तत्वों का वर्गीकरण और गुणधर्म
तत्वों के आवर्ती वर्गीकरण का प्रारंभिक इतिहास
परिचय: वर्गीकरण की आवश्यकता क्यों हुई?
19वीं शताब्दी की शुरुआत में, जैसे-जैसे नए तत्वों की खोज होती गई, वैज्ञानिकों के पास दर्जनों तत्वों और उनके यौगिकों के बारे में बहुत सारी जानकारी जमा हो गई। इस विशाल जानकारी को व्यवस्थित करना और उनके गुणों का अध्ययन करना बहुत मुश्किल था। इसलिए, वैज्ञानिकों ने तत्वों को उनके गुणों में समानताओं के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास शुरू किया ताकि उनका अध्ययन व्यवस्थित और आसान हो सके।
1. डोबेराइनर के त्रिक (Dobereiner’s Triads – 1817)
- वैज्ञानिक: जर्मन रसायनज्ञ योहान वोल्फगांग डोबेराइनर (Johann Wolfgang Döbereiner)।
- सिद्धांत/नियम:
- डोबेराइनर ने समान रासायनिक गुणों वाले तीन-तीन तत्वों (Triads) के समूह बनाए।
- उन्होंने बताया कि जब त्रिक के तीनों तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु भार (Increasing Atomic Mass) के क्रम में रखा जाता है, तो बीच वाले तत्व का परमाणु भार, अन्य दो तत्वों के परमाणु भार का लगभग औसत (Arithmetic Mean) होता है।
- उदाहरण:
- त्रिक 1: लिथियम (Li), सोडियम (Na), पोटैशियम (K)
- लिथियम (Li) का परमाणु भार ≈ 7
- पोटैशियम (K) का परमाणु भार ≈ 39
- औसत = (7 + 39) / 2 = 23
- सोडियम (Na) का वास्तविक परमाणु भार ≈ 23. (यह त्रिक सफल था)
- त्रिक 2: कैल्शियम (Ca), स्ट्रोंशियम (Sr), बेरियम (Ba)
- औसत = (40 + 137) / 2 = 88.5; स्ट्रोंशियम (Sr) का वास्तविक परमाणु भार ≈ 88.
- त्रिक 1: लिथियम (Li), सोडियम (Na), पोटैशियम (K)
- सीमाएं/विफलता (Limitations):
- डोबेराइनर उस समय ज्ञात सभी तत्वों के साथ त्रिक नहीं बना सके। वे केवल कुछ ही त्रिकों की पहचान कर पाए।
- इसलिए, यह वर्गीकरण का नियम सार्वभौमिक (Universal) रूप से लागू नहीं हो सका और इसे अस्वीकार कर दिया गया।
(PYQ Reference: SSC CGL, 2017)
2. न्यूलैंड्स का अष्टक नियम (Newlands’ Law of Octaves – 1866)
- वैज्ञानिक: अंग्रेज रसायनज्ञ जॉन न्यूलैंड्स (John Newlands)।
- सिद्धांत/नियम:
- न्यूलैंड्स ने उस समय ज्ञात तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु भार (Increasing Atomic Mass) के क्रम में व्यवस्थित किया।
- उन्होंने पाया कि प्रत्येक आठवें तत्व (Eighth Element) के गुण, पहले तत्व (First Element) के गुणों के समान थे, ठीक उसी तरह जैसे संगीत में आठवां स्वर (Octave) पहले स्वर के समान होता है (सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि, सा)।
- इसीलिए इसे “अष्टक का नियम” कहा गया।
- उदाहरण:
- लिथियम (Li) से शुरू करने पर, आठवां तत्व सोडियम (Na) आता है, और Li तथा Na के गुण समान हैं।
- सोडियम (Na) से शुरू करने पर, आठवां तत्व पोटैशियम (K) आता है, और Na तथा K के गुण समान हैं।
- सीमाएं/विफलता (Limitations):
- यह नियम केवल कैल्शियम (Calcium, परमाणु भार 40) तक के हल्के तत्वों पर ही सही ढंग से लागू होता था।
- न्यूलैंड्स ने यह मान लिया था कि प्रकृति में केवल 56 तत्व ही मौजूद हैं और भविष्य में कोई नया तत्व नहीं खोजा जाएगा।
- बाद में खोजे गए तत्वों के गुण इस नियम में फिट नहीं हुए।
- अक्रिय गैसों (Noble Gases) की खोज के बाद, यह नियम पूरी तरह से अप्रासंगिक हो गया।
(PYQ Reference: RRB JE, 2019)
3. लोथर मेयर का वक्र (Lothar Meyer’s Curve – 1869)
- वैज्ञानिक: जर्मन रसायनज्ञ लोथर मेयर (Lothar Meyer)।
- कार्य:
- लोथर मेयर ने तत्वों के परमाणु आयतन (Atomic Volume) और परमाणु भार (Atomic Mass) के बीच एक ग्राफ (वक्र) बनाया।
- उन्होंने देखा कि समान गुणों वाले तत्व ग्राफ पर समान स्थिति (जैसे चोटियों, उतार या चढ़ाव) पर स्थित थे।
- उदाहरण: सभी क्षार धातुएं (Li, Na, K) ग्राफ की चोटियों (Peaks) पर थीं।
- महत्व: लोथर मेयर और मेंडेलीफ लगभग एक ही समय में और लगभग एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे, लेकिन मेंडेलीफ का सारणीबद्ध प्रारूप अधिक स्पष्ट और उपयोगी था, इसलिए उन्हें अधिक श्रेय दिया गया।
निष्कर्ष
ये प्रारंभिक प्रयास भले ही पूरी तरह से सफल नहीं हुए, लेकिन इन्होंने भविष्य के वर्गीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण आधार तैयार किया। इन सभी ने “आवर्तता” (Periodicity) की अवधारणा को जन्म दिया – यानी, तत्वों को एक निश्चित क्रम में रखने पर उनके गुणों की नियमित अंतराल पर पुनरावृत्ति होती है। इसी अवधारणा को आधार बनाकर मेंडेलीफ ने अपनी क्रांतिकारी आवर्त सारणी का निर्माण किया।
मेंडेलीफ की आवर्त सारणी (Mendeleev’s Periodic Table – 1869)
वैज्ञानिक: रूसी रसायनज्ञ दिमित्री मेंडेलीफ (Dmitri Mendeleev)। इन्हें “आवर्त सारणी का जनक” (Father of the Periodic Table) भी कहा जाता है।
मेंडेलीफ का आवर्त नियम (Mendeleev’s Periodic Law)
यह मेंडेलीफ के वर्गीकरण का आधार है और इसे याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है।
नियम:
“तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु भारों (Atomic Masses) के आवर्ती फलन (Periodic Function) होते हैं।”
अर्थ: इसका अर्थ है कि यदि तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु भार (Increasing Atomic Mass) के क्रम में व्यवस्थित किया जाए, तो एक नियमित अंतराल के बाद समान गुणों वाले तत्व फिर से प्रकट होते हैं।
मेंडेलीफ की आवर्त सारणी की विशेषताएं (Features)
- वर्गीकरण का आधार: परमाणु भार (Atomic Mass)।
- संरचना:
- समूह (Groups): सारणी में ऊर्ध्वाधर स्तंभों (Vertical Columns) को समूह कहा गया। कुल 8 समूह थे।
- आवर्त (Periods): क्षैतिज पंक्तियों (Horizontal Rows) को आवर्त कहा गया। कुल 7 आवर्त थे (उस समय ज्ञात तत्वों के अनुसार)।
- रासायनिक गुणों पर जोर: मेंडेलीफ ने तत्वों द्वारा बनाए जाने वाले हाइड्राइड (Hydrides) (हाइड्रोजन के साथ यौगिक) और ऑक्साइड (Oxides) (ऑक्सीजन के साथ यौगिक) के सूत्रों को वर्गीकरण का एक मुख्य आधार बनाया।
मेंडेलीफ की आवर्त सारणी की उपलब्धियाँ (Achievements)
मेंडेलीफ की सारणी की सफलता के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण थे:
- तत्वों का व्यवस्थित अध्ययन: पहली बार, तत्वों और उनके यौगिकों का अध्ययन अत्यंत व्यवस्थित और सरल हो गया।
- नए तत्वों की भविष्यवाणी (Prediction of New Elements): यह मेंडेलीफ की सारणी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
- मेंडेलीफ ने अपनी सारणी में कुछ रिक्त स्थान (Empty Spaces) छोड़े और साहसपूर्वक भविष्यवाणी की कि इन स्थानों पर भविष्य में नए तत्व खोजे जाएंगे।
- उन्होंने इन अनाम तत्वों का नाम, उनके समूह में पहले आने वाले तत्व के नाम में संस्कृत का उपसर्ग “एका-” (Eka-) लगाकर किया।
- उदाहरण:
| मेंडेलीफ द्वारा अनुमानित | बाद में खोजा गया तत्व |
|:—|:—|
| एका-बोरॉन| स्कैंडियम (Sc)|
| एका-एल्युमिनियम| गैलियम (Ga)|
| एका-सिलिकॉन | जर्मेनियम (Ge)| - आश्चर्यजनक रूप से, बाद में खोजे गए इन तत्वों के गुण मेंडेलीफ द्वारा अनुमानित गुणों के लगभग समान थे। (PYQ Reference: SSC CGL, RRB NTPC)
- परमाणु भारों में सुधार (Correction of Atomic Masses):
- मेंडेलीफ ने कुछ तत्वों के परमाणु भारों में सुधार किया ताकि उन्हें सारणी में सही स्थान पर रखा जा सके।
- उदाहरण: बेरिलियम (Be) का परमाणु भार पहले 13.5 माना जाता था, लेकिन मेंडेलीफ ने इसे सही करके 9.0 कर दिया।
- अक्रिय गैसों के लिए स्थान:
- जब बाद में नियॉन (Ne) और आर्गन (Ar) जैसी अक्रिय गैसों (Noble Gases) की खोज हुई, तो उन्हें आवर्त सारणी को बिना छेड़े एक नए समूह (जिसे शून्य समूह कहा गया) में आसानी से रखा जा सका। (PYQ Reference: State PSC)
मेंडेलीफ की आवर्त सारणी की सीमाएँ या कमियाँ (Limitations or Defects)
आधुनिक आवर्त सारणी की तुलना में, मेंडेलीफ की सारणी में कुछ गंभीर कमियाँ थीं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- हाइड्रोजन का अनिश्चित स्थान (Anomalous Position of Hydrogen):
- हाइड्रोजन के गुण क्षार धातुओं (Alkali Metals – समूह 1) और हैलोजन (Halogens – समूह 17) दोनों से मिलते-जुलते हैं।
- मेंडेलीफ हाइड्रोजन को आवर्त सारणी में कोई निश्चित स्थान नहीं दे सके। यह उनकी आवर्त सारणी का पहला और सबसे बड़ा दोष था। (PYQ Reference: SSC CHSL, UPSC CDS)
- समस्थानिकों (Isotopes) का स्थान:
- मेंडेलीफ की सारणी परमाणु भार पर आधारित थी।
- चूंकि एक ही तत्व के समस्थानिकों (जैसे ¹²C, ¹⁴C) के परमाणु भार भिन्न-भिन्न होते हैं, इसलिए उन्हें आवर्त सारणी में अलग-अलग स्थान मिलना चाहिए था।
- लेकिन, समस्थानिकों के रासायनिक गुण समान होने के कारण उन्हें एक ही स्थान पर रखना पड़ता था। इस विरोधाभास का कोई समाधान मेंडेलीफ की सारणी में नहीं था। (PYQ Reference: NDA, 2019)
- अनियमित परमाणु भार क्रम (Anomalous Pairs of Elements):
- कुछ स्थानों पर, मेंडेलीफ ने गुणों में समानता बनाए रखने के लिए अधिक परमाणु भार वाले तत्व को कम परमाणु भार वाले तत्व से पहले रख दिया, जो उनके अपने ही नियम का उल्लंघन था।
- उदाहरण:
- आर्गन (Ar, भार ≈ 39.9) को पोटैशियम (K, भार ≈ 39.1) से पहले रखा गया।
- कोबाल्ट (Co, भार ≈ 58.9) को निकल (Ni, भार ≈ 58.7) से पहले रखा गया।
- टेल्यूरियम (Te, भार ≈ 127.6) को आयोडीन (I, भार ≈ 126.9) से पहले रखा गया। (PYQ Reference: RRB JE, 2019)
- एक समूह में भिन्न गुण वाले तत्वों का होना:
- कुछ स्थानों पर, बिल्कुल भिन्न गुणों वाले तत्वों को एक ही समूह में एक साथ रख दिया गया था।
निष्कर्ष
अपनी कमियों के बावजूद, मेंडेलीफ की आवर्त सारणी तत्वों के वर्गीकरण में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। इसने एक मजबूत ढाँचा प्रदान किया जिसके आधार पर बाद में हेनरी मोजले ने परमाणु संख्या की खोज के बाद आधुनिक आवर्त सारणी का निर्माण किया, जिसने मेंडेलीफ की अधिकांश कमियों को दूर कर दिया।
आधुनिक आवर्त सारणी (Modern Periodic Table)
पृष्ठभूमि: एक क्रांतिकारी खोज
20वीं सदी की शुरुआत तक, मेंडेलीफ की आवर्त सारणी को व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन उसकी कुछ कमियाँ (जैसे हाइड्रोजन का स्थान, समस्थानिकों का स्थान, और अनियमित परमाणु भार क्रम) वैज्ञानिकों को परेशान कर रही थीं। इसका मतलब था कि वर्गीकरण के आधार “परमाणु भार” में ही कोई मौलिक समस्या थी।
1. हेनरी मोजले का योगदान (Henry Moseley’s Contribution – 1913)
- वैज्ञानिक: अंग्रेज भौतिक विज्ञानी हेनरी मोजले (Henry Moseley)।
- प्रयोग: मोजले विभिन्न तत्वों पर उच्च-ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉनों की बमबारी कर रहे थे और उनसे निकलने वाली एक्स-रे (X-rays) के गुणों का अध्ययन कर रहे थे।
- ऐतिहासिक खोज:
- उन्होंने पाया कि उत्सर्जित एक्स-रे की आवृत्ति का वर्गमूल (Square root of the frequency) उस तत्व के परमाणु भार (Atomic Mass) की तुलना में उसके नाभिक पर स्थित धनावेश (Positive charge on the nucleus) से अधिक निकटता से संबंधित था।
- उन्होंने इस नाभिकीय आवेश को परमाणु संख्या (Atomic Number) का नाम दिया और सिद्ध किया कि यह तत्व में मौजूद प्रोटॉनों की संख्या के बराबर है।
- निष्कर्ष:
- मोजले के प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि किसी तत्व का सबसे मौलिक गुण (Fundamental Property) उसका परमाणु भार नहीं, बल्कि उसकी परमाणु संख्या (Z) है।
(PYQ Reference: SSC CGL, RRB NTPC)
- मोजले के प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि किसी तत्व का सबसे मौलिक गुण (Fundamental Property) उसका परमाणु भार नहीं, बल्कि उसकी परमाणु संख्या (Z) है।
2. आधुनिक आवर्त नियम (Modern Periodic Law)
हेनरी मोजले की खोज के आधार पर, मेंडेलीफ के पुराने आवर्त नियम में संशोधन किया गया और आधुनिक आवर्त नियम प्रतिपादित किया गया।
नियम:
“तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुणधर्म उनकी परमाणु संख्याओं (Atomic Numbers) के आवर्ती फलन (Periodic Function) होते हैं।”
अर्थ: इसका अर्थ है कि यदि तत्वों को उनकी बढ़ती हुई परमाणु संख्या (Increasing Atomic Number) के क्रम में व्यवस्थित किया जाए, तो एक नियमित अंतराल के बाद उनके गुणों की पुनरावृत्ति होती है।
आधुनिक आवर्त सारणी इसी नियम पर आधारित है। इसे आवर्त सारणी का दीर्घ रूप (Long Form of the Periodic Table) भी कहा जाता है, जिसका ढाँचा नील बोर के मॉडल से प्रेरित था।
(PYQ Reference: SSC CHSL, UPSC CDS)
आधुनिक आवर्त सारणी ने मेंडेलीफ की कमियों को कैसे दूर किया?
आधुनिक आवर्त सारणी ने वर्गीकरण का आधार परमाणु भार से बदलकर परमाणु संख्या करके, मेंडेलीफ की सारणी की लगभग सभी मुख्य विसंगतियों को दूर कर दिया:
- अनियमित परमाणु भार क्रम की समस्या का समाधान:
- आर्गन (Z=18) की परमाणु संख्या पोटैशियम (Z=19) से कम है। इसलिए, परमाणु संख्या के बढ़ते क्रम में रखने पर आर्गन स्वाभाविक रूप से पोटैशियम से पहले आ जाता है, भले ही उसका परमाणु भार अधिक हो। यही बात कोबाल्ट (Z=27)/निकल (Z=28) पर भी लागू होती है। इस प्रकार यह विसंगति दूर हो गई।
(PYQ Reference: State PSC)
- आर्गन (Z=18) की परमाणु संख्या पोटैशियम (Z=19) से कम है। इसलिए, परमाणु संख्या के बढ़ते क्रम में रखने पर आर्गन स्वाभाविक रूप से पोटैशियम से पहले आ जाता है, भले ही उसका परमाणु भार अधिक हो। यही बात कोबाल्ट (Z=27)/निकल (Z=28) पर भी लागू होती है। इस प्रकार यह विसंगति दूर हो गई।
- समस्थानिकों के स्थान की समस्या का समाधान:
- एक ही तत्व के सभी समस्थानिकों (Isotopes) की परमाणु संख्या समान होती है।
- इसलिए, कार्बन के सभी समस्थानिकों (¹²C, ¹⁴C) को आवर्त सारणी में केवल एक ही स्थान (Z=6 पर) पर रखा गया, जो बिल्कुल सही है। अलग-अलग स्थान देने की समस्या समाप्त हो गई।
(PYQ Reference: NDA, 2019)
- तत्वों की स्थिति का तार्किक आधार:
- परमाणु संख्या से हमें परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पता चलता है। आधुनिक आवर्त सारणी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पर आधारित है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि एक समूह के तत्वों के गुण समान क्यों होते हैं (क्योंकि उनके बाहरी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है)।
आधुनिक सारणी की सीमा:
- हाइड्रोजन का स्थान: आधुनिक आवर्त सारणी भी हाइड्रोजन को कोई निश्चित स्थान नहीं दे पाई है। इसे समूह 1 (क्षार धातुओं के साथ) और समूह 17 (हैलोजन के साथ) दोनों के गुण प्रदर्शित करने के कारण अभी भी विवादास्पद माना जाता है, हालांकि इसे आमतौर पर समूह 1 के ऊपर रखा जाता है। यह आज भी आवर्त सारणी की एक सीमा है।
(PYQ Reference: UPPCS)
निष्कर्ष
हेनरी मोजले का काम एक युगांतरकारी खोज थी जिसने तत्वों के वर्गीकरण की पूरी समझ को बदल दिया। परमाणु भार से परमाणु संख्या में बदलाव ने न केवल मेंडेलीफ की सारणी की विसंगतियों को दूर किया, बल्कि तत्वों के आवर्ती व्यवहार के पीछे के वास्तविक कारण – इलेक्ट्रॉनिक विन्यास – को भी उजागर किया, जिससे आधुनिक, तार्किक और त्रुटि रहित आवर्त सारणी का निर्माण संभव हुआ।
आधुनिक आवर्त सारणी की संरचना (Structure of the Modern Periodic Table)
आधुनिक आवर्त सारणी तत्वों को उनकी बढ़ती हुई परमाणु संख्या (Atomic Number) और उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration) के आधार पर व्यवस्थित करती है।
1. आवर्त (Periods)
- परिभाषा: आवर्त सारणी में क्षैतिज पंक्तियों (Horizontal Rows) को आवर्त (Periods) कहा जाता है।
- कुल संख्या: आधुनिक आवर्त सारणी में कुल 7 आवर्त हैं।
- सिद्धांत: एक आवर्त में, तत्वों को मुख्य क्वांटम संख्या (Principal Quantum Number, n) या कोशों (Shells) की संख्या के आधार पर व्यवस्थित किया जाता है।
- पहले आवर्त के तत्वों में केवल एक ऊर्जा कोश (K) होता है।
- दूसरे आवर्त के तत्वों में दो कोश (K, L) होते हैं, और इसी तरह आगे भी।
- गुणों में परिवर्तन: एक आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर:
- परमाणु संख्या एक-एक करके बढ़ती है।
- संयोजी इलेक्ट्रॉनों (Valence Electrons) की संख्या बढ़ती है।
- परमाणु त्रिज्या घटती है।
- आयनन ऊर्जा और विद्युत ऋणात्मकता बढ़ती है।
- आवर्तों में तत्वों की संख्या:
- आवर्त 1: 2 तत्व (H, He) – सबसे छोटा आवर्त
- आवर्त 2: 8 तत्व
- आवर्त 3: 8 तत्व
- आवर्त 4: 18 तत्व
- आवर्त 5: 18 तत्व
- आवर्त 6: 32 तत्व (लैंथेनाइड्स सहित) – सबसे बड़ा आवर्त
- आवर्त 7: 32 तत्व (एक्टिनाइड्स सहित) – अधूरा आवर्त
2. समूह (Groups)
- परिभाषा: आवर्त सारणी में ऊर्ध्वाधर स्तंभों (Vertical Columns) को समूह (Groups) कहा जाता है।
- कुल संख्या: आधुनिक आवर्त सारणी में कुल 18 समूह हैं।
- सिद्धांत: एक ही समूह के सभी तत्वों के परमाणुओं के सबसे बाहरी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या (संयोजी इलेक्ट्रॉन) समान होती है।
- गुणों में समानता:
- चूंकि संयोजी इलेक्ट्रॉन रासायनिक गुणों को निर्धारित करते हैं, इसलिए एक ही समूह के तत्वों के रासायनिक गुणधर्म बहुत समान होते हैं।
- उदाहरण: समूह 1 के सभी तत्वों (Li, Na, K) की संयोजकता +1 होती है और वे सभी अत्यधिक अभिक्रियाशील क्षार धातुएं हैं।
- गुणों में परिवर्तन: एक समूह में ऊपर से नीचे जाने पर:
- ऊर्जा कोशों की संख्या बढ़ती है।
- परमाणु त्रिज्या बढ़ती है।
- आयनन ऊर्जा और विद्युत ऋणात्मकता घटती है।
प्रमुख समूहों के विशेष नाम (Important Groups with Special Names):
| समूह संख्या | विशेष नाम | विशेषता |
| समूह 1 | क्षार धातुएं (Alkali Metals) (H को छोड़कर) | अत्यधिक अभिक्रियाशील, मुलायम धातुएं। |
| समूह 2 | क्षारीय मृदा धातुएं (Alkaline Earth Metals) | अभिक्रियाशील धातुएं, क्षार धातुओं से कम। |
| समूह 15 | निक्टोजेन्स (Pnictogens) | (Nitrogen family) |
| समूह 16 | चाल्कोजन्स (Chalcogens) | (Oxygen family) |
| समूह 17 | हैलोजन (Halogens) | अत्यधिक अभिक्रियाशील अधातुएं, रंगीन होती हैं। |
| समूह 18 | अक्रिय गैसें या उत्कृष्ट गैसें (Inert or Noble Gases) | रासायनिक रूप से अक्रियाशील होती हैं क्योंकि उनका बाहरी कोश पूरी तरह से भरा होता है। |
3. ब्लॉक के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on Blocks)
आधुनिक आवर्त सारणी को अंतिम इलेक्ट्रॉन के प्रवेश करने वाले उपकोश (Subshell) के आधार पर चार ब्लॉकों में विभाजित किया गया है।
(a) s-ब्लॉक तत्व (s-block Elements)
- परिभाषा: वे तत्व जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन s-उपकोश में प्रवेश करता है।
- समूह: समूह 1 और समूह 2 के तत्व s-ब्लॉक में आते हैं।
- विशेषताएं:
- इनमें सभी धातुएं (Metals) हैं (हाइड्रोजन को छोड़कर)।
- ये अत्यधिक अभिक्रियाशील (Highly Reactive) होती हैं।
- ये नरम होती हैं और इनके गलनांक और क्वथनांक कम होते हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: ns¹ (समूह 1) और ns² (समूह 2)।
(b) p-ब्लॉक तत्व (p-block Elements)
- परिभाषा: वे तत्व जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन p-उपकोश में प्रवेश करता है।
- समूह: समूह 13 से लेकर समूह 18 तक के तत्व p-ब्लॉक में आते हैं।
- विशेषताएं:
- यह आवर्त सारणी का एकमात्र ब्लॉक है जिसमें धातु (Metals), अधातु (Non-metals), और उपधातु (Metalloids) तीनों प्रकार के तत्व शामिल हैं।
- s-ब्लॉक के साथ मिलकर, ये प्रतिनिधि तत्व (Representative Elements) कहलाते हैं।
(c) d-ब्लॉक तत्व (d-block Elements)
- परिभाषा: वे तत्व जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन (n-1)d-उपकोश में प्रवेश करता है।
- समूह: समूह 3 से लेकर समूह 12 तक के तत्व d-ब्लॉक में आते हैं।
- अन्य नाम: इन्हें संक्रमण तत्व (Transition Elements) भी कहा जाता है क्योंकि इनके गुण s-ब्लॉक (अत्यधिक धात्विक) और p-ब्लॉक (मुख्य रूप से अधात्विक) के बीच के होते हैं।
- विशेषताएं:
- ये सभी कठोर धातुएं (Hard Metals) हैं (पारा को छोड़कर, जो द्रव है)।
- ये रंगीन यौगिक (Coloured Compounds) बनाती हैं और उत्प्रेरक (Catalyst) के रूप में उपयोग होती हैं।
- इनकी परिवर्तनीय संयोजकता (Variable Valency) होती है।
(d) f-ब्लॉक तत्व (f-block Elements)
- परिभाषा: वे तत्व जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन (n-2)f-उपकोश में प्रवेश करता है।
- स्थिति: इन्हें आवर्त सारणी के मुख्य भाग के नीचे दो अलग-अलग पंक्तियों में रखा गया है।
- अन्य नाम: इन्हें आंतरिक संक्रमण तत्व (Inner Transition Elements) कहा जाता है।
- दो श्रृंखलाएं (Two Series):
- लैंथेनाइड श्रृंखला (Lanthanide Series): परमाणु संख्या 58 से 71 तक (तत्व लैंथेनम के बाद आते हैं)। इन्हें दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements) भी कहते हैं।
- एक्टिनाइड श्रृंखला (Actinide Series): परमाणु संख्या 90 से 103 तक (तत्व एक्टिनियम के बाद आते हैं)। इस श्रृंखला के अधिकांश तत्व रेडियोधर्मी (Radioactive) हैं।
यह संरचनात्मक वर्गीकरण हमें तत्वों के गुणों को उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से जोड़ने में मदद करता है, जिससे रसायन विज्ञान का अध्ययन तार्किक और व्यवस्थित हो जाता है।
आवर्ती गुणधर्म
1. परमाणु त्रिज्या (Atomic Radius)
परिभाषा
परमाणु त्रिज्या को सामान्यतः किसी परमाणु के नाभिक (Nucleus) के केंद्र से उसके सबसे बाहरी कोश (Outermost Shell) में मौजूद इलेक्ट्रॉन तक की दूरी के रूप में परिभाषित किया जाता है।
- चुनौती: हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत के अनुसार, एक इलेक्ट्रॉन की सटीक स्थिति का पता लगाना असंभव है। इसलिए, परमाणु त्रिज्या को सीधे मापना मुश्किल है। इसे आमतौर पर दो बंधे हुए परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी का आधा करके मापा जाता है।
- इकाई: इसे एंगस्ट्रॉम (Å) (1 Å = 10⁻¹⁰ m) या पिकोमीटर (pm) (1 pm = 10⁻¹² m) में मापा जाता है।
आवर्त सारणी में परमाणु त्रिज्या का ट्रेंड (Trend in the Periodic Table)
यह समझना प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।
- ट्रेंड: किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर, परमाणु त्रिज्या घटती (Decreases) है।
- कारण (Reason):
- जब हम एक आवर्त में बाएँ से दाएँ जाते हैं, तो परमाणु संख्या (प्रोटॉनों की संख्या) बढ़ती है, जिससे नाभिकीय आवेश (Nuclear Charge) बढ़ता है।
- इलेक्ट्रॉन उसी मुख्य कोश (Main Shell) में जुड़ते हैं, इसलिए ऊर्जा कोशों की संख्या नहीं बढ़ती।
- बढ़ा हुआ नाभिकीय आवेश बाहरी इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर अधिक मजबूती से खींचता है, जिससे परमाणु का आकार सिकुड़ जाता है।
- निष्कर्ष: आवर्त में, हैलोजन (समूह 17) सबसे छोटे और क्षार धातुएं (समूह 1) सबसे बड़ी होती हैं। (अक्रिय गैसों की त्रिज्या अधिक होती है)।
(PYQ Reference: SSC CGL, RRB JE)
- ट्रेंड: किसी समूह में ऊपर से नीचे जाने पर, परमाणु त्रिज्या बढ़ती (Increases) है।
- कारण (Reason):
- जब हम एक समूह में नीचे जाते हैं, तो प्रत्येक नए तत्व के साथ एक नया ऊर्जा कोश (New Energy Shell) जुड़ जाता है।
- यह नया कोश नाभिक से अधिक दूरी पर होता है।
- भले ही नाभिकीय आवेश बढ़ता है, लेकिन नए कोश के जुड़ने का प्रभाव अधिक प्रभावी होता है, जिससे परमाणु का आकार बढ़ जाता है।
- निष्कर्ष: समूह में, सबसे नीचे वाला तत्व सबसे बड़ा होता है।
(PYQ Reference: State PSC, NDA)
2. आयनन ऊर्जा / आयनन विभव (Ionization Energy / Ionization Potential)
परिभाषा
किसी विलगित गैसीय परमाणु (Isolated Gaseous Atom) के सबसे बाहरी कोश से एक इलेक्ट्रॉन को पूरी तरह से बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा (Minimum Energy) को आयनन ऊर्जा (Ionization Energy – IE) या आयनन विभव (Ionization Potential – IP) कहते हैं।
X (g) + आयनन ऊर्जा → X⁺(g) + e⁻
- यह ऊर्जा की वह मात्रा है जो एक परमाणु को धनायन (Cation) में बदलने के लिए लगती है।
- जिस तत्व की आयनन ऊर्जा जितनी कम होगी, वह उतनी ही आसानी से इलेक्ट्रॉन त्याग देगा और उतना ही अधिक धात्विक (Metallic) या विद्युत धनात्मक (Electropositive) होगा।
आवर्त सारणी में आयनन ऊर्जा का ट्रेंड (Trend in the Periodic Table)
- ट्रेंड: किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर, आयनन ऊर्जा बढ़ती (Increases) है।
- कारण (Reason):
- बाएँ से दाएँ जाने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है और परमाणु त्रिज्या घटती है।
- इस कारण, नाभिक बाहरी इलेक्ट्रॉनों को अधिक मजबूती से पकड़ता है।
- इसलिए, उन इलेक्ट्रॉनों को बाहर निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
- निष्कर्ष: आवर्त में, अक्रिय गैसों (समूह 18) की आयनन ऊर्जा सर्वाधिक और क्षार धातुओं (समूह 1) की न्यूनतम होती है।
(PYQ Reference: CDS, UPPCS)
- ट्रेंड: किसी समूह में ऊपर से नीचे जाने पर, आयनन ऊर्जा घटती (Decreases) है।
- कारण (Reason):
- ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु त्रिज्या बढ़ती है क्योंकि नए ऊर्जा कोश जुड़ जाते हैं।
- बाहरी इलेक्ट्रॉन नाभिक से बहुत दूर हो जाते हैं और भीतरी इलेक्ट्रॉनों द्वारा परिरक्षित (Shielded) होते हैं।
- इससे नाभिक का बाहरी इलेक्ट्रॉनों पर आकर्षण बल कम हो जाता है।
- इसलिए, उन इलेक्ट्रॉनों को बाहर निकालने के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
- निष्कर्ष: समूह में, सबसे ऊपर वाले तत्व की आयनन ऊर्जा सर्वाधिक होती है।
(PYQ Reference: SSC CHSL)
सारांश सारणी: गुणों की तुलना
| गुण (Property) | आवर्त में (बाएँ से दाएँ) | समूह में (ऊपर से नीचे) | कारण (मुख्य) |
| परमाणु त्रिज्या | घटती है ⬇️ | बढ़ती है ⬆️ | कोशों की संख्या बनाम नाभिकीय आवेश |
| आयनन ऊर्जा | बढ़ती है ⬆️ | घटती है ⬇️ | नाभिकीय आवेश और परमाणु त्रिज्या |
महत्वपूर्ण संबंध:
परमाणु त्रिज्या जितनी कम ہوگی، आयनन ऊर्जा उतनी ही अधिक ہوگی।
(Atomic Radius is inversely proportional to Ionization Energy)
यह संबंध इन दोनों अवधारणाओं को एक साथ समझने और याद रखने में मदद करता है।
1. इलेक्ट्रॉन बंधुता (Electron Affinity – EA)
परिभाषा
किसी विलगित गैसीय परमाणु (Isolated Gaseous Atom) के सबसे बाहरी कोश में एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन जोड़ने (adding an electron) पर जो ऊर्जा मुक्त (Energy is Released) होती है, उसे उस परमाणु की इलेक्ट्रॉन बंधुता कहते हैं।
X (g) + e⁻ → X⁻(g) + ऊर्जा (इलेक्ट्रॉन बंधुता)
- यह ऊर्जा की वह मात्रा है जो एक परमाणु को ऋणायन (Anion) में बदलने पर निकलती है।
- सरल शब्दों में, यह किसी परमाणु की इलेक्ट्रॉन को स्वीकार करने या उसके प्रति प्रेम/आकर्षण (Affinity) का माप है।
- इलेक्ट्रॉन बंधुता जितनी अधिक (अधिक ऋणात्मक मान) होगी, परमाणु उतनी ही आसानी से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करेगा और उतना ही अधिक अधात्विक (Non-metallic) होगा।
इकाई (Unit):
इसे किलोजूल प्रति मोल (kJ/mol) या इलेक्ट्रॉन वोल्ट प्रति परमाणु (eV/atom) में मापा जाता है।
आवर्त सारणी में इलेक्ट्रॉन बंधुता का ट्रेंड (Trend in the Periodic Table)
- ट्रेंड: सामान्यतः, किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर, इलेक्ट्रॉन बंधुता बढ़ती (Increases) है (अर्थात, अधिक ऋणात्मक होती जाती है)।
- कारण (Reason):
- बाएँ से दाएँ जाने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है और परमाणु का आकार छोटा होता जाता है।
- इस कारण, नाभिक आने वाले नए इलेक्ट्रॉन को अधिक मजबूती से आकर्षित करता है, जिससे इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर अधिक ऊर्जा मुक्त होती है।
- निष्कर्ष: आवर्त में, हैलोजन (समूह 17) की इलेक्ट्रॉन बंधुता सर्वाधिक होती है।
(PYQ Reference: CDS, 2018)
- ट्रेंड: सामान्यतः, किसी समूह में ऊपर से नीचे जाने पर, इलेक्ट्रॉन बंधुता घटती (Decreases) है (अर्थात, कम ऋणात्मक होती जाती है)।
- कारण (Reason):
- ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु का आकार बढ़ता है क्योंकि नए ऊर्जा कोश जुड़ते हैं।
- आने वाला नया इलेक्ट्रॉन नाभिक से बहुत दूर होता है और भीतरी इलेक्ट्रॉनों द्वारा परिरक्षित (shielded) होता है।
- इसलिए, नाभिक का उस पर आकर्षण बल कम हो जाता है और इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर कम ऊर्जा मुक्त होती है।
- सबसे महत्वपूर्ण अपवाद (Most Important Exception):
- क्लोरीन (Cl) की इलेक्ट्रॉन बंधुता फ्लोरीन (F) से अधिक होती है।
- कारण: फ्लोरीन का परमाणु आकार बहुत छोटा होता है। जब इसमें एक नया इलेक्ट्रॉन जोड़ा जाता है, तो पहले से मौजूद छोटे आकार के 2p उपकोश में इलेक्ट्रॉनों के बीच प्रतिकर्षण (Repulsion) होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन जोड़ना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। क्लोरीन का आकार बड़ा होने के कारण यह प्रतिकर्षण कम होता है।
- पूरी आवर्त सारणी में क्लोरीन (Cl) की इलेक्ट्रॉन बंधुता सर्वाधिक होती है। (यह तथ्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाता है)
2. विद्युत ऋणात्मकता (Electronegativity – EN)
परिभाषा
किसी यौगिक के अणु में, एक परमाणु की सहसंयोजी बंध (Covalent Bond) के साझा किए गए इलेक्ट्रॉन जोड़ी (Shared pair of electrons) को अपनी ओर आकर्षित करने की सापेक्ष क्षमता (Relative tendency to attract) को उस परमाणु की विद्युत ऋणात्मकता कहते हैं।
- यह एकल, विलगित परमाणु का गुण नहीं है, बल्कि यह बंधे हुए परमाणु (Bonded atom) का गुण है।
- इसका कोई मात्रक (Unit) नहीं होता है। यह एक सापेक्षिक संख्या है, जिसे पॉलिंग स्केल (Pauling Scale) पर मापा जाता है।
आवर्त सारणी में विद्युत ऋणात्मकता का ट्रेंड (Trend in the Periodic Table)
इसका ट्रेंड लगभग आयनन ऊर्जा के समान है।
- ट्रेंड: किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ जाने पर, विद्युत ऋणात्मकता बढ़ती (Increases) है।
- कारण (Reason):
- नाभिकीय आवेश बढ़ता है और परमाणु का आकार छोटा होता है। इससे नाभिक की साझा इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर खींचने की क्षमता बढ़ जाती है।
(PYQ Reference: SSC CHSL, 2019)
- नाभिकीय आवेश बढ़ता है और परमाणु का आकार छोटा होता है। इससे नाभिक की साझा इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर खींचने की क्षमता बढ़ जाती है।
- ट्रेंड: किसी समूह में ऊपर से नीचे जाने पर, विद्युत ऋणात्मकता घटती (Decreases) है।
- कारण (Reason):
- परमाणु का आकार बढ़ता है, जिससे नाभिक की साझा इलेक्ट्रॉनों पर पकड़ कमजोर हो जाती है।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- फ्लोरीन (Fluorine, F) पूरी आवर्त सारणी में सर्वाधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व (Most Electronegative Element) है। (पॉलिंग स्केल पर इसका मान 4.0 होता है)।
- इसके बाद ऑक्सीजन (O) और फिर नाइट्रोजन (N) का स्थान आता है। (याद रखें: F > O > N)
- फ्रांशियम (Fr) सबसे कम विद्युत ऋणात्मक (सर्वाधिक विद्युत धनात्मक) तत्व है।
इलेक्ट्रॉन बंधुता बनाम विद्युत ऋणात्मकता (Electron Affinity vs. Electronegativity)
(यह अंतर परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है)
| आधार | इलेक्ट्रॉन बंधुता (Electron Affinity) | विद्युत ऋणात्मकता (Electronegativity) |
| परिभाषा | विलगित (Isolated) गैसीय परमाणु द्वारा एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने पर मुक्त ऊर्जा। | बंधे हुए (Bonded) परमाणु द्वारा साझा इलेक्ट्रॉन जोड़ी को आकर्षित करने की क्षमता। |
| प्रकृति | एक ऊर्जा का निरपेक्ष मान (Absolute value of energy)। | एक सापेक्षिक प्रवृत्ति (Relative tendency), कोई ऊर्जा नहीं। |
| इकाई | kJ/mol या eV/atom | कोई इकाई नहीं (पॉलिंग स्केल)। |
| सर्वाधिक मान वाला तत्व | क्लोरीन (Chlorine, Cl) | फ्लोरीन (Fluorine, F) |
सारांश सारणी: गुणों की तुलना
| गुण (Property) | आवर्त में (बाएँ से दाएँ) | समूह में (ऊपर से नीचे) | सर्वाधिक मान वाला तत्व |
| परमाणु त्रिज्या | घटती है ⬇️ | बढ़ती है ⬆️ | सीजियम/फ्रांशियम |
| आयनन ऊर्जा | बढ़ती है ⬆️ | घटती है ⬇️ | हीलियम |
| इलेक्ट्रॉन बंधुता | बढ़ती है ⬆️ (अधिक ऋणात्मक) | घटती है ⬇️ (कम ऋणात्मक) | क्लोरीन (Cl) (अपवाद) |
| विद्युत ऋणात्मकता | बढ़ती है ⬆️ | घटती है ⬇️ | फ्लोरीन (F) |
धातु, अधातु और उपधातु
धातु (Metals)
परिभाषा: धातु वे तत्व होते हैं जो आसानी से इलेक्ट्रॉन त्यागकर (Lose Electrons) धनायन (Cations) बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं। आवर्त सारणी में अधिकांश तत्व (लगभग 80%) धातु हैं और ये सारणी के बाईं ओर तथा मध्य में स्थित होते हैं।
धातुओं के सामान्य भौतिक गुणधर्म (General Physical Properties of Metals)
1. भौतिक अवस्था (Physical State):
- गुण: सामान्यतः, कमरे के तापमान (Room Temperature) पर सभी धातुएं ठोस (Solid) अवस्था में पाई जाती हैं।
- सबसे महत्वपूर्ण अपवाद:
- पारा (Mercury – Hg): एकमात्र धातु है जो कमरे के तापमान पर द्रव (Liquid) अवस्था में होती है।
- गैलियम (Ga) और सीजियम (Cs): इनका गलनांक बहुत कम होता है। ये कमरे के तापमान पर तो ठोस होती हैं, लेकिन हथेली पर रखने पर (शरीर की गर्मी से) पिघलकर द्रव बन जाती हैं।
2. चमक (Lustre):
- गुण: धातुओं की सतह चमकदार (Shiny) होती है, इस गुण को धात्विक चमक (Metallic Lustre) कहते हैं।
- कारण: यह चमक मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा प्रकाश को परावर्तित करने के कारण होती है।
3. कठोरता (Hardness):
- गुण: अधिकांश धातुएं कठोर (Hard) होती हैं। कठोरता अलग-अलग धातुओं में भिन्न होती है।
- उदाहरण: लोहा (Iron) बहुत कठोर होता है।
- सबसे महत्वपूर्ण अपवाद (मुलायम धातुएं):
- क्षार धातुएं (Alkali Metals) जैसे सोडियम (Na), पोटैशियम (K), और लिथियम (Li) बहुत मुलायम होती हैं। वे इतनी मुलायम होती हैं कि उन्हें चाकू से आसानी से काटा जा सकता है।
4. आघातवर्धनीयता (Malleability):
- गुण: यह धातुओं का वह गुण है जिसके कारण उन्हें हथौड़े से पीटकर पतली चादरों (Thin Sheets) में बदला जा सकता है।
- सबसे अधिक आघातवर्धनीय धातुएं:
- सोना (Gold – Au)
- चांदी (Silver – Ag)
5. तन्यता (Ductility):
- गुण: यह धातुओं का वह गुण है जिसके कारण उन्हें खींचकर पतले तार (Thin Wires) बनाए जा सकते हैं।
- सबसे अधिक तन्य धातु:
- सोना (Gold – Au): 1 ग्राम सोने से लगभग 2 किलोमीटर लंबा तार खींचा जा सकता है।
6. ऊष्मा की सुचालकता (Thermal Conductivity):
- गुण: धातुएं ऊष्मा की उत्तम सुचालक (Good Conductors) होती हैं। इसीलिए खाना पकाने के बर्तन धातुओं (जैसे कॉपर, एल्युमिनियम) के बने होते हैं।
- सर्वश्रेष्ठ सुचालक:
- चांदी (Silver – Ag)
- तांबा (Copper – Cu)
- सबसे खराब सुचालक (धातुओं में):
- सीसा (Lead – Pb)
- पारा (Mercury – Hg)
7. विद्युत की सुचालकता (Electrical Conductivity):
- गुण: धातुएं विद्युत की भी उत्तम सुचालक (Good Conductors) होती हैं। यह गुण मुक्त इलेक्ट्रॉनों (Free Electrons) की उपस्थिति के कारण होता है।
- सर्वश्रेष्ठ सुचालक:
- चांदी (Silver – Ag) (यह सर्वोत्तम सुचालक है)।
- तांबा (Copper – Cu) (चांदी महंगी होने के कारण बिजली के तार तांबे के बनाए जाते हैं)।
- एल्युमिनियम (Aluminium – Al)
8. घनत्व (Density):
- गुण: अधिकांश धातुओं का घनत्व उच्च (High) होता है और वे भारी होती हैं।
- सबसे भारी या उच्चतम घनत्व वाली धातु:
- ऑस्मियम (Osmium – Os)
- सबसे हल्की या निम्नतम घनत्व वाली धातु:
- लिथियम (Lithium – Li) (यह पानी से भी हल्की होती है)।
9. गलनांक और क्वथनांक (Melting and Boiling Points):
- गुण: धातुओं के परमाणुओं के बीच मजबूत धात्विक बंध के कारण, उनके गलनांक और क्वथनांक सामान्यतः उच्च (High) होते हैं।
- उच्चतम गलनांक वाली धातु:
- टंगस्टन (Tungsten – W): (लगभग 3422°C)। इसी गुण के कारण इसका उपयोग बिजली के बल्ब के फिलामेंट (Filament) में किया जाता है।
- न्यूनतम गलनांक वाली धातुएं: (पहले उल्लेखित अपवाद)
- पारा (Hg) (पहले से ही द्रव है)।
- गैलियम (Ga) और सीजियम (Cs) (बहुत कम गलनांक)।
10. ध्वानिक/अनुनादी (Sonorous):
- गुण: जब धातुएं किसी कठोर सतह से टकराती हैं, तो वे एक विशेष ध्वनि (Ringing Sound) उत्पन्न करती हैं। इसी गुण के कारण स्कूलों की घंटियाँ धातुओं की बनी होती हैं।
सारांश सारणी: गुणों के चरम और अपवाद (बहुत महत्वपूर्ण)
| गुण | सर्वोत्तम / उच्चतम | सबसे खराब / निम्नतम (या मुख्य अपवाद) |
| विद्युत सुचालकता | चांदी (Ag), फिर तांबा (Cu) | सीसा (Pb), पारा (Hg) |
| ऊष्मा सुचालकता | चांदी (Ag), फिर तांबा (Cu) | सीसा (Pb), पारा (Hg) |
| तन्यता | सोना (Au) | जिंक (Zn) (भंगुर होता है) |
| आघातवर्धनीयता | सोना (Au), चांदी (Ag) | जिंक (Zn) |
| घनत्व | ऑस्मियम (Os) | लिथियम (Li) |
| कठोरता | टंगस्टन (W), क्रोमियम (Cr) | सोडियम (Na), पोटैशियम (K) (चाकू से काटे जा सकते हैं) |
| गलनांक | टंगस्टन (W) | पारा (Hg), गैलियम (Ga), सीजियम (Cs) |
| भौतिक अवस्था | ठोस (लगभग सभी) | पारा (Hg) (कमरे के तापमान पर द्रव) |
धातुओं के रासायनिक गुणधर्म (Chemical Properties of Metals)
धातुओं के रासायनिक गुण मुख्य रूप से उनके द्वारा इलेक्ट्रॉन त्यागने (Losing Electrons) की प्रवृत्ति पर निर्भर करते हैं। जो धातु जितनी आसानी से इलेक्ट्रॉन त्यागती है, वह उतनी ही अधिक अभिक्रियाशील (Reactive) होती है।
1. ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया (Reaction with Oxygen)
- नियम: लगभग सभी धातुएं ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके संबंधित धातु ऑक्साइड (Metal Oxides) बनाती हैं।
- धातु + ऑक्सीजन → धातु ऑक्साइड
- धातु ऑक्साइड की प्रकृति: अधिकांश धातु ऑक्साइड क्षारीय (Basic) प्रकृति के होते हैं।
- कारण: जब इन ऑक्साइडों को पानी में घोला जाता है, तो वे क्षार (Base) बनाते हैं।
- उदाहरण: Na₂O(s) + H₂O(l) → 2NaOH(aq) (सोडियम हाइड्रॉक्साइड, एक प्रबल क्षार)
- कारण: जब इन ऑक्साइडों को पानी में घोला जाता है, तो वे क्षार (Base) बनाते हैं।
- उदाहरण:
- 2Na + O₂ → Na₂O
- 2Mg + O₂ → 2MgO
- 4Al + 3O₂ → 2Al₂O₃
- अभिक्रियाशीलता में भिन्नता:
- सोडियम (Na) और पोटैशियम (K): ये इतनी तेजी से अभिक्रिया करते हैं कि खुली हवा में रखने पर आग पकड़ लेते हैं। इसीलिए इन्हें सुरक्षित रखने के लिए केरोसीन (Kerosene) में डुबो कर रखा जाता है। (यह बहुत महत्वपूर्ण है)
- मैग्नीशियम (Mg), एल्युमिनियम (Al), जिंक (Zn), सीसा (Pb): ये हवा के संपर्क में आने पर अपने ऊपर ऑक्साइड की एक पतली, रक्षक परत (Protective Layer) बना लेती हैं, जो उन्हें आगे ऑक्सीकरण से बचाती है।
- लोहा (Fe): गर्म करने पर तेजी से जलता नहीं है, लेकिन लोहे का बुरादा आग में डालने पर तेजी से जलता है।
- चांदी (Ag) और सोना (Au): ये ऑक्सीजन के साथ आसानी से अभिक्रिया नहीं करते हैं।
उभयधर्मी ऑक्साइड (Amphoteric Oxides):
- ये वे विशेष धातु ऑक्साइड हैं जो अम्लीय और क्षारीय दोनों प्रकार के व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। यानी, ये अम्ल और क्षार दोनों से अभिक्रिया करके लवण और जल बनाते हैं।
- सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण:
- एल्युमिनियम ऑक्साइड (Al₂O₃)
- जिंक ऑक्साइड (ZnO)
2. जल के साथ अभिक्रिया (Reaction with Water)
- नियम: धातुएं जल के साथ अभिक्रिया करके धातु हाइड्रॉक्साइड (Metal Hydroxide) या धातु ऑक्साइड (Metal Oxide) बनाती हैं और हाइड्रोजन गैस (H₂ Gas) मुक्त करती हैं।
- धातु + जल → धातु हाइड्रॉक्साइड / धातु ऑक्साइड + H₂↑
- अभिक्रियाशीलता में भिन्नता:
| धातु | अभिक्रिया | उत्पाद |
| सोडियम (Na), पोटैशियम (K), कैल्शियम (Ca) | ठंडे जल (Cold Water) से तेजी से अभिक्रिया करते हैं। (Na और K की अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी और विस्फोटक होती है)। | धातु हाइड्रॉक्साइड (NaOH, KOH, Ca(OH)₂) |
| मैग्नीशियम (Mg) | ठंडे जल से अभिक्रिया नहीं करता, केवल गर्म जल (Hot Water) से अभिक्रिया करता है। | मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड (Mg(OH)₂) |
| एल्युमिनियम (Al), जिंक (Zn), लोहा (Fe) | न तो ठंडे और न ही गर्म जल से, केवल भाप (Steam) से अभिक्रिया करते हैं। | धातु ऑक्साइड (Al₂O₃, ZnO, Fe₃O₄) |
| सीसा (Pb), तांबा (Cu), चांदी (Ag), सोना (Au) | जल के साथ कोई अभिक्रिया नहीं करते हैं। | – |
3. अम्लों के साथ अभिक्रिया (Reaction with Acids)
- नियम: वे सभी धातुएं जो अभिक्रियाशीलता श्रेणी में हाइड्रोजन से ऊपर स्थित हैं, वे तनु अम्लों (Dilute Acids) से अभिक्रिया करके संबंधित लवण (Salt) बनाती हैं और हाइड्रोजन गैस (H₂) मुक्त करती हैं।
- धातु + तनु अम्ल → लवण + हाइड्रोजन गैस
- उदाहरण:
- Zn(s) + H₂SO₄(aq) → ZnSO₄(aq) + H₂↑
- Mg(s) + 2HCl(aq) → MgCl₂(aq) + H₂↑
- अपवाद और विशेष मामले:
- हाइड्रोजन से नीचे की धातुएं: तांबा (Cu), पारा (Hg), चांदी (Ag), सोना (Au) तनु अम्लों से अभिक्रिया करके H₂ गैस नहीं देती हैं।
- नाइट्रिक एसिड (HNO₃): जब धातुएं नाइट्रिक एसिड से अभिक्रिया करती हैं, तो सामान्यतः H₂ गैस उत्पन्न नहीं होती है। क्योंकि HNO₃ एक प्रबल ऑक्सीकारक (Strong Oxidizing Agent) है, यह उत्पन्न H₂ को ऑक्सीकृत करके जल (H₂O) में बदल देता है और स्वयं नाइट्रोजन के विभिन्न ऑक्साइडों (NO, NO₂, N₂O) में अपचयित हो जाता है।
- केवल मैग्नीशियम (Mg) और मैंगनीज (Mn) ही अति तनु HNO₃ के साथ अभिक्रिया करके H₂ गैस देते हैं। (यह एक महत्वपूर्ण अपवाद है)
- एक्वा रेजिया (Aqua Regia) या अम्लराज:
- यह 3 भाग सांद्र HCl और 1 भाग सांद्र HNO₃ का ताजा मिश्रण (अनुपात 3:1) होता है।
- यह इतना संक्षारक होता है कि सोने (Gold) और प्लैटिनम (Platinum) जैसी अक्रिय धातुओं को भी अपने में घोल सकता है।
4. क्षार के साथ अभिक्रिया (Reaction with Bases)
- नियम: अधिकांश धातुएं क्षारों से अभिक्रिया नहीं करती हैं।
- केवल कुछ उभयधर्मी (Amphoteric) धातुएं प्रबल क्षारों के साथ अभिक्रिया करके लवण और हाइड्रोजन गैस (H₂ Gas) बनाती हैं।
- सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण:
- एल्युमिनियम (Al): 2Al + 2NaOH + 2H₂O → 2NaAlO₂ (सोडियम एल्युमिनेट) + 3H₂↑
- जिंक (Zn): Zn + 2NaOH → Na₂ZnO₂ (सोडियम जिंकेट) + H₂↑
सारांश सारणी: प्रमुख अभिक्रियाएं
| अभिक्रिया | अभिकारक | उत्पाद | मुख्य गैस |
| ऑक्सीजन के साथ | धातु + O₂ | धातु ऑक्साइड (क्षारीय/उभयधर्मी) | – |
| जल के साथ | धातु + H₂O | धातु हाइड्रॉक्साइड या ऑक्साइड + H₂ | H₂ (हाइड्रोजन) |
| तनु अम्लों के साथ | धातु + Acid | लवण + H₂ | H₂ (हाइड्रोजन) |
| प्रबल क्षारों के साथ | उभयधर्मी धातु + Base | लवण + H₂ | H₂ (हाइड्रोजन) |
| कार्बोनेट/बाइकार्बोनेट के साथ | अम्ल | (यहाँ धातु नहीं) | CO₂ |
अभिक्रियाशीलता श्रेणी (Reactivity Series)
परिभाषा
अभिक्रियाशीलता श्रेणी धातुओं की एक ऐसी सूची है, जिसमें उन्हें उनकी घटती हुई अभिक्रियाशीलता (Decreasing order of reactivity) के क्रम में व्यवस्थित किया गया है।
- इस सूची में सबसे ऊपर रखी गई धातु सर्वाधिक अभिक्रियाशील (Most Reactive) होती है।
- इस सूची में सबसे नीचे रखी गई धातु सबसे कम अभिक्रियाशील (Least Reactive) होती है।
- यह श्रेणी धातुओं की इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति पर आधारित है। जो धातु जितनी आसानी से इलेक्ट्रॉन त्याग कर धनायन बनाती है, वह उतनी ही अधिक अभिक्रियाशील होती है।
धातुओं की अभिक्रियाशीलता श्रेणी
नीचे दी गई श्रेणी को याद रखना प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसे याद करने के लिए लोकप्रिय स्मरक (mnemonics) का भी उपयोग किया जा सकता है।
| धातु (Metal) | प्रतीक (Symbol) | अभिक्रियाशीलता (Reactivity) | स्मरक (Mnemonic) |
| पोटैशियम | K | सर्वाधिक अभिक्रियाशील (Most Reactive) | Kashi |
| सोडियम | Na | Nath | |
| कैल्शियम | Ca | Ca | |
| मैग्नीशियम | Mg | Mali | |
| एल्युमिनियम | Al | घटती हुई अभिक्रियाशीलता (Decreasing Reactivity) ⬇️ | Aloo |
| जिंक (जस्ता) | Zn | Zara | |
| आयरन (लोहा) | Fe | Feeke | |
| लेड (सीसा) | Pb | Pakata | |
| (हाइड्रोजन) | (H) | (संदर्भ बिंदु/Reference Point) | Hai. |
| कॉपर (तांबा) | Cu | Con | |
| मरकरी (पारा) | Hg | Hoga | |
| सिल्वर (चांदी) | Ag | Aage | |
| गोल्ड (सोना) | Au | सबसे कम अभिक्रियाशील (Least Reactive) | Aur? |
| (प्लैटिनम) | (Pt) | (सोने से भी कम अभिक्रियाशील) | – |
(स्मरक: “Kashi Nath Ca Mali Aloo Zara Feeke Pakata Hai. Con Hoga Aage Aur?”)
- हाइड्रोजन (H): यद्यपि हाइड्रोजन एक अधातु है, इसे इस श्रेणी में एक संदर्भ बिंदु (Reference point) के रूप में रखा गया है क्योंकि यह धातुओं की तरह ही इलेक्ट्रॉन त्याग कर धनायन (H⁺) बनाता है।
अभिक्रियाशीलता श्रेणी की मुख्य बातें और अनुप्रयोग
इस श्रेणी का उपयोग कई प्रकार की रासायनिक अभिक्रियाओं की भविष्यवाणी करने के लिए किया जा सकता है:
1. विस्थापन अभिक्रिया (Displacement Reactions):
- नियम: श्रेणी में ऊपर स्थित कोई भी धातु, अपने से नीचे स्थित धातु को, उसके लवण विलयन (Salt Solution) से विस्थापित (Displace) कर सकती है।
- उदाहरण 1 (अभिक्रिया होगी):
Fe(s) + CuSO₄(aq) → FeSO₄(aq) + Cu(s)- कारण: आयरन (Fe) श्रेणी में कॉपर (Cu) से ऊपर है, इसलिए Fe, Cu से अधिक अभिक्रियाशील है और उसे विस्थापित कर सकता है। विलयन का नीला रंग (CuSO₄) बदलकर हल्का हरा (FeSO₄) हो जाएगा।
- उदाहरण 2 (कोई अभिक्रिया नहीं होगी):
Cu(s) + FeSO₄(aq) → कोई अभिक्रिया नहीं (No Reaction)- कारण: कॉपर (Cu) श्रेणी में आयरन (Fe) से नीचे है, इसलिए Cu, Fe से कम अभिक्रियाशील है और उसे विस्थापित नहीं कर सकता।
2. तनु अम्लों के साथ अभिक्रिया:
- नियम: जो धातुएं अभिक्रियाशीलता श्रेणी में हाइड्रोजन (H) से ऊपर स्थित हैं, वे तनु अम्लों (जैसे HCl, H₂SO₄) से अभिक्रिया करके हाइड्रोजन गैस (H₂ Gas) मुक्त करती हैं।
- उदाहरण:
- Zn(s) + H₂SO₄(aq) → ZnSO₄(aq) + H₂↑ (अभिक्रिया होगी क्योंकि Zn, H से ऊपर है)
- नियम: जो धातुएं हाइड्रोजन से नीचे स्थित हैं (जैसे Cu, Ag, Au, Pt), वे तनु अम्लों से अभिक्रिया करके H₂ गैस मुक्त नहीं करती हैं।
- उदाहरण:
- Cu(s) + H₂SO₄(aq) → कोई अभिक्रिया नहीं
3. जल के साथ अभिक्रिया:
- श्रेणी में सबसे ऊपर की धातुएं (K, Na, Ca) ठंडे जल से ही तीव्रता से अभिक्रिया कर लेती हैं।
- जैसे-जैसे हम श्रेणी में नीचे जाते हैं, जल के साथ अभिक्रियाशीलता घटती जाती है। मैग्नीशियम गर्म जल से अभिक्रिया करता है, जबकि एल्युमिनियम, जिंक और लोहा केवल भाप से अभिक्रिया करते हैं।
- हाइड्रोजन से नीचे की धातुएं सामान्यतः जल से अभिक्रिया नहीं करती हैं।
4. धातुओं का निष्कर्षण (Extraction of Metals):
- अधिक अभिक्रियाशील धातुएं (K, Na, Ca, Al): इन्हें इनके अयस्कों से विद्युत अपघटन (Electrolysis) द्वारा प्राप्त किया जाता है क्योंकि ये बहुत स्थायी यौगिक बनाती हैं।
- मध्यम अभिक्रियाशील धातुएं (Zn, Fe, Pb): इन्हें इनके ऑक्साइड अयस्कों का कार्बन द्वारा अपचयन (Reduction with Carbon) करके प्राप्त किया जाता है।
- कम अभिक्रियाशील धातुएं (Cu, Ag, Au): ये प्रकृति में अक्सर मुक्त अवस्था (Free State) में पाई जाती हैं या इनके अयस्कों को केवल गर्म करने से ही धातु प्राप्त की जा सकती है (जैसे पारा का निष्कर्षण)।
निष्कर्ष:
अभिक्रियाशीलता श्रेणी रसायन विज्ञान की भविष्यवाणियों के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है। यह याद रखना कि कौन सी धातु किससे ऊपर है, आपको कई अभिक्रियाओं के परिणाम का अनुमान लगाने और प्रतियोगी परीक्षाओं में संबंधित प्रश्नों को आसानी से हल करने में मदद करेगा।
अधातु (Non-metals)
परिभाषा: अधातु वे तत्व होते हैं जो आसानी से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके (Gain Electrons) ऋणायन (Anions) बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं। आवर्त सारणी में ये तत्व दाईं ओर स्थित होते हैं (समूह 14-18)।
उदाहरण: कार्बन (C), नाइट्रोजन (N), ऑक्सीजन (O), सल्फर (S), फॉस्फोरस (P), क्लोरीन (Cl), हाइड्रोजन (H)।
अधातुओं के सामान्य भौतिक गुणधर्म (General Physical Properties of Non-metals)
1. भौतिक अवस्था (Physical State):
- गुण: अधातुएं कमरे के तापमान पर तीनों अवस्थाओं में पाई जाती हैं:
- ठोस (Solid): अधिकांश अधातुएं ठोस होती हैं, जैसे- कार्बन (C), सल्फर (S), फॉस्फोरस (P), आयोडीन (I)।
- गैस (Gas): कई अधातुएं गैसीय अवस्था में होती हैं, जैसे- हाइड्रोजन (H₂), नाइट्रोजन (N₂), ऑक्सीजन (O₂), क्लोरीन (Cl₂), और सभी अक्रिय गैसें।
- द्रव (Liquid):
- मुख्य अपवाद: ब्रोमीन (Bromine – Br) एकमात्र अधातु है जो कमरे के तापमान पर द्रव अवस्था में पाई जाती है। (यह परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है)
2. चमक (Lustre):
- गुण: अधातुओं में सामान्यतः कोई चमक नहीं होती है। वे निष्प्रभ (Dull) दिखती हैं।
- मुख्य अपवाद:
- आयोडीन (Iodine – I): यह एक ठोस अधातु है जिसमें धातुओं जैसी चमकीली सतह होती है।
- हीरा (Diamond) और ग्रेफाइट (Graphite): ये कार्बन के अपरूप हैं और बहुत चमकदार होते हैं।
3. कठोरता (Hardness):
- गुण: अधातुएं आमतौर पर मुलायम (Soft) होती हैं (गैसीय और तरल अधातुओं को छोड़कर)। ठोस अधातुएं भंगुर होती हैं।
- मुख्य अपवाद:
- हीरा (Diamond): यह कार्बन का एक अपरूप है और प्रकृति में पाया जाने वाला सबसे कठोर ज्ञात पदार्थ है। (यह सबसे प्रसिद्ध अपवाद है)
4. आघातवर्धनीयता (Malleability) और तन्यता (Ductility):
- गुण: अधातुएं गैर-आघातवर्धनीय और गैर-तन्य होती हैं। हथौड़े से पीटने पर वे चादरों में बदलने के बजाय टूट (Break) जाती हैं। इस गुण को भंगुरता (Brittleness) कहते हैं। उनसे तार भी नहीं खींचे जा सकते।
5. ऊष्मा और विद्युत की सुचालकता (Thermal and Electrical Conductivity):
- गुण: अधातुएं ऊष्मा और विद्युत दोनों की कुचालक (Bad Conductors / Insulators) होती हैं।
- मुख्य अपवाद:
- ग्रेफाइट (Graphite): यह कार्बन का एक अपरूप है और अधातु होते हुए भी विद्युत का उत्तम सुचालक (Good Conductor) है। (यह भी सबसे प्रसिद्ध अपवादों में से एक है) इसका उपयोग इलेक्ट्रोड और पेंसिल की लीड बनाने में होता है।
- हीरा ऊष्मा का अच्छा सुचालक है, लेकिन विद्युत का कुचालक है।
6. घनत्व (Density):
- गुण: अधातुओं का घनत्व आमतौर पर कम (Low) होता है।
7. गलनांक और क्वथनांक (Melting and Boiling Points):
- गुण: अधातुओं के गलनांक और क्वथनांक आमतौर पर कम (Low) होते हैं (ग्रेफाइट और हीरे को छोड़कर)।
- अपवाद:
- हीरा का गलनांक बहुत उच्च होता है (लगभग 3550°C)।
- ग्रेफाइट का गलनांक भी बहुत उच्च होता है (लगभग 3700°C)।
8. ध्वानिक/अनुनादी (Sonorous):
- गुण: अधातुएं ध्वानिक नहीं होती हैं। कठोर सतह से टकराने पर वे कोई विशेष गूंजने वाली ध्वनि उत्पन्न नहीं करती हैं।
9. रंग (Color):
- गुण: अधातुएं विभिन्न रंगों में पाई जाती हैं। जैसे- सल्फर (पीला), फॉस्फोरस (सफेद/लाल), क्लोरीन (हरी-पीली गैस), ब्रोमीन (लाल-भूरा द्रव)।
सारांश सारणी: अधातुओं के गुण और उनके महत्वपूर्ण अपवाद
(यह सारणी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है)
| गुण | सामान्य प्रवृत्ति (General Trend) | महत्वपूर्ण अपवाद (Important Exception) |
| भौतिक अवस्था | ठोस या गैस | ब्रोमीन (Br) – द्रव अधातु |
| चमक | चमकदार नहीं होतीं | आयोडीन (I), हीरा, ग्रेफाइट – चमकदार होते हैं |
| कठोरता | मुलायम और भंगुर होती हैं | हीरा (Diamond) – सबसे कठोर ज्ञात पदार्थ |
| विद्युत सुचालकता | कुचालक होती हैं | ग्रेफाइट (Graphite) – सुचालक होता है |
| गलनांक / क्वथनांक | कम होते हैं | हीरा और ग्रेफाइट – बहुत उच्च होते हैं |
यह सारणी आपको अधातुओं के गुणों और सबसे महत्वपूर्ण बात, उनके अपवादों को याद रखने में मदद करेगी, जिनसे अक्सर प्रश्न बनते हैं।
अधातुओं के रासायनिक गुणधर्म (Chemical Properties of Non-metals)
अधातुएं विद्युत ऋणात्मक (Electronegative) तत्व होती हैं, क्योंकि वे रासायनिक अभिक्रियाओं में इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन (Anions) बनाती हैं।
1. ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया (Reaction with Oxygen)
- नियम: अधातुएं ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके संबंधित अधात्विक ऑक्साइड (Non-metallic Oxides) बनाती हैं।
- अधातु + ऑक्सीजन → अधातु ऑक्साइड
- अधात्विक ऑक्साइड की प्रकृति: अधातु ऑक्साइड सामान्यतः अम्लीय (Acidic) या उदासीन (Neutral) प्रकृति के होते हैं।
(a) अम्लीय ऑक्साइड (Acidic Oxides):- परिभाषा: ये वे ऑक्साइड हैं जो जल के साथ अभिक्रिया करके अम्ल (Acid) बनाते हैं।
- उदाहरण 1: कार्बन
- C + O₂ → CO₂ (कार्बन डाइऑक्साइड)
- जब CO₂ को जल में घोला जाता है, तो यह कार्बोनिक एसिड (H₂CO₃) बनाता है:
CO₂ + H₂O → H₂CO₃ (यही कारण है कि सोडा वॉटर अम्लीय होता है)
- उदाहरण 2: सल्फर
- S + O₂ → SO₂ (सल्फर डाइऑक्साइड)
- SO₂ जल के साथ मिलकर सल्फ्यूरस एसिड (H₂SO₃) बनाता है। SO₂ + H₂O → H₂SO₃
- अन्य उदाहरण: N₂O₅, P₄O₁₀। अम्लीय वर्षा (Acid Rain) के लिए SO₂ और नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOₓ) मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं।
- (b) उदासीन ऑक्साइड (Neutral Oxides):
- परिभाषा: ये वे ऑक्साइड हैं जो न तो अम्लीय गुण दर्शाते हैं और न ही क्षारीय। ये अम्ल या क्षार किसी के साथ अभिक्रिया नहीं करते हैं और लिटमस पर कोई प्रभाव नहीं डालते।
- सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण (इन्हें याद रखना आवश्यक है):
- कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
- नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O – लाफिंग गैस)
- नाइट्रिक ऑक्साइड (NO)
- जल (H₂O)
(PYQ Reference: परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है कि निम्नलिखित में से कौन सा ऑक्साइड अम्लीय, क्षारीय, उभयधर्मी या उदासीन है।)
2. जल के साथ अभिक्रिया (Reaction with Water)
- नियम: अधिकांश अधातुएं जल या भाप के साथ अभिक्रिया नहीं करती हैं।
- कारण: ऐसा इसलिए है क्योंकि अधातुएं जल को अपचयित करने के लिए इलेक्ट्रॉन नहीं दे सकतीं और न ही हाइड्रोजन गैस को विस्थापित कर सकती हैं (क्योंकि वे स्वयं इलेक्ट्रॉन ग्रहण करती हैं)।
- अपवाद:
- हैलोजन (Halogens) जैसे क्लोरीन जल के साथ अभिक्रिया करता है:
Cl₂ + H₂O → HCl + HOCl (हाइड्रोक्लोरिक एसिड + हाइपोक्लोरस एसिड)
- हैलोजन (Halogens) जैसे क्लोरीन जल के साथ अभिक्रिया करता है:
- एक महत्वपूर्ण तथ्य:
- अत्यधिक अभिक्रियाशील अधातु सफेद फॉस्फोरस (White Phosphorus) को हवा के संपर्क में आने से बचाने के लिए उसे जल में संग्रहित किया जाता है, क्योंकि यह जल के साथ अभिक्रिया नहीं करता है लेकिन हवा में स्वतः जल उठता है।
3. क्लोरीन के साथ अभिक्रिया (Reaction with Chlorine)
- नियम: अधातुएं क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करके संबंधित क्लोराइड (Chlorides) बनाती हैं। ये क्लोराइड आमतौर पर सहसंयोजी (Covalent) होते हैं।
- उदाहरण:
- हाइड्रोजन की अभिक्रिया: हाइड्रोजन गैस क्लोरीन गैस के साथ मिलकर हाइड्रोजन क्लोराइड गैस बनाती है।
H₂ + Cl₂ → 2HCl - फॉस्फोरस की अभिक्रिया: फॉस्फोरस क्लोरीन के साथ मिलकर फॉस्फोरस ट्राइक्लोराइड और फॉस्फोरस पेंटाक्लोराइड बनाता है।
P₄ + 6Cl₂ → 4PCl₃ (फॉस्फोरस ट्राइक्लोराइड)
P₄ + 10Cl₂ → 4PCl₅ (फॉस्फोरस पेंटाक्लोराइड)
- हाइड्रोजन की अभिक्रिया: हाइड्रोजन गैस क्लोरीन गैस के साथ मिलकर हाइड्रोजन क्लोराइड गैस बनाती है।
4. हाइड्रोजन के साथ अभिक्रिया (Reaction with Hydrogen)
- नियम: कई अधातुएं उपयुक्त परिस्थितियों (जैसे उच्च ताप और दाब, या उत्प्रेरक की उपस्थिति) में हाइड्रोजन के साथ अभिक्रिया करके स्थायी सहसंयोजी हाइड्राइड (Stable Covalent Hydrides) बनाती हैं।
- उदाहरण:
- नाइट्रोजन की अभिक्रिया: नाइट्रोजन, हाइड्रोजन के साथ उच्च दाब और ताप पर हैबर प्रक्रम (Haber’s Process) में अमोनिया (NH₃) गैस बनाती है।
N₂ + 3H₂ ⇌ 2NH₃ - ऑक्सीजन की अभिक्रिया: ऑक्सीजन, हाइड्रोजन के साथ मिलकर जल (H₂O) बनाती है।
2H₂ + O₂ → 2H₂O - सल्फर की अभिक्रिया: सल्फर, हाइड्रोजन के साथ मिलकर हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S) गैस (सड़े अंडे जैसी गंध) बनाती है।
H₂ + S → H₂S
- नाइट्रोजन की अभिक्रिया: नाइट्रोजन, हाइड्रोजन के साथ उच्च दाब और ताप पर हैबर प्रक्रम (Haber’s Process) में अमोनिया (NH₃) गैस बनाती है।
सारांश सारणी: प्रमुख अभिक्रियाएं
| अभिकारक | अभिक्रिया का उत्पाद | उत्पाद की प्रकृति | उदाहरण |
| ऑक्सीजन (O₂) के साथ | अधातु ऑक्साइड | अम्लीय या उदासीन | CO₂ (अम्लीय), CO (उदासीन), SO₂ (अम्लीय) |
| जल (H₂O) के साथ | सामान्यतः कोई अभिक्रिया नहीं | – | (फॉस्फोरस को जल में रखते हैं) |
| क्लोरीन (Cl₂) के साथ | सहसंयोजी क्लोराइड | सहसंयोजी | PCl₃, HCl |
| हाइड्रोजन (H₂) के साथ | सहसंयोजी हाइड्राइड | सहसंयोजी | NH₃, H₂O, H₂S |
यह सारणी आपको अधातुओं की विभिन्न तत्वों के साथ होने वाली अभिक्रियाओं के प्रमुख उत्पादों और उनकी प्रकृति को संक्षेप में याद रखने में मदद करेगी।
उपधातु (Metalloids)
परिभाषा
उपधातु (Metalloids) वे तत्व हैं जिनके गुणधर्म धातुओं (Metals) और अधातुओं (Non-metals) के मध्यवर्ती (Intermediate) होते हैं। अर्थात्, वे कुछ गुण धातुओं के समान दर्शाते हैं और कुछ गुण अधातुओं के समान।
- अन्य नाम: इन्हें अर्ध-धातु (Semi-metals) भी कहा जाता है।
- आवर्त सारणी में स्थिति: उपधातु आवर्त सारणी में धातुओं और अधातुओ को अलग करने वाली एक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा (Zig-zag line) पर या उसके आस-पास स्थित होते हैं। वे p-ब्लॉक में पाए जाते हैं।
प्रमुख उपधातु और उनके उदाहरण (Examples of Metalloids)
आवर्त सारणी में मुख्य रूप से 7 तत्वों को उपधातु के रूप में मान्यता प्राप्त है। इन्हें याद रखना प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
याद रखने की ट्रिक (Mnemonic):
“Bhole Siv As Sab Teri Pooja Kare”
(भोले शिव ऐसे सब तेरी पूजा करें)
| प्रतीक (Symbol) | तत्व का नाम (Name) | परमाणु संख्या (Z) | मुख्य विशेषता/उपयोग |
| B | बोरॉन (Boron) | 5 | अत्यंत कठोर (हीरे के बाद दूसरा), पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व, बोरेक्स बनाने में। |
| Si | सिलिकॉन (Silicon) | 14 | सबसे महत्वपूर्ण उपधातु, पृथ्वी की पपड़ी में दूसरा सबसे प्रचुर तत्व, अर्धचालक (Semiconductor) के रूप में चिप्स और सौर सेल बनाने में। |
| Ge | जर्मेनियम (Germanium) | 32 | सिलिकॉन के समान एक महत्वपूर्ण अर्धचालक, फाइबर-ऑप्टिक केबलों में उपयोग। |
| As | आर्सेनिक (Arsenic) | 33 | अत्यंत विषाक्त (Toxic), मिश्र धातुओं को कठोर बनाने और कीटनाशकों में उपयोग। |
| Sb | एंटीमनी (Antimony) | 51 | लेड (सीसा) को कठोर बनाने के लिए मिश्र धातुओं में, ज्वाला मंदक के रूप में। |
| Te | टेल्यूरियम (Tellurium) | 52 | मिश्र धातुओं में, फोटोकॉपियर और प्रिंटर में फोटोरिसेप्टर के रूप में। |
| Po | पोलोनियम (Polonium) | 84 | एक अत्यधिक रेडियोधर्मी उपधातु, जिसे मैरी क्यूरी ने खोजा था। एंटी-स्टैटिक उपकरणों में उपयोग। |
| ( |
उपधातुओं के सामान्य गुणधर्म (General Properties of Metalloids)
(a) भौतिक गुण (Physical Properties):
- दिखावट: ये दिखने में धातुओं जैसे (Metallic lustre) होते हैं, यानी इनमें धात्विक चमक होती है।
- भौतिक अवस्था: ये कमरे के तापमान पर ठोस (Solids) होते हैं।
- कठोरता और भंगुरता: ये धातुओं की तरह आघातवर्धनीय और तन्य नहीं होते हैं, बल्कि अधातुओं की तरह भंगुर (Brittle) होते हैं, यानी पीटने पर टूट जाते हैं।
(b) रासायनिक गुण (Chemical Properties):
- रासायनिक व्यवहार: ये रासायनिक रूप से अधातुओं की तरह व्यवहार करते हैं।
- ऑक्साइड की प्रकृति: इनके ऑक्साइड आमतौर पर उभयधर्मी (Amphoteric) होते हैं, यानी वे अम्ल और क्षार दोनों के साथ अभिक्रिया कर सकते हैं।
- उदाहरण: सिलिकॉन डाइऑक्साइड (SiO₂) एक अम्लीय ऑक्साइड है, जबकि आर्सेनिक और एंटीमनी के ऑक्साइड उभयधर्मी हैं।
(c) विद्युत गुण (Electrical Properties):
- चालकता: यह उपधातुओं का सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट गुण है। ये न तो धातुओं की तरह अच्छे सुचालक (Conductors) होते हैं और न ही अधातुओं की तरह अच्छे कुचालक (Insulators)। वे अर्धचालक (Semiconductors) होते हैं।
- अर्धचालक (Semiconductor):
- परिभाषा: एक अर्धचालक की विद्युत चालकता सुचालक और कुचालक के बीच होती है।
- तापमान पर प्रभाव: इनकी चालकता तापमान बढ़ाने पर बढ़ती है (यह धातुओं के व्यवहार के विपरीत है, जिनकी चालकता तापमान बढ़ाने पर घटती है)।
- अशुद्धि मिलाना (Doping): इनमें कुछ अशुद्धियाँ मिलाकर इनकी चालकता को नियंत्रित और बढ़ाया जा सकता है।
- प्रमुख उपयोग: इसी अर्धचालक गुण के कारण, सिलिकॉन (Si) और जर्मेनियम (Ge) का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में ट्रांजिस्टर, डायोड और इंटीग्रेटेड सर्किट (IC Chips) बनाने में बड़े पैमाने पर किया जाता है, जो हमारे सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का आधार हैं।
सारांश सारणी: धातु, उपधातु और अधातु की तुलना
| गुण | धातु (Metals) | उपधातु (Metalloids) | अधातु (Non-metals) |
| दिखावट | चमकदार (Lustrous) | चमकदार | निष्प्रभ (Dull) (अपवाद: आयोडीन) |
| चालकता | सुचालक (Good Conductor) | अर्धचालक (Semiconductor) | कुचालक (Insulator) (अपवाद: ग्रेफाइट) |
| आघातवर्धनीयता | हाँ (Yes) | नहीं (भंगुर होते हैं) | नहीं (भंगुर होती हैं) |
| तन्यता | हाँ (Yes) | नहीं (No) | नहीं (No) |
| ऑक्साइड की प्रकृति | सामान्यतः क्षारीय | सामान्यतः उभयधर्मी | सामान्यतः अम्लीय |
| उदाहरण | लोहा, तांबा, सोना | सिलिकॉन, आर्सेनिक | ऑक्सीजन, सल्फर, क्लोरीन |
अर्धचालक (Semiconductors) और उपधातुओं का उपयोग
परिभाषा: अर्धचालक क्या हैं?
अर्धचालक (Semiconductor) वे पदार्थ होते हैं जिनकी विद्युत चालकता (Electrical Conductivity) सुचालकों (Conductors) जैसे तांबा, और कुचालकों (Insulators) जैसे रबर, के मध्यवर्ती (Intermediate) होती है।
इनकी सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट विशेषता यह है कि इनकी चालकता को नियंत्रित किया जा सकता है।
उपधातु ही अर्धचालक क्यों हैं?
- अधिकांश अर्धचालक उपधातु या उनके यौगिक होते हैं। सिलिकॉन (Si) और जर्मेनियम (Ge) सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले अर्धचालक हैं।
- कारण: इनके संयोजी कोश (Valence Shell) में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं। ये इलेक्ट्रॉन न तो इतनी मजबूती से बंधे होते हैं कि वे कुचालक हों, और न ही इतने ढीले होते हैं कि वे धातु की तरह सुचालक हों। यह मध्यवर्ती बंध उन्हें अद्वितीय विद्युत गुण प्रदान करता है।
अर्धचालकों के गुण (जो उन्हें उपयोगी बनाते हैं)
- तापमान पर निर्भरता: धातुओं के विपरीत, अर्धचालकों की चालकता तापमान बढ़ाने पर बढ़ती है। परम शून्य तापमान पर, एक शुद्ध अर्धचालक एक पूर्ण कुचालक की तरह व्यवहार करता है।
- प्रकाश संवेदनशीलता: कुछ अर्धचालकों की चालकता उन पर पड़ने वाले प्रकाश की तीव्रता के साथ बदलती है (इसी गुण का उपयोग सोलर सेल और फोटोडायोड में होता है)।
- डोपिंग (Doping) – चालकता का नियंत्रण: यह अर्धचालकों का सबसे क्रांतिकारी गुण है।
डोपिंग (Doping) – अशुद्धि मिलाना
परिभाषा: एक शुद्ध अर्धचालक (Intrinsic Semiconductor) की चालकता बढ़ाने के लिए, उसमें जानबूझकर बहुत कम मात्रा में एक विशिष्ट अशुद्धि (Specific Impurity) मिलाने की प्रक्रिया को डोपिंग (Doping) कहते हैं।
- डोपिंग के बाद बनने वाले अर्धचालक को अशुद्ध या बाह्य अर्धचालक (Extrinsic Semiconductor) कहा जाता है।
डोपिंग के आधार पर, दो प्रकार के बाह्य अर्धचालक बनते हैं:
1. N- प्रकार के अर्धचालक (N-type Semiconductors)
- डोपिंग: जब सिलिकॉन या जर्मेनियम (समूह 14) में पंचसंयोजी (Pentavalent) अशुद्धि (जिसके बाहरी कोश में 5 इलेक्ट्रॉन हों) मिलाई जाती है।
- अशुद्धि के उदाहरण: आर्सेनिक (As), फॉस्फोरस (P), एंटीमनी (Sb)।
- प्रक्रिया: अशुद्धि के 5 इलेक्ट्रॉनों में से, 4 इलेक्ट्रॉन सिलिकॉन के 4 पड़ोसी परमाणुओं के साथ सहसंयोजी बंध बना लेते हैं, लेकिन पांचवां इलेक्ट्रॉन मुक्त (Free Electron) रह जाता है।
- परिणाम: यह मुक्त इलेक्ट्रॉन पदार्थ में गति करने और विद्युत धारा प्रवाहित करने के लिए उपलब्ध रहता है।
- मुख्य आवेश वाहक (Majority Charge Carriers): इलेक्ट्रॉन (जो Negatively charged होते हैं)।
2. P- प्रकार के अर्धचालक (P-type Semiconductors)
- डोपिंग: जब सिलिकॉन या जर्मेनियम (समूह 14) में त्रिसंयोजी (Trivalent) अशुद्धि (जिसके बाहरी कोश में 3 इलेक्ट्रॉन हों) मिलाई जाती है।
- अशुद्धि के उदाहरण: बोरॉन (B), एल्युमिनियम (Al), गैलियम (Ga), इंडियम (In)।
- प्रक्रिया: अशुद्धि के 3 इलेक्ट्रॉन सिलिकॉन के 3 पड़ोसी परमाणुओं के साथ बंध बना लेते हैं, लेकिन चौथे बंध को पूरा करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन की कमी रह जाती है। इस कमी को एक “होल” (Hole) या “विवर” कहा जाता है।
- परिणाम: यह होल एक आभासी धनावेश (Virtual Positive Charge) की तरह व्यवहार करता है और पदार्थ में गति कर सकता है (वास्तव में, पड़ोसी इलेक्ट्रॉन इस होल में कूदता है, जिससे होल आगे बढ़ जाता है)।
- मुख्य आवेश वाहक (Majority Charge Carriers): होल्स (जो Positively charged माने जाते हैं)।
उपधातुओं का अर्धचालक के रूप में उपयोग (Applications)
N-प्रकार और P-प्रकार के अर्धचालकों को एक साथ जोड़कर विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाए जाते हैं, जिन्होंने दुनिया में क्रांति ला दी है।
(a) डायोड (Diode):
- संरचना: एक P-N जंक्शन (एक P-प्रकार और एक N-प्रकार के अर्धचालक को मिलाकर बनाया जाता है)।
- कार्य: यह करंट को केवल एक दिशा में बहने देता है।
- उपयोग: दिष्टकारी (Rectifier) के रूप में, जो AC (प्रत्यावर्ती धारा) को DC (दिष्ट धारा) में परिवर्तित करता है। LED (Light Emitting Diode) भी एक विशेष प्रकार का डायोड है।
(b) ट्रांजिस्टर (Transistor):
- संरचना: यह तीन-टर्मिनल उपकरण है जिसे N-P-N या P-N-P के रूप में बनाया जाता है।
- कार्य: यह एक इलेक्ट्रॉनिक स्विच और प्रवर्धक (Amplifier) के रूप में कार्य करता है।
- महत्व: यह आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का आधार है।
(c) इंटीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuit – IC or Chip):
- परिभाषा: यह एक छोटी सिलिकॉन चिप होती है जिस पर हजारों या लाखों ट्रांजिस्टर, डायोड, प्रतिरोधक और अन्य घटक एकीकृत होते हैं।
- महत्व: इसने कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के आकार को नाटकीय रूप से कम कर दिया और उनकी शक्ति को बढ़ा दिया।
- उदाहरण: माइक्रोप्रोसेसर एक बहुत जटिल IC है, जो कंप्यूटर का CPU होता है।
- “सिलिकॉन वैली” का नाम इसी सिलिकॉन चिप उद्योग के कारण पड़ा है।
(d) सौर सेल (Solar Cells / Photovoltaic Cells):
- कार्य: ये विशेष P-N जंक्शन डायोड होते हैं जो सौर ऊर्जा (प्रकाश ऊर्जा) को सीधे विद्युत ऊर्जा (Electrical Energy) में परिवर्तित करते हैं।
- पदार्थ: मुख्य रूप से सिलिकॉन का उपयोग किया जाता है।
निष्कर्ष
संक्षेप में, उपधातु (विशेष रूप से सिलिकॉन) आधुनिक दुनिया की रीढ़ हैं। उनके अर्धचालक गुण ने डोपिंग की प्रक्रिया के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक्स में क्रांति ला दी है, जिससे ट्रांजिस्टर, आईसी चिप्स और सौर सेल जैसे उपकरणों का निर्माण संभव हुआ है। ये उपकरण आज के कंप्यूटर, स्मार्टफोन, संचार प्रणाली और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी का आधार हैं।
धातुकर्म (Metallurgy)
धातुकर्म (Metallurgy)
परिभाषा
धातुकर्म वह विज्ञान और प्रौद्योगिकी है जो अयस्कों (Ores) से शुद्ध धातु प्राप्त करने तथा उन्हें उपयोग के लिए तैयार करने से संबंधित है। इसमें अयस्क से धातु के निष्कर्षण (Extraction) से लेकर उसके शोधन (Refining) तक की सभी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
चरण 1: मूलभूत शब्दावली (Basic Terminology)
(a) खनिज (Minerals):
- प्रकृति में पृथ्वी की भूपर्पटी (Earth’s Crust) में पाए जाने वाले वे प्राकृतिक पदार्थ, जिनमें धातुएं या उनके यौगिक मौजूद होते हैं, खनिज कहलाते हैं।
- उदाहरण: एल्युमिनियम के खनिज बॉक्साइट और चिकनी मिट्टी दोनों हैं।
(b) अयस्क (Ores):
- परिभाषा: वे खनिज जिनसे धातु का निष्कर्षण आर्थिक रूप से लाभदायक और सुविधाजनक होता है, अयस्क कहलाते हैं।
- उदाहरण: एल्युमिनियम का निष्कर्षण मुख्य रूप से बॉक्साइट अयस्क से किया जाता है, चिकनी मिट्टी से नहीं, क्योंकि बॉक्साइट से यह सस्ता और आसान है।
- महत्वपूर्ण निष्कर्ष: “सभी अयस्क, खनिज होते हैं, लेकिन सभी खनिज, अयस्क नहीं होते हैं।” (यह कथन प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है)
(c) गैंग या आधात्री (Gangue or Matrix):
- अयस्कों में मौजूद मिट्टी, रेत और चट्टानों जैसी अशुद्धियों (Impurities) को गैंग कहा जाता है।
चरण 2: धातुकर्म की प्रक्रियाएं (Processes of Metallurgy)
अयस्क से शुद्ध धातु प्राप्त करने में मुख्य रूप से तीन चरण शामिल होते हैं:
- अयस्क का सांद्रण (Concentration of Ore)
- धातु का निष्कर्षण (Extraction of Metal from Concentrated Ore)
- धातु का शोधन/परिष्करण (Refining of Metal)
(I) अयस्क का सांद्रण (Concentration of Ore)
इस चरण में अयस्क से गैंग (अशुद्धियों) को हटाया जाता है। इसे अयस्क प्रसाधन (Ore Dressing) भी कहते हैं। इसके लिए अयस्क और गैंग के भौतिक गुणों के अंतर का उपयोग किया जाता है।
- प्रमुख विधियाँ:
- गुरुत्वीय पृथक्करण (Hydraulic Washing/Gravity Separation): भारी अयस्क और हल्की अशुद्धियों को अलग करने के लिए।
- चुंबकीय पृथक्करण (Magnetic Separation): जब अयस्क या अशुद्धि में से कोई एक चुंबकीय हो (जैसे – लौह अयस्क)।
- फेन प्लवन विधि (Froth Flotation Process): सल्फाइड अयस्कों (Sulphide Ores) के सांद्रण के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण विधि है। (जैसे – कॉपर पाइराइट, जिंक ब्लेंड)।
(II) धातु का निष्कर्षण (Extraction of Metal)
सांद्रित अयस्क से धातु को प्राप्त करने की प्रक्रिया अभिक्रियाशीलता श्रेणी के आधार पर अलग-अलग होती है। पहले अयस्क को ऑक्साइड में बदला जाता है क्योंकि ऑक्साइड से धातु का अपचयन करना आसान होता है।
ऑक्साइड में बदलने की विधियाँ:
- निस्तापन (Calcination):
- परिभाषा: सांद्रित अयस्क को वायु की अनुपस्थिति (Absence of Air) में उसके गलनांक से कम ताप पर गर्म करना।
- किसके लिए?: यह मुख्य रूप से कार्बोनेट (Carbonate) और हाइड्रॉक्साइड (Hydroxide) अयस्कों के लिए उपयोग की जाती है।
- उदाहरण (जिंक कार्बोनेट):
ZnCO₃(s) –(ताप)–> ZnO(s) + CO₂(g)
- भर्जन (Roasting):
- परिभाषा: सांद्रित अयस्क को वायु की अधिकता (Presence of Excess Air) में उसके गलनांक से कम ताप पर गर्म करना।
- किसके लिए?: यह मुख्य रूप से सल्फाइड (Sulphide) अयस्कों के लिए उपयोग की जाती है।
- उदाहरण (जिंक सल्फाइड):
2ZnS(s) + 3O₂(g) –(ताप)–> 2ZnO(s) + 2SO₂(g)
(निस्तापन और भर्जन के बीच का अंतर परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है)
ऑक्साइड से धातु का अपचयन (Reduction to Metal):
- उच्च अभिक्रियाशील धातुएं (K, Na, Ca, Mg, Al): इनके ऑक्साइड बहुत स्थायी होते हैं। इन्हें विद्युत अपघटन (Electrolysis) द्वारा अपचयित किया जाता है।
- मध्यम अभिक्रियाशील धातुएं (Zn, Fe, Pb, Cu): इनके ऑक्साइडों को कार्बन (कोक), कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे अपचायकों (Reducing Agents) का उपयोग करके गर्म करके अपचयित किया जाता है। इस प्रक्रिया को प्रगलन (Smelting) कहते हैं।
ZnO(s) + C(s) → Zn(s) + CO(g) - कम अभिक्रियाशील धातुएं (Hg, Ag): इनके अयस्कों को केवल गर्म करने से ही धातु प्राप्त हो जाती है।
2HgS + 3O₂ → 2HgO + 2SO₂;
2HgO –(ताप)–> 2Hg + O₂
(III) धातु का शोधन/परिष्करण (Refining of Metal)
निष्कर्षण से प्राप्त धातु पूरी तरह से शुद्ध नहीं होती है। अंतिम चरण में इन अशुद्धियों को हटाकर उच्च शुद्धता वाली धातु प्राप्त की जाती है।
- सबसे महत्वपूर्ण विधि: वैद्युत-अपघटनी परिष्करण (Electrolytic Refining)
- उपयोग: तांबा (Cu), जिंक (Zn), निकल (Ni), चांदी (Ag), सोना (Au) जैसी कई धातुओं के शोधन के लिए।
- प्रक्रिया:
- एनोड (Anode): अशुद्ध धातु की मोटी छड़।
- कैथोड (Cathode): शुद्ध धातु की पतली पट्टी।
- विद्युत अपघट्य (Electrolyte): उसी धातु का लवण विलयन (जैसे – कॉपर के लिए CuSO₄)।
- विद्युत धारा प्रवाहित करने पर, एनोड से अशुद्ध धातु घुलकर विलयन में जाती है, और विलयन से शुद्ध धातु कैथोड पर जमा हो जाती है।
- अशुद्धियाँ एनोड के नीचे जमा हो जाती हैं, जिसे “एनोड पंक” या “एनोड मड” (Anode Mud) कहते हैं।
प्रमुख धातुओं के अयस्क (Ores of Important Metals)
(यह सूची प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है)
| धातु | रासायनिक प्रतीक | प्रमुख अयस्क (Common Name and Formula) |
| एल्युमिनियम | Al | बॉक्साइट (Bauxite) – Al₂O₃·2H₂O |
| लोहा | Fe | हेमेटाइट (Hematite) – Fe₂O₃<br>मैग्नेटाइट (Magnetite) – Fe₃O₄ |
| तांबा | Cu | कॉपर पाइराइट (Copper Pyrite) – CuFeS₂ |
| पारा | Hg | सिनेबार (Cinnabar) – HgS |
| जस्ता/जिंक | Zn | जिंक ब्लेंड (Zinc Blende) – ZnS<br>कैलेमाइन (Calamine) – ZnCO₃ |
| सीसा/लेड | Pb | गैलेना (Galena) – PbS |
| टिन | Sn | कैसिटेराइट (Cassiterite) – SnO₂ |
| सोडियम | Na | रॉक साल्ट (Rock Salt) – NaCl |
खनिज (Minerals)
परिभाषा:
खनिज वे प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले अकार्बनिक ठोस पदार्थ हैं, जिनकी एक निश्चित रासायनिक संरचना और एक निश्चित क्रिस्टलीय संरचना होती है। ये पृथ्वी की भूपर्पटी (Earth’s Crust) में पाए जाते हैं और इनमें धातुएं या उनके यौगिक विभिन्न रूपों में मौजूद होते हैं।
- उदाहरण: चिकनी मिट्टी (Al₂O₃·2SiO₂·2H₂O) और बॉक्साइट (Al₂O₃·2H₂O) दोनों ही एल्युमिनियम के खनिज हैं, क्योंकि दोनों ही प्रकृति में पाए जाते हैं और दोनों में एल्युमिनियम का यौगिक मौजूद है।
- अन्य उदाहरण: क्वार्ट्ज (SiO₂), फेल्डस्पार, अभ्रक (Mica)।
अयस्क (Ores)
परिभाषा:
अयस्क वे खनिज हैं, जिनसे किसी धातु का निष्कर्षण बहुत आसानी से, बड़ी मात्रा में और आर्थिक रूप से लाभदायक (Profitably) होता है।
- उदाहरण: बॉक्साइट को एल्युमिनियम का अयस्क कहा जाता है, क्योंकि इससे एल्युमिनियम का निष्कर्षण बहुत सुविधाजनक और सस्ता होता है। इसके विपरीत, चिकनी मिट्टी में एल्युमिनियम की प्रतिशत मात्रा कम होती है और इससे एल्युमिनियम निकालना बहुत खर्चीला और मुश्किल होता है, इसलिए इसे एल्युमिनियम का अयस्क नहीं कहा जाता है (यद्यपि यह एक खनिज है)।
निष्कर्ष: “सभी अयस्क खनिज होते हैं, लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं होते हैं।”
यह कथन इन दोनों के बीच के संबंध को पूरी तरह से स्पष्ट करता है:
- “सभी अयस्क खनिज होते हैं”: अयस्क बनने के लिए किसी पदार्थ का खनिज होना पहली और अनिवार्य शर्त है। अयस्क खनिजों का ही एक उप-समूह (subset) है।
- “…लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं होते हैं”: कोई खनिज अयस्क केवल तभी कहलाता है जब उससे धातु निकालना लाभदायक हो। ऐसे कई खनिज हैं जिनमें धातु तो होती है, लेकिन:
- धातु की प्रतिशत मात्रा बहुत कम होती है।
- धातु का निष्कर्षण बहुत मुश्किल या महंगा होता है।
- खनिज में हानिकारक अशुद्धियाँ बहुत अधिक होती हैं।
इसलिए, ऐसे खनिजों को केवल “खनिज” कहा जाता है, “अयस्क” नहीं।
खनिज बनाम अयस्क: एक तुलनात्मक सारणी
| विशेषता (Feature) | खनिज (Mineral) | अयस्क (Ore) |
| परिभाषा | प्रकृति में पाया जाने वाला कोई भी पदार्थ जिसमें धातु या उसका यौगिक हो। | वह खनिज जिससे धातु का निष्कर्षण लाभदायक हो। |
| धातु की मात्रा | धातु की प्रतिशत मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है। | धातु की प्रतिशत मात्रा पर्याप्त रूप से अधिक होती है। |
| आर्थिक महत्व | सभी खनिज आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण नहीं होते हैं। | सभी अयस्क आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। |
| निष्कर्षण (Extraction) | सभी खनिजों से धातु का निष्कर्षण संभव या सुविधाजनक नहीं होता। | अयस्कों से धातु का निष्कर्षण संभव और सुविधाजनक होता है। |
| अशुद्धियाँ | इसमें गैंग (अशुद्धियाँ) की मात्रा अधिक हो सकती है। | गैंग की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है या उसे हटाना आसान होता है। |
| प्रकृति/दायरा | व्यापक अवधारणा। इसमें सभी अयस्क शामिल हैं। | विशिष्ट अवधारणा। यह खनिजों का एक लाभदायक उप-समूह है। |
| उदाहरण | एल्युमिनियम के लिए: चिकनी मिट्टी, बॉक्साइट। | एल्युमिनियम के लिए: केवल बॉक्साइट। |
| संबंध | “सभी अयस्क खनिज हैं।” | “लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं हैं।” |
प्रमुख धातुएं और उनके अयस्क (Important Metals and their Ores)
| धातु (Metal) | प्रतीक (Symbol) | अयस्क का सामान्य नाम (Common Name of Ore) | अयस्क का रासायनिक सूत्र (Chemical Formula) | अयस्क का प्रकार |
| एल्युमिनियम | Al | बॉक्साइट (Bauxite) (सबसे महत्वपूर्ण) | Al₂O₃·2H₂O | ऑक्साइड अयस्क |
| कोरंडम (Corundum) | Al₂O₃ | ऑक्साइड अयस्क | ||
| लोहा (Iron) | Fe | हेमेटाइट (Hematite) (सर्वाधिक निष्कर्षण) | Fe₂O₃ | ऑक्साइड अयस्क |
| मैग्नेटाइट (Magnetite) (सर्वोत्तम अयस्क) | Fe₃O₄ | ऑक्साइड अयस्क | ||
| सिडेराइट (Siderite) | FeCO₃ | कार्बोनेट अयस्क | ||
| आयरन पाइराइट (Iron Pyrite) / “मूर्खों का सोना” | FeS₂ | सल्फाइड अयस्क | ||
| तांबा (Copper) | Cu | कॉपर पाइराइट (Copper Pyrite) / चाल्कोपाइराइट | CuFeS₂ | सल्फाइड अयस्क |
| मैलाकाइट (Malachite) | CuCO₃·Cu(OH)₂ | कार्बोनेट अयस्क | ||
| क्यूप्राइट (Cuprite) | Cu₂O | ऑक्साइड अयस्क | ||
| जस्ता/जिंक | Zn | जिंक ब्लेंड (Zinc Blende) / स्फैलेराइट | ZnS | सल्फाइड अयस्क |
| कैलेमाइन (Calamine) | ZnCO₃ | कार्बोनेट अयस्क | ||
| जिंकाइट (Zincite) | ZnO | ऑक्साइड अयस्क | ||
| पारा (Mercury) | Hg | सिनेबार (Cinnabar) (एकमात्र महत्वपूर्ण अयस्क) | HgS | सल्फाइड अयस्क |
| सीसा/लेड | Pb | गैलेना (Galena) (मुख्य अयस्क) | PbS | सल्फाइड अयस्क |
| टिन | Sn | कैसिटेराइट (Cassiterite) / टिनस्टोन | SnO₂ | ऑक्साइड अयस्क |
| मैग्नीशियम | Mg | मैग्नेसाइट (Magnesite) | MgCO₃ | कार्बोनेट अयस्क |
| डोलोमाइट (Dolomite) | MgCO₃·CaCO₃ | कार्बोनेट अयस्क | ||
| कार्नेलाइट (Carnallite) | KCl·MgCl₂·6H₂O | क्लोराइड अयस्क | ||
| सोडियम | Na | रॉक साल्ट (Rock Salt) / साधारण नमक | NaCl | क्लोराइड अयस्क |
| चिली साल्टपीटर (Chile Saltpeter) | NaNO₃ | नाइट्रेट अयस्क | ||
| बोरेक्स (Borax) / सुहागा | Na₂B₄O₇·10H₂O | बोरेट अयस्क | ||
| पोटैशियम | K | साल्टपीटर (Nitre) / शोरा | KNO₃ | नाइट्रेट अयस्क |
| कार्नेलाइट (Carnallite) | KCl·MgCl₂·6H₂O | क्लोराइड अयस्क | ||
| कैल्शियम | Ca | चूना पत्थर (Limestone) / मार्बल / चाक | CaCO₃ | कार्बोनेट अयस्क |
| जिप्सम (Gypsum) | CaSO₄·2H₂O | सल्फेट अयस्क | ||
| चांदी (Silver) | Ag | अर्जेंटाइट (Argentite) / सिल्वर ग्लांस | Ag₂S | सल्फाइड अयस्क |
| हॉर्न सिल्वर (Horn Silver) | AgCl | क्लोराइड अयस्क | ||
| सोना (Gold) | Au | कैल्वेराइट (Calaverite) | AuTe₂ | टेलुराइड अयस्क |
| (अधिकतर मुक्त अवस्था (Free State) में मिलता है) | Au | – | ||
| यूरेनियम | U | पिचब्लेंड (Pitchblende) | U₃O₈ | ऑक्साइड अयस्क |
| थोरियम | Th | मोनाजाइट (Monazite) (थोरियम ऑक्साइड के रूप में) | ThO₂ | ऑक्साइड अयस्क |
याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बिंदु:
- ऑक्साइड अयस्क: बॉक्साइट (Al), हेमेटाइट (Fe), मैग्नेटाइट (Fe), कैसिटेराइट (Sn), पिचब्लेंड (U)।
- सल्फाइड अयस्क: सिनेबार (Hg), गैलेना (Pb), जिंक ब्लेंड (Zn), कॉपर पाइराइट (Cu), अर्जेंटाइट (Ag)। इन्हें सांद्रित करने के लिए फेन प्लवन विधि का उपयोग होता है।
- कार्बोनेट अयस्क: कैलेमाइन (Zn), सिडेराइट (Fe), चूना पत्थर (Ca), मैग्नेसाइट (Mg)।
- “मूर्खों का सोना” (Fool’s Gold): आयरन पाइराइट (FeS₂) को इसकी सोने जैसी चमक के कारण कहा जाता है।
यह सारणी आपको धातुओं और उनके अयस्कों से संबंधित अधिकांश प्रश्नों को हल करने में मदद करेगी।
धातुकर्म के चरण (Steps of Metallurgy)
अयस्क से शुद्ध धातु प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया को मुख्य रूप से तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
चरण 1: अयस्क का सांद्रण (Concentration of Ore)
चरण 2: सांद्रित अयस्क से धातु का निष्कर्षण (Extraction of Metal from Concentrated Ore)
चरण 3: धातु का शोधन या परिष्करण (Refining or Purification of Metal)
चरण 1: अयस्क का सांद्रण (Concentration of Ore)
- उद्देश्य: पृथ्वी से निकाले गए अयस्क में मौजूद व्यर्थ की अशुद्धियों जैसे मिट्टी, रेत, पत्थर (जिन्हें सामूहिक रूप से गैंग (Gangue) या आधात्री (Matrix) कहा जाता है) को हटाना।
- अन्य नाम: इसे अयस्क प्रसाधन (Ore Dressing) या अयस्क का समृद्धिकरण (Enrichment of Ore) भी कहते हैं।
- मुख्य विधियाँ:
- गुरुत्वीय पृथक्करण विधि (Gravity Separation / Hydraulic Washing):
- सिद्धांत: यह अयस्क और गैंग के घनत्व (Density) में अंतर पर आधारित है।
- प्रक्रिया: इसमें अयस्क को बहते हुए पानी से धोया जाता है। भारी अयस्क के कण नीचे बैठ जाते हैं, जबकि हल्की अशुद्धियाँ पानी के साथ बह जाती हैं।
- किसके लिए उपयोगी?: भारी ऑक्साइड अयस्कों (जैसे – हेमेटाइट Fe₂O₃, टिनस्टोन SnO₂) के लिए।
- चुंबकीय पृथक्करण विधि (Magnetic Separation):
- सिद्धांत: यह अयस्क या गैंग में से किसी एक के चुंबकीय (Magnetic) गुणों पर आधारित है।
- प्रक्रिया: अयस्क को एक कन्वेयर बेल्ट पर डाला जाता है जो एक चुंबकीय रोलर के ऊपर से गुजरता है। चुंबकीय पदार्थ रोलर की ओर आकर्षित होकर उसके पास गिरता है, जबकि अचुंबकीय पदार्थ दूर गिरता है।
- किसके लिए उपयोगी?: लौह-चुंबकीय अयस्कों (जैसे – मैग्नेटाइट Fe₃O₄) के लिए या टिन अयस्क (कैसिटेराइट, SnO₂) से चुंबकीय अशुद्धि (वुल्फ्रमाइट FeWO₄) को अलग करने के लिए।
- फेन प्लवन विधि (Froth Flotation Process):
- सिद्धांत: यह अयस्क और गैंग के पानी और तेल के साथ भीगने के गुण में अंतर पर आधारित है। अयस्क के कण तेल में भीगते हैं, जबकि गैंग के कण पानी में।
- प्रक्रिया: अयस्क के बारीक पाउडर को पानी और चीड़ के तेल (Pine oil) के साथ एक टैंक में डालकर तेजी से हवा प्रवाहित की जाती है। अयस्क के हल्के कण तेल के साथ मिलकर झाग (Froth) बनाते हैं और सतह पर आ जाते हैं, जिन्हें अलग कर लिया जाता है। अशुद्धियाँ नीचे बैठ जाती हैं।
- किसके लिए उपयोगी?: यह विधि विशेष रूप से सल्फाइड अयस्कों (Sulphide Ores) के सांद्रण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। (जैसे- कॉपर पाइराइट CuFeS₂, जिंक ब्लेंड ZnS, गैलेना PbS)।
- गुरुत्वीय पृथक्करण विधि (Gravity Separation / Hydraulic Washing):
चरण 2: सांद्रित अयस्क से धातु का निष्कर्षण (Extraction of Metal)
इस चरण में सांद्रित अयस्क से धातु प्राप्त की जाती है। इसे दो उप-चरणों में बांटा गया है:
(a) अयस्क का ऑक्साइड में परिवर्तन।
(b) ऑक्साइड का धातु में अपचयन।
(a) अयस्क को ऑक्साइड में बदलना (क्योंकि ऑक्साइड का अपचयन करना आसान होता है)
- निस्तापन (Calcination):
- परिभाषा: सांद्रित अयस्क को वायु की सीमित या अनुपस्थिति (Limited or Absence of Air) में उसके गलनांक से नीचे के तापमान पर जोर से गर्म करना।
- किसके लिए उपयोगी?: कार्बोनेट अयस्कों (CaCO₃) और हाइड्रॉक्साइड अयस्कों (Al₂O₃·2H₂O) के लिए। इस प्रक्रिया में नमी और वाष्पशील अशुद्धियाँ भी निकल जाती हैं।
- उदाहरण: ZnCO₃ (कैलेमाइन) –(ताप)–> ZnO + CO₂↑
- भर्जन (Roasting):
- परिभाषा: सांद्रित अयस्क को वायु की अधिकता (Excess of Air) में उसके गलनांक से नीचे के तापमान पर गर्म करना।
- किसके लिए उपयोगी?: मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों (ZnS) के लिए।
- उदाहरण: 2ZnS (जिंक ब्लेंड) + 3O₂ –(ताप)–> 2ZnO + 2SO₂↑
(b) धातु ऑक्साइड का धातु में अपचयन (Reduction of Metal Oxide to Metal)
धातु की अभिक्रियाशीलता के आधार पर उपयुक्त विधि का चयन किया जाता है।
- प्रगलन (Smelting):
- परिभाषा: यह एक अपचयन प्रक्रिया है जिसमें धातु ऑक्साइड को कोक (कार्बन) जैसे अपचायक (Reducing Agent) और एक गालक (Flux) के साथ मिलाकर उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। गालक (फ्लक्स) अयस्क में मौजूद अगलनीय अशुद्धियों के साथ मिलकर एक गलनीय पदार्थ धातुमल (Slag) बनाता है, जिसे आसानी से हटाया जा सकता है।
- किसके लिए उपयोगी?: मध्यम अभिक्रियाशील धातुओं जैसे लोहा, जिंक, टिन, लेड के लिए।
- उदाहरण (आयरन का निष्कर्षण):
Fe₂O₃ (हेमेटाइट) + 3C (कोक) → 2Fe (आयरन) + 3CO↑
- अन्य विधियाँ:
- विद्युत-अपघटनी अपचयन (Electrolytic Reduction): उच्च अभिक्रियाशील धातुओं (Na, K, Ca, Al) के लिए।
- स्वतः अपचयन (Auto Reduction): कम अभिक्रियाशील धातुओं (Cu, Hg) के लिए।
- एल्युमिनोथर्मिक विधि (Thermite Process): इसमें अपचायक के रूप में एल्युमिनियम पाउडर का उपयोग होता है (जैसे- Cr₂O₃ + 2Al → 2Cr + Al₂O₃ ) । रेलवे ट्रैक की वेल्डिंग में थर्माइट अभिक्रिया का उपयोग होता है (Fe₂O₃ + 2Al)।
चरण 3: धातु का शोधन या परिष्करण (Refining of Metal)
निष्कर्षण से प्राप्त धातु (अशुद्ध धातु या कच्ची धातु) में अभी भी कुछ अशुद्धियाँ होती हैं। इन अशुद्धियों को हटाकर उच्च-शुद्धता वाली धातु प्राप्त करने की प्रक्रिया को शोधन कहते हैं।
- सबसे महत्वपूर्ण विधि: वैद्युत-अपघटनी परिष्करण (Electrolytic Refining)
- सिद्धांत: विद्युत अपघटन के सिद्धांत पर आधारित।
- प्रक्रिया:
- एनोड (Anode): अशुद्ध धातु की मोटी प्लेट (+)।
- कैथोड (Cathode): शुद्ध धातु की पतली प्लेट (-)।
- विद्युत अपघट्य (Electrolyte): उसी धातु के लवण का विलयन (जैसे CuSO₄)।
- जब विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो एनोड से अशुद्ध धातु घुलती है, और विलयन से उतनी ही मात्रा में शुद्ध धातु कैथोड पर जमा हो जाती है।
- अशुद्धियाँ एनोड के नीचे ‘एनोड पंक’ (Anode Mud) के रूप में एकत्र हो जाती हैं।
- किसके लिए उपयोगी?: तांबा (Cu), जस्ता (Zn), टिन (Sn), सीसा (Pb), सोना (Au), चांदी (Ag) के शोधन के लिए।