बीमा (Insurance):

 अर्थ, सिद्धांत, प्रकार और नियामक ढाँचा

परिचय: बीमा क्या है?

बीमा (Insurance) जोखिम प्रबंधन (Risk Management) का एक उपकरण है। यह एक ऐसा अनुबंध है, जो एक बीमा कंपनी (बीमाकर्ता) और एक व्यक्ति या संस्था (बीमाधारक) के बीच होता है। इस अनुबंध के तहत, बीमाधारक एक निश्चित राशि का नियमित भुगतान करता है, जिसे प्रीमियम (Premium) कहा जाता है। इसके बदले में, बीमा कंपनी बीमाधारक को किसी अप्रत्याशित घटना (जैसे मृत्यु, दुर्घटना, बीमारी, या संपत्ति का नुकसान) से होने वाले वित्तीय नुकसान की भरपाई करने का वादा करती है।

इसका मूल सिद्धांत जोखिम को साझा करना (Pooling of Risk) है। बहुत से लोग प्रीमियम के रूप में छोटी-छोटी राशि का योगदान करते हैं, और इस जमा हुए धन का उपयोग उन कुछ लोगों के नुकसान की भरपाई के लिए किया जाता है, जिन्हें वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण घटना का सामना करना पड़ता है।


बीमा के आधारभूत सिद्धांत (Fundamental Principles of Insurance)

बीमा का अनुबंध कुछ मौलिक सिद्धांतों पर आधारित होता है जो इसे अन्य अनुबंधों से अलग करते हैं:

  1. परम सद्भाव का सिद्धांत (Principle of Utmost Good Faith – 
    • यह सिद्धांत कहता है कि बीमाधारक और बीमाकर्ता दोनों को एक-दूसरे के प्रति सभी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक जानकारी का पूरी ईमानदारी से खुलासा करना चाहिए। बीमाधारक को अपनी स्वास्थ्य स्थिति, आदतों आदि के बारे में कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए। जानकारी छिपाने पर बीमा कंपनी दावे को अस्वीकार कर सकती है।
  2. बीमा योग्य हित का सिद्धांत (Principle of Insurable Interest):
    • इसका अर्थ है कि बीमाधारक का उस वस्तु या व्यक्ति में वित्तीय हित होना चाहिए जिसका वह बीमा करा रहा है। उदाहरण के लिए, आप अपनी कार का बीमा करा सकते हैं, लेकिन अपने पड़ोसी की कार का नहीं, क्योंकि उसकी क्षति से आपको कोई प्रत्यक्ष वित्तीय हानि नहीं होगी। जीवन बीमा में, यह हित पॉलिसी लेते समय मौजूद होना चाहिए।
  3. क्षतिपूर्ति का सिद्धांत (Principle of Indemnity):
    • यह सिद्धांत जीवन बीमा को छोड़कर सभी सामान्य बीमा अनुबंधों पर लागू होता है। इसका उद्देश्य बीमाधारक को नुकसान की स्थिति में उसी वित्तीय स्थिति में वापस लाना है, जिसमें वह नुकसान से ठीक पहले था, न कि उसे लाभ कमाने देना। आप ₹5 लाख की कार के नुकसान के लिए ₹6 लाख का दावा नहीं कर सकते।
  4. अंशदान का सिद्धांत (Principle of Contribution):
    • यदि किसी व्यक्ति ने एक ही संपत्ति के लिए दो या दो से अधिक बीमा कंपनियों से बीमा कराया है, तो नुकसान की स्थिति में सभी बीमा कंपनियाँ मिलकर दावे की राशि का भुगतान अपने-अपने बीमित राशि के अनुपात में करेंगी।
  5. स्थानापन्नता का सिद्धांत (Principle of Subrogation):
    • एक बार जब बीमा कंपनी बीमाधारक को उसके नुकसान की पूरी भरपाई कर देती है, तो क्षतिग्रस्त संपत्ति का स्वामित्व और उस नुकसान के लिए किसी तीसरे पक्ष से वसूली करने का अधिकार बीमा कंपनी को हस्तांतरित हो जाता है। यह सिद्धांत भी क्षतिपूर्ति के सिद्धांत को ही लागू करता है।
  6. निकटतम कारण का सिद्धांत (Principle of Proximate Cause):
    • यह सिद्धांत कहता है कि बीमा कंपनी केवल उन्हीं नुकसानों की भरपाई करेगी जो पॉलिसी में उल्लिखित जोखिमों के प्रत्यक्ष और निकटतम परिणाम हैं, न कि दूरस्थ या अप्रत्यक्ष कारणों से हुए नुकसान की।

भारत में बीमा के प्रकार

भारत में बीमा को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा गया है:

1. जीवन बीमा (Life Insurance)

यह बीमा किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़े जोखिमों को कवर करता है, जैसे – मृत्यु, विकलांगता या वृद्धावस्था। यह बीमाधारक की मृत्यु पर उसके परिवार को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है या एक निश्चित अवधि के बाद परिपक्वता लाभ (Maturity Benefit) देता है।

2. साधारण/गैर-जीवन बीमा (General/Non-Life Insurance)

यह जीवन के अलावा अन्य सभी प्रकार के बीमा को कवर करता है।


भारत में बीमा का नियामक ढाँचा


भारत में बीमा क्षेत्र की चुनौतियाँ और महत्व


प्रमुख सरकारी बीमा योजनाएँ

निष्कर्ष

बीमा क्षेत्र भारत की आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए एक अनिवार्य स्तंभ है। IRDAI के सक्रिय विनियमन और सरकार की विभिन्न योजनाओं ने इसकी पहुंच का विस्तार किया है। भविष्य में, प्रौद्योगिकी (Insurtech), सरल उत्पादों और बेहतर ग्राहक सेवा के माध्यम से बीमा पैठ को बढ़ाना देश के लिए एक प्रमुख प्राथमिकता होगी।


मुद्रा (Money):

 अर्थ, कार्य, प्रकार और आपूर्ति

परिचय: मुद्रा क्या है?

मुद्रा कोई भी ऐसी वस्तु है जिसे विनिमय के माध्यम (Medium of Exchange), मूल्य के मापक (Measure of Value), मूल्य के संचय (Store of Value) और स्थगित भुगतानों के मान (Standard of Deferred Payments) के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।

इसके उदय से पहले, समाज वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) पर निर्भर था, जहाँ वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान सीधे अन्य वस्तुओं और सेवाओं से किया जाता था (जैसे, एक किलो गेहूं के बदले दो लीटर दूध)। इस प्रणाली में आवश्यकताओं के दोहरे संयोग (Double Coincidence of Wants) की कमी, मूल्य की एक सामान्य इकाई का अभाव और मूल्य को संग्रहीत करने में कठिनाई जैसी कई समस्याएं थीं। मुद्रा ने इन सभी समस्याओं का समाधान किया।


मुद्रा के कार्य (Functions of Money)

मुद्रा के कार्यों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा गया है:

1. प्राथमिक कार्य (Primary Functions):

2. गौण कार्य (Secondary Functions):

3. आकस्मिक कार्य (Contingent Functions):


मुद्रा के प्रकार (Types of Money)

  1. आदेश मुद्रा (Fiat Money):
    • यह वह मुद्रा है जिसका अपना कोई आंतरिक मूल्य नहीं होता, लेकिन सरकार के आदेश या ‘आदेश’ (Fiat) द्वारा इसे कानूनी निविदा (Legal Tender) घोषित किया जाता है।
    • सभी आधुनिक कागज के नोट और सिक्के फिएट मनी के उदाहरण हैं। लोग इन्हें स्वीकार करते हैं क्योंकि सरकार ने इन्हें भुगतान के माध्यम के रूप में अधिकृत किया है।
  2. साख मुद्रा (Fiduciary Money):
    • यह वह मुद्रा है जिसका मूल्य जारीकर्ता और प्राप्तकर्ता के बीच विश्वास (Trust) पर आधारित होता है।
    • चेक (Cheque) और डिमांड ड्राफ्ट इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। इन्हें स्वीकार करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, यह प्राप्तकर्ता की इच्छा पर निर्भर करता है।
  3. बैंक मुद्रा (Bank Money):
    • यह वाणिज्यिक बैंकों द्वारा अपनी जमा राशि के आधार पर बनाई गई साख है। बैंकों में मांग जमा (Demand Deposits) को बैंक मुद्रा माना जाता है।
  4. निकट मुद्रा (Near Money):
    • ये अत्यधिक तरल (Highly Liquid) वित्तीय संपत्तियां हैं जिन्हें बहुत आसानी से और जल्दी से मुद्रा में बदला जा सकता है, लेकिन ये सीधे विनिमय के माध्यम के रूप में काम नहीं करतीं। जैसे – ट्रेजरी बिल, सरकारी बॉन्ड।

मुद्रा का विकास – आधुनिक रूप


भारत में मुद्रा की आपूर्ति (Money Supply in India)

मुद्रा की आपूर्ति का अर्थ है किसी एक विशेष समय पर देश की जनता के पास उपलब्ध मुद्रा का कुल स्टॉक। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मुद्रा आपूर्ति को मापने के लिए चार संकेतकों का उपयोग करता है: M1, M2, M3, और M4.

  1. M1 (Narrow Money – संकीर्ण मुद्रा):
    • M1 = C + DD + OD
      • C = जनता के पास करेंसी (नोट और सिक्के)
      • DD = वाणिज्यिक बैंकों के पास शुद्ध मांग जमा (Net Demand Deposits)
      • OD = RBI के पास अन्य जमा राशियाँ
    • यह मुद्रा का सबसे तरल (Most Liquid) रूप है, यानी इसे तुरंत लेन-देन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
  2. M2:
    • M2 = M1 + डाकघर बचत बैंकों में बचत जमा (Savings deposits with Post Office saving banks)
  3. M3 (Broad Money – व्यापक मुद्रा):
    • M3 = M1 + वाणिज्यिक बैंकों की शुद्ध सावधि जमा (Net time deposits with the commercial banks)
    • यह मुद्रा आपूर्ति का सबसे व्यापक और आमतौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला माप है। इसे “कुल मौद्रिक संसाधन” (Aggregate Monetary Resources) भी कहा जाता है।
  4. M4:
    • M4 = M3 + डाकघर बचत संगठनों के पास कुल जमा (राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्रों को छोड़कर)
    • यह सबसे कम तरल (Least Liquid) माप है।

तरलता का क्रम: M1 > M2 > M3 > M4


भारत में मुद्रा जारी करना

निष्कर्ष

मुद्रा वस्तु विनिमय की बाधाओं को दूर करने वाले एक साधारण उपकरण से विकसित होकर आज आर्थिक नीति का एक शक्तिशाली साधन बन गई है। RBI मौद्रिक नीति के माध्यम से मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करके मुद्रास्फीति, आर्थिक विकास और ब्याज दरों जैसे मैक्रोइकॉनॉमिक चरों को प्रभावित करता है। डिजिटल क्रांति के साथ, मुद्रा का रूप लगातार बदल रहा है, जो भविष्य में वित्तीय परिदृश्य को और भी रोचक बना देगा।


शेयर बाज़ार (Share Market): 

संरचना, कार्य और भूमिका

परिचय: शेयर बाज़ार क्या है?

शेयर बाज़ार एक संगठित बाज़ार है जहाँ सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों (Publicly Listed Companies) के शेयरों (Shares) की खरीद-बिक्री होती है।

सरल शब्दों में, शेयर बाज़ार एक ऐसा मंच है जो उन कंपनियों को जोड़ता है जिन्हें अपने विस्तार और विकास के लिए धन (पूंजी) की आवश्यकता होती है, और उन निवेशकों (Investors) को जिनके पास अतिरिक्त धन है और वे उसे लाभ कमाने के लिए निवेश करना चाहते हैं।


शेयर बाज़ार की संरचना और कार्यप्रणाली

भारत में शेयर बाज़ार को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:

1. प्राथमिक बाज़ार (Primary Market):

2. द्वितीयक बाज़ार (Secondary Market):


भारत में शेयर बाज़ार के प्रमुख घटक

  1. स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchanges):
    • यह एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ शेयरों का व्यवस्थित तरीके से कारोबार होता है।
    • बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (Bombay Stock Exchange – BSE): 1875 में स्थापित, यह एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है।
    • नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (National Stock Exchange – NSE): 1992 में स्थापित, यह व्यापार की मात्रा के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है।
  2. स्टॉक सूचकांक (Stock Indices):
    • सूचकांक एक संकेतक होता है जो स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध कुछ प्रमुख शेयरों के प्रदर्शन को मापकर पूरे बाज़ार की दिशा और भावना को दर्शाता है।
    • सेंसेक्स (Sensex): यह BSE का बेंचमार्क सूचकांक है, जो BSE पर सूचीबद्ध 30 सबसे बड़ी और सबसे सक्रिय रूप से कारोबार करने वाली कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाता है।
    • निफ्टी 50 (Nifty 50): यह NSE का बेंचमार्क सूचकांक है, जो NSE पर सूचीबद्ध 50 सबसे बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाता है।
  3. नियामक (Regulator) – SEBI (सेबी):
    • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Securities and Exchange Board of India – SEBI): सेबी भारतीय पूंजी बाज़ार का सर्वोच्च नियामक है।
    • मुख्य कार्य: निवेशकों के हितों की रक्षा करना, शेयर बाज़ार के विकास को बढ़ावा देना, और बाज़ार में होने वाली धोखाधड़ी (जैसे- इनसाइडर ट्रेडिंग) को रोकना। सेबी को “बाज़ार का प्रहरी” (Watchdog of the Market) भी कहा जाता है।
  4. मध्यस्थ (Intermediaries):
    • स्टॉक ब्रोकर्स: ये SEBI के साथ पंजीकृत सदस्य होते हैं जो निवेशकों को स्टॉक एक्सचेंज पर शेयर खरीदने और बेचने में सक्षम बनाते हैं (जैसे- Zerodha, Angel One, ICICI Direct)।
    • डिपॉजिटरी और डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट्स (DPs): डिपॉजिटरी (भारत में NSDL और CDSL) निवेशकों के शेयरों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में सुरक्षित रखती हैं। DP (जैसे बैंक और ब्रोकर्स) डिपॉजिटरी और निवेशक के बीच की कड़ी होते हैं।

कुछ महत्वपूर्ण शब्दावली


अर्थव्यवस्था में शेयर बाज़ार की भूमिका

  1. पूंजी निर्माण (Capital Formation): यह कंपनियों को जनता से दीर्घकालिक पूंजी जुटाने में मदद करता है, जिससे औद्योगिक विकास और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
  2. आर्थिक बैरोमीटर (Economic Barometer): शेयर बाज़ार के सूचकांकों में उतार-चढ़ाव अक्सर देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य और भविष्य की दिशा का एक विश्वसनीय संकेतक माने जाते हैं।
  3. बचत का निवेश में रूपांतरण: यह आम लोगों की छोटी-छोटी बचत को उत्पादक निवेशों की ओर मोड़ता है, जिससे धन का अधिक कुशल उपयोग होता है।
  4. कॉर्पोरेट गवर्नेंस: सूचीबद्ध कंपनियों को सेबी के कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है, जिससे उनमें पारदर्शिता और बेहतर कॉर्पोरेट प्रशासन को बढ़ावा मिलता है।

जोखिम और सावधानियाँ

निष्कर्ष

शेयर बाज़ार किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग है। यह न केवल पूंजी निर्माण का एक शक्तिशाली माध्यम है, बल्कि यह आर्थिक स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक भी है। सेबी जैसे एक मजबूत नियामक की उपस्थिति यह सुनिश्चित करती है कि बाज़ार निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करे, जिससे निवेशकों का विश्वास बना रहे और अर्थव्यवस्था के विकास में निरंतर योगदान हो।