आनुवंशिकी तथा विकास (Genetics and Evolution)

आनुवंशिकी (Genetics): जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत आनुवंशिकता (Heredity) और विभिन्नता (Variation) का अध्ययन किया जाता है।

जैव विकास (Evolution): समय के साथ किसी जीव की आबादी में आनुवंशिक लक्षणों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाले क्रमिक परिवर्तन को जैव विकास कहते हैं, जिससे नई प्रजातियों का जन्म होता है।

ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor Johann Mendel) को उनके मटर के पौधों पर किए गए अभूतपूर्व कार्यों के लिए “आनुवंशिकी का जनक” (Father of Genetics) कहा जाता है। उन्होंने सबसे पहले आनुवंशिकता के मूल सिद्धांतों की व्याख्या की।


मेंडल के वंशानुगति के नियम (Mendel’s Laws of Inheritance)

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मेंडल ने बगीचे में उगने वाले मटर के पौधे (Pisum sativum) पर सात वर्षों (1856-1863) तक संकरण (hybridization) के प्रयोग किए। उन्होंने मटर के पौधे को इसलिए चुना क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध था, इसका जीवन चक्र छोटा था, और इसमें कई स्पष्ट रूप से भिन्न दिखने वाले लक्षण (जैसे- लंबा/बौना पौधा, गोल/झुर्रीदार बीज) थे।

इन प्रयोगों के आधार पर, मेंडल ने वंशानुगति के तीन मूलभूत नियम दिए।

1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)

नियम का कथन:

“जब दो विपरीत (contrasting) लक्षणों वाले शुद्ध जनकों (pure parents) के बीच संकरण कराया जाता है, तो पहली पीढ़ी (F₁ generation) में संतानों में केवल एक ही लक्षण प्रकट होता है। जो लक्षण प्रकट होता है उसे प्रभावी लक्षण (dominant trait) कहते हैं, और जो लक्षण छिपा रहता है या प्रकट नहीं होता, उसे अप्रभावी लक्षण (recessive trait) कहते हैं।”

महत्व:
यह नियम बताता है कि कुछ लक्षण दूसरों पर हावी हो सकते हैं, भले ही संतान में दोनों लक्षणों के लिए कारक (जीन) मौजूद हों।

2. पृथक्करण या विसंयोजन का नियम (Law of Segregation)

इस नियम को “युग्मकों की शुद्धता का नियम” (Law of Purity of Gametes) भी कहा जाता है। यह मेंडल का पहला और सार्वभौमिक नियम है।

नियम का कथन:

“प्रत्येक जीव में एक लक्षण को नियंत्रित करने के लिए कारकों (जीन) का एक जोड़ा (pair) होता है। युग्मक (gametes) निर्माण के समय, यह दोनों कारक एक-दूसरे से पृथक (segregate) हो जाते हैं और प्रत्येक युग्मक में जोड़े में से केवल एक ही कारक पहुँचता है।”

महत्व:
यह नियम आनुवंशिक लक्षणों के अगली पीढ़ी में स्थानांतरण की मूल क्रियाविधि को समझाता है।

3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)

यह नियम द्विसंकर संकरण (dihybrid cross) पर आधारित है, जिसमें दो जोड़ी विपरीत लक्षणों की वंशानुगति का एक साथ अध्ययन किया जाता है।

नियम का कथन:

“जब दो या दो से अधिक लक्षणों की वंशानुगति एक साथ होती है, तो प्रत्येक लक्षण के कारक (जीन) की वंशानुगति, दूसरे लक्षण के कारक की वंशानुगति से स्वतंत्र होती है।”

महत्व:
यह नियम बताता है कि लक्षणों के विभिन्न संयोजन (combinations) कैसे बनते हैं, जिससे संतानों में विभिन्नता उत्पन्न होती है। (हालांकि, यह नियम केवल उन जीनों पर लागू होता है जो अलग-अलग गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं। एक ही गुणसूत्र पर स्थित जीन अक्सर एक साथ वंशानुगत होते हैं, जिसे ‘सहलग्नता’ या ‘लिंकेज’ कहते हैं।)


शब्दावली:


गुणसूत्र एवं लिंग निर्धारण (Chromosomes and Sex Determination)


गुणसूत्र (Chromosomes)

पुनरावलोकन (Recap):
गुणसूत्र (Chromosomes) यूकैरियोटिक कोशिकाओं के केंद्रक में पाई जाने वाली धागे जैसी संरचनाएं हैं, जो DNA और प्रोटीन से बनी होती हैं। ये कोशिका विभाजन के समय स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। इन्हीं गुणसूत्रों पर जीन (genes) रैखिक क्रम में स्थित होते हैं, जो आनुवंशिक लक्षणों को नियंत्रित करते हैं।

मानव में गुणसूत्र (Chromosomes in Humans)

मानव के 23 जोड़ी गुणसूत्रों को दो श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. अलिंग गुणसूत्र या ऑटोसोम्स (Autosomes):
    • ये 22 जोड़े (अर्थात कुल 44 गुणसूत्र) होते हैं।
    • ये स्त्री और पुरुष दोनों में एक समान होते हैं।
    • ये शरीर के अधिकांश लक्षणों (जैसे त्वचा का रंग, ऊँचाई, रक्त समूह) को नियंत्रित करते हैं।
  2. लिंग गुणसूत्र या एलोसोम्स (Sex Chromosomes or Allosomes):
    • यह 23वाँ जोड़ा होता है, जो व्यक्ति के लिंग (sex) का निर्धारण करता है।
    • ये दो प्रकार के होते हैं: X और Y गुणसूत्र।
    • स्त्री (Female): इनमें दो X गुणसूत्रों का एक समान जोड़ा होता है (XX)
    • पुरुष (Male): इनमें एक X और एक Y गुणसूत्र का असमान जोड़ा होता है (XY)

लिंग निर्धारण (Sex Determination)

परिभाषा:
लिंग निर्धारण वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा यह निर्धारित होता है कि किसी जीव का लिंग नर होगा या मादा। मनुष्यों में, यह प्रक्रिया निषेचन (fertilization) के समय लिंग गुणसूत्रों के संयोजन पर निर्भर करती है।

मनुष्य में लिंग निर्धारण की क्रियाविधि:

  1. मादा (Female) के युग्मक:
    • मादा का जीनोटाइप XX होता है।
    • जब उनमें अर्धसूत्री विभाजन (meiosis) द्वारा अंडाणु (eggs) बनते हैं, तो सभी अंडाणुओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी (22 ऑटोसोम्स + 1 लिंग गुणसूत्र) हो जाती है।
    • चूंकि मादा में केवल X गुणसूत्र होते हैं, इसलिए उनके द्वारा उत्पन्न सभी अंडाणु (100%) केवल X गुणसूत्र वाले ही होते हैं।
    • अतः, मादा को समयुग्मकी (homogametic) कहा जाता है।
  2. नर (Male) के युग्मक:
    • नर का जीनोटाइप XY होता है।
    • जब उनमें अर्धसूत्री विभाजन द्वारा शुक्राणु (sperms) बनते हैं, तो गुणसूत्रों की संख्या भी आधी हो जाती है।
    • नर दो प्रकार के शुक्राणु उत्पन्न करते हैं:
      • 50% शुक्राणुओं में X गुणसूत्र होता है।
      • 50% शुक्राणुओं में Y गुणसूत्र होता है।
    • अतः, नर को विषमयुग्मकी (heterogametic) कहा जाता है।
  3. निषेचन और संतान का लिंग:
    • संतान का लिंग इस बात पर निर्भर करता है कि अंडाणु को किस प्रकार का शुक्राणु निषेचित करता है।
    • स्थिति 1: लड़की का जन्म
      • यदि X गुणसूत्र वाला शुक्राणु, अंडाणु (जो हमेशा X वाला होता है) को निषेचित करता है, तो बनने वाले युग्मनज (zygote) का जीनोटाइप XX होगा।
      • X (sperm) + X (egg) → XX (Female)
      • परिणामस्वरूप लड़की (मादा) का जन्म होता है।
    • स्थिति 2: लड़के का जन्म
      • यदि Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु, अंडाणु को निषेचित करता है, तो बनने वाले युग्मनज का जीनोटाइप XY होगा।
      • Y (sperm) + X (egg) → XY (Male)
      • परिणामस्वरूप लड़का (नर) का जन्म होता है।

निष्कर्ष:
मनुष्यों में, संतान के लिंग का निर्धारण पिता के शुक्राणु द्वारा किया जाता है, न कि माँ के अंडाणु द्वारा। पिता ही वह कारक है जो या तो X या Y गुणसूत्र प्रदान करता है, जिससे संतान का लिंग निर्धारित होता है।

लिंग निर्धारण का आरेख:

codeCode

माता (Female)             पिता (Male)

         (44 + XX)                  (44 + XY)

             |                          |

             ↓                          ↓

    युग्मक (Gametes)             युग्मक (Gametes)

    (अंडाणु – Eggs)               (शुक्राणु – Sperms)

     (22 + X)             50% (22 + X)  और  50% (22 + Y)

        |  \____________________/            |

        |             \                      |

        ↓              \                     ↓

   यदि मिलता है       \               यदि मिलता है

 (X-शुक्राणु से)        \             (Y-शुक्राणु से)

        ↓                \                   ↓

  युग्मनज (Zygote)        \            युग्मनज (Zygote)

      (44 + XX)                        (44 + XY)

          ↓                              ↓

      पुत्री (Daughter)                 पुत्र (Son)


DNA एवं RNA: संरचना, कार्य और प्रतिकृति

परिचय:
न्यूक्लिक अम्ल (Nucleic Acids) जटिल कार्बनिक अणु होते हैं जो सभी ज्ञात जीवित प्राणियों और वायरस में पाए जाते हैं। ये कोशिका के केंद्रक में मौजूद होते हैं और आनुवंशिक सूचना के भंडारण और हस्तांतरण के लिए जिम्मेदार होते हैं। न्यूक्लिक अम्ल दो मुख्य प्रकार के होते हैं: DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) और RNA (राइबोन्यूक्लिक एसिड)


1. DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड)

DNA को “जीवन का ब्लूप्रिंट” कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसी भी जीव के निर्माण और कार्य के लिए सभी आवश्यक निर्देश कोडित होते हैं।

DNA की संरचना (Structure of DNA)

वॉटसन और क्रिक मॉडल (Watson and Crick Model, 1953):
जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने DNA की द्वि-कुंडलिनी या डबल हेलिक्स (Double Helix) संरचना का प्रसिद्ध मॉडल प्रस्तुत किया।

DNA के कार्य (Functions of DNA):

  1. आनुवंशिक सूचना का भंडारण (Storage of Genetic Information): इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य जीव की सभी आनुवंशिक सूचनाओं (जीन) को संग्रहीत करना है।
  2. आनुवंशिक सूचना का हस्तांतरण (Transmission of Genetic Information): यह प्रतिकृति (replication) की प्रक्रिया द्वारा अपनी एक सटीक प्रतिलिपि बनाकर, आनुवंशिक सूचना को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित करता है।
  3. प्रोटीन संश्लेषण पर नियंत्रण: यह ट्रांसक्रिप्शन (अनुलेखन) द्वारा RNA का निर्माण करके, कोशिका में बनने वाले सभी प्रोटीनों को नियंत्रित करता है, जो अंततः जीव के सभी लक्षणों को नियंत्रित करते हैं।

DNA प्रतिकृति या द्विगुणन (DNA Replication):

यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक DNA अणु अपनी एकदम सही दो प्रतिलिपियाँ बनाता है। यह कोशिका विभाजन की S अवस्था में होती है।

  1. एंजाइम हेलिकेज (Helicase) DNA की दोनों शृंखलाओं को अलग करता है।
  2. प्रत्येक पुरानी शृंखला एक टेम्पलेट (template) या साँचे का काम करती है।
  3. एंजाइम DNA पॉलिमरेज (DNA Polymerase) पुराने टेम्पलेट पर नए पूरक न्यूक्लियोटाइडों को जोड़ता है (A के सामने T, C के सामने G)।
  4. अंत में, एक मूल DNA अणु से दो नए, समान DNA अणु बन जाते हैं, जिनमें से प्रत्येक में एक शृंखला पुरानी और एक शृंखला नई होती है।

2. RNA (राइबोन्यूक्लिक एसिड)

RNA, DNA के निर्देशों को पढ़ने और प्रोटीन बनाने में मदद करता है। यह सूचना के वाहक और अनुवादक के रूप में कार्य करता है।

RNA की संरचना (Structure of RNA):

RNA के प्रकार और कार्य (Types and Functions of RNA):

RNA मुख्य रूप से प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) में शामिल होता है। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं:

  1. mRNA (मैसेंजर RNA – दूत RNA):
    • कार्य: यह DNA से आनुवंशिक कोड (जेनेटिक कोड) की प्रतिलिपि बनाता है (इस प्रक्रिया को अनुलेखन या ट्रांसक्रिप्शन कहते हैं) और इस संदेश को केंद्रक से बाहर राइबोसोम तक ले जाता है। यह एक संदेशवाहक की तरह काम करता है।
  2. rRNA (राइबोसोमल RNA):
    • कार्य: यह प्रोटीन के साथ मिलकर राइबोसोम की संरचना बनाता है, जो प्रोटीन संश्लेषण का स्थल है (“प्रोटीन फैक्टरी”)।
  3. tRNA (ट्रांसफर RNA – स्थानांतरण RNA):
    • कार्य: इसका कार्य अमीनो अम्लों (amino acids) को कोशिका द्रव्य से पकड़कर राइबोसोम तक लाना है, जहाँ उन्हें mRNA पर मौजूद कोड के अनुसार सही क्रम में जोड़ा जाता है। यह एक अनुवादक या “एडॉप्टर” अणु की तरह काम करता है। इस प्रक्रिया को अनुवादन या ट्रांसलेशन (Translation) कहते हैं।

संक्षेप में, प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया:

DNA —(अनुलेखन)–> mRNA —(अनुवादन)–> प्रोटीन


DNA और RNA के बीच मुख्य अंतर

विशेषताDNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड)RNA (राइबोन्यूक्लिक एसिड)
शृंखला (Strand)दोहरी-कुंडलिनी (Double Helix)सामान्यतः एकल-शृंखला (Single Strand)
शर्करा (Sugar)डीऑक्सीराइबोज (Deoxyribose)राइबोज (Ribose)
नाइट्रोजनी क्षारकA, G, C, T (थाइमिन)A, G, C, U (यूरेसिल)
स्थान (यूकैरियोट में)मुख्य रूप से केंद्रक (Nucleus) में, कुछ माइटोकॉन्ड्रिया में।केंद्रक (निर्माण) और कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) में।
मुख्य कार्यआनुवंशिक सूचना का भंडारण और हस्तांतरण।प्रोटीन संश्लेषण में सहायता।
स्थिरताअत्यधिक स्थिर।कम स्थिर, आसानी से अपघटित हो जाता है।

आनुवंशिक विकार (Genetic Disorders)

परिभाषा:
आनुवंशिक विकार ऐसी स्थितियाँ या बीमारियाँ हैं जो किसी व्यक्ति के जीनोम (genome) में असामान्यता के कारण होती हैं। ये असामान्यताएँ एक एकल जीन (single gene) में उत्परिवर्तन (mutation), कई जीनों (multiple genes) में उत्परिवर्तन, गुणसूत्रों (chromosomes) की संख्या या संरचना में परिवर्तन, या पर्यावरणीय कारकों के साथ मिलकर कई जीनों के संयोजन के कारण हो सकती हैं।

ये विकार माता-पिता से वंशानुगत (inherited) हो सकते हैं, या कभी-कभी जीवनकाल के दौरान जीन में नए उत्परिवर्तन (spontaneous mutation) के कारण भी हो सकते हैं।

इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:


1. मेंडेलियन विकार या एकल-जीन विकार (Mendelian or Single-Gene Disorders)

ये विकार एक एकल जीन में परिवर्तन या उत्परिवर्तन के कारण होते हैं और ये वंशानुगति के मेंडेलियन पैटर्न का पालन करते हैं।

A) अप्रभावी विकार (Recessive Disorders):

ये तब होते हैं जब किसी व्यक्ति को माता और पिता दोनों से एक ही दोषपूर्ण जीन की एक-एक प्रति प्राप्त होती है (जैसे aa)।

B) प्रभावी विकार (Dominant Disorders):

ये तब होते हैं जब दोषपूर्ण जीन की केवल एक प्रति (माता या पिता किसी एक से प्राप्त) ही रोग उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होती है (जैसे Aa)।

C) लिंग-सहलग्न विकार (Sex-Linked Disorders):

ये विकार लिंग गुणसूत्रों (X या Y) पर मौजूद जीनों में उत्परिवर्तन के कारण होते हैं। अधिकांश लिंग-सहलग्न विकार X-गुणसूत्र सहलग्न अप्रभावी (X-linked recessive) होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे पुरुषों में अधिक आम होते हैं।


2. गुणसूत्रीय विकार (Chromosomal Disorders)

ये विकार गुणसूत्रों की संख्या या संरचना में असामान्यताओं के कारण होते हैं। ये कोशिका विभाजन (विशेष रूप से अर्धसूत्री विभाजन) के दौरान गुणसूत्रों के ठीक से अलग न हो पाने (non-disjunction) के कारण होते हैं।

उदाहरण:

  1. डाउन सिंड्रोम (Down’s Syndrome) – (ट्राइसोमी 21):
    • कारण: यह गुणसूत्र संख्या 21 की एक अतिरिक्त प्रति (Trisomy) के कारण होता है। यानी, व्यक्ति में गुणसूत्र 21 की दो प्रतियों के बजाय तीन प्रतियाँ होती हैं (कुल गुणसूत्र = 47)।
    • लक्षण:
      • छोटा कद, छोटा, गोल सिर।
      • चपटा चेहरा और चौड़ी, सपाट नाक।
      • आंशिक रूप से खुला मुंह और बाहर निकली हुई जीभ।
      • हाथों की हथेली में विशिष्ट क्रीज (simian crease)।
      • शारीरिक, मानसिक और विकासात्मक मंदता।
  2. क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter’s Syndrome):
    • कारण: यह पुरुषों में एक अतिरिक्त X लिंग गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण होता है।
    • जीनोटाइप: 44 + XXY (कुल गुणसूत्र = 47)।
    • लक्षण:
      • व्यक्ति समग्र रूप से पुरुष होता है, लेकिन अल्पविकसित वृषण।
      • उसमें कुछ स्त्री जैसे लक्षण विकसित हो सकते हैं, जैसे स्तनों का विकास (गाइनेकोमास्टिया – Gynecomastia)
      • ऐसे पुरुष अनुर्वर (sterile) होते हैं।
  3. टर्नर सिंड्रोम (Turner’s Syndrome):
    • कारण: यह महिलाओं में एक X लिंग गुणसूत्र की अनुपस्थिति के कारण होता है।
    • जीनोटाइप: 44 + X0 (कुल गुणसूत्र = 45)।
    • लक्षण:
      • ऐसी महिलाएँ अनुर्वर (sterile) होती हैं क्योंकि अंडाशय अविकसित होते हैं।
      • छोटा कद।
      • द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का अभाव।
विकार (Disorder)कारण (Cause)गुणसूत्रों की संख्या (No. of Chromosomes)लक्षण/प्रभाव (Symptoms/Effects)
डाउन सिंड्रोमगुणसूत्र 21 की ट्राइसोमी47मानसिक और शारीरिक मंदता, विशिष्ट चेहरे की बनावट।
क्लाइनफेल्टर सिंड्रोमएक अतिरिक्त X गुणसूत्र (पुरुषों में)47 (XXY)पुरुष अनुर्वर, गाइनेकोमास्टिया।
टर्नर सिंड्रोमएक X गुणसूत्र की कमी (महिलाओं में)45 (X0)महिला अनुर्वर, छोटा कद।
हीमोफीलियाX-सहलग्न अप्रभावी जीन46रक्त का थक्का न जमना।
वर्णान्धताX-सहलग्न अप्रभावी जीन46लाल-हरे रंग में भेद न कर पाना।
सिकल-सेल एनीमियाअलिंग गुणसूत्र अप्रभावी जीन46RBCs का हंसियाकार होना, एनीमिया।

जीवन की उत्पत्ति एवं विकास के सिद्धांत (Origin of Life and Theories of Evolution)


1. जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life)

“पृथ्वी पर जीवन कैसे शुरू हुआ?” – यह विज्ञान के सबसे मौलिक और आकर्षक सवालों में से एक है। इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए समय-समय पर कई सिद्धांत दिए गए, लेकिन सबसे आधुनिक और व्यापक रूप से स्वीकृत सिद्धांत रासायनिक विकास (Chemical Evolution) या एबायोजेनेसिस (Abiogenesis) है।

ओपेरिन-हाल्डेन परिकल्पना (Oparin-Haldane Hypothesis):

यह परिकल्पना रूसी वैज्ञानिक ए. आई. ओपेरिन (A. I. Oparin) और ब्रिटिश वैज्ञानिक जे. बी. एस. हाल्डेन (J. B. S. Haldane) द्वारा स्वतंत्र रूप से प्रस्तावित की गई थी।

परिकल्पना के मुख्य बिंदु:

  1. जीवन की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से हुई: इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी पर जीवन का पहला रूप पहले से मौजूद निर्जीव अकार्बनिक (non-living inorganic) अणुओं से धीरे-धीरे जटिल कार्बनिक (complex organic) अणुओं के निर्माण के माध्यम से हुआ।
  2. आदिम पृथ्वी का वातावरण: आदिम पृथ्वी का वातावरण आज के वातावरण से बहुत अलग था। यह अपचायक (reducing) था, यानी इसमें मुक्त ऑक्सीजन (free oxygen – O₂) नहीं थी। इसमें मीथेन (CH₄), अमोनिया (NH₃), हाइड्रोजन (H₂), और जल वाष्प (H₂O) जैसी गैसें थीं।
  3. ऊर्जा के स्रोत: उस समय ऊर्जा के स्रोत प्रचंड थे – जैसे बिजली (lightning), पराबैंगनी (ultraviolet – UV) किरणें, और ज्वालामुखी विस्फोट।
  4. सरल कार्बनिक अणुओं का निर्माण: इन उच्च ऊर्जा स्रोतों की उपस्थिति में, अपचायक वातावरण की गैसों ने आपस में क्रिया करके सरल कार्बनिक अणु (simple organic molecules) जैसे अमीनो अम्ल (amino acids), न्यूक्लियोटाइड, शर्करा (sugars) का निर्माण किया।
  5. जटिल अणुओं का निर्माण: ये सरल अणु पृथ्वी के गर्म महासागरों (जिसे हाल्डेन ने “गर्म तनु सूप” या “प्रीबायोटिक सूप” कहा) में एकत्र हो गए। वहाँ ये आपस में जुड़कर जटिल कार्बनिक बहुलक (complex organic polymers) जैसे प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्ल (nucleic acids) में बदल गए।
  6. पहली कोशिका का जन्म: अंततः, ये जटिल अणु झिल्लियों के भीतर एकत्रित हो गए, जिससे जीवन के पहले रूप – प्रोटोसेल (protocells) या आद्य-कोशिकाएँ – का निर्माण हुआ, जो धीरे-धीरे विकसित होकर पहली वास्तविक कोशिकाओं में बदल गईं।

मिलर-यूरे प्रयोग (Miller-Urey Experiment, 1953):
स्टेनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने एक प्रयोगशाला प्रयोग द्वारा ओपेरिन-हाल्डेन परिकल्पना का प्रायोगिक प्रमाण दिया। उन्होंने एक बंद फ्लास्क में आदिम पृथ्वी जैसा वातावरण (CH₄, NH₃, H₂, H₂O) बनाया और उसमें कई दिनों तक विद्युत चिंगारी (बिजली) प्रवाहित की। परिणाम में, उन्होंने फ्लास्क के तरल में अमीनो अम्ल जैसे कई सरल कार्बनिक यौगिकों को बनते हुए पाया, जो जीवन के निर्माण खंड हैं।


2. जैव विकास के सिद्धांत (Theories of Evolution)

जीवन की उत्पत्ति के बाद, सरल जीवों से धीरे-धीरे जटिल जीवों का विकास कैसे हुआ, इस प्रक्रिया को जैव विकास (Organic Evolution) कहते हैं। इसे समझाने के लिए दो मुख्य सिद्धांत हैं:

A) लैमार्कवाद (Lamarckism) या “उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धांत”

यह सिद्धांत जीन-बैप्टिस्ट लैमार्क (Jean-Baptiste Lamarck) ने दिया था।

B) डार्विनवाद (Darwinism) या “प्राकृतिक चयन द्वारा विकास का सिद्धांत”

यह सिद्धांत चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “The Origin of Species” (1859) में प्रस्तुत किया था। यह जैव विकास का सबसे मान्य और मूलभूत सिद्धांत है।

मुख्य अवलोकन और विचार:

  1. अत्यधिक जनन क्षमता (Overproduction): सभी जीव अपनी क्षमता से अधिक संतान उत्पन्न करते हैं, लेकिन आबादी लगभग स्थिर रहती है।
  2. जीवन के लिए संघर्ष (Struggle for Existence): सीमित संसाधनों (भोजन, स्थान) के कारण, जीवों को जीवित रहने के लिए आपस में और अपने पर्यावरण के साथ संघर्ष करना पड़ता है।
  3. विभिन्नता (Variation): किसी भी प्रजाति की आबादी में जीव एक-दूसरे से थोड़े भिन्न होते हैं। ये विभिन्नताएँ उन्हें विरासत में मिलती हैं।
  4. योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest): इस संघर्ष में, वे जीव जीवित रहने और जनन करने में अधिक सफल होते हैं जिनके पास अनुकूल विभिन्नताएँ (favourable variations) होती हैं, जो उन्हें अपने पर्यावरण में बेहतर रूप से अनुकूलित करती हैं। (इस वाक्यांश का प्रयोग हर्बर्ट स्पेंसर ने किया था, लेकिन यह डार्विन के विचार से मेल खाता है)।
  5. प्राकृतिक चयन (Natural Selection): प्रकृति “चयन” करती है कि कौन से जीव जीवित रहेंगे और अगली पीढ़ी में अपने अनुकूल जीन स्थानांतरित करेंगे। धीरे-धीरे, प्रतिकूल विभिन्नता वाले जीव समाप्त हो जाते हैं।
  6. नई प्रजाति की उत्पत्ति: यह प्रक्रिया जब हजारों-लाखों वर्षों तक चलती रहती है, तो अनुकूल विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमा होती जाती हैं, और अंततः एक नई प्रजाति का जन्म होता है जो अपने पूर्वजों से बहुत अलग होती है।

जनन (Reproduction): पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन

जनन (Reproduction): यह वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव जीव (माता-पिता) अपने समान नए जीव (संतान) को जन्म देते हैं। यह प्रक्रिया प्रजाति की निरंतरता (continuity of species) सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।


पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction in Flowering Plants)

पुष्पी पादपों, यानी एंजियोस्पर्म (Angiosperms) में पुष्प (Flower) लैंगिक जनन का मुख्य अंग है। एक पुष्प में नर और मादा दोनों जनन अंग हो सकते हैं। लैंगिक जनन में नर युग्मक (male gamete) और मादा युग्मक (female gamete) का संलयन होता है, जिससे बीज और फल का निर्माण होता है।

1. पुष्प की संरचना (Structure of a Flower)

एक पूर्ण (complete) पुष्प के चार मुख्य चक्र होते हैं:

  1. बाह्यदलपुंज (Calyx):
    • यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र है, जो बाह्यदलों (sepals) से बना होता है।
    • ये आमतौर पर हरे रंग के होते हैं और कली अवस्था में पुष्प की रक्षा करते हैं।
  2. दलपुंज (Corolla):
    • यह बाह्यदलों के भीतर स्थित होता है और दलों या पंखुड़ियों (petals) से बना होता है।
    • ये प्रायः रंगीन और सुगंधित होते हैं, जिसका मुख्य कार्य परागण (pollination) के लिए कीटों को आकर्षित करना है।
  3. पुमंग (Androecium): (नर जनन अंग)
    • यह पुष्प का नर जनन चक्र है।
    • यह पुंकेसरों (stamens) से मिलकर बना होता है। प्रत्येक पुंकेसर के दो भाग होते हैं:
      • परागकोश (Anther): यह पुंकेसर का ऊपरी फूला हुआ भाग है, जिसके अंदर परागकण (pollen grains) बनते हैं। परागकणों के अंदर ही नर युग्मक (male gametes) होते हैं।
      • पुतंतु (Filament): वह डंठल जो परागकोश को पुष्प से जोड़ता है।
  4. जायांग (Gynoecium / Pistil): (मादा जनन अंग)
    • यह पुष्प का केंद्रीय और मादा जनन चक्र है।
    • यह एक या एक से अधिक स्त्रीकेसर या अंडप (carpels) से बना होता है। प्रत्येक स्त्रीकेसर के तीन भाग होते हैं:
      • वर्तिकाग्र (Stigma): यह सबसे ऊपरी, चिपचिपा भाग है जो परागण के दौरान परागकणों को ग्रहण करता है
      • वर्तिका (Style): यह वर्तिकाग्र और अंडाशय के बीच की लंबी, पतली नली है।
      • अंडाशय (Ovary): यह स्त्रीकेसर का निचला, फूला हुआ भाग है, जिसके अंदर बीजांड (ovules) स्थित होते हैं। प्रत्येक बीजांड में मादा युग्मक या अंड कोशिका (female gamete or egg cell) होती है।

2. लैंगिक जनन की प्रक्रिया (Process of Sexual Reproduction)

A) परागण (Pollination):

“परागकणों (pollen grains) का परागकोश (anther) से वर्तिकाग्र (stigma) तक स्थानांतरण परागण कहलाता है।”

B) निषेचन (Fertilization):

नर युग्मक का मादा युग्मक (अंड कोशिका) के साथ संलयन निषेचन कहलाता है।”

  1. परागण के बाद, परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होता है और एक पराग नलिका (pollen tube) का निर्माण करता है।
  2. यह पराग नलिका वर्तिका से होते हुए अंडाशय में स्थित बीजांड तक पहुँचती है।
  3. पराग नलिका में दो नर युग्मक होते हैं।
  4. पराग नलिका बीजांड में प्रवेश करती है और दोनों नर युग्मकों को भ्रूण-कोष (embryo sac) में छोड़ देती है।

दोहरा निषेचन (Double Fertilization) – एंजियोस्पर्म का अद्वितीय गुण:

  1. एक नर युग्मक, अंड कोशिका (egg cell) से संलयित होकर युग्मनज (Zygote) बनाता है, जो बाद में विकसित होकर भ्रूण (Embryo) बनता है। (यह वास्तविक निषेचन है)।
  2. दूसरा नर युग्मक, भ्रूण-कोष के केंद्र में स्थित दो ध्रुवीय केंद्रकों (polar nuclei) से संलयित होकर प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (Primary Endosperm Nucleus – PEN) बनाता है, जो बाद में विकसित होकर भ्रूणपोष (Endosperm) बनाता है।

3. निषेचन के बाद के परिवर्तन: बीज और फल का निर्माण

निषेचन के बाद, पुष्प में कई परिवर्तन होते हैं:

निष्कर्ष: इस प्रकार, लैंगिक जनन से बीज का निर्माण होता है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भ्रूण को सुरक्षित रखता है और अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर एक नए पौधे को जन्म देता है। फल बीजों की रक्षा करता है और उनके प्रकीर्णन (dispersal) में मदद करता है।


मानव जनन (Human Reproduction)

परिभाषा:
मानव जनन (Human Reproduction) वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य लैंगिक रूप से अपनी संतति उत्पन्न करते हैं। यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें पुरुष और महिला के जनन तंत्र, युग्मक निर्माण (gametogenesis), निषेचन, भ्रूणीय विकास और प्रसव शामिल हैं।

मनुष्य एकलिंगी (unisexual) होते हैं, अर्थात नर और मादा अलग-अलग होते हैं, और सजीव प्रजक या जरायुज (viviparous) होते हैं, अर्थात मादा सीधे शिशु को जन्म देती है।


1. पुरुष जनन तंत्र (Male Reproductive System)

इसका मुख्य कार्य नर युग्मक (male gametes), यानी शुक्राणु (sperms) का उत्पादन करना और उन्हें महिला के जनन पथ में स्थानांतरित करना है। इसके मुख्य अंग हैं:


2. महिला जनन तंत्र (Female Reproductive System)

इसका कार्य मादा युग्मक (female gamete), यानी अंडाणु (ovum or egg) का उत्पादन करना, निषेचन के लिए स्थान प्रदान करना, भ्रूण का पोषण करना और शिशु को जन्म देना है।


प्रमुख घटनाएँ: युग्मक निर्माण से लेकर भ्रूण विकास तक

1. युग्मक जनन (Gametogenesis):

2. अंडोत्सर्ग (Ovulation):

3. मैथुन और वीर्यसेचन (Copulation and Insemination):

4. निषेचन (Fertilization):

5. विदलन, रोपण और गर्भावस्था (Cleavage, Implantation, and Pregnancy):

6. प्रसव (Parturition):


जनन स्वास्थ्य (Reproductive Health)

परिभाषा:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जनन स्वास्थ्य (Reproductive Health) का अर्थ केवल जनन संबंधी रोगों या दुर्बलता की अनुपस्थिति मात्र नहीं है, बल्कि यह जनन के सभी पहलुओं, यानी शारीरिक, भावनात्मक, व्यावहारिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होने की एक अवस्था है।

इसका उद्देश्य लोगों को एक जिम्मेदार, सुरक्षित और संतोषजनक यौन जीवन जीने में सक्षम बनाना है, जिसमें उन्हें यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता और क्षमता हो कि वे कब और कितनी बार संतान उत्पन्न करना चाहते हैं।


जनन स्वास्थ्य के प्रमुख पहलू (Major Aspects of Reproductive Health)

जनन स्वास्थ्य एक व्यापक विषय है जिसमें कई महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं:

1. यौन संचारित रोग (Sexually Transmitted Diseases – STDs)

2. जनसंख्या विस्फोट और जन्म नियंत्रण (Population Explosion and Birth Control)

3. चिकित्सा सगर्भता समापन (Medical Termination of Pregnancy – MTP)

4. बंध्यता / बांझपन (Infertility)


निष्कर्ष:
जनन स्वास्थ्य, व्यक्तिगत स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यौन शिक्षा, यौन संचारित रोगों के बारे में जागरूकता, और जन्म नियंत्रण के सुरक्षित तरीकों तक पहुंच एक स्वस्थ समाज के निर्माण में मदद करती है।


मानव स्वास्थ्य एवं रोग (Human Health and Diseases)

स्वास्थ्य (Health): विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, “स्वास्थ्य केवल रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की अवस्था है।”

रोग (Disease): “रोग” का शाब्दिक अर्थ है ‘आराम में बाधा’। यह शरीर या उसके किसी अंग की वह अवस्था है जब उसकी कार्यप्रणाली में कोई दोष या असामान्यता आ जाती है, जिससे विभिन्न लक्षण प्रकट होते हैं।

रोग मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:

  1. संक्रामक रोग (Infectious Diseases): वे रोग जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं। ये रोगाणुओं (pathogens) जैसे जीवाणु, विषाणु, कवक, प्रोटोजोआ द्वारा होते हैं।
  2. असंक्रामक रोग (Non-infectious Diseases): वे रोग जो एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलते। ये आनुवंशिक, चयापचय संबंधी या जीवनशैली के कारण हो सकते हैं (जैसे- कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग)।

मानव में होने वाले सामान्य संक्रामक रोग

यहाँ रोगाणुओं के प्रकार के आधार पर वर्गीकृत कुछ प्रमुख संक्रामक रोग दिए गए हैं:

1. जीवाणु जनित रोग (Bacterial Diseases)

रोग का नामकारक जीवाणु (Bacterium)प्रभावित अंग / लक्षणसंचरण का माध्यम
टाइफाइड (Typhoid)साल्मोनेला टाइफीछोटी आंत, लगातार तेज बुखार, कमजोरी, पेट दर्द, सिरदर्द। (विडाल टेस्ट से पुष्टि)दूषित भोजन एवं जल
निमोनिया (Pneumonia)स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी, हीमोफिलस इन्फ्लुएंजीफेफड़ों की वायुकोष्ठिका (Alveoli), वायुकोष्ठिका में तरल भर जाना, तेज बुखार, खांसी, सांस लेने में कठिनाई।संक्रमित व्यक्ति के खांसने/छींकने से निकले ड्रॉपलेट्स
हैजा (Cholera)विब्रियो कॉलेरीआंत, लगातार दस्त, उल्टी, गंभीर निर्जलीकरण (dehydration)।दूषित भोजन एवं जल
क्षय रोग / टी.बी. (Tuberculosis – TB)माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिसमुख्यतः फेफड़े, लगातार खांसी, बलगम में खून आना, सीने में दर्द, बुखार। (BCG का टीका रोकथाम के लिए)वायु (हवा) द्वारा
डिप्थीरिया (Diphtheria)कोरिनेबैक्टीरियम डिप्थीरियागला, सांस की नली, गले में एक झिल्ली बन जाना, सांस लेने में रुकावट, बुखार।ड्रॉपलेट संक्रमण
टिटेनस (Tetanus)क्लोस्ट्रीडियम टेटानीतंत्रिका तंत्र, मांसपेशियों में जकड़न (विशेषकर जबड़े का बंद होना – ‘लॉक-जॉ’)।चोट/घाव का मिट्टी के संपर्क में आना
प्लेग (Plague)यर्सिनिया पेस्टिसतीव्र बुखार, गिल्टियों में सूजन।संक्रमित पिस्सू (चूहों पर पाए जाने वाले)

2. विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)

रोग का नामकारक विषाणु (Virus)प्रभावित अंग / लक्षणसंचरण का माध्यम
सामान्य जुकाम (Common Cold)राइनोवायरस (Rhinovirus)नाक, श्वसन पथ, नाक बहना, गले में खराश, खांसी, सिरदर्द।ड्रॉपलेट संक्रमण, संक्रमित वस्तुओं को छूना
इन्फ्लुएंजा (Influenza / Flu)मिक्सोवायरसपूरा श्वसन तंत्र, तेज बुखार, बदन दर्द, खांसी, सिरदर्द।ड्रॉपलेट संक्रमण
एड्स (AIDS)HIV (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस)प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System – T-कोशिकाएं), शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता खत्म हो जाना। (एलाइजा टेस्ट से पुष्टि)असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित रक्त, माँ से बच्चे को
डेंगू (Dengue)डेंगू वायरस (अरबोवायरस)संपूर्ण शरीर, तेज बुखार, सिरदर्द, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, प्लेटलेट्स में कमीमादा एडीज एजिप्टी मच्छर
पोलियो (Polio)पोलियो वायरसतंत्रिका तंत्र (विशेषकर मेरु रज्जु), मांसपेशियों में पक्षाघात (paralysis)।दूषित भोजन एवं जल
खसरा (Measles)मोरबिलीवायरसश्वसन तंत्र, त्वचा पर लाल चकत्ते, तेज बुखार।हवा / ड्रॉपलेट संक्रमण
रेबीज (Rabies) / हाइड्रोफोबियारैबडोवायरसकेंद्रीय तंत्रिका तंत्र, पानी से डर (hydrophobia), व्यवहार में परिवर्तन।संक्रमित जानवर (कुत्ता, बंदर) के काटने से
छोटी माता / चेचक (Chicken Pox)वैरिसेला-जोस्टर वायरससंपूर्ण शरीर, बुखार, त्वचा पर खुजली वाले दाने और फफोले।हवा, सीधे संपर्क से
हेपेटाइटिस (Hepatitis)हेपेटाइटिस वायरस (A,B,C आदि)यकृत (Liver), पीलिया (त्वचा, आंखों का पीला होना), पेट दर्द।दूषित भोजन/जल (Hep-A), संक्रमित रक्त/शारीरिक तरल (Hep-B)

3. प्रोटोजोआ जनित रोग (Protozoan Diseases)

रोग का नामकारक प्रोटोजोआप्रभावित अंग / लक्षणवाहक / संचरण का माध्यम
मलेरिया (Malaria)प्लाज्मोडियम की विभिन्न प्रजातियाँयकृत, लाल रक्त कणिकाएं (RBCs), निश्चित अंतराल पर ठंड लगकर तेज बुखार आना।मादा एनोफिलीज (Anopheles) मच्छर
अमीबता (Amoebiasis)/अमीबी पेचिशएंटअमीबा हिस्टोलिटिकाबड़ी आंत, पेट में ऐंठन, श्लेष्मा और रक्त के साथ दस्त।दूषित भोजन एवं जल (घरेलू मक्खी द्वारा फैलता है)
काला-जार (Kala-azar)लीशमैनिया डोनोवानीअस्थि मज्जा, प्लीहा, कई हफ्तों तक बुखार।बालू मक्खी (Sand Fly)
निद्रा रोग (Sleeping Sickness)ट्रिपैनोसोमामस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, बुखार, अत्यधिक नींद आना।सीसी मक्खी (Tse-tse Fly)

4. कवक जनित रोग (Fungal Diseases)

रोग का नामकारक कवकप्रभावित अंग / लक्षण
दाद (Ringworm)माइक्रोस्पोरम, ट्राइकोफाइटॉनत्वचा, नाखून, सिर की त्वचा पर सूखी, परतदार और खुजली वाली लाल चकत्ते।
एथलीट फुट (Athlete’s Foot)टीनिया पेडिसपैरों की उंगलियों के बीच की त्वचा का संक्रमित होना, खुजली।
दाद (Scabies)एकेरस स्केबीजत्वचा पर अत्यधिक खुजली वाले छोटे दाने और दरारें।

5. कृमि जनित रोग (Helminthic Diseases)

रोग का नामकारक कृमिप्रभावित अंग / लक्षण
एस्केरिऐसिसएस्केरिस (गोल कृमि)छोटी आंत, आंतरिक रक्तस्राव, पेट दर्द, एनीमिया।
फाइलेरिया / हाथीपाँव (Filariasis / Elephantiasis)वुचेरेरिया बैनक्रॉफ्टी (फाइलेरिया कृमि)लसीका वाहिकाएँ, पैरों और जननांगों में दीर्घकालिक सूजन। (क्यूलेक्स मच्छर द्वारा फैलता है)

प्रतिरक्षा प्रणाली और टीके


1. प्रतिरक्षा या असंक्राम्यता (Immunity)

परिभाषा:
प्रतिरक्षा (Immunity), हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की समग्र क्षमता है। यह बाहरी रोगाणुओं (pathogens) जैसे बैक्टीरिया, वायरस, कवक आदि को पहचानने, उन्हें निष्क्रिय करने और नष्ट करने की एक जटिल प्रणाली है। यह प्रणाली हमें संक्रमणों से बचाती है।

प्रतिरक्षा प्रणाली का अध्ययन प्रतिरक्षा विज्ञान (Immunology) कहलाता है। इस प्रणाली के मुख्य योद्धा श्वेत रक्त कणिकाएँ (WBCs), विशेष रूप से लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes – B और T कोशिकाएँ) होते हैं।

प्रतिरक्षा मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:

A) सहज या जन्मजात प्रतिरक्षा (Innate Immunity)

B) उपार्जित या अर्जित प्रतिरक्षा (Acquired or Adaptive Immunity)

उपार्जित प्रतिरक्षा के प्रकार:

  1. सक्रिय प्रतिरक्षा (Active Immunity):
    • जब शरीर रोगाणुओं (प्राकृतिक संक्रमण से) या टीके के संपर्क में आने पर स्वयं एंटीबॉडी का निर्माण करता है।
    • यह धीमी होती है लेकिन लंबे समय तक (long-lasting) बनी रहती है।
    • उदाहरण: किसी बीमारी (जैसे चेचक) का होना, टीकाकरण (Vaccination)
  2. निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Passive Immunity):
    • जब व्यक्ति को संक्रमण से तत्काल सुरक्षा के लिए पहले से तैयार (readymade) एंटीबॉडी सीधे दिए जाते हैं।
    • यह तेजी से काम करती है लेकिन कुछ समय के लिए (short-lived) ही रहती है क्योंकि शरीर स्वयं एंटीबॉडी बनाना नहीं सीखता।
    • उदाहरण:
      • माँ के दूध (कोलोस्ट्रम – Colostrum) के माध्यम से शिशु को मिलने वाली एंटीबॉडी।
      • टिटेनस के संक्रमण पर दिए जाने वाले एंटी-टॉक्सिन (ATS) इंजेक्शन।

2. टीके (Vaccines)

टीकाकरण (Vaccination): प्रतिरक्षा प्रणाली को “शिक्षित” करने और उसे भविष्य के संक्रमणों के लिए तैयार करने की एक प्रक्रिया है।

सिद्धांत:
टीकाकरण उपार्जित प्रतिरक्षा की “स्मृति” के गुण पर आधारित है।

टीका क्या है? (What is a Vaccine?)
एक टीका (Vaccine) एक जैविक तैयारी है जिसमें किसी विशिष्ट बीमारी के निष्क्रिय (inactivated) या कमजोर (weakened) किए गए रोगाणु, या उसके प्रोटीन का एक अंश होता है।

यह कैसे काम करता है?

  1. जब एक टीका शरीर में इंजेक्ट किया जाता है, तो ये कमजोर या मृत रोगाणु वास्तविक बीमारी का कारण नहीं बनते हैं
  2. लेकिन, हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें एक बाहरी आक्रमणकारी के रूप में पहचान लेती है।
  3. इसके जवाब में, प्रतिरक्षा प्रणाली (B-लिम्फोसाइट्स) उस रोगाणु के खिलाफ एंटीबॉडी बनाना और स्मृति कोशिकाओं (memory cells) का निर्माण करना शुरू कर देती है।
  4. ये स्मृति कोशिकाएँ शरीर में लंबे समय तक बनी रहती हैं।
  5. अब, यदि भविष्य में वास्तविक, सक्रिय रोगाणु शरीर पर हमला करता है, तो पहले से तैयार स्मृति कोशिकाएँ उसे तुरंत पहचान लेती हैं और बहुत बड़ी मात्रा में तेजी से एंटीबॉडी का उत्पादन करके उस पर काबू पा लेती हैं, और हमें वह बीमारी होने से बचाती हैं।

इस प्रकार, टीका शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को पहले से ही अभ्यास (practice) करा देता है।

टीकों के प्रकार:

महत्व:
टीकाकरण, संक्रामक रोगों को रोकने और दुनिया भर में चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों को खत्म करने या नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी और सफल सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों में से एक है।


मानव स्वास्थ्य एवं रोग: कैंसर और एड्स

कैंसर और एड्स (AIDS), दोनों ही बहुत गंभीर और घातक रोग हैं। यद्यपि इनके कारण और प्रकृति पूरी तरह से अलग हैं, लेकिन ये विश्व भर में स्वास्थ्य संबंधी प्रमुख चिंताएँ हैं।


1. कैंसर (Cancer)

परिभाषा:

कैंसर किसी भी ऐसे रोगों के बड़े समूह को दिया गया नाम है जिनमें असामान्य कोशिकाओं (abnormal cells) का अनियंत्रित विभाजन और प्रसार (uncontrolled division and growth) होता है।

सामान्य कोशिका बनाम कैंसर कोशिका:

ट्यूमर के प्रकार:

  1. सुदम्य या बेनाइन ट्यूमर (Benign Tumour):
    • ये ट्यूमर अपने उत्पत्ति स्थान तक सीमित रहते हैं और शरीर के अन्य भागों में नहीं फैलते हैं।
    • ये कैप्सूल से घिरे होते हैं और धीरे-धीरे बढ़ते हैं।
    • ये अपेक्षाकृत कम हानिकारक होते हैं और शल्य चिकित्सा द्वारा हटाए जा सकते हैं। (उदाहरण: मस्से)
  2. दुर्दम या मैलिग्नेंट ट्यूमर (Malignant Tumour):
    • ये कोशिकाएँ ही “वास्तविक कैंसर” कोशिकाएँ होती हैं।
    • ये ट्यूमर तेजी से बढ़ते हैं और आस-पास के सामान्य ऊतकों पर आक्रमण करते हैं और उन्हें नष्ट कर देते हैं।
    • मेटास्टेसिस (Metastasis): यह कैंसर का सबसे खतरनाक गुण है। मैलिग्नेंट ट्यूमर की कोशिकाएँ टूटकर रक्त या लसीका प्रवाह द्वारा शरीर के दूरस्थ स्थानों तक पहुँच जाती हैं और वहां भी नये ट्यूमर का निर्माण शुरू कर देती हैं।

कैंसर के कारण (Carcinogens):
सामान्य कोशिकाओं के कैंसर कोशिकाओं में बदलने के लिए जिम्मेदार कारकों को कैंसरजन (Carcinogens) कहते हैं।

  1. भौतिक कारक: आयनकारी विकिरण (जैसे- X-किरणें, गामा किरणें) और अनआयनकारी विकिरण (जैसे- UV-किरणें), जो DNA को क्षतिग्रस्त करती हैं।
  2. रासायनिक कारक: तंबाकू के धुएं में पाए जाने वाले रसायन फेफड़ों के कैंसर का प्रमुख कारण हैं। अन्य रसायन जैसे एस्बेस्टस, डाई आदि।
  3. जैविक कारक: कुछ विषाणु (Viruses) जिन्हें ओंकोजेनिक वायरस (Oncogenic viruses) कहते हैं (जैसे- HPV से गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर)।
  4. आनुवंशिक कारक: शरीर में मौजूद कुछ प्रोटो-ओंकोजीन (Proto-oncogenes) होते हैं जो सामान्यतः निष्क्रिय रहते हैं, लेकिन कार्सिनोजेन्स द्वारा प्रेरित होने पर ओंकोजीन (Oncogenes) में बदल जाते हैं और कैंसर का कारण बनते हैं।

पता लगाना और उपचार:


2. एड्स (AIDS – Acquired Immuno Deficiency Syndrome)

पूरा नाम: क्वायर्ड (उपार्जित) म्यूनो (प्रतिरक्षा) डेफिशिएंसी (कमी) सिन्ड्रोम (लक्षणों का समूह)।

रोगकारक (Causative Agent):
यह ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) नामक रेट्रोवायरस (Retrovirus) के कारण होता है (जिसका आनुवंशिक पदार्थ RNA होता है)।

संक्रमण और प्रभाव:

  1. HIV शरीर में प्रवेश करने के बाद सीधे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) की प्रमुख कोशिकाओं, सहायक टी-लिम्फोसाइट्स (Helper T-lymphocytes) पर हमला करता है।
  2. वायरस इन टी-कोशिकाओं के अंदर गुणन करता है और उन्हें नष्ट करता रहता है।
  3. समय के साथ, व्यक्ति के शरीर में टी-कोशिकाओं की संख्या बहुत कम हो जाती है।
  4. इसके परिणामस्वरूप, व्यक्ति की रोगों से लड़ने की क्षमता (प्रतिरक्षा) इतनी कमजोर हो जाती है कि वह ऐसे सामान्य जीवाणु, फफूंद या वायरल संक्रमणों से भी नहीं लड़ पाता जो स्वस्थ लोगों को नुकसान नहीं पहुँचाते। इसे “अवसरवादी संक्रमण” (Opportunistic Infections) कहते हैं।
  5. रोगी अंततः इन विभिन्न संक्रमणों के कारण दम तोड़ देता है। HIV से एड्स विकसित होने में 5 से 10 साल या उससे अधिक का समय (incubation period) लग सकता है।

संचरण के तरीके (Mode of Transmission):
HIV केवल विशिष्ट शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है:

  1. संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध द्वारा (सर्वाधिक सामान्य कारण)।
  2. संदूषित रक्त या रक्त उत्पादों के आधान (transfusion) द्वारा।
  3. संक्रमित सुई या सिरिंजों के साझे प्रयोग द्वारा (ड्रग्स लेने वालों में आम है)।
  4. संक्रमित माँ से उसके बच्चे को (गर्भनाल द्वारा गर्भावस्था के दौरान, प्रसव के समय, या स्तनपान द्वारा)।

निदान और उपचार:

रोकथाम:


विटामिन और खनिज की कमी से होने वाले रोग (Deficiency Diseases)

परिभाषा:
हीनताजन्य रोग या अभावजन्य रोग (Deficiency Diseases) वे रोग हैं जो आहार में एक लंबे समय तक किसी विशिष्ट पोषक तत्व (nutrient), जैसे विटामिन या खनिज, की कमी के कारण होते हैं। ये रोग संक्रामक नहीं होते हैं और उचित आहार द्वारा इनकी रोकथाम और उपचार किया जा सकता है।


1. विटामिन की कमी से होने वाले रोग (Vitamin Deficiency Diseases)

विटामिन (Vitamins) सूक्ष्म पोषक तत्व (micronutrients) हैं जिनकी शरीर को सामान्य वृद्धि, विकास और विभिन्न उपापचयी क्रियाओं को करने के लिए अल्प मात्रा में आवश्यकता होती है। विटामिन मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:

विटामिन का नामरासायनिक नाम (Chemical Name)कमी से होने वाला रोग (Deficiency Disease)मुख्य लक्षणप्रमुख स्रोत (Major Sources)
विटामिन Aरेटिनॉल (Retinol)रतौंधी (Night Blindness)<br>जीरोफ्थैल्मिया (Xerophthalmia)रात में या कम प्रकाश में दिखाई न देना,<br>आँखों का शुष्क होना।गाजर, पपीता, आम, मछली का तेल, हरी पत्तेदार सब्जियाँ।
विटामिन B₁थायमिन (Thiamine)बेरी-बेरी (Beri-beri)मांसपेशियों का कमजोर होना, तंत्रिका तंत्र की कमजोरी, भूख न लगना।अनाज, नट्स, माँस, सूखी खमीर (yeast)।
विटामिन B₂राइबोफ्लेविन (Riboflavin)कीलोसिस (Cheilosis),<br> त्वचा का फटनामुंह और होठों के कोनों का फटना, जीभ में सूजन।दूध, अंडा, हरी सब्जियाँ, माँस।
विटामिन B₃नियासिन (Niacin)पेलाग्रा (Pellagra)त्वचा पर दाने (त्वचाशोथ), डायरिया, स्मृति में कमी (3-डी रोग)।अनाज, दालें, माँस, मछली, मूंगफली।
विटामिन B₅पैंटोथैनिक एसिडचर्म रोग, बाल सफेद होनापैरों में जलन, बाल सफेद होना।दूध, अंडा, मशरूम, टमाटर।
विटामिन B₆पाइरिडॉक्सिनएनीमिया (रक्ताल्पता), त्वचा रोगरक्त की कमी, चर्म रोग।अनाज, मांस, सोयाबीन।
विटामिन B₇बायोटिनलकवा, शरीर में दर्द, बालों का गिरनाशरीर में दर्द, बालों का झड़ना।अंडा, गेहूँ, चॉकलेट, सब्ज़ियाँ।
विटामिन B₁₂साइनोकोबालामिन (Cyanocobalamin)पर्निशियस एनीमियालाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) का अपरिपक्व रहना, रक्त की भारी कमी, तंत्रिका संबंधी क्षति। (इसमें कोबाल्ट होता है)माँस, अंडा, दूध, जिगर।
विटामिन Cएस्कॉर्बिक एसिड (Ascorbic Acid)स्कर्वी (Scurvy)मसूड़ों से खून आना, सूजन, घाव का देर से भरना।सभी खट्टे फल (नींबू, संतरा, आँवला), अमरूद, टमाटर।
विटामिन Dकैल्सिफेरॉल (Calciferol)बच्चों में रिकेट्स (Rickets),<br> वयस्कों में ऑस्टियोमलेशियाहड्डियों का कमजोर और मुड़ जाना,<br> हड्डियों में दर्द। (इसे ‘सनशाइन विटामिन’ भी कहते हैं)सूर्य का प्रकाश (शरीर खुद बनाता है), दूध, अंडा, मछली का तेल।
विटामिन Eटोकोफेरॉल (Tocopherol)जनन शक्ति में कमी (बांझपन)मांसपेशियों की कमजोरी, जनन क्षमता प्रभावित।वनस्पति तेल, नट्स, बादाम, बीज, अंकुरित अनाज।
विटामिन Kफाइलोक्विनोन (Phylloquinone)रक्त का थक्का न जमनाचोट लगने पर रक्त का बहाव न रुकना।हरी पत्तेदार सब्जियाँ (पालक), गोभी, टमाटर।

2. खनिज लवणों की कमी से होने वाले रोग (Mineral Deficiency Diseases)

खनिज (Minerals) भी सूक्ष्म पोषक तत्व हैं जो शरीर के समुचित कार्य के लिए आवश्यक होते हैं, जैसे हड्डियों का निर्माण, द्रव संतुलन, और तंत्रिका कार्य।

खनिज (Mineral)कमी से होने वाला रोगमुख्य लक्षण / कार्यप्रमुख स्रोत (Major Sources)
आयोडीन (Iodine)घेंघा या गलगंड (Goitre), <br> बच्चों में बौनापन (Cretinism)थायराइड ग्रंथि में सूजन, शारीरिक और मानसिक विकास का रुकना। (यह थायरॉक्सिन हार्मोन का मुख्य घटक है)।आयोडीन युक्त नमक, समुद्री भोजन, मछली।
लोहा / आयरन (Iron)एनीमिया / रक्ताल्पता (Anemia)रक्त की कमी, कमजोरी, थकान, साँस फूलना। (यह हीमोग्लोबिन का मुख्य घटक है जो ऑक्सीजन का परिवहन करता है)।पालक, हरी सब्जियाँ, गुड़, सेब, चुकंदर, माँस।
कैल्शियम (Calcium)हड्डियाँ कमजोर होना, <br> ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis)हड्डियाँ और दाँत कमजोर और भंगुर हो जाते हैं।दूध, पनीर, अंडा, हरी सब्जियाँ, रागी।
फॉस्फोरस (Phosphorus)हड्डियों और दांतों की कमजोरीहड्डियों का कमजोर होना। (कैल्शियम के साथ मिलकर काम करता है)।दूध, पनीर, अनाज, बाजरा।
सोडियम (Sodium)रक्तचाप कम होना (Low BP), <br> मांसपेशियों में ऐंठनशरीर में द्रव संतुलन और तंत्रिका आवेगों का संचरण।साधारण नमक।
पोटैशियम (Potassium)निम्न रक्तचाप, <br>मांसपेशियों में कमजोरीतंत्रिका आवेग संचरण, हृदय की धड़कन का नियंत्रण।केला, आलू, टमाटर।
फ्लोरीन (Fluorine)दाँतों का क्षयदांतों के इनेमल (enamel) को मजबूत बनाता है।पीने का पानी, टूथपेस्ट।