भारत का सामान्य परिचय

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भारत का सामान्य परिचय – अवस्थिति और विस्तार

(General Introduction of India – Location and Extent)


यह खंड UPSC परीक्षा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए “भारत का सामान्य परिचय: अवस्थिति और विस्तार” विषय को भूमिका, संरचित विवरण, और विगत वर्षों के प्रश्नों (PYQs) सहित प्रस्तुत करता है।


I. भूमिका (Introduction / Prelude)

भारतीय उपमहाद्वीप अपने विशाल क्षेत्रफल, विविध जलवायु, और सांस्कृतिक विषमता के कारण ‘एक महाद्वीप का लघुरूप’ (Miniature Continent) कहलाता है।
इसकी विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति इसके राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और जलवायु स्वरूप को गहराई से प्रभावित करती है।
यह मुख्यतः उत्तरी गोलार्ध के पूर्वी भाग में, भूमध्य रेखा के निकट स्थित है।


II. भौगोलिक अवस्थिति और विस्तार का व्यवस्थित विवरण

(Systematic Description of Geographical Location and Extent)


A. भारत की विश्वव्यापी स्थिति (Global Position of India)

भारत उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) और पूर्वी गोलार्ध (Eastern Hemisphere) में स्थित है।
इसका दक्षिणी भाग उष्णकटिबंधीय (Tropical) और उत्तरी भाग उपोष्णकटिबंधीय (Sub-Tropical) या समशीतोष्ण (Temperate) क्षेत्र में आता है।

मापदण्ड (Parameter)विस्तार (Extent)चरम बिंदु (Extreme Point / Importance)
मुख्य अक्षांशीय विस्तार8°4′ उत्तर (N) से 37°6′ उत्तर (N)37°6′ N पर इंदिरा कोल (उत्तरीतम बिंदु)
सम्पूर्ण अक्षांशीय विस्तार6°45′ उत्तर (N) से 37°6′ उत्तर (N)6°45′ N पर इंदिरा प्वाइंट (दक्षिणीतम बिंदु – ग्रेट निकोबार)
देशांतरीय विस्तार68°7′ पूर्व (E) से 97°25′ पूर्व (E)97°25′ E पर किबिथु (पूर्वीतम बिंदु – अरुणाचल प्रदेश)
अक्षांशीय एवं देशांतरीय अंतरलगभग 29° (37°6′ N – 8°4′ N और 97°25′ E – 68°7′ E)यह अंतर भारत की जलवायु एवं समय विविधता का प्रमुख कारण है।

📘 PYQ 1 (अवस्थिति):
मुख्य भूमि का सबसे दक्षिणी बिंदु क्या है?
उत्तर: केप कोमोरिन (कन्याकुमारी)
[Prelims 2012]


B. आयाम, आकार और क्षेत्रफल

(Dimensions, Shape, and Area)

मापदण्ड (Parameter)आँकड़े (Data)विवरण / वैश्विक क्रम (Rank)
आकार (Shape)मोटे तौर पर चतुष्कोणीय (Quadrangular)विविध जलवायु और भौगोलिक संरचना
कुल क्षेत्रफल (Total Area)32,87,263 वर्ग किमी (≈ 32.8 लाख किमी²)विश्व का 7वाँ सबसे बड़ा देश (2.4%)
उत्तर-दक्षिण विस्तार3,214 किमीइंदिरा कोल से कन्याकुमारी (केप कोमोरिन) तक
पूर्व-पश्चिम विस्तार2,933 किमीकिबिथु (अरुणाचल) से गुहार मोती (गुजरात) तक
तटरेखा की कुल लंबाई7,516.6 किमीमुख्यभूमि (6,100 किमी) + द्वीप समूह (अंडमान, लक्षद्वीप)

C. समय और तिथि का निर्धारण

(Determination of Time and Date)

भारत के देशांतरीय विस्तार (68°7′ E – 97°25′ E) से लगभग 2 घंटे (116 मिनट) का स्थानीय समय अंतर होता है।
इस समस्या के समाधान हेतु भारतीय मानक समय (IST) अपनाया गया है।

मापदण्ड (Parameter)विवरण (Description)प्रभाव / महत्व (Significance)
भारतीय मानक समय रेखा (IST)82°30′ पूर्व देशांतरयह GMT से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।
राज्य जिनसे गुजरती हैउत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेशयह रेखा मिर्ज़ापुर (U.P.) के पास से गुजरती है।

📘 PYQ 2 (समय):
यदि अरुणाचल प्रदेश में सूर्योदय 5:00 बजे होता है,
तो गुजरात में यह लगभग 7:00 बजे होगा।
[Conceptual PYQ – Based on Time Difference]


III. अवस्थिति का महत्व और निहितार्थ

(Significance and Implications of India’s Location)

यह भाग विशेष रूप से मुख्य परीक्षा (Mains) के लिए महत्वपूर्ण है।

आयाम (Dimension)महत्त्व / निहितार्थ (Significance / Implication)
1. जलवायु और कटिबंधकर्क रेखा भारत को लगभग दो भागों में बाँटती है, जिससे दक्षिण में उष्णकटिबंधीय मानसूनी और उत्तर में समशीतोष्ण जलवायु मिलती है। इससे कृषि, जैव-विविधता एवं वर्षा-पैटर्न में विविधता आती है।
2. भू-सामरिक स्थिति (Geostrategic)हिंद महासागर के शीर्ष पर भारत की केंद्रीय स्थिति उसे समुद्री मार्गों के व्यापार, नौसैनिक नियंत्रण (Naval Control) और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए विशेष बनाती है।
3. प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)7,500 किमी लंबी तटरेखा भारत को एक विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) प्रदान करती है, जिसमें खनिज, मत्स्य और अपतटीय ऊर्जा संसाधनों की प्रचुरता है।
4. सांस्कृतिक संपर्क (Cultural Linkages)भारत की सामुद्रिक अवस्थिति ने मसालों, धर्मों, और विचारों के वैश्विक प्रसार को संभव बनाया है, जिससे दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व से ऐतिहासिक संबंध स्थापित हुए।

📘 PYQ 3 (सामरिक):
“भारत का प्रायद्वीपीय भाग हिंद महासागर की ओर विस्तारित एक महत्वपूर्ण अंग है।”
इस कथन की, देश के वाणिज्यिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक लाभों को ध्यान में रखते हुए विवेचना कीजिए।
[Mains GS I – 2020 आधारित]


IV. कर्क रेखा एवं उसका प्रतिच्छेदन

(Tropic of Cancer and Its Intersection)

कर्क रेखा भारत के भौगोलिक अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

विवरण (Description)तथ्य / राज्य (Facts / States)
कर्क रेखा जिन 8 राज्यों से गुजरती हैगुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मिज़ोरम
IST और कर्क रेखा का प्रतिच्छेदनये दोनों रेखाएँ छत्तीसगढ़ राज्य में एक-दूसरे को काटती हैं।

📘 PYQ 4 (राज्य):
कर्क रेखा निम्नलिखित में से किस राज्य से होकर नहीं गुजरती है?
(विकल्पों में से एक — ओडिशा)
उत्तर: ओडिशा
[Prelims 2013 आधारित]

📘 PYQ 5 (अवस्थिति):
“सूर्य के ऊर्ध्वाधर प्रकाश (Vertical Sun Rays) कभी भी चेन्नई (13°N) और कोलकाता (22.5°N) पर नहीं पड़ते हैं।”
क्या यह कथन सत्य है?
उत्तर: असत्य — कर्क रेखा के दक्षिण स्थित सभी स्थानों पर सूर्य की ऊर्ध्व किरणें पड़ती हैं।
[Prelims – Conceptual]


1.2: भारत की सीमाएँ और पड़ोसी देश (Boundaries and Neighboring Countries)

भारत अपनी अवस्थिति के कारण दक्षिण एशिया के मध्य में स्थित है। यह उत्तर, उत्तर-पूर्व और पूर्व में एशियाई मुख्य भू-भाग (Mainland Asia) और दक्षिण में हिंद महासागर (Indian Ocean) से घिरा है, जो इसे विशिष्ट सामरिक और भौगोलिक महत्व प्रदान करता है।

I. सीमा रेखाओं का परिचय (Introduction to Boundaries)

भारत के पास विश्व की सबसे लंबी और सबसे अधिक आबादी वाली सीमाओं में से कुछ हैं, जिनमें मैदानी क्षेत्र, मरुस्थल, उच्च पर्वत श्रृंखलाएँ, दलदली भूमि और समुद्र शामिल हैं।

सीमा का प्रकारकुल अनुमानित लम्बाईसीमा रेखा पर प्रमुख चुनौती
स्थलीय सीमालगभग 15,20015,200 किलोमीटरविविध भूभाग, तस्करी, घुसपैठ।
तटीय सीमा (मुख्य भूमि)6,1006,100 किलोमीटर
तटीय सीमा (कुल, द्वीप समूहों सहित)7,516.67,516.6 किलोमीटरअपतटीय सुरक्षा, मछली पकड़ने के विवाद।

II. पड़ोसी देश और स्थलीय सीमाएँ (Neighboring Countries and Land Boundaries)

भारत अपनी सबसे लंबी स्थलीय सीमा बांग्लादेश के साथ और सबसे छोटी अफगानिस्तान के साथ साझा करता है (POK क्षेत्र में)। भारत कुल सात (7) देशों के साथ स्थलीय सीमाएँ साझा करता है:

पड़ोसी देश (Neighbouring Country)लम्बाई (km में)अंतर्राष्ट्रीय सीमा का नाम (जहाँ लागू हो)
1. बांग्लादेश4096.74096.7
2. चीन34883488मैकमोहन रेखा (पूर्वी भाग), LAC
3. पाकिस्तान33233323रैडक्लिफ रेखा, LoC (नियंत्रण रेखा)
4. नेपाल17511751खुली सीमा
5. म्यांमार (बर्मा)16431643पहाड़ी सीमाएँ (पटकई, नागा, आदि)
6. भूटान699699
7. अफगानिस्तान106106डूरंड रेखा (वर्तमान में POK क्षेत्र से लगी हुई)

A. अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित भारतीय राज्य (Indian States on International Borders)

सीमा साझा करने वाले कुल 

16

16

 राज्य और 

2

2

 केंद्र शासित प्रदेश (UTs) हैं।

नोट: त्रिपुरा एकमात्र भारतीय राज्य है जो तीन तरफ से बांग्लादेश से घिरा हुआ है।


III. जलीय और सामुद्रिक पड़ोसी (Water and Maritime Neighbors)

भारत दो (2) देशों के साथ समुद्री सीमाएँ साझा करता है।


IV. सीमा और क्षेत्र संबंधी विवाद (Boundary and Territorial Disputes)

सीमाएँ हमेशा सामरिक तनाव और भू-राजनीतिक चिंता का क्षेत्र रही हैं।

पड़ोसी देशप्रमुख विवादित क्षेत्र/सीमाएँ
चीन1. LAC (वास्तविक नियंत्रण रेखा): लद्दाख में, मैकमोहन रेखा का विवादित क्षेत्र (खासकर अरुणाचल प्रदेश)।
2. अक्साई चिन (Aksai Chin): चीन के कब्जे वाला लद्दाख का क्षेत्र।
पाकिस्तान1. PoK (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर): 19471947 से पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जाया गया क्षेत्र।
2. LoC (नियंत्रण रेखा): जम्मू-कश्मीर में विवादित सैन्यीकृत सीमा।
3. सर्क्रीक (Sir Creek): गुजरात और सिंध के बीच ज्वारीय क्रीक में विवाद। (सीमा निर्धारण पर विवाद)।
श्रीलंकाकच्चातिवु द्वीप (Katchatheevu Island): एक छोटा सा निर्जन द्वीप जिस पर भारत और श्रीलंका के बीच विवाद रहा है। (वर्तमान में, यह 19741974 और 19761976 के समझौतों के तहत श्रीलंका का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक मुद्दा बना रहता है)।
नेपालकालापानी, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख क्षेत्र: उत्तराखंड और नेपाल की सीमा पर स्थित ये तीन क्षेत्र नेपाल द्वारा मानचित्रण में अपने क्षेत्र के रूप में दावा किए जाते हैं।

V. विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)

PYQ (प्रश्न)वर्ष/परीक्षाउत्तर (संक्षिप्त)
भारत की सबसे लंबी सीमा निम्नलिखित में से किस देश के साथ लगी हुई है?Prelims 2008-आधारितबांग्लादेश
कौन सा राज्य तीनों ओर से बांग्लादेश से घिरा हुआ है?Prelims (विभिन्न राज्य PSC)त्रिपुरा
सर्क्रीक विवाद किन दो देशों के बीच है और इसका कारण क्या है?Mains GS I (Conceptual)भारत और पाकिस्तान; दलदली/ज्वारीय क्रीक क्षेत्र में सीमा निर्धारण।
निम्नलिखित में से कौन से भारतीय राज्य क्रमशः नेपाल, चीन और म्यांमार की सीमाओं को स्पर्श करते हैं? (Multiple choice question)Prelims (Conceptual)जैसे: उत्तर प्रदेश (नेपाल), हिमाचल प्रदेश/सिक्किम (चीन), मिजोरम (म्यांमार)
भारतीय सीमाओं पर संघर्षों में प्राकृतिक भूभाग के प्रभावों की व्याख्या कीजिए। (Explain the influence of physical geography on conflicts along Indian borders.)Mains GS I (Conceptual)(Ans: हिमालय: शीत, उच्च अक्षांशीय युद्ध; कच्छ की खाड़ी: दलदल, पहुंच में कठिनाई आदि।)

1.2: भारत की सीमाएँ और पड़ोसी देश (Boundaries and Neighboring Countries)

भारत दक्षिण एशिया के मध्य में स्थित है। यह उत्तर, उत्तर-पूर्व और पूर्व में एशियाई मुख्य भू-भाग (Mainland Asia) से तथा दक्षिण में हिंद महासागर (Indian Ocean) से घिरा हुआ है। इस कारण इसकी भौगोलिक और सामरिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।


🧭 I. सीमा रेखाओं का परिचय (Introduction to Boundaries)

भारत के पास विश्व की सबसे विविधतापूर्ण और जनसंख्या-सघन सीमाएँ हैं — जिनमें पर्वत, मैदानी क्षेत्र, मरुस्थल, दलदल, और तटरेखाएँ शामिल हैं।

सीमा का प्रकारकुल अनुमानित लंबाईप्रमुख चुनौती
स्थलीय सीमा (Land Boundary)लगभग 15,200 किमीविविध भू-आकृतियाँ, तस्करी, घुसपैठ
तटीय सीमा (मुख्य भूमि)लगभग 6,100 किमीतटीय सुरक्षा और नौवहन
कुल तटीय सीमा (द्वीपों सहित)लगभग 7,516.6 किमीअपतटीय सुरक्षा, मत्स्य विवाद

🌏 II. पड़ोसी देश और स्थलीय सीमाएँ (Neighboring Countries and Land Boundaries)

भारत 7 देशों के साथ अपनी स्थलीय सीमाएँ साझा करता है — जिनमें से सबसे लंबी बांग्लादेश के साथ और सबसे छोटी अफगानिस्तान के साथ (POK क्षेत्र में) है।

क्रमपड़ोसी देशसीमा लंबाई (किमी)सीमा रेखा का नाम / विवरण
1बांग्लादेश4,096.7सबसे लंबी स्थलीय सीमा
2चीन3,488मैकमोहन रेखा (पूर्व), LAC
3पाकिस्तान3,323रैडक्लिफ रेखा, LoC
4नेपाल1,751खुली सीमा
5म्यांमार1,643पटकई, नागा, लुशाई पर्वत क्षेत्र
6भूटान699हिमालयी सीमा क्षेत्र
7अफगानिस्तान106डूरंड रेखा (POK क्षेत्र से जुड़ी)

🗺️ अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगे भारतीय राज्य

भारत के 16 राज्य और 2 केंद्रशासित प्रदेश (UTs) अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से लगे हैं।

देशसंबंधित भारतीय राज्य/UT
पाकिस्तानगुजरात, राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख
चीनहिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख
नेपालउत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम
भूटानसिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश
म्यांमारअरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम
बांग्लादेशपश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिज़ोरम

नोट: त्रिपुरा एकमात्र ऐसा राज्य है जो तीन ओर से बांग्लादेश से घिरा है।


🌊 III. जलीय और सामुद्रिक पड़ोसी (Water & Maritime Neighbors)

भारत दो देशों के साथ समुद्री सीमाएँ (Maritime Borders) साझा करता है।

देशविभाजन का जलसंधि क्षेत्र
श्रीलंकापाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) एवं मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) द्वारा अलग
मालदीव8° चैनल (Eight Degree Channel) द्वारा लक्षद्वीप से अलग

⚔️ IV. सीमा और क्षेत्रीय विवाद (Boundary & Territorial Disputes)

पड़ोसी देशप्रमुख विवादित क्षेत्र / रेखा
चीन① LAC (लद्दाख क्षेत्र) ② अक्साई चिन ③ मैकमोहन रेखा (अरुणाचल प्रदेश)
पाकिस्तान① PoK (पाक-अधिकृत कश्मीर) ② LoC ③ सर्क्रीक विवाद (गुजरात-सिंध सीमा)
श्रीलंकाकच्चातिवु द्वीप – 1974 व 1976 के समझौते में श्रीलंका को हस्तांतरित
नेपालकालापानी, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख (उत्तराखंड सीमा विवाद)

📚 V. विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)

प्रश्नपरीक्षा/वर्षउत्तर
भारत की सबसे लंबी सीमा किस देश से लगती है?Prelims 2008बांग्लादेश
कौन-सा राज्य तीनों ओर से बांग्लादेश से घिरा है?State PSC / Prelimsत्रिपुरा
सर्क्रीक विवाद किन देशों के बीच है?Mains GS-Iभारत और पाकिस्तान
कौन-से राज्य क्रमशः नेपाल, चीन और म्यांमार से सीमाएँ साझा करते हैं?Prelims (Conceptual)उत्तर प्रदेश (नेपाल), सिक्किम (चीन), मिज़ोरम (म्यांमार)
“भारतीय सीमाओं पर संघर्षों में प्राकृतिक भूभाग की भूमिका” पर टिप्पणी कीजिए।Mains GS-Iहिमालयी ऊँचाई, मरुस्थलीय सीमाएँ, दलदली क्षेत्र आदि ने रणनीतिक कठिनाइयाँ उत्पन्न की हैं।

1.3: भारत का राजनीतिक और प्रशासनिक विभाजन (Political and Administrative Division of India)

भारत को शासन एवं प्रशासनिक सुगमता के लिए राज्यों (States) और केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories – UTs) में बाँटा गया है।
वर्तमान में भारत में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं।
इन इकाइयों की सीमाएँ और अवस्थिति भारत के संघीय ढाँचे (Federal Structure) को दर्शाती हैं।


🏛️ I. विभाजन की संरचना (Structure of Division)

भारत में शासन की दो-स्तरीय प्रशासनिक प्रणाली है:

इकाईविवरण
राज्य (States)प्रमुख प्रशासनिक इकाइयाँ, जिनकी अपनी निर्वाचित सरकारें होती हैं। सीमांकन में भौगोलिक, भाषाई और प्रशासनिक कारक महत्त्वपूर्ण रहे हैं।
केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories – UTs)ये सीधे केंद्र सरकार (राष्ट्रपति/प्रशासक) के अधीन आते हैं। इनका गठन सामरिक, ऐतिहासिक या प्रशासनिक कारणों से किया जाता है। (उदाहरण: चंडीगढ़ – दो राज्यों की साझा राजधानी)

🗺️ II. भारतीय राज्य (28 States)

भारत के राज्यों को भौगोलिक और क्षेत्रीय आधार पर समझना प्रशासनिक दृष्टि से उपयोगी है।

क्षेत्रप्रमुख राज्य
उत्तर / हिमालयी राज्यहिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, (उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब)
पश्चिमी / मध्य राज्यराजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़
पूर्वी / पूर्वोत्तर राज्यबिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, सिक्किम
सप्त भगिनी (Seven Sisters)अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, मेघालय, असम (सिक्किम इसमें शामिल नहीं है)
दक्षिणी राज्यआंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु

PYQ (Conceptual):
प्रश्न: राज्य पुनर्गठन के समय भारत के राजनीतिक मानचित्र में प्रमुख विचार कौन-से थे — भाषाई समानता या भौगोलिक सुविधा?
उत्तर: प्रारम्भ में प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता दी गई; 1953 के बाद राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर हुआ।
(उदाहरण: आंध्र प्रदेश – पहला भाषाई राज्य)


🏢 III. केंद्र शासित प्रदेश (8 Union Territories)

भारत के केंद्र शासित प्रदेश सामरिक, ऐतिहासिक और प्रशासनिक दृष्टि से विशिष्ट हैं।

क्रमांककेंद्र शासित प्रदेश (UT)राजधानीभौगोलिक अवस्थिति / विशेषता
1राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (NCT Delhi)नई दिल्लीहरियाणा और उत्तर प्रदेश से घिरा हुआ
2चंडीगढ़चंडीगढ़पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी
3दमन और दीव, दादरा और नगर हवेलीदमनपश्चिमी तट पर; 2020 में दोनों का विलय
4पुदुचेरी (पांडिचेरी)पुदुचेरीचार जिले (पुदुचेरी, कराईकल, माहे, यानम) — तीन राज्यों में फैले
5जम्मू और कश्मीरश्रीनगर (ग्रीष्म), जम्मू (शीत)पश्चिमी हिमालय; LoC पर स्थित
6लद्दाखलेहउच्च हिमालय; चीन (LAC) और पाकिस्तान (PoK) से सटी सीमा
7लक्षद्वीपकवरेत्तीअरब सागर में मूंगे के द्वीप समूह
8अंडमान और निकोबार द्वीप समूहपोर्ट ब्लेयरबंगाल की खाड़ी में; सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण

नोट:
2019 में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के बाद भारत में राज्यों की संख्या 29 से घटकर 28 और UTs की संख्या 7 से बढ़कर 9 हुई।
2020 में दमन और दीव तथा दादरा और नगर हवेली के विलय से UTs की कुल संख्या 8 रह गई।


⚖️ IV. प्रशासनिक विभाजन के निहितार्थ (Implications of Administrative Divisions)

पहलूविवरण
सुशासन (Good Governance)छोटे राज्यों व UTs से प्रशासनिक दक्षता बढ़ती है; स्थानीय समस्याओं के समाधान में तेजी आती है।
भू-राजनीतिक महत्त्व (Geopolitical Importance)जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को UT का दर्जा सामरिक नियंत्रण हेतु दिया गया ताकि सीमाओं पर केंद्र का सीधा अधिकार रहे।
विशिष्ट कानूनी/भौगोलिक पहचानद्वीप समूह (लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार) और विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्र (पुदुचेरी) को विशेष कानूनों से संरक्षित किया गया है।

PYQ (Mains-Relevant):
प्रश्न: भारत में प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने हेतु नए राज्यों के गठन और मौजूदा केंद्र शासित प्रदेशों की स्थिति बदलने के पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: छोटे राज्य स्थानीय शासन सुधारते हैं, परंतु अत्यधिक विखंडन संसाधन व नीति-समन्वय को कठिन बना सकता है। (GS-II: Polity & Governance)



भारत का भौतिक स्वरूप

भारत की भूगर्भिक संरचना: एक व्यवस्थित अध्ययन

परिचय

भारत की भूगर्भिक संरचना अत्यंत जटिल एवं विविधतापूर्ण है, जिसमें पृथ्वी के इतिहास के प्राचीनतम ‘आर्कियन’ काल की चट्टानों से लेकर वर्तमान ‘नवीनतम’ जलोढ़ निक्षेपों तक का समावेश है। किसी भी क्षेत्र की स्थलाकृति, मृदा के प्रकार, खनिज संपदा और आर्थिक गतिविधियाँ उसकी भूगर्भिक संरचना द्वारा ही निर्धारित होती हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए, भारत की भूगर्भिक संरचना को दो मुख्य आधारों पर समझा जा सकता है:

  1. भौतिक लक्षणों के आधार पर भूगर्भिक खंड
  2. चट्टानों के निर्माण क्रम के आधार पर भूवैज्ञानिक वर्गीकरण

1. प्रमुख भूगर्भिक खंड

भौतिक एवं संरचनात्मक विशेषताओं के आधार पर भारत को तीन प्रमुख भूगर्भिक खंडों में विभाजित किया गया है:

क) प्रायद्वीपीय खंड

यह भारत का सबसे प्राचीन एवं स्थिर भूभाग है जो प्राचीन गोंडवानालैंड का हिस्सा था। इसका निर्माण मुख्य रूप से आर्कियन काल की प्राचीन नाइस और ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों से हुआ है। यह पठार एक कठोर खंड के रूप में खड़ा है और पुराकैम्ब्रियन काल से ही विवर्तनिक रूप से largely स्थिर रहा है।

ख) हिमालय और अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वतमालाएँ

यह एक नवीन, अस्थिर और लचीली पर्वत श्रृंखला है। इसका निर्माण टर्शियरी (तृतीयक) युग में भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के अभिसरण के परिणामस्वरूप टेथिस सागर में जमा अवसादों के वलन से हुआ है।

ग) सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान

यह एक भू-अभिनति (Geosyncline) या गर्त है जिसका निर्माण हिमालय की उत्पत्ति के बाद हुआ। इसे हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों ने धीरे-धीरे पाटकर एक समतल एवं उपजाऊ मैदान में बदल दिया।


2. भूवैज्ञानिक कालक्रम के अनुसार चट्टानों का वर्गीकरण

भारत में पाई जाने वाली चट्टानों को उनके निर्माण काल के आधार पर निम्नलिखित क्रम में वर्गीकृत किया गया है (प्राचीन से नवीन):

क) आर्कियन क्रम की चट्टानें (प्री-कैम्ब्रियन)

ख) धारवाड़ क्रम की चट्टानें

ग) कुडप्पा क्रम की चट्टानें

घ) विंध्यन क्रम की चट्टानें

ङ) गोंडवाना क्रम की चट्टानें (कार्बोनिफेरस से जुरासिक काल)

च) दक्कन ट्रैप (क्रिटेशियस काल)

छ) टर्शियरी (तृतीयक) क्रम की चट्टानें (सेनोजोइक)

ज) क्वार्टरनरी (चतुर्थक) क्रम की चट्टानें (नूतन)

निष्कर्ष

भारत की भूगर्भिक संरचना में काल और प्रकृति की व्यापक विविधता परिलक्षित होती है। यह विविधता ही देश की खनिज संपदा की प्रचुरता, विभिन्न प्रकार की मृदाओं की उपस्थिति, और विविध स्थलाकृतिक स्वरूपों का मूल कारण है। प्राचीन स्थिर प्रायद्वीप जहाँ खनिजों का भंडार है, वहीं नवीन वलित हिमालय सदानीरा नदियों का स्रोत है, और नवीनतम मैदानी भाग देश का अन्न भंडार हैं। इस प्रकार, भूगर्भिक संरचना भारत के भौतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य की आधारशिला है।


उत्तरी और उत्तर-पूर्वी पर्वतमाला (हिमालय)

भारत के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित हिमालय पर्वतमाला भूवैज्ञानिक रूप से नवीन और संरचनात्मक रूप से एक मोड़दार (वलित) पर्वत श्रृंखला है। यह पश्चिम में सिंधु नदी के मोड़ से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक एक विशाल चाप के रूप में लगभग 2,400 किलोमीटर की लंबाई में फैली है। इसकी चौड़ाई पश्चिम में (कश्मीर) 400 किलोमीटर और पूर्व में (अरुणाचल प्रदेश) 150 किलोमीटर तक है। यह विश्व की सबसे ऊँची और सबसे उबड़-खाबड़ पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है।

हिमालय की उत्पत्ति

हिमालय का निर्माण प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार हुआ है। लगभग 7 करोड़ वर्ष पहले, भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन प्लेट से टकराई। इस टकराव के कारण दोनों प्लेटों के बीच स्थित टेथिस भू-अभिनति (Tethys Geosyncline) में जमा अवसादों में वलन (Folding) पड़ गया, जिससे हिमालय का उत्थान हुआ। यह प्रक्रिया आज भी जारी है, यही कारण है कि हिमालय भूवैज्ञानिक रूप से एक अस्थिर क्षेत्र है और इसकी ऊँचाई लगातार बढ़ रही है।


हिमालय का भौगोलिक वर्गीकरण

हिमालय को दो प्रमुख आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:

  1. उत्तर से दक्षिण (समानांतर श्रेणियाँ)
  2. पश्चिम से पूर्व (क्षेत्रीय विभाजन)

हिमालय का उत्तर से दक्षिण समानांतर श्रेणियों में विभाजन (अनुदैर्ध्य विभाजन)

हिमालय पर्वत प्रणाली अपने आप में कोई एक अकेली पर्वत श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह लगभग समानांतर चलने वाली कई पर्वत श्रृंखलाओं का एक समूह है। उत्तर से दक्षिण की ओर, इन श्रृंखलाओं को उनकी विशिष्ट भूवैज्ञानिक संरचना, ऊँचाई और निर्माण काल के आधार पर चार मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है।

यह विभाजन इस प्रकार है:

  1. ट्रांस-हिमालय (परा-हिमालय या तिब्बती हिमालय)
  2. वृहद् हिमालय (महान हिमालय या हिमाद्रि)
  3. लघु हिमालय (मध्य हिमालय या हिमाचल)
  4. बाह्य हिमालय (उप-हिमालय या शिवालिक)

1. ट्रांस-हिमालय (परा-हिमालय या तिब्बती हिमालय)

ट्रांस-हिमालय, हिमालय की सबसे उत्तरी और भूवैज्ञानिक रूप से सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह वृहद् हिमालय (Great Himalaya) के उत्तर में स्थित है और भारतीय उपमहाद्वीप को तिब्बत के पठार से अलग करती है।

अवस्थिति एवं विस्तार

उत्पत्ति एवं भूगर्भिक संरचना

प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ

ट्रांस-हिमालय मुख्य रूप से चार प्रमुख और समानांतर पर्वत श्रेणियों से मिलकर बना है, जिनका क्रम उत्तर से दक्षिण इस प्रकार है:

  1. काराकोरम श्रेणी (Karakoram Range):
    • यह ट्रांस-हिमालय की सबसे उत्तरी और सबसे ऊँची श्रेणी है।
    • इसे ‘एशिया की रीढ़’ (Backbone of High Asia) के रूप में भी जाना जाता है।
    • भारत की सबसे ऊँची और विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी K2 (गॉडविन ऑस्टिन, 8611 मीटर) इसी श्रेणी में स्थित है।
    • ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर विश्व के कुछ सबसे लंबे ग्लेशियर यहीं पाए जाते हैं, जैसे सियाचिन (76 किमी), बाल्टोरो, बियाफो, और हिस्पर।
  2. लद्दाख श्रेणी (Ladakh Range):
    • यह काराकोरम श्रेणी के दक्षिण में स्थित है और सिंधु तथा श्योक नदियों के बीच जल-विभाजक का कार्य करती है।
    • सिंधु नदी इसके और जास्कर श्रेणी के बीच एक गहरी घाटी से होकर बहती है।
    • विश्व की सबसे तीव्र ढाल वाली चोटियों में से एक, राकापोशी (7788 मीटर), इसी श्रेणी का हिस्सा है।
    • प्रसिद्ध खारदुंग ला दर्रा इसी श्रेणी में स्थित है।
  3. जास्कर श्रेणी (Zaskar Range):
    • यह लद्दाख श्रेणी के दक्षिण में और वृहद् हिमालय के उत्तर में स्थित है।
    • यह लद्दाख को शेष भारत के पर्वतीय क्षेत्रों से अलग करती है।
  4. कैलाश श्रेणी (Kailash Range):
    • यह लद्दाख श्रेणी की एक पूर्वी शाखा है, जो भारत के बाहर मुख्यतः पश्चिमी तिब्बत में स्थित है।
    • प्रसिद्ध माउंट कैलाश और पवित्र मानसरोवर झील इसी श्रेणी के निकट स्थित हैं।
    • सिंधु, सतलज और ब्रह्मपुत्र जैसी महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम स्थल इसी श्रेणी के आसपास है।

जलवायु एवं वनस्पति

महत्व


2. वृहद् हिमालय (महान हिमालय या हिमाद्रि – Great Himalaya or Himadri)

वृहद् हिमालय, जिसे महान हिमालय, आंतरिक हिमालय या हिमाद्रि के नाम से भी जाना जाता है, हिमालय पर्वत प्रणाली की सबसे केंद्रीय, सबसे ऊँची और सबसे प्रमुख श्रृंखला है। यह हिमालय की धुरी या ‘रीढ़’ का निर्माण करती है।

अवस्थिति एवं विस्तार

भूगर्भिक संरचना एवं विशेषताएँ

प्रमुख पर्वत शिखर

विश्व की अधिकांश सर्वोच्च पर्वत चोटियाँ इसी श्रृंखला का हिस्सा हैं। कुछ प्रमुख शिखर (पश्चिम से पूर्व की ओर) निम्नलिखित हैं:

शिखरऊँचाई (मीटर में)स्थिति
नंगा पर्वत8,126जम्मू और कश्मीर, भारत
कामेत7,756उत्तराखंड, भारत
नंदा देवी7,816उत्तराखंड, भारत (भारत में स्थित सर्वोच्च चोटी जो पूरी तरह देश के भीतर है)
धौलागिरी8,172नेपाल
अन्नपूर्णा8,091नेपाल
माउंट एवरेस्ट8,848.86नेपाल-चीन सीमा (विश्व का सर्वोच्च शिखर)
मकालू8,481नेपाल-चीन सीमा
कंचनजंघा8,598सिक्किम-नेपाल सीमा (भारत की सबसे ऊँची और विश्व की तीसरी सबसे ऊँची चोटी)
नामचा बरवा7,782तिब्बत/अरुणाचल प्रदेश सीमा

प्रमुख हिमनद (Glaciers) एवं नदियाँ

प्रमुख दर्रे (Passes)

चूंकि यह एक निरंतर श्रृंखला है, इसमें मौजूद दर्रे ही तिब्बत के पठार के साथ संपर्क का एकमात्र साधन प्रदान करते हैं।

महत्व


3. लघु हिमालय (मध्य हिमालय या हिमाचल – Lesser or Middle Himalaya or Himachal)

लघु हिमालय, जिसे मध्य हिमालय या हिमाचल श्रेणी के नाम से भी जाना जाता है, वृहद् हिमालय (हिमाद्रि) के दक्षिण में और शिवालिक श्रेणी के उत्तर में लगभग समानांतर स्थित एक जटिल और विखंडित पर्वत श्रृंखला है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता, स्वास्थ्यवर्धक जलवायु और प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों के लिए विख्यात है।

अवस्थिति एवं विस्तार

भूगर्भिक संरचना एवं विशेषताएँ

प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ (पश्चिम से पूर्व)

लघु हिमालय कई महत्वपूर्ण श्रेणियों में विभाजित है:

  1. पीर पंजाल श्रेणी (Pir Panjal Range):
    • यह लघु हिमालय की सबसे लंबी और सबसे महत्वपूर्ण श्रृंखला है।
    • इसका विस्तार मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में है।
    • झेलम और ब्यास नदियाँ इसे काटती हैं। प्रसिद्ध बनिहाल दर्रा (जिससे जवाहर सुरंग गुजरती है) और पीर पंजाल दर्रा इसी श्रेणी में हैं।
  2. धौलाधार श्रेणी (Dhauladhar Range):
    • यह पीर पंजाल के दक्षिण में स्थित है और इसका अधिकांश विस्तार हिमाचल प्रदेश में है।
    • यह कांगड़ा और कुल्लू घाटियों के ऊपर अचानक ऊँचाई प्राप्त करती है। धर्मशाला और शिमला इसी श्रेणी की तलहटी में स्थित हैं।
  3. मसूरी श्रेणी (Mussoorie Range):
    • इसका विस्तार मुख्यतः उत्तराखंड में है। प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मसूरी इसी पर स्थित है।
  4. नाग टिब्बा श्रेणी (Nag Tibba Range):
    • यह भी उत्तराखंड में स्थित मसूरी श्रेणी का ही पूर्वी भाग है।
  5. महाभारत श्रेणी (Mahabharat Range):
    • जब यह श्रृंखला नेपाल में प्रवेश करती है, तो इसे महाभारत श्रेणी के नाम से जाना जाता है।

प्रमुख घाटियाँ

लघु हिमालय और वृहद् हिमालय के बीच कई विस्तृत, समतल और उपजाऊ घाटियाँ स्थित हैं। ये घाटियाँ सघन आबादी वाली हैं और कृषि के लिए महत्वपूर्ण हैं।

प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन स्थल (Hill Stations)

भारत के अधिकांश प्रसिद्ध हिल स्टेशन इसी श्रेणी में स्थित हैं, जिनकी स्थापना ब्रिटिश काल में हुई थी। यहाँ की ठंडी और सुखद जलवायु गर्मियों में पर्यटकों को आकर्षित करती है।

वनस्पति एवं जलवायु (Alpine Pastures)


4. बाह्य हिमालय (उप-हिमालय या शिवालिक – Outer Himalaya or Shiwalik)

बाह्य हिमालय, जिसे सामान्यतः शिवालिक श्रेणी के नाम से जाना जाता है, हिमालय पर्वत प्रणाली की सबसे दक्षिणी, सबसे नवीन और सबसे कम ऊँची श्रृंखला है। यह उत्तर भारत के विशाल मैदानों और लघु हिमालय के बीच एक संक्रमणकालीन क्षेत्र (transitional zone) का निर्माण करती है।

अवस्थिति एवं विस्तार

उत्पत्ति एवं भूगर्भिक संरचना

प्रमुख स्थलाकृतियाँ – दून एवं द्वार (Duns and Duars)

शिवालिक की सबसे विशिष्ट स्थलाकृतिक विशेषता यहाँ पाई जाने वाली अनुदैर्ध्य घाटियाँ (Longitudinal Valleys) हैं। ये घाटियाँ शिवालिक और लघु हिमालय के बीच स्थित हैं।

ये घाटियाँ घनी आबादी वाली और गहन कृषि (विशेषकर बासमती चावल) के लिए प्रसिद्ध हैं।

क्षेत्रीय नाम

शिवालिक को अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नामों से जाना जाता है:

महत्व


हिमालय का पश्चिम से पूर्व क्षेत्रीय विभाजन

हिमालय के समानांतर अनुदैर्ध्य विभाजन के अलावा, इसे पश्चिम से पूर्व तक नदी घाटियों द्वारा सीमांकित क्षेत्रों में भी विभाजित किया जाता है। यह वर्गीकरण सर सिडनी बुरार्ड (Sir Sydney Burrard) द्वारा प्रस्तावित किया गया था और यह हिमालय की क्षेत्रीय विशेषताओं को समझने में मदद करता है। यह विभाजन मुख्य रूप से चार खंडों में किया गया है:


1. पंजाब हिमालय (या कश्मीर और हिमाचल हिमालय)

पंजाब हिमालय, हिमालय के पश्चिम से पूर्व क्षेत्रीय विभाजन का सबसे पश्चिमी खंड है। इसका यह नाम पंजाब क्षेत्र में बहने वाली पाँच प्रमुख नदियों के आधार पर पड़ा है। चूंकि इसका अधिकांश विस्तार जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश राज्यों में है, इसलिए इसे कश्मीर हिमालय और हिमाचल हिमालय के नाम से भी जाना जाता है।

सीमा और विस्तार

प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ एवं श्रेणियाँ

इस खंड में हिमालय की सभी समानांतर श्रेणियाँ (ट्रांस, वृहद्, लघु और शिवालिक) स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं, जिनकी अपनी विशिष्टताएँ हैं:

  1. ट्रांस-हिमालयी श्रेणियाँ:
    • पंजाब हिमालय के सबसे उत्तरी भाग में ट्रांस-हिमालय की काराकोरम, लद्दाख और जास्कर श्रेणियाँ स्थित हैं।
    • लद्दाख का ठंडा मरुस्थल, जो वृहद् हिमालय की वृष्टि-छाया में पड़ता है, इसी क्षेत्र का हिस्सा है।
  2. वृहद् हिमालय (Great Himalaya):
    • जास्कर श्रेणी के दक्षिण में वृहद् हिमालय की श्रृंखला है। यहाँ के कुछ महत्वपूर्ण दर्रों में जोजिला (Zoji La) शामिल है।
  3. लघु हिमालय (Lesser Himalaya):
    • यह इस क्षेत्र का सबसे प्रमुख और जटिल भाग है। यहाँ पीर पंजाल श्रेणी और धौलाधार श्रेणी स्थित हैं।
    • पीर पंजाल श्रेणी लघु हिमालय की सबसे लंबी श्रृंखला है और वृहद् हिमालय के समानांतर चलती है।
    • धौलाधार श्रेणी मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश में स्थित है।
  4. शिवालिक श्रेणी:
    • यह इस खंड की सबसे दक्षिणी श्रेणी है और इसे स्थानीय रूप से ‘जम्मू पहाड़ियाँ’ के नाम से जाना जाता है।

अनूठी स्थलाकृतियाँ और विशेषताएँ

  1. कश्मीर घाटी (Vale of Kashmir):
    • यह इस क्षेत्र की सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण विशेषता है। यह एक विशाल अंडाकार बेसिन है जो वृहद् हिमालय और पीर पंजाल श्रेणी के बीच स्थित है।
    • इसका निर्माण प्लीस्टोसीन युग में एक विशाल झील के निक्षेपों से हुआ है, जिसे झेलम नदी ने अपने प्रवाह से एक घाटी में बदल दिया।
  2. करेवा (Karewas):
    • कश्मीर घाटी में पाए जाने वाले हिमोढ़ निक्षेपों (Glacial Deposits) को करेवा कहा जाता है। ये निक्षेप बहुत उपजाऊ होते हैं।
    • करेवा की भूमि विश्व प्रसिद्ध जाफरान (केसर) की खेती के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा यहाँ सेब, बादाम, अखरोट और अन्य फलों का भी उत्पादन होता है।
  3. प्रमुख दर्रे (Passes):
    • इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण दर्रे हैं जो सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
    • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख: ज़ोजिला, बनिहाल (जिससे जवाहर सुरंग गुजरती है), खारदुंग ला, फोटू ला।
    • हिमाचल प्रदेश: बारालाचा ला, रोहतांग दर्रा, शिपकी ला (जिससे सतलज नदी भारत में प्रवेश करती है)।
  4. प्रमुख हिमनद और झीलें:
    • यह क्षेत्र बड़े-बड़े हिमनदों का घर है, जैसे सियाचिन, बाल्टोरो, हिस्पर
    • यहाँ डल और वुलर जैसी प्रसिद्ध मीठे पानी की झीलें हैं, तथा पैंगोंग त्सो और त्सो मोरीरी जैसी खारे पानी की झीलें भी लद्दाख में स्थित हैं।

अपवाह तंत्र (Drainage System)

महत्व


2. कुमाऊँ हिमालय (Kumaon Himalaya)

कुमाऊँ हिमालय, हिमालय के पश्चिम-से-पूर्व क्षेत्रीय वर्गीकरण का दूसरा और अपेक्षाकृत छोटा खंड है। यह अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक सुंदरता के लिए भारत में विशेष महत्व रखता है।

सीमा और विस्तार

प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ

  1. पर्वत शिखर (Mountain Peaks):
    • यद्यपि यह नेपाल हिमालय जितना ऊँचा नहीं है, फिर भी इसमें कई महत्वपूर्ण और ऊँची चोटियाँ स्थित हैं।
    • इस खंड की सर्वोच्च चोटी नंदा देवी (7,816 मीटर) है। यह भारत में स्थित सबसे ऊँची चोटी है जो पूरी तरह से देश की सीमाओं के भीतर है।
    • अन्य प्रमुख चोटियों में कामेत, त्रिशूल, बद्रीनाथ, केदारनाथ, द्रोणगिरि और गंगोत्री शामिल हैं।
  2. हिमनद एवं नदियाँ (Glaciers and Rivers):
    • यह क्षेत्र भारत की दो सबसे पवित्र और जीवनदायिनी नदियों, गंगा और यमुना, का उद्गम स्थल है।
    • यहाँ कई विशाल हिमनद (ग्लेशियर) मौजूद हैं, जिनमें गंगोत्री, यमुनोत्री, पिंडारी और मिलाम प्रमुख हैं।
    • इसी क्षेत्र में प्रसिद्ध पंच प्रयाग (विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग) स्थित हैं, जहाँ विभिन्न नदियों के संगम होते हैं और अंततः देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा के संगम से गंगा नदी का निर्माण होता है।
  3. झीलें (‘ताल’):
    • कुमाऊँ हिमालय अपनी सुन्दर हिमनद-निर्मित झीलों के लिए भी प्रसिद्ध है, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘ताल’ कहा जाता है।
    • प्रमुख झीलों में नैनीताल, भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल और रूपकुंड (रहस्यमयी झील) शामिल हैं।
  4. दून घाटियाँ (Dun Valleys):
    • पंजाब हिमालय की तरह यहाँ भी शिवालिक और लघु हिमालय के बीच अनुदैर्ध्य घाटियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें ‘दून’ कहते हैं। देहरादून इस क्षेत्र की सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध दून घाटी है।

धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व

पर्यटन और जैव-विविधता


3. नेपाल हिमालय (Nepal Himalaya)

नेपाल हिमालय, हिमालय के पश्चिम-से-पूर्व क्षेत्रीय विभाजन का तीसरा, सबसे लंबा और सबसे ऊँचा खंड है। यह अपनी विश्व प्रसिद्ध ऊँची पर्वत चोटियों के लिए जाना जाता है, जो इसे पर्वतारोहियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक वैश्विक आकर्षण का केंद्र बनाती हैं।

सीमा और विस्तार

प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ

  1. विश्व के सर्वोच्च पर्वत शिखर:
    • यह हिमालय का सबसे ऊँचा भाग है। विश्व की 10 सर्वोच्च चोटियों में से 8 इसी खंड में स्थित हैं।
    • यहाँ स्थित पर्वत श्रृंखलाओं को ‘हिमालय’ शब्द का पर्याय माना जाता है।
  2. प्रमुख शिखर:
शिखरऊँचाई (मीटर में)स्थितिटिप्पणी
माउंट एवरेस्ट8,848.86नेपाल-चीन सीमाविश्व का सर्वोच्च शिखर; नेपाल में ‘सगरमाथा’, तिब्बत में ‘चोमोलुंगमा’
कंचनजंघा8,598नेपाल-सिक्किम सीमाविश्व का तीसरा सबसे ऊँचा शिखर; भारत की सबसे ऊँची चोटी
ल्होत्से8,516नेपाल-चीन सीमाविश्व का चौथा सबसे ऊँचा शिखर
मकालू8,481नेपाल-चीन सीमाविश्व का पाँचवाँ सबसे ऊँचा शिखर
धौलागिरी8,172नेपाल
मनास्लु8,163नेपाल
अन्नपूर्णा8,091नेपाल

  1. प्रमुख घाटियाँ:
    • इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण और सघन आबादी वाली घाटियाँ हैं, जो वृहद् और लघु हिमालय के बीच स्थित हैं।
    • काठमांडू घाटी (Kathmandu Valley): यह नेपाल की सबसे प्रसिद्ध, सबसे बड़ी और सबसे घनी आबादी वाली घाटी है। यह एक सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र है।
  2. अपवाह तंत्र (Drainage System):
    • यह खंड भारत की कुछ प्रमुख नदी प्रणालियों का स्रोत है, जो उत्तरी मैदानों में विशाल जलराशि लेकर पहुँचती हैं।
    • प्रमुख नदियाँ: घाघरा (कर्णाली), गंडक (नारायणी), और कोसी (सप्तकोसी)
    • कोसी नदी अपने मार्ग परिवर्तन और विनाशकारी बाढ़ के लिए कुख्यात है, जिसके कारण इसे “बिहार का शोक” भी कहा जाता है।

महत्व


4. असम हिमालय (Assam Himalaya)

असम हिमालय, हिमालय के पश्चिम-से-पूर्व क्षेत्रीय विभाजन का सबसे पूर्वी खंड है। यह अपनी अनूठी स्थलाकृति, अत्यधिक वर्षा, सघन वनों और समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है।

सीमा और विस्तार

प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ

  1. पर्वत शिखर (Mountain Peaks):
    • असम हिमालय की ऊँचाई नेपाल हिमालय की तुलना में कम है, और यहाँ की बर्फ-रेखा (snowline) भी अधिक ऊँचाई पर पाई जाती है।
    • इस खंड की सबसे महत्वपूर्ण और पूर्वी चोटी नामचा बरवा (Namcha Barwa, 7,782 मीटर) है, जो तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ के ठीक उत्तर में स्थित है।
    • भूटान में कुला कांगड़ी (Kula Kangri) और जोमोलहारी (Jomolhari) जैसी अन्य महत्वपूर्ण चोटियाँ हैं।
  2. अक्षसंधीय मोड़ (Syntaxial Bend):
    • असम हिमालय की सबसे विशिष्ट भू-आकृतिक विशेषता इसका पूर्वी सिरा है। नामचा बरवा शिखर के पास, हिमालय पर्वतमाला अचानक दक्षिण की ओर एक तीव्र, हेयरपिन जैसा मोड़ लेती है।
    • इस मोड़ को अक्षसंधीय मोड़ कहा जाता है। यहीं से हिमालय अपनी पूर्व-पश्चिम दिशा छोड़कर उत्तर-दक्षिण दिशा में पूर्वांचल की पहाड़ियों (पटकाई, नागा, मिज़ो आदि) के रूप में आगे बढ़ता है।
  3. ब्रह्मपुत्र और दिहांग गॉर्ज:
    • तिब्बत के पठार से बहने वाली त्सांगपो नदी, नामचा बरवा को काटकर एक अत्यंत गहरे महाखड्ड (Gorge) का निर्माण करती है, जिसे दिहांग गॉर्ज कहते हैं। इसी गॉर्ज के माध्यम से यह नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश में ‘दिहांग’ नाम से प्रवेश करती है और आगे असम में ‘ब्रह्मपुत्र’ कहलाती है।
  4. कमजोर शिवालिक संरचना:
    • इस क्षेत्र में शिवालिक श्रेणी काफी संकरी है और कई स्थानों पर लघु हिमालय में विलीन हो जाती है। अरुणाचल प्रदेश में शिवालिक की सीध में स्थित पहाड़ियों को स्थानीय जनजातियों के नाम पर जाना जाता है, जैसे डाफला, मिरी, अबोर और मिश्मी पहाड़ियाँ

जलवायु, वनस्पति और जैव-विविधता

अपवाह तंत्र (Drainage System)

महत्व


सारांश तालिका

हिमालय का खंडनदी सीमालंबाई (लगभग)मुख्य विशेषताएँ
पंजाब हिमालयसिंधु से सतलज560 किमीसबसे चौड़ा भाग, करेवा का निर्माण, कश्मीर घाटी।
कुमाऊँ हिमालयसतलज से काली320 किमीगंगा-यमुना का उद्गम, नंदा देवी शिखर, झीलें (ताल)।
नेपाल हिमालयकाली से तिस्ता800 किमीसबसे लंबा और सबसे ऊँचा भाग, माउंट एवरेस्ट सहित विश्व की सर्वोच्च चोटियाँ।
असम हिमालयतिस्ता से दिहांग720 किमीनामचा बरवा शिखर, अक्षसंधीय मोड़, अत्यधिक वर्षा और जैव-विविधता।

🏔️ उत्तर-पूर्वी पर्वतमाला (पूर्वांचल – The Purvanchal)

पूर्वांचल, जिसे पूर्वी पहाड़ियाँ भी कहा जाता है, हिमालय पर्वत श्रृंखला का वह भाग है जो भारत के उत्तर-पूर्वी सिरे पर स्थित है। यह हिमालय के मुख्य पूर्व-पश्चिम विस्तार का हिस्सा न होकर, उसका दक्षिण की ओर मुड़ा हुआ विस्तार है।


🧭 उत्पत्ति एवं अवस्थिति

अक्षसंधीय मोड़ (Syntaxial Bend):
अरुणाचल प्रदेश में दिहांग नदी (ब्रह्मपुत्र) के महाखड्ड (Gorge) के पास हिमालय पर्वत श्रृंखला अचानक दक्षिण की ओर एक तीव्र ‘हेयरपिन’ जैसा मोड़ लेती है।
इसी मोड़ के बाद ये पहाड़ियाँ भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा के साथ उत्तर से दक्षिण दिशा में म्यांमार की सीमा के समानांतर फैल जाती हैं।

अवस्थिति:
पूर्वांचल की पहाड़ियाँ भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों — अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिज़ोरम — में फैली हुई हैं।


🪨 भूगर्भिक संरचना एवं प्रमुख विशेषताएँ


🏞️ पूर्वांचल की प्रमुख पहाड़ियाँ (उत्तर से दक्षिण के क्रम में)

पूर्वांचल कई छोटी-बड़ी पर्वत श्रेणियों से मिलकर बना है, जिन्हें स्थानीय नामों से जाना जाता है —

🏔️ 1. पटकाई बुम (Patkai Bum):

🏔️ 2. नागा पहाड़ियाँ (Naga Hills):

🏔️ 3. मणिपुर पहाड़ियाँ (Manipur Hills):

🏔️ 4. मिज़ो पहाड़ियाँ (Mizo Hills):

🏔️ 5. बरेल श्रेणी (Barail Range):


⚠️ महत्वपूर्ण बिंदु — मेघालय का पठार पूर्वांचल का हिस्सा नहीं है


🌊 प्रमुख नदी


भारत के लिए हिमालय का महत्व

हिमालय पर्वत श्रृंखला भारत के लिए केवल एक भौतिक इकाई नहीं, बल्कि यह देश की जलवायु, अपवाह तंत्र, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा की जीवनरेखा है। इसके बिना भारत का भूगोल, इतिहास और वर्तमान स्वरूप पूरी तरह से भिन्न होता। भारत के लिए हिमालय के बहुआयामी महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:


1. जलवायु नियंत्रक के रूप में

2. जल संसाधनों का स्रोत (भारत की जल मीनार)

3. उपजाऊ मैदानों का निर्माता

4. सामरिक एवं रक्षात्मक महत्व

5. आर्थिक महत्व

6. जैव-विविधता का भंडार

7. धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व

निष्कर्ष में, हिमालय भारत के लिए एक अमूल्य प्राकृतिक वरदान है। यह न केवल देश के भौतिक और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखता है, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन, आजीविका और आस्था को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है।


हिमालय की प्रमुख पर्वत चोटियाँ

हिमालय पर्वत श्रृंखला “विश्व की छत” के रूप में जानी जाती है और यह दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत चोटियों का घर है। यहाँ विश्व के 8,000 मीटर से ऊँचे सभी 14 पर्वत स्थित हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए, हम इन चोटियों को दो भागों में देख सकते हैं: विश्व के संदर्भ में हिमालय की सर्वोच्च चोटियाँ और भारत में स्थित प्रमुख चोटियाँ।


विश्व की सर्वोच्च पर्वत चोटियाँ (मुख्यतः नेपाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में)

यह सूची दुनिया की शीर्ष चोटियों को दर्शाती है, जिनमें से अधिकांश नेपाल-चीन या नेपाल-भारत की सीमा पर स्थित हैं।

क्रमचोटी का नामऊँचाई (मीटर में)स्थितिविशेष तथ्य
1माउंट एवरेस्ट8,848.86नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमाविश्व की सर्वोच्च चोटी। इसे नेपाल में ‘सगरमाथा’ और तिब्बत में ‘चोमोलुंगमा’ कहते हैं।
2K2 (गॉडविन ऑस्टिन)8,611पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK)-चीन सीमाविश्व की दूसरी सर्वोच्च चोटी। यह तकनीकी रूप से काराकोरम श्रेणी में है।
3कंचनजंघा8,598भारत (सिक्किम)-नेपाल सीमाविश्व की तीसरी सर्वोच्च और भारत की सबसे ऊँची चोटी।
4ल्होत्से8,516नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमाविश्व की चौथी सर्वोच्च चोटी, एवरेस्ट के बहुत करीब स्थित है।
5मकालू8,485नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमाविश्व की पाँचवीं सर्वोच्च चोटी।
6चो ओयू8,201नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमाविश्व की छठी सर्वोच्च चोटी।
7धौलागिरी8,167नेपालविश्व की सातवीं सर्वोच्च चोटी।
8मनास्लु8,163नेपालविश्व की आठवीं सर्वोच्च चोटी।
9नंगा पर्वत8,126पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK)विश्व की नवीं सर्वोच्च चोटी, इसे ‘किलर माउंटेन’ भी कहते हैं।
10अन्नपूर्णा I8,091नेपालविश्व की दसवीं सर्वोच्च चोटी।

भारत की प्रमुख हिमालयी पर्वत चोटियाँ

भारत में हिमालय की सबसे ऊँची चोटियों को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति रहती है। यहाँ स्पष्टीकरण दिया गया है:

भारत स्थित प्रमुख चोटियों की सूची:

चोटी का नामऊँचाई (मीटर में)राज्य / स्थितिमहत्व / विशेष तथ्य
कंचनजंघा8,598सिक्किम-नेपाल सीमाभारत की सबसे ऊँची और विश्व की तीसरी सबसे ऊँची चोटी।
नंदा देवी7,816उत्तराखंडपूरी तरह से भारत में स्थित सर्वोच्च चोटी। यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
कामेत7,756उत्तराखंडयह नंदा देवी के बाद उत्तराखंड की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है।
साल्तोरो कांगड़ी7,742लद्दाख (काराकोरम)सियाचिन ग्लेशियर के पास स्थित है।
ससेर कांगड़ी7,672लद्दाख (काराकोरम)ससेर मुजतघ श्रेणी की सबसे ऊँची चोटी है।
मामोस्तोंग कांगड़ी7,516लद्दाख (काराकोरम)रिमो ग्लेशियर के पास स्थित है।
रिमो I7,385लद्दाख (काराकोरम)सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र का हिस्सा है।
त्रिशूल7,120उत्तराखंडतीन चोटियों का एक समूह जो भगवान शिव के त्रिशूल जैसा दिखता है।
चौखम्बा7,138उत्तराखंडगंगोत्री समूह की सबसे ऊँची चोटी है।
केदारनाथ6,940उत्तराखंडपवित्र केदारनाथ मंदिर के पीछे स्थित शिखर।

🏔️ हिमालय पर्वत की प्रमुख श्रेणियाँ एवं प्रमुख चोटियाँ

🔹 महत्वपूर्ण बिंदु:

हिमालय पर्वत एक सीधी रेखा में नहीं, बल्कि एक विशाल चाप (Arc) के रूप में फैला है।
इसलिए इसका वर्गीकरण भौगोलिक दिशा (उत्तर-दक्षिण या पूर्व-पश्चिम) के अनुसार किया जाता है।


🌄 1. उत्तर से दक्षिण क्रम (North to South Arrangement)

यह व्यवस्था पर्वत श्रेणियों पर आधारित है, जो स्वाभाविक रूप से उत्तर से दक्षिण की ओर फैली हैं।


🏔️ I. ट्रांस-हिमालय (Trans-Himalaya / काराकोरम श्रेणी – सबसे उत्तरी)


🏔️ II. वृहद् हिमालय (Great Himalaya / हिमाद्रि श्रृंखला)

यह ट्रांस-हिमालय के दक्षिण में स्थित मुख्य और सबसे ऊँची श्रृंखला है। इसकी चोटियाँ एक चाप में फैली हैं।

चोटी का नामऊँचाई (मीटर में)स्थानविवरण
नंगा पर्वत8,126पाक-अधिकृत कश्मीरवृहद् हिमालय की सबसे पश्चिमी विशाल चोटी
कामेत7,756उत्तराखंडनंदा देवी के उत्तर-पश्चिम में स्थित प्रमुख शिखर
नंदा देवी7,816उत्तराखंडपूरी तरह भारत में स्थित सर्वोच्च चोटी
धौलागिरी8,167नेपालनेपाल के पश्चिमी भाग में स्थित
अन्नपूर्णा8,091नेपालधौलागिरी के पूर्व में स्थित
माउंट एवरेस्ट8,848.86नेपाल/चीन सीमाविश्व की सर्वोच्च चोटी
कंचनजंघा8,598सिक्किम/नेपाल सीमाभारत की सबसे ऊँची चोटी
नामचा बरवा7,782तिब्बत/अरुणाचल सीमावृहद् हिमालय का सबसे पूर्वी छोर

🌏 2. पूर्व से पश्चिम क्रम (East to West Arrangement)

यह व्यवस्था हिमालय की भौगोलिक यात्रा को दर्शाती है — अरुणाचल से कश्मीर तक।

क्षेत्र / देशमुख्य चोटीऊँचाई (मीटर)विवरण
I. अरुणाचल प्रदेश / तिब्बत (सबसे पूर्वी)नामचा बरवा7,782हिमालय चाप की सबसे पूर्वी चोटी
II. सिक्किम / नेपाल क्षेत्रकंचनजंघा8,598नामचा बरवा के पश्चिम में, भारत की सर्वोच्च चोटी
III. नेपाल हिमालय (पूर्व से पश्चिम)मकालू – 8,485ल्होत्से – 8,516माउंट एवरेस्ट – 8,848.86चो ओयू – 8,201मनास्लु – 8,163अन्नपूर्णा – 8,091धौलागिरी – 8,167विश्व की प्रमुख 8,000 मीटर से ऊँची चोटियाँ, बहुत पास-पास स्थित
IV. उत्तराखंड (भारत)नंदा देवी – 7,816कामेत – 7,756भारत की प्रमुख और पूर्णतः स्वदेशी चोटियाँ
V. पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK)नंगा पर्वत8,126वृहद् हिमालय का सबसे पश्चिमी विशाल शिखर
VI. काराकोरम श्रेणी (सबसे पश्चिमी एवं उत्तरी)K2 (गॉडविन ऑस्टिन)8,611सभी प्रमुख चोटियों में सबसे पश्चिम-उत्तर में स्थित

🏁 निष्कर्ष:

हिमालय की पर्वत श्रेणियाँ और चोटियाँ भारत की भौगोलिक, जलवायु तथा सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला हैं।
यह केवल प्राकृतिक सीमा नहीं, बल्कि भारत की जलवायु, नदियों और सुरक्षा की जीवंत ढाल (Living Shield) है।


हिमालय के प्रमुख दर्रे (Major Passes of the Himalayas)

पर्वतीय दर्रे, पहाड़ों के बीच स्थित प्राकृतिक संकरे रास्ते होते हैं जो परिवहन, व्यापार, प्रवास और सैन्य अभियानों के लिए महत्वपूर्ण मार्ग प्रदान करते हैं। हिमालय की विशाल श्रृंखला में अनगिनत दर्रे हैं जो भारत को मध्य एशिया, तिब्बत और म्यांमार से जोड़ते हैं, साथ ही देश के भीतर भी दुर्गम क्षेत्रों के बीच संपर्क स्थापित करते हैं।

इन्हें राज्य/केंद्र-शासित प्रदेश के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है:


1. लद्दाख (Ladakh)

दर्रे का नामस्थिति / जोड़ता हैविशेष तथ्य / महत्व
काराकोरम दर्रालद्दाख को चीन के शिनजियांग प्रांत सेभारत का सबसे ऊँचा दर्रा। प्राचीन रेशम मार्ग (Silk Route) की एक शाखा यहाँ से गुजरती थी। वर्तमान में बंद है।
खारदुंग लालेह को नुब्रा और श्योक घाटियों सेदुनिया के सबसे ऊँचे मोटर-योग्य दर्रों में से एक। सियाचिन ग्लेशियर जाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण मार्ग है।
ज़ोजिला दर्राश्रीनगर (कश्मीर) को लेह (लद्दाख) सेवृहद् हिमालय में स्थित है। सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण बंद रहता है। NH-1 इस पर से गुजरता है। इस पर ‘ज़ोजिला सुरंग’ का निर्माण हो रहा है।
चांग लालेह को पैंगोंग त्सो झील सेयह भी एक बहुत ऊँचा मोटर-योग्य दर्रा है। यहाँ विश्व का दूसरा सबसे ऊँचा अनुसंधान केंद्र स्थित है।
अघिल दर्रालद्दाख को चीन के शिनजियांग प्रांत सेकाराकोरम श्रेणी के उत्तर में स्थित है। अत्यंत दुर्गम और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है।
तांगलंग लामनाली-लेह राजमार्ग पर स्थित हैयह भी विश्व के सबसे ऊँचे मोटर-योग्य दर्रों में से एक है।

2. जम्मू और कश्मीर (Jammu & Kashmir)

दर्रे का नामस्थिति / जोड़ता हैविशेष तथ्य / महत्व
बनिहाल दर्राजम्मू को श्रीनगर सेपीर पंजाल श्रेणी में स्थित है। जवाहर सुरंग इसी दर्रे से होकर गुजरती है। यह जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-44) का हिस्सा है। अब ‘बनिहाल-काजीगुंड सड़क सुरंग’ भी बन गई है।
पीर पंजाल दर्राराजौरी और पुंछ को कश्मीर घाटी सेऐतिहासिक मुगल रोड इसी दर्रे से होकर गुजरती है।
बुर्जिल दर्राश्रीनगर को गिलगित (PoK) के अस्तोर घाटी सेवर्तमान में यह नियंत्रण रेखा (LOC) के पास होने के कारण बंद है।

3. हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh)

दर्रे का नामस्थिति / जोड़ता हैविशेष तथ्य / महत्व
रोहतांग दर्राकुल्लू घाटी को लाहौल और स्पीति घाटियों सेयह मनाली-लेह राजमार्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारी बर्फबारी के कारण सर्दियों में बंद रहता है। अब इसके नीचे से अटल सुरंग का निर्माण हो चुका है, जो वर्ष भर संपर्क बनाए रखती है।
बारालाचा लाहिमाचल के लाहौल को लद्दाख के लेह सेयह भी मनाली-लेह राजमार्ग पर स्थित है। जास्कर श्रेणी में स्थित यह दर्रा चंद्रा और भागा नदियों का उद्गम स्थल है।
शिपकी लाकिन्नौर जिले को तिब्बत (चीन) सेसतलज नदी इसी दर्रे के पास से भारत में प्रवेश करती है। यह भारत-चीन व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है।

4. उत्तराखंड (Uttarakhand)

दर्रे का नामस्थिति / जोड़ता हैविशेष तथ्य / महत्व
लिपुलेख दर्रापिथौरागढ़ (उत्तराखंड) को तिब्बत के तकलाकोट सेयह भारत-चीन-नेपाल का ट्राई-जंक्शन है। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तीर्थयात्री इस दर्रे का उपयोग करते हैं।
माना दर्राउत्तराखंड को तिब्बत सेयह भारत का दूसरा सबसे ऊँचा मोटर-योग्य दर्रा है। यह बद्रीनाथ मंदिर के पास स्थित है।
नीति दर्राउत्तराखंड को तिब्बत सेसर्दियों के दौरान यह दर्रा भी बंद हो जाता है।

5. सिक्किम (Sikkim)

दर्रे का नामस्थिति / जोड़ता हैविशेष तथ्य / महत्व
नाथू लासिक्किम को तिब्बत की चुम्बी घाटी सेयह प्राचीन रेशम मार्ग का एक हिस्सा था। 1962 के युद्ध के बाद बंद कर दिया गया था, जिसे 2006 में व्यापार के लिए फिर से खोला गया।
जेलेप लासिक्किम को चुम्बी घाटी (तिब्बत) सेयह दार्जिलिंग और चुम्बी घाटी के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग था। इसका निर्माण तिस्ता नदी द्वारा किया गया है।

6. अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh)

दर्रे का नामस्थिति / जोड़ता हैविशेष तथ्य / महत्व
बोम डि लाअसम के मैदानी इलाकों को तवांग घाटी सेयह तवांग मठ के लिए मार्ग प्रदान करता है।
सेला दर्रातवांग को शेष अरुणाचल और देश सेयह तवांग की जीवनरेखा है। सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण। इसके नीचे सेला सुरंग का निर्माण किया गया है।
योंगग्याप दर्राअरुणाचल प्रदेश को तिब्बत सेयह ब्रह्मपुत्र (त्सांगपो) नदी के भारत में प्रवेश करने के स्थान के निकट है।
दिफू (या दिफर) दर्राअरुणाचल प्रदेश को म्यांमार के मांडले सेयह भारत-चीन-म्यांमार का ट्राई-जंक्शन है। यह वर्ष भर खुला रहने वाला एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है।

महत्वपूर्ण नोट: यह एक सामान्यीकृत व्यवस्था है। चूँकि हिमालय एक सीधी रेखा में नहीं है, इसलिए कुछ दर्रों की सटीक स्थिति थोड़ी भिन्न हो सकती है (उदाहरण के लिए, हिमाचल का एक पूर्वी दर्रा उत्तराखंड के पश्चिमी दर्रे से पूर्व में हो सकता है)। लेकिन यह वर्गीकरण राज्यों की भौगोलिक स्थिति के आधार पर एक स्पष्ट खाका प्रस्तुत करता है।


1. उत्तर से दक्षिण क्रम (North to South Arrangement)

इस व्यवस्था में हम सबसे उत्तरी क्षेत्र (लद्दाख) से शुरू होकर दक्षिण की ओर बढ़ेंगे।

I. लद्दाख (सबसे उत्तरी)

  1. काराकोरम दर्रा: भारत का सबसे उत्तरी दर्रा।
  2. खारदुंग ला: लेह के उत्तर में, नुब्रा घाटी का प्रवेश द्वार।
  3. चांग ला: लेह के पूर्व में, पैंगोंग झील का मार्ग।
  4. ज़ोजिला दर्रा: वृहद् हिमालय पर, कश्मीर घाटी को लद्दाख से जोड़ता है।
  5. बारालाचा ला: जास्कर श्रेणी में, हिमाचल और लद्दाख की सीमा पर।

II. जम्मू और कश्मीर

  1. बुर्जिल दर्रा: वृहद् हिमालय पर, श्रीनगर को गिलगित से जोड़ता है।
  2. पीर पंजाल दर्रा: पीर पंजाल श्रेणी में।
  3. बनिहाल दर्रा: पीर पंजाल श्रेणी में, जम्मू को श्रीनगर से जोड़ता है।

III. हिमाचल प्रदेश

  1. रोहतांग दर्रा: पीर पंजाल श्रेणी में, कुल्लू को लाहौल-स्पीति से जोड़ता है।
  2. शिपकी ला: जास्कर श्रेणी में, किन्नौर को तिब्बत से जोड़ता है।

IV. उत्तराखंड (सबसे दक्षिणी)

  1. माना दर्रा: वृहद् हिमालय में, उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ता है।
  2. नीति दर्रा: उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ता है।
  3. लिपुलेख दर्रा: उत्तराखंड, नेपाल और चीन के ट्राई-जंक्शन पर स्थित।

2. पूर्व से पश्चिम क्रम (East to West Arrangement)

इस व्यवस्था में हम सबसे पूर्वी राज्य (अरुणाचल प्रदेश) से शुरू होकर पश्चिम की ओर बढ़ेंगे।

I. अरुणाचल प्रदेश (सबसे पूर्वी)

  1. दिफू दर्रा: भारत, चीन और म्यांमार के ट्राई-जंक्शन पर सबसे पूर्व में स्थित।
  2. योंगग्याप दर्रा: भारत को तिब्बत से जोड़ता है।
  3. बोम डि ला: तवांग को असम से जोड़ता है।
  4. सेला दर्रा: तवांग घाटी के पश्चिम में स्थित है।

II. सिक्किम

  1. जेलेप ला: सिक्किम को तिब्बत की चुम्बी घाटी से जोड़ता है।
  2. नाथू ला: जेलेप ला के उत्तर-पश्चिम में, यह भी सिक्किम को चुम्बी घाटी से जोड़ता है।

III. उत्तराखंड

  1. लिपुलेख दर्रा: उत्तराखंड का सबसे पूर्वी दर्रा, नेपाल सीमा के पास।
  2. नीति दर्रा: लिपुलेख के पश्चिम में।
  3. माना दर्रा: नीति दर्रे के पश्चिम में, बद्रीनाथ के पास।

IV. हिमाचल प्रदेश

  1. शिपकी ला: हिमाचल का पूर्वी दर्रा, तिब्बत सीमा पर।
  2. रोहतांग दर्रा: शिपकी ला के पश्चिम में, कुल्लू और लाहौल-स्पीति के बीच।
  3. बारालाचा ला: रोहतांग के उत्तर-पश्चिम में।

V. जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख (सबसे पश्चिमी)

  1. ज़ोजिला दर्रा: लद्दाख का पूर्वी प्रवेश द्वार।
  2. खारदुंग ला: ज़ोजिला के पश्चिम में (लेह के उत्तर में)।
  3. बनिहाल दर्रा: जम्मू-कश्मीर में ज़ोजिला के दक्षिण-पश्चिम में।
  4. बुर्जिल दर्रा: श्रीनगर के उत्तर-पश्चिम में।
  5. काराकोरम दर्रा: सबसे उत्तर-पश्चिम में स्थित दर्रा।

उत्तर का विशाल मैदान (The Great Northern Plains)

उत्तर का विशाल मैदान, जिसे सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान भी कहा जाता है, हिमालय पर्वत और प्रायद्वीपीय पठार के बीच स्थित एक विशाल और समतल भूभाग है। यह दुनिया के सबसे बड़े और सबसे उपजाऊ जलोढ़ निक्षेपित मैदानों में से एक है, जो भारत की सघन आबादी, कृषि और अर्थव्यवस्था का आधार है।


उत्तर के मैदान का निर्माण (Formation of the Plains)

उत्तर के विशाल मैदान का निर्माण एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम है:

  1. हिमालय का उत्थान: लगभग 6-7 करोड़ वर्ष पहले, जब भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराई, तो टेथिस सागर के अवसादों के वलन से हिमालय पर्वत श्रृंखला का उत्थान हुआ।
  2. गर्त (Trough) का निर्माण: हिमालय के उत्थान और दक्षिण में स्थित कठोर प्रायद्वीपीय पठार के बीच एक विशाल अग्रगर्त (Foredeep) या द्रोणी का निर्माण हुआ। यह एक बहुत गहरा बेसिन था।
  3. जलोढ़ निक्षेपण: हिमालय से निकलने वाली तेज-प्रवाह वाली नदियों (जैसे सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियाँ) और प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियों (जैसे सोन, चंबल, बेतवा) ने करोड़ों वर्षों तक अपने साथ लाए गए भारी मात्रा में जलोढ़ (Alluvium) – यानी गाद, रेत और मिट्टी – को इस गर्त में जमा करना शुरू कर दिया।
  4. समतल मैदान का विकास: इस निरंतर निक्षेपण की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे उस विशाल गर्त को पाट दिया, जिससे एक विस्तृत, समतल और अत्यधिक उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ। इस जलोढ़ की गहराई कुछ स्थानों पर 1000 से 2000 मीटर तक है।

उत्तर के मैदान का विभाजन (उच्चावच के आधार पर)

पर्वत से मैदान की ओर आते समय निक्षेपण की विशेषताओं में भिन्नता के कारण उत्तर के मैदान को उत्तर से दक्षिण दिशा में चार प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है। यह विभाजन ढाल, कंकड़-पत्थर और मिट्टी की प्रकृति पर आधारित है।

1. भाबर (Bhabar)

2. तराई (Terai)

3. भांगर (Bhangar)

4. खादर (Khadar)


सारांश तालिका

क्षेत्रमिट्टी का प्रकारअवस्थितिउर्वरतामुख्य विशेषता
भाबरबड़े कंकड़-पत्थरशिवालिक की तलहटीअनुपजाऊनदियाँ लुप्त हो जाती हैं।
तराईमहीन गाद, मिट्टीभाबर के दक्षिण मेंउपजाऊ (अब)नदियाँ पुनः प्रकट होती हैं, दलदली क्षेत्र।
भांगरपुरानी जलोढ़ (कंकर युक्त)बाढ़ के मैदान से दूर, ऊँचा भागमध्यम उपजाऊउत्तरी मैदान का सबसे बड़ा हिस्सा।
खादरनवीन जलोढ़ (कंकर रहित)बाढ़ का मैदान, नदी के पासअत्यधिक उपजाऊमिट्टी का प्रतिवर्ष नवीनीकरण होता है।

डेल्टा (Delta)

डेल्टा एक नदीय भू-आकृति (Fluvial Landform) है, जिसका निर्माण नदी के मुहाने पर (जहाँ नदी समुद्र या झील में मिलती है) उसके द्वारा लाए गए अवसादों (गाद, मिट्टी, रेत) के निक्षेपण (जमाव) से होता है। इसका आकार अक्सर त्रिभुजाकार (Triangular) होता है, जो ग्रीक अक्षर ‘डेल्टा’ (Δ) जैसा दिखता है, और इसी कारण इसका यह नाम पड़ा।

डेल्टा, उत्तरी मैदान की सबसे अंतिम और सबसे नवीन संरचना होती है। यह मैदान के खादर क्षेत्र का ही विस्तार है जो समुद्र तक पहुँच जाता है।


डेल्टा के निर्माण की प्रक्रिया (Process of Delta Formation)

डेल्टा का निर्माण एक धीमी लेकिन निरंतर प्रक्रिया है, जिसके प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:

  1. नदी के वेग में कमी: जब नदी अपने अंतिम चरण में मैदानी इलाकों से बहकर समुद्र के पास पहुँचती है, तो ढाल (Slope) लगभग समाप्त हो जाता है। ढाल की कमी के कारण नदी के प्रवाह का वेग बहुत कम हो जाता है।
  2. अवसादों का जमाव (निक्षेपण): नदी का वेग कम होने से उसकी अवसाद (Sediment) ढोने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है। परिणामस्वरूप, नदी अपने साथ लाए गए भारी मात्रा में गाद, मिट्टी और बालू को अपने मुहाने पर ही जमा करना शुरू कर देती है।
  3. नदी का शाखाओं में विभाजन (वितरिकाएँ): जब नदी के मुख्य मार्ग में अवसाद जमा हो जाते हैं, तो उसका रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। इस रुकावट के कारण नदी को समुद्र तक पहुँचने के लिए कई छोटी-छोटी शाखाओं या धाराओं में बँटना पड़ता है। इन शाखाओं को वितरिकाएँ (Distributaries) कहा जाता है।
  4. नए भूभाग का निर्माण: ये वितरिकाएँ अपने-अपने मुहानों पर अवसाद जमा करती रहती हैं। लाखों वर्षों तक यह प्रक्रिया चलने से एक विशाल, पंखे के आकार का, त्रिभुजाकार और दलदली उपजाऊ मैदान समुद्र के किनारे बन जाता है। इसी नए भूभाग को डेल्टा कहते हैं।

डेल्टा निर्माण के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ

हर नदी डेल्टा का निर्माण नहीं करती। इसके लिए कुछ विशिष्ट भौगोलिक दशाएँ आवश्यक हैं:

(यही कारण है कि भारत की पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ (महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) बंगाल की खाड़ी में बड़े-बड़े डेल्टा बनाती हैं, क्योंकि यहाँ समुद्र उथला और शांत है। इसके विपरीत, पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (नर्मदा, तापी) अरब सागर में डेल्टा न बनाकर ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं, क्योंकि यहाँ का तट खड़ा और गहरा है।)


डेल्टा क्षेत्र की प्रमुख विशेषताएँ


विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा: गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (सुंदरबन)


ज्वारनदमुख / एस्चुएरी (Estuary)

परिभाषा:
ज्वारनदमुख, जिसे एस्चुएरी भी कहते हैं, नदी का वह मुहाना होता है जहाँ नदी का मीठा पानी समुद्र के खारे पानी से मिलता है। यह एक अर्ध-संलग्न (semi-enclosed) तटीय जल निकाय है जो एक या एक से अधिक नदियों द्वारा समुद्र में खुलता है।

सरल शब्दों में, यह नदी का चौड़ा और गहरा कीप (funnel) के आकार का मुहाना होता है जिसमें समुद्र का पानी ज्वार (tide) के समय अंदर तक आ जाता है। “ज्वारनदमुख” शब्द का अर्थ ही है- “ज्वार वाली नदी का मुख”। इस क्षेत्र के पानी को खारा पानी (Brackish Water) कहते हैं क्योंकि यह मीठे और खारे पानी का मिश्रण होता है।


ज्वारनदमुख के निर्माण की प्रक्रिया (Process of Estuary Formation)

ज्वारनदमुख का निर्माण डेल्टा के निर्माण की प्रक्रिया के ठीक विपरीत होता है।

  1. अवसादों का अभाव: जो नदियाँ कठोर और चट्टानी पठारों से होकर बहती हैं, वे अपने साथ बहुत कम मात्रा में गाद या अवसाद (sediment) लाती हैं।
  2. नदी का तीव्र वेग: जब नदी का ढाल तीव्र होता है और वह तेज गति से समुद्र में गिरती है, तो उसे अपने मुहाने पर अवसाद जमा करने का अवसर नहीं मिलता।
  3. समुद्री लहरों और ज्वार का प्रभाव: सबसे महत्वपूर्ण कारक समुद्री लहरों और ज्वार-भाटे की क्रिया है। यदि नदी के मुहाने पर समुद्री धाराएँ और ज्वार बहुत शक्तिशाली होते हैं, तो वे नदी द्वारा लाए गए थोड़े-बहुत अवसादों को भी बहाकर गहरे समुद्र में ले जाते हैं।
  4. रिया तट (Ria Coast): कई ज्वारनदमुखों का निर्माण “जलमग्न नदी घाटियों” के कारण भी होता है। जब समुद्र का स्तर बढ़ता है, तो वह नदी की निचली घाटी में अंदर तक प्रवेश कर जाता है, जिससे एक चौड़े मुहाने का निर्माण होता है।

इस प्रकार, अवसादों के जमाव के अभाव में नदी का मुहाना भरता नहीं है, बल्कि चौड़ा और गहरा बना रहता है, जिसे ज्वारनदमुख कहते हैं।


ज्वारनदमुख की प्रमुख विशेषताएँ


भारत में ज्वारनदमुख (Estuaries in India)

प्रमुख उदाहरण:


डेल्टा बनाम ज्वारनदमुख (Delta vs. Estuary)

आधारडेल्टा (Delta)ज्वारनदमुख (Estuary)
अर्थनदी द्वारा लाए गए अवसादों का जमाव।नदी और समुद्र के जल का मिलन स्थल।
निर्माणकमजोर समुद्री लहरें, अधिक अवसाद।शक्तिशाली समुद्री लहरें, कम अवसाद।
आकृतित्रिभुजाकार, पंखे के आकार का।कीप (Funnel) के आकार का।
भूमि निर्माणउपजाऊ नई भूमि का निर्माण होता है।कोई नई भूमि नहीं बनती।
प्रक्रियानिर्माण की प्रक्रिया (Constructive)।अपरदन की प्रक्रिया (Erosional)।
उपयोगिताकृषि के लिए अत्यंत उपजाऊ।मत्स्य पालन और बंदरगाह के लिए आदर्श।
उदाहरण (भारत)गंगा-ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी।नर्मदा, तापी, मांडवी।

पंजाब का मैदान (The Punjab Plains)

पंजाब का मैदान, उत्तर भारत के विशाल मैदान का सबसे पश्चिमी भाग है। इसका निर्माण मुख्य रूप से सिंधु नदी और उसकी पाँच प्रमुख सहायक नदियों – झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलज – द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से हुआ है। यह एक अत्यंत उपजाऊ और कृषि की दृष्टि से भारत का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

नामकरण (Etymology)

‘पंजाब’ शब्द फारसी के दो शब्दों – ‘पंज’ (पाँच) और ‘आब’ (पानी या नदी) से मिलकर बना है। इस प्रकार, पंजाब का शाब्दिक अर्थ है “पाँच नदियों की भूमि”

भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)

ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से, पंजाब का मैदान एक बहुत बड़ा क्षेत्र है जिसका अधिकांश भाग अब पाकिस्तान (पश्चिम पंजाब) में है और एक छोटा हिस्सा भारत (पूर्वी पंजाब और हरियाणा) में है। भारत में, इसे अक्सर पंजाब-हरियाणा का मैदान कहा जाता है। इसका विस्तार मोटे तौर पर दिल्ली से लेकर पाकिस्तान के अटक तक है।

निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)

इसका निर्माण ठीक उसी प्रक्रिया से हुआ है जिससे पूरे उत्तरी मैदान का निर्माण हुआ है। हिमालय से निकलने वाली सिंधु और उसकी सहायक नदियों ने करोड़ों वर्षों तक अपने साथ लाए गए अवसादों (गाद, मिट्टी, बालू) को एक विशाल भू-अभिनति (Geosyncline) में जमा किया, जिससे इस समतल और उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ।


पंजाब के मैदान की प्रमुख विशेषताएँ

1. दोआबों की भूमि (Land of Doabs)

पंजाब के मैदान की सबसे प्रमुख भू-आकृतिक विशेषता यहाँ पाए जाने वाले “दोआब” हैं।

पंजाब के मैदान को निम्नलिखित पाँच प्रमुख दोआबों में विभाजित किया गया है (पश्चिम से पूर्व):

दोआब का नामनदियों के बीच की स्थितिविशेष तथ्य
सिंध सागर दोआबसिंधु और झेलम-चिनाब के बीचयह सबसे बड़ा दोआब है। इसका अधिकांश भाग पाकिस्तान में है। इसमें थल मरुस्थल का क्षेत्र भी आता है।
चज दोआबचिनाब और झेलम के बीच‘च’ (चिनाब) और ‘ज’ (झेलम) से नाम बना है। इसका बड़ा हिस्सा भी पाकिस्तान में है।
रचना दोआबरावी और चिनाब के बीच‘र’ (रावी) और ‘चना’ (चिनाब) से नाम बना है। इसका भी अधिकांश भाग पाकिस्तान में (जैसे लाहौर, गुजरांवाला) है।
बारी दोआबब्यास और रावी के बीच‘बा’ (ब्यास) और ‘री’ (रावी) से नाम बना है। भारत के पंजाब का माझा क्षेत्र इसी दोआब में आता है। अमृतसर और गुरदासपुर जैसे शहर यहीं हैं।
बिस्त दोआबब्यास और सतलज के बीच‘बि’ (ब्यास) और ‘स्त’ (सतलज) से नाम बना है। भारत के पंजाब का दोआबा क्षेत्र यही है। जालंधर, होशियारपुर जैसे शहर यहाँ स्थित हैं।

2. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)

3. समतल भू-भाग (Flat Topography)

4. अपवाह तंत्र (Drainage System)


पंजाब के मैदान का भारतीय भाग (The Indian Part of Punjab Plains)

निष्कर्ष: पंजाब का मैदान, अपनी उपजाऊ दोआब संरचना और विकसित कृषि प्रणाली के कारण, न केवल भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।


गंगा का मैदान (The Ganga Plains)

गंगा का मैदान, उत्तर भारत के विशाल मैदान का सबसे बड़ा, सबसे उपजाऊ और सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इसका निर्माण मुख्य रूप से गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों (जैसे यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी, सोन आदि) द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से हुआ है। यह भारत का हृदय स्थल माना जाता है और देश की लगभग 40% आबादी का घर है।

भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)


गंगा के मैदान का उप-विभाजन (Sub-divisions of the Ganga Plains)

स्थलाकृतिक और भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर, गंगा के मैदान को सामान्यतः तीन मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है:

1. ऊपरी गंगा का मैदान (Upper Gangetic Plain)

2. मध्य गंगा का मैदान (Middle Gangetic Plain)

3. निचला गंगा का मैदान (Lower Gangetic Plain)


गंगा के मैदान का महत्व


राजस्थान का मैदान (The Rajasthan Plains)

राजस्थान का मैदान, जिसे थार मरुस्थल (Thar Desert) या भारत का महान मरुस्थल (Great Indian Desert) भी कहा जाता है, उत्तर भारत के विशाल मैदान का एक विशिष्ट पश्चिमी भाग है। यह एक शुष्क और अर्ध-शुष्क रेतीला मैदान है, जिसकी स्थलाकृति और जलवायु देश के अन्य मैदानी भागों से पूरी तरह भिन्न है।

भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)

निर्माण और भूगर्भिक इतिहास (Formation and Geological History)

भूवैज्ञानिकों का मानना है कि मेसोजोइक युग (Mesozoic Era) में यह क्षेत्र समुद्र के नीचे था। इसके प्रमाण जैसलमेर के पास स्थित आकल वुड फॉसिल पार्क (Akal Wood Fossil Park) और समुद्री निक्षेपों से मिलते हैं।

बाद में, जलवायु परिवर्तन, दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के मार्ग में अरावली की समानांतर स्थिति और मानवीय गतिविधियों के कारण यह क्षेत्र धीरे-धीरे एक शुष्क मरुस्थल में बदल गया।


राजस्थान के मैदान की प्रमुख विशेषताएँ

स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर, राजस्थान के मैदान को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है:

1. मरुस्थली (The Marusthali) – शुष्क रेतीला मरुस्थल

2. राजस्थान बागर (Rajasthan Bagar) – अर्ध-शुष्क मैदान

राजस्थान बागर को पुनः कई छोटे-छोटे क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:


अपवाह तंत्र (Drainage System)

आधुनिक परिदृश्य और महत्व


भारतीय मरुस्थल (The Indian Desert)

भारतीय मरुस्थल, जिसे थार मरुस्थल (Thar Desert) या भारत का महान मरुस्थल (Great Indian Desert) के नाम से भी जाना जाता है, भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित एक विशाल, शुष्क और रेतीला भू-भाग है। यह विश्व का 17वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल और 9वाँ सबसे बड़ा गर्म उपोष्णकटिबंधीय मरुस्थल है।

भौगोलिक स्थिति और विस्तार

उत्पत्ति और इतिहास

भूवैज्ञानिक साक्ष्यों के अनुसार, यह क्षेत्र हमेशा से मरुस्थल नहीं था। माना जाता है कि मेसोजोइक युग में यह एक विशाल समुद्र के नीचे था। इसके प्रमाण जैसलमेर के निकट स्थित आकल वुड फॉसिल पार्क (Akal Wood Fossil Park) से मिलते हैं, जहाँ 18 करोड़ वर्ष पुराने लकड़ी के जीवाश्म पाए गए हैं।

धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन और विवर्तनिक घटनाओं के कारण यह क्षेत्र मरुस्थल में परिवर्तित हो गया। यह भी माना जाता है कि कभी इस क्षेत्र से पौराणिक सरस्वती नदी बहती थी।


भारतीय मरुस्थल की प्रमुख विशेषताएँ

1. स्थलाकृति (Topography)

यह एक उबड़-खाबड़ और तरंगित मैदान है जिसकी मुख्य स्थलाकृति रेत के टीले (Sand Dunes) हैं।

2. जलवायु (Climate)

3. वनस्पति (Vegetation)

4. अपवाह तंत्र (Drainage System)


जीवन और अर्थव्यवस्था


ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Brahmaputra Plains)

ब्रह्मपुत्र का मैदान, उत्तर भारत के विशाल मैदान का सबसे पूर्वी हिस्सा है। इसका निर्माण मुख्य रूप से ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से हुआ है। यह एक संकरा लेकिन अत्यंत उपजाऊ मैदान है, जो अपनी अनूठी भू-आकृतिक विशेषताओं और आर्थिक महत्व के लिए जाना जाता है।

भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)

निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)

इसका निर्माण हिमालय के उत्थान के बाद बने अग्रगर्त (Foredeep) में अवसादों के जमाव से हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी, तिब्बत के पठार से निकलकर और हिमालय को काटकर जब मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है, तो अपने साथ भारी मात्रा में गाद, रेत और अवसाद लाती है। इस मैदान का ढाल अत्यंत मंद है, जिसके कारण नदी की गति धीमी हो जाती है और वह इन अवसादों को अपनी घाटी में ही जमा कर देती है, जिससे इस उपजाऊ मैदान का निर्माण हुआ है।


ब्रह्मपुत्र के मैदान की प्रमुख विशेषताएँ

ब्रह्मपुत्र का मैदान अपनी कुछ अनूठी विशेषताओं के कारण गंगा और पंजाब के मैदानों से अलग है:

1. गुंफित नदी मार्ग (Braided River Channel)

2. नदीय द्वीपों का निर्माण (Formation of Riverine Islands)

3. अत्यधिक बाढ़ (Frequent and Devastating Floods)

4. दलदली और कच्छ भूमि (‘बील’)


ब्रह्मपुत्र के मैदान का महत्व

निष्कर्ष: ब्रह्मपुत्र का मैदान एक अनूठा और गतिशील भू-भाग है। यह अपनी उपजाऊ भूमि और संसाधनों के कारण आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन साथ ही, यहाँ के निवासियों को हर साल बाढ़ की विनाशकारी चुनौती का सामना भी करना पड़ता है।


प्रायद्वीपीय पठार (The Peninsular Plateau)

प्रायद्वीपीय पठार भारत का सबसे प्राचीन, सबसे बड़ा और सबसे स्थिर भूभाग है। यह एक अनियमित त्रिभुजाकार आकृति वाला एक मेज की आकृति का भूखंड (Tableland) है, जो प्राचीन क्रिस्टलीय, आग्नेय और कायांतरित चट्टानों से बना है। यह प्राचीन गोंडवानालैंड का एक हिस्सा है और पृथ्वी के सबसे पुराने भूखंडों में से एक है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार


प्रायद्वीपीय पठार का विभाजन (Division of the Peninsular Plateau)

नर्मदा नदी प्रायद्वीपीय पठार को दो मुख्य भागों में विभाजित करती है:

1. केन्द्रीय उच्चभूमि (The Central Highlands)
2. दक्कन का पठार (The Deccan Plateau)


1. केन्द्रीय उच्चभूमि (The Central Highlands)

केन्द्रीय उच्चभूमि, प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग है जो नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है। यह पठार के उत्तरी और चौड़े हिस्से का निर्माण करती है और कई छोटी-छोटी पठारी इकाइयों, पर्वत श्रृंखलाओं और नदी घाटियों से मिलकर बनी है। यह उत्तर भारत के विशाल मैदानों और दक्षिण भारत के दक्कन पठार के बीच एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन क्षेत्र है।

भौगोलिक विस्तार एवं सीमाएँ (Geographical Extent and Boundaries)

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

  1. ढाल (Slope): केन्द्रीय उच्चभूमि का सामान्य ढाल दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है। इस ढाल का सबसे स्पष्ट प्रमाण यहाँ बहने वाली नदियाँ हैं।
  2. अपवाह तंत्र (Drainage System): इस क्षेत्र की अधिकांश प्रमुख नदियाँ जैसे चंबल, सिंध, बेतवा और केन दक्षिण-पश्चिम से निकलकर उत्तर-पूर्व दिशा में बहती हैं और अंततः यमुना नदी में मिल जाती हैं।
  3. चौड़ाई: यह उच्चभूमि पश्चिम में अधिक चौड़ी है (जहाँ मालवा का पठार है) और पूर्व की ओर संकरी होती जाती है।

केन्द्रीय उच्चभूमि के प्रमुख उप-भाग

केन्द्रीय उच्चभूमि एक अकेली इकाई नहीं है, बल्कि यह कई पठारों और पर्वत श्रृंखलाओं का एक समूह है। इसके प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं:

क) अरावली श्रेणी (The Aravalli Range)

अरावली श्रेणी, भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित, विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखलाओं (Oldest Fold Mountains) में से एक है। इसका निर्माण प्री-कैम्ब्रियन युग में हुआ था, जो हिमालय से भी बहुत पहले की भूवैज्ञानिक घटना है। करोड़ों वर्षों के अपरदन के कारण, यह अब अपनी मूल ऊँचाई और विस्तार खो चुकी है और एक घर्षित व विच्छेदित अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountain) के रूप में विद्यमान है।

भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)

प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताएँ

  1. सर्वोच्च शिखर (Highest Peak):
    • अरावली का सर्वोच्च शिखर गुरु शिखर (Guru Shikhar) है, जिसकी ऊँचाई 1722 मीटर (5650 फीट) है।
    • यह शिखर माउंट आबू पठार पर स्थित है, जो राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है और जैनियों के प्रसिद्ध दिलवाड़ा मंदिरों के लिए भी जाना जाता है।
  2. संरचना:
    • इसका निर्माण मुख्य रूप से क्वार्टजाइट, नीस और शिस्ट जैसी कठोर कायांतरित चट्टानों से हुआ है। ये चट्टानें खनिज संसाधनों से भरपूर हैं।
  3. दर्रे (Passes):
    • अरावली में कई महत्वपूर्ण दर्रे हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘नाल’ (Nal) कहा जाता है। ये दर्रे परिवहन के लिए मार्ग प्रदान करते हैं, जैसे – देसूरी नाल, हाथीगुढ़ा की नाल आदि।

अरावली श्रेणी का महत्व

अरावली श्रेणी का महत्व केवल भूवैज्ञानिक नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र के पर्यावरण, जलवायु और अर्थव्यवस्था को भी गहराई से प्रभावित करती है।

1. जलवायु विभाजक (Climatic Divide)

2. जल विभाजक (Water Divide)

3. खनिज संसाधन (Mineral Resources)

4. जैव-विविधता और पर्यावरण (Biodiversity and Environment)


वर्तमान चिंताएँ (Current Concerns)

अरावली श्रेणी वर्तमान में अवैध खनन, शहरीकरण और वनों की कटाई जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इन गतिविधियों के कारण इसका पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे भू-क्षरण बढ़ रहा है और मरुस्थलीकरण का खतरा भी उत्पन्न हो रहा है। इसके संरक्षण के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।


ख) मालवा का पठार (Malwa Plateau)

मालवा का पठार, केन्द्रीय उच्चभूमि का एक प्रमुख और सबसे बड़ा हिस्सा है। यह एक लावा निर्मित पठार है जो अपनी विशिष्ट भू-आकृति, उपजाऊ काली मिट्टी और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)


मालवा के पठार की प्रमुख विशेषताएँ

  1. काली मिट्टी (Black Soil):
    • यह पठार अपनी उपजाऊ काली मिट्टी के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें नमी बनाए रखने की उच्च क्षमता होती है।
    • यह मिट्टी कपास, सोयाबीन, गेहूं और चना जैसी फसलों के उत्पादन के लिए आदर्श है। सोयाबीन के वृहद उत्पादन के कारण इस क्षेत्र को “सोया प्रदेश” भी कहा जाता है।
  2. अपवाह तंत्र (Drainage System):
    • मालवा का पठार मुख्य रूप से दो प्रमुख नदी प्रणालियों द्वारा अपवाहित होता है:
      • चंबल नदी प्रणाली: चंबल नदी और उसकी सहायक नदियाँ जैसे कालीसिंध, पार्वती और बनास इस पठार के एक बड़े हिस्से से होकर बहती हैं। ये नदियाँ उत्तर-पूर्व की ओर बहकर यमुना नदी में मिलती हैं।
      • माही नदी प्रणाली: माही नदी इसके पश्चिमी भाग से निकलकर दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हुई खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में गिरती है।
  3. बीहड़ स्थलाकृति (Badland Topography):
    • चंबल नदी और उसकी सहायक नदियों ने अपने प्रवाह मार्ग में मिट्टी का अत्यधिक कटाव (gully erosion) किया है, जिससे गहरे-गहरे खड्डों, घाटियों और टीलों वाली एक ऊबड़-खाबड़ भूमि का निर्माण हुआ है। इस विशिष्ट स्थलाकृति को बीहड़ या उत्खात-भूमि (Badlands or Ravines) कहा जाता है।
    • यह बीहड़ क्षेत्र (विशेषकर भिंड-मुरैना) ऐतिहासिक रूप से डाकुओं की शरणस्थली के रूप में भी कुख्यात रहा है।
  4. लुढ़कती स्थलाकृति (Rolling Topography):
    • पठार की सामान्य सतह लगभग समतल है, लेकिन यह नदी घाटियों द्वारा विच्छेदित है, जो इसे एक “लुढ़कती हुई” (Rolling) या तरंगित मैदान का स्वरूप प्रदान करती है।

आर्थिक महत्व (Economic Importance)

निष्कर्ष: मालवा का पठार अपनी ज्वालामुखी उत्पत्ति, उपजाऊ काली मिट्टी और विशिष्ट बीहड़ स्थलाकृति के साथ भारत का एक अनूठा भौतिक प्रदेश है, जो कृषि और उद्योग दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।


ग) बुंदेलखंड का पठार (Bundelkhand Plateau)

बुंदेलखंड का पठार, केन्द्रीय उच्चभूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो अपनी प्राचीन भूगर्भिक संरचना, ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। यह मालवा के पठार के पूर्व में और यमुना नदी के दक्षिण में स्थित है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)


बुंदेलखंड के पठार की प्रमुख विशेषताएँ

  1. अपदित और तरंगित स्थलाकृति (Eroded and Undulating Topography):
    • यह एक समतल पठार नहीं है, बल्कि नदियों द्वारा काटे जाने के कारण एक ऊबड़-खाबड़ और तरंगित (undulating) भू-भाग है।
    • यहाँ ग्रेनाइट की छोटी-छोटी, गोलाकार और बिखरी हुई पहाड़ियाँ देखी जा सकती हैं।
  2. अपवाह तंत्र (Drainage System):
    • इस क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ बेतवा, केन और धसान हैं, जो यमुना नदी की सहायक नदियाँ हैं।
    • ये नदियाँ पठार को उत्तर की ओर बहते हुए काटती हैं और गहरी घाटियों, खड्डों और कहीं-कहीं जलप्रपातों का निर्माण करती हैं।
  3. मृदा (Soil):
    • यहाँ की मिट्टी मुख्य रूप से लाल और पीली है, जो ग्रेनाइट और नीस चट्टानों के विखंडन से बनी है।
    • यह मिश्रित लाल और काली मिट्टी का क्षेत्र है। यह मिट्टी मालवा की काली मिट्टी की तुलना में कम उपजाऊ होती है और इसमें जल धारण करने की क्षमता भी कम होती है।
  4. वनस्पति (Vegetation):
    • यहाँ की जलवायु अर्ध-शुष्क है और वर्षा अपेक्षाकृत कम होती है।
    • इस कारण यहाँ शुष्क पर्णपाती वन (Dry Deciduous Forests) और कटीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं। सागौन (Teak), तेंदू, महुआ, और बबूल यहाँ के प्रमुख वृक्ष हैं।

आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य

निष्कर्ष: बुंदेलखंड का पठार एक प्राचीन और अपदित भूखंड है जो अपनी विशिष्ट भूगर्भिक संरचना और स्थलाकृति के लिए जाना जाता है। यह खनिज संसाधनों से समृद्ध होते हुए भी, जल संकट और कृषि संबंधी चुनौतियों के कारण एक सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ क्षेत्र माना जाता है।


घ) विंध्य श्रेणी (Vindhya Range)

विंध्य श्रेणी, भारत के मध्य भाग में स्थित एक जटिल और असंतत (discontinuous) पर्वत श्रृंखला है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक महान सांस्कृतिक और भौगोलिक विभाजक के रूप में महत्व रखती है। यह केन्द्रीय उच्चभूमि की दक्षिणी सीमा का निर्माण करती है और नर्मदा नदी की घाटी के लगभग समानांतर चलती है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)


विंध्य श्रेणी की प्रमुख विशेषताएँ और महत्व

  1. महान जल विभाजक (Great Water Divide of India):
    • विंध्य श्रेणी भारत का सबसे महत्वपूर्ण जल विभाजक है। यह गंगा नदी प्रणाली (उत्तर में) और प्रायद्वीपीय नदी प्रणालियों (दक्षिण में) के बीच पानी का बँटवारा करती है।
    • इसके उत्तरी ढलान से निकलने वाली नदियाँ जैसे चंबल, बेतवा, केन और सोन उत्तर की ओर बहकर गंगा-यमुना प्रणाली में मिल जाती हैं, जबकि इसके दक्षिणी ढलान से निकलने वाली छोटी नदियाँ नर्मदा नदी में मिलती हैं।
  2. उत्तर और दक्षिण भारत का विभाजक (Divider of North and South India):
    • ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से, विंध्य श्रेणी को पारंपरिक रूप से उत्तर भारत (आर्यावर्त) और दक्षिण भारत (दक्षिणापथ) के बीच की सीमा माना जाता रहा है। इसने प्राचीन काल में इन दो क्षेत्रों के बीच संचार और प्रवासन में एक अवरोधक के रूप में भी काम किया।
  3. भवन निर्माण सामग्री का स्रोत:
    • विंध्य श्रेणी अपने उच्च गुणवत्ता वाले बलुआ पत्थर और चूना पत्थर के लिए प्रसिद्ध है, जिनका उपयोग प्राचीन काल से लेकर आज तक भवन निर्माण में किया जाता रहा है।
    • ऐतिहासिक स्मारक: साँची के बौद्ध स्तूप, आगरा का किला और दिल्ली के लाल किले जैसे कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारकों के निर्माण में इसी श्रेणी से प्राप्त लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है।
    • चूना पत्थर सीमेंट उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है, जिसके कारण इस क्षेत्र में कई सीमेंट कारखाने स्थापित हैं।
  4. खनिज संसाधन:
    • हीरा (Diamond): मध्य प्रदेश के पन्ना की प्रसिद्ध हीरे की खदानें इसी विंध्यन क्रम की चट्टानों में स्थित हैं।
    • चूना पत्थर: सीमेंट ग्रेड का चूना पत्थर यहाँ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
  5. सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व:
    • यह क्षेत्र कई ऐतिहासिक गुफा चित्रों, जैसे भीमबेटका शैलाश्रय (Bhimbetka Rock Shelters), के लिए प्रसिद्ध है, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
    • यहाँ कई किले, मंदिर और झरने स्थित हैं जो पर्यटन को बढ़ावा देते हैं।

सतपुड़ा और विंध्य में अंतर (Difference between Satpura and Vindhya)

अक्सर इन दोनों समानांतर श्रेणियों में भ्रम हो जाता है। मुख्य अंतर यह है:

निष्कर्ष: विंध्य श्रेणी भारत के भूविज्ञान, अपवाह तंत्र और इतिहास में एक केंद्रीय स्थान रखती है। यह न केवल एक प्रमुख जल विभाजक है, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सीमा भी है, जो भवन निर्माण सामग्री और खनिजों का एक अमूल्य स्रोत है।


ङ) छोटानागपुर का पठार (Chota Nagpur Plateau)

छोटानागपुर का पठार, प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर-पूर्वी विस्तार है। यह भारत का सबसे धनी खनिज क्षेत्र है, जिसके कारण इसे “भारत का रूर (Ruhr of India)” (जर्मनी के खनिज-समृद्ध रूर प्रदेश के नाम पर) और “खनिजों का भंडार (Storehouse of Minerals)” भी कहा जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)


प्रमुख विशेषताएँ और उप-विभाजन

छोटानागपुर का पठार अपनी अनूठी स्थलाकृति और अपवाह तंत्र के लिए जाना जाता है।

1. पठार का उप-विभाजन

यह पठार कई छोटी इकाइयों से मिलकर बना है, जो दामोदर नदी घाटी द्वारा विभाजित हैं:

2. अपवाह तंत्र (Drainage System)


खनिज संसाधन और आर्थिक महत्व

छोटानागपुर का पठार भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

औद्योगिक केंद्र: खनिजों की इसी प्रचुरता के कारण, इस पठार और इसके आसपास भारत के कई प्रमुख औद्योगिक केंद्र स्थापित हुए हैं, जैसे – जमशेदपुर (TISCO), बोकारो, राउरकेला, दुर्गापुर और रांची (HEC)


2. दक्कन का पठार (The Deccan Plateau)

दक्कन का पठार, नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित एक विशाल त्रिभुजाकार भूभाग है। यह प्रायद्वीपीय पठार का सबसे बड़ा हिस्सा है और इसका नाम संस्कृत के शब्द “दक्षिण” से लिया गया है। यह पठार पश्चिम में ऊँचा और पूर्व की ओर धीरे-धीरे ढलानी होता जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं सीमाएँ (Geographical Location and Boundaries)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)

दक्कन के पठार का एक बड़ा हिस्सा “दक्कन ट्रैप” (Deccan Traps) के नाम से जाना जाता है।


दक्कन के पठार के प्रमुख भाग (Major Parts of the Deccan Plateau)

दक्कन के पठार को उसकी सीमा बनाने वाली पर्वत श्रृंखलाओं और आंतरिक पठारी क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:

क) पश्चिमी घाट (The Western Ghats)

पश्चिमी घाट, जिसे महाराष्ट्र में सह्याद्रि (Sahyadri) के नाम से भी जाना जाता है, भारत के पश्चिमी तट के समानांतर चलने वाली एक लंबी, निरंतर और ऊँची पर्वत श्रृंखला है। यह दक्कन के पठार की पश्चिमी सीमा का निर्माण करती है और अपनी समृद्ध जैव-विविधता, मानसूनी वर्षा पर प्रभाव और प्रायद्वीपीय भारत के अपवाह तंत्र को नियंत्रित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भौगोलिक विस्तार एवं स्थिति (Geographical Extent and Location)

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

  1. निरंतरता (Continuity): यह एक निरंतर श्रृंखला है जिसे केवल कुछ ही दर्रों के माध्यम से पार किया जा सकता है। यह पूर्वी घाट के विपरीत है, जो बहुत अधिक विच्छेदित (discontinuous) है।
  2. ऊँचाई: इसकी औसत ऊँचाई 900 से 1,600 मीटर है। यह उत्तर से दक्षिण की ओर ऊँची होती जाती है।
  3. जलवायु पर प्रभाव (Influence on Climate):
    • महान जल विभाजक: पश्चिमी घाट भारत के एक प्रमुख जल-विभाजक (Water Divide) के रूप में कार्य करता है। यह पश्चिम की ओर बहने वाली छोटी, तीव्र गति की नदियों और पूर्व की ओर बहने वाली लंबी, प्रायद्वीपीय नदियों के बीच पानी का बँटवारा करता है।
    • पर्वतीय वर्षा (Orographic Rainfall): यह दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के लिए एक प्रभावी अवरोधक के रूप में काम करता है। यह नमी से भरी हवाओं को ऊपर उठने के लिए मजबूर करता है, जिससे इसके पश्चिमी ढलानों (Windward Side) पर बहुत भारी वर्षा (250 सेमी से अधिक) होती है। इसके विपरीत, इसका पूर्वी ढलान (Leeward Side) वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow Area) में आता है, जहाँ बहुत कम वर्षा होती है।
  4. नदियों का उद्गम (Source of Rivers): यह प्रायद्वीपीय भारत की अधिकांश प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल है, जैसे गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, भीमा, और तुंगभद्रा, जो सभी पूर्व की ओर बहती हैं।

प्रमुख शिखर और पहाड़ियाँ (Major Peaks and Hills)

पश्चिमी घाट को कई उप-भागों और पहाड़ियों में विभाजित किया जा सकता है:

पश्चिमी घाट की प्रमुख पहाड़ियों का उत्तर से दक्षिण क्रम

क्रमपहाड़ी / पर्वत श्रृंखला का नामराज्य / अवस्थितिसबसे ऊँची चोटी / प्रमुख विशेषता
उत्तरी सह्याद्रि
1सतमाला श्रेणी (Satmala Range)उत्तरी महाराष्ट्र
2अजंता श्रेणी (Ajanta Range)उत्तरी महाराष्ट्रयह तापी नदी के समानांतर चलती है, अपनी बौद्ध गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है।
3हरिश्चंद्र श्रेणी (Harishchandra Range)मध्य महाराष्ट्रकलसुबाई (1646 मी)महाराष्ट्र की सबसे ऊँची चोटी इसी श्रृंखला का हिस्सा है।
4महाबलेश्वर पठारमध्य महाराष्ट्रयहाँ से कृष्णा नदी का उद्गम होता है।
मध्य सह्याद्रि
5बाबा बुदन गिरी (Baba Budan Giri)मध्य कर्नाटक (चिकमंगलूर जिला)लौह अयस्क और भारत में पहली कॉफी की खेती के लिए प्रसिद्ध। मुल्यानागिरी (1930 मी)कर्नाटक की सबसे ऊँची चोटी यहीं स्थित है।
6कुद्रेमुखमध्य कर्नाटक“घोड़े के मुख” जैसी आकृति। कुद्रेमुख चोटी (1892 मी) उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के लिए प्रसिद्ध है।
दक्षिणी सह्याद्रि
7नीलगिरि की पहाड़ियाँ (Nilgiri Hills)कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु (ट्राई-जंक्शन)यहाँ पश्चिमी और पूर्वी घाट आकर मिलते हैं। दोदाबेटा (2637 मी)दक्षिण भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी। प्रसिद्ध हिल स्टेशन ऊटी यहीं है।
8अन्नामलाई पहाड़ियाँ (Annamalai Hills)केरल और तमिलनाडु (नीलगिरि के दक्षिण में)अनाइमुडी (2695 मी)पश्चिमी घाट और पूरे दक्षिण भारत की सबसे ऊँची चोटी यहीं स्थित है।
9पालनी पहाड़ियाँ (Palani Hills)तमिलनाडु (अन्नामलाई का पूर्वी विस्तार)प्रसिद्ध हिल स्टेशन कोडाइकनाल यहीं स्थित है।
10इलायची (कार्डेमम) पहाड़ियाँकेरल और तमिलनाडु (सबसे दक्षिणी)अगस्त्यमलाई चोटी यहाँ का प्रमुख शिखर है। यह भारत की सबसे दक्षिणी पहाड़ी श्रृंखला है, जो इलायची और अन्य मसालों के लिए प्रसिद्ध है।

इसे याद रखने का आसान तरीका:

  1. महाराष्ट्र की चोटियाँ: महाराष्ट्र से शुरुआत करें (सतमाला, अजंता, हरिश्चंद्र)।
  2. कर्नाटक के खनिज क्षेत्र: फिर कर्नाटक में जाएँ, जहाँ लोहा और कॉफी मिलती है (बाबा बुदन गिरी, कुद्रेमुख)।
  3. दक्षिणी मिलन स्थल: दक्षिण में जाएँ जहाँ दोनों घाट मिलते हैं – नीलगिरि
  4. सर्वोच्च शिखर और हिल स्टेशन: नीलगिरि के दक्षिण में दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी है – अनाइमुडी (अन्नामलाई में), और पास में ही पालनी की पहाड़ियाँ (कोडाइकनाल)।
  5. सबसे अंत में मसाले: सबसे अंत में, सबसे दक्षिण में मसाले वाली पहाड़ी – इलायची (कार्डेमम) पहाड़ियाँ

प्रमुख दर्रे (Major Passes)

ये दर्रे पश्चिमी तट को पूर्वी पठार से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण परिवहन मार्ग हैं:

  1. थालघाट (Thal Ghat): मुंबई को नासिक से जोड़ता है।
  2. भोरघाट (Bhor Ghat): मुंबई को पुणे से जोड़ता है।
  3. पालघाट (Pal Ghat): यह एक चौड़ा दर्रा है जो केरल (कोच्चि) को तमिलनाडु (चेन्नई) से जोड़ता है। यह नीलगिरि और अन्नामलाई पहाड़ियों के बीच स्थित है।
  4. सेनकोट्टा दर्रा (Senkotta Pass): नागरकोइल और इलायची पहाड़ियों के बीच स्थित है, जो तिरुवनंतपुरम (केरल) को मदुरै (तमिलनाडु) से जोड़ता है।

जैव-विविधता (Biodiversity)


ख) पूर्वी घाट (The Eastern Ghats)

पूर्वी घाट, भारत के पूर्वी तट के लगभग समानांतर चलने वाली पहाड़ियों की एक असंतत और निचली श्रृंखला है। यह दक्कन के पठार की पूर्वी सीमा का निर्माण करती है। पश्चिमी घाट के विपरीत, यह एक विच्छेदित और अनियमित पर्वतमाला है।

भौगोलिक विस्तार एवं स्थिति (Geographical Extent and Location)

प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

  1. असंतत और विच्छेदित स्वरूप (Discontinuous and Eroded Nature):
    • पूर्वी घाट की सबसे प्रमुख विशेषता इसका विच्छेदित या असंतत (Discontinuous) होना है।
    • प्रायद्वीपीय भारत की चार बड़ी और शक्तिशाली नदियों – महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी – ने अपने प्रवाह मार्ग में इसे कई स्थानों पर काट दिया है और चौड़ी-चौड़ी घाटियों का निर्माण किया है। इन बड़ी घाटियों में, पहाड़ियों की निरंतरता लगभग समाप्त हो जाती है।
    • यह पश्चिमी घाट की तरह एक निरंतर दीवार नहीं है।
  2. ऊँचाई (Elevation):
    • यह पश्चिमी घाट की तुलना में कम ऊँचा है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 600 मीटर है, जबकि पश्चिमी घाट की औसत ऊँचाई 900-1600 मीटर है।
  3. संरचना:
    • यह एक अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountain) है, जिसका निर्माण विभिन्न प्रकार की चट्टानों जैसे चार्नोकाइट, खोंडालाइट, ग्रेनाइट, नीस और क्वार्टजाइट से हुआ है।
    • इन चट्टानों में बॉक्साइट, लौह अयस्क और चूना पत्थर जैसे खनिज पाए जाते हैं।
  4. कोई प्रमुख वर्षा अवरोधक नहीं:
    • यह श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के समानांतर पड़ती है और बहुत अधिक कटी-फटी होने के कारण, यह पश्चिमी घाट की तरह एक प्रभावी वर्षा अवरोधक के रूप में कार्य नहीं कर पाती है।
    • हालांकि, मानसून के लौटते समय (उत्तर-पूर्वी मानसून) के दौरान, यह तमिलनाडु के तट पर कुछ वर्षा कराने में सहायक होती है।

पूर्वी घाट के क्षेत्रीय नाम और प्रमुख पहाड़ियाँ

पूर्वी घाट को विभिन्न राज्यों में स्थानीय नामों से जाना जाता है और इसे कई अलग-अलग पहाड़ी समूहों में विभाजित किया गया है:

पूर्वी घाट की प्रमुख पहाड़ियों का उत्तर से दक्षिण क्रम

क्रमपहाड़ी / पर्वत श्रृंखला का नामराज्य / अवस्थितिसबसे ऊँची चोटी / प्रमुख विशेषता
उत्तरी भाग
1गढजात पहाड़ियाँ (Garhjat Hills)उत्तरी ओडिशायह पूर्वी घाट का सबसे उत्तरी हिस्सा है।
2महेंद्रगिरिदक्षिणी ओडिशामहेंद्रगिरि चोटी (1501 मी)। लंबे समय तक इसे पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी माना जाता था।
3अराकू घाटी / मादुगुला कोंडाउत्तरी आंध्र प्रदेश (ओडिशा सीमा के पास)जिंद्धागाड़ा चोटी (1690 मी)पूर्वी घाट की वर्तमान में सबसे ऊँची चोटी। बॉक्साइट के भंडार के लिए प्रसिद्ध।
मध्य भाग (कृष्णा और पेन्नेरु नदियों के बीच)
4नल्लमल्ला पहाड़ियाँ (Nallamala Hills)दक्षिणी आंध्र प्रदेश / तेलंगानायह पूर्वी घाट की सबसे लंबी और सबसे निरंतर श्रृंखलाओं में से एक है। यहाँ नागार्जुन सागर – श्रीशैलम टाइगर रिजर्व स्थित है।
5वेलीकोंडा श्रेणी (Velikonda Range)आंध्र प्रदेशनल्लमल्ला के समानांतर पूर्व में स्थित है।
6पालकोंडा श्रेणी (Palkonda Range)दक्षिणी आंध्र प्रदेशतिरुपति शहर के पास तक विस्तृत है। प्रसिद्ध तिरुमाला मंदिर इसी श्रृंखला की शेषाचलम पहाड़ियों में स्थित है।
दक्षिणी भाग (पेन्नेरु और कावेरी नदियों के बीच)
7नगरी पहाड़ियाँ (Nagari Hills)दक्षिणी आंध्र प्रदेश / तमिलनाडु सीमा
8जावडी पहाड़ियाँ (Javadi Hills)उत्तरी तमिलनाडुचंदन की लकड़ी और शीशम के लिए जानी जाती हैं।
9शेवरॉय पहाड़ियाँ (Shevaroy Hills)मध्य तमिलनाडु (सलेम के पास)येरकॉड हिल स्टेशन यहीं स्थित है। यहाँ की सबसे ऊँची चोटी सन्यासीमलाई (1620 मी) है।
10पंचमलाई पहाड़ियाँ (Pachaimalai Hills)मध्य तमिलनाडु“हरी पहाड़ियाँ” के नाम से जानी जाती हैं।
11सिरूमलाई पहाड़ियाँ (Sirumalai Hills)दक्षिणी तमिलनाडु (डिंडीगुल के पास)
12वरुशनाद पहाड़ियाँ (Varushanad Hills)दक्षिणी तमिलनाडुवैगई नदी का उद्गम यहीं से होता है। यह पश्चिमी घाट के साथ विलीन हो जाती हैं।

इसे याद रखने का आसान तरीका:

  1. ओडिशा से शुरुआत: सबसे उत्तर में ओडिशा की गढजात पहाड़ियाँ और महेंद्रगिरि
  2. आंध्र की सबसे ऊँची चोटी और ‘कोंडा’: फिर आंध्र प्रदेश में जाएँ, जहाँ सबसे ऊँची चोटी जिंद्धागाड़ा (अराकू घाटी) है। इसके बाद ‘कोंडा’ नाम वाली पहाड़ियाँ आती हैं – नल्लमल्ला, वेलीकोंडा, पालकोंडा
  3. तमिलनाडु की ‘मलाई’ और ‘राय’ वाली पहाड़ियाँ: सबसे अंत में तमिलनाडु की पहाड़ियाँ, जिनमें ‘मलाई’ या ‘राय’ जैसे शब्द आते हैं – जावडी, शेवरॉय, पंचमलाई, सिरूमलाई

यह क्रम आपको इन विच्छेदित पहाड़ियों की भौगोलिक स्थिति को बेहतर ढंग से याद रखने में मदद करेगा।


पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट में मुख्य अंतर (Key Differences)

आधारपश्चिमी घाट (Western Ghats)पूर्वी घाट (Eastern Ghats)
निरंतरतानिरंतर, केवल दर्रों से पार करने योग्य।असंतत और विच्छेदित।
ऊँचाईअधिक ऊँचा (औसत 900-1600 मी)।कम ऊँचा (औसत 600 मी)।
सर्वोच्च शिखरअनाइमुडी (2695 मी)।जिंद्धागाड़ा (1690 मी)।
वर्षापश्चिमी ढलानों पर भारी पर्वतीय वर्षा होती है।कोई महत्वपूर्ण पर्वतीय वर्षा नहीं कराता।
नदियों का उद्गमगोदावरी, कृष्णा, कावेरी का उद्गम स्थल।कोई बड़ी नदी यहाँ से नहीं निकलती, बल्कि नदियाँ इसे काटती हैं।
संरचनापठार का भ्रंश-कगार।प्राचीन अवशिष्ट पर्वत।

ग) दक्कन ट्रैप (Deccan Trap) / महाराष्ट्र का पठार

दक्कन ट्रैप, प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित एक विशाल आग्नेय (igneous) प्रांत है, जो मुख्य रूप से दक्कन के पठार का निर्माण करता है। यह अपनी सीढ़ीनुमा स्थलाकृति, बेसाल्टिक लावा चट्टानों और उपजाऊ काली मिट्टी के लिए विश्व प्रसिद्ध है। “महाराष्ट्र का पठार” इसी दक्कन ट्रैप का सबसे प्रमुख और विस्तृत हिस्सा है।

नामकरण (Etymology)

भौगोलिक विस्तार एवं स्थिति (Geographical Extent and Location)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)

दक्कन ट्रैप का निर्माण एक विशाल भूवैज्ञानिक घटना का परिणाम है:

  1. दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन (Fissure Volcanic Eruption):
    • आज से लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पहले (मेसोजोइक युग के क्रिटेशियस काल के अंत में), जब भारतीय प्लेट गोंडवानालैंड से टूटकर उत्तर की ओर बढ़ रही थी और रीयूनियन हॉटस्पॉट (Reunion Hotspot) के ऊपर से गुजर रही थी, तब पृथ्वी की पपड़ी में एक विशाल दरार पड़ गई।
    • इस दरार से किसी विस्फोटक ज्वालामुखी की तरह नहीं, बल्कि शांत रूप से अत्यधिक तरल बेसाल्टिक लावा (highly fluid basaltic lava) का विशाल प्रवाह हुआ।
  2. लावा का परत दर परत जमाव:
    • यह तरल लावा पानी की तरह एक बहुत बड़े क्षेत्र पर फैल गया। यह प्रक्रिया रुक-रुक कर लाखों वर्षों तक चलती रही, जिससे लावा की एक के ऊपर एक कई परतें (hundreds of layers) जम गईं।
    • इन परतों की मोटाई कहीं-कहीं 2,000 मीटर (2 किमी) से भी अधिक है, विशेषकर पश्चिमी घाट के पास। पूर्व की ओर जाने पर इन परतों की मोटाई कम होती जाती है।
  3. सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास:
    • चूंकि लावा का प्रवाह रुक-रुक कर हुआ, इसने अलग-अलग मोटाई की परतें बनाईं। बाद में, अपरदन की क्रिया ने इन परतों को काटकर घाटियाँ और पठार बना दिए, जिससे दूर से देखने पर यह क्षेत्र सीढ़ीनुमा या सोपानी दिखाई देता है।

प्रमुख विशेषताएँ

1. काली मिट्टी या रेगुर मिट्टी (Black Soil or Regur Soil)

2. प्रमुख नदियाँ

3. स्थानीय स्थलाकृतियाँ


घ) कर्नाटक का पठार (Karnataka Plateau) / मैसूर का पठ

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कर्नाटक का पठार, जिसे ऐतिहासिक रूप से मैसूर का पठार (Mysore Plateau) भी कहा जाता है, दक्कन के पठार का दक्षिणी हिस्सा है। यह अपनी विशिष्ट भूगर्भिक संरचना, समृद्ध खनिज संसाधनों (विशेषकर लोहा और सोना), ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति और अद्वितीय अपवाह तंत्र के लिए जाना जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)

कर्नाटक के पठार का विभाजन

कर्नाटक के पठार को उसकी स्थलाकृति के आधार पर दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है:

1. मलनाड (Malnad) – पहाड़ी प्रदेश

2. मैदान (Maidan) – मैदानी प्रदेश

प्रमुख विशेषताएँ और आर्थिक महत्व

  1. खनिज संसाधनों का भंडार:
    • धारवाड़ चट्टानों की उपस्थिति के कारण, यह पठार खनिज संपदा की दृष्टि से बहुत धनी है।
    • लौह अयस्क (Iron Ore): बाबा बुदन की पहाड़ियाँ (Baba Budan Hills) और कुद्रेमुख (Kudremukh) क्षेत्र उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क के विशाल भंडार के लिए प्रसिद्ध हैं। भारत में सबसे पहले कॉफी की खेती बाबा बुदन पहाड़ियों पर ही शुरू हुई थी।
    • सोना (Gold): भारत की अधिकांश सोने की खदानें इसी पठार पर हैं। कोलार (Kolar) और हट्टी (Hatti) की सोने की खदानें विश्व प्रसिद्ध हैं। (कोलार गोल्ड फील्ड्स-KGF अब लगभग बंद हो चुकी है)।
    • मैंगनीज: यह मैंगनीज के उत्पादन में भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
  2. जलविद्युत उत्पादन (Hydroelectric Power):
    • पठार की ऊँचाई और यहाँ से निकलने वाली नदियों ने जलविद्युत उत्पादन के लिए आदर्श स्थितियाँ पैदा की हैं। शरावती नदी पर जोग फॉल्स और कावेरी नदी पर शिवसमुद्रम जैसी परियोजनाएँ महत्वपूर्ण हैं।
  3. सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology):
    • पठार के मैदान क्षेत्र में स्थित बेंगलुरु (Bengaluru) भारत की “सिलिकॉन वैली (Silicon Valley of India)” के रूप में प्रसिद्ध है और देश का सबसे बड़ा सूचना प्रौद्योगिकी केंद्र है।

निष्कर्ष: कर्नाटक का पठार भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भौतिक प्रदेश है। यह न केवल अपने लौह अयस्क और सोने जैसे खनिज संसाधनों के लिए जाना जाता है, बल्कि कॉफी उत्पादन, जलविद्युत क्षमता और आईटी उद्योग का एक प्रमुख केंद्र भी है। इसकी ‘मलनाड’ और ‘मैदान’ में विभाजित विशिष्ट स्थलाकृति इसे और भी अनूठा बनाती है।

ङ) तेलंगाना पठार और आंध्र पठार (Telangana and Andhra Plateau)

तेलंगाना और आंध्र पठार, दक्कन के पठार के पूर्वी भाग का निर्माण करते हैं। यह एक प्राचीन और अपदित भूभाग है जो अपनी विशिष्ट भूगर्भिक संरचना, खनिज संपदा और नदी घाटियों के लिए जाना जाता है। आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन के बाद, इस पठारी क्षेत्र को दो मुख्य भागों में देखा जा सकता है: तेलंगाना का पठार और आंध्र का रायलसीमा पठार।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)


पठार का विभाजन (Division of the Plateau)

इस पूरे क्षेत्र को मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:

1. तेलंगाना का पठार (Telangana Plateau)

2. रायलसीमा पठार या आंध्र पठार (Rayalaseema Plateau or Andhra Plateau)


प्रमुख विशेषताएँ और आर्थिक महत्व

  1. अर्ध-शुष्क जलवायु:
    • यह पठार पूर्वी और पश्चिमी घाट दोनों के वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow Area) में पड़ता है।
    • इस कारण यहाँ वर्षा कम होती है और जलवायु अर्ध-शुष्क (semi-arid) है, जिससे यह क्षेत्र सूखा-प्रवण हो जाता है।
  2. टैंक सिंचाई (Tank Irrigation):
    • कम और अनियमित वर्षा के कारण यहाँ सिंचाई के लिए पारंपरिक रूप से टैंकों पर अत्यधिक निर्भरता रही है। हैदराबाद शहर की प्रसिद्ध हुसैन सागर झील भी एक ऐसा ही विशाल टैंक है।
  3. प्रमुख नदियाँ:
    • गोदावरी और कृष्णा इस पठार की जीवन रेखा हैं। इन नदियों पर कई बहुउद्देशीय परियोजनाएँ (जैसे नागार्जुन सागर, श्रीशैलम) बनाई गई हैं, जो सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
    • इन दोनों नदियों का डेल्टा क्षेत्र (K-G डेल्टा) भारत के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार के लिए भी प्रसिद्ध है।
  4. खनिज संपदा:
    • जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, यह पठार कई महत्वपूर्ण खनिजों का स्रोत है, जो सीमेंट, खनन और अन्य उद्योगों का आधार हैं।
    • आंध्र प्रदेश की अनंतपुर की खदानें सोने के लिए भी जानी जाती थीं।

निष्कर्ष: तेलंगाना और आंध्र का पठार एक प्राचीन, खनिज-समृद्ध और अर्ध-शुष्क भूभाग है। गोदावरी और कृष्णा जैसी शक्तिशाली नदियाँ इसे दो भागों में विभाजित करती हैं, और पारंपरिक टैंक सिंचाई प्रणाली इसकी एक अनूठी विशेषता है। यह क्षेत्र खनिज संपदा में धनी होते हुए भी, अपनी सूखा-प्रवण प्रकृति के कारण जल संसाधनों की चुनौतियों का सामना करता है।


निष्कर्ष: दक्कन का पठार अपनी ज्वालामुखी उत्पत्ति, विविध स्थलाकृति, समृद्ध खनिज संपदा, विशिष्ट नदी प्रणालियों और जैव-विविधता से परिपूर्ण घाटियों के साथ भारत का एक अनूठा और आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण भौतिक प्रदेश है।


🏞️ उत्तर-पूर्वी पठार (The North-Eastern Plateau)

उत्तर-पूर्वी पठार, जिसे मेघालय का पठार (Meghalaya Plateau) और कार्बी-आंगलोंग पठार (Karbi-Anglong Plateau) के नाम से भी जाना जाता है, भूवैज्ञानिक रूप से मुख्य प्रायद्वीपीय पठार (Peninsular Plateau) का ही एक पूर्वी विस्तार है।
हालांकि यह भौगोलिक रूप से मुख्य पठार से अलग-थलग दिखाई देता है, लेकिन इसकी चट्टानी संरचना और उत्पत्ति प्रायद्वीपीय भारत के समान ही है।


📍 भौगोलिक स्थिति एवं निर्माण (Geographical Location and Formation)

मुख्य पठार से अलगाव:
यह पठार मुख्य प्रायद्वीपीय पठार (विशेषकर छोटानागपुर पठार) से मालदा गैप (Malda Gap) या राजमहल-गारो गैप (Rajmahal–Garo Gap) नामक एक चौड़े समतल मैदान द्वारा अलग किया गया है।

मालदा गैप का निर्माण:
माना जाता है कि हिमालय के उत्थान के समय हुए विवर्तनिक हलचलों (Tectonic movements) के कारण प्रायद्वीपीय पठार के इस हिस्से और राजमहल की पहाड़ियों के बीच एक भ्रंश (Fault) उत्पन्न हुआ, जिससे भूमि का एक बड़ा भाग नीचे धँस गया।
बाद में इस धँसे हुए भाग को गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाए गए जलोढ़ निक्षेपों से भर दिया गया, जिससे यह समतल क्षेत्र (गैप) बना। आज यह भाग पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में स्थित है।

अवस्थिति:
यह पठार मुख्य रूप से मेघालय राज्य में स्थित है, परंतु इसका विस्तार असम के कार्बी-आंगलोंग और उत्तरी कछार पहाड़ियों तक भी है।


🏔️ उत्तर-पूर्वी पठार का विभाजन (Divisions of the North-Eastern Plateau)

इस पठार को तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है — जिनके नाम वहाँ की प्रमुख जनजातियों पर आधारित हैं (पश्चिम से पूर्व की ओर):

1. गारो पहाड़ियाँ (Garo Hills)

2. खासी पहाड़ियाँ (Khasi Hills)

3. जयंतिया पहाड़ियाँ (Jaintia Hills)

नोट:
असम में स्थित कार्बी-आंगलोंग पठार (Karbi-Anglong Plateau) भी इसी उत्तर-पूर्वी पठार का विस्तार है, जो दक्षिण में मेघालय पठार और पूर्व में नागा पहाड़ियों से घिरा है।


🌿 प्रमुख विशेषताएँ और महत्व (Major Features and Significance)

1. प्रायद्वीपीय पठार से समानता:
इस पठार की चट्टानें आर्कियन युग (Archean Era) की क्वार्टजाइट, शिस्ट, और नीस से बनी हैं, जो छोटानागपुर पठार जैसी हैं।
यह इसे हिमालय की नवीन वलित पर्वत श्रृंखलाओं से स्पष्ट रूप से अलग बनाती हैं।
यहाँ पाए जाने वाले कोयला, चूना पत्थर, लोहा, सिलीमेनाइट और यूरेनियम भी छोटानागपुर पठार के समान हैं।

2. विश्व का सबसे आर्द्र क्षेत्र:
इसकी भौगोलिक स्थिति और कीप जैसी आकृति इसे मानसूनी हवाओं के लिए आदर्श अवरोधक बनाती है।
इसी कारण यह क्षेत्र विश्व में सर्वाधिक औसत वार्षिक वर्षा प्राप्त करता है।

3. अपरदित सतह (Eroded Surface):
अत्यधिक वर्षा के कारण पठार की सतह अत्यधिक अपदित (eroded) हो चुकी है।
यहाँ कोई स्थायी नदी प्रणाली विकसित नहीं हो पाई है, और कई भाग वनस्पति-विहीन हैं।

4. जनजातीय संस्कृति:
यह पठार गारो, खासी, और जयंतिया जैसी प्रमुख मातृवंशीय (Matrilineal) जनजातियों का घर है।
इनकी अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराएँ और जीवन-शैली हैं।


🧭 निष्कर्ष (Conclusion)

उत्तर-पूर्वी पठार, भूवैज्ञानिक दृष्टि से प्रायद्वीपीय भारत का ही भाग है, परंतु मालदा गैप के कारण भौगोलिक रूप से अलग-थलग है।
यह अपनी जनजातीय पहाड़ियों, खनिज संपदा, और विश्व में सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र के रूप में एक विशिष्ट भौगोलिक इकाई का प्रतिनिधित्व करता है।


                      पूर्वी पठार

“पूर्वी पठार” शब्द का उपयोग अक्सर प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी हिस्से को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, हालांकि यह एक बहुत ही सामान्य और व्यापक शब्द है। भूवैज्ञानिक और भौगोलिक रूप से, इस क्षेत्र को अधिक सटीक रूप से कई छोटे-छोटे पठारों और बेसिन में विभाजित किया जाता है।

“पूर्वी पठार” के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्र आते हैं:

  1. छोटानागपुर का पठार (Chota Nagpur Plateau): यह प्रायद्वीपीय पठार का सबसे महत्वपूर्ण पूर्वी विस्तार है।
  2. बघेलखंड का पठार (Baghelkhand Plateau): यह छोटानागपुर के पश्चिम में स्थित है।
  3. दंडकारण्य का पठार (Dandakaranya Plateau): यह छोटानागपुर के दक्षिण में स्थित है।
  4. महानदी बेसिन / छत्तीसगढ़ का मैदान (Mahanadi Basin / Chhattisgarh Plain): यह पठारों के बीच स्थित एक निम्न मैदानी क्षेत्र है।

चलिए, इन सभी का विस्तृत विवरण देखते हैं।


1. छोटानागपुर का पठार (Chota Nagpur Plateau)

छोटानागपुर का पठार, प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर-पूर्वी विस्तार है। यह भारत का सबसे धनी खनिज क्षेत्र है, जिसके कारण इसे “भारत का रूर (Ruhr of India)” (जर्मनी के खनिज-समृद्ध रूर प्रदेश के नाम पर) और “खनिजों का भंडार (Storehouse of Minerals)” भी कहा जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)


प्रमुख विशेषताएँ और उप-विभाजन

छोटानागपुर का पठार अपनी अनूठी स्थलाकृति और अपवाह तंत्र के लिए जाना जाता है।

1. पठार का उप-विभाजन

यह पठार कई छोटी इकाइयों से मिलकर बना है, जो दामोदर नदी घाटी द्वारा विभाजित हैं:

2. अपवाह तंत्र (Drainage System)


खनिज संसाधन और आर्थिक महत्व

छोटानागपुर का पठार भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

औद्योगिक केंद्र: खनिजों की इसी प्रचुरता के कारण, इस पठार और इसके आसपास भारत के कई प्रमुख औद्योगिक केंद्र स्थापित हुए हैं, जैसे – जमशेदपुर (TISCO), बोकारो, राउरकेला, दुर्गापुर और रांची (HEC)


2. बघेलखंड का पठार (Baghelkhand Plateau)

बघेलखंड का पठार, जिसे विंध्याचल पठार के नाम से भी जाना जाता है, मध्य भारत में स्थित एक महत्वपूर्ण पठारी भूभाग है। यह विंध्य पर्वत श्रृंखला का पूर्वी विस्तार है और मध्य भारत के पठारों में एक विशिष्ट स्थान रखता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)

बघेलखंड की भूगर्भिक संरचना जटिल और विविधतापूर्ण है, जो इसे पड़ोसी पठारों से अलग करती है:


बघेलखंड के पठार की प्रमुख विशेषताएँ

  1. जल विभाजक के रूप में महत्व (Importance as a Water Divide):
    • बघेलखंड का पठार एक अत्यंत महत्वपूर्ण जल-विभाजक (Water Divide) के रूप में कार्य करता है।
    • यह उत्तर की ओर बहने वाली गंगा नदी प्रणाली और दक्षिण-पूर्व की ओर बहने वाली महानदी नदी प्रणाली के बीच पानी का बँटवारा करता है।
  2. अपवाह तंत्र (Drainage System):
    • सोन नदी: यह पठार की सबसे महत्वपूर्ण नदी है। यह मैकाल श्रेणी के अमरकंटक शिखर के पास से निकलती है और पठार की उत्तरी सीमा के साथ-साथ बहती हुई पूर्व की ओर जाकर पटना के पास गंगा नदी में मिल जाती है। सोन नदी और उसकी सहायक नदियाँ (जैसे रिहंद) इस क्षेत्र के जल निकासी का मुख्य स्रोत हैं।
    • अन्य नदियाँ: पठार के दक्षिणी भाग से निकलने वाली छोटी नदियाँ महानदी प्रणाली का हिस्सा बनती हैं।
  3. स्थलाकृति (Topography):
    • यह पठार उत्तर में अधिक पठारी और दक्षिण में अधिक पहाड़ी है।
    • यहाँ की स्थलाकृति असमान है, जिसमें समतल मैदानों से लेकर खड़ी ढलान वाली पहाड़ियाँ और गहरी नदी घाटियाँ शामिल हैं। कैमूर और भारनेर की श्रेणियाँ यहाँ की प्रमुख उच्च भूमियाँ हैं।
  4. खनिज संसाधन (Mineral Resources):
    • कोयला: गोंडवाना चट्टानों की उपस्थिति के कारण, यह क्षेत्र कोयले के भंडार में बहुत समृद्ध है। मध्य प्रदेश का सिंगरौली कोयला क्षेत्र, जो भारत का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक क्षेत्र है, इसी पठार पर स्थित है। छत्तीसगढ़ के कोयला क्षेत्र भी इसी का हिस्सा हैं।
    • चूना पत्थर: विंध्यन चट्टानों के कारण यहाँ उच्च गुणवत्ता वाला चूना पत्थर पाया जाता है, जो सीमेंट उद्योग का आधार है। सतना और रीवा प्रमुख सीमेंट उत्पादक केंद्र हैं।
    • बॉक्साइट: मैकाल श्रेणी के पास बॉक्साइट के भी महत्वपूर्ण भंडार हैं।
  5. कृषि और वनस्पति:
    • यहाँ की मिट्टी लाल-पीली है जो बहुत अधिक उपजाऊ नहीं है। सिंचाई की सहायता से चावल, गेहूं और मोटे अनाज उगाए जाते हैं।
    • पठार का एक बड़ा हिस्सा शुष्क पर्णपाती वनों से ढका हुआ है, जहाँ साल, सागौन, और तेंदू के वृक्ष बहुतायत में हैं।

निष्कर्ष: बघेलखंड का पठार एक महत्वपूर्ण भौगोलिक इकाई है जो दो महान नदी प्रणालियों के बीच जल-विभाजक का कार्य करता है। गोंडवाना और विंध्यन चट्टानों की उपस्थिति के कारण यह कोयले और चूना पत्थर जैसे महत्वपूर्ण खनिजों का भंडार है, जिसने इस क्षेत्र को ऊर्जा और सीमेंट उद्योग का एक प्रमुख केंद्र बना दिया है।


3. दंडकारण्य का पठार (Dandakaranya Plateau)

दंडकारण्य का पठार, भारत के मध्य-पूर्वी भाग में स्थित एक विशाल, अत्यंत ऊबड़-खाबड़ और सघन वनों से आच्छादित पठारी भूभाग है। यह अपनी समृद्ध खनिज संपदा, घने जंगलों और अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, लेकिन साथ ही, यह भारत के सबसे अविकसित और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।

ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व (Historical and Mythological Significance)

“दंडकारण्य” का शाब्दिक अर्थ है “दंड का वन” (The Forest of Punishment)। इसका उल्लेख महान महाकाव्य रामायण में प्रमुखता से मिलता है। यह वही विशाल वन प्रदेश था जहाँ भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास का एक बड़ा हिस्सा बिताया था। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से ऋषियों, मुनियों और जनजातीय समुदायों का निवास स्थान रहा है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

भूगर्भिक संरचना एवं स्थलाकृति (Geological Structure and Topography)


प्रमुख विशेषताएँ और महत्व

1. खनिज संसाधनों का विशाल भंडार

दंडकारण्य भारत के सबसे धनी खनिज क्षेत्रों में से एक है, लेकिन दुर्गम और अशांत क्षेत्र होने के कारण इन संसाधनों का पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पाया है।

2. अपवाह तंत्र (Drainage System)

3. घने वन और जैव-विविधता (Dense Forests and Biodiversity)


सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ

निष्कर्ष: दंडकारण्य का पठार एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ प्रकृति ने भरपूर संपदा दी है, लेकिन यह भौगोलिक दुर्गमता और गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। यह अपनी पौराणिक विरासत, खनिज संपदा और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन इसका विकास नक्सलवाद और पिछड़ेपन के कारण बाधित है।


4. महानदी बेसिन / छत्तीसगढ़ का मैदान (Mahanadi Basin / Chhattisgarh Plain)

महानदी बेसिन, जिसे छत्तीसगढ़ का मैदान भी कहा जाता है, प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी भाग में स्थित एक अनूठी, कटोरे के आकार की स्थलाकृतिक इकाई है। यह एक उपजाऊ, कृषि प्रधान और खनिज समृद्ध क्षेत्र है, जो अपने धान के उत्पादन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (Geographical Location and Extent)

निर्माण और भूगर्भिक संरचना (Formation and Geological Structure)

प्रमुख विशेषताएँ और महत्व

1. कटोरे के आकार की स्थलाकृति (Saucer-shaped Topography)

2. “भारत का चावल का कटोरा” (Rice Bowl of India)

3. अपवाह तंत्र (Drainage System)

4. खनिज संसाधन (Mineral Resources)

5. औद्योगिक विकास

निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ का मैदान या महानदी बेसिन, अपनी कटोरे जैसी अनूठी स्थलाकृति के साथ, भारत का एक महत्वपूर्ण कृषि और औद्योगिक क्षेत्र है। यह न केवल देश का “चावल का कटोरा” है, बल्कि कोयला, चूना पत्थर और लौह अयस्क जैसे संसाधनों की निकटता के कारण यह सीमेंट और इस्पात उद्योग का एक प्रमुख केंद्र भी बन गया है।

निष्कर्ष: “पूर्वी पठार” शब्द के अंतर्गत ये सभी विविध क्षेत्र आते हैं, जो अपनी अनूठी भूगर्भिक संरचना, खनिज संपदा और आर्थिक गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं। यह क्षेत्र भारत की खनिज सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


🏔️ पश्चिमी और पूर्वी घाट की प्रमुख चोटियाँ — ऊँचाई के अनुसार (घटते क्रम में)

क्रमचोटी का नामऊँचाई (मीटर में)घाटपहाड़ी / श्रेणीराज्य / अवस्थिति
1अनाइमुडी (Anaimudi)2695पश्चिमी घाटअन्नामलाई पहाड़ियाँकेरल
2दोदाबेटा (Doda Betta)2637पश्चिमी घाटनीलगिरि पहाड़ियाँतमिलनाडु
3मुल्यानागिरी (Mullayanagiri)1930पश्चिमी घाटबाबा बुदन गिरीकर्नाटक
4कुद्रेमुख (Kudremukh)1892पश्चिमी घाटकुद्रेमुख श्रेणीकर्नाटक
5जिंद्धागाड़ा (Jindhagada Peak)1690पूर्वी घाटअराकू घाटी / मादुगुला कोंडाआंध्र प्रदेश
6कलसुबाई (Kalsubai)1646पश्चिमी घाटहरिश्चंद्र श्रेणीमहाराष्ट्र
7सन्यासीमलाई (Sanyasimalai)1620पूर्वी घाटशेवरॉय पहाड़ियाँतमिलनाडु
8महेंद्रगिरि (Mahendragiri)1501पूर्वी घाटगढ़जात पहाड़ियाँओडिशा
9महाबलेश्वर (Mahabaleshwar)1438पश्चिमी घाटमहाबलेश्वर पठारमहाराष्ट्र
10नोकरेक चोटी (Nokrek Peak)1412मेघालय पठार (प्रायद्वीपीय पठार का हिस्सा)गारो पहाड़ियाँमेघालय

📌 प्रमुख बिंदु और निष्कर्ष

1. पश्चिमी घाट स्पष्ट रूप से ऊँचा है:
आप देख सकते हैं कि सूची में शीर्ष चोटियाँ — अनाइमुडी, दोदाबेटा, मुल्यानागिरी, और कुद्रेमुख — सभी पश्चिमी घाट की हैं।
दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटी अनाइमुडी (2695 मी) भी पश्चिमी घाट में ही स्थित है।

2. पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी:
पूर्वी घाट की सर्वोच्च चोटी जिंद्धागाड़ा (1690 मी) है, जो पश्चिमी घाट की कई चोटियों से कम ऊँची है।

3. ऊँचाई का क्रम:
सामान्यतः, पश्चिमी घाट की ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती है — जैसे महाराष्ट्र में कलसुबाई (1646 मी) से लेकर केरल में अनाइमुडी (2695 मी) तक।
पूर्वी घाट में ऊँचाई का कोई निश्चित क्रम नहीं है क्योंकि यह एक विच्छेदित श्रृंखला है, परंतु इसकी ऊँची चोटियाँ आंध्र प्रदेश और ओडिशा के उत्तरी भागों में स्थित हैं।

4. राज्यवार सर्वोच्च चोटियाँ:


📖 यह तालिका प्रतियोगी परीक्षाओं और सामान्य अध्ययन के लिए एक त्वरित एवं उपयोगी संदर्भ प्रदान करती है।


प्रायद्वीपीय पठार का महत्व (Importance of the Peninsular Plateau)

प्रायद्वीपीय पठार भारत का न केवल सबसे प्राचीन और सबसे बड़ा भूभाग है, बल्कि यह देश के आर्थिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक विकास की आधारशिला भी है। इसका महत्व बहुआयामी है, जिसे निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:


1. खनिजों का भंडार (Storehouse of Minerals)

यह प्रायद्वीपीय पठार का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। भारत के लगभग 98% खनिज संसाधन इसी पठार में संचित हैं, जिस कारण यह भारत के औद्योगिक विकास की रीढ़ है।

2. उपजाऊ काली मिट्टी (Fertile Black Soil)

3. जल-विद्युत और सिंचाई (Hydroelectricity and Irrigation)

4. वन संपदा और जैव-विविधता (Forest Wealth and Biodiversity)

5. जलवायु पर प्रभाव (Influence on Climate)

6. पर्यटन एवं सांस्कृतिक धरोहर (Tourism and Cultural Heritage)

7. भूवैज्ञानिक स्थिरता (Geological Stability)

निष्कर्ष में, प्रायद्वीपीय पठार सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक संपदा का खजाना, औद्योगिक शक्ति का आधार, कृषि अर्थव्यवस्था की नींव और एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षक है।