मानव विकास सूचकांक (Human Development Index – HDI)

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परिभाषा:
मानव विकास सूचकांक एक समग्र सांख्यिकीय सूचकांक (composite statistical index) है, जिसका उपयोग किसी देश में मानव विकास के औसत स्तर को मापने के लिए किया जाता है। यह सूचकांक केवल आर्थिक समृद्धि (जैसे प्रति व्यक्ति आय) पर ध्यान केंद्रित नहीं करता, बल्कि यह शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मानवीय पहलुओं को भी समान महत्व देता है।

अवधारणा का विकास:

मूल दर्शन:
HDI का मूल दर्शन यह है कि किसी देश के विकास का वास्तविक मापक उसकी आय नहीं, बल्कि उसके लोगों का स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर है। विकास का अंतिम लक्ष्य लोगों के जीवन में सुधार लाना और उनकी क्षमताओं (capabilities) का विस्तार करना है।


HDI के तीन प्रमुख आयाम और संकेतक (Three Key Dimensions and Indicators)

HDI की गणना तीन मुख्य आयामों में किसी देश की औसत उपलब्धि को मापकर की जाती है। प्रत्येक आयाम के लिए एक विशिष्ट संकेतक का उपयोग किया जाता है:

आयाम (Dimension)संकेतक (Indicator)इसका अर्थ क्या है?
1. एक लंबा और स्वस्थ जीवन (A Long and Healthy Life)जन्म के समय जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy at Birth)यह मापता है कि एक नवजात शिशु औसतन कितने वर्षों तक जीवित रहने की उम्मीद कर सकता है। यह स्वास्थ्य और स्वच्छता के स्तर को दर्शाता है।
2. ज्ञान (Knowledge)a) स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष (Expected Years of Schooling)<br>b) स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष (Mean Years of Schooling)a) यह मापता है कि एक बच्चा अपने जीवनकाल में कितने वर्ष की स्कूली शिक्षा प्राप्त करने की उम्मीद कर सकता है।<br>b) यह मापता है कि 25 वर्ष और उससे अधिक आयु के वयस्क औसतन कितने वर्ष की शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं।
3. एक सभ्य जीवन स्तर (A Decent Standard of Living)प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income – GNI per capita) (क्रय शक्ति समता – PPP $ में)यह मापता है कि देश के प्रत्येक व्यक्ति के पास औसतन कितनी क्रय शक्ति है, जिससे उसकी संसाधनों तक पहुँच का पता चलता है।

गणना की विधि:


देशों का वर्गीकरण

UNDP, HDI स्कोर के आधार पर देशों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत करता है:

  1. बहुत उच्च मानव विकास (Very High Human Development): 0.800 और उससे ऊपर
  2. उच्च मानव विकास (High Human Development): 0.700 – 0.799
  3. मध्यम मानव विकास (Medium Human Development): 0.550 – 0.699
  4. निम्न मानव विकास (Low Human Development): 0.550 से नीचे

HDI का महत्व (Significance of HDI)

  1. विकास के दृष्टिकोण में बदलाव:
    • HDI ने विकास के फोकस को सिर्फ आर्थिक विकास (GDP) से हटाकर मानव-केंद्रित विकास (human-centric development) पर स्थानांतरित कर दिया है।
  2. व्यापक मापक:
    • यह आय के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य को भी शामिल करता है, जो विकास का एक अधिक समग्र और संतुलित चित्र प्रस्तुत करता है।
  3. नीति निर्माण के लिए उपकरण:
    • यह सरकारों को यह पहचानने में मदद करता है कि किन क्षेत्रों (जैसे स्वास्थ्य या शिक्षा) में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
  4. अंतर्राष्ट्रीय तुलना:
    • यह विभिन्न देशों के बीच मानव विकास के स्तर की तुलना करने के लिए एक उपयोगी उपकरण है।
  5. सार्वजनिक बहस को प्रेरित करना:
    • HDI की रैंकिंग पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहस होती है, जिससे सरकारें मानव विकास के मुद्दों पर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित होती हैं।

HDI की आलोचना और सीमाएँ

  1. सीमित संकेतक:
    • आलोचकों का तर्क है कि यह केवल तीन आयामों को मापता है और राजनीतिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार, लैंगिक समानता, आय असमानता और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को छोड़ देता है।
  2. आंकड़ों की गुणवत्ता:
    • इसकी गणना के लिए उपयोग किए जाने वाले आंकड़े हमेशा विश्वसनीय और तुलनीय नहीं होते हैं।
  3. केवल औसत को मापना:
    • HDI एक औसत माप है और यह देश के भीतर मौजूद व्यापक असमानताओं को नहीं दर्शाता है।

इन सीमाओं को दूर करने के लिए, UNDP अब HDI के साथ-साथ कुछ अन्य पूरक सूचकांक भी जारी करता है, जैसे:

निष्कर्ष:
अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद, मानव विकास सूचकांक (HDI) विकास को मापने और समझने के तरीके में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया है। यह एक शक्तिशाली अनुस्मारक है कि विकास का असली धन लोग हैं, और आर्थिक विकास केवल एक साधन है, साध्य (end) नहीं।


गरीबी का मापन (Measurement of Poverty in India)

गरीबी की परिभाषा:
गरीबी वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (basic necessities) जैसे- भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य को पूरा करने में असमर्थ होता है।

भारत में गरीबी का आकलन पारंपरिक रूप से उपभोग व्यय (Consumption Expenditure) के आधार पर किया जाता है, न कि आय (income) के आधार पर। ऐसा इसलिए है क्योंकि आय का सटीक डेटा एकत्र करना मुश्किल होता है और उपभोग जीवन स्तर का एक बेहतर संकेतक माना जाता है।


गरीबी रेखा (Poverty Line)

परिभाषा:
गरीबी रेखा एक काल्पनिक रेखा है जो उस न्यूनतम आय या उपभोग व्यय के स्तर को दर्शाती है जो एक व्यक्ति को अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक है। जो लोग इस रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं, उन्हें “गरीब” (Below Poverty Line – BPL) माना जाता है, और जो लोग इससे ऊपर होते हैं, उन्हें “गैर-गरीब” (Above Poverty Line – APL) माना जाता है।

मापन का आधार:


भारत में गरीबी आकलन का इतिहास और प्रमुख समितियाँ

समय-समय पर गरीबी के आकलन की पद्धति की समीक्षा करने और उसे बेहतर बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा कई समितियों का गठन किया गया है।

1. वाई. के. अलघ समिति (1979)


2. लकड़ावाला समिति (1993)

इस समिति ने गरीबी के आकलन को और अधिक परिष्कृत किया।


3. तेंदुलकर समिति (2009)

प्रोफेसर सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने गरीबी आकलन की पद्धति में एक क्रांतिकारी बदलाव किया।


4. रंगराजन समिति (2014)

तेंदुलकर समिति की आलोचनाओं के जवाब में, सरकार ने सी. रंगराजन की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया।


नीति आयोग टास्क फोर्स और बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI)

निष्कर्ष:
भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण हमेशा से एक विवादास्पद विषय रहा है। जहाँ लकड़ावाला समिति ने कैलोरी मॉडल को परिष्कृत किया, वहीं तेंदुलकर समिति ने गरीबी की परिभाषा को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे गैर-खाद्य मदों को शामिल करके व्यापक बनाया। रंगराजन समिति ने इस परिभाषा को और भी यथार्थवादी बनाने का प्रयास किया। हालाँकि, ये सभी विधियाँ उपभोग पर आधारित हैं, और अब बहुआयामी गरीबी जैसे व्यापक दृष्टिकोणों को अधिक महत्व दिया जा रहा है।


बेरोजगारी क्या है? (What is Unemployment?)

परिभाषा:
बेरोजगारी वह स्थिति है जिसमें एक कार्य-सक्षम व्यक्ति (able to work), जो प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने का इच्छुक (willing to work) है, को उसकी योग्यता के अनुसार रोजगार (काम) नहीं मिल पाता है।

महत्वपूर्ण बिंदु:

श्रम बल (Labour Force):
यह देश में कार्य कर रहे लोगों (नियोजित) और काम की तलाश कर रहे लोगों (बेरोजगार) का कुल योग है।
श्रम बल = नियोजित (Employed) + बेरोजगार (Unemployed)

बेरोजगारी दर (Unemployment Rate):
बेरोजगारी दर = (बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या / कुल श्रम बल) x 100


बेरोजगारी के प्रकार (Types of Unemployment)

भारत जैसे विकासशील देश में कई प्रकार की बेरोजगारी पाई जाती है:

A. ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी

1. प्रच्छन्न/छिपी हुई बेरोजगारी (Disguised Unemployment):

2. मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment):

B. शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी

3. औद्योगिक/संरचनात्मक बेरोजगारी (Industrial/Structural Unemployment):

4. शिक्षित बेरोजगारी (Educated Unemployment):

C. अन्य प्रकार की बेरोजगारी

5. घर्षणात्मक बेरोजगारी (Frictional Unemployment):

6. चक्रीय बेरोजगारी (Cyclical Unemployment):


भारत में बेरोजगारी का मापन (Measurement of Unemployment in India)

भारत में बेरोजगारी के आंकड़ों का संग्रह और प्रकाशन मुख्य रूप से राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (National Statistical Office – NSO) (पूर्व में NSSO) द्वारा आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey – PLFS) के माध्यम से किया जाता है।

NSO बेरोजगारी को मापने के लिए मुख्य रूप से दो दृष्टिकोणों का उपयोग करता है:

1. सामान्य स्थिति (Usual Status – US):

2. वर्तमान साप्ताहिक स्थिति (Current Weekly Status – CWS):

(नोट: पहले एक “वर्तमान दैनिक स्थिति” का भी उपयोग होता था, जो एक दिन में बेरोजगारी को मापता था, लेकिन PLFS मुख्य रूप से उपरोक्त दो पर ध्यान केंद्रित करता है।)

निष्कर्ष:
बेरोजगारी भारत के लिए एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती है। इसकी विभिन्न प्रकृतियों (जैसे प्रच्छन्न, संरचनात्मक) को समझना आवश्यक है ताकि सरकार कौशल विकास, औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन की सही नीतियां बना सके।


भारत में असमानता (Inequality in India)

परिभाषा:
असमानता का तात्पर्य समाज में अवसरों (opportunities), संसाधनों (resources) और परिणामों (outcomes) के असमान या अन्यायपूर्ण वितरण (unequal or unjust distribution) से है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी के पास ठीक-ठीक बराबर धन हो, बल्कि इसका गहरा अर्थ यह है कि कुछ लोगों या समूहों को दूसरों की तुलना में जीवन में आगे बढ़ने के कम अवसर मिलते हैं।


भारत में असमानता के प्रमुख रूप (Major Forms of Inequality in India)

भारत में असमानता कई रूपों में मौजूद है:

1. आर्थिक असमानता (Economic Inequality):

2. सामाजिक असमानता (Social Inequality):

3. राजनीतिक असमानता (Political Inequality):

4. क्षेत्रीय असमानता (Regional Inequality):

5. अवसर की असमानता (Inequality of Opportunity):


भारत में असमानता के प्रमुख कारण (Major Causes of Inequality in India)

  1. ऐतिहासिक कारक:
    • जाति व्यवस्था और औपनिवेशिक शोषण ने असमानता की गहरी जड़ें जमाईं।
  2. बेरोजगारी और निम्न-गुणवत्ता वाले रोजगार:
    • एक बड़ी आबादी या तो बेरोजगार है या अनौपचारिक क्षेत्र (informal sector) में कम वेतन और बिना सामाजिक सुरक्षा के काम करती है।
  3. भूमि स्वामित्व का असमान वितरण:
    • ग्रामीण भारत में आज भी कुछ लोगों के पास बहुत अधिक जमीन है, जबकि एक बड़ा वर्ग भूमिहीन है।
  4. शिक्षा और स्वास्थ्य तक असमान पहुँच:
    • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ महँगी हैं और गरीबों की पहुँच से बाहर हैं, जिससे अवसरों की असमानता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।
  5. पूंजी-गहन विकास मॉडल:
    • आर्थिक सुधारों के बाद, विकास का मॉडल उन क्षेत्रों (जैसे- आईटी, वित्त) में केंद्रित रहा है जो पूंजी-गहन (capital-intensive) हैं और कम रोजगार पैदा करते हैं, बजाय श्रम-गहन (labour-intensive) क्षेत्रों के।
  6. प्रतिगामी कर प्रणाली (Regressive Tax System):
    • भारत में अप्रत्यक्ष करों (जैसे GST) का भार प्रत्यक्ष करों (आयकर) से अधिक है। अप्रत्यक्ष कर गरीबों और अमीरों, दोनों पर समान रूप से लगते हैं, जिससे गरीबों पर अधिक बोझ पड़ता है।

असमानता के प्रभाव (Impacts of Inequality)


असमानता कम करने के उपाय (Measures to Reduce Inequality)

  1. प्रगतिशील कराधान (Progressive Taxation):
    • अमीरों पर अधिक कर (जैसे संपत्ति कर, विरासत कर) लगाना और उस राजस्व का उपयोग गरीबों के लिए सामाजिक योजनाओं पर करना।
  2. रोजगार सृजन:
    • श्रम-गहन उद्योगों (जैसे- विनिर्माण, कपड़ा) को बढ़ावा देना और कौशल विकास पर जोर देना।
  3. सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश:
    • सभी के लिए मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करना।
  4. सामाजिक सुरक्षा का विस्तार:
    • अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार करना।
  5. समान अवसर सुनिश्चित करना:
    • आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्रवाई नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करना ताकि ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों को मुख्यधारा में लाया जा सके।
  6. भूमि सुधार:
    • भूमिहीन गरीबों को भूमि वितरित करना और भूमि रिकॉर्ड को डिजिटल बनाना।

निष्कर्ष:
असमानता न केवल एक आर्थिक मुद्दा है, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक चुनौती भी है, जो “सबका साथ, सबका विकास” और एक न्यायपूर्ण समाज के संवैधानिक आदर्शों के विरुद्ध है। भारत को अपनी विकास यात्रा को वास्तव में सफल बनाने के लिए आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ असमानता को कम करने पर भी समान रूप से ध्यान केंद्रित करना होगा।


समावेशन क्या है? (What is Inclusion?)

परिभाषा:
समावेशन वह प्रक्रिया और परिणाम है जो यह सुनिश्चित करती है कि समाज के सभी व्यक्तियों और समूहों, विशेष रूप से जो ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर (marginalized) या वंचित (disadvantaged) रहे हैं, को विकास की मुख्यधारा में भाग लेने, योगदान करने और लाभ प्राप्त करने के समान अवसर और संसाधन प्राप्त हों।

मूल सिद्धांत:
इसका मूल सिद्धांत है “किसी को भी पीछे न छोड़ना” (Leaving No One Behind)। यह केवल लोगों को कुछ देना नहीं, बल्कि उन्हें विकास प्रक्रिया का एक सक्रिय और सम्मानित भागीदार बनाना है।

यह केवल उपस्थिति (presence) के बारे में नहीं है, बल्कि भागीदारी (participation), स्वीकृति (acceptance) और अपनेपन की भावना (sense of belonging) के बारे में भी है।


समावेशन के विभिन्न रूप (Various Forms of Inclusion)

समावेशन एक बहुआयामी अवधारणा है, जिसके कई रूप हैं:

1. वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion):

2. सामाजिक समावेशन (Social Inclusion):

3. राजनीतिक समावेशन (Political Inclusion):

4. डिजिटल समावेशन (Digital Inclusion):


समावेशन क्यों महत्वपूर्ण है? (Why is Inclusion Important?)

  1. न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के लिए:
    • यह सामाजिक न्याय (Social Justice) का एक मूल सिद्धांत है। यह सुनिश्चित करता है कि विकास का लाभ कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित न रह जाए।
  2. सतत आर्थिक विकास के लिए:
    • जब समाज का एक बड़ा हिस्सा वित्तीय रूप से बहिष्कृत, अशिक्षित और अस्वस्थ होता है, तो वह अर्थव्यवस्था की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाता है। समावेशन लोगों की उत्पादकता बढ़ाता है और बाजार का विस्तार करता है, जिससे सतत आर्थिक विकास (sustainable economic growth) को बढ़ावा मिलता है।
  3. गरीबी कम करने के लिए:
    • वित्तीय और सामाजिक समावेशन लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकलने के अवसर प्रदान करता है।
  4. सामाजिक सद्भाव और स्थिरता के लिए:
    • जब लोग महसूस करते हैं कि उन्हें बाहर रखा जा रहा है या उनके साथ भेदभाव हो रहा है, तो इससे सामाजिक तनाव और अशांति पैदा होती है। समावेशन सामाजिक एकजुटता और सद्भाव को बढ़ावा देता है।
  5. लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए:
    • समावेशन यह सुनिश्चित करता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित न रहे, बल्कि यह शासन और विकास के हर पहलू में परिलक्षित हो, जहाँ हर नागरिक की आवाज का महत्व हो।

चुनौतियाँ:
भारत में समावेशन को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में अभी भी कई चुनौतियाँ हैं, जैसे – डिजिटल डिवाइड (शहरी-ग्रामीण अंतर), शिक्षा और कौशल की कमी, सामाजिक पूर्वाग्रह, और योजनाओं का अप्रभावी कार्यान्वयन।

निष्कर्ष:
समावेशन एक ऐसा शक्तिशाली दृष्टिकोण है जो न केवल एक अधिक मानवीय और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करता है, बल्कि एक अधिक समृद्ध और स्थिर राष्ट्र की नींव भी रखता है। भारत का “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” का नारा समावेशन के इसी व्यापक दर्शन को दर्शाता है।

1. जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition)

परिभाषा:
जनसांख्यिकीय संक्रमण एक ऐतिहासिक मॉडल है जो यह बताता है कि जैसे-जैसे कोई देश औद्योगिक और आर्थिक रूप से विकसित होता है, उसकी जनसंख्या की जन्म दर (Birth Rate) और मृत्यु दर (Death Rate) उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर कैसे बदलती है।

यह मॉडल दुनिया के विकसित देशों के जनसंख्या परिवर्तन के अनुभवों पर आधारित है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण के चरण (Stages of Demographic Transition)

यह संक्रमण मुख्य रूप से चार चरणों में होता है (कुछ मॉडल में पाँचवाँ चरण भी जोड़ा जाता है):

(i) चरण 1: उच्च जन्म दर और उच्च मृत्यु दर (High Birth Rate & High Death Rate)

(ii) चरण 2: उच्च जन्म दर और घटती मृत्यु दर (High Birth Rate & Declining Death Rate)

(iii) चरण 3: घटती जन्म दर और निम्न मृत्यु दर (Declining Birth Rate & Low Death Rate)

(iv) चरण 4: निम्न जन्म दर और निम्न मृत्यु दर (Low Birth Rate & Low Death Rate)

(v) चरण 5 (कुछ मॉडल के अनुसार):


2. जनसंख्या लाभांश (Demographic Dividend)

परिभाषा:
जनसंख्या लाभांश वह संभावित आर्थिक लाभ है जो किसी देश को तब प्राप्त हो सकता है जब उसकी जनसंख्या की आयु संरचना (age structure) में परिवर्तन होता है और कार्यशील आयु की जनसंख्या (working-age population: 15-59 वर्ष) का अनुपात आश्रित जनसंख्या (dependent population: 0-14 वर्ष और 60+ वर्ष) की तुलना में अधिक हो जाता है।

यह कैसे काम करता है?

महत्वपूर्ण बिंदु:

भारत और जनसंख्या लाभांश