वारनदमुख के निर्माण की प्रक्रिया (Process of Estuary Formation)
ज्वारनदमुख का निर्माण डेल्टा के निर्माण की प्रक्रिया के ठीक विपरीत होता है।
- अवसादों का अभाव: जो नदियाँ कठोर और चट्टानी पठारों से होकर बहती हैं, वे अपने साथ बहुत कम मात्रा में गाद या अवसाद (sediment) लाती हैं।
- नदी का तीव्र वेग: जब नदी का ढाल तीव्र होता है और वह तेज गति से समुद्र में गिरती है, तो उसे अपने मुहाने पर अवसाद जमा करने का अवसर नहीं मिलता।
- समुद्री लहरों और ज्वार का प्रभाव: सबसे महत्वपूर्ण कारक समुद्री लहरों और ज्वार-भाटे की क्रिया है। यदि नदी के मुहाने पर समुद्री धाराएँ और ज्वार बहुत शक्तिशाली होते हैं, तो वे नदी द्वारा लाए गए थोड़े-बहुत अवसादों को भी बहाकर गहरे समुद्र में ले जाते हैं।
- रिया तट (Ria Coast): कई ज्वारनदमुखों का निर्माण “जलमग्न नदी घाटियों” के कारण भी होता है। जब समुद्र का स्तर बढ़ता है, तो वह नदी की निचली घाटी में अंदर तक प्रवेश कर जाता है, जिससे एक चौड़े मुहाने का निर्माण होता है।
इस प्रकार, अवसादों के जमाव के अभाव में नदी का मुहाना भरता नहीं है, बल्कि चौड़ा और गहरा बना रहता है, जिसे ज्वारनदमुख कहते हैं।
ज्वारनदमुख की प्रमुख विशेषताएँ
- खारा पानी (Brackish Water): यहाँ लवणता (salinity) नदी के मीठे पानी और समुद्र के खारे पानी के बीच बदलती रहती है।
- कीप के आकार का मुहाना (Funnel-shaped Mouth): यह समुद्र की ओर चौड़ा और नदी की ओर संकरा होता है।
- कोई नया भूभाग नहीं बनता: डेल्टा के विपरीत, यहाँ अवसादों के जमाव से किसी नई भूमि का निर्माण नहीं होता।
- ज्वारीय प्रभाव: समुद्र के ज्वार का पानी नदी में काफी अंदर तक प्रवेश करता है और भाटे के समय वापस लौटता है।
- उच्च जैव-विविधता: यह मीठे और खारे पानी की प्रजातियों के मिलन का स्थल है। इसलिए, यह एक अत्यंत उत्पादक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) होता है। इसे “समुद्री नर्सरी” भी कहा जाता है क्योंकि कई समुद्री जीव यहाँ अंडे देते हैं और उनके बच्चे यहीं पलते-बढ़ते हैं।
- प्राकृतिक बंदरगाह: ये गहरे और चौड़े होते हैं, जिस कारण ये जहाजों के लंगर डालने के लिए आदर्श स्थान होते हैं। ये प्राकृतिक बंदरगाह (Natural Harbours) के रूप में काम करते हैं।
भारत में ज्वारनदमुख (Estuaries in India)
- भारत की पश्चिमी तट की अधिकांश नदियाँ ज्वारनदमुख का निर्माण करती हैं।
- कारण: ये नदियाँ कठोर दक्कन के पठार से होकर बहती हैं, जिससे वे कम अवसाद लाती हैं। साथ ही, वे पश्चिमी घाट के तीव्र ढाल से तेजी से अरब सागर में गिरती हैं, और अरब सागर में ज्वारीय क्रिया बंगाल की खाड़ी की तुलना में अधिक तीव्र है।
प्रमुख उदाहरण:
- नर्मदा और तापी: ये भारत में ज्वारनदमुख बनाने वाली सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध नदियाँ हैं।
- गोवा: मांडवी और जुआरी नदियाँ।
- कर्नाटक: शरावती नदी।
- केरल: पेरियार नदी और कई अन्य नदियाँ जो लैगून (बैकवाटर) में मिलती हैं।
- हुगली नदी (पश्चिम बंगाल): यह एक विशेष मामला है। यद्यपि हुगली गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा का हिस्सा है, लेकिन इसका मुहाना बहुत चौड़ा और गहरा है और इसमें बंगाल की खाड़ी का तीव्र ज्वारीय प्रभाव होता है, जिसके कारण यह ज्वारनदमुख जैसी विशेषताएँ प्रदर्शित करता है। इसी कारण कोलकाता एक महत्वपूर्ण नदीय बंदरगाह (Riverine Port) है।
डेल्टा बनाम ज्वारनदमुख (Delta vs. Estuary)
| आधार | डेल्टा (Delta) | ज्वारनदमुख (Estuary) |
| अर्थ | नदी द्वारा लाए गए अवसादों का जमाव। | नदी और समुद्र के जल का मिलन स्थल। |
| निर्माण | कमजोर समुद्री लहरें, अधिक अवसाद। | शक्तिशाली समुद्री लहरें, कम अवसाद। |
| आकृति | त्रिभुजाकार, पंखे के आकार का। | कीप (Funnel) के आकार का। |
| भूमि निर्माण | उपजाऊ नई भूमि का निर्माण होता है। | कोई नई भूमि नहीं बनती। |
| प्रक्रिया | निर्माण की प्रक्रिया (Constructive)। | अपरदन की प्रक्रिया (Erosional)। |
| उपयोगिता | कृषि के लिए अत्यंत उपजाऊ। | मत्स्य पालन और बंदरगाह के लिए आदर्श। |
| उदाहरण (भारत) | गंगा-ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी। | नर्मदा, तापी, मांडवी। |
पंजाब का मैदान (The Punjab Plains)
पंजाब का मैदान, उत्तर भारत के विशाल मैदान का सबसे पश्चिमी भाग है। इसका निर्माण मुख्य रूप से सिंधु नदी और उसकी पाँच प्रमुख सहायक नदियों – झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलज – द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से हुआ है। यह एक अत्यंत उपजाऊ और कृषि की दृष्टि से भारत का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
नामकरण (Etymology)
‘पंजाब’ शब्द फारसी के दो शब्दों – ‘पंज’ (पाँच) और ‘आब’ (पानी या नदी) से मिलकर बना है। इस प्रकार, पंजाब का शाब्दिक अर्थ है “पाँच नदियों की भूमि”।
भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)
ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से, पंजाब का मैदान एक बहुत बड़ा क्षेत्र है जिसका अधिकांश भाग अब पाकिस्तान (पश्चिम पंजाब) में है और एक छोटा हिस्सा भारत (पूर्वी पंजाब और हरियाणा) में है। भारत में, इसे अक्सर पंजाब-हरियाणा का मैदान कहा जाता है। इसका विस्तार मोटे तौर पर दिल्ली से लेकर पाकिस्तान के अटक तक है।
निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)
इसका निर्माण ठीक उसी प्रक्रिया से हुआ है जिससे पूरे उत्तरी मैदान का निर्माण हुआ है। हिमालय से निकलने वाली सिंधु और उसकी सहायक नदियों ने करोड़ों वर्षों तक अपने साथ लाए गए अवसादों (गाद, मिट्टी, बालू) को एक विशाल भू-अभिनति (Geosyncline) में जमा किया, जिससे इस समतल और उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ।
पंजाब के मैदान की प्रमुख विशेषताएँ
1. दोआबों की भूमि (Land of Doabs)
पंजाब के मैदान की सबसे प्रमुख भू-आकृतिक विशेषता यहाँ पाए जाने वाले “दोआब” हैं।
- दोआब का अर्थ: “दो” और “आब” (नदी) शब्दों से मिलकर बना यह शब्द, दो नदियों के बीच स्थित भूमि को दर्शाता है। ये क्षेत्र नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी से बने होते हैं और कृषि के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
पंजाब के मैदान को निम्नलिखित पाँच प्रमुख दोआबों में विभाजित किया गया है (पश्चिम से पूर्व):
| दोआब का नाम | नदियों के बीच की स्थिति | विशेष तथ्य |
| सिंध सागर दोआब | सिंधु और झेलम-चिनाब के बीच | यह सबसे बड़ा दोआब है। इसका अधिकांश भाग पाकिस्तान में है। इसमें थल मरुस्थल का क्षेत्र भी आता है। |
| चज दोआब | चिनाब और झेलम के बीच | ‘च’ (चिनाब) और ‘ज’ (झेलम) से नाम बना है। इसका बड़ा हिस्सा भी पाकिस्तान में है। |
| रचना दोआब | रावी और चिनाब के बीच | ‘र’ (रावी) और ‘चना’ (चिनाब) से नाम बना है। इसका भी अधिकांश भाग पाकिस्तान में (जैसे लाहौर, गुजरांवाला) है। |
| बारी दोआब | ब्यास और रावी के बीच | ‘बा’ (ब्यास) और ‘री’ (रावी) से नाम बना है। भारत के पंजाब का माझा क्षेत्र इसी दोआब में आता है। अमृतसर और गुरदासपुर जैसे शहर यहीं हैं। |
| बिस्त दोआब | ब्यास और सतलज के बीच | ‘बि’ (ब्यास) और ‘स्त’ (सतलज) से नाम बना है। भारत के पंजाब का दोआबा क्षेत्र यही है। जालंधर, होशियारपुर जैसे शहर यहाँ स्थित हैं। |
2. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)
- यहाँ भांगर (पुरानी जलोढ़) और खादर (नवीन जलोढ़) दोनों प्रकार की मिट्टी पाई जाती है।
- नदियों से दूर ऊँचे क्षेत्रों में भांगर मिट्टी है, जबकि नदियों के पास बाढ़ वाले मैदानों में खादर मिट्टी है, जिसे स्थानीय रूप से ‘बेट’ (Bet) कहा जाता है।
3. समतल भू-भाग (Flat Topography)
- यह मैदान लगभग समतल है और इसका ढाल बहुत मंद है, जो दक्षिण-पश्चिम की ओर है।
- समतल भूमि होने के कारण यहाँ नहरों का जाल बिछाना आसान हुआ, जिसने सिंचाई व्यवस्था को बहुत मजबूत किया है।
4. अपवाह तंत्र (Drainage System)
- रावी, ब्यास और सतलज नदियाँ भारतीय पंजाब से होकर बहती हैं।
- पाकिस्तान में, झेलम और चिनाब आपस में मिलती हैं, फिर रावी भी उनमें मिल जाती है। अंत में ये सभी नदियाँ सतलज में मिलकर ‘पंजनद’ (Panjnad) का निर्माण करती हैं, जो अंततः सिंधु नदी में मिल जाती है।
पंजाब के मैदान का भारतीय भाग (The Indian Part of Punjab Plains)
- राज्य: भारत में पंजाब के मैदान का विस्तार मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा राज्यों में है।
- नदियाँ: भारतीय पंजाब को मुख्य रूप से रावी, ब्यास और सतलज नदियों का जल प्राप्त होता है।
- भारत का अन्न भंडार: यह क्षेत्र भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) का केंद्र रहा है। उन्नत बीजों, उर्वरकों और विकसित सिंचाई प्रणालियों के कारण यहाँ गेहूं और चावल का रिकॉर्ड उत्पादन होता है। इसी कारण पंजाब-हरियाणा के मैदान को “भारत का अन्न भंडार” (Granary of India) या “भारत की रोटी की टोकरी” (Breadbasket of India) कहा जाता है।
निष्कर्ष: पंजाब का मैदान, अपनी उपजाऊ दोआब संरचना और विकसित कृषि प्रणाली के कारण, न केवल भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
गंगा का मैदान (The Ganga Plains)
गंगा का मैदान, उत्तर भारत के विशाल मैदान का सबसे बड़ा, सबसे उपजाऊ और सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इसका निर्माण मुख्य रूप से गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों (जैसे यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी, सोन आदि) द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से हुआ है। यह भारत का हृदय स्थल माना जाता है और देश की लगभग 40% आबादी का घर है।
भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)
- सीमा: यह मैदान पश्चिम में यमुना नदी से लेकर पूर्व में पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश की सीमा तक फैला हुआ है।
- राज्य: इसका विस्तार उत्तर भारत के कई प्रमुख राज्यों में है, जिनमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड का कुछ हिस्सा और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
- आयाम: यह पूर्व से पश्चिम तक लगभग 1400 किलोमीटर लंबा और औसतन 240 से 320 किलोमीटर चौड़ा है।
गंगा के मैदान का उप-विभाजन (Sub-divisions of the Ganga Plains)
स्थलाकृतिक और भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर, गंगा के मैदान को सामान्यतः तीन मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है:
1. ऊपरी गंगा का मैदान (Upper Gangetic Plain)
- विस्तार: यह गंगा के मैदान का सबसे पश्चिमी भाग है। इसका विस्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना नदी से लेकर लगभग इलाहाबाद (प्रयागराज) तक है।
- नदियाँ: यहाँ की प्रमुख नदियाँ गंगा, यमुना और उनकी सहायक नदियाँ जैसे रामगंगा, गोमती और घाघरा हैं।
- विशेषताएँ:
- इसका ढाल अपेक्षाकृत तीव्र है।
- इस क्षेत्र में दोआबों (दो नदियों के बीच का क्षेत्र) का विशेष महत्व है, खासकर गंगा-यमुना दोआब, जो भारत के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है।
- सिंचाई के लिए नहरों का घना जाल बिछा हुआ है।
- कृषि की दृष्टि से यह गेहूं, गन्ना और चावल के उत्पादन का प्रमुख केंद्र है।
2. मध्य गंगा का मैदान (Middle Gangetic Plain)
- विस्तार: यह पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य में फैला हुआ है।
- नदियाँ: यहाँ की प्रमुख नदियाँ घाघरा, गंडक, कोसी और सोन हैं। कोसी नदी अपने मार्ग परिवर्तन और विनाशकारी बाढ़ के लिए “बिहार का शोक” कहलाती है।
- विशेषताएँ:
- इसका ढाल ऊपरी गंगा के मैदान की तुलना में बहुत मंद है, जिसके कारण नदियाँ विसर्प (meanders) बनाती हुई धीमी गति से बहती हैं।
- यह क्षेत्र बाढ़ से बहुत अधिक प्रभावित रहता है।
- बाढ़ के कारण यहाँ विशाल खादर (नवीन जलोढ़) के मैदानों का निर्माण हुआ है।
- यह क्षेत्र गोखुर झीलों (Ox-bow lakes) और स्थानीय रूप से ‘ताल’ या ‘चौड़’ कहे जाने वाले निचले दलदली क्षेत्रों के लिए जाना जाता है।
- यह मुख्य रूप से चावल और जूट की खेती का प्रमुख क्षेत्र है।
3. निचला गंगा का मैदान (Lower Gangetic Plain)
- विस्तार: इसका विस्तार मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में है। इसमें बिहार का किशनगंज जिला भी शामिल है।
- नदियाँ: यहाँ की प्रमुख नदियाँ गंगा (जो यहाँ भागीरथी-हुगली कहलाती है) और तिस्ता हैं, जो अंत में ब्रह्मपुत्र (पद्मा) में मिल जाती हैं।
- विशेषताएँ:
- इसका ढाल लगभग न के बराबर है, जिससे नदियाँ अत्यंत धीमी गति से बहती हैं और समुद्र में मिलने से पहले कई वितरिकाओं (Distributaries) में बँट जाती हैं।
- यह क्षेत्र विश्व के सबसे बड़े डेल्टा – गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा – का निर्माण करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा सुंदरबन कहलाता है।
- सुंदरबन अपने मैंग्रोव वनों और रॉयल बंगाल टाइगर के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
- यह क्षेत्र जूट, चावल और मत्स्य पालन के लिए प्रसिद्ध है।
गंगा के मैदान का महत्व
- भारत का हृदय स्थल: यह भारत की प्राचीन सभ्यताओं (जैसे वैदिक सभ्यता) और शक्तिशाली साम्राज्यों (जैसे मौर्य और गुप्त साम्राज्य) का केंद्र रहा है।
- खाद्य सुरक्षा का आधार: अत्यधिक उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी और पर्याप्त जल की उपलब्धता के कारण यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र है। यह देश का “अन्न भंडार” है जो गेहूं, चावल, गन्ना, जूट और कई अन्य फसलों का विशाल उत्पादन करता है।
- सघन जनसंख्या और आर्थिक केंद्र: उपजाऊ भूमि और अनुकूल जलवायु के कारण यह भारत का सबसे सघन बसा हुआ क्षेत्र है। दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, पटना और कोलकाता जैसे कई बड़े औद्योगिक और व्यावसायिक केंद्र इसी मैदान में स्थित हैं।
- जलमार्ग और परिवहन: यहाँ की नदियाँ प्राचीन काल से ही जलमार्ग के रूप में उपयोग होती रही हैं। साथ ही, समतल भूमि होने के कारण यहाँ सड़क और रेल मार्गों का घना जाल बिछा हुआ है।
- सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र: यह मैदान हिंदू धर्म के लिए अत्यंत पवित्र है। गंगा और यमुना नदियों के तट पर हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी और मथुरा जैसे अनगिनत पवित्र तीर्थ स्थल स्थित हैं।
राजस्थान का मैदान (The Rajasthan Plains)
राजस्थान का मैदान, जिसे थार मरुस्थल (Thar Desert) या भारत का महान मरुस्थल (Great Indian Desert) भी कहा जाता है, उत्तर भारत के विशाल मैदान का एक विशिष्ट पश्चिमी भाग है। यह एक शुष्क और अर्ध-शुष्क रेतीला मैदान है, जिसकी स्थलाकृति और जलवायु देश के अन्य मैदानी भागों से पूरी तरह भिन्न है।
भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)
- अवस्थिति: यह मैदान मुख्य रूप से अरावली पर्वत श्रृंखला के पश्चिम में स्थित है। अरावली पर्वत एक प्रभावी जल-विभाजक के रूप में कार्य करता है, जो इस शुष्क क्षेत्र को पूर्व के अधिक आर्द्र मैदानों से अलग करता है।
- राज्य: इसका अधिकांश विस्तार पश्चिमी राजस्थान में है। इसके अलावा, यह दक्षिण-पश्चिमी हरियाणा, दक्षिणी पंजाब और उत्तरी गुजरात तक फैला हुआ है। इसका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांतों में भी है।
- क्षेत्रफल: भारत में इसका क्षेत्रफल लगभग 2 लाख वर्ग किलोमीटर है।
निर्माण और भूगर्भिक इतिहास (Formation and Geological History)
भूवैज्ञानिकों का मानना है कि मेसोजोइक युग (Mesozoic Era) में यह क्षेत्र समुद्र के नीचे था। इसके प्रमाण जैसलमेर के पास स्थित आकल वुड फॉसिल पार्क (Akal Wood Fossil Park) और समुद्री निक्षेपों से मिलते हैं।
बाद में, जलवायु परिवर्तन, दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के मार्ग में अरावली की समानांतर स्थिति और मानवीय गतिविधियों के कारण यह क्षेत्र धीरे-धीरे एक शुष्क मरुस्थल में बदल गया।
राजस्थान के मैदान की प्रमुख विशेषताएँ
स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर, राजस्थान के मैदान को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है:
1. मरुस्थली (The Marusthali) – शुष्क रेतीला मरुस्थल
- अवस्थिति: यह मैदान का पश्चिमी, पूर्णतः शुष्क और रेतीला भाग है।
- स्थलाकृति: यहाँ की प्रमुख स्थलाकृति रेत के टीले (Sand Dunes) या टिब्बे हैं, जो पवन के निक्षेपण की क्रिया द्वारा निर्मित होते हैं। ये टीले स्थायी नहीं होते और हवा के साथ अपना स्थान बदलते रहते हैं।
- बरखान (Barchans): ये अर्ध-चंद्राकार (crescent-shaped) रेत के टीले हैं जो बहुत अधिक पाए जाते हैं, विशेषकर जैसलमेर के आसपास।
- अनुदैर्ध्य टीले (Longitudinal Dunes): ये भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट पवन की दिशा के समानांतर बनते हैं।
- ‘धरियन’ (Dhrians): स्थानीय भाषा में स्थानांतरित होने वाले रेत के टीलों को धरियन कहा जाता है।
- जलवायु: यहाँ की जलवायु अत्यंत विषम है। वार्षिक वर्षा 150 मि.मी. से भी कम होती है। गर्मियों में तापमान 50°C तक पहुँच जाता है, जबकि सर्दियों में हिमांक बिंदु तक गिर सकता है।
2. राजस्थान बागर (Rajasthan Bagar) – अर्ध-शुष्क मैदान
- अवस्थिति: यह मरुस्थली के पूर्व में और अरावली पर्वत के पश्चिम में स्थित एक अर्ध-शुष्क (semi-arid) संक्रमणकालीन मैदान है।
- विशेषताएँ:
- यह मरुस्थली की तुलना में कम रेतीला है और यहाँ स्टेपी (Steppe) प्रकार की घास वाली वनस्पति पाई जाती है।
- यहाँ कई छोटी, मौसमी नदियाँ हैं जो अरावली से निकलती हैं।
राजस्थान बागर को पुनः कई छोटे-छोटे क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:
- घग्गर का मैदान (Ghaggar Plain): यह सबसे उत्तरी भाग है जो घग्गर नदी द्वारा सिंचित है। घग्गर एक अंतःस्थलीय मौसमी नदी है, जिसे प्राचीन सरस्वती नदी का अवशेष माना जाता है।
- शेखावाटी प्रदेश: यह मध्य भाग है, जहाँ रेत के टीलों के बीच निचले गर्त पाए जाते हैं।
- नागौरी उच्चभूमि: यह लवणयुक्त झीलों (जैसे सांभर, डीडवाना, कुचामन) के लिए प्रसिद्ध है।
- लूनी बेसिन: यह दक्षिणी भाग है, जो लूनी नदी द्वारा अपवाहित होता है। लूनी इस मैदान की सबसे महत्वपूर्ण और एकमात्र प्रमुख नदी है। यह अजमेर के पास अरावली से निकलती है और कच्छ के रण (गुजरात) में विलुप्त हो जाती है, समुद्र तक नहीं पहुँच पाती। इसका पानी उद्गम के पास मीठा और आगे जाकर खारा हो जाता है।
अपवाह तंत्र (Drainage System)
- इस क्षेत्र का अपवाह तंत्र अंतःस्थलीय (Inland Drainage) है, जिसका अर्थ है कि यहाँ की नदियाँ समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं और या तो मरुस्थल में ही सूख जाती हैं या किसी झील या प्लाया (Playa) में मिल जाती हैं।
- प्लाया: ये रेगिस्तानी मैदानों के वे निचले हिस्से होते हैं, जहाँ वर्षा का पानी इकट्ठा होने से अस्थायी, उथली खारी झीलें बन जाती हैं।
आधुनिक परिदृश्य और महत्व
- इंदिरा गांधी नहर (Indira Gandhi Canal): सतलज नदी से निकाली गई यह नहर राजस्थान के मैदान के लिए एक जीवनरेखा साबित हुई है। इसने इस शुष्क क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को सिंचित कर कृषि योग्य बना दिया है, जिससे यहाँ श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जैसे क्षेत्रों में गेहूं, कपास और सरसों की खेती संभव हुई है।
- खनिज संसाधन: यह क्षेत्र जिप्सम, नमक और संगमरमर जैसे खनिजों से समृद्ध है।
- पर्यटन: थार मरुस्थल अपने अद्वितीय परिदृश्य, ऊँट सफारी और सांस्कृतिक विरासत (जैसलमेर, जोधपुर) के कारण एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है।
- पवन और सौर ऊर्जा: यहाँ पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं।
भारतीय मरुस्थल (The Indian Desert)
भारतीय मरुस्थल, जिसे थार मरुस्थल (Thar Desert) या भारत का महान मरुस्थल (Great Indian Desert) के नाम से भी जाना जाता है, भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित एक विशाल, शुष्क और रेतीला भू-भाग है। यह विश्व का 17वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल और 9वाँ सबसे बड़ा गर्म उपोष्णकटिबंधीय मरुस्थल है।
भौगोलिक स्थिति और विस्तार
- अवस्थिति: यह विशाल मरुस्थल अरावली पर्वत श्रृंखला के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। अरावली पहाड़ियाँ इसे पूर्व में स्थित उपजाऊ मैदानों से अलग करती हैं।
- विस्तार:
- भारत में: इसका अधिकांश विस्तार (लगभग 85%) भारत में है, जो मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान में फैला है। इसके अलावा यह उत्तरी गुजरात, दक्षिणी हरियाणा और दक्षिण-पश्चिमी पंजाब तक विस्तृत है।
- पाकिस्तान में: इसका कुछ हिस्सा पाकिस्तान के पूर्वी सिंध और दक्षिण-पूर्वी पंजाब प्रांतों तक फैला है, जहाँ इसे चोलिस्तान मरुस्थल (Cholistan Desert) के नाम से जाना जाता है।
- ढाल: इस मरुस्थल का सामान्य ढाल दक्षिण-पश्चिम (पाकिस्तान के सिंध और गुजरात के कच्छ के रण की ओर) है।
उत्पत्ति और इतिहास
भूवैज्ञानिक साक्ष्यों के अनुसार, यह क्षेत्र हमेशा से मरुस्थल नहीं था। माना जाता है कि मेसोजोइक युग में यह एक विशाल समुद्र के नीचे था। इसके प्रमाण जैसलमेर के निकट स्थित आकल वुड फॉसिल पार्क (Akal Wood Fossil Park) से मिलते हैं, जहाँ 18 करोड़ वर्ष पुराने लकड़ी के जीवाश्म पाए गए हैं।
धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन और विवर्तनिक घटनाओं के कारण यह क्षेत्र मरुस्थल में परिवर्तित हो गया। यह भी माना जाता है कि कभी इस क्षेत्र से पौराणिक सरस्वती नदी बहती थी।
भारतीय मरुस्थल की प्रमुख विशेषताएँ
1. स्थलाकृति (Topography)
यह एक उबड़-खाबड़ और तरंगित मैदान है जिसकी मुख्य स्थलाकृति रेत के टीले (Sand Dunes) हैं।
- बालुका स्तूप: यहाँ बड़े-बड़े बालुका स्तूप या रेत के टीले पाए जाते हैं जो हवा के साथ अपना आकार और स्थान बदलते रहते हैं।
- बरखान (Barchans): ये अर्ध-चंद्राकार (crescent-shaped) रेत के टीले हैं जो मरुस्थल के एक बड़े हिस्से, खासकर जैसलमेर के पास, में पाए जाते हैं।
- अनुदैर्ध्य टीले (Longitudinal Dunes): ये भारत-पाकिस्तान सीमा के पास अधिक पाए जाते हैं और हवा की दिशा के समानांतर बनते हैं।
- चट्टानी भू-भाग: मरुस्थल का पूरा हिस्सा रेतीला नहीं है। कुछ स्थानों पर नग्न चट्टानें और चट्टानी पठार भी पाए जाते हैं।
2. जलवायु (Climate)
- वर्षा: यहाँ की जलवायु अत्यंत शुष्क है। इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 150 मि.मी. से भी कम होती है, जो बहुत अनियमित और अविश्वसनीय होती है।
- तापमान: यहाँ तापमान में अत्यधिक विषमता पाई जाती है। गर्मियों में दिन का तापमान 50° सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जबकि सर्दियों में रात का तापमान हिमांक बिंदु (0° सेल्सियस) से भी नीचे चला जाता है। इस तापांतर के कारण यहाँ की चट्टानें जल्दी टूटती हैं।
3. वनस्पति (Vegetation)
- कम वर्षा और शुष्क जलवायु के कारण यहाँ प्राकृतिक वनस्पति बहुत विरल है और इसे मरुद्भिद (Xerophytic) वनस्पति कहा जाता है।
- यहाँ केवल वही पेड़-पौधे उग सकते हैं जिनकी जड़ें लंबी, पत्तियाँ छोटी और कांटेदार होती हैं ताकि वे पानी का संरक्षण कर सकें।
- प्रमुख वनस्पतियों में कैक्टस (नागफनी), खेजड़ी, बबूल (कीकर) और कुछ छोटी झाड़ियाँ शामिल हैं।
4. अपवाह तंत्र (Drainage System)
- यहाँ का अपवाह तंत्र अंतःस्थलीय (Inland Drainage) है, जिसका अर्थ है कि यहाँ की नदियाँ समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं और मरुस्थल में ही विलुप्त हो जाती हैं।
- लूनी नदी: यह इस क्षेत्र की सबसे लंबी और एकमात्र महत्वपूर्ण नदी है। यह अजमेर के पास अरावली की पहाड़ियों से निकलती है और गुजरात में कच्छ के रण (Rann of Kutch) में विलीन हो जाती है। कम वर्षा के कारण इसमें जल की मात्रा बहुत कम होती है।
- प्लाया (Playas): वर्षा के मौसम में, रेत के टीलों के बीच के निचले हिस्सों में पानी भर जाने से अस्थायी खारे पानी की झीलें बन जाती हैं, जिन्हें प्लाया या रण कहते हैं। सांभर, डीडवाना, और कुचामन इसके उदाहरण हैं।
जीवन और अर्थव्यवस्था
- जीवित मरुस्थल (The Living Desert): विश्व के अन्य मरुस्थलों की तुलना में थार मरुस्थल में जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है। इसी कारण इसे “जीवित मरुस्थल” कहा जाता है।
- पशुपालन: यहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन है, जिसमें भेड़, बकरी और ऊँट प्रमुख हैं। ऊँट को “मरुस्थल का जहाज” कहा जाता है।
- इंदिरा गांधी नहर: इस नहर के निर्माण से मरुस्थल के एक बड़े हिस्से में सिंचाई संभव हो पाई है, जिससे श्रीगंगानगर जैसे क्षेत्रों में कृषि क्रांति आ गई है।
- खनिज: यह क्षेत्र जिप्सम, रॉक फॉस्फेट, संगमरमर और नमक जैसे खनिजों से समृद्ध है।
- ऊर्जा: यहाँ पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं, जिस पर तेजी से काम हो रहा है।
- पर्यटन: जैसलमेर (स्वर्ण नगरी), जोधपुर और बीकानेर जैसे शहर अपनी सांस्कृतिक विरासत और मरुस्थलीय सफारी के लिए प्रसिद्ध हैं, जो पर्यटन का एक बड़ा केंद्र है।
ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Brahmaputra Plains)
ब्रह्मपुत्र का मैदान, उत्तर भारत के विशाल मैदान का सबसे पूर्वी हिस्सा है। इसका निर्माण मुख्य रूप से ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से हुआ है। यह एक संकरा लेकिन अत्यंत उपजाऊ मैदान है, जो अपनी अनूठी भू-आकृतिक विशेषताओं और आर्थिक महत्व के लिए जाना जाता है।
भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)
- अवस्थिति: यह मैदान मुख्य रूप से असम राज्य में एक लंबी और संकरी पट्टी के रूप में फैला हुआ है। इसके उत्तर में पूर्वी हिमालय (अरुणाचल प्रदेश) और दक्षिण में मेघालय का पठार (गारो-खासी-जयंतिया पहाड़ियाँ) और पूर्वांचल की पहाड़ियाँ (पटकाई-नागा पहाड़ियाँ) स्थित हैं।
- सीमा: यह पूर्व में सदिया (Sadiya) से शुरू होकर पश्चिम में धुबरी (Dhubri) तक फैला है, जहाँ यह बांग्लादेश के मैदान में मिल जाता है।
- आयाम: इसकी लंबाई लगभग 640 किलोमीटर और चौड़ाई औसतन 80 से 100 किलोमीटर है।
निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)
इसका निर्माण हिमालय के उत्थान के बाद बने अग्रगर्त (Foredeep) में अवसादों के जमाव से हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी, तिब्बत के पठार से निकलकर और हिमालय को काटकर जब मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है, तो अपने साथ भारी मात्रा में गाद, रेत और अवसाद लाती है। इस मैदान का ढाल अत्यंत मंद है, जिसके कारण नदी की गति धीमी हो जाती है और वह इन अवसादों को अपनी घाटी में ही जमा कर देती है, जिससे इस उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ है।
ब्रह्मपुत्र के मैदान की प्रमुख विशेषताएँ
ब्रह्मपुत्र का मैदान अपनी कुछ अनूठी विशेषताओं के कारण गंगा और पंजाब के मैदानों से अलग है:
1. गुंफित नदी मार्ग (Braided River Channel)
- इस मैदान की सबसे प्रमुख विशेषता ब्रह्मपुत्र नदी का गुंफित (Braided) स्वरूप है।
- अत्यधिक अवसाद और मंद ढाल के कारण, नदी अपने ही मार्ग में गाद के टीले (सैंडबार्स या ‘चर’) जमा कर देती है।
- इन टीलों से बचने के लिए नदी कई छोटी-छोटी, आपस में जुड़ी हुई धाराओं में बँट जाती है और फिर आगे जाकर मिल जाती है। यह जाल जैसा स्वरूप ही “गुंफित जलमार्ग” कहलाता है।
2. नदीय द्वीपों का निर्माण (Formation of Riverine Islands)
- नदी के गुंफित मार्ग और भारी निक्षेपण के कारण यहाँ विश्व के कुछ सबसे बड़े नदीय द्वीप (Riverine Islands) पाए जाते हैं।
- माजुली (Majuli): यह ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित विश्व का सबसे बड़ा बसा हुआ नदी द्वीप है। यह न केवल एक भौगोलिक इकाई है, बल्कि असम की वैष्णव संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र भी है। (अब इसे असम का एक जिला भी घोषित कर दिया गया है)।
3. अत्यधिक बाढ़ (Frequent and Devastating Floods)
- ब्रह्मपुत्र का मैदान भारत के सबसे अधिक बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में से एक है। इसके प्रमुख कारण हैं:
- मानसून के दौरान जलग्रहण क्षेत्र में भारी वर्षा।
- नदी के तल में गाद का निरंतर जमाव, जिससे उसकी जल-वहन क्षमता कम हो जाती है।
- हिमालय से आने वाली सहायक नदियाँ अपने साथ भारी मात्रा में जल और अवसाद लाती हैं।
- यह बाढ़ हर साल बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान करती है, लेकिन साथ ही खेतों में उपजाऊ मिट्टी की एक नई परत भी बिछा देती है।
4. दलदली और कच्छ भूमि (‘बील’)
- मैदान का ढाल कम होने और जल निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण यहाँ कई दलदली और कच्छ भूमियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘बील’ (Beels), ‘बिल’ या ‘ताल’ कहा जाता है। ये प्राकृतिक निचले जलाशय होते हैं जो मत्स्य पालन और जैव-विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
ब्रह्मपुत्र के मैदान का महत्व
- कृषि: यहाँ की मिट्टी बहुत उपजाऊ है, जो मुख्य रूप से चावल और जूट की खेती के लिए आदर्श है। यह क्षेत्र भारत के प्रमुख चावल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है।
- चाय के बागान (Tea Gardens): मैदान के किनारे स्थित ऊपरी ढलानों पर विश्व प्रसिद्ध असम चाय (Assam Tea) के बागान हैं। यह भारत का सबसे बड़ा चाय उत्पादक क्षेत्र है।
- पेट्रोलियम संसाधन: यह मैदान भारत के लिए सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण पेट्रोलियम भंडार यहीं स्थित हैं। डिगबोई, नहरकटिया, और शिवसागर भारत के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र हैं।
- जैव-विविधता: यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, जो एक सींग वाले गैंडे के लिए विश्व प्रसिद्ध है, इसी मैदान में स्थित है।
- सामरिक महत्व: यह भारत को शेष उत्तर-पूर्वी राज्यों से जोड़ने वाला एक गलियारा है और इसकी अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ इसे सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं।
निष्कर्ष: ब्रह्मपुत्र का मैदान एक अनूठा और गतिशील भू-भाग है। यह अपनी उपजाऊ भूमि और संसाधनों के कारण आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन साथ ही, यहाँ के निवासियों को हर साल बाढ़ की विनाशकारी चुनौती का सामना भी करना पड़ता है।
प्रायद्वीपीय पठार (The Peninsular Plateau)
प्रायद्वीपीय पठार भारत का सबसे प्राचीन, सबसे बड़ा और सबसे स्थिर भूभाग है। यह एक अनियमित त्रिभुजाकार आकृति वाला एक मेज की आकृति का भूखंड (Tableland) है, जो प्राचीन क्रिस्टलीय, आग्नेय और कायांतरित चट्टानों से बना है। यह प्राचीन गोंडवानालैंड का एक हिस्सा है और पृथ्वी के सबसे पुराने भूखंडों में से एक है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार
- सीमा:
- उत्तर-पश्चिम: अरावली पर्वत श्रृंखला और दिल्ली रिज।
- उत्तर: विंध्य और सतपुड़ा श्रेणियाँ, बुंदेलखंड का पठार।
- उत्तर-पूर्व: राजमहल की पहाड़ियाँ।
- पश्चिम: पश्चिमी घाट।
- पूर्व: पूर्वी घाट।
- क्षेत्रफल: इसका क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो इसे भारत का सबसे बड़ा भौतिक प्रदेश बनाता है।
- ऊँचाई: इसकी औसत ऊँचाई समुद्र तल से 600 से 900 मीटर है।
- ढाल: इस पठार का सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है, यही कारण है कि अधिकांश प्रायद्वीपीय नदियाँ (जैसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) पश्चिम में पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। इसका अपवाद नर्मदा और तापी नदियाँ हैं जो एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) में बहती हुई पूर्व से पश्चिम की ओर अरब सागर में गिरती हैं।
प्रायद्वीपीय पठार का विभाजन (Division of the Peninsular Plateau)
नर्मदा नदी प्रायद्वीपीय पठार को दो मुख्य भागों में विभाजित करती है:
1. केन्द्रीय उच्चभूमि (The Central Highlands)
2. दक्कन का पठार (The Deccan Plateau)
1. केन्द्रीय उच्चभूमि (The Central Highlands)
केन्द्रीय उच्चभूमि, प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग है जो नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है। यह पठार के उत्तरी और चौड़े हिस्से का निर्माण करती है और कई छोटी-छोटी पठारी इकाइयों, पर्वत श्रृंखलाओं और नदी घाटियों से मिलकर बनी है। यह उत्तर भारत के विशाल मैदानों और दक्षिण भारत के दक्कन पठार के बीच एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन क्षेत्र है।
भौगोलिक विस्तार एवं सीमाएँ (Geographical Extent and Boundaries)
- दक्षिण में: इसकी दक्षिणी सीमा विंध्य पर्वत श्रृंखला और नर्मदा नदी घाटी द्वारा निर्धारित होती है, जो इसे दक्कन के पठार से अलग करती है।
- उत्तर-पश्चिम में: इसकी सीमा अरावली पर्वत श्रृंखला द्वारा निर्धारित होती है।
- उत्तर में: यह धीरे-धीरे ढलानी होकर उत्तर भारत के विशाल मैदानों में विलीन हो जाती है।
- पूर्व में: इसका पूर्वी विस्तार छोटानागपुर का पठार है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- ढाल (Slope): केन्द्रीय उच्चभूमि का सामान्य ढाल दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है। इस ढाल का सबसे स्पष्ट प्रमाण यहाँ बहने वाली नदियाँ हैं।
- अपवाह तंत्र (Drainage System): इस क्षेत्र की अधिकांश प्रमुख नदियाँ जैसे चंबल, सिंध, बेतवा और केन दक्षिण-पश्चिम से निकलकर उत्तर-पूर्व दिशा में बहती हैं और अंततः यमुना नदी में मिल जाती हैं।
- चौड़ाई: यह उच्चभूमि पश्चिम में अधिक चौड़ी है (जहाँ मालवा का पठार है) और पूर्व की ओर संकरी होती जाती है।
केन्द्रीय उच्चभूमि के प्रमुख उप-भाग
केन्द्रीय उच्चभूमि एक अकेली इकाई नहीं है, बल्कि यह कई पठारों और पर्वत श्रृंखलाओं का एक समूह है। इसके प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:
क) अरावली श्रेणी (The Aravalli Range)
अरावली श्रेणी, भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित, विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखलाओं (Oldest Fold Mountains) में से एक है। इसका निर्माण प्री-कैम्ब्रियन युग में हुआ था, जो हिमालय से भी बहुत पहले की भूवैज्ञानिक घटना है। करोड़ों वर्षों के अपरदन के कारण, यह अब अपनी मूल ऊँचाई और विस्तार खो चुकी है और एक घर्षित व विच्छेदित अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountain) के रूप में विद्यमान है।
भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)
- दिशा: यह पर्वत श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में एक संकरी पट्टी के रूप में फैली हुई है।
- लंबाई और क्षेत्र: यह गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा से गुजरती हुई दिल्ली तक लगभग 800 किलोमीटर की लंबाई में फैली हुई है। दिल्ली में इसे दिल्ली रिज (Delhi Ridge) के नाम से जाना जाता है, जो राष्ट्रपति भवन के नीचे तक विस्तृत है।
- चौड़ाई: इसकी चौड़ाई दक्षिण-पश्चिम में (लगभग 100 किमी) अधिक है और दिल्ली के पास आते-आते यह संकरी पहाड़ियों में बदल जाती है।
प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ
- सर्वोच्च शिखर (Highest Peak):
- अरावली का सर्वोच्च शिखर गुरु शिखर (Guru Shikhar) है, जिसकी ऊँचाई 1722 मीटर (5650 फीट) है।
- यह शिखर माउंट आबू पठार पर स्थित है, जो राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है और जैनियों के प्रसिद्ध दिलवाड़ा मंदिरों के लिए भी जाना जाता है।
- संरचना:
- इसका निर्माण मुख्य रूप से क्वार्टजाइट, नीस और शिस्ट जैसी कठोर कायांतरित चट्टानों से हुआ है। ये चट्टानें खनिज संसाधनों से भरपूर हैं।
- दर्रे (Passes):
- अरावली में कई महत्वपूर्ण दर्रे हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘नाल’ (Nal) कहा जाता है। ये दर्रे परिवहन के लिए मार्ग प्रदान करते हैं, जैसे – देसूरी नाल, हाथीगुढ़ा की नाल आदि।
अरावली श्रेणी का महत्व
अरावली श्रेणी का महत्व केवल भूवैज्ञानिक नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र के पर्यावरण, जलवायु और अर्थव्यवस्था को भी गहराई से प्रभावित करती है।
1. जलवायु विभाजक (Climatic Divide)
- मरुस्थल का प्रसार रोकना: अरावली श्रेणी थार मरुस्थल को पूर्व की ओर उपजाऊ मैदानों में फैलने से रोकती है। यह एक प्राकृतिक अवरोध (Natural Barrier) के रूप में कार्य करती है।
- वर्षा पर प्रभाव: अरावली की सबसे बड़ी खासियत इसकी दिशा है। यह दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं की अरब सागर शाखा के समानांतर स्थित है। इस कारण, ये नमी से भरी हवाएं बिना किसी रुकावट के इसके समानांतर आगे निकल जाती हैं और इसके पश्चिमी भाग (राजस्थान) में बहुत कम वर्षा करती हैं, जिससे यह क्षेत्र शुष्क या अर्ध-शुष्क रह जाता है।
2. जल विभाजक (Water Divide)
- यह गंगा और सिंधु नदी प्रणालियों के बीच एक प्रमुख जल विभाजक का कार्य करती है।
- अरावली के पूर्व में निकलने वाली नदियाँ (जैसे बनास) यमुना-गंगा प्रणाली का हिस्सा बनती हैं, जबकि पश्चिम से निकलने वाली नदियाँ (जैसे लूनी) कच्छ के रण में विलीन हो जाती हैं।
3. खनिज संसाधन (Mineral Resources)
- अरावली श्रेणी धात्विक और अधात्विक खनिजों का भंडार है।
- यहाँ तांबा (खेतड़ी खानों के लिए प्रसिद्ध), सीसा-जस्ता, अभ्रक, संगमरमर, चूना पत्थर, एस्बेस्टस और कीमती पत्थर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
4. जैव-विविधता और पर्यावरण (Biodiversity and Environment)
- यह श्रेणी एक महत्वपूर्ण जैव-विविधता क्षेत्र है। सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान और रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान जैसे संरक्षित क्षेत्र इसी के आसपास स्थित हैं।
- यह भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वर्तमान चिंताएँ (Current Concerns)
अरावली श्रेणी वर्तमान में अवैध खनन, शहरीकरण और वनों की कटाई जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इन गतिविधियों के कारण इसका पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे भू-क्षरण बढ़ रहा है और मरुस्थलीकरण का खतरा भी उत्पन्न हो रहा है। इसके संरक्षण के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
ख) मालवा का पठार (Malwa Plateau)
मालवा का पठार, केन्द्रीय उच्चभूमि का एक प्रमुख और सबसे बड़ा हिस्सा है। यह एक लावा निर्मित पठार है जो अपनी विशिष्ट भू-आकृति, उपजाऊ काली मिट्टी और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह पठार एक त्रिभुजाकार क्षेत्र में फैला हुआ है।
- उत्तर-पश्चिम में: इसके अरावली पर्वत स्थित हैं।
- दक्षिण में: विंध्य पर्वत श्रृंखला इसकी सीमा बनाती है।
- पूर्व में: बुंदेलखंड का पठार स्थित है।
- राज्य: इसका अधिकांश भाग पश्चिमी मध्य प्रदेश में है, और इसका कुछ हिस्सा दक्षिण-पूर्वी राजस्थान और गुजरात तक फैला हुआ है।
- ढाल: इस पठार का सामान्य ढाल उत्तर और उत्तर-पूर्व की ओर है, जिसकी पुष्टि यहाँ की नदियों के प्रवाह मार्ग से होती है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
- ज्वालामुखी उत्पत्ति: मालवा के पठार का निर्माण क्रिटेशियस-इयोसीन काल में हुए दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन (Fissure Volcanic Eruption) से हुआ है।
- बेसाल्टिक लावा: इस उद्भेदन से निकले बेसाल्टिक लावा की मोटी परतें सीढ़ीनुमा (Traps) रूप में जम गईं, जिससे इस पठार का निर्माण हुआ। यह दक्कन ट्रैप (Deccan Traps) का ही उत्तरी विस्तार है।
- काली मिट्टी का निर्माण: करोड़ों वर्षों तक इस बेसाल्टिक लावा चट्टान के अपरदन (weathering) और विखंडन से उपजाऊ काली मिट्टी (Black Soil) का निर्माण हुआ, जिसे रेगुर मिट्टी (Regur Soil) या कपास की मिट्टी (Cotton Soil) भी कहते हैं।
मालवा के पठार की प्रमुख विशेषताएँ
- काली मिट्टी (Black Soil):
- यह पठार अपनी उपजाऊ काली मिट्टी के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें नमी बनाए रखने की उच्च क्षमता होती है।
- यह मिट्टी कपास, सोयाबीन, गेहूं और चना जैसी फसलों के उत्पादन के लिए आदर्श है। सोयाबीन के वृहद उत्पादन के कारण इस क्षेत्र को “सोया प्रदेश” भी कहा जाता है।
- अपवाह तंत्र (Drainage System):
- मालवा का पठार मुख्य रूप से दो प्रमुख नदी प्रणालियों द्वारा अपवाहित होता है:
- चंबल नदी प्रणाली: चंबल नदी और उसकी सहायक नदियाँ जैसे कालीसिंध, पार्वती और बनास इस पठार के एक बड़े हिस्से से होकर बहती हैं। ये नदियाँ उत्तर-पूर्व की ओर बहकर यमुना नदी में मिलती हैं।
- माही नदी प्रणाली: माही नदी इसके पश्चिमी भाग से निकलकर दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हुई खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में गिरती है।
- मालवा का पठार मुख्य रूप से दो प्रमुख नदी प्रणालियों द्वारा अपवाहित होता है:
- बीहड़ स्थलाकृति (Badland Topography):
- चंबल नदी और उसकी सहायक नदियों ने अपने प्रवाह मार्ग में मिट्टी का अत्यधिक कटाव (gully erosion) किया है, जिससे गहरे-गहरे खड्डों, घाटियों और टीलों वाली एक ऊबड़-खाबड़ भूमि का निर्माण हुआ है। इस विशिष्ट स्थलाकृति को बीहड़ या उत्खात-भूमि (Badlands or Ravines) कहा जाता है।
- यह बीहड़ क्षेत्र (विशेषकर भिंड-मुरैना) ऐतिहासिक रूप से डाकुओं की शरणस्थली के रूप में भी कुख्यात रहा है।
- लुढ़कती स्थलाकृति (Rolling Topography):
- पठार की सामान्य सतह लगभग समतल है, लेकिन यह नदी घाटियों द्वारा विच्छेदित है, जो इसे एक “लुढ़कती हुई” (Rolling) या तरंगित मैदान का स्वरूप प्रदान करती है।
आर्थिक महत्व (Economic Importance)
- कृषि: यह मध्य प्रदेश और राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों में से एक है। काली मिट्टी के कारण यह सोयाबीन, कपास और गेहूं का एक प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है।
- औद्योगिक केंद्र: पठार पर स्थित इंदौर, भोपाल और उज्जैन जैसे शहर प्रमुख औद्योगिक और व्यावसायिक केंद्र हैं। इंदौर को मध्य प्रदेश की ‘आर्थिक राजधानी’ भी कहा जाता है।
- सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व: यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। उज्जैन (प्राचीन अवंति) महान मौर्य और गुप्त साम्राज्यों का एक प्रमुख केंद्र था। यहाँ साँची के बौद्ध स्तूप और मांडू के किले जैसे कई ऐतिहासिक स्थल हैं।
निष्कर्ष: मालवा का पठार अपनी ज्वालामुखी उत्पत्ति, उपजाऊ काली मिट्टी और विशिष्ट बीहड़ स्थलाकृति के साथ भारत का एक अनूठा भौतिक प्रदेश है, जो कृषि और उद्योग दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
ग) बुंदेलखंड का पठार (Bundelkhand Plateau)
बुंदेलखंड का पठार, केन्द्रीय उच्चभूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो अपनी प्राचीन भूगर्भिक संरचना, ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। यह मालवा के पठार के पूर्व में और यमुना नदी के दक्षिण में स्थित है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति:
- उत्तर में: इसके यमुना नदी का मैदान (गंगा का मैदान) है।
- पश्चिम में: मालवा का पठार स्थित है।
- दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में: विंध्य श्रेणी और बघेलखंड का पठार इसकी सीमा बनाते हैं।
- राज्य: इसका विस्तार उत्तर प्रदेश के दक्षिणी जिलों (जैसे झाँसी, ललितपुर, हमीरपुर, बाँदा) और मध्य प्रदेश के उत्तरी जिलों (जैसे सागर, दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना) में है।
- ढाल: इस पठार का सामान्य ढाल भी दक्षिण से उत्तर की ओर है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
- प्राचीनतम भूखंड: बुंदेलखंड का पठार भारत के सबसे प्राचीन भूखंडों में से एक है। यह प्रायद्वीपीय भारत के शील्ड (Peninsular Shield) का हिस्सा है।
- बुंदेलखंड नीस: मालवा पठार के विपरीत, यह लावा से नहीं बना है। इसका निर्माण आर्कियन युग की प्राचीन ग्रेनाइट और नीस (Granite and Gneiss) चट्टानों से हुआ है। इस विशिष्ट संरचना को “बुंदेलखंड नीस” के नाम से जाना जाता है।
- अत्यधिक अपरदन: अपनी अत्यधिक प्राचीनता के कारण, यह पठार लाखों वर्षों के अपरदन (वायु और जल द्वारा) से बहुत अधिक घर्षित और विच्छेदित हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप एक वृद्धावस्था वाली स्थलाकृति (Senile Topography) का निर्माण हुआ है।
बुंदेलखंड के पठार की प्रमुख विशेषताएँ
- अपदित और तरंगित स्थलाकृति (Eroded and Undulating Topography):
- यह एक समतल पठार नहीं है, बल्कि नदियों द्वारा काटे जाने के कारण एक ऊबड़-खाबड़ और तरंगित (undulating) भू-भाग है।
- यहाँ ग्रेनाइट की छोटी-छोटी, गोलाकार और बिखरी हुई पहाड़ियाँ देखी जा सकती हैं।
- अपवाह तंत्र (Drainage System):
- इस क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ बेतवा, केन और धसान हैं, जो यमुना नदी की सहायक नदियाँ हैं।
- ये नदियाँ पठार को उत्तर की ओर बहते हुए काटती हैं और गहरी घाटियों, खड्डों और कहीं-कहीं जलप्रपातों का निर्माण करती हैं।
- मृदा (Soil):
- यहाँ की मिट्टी मुख्य रूप से लाल और पीली है, जो ग्रेनाइट और नीस चट्टानों के विखंडन से बनी है।
- यह मिश्रित लाल और काली मिट्टी का क्षेत्र है। यह मिट्टी मालवा की काली मिट्टी की तुलना में कम उपजाऊ होती है और इसमें जल धारण करने की क्षमता भी कम होती है।
- वनस्पति (Vegetation):
- यहाँ की जलवायु अर्ध-शुष्क है और वर्षा अपेक्षाकृत कम होती है।
- इस कारण यहाँ शुष्क पर्णपाती वन (Dry Deciduous Forests) और कटीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं। सागौन (Teak), तेंदू, महुआ, और बबूल यहाँ के प्रमुख वृक्ष हैं।
आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य
- कृषि: यह क्षेत्र कृषि प्रधान है, लेकिन यह कई चुनौतियों का सामना करता है। यहाँ मुख्य रूप से मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा), दलहन (चना, अरहर) और तिलहन की खेती की जाती है।
- खनिज संसाधन: बुंदेलखंड खनिज संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
- हीरा: मध्य प्रदेश का पन्ना जिला, जो इसी पठार पर स्थित है, भारत में हीरा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
- अन्य खनिज: यहाँ ग्रेनाइट (निर्माण पत्थर के रूप में), लौह अयस्क और रॉक फॉस्फेट भी पाया जाता है।
- प्रमुख चुनौतियाँ: बुंदेलखंड क्षेत्र कई गंभीर समस्याओं के लिए जाना जाता है:
- जल संकट: कठोर चट्टानी सतह के कारण वर्षा का पानी भूमि में अधिक नहीं रिस पाता और कम वर्षा के कारण यहाँ पानी की गंभीर कमी रहती है।
- सूखा और कृषि संकट: यह भारत के सबसे अधिक सूखा-प्रवण क्षेत्रों में से một है, जिसके कारण यहाँ कृषि संकट और गरीबी एक बड़ी समस्या है।
- पलायन (Migration): रोजगार के अवसरों की कमी और कृषि संकट के कारण यहाँ से बड़े पैमाने पर लोग दूसरे शहरों की ओर पलायन करते हैं।
निष्कर्ष: बुंदेलखंड का पठार एक प्राचीन और अपदित भूखंड है जो अपनी विशिष्ट भूगर्भिक संरचना और स्थलाकृति के लिए जाना जाता है। यह खनिज संसाधनों से समृद्ध होते हुए भी, जल संकट और कृषि संबंधी चुनौतियों के कारण एक सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ क्षेत्र माना जाता है।
घ) विंध्य श्रेणी (Vindhya Range)
विंध्य श्रेणी, भारत के मध्य भाग में स्थित एक जटिल और असंतत (discontinuous) पर्वत श्रृंखला है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक महान सांस्कृतिक और भौगोलिक विभाजक के रूप में महत्व रखती है। यह केन्द्रीय उच्चभूमि की दक्षिणी सीमा का निर्माण करती है और नर्मदा नदी की घाटी के लगभग समानांतर चलती है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह पर्वत श्रृंखला पश्चिम में गुजरात से शुरू होकर मध्य में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से गुजरती हुई पूर्व में बिहार के सासाराम और झारखंड तक फैली हुई है।
- लंबाई और दिशा: यह पूर्व-पश्चिम दिशा में लगभग 1,200 किलोमीटर की लंबाई में फैली हुई है।
- पूर्वी विस्तार: पूर्व में, विंध्य श्रेणी की शाखाओं को स्थानीय रूप से भारनेर श्रेणी (Bhanrer Range) और कैमूर श्रेणी (Kaimur Range) के नाम से जाना जाता है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
- ब्लॉक पर्वत (Block Mountain): विंध्य एक प्राचीन वलित पर्वत नहीं है, बल्कि यह एक ब्लॉक पर्वत है, जिसका निर्माण पृथ्वी की पपड़ी में भ्रंशन (faulting) और भूखंडों के उत्थान के कारण हुआ है। इसका दक्षिणी ढलान (नर्मदा की ओर) एक स्पष्ट भ्रंश-कगार (escarpment) है, जबकि उत्तरी ढलान मंद है।
- परतदार चट्टानें (Sedimentary Rocks): इस श्रेणी का निर्माण मुख्य रूप से प्राचीन परतदार चट्टानों से हुआ है। यहाँ लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone), चूना पत्थर (Limestone), और क्वार्टजाइट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
- जीवाश्मों की उपस्थिति: इन परतदार चट्टानों में कुछ प्राचीनतम ज्ञात सूक्ष्म-जीवों (micro-organisms) के जीवाश्म भी पाए गए हैं।
विंध्य श्रेणी की प्रमुख विशेषताएँ और महत्व
- महान जल विभाजक (Great Water Divide of India):
- विंध्य श्रेणी भारत का सबसे महत्वपूर्ण जल विभाजक है। यह गंगा नदी प्रणाली (उत्तर में) और प्रायद्वीपीय नदी प्रणालियों (दक्षिण में) के बीच पानी का बँटवारा करती है।
- इसके उत्तरी ढलान से निकलने वाली नदियाँ जैसे चंबल, बेतवा, केन और सोन उत्तर की ओर बहकर गंगा-यमुना प्रणाली में मिल जाती हैं, जबकि इसके दक्षिणी ढलान से निकलने वाली छोटी नदियाँ नर्मदा नदी में मिलती हैं।
- उत्तर और दक्षिण भारत का विभाजक (Divider of North and South India):
- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से, विंध्य श्रेणी को पारंपरिक रूप से उत्तर भारत (आर्यावर्त) और दक्षिण भारत (दक्षिणापथ) के बीच की सीमा माना जाता रहा है। इसने प्राचीन काल में इन दो क्षेत्रों के बीच संचार और प्रवासन में एक अवरोधक के रूप में भी काम किया।
- भवन निर्माण सामग्री का स्रोत:
- विंध्य श्रेणी अपने उच्च गुणवत्ता वाले बलुआ पत्थर और चूना पत्थर के लिए प्रसिद्ध है, जिनका उपयोग प्राचीन काल से लेकर आज तक भवन निर्माण में किया जाता रहा है।
- ऐतिहासिक स्मारक: साँची के बौद्ध स्तूप, आगरा का किला और दिल्ली के लाल किले जैसे कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारकों के निर्माण में इसी श्रेणी से प्राप्त लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है।
- चूना पत्थर सीमेंट उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है, जिसके कारण इस क्षेत्र में कई सीमेंट कारखाने स्थापित हैं।
- खनिज संसाधन:
- हीरा (Diamond): मध्य प्रदेश के पन्ना की प्रसिद्ध हीरे की खदानें इसी विंध्यन क्रम की चट्टानों में स्थित हैं।
- चूना पत्थर: सीमेंट ग्रेड का चूना पत्थर यहाँ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
- सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व:
- यह क्षेत्र कई ऐतिहासिक गुफा चित्रों, जैसे भीमबेटका शैलाश्रय (Bhimbetka Rock Shelters), के लिए प्रसिद्ध है, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
- यहाँ कई किले, मंदिर और झरने स्थित हैं जो पर्यटन को बढ़ावा देते हैं।
सतपुड़ा और विंध्य में अंतर (Difference between Satpura and Vindhya)
अक्सर इन दोनों समानांतर श्रेणियों में भ्रम हो जाता है। मुख्य अंतर यह है:
- विंध्य: यह नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है और गंगा एवं प्रायद्वीपीय नदी प्रणालियों के बीच जल-विभाजक है।
- सतपुड़ा: यह विंध्य के दक्षिण में है और नर्मदा तथा तापी नदियों के बीच स्थित है। यह स्वयं एक जल-विभाजक के रूप में कार्य करता है, लेकिन नर्मदा और तापी के बीच।
निष्कर्ष: विंध्य श्रेणी भारत के भूविज्ञान, अपवाह तंत्र और इतिहास में एक केंद्रीय स्थान रखती है। यह न केवल एक प्रमुख जल विभाजक है, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सीमा भी है, जो भवन निर्माण सामग्री और खनिजों का एक अमूल्य स्रोत है।
ङ) छोटानागपुर का पठार (Chota Nagpur Plateau)
छोटानागपुर का पठार, प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर-पूर्वी विस्तार है। यह भारत का सबसे धनी खनिज क्षेत्र है, जिसके कारण इसे “भारत का रूर (Ruhr of India)” (जर्मनी के खनिज-समृद्ध रूर प्रदेश के नाम पर) और “खनिजों का भंडार (Storehouse of Minerals)” भी कहा जाता है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह पठार केन्द्रीय उच्चभूमि के पूर्वी छोर पर स्थित है। इसके उत्तर और पूर्व में गंगा का मैदान है, जबकि दक्षिण में महानदी बेसिन है।
- राज्य: इसका अधिकांश विस्तार झारखंड राज्य में है। इसके अलावा, इसका कुछ हिस्सा उत्तरी ओडिशा, पश्चिमी पश्चिम बंगाल, उत्तरी छत्तीसगढ़ और बिहार के दक्षिणी हिस्सों तक फैला हुआ है।
- संरचना: यह एक अकेली पठारी इकाई नहीं है, बल्कि विभिन्न ऊँचाइयों और संरचनाओं वाले कई छोटे-छोटे पठारों का एक समूह है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
- प्राचीन भूखंड: यह प्रायद्वीपीय भारत के प्राचीनतम भूखंडों में से एक है, जो आर्कियन युग की ग्रेनाइट और नीस चट्टानों से बना है।
- चट्टानों की विविधता: इसकी खनिज संपन्नता का कारण यहाँ विभिन्न भूवैज्ञानिक कालों की चट्टानों का पाया जाना है:
- धारवाड़ क्रम की चट्टानें: इनमें लौह अयस्क, मैंगनीज, तांबा जैसे धात्विक खनिज मिलते हैं।
- गोंडवाना क्रम की चट्टानें: दामोदर नदी घाटी में पाई जाने वाली इन चट्टानों में भारत के उच्च गुणवत्ता वाले कोयले का विशाल भंडार है।
- आर्कियन चट्टानें: इनमें अभ्रक जैसे खनिज पाए जाते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ और उप-विभाजन
छोटानागपुर का पठार अपनी अनूठी स्थलाकृति और अपवाह तंत्र के लिए जाना जाता है।
1. पठार का उप-विभाजन
यह पठार कई छोटी इकाइयों से मिलकर बना है, जो दामोदर नदी घाटी द्वारा विभाजित हैं:
- पाट प्रदेश (Pat Lands): यह छोटानागपुर पठार का सबसे ऊँचा पश्चिमी भाग है (औसत ऊँचाई ~1,100 मीटर)। इसके शिखर सपाट (flat-topped) और किनारे खड़े ढाल वाले होते हैं (Mesa/Butte जैसी आकृति)। यह क्षेत्र बॉक्साइट के विशाल भंडार के लिए प्रसिद्ध है, जिससे एल्यूमीनियम निकाला जाता है।
- राँची का पठार (Ranchi Plateau): यह पठार का सबसे बड़ा और मध्य भाग है। यह अपेक्षाकृत समतल है और यहाँ से कई नदियाँ निकलती हैं।
- हजारीबाग का पठार (Hazaribagh Plateau): यह दामोदर नदी घाटी के उत्तर में स्थित है। इसे भी दो भागों में बांटा गया है- ऊपरी और निचला हजारीबाग पठार।
- कोडरमा का पठार (Koderma Plateau): यह हजारीबाग पठार का ही उत्तरी किनारा है, जो विश्व में उच्च गुणवत्ता वाले अभ्रक (Mica) के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। इसे “भारत की अभ्रक राजधानी” भी कहा जाता है।
- राजमहल की पहाड़ियाँ (Rajmahal Hills): यह पठार की उत्तर-पूर्वी सीमा बनाती हैं, जो बेसाल्टिक लावा से बनी हैं।
2. अपवाह तंत्र (Drainage System)
- अरीय अपवाह प्रतिरूप (Radial Drainage Pattern): छोटानागपुर पठार अरीय या केन्द्रापसारी अपवाह प्रतिरूप का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पठार का मध्य भाग एक गुंबद की तरह उठा हुआ है, जहाँ से नदियाँ चारों दिशाओं में निकलती हैं।
- प्रमुख नदियाँ:
- दामोदर नदी: यह पठार की सबसे महत्वपूर्ण नदी है जो एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) में पूर्व की ओर बहती है। इसे पहले अत्यधिक बाढ़ के कारण “बंगाल का शोक” कहा जाता था। अब इस पर दामोदर घाटी निगम (DVC) द्वारा कई बांध बना दिए गए हैं।
- सुवर्णरेखा नदी: यह पठार के दक्षिण-पूर्व में बहती है और प्रसिद्ध हुंडरू जलप्रपात (Hundru Falls) का निर्माण करती है। जमशेदपुर शहर इसी नदी के किनारे स्थित है।
- उत्तरी कोयल, दक्षिणी कोयल और बराक भी यहाँ की अन्य प्रमुख नदियाँ हैं।
खनिज संसाधन और आर्थिक महत्व
छोटानागपुर का पठार भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
- कोयला (Coal): दामोदर घाटी क्षेत्र (झरिया, बोकारो, गिरिडीह, करनपुरा) भारत के कोकिंग कोल का सबसे बड़ा उत्पादक है, जो लौह-इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक है।
- लौह अयस्क (Iron Ore): सिंहभूम (झारखंड) और क्योंझर (ओडिशा) क्षेत्र में उच्च कोटि के लौह अयस्क का भंडार है।
- अभ्रक (Mica): कोडरमा पठार दुनिया का सबसे बड़ा अभ्रक उत्पादक क्षेत्र है।
- बॉक्साइट (Bauxite): पाट प्रदेश भारत के प्रमुख बॉक्साइट उत्पादक क्षेत्र हैं।
- अन्य खनिज: यहाँ तांबा, यूरेनियम (जादूगुड़ा खान), चूना पत्थर, डोलोमाइट और चीनी मिट्टी भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
औद्योगिक केंद्र: खनिजों की इसी प्रचुरता के कारण, इस पठार और इसके आसपास भारत के कई प्रमुख औद्योगिक केंद्र स्थापित हुए हैं, जैसे – जमशेदपुर (TISCO), बोकारो, राउरकेला, दुर्गापुर और रांची (HEC)।
2. दक्कन का पठार (The Deccan Plateau)
दक्कन का पठार, नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित एक विशाल त्रिभुजाकार भूभाग है। यह प्रायद्वीपीय पठार का सबसे बड़ा हिस्सा है और इसका नाम संस्कृत के शब्द “दक्षिण” से लिया गया है। यह पठार पश्चिम में ऊँचा और पूर्व की ओर धीरे-धीरे ढलानी होता जाता है।
भौगोलिक स्थिति एवं सीमाएँ (Geographical Location and Boundaries)
- उत्तर में: इसकी उत्तरी सीमा सतपुड़ा, महादेव और मैकाल श्रेणियों द्वारा बनाई जाती है।
- पश्चिम में: इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट (Western Ghats) स्थित हैं, जो एक ऊँची और निरंतर दीवार की तरह खड़े हैं।
- पूर्व में: इसके पूर्व में पूर्वी घाट (Eastern Ghats) हैं, जो असंतत और निचली पहाड़ियों की श्रृंखला है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
दक्कन के पठार का एक बड़ा हिस्सा “दक्कन ट्रैप” (Deccan Traps) के नाम से जाना जाता है।
- ज्वालामुखी उद्भेदन: लगभग 6-7 करोड़ वर्ष पहले (क्रिटेशियस काल के अंत में), प्रायद्वीपीय भारत में हुए एक विशाल दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन (Fissure Volcanic Eruption) से बेसाल्टिक लावा की विशाल परतें बाहर निकलीं।
- लावा का फैलाव: यह लावा धीरे-धीरे फैलकर एक बहुत बड़े क्षेत्र पर जम गया, जिससे सीढ़ीनुमा (stair-like or step-like) स्थलाकृति का निर्माण हुआ। इसी कारण इसे “ट्रैप” (स्वीडिश शब्द ‘Trappa’ से, जिसका अर्थ सीढ़ी है) कहा जाता है।
- काली मिट्टी का निर्माण: लाखों वर्षों के अपरदन से यही बेसाल्टिक चट्टानें टूटकर काली मिट्टी या रेगुर मिट्टी (Black Soil or Regur Soil) में बदल गईं, जो कपास की खेती के लिए अत्यंत उपजाऊ है।
दक्कन के पठार के प्रमुख भाग (Major Parts of the Deccan Plateau)
दक्कन के पठार को उसकी सीमा बनाने वाली पर्वत श्रृंखलाओं और आंतरिक पठारी क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:
क) पश्चिमी घाट (The Western Ghats)
पश्चिमी घाट, जिसे महाराष्ट्र में सह्याद्रि (Sahyadri) के नाम से भी जाना जाता है, भारत के पश्चिमी तट के समानांतर चलने वाली एक लंबी, निरंतर और ऊँची पर्वत श्रृंखला है। यह दक्कन के पठार की पश्चिमी सीमा का निर्माण करती है और अपनी समृद्ध जैव-विविधता, मानसूनी वर्षा पर प्रभाव और प्रायद्वीपीय भारत के अपवाह तंत्र को नियंत्रित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भौगोलिक विस्तार एवं स्थिति (Geographical Extent and Location)
- विस्तार: यह उत्तर में तापी नदी की घाटी से शुरू होकर दक्षिण में कन्याकुमारी (Cape Comorin) तक लगभग 1,600 किलोमीटर की लंबाई में एक अविच्छिन्न दीवार की तरह फैला हुआ है।
- राज्य: यह श्रृंखला छह राज्यों से होकर गुजरती है: गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु।
- स्वरूप: यह एक वास्तविक पर्वत श्रृंखला (जैसे हिमालय) नहीं है, बल्कि प्रायद्वीपीय पठार का ही एक भ्रंश-कगार (Faulted Escarpment) है। इसका अर्थ है कि इसका पश्चिमी ढलान (समुद्र की ओर) एक तीव्र चट्टानी दीवार जैसा है, जबकि पूर्वी ढलान (पठार की ओर) बहुत मंद है।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- निरंतरता (Continuity): यह एक निरंतर श्रृंखला है जिसे केवल कुछ ही दर्रों के माध्यम से पार किया जा सकता है। यह पूर्वी घाट के विपरीत है, जो बहुत अधिक विच्छेदित (discontinuous) है।
- ऊँचाई: इसकी औसत ऊँचाई 900 से 1,600 मीटर है। यह उत्तर से दक्षिण की ओर ऊँची होती जाती है।
- जलवायु पर प्रभाव (Influence on Climate):
- महान जल विभाजक: पश्चिमी घाट भारत के एक प्रमुख जल-विभाजक (Water Divide) के रूप में कार्य करता है। यह पश्चिम की ओर बहने वाली छोटी, तीव्र गति की नदियों और पूर्व की ओर बहने वाली लंबी, प्रायद्वीपीय नदियों के बीच पानी का बँटवारा करता है।
- पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall): यह दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के लिए एक प्रभावी अवरोधक के रूप में काम करता है। यह नमी से भरी हवाओं को ऊपर उठने के लिए मजबूर करता है, जिससे इसके पश्चिमी ढलानों (Windward Side) पर बहुत भारी वर्षा (250 सेमी से अधिक) होती है। इसके विपरीत, इसका पूर्वी ढलान (Leeward Side) वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow Area) में आता है, जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
- नदियों का उद्गम (Source of Rivers): यह प्रायद्वीपीय भारत की अधिकांश प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल है, जैसे गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, भीमा, और तुंगभद्रा, जो सभी पूर्व की ओर बहती हैं।
प्रमुख शिखर और पहाड़ियाँ (Major Peaks and Hills)
पश्चिमी घाट को कई उप-भागों और पहाड़ियों में विभाजित किया जा सकता है:
- उत्तरी सह्याद्रि (महाराष्ट्र): यहाँ की औसत ऊँचाई कम है। कलसुबाई (1646 मीटर) इस भाग की सबसे ऊँची चोटी है, इसके बाद महाबलेश्वर (1438 मीटर) का स्थान है, जहाँ से कृष्णा नदी का उद्गम होता है।
- मध्य सह्याद्रि (कर्नाटक): यहाँ बाबा बुदन की पहाड़ियाँ (लौह अयस्क के लिए प्रसिद्ध) और कुद्रेमुख (1892 मीटर) जैसी महत्वपूर्ण चोटियाँ हैं।
- दक्षिणी सह्याद्रि (केरल-तमिलनाडु): यह पश्चिमी घाट का सबसे ऊँचा हिस्सा है।
- नीलगिरि की पहाड़ियाँ (Nilgiri Hills): यह एक गाँठ (knot) है जहाँ पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट आकर मिलते हैं। दोदाबेटा (2637 मीटर) इसकी सबसे ऊँची चोटी और दक्षिण भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है। प्रसिद्ध हिल स्टेशन ऊटी (Udagamandalam) यहीं स्थित है।
- अन्नामलाई पहाड़ियाँ (Annamalai Hills): नीलगिरि के दक्षिण में स्थित हैं। अनाइमुडी (2695 मीटर) इसी पहाड़ी पर स्थित है और यह पश्चिमी घाट और पूरे दक्षिण भारत की सबसे ऊँची चोटी है।
- पालनी पहाड़ियाँ (Palani Hills): यह अन्नामलाई का एक पूर्वी विस्तार है, जहाँ प्रसिद्ध हिल स्टेशन कोडाइकनाल स्थित है।
- इलायची (कार्डेमम) पहाड़ियाँ (Cardamom Hills): यह भारत की सबसे दक्षिणी पहाड़ी श्रृंखला है, जो मसालों, विशेषकर इलायची, की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
पश्चिमी घाट की प्रमुख पहाड़ियों का उत्तर से दक्षिण क्रम
| क्रम | पहाड़ी / पर्वत श्रृंखला का नाम | राज्य / अवस्थिति | सबसे ऊँची चोटी / प्रमुख विशेषता |
| उत्तरी सह्याद्रि | |||
| 1 | सतमाला श्रेणी (Satmala Range) | उत्तरी महाराष्ट्र | |
| 2 | अजंता श्रेणी (Ajanta Range) | उत्तरी महाराष्ट्र | यह तापी नदी के समानांतर चलती है, अपनी बौद्ध गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है। |
| 3 | हरिश्चंद्र श्रेणी (Harishchandra Range) | मध्य महाराष्ट्र | कलसुबाई (1646 मी) – महाराष्ट्र की सबसे ऊँची चोटी इसी श्रृंखला का हिस्सा है। |
| 4 | महाबलेश्वर पठार | मध्य महाराष्ट्र | यहाँ से कृष्णा नदी का उद्गम होता है। |
| मध्य सह्याद्रि | |||
| 5 | बाबा बुदन गिरी (Baba Budan Giri) | मध्य कर्नाटक (चिकमंगलूर जिला) | लौह अयस्क और भारत में पहली कॉफी की खेती के लिए प्रसिद्ध। मुल्यानागिरी (1930 मी) – कर्नाटक की सबसे ऊँची चोटी यहीं स्थित है। |
| 6 | कुद्रेमुख | मध्य कर्नाटक | “घोड़े के मुख” जैसी आकृति। कुद्रेमुख चोटी (1892 मी) उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के लिए प्रसिद्ध है। |
| दक्षिणी सह्याद्रि | |||
| 7 | नीलगिरि की पहाड़ियाँ (Nilgiri Hills) | कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु (ट्राई-जंक्शन) | यहाँ पश्चिमी और पूर्वी घाट आकर मिलते हैं। दोदाबेटा (2637 मी) – दक्षिण भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी। प्रसिद्ध हिल स्टेशन ऊटी यहीं है। |
| 8 | अन्नामलाई पहाड़ियाँ (Annamalai Hills) | केरल और तमिलनाडु (नीलगिरि के दक्षिण में) | अनाइमुडी (2695 मी) – पश्चिमी घाट और पूरे दक्षिण भारत की सबसे ऊँची चोटी यहीं स्थित है। |
| 9 | पालनी पहाड़ियाँ (Palani Hills) | तमिलनाडु (अन्नामलाई का पूर्वी विस्तार) | प्रसिद्ध हिल स्टेशन कोडाइकनाल यहीं स्थित है। |
| 10 | इलायची (कार्डेमम) पहाड़ियाँ | केरल और तमिलनाडु (सबसे दक्षिणी) | अगस्त्यमलाई चोटी यहाँ का प्रमुख शिखर है। यह भारत की सबसे दक्षिणी पहाड़ी श्रृंखला है, जो इलायची और अन्य मसालों के लिए प्रसिद्ध है। |
इसे याद रखने का आसान तरीका:
- महाराष्ट्र की चोटियाँ: महाराष्ट्र से शुरुआत करें (सतमाला, अजंता, हरिश्चंद्र)।
- कर्नाटक के खनिज क्षेत्र: फिर कर्नाटक में जाएँ, जहाँ लोहा और कॉफी मिलती है (बाबा बुदन गिरी, कुद्रेमुख)।
- दक्षिणी मिलन स्थल: दक्षिण में जाएँ जहाँ दोनों घाट मिलते हैं – नीलगिरि।
- सर्वोच्च शिखर और हिल स्टेशन: नीलगिरि के दक्षिण में दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी है – अनाइमुडी (अन्नामलाई में), और पास में ही पालनी की पहाड़ियाँ (कोडाइकनाल)।
- सबसे अंत में मसाले: सबसे अंत में, सबसे दक्षिण में मसाले वाली पहाड़ी – इलायची (कार्डेमम) पहाड़ियाँ।
प्रमुख दर्रे (Major Passes)
ये दर्रे पश्चिमी तट को पूर्वी पठार से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण परिवहन मार्ग हैं:
- थालघाट (Thal Ghat): मुंबई को नासिक से जोड़ता है।
- भोरघाट (Bhor Ghat): मुंबई को पुणे से जोड़ता है।
- पालघाट (Pal Ghat): यह एक चौड़ा दर्रा है जो केरल (कोच्चि) को तमिलनाडु (चेन्नई) से जोड़ता है। यह नीलगिरि और अन्नामलाई पहाड़ियों के बीच स्थित है।
- सेनकोट्टा दर्रा (Senkotta Pass): नागरकोइल और इलायची पहाड़ियों के बीच स्थित है, जो तिरुवनंतपुरम (केरल) को मदुरै (तमिलनाडु) से जोड़ता है।
जैव-विविधता (Biodiversity)
- पश्चिमी घाट को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) घोषित किया गया है।
- यह विश्व के 8 प्रमुख “जैव-विविधता हॉटस्पॉट” में से एक है।
- यहाँ उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों (Evergreen Forests) से लेकर शोला वनों (Shola Forests) तक विविध प्रकार की वनस्पतियाँ और जीव-जंतुओं की हजारों स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic Species) पाई जाती हैं।
ख) पूर्वी घाट (The Eastern Ghats)
पूर्वी घाट, भारत के पूर्वी तट के लगभग समानांतर चलने वाली पहाड़ियों की एक असंतत और निचली श्रृंखला है। यह दक्कन के पठार की पूर्वी सीमा का निर्माण करती है। पश्चिमी घाट के विपरीत, यह एक विच्छेदित और अनियमित पर्वतमाला है।
भौगोलिक विस्तार एवं स्थिति (Geographical Extent and Location)
- विस्तार: यह उत्तर में ओडिशा की महानदी घाटी से शुरू होकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से गुजरती हुई दक्षिण में तमिलनाडु की वैगई नदी घाटी तक फैली हुई है।
- राज्य: यह श्रृंखला मुख्य रूप से ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु राज्यों में विस्तृत है।
- मिलन स्थल: दक्षिण में, पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट नीलगिरि की पहाड़ियों (Nilgiri Hills) पर आकर विलीन हो जाते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- असंतत और विच्छेदित स्वरूप (Discontinuous and Eroded Nature):
- पूर्वी घाट की सबसे प्रमुख विशेषता इसका विच्छेदित या असंतत (Discontinuous) होना है।
- प्रायद्वीपीय भारत की चार बड़ी और शक्तिशाली नदियों – महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी – ने अपने प्रवाह मार्ग में इसे कई स्थानों पर काट दिया है और चौड़ी-चौड़ी घाटियों का निर्माण किया है। इन बड़ी घाटियों में, पहाड़ियों की निरंतरता लगभग समाप्त हो जाती है।
- यह पश्चिमी घाट की तरह एक निरंतर दीवार नहीं है।
- ऊँचाई (Elevation):
- यह पश्चिमी घाट की तुलना में कम ऊँचा है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 600 मीटर है, जबकि पश्चिमी घाट की औसत ऊँचाई 900-1600 मीटर है।
- संरचना:
- यह एक अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountain) है, जिसका निर्माण विभिन्न प्रकार की चट्टानों जैसे चार्नोकाइट, खोंडालाइट, ग्रेनाइट, नीस और क्वार्टजाइट से हुआ है।
- इन चट्टानों में बॉक्साइट, लौह अयस्क और चूना पत्थर जैसे खनिज पाए जाते हैं।
- कोई प्रमुख वर्षा अवरोधक नहीं:
- यह श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के समानांतर पड़ती है और बहुत अधिक कटी-फटी होने के कारण, यह पश्चिमी घाट की तरह एक प्रभावी वर्षा अवरोधक के रूप में कार्य नहीं कर पाती है।
- हालांकि, मानसून के लौटते समय (उत्तर-पूर्वी मानसून) के दौरान, यह तमिलनाडु के तट पर कुछ वर्षा कराने में सहायक होती है।
पूर्वी घाट के क्षेत्रीय नाम और प्रमुख पहाड़ियाँ
पूर्वी घाट को विभिन्न राज्यों में स्थानीय नामों से जाना जाता है और इसे कई अलग-अलग पहाड़ी समूहों में विभाजित किया गया है:
- ओडिशा:
- महेंद्रगिरि (Mahendragiri – 1501 मीटर): यह लंबे समय तक पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी मानी जाती थी।
- उत्तरी सरकार (Northern Circars) के हिस्से के रूप में यहाँ कई छोटी-छोटी श्रेणियाँ हैं।
- आंध्र प्रदेश:
- यह पूर्वी घाट का सबसे चौड़ा और सबसे सुविकसित हिस्सा है।
- जिंद्धागाड़ा चोटी (Jindhagada Peak – 1690 मीटर): यह अराकू घाटी में स्थित है और अब इसे पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी माना जाता है।
- नल्लमल्ला पहाड़ियाँ (Nallamala Hills): ये समानांतर श्रेणियों के रूप में हैं और कृष्णा तथा पेन्नेरु नदियों के बीच स्थित हैं।
- पालकोंडा श्रेणी (Palkonda Range): नल्लमल्ला के दक्षिण में स्थित हैं।
- वेलीकोंडा श्रेणी (Velikonda Range): पालकोंडा के समानांतर हैं।
- तेलंगाना:
- यहाँ पूर्वी घाट के अवशेष नल्लामाला और वेलिकोंडा पहाड़ियों के रूप में पाए जाते हैं।
- तमिलनाडु:
- जावडी पहाड़ियाँ (Javadi Hills): यहाँ चंदन के पेड़ पाए जाते हैं।
- शेवरॉय पहाड़ियाँ (Shevaroy Hills): यहाँ प्रसिद्ध हिल स्टेशन येरकॉड (Yercaud) स्थित है।
- पंचमलाई पहाड़ियाँ (Panchaimalai Hills)
- सिरूमलाई पहाड़ियाँ (Sirumalai Hills)
पूर्वी घाट की प्रमुख पहाड़ियों का उत्तर से दक्षिण क्रम
| क्रम | पहाड़ी / पर्वत श्रृंखला का नाम | राज्य / अवस्थिति | सबसे ऊँची चोटी / प्रमुख विशेषता |
| उत्तरी भाग | |||
| 1 | गढजात पहाड़ियाँ (Garhjat Hills) | उत्तरी ओडिशा | यह पूर्वी घाट का सबसे उत्तरी हिस्सा है। |
| 2 | महेंद्रगिरि | दक्षिणी ओडिशा | महेंद्रगिरि चोटी (1501 मी)। लंबे समय तक इसे पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी माना जाता था। |
| 3 | अराकू घाटी / मादुगुला कोंडा | उत्तरी आंध्र प्रदेश (ओडिशा सीमा के पास) | जिंद्धागाड़ा चोटी (1690 मी) – पूर्वी घाट की वर्तमान में सबसे ऊँची चोटी। बॉक्साइट के भंडार के लिए प्रसिद्ध। |
| मध्य भाग (कृष्णा और पेन्नेरु नदियों के बीच) | |||
| 4 | नल्लमल्ला पहाड़ियाँ (Nallamala Hills) | दक्षिणी आंध्र प्रदेश / तेलंगाना | यह पूर्वी घाट की सबसे लंबी और सबसे निरंतर श्रृंखलाओं में से एक है। यहाँ नागार्जुन सागर – श्रीशैलम टाइगर रिजर्व स्थित है। |
| 5 | वेलीकोंडा श्रेणी (Velikonda Range) | आंध्र प्रदेश | नल्लमल्ला के समानांतर पूर्व में स्थित है। |
| 6 | पालकोंडा श्रेणी (Palkonda Range) | दक्षिणी आंध्र प्रदेश | तिरुपति शहर के पास तक विस्तृत है। प्रसिद्ध तिरुमाला मंदिर इसी श्रृंखला की शेषाचलम पहाड़ियों में स्थित है। |
| दक्षिणी भाग (पेन्नेरु और कावेरी नदियों के बीच) | |||
| 7 | नगरी पहाड़ियाँ (Nagari Hills) | दक्षिणी आंध्र प्रदेश / तमिलनाडु सीमा | |
| 8 | जावडी पहाड़ियाँ (Javadi Hills) | उत्तरी तमिलनाडु | चंदन की लकड़ी और शीशम के लिए जानी जाती हैं। |
| 9 | शेवरॉय पहाड़ियाँ (Shevaroy Hills) | मध्य तमिलनाडु (सलेम के पास) | येरकॉड हिल स्टेशन यहीं स्थित है। यहाँ की सबसे ऊँची चोटी सन्यासीमलाई (1620 मी) है। |
| 10 | पंचमलाई पहाड़ियाँ (Pachaimalai Hills) | मध्य तमिलनाडु | “हरी पहाड़ियाँ” के नाम से जानी जाती हैं। |
| 11 | सिरूमलाई पहाड़ियाँ (Sirumalai Hills) | दक्षिणी तमिलनाडु (डिंडीगुल के पास) | |
| 12 | वरुशनाद पहाड़ियाँ (Varushanad Hills) | दक्षिणी तमिलनाडु | वैगई नदी का उद्गम यहीं से होता है। यह पश्चिमी घाट के साथ विलीन हो जाती हैं। |
इसे याद रखने का आसान तरीका:
- ओडिशा से शुरुआत: सबसे उत्तर में ओडिशा की गढजात पहाड़ियाँ और महेंद्रगिरि।
- आंध्र की सबसे ऊँची चोटी और ‘कोंडा’: फिर आंध्र प्रदेश में जाएँ, जहाँ सबसे ऊँची चोटी जिंद्धागाड़ा (अराकू घाटी) है। इसके बाद ‘कोंडा’ नाम वाली पहाड़ियाँ आती हैं – नल्लमल्ला, वेलीकोंडा, पालकोंडा।
- तमिलनाडु की ‘मलाई’ और ‘राय’ वाली पहाड़ियाँ: सबसे अंत में तमिलनाडु की पहाड़ियाँ, जिनमें ‘मलाई’ या ‘राय’ जैसे शब्द आते हैं – जावडी, शेवरॉय, पंचमलाई, सिरूमलाई।
यह क्रम आपको इन विच्छेदित पहाड़ियों की भौगोलिक स्थिति को बेहतर ढंग से याद रखने में मदद करेगा।
पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट में मुख्य अंतर (Key Differences)
| आधार | पश्चिमी घाट (Western Ghats) | पूर्वी घाट (Eastern Ghats) |
| निरंतरता | निरंतर, केवल दर्रों से पार करने योग्य। | असंतत और विच्छेदित। |
| ऊँचाई | अधिक ऊँचा (औसत 900-1600 मी)। | कम ऊँचा (औसत 600 मी)। |
| सर्वोच्च शिखर | अनाइमुडी (2695 मी)। | जिंद्धागाड़ा (1690 मी)। |
| वर्षा | पश्चिमी ढलानों पर भारी पर्वतीय वर्षा होती है। | कोई महत्वपूर्ण पर्वतीय वर्षा नहीं कराता। |
| नदियों का उद्गम | गोदावरी, कृष्णा, कावेरी का उद्गम स्थल। | कोई बड़ी नदी यहाँ से नहीं निकलती, बल्कि नदियाँ इसे काटती हैं। |
| संरचना | पठार का भ्रंश-कगार। | प्राचीन अवशिष्ट पर्वत। |
ग) दक्कन ट्रैप (Deccan Trap) / महाराष्ट्र का पठार
दक्कन ट्रैप, प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित एक विशाल आग्नेय (igneous) प्रांत है, जो मुख्य रूप से दक्कन के पठार का निर्माण करता है। यह अपनी सीढ़ीनुमा स्थलाकृति, बेसाल्टिक लावा चट्टानों और उपजाऊ काली मिट्टी के लिए विश्व प्रसिद्ध है। “महाराष्ट्र का पठार” इसी दक्कन ट्रैप का सबसे प्रमुख और विस्तृत हिस्सा है।
नामकरण (Etymology)
- “दक्कन” (Deccan): यह शब्द संस्कृत के शब्द “दक्षिण” से लिया गया है, जो इसकी दक्षिणी स्थिति को दर्शाता है।
- “ट्रैप” (Trap): यह शब्द स्वीडिश भाषा के शब्द “Trappa” से लिया गया है, जिसका अर्थ है “सीढ़ी” (stair)। यह नाम इस क्षेत्र की सीढ़ी जैसी स्थलाकृति (step-like topography) के कारण पड़ा है, जो लावा की विभिन्न परतों के जमने से बनी है।
भौगोलिक विस्तार एवं स्थिति (Geographical Extent and Location)
- विस्तार: दक्कन ट्रैप का विस्तार भारत के लगभग 5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है।
- राज्य:
- इसका सबसे बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र में है (इसीलिए इसे महाराष्ट्र का पठार भी कहते हैं)।
- इसके अलावा, यह गुजरात के काठियावाड़ और कच्छ क्षेत्रों, पश्चिमी और उत्तरी मध्य प्रदेश, उत्तरी कर्नाटक और तेलंगाना के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
दक्कन ट्रैप का निर्माण एक विशाल भूवैज्ञानिक घटना का परिणाम है:
- दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन (Fissure Volcanic Eruption):
- आज से लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले (मेसोजोइक युग के क्रिटेशियस काल के अंत में), जब भारतीय प्लेट गोंडवानालैंड से टूटकर उत्तर की ओर बढ़ रही थी और रीयूनियन हॉटस्पॉट (Reunion Hotspot) के ऊपर से गुजर रही थी, तब पृथ्वी की पपड़ी में एक विशाल दरार पड़ गई।
- इस दरार से किसी विस्फोटक ज्वालामुखी की तरह नहीं, बल्कि शांत रूप से अत्यधिक तरल बेसाल्टिक लावा (highly fluid basaltic lava) का विशाल प्रवाह हुआ।
- लावा का परत दर परत जमाव:
- यह तरल लावा पानी की तरह एक बहुत बड़े क्षेत्र पर फैल गया। यह प्रक्रिया रुक-रुक कर लाखों वर्षों तक चलती रही, जिससे लावा की एक के ऊपर एक कई परतें (hundreds of layers) जम गईं।
- इन परतों की मोटाई कहीं-कहीं 2,000 मीटर (2 किमी) से भी अधिक है, विशेषकर पश्चिमी घाट के पास। पूर्व की ओर जाने पर इन परतों की मोटाई कम होती जाती है।
- सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास:
- चूंकि लावा का प्रवाह रुक-रुक कर हुआ, इसने अलग-अलग मोटाई की परतें बनाईं। बाद में, अपरदन की क्रिया ने इन परतों को काटकर घाटियाँ और पठार बना दिए, जिससे दूर से देखने पर यह क्षेत्र सीढ़ीनुमा या सोपानी दिखाई देता है।
प्रमुख विशेषताएँ
1. काली मिट्टी या रेगुर मिट्टी (Black Soil or Regur Soil)
- दक्कन ट्रैप की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यहाँ पाई जाने वाली काली मिट्टी है।
- निर्माण: यह मिट्टी बेसाल्टिक लावा चट्टानों के अपरदन (weathering) से बनी है। इसमें लौह और मैग्नीशियम यौगिकों की प्रचुरता होती है, जो इसे इसका काला रंग देते हैं।
- गुण:
- यह मिट्टी बहुत महीन कणों वाली (क्लेय) होती है।
- इसमें नमी बनाए रखने की असाधारण क्षमता होती है, जिससे यह शुष्क मौसम में भी फसलों को नमी प्रदान करती है।
- गीली होने पर यह चिपचिपी हो जाती है और सूखने पर इसमें गहरी दरारें (deep cracks) पड़ जाती हैं। इन दरारों से मिट्टी में स्वतः-जुताई (self-ploughing) हो जाती है, जिससे वायु का संचार बना रहता है।
- उपयोगिता: यह मिट्टी कपास की खेती के लिए विश्व प्रसिद्ध है, इसीलिए इसे “काली कपास मिट्टी (Black Cotton Soil)” भी कहा जाता है। इसके अलावा, यह गन्ना, ज्वार, सोयाबीन और गेहूं के लिए भी बहुत उपजाऊ है।
2. प्रमुख नदियाँ
- इस पठार का ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। इसलिए, यहाँ की प्रमुख नदियाँ जैसे गोदावरी, कृष्णा, भीमा, और पेंगंगा पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं।
- तापी और नर्मदा नदियाँ इसकी उत्तरी सीमा पर भ्रंश घाटियों में बहती हैं।
3. स्थानीय स्थलाकृतियाँ
- इस पठार को कई छोटी पहाड़ियों और घाटियों ने विच्छेदित किया है।
- महाराष्ट्र में, अजंता, सतमाला और बालाघाट जैसी श्रेणियाँ इसी पठार का हिस्सा हैं।
घ) कर्नाटक का पठार (Karnataka Plateau) / मैसूर का पठ
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कर्नाटक का पठार, जिसे ऐतिहासिक रूप से मैसूर का पठार (Mysore Plateau) भी कहा जाता है, दक्कन के पठार का दक्षिणी हिस्सा है। यह अपनी विशिष्ट भूगर्भिक संरचना, समृद्ध खनिज संसाधनों (विशेषकर लोहा और सोना), ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति और अद्वितीय अपवाह तंत्र के लिए जाना जाता है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह पठार मुख्य रूप से कर्नाटक राज्य में फैला हुआ है।
- उत्तर में: इसके महाराष्ट्र का पठार (दक्कन ट्रैप) है।
- पश्चिम में: पश्चिमी घाट इसकी सीमा बनाते हैं।
- पूर्व में: पूर्वी घाट और आंध्र का मैदान स्थित हैं।
- दक्षिण में: नीलगिरि की पहाड़ियाँ इसे तमिलनाडु के पठार से अलग करती हैं।
- ऊँचाई: इसकी औसत ऊँचाई समुद्र तल से 600 से 900 मीटर के बीच है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
- ज्वालामुखी उत्पत्ति से भिन्न: महाराष्ट्र के पठार (दक्कन ट्रैप) के विपरीत, कर्नाटक का पठार बेसाल्टिक लावा से नहीं बना है।
- आर्कियन युग की चट्टानें: इसका निर्माण पृथ्वी की सबसे प्राचीन चट्टानों से हुआ है। यह आर्कियन युग की ग्रेनाइट, नीस और शिस्ट चट्टानों से निर्मित एक अत्यंत पुराना और कठोर भूखंड है।
- धारवाड़ क्रम (Dharwar System): इस पठार पर धारवाड़ क्रम की चट्टानें बहुतायत में पाई जाती हैं, जिनका नाम कर्नाटक के धारवाड़ जिले के नाम पर ही पड़ा है। ये भारत की सबसे प्राचीन अवसादी चट्टानें हैं जो धात्विक खनिजों से अत्यंत समृद्ध हैं।
कर्नाटक के पठार का विभाजन
कर्नाटक के पठार को उसकी स्थलाकृति के आधार पर दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है:
1. मलनाड (Malnad) – पहाड़ी प्रदेश
- अर्थ: ‘मलनाड’ कन्नड़ भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है “पहाड़ी देश” (Hilly Country)।
- अवस्थिति: यह पठार का पश्चिमी और अधिक ऊँचा भाग है, जो पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) से सटा हुआ है।
- स्थलाकृति: यह एक गहरा विच्छेदित, ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी क्षेत्र है। यहाँ घने जंगल, गहरी घाटियाँ और तेज ढलान पाए जाते हैं।
- नदियाँ और जलप्रपात: यहाँ से कई छोटी लेकिन तेज-प्रवाह वाली नदियाँ निकलती हैं, जो शानदार जलप्रपात (Waterfalls) बनाती हैं।
- जोग या गरसोप्पा जलप्रपात (Jog or Gersoppa Falls): शरावती नदी पर स्थित, यह भारत के सबसे ऊँचे और सबसे प्रसिद्ध जलप्रपातों में से एक है।
- कृषि: यहाँ की ढलानों पर कॉफी (Coffee) और मसालों के बड़े-बड़े बागान हैं। चिकमंगलूर और कुर्ग (कोडागु) जिले भारत के प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्र हैं।
2. मैदान (Maidan) – मैदानी प्रदेश
- अर्थ: ‘मैदान’ का अर्थ है समतल भूमि।
- अवस्थिति: यह पठार का पूर्वी, निचला और अपेक्षाकृत समतल भाग है।
- स्थलाकृति: यह एक तरंगित मैदान (Rolling Plain) है जिसमें कम ऊँचाई वाली गोलाकार पहाड़ियाँ और चौड़ी घाटियाँ हैं।
- अपवाह तंत्र: पठार की प्रमुख नदियाँ कृष्णा, तुंगभद्रा और कावेरी इसी मैदान से होकर बहती हैं।
- कृषि: यहाँ की मिट्टी लाल और कुछ हिस्सों में काली है, जो रागी (मोटे अनाज), दलहन, कपास और मूंगफली की खेती के लिए उपयुक्त है। विकसित सिंचाई सुविधाओं वाले क्षेत्रों में चावल और गन्ने की खेती भी की जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ और आर्थिक महत्व
- खनिज संसाधनों का भंडार:
- धारवाड़ चट्टानों की उपस्थिति के कारण, यह पठार खनिज संपदा की दृष्टि से बहुत धनी है।
- लौह अयस्क (Iron Ore): बाबा बुदन की पहाड़ियाँ (Baba Budan Hills) और कुद्रेमुख (Kudremukh) क्षेत्र उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के विशाल भंडार के लिए प्रसिद्ध हैं। भारत में सबसे पहले कॉफी की खेती बाबा बुदन पहाड़ियों पर ही शुरू हुई थी।
- सोना (Gold): भारत की अधिकांश सोने की खदानें इसी पठार पर हैं। कोलार (Kolar) और हट्टी (Hatti) की सोने की खदानें विश्व प्रसिद्ध हैं। (कोलार गोल्ड फील्ड्स-KGF अब लगभग बंद हो चुकी है)।
- मैंगनीज: यह मैंगनीज के उत्पादन में भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
- जलविद्युत उत्पादन (Hydroelectric Power):
- पठार की ऊँचाई और यहाँ से निकलने वाली नदियों ने जलविद्युत उत्पादन के लिए आदर्श स्थितियाँ पैदा की हैं। शरावती नदी पर जोग फॉल्स और कावेरी नदी पर शिवसमुद्रम जैसी परियोजनाएँ महत्वपूर्ण हैं।
- सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology):
- पठार के मैदान क्षेत्र में स्थित बेंगलुरु (Bengaluru) भारत की “सिलिकॉन वैली (Silicon Valley of India)” के रूप में प्रसिद्ध है और देश का सबसे बड़ा सूचना प्रौद्योगिकी केंद्र है।
निष्कर्ष: कर्नाटक का पठार भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भौतिक प्रदेश है। यह न केवल अपने लौह अयस्क और सोने जैसे खनिज संसाधनों के लिए जाना जाता है, बल्कि कॉफी उत्पादन, जलविद्युत क्षमता और आईटी उद्योग का एक प्रमुख केंद्र भी है। इसकी ‘मलनाड’ और ‘मैदान’ में विभाजित विशिष्ट स्थलाकृति इसे और भी अनूठा बनाती है।
ङ) तेलंगाना पठार और आंध्र पठार (Telangana and Andhra Plateau)
तेलंगाना और आंध्र पठार, दक्कन के पठार के पूर्वी भाग का निर्माण करते हैं। यह एक प्राचीन और अपदित भूभाग है जो अपनी विशिष्ट भूगर्भिक संरचना, खनिज संपदा और नदी घाटियों के लिए जाना जाता है। आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन के बाद, इस पठारी क्षेत्र को दो मुख्य भागों में देखा जा सकता है: तेलंगाना का पठार और आंध्र का रायलसीमा पठार।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह पठार कर्नाटक पठार के पूर्व में और पूर्वी घाट के पश्चिम में स्थित है।
- राज्य: इसका विस्तार मुख्य रूप से तेलंगाना और आंध्र प्रदेश (विशेषकर रायलसीमा क्षेत्र) में है।
- ऊँचाई: इसकी औसत ऊँचाई 500 से 600 मीटर है, जो इसे कर्नाटक पठार से थोड़ा निचला बनाती है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
- प्राचीन चट्टानें: कर्नाटक पठार की तरह ही, यह क्षेत्र भी आर्कियन युग की प्राचीन ग्रेनाइट और नीस चट्टानों से बना है। यह प्रायद्वीपीय शील्ड का एक कठोर और स्थिर हिस्सा है।
- खनिज चट्टानें: यहाँ धारवाड़ और कुडप्पा क्रम की चट्टानें भी पाई जाती हैं, जो विभिन्न प्रकार के खनिज संसाधनों का स्रोत हैं।
पठार का विभाजन (Division of the Plateau)
इस पूरे क्षेत्र को मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
1. तेलंगाना का पठार (Telangana Plateau)
- अवस्थिति: यह इस क्षेत्र का उत्तरी भाग है और मुख्य रूप से तेलंगाना राज्य में आता है।
- निर्माण: यह पूरी तरह से आर्कियन नीस चट्टानों से बना एक पेनिप्लेन (Peneplain) है, जिसका अर्थ है एक लगभग समतल, अपदित भूभाग।
- स्थलाकृति:
- घाट और पेडीप्लेन: इस पठार को दो प्रमुख स्थलाकृतिक इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है:
- घाट (Ghats): ऊँची और पहाड़ी शृंखलाएँ।
- पेडीप्लेन (Pediplains): निम्न और समतल मैदानी क्षेत्र।
- टैंक और झीलें: पठार की तरंगित सतह और कठोर चट्टानी आधार के कारण यहाँ वर्षा जल संचयन के लिए हजारों टैंकों (मानव निर्मित झीलों) का निर्माण किया गया है, जो इस क्षेत्र की सिंचाई का प्रमुख साधन हैं।
- घाट और पेडीप्लेन: इस पठार को दो प्रमुख स्थलाकृतिक इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है:
- अपवाह तंत्र:
- गोदावरी और कृष्णा: इस पठार को दो प्रमुख नदियाँ, गोदावरी (उत्तर से) और कृष्णा (दक्षिण से), पूर्व की ओर बहती हुई अपवाहित करती हैं। इन नदियों ने गहरी और चौड़ी घाटियों का निर्माण किया है।
2. रायलसीमा पठार या आंध्र पठार (Rayalaseema Plateau or Andhra Plateau)
- अवस्थिति: यह पठार का दक्षिणी भाग है, जो मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र (अनंतपुर, कुरनूल, कडपा, चित्तूर जिले) में आता है।
- निर्माण: यह भी प्राचीन चट्टानों से बना है, लेकिन यहाँ कुडप्पा क्रम (Cuddapah System) की चट्टानें प्रमुखता से पाई जाती हैं (इसका नाम आंध्र प्रदेश के कडपा जिले पर ही पड़ा है)।
- खनिज संसाधन:
- कुडप्पा क्रम की चट्टानों की उपस्थिति के कारण, यह क्षेत्र खनिज संसाधनों में बहुत समृद्ध है।
- यहाँ एस्बेस्टस, बैराइट्स, चूना पत्थर, अभ्रक और लौह अयस्क के विशाल भंडार पाए जाते हैं।
- आंध्र प्रदेश भारत का सबसे बड़ा बैराइट्स उत्पादक राज्य है।
- अपवाह तंत्र: इस क्षेत्र को पेन्नेरु (या पेन्नार) नदी और उसकी सहायक नदियाँ अपवाहित करती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ और आर्थिक महत्व
- अर्ध-शुष्क जलवायु:
- यह पठार पूर्वी और पश्चिमी घाट दोनों के वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow Area) में पड़ता है।
- इस कारण यहाँ वर्षा कम होती है और जलवायु अर्ध-शुष्क (semi-arid) है, जिससे यह क्षेत्र सूखा-प्रवण हो जाता है।
- टैंक सिंचाई (Tank Irrigation):
- कम और अनियमित वर्षा के कारण यहाँ सिंचाई के लिए पारंपरिक रूप से टैंकों पर अत्यधिक निर्भरता रही है। हैदराबाद शहर की प्रसिद्ध हुसैन सागर झील भी एक ऐसा ही विशाल टैंक है।
- प्रमुख नदियाँ:
- गोदावरी और कृष्णा इस पठार की जीवन रेखा हैं। इन नदियों पर कई बहुउद्देशीय परियोजनाएँ (जैसे नागार्जुन सागर, श्रीशैलम) बनाई गई हैं, जो सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- इन दोनों नदियों का डेल्टा क्षेत्र (K-G डेल्टा) भारत के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार के लिए भी प्रसिद्ध है।
- खनिज संपदा:
- जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, यह पठार कई महत्वपूर्ण खनिजों का स्रोत है, जो सीमेंट, खनन और अन्य उद्योगों का आधार हैं।
- आंध्र प्रदेश की अनंतपुर की खदानें सोने के लिए भी जानी जाती थीं।
निष्कर्ष: तेलंगाना और आंध्र का पठार एक प्राचीन, खनिज-समृद्ध और अर्ध-शुष्क भूभाग है। गोदावरी और कृष्णा जैसी शक्तिशाली नदियाँ इसे दो भागों में विभाजित करती हैं, और पारंपरिक टैंक सिंचाई प्रणाली इसकी एक अनूठी विशेषता है। यह क्षेत्र खनिज संपदा में धनी होते हुए भी, अपनी सूखा-प्रवण प्रकृति के कारण जल संसाधनों की चुनौतियों का सामना करता है।
निष्कर्ष: दक्कन का पठार अपनी ज्वालामुखी उत्पत्ति, विविध स्थलाकृति, समृद्ध खनिज संपदा, विशिष्ट नदी प्रणालियों और जैव-विविधता से परिपूर्ण घाटियों के साथ भारत का एक अनूठा और आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण भौतिक प्रदेश है।
🏞️ उत्तर-पूर्वी पठार (The North-Eastern Plateau)
उत्तर-पूर्वी पठार, जिसे मेघालय का पठार (Meghalaya Plateau) और कार्बी-आंगलोंग पठार (Karbi-Anglong Plateau) के नाम से भी जाना जाता है, भूवैज्ञानिक रूप से मुख्य प्रायद्वीपीय पठार (Peninsular Plateau) का ही एक पूर्वी विस्तार है।
हालांकि यह भौगोलिक रूप से मुख्य पठार से अलग-थलग दिखाई देता है, लेकिन इसकी चट्टानी संरचना और उत्पत्ति प्रायद्वीपीय भारत के समान ही है।
📍 भौगोलिक स्थिति एवं निर्माण (Geographical Location and Formation)
मुख्य पठार से अलगाव:
यह पठार मुख्य प्रायद्वीपीय पठार (विशेषकर छोटानागपुर पठार) से मालदा गैप (Malda Gap) या राजमहल-गारो गैप (Rajmahal–Garo Gap) नामक एक चौड़े समतल मैदान द्वारा अलग किया गया है।
मालदा गैप का निर्माण:
माना जाता है कि हिमालय के उत्थान के समय हुए विवर्तनिक हलचलों (Tectonic movements) के कारण प्रायद्वीपीय पठार के इस हिस्से और राजमहल की पहाड़ियों के बीच एक भ्रंश (Fault) उत्पन्न हुआ, जिससे भूमि का एक बड़ा भाग नीचे धँस गया।
बाद में इस धँसे हुए भाग को गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से भर दिया गया, जिससे यह समतल क्षेत्र (गैप) बना। आज यह भाग पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में स्थित है।
अवस्थिति:
यह पठार मुख्य रूप से मेघालय राज्य में स्थित है, परंतु इसका विस्तार असम के कार्बी-आंगलोंग और उत्तरी कछार पहाड़ियों तक भी है।
🏔️ उत्तर-पूर्वी पठार का विभाजन (Divisions of the North-Eastern Plateau)
इस पठार को तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है — जिनके नाम वहाँ की प्रमुख जनजातियों पर आधारित हैं (पश्चिम से पूर्व की ओर):
1. गारो पहाड़ियाँ (Garo Hills)
- अवस्थिति: यह पठार का सबसे पश्चिमी भाग है।
- सर्वोच्च शिखर: नोकरेक चोटी (Nokrek Peak – 1412 मीटर), जो एक महत्वपूर्ण बायोस्फीयर रिजर्व भी है।
- जनजाति: यहाँ मुख्य रूप से गारो जनजाति निवास करती है।
2. खासी पहाड़ियाँ (Khasi Hills)
- अवस्थिति: यह पठार का मध्य भाग है और गारो पहाड़ियों से अधिक ऊँचा है।
- सर्वोच्च शिखर: शिलांग शिखर (Shillong Peak – 1965 मीटर) — यह पूरे पठार की भी सबसे ऊँची चोटी है।
मेघालय की राजधानी शिलांग इसी पहाड़ी पर स्थित है। - वर्षा: इन पहाड़ियों का दक्षिणी ढलान कीप (Funnel) जैसी आकृति का है, जो बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी हवाओं को रोक देता है।
परिणामस्वरूप यहाँ विश्व की सर्वाधिक वर्षा होती है।
मॉसिनराम (Mawsynram) और चेरापूंजी (Cherrapunji) — जो विश्व के सर्वाधिक आर्द्र स्थान हैं — खासी पहाड़ियों के दक्षिणी ढलान पर ही स्थित हैं।
3. जयंतिया पहाड़ियाँ (Jaintia Hills)
- अवस्थिति: यह पठार का सबसे पूर्वी भाग है।
- खनिज संपदा: यहाँ कोयला और चूना पत्थर जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
नोट:
असम में स्थित कार्बी-आंगलोंग पठार (Karbi-Anglong Plateau) भी इसी उत्तर-पूर्वी पठार का विस्तार है, जो दक्षिण में मेघालय पठार और पूर्व में नागा पहाड़ियों से घिरा है।
🌿 प्रमुख विशेषताएँ और महत्व (Major Features and Significance)
1. प्रायद्वीपीय पठार से समानता:
इस पठार की चट्टानें आर्कियन युग (Archean Era) की क्वार्टजाइट, शिस्ट, और नीस से बनी हैं, जो छोटानागपुर पठार जैसी हैं।
यह इसे हिमालय की नवीन वलित पर्वत श्रृंखलाओं से स्पष्ट रूप से अलग बनाती हैं।
यहाँ पाए जाने वाले कोयला, चूना पत्थर, लोहा, सिलीमेनाइट और यूरेनियम भी छोटानागपुर पठार के समान हैं।
2. विश्व का सबसे आर्द्र क्षेत्र:
इसकी भौगोलिक स्थिति और कीप जैसी आकृति इसे मानसूनी हवाओं के लिए आदर्श अवरोधक बनाती है।
इसी कारण यह क्षेत्र विश्व में सर्वाधिक औसत वार्षिक वर्षा प्राप्त करता है।
3. अपरदित सतह (Eroded Surface):
अत्यधिक वर्षा के कारण पठार की सतह अत्यधिक अपदित (eroded) हो चुकी है।
यहाँ कोई स्थायी नदी प्रणाली विकसित नहीं हो पाई है, और कई भाग वनस्पति-विहीन हैं।
4. जनजातीय संस्कृति:
यह पठार गारो, खासी, और जयंतिया जैसी प्रमुख मातृवंशीय (Matrilineal) जनजातियों का घर है।
इनकी अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएँ और जीवन-शैली हैं।
🧭 निष्कर्ष (Conclusion)
उत्तर-पूर्वी पठार, भूवैज्ञानिक दृष्टि से प्रायद्वीपीय भारत का ही भाग है, परंतु मालदा गैप के कारण भौगोलिक रूप से अलग-थलग है।
यह अपनी जनजातीय पहाड़ियों, खनिज संपदा, और विश्व में सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र के रूप में एक विशिष्ट भौगोलिक इकाई का प्रतिनिधित्व करता है।
पूर्वी पठार
“पूर्वी पठार” शब्द का उपयोग अक्सर प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी हिस्से को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, हालांकि यह एक बहुत ही सामान्य और व्यापक शब्द है। भूवैज्ञानिक और भौगोलिक रूप से, इस क्षेत्र को अधिक सटीक रूप से कई छोटे-छोटे पठारों और बेसिन में विभाजित किया जाता है।
“पूर्वी पठार” के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्र आते हैं:
- छोटानागपुर का पठार (Chota Nagpur Plateau): यह प्रायद्वीपीय पठार का सबसे महत्वपूर्ण पूर्वी विस्तार है।
- बघेलखंड का पठार (Baghelkhand Plateau): यह छोटानागपुर के पश्चिम में स्थित है।
- दंडकारण्य का पठार (Dandakaranya Plateau): यह छोटानागपुर के दक्षिण में स्थित है।
- महानदी बेसिन / छत्तीसगढ़ का मैदान (Mahanadi Basin / Chhattisgarh Plain): यह पठारों के बीच स्थित एक निम्न मैदानी क्षेत्र है।
चलिए, इन सभी का विस्तृत विवरण देखते हैं।
1. छोटानागपुर का पठार (Chota Nagpur Plateau)
छोटानागपुर का पठार, प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर-पूर्वी विस्तार है। यह भारत का सबसे धनी खनिज क्षेत्र है, जिसके कारण इसे “भारत का रूर (Ruhr of India)” (जर्मनी के खनिज-समृद्ध रूर प्रदेश के नाम पर) और “खनिजों का भंडार (Storehouse of Minerals)” भी कहा जाता है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह पठार केन्द्रीय उच्चभूमि के पूर्वी छोर पर स्थित है। इसके उत्तर और पूर्व में गंगा का मैदान है, जबकि दक्षिण में महानदी बेसिन है।
- राज्य: इसका अधिकांश विस्तार झारखंड राज्य में है। इसके अलावा, इसका कुछ हिस्सा उत्तरी ओडिशा, पश्चिमी पश्चिम बंगाल, उत्तरी छत्तीसगढ़ और बिहार के दक्षिणी हिस्सों तक फैला हुआ है।
- संरचना: यह एक अकेली पठारी इकाई नहीं है, बल्कि विभिन्न ऊँचाइयों और संरचनाओं वाले कई छोटे-छोटे पठारों का एक समूह है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
- प्राचीन भूखंड: यह प्रायद्वीपीय भारत के प्राचीनतम भूखंडों में से एक है, जो आर्कियन युग की ग्रेनाइट और नीस चट्टानों से बना है।
- चट्टानों की विविधता: इसकी खनिज संपन्नता का कारण यहाँ विभिन्न भूवैज्ञानिक कालों की चट्टानों का पाया जाना है:
- धारवाड़ क्रम की चट्टानें: इनमें लौह अयस्क, मैंगनीज, तांबा जैसे धात्विक खनिज मिलते हैं।
- गोंडवाना क्रम की चट्टानें: दामोदर नदी घाटी में पाई जाने वाली इन चट्टानों में भारत के उच्च गुणवत्ता वाले कोयले का विशाल भंडार है।
- आर्कियन चट्टानें: इनमें अभ्रक जैसे खनिज पाए जाते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ और उप-विभाजन
छोटानागपुर का पठार अपनी अनूठी स्थलाकृति और अपवाह तंत्र के लिए जाना जाता है।
1. पठार का उप-विभाजन
यह पठार कई छोटी इकाइयों से मिलकर बना है, जो दामोदर नदी घाटी द्वारा विभाजित हैं:
- पाट प्रदेश (Pat Lands): यह छोटानागपुर पठार का सबसे ऊँचा पश्चिमी भाग है (औसत ऊँचाई ~1,100 मीटर)। इसके शिखर सपाट (flat-topped) और किनारे खड़े ढाल वाले होते हैं (Mesa/Butte जैसी आकृति)। यह क्षेत्र बॉक्साइट के विशाल भंडार के लिए प्रसिद्ध है, जिससे एल्यूमीनियम निकाला जाता है।
- राँची का पठार (Ranchi Plateau): यह पठार का सबसे बड़ा और मध्य भाग है। यह अपेक्षाकृत समतल है और यहाँ से कई नदियाँ निकलती हैं।
- हजारीबाग का पठार (Hazaribagh Plateau): यह दामोदर नदी घाटी के उत्तर में स्थित है। इसे भी दो भागों में बांटा गया है- ऊपरी और निचला हजारीबाग पठार।
- कोडरमा का पठार (Koderma Plateau): यह हजारीबाग पठार का ही उत्तरी किनारा है, जो विश्व में उच्च गुणवत्ता वाले अभ्रक (Mica) के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। इसे “भारत की अभ्रक राजधानी” भी कहा जाता है।
- राजमहल की पहाड़ियाँ (Rajmahal Hills): यह पठार की उत्तर-पूर्वी सीमा बनाती हैं, जो बेसाल्टिक लावा से बनी हैं।
2. अपवाह तंत्र (Drainage System)
- अरीय अपवाह प्रतिरूप (Radial Drainage Pattern): छोटानागपुर पठार अरीय या केन्द्रापसारी अपवाह प्रतिरूप का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पठार का मध्य भाग एक गुंबद की तरह उठा हुआ है, जहाँ से नदियाँ चारों दिशाओं में निकलती हैं।
- प्रमुख नदियाँ:
- दामोदर नदी: यह पठार की सबसे महत्वपूर्ण नदी है जो एक भ्रंश घाटी (Rift Valley) में पूर्व की ओर बहती है। इसे पहले अत्यधिक बाढ़ के कारण “बंगाल का शोक” कहा जाता था। अब इस पर दामोदर घाटी निगम (DVC) द्वारा कई बांध बना दिए गए हैं।
- सुवर्णरेखा नदी: यह पठार के दक्षिण-पूर्व में बहती है और प्रसिद्ध हुंडरू जलप्रपात (Hundru Falls) का निर्माण करती है। जमशेदपुर शहर इसी नदी के किनारे स्थित है।
- उत्तरी कोयल, दक्षिणी कोयल और बराक भी यहाँ की अन्य प्रमुख नदियाँ हैं।
खनिज संसाधन और आर्थिक महत्व
छोटानागपुर का पठार भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
- कोयला (Coal): दामोदर घाटी क्षेत्र (झरिया, बोकारो, गिरिडीह, करनपुरा) भारत के कोकिंग कोल का सबसे बड़ा उत्पादक है, जो लौह-इस्पात उद्योग के लिए आवश्यक है।
- लौह अयस्क (Iron Ore): सिंहभूम (झारखंड) और क्योंझर (ओडिशा) क्षेत्र में उच्च कोटि के लौह अयस्क का भंडार है।
- अभ्रक (Mica): कोडरमा पठार दुनिया का सबसे बड़ा अभ्रक उत्पादक क्षेत्र है।
- बॉक्साइट (Bauxite): पाट प्रदेश भारत के प्रमुख बॉक्साइट उत्पादक क्षेत्र हैं।
- अन्य खनिज: यहाँ तांबा, यूरेनियम (जादूगुड़ा खान), चूना पत्थर, डोलोमाइट और चीनी मिट्टी भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
औद्योगिक केंद्र: खनिजों की इसी प्रचुरता के कारण, इस पठार और इसके आसपास भारत के कई प्रमुख औद्योगिक केंद्र स्थापित हुए हैं, जैसे – जमशेदपुर (TISCO), बोकारो, राउरकेला, दुर्गापुर और रांची (HEC)।
2. बघेलखंड का पठार (Baghelkhand Plateau)
बघेलखंड का पठार, जिसे विंध्याचल पठार के नाम से भी जाना जाता है, मध्य भारत में स्थित एक महत्वपूर्ण पठारी भूभाग है। यह विंध्य पर्वत श्रृंखला का पूर्वी विस्तार है और मध्य भारत के पठारों में एक विशिष्ट स्थान रखता है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति:
- यह मैकाल श्रेणी के उत्तर-पूर्व में स्थित है।
- इसके पश्चिम में बुंदेलखंड का पठार है, और पूर्व और दक्षिण-पूर्व में छोटानागपुर का पठार है।
- इसके उत्तर में विंध्य की कैमूर श्रेणी और दक्षिण में सतपुड़ा श्रेणी का विस्तार है।
- राज्य: इसका विस्तार उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश (जैसे रीवा, सतना, सीधी, शहडोल जिले) और उत्तरी छत्तीसगढ़ (जैसे कोरिया, सूरजपुर जिले) में है।
- ढाल: इस पठार का सामान्य ढाल भी उत्तर और उत्तर-पूर्व की ओर है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
बघेलखंड की भूगर्भिक संरचना जटिल और विविधतापूर्ण है, जो इसे पड़ोसी पठारों से अलग करती है:
- विंध्यन और गोंडवाना चट्टानें: बुंदेलखंड के आर्कियन ग्रेनाइट-नीस के विपरीत, बघेलखंड का पठार मुख्य रूप से विंध्यन क्रम की चूना पत्थर और बलुआ पत्थर की चट्टानों तथा गोंडवाना क्रम की बलुआ पत्थर और शेल की चट्टानों से बना है।
- असंतत स्थलाकृति: इस क्षेत्र में परतदार चट्टानों की श्रृंखलाएं एक-दूसरे के ऊपर चढ़ी हुई सी प्रतीत होती हैं, जो एक असंतत और ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति का निर्माण करती हैं।
बघेलखंड के पठार की प्रमुख विशेषताएँ
- जल विभाजक के रूप में महत्व (Importance as a Water Divide):
- बघेलखंड का पठार एक अत्यंत महत्वपूर्ण जल-विभाजक (Water Divide) के रूप में कार्य करता है।
- यह उत्तर की ओर बहने वाली गंगा नदी प्रणाली और दक्षिण-पूर्व की ओर बहने वाली महानदी नदी प्रणाली के बीच पानी का बँटवारा करता है।
- अपवाह तंत्र (Drainage System):
- सोन नदी: यह पठार की सबसे महत्वपूर्ण नदी है। यह मैकाल श्रेणी के अमरकंटक शिखर के पास से निकलती है और पठार की उत्तरी सीमा के साथ-साथ बहती हुई पूर्व की ओर जाकर पटना के पास गंगा नदी में मिल जाती है। सोन नदी और उसकी सहायक नदियाँ (जैसे रिहंद) इस क्षेत्र के जल निकासी का मुख्य स्रोत हैं।
- अन्य नदियाँ: पठार के दक्षिणी भाग से निकलने वाली छोटी नदियाँ महानदी प्रणाली का हिस्सा बनती हैं।
- स्थलाकृति (Topography):
- यह पठार उत्तर में अधिक पठारी और दक्षिण में अधिक पहाड़ी है।
- यहाँ की स्थलाकृति असमान है, जिसमें समतल मैदानों से लेकर खड़ी ढलान वाली पहाड़ियाँ और गहरी नदी घाटियाँ शामिल हैं। कैमूर और भारनेर की श्रेणियाँ यहाँ की प्रमुख उच्च भूमियाँ हैं।
- खनिज संसाधन (Mineral Resources):
- कोयला: गोंडवाना चट्टानों की उपस्थिति के कारण, यह क्षेत्र कोयले के भंडार में बहुत समृद्ध है। मध्य प्रदेश का सिंगरौली कोयला क्षेत्र, जो भारत का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक क्षेत्र है, इसी पठार पर स्थित है। छत्तीसगढ़ के कोयला क्षेत्र भी इसी का हिस्सा हैं।
- चूना पत्थर: विंध्यन चट्टानों के कारण यहाँ उच्च गुणवत्ता वाला चूना पत्थर पाया जाता है, जो सीमेंट उद्योग का आधार है। सतना और रीवा प्रमुख सीमेंट उत्पादक केंद्र हैं।
- बॉक्साइट: मैकाल श्रेणी के पास बॉक्साइट के भी महत्वपूर्ण भंडार हैं।
- कृषि और वनस्पति:
- यहाँ की मिट्टी लाल-पीली है जो बहुत अधिक उपजाऊ नहीं है। सिंचाई की सहायता से चावल, गेहूं और मोटे अनाज उगाए जाते हैं।
- पठार का एक बड़ा हिस्सा शुष्क पर्णपाती वनों से ढका हुआ है, जहाँ साल, सागौन, और तेंदू के वृक्ष बहुतायत में हैं।
निष्कर्ष: बघेलखंड का पठार एक महत्वपूर्ण भौगोलिक इकाई है जो दो महान नदी प्रणालियों के बीच जल-विभाजक का कार्य करता है। गोंडवाना और विंध्यन चट्टानों की उपस्थिति के कारण यह कोयले और चूना पत्थर जैसे महत्वपूर्ण खनिजों का भंडार है, जिसने इस क्षेत्र को ऊर्जा और सीमेंट उद्योग का एक प्रमुख केंद्र बना दिया है।
3. दंडकारण्य का पठार (Dandakaranya Plateau)
दंडकारण्य का पठार, भारत के मध्य-पूर्वी भाग में स्थित एक विशाल, अत्यंत ऊबड़-खाबड़ और सघन वनों से आच्छादित पठारी भूभाग है। यह अपनी समृद्ध खनिज संपदा, घने जंगलों और अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, लेकिन साथ ही, यह भारत के सबसे अविकसित और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।
ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व (Historical and Mythological Significance)
“दंडकारण्य” का शाब्दिक अर्थ है “दंड का वन” (The Forest of Punishment)। इसका उल्लेख महान महाकाव्य रामायण में प्रमुखता से मिलता है। यह वही विशाल वन प्रदेश था जहाँ भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास का एक बड़ा हिस्सा बिताया था। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से ऋषियों, मुनियों और जनजातीय समुदायों का निवास स्थान रहा है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह पठार छोटानागपुर पठार के दक्षिण और छत्तीसगढ़ के मैदान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
- राज्य: इसका विस्तार मुख्य रूप से दक्षिणी छत्तीसगढ़ (विशेषकर बस्तर संभाग), दक्षिणी ओडिशा (कोरापुट और कालाहांडी जिले) और उत्तरी-पूर्वी तेलंगाना तथा पूर्वी आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में है।
- आयाम: यह पूर्व से पश्चिम लगभग 320 किलोमीटर और उत्तर से दक्षिण लगभग 480 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है।
भूगर्भिक संरचना एवं स्थलाकृति (Geological Structure and Topography)
- प्राचीन चट्टानें: यह प्रायद्वीपीय भारत की प्राचीन आर्कियन युग की ग्रेनाइट और नीस चट्टानों से बना है। साथ ही, यहाँ धारवाड़ क्रम की चट्टानें भी पाई जाती हैं, जो इसे खनिज समृद्ध बनाती हैं।
- अत्यधिक विच्छेदित स्थलाकृति: यह एक समतल पठार नहीं है, बल्कि नदियों द्वारा गहराई से काटा गया एक अत्यधिक विच्छेदित (highly dissected) और ऊबड़-खाबड़ भू-भाग है। यहाँ की स्थलाकृति पहाड़ी, दुर्गम और घने जंगलों वाली है।
- ऊँचाई: पठार की औसत ऊँचाई 400 से 700 मीटर के बीच है।
प्रमुख विशेषताएँ और महत्व
1. खनिज संसाधनों का विशाल भंडार
दंडकारण्य भारत के सबसे धनी खनिज क्षेत्रों में से एक है, लेकिन दुर्गम और अशांत क्षेत्र होने के कारण इन संसाधनों का पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पाया है।
- लौह अयस्क (Iron Ore): छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित बैलाडीला की खदानें (Bailadila Mines) विश्व प्रसिद्ध हैं। यहाँ सर्वोच्च कोटि का हेमेटाइट लौह अयस्क पाया जाता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा विशाखापत्तनम बंदरगाह के माध्यम से जापान को निर्यात किया जाता है।
- बॉक्साइट (Bauxite): ओडिशा के कालाहांडी और कोरापुट जिले, जो इसी पठार का हिस्सा हैं, भारत के सबसे बड़े बॉक्साइट उत्पादक क्षेत्रों में से हैं।
- टिन (Tin): यह दंडकारण्य की सबसे अनूठी खनिज विशेषता है। छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला भारत का एकमात्र टिन-अयस्क उत्पादक क्षेत्र है।
2. अपवाह तंत्र (Drainage System)
- इस पठार का ढाल पूर्व और दक्षिण-पूर्व की ओर है।
- महानदी और गोदावरी नदियाँ इस क्षेत्र के जल को अपवाहित करती हैं।
- इंद्रावती नदी इस पठार की सबसे महत्वपूर्ण नदी है। यह गोदावरी की एक प्रमुख सहायक नदी है।
- चित्रकूट जलप्रपात (Chitrakoot Falls): इंद्रावती नदी छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध चित्रकूट जलप्रपात का निर्माण करती है। अपने चौड़े आकार और घोड़े की नाल जैसी आकृति के कारण इसे अक्सर “भारत का नियाग्रा” (Niagara of India) कहा जाता है।
3. घने वन और जैव-विविधता (Dense Forests and Biodiversity)
- “अरण्य” का अर्थ ही वन होता है। यह क्षेत्र भारत के सबसे घने उष्णकटिबंधीय नम और शुष्क पर्णपाती वनों से आच्छादित है।
- साल और सागौन (Teak) यहाँ के प्रमुख और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण वृक्ष हैं।
- यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव-विविधता के लिए भी जाना जाता है और कई राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों का घर है।
सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ
- पिछड़ापन और गरीबी: विशाल खनिज संपदा के बावजूद, दंडकारण्य भारत के सबसे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में से एक है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है।
- वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद): यह पूरा क्षेत्र वामपंथी उग्रवाद या नक्सलवाद से गंभीर रूप से प्रभावित है। इस अशांति ने क्षेत्र के विकास, औद्योगीकरण और संसाधनों के उपयोग में बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न की है।
- जनजातीय जनसंख्या: यह क्षेत्र मुख्य रूप से गोंड, मारिया, मुरिया और भतरा जैसी विभिन्न जनजातीय समुदायों का घर है, जिनकी अपनी अनूठी और समृद्ध संस्कृति है।
निष्कर्ष: दंडकारण्य का पठार एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ प्रकृति ने भरपूर संपदा दी है, लेकिन यह भौगोलिक दुर्गमता और गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। यह अपनी पौराणिक विरासत, खनिज संपदा और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन इसका विकास नक्सलवाद और पिछड़ेपन के कारण बाधित है।
4. महानदी बेसिन / छत्तीसगढ़ का मैदान (Mahanadi Basin / Chhattisgarh Plain)
महानदी बेसिन, जिसे छत्तीसगढ़ का मैदान भी कहा जाता है, प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी भाग में स्थित एक अनूठी, कटोरे के आकार की स्थलाकृतिक इकाई है। यह एक उपजाऊ, कृषि प्रधान और खनिज समृद्ध क्षेत्र है, जो अपने धान के उत्पादन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)
- अवस्थिति: यह एक अंतःपर्वतीय बेसिन (Intermontane Basin) है, जो चारों ओर से उच्च भूमियों और पठारों से घिरा हुआ है:
- उत्तर में: छोटानागपुर का पठार और बघेलखंड का पठार।
- पश्चिम में: मैकाल श्रेणी (सतपुड़ा का पूर्वी विस्तार)।
- दक्षिण में: दंडकारण्य का पठार और रायपुर उच्चभूमि।
- पूर्व में: पूर्वी घाट की निचली पहाड़ियाँ।
- आकृति: इसकी स्थलाकृति एक विशाल तश्तरी या कटोरे (Saucer-shaped) के समान है, जिसके किनारे ऊँचे और मध्य भाग निचला और समतल है।
- राज्य: इसका अधिकांश विस्तार छत्तीसगढ़ राज्य में है, लेकिन इसका पूर्वी भाग ओडिशा तक फैला हुआ है, जहाँ महानदी अपना डेल्टा बनाती है।
निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)
- अपवाह बेसिन: इसका निर्माण मुख्य रूप से महानदी नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा एक विशाल भू-अभिनति (Syncline) में अवसादों के जमाव से हुआ है।
- चट्टानी संरचना:
- यह बेसिन भूवैज्ञानिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कुडप्पा और विंध्यन क्रम की प्राचीन परतदार चट्टानों (Sedimentary Rocks) से बना है।
- इसके चारों ओर की उच्चभूमियाँ कठोर आर्कियन ग्रेनाइट और नीस से बनी हैं, जबकि बेसिन का भीतरी भाग अपेक्षाकृत नरम चूना पत्थर, शेल और बलुआ पत्थर से बना है।
प्रमुख विशेषताएँ और महत्व
1. कटोरे के आकार की स्थलाकृति (Saucer-shaped Topography)
- यह भारत की एक बहुत ही विशिष्ट स्थलाकृति है। इसके ऊँचे किनारे (Rim) और समतल केंद्रीय मैदान ने इसे एक अद्वितीय पहचान दी है।
2. “भारत का चावल का कटोरा” (Rice Bowl of India)
- उपजाऊ मिट्टी: नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी और बेसिन की लाल-पीली मिट्टी कृषि के लिए बहुत उपजाऊ है।
- सघन धान की खेती: बेसिन की समतल भूमि और पर्याप्त जल की उपलब्धता (वर्षा और सिंचाई दोनों से) चावल (धान) की खेती के लिए आदर्श दशाएँ प्रदान करती है।
- यहाँ साल में दो बार चावल की फसल ली जाती है, और यहाँ का चावल अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है। इसी सघन उत्पादन के कारण छत्तीसगढ़ को “भारत का धान का कटोरा” की संज्ञा दी जाती है।
3. अपवाह तंत्र (Drainage System)
- महानदी और उसकी सहायक नदियाँ: इस पूरे मैदान को महानदी और उसकी प्रमुख सहायक नदियाँ जैसे शिवनाथ, हसदो, मांड और जोंक अपवाहित करती हैं। शिवनाथ इसकी सबसे लंबी सहायक नदी है।
- हीराकुंड बांध: महानदी पर ओडिशा में विश्व के सबसे लंबे बांधों में से एक, हीराकुंड बांध बनाया गया है। यह बांध बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है और इस बेसिन के निचले हिस्सों को लाभान्वित करता है।
4. खनिज संसाधन (Mineral Resources)
- सीमेंट ग्रेड चूना पत्थर: कुडप्पा और विंध्यन चट्टानों की उपस्थिति के कारण, यह बेसिन उच्च गुणवत्ता वाले चूना पत्थर और डोलोमाइट के विशाल भंडार से समृद्ध है।
- सीमेंट उद्योग का केंद्र: इसी कारण, यह क्षेत्र भारत के सबसे बड़े सीमेंट उत्पादक क्षेत्रों में से एक बन गया है। रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर के आसपास कई बड़े सीमेंट संयंत्र स्थित हैं।
- कोयला: बेसिन के उत्तर-पूर्वी हिस्से में कोरबा कोयला क्षेत्र स्थित है, जो देश के प्रमुख कोयला क्षेत्रों में से एक है।
5. औद्योगिक विकास
- खनिज संसाधनों और कृषि उत्पादन की प्रचुरता ने इस क्षेत्र में तेजी से औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया है।
- भिलाई इस्पात संयंत्र (Bhilai Steel Plant): भारत के सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण इस्पात संयंत्रों में से एक, भिलाई, इसी मैदान में स्थित है। इसे लौह अयस्क पास के दंडकारण्य (बैलाडीला) से, कोयला कोरबा से और डोलोमाइट स्थानीय स्तर पर मिल जाता है।
- कोरबा भारत का एक प्रमुख ताप विद्युत केंद्र (Thermal Power Hub) भी है।
निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ का मैदान या महानदी बेसिन, अपनी कटोरे जैसी अनूठी स्थलाकृति के साथ, भारत का एक महत्वपूर्ण कृषि और औद्योगिक क्षेत्र है। यह न केवल देश का “चावल का कटोरा” है, बल्कि कोयला, चूना पत्थर और लौह अयस्क जैसे संसाधनों की निकटता के कारण यह सीमेंट और इस्पात उद्योग का एक प्रमुख केंद्र भी बन गया है।
निष्कर्ष: “पूर्वी पठार” शब्द के अंतर्गत ये सभी विविध क्षेत्र आते हैं, जो अपनी अनूठी भूगर्भिक संरचना, खनिज संपदा और आर्थिक गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं। यह क्षेत्र भारत की खनिज सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
🏔️ पश्चिमी और पूर्वी घाट की प्रमुख चोटियाँ — ऊँचाई के अनुसार (घटते क्रम में)
| क्रम | चोटी का नाम | ऊँचाई (मीटर में) | घाट | पहाड़ी / श्रेणी | राज्य / अवस्थिति |
| 1 | अनाइमुडी (Anaimudi) | 2695 | पश्चिमी घाट | अन्नामलाई पहाड़ियाँ | केरल |
| 2 | दोदाबेटा (Doda Betta) | 2637 | पश्चिमी घाट | नीलगिरि पहाड़ियाँ | तमिलनाडु |
| 3 | मुल्यानागिरी (Mullayanagiri) | 1930 | पश्चिमी घाट | बाबा बुदन गिरी | कर्नाटक |
| 4 | कुद्रेमुख (Kudremukh) | 1892 | पश्चिमी घाट | कुद्रेमुख श्रेणी | कर्नाटक |
| 5 | जिंद्धागाड़ा (Jindhagada Peak) | 1690 | पूर्वी घाट | अराकू घाटी / मादुगुला कोंडा | आंध्र प्रदेश |
| 6 | कलसुबाई (Kalsubai) | 1646 | पश्चिमी घाट | हरिश्चंद्र श्रेणी | महाराष्ट्र |
| 7 | सन्यासीमलाई (Sanyasimalai) | 1620 | पूर्वी घाट | शेवरॉय पहाड़ियाँ | तमिलनाडु |
| 8 | महेंद्रगिरि (Mahendragiri) | 1501 | पूर्वी घाट | गढ़जात पहाड़ियाँ | ओडिशा |
| 9 | महाबलेश्वर (Mahabaleshwar) | 1438 | पश्चिमी घाट | महाबलेश्वर पठार | महाराष्ट्र |
| 10 | नोकरेक चोटी (Nokrek Peak) | 1412 | मेघालय पठार (प्रायद्वीपीय पठार का हिस्सा) | गारो पहाड़ियाँ | मेघालय |
📌 प्रमुख बिंदु और निष्कर्ष
1. पश्चिमी घाट स्पष्ट रूप से ऊँचा है:
आप देख सकते हैं कि सूची में शीर्ष चोटियाँ — अनाइमुडी, दोदाबेटा, मुल्यानागिरी, और कुद्रेमुख — सभी पश्चिमी घाट की हैं।
दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी अनाइमुडी (2695 मी) भी पश्चिमी घाट में ही स्थित है।
2. पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी:
पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी जिंद्धागाड़ा (1690 मी) है, जो पश्चिमी घाट की कई चोटियों से कम ऊँची है।
3. ऊँचाई का क्रम:
सामान्यतः, पश्चिमी घाट की ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती है — जैसे महाराष्ट्र में कलसुबाई (1646 मी) से लेकर केरल में अनाइमुडी (2695 मी) तक।
पूर्वी घाट में ऊँचाई का कोई निश्चित क्रम नहीं है क्योंकि यह एक विच्छेदित श्रृंखला है, परंतु इसकी ऊँची चोटियाँ आंध्र प्रदेश और ओडिशा के उत्तरी भागों में स्थित हैं।
4. राज्यवार सर्वोच्च चोटियाँ:
- केरल: अनाइमुडी (2695 मी)
- तमिलनाडु: दोदाबेटा (2637 मी)
- कर्नाटक: मुल्यानागिरी (1930 मी)
- आंध्र प्रदेश: जिंद्धागाड़ा (1690 मी)
- महाराष्ट्र: कलसुबाई (1646 मी)
- ओडिशा: महेंद्रगिरि (1501 मी) (कुछ स्रोतों के अनुसार देओमाली – 1672 मी)
📖 यह तालिका प्रतियोगी परीक्षाओं और सामान्य अध्ययन के लिए एक त्वरित एवं उपयोगी संदर्भ प्रदान करती है।
प्रायद्वीपीय पठार का महत्व (Importance of the Peninsular Plateau)
प्रायद्वीपीय पठार भारत का न केवल सबसे प्राचीन और सबसे बड़ा भूभाग है, बल्कि यह देश के आर्थिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक विकास की आधारशिला भी है। इसका महत्व बहुआयामी है, जिसे निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. खनिजों का भंडार (Storehouse of Minerals)
यह प्रायद्वीपीय पठार का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। भारत के लगभग 98% खनिज संसाधन इसी पठार में संचित हैं, जिस कारण यह भारत के औद्योगिक विकास की रीढ़ है।
- लौह अयस्क: छोटानागपुर, कर्नाटक और ओडिशा के पठारी क्षेत्रों में उच्च कोटि के लौह अयस्क के विशाल भंडार हैं, जो भारत के लौह-इस्पात उद्योग का आधार हैं।
- कोयला: दामोदर, महानदी और गोदावरी नदी घाटियों की गोंडवाना चट्टानों में भारत का अधिकांश कोयला पाया जाता है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। छोटानागपुर पठार को “भारत का रूर” (Ruhr of India) कहा जाता है।
- बॉक्साइट, अभ्रक और मैंगनीज: छोटानागपुर और दंडकारण्य पठार बॉक्साइट (एल्यूमीनियम का अयस्क) और अभ्रक के प्रमुख स्रोत हैं, जबकि कर्नाटक और मध्य प्रदेश मैंगनीज के लिए प्रसिद्ध हैं।
- कीमती धातुएँ और पत्थर: कर्नाटक की कोलार और हट्टी की खदानें सोने के लिए प्रसिद्ध हैं, और मध्य प्रदेश की पन्ना की खदानें विंध्य श्रेणी में हीरे के लिए जानी जाती हैं।
2. उपजाऊ काली मिट्टी (Fertile Black Soil)
- दक्कन ट्रैप (विशेषकर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात) के लावा निर्मित पठार पर काली मिट्टी या रेगुर मिट्टी की मोटी परत पाई जाती है।
- यह मिट्टी अपनी उच्च नमी धारण क्षमता के कारण कपास, गन्ना, सोयाबीन और चना जैसी व्यावसायिक फसलों के उत्पादन के लिए अत्यंत उपजाऊ है। इसने इस क्षेत्र को भारत के प्रमुख कृषि केंद्रों में से एक बना दिया है।
3. जल-विद्युत और सिंचाई (Hydroelectricity and Irrigation)
- पठार की अधिकांश नदियाँ मौसमी हैं, लेकिन वे अपने मार्ग में कई जलप्रपातों (Waterfalls) का निर्माण करती हैं क्योंकि वे ऊँचे पठारी भू-भाग से होकर गुजरती हैं।
- इन जलप्रपातों की क्षमता का उपयोग जलविद्युत उत्पादन के लिए किया गया है। शिवसमुद्रम (कावेरी नदी पर), जोग फॉल्स (शरावती नदी पर) और कई अन्य परियोजनाएँ इसके उदाहरण हैं।
- यहाँ की नदियों पर बांध बनाकर नहरों के माध्यम से सिंचाई की सुविधा प्रदान की गई है, जो पठार के शुष्क क्षेत्रों में कृषि के लिए जीवनरेखा है।
4. वन संपदा और जैव-विविधता (Forest Wealth and Biodiversity)
- पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट के पहाड़ी क्षेत्र घने वनों से आच्छादित हैं।
- इन वनों से सागौन (Teak), साल, शीशम और चंदन (Sandalwood) जैसी मूल्यवान लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं। इसके अलावा, ये वन कई औषधीय जड़ी-बूटियों और वन उत्पादों का भी स्रोत हैं।
- पश्चिमी घाट को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है और यह विश्व के शीर्ष जैव-विविधता हॉटस्पॉट में से एक है। यह हजारों स्थानिक वनस्पतियों और जीवों का घर है, जो पारिस्थितिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
5. जलवायु पर प्रभाव (Influence on Climate)
- पश्चिमी घाट दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के लिए एक प्रमुख अवरोधक के रूप में कार्य करता है, जिससे इसके पश्चिमी ढलानों पर भारी वर्षा होती है।
- यह पठार के आंतरिक भागों में एक वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow Area) का भी निर्माण करता है, जिससे वहाँ की जलवायु अर्ध-शुष्क रहती है। यह प्रभाव इस क्षेत्र की कृषि और वनस्पति को सीधे तौर पर निर्धारित करता है।
6. पर्यटन एवं सांस्कृतिक धरोहर (Tourism and Cultural Heritage)
- यह पठार अपने सुरम्य हिल स्टेशनों जैसे ऊटी, कोडाइकनाल, महाबलेश्वर, पंचमढ़ी और माउंट आबू के लिए प्रसिद्ध है।
- यह क्षेत्र ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। अजंता-एलोरा की गुफाएँ, हम्पी के खंडहर, महाबलीपुरम के मंदिर, साँची के स्तूप और अनगिनत किले और मंदिर इसकी प्राचीन विरासत के प्रतीक हैं, जो पर्यटन का एक बड़ा केंद्र हैं।
7. भूवैज्ञानिक स्थिरता (Geological Stability)
- हिमालय के विपरीत, प्रायद्वीपीय पठार भूवैज्ञानिक रूप से एक अत्यंत स्थिर और कठोर भूखंड है।
- यह क्षेत्र बड़े भूकंपों से लगभग मुक्त है (लातूर जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर), जो इसे बड़े बांधों, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के निर्माण के लिए एक सुरक्षित क्षेत्र बनाता है।
निष्कर्ष में, प्रायद्वीपीय पठार सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक संपदा का खजाना, औद्योगिक शक्ति का आधार, कृषि अर्थव्यवस्था की नींव और एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षक है।