राजकोषीय नीति (Fiscal Policy)

परिभाषा:
राजकोषीय नीति सरकार की वह नीति है जो अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए सरकारी खर्च (Government Expenditure) और कराधान (Taxation) के उपयोग से संबंधित है।

यह सरकार की आय (revenue) और व्यय (expenditure) की नीति है, जिसे वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) द्वारा तैयार और कार्यान्वित किया जाता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ वार्षिक ‘बजट’ (Budget) होता है।

मुख्य उद्देश्य:
इसका समग्र उद्देश्य देश में स्थिरता के साथ आर्थिक विकास (economic growth with stability) को बढ़ावा देना है।


राजकोषीय नीति के उद्देश्य (Objectives of Fiscal Policy)

  1. आर्थिक विकास को बढ़ावा देना (Promoting Economic Growth):
    • सरकार बुनियादी ढाँचे (जैसे- सड़कें, बंदरगाह) और सामाजिक क्षेत्रों (शिक्षा, स्वास्थ्य) पर खर्च करके आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करती है।
  2. पूर्ण रोजगार (Full Employment):
    • सार्वजनिक व्यय के माध्यम से, विशेष रूप से मंदी के समय में, सरकार रोजगार के अवसर पैदा करने का प्रयास करती है (जैसे- मनरेगा)।
  3. मूल्य स्थिरता (Price Stability) / मुद्रास्फीति पर नियंत्रण:
    • यदि अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति (महंगाई) बहुत अधिक है, तो सरकार करों में वृद्धि कर सकती है (ताकि लोगों के पास खर्च करने के लिए कम पैसा बचे) और सार्वजनिक व्यय में कमी कर सकती है।
    • यदि मंदी (recession) है, तो सरकार करों में कमी और सार्वजनिक व्यय में वृद्धि करती है।
  4. धन और आय की असमानता को कम करना:
    • सरकार अमीरों पर अधिक कर (progressiv लगाकर और उस राजस्व का उपयोग गरीबों के लिए सब्सिडी और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर खर्च करके आय के पुनर्वितरण का प्रयास करती है।
  5. संसाधनों का कुशल आवंटन:
    • सरकार कर छूट (tax rebates) और सब्सिडी के माध्यम से वांछनीय क्षेत्रों (जैसे- नवीकरणीय ऊर्जा) में निवेश को प्रोत्साहित करती है और अवांछनीय वस्तुओं (जैसे- तंबाकू, शराब) पर उच्च कर लगाकर उनके उपभोग को हतोत्साहित करती है।

राजकोषीय नीति के उपकरण (Instruments of Fiscal Policy)

सरकार अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए मुख्य रूप से चार उपकरणों का उपयोग करती है:

उपकरणविवरण
1. कराधान (Taxation)* कर लगाना: यह सरकार की आय का मुख्य स्रोत है। कर दो प्रकार के होते हैं:<br> (क) प्रत्यक्ष कर (Direct Tax): वह कर जो उसी व्यक्ति द्वारा चुकाया जाता है जिस पर यह लगाया जाता है। इसका भार हस्तांतरित नहीं किया जा सकता (जैसे – आयकर, निगम कर)।<br> (ख) अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax): वह कर जो लगाया तो किसी और (निर्माता/विक्रेता) पर जाता है, लेकिन उसका भार अंततः उपभोक्ता पर पड़ता है (जैसे – GST, सीमा शुल्क)।
2. सार्वजनिक व्यय (Public Expenditure)* खर्च करना: सरकार द्वारा किए जाने वाले सभी खर्च। यह दो प्रकार का होता है:<br> (क) राजस्व व्यय (Revenue Expenditure): वह खर्च जिससे कोई संपत्ति नहीं बनती, जैसे – वेतन, पेंशन, सब्सिडी, ब्याज भुगतान।<br> (ख) पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure): वह खर्च जिससे संपत्ति का निर्माण होता है या देनदारियों में कमी आती है, जैसे – सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों का निर्माण, ऋणों की अदायगी।
3. सार्वजनिक ऋण (Public Debt)* उधार लेना: जब सरकार का खर्च उसकी आय से अधिक हो जाता है (घाटे की स्थिति में), तो वह इस कमी को पूरा करने के लिए आंतरिक (देश के भीतर) या बाहरी (विदेशों से) स्रोतों से ऋण लेती है।
4. बजटीय प्रबंधन (Budgetary Management)* सरकार अपनी राजकोषीय नीति को वार्षिक बजट के माध्यम से प्रस्तुत और कार्यान्वित करती है। बजट या तो संतुलित (balanced), अधिशेष (surplus), या घाटे (deficit) का हो सकता है। विकासशील देशों में आमतौर पर घाटे का बजट अपनाया जाता है।

राजकोषीय नीति के प्रकार (Types of Fiscal Policy)

परिस्थिति के अनुसार सरकार तीन प्रकार की राजकोषीय नीति अपना सकती है:

1. विस्तारवादी राजकोषीय नीति (Expansionary Fiscal Policy):

2. संकुचनकारी राजकोषीय नीति (Contractionary/Restrictive Fiscal Policy):

3. तटस्थ राजकोषीय नीति (Neutral Fiscal Policy):


महत्वपूर्ण राजकोषीय अवधारणाएँ

सरकार की वित्तीय स्थिति को समझने के लिए इन घाटे (deficit) की अवधारणाओं को जानना आवश्यक है:

निष्कर्ष:
राजकोषीय नीति एक शक्तिशाली उपकरण है जिसका उपयोग सरकार अर्थव्यवस्था को स्थिर करने, विकास को बढ़ावा देने और सामाजिक कल्याण के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए करती है। कराधान और सार्वजनिक व्यय में सही संतुलन बनाकर, सरकार आर्थिक उतार-चढ़ाव को कम कर सकती है और एक टिकाऊ और समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।


सार्वजनिक वित्त (Public Finance)

सार्वजनिक वित्त, अर्थशास्त्र की वह शाखा है जो सरकार की आय (income) और व्यय (expenditure) का अध्ययन करती है। यह इस बात का विश्लेषण करता है कि सरकार जनता की जरूरतों को पूरा करने और देश की अर्थव्यवस्था को प्रबंधित करने के लिए अपने वित्तीय संसाधनों को कैसे जुटाती है और खर्च करती है।


सरकारी बजट (Government Budget)

परिभाषा:
बजट एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के लिए सरकार की अनुमानित प्राप्तियों (estimated receipts) और अनुमानित व्यय (estimated expenditures) का एक वार्षिक वित्तीय विवरण (Annual Financial Statement) होता है।

यह सिर्फ आय-व्यय का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह सरकार की नीतियों, उद्देश्यों और प्राथमिकताओं को भी दर्शाता है।

संवैधानिक प्रावधान:


सरकारी बजट की संरचना (Structure of the Government Budget)

सरकारी बजट के मुख्य रूप से दो भाग होते हैं:

1. बजट प्राप्तियाँ (Budget Receipts): एक वित्तीय वर्ष में सरकार की सभी स्रोतों से अनुमानित मौद्रिक प्राप्तियाँ।
2. बजट व्यय (Budget Expenditure): एक वित्तीय वर्ष में सरकार का अनुमानित खर्च।

इन दोनों को आगे राजस्व (Revenue) और पूंजीगत (Capital) श्रेणियों में विभाजित किया गया है।

(This is a placeholder for a diagram that would visually represent the structure below)

A. बजट प्राप्तियाँ (Budget Receipts)

बजट प्राप्तियों को दो मुख्य भागों में बांटा गया है:

1. राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts):

2. पूंजीगत प्राप्तियाँ (Capital Receipts):


B. बजट व्यय (Budget Expenditure)

बजट व्यय को भी दो मुख्य भागों में बांटा गया है:

1. राजस्व व्यय (Revenue Expenditure):

2. पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure):

नोट: पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) को अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा माना जाता है, क्योंकि यह भविष्य में उत्पादकता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है, जबकि एक उच्च राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) (विशेष रूप से ब्याज और सब्सिडी पर) अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल सकता है।


बजट के प्रकार (Types of Budget)

प्राप्तियों और व्यय के संतुलन के आधार पर बजट तीन प्रकार का हो सकता है:

  1. संतुलित बजट (Balanced Budget):
    • कुल अनुमानित प्राप्तियाँ = कुल अनुमानित व्यय
    • यह आर्थिक रूप से एक आदर्श स्थिति है, लेकिन विकासशील देशों में इसे अपनाना मुश्किल होता है।
  2. अधिशेष बजट (Surplus Budget):
    • कुल अनुमानित प्राप्तियाँ > कुल अनुमानित व्यय
    • यह मुद्रास्फीति (महंगाई) के समय उपयोगी होता है, क्योंकि सरकार अर्थव्यवस्था से अतिरिक्त पैसा निकाल लेती है।
  3. घाटे का बजट (Deficit Budget):
    • कुल अनुमानित प्राप्तियाँ < कुल अनुमानित व्यय
    • भारत जैसे विकासशील देशों में यह सबसे आम बजट है। सरकार जानबूझकर अपनी आय से अधिक खर्च करती है ताकि आर्थिक विकास को गति दे सके। इस घाटे को उधार लेकर पूरा किया जाता है।

बजटीय घाटे की अवधारणाएँ (Concepts of Budgetary Deficit)

1. राजस्व घाटा (Revenue Deficit)

परिभाषा:
राजस्व घाटा, सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियों (Total Revenue Receipts) पर उसके कुल राजस्व व्यय (Total Revenue Expenditure) की अधिकता को दर्शाता है।

सूत्र:
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ

यह क्या दर्शाता है?

खराब क्यों माना जाता है?

राजस्व घाटे को कम करने के उपाय:


2. राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)

यह सरकार की वित्तीय स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक संकेतक है।

परिभाषा:
राजकोषीय घाटा, एक वित्तीय वर्ष में सरकार की कुल उधारी आवश्यकताओं (Total Borrowing Requirements) को दर्शाता है। यह सरकार के कुल व्यय (Total Expenditure) और उसकी कुल ऋण-भिन्न प्राप्तियों (Total Non-Debt Receipts) के बीच का अंतर है।

सूत्र:
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – (राजस्व प्राप्तियाँ + ऋण-भिन्न पूंजीगत प्राप्तियाँ)
या
सरल भाषा में, राजकोषीय घाटा = सरकार द्वारा लिया गया कुल उधार (Total Borrowings)

यह क्या दर्शाता है?

खराब क्यों माना जाता है?


3. प्राथमिक घाटा (Primary Deficit)

परिभाषा:
प्राथमिक घाटा, चालू वर्ष के राजकोषीय घाटे और पिछले वर्षों के ऋणों पर किए जाने वाले ब्याज भुगतान (Interest Payments) के बीच का अंतर है।

सूत्र:
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान

यह क्या दर्शाता है?

इसका महत्व:


तीनों घाटों में संबंध


भारत में कर प्रणाली (Tax System in India)

कर (Tax) क्या है?
कर एक अनिवार्य वित्तीय शुल्क या भुगतान है जो किसी सरकार द्वारा किसी व्यक्ति, संस्था या संपत्ति पर सार्वजनिक व्यय (जैसे- सड़क, स्कूल, रक्षा) को निधि देने के लिए लगाया जाता है। कर का भुगतान न करना कानूनन अपराध है।

भारत में एक सु-संरचित त्रि-स्तरीय कर प्रणाली है:

  1. केंद्र सरकार: राष्ट्रीय स्तर पर कर लगाती और वसूलती है।
  2. राज्य सरकारें: राज्य स्तर पर कर लगाती और वसूलती हैं।
  3. स्थानीय निकाय (नगर पालिका, पंचायत): स्थानीय स्तर पर कर लगाते हैं (जैसे- संपत्ति कर)।

मुख्य रूप से, भारत में करों को दो व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

  1. प्रत्यक्ष कर (Direct Tax)
  2. अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax)

1. प्रत्यक्ष कर (Direct Tax)

परिभाषा:
प्रत्यक्ष कर वह कर है जो सीधे उसी व्यक्ति या संस्था द्वारा चुकाया जाता है जिस पर यह कानूनी रूप से लगाया गया है

प्रकृति:

उदाहरण:

प्रत्यक्ष कर का नामकौन लगाता है?किस पर लगता है?
आयकर (Income Tax)केंद्र सरकारव्यक्तियों की आय पर (वेतन, व्यवसाय, ब्याज से)।
निगम कर (Corporate Tax)केंद्र सरकारकंपनियों के लाभ (profits) पर।
पूंजीगत लाभ कर (Capital Gains Tax)केंद्र सरकारसंपत्ति (शेयर, मकान) बेचने से होने वाले लाभ पर।
**प्रतिभूति लेनदेन कर (Securities Transaction Tax – STT)केंद्र सरकारशेयर बाजार में शेयरों की खरीद-बिक्री पर।
संपत्ति कर (Property Tax) / गृह करस्थानीय निकायअचल संपत्ति (मकान, जमीन) के मूल्य पर।

प्रशासन:


2. अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax)

परिभाषा:
अप्रत्यक्ष कर वह कर है जो वस्तुओं के उत्पादन और बिक्री तथा सेवाओं के प्रदान पर लगाया जाता है। इसका भार अंतिम उपभोक्ता (Consumer) द्वारा वहन किया जाता है।

प्रकृति:

GST-पूर्व के प्रमुख अप्रत्यक्ष कर (अब GST में समाहित):

प्रशासन:


वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax – GST)

GST भारत के अप्रत्यक्ष कर सुधार के इतिहास का सबसे बड़ा कदम है। इसे 1 जुलाई, 2017 को लागू किया गया।

GST में कौन-कौन से अप्रत्यक्ष कर शामिल हुए:
उपरोक्त सूची में वर्णित लगभग सभी प्रमुख अप्रत्यक्ष कर (जैसे- उत्पाद शुल्क, सेवा कर, वैट) GST में समाहित हो गए।

कौन-से कर GST से बाहर हैं:


प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर में मुख्य अंतर

आधारप्रत्यक्ष कर (Direct Tax)अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax)
भार का हस्तांतरणइसका भार हस्तांतरित नहीं किया जा सकताइसका भार उपभोक्ता पर हस्तांतरित कर दिया जाता है
किस पर लगता हैव्यक्ति और कंपनियों की आय और धन पर।वस्तुओं और सेवाओं पर।
भुगतानभुगतान सीधे सरकार को किया जाता है।भुगतान उपभोक्ता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से (विक्रेता के माध्यम से) सरकार को किया जाता है।
प्रकृतिसामान्यतः प्रगतिशील (Progressive) होता है।सामान्यतः प्रतिगामी (Regressive) होता है।
जागरूकताकरदाता को सीधे पता होता है कि वह कर दे रहा है।करदाता को पता नहीं चलता क्योंकि यह वस्तु की कीमत में शामिल होता है।
कर चोरीकर चोरी संभव है और अपेक्षाकृत अधिक होती है।कर चोरी कठिन होती है।
उदाहरणआयकर, निगम कर, संपत्ति कर।GST, सीमा शुल्क, (पुराने: वैट, सेवा कर)।

निष्कर्ष:
एक अच्छी कर प्रणाली वह मानी जाती है जो सरल, पारदर्शी हो और जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के बीच एक संतुलन हो। भारत सरकार GST के माध्यम से अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सरल बनाने और प्रत्यक्ष करों (जैसे आयकर) के आधार को व्यापक बनाने का निरंतर प्रयास कर रही है ताकि कर राजस्व को बढ़ाया जा सके और एक न्यायपूर्ण कर प्रणाली स्थापित की जा सके।


वित्त आयोग (The Finance Commission)

परिभाषा:
वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय (Constitutional Body) है जिसका गठन अनुच्छेद 280 के तहत, भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष (या आवश्यकतानुसार उससे पहले) किया जाता है।

मुख्य भूमिका:
इसका प्राथमिक कार्य राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) को संतुलित करना है। सरल शब्दों में, यह सिफारिश करता है कि केंद्र सरकार द्वारा एकत्र किए गए करों का कितना हिस्सा राज्यों को दिया जाना चाहिए और राज्यों के बीच उस हिस्से को कैसे बांटा जाना चाहिए।


केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों में वित्त आयोग की भूमिका

वित्त आयोग की सिफारिशें केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों के दो प्रमुख आयामों को आकार देती हैं:

  1. राजस्व का ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज वितरण (Vertical and Horizontal Devolution of Revenue)
  2. राज्यों को सहायता अनुदान (Grants-in-aid to the States)

आइए, इन्हें विस्तार से समझते हैं:

1. राजस्व का वितरण

केंद्र सरकार कई प्रमुख करों (जैसे- आयकर, निगम कर, GST) को एकत्र करती है। वित्त आयोग यह तय करता है कि इस “विभाज्य पूल” (Divisible Pool), यानी वह कुल कर राजस्व जिसे बांटा जा सकता है, का वितरण कैसे होगा।

(क) ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण (Vertical Devolution):

(ख) क्षैतिज हस्तांतरण (Horizontal Devolution):

मानदंड (Criterion)भारांश (%)इसका उद्देश्य क्या है?
आय-अंतर (Income Distance)45%यह सुनिश्चित करना कि कम प्रति व्यक्ति आय वाले गरीब राज्यों को अधिक हिस्सा मिले। (समता)
जनसंख्या (Population – 2011)15%बड़ी आबादी वाले राज्यों की उच्च व्यय आवश्यकताओं को पूरा करना। (आवश्यकता)
क्षेत्रफल (Area)15%बड़े क्षेत्रफल वाले राज्यों की उच्च प्रशासनिक लागतों को समायोजित करना। (आवश्यकता)
वन और पारिस्थितिकी10%जिन राज्यों ने अपने वन क्षेत्र को बनाए रखा है, उन्हें पुरस्कृत करना। (पर्यावरण)
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन12.5%जिन राज्यों ने अपनी जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, उन्हें पुरस्कृत करना। (कुशलता)
कर प्रयास (Tax Effort)2.5%जिन राज्यों ने अधिक कर राजस्व जुटाने में कुशलता दिखाई है, उन्हें पुरस्कृत करना। (कुशलता)

2. राज्यों को सहायता अनुदान (Grants-in-aid to the States)

करों के हिस्से के अलावा, संविधान राज्यों को सहायता अनुदान प्रदान करने की भी व्यवस्था करता है। वित्त आयोग इन अनुदानों के सिद्धांतों पर भी सिफारिश करता है।


वित्त आयोग का महत्व

  1. सहकारी संघवाद का स्तंभ: यह केंद्र-राज्य संबंधों में विश्वास और सहयोग को बढ़ावा देता है, जिससे सहकारी संघवाद की भावना मजबूत होती है।
  2. राजकोषीय असंतुलन को कम करना: भारत में केंद्र के पास राजस्व जुटाने के स्रोत अधिक हैं, जबकि राज्यों के पास विकासात्मक खर्च की जिम्मेदारियाँ अधिक हैं। वित्त आयोग इस ऊर्ध्वाधर असंतुलन (Vertical Imbalance) को दूर करने का प्रयास करता है।
  3. क्षेत्रीय समानता: यह क्षैतिज हस्तांतरण के अपने फार्मूले के माध्यम से विभिन्न राज्यों के बीच वित्तीय असमानताओं को कम करने का प्रयास करता है, जिससे संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलता है।
  4. राजकोषीय अनुशासन को बढ़ावा देना: ‘कर प्रयास’ और ‘जनसांख्यिकीय प्रदर्शन’ जैसे मानदंडों को शामिल करके, यह राज्यों को बेहतर राजकोषीय प्रबंधन और जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित करता है।
  5. विशेष जरूरतों का समाधान: यह उन राज्यों की विशेष समस्याओं (जैसे सीमावर्ती राज्य, पहाड़ी राज्य) को पहचानता है और उनके लिए अतिरिक्त अनुदान की सिफारिश कर सकता है।

निष्कर्ष:
वित्त आयोग सिर्फ एक वित्तीय वितरक निकाय नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक मध्यस्थ है जो भारतीय संघ की वित्तीय एकता और स्थिरता को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी सिफारिशें यह सुनिश्चित करती हैं कि केंद्र और राज्य, दोनों सरकारें अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों से लैस हों, जिससे देश का समग्र और संतुलित विकास संभव हो सके।


सार्वजनिक ऋण (Public Debt)

परिभाषा:
सार्वजनिक ऋण, सरकार द्वारा अपनी बजटीय जरूरतों को पूरा करने के लिए लिए गए कुल ऋण या उधार (Total Borrowings) को संदर्भित करता है। जब सरकार का कुल व्यय (Total Expenditure) उसकी कुल आय (Total Revenue) से अधिक हो जाता है (यानी जब राजकोषीय घाटा – Fiscal Deficit होता है), तो इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को ऋण लेना पड़ता है।

यह ऋण केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों द्वारा लिया जा सकता है।


सार्वजनिक ऋण के प्रकार (Types of Public Debt)

सार्वजनिक ऋण को मुख्य रूप से दो आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. स्रोत के आधार पर (Based on Source):

(क) आंतरिक ऋण (Internal Debt):

(ख) बाह्य ऋण (External Debt):


2. अवधि के आधार पर (Based on Tenure):

(क) अल्पकालिक ऋण (Short-term Debt):

(ख) दीर्घकालिक ऋण (Long-term Debt):


सरकार ऋण क्यों लेती है? (Reasons for Public Debt)

  1. राजकोषीय घाटे का वित्तपोषण: यह सबसे मुख्य कारण है। जब व्यय आय से अधिक होता है, तो उस अंतर (घाटे) को भरने के लिए ऋण लेना आवश्यक हो जाता है।
  2. आर्थिक विकास के लिए निवेश:
    • सरकार बुनियादी ढाँचे (सड़क, बंदरगाह, बिजली संयंत्र), शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे उत्पादक क्षेत्रों में निवेश करने के लिए ऋण लेती है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
  3. मंदी से निपटना:
    • आर्थिक मंदी के दौरान, सरकार विस्तारवादी राजकोषीय नीति के तहत जानबूझकर खर्च बढ़ाती है ताकि अर्थव्यवस्था में मांग पैदा की जा सके। इस अतिरिक्त खर्च के लिए ऋण लिया जाता है।
  4. युद्ध या राष्ट्रीय आपातकाल:
    • युद्ध या प्राकृतिक आपदा जैसी अप्रत्याशित घटनाओं से निपटने के लिए अचानक होने वाले बड़े खर्चों को पूरा करने के लिए।
  5. सामाजिक कल्याण कार्यक्रम:
    • सब्सिडी, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं को निधि देने के लिए।

सार्वजनिक ऋण के प्रभाव (Impacts of Public Debt)

सार्वजनिक ऋण के सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रभाव हो सकते हैं।

सकारात्मक प्रभाव:

  1. आर्थिक विकास: यदि ऋण का उपयोग उत्पादक निवेश (जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर) में किया जाता है, तो यह आर्थिक विकास को गति दे सकता है।
  2. मांग सृजन: मंदी के समय में यह कुल मांग को बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद करता है।
  3. बचत का उपयोग: यह जनता की बचत को सरकारी प्रतिभूतियों के माध्यम से एक उत्पादक दिशा में प्रवाहित करता है।

नकारात्मक प्रभाव:

  1. ब्याज का बोझ:
    • ऋण पर ब्याज का भुगतान सरकार के राजस्व व्यय का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन जाता है, जिससे विकास कार्यों के लिए कम पैसा बचता है।
  2. भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ:
    • वर्तमान पीढ़ी द्वारा लिए गए ऋण को चुकाने का बोझ अंततः भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ता है, जिन्हें उच्च करों का सामना करना पड़ सकता है।
  3. मुद्रास्फीति का खतरा:
    • यदि सरकार घाटे को पूरा करने के लिए RBI से बड़े पैमाने पर उधार लेती है (जिसे ‘घाटे का मुद्रीकरण’ कहते हैं), तो इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति बढ़ सकती है और उच्च मुद्रास्फीति पैदा हो सकती है।
  4. निजी निवेश में कमी (Crowding-out Effect):
    • जब सरकार बाजार से बड़ी मात्रा में उधार लेती है, तो ऋण के लिए उपलब्ध कुल बचत का एक बड़ा हिस्सा सरकार के पास चला जाता है। इससे ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, जिससे निजी कंपनियों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाता है और वे निवेश कम कर देती हैं।
  5. विदेशी निर्भरता:
    • अत्यधिक बाह्य ऋण देश को बाहरी शक्तियों और संस्थानों के प्रति कमजोर बना सकता है।

भारत में सार्वजनिक ऋण की स्थिति

निष्कर्ष:
सार्वजनिक ऋण अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण राजकोषीय उपकरण है। इसकी वांछनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि ऋण का उपयोग किस लिए किया जा रहा है। यदि इसका उपयोग अनुत्पादक उपभोग (जैसे- सब्सिडी) के लिए किया जाता है, तो यह बोझ बन सकता है। लेकिन यदि इसका उपयोग उत्पादक पूंजी निर्माण के लिए किया जाता है, तो यह भविष्य के विकास की नींव रख सकता है।


मौद्रिक नीति (Monetary Policy)

परिभाषा:
मौद्रिक नीति किसी देश के केंद्रीय बैंक (Central Bank) द्वारा अपनाई गई वह नीति है, जिसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति (money supply), ऋण की उपलब्धता (availability of credit) और ब्याज दरों (interest rates) को नियंत्रित और विनियमित करना है।


मौद्रिक नीति के उद्देश्य (Objectives of Monetary Policy)

RBI अधिनियम के अनुसार, मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य “मूल्य स्थिरता बनाए रखना, और साथ ही विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखना” है।

इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  1. मूल्य स्थिरता / मुद्रास्फीति पर नियंत्रण (Price Stability / Controlling Inflation):
    • यह मौद्रिक नीति का सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिक उद्देश्य है।
    • RBI यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि मुद्रास्फीति (महंगाई) एक निर्धारित लक्ष्य के भीतर बनी रहे (वर्तमान में भारत में यह लक्ष्य 4% +/- 2% है, यानी 2% से 6% के बीच)।
  2. आर्थिक विकास को बढ़ावा देना (Promoting Economic Growth):
    • जब अर्थव्यवस्था में सुस्ती हो, तो RBI ब्याज दरों को कम करके और ऋण को सस्ता बनाकर निवेश और उपभोग को प्रोत्साहित करने का प्रयास करता है, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलती है।
  3. रोजगार सृजन (Employment Generation):
    • आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर, मौद्रिक नीति अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के नए अवसर पैदा करने में मदद करती है।
  4. विनिमय दर की स्थिरता (Exchange Rate Stability):
    • RBI विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करके भारतीय रुपये की विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

मौद्रिक नीति के उपकरण (Instruments of Monetary Policy)

RBI अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के उपकरणों का उपयोग करता है:

A. मात्रात्मक उपकरण (Quantitative Instruments)

ये उपकरण अर्थव्यवस्था में मुद्रा की कुल मात्रा (overall money supply) को प्रभावित करते हैं और सामान्य प्रकृति के होते हैं।

उपकरणविवरणवर्तमान प्रभाव (बढ़ाने पर)
1. रेपो रेट (Repo Rate)वह ब्याज दर जिस पर RBI, वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक (short-term) ऋण देता है।बैंक RBI से कम उधार लेंगे, जिससे उनके पास कम पैसा होगा और ऋण देना महंगा हो जाएगा → मुद्रा आपूर्ति घटती है। (संकुचनकारी)
2. रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate)वह ब्याज दर जो RBI, वाणिज्यिक बैंकों से अल्पकालिक जमा स्वीकार करने पर उन्हें देता है।बैंक अपना अतिरिक्त पैसा RBI के पास जमा करने के लिए प्रोत्साहित होंगे, जिससे बाजार में पैसा कम हो जाएगा → मुद्रा आपूर्ति घटती है। (संकुचनकारी)
3. बैंक दर (Bank Rate)वह ब्याज दर जिस पर RBI, वाणिज्यिक बैंकों को दीर्घकालिक (long-term) ऋण देता है।(रेपो रेट के समान प्रभाव)।
4. नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR)बैंकों की कुल जमाओं का वह प्रतिशत जो उन्हें अनिवार्य रूप से RBI के पास नकद रूप में रखना होता है। (इस पर बैंकों को कोई ब्याज नहीं मिलता)।बैंकों को RBI के पास अधिक पैसा रखना होगा, जिससे उनके पास ऋण देने के लिए कम पैसा बचेगा → मुद्रा आपूर्ति घटती है
5. सांविधिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR)बैंकों की कुल जमाओं का वह प्रतिशत जो उन्हें स्वयं के पास तरल संपत्तियों (जैसे- नकद, सोना, सरकारी प्रतिभूतियाँ) के रूप में रखना अनिवार्य है।बैंकों को अपने पास अधिक तरल संपत्ति रखनी होगी, जिससे वे ऋण के रूप में कम पैसा दे पाएंगे → मुद्रा आपूर्ति घटती है
6. खुले बाजार की क्रियाएँ (Open Market Operations – OMO)RBI द्वारा खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities – G-Secs) की खरीद-बिक्रीजब RBI प्रतिभूतियाँ बेचता है, तो वह बाजार से पैसा सोखता है → मुद्रा आपूर्ति घटती है।<br>जब RBI प्रतिभूतियाँ खरीदता है, तो वह बाजार में पैसा डालता है → मुद्रा आपूर्ति बढ़ती है

B. गुणात्मक / चयनात्मक उपकरण (Qualitative / Selective Instruments)

ये उपकरण अर्थव्यवस्था के कुछ विशेष क्षेत्रों (specific sectors) में ऋण के प्रवाह को निर्देशित या प्रतिबंधित करते हैं।


मौद्रिक नीति के प्रकार (Types of Monetary Policy)

अर्थव्यवस्था की स्थिति के आधार पर RBI दो प्रकार की मौद्रिक नीति अपना सकता है:

1. संकुचनकारी / कड़ी मौद्रिक नीति (Contractionary / Tight / Dear Money Policy):

2. विस्तारवादी / सस्ती मौद्रिक नीति (Expansionary / Easy / Cheap Money Policy):


मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC)

निष्कर्ष:
मौद्रिक नीति, राजकोषीय नीति के साथ मिलकर, देश के व्यापक आर्थिक प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। RBI इन उपकरणों का उपयोग करके मुद्रास्फीति, विकास और स्थिरता के बीच एक नाजुक संतुलन साधने का प्रयास करता है। MPC की स्थापना ने इस प्रक्रिया को और अधिक संस्थागत, पारदर्शी और जवाबदेह बनाया है।


भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI): संरचना, कार्य और भूमिका

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत का केंद्रीय बैंक है, जो देश की मौद्रिक और वित्तीय प्रणाली के केंद्र में स्थित है. इसकी स्थापना 1 अप्रैल, 1935 को भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के प्रावधानों के तहत की गई थी. शुरुआत में इसका मुख्यालय कोलकाता में था, जिसे 1937 में स्थायी रूप से मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया. 1949 में राष्ट्रीयकरण के बाद यह पूरी तरह से भारत सरकार के स्वामित्व में है.

संरचना

आरबीआई का कामकाज एक केंद्रीय निदेशक बोर्ड द्वारा शासित होता है, जिसकी नियुक्ति भारत सरकार द्वारा चार साल की अवधि के लिए की जाती है.

प्रमुख कार्य

भारतीय रिज़र्व बैंक देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य करता है:

भारतीय अर्थव्यवस्था में भूमिका

भारतीय रिज़र्व बैंक भारतीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्तंभ है. इसकी भूमिका केवल एक नियामक तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक स्थिरता और विकास का संरक्षक भी है.

संक्षेप में, भारतीय रिज़र्व बैंक सिर्फ एक बैंक नहीं, बल्कि एक बहु-आयामी संस्था है जो देश की मौद्रिक अखंडता, वित्तीय स्थिरता और आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए अथक रूप से काम करती है.


परिचय: मौद्रिक नीति के उपकरण

मौद्रिक नीति भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा अपनाई गई वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वह अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति (तरलता), ब्याज दरों और ऋण की उपलब्धता को नियंत्रित करता है। इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आरबीआई विभिन्न उपकरणों का उपयोग करता है।

1. रेपो रेट (Repo Rate)

2. रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate)

3. नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR)

4. सांविधिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR)

5. बैंक दर (Bank Rate)

6. सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility – MSF)

7. खुले बाजार की क्रियाएं (Open Market Operations – OMO)


निष्कर्ष (यूपीएससी के लिए)

आरबीआई इन सभी उपकरणों का उपयोग एक-दूसरे के संयोजन में करता है। किसी एक उपकरण का चयन अर्थव्यवस्था की तत्कालीन स्थिति, मुद्रास्फीति के दबाव और विकास की आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। यूपीएससी के एक अभ्यर्थी को इन उपकरणों की परिभाषा के साथ-साथ यह भी समझना चाहिए कि ये अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं – जैसे मुद्रास्फीति, आर्थिक वृद्धि, रोजगार और निवेश – को कैसे प्रभावित करते हैं।


मुद्रास्फीति (Inflation): प्रकार, कारण और नियंत्रण के उपाय

परिचय

मुद्रास्फीति का अर्थ है अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में एक निरंतर वृद्धि। जब मूल्य स्तर बढ़ता है, तो मुद्रा की प्रत्येक इकाई कम वस्तुएं और सेवाएं खरीद पाती है। संक्षेप में, यह मुद्रा की क्रय शक्ति में कमी है। भारत में, मुद्रास्फीति को मुख्यतः उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI) और थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index – WPI) के माध्यम से मापा जाता है।

एक हल्की मुद्रास्फीति (लगभग 2-3%) को अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा माना जाता है क्योंकि यह उत्पादन और निवेश को प्रोत्साहित करती है। लेकिन एक उच्च मुद्रास्फीति दर अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होती है।


मुद्रास्फीति के प्रकार (Types of Inflation)

मुद्रास्फीति को उसकी दर के आधार पर मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

  1. रेंगती हुई मुद्रास्फीति (Creeping Inflation):
    • जब मूल्य वृद्धि की दर बहुत धीमी और अनुमानित होती है (आमतौर पर 3% प्रति वर्ष से कम)।
    • यह आर्थिक विकास के लिए सुरक्षित और सहायक मानी जाती है।
  2. चलती हुई मुद्रास्फीति (Walking or Trotting Inflation):
    • जब मूल्य वृद्धि की दर 3% से 10% प्रति वर्ष के बीच होती है।
    • यह एक चेतावनी का संकेत है, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था को गर्म कर सकती है और यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो यह और तेज हो सकती है।
  3. दौड़ती हुई मुद्रास्फीति (Running Inflation):
    • जब मूल्य वृद्धि की दर 10% से 20% प्रति वर्ष की उच्च दर से होती है।
    • यह अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डालती है, लोगों की बचत को नष्ट करती है और आर्थिक अनिश्चितता पैदा करती है।
  4. अति/सरपट दौड़ती मुद्रास्फीति (Hyperinflation):
    • यह एक अनियंत्रित स्थिति है जहाँ मूल्य वृद्धि की दर अत्यधिक (50% प्रति माह या उससे भी अधिक) होती है।
    • यह पूरी तरह से आर्थिक पतन का कारण बन सकती है, जहाँ लोगों का अपनी मुद्रा से विश्वास उठ जाता है (जैसे – जिम्बाब्वे और वेनेजुएला के उदाहरण)।

अन्य महत्वपूर्ण प्रकार:


मुद्रास्फीति के कारण (Causes of Inflation)

मुद्रास्फीति के कारणों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

1. मांग-जनित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation)

यह तब होती है जब वस्तुओं और सेवाओं की कुल मांग (Aggregate Demand) उनकी कुल आपूर्ति (Aggregate Supply) से अधिक हो जाती है। इसे “बहुत अधिक धन बहुत कम वस्तुओं का पीछा करता है” (Too much money chasing too few goods) की स्थिति भी कहा जाता है। इसके मुख्य कारण हैं:

2. लागत-जनित मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation)

यह तब होती है जब उत्पादन की लागत (Cost of Production) में वृद्धि के कारण वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है, भले ही मांग स्थिर हो। इसके मुख्य कारण हैं:

3. संरचनात्मक मुद्रास्फीति (Structural Inflation)

यह विकासशील देशों में पाई जाने वाली मुद्रास्फीति है जो अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों के कारण होती है।


मुद्रास्फीति के नियंत्रण के उपाय

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए सरकार और RBI मिलकर कदम उठाते हैं। इन उपायों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

1. मौद्रिक उपाय (Monetary Measures) – भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा

इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति (तरलता) को कम करना और ऋण को महंगा बनाना है।

2. राजकोषीय उपाय (Fiscal Measures) – भारत सरकार द्वारा

इसका उद्देश्य सरकारी व्यय को कम करना और करों के माध्यम से जनता से अतिरिक्त धन वापस लेना है।

3. आपूर्ति-पक्ष के उपाय (Supply-Side Measures)

इसका उद्देश्य वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और वितरण में सुधार करके आपूर्ति बढ़ाना है।


निष्कर्ष

मुद्रास्फीति एक जटिल आर्थिक घटना है जिसके कई कारण और प्रभाव हैं। इसे पूरी तरह से समाप्त करना न तो संभव है और न ही वांछनीय। लक्ष्य एक ऐसी दर बनाए रखना है जो आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करे लेकिन आम आदमी की क्रय शक्ति को नुकसान न पहुंचाए। इसके लिए मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों के बीच एक प्रभावी समन्वय अत्यंत आवश्यक है।


भारत में बैंकिंग प्रणाली: संरचना, भूमिका और चुनौतियाँ

परिचय

भारतीय बैंकिंग प्रणाली देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह न केवल धन के प्रवाह को सुगम बनाती है, बल्कि बचत को एकत्रित कर उसे उत्पादक निवेशों में बदलने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है। एक सुविकसित और मजबूत बैंकिंग प्रणाली वित्तीय स्थिरता, आर्थिक विकास और वित्तीय समावेशन के लिए अनिवार्य है। भारत की बैंकिंग प्रणाली की जड़ें स्वतंत्रता-पूर्व काल से जुड़ी हैं, लेकिन 1949 में RBI के राष्ट्रीयकरण और 1969 तथा 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद इसने एक नया आकार लिया। 1991 के आर्थिक सुधारों ने इसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया।


भारतीय बैंकिंग प्रणाली की संरचना (Structure)

भारत की बैंकिंग प्रणाली को मोटे तौर पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

(यह एक काल्पनिक चित्रण है; संरचना नीचे पाठ में दी गई है)

1. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI): यह भारत का केंद्रीय बैंक और संपूर्ण बैंकिंग प्रणाली का सर्वोच्च नियामक है।

2. अनुसूचित बैंक (Scheduled Banks):
वे बैंक जिनके नाम भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल हैं। इन्हें अनुसूचित बैंक कहा जाता है। इन्हें RBI से बैंक दर पर ऋण लेने और समाशोधन गृह (Clearing House) की सदस्यता जैसी कुछ विशेष सुविधाएं प्राप्त होती हैं। इन्हें CRR और SLR के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है।

अनुसूचित बैंकों को आगे निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा गया है:

(A) वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks)

इनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। वे जनता से जमा स्वीकार करते हैं और व्यावसायिक व उपभोक्ता ऋण प्रदान करते हैं।

(B) सहकारी बैंक (Cooperative Banks)

ये सहकारिता के सिद्धांत (सदस्यों द्वारा स्वामित्व और संचालन) पर काम करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य अपने सदस्यों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराना है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में।

(C) विभेदित बैंक (Differentiated Banks)

ये नए प्रकार के बैंक हैं जिन्हें RBI ने वित्तीय समावेशन के एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए लाइसेंस दिया है।

3. गैर-अनुसूचित बैंक (Non-Scheduled Banks):
ये वे बैंक हैं जो RBI अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध नहीं हैं। इन्हें RBI से सामान्य बैंकिंग नियमों का पालन करना पड़ता है, लेकिन वे RBI से आपातकालीन ऋण जैसी सुविधाओं के हकदार नहीं होते हैं। इनकी संख्या बहुत कम है।


भारतीय बैंकिंग प्रणाली की भूमिका

  1. पूंजी निर्माण (Capital Formation): देश भर से बचत एकत्र कर उसे निवेश के लिए उपलब्ध कराना।
  2. साख निर्माण (Credit Creation): अर्थव्यवस्था में ऋण और अग्रिम प्रदान करके आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना।
  3. मौद्रिक नीति का कार्यान्वयन: RBI द्वारा निर्धारित मौद्रिक नीति को जमीनी स्तर पर लागू करना।
  4. वित्तीय समावेशन: समाज के गरीब और वंचित वर्गों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना (जैसे – प्रधानमंत्री जन धन योजना)।
  5. भुगतान और निपटान प्रणाली: चेक, ड्राफ्ट, NEFT, RTGS, UPI जैसे माध्यमों से धन के लेन-देन को सुरक्षित और कुशल बनाना।
  6. सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन: विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत सब्सिडी और लाभों का वितरण करना।

भारतीय बैंकिंग प्रणाली के समक्ष चुनौतियाँ

  1. गैर-निष्पादित संपत्ति (Non-Performing Assets – NPA): यह बैंकिंग क्षेत्र की सबसे बड़ी और पुरानी समस्या है। NPA वह ऋण है जिसका मूलधन या ब्याज 90 दिनों तक देय रहता है। इससे बैंकों की लाभप्रदता और ऋण देने की क्षमता कम हो जाती है। “ट्विन बैलेंस शीट सिंड्रोम” (तनावग्रस्त कॉर्पोरेट बैलेंस शीट और NPA से लदी बैंक बैलेंस शीट) इसी से जुड़ी एक समस्या है।
  2. शासन और प्रशासनिक मुद्दे (Governance Issues): विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में राजनीतिक हस्तक्षेप, बोर्ड की नियुक्तियों में देरी और जवाबदेही की कमी एक बड़ी चुनौती है।
  3. बढ़ती प्रतिस्पर्धा: फिनटेक कंपनियों (जैसे पेमेंट ऐप्स) और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) से बैंकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है।
  4. साइबर सुरक्षा का खतरा: डिजिटल बैंकिंग के बढ़ने के साथ-साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी, डेटा चोरी और हैकिंग का जोखिम भी बढ़ा है।
  5. पूंजी पर्याप्तता (Capital Adequacy): बेसल-III जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के लिए बैंकों को निरंतर अतिरिक्त पूंजी की आवश्यकता होती है, जो एक चुनौती है।
  6. कम क्रेडिट ग्रोथ: कई बार कमजोर आर्थिक माहौल के कारण ऋण की मांग कम हो जाती है, जो बैंकों के व्यवसाय को प्रभावित करता है।

निष्कर्ष

भारतीय बैंकिंग प्रणाली ने पिछले कुछ दशकों में एक लंबा सफर तय किया है। दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016, बैंकों का विलय, और डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने जैसे हालिया सुधारों ने इसे मजबूत करने में मदद की है। हालाँकि, NPA की समस्या, शासन में सुधार और बदलती प्रौद्योगिकी के साथ तालमेल बिठाने जैसी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। एक पारदर्शी, कुशल और मजबूत बैंकिंग प्रणाली ही 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने में भारत की मदद कर सकती है।


यहाँ वाणिज्यिक बैंकों, सहकारी बैंकों, NBFCs और भुगतान बैंकों के बीच एक विस्तृत, तुलनात्मक और विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत है।


तुलनात्मक सारणी: वित्तीय संस्थानों का अवलोकन

पैरामीटरवाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks)सहकारी बैंक (Cooperative Banks)गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC)भुगतान बैंक (Payments Banks)
मूल उद्देश्यलाभ कमानासदस्यों को सेवा और पारस्परिक सहायतालाभ कमाना (विशिष्ट वित्तीय क्षेत्रों में)वित्तीय समावेशन, भुगतान और प्रेषण
नियामकभारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)RBI (बैंकिंग) और सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार (प्रबंधन) (दोहरा नियंत्रण)भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) (लेकिन बैंकों की तुलना में कम कठोर नियम)भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)
नियामक अधिनियमबैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949; RBI अधिनियम, 1934सहकारी समिति अधिनियम; बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949कंपनी अधिनियम, 2013; RBI अधिनियम, 1934बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949; RBI अधिनियम, 1934
जमा स्वीकृतिहाँ, सभी प्रकार की (मांग और सावधि जमा – चालू, बचत, FD, RD)हाँ, मुख्य रूप से सदस्यों से (मांग और सावधि जमा)नहीं, मांग जमा स्वीकार नहीं कर सकते। केवल विशिष्ट शर्तों के साथ सावधि जमा ले सकते हैं।हाँ, केवल मांग जमा (चालू/बचत) – ₹2 लाख प्रति ग्राहक की सीमा तक। सावधि जमा नहीं ले सकते।
ऋण गतिविधियाँहाँ, मुख्य कार्य है। सभी प्रकार के ऋण दे सकते हैं।हाँ, मुख्य रूप से सदस्यों को कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण देते हैं।हाँ, मुख्य कार्य है। अक्सर विशेष प्रकार के ऋण देते हैं (जैसे- गोल्ड लोन, वाहन लोन)।नहीं, ऋण नहीं दे सकते, क्रेडिट कार्ड जारी नहीं कर सकते।
साख निर्माणहाँ, कर सकते हैं। यह अर्थव्यवस्था में इनकी प्रमुख भूमिका है।हाँ, सीमित स्तर पर कर सकते हैं।नहीं, क्योंकि वे मांग जमा स्वीकार नहीं करते।नहीं, क्योंकि वे ऋण नहीं दे सकते।
DICGC कवरहाँ, ₹5 लाख तक की जमा राशि बीमित होती है।हाँ, ₹5 लाख तक की जमा राशि बीमित होती है।नहीं, NBFCs में जमा राशि पर DICGC का बीमा कवर उपलब्ध नहीं होता।हाँ, ₹5 लाख तक की जमा राशि बीमित होती है।
प्रमुख ग्राहकसामान्य जनता, कॉर्पोरेट्स, सरकारग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सदस्य (किसान, छोटे व्यापारी)वे ग्राहक जिन्हें बैंकों से आसानी से ऋण नहीं मिलता या जो त्वरित सेवा चाहते हैंप्रवासी श्रमिक, निम्न-आय वाले परिवार, छोटे व्यवसाय
उदाहरणSBI, HDFC बैंक, ICICI बैंकसारस्वत सहकारी बैंक, जिला केंद्रीय सहकारी बैंक, PACSबजाज फाइनेंस, मुथूट फाइनेंस, टाटा कैपिटलएयरटेल पेमेंट्स बैंक, इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक, पेटीएम पेमेंट्स बैंक

विस्तृत विश्लेषण

1. वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks)

ये वित्तीय प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इनका प्राथमिक उद्देश्य लाभ कमाना है। वे जनता से सभी प्रकार की जमा स्वीकार करते हैं और उन निधियों का उपयोग व्यक्तियों और व्यवसायों को ऋण देने के लिए करते हैं। साख निर्माण (Credit Creation) इनकी सबसे अनूठी विशेषता है, जो अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति को कई गुना बढ़ा देती है। प्रौद्योगिकी अपनाने, उत्पादों की विस्तृत श्रृंखला और देशव्यापी नेटवर्क के कारण ये अर्थव्यवस्था के हर कोने में मौजूद हैं। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSBs), निजी क्षेत्र के बैंक और विदेशी बैंक शामिल हैं।

2. सहकारी बैंक (Cooperative Banks)

ये “नो-प्रॉफिट, नो-लॉस” के सहकारी सिद्धांत पर आधारित हैं। इनका स्वामित्व और संचालन इनके सदस्यों द्वारा ही किया जाता है, जो इसके ग्राहक भी होते हैं। इनका मुख्य ध्यान लाभ कमाने के बजाय अपने सदस्यों को वित्तीय सेवाएं प्रदान करना होता है, विशेषकर ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में।

प्रमुख विशेषता: इनकी दोहरी नियामक प्रणाली है। इनके बैंकिंग कार्यों (जैसे ब्याज दरें, CRR/SLR) का विनियमन RBI करता है, जबकि इनके प्रबंधन, निगमन और लेखा परीक्षा जैसे प्रशासनिक मामलों का नियंत्रण राज्य या केंद्र सरकार के सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार (Registrar of Cooperative Societies) द्वारा किया जाता है। यह अक्सर इनके प्रभावी कामकाज में एक चुनौती पैदा करता है।

3. गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (Non-Banking Financial Company – NBFC)

NBFC एक ऐसी कंपनी है जो कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत होती है और ऋण और अग्रिम देने, शेयरों के अधिग्रहण या बीमा के कारोबार में लगी होती है।

बैंकों से मुख्य अंतर:

  1. मांग जमा: NBFC जनता से मांग जमा (Demand Deposits – बचत या चालू खाते में रखी राशि जिसे कभी भी निकाला जा सकता है) स्वीकार नहीं कर सकती। यही वह मौलिक विशेषता है जो इन्हें ‘बैंक’ होने से अलग करती है।
  2. भुगतान प्रणाली: वे भुगतान और निपटान प्रणाली का हिस्सा नहीं होती हैं और स्वयं पर आहरित चेक जारी नहीं कर सकतीं।
  3. DICGC बीमा: NBFC में जमाकर्ताओं को DICGC का जमा बीमा कवर नहीं मिलता है, जो इसे बैंकों की तुलना में अधिक जोखिम भरा बनाता है।

NBFCs अक्सर उन क्षेत्रों में काम करती हैं जहाँ पारंपरिक बैंक पहुँचने में संकोच करते हैं और वे अपनी त्वरित निर्णय प्रक्रिया के लिए जानी जाती हैं।

4. भुगतान बैंक (Payments Banks)

यह भारतीय बैंकिंग में एक नया मॉडल है, जिसे नचिकेत मोर समिति की सिफारिशों पर वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। इनका मुख्य लक्ष्य प्रवासी श्रमिकों, निम्न-आय वाले परिवारों और छोटे व्यवसायों को कम लागत पर बुनियादी बैंकिंग और प्रेषण (Remittance) सेवाएं प्रदान करना है।

मुख्य विशेषताएँ और प्रतिबंध:

ये बैंक पारंपरिक बैंकों के लिए प्रतिस्पर्धा पैदा करने के बजाय उनके पूरक के रूप में काम करते हैं। वे प्रौद्योगिकी का लाभ उठाकर अंतिम छोर तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।


वित्तीय बाजार (Financial Market)

यह एक ऐसा बाजार है जहाँ लोग और संस्थाएँ अधिशेष धन (Surplus funds) वाले क्षेत्रों से धन की कमी (Deficit funds) वाले क्षेत्रों में वित्तीय संपत्तियों (जैसे स्टॉक, बॉन्ड) का व्यापार करते हैं। इसे मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है:

  1. मुद्रा बाजार (Money Market): अल्पकालिक धन के लिए।
  2. पूंजी बाजार (Capital Market): दीर्घकालिक धन के लिए।

1. मुद्रा बाजार (Money Market)

अर्थ:

मुद्रा बाजार वित्तीय बाजार का वह खंड है जहाँ अल्पकालिक (Short-term) निधियों का उधार लिया और दिया जाता है। यहाँ “अल्पकालिक” का अर्थ आमतौर पर एक वर्ष तक की अवधि के लिए होता है। यह बाजार मुख्य रूप से संस्थागत होता है और इसमें बड़ी वित्तीय संस्थाएं, बैंक, सरकार और बड़ी कंपनियाँ भाग लेती हैं।

उद्देश्य:

मुद्रा बाजार के उपकरण (Instruments of Money Market):

  1. ट्रेजरी बिल (Treasury Bills – T-bills):
    • ये भारत सरकार द्वारा अपनी अल्पकालिक नकदी जरूरतों के लिए जारी किए जाते हैं।
    • इन्हें भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किया जाता है।
    • ये शून्य-कूपन बॉन्ड (Zero-coupon bonds) होते हैं, यानी इन पर कोई ब्याज नहीं दिया जाता। इन्हें छूट (Discount) पर जारी किया जाता है और अंकित मूल्य (Face Value) पर भुनाया जाता है। (उदाहरण: ₹100 का टी-बिल ₹97 में जारी किया गया और परिपक्वता पर ₹100 वापस मिलेंगे, ₹3 का अंतर ही निवेशक का लाभ है)।
    • ये 91-दिन, 182-दिन और 364-दिन की परिपक्वता अवधि के लिए जारी होते हैं।
  2. वाणिज्यिक पत्र (Commercial Paper – CP):
    • यह एक असुरक्षित (Unsecured) वचन पत्र होता है, जिसे उच्च क्रेडिट रेटिंग वाली बड़ी कंपनियाँ अपनी अल्पकालिक कार्यशील पूंजी की जरूरतों के लिए जारी करती हैं।
  3. जमा प्रमाण पत्र (Certificate of Deposit – CD):
    • यह बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा जारी एक परक्राम्य (Negotiable) साधन है। यह एक निश्चित अवधि के लिए जमा की गई धनराशि की रसीद की तरह है।
  4. कॉल मनी / नोटिस मनी (Call Money / Notice Money):
    • यह अंतर-बैंक बाजार (Inter-bank market) है, जहाँ बैंक एक-दूसरे से अत्यधिक अल्प अवधि (1 दिन से 14 दिन तक) के लिए उधार लेते हैं।
    • जब उधार एक दिन के लिए होता है, तो इसे कॉल मनी कहते हैं।
    • जब उधार 2 से 14 दिनों के लिए होता है, तो इसे नोटिस मनी कहते हैं।
    • इस पर लगने वाली ब्याज दर को कॉल मनी रेट कहा जाता है।
  5. रेपो और रिवर्स रेपो (Repo and Reverse Repo):
    • ये RBI द्वारा मौद्रिक नीति के उपकरण हैं, लेकिन मुद्रा बाजार में तरलता को प्रबंधित करने के लिए भी इनका व्यापक रूप से उपयोग होता है।

नियामक (Regulator): भारत में मुद्रा बाजार का मुख्य नियामक भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) है।


2. पूंजी बाजार (Capital Market)

अर्थ:

पूंजी बाजार वित्तीय बाजार का वह खंड है जहाँ दीर्घकालिक (Long-term) निधियों का व्यापार होता है। यहाँ “दीर्घकालिक” का अर्थ एक वर्ष से अधिक की अवधि के लिए होता है। यह बाजार उद्योगों और सरकार को स्थायी पूंजी प्रदान करता है।

उद्देश्य:

पूंजी बाजार की संरचना और उपकरण:

पूंजी बाजार को दो भागों में बांटा गया है:

  1. प्राथमिक बाजार (Primary Market):
    • यहाँ कंपनियाँ और सरकार पहली बार (for the first time) नई प्रतिभूतियाँ (Securities) जारी करके सीधे निवेशकों से धन जुटाती हैं।
    • इसे नया निर्गम बाजार (New Issue Market) भी कहते हैं।
    • तरीके: आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (Initial Public Offering – IPO), फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (FPO), राइट्स इश्यू आदि।
  2. द्वितीयक बाजार (Secondary Market):
    • यहाँ उन प्रतिभूतियों का कारोबार होता है जो पहले से ही प्राथमिक बाजार में जारी की जा चुकी हैं।
    • इसे स्टॉक मार्केट या स्टॉक एक्सचेंज भी कहा जाता है।
    • यह मौजूदा निवेशकों को अपनी प्रतिभूतियों को बेचने और बाहर निकलने का एक मंच प्रदान करता है, जिससे बाजार में तरलता (Liquidity) आती है।
    • उदाहरण: बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE), नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE)।

पूंजी बाजार के उपकरण (Instruments of Capital Market):

नियामक (Regulator): भारत में पूंजी बाजार का मुख्य नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI – Securities and Exchange Board of India) है।


मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार के बीच मुख्य अंतर

आधारमुद्रा बाजार (Money Market)पूंजी बाजार (Capital Market)
अवधि (Tenure)अल्पकालिक (एक वर्ष तक)।दीर्घकालिक (एक वर्ष से अधिक)।
उद्देश्य (Purpose)कार्यशील पूंजी और तरलता प्रबंधन।स्थायी पूंजी और पूंजी निर्माण।
तरलता (Liquidity)उच्च, क्योंकि अवधि कम होती है।कम (मुद्रा बाजार की तुलना में)।
जोखिम (Risk)कम, क्योंकि अवधि छोटी और जारीकर्ता विश्वसनीय होते हैं।अधिक, क्योंकि अवधि लंबी होती है और मूल्य में उतार-चढ़ाव होता है।
प्रतिफल (Return)आमतौर पर कमआमतौर पर अधिक होने की संभावना।
नियामक (Regulator)भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI)
उपकरण (Instruments)टी-बिल, वाणिज्यिक पत्र, जमा प्रमाण पत्र, कॉल मनी।शेयर, डिबेंचर, बॉन्ड, डेरिवेटिव्स।
भागीदारी (Participation)मुख्य रूप से संस्थागत (RBI, बैंक, कंपनियाँ)।संस्थागत और खुदरा निवेशक (आम जनता)।

निष्कर्ष

मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार किसी भी अर्थव्यवस्था के वित्तीय तंत्र के दो पहिये हैं। जहाँ मुद्रा बाजार अर्थव्यवस्था को आवश्यक तरलता प्रदान करके सुचारू रूप से चलाता है, वहीं पूंजी बाजार दीर्घकालिक निवेश और विकास की नींव रखता है। दोनों बाजार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक का प्रदर्शन दूसरे को प्रभावित करता है। एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए इन दोनों बाजारों का कुशल और स्थिर होना अनिवार्य है।


भाग 1: आर्थिक नियोजन का युग (1951 – 2017)

स्वतंत्रता के बाद, भारत के नीति निर्माताओं ने देश के तीव्र और समान विकास के लिए सोवियत संघ से प्रेरित होकर आर्थिक नियोजन (Economic Planning) का मॉडल अपनाया। इसका मुख्य उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों का देश की प्राथमिकताओं के अनुसार आवंटन और उपयोग करना था।

नियोजन के मुख्य उद्देश्य:

संस्थागत ढाँचा:

  1. योजना आयोग (Planning Commission):
    • इसकी स्थापना 1950 में एक कार्यकारी प्रस्ताव द्वारा की गई थी। यह एक गैर-संवैधानिक और गैर-सांविधिक निकाय था।
    • इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे।
    • इसका मुख्य कार्य पंचवर्षीय योजनाओं (Five-Year Plans) का निर्माण करना था।
    • कुल 12 पंचवर्षीय योजनाएँ लागू की गईं।
  2. राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development Council – NDC):
    • इसकी स्थापना 1952 में हुई थी। इसका कार्य योजना आयोग द्वारा तैयार की गई योजनाओं को अंतिम मंजूरी देना और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा کرنا था। इसमें प्रधानमंत्री, सभी केंद्रीय मंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होते थे।

प्रमुख पंचवर्षीय योजनाएँ और उनकी दिशा:

नियोजन युग की आलोचना:

योजना आयोग का अंत और नीति आयोग का उदय:

2014 में, सरकार ने योजना आयोग को भंग कर दिया और 1 जनवरी, 2015 को उसके स्थान पर नीति आयोग (National Institution for Transforming India) की स्थापना की।


भाग 2: आर्थिक सुधार का युग (1991 से आगे)

1990 के दशक की शुरुआत में भारत एक गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। इस संकट ने देश को अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।

1991 के आर्थिक संकट के कारण:

  1. भुगतान संतुलन का संकट (Balance of Payments – BoP Crisis):
    • भारत के विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो गए थे (लगभग 2 सप्ताह के आयात के लिए ही पर्याप्त थे)।
    • खाड़ी युद्ध (Gulf War) के कारण तेल की कीमतें बढ़ गईं और खाड़ी देशों से आने वाले प्रेषण (Remittances) में कमी आई।
  2. उच्च राजकोषीय घाटा (High Fiscal Deficit): सरकार का खर्च उसकी आय से बहुत अधिक था, जिससे सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा था।
  3. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का खराब प्रदर्शन: अधिकांश PSUs भारी घाटे में थे।
  4. उच्च मुद्रास्फीति: बढ़ती कीमतों ने आम आदमी के जीवन को मुश्किल बना दिया था।

इस संकट से निपटने के लिए, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक से ऋण लिया, जिन्होंने ऋण देने के लिए अपनी आर्थिक नीतियों में संरचनात्मक सुधार करने की शर्त रखी।

नई आर्थिक नीति (1991) और LPG सुधार:

तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में, भारत ने एक व्यापक सुधार कार्यक्रम शुरू किया, जिसे LPG सुधारों के नाम से जाना जाता है:

  1. उदारीकरण (Liberalization):
    • अर्थ: अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण और प्रतिबंधों को कम करना।
    • प्रमुख कदम:
      • “लाइसेंस-परमिट राज” को समाप्त करना: कुछ रणनीतिक क्षेत्रों को छोड़कर अधिकांश उद्योगों को लाइसेंस-मुक्त कर दिया गया।
      • वित्तीय क्षेत्र में सुधार: निजी और विदेशी बैंकों को भारत में काम करने की अनुमति दी गई।
      • कर सुधार: कर दरों को युक्तिसंगत बनाया गया और प्रक्रियाओं को सरल किया गया।
  2. निजीकरण (Privatization):
    • अर्थ: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के स्वामित्व और प्रबंधन को निजी क्षेत्र को हस्तांतरित करना।
    • प्रमुख कदम:
      • विनिवेश (Disinvestment): सरकार द्वारा PSUs में अपनी हिस्सेदारी (शेयर) बेचना।
      • रणनीतिक बिक्री (Strategic Sale): सरकार द्वारा किसी PSU में बहुसंख्यक हिस्सेदारी के साथ-साथ प्रबंधन नियंत्रण भी निजी क्षेत्र को सौंप देना।
  3. वैश्वीकरण (Globalization):
    • अर्थ: भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना।
    • प्रमुख कदम:
      • आयात शुल्कों में कमी: विदेशी वस्तुओं पर लगने वाले टैरिफ और शुल्कों में भारी कमी की गई।
      • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को बढ़ावा देना: विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश करने के नियमों को आसान बनाया गया।
      • निर्यात को प्रोत्साहन: रुपये का अवमूल्यन किया गया ताकि भारतीय वस्तुएं अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ती हो सकें और निर्यात बढ़े।

सुधारों का प्रभाव:

निष्कर्ष

नियोजन के युग ने भारत में एक मजबूत औद्योगिक आधार और संस्थागत ढाँचा तैयार किया, लेकिन इसकी संरक्षणवादी और राज्य-नियंत्रित नीतियों ने अंततः विकास को बाधित कर दिया। 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को इस ठहराव से मुक्त किया और इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनाया। आज, भारत के सामने “द्वितीय पीढ़ी के सुधारों” (Second Generation Reforms) की चुनौती है, जिसमें श्रम, भूमि और शासन जैसे क्षेत्रों में सुधार शामिल हैं, ताकि विकास को और अधिक समावेशी और टिकाऊ बनाया जा सके।


भारत में आर्थिक नियोजन का इतिहास: पंचवर्षीय योजनाएँ (1951-2017)

पृष्ठभूमि और दर्शन

स्वतंत्रता के समय, भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई, गतिहीन और औपनिवेशिक शोषण से त्रस्त थी। देश के सामने गरीबी, निरक्षरता, असमानता और एक कमजोर औद्योगिक आधार जैसी गंभीर चुनौतियाँ थीं। इन समस्याओं से निपटने के लिए, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ के नियोजन मॉडल से प्रेरित होकर, राज्य-निर्देशित आर्थिक नियोजन का मार्ग चुना।

उद्देश्य: नियोजन का मूल दर्शन संसाधनों का तर्कसंगत आवंटन करके तीव्र, आत्मनिर्भर और समावेशी विकास हासिल करना था।

संस्था: इस कार्य के लिए 15 मार्च, 1950 को योजना आयोग (Planning Commission) का गठन किया गया, जो एक गैर-संवैधानिक सलाहकार निकाय था, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे।


पंचवर्षीय योजनाओं का सफर

पहली पंचवर्षीय योजना (1951-1956)

दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961)

तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-1966)

योजना अवकाश (Plan Holiday) (1966-1969)

तीसरी योजना की विफलता के कारण, सरकार ने एक औपचारिक पंचवर्षीय योजना के बजाय तीन वार्षिक योजनाएँ (1966-67, 67-68, 68-69) लागू कीं। इस अवधि में हरित क्रांति (Green Revolution) की शुरुआत हुई, जिसने कृषि उत्पादकता को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया।

चौथी पंचवर्षीय योजना (1969-1974)

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-1979)

रोलिंग प्लान (Rolling Plan) (1978-1980)

जनता पार्टी सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं की जगह एक “रोलिंग प्लान” पेश किया, जिसमें हर साल योजना के प्रदर्शन का आकलन किया जाता था और उसके आधार पर अगले वर्ष के लिए एक नई योजना बनाई जाती थी। 1980 में कांग्रेस सरकार के सत्ता में लौटने पर इसे समाप्त कर दिया गया।

छठी पंचवर्षीय योजना (1980-1985)

सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-1990)

वार्षिक योजनाएँ (1990-1992)

केंद्र में राजनीतिक अस्थिरता और 1991 के गंभीर आर्थिक संकट के कारण आठवीं पंचवर्षीय योजना समय पर शुरू नहीं हो सकी। इस दौरान दो वार्षिक योजनाएँ लागू की गईं।

आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-1997) – सुधारों के बाद की पहली योजना

नौवीं से बारहवीं योजना तक (1997-2017)


योजना आयोग का अंत और नीति आयोग का उदय

2014 में, नई सरकार ने महसूस किया कि केंद्रीकृत नियोजन का “Top-Down” मॉडल अब वर्तमान आर्थिक चुनौतियों के लिए उपयुक्त नहीं है। परिणामस्वरूप, योजना आयोग को भंग कर दिया गया और 1 जनवरी 2015 को इसके स्थान पर नीति आयोग (National Institution for Transforming India) की स्थापना की गई। नीति आयोग एक “थिंक टैंक” के रूप में कार्य करता है जो “सहकारी संघवाद” को बढ़ावा देता है और राज्यों को नीति निर्माण में एक सक्रिय भागीदार बनाता है, जो योजना आयोग के केंद्रीकृत मॉडल के विपरीत है। इसने पंचवर्षीय योजनाओं के युग का अंत कर दिया।


परिचय: एक प्रतिमान विस्थापन (A Paradigm Shift)

भारत की विकास यात्रा में, योजना आयोग से नीति आयोग में परिवर्तन केवल एक संस्थागत नाम का बदलाव नहीं है, बल्कि यह शासन के दर्शन में एक मौलिक बदलाव है। यह केंद्रीकृत नियोजन (Centralized Planning) के युग से सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के युग में संक्रमण का प्रतीक है, जहाँ राज्य अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि विकास की प्रक्रिया में समान भागीदार हैं।


1. योजना आयोग (Planning Commission) (1950-2014)

स्थापना और भूमिका:

संरचना:

मुख्य कार्य:

  1. पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण: देश के संसाधनों का आकलन करना और विकास के लिए प्राथमिकताएं तय करना।
  2. वित्तीय संसाधनों का आवंटन: यह इसकी सबसे महत्वपूर्ण शक्ति थी। यह तय करता था कि किस राज्य को किस योजना के लिए कितना धन मिलेगा। इस शक्ति के कारण इसे एक “सुपर कैबिनेट” भी कहा जाता था।
  3. नीति मूल्यांकन: योजनाओं के कार्यान्वयन की समय-समय पर समीक्षा करना।

योजना आयोग की आलोचना/समाप्ति के कारण:


2. नीति आयोग (NITI Aayog) (2015-वर्तमान)

स्थापना और दर्शन:

संरचना:

मुख्य कार्य:

  1. नीतिगत इनपुट प्रदान करना: यह सरकार के लिए एक “थिंक टैंक” या वैचारिक केंद्र के रूप में काम करता है और केंद्र व राज्यों को रणनीतिक और तकनीकी सलाह देता है।
  2. सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना: राज्यों को राष्ट्रीय नीति निर्माण में सक्रिय भागीदार बनाना।
  3. दीर्घकालिक दृष्टिकोण विकसित करना: यह पंचवर्षीय योजनाओं के बजाय दीर्घकालिक नीतिगत ढांचे (जैसे- 3-वर्षीय एक्शन एजेंडा, 7-वर्षीय रणनीति, 15-वर्षीय विजन डॉक्यूमेंट) बनाता है।
  4. निगरानी और मूल्यांकन (Monitoring and Evaluation): विभिन्न सरकारी योजनाओं और पहलों के कार्यान्वयन की निगरानी करना।
  5. ज्ञान और नवाचार हब: सुशासन और सर्वोत्तम प्रथाओं पर एक ज्ञान केंद्र के रूप में कार्य करना।

योजना आयोग बनाम नीति आयोग: मुख्य अंतर

आधारयोजना आयोगनीति आयोग
प्रकृति (Nature)यह एक केंद्रीकृत नियोजन निकाय था।यह एक सलाहकार “थिंक टैंक” है।
दृष्टिकोण (Approach)“ऊपर से नीचे” (Top-Down): नीतियां केंद्र में बनती थीं और राज्यों पर लागू होती थीं।“नीचे से ऊपर” (Bottom-Up): राज्यों की सक्रिय भागीदारी से नीतियां बनती हैं।
राज्यों की भूमिकासीमित भूमिका: राज्यों की भूमिका NDC की बैठकों तक सीमित थी।प्रमुख भूमिका: गवर्निंग काउंसिल के माध्यम से राज्य नीति निर्माण के केंद्र में हैं।
वित्तीय शक्तिवित्तीय आवंटन की शक्ति थी। यह राज्यों को धन आवंटित करता था।वित्तीय आवंटन की कोई शक्ति नहीं है। यह पूरी तरह से एक सलाहकार निकाय है। वित्त मंत्रालय धन आवंटित करता है।
सदस्यों की विशेषज्ञतासदस्यों की नियुक्ति में विशेषज्ञता पर सीमित ध्यान था।सदस्यों (विशेष आमंत्रितों) की नियुक्ति में विशेषज्ञता (Domain Expertise) पर जोर दिया जाता है।
प्रासंगिकतायह कमांड और कंट्रोल अर्थव्यवस्था (समाजवादी मॉडल) के लिए उपयुक्त था।यह एक खुली, बाजार-उन्मुख और विविध अर्थव्यवस्था के लिए अधिक प्रासंगिक है।

निष्कर्ष

योजना आयोग ने अपने युग में भारत के बुनियादी औद्योगिक और संस्थागत ढांचे को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि, बदलते समय और एक अधिक परिपक्व संघीय ढांचे की जरूरतों के साथ, यह अप्रासंगिक हो गया था। नीति आयोग की स्थापना इस वास्तविकता की स्वीकृति है कि भारत का विकास केवल केंद्र और राज्यों के बीच एक सहयोगात्मक और सामंजस्यपूर्ण साझेदारी के माध्यम से ही संभव है। यह नियोजन से नीति की ओर, और नियंत्रण से सक्षमता (Enabling) की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।


1991 के आर्थिक सुधार: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG Reforms)

पृष्ठभूमि: संकट का क्षण

1991 में, भारत एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट के कगार पर खड़ा था। यह संकट वर्षों की संरक्षणवादी और राज्य-नियंत्रित आर्थिक नीतियों का परिणाम था। तत्कालीन स्थिति इतनी गंभीर थी कि भारत अपने आयातों का भुगतान करने में लगभग असमर्थ था।

संकट के तात्कालिक कारण:

  1. भुगतान संतुलन का गंभीर संकट (Severe Balance of Payments – BoP Crisis): भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो गया था। यह केवल दो सप्ताह के आयात बिल का भुगतान करने के लिए पर्याप्त था।
  2. उच्च राजकोषीय घाटा (High Fiscal Deficit): सरकार का खर्च उसकी आय से बहुत अधिक था, जो GDP के लगभग 8% तक पहुँच गया था, जिससे सरकार पर भारी कर्ज का बोझ था।
  3. उच्च मुद्रास्फीति दर (High Inflation): कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं, जिससे आम आदमी का जीवन मुश्किल हो गया था।
  4. बाहरी कारक (External Factors): 1990-91 के खाड़ी युद्ध ने कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया, जिससे भारत का आयात बिल और बढ़ गया। साथ ही, खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले प्रेषण (Remittances) में भी कमी आई।
  5. सार्वजनिक क्षेत्र का खराब प्रदर्शन: अधिकांश सार्वजनिक उपक्रम (PSUs) अकुशल और घाटे में चल रहे थे, जो अर्थव्यवस्था पर एक बोझ थे।

इस विकट स्थिति से निपटने के लिए, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक से संपर्क किया। इन संस्थाओं ने ऋण देने के लिए यह शर्त रखी कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को खोलेगा और संरचनात्मक सुधारों को लागू करेगा। इन्हीं सुधारों को नई आर्थिक नीति (New Economic Policy – NEP), 1991 के रूप में जाना जाता है, जिसे LPG सुधारों के नाम से प्रसिद्धि मिली।


LPG सुधारों के तीन स्तंभ

तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में इन सुधारों को लागू किया गया।

1. उदारीकरण (Liberalization) – नियंत्रणों से मुक्ति

अर्थ: इसका अर्थ था अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर लगाए गए सरकारी नियंत्रणों और प्रतिबंधों को समाप्त करना या उनमें ढील देना, ताकि निजी क्षेत्र को विकास के अधिक अवसर मिल सकें।

प्रमुख कदम:

2. निजीकरण (Privatization) – निजी क्षेत्र की भूमिका का विस्तार

अर्थ: इसका अर्थ था सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के स्वामित्व या प्रबंधन में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाना।

प्रमुख कदम:

3. वैश्वीकरण (Globalization) – विश्व के साथ एकीकरण

अर्थ: इसका अर्थ था भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना, ताकि वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी, प्रौद्योगिकी और लोगों का स्वतंत्र प्रवाह हो सके।

प्रमुख कदम:


आर्थिक सुधारों का प्रभाव और मूल्यांकन

सकारात्मक प्रभाव:

  1. उच्च आर्थिक विकास दर: भारतीय अर्थव्यवस्था “हिंदू विकास दर” (3.5%) के दौर से निकलकर 6-8% की उच्च विकास दर की पटरी पर आ गई।
  2. विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि: संकट के समय लगभग समाप्त हो चुका विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बढ़ा और एक आरामदायक स्तर पर पहुंच गया।
  3. सेवा क्षेत्र में क्रांति: विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और IT-सक्षम सेवाओं (ITES) के क्षेत्र में भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा।
  4. निजी क्षेत्र का उदय: सुधारों ने एक मजबूत और प्रतिस्पर्धी निजी क्षेत्र को जन्म दिया।
  5. उपभोक्ताओं को लाभ: बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता वाली वस्तुएं और सेवाएं कम कीमतों पर उपलब्ध हुईं।

नकारात्मक प्रभाव और आलोचना:

  1. कृषि की उपेक्षा: सुधारों का ध्यान मुख्य रूप से उद्योग और सेवा क्षेत्र पर था, जिससे कृषि क्षेत्र पिछड़ गया।
  2. रोजगारहीन विकास (Jobless Growth): GDP तो तेजी से बढ़ी, लेकिन उस अनुपात में गुणवत्ता वाले रोजगार के अवसर पैदा नहीं हुए।
  3. आय की बढ़ती असमानता: सुधारों का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचा, जिससे शहरी और ग्रामीण भारत तथा अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ी।
  4. छोटे उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव: टैरिफ कम होने और विदेशी प्रतिस्पर्धा के कारण कई छोटे और मध्यम आकार के उद्योग बाजार में टिक नहीं पाए।
  5. विनिवेश की आलोचना: आलोचकों का तर्क था कि सरकार ने अक्सर राष्ट्रीय संपत्ति (PSUs) को कम कीमतों पर बेचा।

निष्कर्ष

1991 के आर्थिक सुधार निस्संदेह एक ऐतिहासिक आवश्यकता और एक साहसिक कदम थे, जिसने भारत को एक गंभीर आर्थिक संकट से उबारा और एक वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की राह पर अग्रसर किया। हालाँकि, इन सुधारों के अपने सामाजिक और आर्थिक परिणाम भी हुए, जैसे कि बढ़ती असमानता और कृषि संकट। आज, भारत के लिए चुनौती इन सुधारों के लाभों को और अधिक समावेशी बनाने और उन क्षेत्रों (जैसे श्रम, भूमि) में “द्वितीय पीढ़ी के सुधार” करने की है, जिन्हें अभी भी संबोधित करने की आवश्यकता है।


भुगतान संतुलन (BoP) और विदेश व्यापार

भुगतान संतुलन (BoP) और विदेश व्यापार भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण से जुड़े दो सबसे महत्वपूर्ण विषय हैं। यह यूपीएससी के लिए एक कोर कॉन्सेप्ट है।

यहाँ इन दोनों विषयों का एक विस्तृत, संरचित और विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत है।


भाग 1: विदेश व्यापार (Foreign Trade)

अर्थ:

विदेश व्यापार का तात्पर्य देशों की सीमाओं के पार वस्तुओं और सेवाओं के आदान-प्रदान से है। यह किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो उसे वैश्विक बाजार से जोड़ता है।

व्यापार संतुलन (Balance of Trade – BoT)

यह विदेश व्यापार का एक महत्वपूर्ण घटक है, जो केवल वस्तुओं (Goods/Visible Items) के निर्यात और आयात के मूल्य के बीच के अंतर को मापता है।

इसके दो परिणाम हो सकते हैं:

  1. व्यापार अधिशेष (Trade Surplus): जब निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य से अधिक होता है। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल मानी जाती है।
  2. व्यापार घाटा (Trade Deficit): जब आयात का मूल्य निर्यात के मूल्य से अधिक होता है। भारत की अर्थव्यवस्था में आमतौर पर व्यापार घाटे की स्थिति रहती है, जिसका मुख्य कारण कच्चे तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का भारी आयात है।

भाग 2: भुगतान संतुलन (Balance of Payments – BoP)

अर्थ:

भुगतान संतुलन (BoP) एक व्यापक अवधारणा है। यह एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक वित्तीय वर्ष) के दौरान, किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच हुए सभी मौद्रिक लेन-देन (All Monetary Transactions) का एक व्यवस्थित और सारांशित रिकॉर्ड है।

इसमें न केवल वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, बल्कि निवेश, ऋण, और हस्तांतरण भी शामिल होता है। BoP खाता दोहरी लेखा प्रणाली (Double Entry System) पर आधारित होता है, जहाँ प्रत्येक लेन-देन के लिए एक क्रेडिट (आगमन) और एक डेबिट (बहिर्वाह) एंट्री होती है। सैद्धांतिक रूप से, BoP हमेशा संतुलन में रहता है।

BoP के घटक (Components of BoP):

BoP खाते को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:

A. चालू खाता (Current Account)
B. पूंजीगत खाता (Capital Account)

A. चालू खाता (Current Account):

यह खाता वस्तुओं, सेवाओं, आय और एकतरफा हस्तांतरण के प्रवाह को रिकॉर्ड करता है। ये वे लेन-देन हैं जो भविष्य में कोई दावा (Claim) या देनदारी (Liability) नहीं बनाते हैं। इसे चार भागों में बांटा गया है:

  1. वस्तुओं का व्यापार (Trade in Goods/Merchandise):
    • इसमें केवल भौतिक वस्तुओं का निर्यात (क्रेडिट) और आयात (डेबिट) शामिल है। इसके संतुलन को व्यापार संतुलन (BoT) कहते हैं। इसे दृश्य व्यापार (Visible Trade) भी कहा जाता है क्योंकि वस्तुओं को सीमाओं के पार आते-जाते देखा जा सकता है।
  2. सेवाओं का व्यापार (Trade in Services):
    • इसमें गैर-भौतिक वस्तुओं जैसे सॉफ्टवेयर सेवाएं, पर्यटन, परिवहन, बीमा और बैंकिंग सेवाओं का निर्यात और आयात शामिल है। इसे अदृश्य व्यापार (Invisible Trade) कहते हैं।
    • भारत का सेवा क्षेत्र में अधिशेष (Surplus) है, जो हमारे व्यापार घाटे को कम करने में मदद करता है।
  3. आय (Investment Income):
    • इसमें विदेशी निवेश से प्राप्त लाभ, ब्याज और लाभांश (क्रेडिट) तथा विदेशियों को उनके भारत में किए गए निवेश पर किए गए भुगतान (डेबिट) को शामिल किया जाता है।
  4. एकतरफा हस्तांतरण (Unilateral Transfers):
    • ये “एक-तरफा” भुगतान होते हैं, जिनके बदले में कुछ भी प्राप्त नहीं होता। जैसे – उपहार, दान, और सबसे महत्वपूर्ण प्रेषण (Remittances), जो विदेशों में काम करने वाले भारतीय अपने घर भेजते हैं।
    • प्रेषण भारत के चालू खाते का एक बहुत मजबूत और सकारात्मक घटक है।

चालू खाता घाटा (Current Account Deficit – CAD): जब चालू खाते में डेबिट (कुल बहिर्वाह) क्रेडिट (कुल आगमन) से अधिक हो जाता है, तो उसे CAD कहते हैं। यह दर्शाता है कि एक देश वस्तुओं, सेवाओं और हस्तांतरण पर जितना कमा रहा है, उससे अधिक खर्च कर रहा है।

B. पूंजीगत खाता (Capital Account):

यह खाता उन सभी लेन-देन को रिकॉर्ड करता है जो देश के निवासियों की विदेशी संपत्ति (Assets) और देनदारियों (Liabilities) में परिवर्तन लाते हैं। ये लेन-देन भविष्य में दावे या देनदारियां उत्पन्न करते हैं।

इसके मुख्य घटक हैं:

  1. निवेश (Investments):
    • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment – FDI): जब कोई विदेशी कंपनी भारत में एक स्थायी भौतिक संपत्ति (जैसे कारखाना बनाना) में निवेश करती है। यह स्थिर और दीर्घकालिक होता है।
    • विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Investment – FPI): जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार जैसी वित्तीय संपत्तियों में निवेश करते हैं। यह अस्थिर और अल्पकालिक होता है।
  2. ऋण (Loans):
    • विदेशी वाणिज्यिक उधार (External Commercial Borrowings – ECBs): जब भारतीय कंपनियाँ विदेशी बाजारों से ऋण लेती हैं।
    • विदेशी सहायता (External Assistance): जब भारत सरकार को अन्य देशों या अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से रियायती दरों पर ऋण मिलता है।
  3. बैंकिंग पूंजी (Banking Capital): इसमें प्रवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा भारतीय बैंकों में जमा की गई धनराशि (जैसे FCNR खाते) शामिल है।

भुगतान संतुलन में घाटा या अधिशेष (BoP Deficit or Surplus):

जब चालू खाते और पूंजीगत खाते के सभी स्वायत्त लेन-देनों को जोड़ा जाता है, तो अंतिम संतुलन या तो अधिशेष या घाटा हो सकता है।

भारत के संदर्भ में BoP की स्थिति:

निष्कर्ष

विदेश व्यापार किसी देश की आर्थिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन भुगतान संतुलन (BoP) उसकी पूरी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक स्थिति का स्वास्थ्य कार्ड है। एक स्थायी BoP, विशेष रूप से एक प्रबंधनीय चालू खाता घाटा और स्थिर पूंजी प्रवाह, किसी भी देश की मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता, मुद्रा की मजबूती और निवेशकों के विश्वास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves / Forex Reserves)

अर्थ:

विदेशी मुद्रा भंडार, जिन्हें ‘फॉरेक्स रिज़र्व’ भी कहा जाता है, किसी देश के केंद्रीय बैंक (भारत के मामले में, RBI) द्वारा विदेशी मुद्राओं में रखी गई संपत्ति है। ये भंडार आमतौर पर बॉन्ड, ट्रेजरी बिल और अन्य विदेशी सरकारी प्रतिभूतियों के रूप में रखे जाते हैं। यह देश के लिए एक आर्थिक सुरक्षा कवच (Economic Safety Net) की तरह काम करता है, जो बाहरी आर्थिक झटकों से बचाता है।


भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के घटक

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में मुख्य रूप से चार घटक शामिल होते हैं:

  1. विदेशी मुद्रा आस्तियाँ (Foreign Currency Assets – FCA):
    • यह भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होता है।
    • इसमें अमेरिकी डॉलर, यूरो, पाउंड स्टर्लिंग, जापानी येन जैसी प्रमुख विदेशी मुद्राओं को रखा जाता है।
    • इन संपत्तियों को अन्य देशों के केंद्रीय बैंकों में जमा के रूप में या उन देशों की सरकारी प्रतिभूतियों (जैसे – अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड) में निवेश के रूप में रखा जाता है।
    • FCA का मूल्य डॉलर के मुकाबले अन्य मुद्राओं के घटने या बढ़ने से भी प्रभावित होता है।
  2. स्वर्ण (Gold):
    • यह RBI द्वारा अपने पास रखे गए सोने का भंडार है।
    • सोने को एक सुरक्षित निवेश (Safe Haven Asset) माना जाता है। वैश्विक अनिश्चितता या संकट के समय, जब मुद्राओं का मूल्य गिरता है, तब सोने का मूल्य अक्सर बढ़ जाता है। इसलिए, यह भंडार को स्थिरता प्रदान करता है।
  3. विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights – SDRs):
    • SDR अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा बनाई गई एक अंतरराष्ट्रीय आरक्षित संपत्ति है।
    • यह कोई मुद्रा नहीं है, बल्कि IMF के सदस्य देशों की मुद्राओं की एक टोकरी (Basket of Currencies) पर एक संभावित दावा है। इस टोकरी में अमेरिकी डॉलर, यूरो, चीनी युआन, जापानी येन और पाउंड स्टर्लिंग शामिल हैं।
    • IMF अपने सदस्य देशों को उनके कोटे के अनुपात में SDR आवंटित करता है।
  4. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास रिज़र्व ट्रेंच (Reserve Tranche Position – RTP):
    • यह किसी भी सदस्य देश द्वारा IMF को दिए गए कोटे का वह हिस्सा है जिसे वह देश बिना किसी शर्त के अपनी विदेशी मुद्रा की जरूरतों के लिए निकाल सकता है।

भारत में विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन

भारत में, विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षक और प्रबंधक भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) है। यह कार्य भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के प्रावधानों के तहत किया जाता है।


विदेशी मुद्रा भंडार का महत्व क्यों है?

एक मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके निम्नलिखित कारण हैं:

  1. भुगतान संतुलन संकट से बचाव: यह 1991 के संकट के दौरान सीखे गए सबसे बड़े सबक में से एक है। यदि देश का आयात उसके निर्यात से बहुत अधिक हो जाए और पूंजी का बहिर्वाह होने लगे, तो एक बड़ा भंडार उस घाटे को पूरा करने और अर्थव्यवस्था को ध्वस्त होने से बचाने में मदद करता है।
  2. रुपये को स्थिरता प्रदान करना: RBI विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करके रुपये की अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित कर सकता है।
    • यदि रुपया तेजी से कमजोर (Depreciate) हो रहा है, तो RBI बाजार में डॉलर बेचकर रुपये की आपूर्ति को कम करता है, जिससे रुपया स्थिर होता है।
    • यदि रुपया तेजी से मजबूत (Appreciate) हो रहा है (जो निर्यात के लिए हानिकारक हो सकता है), तो RBI बाजार से डॉलर खरीदकर रुपये की आपूर्ति बढ़ाता है।
  3. आयात कवर (Import Cover): भंडार का आकार यह मापने में मदद करता है कि देश कितने महीनों के आयात का भुगतान कर सकता है। 8 से 10 महीने का आयात कवर एक आरामदायक स्थिति मानी जाती है।
  4. निवेशकों और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का विश्वास: एक बड़ा भंडार वैश्विक निवेशकों (FDI और FPI) और मूडीज, एसएंडपी जैसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को विश्वास दिलाता है कि देश अपने बाहरी दायित्वों को पूरा करने में सक्षम है। इससे देश की क्रेडिट रेटिंग में सुधार होता है और विदेशी निवेश आकर्षित होता है।
  5. बाहरी ऋण चुकाने की क्षमता: यह सरकार को अपने विदेशी मुद्रा में लिए गए ऋणों और उस पर लगने वाले ब्याज को चुकाने में सक्षम बनाता है।
  6. राष्ट्रीय संप्रभुता और सामरिक स्वायत्तता: एक पर्याप्त भंडार बाहरी दबावों और IMF जैसी संस्थाओं पर निर्भरता को कम करता है, जिससे देश को अपनी आर्थिक नीतियां स्वतंत्र रूप से बनाने की शक्ति मिलती है।

उच्च विदेशी मुद्रा भंडार रखने की लागत (नकारात्मक पक्ष)

एक बड़ा भंडार फायदेमंद है, लेकिन इसे बनाए रखने की कुछ लागतें भी हैं:

  1. अवसर लागत (Opportunity Cost): विदेशी मुद्रा भंडार को आमतौर पर कम जोखिम वाले और कम प्रतिफल (Low Return) वाले विदेशी सरकारी बॉन्डों में निवेश किया जाता है। यदि इस धन को देश के भीतर बुनियादी ढांचे या सामाजिक क्षेत्र में निवेश किया जाता, तो यह उच्च आर्थिक प्रतिफल दे सकता था।
  2. मौद्रिक प्रबंधन की लागत: जब RBI बाजार से डॉलर खरीदता है, तो वह प्रणाली में उतनी ही मात्रा में रुपये डालता है। इससे अर्थव्यवस्था में तरलता (Liquidity) बढ़ जाती है, जो मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती है। इस अतिरिक्त तरलता को सोखने के लिए, RBI को सरकारी बॉन्ड बेचना पड़ता है (स्टरलाइजेशन ऑपरेशन), जिस पर उसे ब्याज देना पड़ता है, जो एक लागत है।

निष्कर्ष

संक्षेप में, विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश के लिए सिर्फ विदेशी मुद्राओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उसकी आर्थिक स्थिरता का एक महत्वपूर्ण मापक, बाहरी झटकों के खिलाफ एक ढाल, और वैश्विक मंच पर उसके विश्वास का प्रतीक है। इसका प्रबंधन सुरक्षा और अवसर लागत के बीच एक délicat संतुलन बनाने की कला है, जिसे RBI भारतीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुसार सफलतापूर्वक करता आ रहा है।


विनिमय दर प्रणाली (Exchange Rate Systems)

अर्थ:

विनिमय दर (Exchange Rate) वह दर है जिस पर किसी देश की मुद्रा का दूसरे देश की मुद्रा से विनिमय किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि $1 = ₹83 है, तो यह डॉलर और रुपये के बीच की विनिमय दर है।

विनिमय दर प्रणाली वह ढाँचा या नियमों का समूह है जिसके द्वारा कोई देश अपनी मुद्रा की विनिमय दर का प्रबंधन करता है। इसे मुख्य रूप से दो चरम प्रणालियों में वर्गीकृत किया जाता है: स्थिर और लचीली।


1. स्थिर/निश्चित विनिमय दर प्रणाली (Fixed/Pegged Exchange Rate System)

अर्थ:

यह एक ऐसी प्रणाली है जिसमें किसी देश की सरकार या केंद्रीय बैंक अपनी मुद्रा के मूल्य को किसी अन्य देश की मुद्रा (जैसे अमेरिकी डॉलर), मुद्राओं की एक टोकरी (Basket of currencies), या किसी वस्तु (जैसे सोना) के मुकाबले एक निश्चित स्तर पर तय (Fix or Peg) कर देता है।

यह कैसे काम करती है?

गुण (Pros):

  1. स्थिरता और पूर्वानुमेयता (Stability and Predictability): यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और निवेश में अनिश्चितता को कम करती है, जिससे व्यवसायों को योजना बनाने में आसानी होती है।
  2. मुद्रा सट्टेबाजी पर रोक: दर निश्चित होने के कारण सट्टेबाजों के लिए लाभ कमाना मुश्किल हो जाता है।
  3. मुद्रास्फीति पर नियंत्रण: यह सरकार को अनुशासित मौद्रिक नीति अपनाने के लिए मजबूर करती है ताकि मुद्रा का मूल्य स्थिर रहे।

अवगुण (Cons):

  1. मौद्रिक स्वायत्तता का अभाव: केंद्रीय बैंक का मुख्य ध्यान विनिमय दर को बनाए रखने पर होता है, न कि घरेलू आर्थिक लक्ष्यों (जैसे मुद्रास्फीति या बेरोजगारी को नियंत्रित करना) पर।
  2. बड़े विदेशी मुद्रा भंडार की आवश्यकता: दर को बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप करने हेतु केंद्रीय बैंक को हर समय एक बड़े विदेशी मुद्रा भंडार की आवश्यकता होती है।
  3. संकट का खतरा: यदि निवेशकों को लगता है कि केंद्रीय बैंक दर को बनाए रखने में असमर्थ होगा, तो वे उस मुद्रा के खिलाफ सट्टा लगा सकते हैं, जिससे एक गंभीर भुगतान संतुलन संकट पैदा हो सकता है (जैसे 1997 का एशियाई वित्तीय संकट)।

2. लचीली/अस्थिर विनिमय दर प्रणाली (Flexible/Floating Exchange Rate System)

अर्थ:

यह एक ऐसी प्रणाली है जिसमें किसी मुद्रा की विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाजार में उसकी मांग (Demand) और आपूर्ति (Supply) की बाजार शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है। इसमें सरकार या केंद्रीय बैंक का कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं होता है। इसे “स्वच्छ फ्लोट” (Clean Float) भी कहा जाता है।

यह कैसे काम करती है?

गुण (Pros):

  1. मौद्रिक नीति की स्वायत्तता: केंद्रीय बैंक विनिमय दर की चिंता किए बिना घरेलू मुद्रास्फीति, विकास और अन्य लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए स्वतंत्र है।
  2. भुगतान संतुलन में स्वत: समायोजन: यदि किसी देश में व्यापार घाटा है, तो उसकी मुद्रा स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाएगी, जिससे उसका निर्यात सस्ता और आयात महंगा हो जाएगा। यह अंततः घाटे को ठीक करने में मदद करता है।
  3. विदेशी मुद्रा भंडार की आवश्यकता नहीं: सैद्धांतिक रूप से, हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं होने के कारण बड़े भंडार रखने की जरूरत नहीं है।

अवगुण (Cons):

  1. अत्यधिक अस्थिरता (High Volatility): विनिमय दरों में दैनिक और तीव्र उतार-चढ़ाव से व्यापार और निवेश में भारी अनिश्चितता पैदा होती है।
  2. सट्टेबाजी को बढ़ावा: अस्थिरता सट्टेबाजों को अल्पकालिक लाभ कमाने का अवसर देती है, जो अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।
  3. आर्थिक झटके: अचानक बड़े पूंजी बहिर्वाह से मुद्रा में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे देश में मुद्रास्फीति का संकट पैदा हो सकता है।

प्रबंधित लचीली प्रणाली (Managed Float System): वास्तविकता

व्यवहार में, कोई भी देश पूरी तरह से स्थिर या पूरी तरह से लचीली प्रणाली का पालन नहीं करता है। अधिकांश देश, भारत सहित, एक मध्य मार्ग अपनाते हैं जिसे प्रबंधित लचीली प्रणाली (Managed Float) या “डर्टी फ्लोट” (Dirty Float) कहा जाता है।

यह क्या है?

यह भारत के लिए क्यों उपयुक्त है?


तुलनात्मक सारणी

आधारस्थिर विनिमय दर प्रणालीलचीली विनिमय दर प्रणाली
निर्धारणसरकार या केंद्रीय बैंक द्वारा तय की जाती है।बाजार में मांग और आपूर्ति द्वारा निर्धारित होती है।
अस्थिरतानगण्य (स्थिर रहती है)।बहुत अधिक (लगातार बदलती रहती है)।
हस्तक्षेपदर को बनाए रखने के लिए निरंतर हस्तक्षेप आवश्यक।सैद्धांतिक रूप से कोई हस्तक्षेप नहीं।
मौद्रिक स्वायत्ततानहीं होती।पूर्ण होती है।
मूल्य में परिवर्तनअवमूल्यन / पुनर्मूल्यन (सरकार द्वारा)।मूल्यह्रास / अधिमूल्यन (बाजार द्वारा)।
भारत का दृष्टिकोण(1991 से पहले काफी हद तक)प्रबंधित फ्लोट (वर्तमान प्रणाली)

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment – FDI)

अर्थ:

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का तात्पर्य किसी एक देश की कंपनी या व्यक्ति द्वारा दूसरे देश में स्थित व्यावसायिक हितों में किए गए दीर्घकालिक और स्थायी निवेश से है। FDI का उद्देश्य केवल पैसा लगाना नहीं, बल्कि उस विदेशी उद्यम पर महत्वपूर्ण प्रभाव या नियंत्रण स्थापित करना भी होता है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, यदि कोई विदेशी निवेशक किसी घरेलू कंपनी में 10% या उससे अधिक शेयर खरीदकर वोटिंग अधिकार प्राप्त करता है, तो उसे आमतौर पर FDI माना जाता है।

यह मुख्य रूप से भौतिक संपत्तियों (Physical Assets) में निवेश है, जैसे:

FDI का महत्व (यह क्यों वांछनीय है?):

  1. स्थिर पूंजी का स्रोत: FDI एक स्थिर और दीर्घकालिक निवेश है। इसे आसानी से और जल्दी से वापस नहीं निकाला जा सकता, इसलिए यह अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करता है।
  2. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer): विदेशी कंपनियाँ अपने साथ अक्सर उन्नत तकनीक, मशीनरी और उत्पादन प्रक्रियाएं लाती हैं, जिससे मेजबान देश के औद्योगिक क्षेत्र का आधुनिकीकरण होता है।
  3. प्रबंधकीय कौशल और सर्वोत्तम प्रथाएं: FDI के साथ बेहतर प्रबंधन तकनीकें, कॉर्पोरेट प्रशासन के मानक और संगठनात्मक कौशल भी आते हैं।
  4. रोजगार सृजन: नई कंपनियों और कारखानों की स्थापना से स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
  5. बुनियादी ढांचे का विकास: विदेशी कंपनियां अक्सर अपने संचालन के लिए सड़कें, बंदरगाह और संचार नेटवर्क जैसे सहायक बुनियादी ढांचे के विकास में भी योगदान करती हैं।
  6. निर्यात को बढ़ावा और प्रतिस्पर्धा में वृद्धि: FDI वाली कंपनियाँ अक्सर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा होती हैं, जिससे देश के निर्यात को बढ़ावा मिलता है और घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, जिसका लाभ अंततः उपभोक्ताओं को मिलता है।

भारत में FDI के मार्ग:


विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Investment – FPI)

(पहले इसे विदेशी संस्थागत निवेशक – Foreign Institutional Investor – FII के रूप में जाना जाता था। अब FII, FPI का ही एक हिस्सा है।)

अर्थ:

विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का तात्पर्य विदेशी निवेशकों द्वारा किसी दूसरे देश के वित्तीय बाजारों (Financial Markets) में किए गए अल्पकालिक निवेश से है। इसमें निवेशक का उद्देश्य कंपनी के प्रबंधन में कोई नियंत्रण हासिल करना नहीं होता, बल्कि उसका एकमात्र लक्ष्य वित्तीय लाभ (Financial Gain) कमाना होता है।

यह मुख्य रूप से वित्तीय संपत्तियों (Financial Assets) में निवेश है, जैसे:

FPI का महत्व:

  1. पूंजी बाजार को गहराई प्रदान करना: FPI से भारतीय शेयर बाजारों में तरलता (Liquidity) बढ़ती है, जिससे बाजार अधिक कुशल और जीवंत होते हैं।
  2. वित्तीय नवाचार: विदेशी निवेशक अपने साथ वित्तीय बाजारों के लिए नए उपकरण और विशेषज्ञता लाते हैं।
  3. घरेलू कंपनियों के लिए वित्त तक पहुंच: यह भारतीय कंपनियों को पूंजी जुटाने का एक और स्रोत प्रदान करता है।

FPI से जुड़ी चिंताएं (यह अस्थिर क्यों है?):


FDI बनाम FPI: एक तुलनात्मक विश्लेषण

आधारप्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI)
प्रकृति और उद्देश्यदीर्घकालिक और स्थायी। उद्देश्य – उत्पादन और प्रबंधन में भागीदारी।अल्पकालिक और सट्टा। उद्देश्य – केवल वित्तीय लाभ कमाना।
निवेश का प्रकारभौतिक संपत्तियों (कारखाना, मशीनरी, कंपनी) में निवेश।वित्तीय संपत्तियों (शेयर, बॉन्ड) में निवेश।
नियंत्रण (Control)निवेशक का मेजबान कंपनी के प्रबंधन पर महत्वपूर्ण प्रभाव या नियंत्रण होता है।निवेशक का कोई नियंत्रण नहीं होता, वह एक निष्क्रिय निवेशक होता है।
स्थिरता (Stability)अत्यधिक स्थिर। इसे निकालना मुश्किल और समय लेने वाला होता है।अत्यधिक अस्थिर (गर्म मुद्रा)। इसे कंप्यूटर के एक क्लिक से निकाला जा सकता है।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरणहाँ, अक्सर होता है।नहीं होता।
फोकस क्षेत्रअर्थव्यवस्था का वास्तविक क्षेत्र (Real Sector) – उद्योग, सेवाएं, बुनियादी ढांचा।अर्थव्यवस्था का वित्तीय क्षेत्र (Financial Sector) – पूंजी बाजार।
मेजबान देश के लिए जोखिमकम जोखिम भरा और अधिक फायदेमंद माना जाता है।अधिक जोखिम भरा, क्योंकि अचानक बहिर्वाह से संकट पैदा हो सकता है।

निष्कर्ष

संक्षेप में, FDI और FPI को “मैराथन धावक” और “स्प्रिंट धावक” के रूप में समझा जा सकता है।

एक विकासशील देश के रूप में, भारत को दोनों की आवश्यकता है। हालाँकि, दीर्घकालिक और सतत विकास के लिए, भारत की नीति हमेशा FPI की तुलना में स्थिर FDI को आकर्षित करने पर अधिक केंद्रित रही है, जबकि FPI द्वारा उत्पन्न अस्थिरता को प्रबंधित करने के उपाय भी किए जाते हैं।


भारत की विदेश व्यापार नीति (Foreign Trade Policy – FTP)

परिचय: विदेश व्यापार नीति क्या है?

विदेश व्यापार नीति (FTP) सरकार द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों और रणनीतियों का एक समूह है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश के निर्यात को बढ़ावा देना, आयात को सुगम बनाना और देश के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करना है। इसका प्राथमिक लक्ष्य वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना, आर्थिक विकास को गति देना, रोजगार सृजित करना और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना है।

भारत में, यह नीति वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry) के तहत विदेश व्यापार महानिदेशालय (Directorate General of Foreign Trade – DGFT) द्वारा तैयार और कार्यान्वित की जाती है।


भारत की व्यापार नीति का विकास (Evolution)

भारत की व्यापार नीति को मुख्य रूप से दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है:

  1. 1991 से पहले (स्वतंत्रता से 1990 तक):
    • नीति: यह युग आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution) और संरक्षणवाद (Protectionism) पर आधारित था।
    • दृष्टिकोण: इसे “अंतर्मुखी नीति” (Inward-looking Policy) कहा जाता था। इसका उद्देश्य घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना और आत्मनिर्भरता हासिल करना था।
    • उपकरण: उच्च आयात शुल्क (High Tariffs), आयात कोटा (Quotas), और एक जटिल लाइसेंसिंग प्रणाली का उपयोग किया जाता था।
    • परिणाम: इस नीति ने घरेलू उद्योगों की रक्षा तो की, लेकिन इसने प्रतिस्पर्धा को कम कर दिया, नवाचार को हतोत्साहित किया और भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग कर दिया।
  2. 1991 के बाद (आर्थिक सुधारों का युग):
    • नीति: 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद, नीति में एक बड़ा प्रतिमान विस्थापन (Paradigm Shift) हुआ। अब फोकस निर्यात संवर्धन (Export Promotion) और वैश्वीकरण पर था।
    • दृष्टिकोण: इसे “बहिर्मुखी नीति” (Outward-looking Policy) कहा जाता है।
    • उपकरण: आयात शुल्कों में कमी की गई, लाइसेंस राज को समाप्त किया गया और अर्थव्यवस्था को विदेशी व्यापार और निवेश के लिए खोल दिया गया।
    • परिणाम: भारत का विदेशी व्यापार कई गुना बढ़ा, और देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

विदेश व्यापार नीति (FTP) 2023: वर्तमान नीति

सरकार ने 1 अप्रैल, 2023 को एक नई विदेश व्यापार नीति (FTP 2023) का अनावरण किया। यह नीति पिछली पंचवर्षीय योजनाओं के दृष्टिकोण से अलग है।

FTP 2023 की मुख्य विशेषताएं और दर्शन:

  1. कोई अंतिम तिथि नहीं (No End Date):
    • यह FTP 2023 की सबसे अनूठी विशेषता है। पिछली नीतियां 5 साल की अवधि के लिए होती थीं। इस नीति की कोई अंतिम तिथि नहीं है और इसे वैश्विक व्यापार परिदृश्य में बदलाव के अनुसार गतिशील रूप से (Dynamically) अद्यतन किया जाएगा। इससे नीति में निरंतरता और लचीलापन आता है।
  2. लक्ष्य:
    • वर्ष 2030 तक भारत के कुल निर्यात (वस्तुओं और सेवाओं दोनों) को 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाना।
  3. चार स्तंभ (Four Pillars): यह नीति चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित है:
    • (i) प्रोत्साहनों से छूट की ओर बढ़ना (Shift from Incentive to Remission)।
    • (ii) सहयोग के माध्यम से निर्यात संवर्धन (Export promotion through collaboration)।
    • (iii) व्यापार करने में आसानी (Ease of Doing Business)।
    • (iv) उभरते क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना (Focus on Emerging Areas)।

नीति के प्रमुख प्रावधान:

  1. प्रोत्साहन से छूट की ओर बढ़ना (Shift from Incentive to Remission):
    • नीति का फोकस निर्यातकों को प्रत्यक्ष सब्सिडी या प्रोत्साहन देने के बजाय, उन पर लगे करों और शुल्कों को वापस करने (Remission/Neutralization) पर है, ताकि वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सकें। यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के भी अनुरूप है।
    • योजनाएं: RoDTEP (Remission of Duties and Taxes on Exported Products) जैसी योजनाएं इसी दर्शन पर आधारित हैं।
  2. निर्यात हब के रूप में जिलों का विकास (Districts as Export Hubs):
    • “सहकारी संघवाद” की भावना को बढ़ावा देते हुए, यह नीति राज्यों, जिलों और भारतीय मिशनों के साथ मिलकर निर्यात को जमीनी स्तर पर बढ़ावा देने पर जोर देती है।
    • प्रत्येक जिले की विशिष्ट क्षमता वाले उत्पादों (जैसे – मुरादाबाद का पीतल, वाराणसी की साड़ियां) को पहचानकर उनके निर्यात को प्रोत्साहित किया जाएगा।
  3. व्यापार करने में आसानी, लेन-देन लागत में कमी:
    • पूरी प्रक्रिया को स्वचालित (Automatic) और ऑनलाइन किया जा रहा है ताकि मानवीय हस्तक्षेप कम हो।
    • शुल्क में कमी और प्रौद्योगिकी के उपयोग से निर्यातकों के लिए लेन-देन की लागत को कम करने पर जोर दिया गया है।
  4. उभरते क्षेत्रों पर ध्यान:
    • नीति में ई-कॉमर्स निर्यात को एक प्रमुख फोकस क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है। ई-कॉमर्स निर्यात के लिए प्रति शिपमेंट मूल्य सीमा को ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख कर दिया गया है।
    • डेयरी, परिधान, और हरित हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों से निर्यात को बढ़ावा देने पर भी जोर है।
    • SCOMET नीति: विशेष रसायनों, जीवों, सामग्रियों, उपकरणों और प्रौद्योगिकियों (Special Chemicals, Organisms, Materials, Equipment and Technologies – SCOMET) के निर्यात के लिए नीति को और सुव्यवस्थित किया गया है, जो संवेदनशील दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं से संबंधित है।
  5. निर्यात उत्कृष्टता के शहर (Towns of Export Excellence – TEE):
    • मौजूदा 39 शहरों के अलावा, चार नए शहरों – फरीदाबाद, मुरादाबाद, मिर्जापुर, और वाराणसी – को TEE के रूप में नामित किया गया है। इन शहरों को अपने उत्पादों का निर्यात बढ़ाने के लिए विशेष सहायता मिलती है।
  6. अमानत योजना (Amnesty Scheme):
    • निर्यात दायित्वों को पूरा न कर पाने वाले निर्यातकों को राहत देने के लिए “विवाद से विश्वास” की तर्ज पर एकमुश्त समाधान योजना शुरू की गई है।

चुनौतियाँ और आगे की राह:

निष्कर्ष:

भारत की विदेश व्यापार नीति 2023 एक दूरदर्शी, लचीली और सहयोगात्मक नीति है जो पुराने प्रोत्साहन-आधारित मॉडल से हटकर एक स्थायी और WTO-अनुपालक छूट-आधारित प्रणाली की ओर बढ़ती है। इसका उद्देश्य भारत को केवल एक निर्यातक के रूप में नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला भागीदार के रूप में स्थापित करना है, जो “लोकल गोज ग्लोबल” और “मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड” के दृष्टिकोण को साकार करने में मदद करेगा।


अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठन यूपीएससी के सामान्य अध्ययन (GS Paper 2 – अंतर्राष्ट्रीय संबंध) और (GS Paper 3 – अर्थव्यवस्था) दोनों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। ये संगठन वैश्विक आर्थिक प्रशासन की रीढ़ हैं।

यहाँ प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों का एक विस्तृत, संरचित और विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत है।


परिचय: वैश्विक आर्थिक शासन

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, वैश्विक नेताओं ने एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था बनाने की कोशिश की जो भविष्य में आर्थिक संकटों और संघर्षों को रोक सके। इसी उद्देश्य से 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स (Bretton Woods) में एक सम्मेलन हुआ, जिसने तीन प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों की नींव रखी, जिन्हें अक्सर “ब्रेटन वुड्स ट्विन्स” और उनकी सहयोगी संस्था के रूप में जाना जाता है। इनका लक्ष्य वैश्विक आर्थिक स्थिरता, पुनर्निर्माण और व्यापार को बढ़ावा देना था।


1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund – IMF)

मुख्य उद्देश्य:

IMF का प्राथमिक उद्देश्य वैश्विक मौद्रिक सहयोग सुनिश्चित करना, वित्तीय स्थिरता हासिल करना, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुगम बनाना और सदस्य देशों के भुगतान संतुलन (Balance of Payments – BoP) की कठिनाइयों को दूर करने में मदद करना है। यह एक विकास बैंक नहीं है, बल्कि एक संकट प्रबंधक (Crisis Manager) है।

प्रमुख कार्य:

  1. निगरानी (Surveillance): IMF सदस्य देशों की आर्थिक और वित्तीय नीतियों पर नजर रखता है और उन्हें नीतिगत सलाह देता है ताकि वे आर्थिक संकटों से बच सकें।
  2. वित्तीय सहायता (Financial Assistance): जब कोई सदस्य देश गंभीर BoP संकट का सामना करता है (जैसे 1991 में भारत), तो IMF उसे उबरने के लिए अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है।
  3. सशर्तता (Conditionalities): यह IMF की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद विशेषता है। IMF अपने ऋणों के साथ संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम (Structural Adjustment Programs – SAPs) के रूप में कड़ी शर्तें लगाता है, जिसमें सरकारों को अपने खर्च कम करने, सब्सिडी खत्म करने और अर्थव्यवस्था को उदार बनाने जैसे कदम उठाने पड़ते हैं।
  4. तकनीकी सहायता: यह केंद्रीय बैंकों और वित्त मंत्रालयों को उनकी क्षमता निर्माण में मदद करता है।

शासन और सुधार:

प्रमुख प्रकाशन:


2. विश्व बैंक समूह (The World Bank Group)

मुख्य उद्देश्य:

IMF के विपरीत, विश्व बैंक एक विकास बैंक (Development Bank) है। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों, विशेष रूप से विकासशील देशों में, गरीबी उन्मूलन और सतत विकास के लिए दीर्घकालिक पूंजी और तकनीकी सहायता प्रदान करना है।

विश्व बैंक समूह की पाँच संस्थाएँ:

  1. IBRD (पुनर्निर्माण और विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय बैंक): यह मध्यम-आय और साख-योग्य गरीब देशों को ऋण प्रदान करता है।
  2. IDA (अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ): यह “सॉफ्ट लोन विंडो” है जो दुनिया के सबसे गरीब देशों को ब्याज-मुक्त ऋण और अनुदान प्रदान करता है।
  3. IFC (अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम): यह विकासशील देशों में निजी क्षेत्र (Private Sector) को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
  4. MIGA (बहुपक्षीय निवेश गारंटी एजेंसी): यह विकासशील देशों में FDI को बढ़ावा देने के लिए निवेशकों को राजनीतिक जोखिम बीमा प्रदान करता है।
  5. ICSID (निवेश विवादों के निपटारे के लिए अंतर्राष्ट्रीय केंद्र): यह अंतर्राष्ट्रीय निवेश विवादों के समाधान के लिए एक मंच प्रदान करता है। (भारत इसका सदस्य नहीं है)।

आलोचना:

प्रमुख प्रकाशन:


3. विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization – WTO)

मुख्य उद्देश्य:

WTO एकमात्र वैश्विक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जो राष्ट्रों के बीच व्यापार के नियमों से निपटता है। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि व्यापार सुचारू रूप से, अनुमानित रूप से और यथासंभव स्वतंत्र रूप से हो।

प्रमुख कार्य और सिद्धांत:

  1. व्यापार वार्ता का मंच: यह सदस्य देशों को व्यापार बाधाओं को कम करने के लिए एक मंच प्रदान करता है (जैसे, दोहा विकास दौर)।
  2. विवाद निपटान (Dispute Settlement): इसकी एक शक्तिशाली विवाद निपटान संस्था (Dispute Settlement Body) है जो व्यापार विवादों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी निर्णय देती है।
  3. व्यापार नियमों का प्रशासन: यह GATS (सेवाओं में व्यापार), TRIPS (बौद्धिक संपदा) जैसे विभिन्न समझौतों का प्रशासन करता है।
  4. प्रमुख सिद्धांत:
    • गैर-भेदभाव: इसमें दो घटक हैं – मोस्ट-फेवर्ड-नेशन (MFN) (सभी WTO सदस्यों के साथ समान व्यवहार) और राष्ट्रीय व्यवहार (आयातित और घरेलू वस्तुओं के साथ समान व्यवहार)।
    • पारदर्शिता: व्यापार नियमों को पारदर्शी और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना चाहिए।

भारत और WTO:

आलोचना:


उभरते हुए नए संगठन: एक विकल्प?

ब्रेटन वुड्स संस्थानों के प्रभुत्व और उनकी सुधार की धीमी गति की प्रतिक्रिया में, हाल के वर्षों में कुछ नए संगठन उभरे हैं:

4. न्यू डेवलपमेंट बैंक (New Development Bank – NDB)

5. एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (Asian Infrastructure Investment Bank – AIIB)


निष्कर्ष

अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नियम-आधारित व्यवस्था प्रदान करते हैं, लेकिन वे शक्ति असंतुलन और प्रतिनिधित्व के मुद्दों से ग्रस्त हैं। IMF और विश्व बैंक जैसे पारंपरिक संगठन अभी भी केंद्रीय भूमिका निभाते हैं, लेकिन NDB और AIIB जैसे नए संस्थानों का उदय एक अधिक बहुध्रुवीय (Multipolar) वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की ओर संकेत करता है, जहाँ भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज और भूमिका बढ़ रही है। इन संस्थानों में निरंतर सुधार उनकी भविष्य की प्रासंगिकता के लिए महत्वपूर्ण है।