मानव विकास सूचकांक (Human Development Index – HDI)
परिभाषा:
मानव विकास सूचकांक एक समग्र सांख्यिकीय सूचकांक (composite statistical index) है, जिसका उपयोग किसी देश में मानव विकास के औसत स्तर को मापने के लिए किया जाता है। यह सूचकांक केवल आर्थिक समृद्धि (जैसे प्रति व्यक्ति आय) पर ध्यान केंद्रित नहीं करता, बल्कि यह शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मानवीय पहलुओं को भी समान महत्व देता है।
अवधारणा का विकास:
- HDI की अवधारणा पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब-उल-हक द्वारा विकसित की गई थी।
- भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने इस अवधारणा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- इसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (United Nations Development Programme – UNDP) द्वारा 1990 से अपनी वार्षिक मानव विकास रिपोर्ट (Human Development Report – HDR) में प्रकाशित किया जा रहा है।
मूल दर्शन:
HDI का मूल दर्शन यह है कि किसी देश के विकास का वास्तविक मापक उसकी आय नहीं, बल्कि उसके लोगों का स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर है। विकास का अंतिम लक्ष्य लोगों के जीवन में सुधार लाना और उनकी क्षमताओं (capabilities) का विस्तार करना है।
HDI के तीन प्रमुख आयाम और संकेतक (Three Key Dimensions and Indicators)
HDI की गणना तीन मुख्य आयामों में किसी देश की औसत उपलब्धि को मापकर की जाती है। प्रत्येक आयाम के लिए एक विशिष्ट संकेतक का उपयोग किया जाता है:
| आयाम (Dimension) | संकेतक (Indicator) | इसका अर्थ क्या है? |
| 1. एक लंबा और स्वस्थ जीवन (A Long and Healthy Life) | जन्म के समय जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy at Birth) | यह मापता है कि एक नवजात शिशु औसतन कितने वर्षों तक जीवित रहने की उम्मीद कर सकता है। यह स्वास्थ्य और स्वच्छता के स्तर को दर्शाता है। |
| 2. ज्ञान (Knowledge) | a) स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष (Expected Years of Schooling)<br>b) स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष (Mean Years of Schooling) | a) यह मापता है कि एक बच्चा अपने जीवनकाल में कितने वर्ष की स्कूली शिक्षा प्राप्त करने की उम्मीद कर सकता है।<br>b) यह मापता है कि 25 वर्ष और उससे अधिक आयु के वयस्क औसतन कितने वर्ष की शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। |
| 3. एक सभ्य जीवन स्तर (A Decent Standard of Living) | प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income – GNI per capita) (क्रय शक्ति समता – PPP $ में) | यह मापता है कि देश के प्रत्येक व्यक्ति के पास औसतन कितनी क्रय शक्ति है, जिससे उसकी संसाधनों तक पहुँच का पता चलता है। |
गणना की विधि:
- इन तीनों आयामों के लिए एक मान (value) की गणना की जाती है, जो 0 से 1 के बीच होता है (जहाँ 1 उच्चतम मान है)।
- फिर इन तीन आयाम सूचकांकों का ज्यामितीय माध्य (geometric mean) निकालकर HDI स्कोर प्राप्त किया जाता है।
- HDI स्कोर 0 से 1 के बीच होता है। स्कोर जितना अधिक होता है, मानव विकास का स्तर उतना ही उच्च माना जाता है।
देशों का वर्गीकरण
UNDP, HDI स्कोर के आधार पर देशों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत करता है:
- बहुत उच्च मानव विकास (Very High Human Development): 0.800 और उससे ऊपर
- उच्च मानव विकास (High Human Development): 0.700 – 0.799
- मध्यम मानव विकास (Medium Human Development): 0.550 – 0.699
- निम्न मानव विकास (Low Human Development): 0.550 से नीचे
HDI का महत्व (Significance of HDI)
- विकास के दृष्टिकोण में बदलाव:
- HDI ने विकास के फोकस को सिर्फ आर्थिक विकास (GDP) से हटाकर मानव-केंद्रित विकास (human-centric development) पर स्थानांतरित कर दिया है।
- व्यापक मापक:
- यह आय के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य को भी शामिल करता है, जो विकास का एक अधिक समग्र और संतुलित चित्र प्रस्तुत करता है।
- नीति निर्माण के लिए उपकरण:
- यह सरकारों को यह पहचानने में मदद करता है कि किन क्षेत्रों (जैसे स्वास्थ्य या शिक्षा) में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय तुलना:
- यह विभिन्न देशों के बीच मानव विकास के स्तर की तुलना करने के लिए एक उपयोगी उपकरण है।
- सार्वजनिक बहस को प्रेरित करना:
- HDI की रैंकिंग पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहस होती है, जिससे सरकारें मानव विकास के मुद्दों पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित होती हैं।
HDI की आलोचना और सीमाएँ
- सीमित संकेतक:
- आलोचकों का तर्क है कि यह केवल तीन आयामों को मापता है और राजनीतिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार, लैंगिक समानता, आय असमानता और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को छोड़ देता है।
- आंकड़ों की गुणवत्ता:
- इसकी गणना के लिए उपयोग किए जाने वाले आंकड़े हमेशा विश्वसनीय और तुलनीय नहीं होते हैं।
- केवल औसत को मापना:
- HDI एक औसत माप है और यह देश के भीतर मौजूद व्यापक असमानताओं को नहीं दर्शाता है।
इन सीमाओं को दूर करने के लिए, UNDP अब HDI के साथ-साथ कुछ अन्य पूरक सूचकांक भी जारी करता है, जैसे:
- असमानता-समायोजित HDI (Inequality-adjusted HDI – IHDI)
- लैंगिक विकास सूचकांक (Gender Development Index – GDI)
- लैंगिक असमानता सूचकांक (Gender Inequality Index – GII)
- बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index – MPI)
निष्कर्ष:
अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद, मानव विकास सूचकांक (HDI) विकास को मापने और समझने के तरीके में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया है। यह एक शक्तिशाली अनुस्मारक है कि विकास का असली धन लोग हैं, और आर्थिक विकास केवल एक साधन है, साध्य (end) नहीं।
गरीबी का मापन (Measurement of Poverty in India)
गरीबी की परिभाषा:
गरीबी वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (basic necessities) जैसे- भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य को पूरा करने में असमर्थ होता है।
भारत में गरीबी का आकलन पारंपरिक रूप से उपभोग व्यय (Consumption Expenditure) के आधार पर किया जाता है, न कि आय (income) के आधार पर। ऐसा इसलिए है क्योंकि आय का सटीक डेटा एकत्र करना मुश्किल होता है और उपभोग जीवन स्तर का एक बेहतर संकेतक माना जाता है।
गरीबी रेखा (Poverty Line)
परिभाषा:
गरीबी रेखा एक काल्पनिक रेखा है जो उस न्यूनतम आय या उपभोग व्यय के स्तर को दर्शाती है जो एक व्यक्ति को अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक है। जो लोग इस रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं, उन्हें “गरीब” (Below Poverty Line – BPL) माना जाता है, और जो लोग इससे ऊपर होते हैं, उन्हें “गैर-गरीब” (Above Poverty Line – APL) माना जाता है।
मापन का आधार:
- भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण मुख्य रूप से न्यूनतम कैलोरी आवश्यकता (Minimum Calorie Intake) पर आधारित रहा है।
- यह माना जाता है कि एक व्यक्ति को स्वस्थ रहने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रतिदिन की आवश्यकता होती है।
- गरीबी रेखा वह मौद्रिक राशि (money value) है जो इन कैलोरी को भोजन के रूप में खरीदने के साथ-साथ कुछ अन्य गैर-खाद्य आवश्यक वस्तुओं (जैसे कपड़े, ईंधन) पर खर्च करने के लिए आवश्यक है।
भारत में गरीबी आकलन का इतिहास और प्रमुख समितियाँ
समय-समय पर गरीबी के आकलन की पद्धति की समीक्षा करने और उसे बेहतर बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा कई समितियों का गठन किया गया है।
1. वाई. के. अलघ समिति (1979)
- यह गरीबी का आकलन करने के लिए गठित शुरुआती महत्वपूर्ण समितियों में से एक थी।
- मुख्य सिफारिश: इसने पहली बार पोषाहार आवश्यकताओं (nutritional requirements) के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 कैलोरी का मानक तय किया।
2. लकड़ावाला समिति (1993)
इस समिति ने गरीबी के आकलन को और अधिक परिष्कृत किया।
- प्रमुख सिफारिशें:
- राज्य-विशिष्ट गरीबी रेखा: इसने सुझाव दिया कि प्रत्येक राज्य की अपनी अलग गरीबी रेखा होनी चाहिए, क्योंकि कीमतों का स्तर अलग-अलग राज्यों में भिन्न होता है।
- CPI का उपयोग: इसने सुझाव दिया कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी के आकलन के लिए कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-AL) और शहरी क्षेत्रों के लिए औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-IW) का उपयोग किया जाना चाहिए।
- इसने कैलोरी आधारित खपत को ही आकलन का आधार बनाए रखा, लेकिन गणना की विधि को और वैज्ञानिक बनाया।
3. तेंदुलकर समिति (2009)
प्रोफेसर सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने गरीबी आकलन की पद्धति में एक क्रांतिकारी बदलाव किया।
- मुख्य बदलाव:
- कैलोरी से परे जाना: समिति ने तर्क दिया कि गरीबी केवल भूख तक सीमित नहीं है। इसलिए, इसने गरीबी की टोकरी में केवल कैलोरी को ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और परिवहन जैसे अन्य महत्वपूर्ण गैर-खाद्य खर्चों को भी शामिल किया।
- एकसमान टोकरी: इसने ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों के लिए एक एकसमान उपभोग टोकरी (uniform consumption basket) का उपयोग किया, हालांकि इन टोकरियों का मौद्रिक मूल्य अलग-अलग था।
- मिक्सड रेफरेंस पीरियड (MRP): इसने डेटा संग्रह के लिए एक मिश्रित संदर्भ अवधि का उपयोग किया।
- गरीबी रेखा:
- तेंदुलकर समिति ने 2011-12 के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ₹816 प्रति व्यक्ति प्रति माह और शहरी क्षेत्रों के लिए ₹1000 प्रति व्यक्ति प्रति माह का उपभोग व्यय गरीबी रेखा के रूप में निर्धारित किया। (अर्थात, ग्रामीण क्षेत्र में लगभग ₹27 प्रतिदिन और शहरी क्षेत्र में लगभग ₹33 प्रतिदिन)।
- विवाद:
- इसकी गरीबी रेखा के अत्यंत निम्न स्तर के कारण इसकी बहुत आलोचना हुई।
4. रंगराजन समिति (2014)
तेंदुलकर समिति की आलोचनाओं के जवाब में, सरकार ने सी. रंगराजन की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया।
- प्रमुख बदलाव:
- नई गरीबी रेखा: इस समिति ने तेंदुलकर समिति द्वारा निर्धारित रेखा से ऊंची गरीबी रेखा की सिफारिश की।
- पोषाहार पर पुनः जोर: इसने पोषक तत्वों (प्रोटीन और वसा सहित) की एक निश्चित मात्रा के साथ-साथ गैर-खाद्य वस्तुओं पर होने वाले औसत खर्च को गरीबी रेखा का आधार बनाया।
- गरीबी रेखा:
- रंगराजन समिति ने 2011-12 के लिए ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ₹972 प्रति व्यक्ति प्रति माह और शहरी क्षेत्रों के लिए ₹1407 प्रति व्यक्ति प्रति माह की गरीबी रेखा निर्धारित की। (अर्थात, ग्रामीण क्षेत्र में लगभग ₹32 प्रतिदिन और शहरी क्षेत्र में लगभग ₹47 प्रतिदिन)।
- सरकार का रुख:
- रंगराजन समिति की रिपोर्ट को सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया।
- वर्तमान में, भारत सरकार आधिकारिक रूप से तेंदुलकर समिति की गरीबी आकलन पद्धति का ही उपयोग करती है।
नीति आयोग टास्क फोर्स और बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI)
- वर्तमान में, भारत में गरीबी का आकलन नीति आयोग की देखरेख में किया जाता है।
- नीति आयोग अब बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index – MPI) पर भी जोर दे रहा है, जो केवल मौद्रिक गरीबी को नहीं मापता, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़े 10 संकेतकों के आधार पर गरीबी का आकलन करता है। यह गरीबी की एक अधिक व्यापक और यथार्थवादी तस्वीर प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष:
भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण हमेशा से एक विवादास्पद विषय रहा है। जहाँ लकड़ावाला समिति ने कैलोरी मॉडल को परिष्कृत किया, वहीं तेंदुलकर समिति ने गरीबी की परिभाषा को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे गैर-खाद्य मदों को शामिल करके व्यापक बनाया। रंगराजन समिति ने इस परिभाषा को और भी यथार्थवादी बनाने का प्रयास किया। हालाँकि, ये सभी विधियाँ उपभोग पर आधारित हैं, और अब बहुआयामी गरीबी जैसे व्यापक दृष्टिकोणों को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
बेरोजगारी क्या है? (What is Unemployment?)
परिभाषा:
बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमें एक कार्य-सक्षम व्यक्ति (able to work), जो प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने का इच्छुक (willing to work) है, को उसकी योग्यता के अनुसार रोजगार (काम) नहीं मिल पाता है।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- केवल वही व्यक्ति ‘बेरोजगार’ कहलाता है जो सक्रिय रूप से काम की तलाश कर रहा है।
- कार्य-सक्षम जनसंख्या (Working Age Population): सामान्यतः 15 से 59 वर्ष की आयु के लोगों को कार्य-सक्षम माना जाता है।
- कौन बेरोजगार नहीं हैं?: वे लोग जो अपनी इच्छा से काम नहीं करना चाहते (जैसे छात्र, गृहिणी), बीमार व्यक्ति, या सेवानिवृत्त लोग, उन्हें ‘बेरोजगार’ की श्रेणी में नहीं गिना जाता।
श्रम बल (Labour Force):
यह देश में कार्य कर रहे लोगों (नियोजित) और काम की तलाश कर रहे लोगों (बेरोजगार) का कुल योग है।
श्रम बल = नियोजित (Employed) + बेरोजगार (Unemployed)
बेरोजगारी दर (Unemployment Rate):
बेरोजगारी दर = (बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या / कुल श्रम बल) x 100
बेरोजगारी के प्रकार (Types of Unemployment)
भारत जैसे विकासशील देश में कई प्रकार की बेरोजगारी पाई जाती है:
A. ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी
1. प्रच्छन्न/छिपी हुई बेरोजगारी (Disguised Unemployment):
- परिभाषा: यह वह स्थिति है जहाँ किसी काम में आवश्यकता से अधिक लोग लगे होते हैं। यदि इनमें से कुछ लोगों को काम से हटा भी दिया जाए, तो कुल उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- इन अतिरिक्त श्रमिकों की सीमांत उत्पादकता (Marginal Productivity) शून्य होती है।
- उदाहरण: कृषि क्षेत्र में यह बहुत आम है। यदि एक छोटे से खेत पर एक परिवार के 5 सदस्य काम कर रहे हैं, जबकि वास्तव में केवल 3 लोगों की ही जरूरत है, तो बाकी 2 लोग प्रच्छन्न रूप से बेरोजगार हैं।
2. मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment):
- परिभाषा: जब लोगों को वर्ष के केवल कुछ महीनों या मौसमों में ही काम मिलता है और बाकी समय वे बेरोजगार रहते हैं।
- उदाहरण: कृषि क्षेत्र में, यह बुवाई और कटाई के मौसम में अधिक रोजगार और बीच के समय में बेरोजगारी की स्थिति पैदा करता है। इसके अलावा, पर्यटन, चीनी मिलें, और बर्फ के कारखानों में भी मौसमी बेरोजगारी देखी जाती है।
B. शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी
3. औद्योगिक/संरचनात्मक बेरोजगारी (Industrial/Structural Unemployment):
- परिभाषा: यह बेरोजगारी अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तनों (structural changes) के कारण उत्पन्न होती है।
- कारण:
- तकनीकी परिवर्तन: नई तकनीक आने से पुराने कौशल वाले श्रमिक बेरोजगार हो जाते हैं (जैसे- कंप्यूटर आने से टाइपिस्टों की मांग कम हो जाना)।
- मांग के पैटर्न में बदलाव: किसी वस्तु की मांग कम होने से उस उद्योग में काम कर रहे लोग बेरोजगार हो जाते हैं।
- कौशल का अभाव: श्रमिकों में उद्योगों की मांग के अनुसार कौशल (skills) का न होना।
- यह एक दीर्घकालिक प्रकृति की बेरोजगारी है। भारत में पाई जाने वाली अधिकांश बेरोजगारी इसी प्रकार की है।
4. शिक्षित बेरोजगारी (Educated Unemployment):
- परिभाषा: जब शिक्षित और योग्य व्यक्तियों को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार नहीं मिल पाता।
- उदाहरण: इंजीनियरिंग की डिग्री या M.A. की डिग्री वाले व्यक्ति का क्लर्क की नौकरी करना या बेरोजगार रहना।
C. अन्य प्रकार की बेरोजगारी
5. घर्षणात्मक बेरोजगारी (Frictional Unemployment):
- परिभाषा: यह अस्थायी (temporary) बेरोजगारी है जो तब उत्पन्न होती है जब कोई व्यक्ति एक नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी की तलाश कर रहा होता है।
- यह नौकरी बदलने की प्रक्रिया के बीच के समय अंतराल के कारण होती है। यह किसी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था का एक स्वाभाविक हिस्सा है।
6. चक्रीय बेरोजगारी (Cyclical Unemployment):
- परिभाषा: यह बेरोजगारी आर्थिक चक्र (Business Cycle) में आने वाले उतार-चढ़ाव (boom and recession) के कारण उत्पन्न होती है।
- कारण: जब अर्थव्यवस्था में मंदी (recession) आती है, तो कुल मांग घट जाती है, जिससे उत्पादन कम हो जाता है और कंपनियाँ कर्मचारियों की छंटनी करने लगती हैं।
- यह विकसित पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं की एक आम विशेषता है।
भारत में बेरोजगारी का मापन (Measurement of Unemployment in India)
भारत में बेरोजगारी के आंकड़ों का संग्रह और प्रकाशन मुख्य रूप से राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (National Statistical Office – NSO) (पूर्व में NSSO) द्वारा आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey – PLFS) के माध्यम से किया जाता है।
NSO बेरोजगारी को मापने के लिए मुख्य रूप से दो दृष्टिकोणों का उपयोग करता है:
1. सामान्य स्थिति (Usual Status – US):
- अवधारणा: इस दृष्टिकोण में यह देखा जाता है कि सर्वेक्षण की तारीख से पिछले 365 दिनों (एक वर्ष) में किसी व्यक्ति की गतिविधि की स्थिति क्या रही।
- यदि किसी व्यक्ति को वर्ष के अधिकांश समय (यानी 183 दिन या उससे अधिक) कोई लाभकारी काम नहीं मिलता है, तो उसे ‘बेरोजगार’ माना जाता है।
- यह दीर्घकालिक या स्थायी बेरोजगारी का एक अच्छा मापक है।
2. वर्तमान साप्ताहिक स्थिति (Current Weekly Status – CWS):
- अवधारणा: इसमें यह देखा जाता है कि सर्वेक्षण की तारीख से पिछले 7 दिनों में किसी व्यक्ति की गतिविधि की स्थिति क्या थी।
- यदि किसी व्यक्ति को सर्वेक्षण सप्ताह के दौरान एक घंटे का भी काम नहीं मिलता है, तो उसे ‘बेरोजगार’ माना जाता है।
- यह बेरोजगारी का एक अधिक संवेदनशील मापक है और अर्थव्यवस्था में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को दर्शाता है।
(नोट: पहले एक “वर्तमान दैनिक स्थिति” का भी उपयोग होता था, जो एक दिन में बेरोजगारी को मापता था, लेकिन PLFS मुख्य रूप से उपरोक्त दो पर ध्यान केंद्रित करता है।)
निष्कर्ष:
बेरोजगारी भारत के लिए एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती है। इसकी विभिन्न प्रकृतियों (जैसे प्रच्छन्न, संरचनात्मक) को समझना आवश्यक है ताकि सरकार कौशल विकास, औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन की सही नीतियां बना सके।
भारत में असमानता (Inequality in India)
परिभाषा:
असमानता का तात्पर्य समाज में अवसरों (opportunities), संसाधनों (resources) और परिणामों (outcomes) के असमान या अन्यायपूर्ण वितरण (unequal or unjust distribution) से है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी के पास ठीक-ठीक बराबर धन हो, बल्कि इसका गहरा अर्थ यह है कि कुछ लोगों या समूहों को दूसरों की तुलना में जीवन में आगे बढ़ने के कम अवसर मिलते हैं।
भारत में असमानता के प्रमुख रूप (Major Forms of Inequality in India)
भारत में असमानता कई रूपों में मौजूद है:
1. आर्थिक असमानता (Economic Inequality):
- यह असमानता का सबसे स्पष्ट रूप है। इसे दो भागों में बांटा जा सकता है:
- (क) आय असमानता (Income Inequality): लोगों की कमाई के बीच का विशाल अंतर।
- (ख) धन/संपत्ति असमानता (Wealth Inequality): लोगों के पास मौजूद संपत्ति (जैसे – जमीन, मकान, स्टॉक) के मूल्य में भारी अंतर।
- आंकड़े (ऑक्सफैम रिपोर्ट के अनुसार):
- भारत के शीर्ष 1% लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 40%) है, जबकि नीचे की 50% आबादी के पास बहुत कम हिस्सा (लगभग 3%) है।
- यह खाई महामारी के बाद और भी चौड़ी हुई है।
2. सामाजिक असमानता (Social Inequality):
- यह समाज में व्यक्तियों या समूहों को उनके जन्म, जाति, धर्म, लिंग या नस्ल के आधार पर अलग-अलग दर्जा और अवसर देने से उत्पन्न होती है।
- रूप:
- जाति-आधारित असमानता: ऐतिहासिक रूप से, भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था ने दलितों और पिछड़ी जातियों को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान से वंचित रखा है।
- लैंगिक असमानता (Gender Inequality): महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, संपत्ति के अधिकार और निर्णय लेने की प्रक्रिया में पुरुषों की तुलना में कम अवसर मिलते हैं।
- धार्मिक असमानता: धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों को कभी-कभी भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
3. राजनीतिक असमानता (Political Inequality):
- यद्यपि भारत “एक व्यक्ति, एक वोट” के सिद्धांत पर आधारित लोकतंत्र है, फिर भी राजनीतिक प्रक्रिया में सभी की आवाज समान रूप से नहीं सुनी जाती।
- धनवान और शक्तिशाली लोग नीति-निर्माण को अधिक प्रभावित करते हैं, जबकि गरीबों और हाशिये पर पड़े लोगों की राजनीतिक भागीदारी सीमित होती है।
4. क्षेत्रीय असमानता (Regional Inequality):
- भारत के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के बीच विकास का स्तर बहुत असमान है।
- उदाहरण: पश्चिमी और दक्षिणी राज्य (जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु) आर्थिक रूप से अधिक विकसित हैं, जबकि कुछ पूर्वी और उत्तरी राज्य (जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा) अपेक्षाकृत पिछड़े हुए हैं। इससे प्रवासन (migration) जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
5. अवसर की असमानता (Inequality of Opportunity):
- यह सबसे मूलभूत असमानता है। इसका अर्थ है कि एक गरीब घर में पैदा हुए बच्चे को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के वे अवसर नहीं मिल पाते जो एक अमीर घर में पैदा हुए बच्चे को आसानी से मिल जाते हैं।
भारत में असमानता के प्रमुख कारण (Major Causes of Inequality in India)
- ऐतिहासिक कारक:
- जाति व्यवस्था और औपनिवेशिक शोषण ने असमानता की गहरी जड़ें जमाईं।
- बेरोजगारी और निम्न-गुणवत्ता वाले रोजगार:
- एक बड़ी आबादी या तो बेरोजगार है या अनौपचारिक क्षेत्र (informal sector) में कम वेतन और बिना सामाजिक सुरक्षा के काम करती है।
- भूमि स्वामित्व का असमान वितरण:
- ग्रामीण भारत में आज भी कुछ लोगों के पास बहुत अधिक जमीन है, जबकि एक बड़ा वर्ग भूमिहीन है।
- शिक्षा और स्वास्थ्य तक असमान पहुँच:
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ महँगी हैं और गरीबों की पहुँच से बाहर हैं, जिससे अवसरों की असमानता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।
- पूंजी-गहन विकास मॉडल:
- आर्थिक सुधारों के बाद, विकास का मॉडल उन क्षेत्रों (जैसे- आईटी, वित्त) में केंद्रित रहा है जो पूंजी-गहन (capital-intensive) हैं और कम रोजगार पैदा करते हैं, बजाय श्रम-गहन (labour-intensive) क्षेत्रों के।
- प्रतिगामी कर प्रणाली (Regressive Tax System):
- भारत में अप्रत्यक्ष करों (जैसे GST) का भार प्रत्यक्ष करों (आयकर) से अधिक है। अप्रत्यक्ष कर गरीबों और अमीरों, दोनों पर समान रूप से लगते हैं, जिससे गरीबों पर अधिक बोझ पड़ता है।
असमानता के प्रभाव (Impacts of Inequality)
- सामाजिक अशांति: यह समाज में हताशा, अपराध और सामाजिक तनाव को जन्म देती है।
- आर्थिक विकास में बाधा: जब एक बड़ा वर्ग गरीबी और निम्न शिक्षा के कारण अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से योगदान नहीं कर पाता, तो यह देश के समग्र आर्थिक विकास को बाधित करता है।
- लोकतंत्र का कमजोर होना: यह राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है और लोकतांत्रिक संस्थानों में जनता के विश्वास को कम करती है।
- गरीबी का दुष्चक्र: असमानता गरीबी को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनाए रखती है।
असमानता कम करने के उपाय (Measures to Reduce Inequality)
- प्रगतिशील कराधान (Progressive Taxation):
- अमीरों पर अधिक कर (जैसे संपत्ति कर, विरासत कर) लगाना और उस राजस्व का उपयोग गरीबों के लिए सामाजिक योजनाओं पर करना।
- रोजगार सृजन:
- श्रम-गहन उद्योगों (जैसे- विनिर्माण, कपड़ा) को बढ़ावा देना और कौशल विकास पर जोर देना।
- सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश:
- सभी के लिए मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करना।
- सामाजिक सुरक्षा का विस्तार:
- अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार करना।
- समान अवसर सुनिश्चित करना:
- आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाई नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करना ताकि ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को मुख्यधारा में लाया जा सके।
- भूमि सुधार:
- भूमिहीन गरीबों को भूमि वितरित करना और भूमि रिकॉर्ड को डिजिटल बनाना।
निष्कर्ष:
असमानता न केवल एक आर्थिक मुद्दा है, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक चुनौती भी है, जो “सबका साथ, सबका विकास” और एक न्यायपूर्ण समाज के संवैधानिक आदर्शों के विरुद्ध है। भारत को अपनी विकास यात्रा को वास्तव में सफल बनाने के लिए आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ असमानता को कम करने पर भी समान रूप से ध्यान केंद्रित करना होगा।
समावेशन क्या है? (What is Inclusion?)
परिभाषा:
समावेशन वह प्रक्रिया और परिणाम है जो यह सुनिश्चित करती है कि समाज के सभी व्यक्तियों और समूहों, विशेष रूप से जो ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर (marginalized) या वंचित (disadvantaged) रहे हैं, को विकास की मुख्यधारा में भाग लेने, योगदान करने और लाभ प्राप्त करने के समान अवसर और संसाधन प्राप्त हों।
मूल सिद्धांत:
इसका मूल सिद्धांत है “किसी को भी पीछे न छोड़ना” (Leaving No One Behind)। यह केवल लोगों को कुछ देना नहीं, बल्कि उन्हें विकास प्रक्रिया का एक सक्रिय और सम्मानित भागीदार बनाना है।
यह केवल उपस्थिति (presence) के बारे में नहीं है, बल्कि भागीदारी (participation), स्वीकृति (acceptance) और अपनेपन की भावना (sense of belonging) के बारे में भी है।
समावेशन के विभिन्न रूप (Various Forms of Inclusion)
समावेशन एक बहुआयामी अवधारणा है, जिसके कई रूप हैं:
1. वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion):
- अर्थ: समाज के कमजोर वर्गों और निम्न आय समूहों को सस्ती लागत पर (affordable cost) आवश्यक वित्तीय सेवाओं (financial services) तक पहुँच प्रदान करना।
- वित्तीय सेवाएँ शामिल हैं:
- बचत बैंक खाते (Savings Bank Accounts): पैसा सुरक्षित रखने और लेनदेन के लिए।
- ऋण (Credit): अपनी जरूरतों और उद्यम के लिए उचित ब्याज दरों पर ऋण की सुविधा।
- प्रेषण (Remittance): पैसे को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित रूप से भेजने की सुविधा।
- बीमा (Insurance): जीवन, स्वास्थ्य और फसल जैसे जोखिमों से सुरक्षा।
- पेंशन (Pension): वृद्धावस्था के लिए वित्तीय सुरक्षा।
- महत्व: यह लोगों को अनौपचारिक साहूकारों के शोषण से बचाता है, बचत को बढ़ावा देता है, और उन्हें अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में सक्षम बनाता है।
- भारत में पहल: प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) वित्तीय समावेशन के इतिहास में दुनिया की सबसे बड़ी पहलों में से एक है।
2. सामाजिक समावेशन (Social Inclusion):
- अर्थ: यह सुनिश्चित करना कि सभी व्यक्तियों और समूहों को उनकी जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, विकलांगता या यौन अभिविन्यास के बावजूद समाज में पूर्ण रूप से भाग लेने का अधिकार और अवसर मिले।
- लक्ष्य: सामाजिक भेदभाव, अलगाव और बहिष्कार को समाप्त करना।
- भारत में पहल: आरक्षण (Reservation) नीति, अस्पृश्यता विरोधी कानून, महिला सशक्तिकरण योजनाएँ और विकलांगों के अधिकार अधिनियम।
3. राजनीतिक समावेशन (Political Inclusion):
- अर्थ: यह सुनिश्चित करना कि समाज के सभी वर्गों, विशेषकर महिलाओं और कमजोर समूहों को राजनीतिक प्रक्रिया और निर्णय-निर्माण में पर्याप्त प्रतिनिधित्व और आवाज मिले।
- भारत में पहल: पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं और SC/ST के लिए आरक्षण, वयस्क मताधिकार।
4. डिजिटल समावेशन (Digital Inclusion):
- अर्थ: यह सुनिश्चित करना कि सभी लोगों के पास, उनकी आय, स्थान या क्षमता के बावजूद, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (Information and Communication Technology – ICT) (जैसे- इंटरनेट, मोबाइल फोन) का उपयोग करने का अवसर और कौशल हो।
- महत्व: आज के डिजिटल युग में, यह शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, वित्तीय सेवाओं और सरकारी योजनाओं तक पहुँच के लिए आवश्यक है।
- भारत में पहल: डिजिटल इंडिया कार्यक्रम, भारतनेट परियोजना (गांवों तक ब्रॉडबैंड पहुँचाने के लिए)।
समावेशन क्यों महत्वपूर्ण है? (Why is Inclusion Important?)
- न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के लिए:
- यह सामाजिक न्याय (Social Justice) का एक मूल सिद्धांत है। यह सुनिश्चित करता है कि विकास का लाभ कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित न रह जाए।
- सतत आर्थिक विकास के लिए:
- जब समाज का एक बड़ा हिस्सा वित्तीय रूप से बहिष्कृत, अशिक्षित और अस्वस्थ होता है, तो वह अर्थव्यवस्था की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाता है। समावेशन लोगों की उत्पादकता बढ़ाता है और बाजार का विस्तार करता है, जिससे सतत आर्थिक विकास (sustainable economic growth) को बढ़ावा मिलता है।
- गरीबी कम करने के लिए:
- वित्तीय और सामाजिक समावेशन लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकलने के अवसर प्रदान करता है।
- सामाजिक सद्भाव और स्थिरता के लिए:
- जब लोग महसूस करते हैं कि उन्हें बाहर रखा जा रहा है या उनके साथ भेदभाव हो रहा है, तो इससे सामाजिक तनाव और अशांति पैदा होती है। समावेशन सामाजिक एकजुटता और सद्भाव को बढ़ावा देता है।
- लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए:
- समावेशन यह सुनिश्चित करता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित न रहे, बल्कि यह शासन और विकास के हर पहलू में परिलक्षित हो, जहाँ हर नागरिक की आवाज का महत्व हो।
चुनौतियाँ:
भारत में समावेशन को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में अभी भी कई चुनौतियाँ हैं, जैसे – डिजिटल डिवाइड (शहरी-ग्रामीण अंतर), शिक्षा और कौशल की कमी, सामाजिक पूर्वाग्रह, और योजनाओं का अप्रभावी कार्यान्वयन।
निष्कर्ष:
समावेशन एक ऐसा शक्तिशाली दृष्टिकोण है जो न केवल एक अधिक मानवीय और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करता है, बल्कि एक अधिक समृद्ध और स्थिर राष्ट्र की नींव भी रखता है। भारत का “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” का नारा समावेशन के इसी व्यापक दर्शन को दर्शाता है।
1. जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition)
परिभाषा:
जनसांख्यिकीय संक्रमण एक ऐतिहासिक मॉडल है जो यह बताता है कि जैसे-जैसे कोई देश औद्योगिक और आर्थिक रूप से विकसित होता है, उसकी जनसंख्या की जन्म दर (Birth Rate) और मृत्यु दर (Death Rate) उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर कैसे बदलती है।
यह मॉडल दुनिया के विकसित देशों के जनसंख्या परिवर्तन के अनुभवों पर आधारित है।
जनसांख्यिकीय संक्रमण के चरण (Stages of Demographic Transition)
यह संक्रमण मुख्य रूप से चार चरणों में होता है (कुछ मॉडल में पाँचवाँ चरण भी जोड़ा जाता है):
(i) चरण 1: उच्च जन्म दर और उच्च मृत्यु दर (High Birth Rate & High Death Rate)
- विशेषता: इस चरण में जन्म दर और मृत्यु दर, दोनों बहुत उच्च स्तर पर होते हैं।
- परिणाम: जन्म तो बहुत होते हैं, लेकिन बीमारियों, महामारियों और अकाल के कारण मृत्यु भी बहुत होती है। इसलिए, जनसंख्या वृद्धि दर या तो बहुत धीमी होती है या लगभग स्थिर रहती है।
- उदाहरण: औद्योगिक क्रांति से पहले के लगभग सभी देश। (अब शायद ही कोई देश इस चरण में है)।
(ii) चरण 2: उच्च जन्म दर और घटती मृत्यु दर (High Birth Rate & Declining Death Rate)
- विशेषता: स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा में सुधार के कारण मृत्यु दर तेजी से घटनी शुरू हो जाती है। लेकिन सामाजिक मान्यताओं और जागरूकता की कमी के कारण जन्म दर अभी भी उच्च बनी रहती है।
- परिणाम: जन्म दर और मृत्यु दर के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो जाता है, जिससे जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि (Population Explosion) होती है।
- उदाहरण: भारत 1950 के दशक के बाद इस चरण में प्रवेश कर गया था। कई अफ्रीकी देश अभी भी इस चरण में हैं।
(iii) चरण 3: घटती जन्म दर और निम्न मृत्यु दर (Declining Birth Rate & Low Death Rate)
- विशेषता: शिक्षा, शहरीकरण और परिवार नियोजन के साधनों की पहुँच बढ़ने के कारण जन्म दर भी घटने लगती है। मृत्यु दर निम्न स्तर पर बनी रहती है।
- परिणाम: जनसंख्या वृद्धि की दर धीमी होने लगती है, लेकिन जनसंख्या अभी भी बढ़ रही होती है।
- भारत वर्तमान में इस चरण से गुजर रहा है।
(iv) चरण 4: निम्न जन्म दर और निम्न मृत्यु दर (Low Birth Rate & Low Death Rate)
- विशेषता: जन्म दर और मृत्यु दर, दोनों ही बहुत निम्न स्तर पर आ जाती हैं और लगभग बराबर हो जाती हैं।
- परिणाम: जनसंख्या या तो स्थिर हो जाती है या बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है।
- उदाहरण: अधिकांश विकसित देश जैसे अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन।
(v) चरण 5 (कुछ मॉडल के अनुसार):
- विशेषता: जन्म दर, मृत्यु दर से भी नीचे चली जाती है।
- परिणाम: जनसंख्या घटने लगती है (Population Decline)।
- उदाहरण: जर्मनी, जापान और इटली जैसे कुछ देश इस चरण का अनुभव कर रहे हैं।
2. जनसंख्या लाभांश (Demographic Dividend)
परिभाषा:
जनसंख्या लाभांश वह संभावित आर्थिक लाभ है जो किसी देश को तब प्राप्त हो सकता है जब उसकी जनसंख्या की आयु संरचना (age structure) में परिवर्तन होता है और कार्यशील आयु की जनसंख्या (working-age population: 15-59 वर्ष) का अनुपात आश्रित जनसंख्या (dependent population: 0-14 वर्ष और 60+ वर्ष) की तुलना में अधिक हो जाता है।
यह कैसे काम करता है?
- जनसांख्यिकीय संक्रमण के दूसरे और तीसरे चरण के दौरान, मृत्यु दर में कमी और बाद में जन्म दर में कमी के कारण, देश में युवाओं और कार्यशील लोगों की एक बड़ी पीढ़ी तैयार हो जाती है।
- चूंकि बच्चों और बूढ़ों (आश्रितों) की संख्या कम होती है, इसलिए प्रति कार्यशील व्यक्ति पर आश्रितों का बोझ कम हो जाता है।
- इससे बचत (savings) और निवेश (investment) की दर बढ़ती है, और यदि इस बड़ी कार्यशील आबादी को अच्छा स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल और रोजगार प्रदान किया जाए, तो यह तेज आर्थिक विकास (rapid economic growth) को गति प्रदान कर सकती है।
- सरल शब्दों में: जब परिवार में कमाने वाले अधिक हों और खाने वाले (बच्चे और बूढ़े) कम हों, तो परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है। यही सिद्धांत पूरे देश पर लागू होता है।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- जनसंख्या लाभांश स्वचालित नहीं है। यह केवल एक “अवसर की खिड़की” (window of opportunity) है जो कुछ दशकों (आमतौर पर 30-40 साल) के लिए ही खुली रहती है।
- इसे भुनाने के लिए आवश्यक शर्तें:
- शिक्षा और कौशल विकास: कार्यबल को उत्पादक बनाने के लिए।
- स्वास्थ्य: एक स्वस्थ कार्यबल ही प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।
- रोजगार सृजन: इस विशाल कार्यबल को खपाने के लिए पर्याप्त नौकरियों का सृजन।
- सुशासन और सही नीतियां: जो निवेश और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दें।
भारत और जनसंख्या लाभांश
- वर्तमान स्थिति: भारत वर्तमान में अपनी जनसंख्या लाभांश की अवधि के चरम पर है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा और कार्यशील आबादी है।
- अवसर: यह भारत के लिए एक सुनहरा अवसर है कि वह अपने आर्थिक विकास को गति दे और एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बने।
- चुनौती: यदि हम अपनी युवा आबादी को उचित शिक्षा, कौशल और रोजगार प्रदान करने में विफल रहते हैं, तो यही जनसंख्या लाभांश एक “जनसंख्या आपदा” (Demographic Disaster) में बदल सकता है, जिससे सामाजिक अशांति और अस्थिरता पैदा हो सकती है।
- जैसे-जैसे यह बड़ी पीढ़ी बूढ़ी होगी (2040 के बाद), आश्रित बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी और यह “अवसर की खिड़की” बंद हो जाएगी। इसलिए, इस अवसर का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए तत्काल और केंद्रित कार्रवाई की आवश्यकता है।