मानव कल्याण में जीव विज्ञान: खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति

बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, खाद्य उत्पादन में वृद्धि करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। जीव विज्ञान की तकनीकों ने इस चुनौती का सामना करने के लिए प्रभावी कार्यनीतियाँ प्रदान की हैं, जिनमें मुख्य रूप से पशुपालन और पादप प्रजनन शामिल हैं।


1. पशुपालन (Animal Husbandry)

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परिभाषा:
पशुपालन कृषि विज्ञान की वह शाखा है जिसमें भोजन, ऊन, श्रम और अन्य उत्पादों के लिए पशुधन (जैसे- गाय, भैंस, भेड़, बकरी, मुर्गी) के प्रजनन (breeding), पालन-पोषण (rearing) और देखभाल (care) का वैज्ञानिक अध्ययन और प्रबंधन किया जाता है।

उद्देश्य: दूध, अंडे, मांस और ऊन जैसे पशु उत्पादों की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार करना।

प्रमुख क्षेत्र और कार्यनीतियाँ:

A) डेयरी फार्म प्रबंधन (Dairy Farm Management):
यह दूध और दुग्ध उत्पादों के लिए दुधारू पशुओं का प्रबंधन है।

B) कुक्कुट (मुर्गी) फार्म प्रबंधन (Poultry Farm Management):
यह अंडे और मांस के लिए पालतू कुक्कुटों (जैसे- मुर्गी, बत्तख, टर्की) का प्रबंधन है।

C) पशु प्रजनन (Animal Breeding):
यह पशुपालन का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसका उद्देश्य पशुओं के आनुवंशिक गुणों में सुधार करके उनकी उपज और गुणवत्ता को बढ़ाना है।

D) मधुमक्खी पालन (Apiculture or Beekeeping):
शहद और मोम के व्यावसायिक उत्पादन के लिए मधुमक्खियों का पालन करना। शहद एक उच्च पौष्टिक आहार है और पारंपरिक चिकित्सा में भी इसका उपयोग होता है।

E) मत्स्यकी (Fisheries):
मछली और अन्य जलीय जीवों (जैसे- झींगा, केकड़ा) को पकड़ना, पालना, और बेचना। नीली क्रांति (Blue Revolution) का संबंध इसी क्षेत्र से है।


2. पादप प्रजनन (Plant Breeding)

परिभाषा:
पादप प्रजनन एक विज्ञान है जिसके द्वारा पादपों की आनुवंशिक संरचना में उद्देश्यपूर्ण तरीके से परिवर्तन करके उन्हें मानव उपयोग के लिए अधिक उपयुक्त बनाया जाता है, ताकि वांछित लक्षण (जैसे- उच्च उपज, रोग प्रतिरोधकता, बेहतर गुणवत्ता) प्राप्त किए जा सकें।

हरित क्रांति (Green Revolution) में पादप प्रजनन की तकनीकों का बहुत बड़ा योगदान था, जिससे गेहूँ और चावल के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

पादप प्रजनन के मुख्य चरण (Main Steps of Plant Breeding):

  1. विभिन्नता का संग्रहण (Collection of Variability):
    • किसी भी प्रजनन कार्यक्रम का आधार आनुवंशिक विभिन्नता है। इसके लिए, किसी फसल की सभी जंगली किस्मों, प्रजातियों और संबंधित प्रजातियों से जनक प्लाज्मा (Germplasm) का संग्रह किया जाता है।
  2. जनकों का मूल्यांकन तथा चयन (Evaluation and Selection of Parents):
    • एकत्रित किए गए जर्मप्लाज्म का मूल्यांकन करके वांछित लक्षणों वाले पौधों को जनक (parents) के रूप में चुना जाता है।
  3. चयनित जनकों के बीच संकरण (Cross Hybridization among Selected Parents):
    • वांछित लक्षणों (जैसे- एक जनक से उच्च उपज और दूसरे से रोग प्रतिरोधकता) को एक ही पौधे में लाने के लिए चयनित जनकों के बीच कृत्रिम परागण कराया जाता है।
    • यह एक समय लेने वाली और कठिन प्रक्रिया है।
  4. श्रेष्ठ पुनर्योगजों का चयन और परीक्षण (Selection and Testing of Superior Recombinants):
    • संकरण से उत्पन्न संतानों में से उन पौधों का चयन किया जाता है जिनमें दोनों जनकों के वांछित गुणों का संयोजन होता है।
    • यह प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है और इसमें वैज्ञानिक मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।
  5. नए کشتوں (cultivars) का परीक्षण, निर्मुक्ति तथा व्यापारीकरण (Testing, Release and Commercialization of New Cultivars):
    • चयनित पौधों को अनुसंधान क्षेत्रों में उगाया जाता है और उनकी उपज तथा अन्य गुणों का मूल्यांकन किया जाता है।
    • इसके बाद, इन्हें कम से कम तीन ऋतुओं तक पूरे देश में किसानों के खेतों में अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में परीक्षण के लिए उगाया जाता है।
    • सफल परीक्षण के बाद, इन उन्नत किस्मों को खेती के लिए जारी कर दिया जाता है।

पादप प्रजनन की सफलताएँ:


मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव (Microbes in Human Welfare)

सूक्ष्मजीव (Microbes) वे जीव हैं जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता और उन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है। इनमें जीवाणु (Bacteria), कवक (Fungi), प्रोटोजोआ (Protozoa) और सूक्ष्म विषाणु (Viruses) शामिल हैं।

हालांकि कुछ सूक्ष्मजीव मनुष्यों में रोग उत्पन्न करते हैं, लेकिन अधिकांश सूक्ष्मजीव हमारे लिए और पर्यावरण के लिए अत्यंत लाभदायक होते हैं। वे हमारे दैनिक जीवन के कई पहलुओं, जैसे भोजन, दवा और उद्योग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


1. घरेलू उत्पादों में सूक्ष्मजीव (Microbes in Household Products)

  1. दही (Curd):
    • सूक्ष्मजीव: लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) नामक जीवाणु, जिसे लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया (LAB) भी कहा जाता है।
    • प्रक्रिया: जब दूध में थोड़ी मात्रा में जामन (जिसमें लाखों LAB होते हैं) मिलाया जाता है, तो ये जीवाणु दूध में वृद्धि करते हैं। वे लैक्टोज (lactose) शर्करा को लैक्टिक एसिड (lactic acid) में बदल देते हैं।
    • परिणाम: लैक्टिक एसिड दूध के प्रोटीन (कैसिइन) को स्कंदित (coagulate) और आंशिक रूप से पचा देता है, जिससे दूध दही में बदल जाता है। दही में विटामिन B₁₂ की मात्रा भी बढ़ जाती है।
  2. चीज (Cheese):
    • यह सबसे पुराने खाद्य पदार्थों में से एक है जिसे सूक्ष्मजीवों की मदद से बनाया जाता है।
    • अलग-अलग प्रकार के चीज की विशिष्ट बनावट, स्वाद और सुगंध उनमें उपयोग किए गए विशिष्ट कवक या जीवाणु पर निर्भर करती है।
      • स्विस चीज (Swiss cheese): इसमें बड़े-बड़े छेद प्रोपिओनीबैक्टीरियम शारमैनाई नामक जीवाणु द्वारा उत्पन्न CO₂ के कारण होते हैं।
      • रोकफोर्ट चीज (Roquefort cheese): एक विशिष्ट कवक द्वारा पकाया जाता है।
  3. इडली और डोसा (Idli and Dosa):
    • चावल और दाल के मिश्रण से बना खमीरीकृत आटा बैक्टीरिया द्वारा किण्वित (fermented) होता है, जिससे CO₂ गैस उत्पन्न होती है और आटा फूल जाता है।
  4. ब्रेड (Bread):
    • सूक्ष्मजीव: सैकैरोमाइसीज सेरेविसी (Saccharomyces cerevisiae) नामक खमीर या यीस्ट (Yeast)
    • प्रक्रिया: गुंथे हुए आटे में यीस्ट मिलाया जाता है। यीस्ट आटे में किण्वन करता है और CO₂ गैस का उत्पादन करता है।
    • परिणाम: CO₂ के बुलबुले आटे को फुला देते हैं, जिससे ब्रेड स्पंजी और नरम बनती है। इसी यीस्ट को ‘बेकर्स यीस्ट’ (Baker’s yeast) कहते हैं।

2. औद्योगिक उत्पादों में सूक्ष्मजीव (Microbes in Industrial Products)

सूक्ष्मजीवों को बड़े बर्तनों, जिन्हें किण्वक या फरमेंटर (fermenters) कहते हैं, में उगाकर बड़े पैमाने पर कई औद्योगिक उत्पादों का उत्पादन किया जाता है।

  1. किण्वित पेय पदार्थ (Fermented Beverages):
    • सूक्ष्मजीव: सैकैरोमाइसीज सेरेविसी यीस्ट, जिसे ‘ब्रूअर्स यीस्ट’ (Brewer’s yeast) भी कहा जाता है।
    • प्रक्रिया: यह यीस्ट फलों के रस और माल्टेड अनाज में मौजूद शर्करा को किण्वित करके इथेनॉल (Ethanol) में बदल देता है।
    • उत्पाद:
      • बिना आसवन के (Without distillation): बीयर और वाइन।
      • आसवन के बाद (After distillation): व्हिस्की, ब्रांडी, रम (इनमें अल्कोहल की सांद्रता अधिक होती है)।
  2. प्रतिजैविक या एंटीबायोटिक्स (Antibiotics):
    • परिभाषा: एंटीबायोटिक्स वे रासायनिक पदार्थ हैं जो कुछ सूक्ष्मजीवों (जैसे कवक) द्वारा उत्पन्न होते हैं और अन्य रोगजनक सूक्ष्मजीवों (जैसे बैक्टीरिया) की वृद्धि को रोकते हैं या उन्हें मार देते हैं।
    • खोज: पहली एंटीबायोटिक, पेनिसिलिन (Penicillin), की खोज अलेक्जेंडर फ्लेमिंग (Alexander Fleming) ने 1928 में पेनिसिलियम नोटेटम (Penicillium notatum) नामक कवक से की थी।
    • यह 20वीं सदी की एक युगांतकारी खोज थी जिसने लाखों लोगों की जान बचाई।
    • अन्य उदाहरण: स्ट्रेप्टोमाइसिन, टेट्रासाइक्लिन (जो विभिन्न जीवाणुओं से प्राप्त होते हैं)।
  3. रसायन, एंजाइम और जैव-सक्रिय अणु (Chemicals, Enzymes and Bioactive Molecules):
    • कार्बनिक अम्ल (Organic Acids):
      • सिट्रिक अम्ल: एस्परजिलस नाइजर (कवक)।
      • एसिटिक अम्ल (सिरका): एसिटोबैक्टर एसिटाई (जीवाणु)।
    • एंजाइम (Enzymes):
      • लाइपेज (Lipases): डिटर्जेंट में तेल के दाग हटाने के लिए।
      • प्रोटिएज और पेक्टिनेज: बोतलबंद जूस को साफ करने के लिए।
    • जैव-सक्रिय अणु (Bioactive Molecules):
      • साइक्लोस्पोरिन-ए (Cyclosporin A): यह ट्राइकोडर्मा पॉलीस्पोरम कवक से प्राप्त होता है। इसका उपयोग अंग प्रत्यारोपण (organ transplant) में एक प्रतिरक्षा-निरोधक कारक (immunosuppressive agent) के रूप में किया जाता है ताकि शरीर नए अंग को अस्वीकार न करे।
      • स्टैटिन (Statins): यह मोनॉस्कस परप्यूरीअस यीस्ट से प्राप्त होता है। इसका उपयोग रक्त-कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाले कारक के रूप में किया जाता है।

3. वाहित मल उपचार (Sewage Treatment)

शहरों से उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट जल (वाहित मल) को सीधे नदियों में नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि यह अत्यधिक प्रदूषित होता है। इसे साफ करने के लिए वाहित मल उपचार संयंत्रों (Sewage Treatment Plants – STPs) का उपयोग किया जाता है, जिसमें सूक्ष्मजीव एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं।


4. बायोगैस के उत्पादन में (In Production of Biogas)


खाद्य एवं पोषण (Food and Nutrition)

परिभाषा:
खाद्य (Food) कोई भी ऐसा पदार्थ है जिसे शरीर में ग्रहण करने पर वह ऊर्जा प्रदान करता है, शरीर की वृद्धि और मरम्मत करता है, तथा शरीर को रोगों से बचाता है।

पोषण (Nutrition) वह विज्ञान है जो भोजन, उसमें मौजूद पोषक तत्वों (nutrients) और अन्य पदार्थों के शरीर में अंतर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण, परिवहन, उपापचय और भंडारण की प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। यह भी अध्ययन करता है कि ये पोषक तत्व स्वास्थ्य और रोग को कैसे प्रभावित करते हैं।

संक्षेप में, “स्वस्थ रहने के लिए सही भोजन का सेवन करना ही पोषण है।”


पोषक तत्व (Nutrients)

भोजन में मौजूद वे रासायनिक घटक जो शरीर के विभिन्न कार्यों के लिए आवश्यक होते हैं, पोषक तत्व कहलाते हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients): इनकी शरीर को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। ये मुख्य रूप से ऊर्जा प्रदान करते हैं और शरीर की संरचना बनाते हैं।
  2. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients): इनकी शरीर को अल्प मात्रा में आवश्यकता होती है, लेकिन ये शरीर की विभिन्न उपापचयी क्रियाओं और सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

1. वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients)

A) कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates):

B) प्रोटीन (Proteins):

C) वसा / लिपिड (Fats / Lipids):

2. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)

A) विटामिन (Vitamins):

B) खनिज लवण (Minerals):


पोषण के अन्य महत्वपूर्ण घटक

1. जल (Water):

2. फाइबर / आहारीय रेशे (Fibre / Dietary Roughage):


संतुलित आहार (Balanced Diet)

“वह आहार जिसमें शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज) सही और पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों, संतुलित आहार कहलाता है।”

कुपोषण (Malnutrition):
आहार में पोषक तत्वों की कमी, अधिकता या असंतुलन की स्थिति को कुपोषण कहते हैं। प्रोटीन और ऊर्जा की कमी से बच्चों में क्वाशियोरकर (Kwashiorkor) और मरास्मस (Marasmus) जैसे गंभीर रोग हो जाते हैं।


जैव प्रौद्योगिकी: सिद्धांत एवं प्रक्रम (Biotechnology: Principles and Processes)

परिभाषा:
जैव प्रौद्योगिकी या बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology) विज्ञान की वह शाखा है जो सजीवों (living organisms) या उनसे प्राप्त एंजाइमों/प्रोटीनों (enzymes/proteins) का उपयोग करके मानव कल्याण के लिए उपयोगी उत्पादों (products) और प्रक्रमों (processes) को विकसित करने से संबंधित है।

यह एक व्यापक क्षेत्र है जिसमें पारंपरिक तकनीकें (जैसे- दही, पनीर बनाना) से लेकर आधुनिक आनुवंशिक इंजीनियरिंग तक शामिल हैं।


आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के सिद्धांत (Principles of Modern Biotechnology)

आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का जन्म दो प्रमुख तकनीकों के कारण हुआ:

1. आनुवंशिक इंजीनियरिंग या पुनर्योगज DNA तकनीक (Genetic Engineering or Recombinant DNA Technology):

2. रासायनिक इंजीनियरिंग प्रक्रम (Chemical Engineering Processes):


पुनर्योगज DNA तकनीक के प्रक्रम/साधन (Processes/Tools of Recombinant DNA Technology)

r-DNA तकनीक को सफलतापूर्वक करने के लिए कुछ आवश्यक साधनों की जरूरत होती है:

1. वांछित जीन / विजातीय DNA (Gene of Interest / Foreign DNA):

यह DNA का वह खंड है जिसे हम क्लोन करना या अभिव्यक्त करना चाहते हैं (जैसे मानव इंसुलिन का जीन)।

2. प्रतिबंधन एंजाइम / “आणविक कैंचियाँ” (Restriction Enzymes / “Molecular Scissors”):

3. संवाहक या वेक्टर (Cloning Vector):

4. लाइगेज एंजाइम / “आणविक गोंद” (Ligase Enzyme / “Molecular Glue”):

5. मेजबान जीव / कोशिका (Host Organism / Cell):


पुनर्योगज DNA तकनीक के चरण (Steps in r-DNA Technology)

  1. वांछित DNA खंड का विलगन (Isolation of the desired DNA fragment): स्रोत कोशिका से DNA को निकाला जाता है।
  2. DNA का खंडन (Fragmentation of DNA): प्रतिबंधन एंजाइम (restriction enzyme) का उपयोग करके स्रोत DNA और प्लाज्मिड वेक्टर दोनों को एक ही विशिष्ट स्थल पर काटा जाता है।
  3. DNA खंड को संवाहक से जोड़ना (Joining of DNA fragment to the vector): DNA लाइगेज (ligase) एंजाइम की मदद से वांछित जीन को कटे हुए प्लाज्मिड के साथ जोड़कर पुनर्योगज DNA (r-DNA) बनाया जाता है।
  4. पुनर्योगज DNA को मेजबान में स्थानांतरण (Transfer of r-DNA into the host): इस r-DNA को रूपांतरण (transformation) नामक प्रक्रिया द्वारा मेजबान कोशिका (E. coli) में प्रवेश कराया जाता है।
  5. मेजबान कोशिकाओं का संवर्धन (Culturing the host cells): इन रूपांतरित कोशिकाओं को पोषक माध्यम में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है (बायोरिएक्टर में), जहाँ वे तेजी से विभाजित होती हैं। प्रत्येक विभाजन के साथ, हमारा वांछित जीन भी अपनी प्रतिकृति बनाता है।
  6. वांछित उत्पाद का निष्कर्षण (Extraction of the desired product): यदि जीन का उद्देश्य किसी प्रोटीन (जैसे इंसुलिन) का उत्पादन करना है, तो उसे बायोरिएक्टर से निकालकर शुद्ध किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को अनुप्रवाह संसाधन (Downstream Processing) कहते हैं।

यह तकनीक जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक क्रांति लेकर आई, जिससे चिकित्सा, कृषि और उद्योग में अनेक संभावनाओं के द्वार खुल गए।


पुनर्योगज DNA तकनीक (Recombinant DNA Technology)

परिभाषा:
पुनर्योगज DNA तकनीक, जिसे आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) के रूप में भी जाना जाता है, जैव प्रौद्योगिकी की वह शक्तिशाली तकनीक है जिसमें दो अलग-अलग स्रोतों से लिए गए DNA खंडों (DNA fragments) को कृत्रिम रूप से जोड़कर एक नया, मिश्रित DNA अणु बनाया जाता है। इस नए बने DNA अणु को पुनर्योगज DNA (Recombinant DNA or r-DNA) कहते हैं।

इस तकनीक का मूल उद्देश्य किसी एक जीव के वांछित जीन (gene of interest) को निकालकर उसे दूसरे जीव में स्थानांतरित करना है, ताकि वह मेजबान जीव उस जीन के अनुसार लक्षण प्रदर्शित करे या कोई विशिष्ट उत्पाद (जैसे प्रोटीन) बनाए।

यह तकनीक विज्ञान को किसी जीव के जेनेटिक “ब्लूप्रिंट” को बदलने या उसमें हेरफेर करने की अनुमति देती है।


पुनर्योगज DNA तकनीक के मुख्य चरण (Key Steps in r-DNA Technology)

इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कई चरण होते हैं और इसके लिए कुछ विशेष जैविक साधनों (tools) की आवश्यकता होती है।

आवश्यक साधन (Required Tools):

  1. प्रतिबंधन एंजाइम (Restriction Enzymes): DNA को काटने वाली “आणविक कैंचियाँ”।
  2. DNA लाइगेज (DNA Ligase): DNA खंडों को जोड़ने वाला “आणविक गोंद”।
  3. संवाहक या वेक्टर (Vector): वांछित जीन को ले जाने वाला “वाहन”, आमतौर पर प्लाज्मिड
  4. मेजबान कोशिका (Host Cell): वह कोशिका जिसमें r-DNA को डाला जाता है, आमतौर पर E. coli जैसा जीवाणु।

प्रक्रिया के चरण:

1. वांछित जीन की पहचान और विलगन (Identification and Isolation of Gene of Interest):

2. जीन और वेक्टर को काटना (Cutting the Gene and the Vector):

3. पुनर्योगज DNA (r-DNA) का निर्माण:

4. मेजबान कोशिका में स्थानांतरण (Transformation):

5. जीन क्लोनिंग और उत्पाद प्राप्ति (Gene Cloning and Product Retrieval):


पुनर्योगज DNA तकनीक के अनुप्रयोग (Applications of r-DNA Technology)

यह तकनीक विज्ञान के कई क्षेत्रों में क्रांति ला चुकी है:

  1. चिकित्सा (Medicine):
    • आनुवंशिक रूप से इंजीनियर इंसुलिन: मधुमेह के रोगियों के लिए मानव इंसुलिन (Humulin) का व्यावसायिक उत्पादन।
    • टीकों का उत्पादन: हेपेटाइटिस-B जैसे सुरक्षित और अधिक प्रभावी टीके।
    • हार्मोन और वृद्धि कारक: मानव वृद्धि हार्मोन, इंटरफेरॉन आदि का उत्पादन।
    • जीन थेरेपी: आनुवंशिक रोगों के इलाज का प्रयास।
    • रोग निदान: HIV जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए PCR (पॉलिमरेज चेन रिएक्शन) जैसी तकनीकों का आधार।
  2. कृषि (Agriculture):
    • आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें (Genetically Modified – GM Crops):
      • कीट-प्रतिरोधी फसलें: जैसे बीटी-कपास (Bt-Cotton), जो कीटनाशकों की आवश्यकता को कम करता है।
      • शाकनाशी-प्रतिरोधी फसलें: जो खरपतवारनाशकों के प्रति सहिष्णु होती हैं।
      • पोषण में सुधार: जैसे गोल्डन राइस (Golden Rice), जो विटामिन-A से भरपूर होता है।
    • फसलों की उत्पादकता और सूखे के प्रति सहनशीलता बढ़ाना।
  3. उद्योग (Industry):
    • बड़े पैमाने पर एंजाइमों का उत्पादन (जैसे डिटर्जेंट, खाद्य प्रसंस्करण में)।
    • जैव ईंधन (Biofuels) का उत्पादन।
  4. फोरेंसिक विज्ञान (Forensic Science):
    • DNA फिंगरप्रिंटिंग: अपराधों की जाँच, पितृत्व परीक्षण, और पहचान स्थापित करने के लिए।

निष्कर्ष:
पुनर्योगज DNA तकनीक ने हमें जीवों के आनुवंशिक स्तर पर हेरफेर करने की अभूतपूर्व क्षमता प्रदान की है, जिससे मानव स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण के क्षेत्र में अनगिनत समस्याओं का समाधान संभव हो सका है।


जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग (Applications of Biotechnology)

जैव प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से पुनर्योगज DNA तकनीक (Recombinant DNA Technology), ने मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इसके सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली अनुप्रयोग कृषि और चिकित्सा के क्षेत्र में देखे गए हैं।


1. कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग (Biotechnology in Agriculture)

बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन को बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने उत्पादन बढ़ाया है, लेकिन उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी हैं। जैव प्रौद्योगिकी ने आनुवंशिक रूप से रूपांतरित फसलों (Genetically Modified Crops – GM Crops) का विकास करके एक स्थायी और प्रभावी समाधान प्रदान किया है।

आनुवंशिक रूप से रूपांतरित (GM) फसलें:

ये वे फसलें हैं जिनके DNA में बाहरी जीन (foreign gene) को प्रवेश कराकर उनके लक्षणों में सुधार किया गया है। GM फसलों को विकसित करने के मुख्य उद्देश्य हैं:

प्रमुख उदाहरण: बीटी-कपास (Bt-Cotton)

समस्या: कपास की फसल को बॉलवर्म (bollworm) नामक कीट लार्वा से बहुत अधिक नुकसान होता था, जिससे उत्पादन कम हो जाता था और किसानों को महंगे कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ता था।

समाधान – बीटी-कपास:

  1. स्रोत: वैज्ञानिकों ने बैसिलस थुरिंजिएंसिस (Bacillus thuringiensis) नामक एक जीवाणु (Bacteria) से एक विशेष जीन को अलग किया। इस जीवाणु में एक ऐसा जीन होता है जो एक विषाक्त प्रोटीन (toxic protein) बनाता है, जिसे क्राई प्रोटीन (Cry protein) कहते हैं। यह प्रोटीन कुछ कीटों के लिए घातक होता है।
  2. प्रक्रिया: पुनर्योगज DNA तकनीक का उपयोग करके, इस “क्राई जीन” को जीवाणु से निकालकर कपास के पौधे के DNA में डाल दिया गया
  3. परिणाम: अब यह आनुवंशिक रूप से रूपांतरित कपास का पौधा, अपने आप अपनी कोशिकाओं में इस विषैले क्राई प्रोटीन का उत्पादन करने लगा
  4. यह कैसे काम करता है:
    • यह विष पौधे में निष्क्रिय प्रोटॉक्सिन (inactive protoxin) के रूप में मौजूद रहता है, इसलिए यह पौधे या अन्य जीवों के लिए हानिकारक नहीं होता।
    • जब कोई बॉलवर्म कीट इस पौधे की पत्तियों या फल को खाता है, तो यह प्रोटॉक्सिन कीट की आंत (gut) में पहुँच जाता है।
    • कीट की आंत का क्षारीय माध्यम (alkaline pH) इस प्रोटॉक्सिन को सक्रिय विष (active toxin) में बदल देता है।
    • यह सक्रिय विष कीट की आंत की दीवारों में छेद (pores) कर देता है, जिससे कोशिकाएं सूजकर फट जाती हैं और अंततः कीट की मृत्यु हो जाती है
    • मनुष्य और अन्य जानवरों की आंत का माध्यम अम्लीय होता है, इसलिए यह विष उन पर कोई प्रभाव नहीं डालता।

लाभ:

अन्य उदाहरण: बीटी-मकई, बीटी-बैंगन, गोल्डन राइस (विटामिन-ए युक्त), टमाटर की “फ्लेवर सेवर” किस्म।


2. चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग (Biotechnology in Medicine)

चिकित्सा के क्षेत्र में, पुनर्योगज DNA तकनीक का उपयोग सुरक्षित, प्रभावी और बड़े पैमाने पर चिकित्सीय दवाओं और निदान के तरीकों को विकसित करने के लिए किया गया है।

प्रमुख उदाहरण: आनुवंशिक रूप से इंजीनियर इंसुलिन (Genetically Engineered Insulin)

समस्या: मधुमेह (Diabetes) एक ऐसी बीमारी है जिसमें अग्न्याशय पर्याप्त इंसुलिन (Insulin) का उत्पादन नहीं कर पाता। इंसुलिन एक हार्मोन है जो रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है। पहले, मधुमेह के रोगियों को जानवरों (जैसे सुअर और गाय) के अग्न्याशय से निकाले गए इंसुलिन के इंजेक्शन दिए जाते थे।

समाधान – पुनर्योगज मानव इंसुलिन (ह्युमुलिन – Humulin):
1983 में, एली लिली (Eli Lilly) नामक एक अमेरिकी कंपनी ने r-DNA तकनीक का उपयोग करके मानव इंसुलिन का उत्पादन करने में सफलता प्राप्त की।

  1. स्रोत: वैज्ञानिकों ने मानव अग्न्याशय की कोशिकाओं से इंसुलिन बनाने वाले जीन की पहचान की और उसे अलग किया।
  2. प्रक्रिया:
    • इस इंसुलिन जीन को प्लाज्मिड (plasmid) वेक्टर में डाला गया।
    • इस पुनर्योगज प्लाज्मिड को ई. कोलाई ( में प्रवेश कराया गया।
  3. उत्पादन: इन रूपांतरित बैक्टीरिया को बायोरिएक्टर (bioreactors) में बड़े पैमाने पर उगाया गया।
  4. परिणाम: अब ये बैक्टीरिया मानव इंसुलिन जीन को ‘पढ़कर’ ठीक मानव इंसुलिन (human insulin) जैसा ही प्रोटीन बनाने लगे। इस इंसुलिन को बैक्टीरिया से निकालकर शुद्ध किया गया और दवाओं के रूप में उपलब्ध कराया गया।

लाभ:

अन्य चिकित्सीय अनुप्रयोग: