छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियाँ: एक विस्तृत अवलोकन 🌏
केंद्र सरकार मान्यता प्राप्तविशेष पिछड़ी जनजातियाँ
📌 भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत, छत्तीसगढ़ की पाँच जनजातियों को राष्ट्रपति द्वारा विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा दिया गया है। ये जनजातियाँ हैं:
अबूझमाड़िया
बैगा
कोरवा (पहाड़ी कोरवा)
बिरहोर
कमार [CG PSC (ARO)2022]
1. अबूझमाड़िया (Abujhmadiya) जनजाति 🌳
अबूझमाड़ का परिचय
अर्थ 🧠: ‘अबूझमाड़’ का शाब्दिक अर्थ ‘अज्ञात’ होता है। [CG PSC (Lib & Hameo)2017]
स्व-पहचान: अबूझमाड़िया समुदाय अबूझमाड़ क्षेत्र को ‘मेटाभूम’ (पर्वतीय भूमि) और स्वयं को ‘मेटा कोईतोर’ (पर्वतीय भूमि के निवासी) कहकर पुकारते हैं।
जीवन शैली 🏡: यह जनजाति आज भी अपनी आदिम जीवन शैली को बनाए हुए है और अन्य जनजातियों से पृथक रहती है।
प्रवेश द्वार: ओरछा, जो ब्लॉक मुख्यालय है, उसे अबूझमाड़ का प्रवेश द्वार माना जाता है।
निवास स्थान 🗺️: पं. केदारनाथ ठाकुर ने अपनी पुस्तक ‘बस्तर भूषण’ (1908) में माड़िया जनजाति का विस्तार से उल्लेख किया है। उनके अनुसार, माड़िया लोगों का मूल निवास बैलाडीला पहाड़ के आसपास है, और वे आज भी वहीं बसे हुए हैं। माड़िया जनजाति तीन प्रकार की होती है: वर्तमान अबूझमाड़िया, कुवाकोंडा हल्के के माड़िये, और तेलंगे माड़िये (जिन्हें कोया भी कहा जाता है), ये सभी गोंड समुदाय का हिस्सा हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 📜
सर्वप्रथम प्रयोग: ‘अबूझमाड़’ शब्द का पहला प्रयोग कैप्टन सी.एल.आर. ग्लासफर्ड (1866-67) द्वारा अपनी रिपोर्ट में ‘उबूझमार्ड’ के रूप में किया गया था।
गजेटियर में उल्लेख: ग्रांट (1870) ने अपने गजेटियर में इस इलाके के लिए ‘माड़ियान’ या ‘अबूझमाड’ शब्द का उपयोग किया।
अन्य उल्लेख: हिस्लॉप (1876) ने ‘हिंदू ट्राइब्स एण्ड कॉस्ट्स भाग-2’ में ‘अबूझमाड़/माड़ियान’ शब्द का प्रयोग किया था।
हिल माड़िया नामकरण: डब्ल्यू. वी. ग्रिगसन (1938) ने इस जनजाति को ‘हिल माड़िया’ नाम दिया।
सामान्य जानकारी
निवास क्षेत्र 🌍: यह जनजाति मुख्यतः ओरछा (अबूझमाड़) तहसील, नारायणपुर, दंतेवाड़ा और बीजापुर में निवास करती है। [CG PSC (Reg.) 2017]
जनसंख्या 📊: सर डब्ल्यू. वी. ग्रिगसन के समय 1931 में पहली जनगणना हुई, जिसमें अबूझमाड़ियों की कुल आबादी 11,500 थी। 1941 में वेरियर एल्विन ने यह संख्या लगभग 13,000 बताई। वर्तमान में इनकी जनसंख्या 23,330 है।
बोली 🗣️: इनकी बोली ‘माड़ी’ है, जो द्रविड़ भाषा शैली का एक स्थानीय रूप है और गोंडी बोली से मिलती-जुलती है।
प्रमुख संस्कार और परंपराएं
नृत्य 💃:
ककसाड़ / काकसाड़
कोटकी घोड़ा नृत्य [CG PSC (CMO)2019]
विवाह के प्रकार 💒:
बिधेर/बिथेर: घर से भागकर विवाह।
ओड़ियत्ता: घुसपैठ या घर में घुसकर विवाह।
चूड़ी पहनना: विधवा या परित्यक्ता का पुनर्विवाह।
तालको वायता: सहमति से विवाह।
लामड़े वायता: लमसेना विवाह।
खेती की विधि 🌱:
पेद्दा कृषि: यह ढलानों पर की जाने वाली कृषि है। इस कृषि भूमि को ‘कघई’ भी कहा जाता है।
दिप्पा कृषि: यह पहाड़ों के नीचे समतल भूमि पर की जाती है। [CG PSC (Sci. Off.)2018, (ADPPO) 2017]
पर्व, नृत्य और देवी-देवता 🙏
कौमार्य संस्कार: इसे ‘कांडाबरा’ (पुष्प विवाह) या कांड विवाह के नाम से भी जाना जाता है। [CG Vyapam (ECH)2017]
गोत्र (टोटम) 🛡️: कट्टा गोत्र में कई वंश शामिल होते हैं। अबूझमाड़िया जनजाति में गोत्र और गोत्र चिन्ह (टोटम) पाए जाते हैं, जैसे – करमा, दोरपा, जाटा, वड्डे, कोर्राम, दोदी, अक्का, मंडावी, उसेंडी, अटमी आदि।
त्यौहार 🎉:
काकसाड़: गोत्र देव की पूजा का पर्व। [CGPSC (ADPO)2021, (ITI Pri.)2016] [CG Vyapam (MBD)2024]
विजा कोड़तांग (हरियाली), जोन्ना कोड़तांग (मक्का खाने का त्यौहार), वन्जा कोड़तांग (नवाखानी), पूना कोहला (नया कोसरा खाने का पर्व)।
देवी-देवता: ठाकुरदेव (टालुभेंट), बुढ़ी माई/बुढ़ी डोकरी, और घर के देवता (छोटा पेन, मेंझला पेन, बड़ा पेन)।
मृतक स्तंभ ⚰️: मृत्यु के बाद लकड़ी का खंभा (अनाल गठ्या) गाड़ा जाता है।
तुम्बा का महत्व: इनके जीवन में तुम्बा (लौकी का सूखा खोल) का विशेष महत्व होता है।
ग्राम देवता: ग्राम स्तर पर ‘तलुर मुत्ते’ या ‘तलोक देवी’ की पूजा की जाती है। [CGPSC(ADA)2023]
तंत्र-मंत्र ज्ञाता: तंत्र-मंत्र के जानकार को ‘गायता’ या ‘सिरहा’ कहा जाता है।
युवागृह 🛖: इनके युवागृह को ‘कोसी गोटुल’ या ‘गोटुल’ के नाम से जाना जाता है।
प्रकार और उपजाति
विभाजन: विलफ्रिड ग्रिगसन ने अपनी पुस्तक में निवास के आधार पर इन्हें दो भागों में बांटा है:
हिल माड़िया: अबूझमाड़ के पर्वतों में निवास करने वाले।
बॉयसन हार्न माड़िया: इंद्रावती नदी के दक्षिणी भाग में रहने वाले।
उपजाति: अबूझमाड़िया जनजाति गोंड जनजाति की ही एक उपजाति है। [CG Vyapam (Patwari) 2016]
विशेष तथ्य 💡
पुस्तकें 📖:
द अबूझमारियास (टी.बी. नायक)
The Maria Gonds of Bastar (1938) – विलफ्रिड ग्रिगसन
शब्दावली ( शब्दावली) 🗣️:
लोन: आवास
अगली: बरामदा
गुड़नद: शयन कक्ष
अंगादी/आंगड़ी: रसोईघर
हानाल कोली बाडड तास्ना कोली: पूर्वजों का कक्ष या भंडार
मंडा: अनाज भंडार गृह
उबिंग: सिक्कों की माला
अगहा: बैठक
पोवई: चटाई
अल्पांजी: सोने के लिए सामान
लोनू: संग्रहण कक्ष / कुल देवता का निवास स्थान
वैन्डू कुरमा: आवास से कुछ दूरी पर बना कमरा, जहाँ रजस्वला और प्रसूता स्त्री को रखा जाता है। [CGPSC(ADR.)2019]
विकास अभिकरण 🏛️: विशेष पिछड़ी जनजाति अबूझमाड़िया विकास अभिकरण, नारायणपुर। इसकी स्थापना पांचवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 13 जून, 1978 को की गई थी। [CGPSC(ADH)2022]
गोदना 🎨: स्त्रियाँ गोदना को स्थायी आभूषण मानती हैं और सामान्यतः मस्तक, नाक, हथेली, ठुड्ढी आदि पर गोदवाती हैं।
प्रसव गृह: कुरमा लोन।
पोशाक 👕:
पुरुष: लंगोटी, लुंगी, पंछा, पगड़ी पहनते हैं।
महिला: लुगरा को कमर से घुटने तक लपेट कर पहनती हैं।
सामाजिक संगठन 🤝: पारा/टोला (मुखिया: पंच) → ग्राम (मुखिया: पटेल) → परगना (मुखिया: परगना मांझी)।
साक्षरता ✍️: यह राज्य की सबसे कम साक्षरता वाली जनजातियों में से एक है। (हालांकि, आयोग ने सबसे कम साक्षरता (19%) बिरहोर जनजाति को माना है) [CG PSC(ARO)2022]
उत्पत्ति की कथा 📜: किंवदंती के अनुसार, ब्रह्मा जी ने दो व्यक्ति बनाए – एक को ‘नांगर’ (हल) और दूसरे को ‘टंगिया’ (कुल्हाड़ी) दी। जिन्हें नांगर मिला वे गोंड कहलाए और जिन्हें टंगिया मिली वे नागा बैगा कहलाए। बैगा जनजाति नागा बैगा को ही अपना पूर्वज मानती है।
भाषा परिवार: आर्यभाषा परिवार
पेय पदार्थ 🍺: ताड़ी (ताड़ के वृक्ष से प्राप्त)
रसोईघर: रांधड़ घर
जनसंख्या: इनकी वर्तमान जनसंख्या 88,317 है, जो विशेष पिछड़ी जनजातियों में सबसे ज्यादा है। [CG PSC(Pre)2019]
निवास 🗺️: ये मुख्यतः मैकल पर्वत श्रेणी (राजनांदगांव, कवर्धा, मुंगेली, बिलासपुर आदि) में निवास करते हैं। सर्वाधिक जनसंख्या कबीरधाम जिले में है।
विकास अभिकरण व प्रकोष्ठ: इनके लिए कवर्धा और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में विकास अभिकरण तथा राजनांदगांव, मुंगेली और बैकुंठपुर में विकास प्रकोष्ठ स्थापित हैं।
प्रमुख संस्कार और परंपराएं
जन्म संस्कार: शिशु जन्म के समय प्रसव कराने वाली महिला को ‘गौंजी’ या ‘सुनमाई (दाई)’ कहा जाता है।
विवाह के प्रकार: ढुकू, उढ़रिया, गोलत (विनिमय प्रथा), चूड़ी पहनना। विवाह संपन्न कराने वाले को ‘दोषी’ कहा जाता है।
पुनर्विवाह: इसे ‘खड़ोनी’ कहते हैं। [CG Vyapam (VFM)2021]
मृत्यु संस्कार: मृत्यु के बाद शुद्धि के संस्कार को ‘मादी’ कहा जाता है।
कार्य 💼: बैगा जनजाति गोंडों के पुरोहित (पुजारी) के रूप में कार्य करती है और पारंपरिक वैद्य के रूप में भी जानी जाती है। [CGPSC(ARO)2022]
वस्त्र: महिलाओं का वस्त्र ‘कपची’ और परंपरागत वस्त्र ‘चौखाना-मुंगी’ कहलाता है।
भोजन 🍚: इनका पहला भोजन ‘बासी’, दोपहर का ‘पेजा/पेज’ और रात का ‘बियारी’ होता है।
कृषि: इनकी स्थानांतरित कृषि ‘बेवार/बेवरा/बेवर’ कहलाती है। [CG PSC(ADPPO)2017(SEE)2020]
वृक्ष पूजा 🌳: साल (सोरिया रोबस्टा) वृक्ष की पूजा करते हैं। [CG Vyapam (ASO)2018]
पुजारी: ‘भुमका’ (भूत-प्रेत भगाने वाला), और देवी-देवता का पूजा करने वाला।
पर्व 🎉: रसनवा पर्व (यह 9 वर्षों में एक बार मनाया जाता है)।
गोदना (Tattooing) परंपरा 🎨
जनजाति: बैगा विश्व की सर्वाधिक गोदना प्रिय जनजाति है, जबकि कमार जनजाति सर्वाधिक गोदना गोदवाने वाली जनजाति है। [CGPSC (Pre)2024][CGVyapam (CBAS)2023]
गोदना का नाम: बैगाओं के गोदना को ‘झेला गोदना’ कहते हैं। ये स्थानीय ‘बादी’ जाति की महिलाओं से गोदना गोदवाती हैं। [CG PSC (MI) 2018],[CG Vyapam (ESC)2017]
गोदना का प्रकार
विवरण
आयु
1. कपाल गोदना
महिलाएँ माथे पर (भौंहों के बीच) ‘v’ आकृति का गोदना गोदवाती हैं।
8 वर्ष की आयु में अनिवार्य [CG PSC (SEE)2020]
2. पृष्ठ गोदना
इसे ‘पुखड़ा गोदाय’ भी कहते हैं।
15-16 वर्ष की आयु में
3. वक्ष गोदना
यह सामान्यतः फूल, टिक्का, या पुतरी की आकृति का होता है।
4. बांह गोदना
इसमें मछली, कांटा, बिच्छू आदि की आकृति होती है, जिसे ‘पोरी गोदाय’ कहते हैं।
5. जांघ गोदना
लड़कियों के लिए विवाह से पूर्व अनिवार्य माना जाता है।
6. पछाड़ी गोदाय
यह जांघ के पिछले भाग में गोदाये जाते हैं।
पुस्तकें 📚:
द बैगॉस (वेरियर एल्विन)
द ट्राइबल इकोनॉमी (दयाशंकर नाग)
3. कोरवा (Korva) जनजाति 🏹
सामान्य जानकारी
निवास स्थान: मुख्यतः कोरबा, जशपुर, अम्बिकापुर, और बलरामपुर में।
उत्पत्ति: कर्नल डॉल्टन के अनुसार, इस जनजाति की उत्पत्ति कोलारियन समूह से हुई है।
उप-समूह:
पहाड़ी कोरवा: ये पेड़ों के ऊपर मचान बनाकर रहते हैं और घुमंतू जीवन जीते हैं। यह समूह विशेष पिछड़ी जनजाति में शामिल है। [CG Vyapam (ESC)2017]
दिहाड़ी कोरवा: ये मैदानी क्षेत्रों में स्थाई रूप से गांवों (डिह) में रहते हैं, जिस कारण इन्हें डिहारी कोरवा भी कहा जाता है।
नृत्य: ‘दमनच’ (यह एक भय उत्पादक नृत्य है, जो विवाह के समय किया जाता है)।
विकास अभिकरण: विशेष पिछड़ी जनजाति कमार विकास अभिकरण, गरियाबंद। इसके अलावा नगरी, भानुप्रतापपुर, और महासमुंद में विकास प्रकोष्ठ हैं।
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मान्यता प्राप्त विशेष पिछड़ी जनजातियाँ 📜
📌 छत्तीसगढ़ में कुल 7 विशेष पिछड़ी जनजातियाँ हैं। इनमें से, राज्य सरकार ने वर्ष 2002-03 में पण्डो और भुजिया, दो जनजातियों को, विशेष पिछड़ी जनजाति समूह के रूप में मान्यता प्रदान की।
1. भुंजिया (Bhunjiya) जनजाति 🔥
सामान्य जानकारी
नामकरण 🔥: एक किंवदंती के अनुसार, इनका नाम ‘भुंजिया’ आग में जलने की घटना से पड़ा है। [CG PSC (Pre)2012]
निवास 🗺️: ये गरियाबंद, महासमुंद, और धमतरी जिलों में निवास करते हैं।
उपजाति: चौखुटिया भुजिया और चिंदाभुजिया। [CGVyapam(PHEH) 2023]
रसोईघर 🏠: इनके रसोईघर को ‘लाल बंगला’ कहा जाता है, जो एक पवित्र स्थान माना जाता है। इसका संबंध रामायण काल के सीताहरण की कथा से जोड़ा जाता है। [CG PSC(Pre)2019,(ADA)2020, (EAP)2016(Pre)2021]
वस्त्र 👘: विवाहित महिलाएँ पारंपरिक रूप से सफेद साड़ी पहनती हैं। [CG PSC(ADA)2020]
प्रमुख संस्कार और रस्में
चामबंदी: जन्म के सातवें दिन शिशु का मुंडन होता है और उसी दिन उसकी कमर में एक काला धागा बांधा जाता है, जिसे ‘चामबंदी’ कहते हैं। यह धागा मृत्यु के बाद ही निकाला जाता है।
कांड विवाह: इस विवाह का शाब्दिक अर्थ बाण (कांड) से विवाह है। भुंजिया लड़कियों का पहला मासिक स्राव आने से पहले कांड विवाह करना अनिवार्य होता है। यदि कोई लड़की इस विवाह से पहले रजस्वला हो जाती है, तो उसका सामान्य हल्दी विवाह नहीं होता, बल्कि चूड़ी विवाह किया जाता है। [CG PSC(ARO)2022]
अन्य विवाह प्रकार: दूध लौटावा, चूड़ी विवाह, विधवा विवाह, पैठू विवाह, पलायन विवाह, और लमसेना विवाह।
त्यौहार 🎉:
नावाखायी: नई फसल आने पर भाद्र माह में प्रथमा या तृतीया को मनाते हैं।
डूमा पितर: अगहन माह में चंउर धोनी या रोटी खानी का त्यौहार मनाते हैं, जिसमें पूर्वजों को अन्न अर्पित किया जाता है। बस्तर क्षेत्र में पितृ देव को डूमा देव कहते हैं।
देवारी त्यौहार: इस दौरान पशुओं की पूजा-अर्चना की जाती है।
देवी-देवता 🙏: ठाकुरदेव, शीतला माता, माटीदाई आदि। इस जनजाति में कछुआ विशेष रूप से पूजनीय है।
विकास अभिकरण: भुजिया विकास अभिकरण, गरियाबंद।
विशेष तथ्य
यह जनजाति राज्य सरकार द्वारा घोषित एक विशेष पिछड़ी जनजाति है। [CG PSC(Pre)2021]
भुंजिया जनजाति के लोग बीमारी का इलाज करने के लिए तपते लोहे से दागने की प्रथा का पालन करते हैं।
2. पण्डो (Pando) जनजाति 🏹
निवास: सरगुजा, सूरजपुर, (अम्बिकापुर), कोरिया और बलरामपुर क्षेत्र में।
पूर्वज: ये स्वयं को पांडवों का वंशज मानते हैं। इनके उपसमूह सरगुजिहा और उतरांश हैं।
विवाह पद्धति: ‘बरोखी’, जिसमें धनराशि के अभाव में वर, वधू को अंगूठी पहनाकर अपने घर ले आता है। [CG PSC(ARO)2022]
बोली: पण्डो।
देवी-देवता: वागेश्वर देव, बरहिया देव, महामई, अन्न कुमारी आदि।
विकास अभिकरण: पण्डो विकास अभिकरण, सूरजपुर (2002-03)।
छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियाँ 🌟
परिचय: मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद, भारतीय जनगणना द्वारा जारी जनजातियों की सूची छत्तीसगढ़ के लिए भी मान्य रही। छत्तीसगढ़ में 43 प्रकार की जनजातियाँ पाई जाती हैं, जिन्हें 161 उपसमूहों में बांटा गया है।
1. गोंड (Gond) जनजाति 🏞️
सामान्य परिचय
उत्पत्ति: ‘कोंड़’ (तेलुगू शब्द) से, जिसका अर्थ पर्वत होता है। माना जाता है कि कोंड़ के निवासी ही बाद में गोंड कहलाए। [CG Vyapam (DCAG)2018] गोंड स्वयं को ‘कोयतोर’ कहते हैं, जिसका अर्थ पर्वतवासी होता है।
निवास: दक्षिण छत्तीसगढ़ (बस्तर संभाग), बिलासपुर, कोरबा, कवर्धा आदि क्षेत्रों में।
उपजाति और शाखा: छत्तीसगढ़ में इनकी सर्वाधिक 41 उपजातियाँ और 30 शाखाएं पाई जाती हैं। [CG PSC (ARO)2022]
समूह और कार्य: यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जनजाति समूह है। ये जनजातियों के पारंपरिक वैद्य के रूप में भी कार्य करते हैं। [CG PSC (SEE)2017], [CG Vyapam(RFOI)2018], [CG PSC (ARO)2022]
जनसंख्या:
यह राज्य की कुल जनजाति का 56% और राज्य की कुल जनसंख्या का 17.57% है।
यह छत्तीसगढ़ की सबसे प्रमुख और सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है। [CG PSC (Reg.)2021, (ARO) 2022], [CG PSC (ADH)2011]
मृतक संस्कार: मृत्यु के तीसरे दिन “कोज्जी” और दसवें दिन “कुण्डा” मिलन संस्कार करते हैं।
कला: घर की दीवारों पर ‘नोहडोरा’ नामक अलंकरण करते हैं।
पर्व, नृत्य और देवी-देवता
त्यौहार: नवाखाई त्यौहार को इस जनजाति में ‘पण्डुम’ कहा जाता है। [CG Vyapam (VDAG)2021]
नृत्य: करमा, सैला, पंडकी नृत्य (महिलाओं द्वारा)।
पंचायत प्रमुख: राजा / भोई। [CG PSC (ARO)2022]
गोटुल: गोंड जनजाति में ‘लिंगोपेन’ को गोटुल का संस्थापक और नियामक माना जाता है। [CG PSC (ARO)2022]
देवगुड़ी: ग्राम के किनारे या मध्य में देवगुड़ी और मालागुड़ी स्थित होती है।
2. कंवर (Kanwar) जनजाति 👑
उत्पत्ति: किंवदंतियों के अनुसार, ये अपनी उत्पत्ति कौरव वंशीय राजा धृतराष्ट्र से मानते हैं, इसलिए इन्हें कुरूवंशीय या चन्द्रवंशी भी कहा जाता है। [CG PSC (ADJE)2020]
समुदाय: गहिरागुरू कंवर समुदाय से संबंधित थे।
निवास: सरगुजा, बलरामपुर, बिलासपुर, कोरिया, रायपुर, महासमुंद आदि क्षेत्रों में। इनका सर्वाधिक बसाहट बिलासपुर जिले में है।
प्रमुख बोली: कुरूख/कुडुख। ‘कुरूख’ में ‘कुजुर’ का अर्थ औषधीय पौधा होता है। [CG PSC(Lib & SO)2019], [CG PSC (Pre) 2017], [CG PSC (SEE) 2017], [CG Vyapam (SI) 2022]
गांव के प्रमुख: मांझी।
प्रमुख पर्व: खद्दी, सरहुल, फाग, तुसर्गो पर्व, टुण्टा पर्व एवं सोहरई पर्व (पशुधन की सुरक्षा और वृद्धि की कामना)। [CGPSC(Pre)2024]
पारंपरिक पोशाक: करेया।
त्यौहार: करमा त्यौहार और सरहुल त्यौहार (साल वृक्ष के नीचे) मनाते हैं। [CG PSC (Sci. Off.) 2018], [CG Vyapam (SAAF)2021]
शिकार अनुष्ठान: फाग सेंदरा, जेठ शिकार। [CGPSC(Pre)2024]
उपनाम: बायसन हार्न माड़िया (पुरुष सदस्य गौरसींग वाला मुकुट पहनते हैं)।
उपजाति: यह गोंड की उपजाति है।
उत्पत्ति: भीमुलदेव (भीमादेव) के आशीर्वाद से।
बोली: गोंड़ी (यह इनकी विशेष बोली है), कोयतुर (एक प्रकार की गोंड़ी बोली)।
भाषा परिवार: द्रविड़।
कृषि: पेद्दा खेती (अस्थायी कृषि पद्धति)।
पेय पदार्थ: सल्फी, लांदा (चावल की शराब)।
पुस्तक: द गौर (वेरियर एल्विन)।
मकान: वैडु कुरमा। [CG PSC (ADR)2019]
निवास: कोण्डागांव, बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर, बीजापुर। यह छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी निवास करते हैं।
शब्दावली:
सिहारी: जंगल में बनी पृथक झोपड़ी।
रांधालोना: रसोईघर
लोना: आवास
माने कोट्टाम: बैठक कक्ष
ओसेर: बरामदा
विस्क बट: श्मशान
मृत्यु एवं त्यौहार
मृत्यु संस्कार: ‘कूटेह’ – तीसरे दिन या कुछ दिनों बाद होता है, जिसमें मृतात्मा को घर के पूजा कक्ष में पीतर देवों के लिए स्थापित ‘अनाल कुंडा’ में लाते हैं।
स्मृति स्तंभ: मृतक की याद में स्मृति स्तंभ स्थापित करने की परंपरा है, जिसे ‘हनालगट्टा’ या ‘गायता पखना’ भी कहते हैं। [CG PSC(CMO)2019,(AP)2016,(SEE)2017]
प्रमुख त्यौहार: अमुस (हरियाली), कोड़ता (नवाखानी), नुका नोरदा नाद (नया चावल धोने का पर्व), दियारी, ककसाड़ जात्रा (गोत्र देव की पूजा पर्व)।
नृत्य: बायसनहार्न नृत्य या गौर नृत्य (भैंस के सींग के समान टोपी पहनकर)। यह जात्रा पर्व के दौरान किया जाता है और इसे वेरियर एल्विन ने विश्व का सबसे सुंदरतम नृत्य कहा है। [CG PSC (SEE)2017]
उप-शाखाएँ: इनके चार उप-समूह हैं: 1. गुमिनोर, 2. पार्मिलोर, 3. तोगुतोर, 4. मन्नोतोर। [CG Vyapam (VFM)2021]
उपजाति: यह गोंड़ (कोयतोर या कोइतुर) की ही एक उपजाति है।
विवाह:
विनिमय विवाह: कुण्ड मारपुर
परिवीक्षा विवाह: इलेटाम
मंगनी विवाह: इसे ‘तरपील’ कहा जाता है।
सगाई: सगाई को ‘कलतोसनाद’ भी कहा जाता है।
पुनर्विवाह और पलायन विवाह: इनमें ‘मोगनाल मिरतोर’ (पलायन विवाह) और ‘मुंडराल पिल’ (पुनर्विवाह) की प्रथा प्रचलित है।
सामूहिक शिकार: गर्मियों में ‘विज्जा पंडुम’ त्यौहार के अवसर पर ये सामूहिक शिकार (‘वेन्टा’) करते हैं।
उल्लेखनीय तथ्य: इनके एक मृत्यु गीत में कलिंग राजा ‘कलेगीराजू’ का उल्लेख मिलता है।
त्यौहार: बारिश न होने पर महिलाएं ‘कप्पल पंडुम’ नामक त्यौहार मनाती हैं, जिसमें मेढ़कों का विवाह करवाया जाता है। अन्य त्यौहारों में जिरा पण्डुम, कोल पण्डुम और चिकुर पण्डुम शामिल हैं। [CG PSC(Pre)2023,(ARO)2022]
6. गदबा (गडाबा) जनजाति 🛶
निवास: यह जनजाति बस्तर में निवास करती है, हालांकि मूल रूप से यह ओडिशा की है। [CG PSC (CMO)2019]
प्रमुख देवी: बूढ़ी देवी या ठकुरानी माता।
उपजाति: बोदो, कथेरा, पारंगी, कापू।
ऐतिहासिक संदर्भ: एक जनश्रुति के अनुसार, काकतीय शासक महिपाल देव इन्हें पालकी ढोने के लिए लाए थे।
विशेष तथ्य:
यह जनजाति धुरवा जनजाति से मिलती-जुलती संस्कृति रखती है।
इनमें भी घोड़े को छूना पाप माना जाता है।
7. परजा (परजा) जनजाति 🛖
निवास: यह जनजाति बस्तर, कोण्डागांव, सुकमा और दंतेवाड़ा क्षेत्र में निवास करती है। [CG Vyapam (FDFG)2024]
उत्पत्ति: ‘परजा’ शब्द संस्कृत के ‘प्रजा’ शब्द से बना है।
युवागृह: धांगाबक्सर।
बोली: परिज / परजी।
ग्राम मुखिया और चौपाल: इनके ग्राम मुखिया को ‘मडूली’ कहा जाता है, जिनके घर के सामने पत्थर का देवता निशान (‘मुण्डा’) होता है, जहाँ पंचायत (‘चौपाल’) लगती है।
धार्मिक कार्य: धार्मिक कार्य करने वाला व्यक्ति “जानी” और शुद्धिकरण करने वाला “भटनायक” कहलाता है।
मध्य सांस्कृतिक क्षेत्र (बिलासपुर, रायपुर एवं दुर्ग संभाग) की जनजातियाँ 🏛️
क्षेत्र विस्तार: इस क्षेत्र में बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग संभागों के मैदानी इलाके जैसे जांजगीर-चांपा, सक्ती, मुंगेली, रायपुर, महासमुंद, बलौदाबाजार, गरियाबंद, धमतरी, दुर्ग, बालोद, बेमेतरा, राजनांदगांव आदि शामिल हैं।
निवास करने वाली जनजातियाँ: अगरिया, बिंझवार, धनवार, भुजिया, कोंध, कोल, संवरा, सौंता, पाव, भैना, कंवर, गोंड़, कमार, कंडरा, उरांव आदि।
1. अगरिया (अगरिया) जनजाति 🔥🔨
निवास: ये मैकल श्रेणी के आसपास निवास करते हैं। इनका निवास देवता ‘धधकती भट्ठी’ को माना जाता है। [CG PSC (ARO)2022]
उपजाति: इनके दो उप-समूह हैं – पथरिया और खुटीया अगरिया।
पितृ देवता: लोहासुर (लोहासार/लोहाझार – मलार)।
कार्य: इनका पारंपरिक व्यवसाय लोहे को गलाकर औजार बनाना है। [CG PSC(ADS)2017,(ACF)2017],[CGVyapam (EAE)2018]
विशेष तथ्य:
इनके भोजन में उड़द दाल का विशेष महत्व होता है।
इनका चूल्हा एक या दो मुंह वाला, अंग्रेजी के उल्टे ‘U’ आकार का होता है।
दशहरा के अवसर पर ये लोहासुर को काले मुर्गे की बलि चढ़ाते हैं।
बिहार में इस जनजाति को ‘असुर’ कहा जाता है।
2. बिंझवार (Binjhwar) जनजाति 🏹
निवास: ये बलौदाबाजार, महासमुंद, रायपुर, बिलासपुर, कोरबा और रायगढ़ क्षेत्र में पाए जाते हैं।
नामकरण: माना जाता है कि विंध्य पर्वत के मूल निवासी होने के कारण इन्हें ‘बिंझवार’ कहा गया। [CG PSC (Engg. AP)2016]
प्रतीक चिह्न: तीर-कमान इनका पूजनीय प्रतीक है।
विवाह: इनमें ‘तीर विवाह’ और सामान्य विवाह प्रचलित है। [CG Vyapam (SAAF)2016]
प्रमुख देवी-देवता: बारह भाई बेटकर और विंध्यवासिनी देवी।
ऐतिहासिक संबंध: सोनाखान के वीर सपूत, शहीद वीरनारायण सिंह, इसी जनजाति से संबंधित थे। [CG PSC (AP)2016]
3. धनवार (धनवार) जनजाति 🎋
सम्बोधन: स्थानीय बोली में इन्हें ‘धनुहार’ या ‘धनुवार’ कहा जाता है।
नामकरण: इनका नाम ‘बाण’ निर्माण के कार्य के कारण पड़ा।
निवास: ये मुख्यतः बिलासपुर जिले में निवास करते हैं। [CG Vyapam (FI)2022]
कार्य: इनका प्रमुख कार्य बांस के बर्तन बनाना है। [CG PSC (ADS)2017]
अर्थ: ‘धनवार’ का अर्थ ‘धनुर्धारी’ होता है।
4. संवरा/सौंरा (Saura) जनजाति 🐍
निवास: महासमुन्द, रायगढ़, बिलासपुर क्षेत्र में।
कार्य: इनका पारंपरिक कार्य सांप पकड़ना है।
उत्पत्ति: यह जनजाति स्वयं को रामायण की ‘शबरी’ का वंशज मानती है।
ऐतिहासिक मान्यता: माना जाता है कि यह जनजाति लगभग 200 वर्ष पूर्व ओडिशा से आकर यहां बसी थी।
खेती: इनके द्वारा ‘पोडु’ नामक स्थानांतरित खेती की जाती है।
6. सौंता (सौंता) जनजाति 🌳
निवास: सूरजपुर, सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़।
उपजातियाँ: छत्तीसगढ़िया सौंता, उड़िया सौंता।
मुख्य संकेन्द्रण: कोरबा जिले के कटघोरा तहसील क्षेत्र में।
पूर्वज: ये लोग ‘बालक लोढ़ा’ को अपना पूर्वज मानते हैं।
7. भैना (भैना) जनजाति 🏞️
निवास: बिलासपुर, रायगढ़।
पंचायत प्रमुख: गौटिया।
8. परधान (परधान) जनजाति 🎶
निवास: मुख्यतः कबीरधाम और बिलासपुर क्षेत्र में।
गीत: परधान ‘लिंगोपाटा’ गायन करते हैं। [CG PSC(CMO)2019], [CG Vyapam (ECH)2017][CG PSC (ITI Pri.)2016]
विशेष: ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यह जाति गोंड राजाओं की मंत्री हुआ करती थी और उन्हें ‘पटरिया’ भी कहा जाता था। ये गोंड राजाओं के गीत गायक भी थे, जिसके कारण इन्हें गाथावाचक के रूप में भी जाना जाता है।
9. कंडरा (कंडरा) जनजाति 🎋
निवास: रायपुर, दुर्ग।
उत्पत्ति: ‘कंडरा’ शब्द की उत्पत्ति ‘कांड’ (अर्थात् बाण) से मानी जाती है। [CG Vyapam (Lab Tech.)2024]
कार्य: इनका मुख्य कार्य बांस के बर्तन बनाना है। [CG PSC (ITI Pri.)2016, (ADS)2017], [CG Vyapam (Patwari) [2017]
10. पाव (पाव) जनजाति 🌳
निवास: बिलासपुर और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के शहडोल (मध्यप्रदेश) से लगे क्षेत्रों में।
विशेष: पाव जनजाति छत्तीसगढ़ की एक अल्पसंख्यक जनजाति है।
उत्तर सांस्कृतिक क्षेत्र (सरगुजा संभाग) की जनजातियाँ ⛰️
भौगोलिक विस्तार: इस क्षेत्र में सरगुजा संभाग के जिले—सरगुजा, सूरजपुर, कोरिया, मनेन्द्रगढ़-भरतपुर-चिरमिरी, बलरामपुर, जशपुर—और बिलासपुर संभाग के रायगढ़ और कोरबा जिले के पहाड़ी इलाके शामिल हैं।
निवास: रायगढ़, जशपुर, रायपुर, महासमुंद और सरगुजा क्षेत्र में।
पारंपरिक कार्य: पालकी ढोना।
बोली: खड़िया।
प्रमुख पर्व: पूस-पुन्नी और करमा।
प्रमुख देवता: बंदा।
विशेष: यह एक आदिम कोलारियन जनजाति है।
2. खैरवार (खैरवार) जनजाति 🌳
निवास: सरगुजा अंचल।
अन्य नाम: इन्हें खरवार, खरिया या खैरया भी कहा जाता है।
कार्य: इनका पारंपरिक व्यवसाय खैर के वृक्ष से कत्था निकालना है।
नृत्य: जदुरा (दीपावली के समय) और डंडा (होली के समय)। [CG PSC (CMO)2019],[CG PSC (Pre)2016]
3. भारिया (भारिया) जनजाति 🐦
निवास: प्रमुखतः सरगुजा अंचल (बिलासपुर, कोरबा और जांजगीर-चांपा जिलों में भी)।
निवास स्थान: इनके निवास को ‘ढाना’ कहा जाता है।
बोली: भरनोटी या भारियाटी।
युवागृह: घसरवासा।
विशेष:
यह जनजाति “सांप और मोर के मांस” खाने में विशेष रुचि रखती है।
इनके ग्राम की सीमा पर ‘मुठवा बाबा’ का चबूतरा होता है।
4. मझवार (मझवार) जनजाति 🛶
निवास: प्रमुखतः सरगुजा (बलरामपुर, कोरबा और रायगढ़ क्षेत्र में)।
पंचायत प्रमुख: गौटिया।
विशेष:
अपनी बोली में ये स्वयं को ‘होर’ कहते हैं।
यह एक मिश्रित जनजाति है, जिसकी उत्पत्ति “गोंड़, मुंडा और कंवर” जनजातियों से हुई है।
5. माझी (माझी) जनजाति 🌊
निवास: जशपुर।
उत्पत्ति:
आर.व्ही. रसेल की पुस्तक “दी ट्राइब्स एण्ड कास्ट ऑफ सेन्ट्रल प्रोविन्सेस ऑफ इंडिया” (1916) के अनुसार, माझी जनजाति की उत्पत्ति गोंड़, मुण्डा और कंवर जनजाति के पूर्वजों से हुई है।
विलियम क्रुक्स के अनुसार, आर्यन समूह के केंवट, धीवर, मल्लाह आदि द्वारा नदी की मझधार पार करने के कारण इन्हें ‘माझी’ कहा गया।
उपजाति: इनकी तीन मुख्य उपजातियाँ हैं: 1. कोल माझी, 2. डोरबटा/तुरिया माझी, 3. किसान माझी।
पंचायत प्रमुख: सियान।
6. नगेशिया (नगेशिया) जनजाति 🐍
निवास: सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर और रायगढ़ जिले में। [CG Vyapam (Superviser)2009, (Shiksha Karmi) 2009]
बोली: सदरी।
उत्पत्ति: किंवदंती के अनुसार, नाग सर्प द्वारा रक्षा किए जाने के कारण इन्हें ‘नगेशिया’ कहा गया।