छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: राजवंशों और शासन प्रणालियों का एक अध्ययन…COMPLETE NOTES…

छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: राजवंशों और शासन प्रणालियों का एक अध्ययन

📜 छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास: राजवंशों और शासन प्रणालियों का एक अध्ययन 🏛️

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इस अध्ययन मार्गदर्शिका में छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक सफर को समझें

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📚 अध्ययन परिचय

यह अध्ययन मार्गदर्शिका छत्तीसगढ़ के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास के प्रमुख राजवंशों, उनके शासकों, महत्वपूर्ण घटनाओं, सांस्कृतिक योगदानों और शासन प्रणालियों को समझने के लिए डिज़ाइन की गई है। इसमें विभिन्न राजवंशों जैसे पाण्डुवंश, नल वंश, राजर्षितुल्यकुल वंश, पर्वतद्वारक वंश, शरभपुरीय वंश, बाण वंश, सोमवंश, नागवंश (छिंदक और फणि), और काकतीय वंश के साथ-साथ मराठा शासन काल के प्रमुख पहलुओं को शामिल किया गया है।

👑 राजर्षितुल्यकुल वंश

शासनकाल और क्षेत्र: 5वीं-6वीं शताब्दी ईस्वी, दक्षिण कोसल (आरंग)।

संस्थापक: सूर।

प्रमुख शासक: शूर, दायित प्रथम, विभीषण, भीमसेन प्रथम, दायितवर्मन द्वितीय, भीमसेन द्वितीय (अंतिम शासक)।

महत्वपूर्ण साक्ष्य: भीमसेन द्वितीय का आरंग ताम्रपत्र (गुप्त संवत का प्रयोग, गुप्तों की अधीनता)।

उपाधियाँ और धर्म: महाराज, राजयोगी, वैष्णव धर्म के अनुयायी।

राजचिन्ह और राजमुद्रा: गजलक्ष्मी, सिंह।

पतन: पाण्डु वंश द्वारा।

⛰️ पर्वतद्वारक वंश

शासनकाल और क्षेत्र: 5वीं शताब्दी ईस्वी, गरियाबंद का देवभोग क्षेत्र, तेल नदी घाटी। प्रारंभिक राजधानी ‘तारंभक’ या ‘तारभक’ थी।

जानकारी का स्रोत: तुष्टिकार का तेरसिंगा ताम्रपत्र।

प्रमुख शासक: सोमन राज (देवभोग क्षेत्र का दान), तुष्टिराज (तेरसिंगा ताम्रपत्र, पर्वतद्वारक क्षेत्र का दान)।

धार्मिक संबद्धता: स्तंभेश्वरी देवी के उपासक।

अधीनता: शरभपुरीय वंश की अधीनता स्वीकार करते थे।

🦁 शरभपुरीय वंश

शासनकाल और क्षेत्र: 6वीं शताब्दी ईस्वी, शरभपुर, श्रीपुर (वर्तमान बिलासपुर, रायपुर, रायगढ़ क्षेत्र)।

संस्थापक: शरभराज।

राजधानियाँ: शरभपुर और श्रीपुर।

प्रमुख शासक: शरभराज, प्रसन्नमात्र (प्रसन्नपुर नगर की स्थापना, सोने-चांदी के सिक्के), नरेंद्र, प्रवरराज प्रथम (राजधानी शरभपुर से सिरपुर स्थानांतरित), प्रवरराज द्वितीय (अंतिम शासक)।

विशेषताएँ: ‘बॉक्स हेडेड अल्फाबेट्स’ का प्रयोग शिलालेखों में।

अंत: इंद्रबल (पाण्डुवंशी सामंत) द्वारा।

🐼 पाण्डुवंश (सिरपुर/श्रीपुर के पाण्डुवंश/सोमवंश)

शासनकाल और क्षेत्र: 6वीं से 7वीं शताब्दी ईस्वी, राजधानी श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर)।

संस्थापक: उदयन। वास्तविक संस्थापक: इंद्रबल (जिन्होंने इंद्रपुर नगर की स्थापना की)।

महत्वपूर्ण शासक: ईशानदेव (खरौद के लक्ष्मणेश्वर मंदिर का निर्माण), महाशिव तीवरदेव (“सकल कोशलाधिपति” उपाधि), हर्षगुप्त, महाशिवगुप्त बालार्जुन (“छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्णकाल”)।

स्थापत्य और धार्मिक सहिष्णुता: लक्ष्मण मंदिर (रानी वासटादेवी द्वारा निर्मित, महाशिवगुप्त बालार्जुन द्वारा पूर्ण), विभिन्न धर्मों के स्मारकों का निर्माण (शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध)।

प्रमुख अभिलेख और यात्री: महाशिवगुप्त के 27 ताम्रपत्र (सर्वाधिक), चीनी यात्री ह्वेनसांग की यात्रा (639 ई.)।

पतन का कारण: भूकंप और बाढ़।

🌊 नल वंश

शासनकाल और क्षेत्र: 4वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी, बस्तर क्षेत्र (पुष्करी/भोपालपट्टनम)।

संस्थापक: शिशु। वास्तविक संस्थापक: वराह राज।

महत्वपूर्ण शासक: वराहराज, भवदत्त वर्मन, अर्धपति भट्टारक, स्कंद वर्मन, स्तंभ राज, विलासतुंग (राजीव लोचन मंदिर का निर्माण)।

सिक्के: कोंडागाँव के अड़ंगा से प्राप्त स्वर्ण मुद्राएं (वराह राज, भवदत्त वर्मन, अर्धपति भट्टारक), बालोद के कुलिया से स्तंभ राज के 55 स्वर्ण सिक्के (सर्वाधिक)।

संघर्ष: वाकाटक वंश और चालुक्य शासक कीर्ति वर्मन प्रथम के साथ संघर्ष।

धर्म: शैव धर्मावलंबी।

🏹 बाण वंश

शासनकाल: पाण्डुवंश के पतन के बाद।

क्षेत्र: पाली (कोरबा)।

संस्थापक: मल्लदेव।

प्रमुख शासक: विक्रमादित्य जयमऊ (पाली के शिव मंदिर का निर्माण)।

अंत: कलचुरी शासक शंकरगण द्वितीय द्वारा।

🌙 सोमवंश (उत्कल)

शासनकाल: मुख्य रूप से 9वीं से 11वीं सदी (पाण्डु वंश की शाखा के रूप में उभरा)।

प्रमुख शासक: शिवगुप्त (प्रथम शासक), जन्मेजय महाभवगुप्त प्रथम (“त्रिकलिंगाधिपति” की उपाधि), उद्योत केसरी, कर्ण केसरी (अंतिम शासक)।

संघर्ष: कलचुरी, भोज, परमार, चोल राज्यों से।

पतन: तुम्माण के कलचुरियों और उड़ीसा के शासक अनंतवर्मन चोडगंग द्वारा।

🐍 नागवंश

छिंदक नागवंश (बस्तर)

  • शासनकाल: 10वीं सदी से 1313 ई. तक।
  • क्षेत्र: बस्तर (चक्रकोट/भ्रमरकोट)।
  • संस्थापक: नृपति भूषण।
  • प्रमुख शासक: सोमेश्वर देव, हरिश्चंद्र देव (अंतिम शासक)।
  • निर्माण: मामा-भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर, चंद्रादित्येश्वर मंदिर (बारसूर)।
  • पतन: काकतीय शासक अन्नम देव द्वारा।

फणि नागवंश (कवर्धा)

  • शासनकाल: 9वीं से 15वीं सदी।
  • क्षेत्र: कवर्धा।
  • संस्थापक: अहिराज।
  • निर्माण: भोरमदेव मंदिर (गोपाल देव द्वारा, 1089 ई.), मड़वा महल (रामचंद्र देव द्वारा, 1349 ई.)।
  • अधीनता: कलचुरी वंश की प्रभुसत्ता स्वीकार करते थे।

🐅 काकतीय वंश

शासनकाल: 1324-1961 (बस्तर)।

संस्थापक: अन्नमदेव (छिंदक नागवंश के हरिश्चंद्र देव को पराजित कर)।

निर्माण: दंतेश्वरी मंदिर (दंतेवाड़ा)।

महत्वपूर्ण शासक: अन्नमदेव, पुरुषोत्तम देव (जगन्नाथ पुरी की यात्रा, रथयात्रा/गोंचा पर्व का प्रारंभ), दलपतदेव, रुद्रप्रताप देव (“चौराहों का शहर” जगदलपुर), प्रफुल्ल कुमारी देवी (छत्तीसगढ़ की एकमात्र महिला शासिका), प्रवीरचंद्र भंजदेव (बस्तर रियासत का भारत संघ में विलय)।

🔱 कलचुरी वंश

संस्थापक: कलिंगराज (छत्तीसगढ़ में वास्तविक संस्थापक)।

राजधानियाँ: तुममन (प्रारंभिक), रतनपुर (1050 ई., रतनदेव प्रथम द्वारा स्थापित)।

विभाजन: वीर सिंह देव के समय में रायपुर और रतनपुर के कलचुरियों में विभाजित।

शासन प्रणाली: गढ़ व्यवस्था (84 गढ़, प्रत्येक गढ़ में 12 गाँव) और स्थानीय प्रशासन (पंकुल, पुरजन, ग्रामकूट)।

🐎 मराठा शासन काल (1741-1854 ई.)

शासन प्रणाली: सूबा प्रणाली और परगना प्रणाली।

पहला मराठा शासक: बिंबाजी भोंसले।

विद्रोह: धमधा, बरगढ़, तारापुर में।

प्रशासनिक नीतियाँ: भूमि कर आय का मुख्य स्रोत, मराठा अधिकारियों द्वारा लूटपाट और कुशासन।

भूदान प्रथाएँ: नमानुक (ब्राह्मणों को कर मुक्त गाँव), मोकासा (ब्राह्मणों को दान किए गए गाँव), धर्मदाय (धर्म के नाम पर), देवस्थान (मंदिर के नाम पर)।

अंतिम मराठा शासक: रघुजी तृतीय भोसले (1854 में विलय)।

🇬🇧 ब्रिटिश शासन (1818-1830)

प्रथम डिप्टी कमिश्नर: चार्ल्स सी. इलियट (1818 में)।

प्रशासनिक बदलाव: सूबा पद्धति समाप्त।

प्रमुख विद्रोह: डोंगरगढ़ जमींदार विद्रोह (1818), गोंड विद्रोह (1818, 1825), सोनखान विद्रोह (1819), परलकोट विद्रोह (1824-25)।

✨ छत्तीसगढ़ का संक्षिप्त इतिहास: अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

प्रागैतिहासिक काल 🗿

  • पाषाण युग: पूर्व पाषाण युग, मध्य पाषाण युग, उत्तर पाषाण युग, नव पाषाण काल के स्थान और साक्ष्य।
  • शैलचित्र: सर्वाधिक रायगढ़ जिले में (सिंघनपुर, कबरा पहाड़ आदि)।
  • महापाषाण स्मारक: बालोद जिले के धनोरा से लगभग 500 स्मारक।

महाकाव्य काल (रामायण और महाभारत) 🏹

  • रामायण काल: भगवान राम की माता कौशल्या, वनवास के दौरान के स्थल (शबरी आश्रम, खरदूषण वध, तुरतुरिया, पंचवटी)।
  • महाभारत काल: बस्तर का ‘कांतार’, ऋषभतीर्थ (गुंजी), लाखागढ़ (खल्लारी), चित्रांगदपुर (सिरपुर), आरंग।

मौर्योत्तर काल 📜

  • शुंग वंश: अल्पकालिक शासन।
  • खारवेल वंश: हाथीगुम्फा अभिलेख।
  • सातवाहन वंश: राजा अपीलक की मुद्रा (बालपुर), कुमार वरदत्तश्री का शिलालेख (गुंजी), रोम से व्यापार।
  • कुषाण वंश: कनिष्क के सिक्के (टेलीकोट)।
  • मेघ वंश: सातवाहनों के बाद शासन।

गुप्तोत्तर काल (चौथी शताब्दी से) 🌟

  • प्रारंभिक नल वंश: समुद्रगुप्त द्वारा व्याघ्रराज को पराजित करना।
  • गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त का दक्षिणापथ अभियान: महेंद्र (दक्षिण कोसल) और व्याघ्रराज (महाकांतार) को पराजित किया।
  • वाकाटक काल: प्रवरसेन प्रथम का दक्षिण कोसल पर अधिकार।
  • राजर्षितुल्यकुल वंश: आरंग ताम्रपत्र, गुप्तों की अधीनता।
  • पर्वतद्वारक वंश: तेल नदी घाटी में शासन।
  • नल वंश: वास्तविक संस्थापक वराहराज, महत्वपूर्ण शासक विलासतुंग (राजीव लोचन मंदिर)।
  • शरभपुरीय वंश: शरभराज द्वारा स्थापित, बॉक्स हेडेड अल्फाबेट्स।
  • पांडु वंश: इंद्रबल द्वारा स्थापित, महाशिवगुप्त बालार्जुन का स्वर्णकाल, ह्वेनसांग की यात्रा।

छत्तीसगढ़ के राज्य प्रतीक 🇮🇳

  • राजकीय चिन्ह: 04 दिसंबर 2001 को स्वीकृत (36 किले, धान की बालियां, विद्युत संकेत, लहरदार रेखाएँ, अशोक स्तंभ)।
  • राजकीय वृक्ष: साल का वृक्ष (बस्तर में देवता का दर्जा)।
  • राजकीय पक्षी: बस्तर की पहाड़ी मैना (जुलाई 2001 को स्वीकृत)।
  • राजकीय पशु: जंगली भैंसा (अरना)।
  • राजकीय भाषा: छत्तीसगढ़ी (28 नवंबर 2007 को राजभाषा का दर्जा मिला)।

💡 क्विज़: अपनी जानकारी परखें!

निर्देश: निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 2-3 वाक्यों में दें।

  1. पाण्डुवंश के शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन को “छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्णकाल” क्यों कहा जाता है?
  2. आरंग ताम्रपत्र राजर्षितुल्यकुल वंश के बारे में क्या महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है?
  3. पर्वतद्वारक वंश का नाम “पर्वतद्वारक” क्यों पड़ा और इसके प्रमुख शासकों ने क्या दान दिया था?
  4. नल वंश के दो सबसे प्रतापी शासकों के नाम बताइए और उनके प्रमुख योगदानों का उल्लेख करें।
  5. शरभपुरीय वंश के प्रसन्नमात्र ने क्या उल्लेखनीय कार्य किए और उनके सिक्के किस विशेषता के लिए जाने जाते हैं?
  6. कवर्धा के फणि नागवंश के किन दो शासकों ने महत्वपूर्ण मंदिरों का निर्माण करवाया था? उनके द्वारा निर्मित मंदिरों का नाम भी बताएं।
  7. छिंदक नागवंशियों की राजधानी क्या थी और वे कौन से प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करने के लिए जाने जाते हैं?
  8. काकतीय वंश के संस्थापक अन्नमदेव का प्रमुख योगदान क्या था, और पुरुषोत्तम देव किस उत्सव को प्रारंभ करने के लिए प्रसिद्ध हैं?
  9. मराठा शासनकाल के दौरान छत्तीसगढ़ में कौन सी प्रमुख प्रशासनिक प्रणालियाँ लागू की गईं?
  10. छत्तीसगढ़ में मराठा शासन के दौरान हुए किन्हीं तीन प्रमुख विद्रोहों के स्थानों का उल्लेख करें।

उत्तर कुंजी:

  • महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल को “छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्णकाल” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दौरान उनकी धार्मिक सहिष्णुता अनुकरणीय थी, उन्होंने विभिन्न धर्मों के स्मारकों का निर्माण करवाया और उनके शासन काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने छत्तीसगढ़ की यात्रा की थी। उनके 27 ताम्रपत्र भी श्रीपुर से प्राप्त हुए हैं, जो उनकी प्रशासनिक कुशलता को दर्शाते हैं।
  • आरंग ताम्रपत्र राजर्षितुल्यकुल वंश के छह शासकों की वंशावली की जानकारी देता है, जिसमें संस्थापक सूर से लेकर अंतिम शासक भीमसेन द्वितीय तक शामिल हैं। यह ताम्रपत्र गुप्त संवत का प्रयोग करता है (182 या 282 गुप्त संवत), जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि इस वंश के शासकों ने गुप्तों की अधीनता स्वीकार की थी।
  • पर्वतद्वारक वंश का नाम “पर्वतद्वारक” इसलिए पड़ा क्योंकि इस वंश के शासकों ने पर्वतीय क्षेत्रों को दान में दिया था, “द्वारक” का अर्थ दान देने वाला होता है। प्रमुख शासकों में सोमन राज ने देवभोग क्षेत्र को दान में दिया, जबकि तुष्टिकार ने पर्वतद्वारक क्षेत्र को दान में दिया था।
  • नल वंश के प्रतापी शासकों में वराह राज और विलासतुंग शामिल हैं। वराह राज को नल वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है, जिन्होंने राज्य का विस्तार किया और अड़ंगा से उनके 29 स्वर्ण सिक्के मिले। विलासतुंग ने राजिम में प्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • शरभपुरीय वंश के प्रसन्नमात्र ने प्रसन्नपुर नामक नगर की स्थापना की थी। उन्होंने सोने और चांदी के पानी चढ़े सिक्के प्रचलित करवाए, जिन पर गरुड़, शंख और चक्र अंकित होते थे। यह उनके शासनकाल की आर्थिक समृद्धि और वैष्णव धर्म के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है।
  • कवर्धा के फणि नागवंश के शासक गोपाल देव ने 11वीं सदी में भोरमदेव मंदिर का निर्माण कराया, जिसे “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” भी कहा जाता है। रामचंद्र देव ने 14वीं सदी में मड़वा महल या दूल्हादेव मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • छिंदक नागवंशियों की राजधानी भोगवती पुरी थी। वे बारसूर (दंतेवाड़ा जिले में) में शिव मंदिर, मामा-भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर, और चंद्रादित्येश्वर मंदिर जैसे कई मंदिरों का निर्माण करने के लिए जाने जाते हैं।
  • काकतीय वंश के संस्थापक अन्नमदेव ने बस्तर में काकतीय वंश की नींव रखी और दंतेवाड़ा में प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण करवाया। पुरुषोत्तम देव जगन्नाथ पुरी की यात्रा के बाद बस्तर में रथयात्रा (जो “गोंचा पर्व” के नाम से प्रसिद्ध है) को प्रारंभ करने के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • मराठा शासनकाल के दौरान छत्तीसगढ़ में सूबा प्रणाली और परगना प्रणाली जैसी प्रमुख प्रशासनिक प्रणालियाँ लागू की गईं। ये प्रणालियाँ नागपुर के भोंसले शासकों द्वारा शासन की बागडोर संभालने के बाद स्थापित की गई थीं।
  • छत्तीसगढ़ में मराठा शासन के दौरान हुए तीन प्रमुख विद्रोहों के स्थान धमधा, बरगढ़, और तारापुर थे। इन विद्रोहों का मुख्य कारण मराठा शासन की अशांति, कुशासन, बड़े पैमाने पर लूटपाट और क्षेत्र के हितों की उपेक्षा थी।

📖 प्रमुख शब्दों की शब्दावली

  • पाण्डुवंश: छत्तीसगढ़ के सिरपुर/श्रीपुर क्षेत्र पर शासन करने वाला एक प्राचीन राजवंश, जिसने 6वीं-7वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • सकल कोशलाधिपति: एक उपाधि जिसका अर्थ “समग्र कोसल का अधिपति” है, जिसे पाण्डुवंशी शासक महाशिव तीवरदेव ने धारण किया।
  • महाशिवगुप्त बालार्जुन: पाण्डुवंश के एक प्रतापी शासक जिनके शासनकाल को छत्तीसगढ़ के इतिहास का “स्वर्णकाल” माना जाता है।
  • ह्वेनसांग: 7वीं शताब्दी का एक प्रसिद्ध चीनी बौद्ध तीर्थयात्री जिसने 639 ईस्वी में छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) की यात्रा की।
  • लक्ष्मण मंदिर (सिरपुर): रानी वासटादेवी द्वारा अपने पति हर्षगुप्त की स्मृति में श्रीपुर में निर्मित एक विष्णु मंदिर।
  • राजर्षितुल्यकुल वंश: 5वीं-6वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान दक्षिण कोसल (आरंग) पर शासन करने वाला एक प्राचीन राजवंश।
  • आरंग ताम्रपत्र: राजर्षितुल्यकुल वंश के अंतिम शासक भीमसेन द्वितीय द्वारा जारी किया गया एक महत्वपूर्ण अभिलेख।
  • पर्वतद्वारक वंश: 5वीं शताब्दी ईस्वी में गरियाबंद के देवभोग क्षेत्र पर शासन करने वाला एक स्थानीय राजवंश।
  • स्तंभेश्वरी देवी: पर्वतद्वारक वंश के शासकों की उपास्य देवी।
  • नल वंश: 4थीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक बस्तर क्षेत्र पर शासन करने वाला एक शक्तिशाली राजवंश।
  • राजीव लोचन मंदिर (राजिम): नल वंशीय शासक विलासतुंग द्वारा 712 ईस्वी में निर्मित एक प्रसिद्ध विष्णु मंदिर।
  • शरभपुरीय वंश: 6वीं शताब्दी ईस्वी में प्राचीन दक्षिण कोसल पर शासन करने वाला एक राजवंश, जिसकी स्थापना शरभराज ने की थी।
  • प्रसन्नमात्र: शरभpuriय वंश का एक महत्वपूर्ण शासक जिसने प्रसन्नपुर नगर की स्थापना की।
  • बॉक्स हेडेड अल्फाबेट्स: एक विशेष लिपि शैली जिसका प्रयोग शरभपुरीय शासकों के शिलालेखों में किया गया था।
  • बाण वंश: पाण्डुवंश के पतन के बाद कोरबा के पाली क्षेत्र पर शासन करने वाला एक राजवंश।
  • सोमवंश: पाण्डु वंश की एक शाखा के रूप में उभरा एक राजवंश जिसने मुख्य रूप से 9वीं से 11वीं सदी तक दक्षिण कोसल पर शासन किया।
  • त्रिकलिंगाधिपति: एक उपाधि जिसका अर्थ “तीन कलिंगों का अधिपति” है, जिसे सोमवंशी शासक जन्मेजय महाभवगुप्त प्रथम ने धारण किया।
  • छिंदक नागवंश: बस्तर के चक्रकोट/भ्रमरकोट क्षेत्र पर 10वीं से 14वीं शताब्दी ईस्वी तक शासन करने वाला एक नागवंशी शाखा।
  • मामा-भांजा मंदिर (बारसूर): छिंदक नागवंशियों द्वारा निर्मित एक प्रसिद्ध मंदिर।
  • फणि नागवंश: 9वीं से 15वीं शताब्दी ईस्वी तक कवर्धा क्षेत्र के आस-पास शासन करने वाला नागवंश की एक शाखा।
  • भोरमदेव मंदिर (कवर्धा): फणि नागवंशी शासक गोपाल देव द्वारा निर्मित 11वीं सदी का मंदिर, जिसे “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” भी कहा जाता है।
  • मड़वा महल (कवर्धा): फणि नागवंशी शासक रामचंद्र देव द्वारा 1349 ईस्वी में निर्मित दूल्हादेव मंदिर।
  • काकतीय वंश: बस्तर क्षेत्र पर 14वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी तक शासन करने वाला एक राजवंश।
  • दंतेश्वरी मंदिर (दंतेवाड़ा): काकतीय वंश के संस्थापक अन्नमदेव द्वारा निर्मित एक प्रसिद्ध मंदिर।
  • गोंचा पर्व: काकतीय शासक पुरुषोत्तम देव द्वारा प्रारंभ की गई बस्तर की रथयात्रा का स्थानीय नाम।
  • प्रफुल्ल कुमारी देवी: छत्तीसगढ़ की एकमात्र महिला शासिका जो काकतीय वंश से संबंधित थीं।
  • सूबा प्रणाली: मराठा शासनकाल के दौरान छत्तीसगढ़ में लागू की गई एक प्रशासनिक व्यवस्था।
  • परगना प्रणाली: मराठा शासनकाल के दौरान छत्तीसगढ़ में लागू की गई एक प्रशासनिक व्यवस्था।
  • बिंबाजी भोंसले: छत्तीसगढ़ के पहले मराठा शासक।
  • धमधा, बरगढ़, तारापुर: छत्तीसगढ़ में मराठा शासन के दौरान हुए प्रमुख विद्रोहों के स्थान।

👤 पात्रों की सूची

राजर्षितुल्यकुल वंश

  • महाराज सूर, दायित प्रथम, विभीषण, भीमसेन प्रथम, दायितवर्मन द्वितीय, भीमसेन द्वितीय।

पर्वतद्वारक वंश

  • सोमन्नराज, तुष्टि।

नल वंश

  • शिशुकुंज, व्याघ्रराज, वृषभराज, वराहराज, भवदत्त वर्मन, अर्धपति भट्टारक, स्कंद वर्मन, स्तंभराज, नंदराज, विलासतुंग, पृथ्वी व्याघ्र, भीमसेन, नरेंद्र थबल।

शरभपुरीय वंश

  • शरभराज, नरेन्द्र, प्रसन्नमात्र, जयराज, मनमात्र, दुर्गराज, सुदेवराज, प्रवरराज प्रथम, प्रवरराज द्वितीय।

पांडुवंश

  • इंद्रबल, उदयन, तीवरदेव, हर्षगुप्त, रानी वासटा, महाशिवगुप्त बालार्जुन।

बाण वंश

  • मल्लदेव, विक्रमादित्य जयमऊ।

सोमवंश

  • शिवगुप्त, जन्मेजय महाभवगुप्त प्रथम, इंद्ररथ, ययाति, धर्मरथ, उद्योत केसरी, कर्ण केसरी।

नागवंश

  • कवर्धा के फणिनागवंश: अहिराज, गोपाल देव, रामचंद्र देव, धरमराज सिंह, मोहिम देव।
  • बस्तर के छिंदक नागवंश: नृपति भूषण, सोमेश्वर देव, मधुरांतक देव, कन्हर देव, जयसिंह देव, नरसिंह देव, कन्हर देव द्वितीय, हरिशचंद्र देव।

काकतीय वंश

  • अन्नमदेव, पुरुषोत्तम देव, दikपाल देव, राजपाल देव, दलपतदेव, अजमेर सिंह, दरियावदेव, महिपाल देव, भैरम देव, रुद्रप्रताप देव, महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी, प्रवीरचंद्र भंजदेव।

अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति

  • हरी स्वामी, बप्पा स्वामी, कीर्ति वर्मन प्रथम, डॉ. लक्ष्मी शंकर निगम, दुर्गाहस्ती, नंदीवर्धन, पुष्यमित्र शुंग, डॉ. सी. के. साहू, डॉ. वासुदेव विष्णु मिराशी, कालकादास, ह्वेनसांग, डॉ. एम. जी. दीक्षित, प्रोफेसर जे. आर. कांबले, डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र, एंडरसन, अमरनाथ दत्त, भगवान सिंह बघेल।

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