बीमा (Insurance):
अर्थ, सिद्धांत, प्रकार और नियामक ढाँचा
परिचय: बीमा क्या है?
बीमा (Insurance) जोखिम प्रबंधन (Risk Management) का एक उपकरण है। यह एक ऐसा अनुबंध है, जो एक बीमा कंपनी (बीमाकर्ता) और एक व्यक्ति या संस्था (बीमाधारक) के बीच होता है। इस अनुबंध के तहत, बीमाधारक एक निश्चित राशि का नियमित भुगतान करता है, जिसे प्रीमियम (Premium) कहा जाता है। इसके बदले में, बीमा कंपनी बीमाधारक को किसी अप्रत्याशित घटना (जैसे मृत्यु, दुर्घटना, बीमारी, या संपत्ति का नुकसान) से होने वाले वित्तीय नुकसान की भरपाई करने का वादा करती है।
इसका मूल सिद्धांत जोखिम को साझा करना (Pooling of Risk) है। बहुत से लोग प्रीमियम के रूप में छोटी-छोटी राशि का योगदान करते हैं, और इस जमा हुए धन का उपयोग उन कुछ लोगों के नुकसान की भरपाई के लिए किया जाता है, जिन्हें वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण घटना का सामना करना पड़ता है।
बीमा के आधारभूत सिद्धांत (Fundamental Principles of Insurance)
बीमा का अनुबंध कुछ मौलिक सिद्धांतों पर आधारित होता है जो इसे अन्य अनुबंधों से अलग करते हैं:
- परम सद्भाव का सिद्धांत (Principle of Utmost Good Faith –
- यह सिद्धांत कहता है कि बीमाधारक और बीमाकर्ता दोनों को एक-दूसरे के प्रति सभी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक जानकारी का पूरी ईमानदारी से खुलासा करना चाहिए। बीमाधारक को अपनी स्वास्थ्य स्थिति, आदतों आदि के बारे में कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए। जानकारी छिपाने पर बीमा कंपनी दावे को अस्वीकार कर सकती है।
- बीमा योग्य हित का सिद्धांत (Principle of Insurable Interest):
- इसका अर्थ है कि बीमाधारक का उस वस्तु या व्यक्ति में वित्तीय हित होना चाहिए जिसका वह बीमा करा रहा है। उदाहरण के लिए, आप अपनी कार का बीमा करा सकते हैं, लेकिन अपने पड़ोसी की कार का नहीं, क्योंकि उसकी क्षति से आपको कोई प्रत्यक्ष वित्तीय हानि नहीं होगी। जीवन बीमा में, यह हित पॉलिसी लेते समय मौजूद होना चाहिए।
- क्षतिपूर्ति का सिद्धांत (Principle of Indemnity):
- यह सिद्धांत जीवन बीमा को छोड़कर सभी सामान्य बीमा अनुबंधों पर लागू होता है। इसका उद्देश्य बीमाधारक को नुकसान की स्थिति में उसी वित्तीय स्थिति में वापस लाना है, जिसमें वह नुकसान से ठीक पहले था, न कि उसे लाभ कमाने देना। आप ₹5 लाख की कार के नुकसान के लिए ₹6 लाख का दावा नहीं कर सकते।
- अंशदान का सिद्धांत (Principle of Contribution):
- यदि किसी व्यक्ति ने एक ही संपत्ति के लिए दो या दो से अधिक बीमा कंपनियों से बीमा कराया है, तो नुकसान की स्थिति में सभी बीमा कंपनियाँ मिलकर दावे की राशि का भुगतान अपने-अपने बीमित राशि के अनुपात में करेंगी।
- स्थानापन्नता का सिद्धांत (Principle of Subrogation):
- एक बार जब बीमा कंपनी बीमाधारक को उसके नुकसान की पूरी भरपाई कर देती है, तो क्षतिग्रस्त संपत्ति का स्वामित्व और उस नुकसान के लिए किसी तीसरे पक्ष से वसूली करने का अधिकार बीमा कंपनी को हस्तांतरित हो जाता है। यह सिद्धांत भी क्षतिपूर्ति के सिद्धांत को ही लागू करता है।
- निकटतम कारण का सिद्धांत (Principle of Proximate Cause):
- यह सिद्धांत कहता है कि बीमा कंपनी केवल उन्हीं नुकसानों की भरपाई करेगी जो पॉलिसी में उल्लिखित जोखिमों के प्रत्यक्ष और निकटतम परिणाम हैं, न कि दूरस्थ या अप्रत्यक्ष कारणों से हुए नुकसान की।
भारत में बीमा के प्रकार
भारत में बीमा को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा गया है:
1. जीवन बीमा (Life Insurance)
यह बीमा किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़े जोखिमों को कवर करता है, जैसे – मृत्यु, विकलांगता या वृद्धावस्था। यह बीमाधारक की मृत्यु पर उसके परिवार को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है या एक निश्चित अवधि के बाद परिपक्वता लाभ (Maturity Benefit) देता है।
- टर्म प्लान (Term Plan): यह जीवन बीमा का सबसे शुद्ध और सस्ता रूप है। यह एक निश्चित अवधि के लिए कवरेज प्रदान करता है, और यदि इस अवधि के दौरान बीमाधारक की मृत्यु हो जाती है, तो नामांकित व्यक्ति (Nominee) को राशि का भुगतान किया जाता है।
- एंडोमेंट प्लान (Endowment Plan): यह बीमा और बचत का एक संयोजन है। यह टर्म प्लान की तरह मृत्यु लाभ और पॉलिसी अवधि के अंत में एकमुश्त परिपक्वता लाभ दोनों प्रदान करता है।
- यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (ULIP): यह बीमा और निवेश का एक मिश्रण है। प्रीमियम का एक हिस्सा मृत्यु कवरेज के लिए उपयोग किया जाता है, और शेष हिस्से को शेयर बाजार या बॉन्ड में निवेश किया जाता है।
- मनी बैक पॉलिसी (Money Back Policy): इसमें पॉलिसी अवधि के दौरान नियमित अंतराल पर बीमित राशि का एक निश्चित प्रतिशत वापस मिलता है।
- संपूर्ण जीवन पॉलिसी (Whole Life Policy): यह बीमाधारक को उसके पूरे जीवन (आमतौर पर 100 वर्ष की आयु तक) के लिए कवरेज प्रदान करती है।
2. साधारण/गैर-जीवन बीमा (General/Non-Life Insurance)
यह जीवन के अलावा अन्य सभी प्रकार के बीमा को कवर करता है।
- स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance): यह बीमारी या दुर्घटना के कारण होने वाले चिकित्सा खर्चों (जैसे अस्पताल में भर्ती, दवाएं) को कवर करता है।
- मोटर बीमा (Motor Insurance): कानून के अनुसार यह अनिवार्य है। यह वाहन को दुर्घटना, चोरी से होने वाले नुकसान और तीसरे पक्ष (Third-party) की देनदारियों से बचाता है।
- गृह बीमा (Home Insurance): यह घर और उसकी सामग्री को आग, भूकंप, बाढ़ और चोरी जैसे खतरों से बचाता है।
- यात्रा बीमा (Travel Insurance): यह यात्रा के दौरान सामान खोने, उड़ान रद्द होने या चिकित्सा आपात स्थिति जैसे जोखिमों को कवर करता है।
- फसल बीमा (Crop Insurance): यह किसानों को सूखा, बाढ़ या कीटों के हमले के कारण फसल खराब होने से होने वाले वित्तीय नुकसान से बचाता है (जैसे- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना)।
भारत में बीमा का नियामक ढाँचा
- IRDAI (भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण):
- स्थापना: 2000 में, मल्होत्रा समिति (Malhotra Committee) की सिफारिशों पर।
- मुख्यालय: हैदराबाद।
- यह भारत में बीमा क्षेत्र की सर्वोच्च और स्वतंत्र नियामक संस्था है।
- मुख्य कार्य:
- पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा करना।
- बीमा कंपनियों का पंजीकरण और विनियमन करना।
- बीमा उत्पादों का अनुमोदन करना और यह सुनिश्चित करना कि वे निष्पक्ष हों।
- बीमा क्षेत्र के व्यवस्थित विकास को बढ़ावा देना।
- विवादों का समाधान करना।
भारत में बीमा क्षेत्र की चुनौतियाँ और महत्व
- महत्व:
- जोखिम से सुरक्षा: यह व्यक्तियों और व्यवसायों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है।
- पूंजी निर्माण: बीमा कंपनियाँ प्रीमियम के रूप में बड़ी मात्रा में धन एकत्र करती हैं और इसे बुनियादी ढांचे और सरकारी प्रतिभूतियों जैसे दीर्घकालिक निवेशों में लगाती हैं, जो देश के आर्थिक विकास में मदद करता है।
- वित्तीय समावेशन: यह लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ता है।
- सामाजिक सुरक्षा: यह समाज के कमजोर वर्गों को एक सामाजिक सुरक्षा जाल प्रदान करता है।
- चुनौतियाँ:
- कम बीमा पैठ (Low Insurance Penetration): भारत में GDP के प्रतिशत के रूप में बीमा प्रीमियम अभी भी वैश्विक औसत से बहुत कम है।
- जागरूकता की कमी: विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में बीमा के लाभों के बारे में जागरूकता बहुत कम है।
- विश्वास की कमी: दावा निपटान (Claim Settlement) की जटिल प्रक्रियाओं के कारण लोगों में विश्वास की कमी है।
- जटिल उत्पाद: बीमा उत्पाद अक्सर इतने जटिल होते हैं कि आम आदमी उन्हें समझ नहीं पाता है।
प्रमुख सरकारी बीमा योजनाएँ
- प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY): निम्न-आय वर्ग के लिए एक किफायती जीवन बीमा योजना।
- प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY): एक किफायती दुर्घटना और विकलांगता कवर योजना।
- आयुष्मान भारत (PM-JAY): दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी वित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजना।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): किसानों के लिए एक व्यापक फसल बीमा योजना।
निष्कर्ष
बीमा क्षेत्र भारत की आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए एक अनिवार्य स्तंभ है। IRDAI के सक्रिय विनियमन और सरकार की विभिन्न योजनाओं ने इसकी पहुंच का विस्तार किया है। भविष्य में, प्रौद्योगिकी (Insurtech), सरल उत्पादों और बेहतर ग्राहक सेवा के माध्यम से बीमा पैठ को बढ़ाना देश के लिए एक प्रमुख प्राथमिकता होगी।
मुद्रा (Money):
अर्थ, कार्य, प्रकार और आपूर्ति
परिचय: मुद्रा क्या है?
मुद्रा कोई भी ऐसी वस्तु है जिसे विनिमय के माध्यम (Medium of Exchange), मूल्य के मापक (Measure of Value), मूल्य के संचय (Store of Value) और स्थगित भुगतानों के मान (Standard of Deferred Payments) के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।
इसके उदय से पहले, समाज वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System) पर निर्भर था, जहाँ वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान सीधे अन्य वस्तुओं और सेवाओं से किया जाता था (जैसे, एक किलो गेहूं के बदले दो लीटर दूध)। इस प्रणाली में आवश्यकताओं के दोहरे संयोग (Double Coincidence of Wants) की कमी, मूल्य की एक सामान्य इकाई का अभाव और मूल्य को संग्रहीत करने में कठिनाई जैसी कई समस्याएं थीं। मुद्रा ने इन सभी समस्याओं का समाधान किया।
मुद्रा के कार्य (Functions of Money)
मुद्रा के कार्यों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
1. प्राथमिक कार्य (Primary Functions):
- विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange): यह मुद्रा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। यह खरीदने और बेचने की प्रक्रिया को अलग करता है, जिससे व्यापार सुगम हो जाता है। आपको अपनी वस्तु के लिए एक ऐसा खरीदार खोजने की जरूरत नहीं है जिसके पास वह वस्तु भी हो जो आप चाहते हैं।
- मूल्य का मापक (Measure of Value or Unit of Account): मुद्रा सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को मापने के लिए एक सामान्य इकाई के रूप में कार्य करती है। हम हर चीज की कीमत रुपये, डॉलर या यूरो में माप सकते हैं, जिससे उनकी तुलना करना आसान हो जाता है।
2. गौण कार्य (Secondary Functions):
- स्थगित भुगतानों का मान (Standard of Deferred Payments): मुद्रा भविष्य में किए जाने वाले भुगतानों (जैसे ऋण, वेतन, पेंशन) के लिए एक मानक के रूप में काम करती है। इसका मूल्य अपेक्षाकृत स्थिर रहता है, जिससे उधार लेना और देना संभव हो पाता है।
- मूल्य का संचय (Store of Value): आप धन या संपत्ति को मुद्रा के रूप में संग्रहीत कर सकते हैं। यह वस्तुओं की तरह जल्दी खराब नहीं होती है, हालांकि मुद्रास्फीति समय के साथ इसकी क्रय शक्ति को कम कर सकती है।
3. आकस्मिक कार्य (Contingent Functions):
- साख का आधार (Basis of Credit): आधुनिक बैंकिंग प्रणाली मुद्रा के आधार पर ही साख (Credit) का निर्माण करती है।
- राष्ट्रीय आय के वितरण में सहायक: मुद्रा के माध्यम से ही उत्पादन के विभिन्न कारकों (भूमि, श्रम, पूंजी) को उनका प्रतिफल (लगान, मजदूरी, ब्याज) देना संभव होता है।
मुद्रा के प्रकार (Types of Money)
- आदेश मुद्रा (Fiat Money):
- यह वह मुद्रा है जिसका अपना कोई आंतरिक मूल्य नहीं होता, लेकिन सरकार के आदेश या ‘आदेश’ (Fiat) द्वारा इसे कानूनी निविदा (Legal Tender) घोषित किया जाता है।
- सभी आधुनिक कागज के नोट और सिक्के फिएट मनी के उदाहरण हैं। लोग इन्हें स्वीकार करते हैं क्योंकि सरकार ने इन्हें भुगतान के माध्यम के रूप में अधिकृत किया है।
- साख मुद्रा (Fiduciary Money):
- यह वह मुद्रा है जिसका मूल्य जारीकर्ता और प्राप्तकर्ता के बीच विश्वास (Trust) पर आधारित होता है।
- चेक (Cheque) और डिमांड ड्राफ्ट इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। इन्हें स्वीकार करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, यह प्राप्तकर्ता की इच्छा पर निर्भर करता है।
- बैंक मुद्रा (Bank Money):
- यह वाणिज्यिक बैंकों द्वारा अपनी जमा राशि के आधार पर बनाई गई साख है। बैंकों में मांग जमा (Demand Deposits) को बैंक मुद्रा माना जाता है।
- निकट मुद्रा (Near Money):
- ये अत्यधिक तरल (Highly Liquid) वित्तीय संपत्तियां हैं जिन्हें बहुत आसानी से और जल्दी से मुद्रा में बदला जा सकता है, लेकिन ये सीधे विनिमय के माध्यम के रूप में काम नहीं करतीं। जैसे – ट्रेजरी बिल, सरकारी बॉन्ड।
मुद्रा का विकास – आधुनिक रूप
- प्लास्टिक मुद्रा (Plastic Money): क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड।
- इलेक्ट्रॉनिक मुद्रा (Electronic Money): डिजिटल रूप से संग्रहीत धन जिसका उपयोग NEFT, RTGS, IMPS के माध्यम से लेन-देन के लिए किया जाता है।
- क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency): जैसे बिटकॉइन, एथेरियम। ये विकेंद्रीकृत डिजिटल मुद्राएं हैं जो क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करती हैं। भारत में, यह कानूनी निविदा नहीं है, लेकिन सरकार ने इस पर कर लगाकर इसे एक परिसंपत्ति के रूप में विनियमित किया है।
- सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (Central Bank Digital Currency – CBDC):
- यह किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी की गई मुद्रा का एक डिजिटल रूप है।
- भारत में RBI ने इसे “डिजिटल रुपया” या “e₹” के रूप में लॉन्च किया है।
- यह क्रिप्टोकरेंसी से अलग है क्योंकि यह केंद्रीकृत है और RBI द्वारा समर्थित कानूनी निविदा है।
भारत में मुद्रा की आपूर्ति (Money Supply in India)
मुद्रा की आपूर्ति का अर्थ है किसी एक विशेष समय पर देश की जनता के पास उपलब्ध मुद्रा का कुल स्टॉक। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मुद्रा आपूर्ति को मापने के लिए चार संकेतकों का उपयोग करता है: M1, M2, M3, और M4.
- M1 (Narrow Money – संकीर्ण मुद्रा):
- M1 = C + DD + OD
- C = जनता के पास करेंसी (नोट और सिक्के)
- DD = वाणिज्यिक बैंकों के पास शुद्ध मांग जमा (Net Demand Deposits)
- OD = RBI के पास अन्य जमा राशियाँ
- यह मुद्रा का सबसे तरल (Most Liquid) रूप है, यानी इसे तुरंत लेन-देन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
- M1 = C + DD + OD
- M2:
- M2 = M1 + डाकघर बचत बैंकों में बचत जमा (Savings deposits with Post Office saving banks)
- M3 (Broad Money – व्यापक मुद्रा):
- M3 = M1 + वाणिज्यिक बैंकों की शुद्ध सावधि जमा (Net time deposits with the commercial banks)
- यह मुद्रा आपूर्ति का सबसे व्यापक और आमतौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला माप है। इसे “कुल मौद्रिक संसाधन” (Aggregate Monetary Resources) भी कहा जाता है।
- M4:
- M4 = M3 + डाकघर बचत संगठनों के पास कुल जमा (राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्रों को छोड़कर)
- यह सबसे कम तरल (Least Liquid) माप है।
तरलता का क्रम: M1 > M2 > M3 > M4
भारत में मुद्रा जारी करना
- ₹1 का नोट और सभी सिक्के: इन्हें भारत सरकार के वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) द्वारा जारी किया जाता है। ₹1 के नोट पर वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं।
- ₹2 और उससे अधिक मूल्य के सभी करेंसी नोट: इन्हें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किया जाता है, और इन पर RBI गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं।
निष्कर्ष
मुद्रा वस्तु विनिमय की बाधाओं को दूर करने वाले एक साधारण उपकरण से विकसित होकर आज आर्थिक नीति का एक शक्तिशाली साधन बन गई है। RBI मौद्रिक नीति के माध्यम से मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करके मुद्रास्फीति, आर्थिक विकास और ब्याज दरों जैसे मैक्रोइकॉनॉमिक चरों को प्रभावित करता है। डिजिटल क्रांति के साथ, मुद्रा का रूप लगातार बदल रहा है, जो भविष्य में वित्तीय परिदृश्य को और भी रोचक बना देगा।
शेयर बाज़ार (Share Market):
संरचना, कार्य और भूमिका
परिचय: शेयर बाज़ार क्या है?
शेयर बाज़ार एक संगठित बाज़ार है जहाँ सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों (Publicly Listed Companies) के शेयरों (Shares) की खरीद-बिक्री होती है।
- शेयर क्या है? एक ‘शेयर’ किसी कंपनी में आंशिक स्वामित्व (Ownership) का प्रतिनिधित्व करता है। जब आप किसी कंपनी का शेयर खरीदते हैं, तो आप उस कंपनी के एक बहुत छोटे हिस्से के मालिक बन जाते हैं।
सरल शब्दों में, शेयर बाज़ार एक ऐसा मंच है जो उन कंपनियों को जोड़ता है जिन्हें अपने विस्तार और विकास के लिए धन (पूंजी) की आवश्यकता होती है, और उन निवेशकों (Investors) को जिनके पास अतिरिक्त धन है और वे उसे लाभ कमाने के लिए निवेश करना चाहते हैं।
शेयर बाज़ार की संरचना और कार्यप्रणाली
भारत में शेयर बाज़ार को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:
1. प्राथमिक बाज़ार (Primary Market):
- यह वह बाज़ार है जहाँ कोई कंपनी पहली बार (for the first time) अपने शेयर सीधे निवेशकों को जारी करके धन जुटाती है। इसे नया निर्गम बाज़ार (New Issue Market) भी कहते हैं।
- जब कोई कंपनी पहली बार अपने शेयर आम जनता को खरीदने के लिए पेश करती है, तो इस प्रक्रिया को आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (Initial Public Offering – IPO) कहा जाता है।
- उद्देश्य: IPO के माध्यम से जुटाई गई धनराशि सीधे कंपनी के पास जाती है, जिसका उपयोग वह अपने विस्तार, कर्ज चुकाने या नई परियोजनाओं में करती है।
2. द्वितीयक बाज़ार (Secondary Market):
- एक बार जब शेयर IPO के माध्यम से प्राथमिक बाज़ार में जारी हो जाते हैं, तो उनका कारोबार द्वितीयक बाज़ार में होता है।
- यह वह बाज़ार है जिसे हम आम तौर पर “शेयर बाज़ार” के रूप में जानते हैं। यहाँ निवेशक एक-दूसरे से पहले से जारी किए गए शेयरों की खरीद-बिक्री करते हैं।
- इस बाज़ार में होने वाले लेन-देन से प्राप्त धन निवेशकों के बीच रहता है, यह सीधे कंपनी के पास नहीं जाता है।
- उद्देश्य: द्वितीयक बाज़ार का मुख्य कार्य शेयरों को तरलता (Liquidity) प्रदान करना है, यानी निवेशकों को यह सुविधा देना कि वे जब चाहें अपने शेयर बेच सकें और नकदी प्राप्त कर सकें। भारत में यह कारोबार स्टॉक एक्सचेंजों के माध्यम से होता है।
भारत में शेयर बाज़ार के प्रमुख घटक
- स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchanges):
- यह एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ शेयरों का व्यवस्थित तरीके से कारोबार होता है।
- बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (Bombay Stock Exchange – BSE): 1875 में स्थापित, यह एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है।
- नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (National Stock Exchange – NSE): 1992 में स्थापित, यह व्यापार की मात्रा के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है।
- स्टॉक सूचकांक (Stock Indices):
- सूचकांक एक संकेतक होता है जो स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध कुछ प्रमुख शेयरों के प्रदर्शन को मापकर पूरे बाज़ार की दिशा और भावना को दर्शाता है।
- सेंसेक्स (Sensex): यह BSE का बेंचमार्क सूचकांक है, जो BSE पर सूचीबद्ध 30 सबसे बड़ी और सबसे सक्रिय रूप से कारोबार करने वाली कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाता है।
- निफ्टी 50 (Nifty 50): यह NSE का बेंचमार्क सूचकांक है, जो NSE पर सूचीबद्ध 50 सबसे बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाता है।
- नियामक (Regulator) – SEBI (सेबी):
- भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Securities and Exchange Board of India – SEBI): सेबी भारतीय पूंजी बाज़ार का सर्वोच्च नियामक है।
- मुख्य कार्य: निवेशकों के हितों की रक्षा करना, शेयर बाज़ार के विकास को बढ़ावा देना, और बाज़ार में होने वाली धोखाधड़ी (जैसे- इनसाइडर ट्रेडिंग) को रोकना। सेबी को “बाज़ार का प्रहरी” (Watchdog of the Market) भी कहा जाता है।
- मध्यस्थ (Intermediaries):
- स्टॉक ब्रोकर्स: ये SEBI के साथ पंजीकृत सदस्य होते हैं जो निवेशकों को स्टॉक एक्सचेंज पर शेयर खरीदने और बेचने में सक्षम बनाते हैं (जैसे- Zerodha, Angel One, ICICI Direct)।
- डिपॉजिटरी और डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट्स (DPs): डिपॉजिटरी (भारत में NSDL और CDSL) निवेशकों के शेयरों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में सुरक्षित रखती हैं। DP (जैसे बैंक और ब्रोकर्स) डिपॉजिटरी और निवेशक के बीच की कड़ी होते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण शब्दावली
- डीमैट खाता (Demat Account): यह एक इलेक्ट्रॉनिक खाता है जिसमें आपके द्वारा खरीदे गए शेयरों को रखा जाता है, ठीक उसी तरह जैसे बैंक खाते में पैसे रखे जाते हैं।
- बुल मार्केट (तेड़िया/Bull Market): यह एक ऐसी स्थिति है जब शेयर बाज़ार में लगातार तेज़ी (Growth) आ रही हो, कीमतें बढ़ रही हों और निवेशकों में आशावाद हो।
- बियर मार्केट (मंदड़िया/Bear Market): यह एक ऐसी स्थिति है जब बाज़ार में लगातार गिरावट (Decline) हो रही हो, कीमतें घट रही हों और निवेशकों में निराशावाद हो।
अर्थव्यवस्था में शेयर बाज़ार की भूमिका
- पूंजी निर्माण (Capital Formation): यह कंपनियों को जनता से दीर्घकालिक पूंजी जुटाने में मदद करता है, जिससे औद्योगिक विकास और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
- आर्थिक बैरोमीटर (Economic Barometer): शेयर बाज़ार के सूचकांकों में उतार-चढ़ाव अक्सर देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य और भविष्य की दिशा का एक विश्वसनीय संकेतक माने जाते हैं।
- बचत का निवेश में रूपांतरण: यह आम लोगों की छोटी-छोटी बचत को उत्पादक निवेशों की ओर मोड़ता है, जिससे धन का अधिक कुशल उपयोग होता है।
- कॉर्पोरेट गवर्नेंस: सूचीबद्ध कंपनियों को सेबी के कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है, जिससे उनमें पारदर्शिता और बेहतर कॉर्पोरेट प्रशासन को बढ़ावा मिलता है।
जोखिम और सावधानियाँ
- शेयर बाज़ार में निवेश बाज़ार के जोखिमों के अधीन होता है। कंपनियों के खराब प्रदर्शन, आर्थिक मंदी या राजनीतिक अस्थिरता के कारण शेयरों की कीमतें गिर सकती हैं, जिससे निवेशकों को नुकसान हो सकता है।
- इसलिए, निवेश करने से पहले गहन शोध और विश्लेषण करना, अपनी जोखिम क्षमता का आकलन करना, और एक विविध पोर्टफोलियो (विभिन्न क्षेत्रों और कंपनियों में निवेश फैलाना) बनाना महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
शेयर बाज़ार किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग है। यह न केवल पूंजी निर्माण का एक शक्तिशाली माध्यम है, बल्कि यह आर्थिक स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक भी है। सेबी जैसे एक मजबूत नियामक की उपस्थिति यह सुनिश्चित करती है कि बाज़ार निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम करे, जिससे निवेशकों का विश्वास बना रहे और अर्थव्यवस्था के विकास में निरंतर योगदान हो।