मानव कल्याण में जीव विज्ञान: खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति
बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, खाद्य उत्पादन में वृद्धि करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। जीव विज्ञान की तकनीकों ने इस चुनौती का सामना करने के लिए प्रभावी कार्यनीतियाँ प्रदान की हैं, जिनमें मुख्य रूप से पशुपालन और पादप प्रजनन शामिल हैं।
1. पशुपालन (Animal Husbandry)
परिभाषा:
पशुपालन कृषि विज्ञान की वह शाखा है जिसमें भोजन, ऊन, श्रम और अन्य उत्पादों के लिए पशुधन (जैसे- गाय, भैंस, भेड़, बकरी, मुर्गी) के प्रजनन (breeding), पालन-पोषण (rearing) और देखभाल (care) का वैज्ञानिक अध्ययन और प्रबंधन किया जाता है।
उद्देश्य: दूध, अंडे, मांस और ऊन जैसे पशु उत्पादों की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार करना।
प्रमुख क्षेत्र और कार्यनीतियाँ:
A) डेयरी फार्म प्रबंधन (Dairy Farm Management):
यह दूध और दुग्ध उत्पादों के लिए दुधारू पशुओं का प्रबंधन है।
- कार्यनीतियाँ:
- अच्छी नस्लों का चयन: ऐसी नस्लों का चयन करना जो उच्च दूध उत्पादन क्षमता वाली और रोग प्रतिरोधी हों (जैसे- जर्सी, होल्स्टीन-फ्रेशियन जैसी विदेशी नस्लें और साहीवाल, गीर जैसी देशी नस्लें)।
- उचित आवास और स्वच्छता: पशुओं के लिए स्वच्छ, हवादार और आरामदायक आवास की व्यवस्था करना।
- संतुलित आहार: पशुओं को उनकी आवश्यकतानुसार संतुलित आहार (चारा, पानी, पोषक तत्व) देना।
- नियमित स्वास्थ्य जाँच: बीमारियों की रोकथाम और उपचार के लिए नियमित रूप से पशु चिकित्सकों से जाँच कराना।
B) कुक्कुट (मुर्गी) फार्म प्रबंधन (Poultry Farm Management):
यह अंडे और मांस के लिए पालतू कुक्कुटों (जैसे- मुर्गी, बत्तख, टर्की) का प्रबंधन है।
- कार्यनीतियाँ:
- उपयुक्त नस्लों का चयन: अंडे के लिए (लेयर्स, जैसे- लेगहॉर्न) और मांस के लिए (ब्रॉयलर्स) उपयुक्त नस्लों का चयन करना।
- स्वच्छ और सुरक्षित फार्म: फार्म को स्वच्छ रखना और बीमारियों (जैसे- बर्ड फ्लू) से बचाना।
- संतुलित आहार और पानी: पक्षियों को उचित आहार और स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना।
C) पशु प्रजनन (Animal Breeding):
यह पशुपालन का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसका उद्देश्य पशुओं के आनुवंशिक गुणों में सुधार करके उनकी उपज और गुणवत्ता को बढ़ाना है।
- कार्यनीतियाँ:
- अंतःप्रजनन (Inbreeding): एक ही नस्ल के निकट संबंधित श्रेष्ठ नर और मादा के बीच संभोग कराना। इससे शुद्ध वंशक्रम (pure lines) विकसित होते हैं।
- बहिःप्रजनन (Outbreeding): विभिन्न नस्लों या प्रजातियों के बीच संभोग कराना।
- संकरण (Cross-breeding): यह एक उच्च गुणवत्ता वाली नस्ल विकसित करने के लिए उपयोग किया जाता है (जैसे- हिसारडेल भेड़, जो बीकानेरी भेड़ों और मैरिनो मेढ़ों का संकर है)।
- कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination): एक चयनित उत्तम नर के वीर्य को एकत्र कर उसे एक चयनित मादा के जनन पथ में कृत्रिम रूप से डालना। यह श्रेष्ठ नर का उपयोग अधिक व्यापक रूप से करने की अनुमति देता है।
- MOET (Multiple Ovulation Embryo Transfer): यह उच्च गुणवत्ता वाली मादाओं से कम समय में अधिक संतान प्राप्त करने की एक उन्नत तकनीक है (“सुपर-ओव्यूलेशन”)।
D) मधुमक्खी पालन (Apiculture or Beekeeping):
शहद और मोम के व्यावसायिक उत्पादन के लिए मधुमक्खियों का पालन करना। शहद एक उच्च पौष्टिक आहार है और पारंपरिक चिकित्सा में भी इसका उपयोग होता है।
E) मत्स्यकी (Fisheries):
मछली और अन्य जलीय जीवों (जैसे- झींगा, केकड़ा) को पकड़ना, पालना, और बेचना। नीली क्रांति (Blue Revolution) का संबंध इसी क्षेत्र से है।
2. पादप प्रजनन (Plant Breeding)
परिभाषा:
पादप प्रजनन एक विज्ञान है जिसके द्वारा पादपों की आनुवंशिक संरचना में उद्देश्यपूर्ण तरीके से परिवर्तन करके उन्हें मानव उपयोग के लिए अधिक उपयुक्त बनाया जाता है, ताकि वांछित लक्षण (जैसे- उच्च उपज, रोग प्रतिरोधकता, बेहतर गुणवत्ता) प्राप्त किए जा सकें।
हरित क्रांति (Green Revolution) में पादप प्रजनन की तकनीकों का बहुत बड़ा योगदान था, जिससे गेहूँ और चावल के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
पादप प्रजनन के मुख्य चरण (Main Steps of Plant Breeding):
- विभिन्नता का संग्रहण (Collection of Variability):
- किसी भी प्रजनन कार्यक्रम का आधार आनुवंशिक विभिन्नता है। इसके लिए, किसी फसल की सभी जंगली किस्मों, प्रजातियों और संबंधित प्रजातियों से जनक प्लाज्मा (Germplasm) का संग्रह किया जाता है।
- जनकों का मूल्यांकन तथा चयन (Evaluation and Selection of Parents):
- एकत्रित किए गए जर्मप्लाज्म का मूल्यांकन करके वांछित लक्षणों वाले पौधों को जनक (parents) के रूप में चुना जाता है।
- चयनित जनकों के बीच संकरण (Cross Hybridization among Selected Parents):
- वांछित लक्षणों (जैसे- एक जनक से उच्च उपज और दूसरे से रोग प्रतिरोधकता) को एक ही पौधे में लाने के लिए चयनित जनकों के बीच कृत्रिम परागण कराया जाता है।
- यह एक समय लेने वाली और कठिन प्रक्रिया है।
- श्रेष्ठ पुनर्योगजों का चयन और परीक्षण (Selection and Testing of Superior Recombinants):
- संकरण से उत्पन्न संतानों में से उन पौधों का चयन किया जाता है जिनमें दोनों जनकों के वांछित गुणों का संयोजन होता है।
- यह प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है और इसमें वैज्ञानिक मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।
- नए کشتوں (cultivars) का परीक्षण, निर्मुक्ति तथा व्यापारीकरण (Testing, Release and Commercialization of New Cultivars):
- चयनित पौधों को अनुसंधान क्षेत्रों में उगाया जाता है और उनकी उपज तथा अन्य गुणों का मूल्यांकन किया जाता है।
- इसके बाद, इन्हें कम से कम तीन ऋतुओं तक पूरे देश में किसानों के खेतों में अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में परीक्षण के लिए उगाया जाता है।
- सफल परीक्षण के बाद, इन उन्नत किस्मों को खेती के लिए जारी कर दिया जाता है।
पादप प्रजनन की सफलताएँ:
- रोग प्रतिरोधकता के लिए प्रजनन: कई फसलों (जैसे गेहूँ, सरसों) की ऐसी किस्में विकसित की गई हैं जो कवक, जीवाणु और वायरस जनित रोगों के प्रति प्रतिरोधी हैं (जैसे- गेहूँ की हिमगिरी किस्म)।
- कीट प्रतिरोधकता के लिए प्रजनन: कीटों के प्रति प्रतिरोधी किस्में विकसित की गईं, जैसे बीटी-कपास (Bt-Cotton), जो एक जैव प्रौद्योगिकी उत्पाद है।
- उच्च उपज के लिए प्रजनन: 1960 के दशक में, नॉर्मन ई. बोरलॉग द्वारा विकसित गेहूँ की अर्ध-बौनी (semi-dwarf) किस्में (जैसे सोनालिका, कल्याण सोना) भारत लाई गईं, जिससे भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई।
- बेहतर पोषण गुणवत्ता के लिए प्रजनन (Biofortification): फसलों में विटामिन, खनिज, और प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के लिए प्रजनन, जैसे ‘गोल्डन राइस’ (विटामिन-ए)।
मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव (Microbes in Human Welfare)
सूक्ष्मजीव (Microbes) वे जीव हैं जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता और उन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है। इनमें जीवाणु (Bacteria), कवक (Fungi), प्रोटोजोआ (Protozoa) और सूक्ष्म विषाणु (Viruses) शामिल हैं।
हालांकि कुछ सूक्ष्मजीव मनुष्यों में रोग उत्पन्न करते हैं, लेकिन अधिकांश सूक्ष्मजीव हमारे लिए और पर्यावरण के लिए अत्यंत लाभदायक होते हैं। वे हमारे दैनिक जीवन के कई पहलुओं, जैसे भोजन, दवा और उद्योग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
1. घरेलू उत्पादों में सूक्ष्मजीव (Microbes in Household Products)
- दही (Curd):
- सूक्ष्मजीव: लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) नामक जीवाणु, जिसे लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया (LAB) भी कहा जाता है।
- प्रक्रिया: जब दूध में थोड़ी मात्रा में जामन (जिसमें लाखों LAB होते हैं) मिलाया जाता है, तो ये जीवाणु दूध में वृद्धि करते हैं। वे लैक्टोज (lactose) शर्करा को लैक्टिक एसिड (lactic acid) में बदल देते हैं।
- परिणाम: लैक्टिक एसिड दूध के प्रोटीन (कैसिइन) को स्कंदित (coagulate) और आंशिक रूप से पचा देता है, जिससे दूध दही में बदल जाता है। दही में विटामिन B₁₂ की मात्रा भी बढ़ जाती है।
- चीज (Cheese):
- यह सबसे पुराने खाद्य पदार्थों में से एक है जिसे सूक्ष्मजीवों की मदद से बनाया जाता है।
- अलग-अलग प्रकार के चीज की विशिष्ट बनावट, स्वाद और सुगंध उनमें उपयोग किए गए विशिष्ट कवक या जीवाणु पर निर्भर करती है।
- स्विस चीज (Swiss cheese): इसमें बड़े-बड़े छेद प्रोपिओनीबैक्टीरियम शारमैनाई नामक जीवाणु द्वारा उत्पन्न CO₂ के कारण होते हैं।
- रोकफोर्ट चीज (Roquefort cheese): एक विशिष्ट कवक द्वारा पकाया जाता है।
- इडली और डोसा (Idli and Dosa):
- चावल और दाल के मिश्रण से बना खमीरीकृत आटा बैक्टीरिया द्वारा किण्वित (fermented) होता है, जिससे CO₂ गैस उत्पन्न होती है और आटा फूल जाता है।
- ब्रेड (Bread):
- सूक्ष्मजीव: सैकैरोमाइसीज सेरेविसी (Saccharomyces cerevisiae) नामक खमीर या यीस्ट (Yeast)।
- प्रक्रिया: गुंथे हुए आटे में यीस्ट मिलाया जाता है। यीस्ट आटे में किण्वन करता है और CO₂ गैस का उत्पादन करता है।
- परिणाम: CO₂ के बुलबुले आटे को फुला देते हैं, जिससे ब्रेड स्पंजी और नरम बनती है। इसी यीस्ट को ‘बेकर्स यीस्ट’ (Baker’s yeast) कहते हैं।
2. औद्योगिक उत्पादों में सूक्ष्मजीव (Microbes in Industrial Products)
सूक्ष्मजीवों को बड़े बर्तनों, जिन्हें किण्वक या फरमेंटर (fermenters) कहते हैं, में उगाकर बड़े पैमाने पर कई औद्योगिक उत्पादों का उत्पादन किया जाता है।
- किण्वित पेय पदार्थ (Fermented Beverages):
- सूक्ष्मजीव: सैकैरोमाइसीज सेरेविसी यीस्ट, जिसे ‘ब्रूअर्स यीस्ट’ (Brewer’s yeast) भी कहा जाता है।
- प्रक्रिया: यह यीस्ट फलों के रस और माल्टेड अनाज में मौजूद शर्करा को किण्वित करके इथेनॉल (Ethanol) में बदल देता है।
- उत्पाद:
- बिना आसवन के (Without distillation): बीयर और वाइन।
- आसवन के बाद (After distillation): व्हिस्की, ब्रांडी, रम (इनमें अल्कोहल की सांद्रता अधिक होती है)।
- प्रतिजैविक या एंटीबायोटिक्स (Antibiotics):
- परिभाषा: एंटीबायोटिक्स वे रासायनिक पदार्थ हैं जो कुछ सूक्ष्मजीवों (जैसे कवक) द्वारा उत्पन्न होते हैं और अन्य रोगजनक सूक्ष्मजीवों (जैसे बैक्टीरिया) की वृद्धि को रोकते हैं या उन्हें मार देते हैं।
- खोज: पहली एंटीबायोटिक, पेनिसिलिन (Penicillin), की खोज अलेक्जेंडर फ्लेमिंग (Alexander Fleming) ने 1928 में पेनिसिलियम नोटेटम (Penicillium notatum) नामक कवक से की थी।
- यह 20वीं सदी की एक युगांतकारी खोज थी जिसने लाखों लोगों की जान बचाई।
- अन्य उदाहरण: स्ट्रेप्टोमाइसिन, टेट्रासाइक्लिन (जो विभिन्न जीवाणुओं से प्राप्त होते हैं)।
- रसायन, एंजाइम और जैव-सक्रिय अणु (Chemicals, Enzymes and Bioactive Molecules):
- कार्बनिक अम्ल (Organic Acids):
- सिट्रिक अम्ल: एस्परजिलस नाइजर (कवक)।
- एसिटिक अम्ल (सिरका): एसिटोबैक्टर एसिटाई (जीवाणु)।
- एंजाइम (Enzymes):
- लाइपेज (Lipases): डिटर्जेंट में तेल के दाग हटाने के लिए।
- प्रोटिएज और पेक्टिनेज: बोतलबंद जूस को साफ करने के लिए।
- जैव-सक्रिय अणु (Bioactive Molecules):
- साइक्लोस्पोरिन-ए (Cyclosporin A): यह ट्राइकोडर्मा पॉलीस्पोरम कवक से प्राप्त होता है। इसका उपयोग अंग प्रत्यारोपण (organ transplant) में एक प्रतिरक्षा-निरोधक कारक (immunosuppressive agent) के रूप में किया जाता है ताकि शरीर नए अंग को अस्वीकार न करे।
- स्टैटिन (Statins): यह मोनॉस्कस परप्यूरीअस यीस्ट से प्राप्त होता है। इसका उपयोग रक्त-कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाले कारक के रूप में किया जाता है।
- कार्बनिक अम्ल (Organic Acids):
3. वाहित मल उपचार (Sewage Treatment)
शहरों से उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट जल (वाहित मल) को सीधे नदियों में नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि यह अत्यधिक प्रदूषित होता है। इसे साफ करने के लिए वाहित मल उपचार संयंत्रों (Sewage Treatment Plants – STPs) का उपयोग किया जाता है, जिसमें सूक्ष्मजीव एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
- प्रक्रिया: वायवीय (aerobic) और अवायवीय (anaerobic) दोनों प्रकार के जीवाणु और कवक, वाहित मल में मौजूद जटिल कार्बनिक पदार्थों को अपघटित (decompose) करके उन्हें सरल और कम हानिकारक पदार्थों में बदल देते हैं, जिससे पानी साफ हो जाता है।
4. बायोगैस के उत्पादन में (In Production of Biogas)
- बायोगैस: यह गैसों (मुख्य रूप से मीथेन – CH₄) का एक ज्वलनशील मिश्रण है जिसका उपयोग ईंधन (खाना पकाने और प्रकाश) के रूप में किया जाता है।
- सूक्ष्मजीव: यह अवायवीय जीवाणुओं (anaerobic bacteria) के एक समूह द्वारा उत्पन्न होती है, जिन्हें मेथैनोजन (Methanogens) कहते हैं।
- प्रक्रिया: ये जीवाणु पशुओं के गोबर और पौधों के अपशिष्टों में मौजूद सेल्यूलोज को अवायवीय परिस्थितियों में अपघटित करते हैं। इस प्रक्रिया में, मीथेन (CH₄), कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और कुछ मात्रा में हाइड्रोजन गैस निकलती है।
- यह प्रक्रिया एक बड़े टैंक में की जाती है जिसे बायोगैस संयंत्र (Biogas Plant) कहते हैं।
- लाभ: यह एक सस्ता और स्वच्छ ईंधन प्रदान करता है, और बचा हुआ पदार्थ (स्लरी) एक उत्कृष्ट जैविक खाद के रूप में उपयोग होता है।
खाद्य एवं पोषण (Food and Nutrition)
परिभाषा:
खाद्य (Food) कोई भी ऐसा पदार्थ है जिसे शरीर में ग्रहण करने पर वह ऊर्जा प्रदान करता है, शरीर की वृद्धि और मरम्मत करता है, तथा शरीर को रोगों से बचाता है।
पोषण (Nutrition) वह विज्ञान है जो भोजन, उसमें मौजूद पोषक तत्वों (nutrients) और अन्य पदार्थों के शरीर में अंतर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण, परिवहन, उपापचय और भंडारण की प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। यह भी अध्ययन करता है कि ये पोषक तत्व स्वास्थ्य और रोग को कैसे प्रभावित करते हैं।
संक्षेप में, “स्वस्थ रहने के लिए सही भोजन का सेवन करना ही पोषण है।”
पोषक तत्व (Nutrients)
भोजन में मौजूद वे रासायनिक घटक जो शरीर के विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यक होते हैं, पोषक तत्व कहलाते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है:
- वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients): इनकी शरीर को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। ये मुख्य रूप से ऊर्जा प्रदान करते हैं और शरीर की संरचना बनाते हैं।
- सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients): इनकी शरीर को अल्प मात्रा में आवश्यकता होती है, लेकिन ये शरीर की विभिन्न उपापचयी क्रियाओं और सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
1. वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients)
A) कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates):
- कार्य: ये शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले मुख्य स्रोत हैं। 1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट से लगभग 4 किलोकैलोरी (kcal) ऊर्जा मिलती है।
- प्रकार:
- सरल कार्बोहाइड्रेट (Simple Carbs): ये जल्दी पच जाते हैं और तुरंत ऊर्जा देते हैं (जैसे- ग्लूकोज, फ्रुक्टोज, सुक्रोज)।
- जटिल कार्बोहाइड्रेट (Complex Carbs): ये धीरे-धीरे पचते हैं और लंबे समय तक ऊर्जा देते हैं (जैसे- स्टार्च, फाइबर)।
- स्रोत: अनाज (गेहूँ, चावल, मक्का), आलू, चीनी, शहद, फल।
B) प्रोटीन (Proteins):
- कार्य:
- ये “शरीर के निर्माण खंड (Building Blocks of the Body)” कहलाते हैं।
- इनका मुख्य कार्य शरीर की वृद्धि (growth), मरम्मत (repair), और नई कोशिकाओं तथा ऊतकों का निर्माण करना है।
- एंजाइम, हार्मोन और एंटीबॉडी भी प्रोटीन से ही बने होते हैं।
- संरचनात्मक इकाई: ये अमीनो अम्लों (Amino Acids) से बने होते हैं।
- स्रोत: दालें, सोयाबीन, दूध और दूध से बने उत्पाद, अंडा, माँस, मछली।
C) वसा / लिपिड (Fats / Lipids):
- कार्य:
- ये ऊर्जा के सबसे सघन स्रोत हैं। 1 ग्राम वसा से लगभग 9 किलोकैलोरी (kcal) ऊर्जा मिलती है।
- ये शरीर में ऊर्जा का भंडारण करते हैं।
- ये वसा-घुलनशील विटामिन (A, D, E, K) के अवशोषण में मदद करते हैं।
- ये शरीर के अंगों को सुरक्षा प्रदान करते हैं और तापमान को नियंत्रित करते हैं।
- स्रोत: तेल, घी, मक्खन, नट्स, तैलीय बीज।
2. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)
A) विटामिन (Vitamins):
- कार्य: ये कार्बनिक यौगिक हैं जिनकी शरीर को सामान्य वृद्धि और उपापचय क्रियाओं के लिए अल्प मात्रा में आवश्यकता होती है।
- प्रकार और स्रोत:
- वसा-घुलनशील: विटामिन A, D, E, K (ये शरीर में संग्रहीत हो सकते हैं)।
- जल-घुलनशील: विटामिन B समूह और C (ये शरीर में संग्रहीत नहीं होते और इन्हें नियमित रूप से लेना पड़ता है)।
- स्रोत: फल, सब्जियाँ, दूध, अंडा, माँस।
B) खनिज लवण (Minerals):
- कार्य: ये अकार्बनिक तत्व हैं जो हड्डियों और दांतों के निर्माण, द्रव संतुलन, तंत्रिका तंत्र के कार्य, और कई एंजाइमों की क्रियाशीलता के लिए आवश्यक हैं।
- उदाहरण और स्रोत:
- कैल्शियम (Calcium): हड्डियाँ, दाँत (स्रोत: दूध, दही)।
- आयरन / लोहा (Iron): हीमोग्लोबिन का निर्माण (स्रोत: पालक, हरी सब्जियाँ, गुड़)।
- आयोडीन (Iodine): थायरॉइड हार्मोन का निर्माण (स्रोत: आयोडीन युक्त नमक, समुद्री भोजन)।
- सोडियम (Sodium), पोटैशियम (Potassium): द्रव संतुलन और तंत्रिका कार्य।
पोषण के अन्य महत्वपूर्ण घटक
1. जल (Water):
- कार्य:
- यह हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण घटक है (शरीर का लगभग 60-70% हिस्सा)।
- यह शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है।
- यह पोषक तत्वों और अपशिष्ट पदार्थों का परिवहन करता है।
- यह लगभग सभी उपापचयी क्रियाओं के लिए एक माध्यम प्रदान करता है।
- स्रोत: पीने का पानी, फल, सब्जियाँ, जूस।
2. फाइबर / आहारीय रेशे (Fibre / Dietary Roughage):
- कार्य:
- ये कार्बोहाइड्रेट का वह हिस्सा है जिसे शरीर पचा नहीं सकता।
- ये पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं और कब्ज (constipation) को रोकते हैं।
- ये भोजन में भारीपन लाते हैं, जिससे पेट भरा हुआ महसूस होता है।
- स्रोत: साबुत अनाज, दलिया, सब्जियाँ (जैसे गाजर, खीरा), फल (जैसे सेब)।
संतुलित आहार (Balanced Diet)
“वह आहार जिसमें शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज) सही और पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, संतुलित आहार कहलाता है।”
- एक संतुलित आहार व्यक्ति की आयु, लिंग और शारीरिक गतिविधि के स्तर पर निर्भर करता है।
- संतुलित आहार न केवल हमें स्वस्थ और ऊर्जावान रखता है, बल्कि हमें कई हीनताजन्य रोगों (Deficiency Diseases) और जीवनशैली से जुड़े रोगों (Lifestyle Diseases) जैसे मधुमेह, मोटापा और हृदय रोगों से भी बचाता है।
कुपोषण (Malnutrition):
आहार में पोषक तत्वों की कमी, अधिकता या असंतुलन की स्थिति को कुपोषण कहते हैं। प्रोटीन और ऊर्जा की कमी से बच्चों में क्वाशियोरकर (Kwashiorkor) और मरास्मस (Marasmus) जैसे गंभीर रोग हो जाते हैं।
जैव प्रौद्योगिकी: सिद्धांत एवं प्रक्रम (Biotechnology: Principles and Processes)
परिभाषा:
जैव प्रौद्योगिकी या बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology) विज्ञान की वह शाखा है जो सजीवों (living organisms) या उनसे प्राप्त एंजाइमों/प्रोटीनों (enzymes/proteins) का उपयोग करके मानव कल्याण के लिए उपयोगी उत्पादों (products) और प्रक्रमों (processes) को विकसित करने से संबंधित है।
यह एक व्यापक क्षेत्र है जिसमें पारंपरिक तकनीकें (जैसे- दही, पनीर बनाना) से लेकर आधुनिक आनुवंशिक इंजीनियरिंग तक शामिल हैं।
आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के सिद्धांत (Principles of Modern Biotechnology)
आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का जन्म दो प्रमुख तकनीकों के कारण हुआ:
1. आनुवंशिक इंजीनियरिंग या पुनर्योगज DNA तकनीक (Genetic Engineering or Recombinant DNA Technology):
- परिभाषा: यह वह तकनीक है जिसके द्वारा किसी भी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (DNA या RNA) के रसायन में कृत्रिम रूप से परिवर्तन करके, उसे मेजबान जीव (host organism) में प्रवेश कराया जाता है, ताकि मेजबान जीव के फीनोटाइप (लक्षण) में स्थायी परिवर्तन किया जा सके।
- अवधारणा:
- किसी एक जीव (जैसे मानव) से एक वांछित जीन (gene of interest) (जैसे इंसुलिन बनाने वाला जीन) को अलग करना।
- इस जीन को एक वाहक या वेक्टर (vector) (आमतौर पर एक जीवाणु का प्लाज्मिड – Plasmid) के DNA के साथ जोड़ना।
- इस प्रकार बने नए मिश्रित DNA, जिसे पुनर्योगज DNA (Recombinant DNA or r-DNA) कहते हैं, को एक मेजबान कोशिका (जैसे E. coli बैक्टीरिया) में डालना।
- अब यह मेजबान कोशिका जब विभाजित होती है, तो वह न केवल अपनी संख्या बढ़ाती है, बल्कि उस वांछित जीन की भी कई प्रतियाँ (cloning) बनाती है और उस जीन द्वारा कोडित उत्पाद (जैसे इंसुलिन) का भी उत्पादन करती है।
2. रासायनिक इंजीनियरिंग प्रक्रम (Chemical Engineering Processes):
- परिभाषा: इस तकनीक में रोगाणुरहित या विसंक्रमित (sterile or contamination-free) वातावरण बनाए रखा जाता है ताकि केवल वांछित सूक्ष्मजीव (desired microbe) या यूकैरियोटिक कोशिका की ही वृद्धि हो सके।
- उद्देश्य: एंटीबायोटिक्स, टीके, एंजाइम, या आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों जैसे उत्पादों का बड़े पैमाने पर (large-scale) और शुद्ध रूप में उत्पादन सुनिश्चित करना।
- उपकरण: इसके लिए बायोरिएक्टर (Bioreactors) जैसे बड़े बर्तनों का उपयोग किया जाता है, जिसमें तापमान, pH, लवण, ऑक्सीजन आदि को नियंत्रित किया जा सकता है।
पुनर्योगज DNA तकनीक के प्रक्रम/साधन (Processes/Tools of Recombinant DNA Technology)
r-DNA तकनीक को सफलतापूर्वक करने के लिए कुछ आवश्यक साधनों की जरूरत होती है:
1. वांछित जीन / विजातीय DNA (Gene of Interest / Foreign DNA):
यह DNA का वह खंड है जिसे हम क्लोन करना या अभिव्यक्त करना चाहते हैं (जैसे मानव इंसुलिन का जीन)।
2. प्रतिबंधन एंजाइम / “आणविक कैंचियाँ” (Restriction Enzymes / “Molecular Scissors”):
- कार्य: ये विशेष एंजाइम होते हैं जो DNA को विशिष्ट पहचान स्थलों (specific recognition sites) पर काटते हैं।
- ये बैक्टीरिया में स्वाभाविक रूप से पाए जाते हैं जहाँ ये वायरस के DNA को काटकर उन्हें नष्ट करने का काम करते हैं (रक्षा तंत्र)।
- r-DNA तकनीक में इनका उपयोग वांछित जीन को स्रोत DNA से काटने और प्लाज्मिड को खोलने के लिए किया जाता है।
- उदाहरण: EcoRI, Hind III।
3. संवाहक या वेक्टर (Cloning Vector):
- परिभाषा: यह DNA का एक छोटा अणु होता है जो स्वयं अपनी प्रतिकृति (replicate) बना सकता है। इसका उपयोग वांछित जीन को मेजबान कोशिका में ले जाने के लिए एक “वाहन” (vehicle) के रूप में किया जाता है।
- प्रमुख उदाहरण: प्लाज्मिड (Plasmids)। ये बैक्टीरिया में गुणसूत्रीय DNA के अलावा पाए जाने वाले छोटे, वृत्ताकार DNA अणु होते हैं।
4. लाइगेज एंजाइम / “आणविक गोंद” (Ligase Enzyme / “Molecular Glue”):
- कार्य: जब वांछित जीन को कटे हुए प्लाज्मिड के साथ रखा जाता है, तो यह एंजाइम उन दोनों के सिरों को स्थायी रूप से जोड़कर एक पूर्ण पुनर्योगज DNA का निर्माण करता है।
5. मेजबान जीव / कोशिका (Host Organism / Cell):
- यह वह कोशिका होती है जिसके अंदर पुनर्योगज DNA को प्रवेश कराया जाता है ताकि वह अपनी संख्या बढ़ा सके।
- सबसे आम मेजबान ई. कोलाई ( जीवाणु है क्योंकि यह बहुत तेजी से विभाजित होता है।
पुनर्योगज DNA तकनीक के चरण (Steps in r-DNA Technology)
- वांछित DNA खंड का विलगन (Isolation of the desired DNA fragment): स्रोत कोशिका से DNA को निकाला जाता है।
- DNA का खंडन (Fragmentation of DNA): प्रतिबंधन एंजाइम (restriction enzyme) का उपयोग करके स्रोत DNA और प्लाज्मिड वेक्टर दोनों को एक ही विशिष्ट स्थल पर काटा जाता है।
- DNA खंड को संवाहक से जोड़ना (Joining of DNA fragment to the vector): DNA लाइगेज (ligase) एंजाइम की मदद से वांछित जीन को कटे हुए प्लाज्मिड के साथ जोड़कर पुनर्योगज DNA (r-DNA) बनाया जाता है।
- पुनर्योगज DNA को मेजबान में स्थानांतरण (Transfer of r-DNA into the host): इस r-DNA को रूपांतरण (transformation) नामक प्रक्रिया द्वारा मेजबान कोशिका (E. coli) में प्रवेश कराया जाता है।
- मेजबान कोशिकाओं का संवर्धन (Culturing the host cells): इन रूपांतरित कोशिकाओं को पोषक माध्यम में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है (बायोरिएक्टर में), जहाँ वे तेजी से विभाजित होती हैं। प्रत्येक विभाजन के साथ, हमारा वांछित जीन भी अपनी प्रतिकृति बनाता है।
- वांछित उत्पाद का निष्कर्षण (Extraction of the desired product): यदि जीन का उद्देश्य किसी प्रोटीन (जैसे इंसुलिन) का उत्पादन करना है, तो उसे बायोरिएक्टर से निकालकर शुद्ध किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को अनुप्रवाह संसाधन (Downstream Processing) कहते हैं।
यह तकनीक जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांति लेकर आई, जिससे चिकित्सा, कृषि और उद्योग में अनेक संभावनाओं के द्वार खुल गए।
पुनर्योगज DNA तकनीक (Recombinant DNA Technology)
परिभाषा:
पुनर्योगज DNA तकनीक, जिसे आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) के रूप में भी जाना जाता है, जैव प्रौद्योगिकी की वह शक्तिशाली तकनीक है जिसमें दो अलग-अलग स्रोतों से लिए गए DNA खंडों (DNA fragments) को कृत्रिम रूप से जोड़कर एक नया, मिश्रित DNA अणु बनाया जाता है। इस नए बने DNA अणु को पुनर्योगज DNA (Recombinant DNA or r-DNA) कहते हैं।
इस तकनीक का मूल उद्देश्य किसी एक जीव के वांछित जीन (gene of interest) को निकालकर उसे दूसरे जीव में स्थानांतरित करना है, ताकि वह मेजबान जीव उस जीन के अनुसार लक्षण प्रदर्शित करे या कोई विशिष्ट उत्पाद (जैसे प्रोटीन) बनाए।
यह तकनीक विज्ञान को किसी जीव के जेनेटिक “ब्लूप्रिंट” को बदलने या उसमें हेरफेर करने की अनुमति देती है।
पुनर्योगज DNA तकनीक के मुख्य चरण (Key Steps in r-DNA Technology)
इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कई चरण होते हैं और इसके लिए कुछ विशेष जैविक साधनों (tools) की आवश्यकता होती है।
आवश्यक साधन (Required Tools):
- प्रतिबंधन एंजाइम (Restriction Enzymes): DNA को काटने वाली “आणविक कैंचियाँ”।
- DNA लाइगेज (DNA Ligase): DNA खंडों को जोड़ने वाला “आणविक गोंद”।
- संवाहक या वेक्टर (Vector): वांछित जीन को ले जाने वाला “वाहन”, आमतौर पर प्लाज्मिड।
- मेजबान कोशिका (Host Cell): वह कोशिका जिसमें r-DNA को डाला जाता है, आमतौर पर E. coli जैसा जीवाणु।
प्रक्रिया के चरण:
1. वांछित जीन की पहचान और विलगन (Identification and Isolation of Gene of Interest):
- लक्ष्य: सबसे पहले उस जीन की पहचान की जाती है जिसकी हमें आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, मानव की अग्नाशयी कोशिका से इंसुलिन बनाने वाला जीन।
- प्रक्रिया: स्रोत कोशिका (जैसे मानव कोशिका) से कुल DNA को निकाला जाता है।
2. जीन और वेक्टर को काटना (Cutting the Gene and the Vector):
- लक्ष्य: वांछित जीन को उसके मूल DNA से अलग करना और वेक्टर (प्लाज्मिड) में उसे जोड़ने के लिए जगह बनाना।
- प्रक्रिया:एक ही प्रकार के प्रतिबंधन एंजाइम (Same Restriction Enzyme) का उपयोग करके,
- (a) वांछित जीन को स्रोत DNA से काटा जाता है।
- (b) बैक्टीरिया से निकाले गए प्लाज्मिड (वेक्टर) को भी उसी एंजाइम से काटा जाता है ताकि वह खुल जाए।
- एक ही एंजाइम का उपयोग यह सुनिश्चित करता है कि दोनों कटे हुए सिरों पर “चिपचिपे सिरे” (sticky ends) बनें जो एक-दूसरे के पूरक (complementary) हों।
3. पुनर्योगज DNA (r-DNA) का निर्माण:
- लक्ष्य: वांछित जीन को खुले हुए प्लाज्मिड वेक्टर से जोड़ना।
- प्रक्रिया: कटे हुए जीन और कटे हुए प्लाज्मिड को एक साथ मिलाया जाता है। उनके चिपचिपे सिरे आपस में जुड़ जाते हैं।
- फिर, DNA लाइगेज एंजाइम को डाला जाता है, जो जीन और प्लाज्मिड के बीच स्थायी फॉस्फोडाइस्टर बंध बनाकर उन्हें एक साथ “सील” कर देता है। अब जो नया, वृत्ताकार DNA अणु बना है, उसे पुनर्योगज DNA (r-DNA) कहते हैं।
4. मेजबान कोशिका में स्थानांतरण (Transformation):
- लक्ष्य: इस नए बने r-DNA को एक मेजबान कोशिका (जैसे E. coli बैक्टीरिया) के अंदर डालना।
- प्रक्रिया: रूपांतरण (Transformation) नामक प्रक्रिया द्वारा, मेजबान बैक्टीरिया को पुनर्योगज प्लाज्मिड को अपने अंदर लेने के लिए सक्षम बनाया जाता है (जैसे कैल्शियम क्लोराइड उपचार द्वारा)।
5. जीन क्लोनिंग और उत्पाद प्राप्ति (Gene Cloning and Product Retrieval):
- लक्ष्य: वांछित जीन की लाखों प्रतियाँ बनाना और/या उससे संबंधित प्रोटीन प्राप्त करना।
- प्रक्रिया:
- क्लोनिंग: रूपांतरित बैक्टीरिया (जिसके अंदर r-DNA है) को एक पोषक माध्यम में रखा जाता है। यह बैक्टीरिया बहुत तेजी से विभाजित (multiply) होता है। हर बार जब बैक्टीरिया विभाजित होता है, तो उसके अंदर मौजूद r-DNA भी अपनी प्रतिकृति बनाता है। इस प्रकार, कुछ ही घंटों में वांछित जीन की अरबों प्रतियाँ (clones) बन जाती हैं।
- प्रोटीन उत्पादन: यदि वांछित जीन किसी प्रोटीन (जैसे इंसुलिन) के लिए कोड करता है, तो मेजबान बैक्टीरिया उस जीन को ‘पढ़ता’ है और उस प्रोटीन का निर्माण शुरू कर देता है।
- बड़े पैमाने पर उत्पादन: इस प्रक्रिया को बायोरिएक्टर (Bioreactor) नामक बड़े औद्योगिक बर्तनों में किया जाता है, जहाँ बैक्टीरिया की वृद्धि के लिए इष्टतम koşullar प्रदान की जाती हैं।
- उत्पाद का निष्कर्षण: अंत में, वांछित प्रोटीन (जैसे इंसुलिन) को बैक्टीरिया से निकालकर, उसे शुद्ध करके और संसाधित करके उपयोग के लिए तैयार किया जाता है।
पुनर्योगज DNA तकनीक के अनुप्रयोग (Applications of r-DNA Technology)
यह तकनीक विज्ञान के कई क्षेत्रों में क्रांति ला चुकी है:
- चिकित्सा (Medicine):
- आनुवंशिक रूप से इंजीनियर इंसुलिन: मधुमेह के रोगियों के लिए मानव इंसुलिन (Humulin) का व्यावसायिक उत्पादन।
- टीकों का उत्पादन: हेपेटाइटिस-B जैसे सुरक्षित और अधिक प्रभावी टीके।
- हार्मोन और वृद्धि कारक: मानव वृद्धि हार्मोन, इंटरफेरॉन आदि का उत्पादन।
- जीन थेरेपी: आनुवंशिक रोगों के इलाज का प्रयास।
- रोग निदान: HIV जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए PCR (पॉलिमरेज चेन रिएक्शन) जैसी तकनीकों का आधार।
- कृषि (Agriculture):
- आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें (Genetically Modified – GM Crops):
- कीट-प्रतिरोधी फसलें: जैसे बीटी-कपास (Bt-Cotton), जो कीटनाशकों की आवश्यकता को कम करता है।
- शाकनाशी-प्रतिरोधी फसलें: जो खरपतवारनाशकों के प्रति सहिष्णु होती हैं।
- पोषण में सुधार: जैसे गोल्डन राइस (Golden Rice), जो विटामिन-A से भरपूर होता है।
- फसलों की उत्पादकता और सूखे के प्रति सहनशीलता बढ़ाना।
- आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें (Genetically Modified – GM Crops):
- उद्योग (Industry):
- बड़े पैमाने पर एंजाइमों का उत्पादन (जैसे डिटर्जेंट, खाद्य प्रसंस्करण में)।
- जैव ईंधन (Biofuels) का उत्पादन।
- फोरेंसिक विज्ञान (Forensic Science):
- DNA फिंगरप्रिंटिंग: अपराधों की जाँच, पितृत्व परीक्षण, और पहचान स्थापित करने के लिए।
निष्कर्ष:
पुनर्योगज DNA तकनीक ने हमें जीवों के आनुवंशिक स्तर पर हेरफेर करने की अभूतपूर्व क्षमता प्रदान की है, जिससे मानव स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण के क्षेत्र में अनगिनत समस्याओं का समाधान संभव हो सका है।
जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग (Applications of Biotechnology)
जैव प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से पुनर्योगज DNA तकनीक (Recombinant DNA Technology), ने मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इसके सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली अनुप्रयोग कृषि और चिकित्सा के क्षेत्र में देखे गए हैं।
1. कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग (Biotechnology in Agriculture)
बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन को बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने उत्पादन बढ़ाया है, लेकिन उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी हैं। जैव प्रौद्योगिकी ने आनुवंशिक रूप से रूपांतरित फसलों (Genetically Modified Crops – GM Crops) का विकास करके एक स्थायी और प्रभावी समाधान प्रदान किया है।
आनुवंशिक रूप से रूपांतरित (GM) फसलें:
ये वे फसलें हैं जिनके DNA में बाहरी जीन (foreign gene) को प्रवेश कराकर उनके लक्षणों में सुधार किया गया है। GM फसलों को विकसित करने के मुख्य उद्देश्य हैं:
- अजैविक तनाव (सूखा, ठंड, लवणता) के प्रति अधिक सहिष्णु बनाना।
- रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करना।
- फसलों की पोषण गुणवत्ता में सुधार करना।
प्रमुख उदाहरण: बीटी-कपास (Bt-Cotton)
समस्या: कपास की फसल को बॉलवर्म (bollworm) नामक कीट लार्वा से बहुत अधिक नुकसान होता था, जिससे उत्पादन कम हो जाता था और किसानों को महंगे कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ता था।
समाधान – बीटी-कपास:
- स्रोत: वैज्ञानिकों ने बैसिलस थुरिंजिएंसिस (Bacillus thuringiensis) नामक एक जीवाणु (Bacteria) से एक विशेष जीन को अलग किया। इस जीवाणु में एक ऐसा जीन होता है जो एक विषाक्त प्रोटीन (toxic protein) बनाता है, जिसे क्राई प्रोटीन (Cry protein) कहते हैं। यह प्रोटीन कुछ कीटों के लिए घातक होता है।
- प्रक्रिया: पुनर्योगज DNA तकनीक का उपयोग करके, इस “क्राई जीन” को जीवाणु से निकालकर कपास के पौधे के DNA में डाल दिया गया।
- परिणाम: अब यह आनुवंशिक रूप से रूपांतरित कपास का पौधा, अपने आप अपनी कोशिकाओं में इस विषैले क्राई प्रोटीन का उत्पादन करने लगा।
- यह कैसे काम करता है:
- यह विष पौधे में निष्क्रिय प्रोटॉक्सिन (inactive protoxin) के रूप में मौजूद रहता है, इसलिए यह पौधे या अन्य जीवों के लिए हानिकारक नहीं होता।
- जब कोई बॉलवर्म कीट इस पौधे की पत्तियों या फल को खाता है, तो यह प्रोटॉक्सिन कीट की आंत (gut) में पहुँच जाता है।
- कीट की आंत का क्षारीय माध्यम (alkaline pH) इस प्रोटॉक्सिन को सक्रिय विष (active toxin) में बदल देता है।
- यह सक्रिय विष कीट की आंत की दीवारों में छेद (pores) कर देता है, जिससे कोशिकाएं सूजकर फट जाती हैं और अंततः कीट की मृत्यु हो जाती है।
- मनुष्य और अन्य जानवरों की आंत का माध्यम अम्लीय होता है, इसलिए यह विष उन पर कोई प्रभाव नहीं डालता।
लाभ:
- बीटी-कपास कीटों के प्रति प्रतिरोधी है, जिससे फसल की पैदावार बढ़ती है।
- इसने कीटनाशकों के उपयोग को काफी कम कर दिया है, जिससे पर्यावरण संरक्षण हुआ है और किसानों का खर्च बचा है।
अन्य उदाहरण: बीटी-मकई, बीटी-बैंगन, गोल्डन राइस (विटामिन-ए युक्त), टमाटर की “फ्लेवर सेवर” किस्म।
2. चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग (Biotechnology in Medicine)
चिकित्सा के क्षेत्र में, पुनर्योगज DNA तकनीक का उपयोग सुरक्षित, प्रभावी और बड़े पैमाने पर चिकित्सीय दवाओं और निदान के तरीकों को विकसित करने के लिए किया गया है।
प्रमुख उदाहरण: आनुवंशिक रूप से इंजीनियर इंसुलिन (Genetically Engineered Insulin)
समस्या: मधुमेह (Diabetes) एक ऐसी बीमारी है जिसमें अग्न्याशय पर्याप्त इंसुलिन (Insulin) का उत्पादन नहीं कर पाता। इंसुलिन एक हार्मोन है जो रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है। पहले, मधुमेह के रोगियों को जानवरों (जैसे सुअर और गाय) के अग्न्याशय से निकाले गए इंसुलिन के इंजेक्शन दिए जाते थे।
- इसकी कमियाँ:
- यह कुछ रोगियों में एलर्जी या अन्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं का कारण बनता था।
- यह महंगा था और इसकी आपूर्ति सीमित थी।
समाधान – पुनर्योगज मानव इंसुलिन (ह्युमुलिन – Humulin):
1983 में, एली लिली (Eli Lilly) नामक एक अमेरिकी कंपनी ने r-DNA तकनीक का उपयोग करके मानव इंसुलिन का उत्पादन करने में सफलता प्राप्त की।
- स्रोत: वैज्ञानिकों ने मानव अग्न्याशय की कोशिकाओं से इंसुलिन बनाने वाले जीन की पहचान की और उसे अलग किया।
- प्रक्रिया:
- इस इंसुलिन जीन को प्लाज्मिड (plasmid) वेक्टर में डाला गया।
- इस पुनर्योगज प्लाज्मिड को ई. कोलाई ( में प्रवेश कराया गया।
- उत्पादन: इन रूपांतरित बैक्टीरिया को बायोरिएक्टर (bioreactors) में बड़े पैमाने पर उगाया गया।
- परिणाम: अब ये बैक्टीरिया मानव इंसुलिन जीन को ‘पढ़कर’ ठीक मानव इंसुलिन (human insulin) जैसा ही प्रोटीन बनाने लगे। इस इंसुलिन को बैक्टीरिया से निकालकर शुद्ध किया गया और दवाओं के रूप में उपलब्ध कराया गया।
लाभ:
- यह पूरी तरह से मानव इंसुलिन है, इसलिए इससे एलर्जी होने का कोई खतरा नहीं है।
- इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सकता है, जिससे यह आसानी से उपलब्ध है।
- जानवरों पर निर्भरता खत्म हो गई।
अन्य चिकित्सीय अनुप्रयोग:
- जीन थेरेपी (Gene Therapy): आनुवंशिक रोगों (जैसे SCID) के इलाज के लिए दोषपूर्ण जीन को एक स्वस्थ जीन से बदलने का प्रयास।
- आणविक निदान (Molecular Diagnosis):
- PCR (पॉलिमरेज चेन रिएक्शन): DNA की बहुत छोटी मात्रा को बढ़ाकर किसी रोग (जैसे- HIV, कैंसर) का शुरुआती चरण में ही पता लगाना।
- ELISA (एलाइजा टेस्ट): एंटीजन-एंटीबॉडी की परस्पर क्रिया पर आधारित परीक्षण (जैसे- HIV का प्राथमिक परीक्षण)।
- पुनर्योगज टीके: हेपेटाइटिस-बी जैसे सुरक्षित टीकों का उत्पादन।
- कई अन्य दवाओं का उत्पादन, जैसे- वृद्धि हार्मोन, इंटरफेरॉन, रक्त स्कंदन कारक।