आनुवंशिकी तथा विकास (Genetics and Evolution)
आनुवंशिकी (Genetics): जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत आनुवंशिकता (Heredity) और विभिन्नता (Variation) का अध्ययन किया जाता है।
- आनुवंशिकता (Heredity): वह प्रक्रिया जिसके द्वारा लक्षण (traits) माता-पिता से उनकी संतानों में स्थानांतरित होते हैं।
- विभिन्नता (Variation): एक ही जाति के जीवों और एक ही माता-पिता की संतानों के बीच पाई जाने वाली असमानताएँ।
जैव विकास (Evolution): समय के साथ किसी जीव की आबादी में आनुवंशिक लक्षणों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाले क्रमिक परिवर्तन को जैव विकास कहते हैं, जिससे नई प्रजातियों का जन्म होता है।
ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor Johann Mendel) को उनके मटर के पौधों पर किए गए अभूतपूर्व कार्यों के लिए “आनुवंशिकी का जनक” (Father of Genetics) कहा जाता है। उन्होंने सबसे पहले आनुवंशिकता के मूल सिद्धांतों की व्याख्या की।
मेंडल के वंशानुगति के नियम (Mendel’s Laws of Inheritance)
मेंडल ने बगीचे में उगने वाले मटर के पौधे (Pisum sativum) पर सात वर्षों (1856-1863) तक संकरण (hybridization) के प्रयोग किए। उन्होंने मटर के पौधे को इसलिए चुना क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध था, इसका जीवन चक्र छोटा था, और इसमें कई स्पष्ट रूप से भिन्न दिखने वाले लक्षण (जैसे- लंबा/बौना पौधा, गोल/झुर्रीदार बीज) थे।
इन प्रयोगों के आधार पर, मेंडल ने वंशानुगति के तीन मूलभूत नियम दिए।
1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
नियम का कथन:
“जब दो विपरीत (contrasting) लक्षणों वाले शुद्ध जनकों (pure parents) के बीच संकरण कराया जाता है, तो पहली पीढ़ी (F₁ generation) में संतानों में केवल एक ही लक्षण प्रकट होता है। जो लक्षण प्रकट होता है उसे प्रभावी लक्षण (dominant trait) कहते हैं, और जो लक्षण छिपा रहता है या प्रकट नहीं होता, उसे अप्रभावी लक्षण (recessive trait) कहते हैं।”
- उदाहरण: जब एक शुद्ध लंबे (TT) मटर के पौधे का संकरण एक शुद्ध बौने (tt) पौधे से कराया जाता है, तो F₁ पीढ़ी में प्राप्त सभी पौधे लंबे (Tt) होते हैं।
- यहाँ, लंबापन (T) का लक्षण, बौनेपन (t) के लक्षण पर प्रभावी है।
महत्व:
यह नियम बताता है कि कुछ लक्षण दूसरों पर हावी हो सकते हैं, भले ही संतान में दोनों लक्षणों के लिए कारक (जीन) मौजूद हों।
2. पृथक्करण या विसंयोजन का नियम (Law of Segregation)
इस नियम को “युग्मकों की शुद्धता का नियम” (Law of Purity of Gametes) भी कहा जाता है। यह मेंडल का पहला और सार्वभौमिक नियम है।
नियम का कथन:
“प्रत्येक जीव में एक लक्षण को नियंत्रित करने के लिए कारकों (जीन) का एक जोड़ा (pair) होता है। युग्मक (gametes) निर्माण के समय, यह दोनों कारक एक-दूसरे से पृथक (segregate) हो जाते हैं और प्रत्येक युग्मक में जोड़े में से केवल एक ही कारक पहुँचता है।”
- उदाहरण (ऊपर के उदाहरण को जारी रखते हुए):
- F₁ पीढ़ी के लंबे पौधे का जीनोटाइप Tt था।
- जब यह पौधा युग्मक (परागकण या अंडाणु) बनाएगा, तो इसके ‘T’ और ‘t’ कारक अलग-अलग हो जाएंगे।
- अर्थात, 50% युग्मकों में ‘T’ कारक होगा और 50% युग्मकों में ‘t’ कारक होगा।
- ये युग्मक एक-दूसरे के लिए पूरी तरह से शुद्ध होते हैं; उनमें कोई मिश्रण नहीं होता।
- परिणाम: जब F₁ पीढ़ी के पौधों में स्व-परागण (self-pollination) कराया जाता है, तो F₂ पीढ़ी में लंबे और बौने दोनों प्रकार के पौधे 3:1 के अनुपात में प्राप्त होते हैं। बौने लक्षण का फिर से प्रकट होना यह साबित करता है कि F₁ पीढ़ी में वह छिपा हुआ था, खत्म नहीं हुआ था, और युग्मक बनते समय अलग हो गया था।
महत्व:
यह नियम आनुवंशिक लक्षणों के अगली पीढ़ी में स्थानांतरण की मूल क्रियाविधि को समझाता है।
3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)
यह नियम द्विसंकर संकरण (dihybrid cross) पर आधारित है, जिसमें दो जोड़ी विपरीत लक्षणों की वंशानुगति का एक साथ अध्ययन किया जाता है।
नियम का कथन:
“जब दो या दो से अधिक लक्षणों की वंशानुगति एक साथ होती है, तो प्रत्येक लक्षण के कारक (जीन) की वंशानुगति, दूसरे लक्षण के कारक की वंशानुगति से स्वतंत्र होती है।”
- उदाहरण: यदि हम मटर के दो लक्षणों को एक साथ लेते हैं – बीज का आकार (गोल-R, झुर्रीदार-r) और बीज का रंग (पीला-Y, हरा-y)।
- जब एक शुद्ध गोल और पीले (RRYY) बीज वाले पौधे का संकरण एक शुद्ध झुर्रीदार और हरे (rryy) बीज वाले पौधे से कराया जाता है, तो F₁ पीढ़ी में सभी पौधे गोल और पीले (RrYy) बीज वाले होते हैं।
- जब F₁ पीढ़ी में स्व-परागण होता है, तो F₂ पीढ़ी में ये चारों लक्षण एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से संयोजित होकर चार प्रकार के पौधे बनाते हैं – (1) गोल-पीले, (2) गोल-हरे, (3) झुर्रीदार-पीले, और (4) झुर्रीदार-हरे।
- इनका लक्षणप्ररूप (phenotypic) अनुपात 9:3:3:1 होता है।
महत्व:
यह नियम बताता है कि लक्षणों के विभिन्न संयोजन (combinations) कैसे बनते हैं, जिससे संतानों में विभिन्नता उत्पन्न होती है। (हालांकि, यह नियम केवल उन जीनों पर लागू होता है जो अलग-अलग गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं। एक ही गुणसूत्र पर स्थित जीन अक्सर एक साथ वंशानुगत होते हैं, जिसे ‘सहलग्नता’ या ‘लिंकेज’ कहते हैं।)
शब्दावली:
- जीन (Gene): DNA का एक खंड जो एक विशिष्ट लक्षण को नियंत्रित करता है। मेंडल ने इन्हें “कारक” (Factors) कहा था।
- युग्मविकल्पी (Alleles): एक ही जीन के विभिन्न रूप (जैसे- लंबेपन के लिए ‘T’ और बौनेपन के लिए ‘t’)।
- जीनोटाइप (Genotype): किसी जीव का आनुवंशिक संघटन (जैसे- TT, Tt, tt)।
- फीनोटाइप (Phenotype): जीव का बाहरी रूप से दिखने वाला लक्षण (जैसे- लंबा, बौना)।
गुणसूत्र एवं लिंग निर्धारण (Chromosomes and Sex Determination)
गुणसूत्र (Chromosomes)
पुनरावलोकन (Recap):
गुणसूत्र (Chromosomes) यूकैरियोटिक कोशिकाओं के केंद्रक में पाई जाने वाली धागे जैसी संरचनाएं हैं, जो DNA और प्रोटीन से बनी होती हैं। ये कोशिका विभाजन के समय स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। इन्हीं गुणसूत्रों पर जीन (genes) रैखिक क्रम में स्थित होते हैं, जो आनुवंशिक लक्षणों को नियंत्रित करते हैं।
- गुणसूत्र आनुवंशिक सूचना को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ले जाने वाले “वाहन” (vehicles) हैं।
- प्रत्येक प्रजाति में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है।
मानव में गुणसूत्र (Chromosomes in Humans)
- मनुष्य की प्रत्येक कायिक कोशिका (somatic cell), यानी शरीर की सामान्य कोशिका में 46 गुणसूत्र होते हैं, जो 23 जोड़ों (23 pairs) में पाए जाते हैं।
- इन जोड़ों में से एक गुणसूत्र माँ से और दूसरा पिता से आता है। इस अवस्था को द्विगुणित (Diploid, 2n) कहते हैं।
- मानव की युग्मक कोशिकाओं (gametes), यानी शुक्राणु (sperm) और अंडाणु (egg) में 23 गुणसूत्र होते हैं (जोड़ों में नहीं)। इस अवस्था को अगुणित (Haploid, n) कहते हैं।
मानव के 23 जोड़ी गुणसूत्रों को दो श्रेणियों में बांटा गया है:
- अलिंग गुणसूत्र या ऑटोसोम्स (Autosomes):
- ये 22 जोड़े (अर्थात कुल 44 गुणसूत्र) होते हैं।
- ये स्त्री और पुरुष दोनों में एक समान होते हैं।
- ये शरीर के अधिकांश लक्षणों (जैसे त्वचा का रंग, ऊँचाई, रक्त समूह) को नियंत्रित करते हैं।
- लिंग गुणसूत्र या एलोसोम्स (Sex Chromosomes or Allosomes):
- यह 23वाँ जोड़ा होता है, जो व्यक्ति के लिंग (sex) का निर्धारण करता है।
- ये दो प्रकार के होते हैं: X और Y गुणसूत्र।
- स्त्री (Female): इनमें दो X गुणसूत्रों का एक समान जोड़ा होता है (XX)।
- पुरुष (Male): इनमें एक X और एक Y गुणसूत्र का असमान जोड़ा होता है (XY)।
लिंग निर्धारण (Sex Determination)
परिभाषा:
लिंग निर्धारण वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा यह निर्धारित होता है कि किसी जीव का लिंग नर होगा या मादा। मनुष्यों में, यह प्रक्रिया निषेचन (fertilization) के समय लिंग गुणसूत्रों के संयोजन पर निर्भर करती है।
मनुष्य में लिंग निर्धारण की क्रियाविधि:
- मादा (Female) के युग्मक:
- मादा का जीनोटाइप XX होता है।
- जब उनमें अर्धसूत्री विभाजन (meiosis) द्वारा अंडाणु (eggs) बनते हैं, तो सभी अंडाणुओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी (22 ऑटोसोम्स + 1 लिंग गुणसूत्र) हो जाती है।
- चूंकि मादा में केवल X गुणसूत्र होते हैं, इसलिए उनके द्वारा उत्पन्न सभी अंडाणु (100%) केवल X गुणसूत्र वाले ही होते हैं।
- अतः, मादा को समयुग्मकी (homogametic) कहा जाता है।
- नर (Male) के युग्मक:
- नर का जीनोटाइप XY होता है।
- जब उनमें अर्धसूत्री विभाजन द्वारा शुक्राणु (sperms) बनते हैं, तो गुणसूत्रों की संख्या भी आधी हो जाती है।
- नर दो प्रकार के शुक्राणु उत्पन्न करते हैं:
- 50% शुक्राणुओं में X गुणसूत्र होता है।
- 50% शुक्राणुओं में Y गुणसूत्र होता है।
- अतः, नर को विषमयुग्मकी (heterogametic) कहा जाता है।
- निषेचन और संतान का लिंग:
- संतान का लिंग इस बात पर निर्भर करता है कि अंडाणु को किस प्रकार का शुक्राणु निषेचित करता है।
- स्थिति 1: लड़की का जन्म
- यदि X गुणसूत्र वाला शुक्राणु, अंडाणु (जो हमेशा X वाला होता है) को निषेचित करता है, तो बनने वाले युग्मनज (zygote) का जीनोटाइप XX होगा।
- X (sperm) + X (egg) → XX (Female)
- परिणामस्वरूप लड़की (मादा) का जन्म होता है।
- स्थिति 2: लड़के का जन्म
- यदि Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु, अंडाणु को निषेचित करता है, तो बनने वाले युग्मनज का जीनोटाइप XY होगा।
- Y (sperm) + X (egg) → XY (Male)
- परिणामस्वरूप लड़का (नर) का जन्म होता है।
निष्कर्ष:
मनुष्यों में, संतान के लिंग का निर्धारण पिता के शुक्राणु द्वारा किया जाता है, न कि माँ के अंडाणु द्वारा। पिता ही वह कारक है जो या तो X या Y गुणसूत्र प्रदान करता है, जिससे संतान का लिंग निर्धारित होता है।
लिंग निर्धारण का आरेख:
codeCode
माता (Female) पिता (Male)
(44 + XX) (44 + XY)
| |
↓ ↓
युग्मक (Gametes) युग्मक (Gametes)
(अंडाणु – Eggs) (शुक्राणु – Sperms)
(22 + X) 50% (22 + X) और 50% (22 + Y)
| \____________________/ |
| \ |
↓ \ ↓
यदि मिलता है \ यदि मिलता है
(X-शुक्राणु से) \ (Y-शुक्राणु से)
↓ \ ↓
युग्मनज (Zygote) \ युग्मनज (Zygote)
(44 + XX) (44 + XY)
↓ ↓
पुत्री (Daughter) पुत्र (Son)
DNA एवं RNA: संरचना, कार्य और प्रतिकृति
परिचय:
न्यूक्लिक अम्ल (Nucleic Acids) जटिल कार्बनिक अणु होते हैं जो सभी ज्ञात जीवित प्राणियों और वायरस में पाए जाते हैं। ये कोशिका के केंद्रक में मौजूद होते हैं और आनुवंशिक सूचना के भंडारण और हस्तांतरण के लिए जिम्मेदार होते हैं। न्यूक्लिक अम्ल दो मुख्य प्रकार के होते हैं: DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) और RNA (राइबोन्यूक्लिक एसिड)।
1. DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड)
DNA को “जीवन का ब्लूप्रिंट” कहा जाता है, क्योंकि इसमें किसी भी जीव के निर्माण और कार्य के लिए सभी आवश्यक निर्देश कोडित होते हैं।
DNA की संरचना (Structure of DNA)
वॉटसन और क्रिक मॉडल (Watson and Crick Model, 1953):
जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने DNA की द्वि-कुंडलिनी या डबल हेलिक्स (Double Helix) संरचना का प्रसिद्ध मॉडल प्रस्तुत किया।
- दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड शृंखलाएँ: DNA का अणु पॉलीन्यूक्लियोटाइड की दो लंबी शृंखलाओं (strands) से बना होता है, जो एक-दूसरे के चारों ओर एक सर्पिल सीढ़ी की तरह लिपटी होती हैं।
- न्यूक्लियोटाइड (Nucleotide): प्रत्येक पॉलीन्यूक्लियोटाइड शृंखला न्यूक्लियोटाइड नामक छोटी इकाइयों से बनी होती है। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड में तीन घटक होते हैं:
- डीऑक्सीराइबोज शर्करा (Deoxyribose Sugar)
- फॉस्फेट समूह (Phosphate Group)
- नाइट्रोजनी क्षारक (Nitrogenous Base)
- नाइट्रोजनी क्षारक (Nitrogenous Bases): DNA में चार प्रकार के नाइट्रोजनी क्षारक पाए जाते हैं:
- एडेनिन (Adenine – A)
- ग्वानिन (Guanine – G) – (A और G को प्यूरीन कहते हैं)।
- साइटोसिन (Cytosine – C)
- थाइमिन (Thymine – T) – (C और T को पिरामिडीन कहते हैं)।
- क्षारक-युग्मन का नियम (Base Pairing Rule):
- DNA की दोनों शृंखलाएँ इन्हीं क्षारकों के बीच हाइड्रोजन बंध (hydrogen bonds) द्वारा जुड़ी होती हैं।
- यह युग्मन हमेशा एक विशिष्ट नियम का पालन करता है (पूरकता का नियम):
- एडेनिन (A) हमेशा थाइमिन (T) के साथ दो हाइड्रोजन बंधों से जुड़ता है (A=T)।
- ग्वानिन (G) हमेशा साइटोसिन (C) के साथ तीन हाइड्रोजन बंधों से जुड़ता है (G≡C)।
- DNA अणु की चौड़ाई इन्हीं बंधों के कारण स्थिर रहती है।
DNA के कार्य (Functions of DNA):
- आनुवंशिक सूचना का भंडारण (Storage of Genetic Information): इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य जीव की सभी आनुवंशिक सूचनाओं (जीन) को संग्रहीत करना है।
- आनुवंशिक सूचना का हस्तांतरण (Transmission of Genetic Information): यह प्रतिकृति (replication) की प्रक्रिया द्वारा अपनी एक सटीक प्रतिलिपि बनाकर, आनुवंशिक सूचना को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित करता है।
- प्रोटीन संश्लेषण पर नियंत्रण: यह ट्रांसक्रिप्शन (अनुलेखन) द्वारा RNA का निर्माण करके, कोशिका में बनने वाले सभी प्रोटीनों को नियंत्रित करता है, जो अंततः जीव के सभी लक्षणों को नियंत्रित करते हैं।
DNA प्रतिकृति या द्विगुणन (DNA Replication):
यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक DNA अणु अपनी एकदम सही दो प्रतिलिपियाँ बनाता है। यह कोशिका विभाजन की S अवस्था में होती है।
- एंजाइम हेलिकेज (Helicase) DNA की दोनों शृंखलाओं को अलग करता है।
- प्रत्येक पुरानी शृंखला एक टेम्पलेट (template) या साँचे का काम करती है।
- एंजाइम DNA पॉलिमरेज (DNA Polymerase) पुराने टेम्पलेट पर नए पूरक न्यूक्लियोटाइडों को जोड़ता है (A के सामने T, C के सामने G)।
- अंत में, एक मूल DNA अणु से दो नए, समान DNA अणु बन जाते हैं, जिनमें से प्रत्येक में एक शृंखला पुरानी और एक शृंखला नई होती है।
2. RNA (राइबोन्यूक्लिक एसिड)
RNA, DNA के निर्देशों को पढ़ने और प्रोटीन बनाने में मदद करता है। यह सूचना के वाहक और अनुवादक के रूप में कार्य करता है।
RNA की संरचना (Structure of RNA):
- एकल शृंखला: DNA के विपरीत, RNA का अणु आमतौर पर एकल-शृंखला (single-stranded) वाला होता है।
- न्यूक्लियोटाइड घटक: इसके न्यूक्लियोटाइड में भी तीन घटक होते हैं, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण अंतरों के साथ:
- शर्करा: इसमें राइबोज शर्करा (Ribose Sugar) होती है (डीऑक्सीराइबोज की जगह)।
- नाइट्रोजनी क्षारक: RNA में थाइमिन (T) के स्थान पर यूरेसिल (Uracil – U) पाया जाता है। अन्य तीन क्षारक (A, G, C) DNA के समान होते हैं।
- RNA में युग्मन: A के साथ U (A=U) और G के साथ C (G≡C)।
RNA के प्रकार और कार्य (Types and Functions of RNA):
RNA मुख्य रूप से प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) में शामिल होता है। इसके तीन मुख्य प्रकार हैं:
- mRNA (मैसेंजर RNA – दूत RNA):
- कार्य: यह DNA से आनुवंशिक कोड (जेनेटिक कोड) की प्रतिलिपि बनाता है (इस प्रक्रिया को अनुलेखन या ट्रांसक्रिप्शन कहते हैं) और इस संदेश को केंद्रक से बाहर राइबोसोम तक ले जाता है। यह एक संदेशवाहक की तरह काम करता है।
- rRNA (राइबोसोमल RNA):
- कार्य: यह प्रोटीन के साथ मिलकर राइबोसोम की संरचना बनाता है, जो प्रोटीन संश्लेषण का स्थल है (“प्रोटीन फैक्टरी”)।
- tRNA (ट्रांसफर RNA – स्थानांतरण RNA):
- कार्य: इसका कार्य अमीनो अम्लों (amino acids) को कोशिका द्रव्य से पकड़कर राइबोसोम तक लाना है, जहाँ उन्हें mRNA पर मौजूद कोड के अनुसार सही क्रम में जोड़ा जाता है। यह एक अनुवादक या “एडॉप्टर” अणु की तरह काम करता है। इस प्रक्रिया को अनुवादन या ट्रांसलेशन (Translation) कहते हैं।
संक्षेप में, प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया:
DNA —(अनुलेखन)–> mRNA —(अनुवादन)–> प्रोटीन
DNA और RNA के बीच मुख्य अंतर
| विशेषता | DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) | RNA (राइबोन्यूक्लिक एसिड) |
| शृंखला (Strand) | दोहरी-कुंडलिनी (Double Helix) | सामान्यतः एकल-शृंखला (Single Strand) |
| शर्करा (Sugar) | डीऑक्सीराइबोज (Deoxyribose) | राइबोज (Ribose) |
| नाइट्रोजनी क्षारक | A, G, C, T (थाइमिन) | A, G, C, U (यूरेसिल) |
| स्थान (यूकैरियोट में) | मुख्य रूप से केंद्रक (Nucleus) में, कुछ माइटोकॉन्ड्रिया में। | केंद्रक (निर्माण) और कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) में। |
| मुख्य कार्य | आनुवंशिक सूचना का भंडारण और हस्तांतरण। | प्रोटीन संश्लेषण में सहायता। |
| स्थिरता | अत्यधिक स्थिर। | कम स्थिर, आसानी से अपघटित हो जाता है। |
आनुवंशिक विकार (Genetic Disorders)
परिभाषा:
आनुवंशिक विकार ऐसी स्थितियाँ या बीमारियाँ हैं जो किसी व्यक्ति के जीनोम (genome) में असामान्यता के कारण होती हैं। ये असामान्यताएँ एक एकल जीन (single gene) में उत्परिवर्तन (mutation), कई जीनों (multiple genes) में उत्परिवर्तन, गुणसूत्रों (chromosomes) की संख्या या संरचना में परिवर्तन, या पर्यावरणीय कारकों के साथ मिलकर कई जीनों के संयोजन के कारण हो सकती हैं।
ये विकार माता-पिता से वंशानुगत (inherited) हो सकते हैं, या कभी-कभी जीवनकाल के दौरान जीन में नए उत्परिवर्तन (spontaneous mutation) के कारण भी हो सकते हैं।
इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1. मेंडेलियन विकार या एकल-जीन विकार (Mendelian or Single-Gene Disorders)
ये विकार एक एकल जीन में परिवर्तन या उत्परिवर्तन के कारण होते हैं और ये वंशानुगति के मेंडेलियन पैटर्न का पालन करते हैं।
A) अप्रभावी विकार (Recessive Disorders):
ये तब होते हैं जब किसी व्यक्ति को माता और पिता दोनों से एक ही दोषपूर्ण जीन की एक-एक प्रति प्राप्त होती है (जैसे aa)।
- उदाहरण:
- सिकल-सेल एनीमिया (Sickle-Cell Anemia):
- यह एक अलिंग गुणसूत्र अप्रभावी (autosomal recessive) रक्त विकार है।
- इसमें हीमोग्लोबिन अणु असामान्य हो जाता है, जिससे लाल रक्त कोशिकाएँ (RBCs) सामान्य डिस्क के आकार की बजाय हंसिया (sickle) के आकार की हो जाती हैं।
- ये असामान्य कोशिकाएँ कठोर होती हैं, छोटी रक्त वाहिकाओं में फंस जाती हैं, और सामान्य RBCs की तुलना में जल्दी नष्ट हो जाती हैं।
- परिणाम: शरीर में रक्त की कमी (एनीमिया), दर्द, और अंगों को नुकसान।
- थैलेसीमिया (Thalassemia): एक और रक्त विकार जिसमें हीमोग्लोबिन का उत्पादन प्रभावित होता है।
- फेनिलकीटोन्यूरिया (Phenylketonuria – PKU): एक चयापचय विकार।
- सिकल-सेल एनीमिया (Sickle-Cell Anemia):
B) प्रभावी विकार (Dominant Disorders):
ये तब होते हैं जब दोषपूर्ण जीन की केवल एक प्रति (माता या पिता किसी एक से प्राप्त) ही रोग उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होती है (जैसे Aa)।
- उदाहरण:
- हंटिंगटन रोग (Huntington’s Disease): एक प्रगतिशील मस्तिष्क विकार जो तंत्रिका कोशिकाओं के पतन का कारण बनता है।
C) लिंग-सहलग्न विकार (Sex-Linked Disorders):
ये विकार लिंग गुणसूत्रों (X या Y) पर मौजूद जीनों में उत्परिवर्तन के कारण होते हैं। अधिकांश लिंग-सहलग्न विकार X-गुणसूत्र सहलग्न अप्रभावी (X-linked recessive) होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे पुरुषों में अधिक आम होते हैं।
- उदाहरण:
- हीमोफीलिया (Haemophilia):
- इसे “रॉयल डिजीज” भी कहा जाता है।
- यह एक रक्तस्राव विकार है जिसमें रक्त के थक्का जमने की प्रक्रिया में शामिल प्रोटीन (क्लॉटिंग फैक्टर) की कमी हो जाती है।
- परिणाम: छोटी सी चोट लगने पर भी लंबे समय तक या अनियंत्रित रक्तस्राव होता है।
- वर्णान्धता (Colour Blindness):
- यह X-गुणसूत्र पर एक जीन में दोष के कारण होता है।
- इससे पीड़ित व्यक्ति लाल और हरे रंगों के बीच स्पष्ट रूप से अंतर नहीं कर पाता है। यह सबसे आम प्रकार की वर्णान्धता है।
- हीमोफीलिया (Haemophilia):
2. गुणसूत्रीय विकार (Chromosomal Disorders)
ये विकार गुणसूत्रों की संख्या या संरचना में असामान्यताओं के कारण होते हैं। ये कोशिका विभाजन (विशेष रूप से अर्धसूत्री विभाजन) के दौरान गुणसूत्रों के ठीक से अलग न हो पाने (non-disjunction) के कारण होते हैं।
- एन्युप्लोइडी (Aneuploidy): गुणसूत्रों की संख्या में एक या अधिक की कमी या अधिकता।
उदाहरण:
- डाउन सिंड्रोम (Down’s Syndrome) – (ट्राइसोमी 21):
- कारण: यह गुणसूत्र संख्या 21 की एक अतिरिक्त प्रति (Trisomy) के कारण होता है। यानी, व्यक्ति में गुणसूत्र 21 की दो प्रतियों के बजाय तीन प्रतियाँ होती हैं (कुल गुणसूत्र = 47)।
- लक्षण:
- छोटा कद, छोटा, गोल सिर।
- चपटा चेहरा और चौड़ी, सपाट नाक।
- आंशिक रूप से खुला मुंह और बाहर निकली हुई जीभ।
- हाथों की हथेली में विशिष्ट क्रीज (simian crease)।
- शारीरिक, मानसिक और विकासात्मक मंदता।
- क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter’s Syndrome):
- कारण: यह पुरुषों में एक अतिरिक्त X लिंग गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण होता है।
- जीनोटाइप: 44 + XXY (कुल गुणसूत्र = 47)।
- लक्षण:
- व्यक्ति समग्र रूप से पुरुष होता है, लेकिन अल्पविकसित वृषण।
- उसमें कुछ स्त्री जैसे लक्षण विकसित हो सकते हैं, जैसे स्तनों का विकास (गाइनेकोमास्टिया – Gynecomastia)।
- ऐसे पुरुष अनुर्वर (sterile) होते हैं।
- टर्नर सिंड्रोम (Turner’s Syndrome):
- कारण: यह महिलाओं में एक X लिंग गुणसूत्र की अनुपस्थिति के कारण होता है।
- जीनोटाइप: 44 + X0 (कुल गुणसूत्र = 45)।
- लक्षण:
- ऐसी महिलाएँ अनुर्वर (sterile) होती हैं क्योंकि अंडाशय अविकसित होते हैं।
- छोटा कद।
- द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का अभाव।
| विकार (Disorder) | कारण (Cause) | गुणसूत्रों की संख्या (No. of Chromosomes) | लक्षण/प्रभाव (Symptoms/Effects) |
| डाउन सिंड्रोम | गुणसूत्र 21 की ट्राइसोमी | 47 | मानसिक और शारीरिक मंदता, विशिष्ट चेहरे की बनावट। |
| क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम | एक अतिरिक्त X गुणसूत्र (पुरुषों में) | 47 (XXY) | पुरुष अनुर्वर, गाइनेकोमास्टिया। |
| टर्नर सिंड्रोम | एक X गुणसूत्र की कमी (महिलाओं में) | 45 (X0) | महिला अनुर्वर, छोटा कद। |
| हीमोफीलिया | X-सहलग्न अप्रभावी जीन | 46 | रक्त का थक्का न जमना। |
| वर्णान्धता | X-सहलग्न अप्रभावी जीन | 46 | लाल-हरे रंग में भेद न कर पाना। |
| सिकल-सेल एनीमिया | अलिंग गुणसूत्र अप्रभावी जीन | 46 | RBCs का हंसियाकार होना, एनीमिया। |
जीवन की उत्पत्ति एवं विकास के सिद्धांत (Origin of Life and Theories of Evolution)
1. जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life)
“पृथ्वी पर जीवन कैसे शुरू हुआ?” – यह विज्ञान के सबसे मौलिक और आकर्षक सवालों में से एक है। इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए समय-समय पर कई सिद्धांत दिए गए, लेकिन सबसे आधुनिक और व्यापक रूप से स्वीकृत सिद्धांत रासायनिक विकास (Chemical Evolution) या एबायोजेनेसिस (Abiogenesis) है।
ओपेरिन-हाल्डेन परिकल्पना (Oparin-Haldane Hypothesis):
यह परिकल्पना रूसी वैज्ञानिक ए. आई. ओपेरिन (A. I. Oparin) और ब्रिटिश वैज्ञानिक जे. बी. एस. हाल्डेन (J. B. S. Haldane) द्वारा स्वतंत्र रूप से प्रस्तावित की गई थी।
परिकल्पना के मुख्य बिंदु:
- जीवन की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से हुई: इस सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी पर जीवन का पहला रूप पहले से मौजूद निर्जीव अकार्बनिक (non-living inorganic) अणुओं से धीरे-धीरे जटिल कार्बनिक (complex organic) अणुओं के निर्माण के माध्यम से हुआ।
- आदिम पृथ्वी का वातावरण: आदिम पृथ्वी का वातावरण आज के वातावरण से बहुत अलग था। यह अपचायक (reducing) था, यानी इसमें मुक्त ऑक्सीजन (free oxygen – O₂) नहीं थी। इसमें मीथेन (CH₄), अमोनिया (NH₃), हाइड्रोजन (H₂), और जल वाष्प (H₂O) जैसी गैसें थीं।
- ऊर्जा के स्रोत: उस समय ऊर्जा के स्रोत प्रचंड थे – जैसे बिजली (lightning), पराबैंगनी (ultraviolet – UV) किरणें, और ज्वालामुखी विस्फोट।
- सरल कार्बनिक अणुओं का निर्माण: इन उच्च ऊर्जा स्रोतों की उपस्थिति में, अपचायक वातावरण की गैसों ने आपस में क्रिया करके सरल कार्बनिक अणु (simple organic molecules) जैसे अमीनो अम्ल (amino acids), न्यूक्लियोटाइड, शर्करा (sugars) का निर्माण किया।
- जटिल अणुओं का निर्माण: ये सरल अणु पृथ्वी के गर्म महासागरों (जिसे हाल्डेन ने “गर्म तनु सूप” या “प्रीबायोटिक सूप” कहा) में एकत्र हो गए। वहाँ ये आपस में जुड़कर जटिल कार्बनिक बहुलक (complex organic polymers) जैसे प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्ल (nucleic acids) में बदल गए।
- पहली कोशिका का जन्म: अंततः, ये जटिल अणु झिल्लियों के भीतर एकत्रित हो गए, जिससे जीवन के पहले रूप – प्रोटोसेल (protocells) या आद्य-कोशिकाएँ – का निर्माण हुआ, जो धीरे-धीरे विकसित होकर पहली वास्तविक कोशिकाओं में बदल गईं।
मिलर-यूरे प्रयोग (Miller-Urey Experiment, 1953):
स्टेनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने एक प्रयोगशाला प्रयोग द्वारा ओपेरिन-हाल्डेन परिकल्पना का प्रायोगिक प्रमाण दिया। उन्होंने एक बंद फ्लास्क में आदिम पृथ्वी जैसा वातावरण (CH₄, NH₃, H₂, H₂O) बनाया और उसमें कई दिनों तक विद्युत चिंगारी (बिजली) प्रवाहित की। परिणाम में, उन्होंने फ्लास्क के तरल में अमीनो अम्ल जैसे कई सरल कार्बनिक यौगिकों को बनते हुए पाया, जो जीवन के निर्माण खंड हैं।
2. जैव विकास के सिद्धांत (Theories of Evolution)
जीवन की उत्पत्ति के बाद, सरल जीवों से धीरे-धीरे जटिल जीवों का विकास कैसे हुआ, इस प्रक्रिया को जैव विकास (Organic Evolution) कहते हैं। इसे समझाने के लिए दो मुख्य सिद्धांत हैं:
A) लैमार्कवाद (Lamarckism) या “उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धांत”
यह सिद्धांत जीन-बैप्टिस्ट लैमार्क (Jean-Baptiste Lamarck) ने दिया था।
- मुख्य विचार:
- अंगों का उपयोग और अनुपयोग: जीव अपने जीवनकाल में जिन अंगों का अधिक उपयोग करते हैं, वे अधिक विकसित और मजबूत हो जाते हैं, और जिन अंगों का उपयोग नहीं करते, वे धीरे-धीरे कमजोर होकर विलुप्त हो जाते हैं।
- उपार्जित लक्षणों की वंशागति: जीव द्वारा अपने जीवनकाल में अर्जित किए गए इन परिवर्तनों (उपार्जित लक्षणों) को वह अपनी संतानों में स्थानांतरित कर देता है।
- उदाहरण: जिराफ की गर्दन का लंबा होना। लैमार्क के अनुसार, जिराफों ने ऊँचे पेड़ों की पत्तियों तक पहुँचने के लिए अपनी गर्दन को लगातार खींचा। यह “उपार्जित” लंबापन अगली पीढ़ी में चला गया, और पीढ़ियों तक यह प्रक्रिया दोहराने से जिराफ की गर्दन लंबी हो गई।
- आलोचना: यह सिद्धांत गलत साबित हुआ क्योंकि यह ज्ञात है कि केवल आनुवंशिक (genetic) परिवर्तन ही वंशानुगत होते हैं, जीवनकाल में प्राप्त शारीरिक परिवर्तन नहीं (जैसे एक पहलवान का बच्चा जन्म से ही पहलवान नहीं होता)।
B) डार्विनवाद (Darwinism) या “प्राकृतिक चयन द्वारा विकास का सिद्धांत”
यह सिद्धांत चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “The Origin of Species” (1859) में प्रस्तुत किया था। यह जैव विकास का सबसे मान्य और मूलभूत सिद्धांत है।
मुख्य अवलोकन और विचार:
- अत्यधिक जनन क्षमता (Overproduction): सभी जीव अपनी क्षमता से अधिक संतान उत्पन्न करते हैं, लेकिन आबादी लगभग स्थिर रहती है।
- जीवन के लिए संघर्ष (Struggle for Existence): सीमित संसाधनों (भोजन, स्थान) के कारण, जीवों को जीवित रहने के लिए आपस में और अपने पर्यावरण के साथ संघर्ष करना पड़ता है।
- विभिन्नता (Variation): किसी भी प्रजाति की आबादी में जीव एक-दूसरे से थोड़े भिन्न होते हैं। ये विभिन्नताएँ उन्हें विरासत में मिलती हैं।
- योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest): इस संघर्ष में, वे जीव जीवित रहने और जनन करने में अधिक सफल होते हैं जिनके पास अनुकूल विभिन्नताएँ (favourable variations) होती हैं, जो उन्हें अपने पर्यावरण में बेहतर रूप से अनुकूलित करती हैं। (इस वाक्यांश का प्रयोग हर्बर्ट स्पेंसर ने किया था, लेकिन यह डार्विन के विचार से मेल खाता है)।
- प्राकृतिक चयन (Natural Selection): प्रकृति “चयन” करती है कि कौन से जीव जीवित रहेंगे और अगली पीढ़ी में अपने अनुकूल जीन स्थानांतरित करेंगे। धीरे-धीरे, प्रतिकूल विभिन्नता वाले जीव समाप्त हो जाते हैं।
- नई प्रजाति की उत्पत्ति: यह प्रक्रिया जब हजारों-लाखों वर्षों तक चलती रहती है, तो अनुकूल विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमा होती जाती हैं, और अंततः एक नई प्रजाति का जन्म होता है जो अपने पूर्वजों से बहुत अलग होती है।
- डार्विन का उदाहरण: जिराफ की आबादी में, शुरू से ही कुछ लंबी गर्दन वाले और कुछ छोटी गर्दन वाले जिराफ थे (विभिन्नता)। जब जमीन की घास खत्म हो गई, तो केवल लंबी गर्दन वाले जिराफ ही ऊँचे पेड़ों की पत्तियाँ खाकर जीवित रह सके (जीवन संघर्ष और योग्यतम की उत्तरजीविता)। इसलिए, प्रकृति ने लंबी गर्दन वाले जिराफों का चयन किया। उन्होंने जनन किया और अपनी लंबी गर्दन का गुण अगली पीढ़ी में दिया, जबकि छोटी गर्दन वाले धीरे-धीरे समाप्त हो गए।
जनन (Reproduction): पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन
जनन (Reproduction): यह वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव जीव (माता-पिता) अपने समान नए जीव (संतान) को जन्म देते हैं। यह प्रक्रिया प्रजाति की निरंतरता (continuity of species) सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction in Flowering Plants)
पुष्पी पादपों, यानी एंजियोस्पर्म (Angiosperms) में पुष्प (Flower) लैंगिक जनन का मुख्य अंग है। एक पुष्प में नर और मादा दोनों जनन अंग हो सकते हैं। लैंगिक जनन में नर युग्मक (male gamete) और मादा युग्मक (female gamete) का संलयन होता है, जिससे बीज और फल का निर्माण होता है।
1. पुष्प की संरचना (Structure of a Flower)
एक पूर्ण (complete) पुष्प के चार मुख्य चक्र होते हैं:
- बाह्यदलपुंज (Calyx):
- यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र है, जो बाह्यदलों (sepals) से बना होता है।
- ये आमतौर पर हरे रंग के होते हैं और कली अवस्था में पुष्प की रक्षा करते हैं।
- दलपुंज (Corolla):
- यह बाह्यदलों के भीतर स्थित होता है और दलों या पंखुड़ियों (petals) से बना होता है।
- ये प्रायः रंगीन और सुगंधित होते हैं, जिसका मुख्य कार्य परागण (pollination) के लिए कीटों को आकर्षित करना है।
- पुमंग (Androecium): (नर जनन अंग)
- यह पुष्प का नर जनन चक्र है।
- यह पुंकेसरों (stamens) से मिलकर बना होता है। प्रत्येक पुंकेसर के दो भाग होते हैं:
- परागकोश (Anther): यह पुंकेसर का ऊपरी फूला हुआ भाग है, जिसके अंदर परागकण (pollen grains) बनते हैं। परागकणों के अंदर ही नर युग्मक (male gametes) होते हैं।
- पुतंतु (Filament): वह डंठल जो परागकोश को पुष्प से जोड़ता है।
- जायांग (Gynoecium / Pistil): (मादा जनन अंग)
- यह पुष्प का केंद्रीय और मादा जनन चक्र है।
- यह एक या एक से अधिक स्त्रीकेसर या अंडप (carpels) से बना होता है। प्रत्येक स्त्रीकेसर के तीन भाग होते हैं:
- वर्तिकाग्र (Stigma): यह सबसे ऊपरी, चिपचिपा भाग है जो परागण के दौरान परागकणों को ग्रहण करता है।
- वर्तिका (Style): यह वर्तिकाग्र और अंडाशय के बीच की लंबी, पतली नली है।
- अंडाशय (Ovary): यह स्त्रीकेसर का निचला, फूला हुआ भाग है, जिसके अंदर बीजांड (ovules) स्थित होते हैं। प्रत्येक बीजांड में मादा युग्मक या अंड कोशिका (female gamete or egg cell) होती है।
2. लैंगिक जनन की प्रक्रिया (Process of Sexual Reproduction)
A) परागण (Pollination):
“परागकणों (pollen grains) का परागकोश (anther) से वर्तिकाग्र (stigma) तक स्थानांतरण परागण कहलाता है।”
- यह जनन का पहला चरण है। यह दो प्रकार का होता है:
- स्व-परागण (Self-Pollination): जब एक ही पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर या उसी पौधे के दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं।
- पर-परागण (Cross-Pollination): जब एक पौधे के पुष्प के परागकण, उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। पर-परागण के लिए बाह्य कारकों की आवश्यकता होती है, जैसे- वायु (anemophily), जल (hydrophily), और जंतु (zoophily) (मुख्य रूप से कीट- entomophily)।
B) निषेचन (Fertilization):
“नर युग्मक का मादा युग्मक (अंड कोशिका) के साथ संलयन निषेचन कहलाता है।”
- परागण के बाद, परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होता है और एक पराग नलिका (pollen tube) का निर्माण करता है।
- यह पराग नलिका वर्तिका से होते हुए अंडाशय में स्थित बीजांड तक पहुँचती है।
- पराग नलिका में दो नर युग्मक होते हैं।
- पराग नलिका बीजांड में प्रवेश करती है और दोनों नर युग्मकों को भ्रूण-कोष (embryo sac) में छोड़ देती है।
दोहरा निषेचन (Double Fertilization) – एंजियोस्पर्म का अद्वितीय गुण:
- एक नर युग्मक, अंड कोशिका (egg cell) से संलयित होकर युग्मनज (Zygote) बनाता है, जो बाद में विकसित होकर भ्रूण (Embryo) बनता है। (यह वास्तविक निषेचन है)।
- दूसरा नर युग्मक, भ्रूण-कोष के केंद्र में स्थित दो ध्रुवीय केंद्रकों (polar nuclei) से संलयित होकर प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (Primary Endosperm Nucleus – PEN) बनाता है, जो बाद में विकसित होकर भ्रूणपोष (Endosperm) बनाता है।
- भ्रूणपोष: यह विकासशील भ्रूण को पोषण प्रदान करने वाला ऊतक है। (नारियल का पानी और सफेद गुदा भ्रूणपोष का अच्छा उदाहरण है)।
3. निषेचन के बाद के परिवर्तन: बीज और फल का निर्माण
निषेचन के बाद, पुष्प में कई परिवर्तन होते हैं:
- बीजांड (Ovule) → बीज (Seed) में विकसित हो जाता है।
- बीज के अंदर भविष्य का पौधा, यानी भ्रूण (embryo), और संग्रहीत भोजन, यानी भ्रूणपोष (endosperm) होता है। बीज एक कठोर बीजावरण (seed coat) से ढका होता है।
- अंडाशय (Ovary) → फल (Fruit) में विकसित हो जाता है।
- अंडाशय की दीवार, फलभित्ति (pericarp) या फल के छिलके का निर्माण करती है।
- पुष्प के अन्य भाग: बाह्यदल, दल, पुंकेसर, वर्तिका, और वर्तिकाग्र मुरझाकर गिर जाते हैं।
निष्कर्ष: इस प्रकार, लैंगिक जनन से बीज का निर्माण होता है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भ्रूण को सुरक्षित रखता है और अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर एक नए पौधे को जन्म देता है। फल बीजों की रक्षा करता है और उनके प्रकीर्णन (dispersal) में मदद करता है।
मानव जनन (Human Reproduction)
परिभाषा:
मानव जनन (Human Reproduction) वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य लैंगिक रूप से अपनी संतति उत्पन्न करते हैं। यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें पुरुष और महिला के जनन तंत्र, युग्मक निर्माण (gametogenesis), निषेचन, भ्रूणीय विकास और प्रसव शामिल हैं।
मनुष्य एकलिंगी (unisexual) होते हैं, अर्थात नर और मादा अलग-अलग होते हैं, और सजीव प्रजक या जरायुज (viviparous) होते हैं, अर्थात मादा सीधे शिशु को जन्म देती है।
1. पुरुष जनन तंत्र (Male Reproductive System)
इसका मुख्य कार्य नर युग्मक (male gametes), यानी शुक्राणु (sperms) का उत्पादन करना और उन्हें महिला के जनन पथ में स्थानांतरित करना है। इसके मुख्य अंग हैं:
- वृषण (Testes – एक जोड़ी):
- ये प्राथमिक नर जनन अंग हैं। ये उदर गुहा के बाहर एक थैलीनुमा संरचना, जिसे वृषण कोष (scrotum) कहते हैं, में स्थित होते हैं।
- वृषण कोष का तापमान शरीर के तापमान से 2-2.5°C कम होता है, जो शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक है।
- कार्य:
- शुक्राणु (Sperms) का उत्पादन करना।
- नर हार्मोन टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) का स्राव करना, जो द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (जैसे- दाढ़ी-मूंछ का आना, आवाज का भारी होना) को नियंत्रित करता है।
- सहायक नलिकाएँ (Accessory Ducts):
- इनमें अधिवृषण (epididymis), शुक्र वाहक (vas deferens), और मूत्रमार्ग (urethra) शामिल हैं।
- कार्य: ये शुक्राणुओं का भंडारण और उन्हें वृषण से बाहर शरीर तक ले जाने का मार्ग प्रदान करती हैं।
- सहायक ग्रंथियाँ (Accessory Glands):
- इनमें शुक्राशय (seminal vesicles), प्रोस्टेट ग्रंथि (prostate gland), और बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथियाँ शामिल हैं।
- कार्य: ये ग्रंथियाँ एक तरल पदार्थ का स्राव करती हैं, जिसे वीर्य प्लाज्मा (seminal plasma) कहते हैं।
- वीर्य प्लाज्मा + शुक्राणु = वीर्य (Semen)। यह प्लाज्मा शुक्राणुओं को पोषण और गतिशीलता प्रदान करता है और उन्हें एक तरल माध्यम उपलब्ध कराता है।
- शिश्न (Penis):
- यह बाह्य जनन अंग है, जो मैथुन के दौरान वीर्य को मादा की योनि में स्थानांतरित करने का कार्य करता है।
2. महिला जनन तंत्र (Female Reproductive System)
इसका कार्य मादा युग्मक (female gamete), यानी अंडाणु (ovum or egg) का उत्पादन करना, निषेचन के लिए स्थान प्रदान करना, भ्रूण का पोषण करना और शिशु को जन्म देना है।
- अंडाशय (Ovaries – एक जोड़ी):
- ये प्राथमिक मादा जनन अंग हैं, जो उदर गुहा के निचले भाग में स्थित होते हैं।
- कार्य:
- अंडाणु (Ova/Eggs) का उत्पादन करना।
- मादा हार्मोन एस्ट्रोजन (Estrogen) और प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) का स्राव करना।
- अंडवाहिनी / फैलोपियन ट्यूब (Oviduct / Fallopian Tube – एक जोड़ी):
- ये अंडाशय से गर्भाशय तक फैली पतली नलिकाएँ हैं।
- अंडोत्सर्ग (Ovulation) के बाद अंडाणु यहीं आता है।
- निषेचन (Fertilization) की क्रिया अंडवाहिनी में ही होती है।
- गर्भाशय (Uterus):
- यह एक नाशपाती के आकार का, मोटी दीवारों वाला पेशीय अंग है।
- कार्य: निषेचित अंडाणु (भ्रूण) का रोपण (implantation) और पूर्ण विकास (development of foetus) गर्भाशय के अंदर ही होता है। गर्भावस्था के दौरान यह फैलता है।
- गर्भाशय ग्रीवा (Cervix):
- यह गर्भाशय का निचला, संकरा भाग है जो योनि में खुलता है।
- योनि (Vagina):
- यह एक पेशीय नली है जो मैथुन के दौरान शुक्राणुओं को ग्रहण करती है और प्रसव के दौरान जन्म-नाल (birth canal) के रूप में कार्य करती है।
प्रमुख घटनाएँ: युग्मक निर्माण से लेकर भ्रूण विकास तक
1. युग्मक जनन (Gametogenesis):
- पुरुषों में शुक्रजनन (Spermatogenesis): वृषण में निरंतर शुक्राणुओं का निर्माण।
- महिलाओं में अंडजनन (Oogenesis): अंडाशय में अंडाणुओं का निर्माण। एक महिला के जीवनकाल में सीमित संख्या में ही अंडाणु परिपक्व होते हैं।
2. अंडोत्सर्ग (Ovulation):
- मासिक धर्म चक्र (menstrual cycle) के लगभग 14वें दिन, अंडाशय से एक परिपक्व अंडाणु का निकलकर अंडवाहिनी में आना।
3. मैथुन और वीर्यसेचन (Copulation and Insemination):
- मैथुन (intercourse) के दौरान पुरुष द्वारा वीर्य (जिसमें लाखों शुक्राणु होते हैं) को स्त्री की योनि में स्खलित किया जाता है।
4. निषेचन (Fertilization):
- परिभाषा: “अगुणित (haploid, n) नर युग्मक (शुक्राणु) का अगुणित मादा युग्मक (अंडाणु) के साथ संलयित होकर एक द्विगुणित (diploid, 2n) युग्मनज (Zygote) बनाने की प्रक्रिया निषेचन कहलाती है।”
- स्थान: यह क्रिया मादा की अंडवाहिनी (Fallopian tube) में होती है।
- प्रक्रिया: लाखों शुक्राणुओं में से केवल एक ही शुक्राणु अंडाणु की दीवार को भेदकर उसके अंदर प्रवेश कर पाता है। प्रवेश करते ही अंडाणु एक रासायनिक अवरोध बना देता है ताकि अन्य शुक्राणु प्रवेश न कर सकें।
- युग्मनज (Zygote) मानव जीवन की पहली कोशिका है।
5. विदलन, रोपण और गर्भावस्था (Cleavage, Implantation, and Pregnancy):
- विदलन (Cleavage): युग्मनज में तेजी से समसूत्री विभाजन (mitosis) शुरू होता है, और यह एक गेंद जैसी संरचना बनाता है जिसे भ्रूण (Embryo) कहते हैं।
- रोपण (Implantation): निषेचन के लगभग 6-9 दिन बाद, यह भ्रूण गर्भाशय की मोटी आंतरिक दीवार (एंडोमेट्रियम – Endometrium) से जुड़ जाता है। इस प्रक्रिया को रोपण कहते हैं और यहीं से गर्भावस्था (pregnancy) की शुरुआत होती है।
- प्लेसेंटा (Placenta): रोपण के बाद, माँ और विकासशील भ्रूण के बीच एक संरचनात्मक और कार्यात्मक संबंध स्थापित होता है जिसे प्लेसेंटा या अपरा कहते हैं।
- प्लेसेंटा का कार्य: यह विकासशील भ्रूण को माँ के रक्त से पोषण (nutrients) और ऑक्सीजन (O₂) प्रदान करता है तथा भ्रूण के अपशिष्ट पदार्थों (जैसे CO₂, यूरिया) को हटाकर माँ के रक्त में डाल देता है।
- गर्भकाल (Gestation Period): मनुष्य में गर्भावस्था की अवधि लगभग 9 महीने (या लगभग 280 दिन) होती है।
6. प्रसव (Parturition):
- गर्भावस्था के अंत में, गर्भाशय में तीव्र संकुचन के कारण शिशु का जन्म होता है। इस प्रक्रिया को प्रसव कहते हैं।
जनन स्वास्थ्य (Reproductive Health)
परिभाषा:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जनन स्वास्थ्य (Reproductive Health) का अर्थ केवल जनन संबंधी रोगों या दुर्बलता की अनुपस्थिति मात्र नहीं है, बल्कि यह जनन के सभी पहलुओं, यानी शारीरिक, भावनात्मक, व्यावहारिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होने की एक अवस्था है।
इसका उद्देश्य लोगों को एक जिम्मेदार, सुरक्षित और संतोषजनक यौन जीवन जीने में सक्षम बनाना है, जिसमें उन्हें यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता और क्षमता हो कि वे कब और कितनी बार संतान उत्पन्न करना चाहते हैं।
जनन स्वास्थ्य के प्रमुख पहलू (Major Aspects of Reproductive Health)
जनन स्वास्थ्य एक व्यापक विषय है जिसमें कई महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं:
1. यौन संचारित रोग (Sexually Transmitted Diseases – STDs)
- परिभाषा: वे संक्रमण या रोग जो मुख्य रूप से असुरक्षित यौन संपर्क (unprotected sexual contact) के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं, यौन संचारित रोग कहलाते हैं। इन्हें रतिज रोग (Venereal Diseases – VD) या जनन मार्ग संक्रमण (Reproductive Tract Infections – RTI) भी कहा जाता है।
- कारण: ये रोग जीवाणु (bacteria), विषाणु (virus), प्रोटोजोआ और कवक के कारण हो सकते हैं।
- प्रमुख उदाहरण:
- जीवाणु जनित: सिफलिस (Syphilis), गोनोरिया (Gonorrhoea)।
- विषाणु जनित:
- एड्स (AIDS – Acquired Immuno Deficiency Syndrome): यह एचआईवी (HIV – Human Immunodeficiency Virus) नामक वायरस के कारण होता है। यह वायरस शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) पर हमला करता है, जिससे शरीर सामान्य संक्रमणों से भी लड़ने में असमर्थ हो जाता है।
- हर्पीस (Herpes): जननांगों पर दाद।
- हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis-B): यह यकृत का एक गंभीर संक्रमण है।
- रोकथाम:
- असुरक्षित यौन संबंधों से बचना।
- एक से अधिक साथियों के साथ यौन संबंध न रखना।
- संभोग के दौरान कंडोम (Condom) का उपयोग करना संक्रमण के जोखिम को काफी कम कर देता है।
- संक्रमण का कोई भी लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना।
2. जनसंख्या विस्फोट और जन्म नियंत्रण (Population Explosion and Birth Control)
- जनसंख्या विस्फोट: बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और मृत्यु दर में कमी के कारण विश्व की, विशेषकर भारत की, जनसंख्या में तीव्र वृद्धि को जनसंख्या विस्फोट कहा जाता है।
- प्रभाव: इसके कारण भोजन, आवास, शिक्षा, और रोजगार जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
- जन्म नियंत्रण / गर्भनिरोधन (Birth Control / Contraception):
- परिभाषा: गर्भधारण को रोकने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपायों या विधियों को गर्भनिरोधक (contraceptives) कहते हैं। ये विधियाँ जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- गर्भनिरोधक विधियाँ:
- प्राकृतिक विधियाँ (Natural Methods): इसमें आवधिक संयम (periodic abstinence) और स्तनपान अनार्तव (lactational amenorrhea) शामिल हैं। इनकी विफलता दर अधिक होती है।
- रोध विधि (Barrier Methods): ये विधियाँ शुक्राणु और अंडाणु को भौतिक रूप से मिलने से रोकती हैं।
- उदाहरण: कंडोम (Condoms) (पुरुषों और महिलाओं के लिए), डायाफ्राम। कंडोम STDs से भी सुरक्षा प्रदान करता है।
- अंतर्गर्भाशयी युक्तियाँ (Intra-Uterine Devices – IUDs):
- ये युक्तियाँ (जैसे- कॉपर-टी – Copper-T, मल्टीलोड) डॉक्टरों द्वारा गर्भाशय में लगाई जाती हैं। ये शुक्राणुओं की गतिशीलता को कम करती हैं और निषेचन को रोकती हैं।
- हार्मोनल विधियाँ (Hormonal Methods):
- इसमें गर्भनिरोधक गोलियां (oral contraceptive pills) शामिल हैं, जो हार्मोन (एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन) से बनी होती हैं। ये गोलियाँ अंडोत्सर्ग (ovulation) को रोकती हैं। आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियाँ भी इसी श्रेणी में आती हैं।
- शल्यक्रिया विधियाँ / बंध्यकरण (Surgical Methods / Sterilization):
- यह गर्भनिरोधन की एक स्थायी विधि है।
- पुरुष नसबंदी (Vasectomy): पुरुषों में शुक्र वाहिकाओं (vas deferens) को काटकर बांध दिया जाता है, जिससे शुक्राणु वीर्य में नहीं आ पाते।
- महिला नसबंदी (Tubectomy): महिलाओं में अंडवाहिनियों (fallopian tubes) को काटकर बांध दिया जाता है, जिससे अंडाणु गर्भाशय तक नहीं पहुँच पाता और निषेचन रुक जाता है।
3. चिकित्सा सगर्भता समापन (Medical Termination of Pregnancy – MTP)
- परिभाषा: गर्भावस्था पूर्ण होने से पहले, जानबूझकर या स्वैच्छिक रूप से गर्भ के समापन को प्रेरित गर्भपात (induced abortion) या एमटीपी कहते हैं।
- कानूनी पहलू: भारत में, कुछ विशेष परिस्थितियों में (जैसे- बलात्कार, भ्रूण में गंभीर विकृति, या माँ के जीवन को खतरा) कानूनी रूप से एमटीपी की अनुमति है।
- सुरक्षा: एमटीपी हमेशा एक योग्य चिकित्सक द्वारा ही कराया जाना चाहिए। गर्भावस्था की पहली तिमाही (first trimester – 12 सप्ताह तक) में यह अपेक्षाकृत सुरक्षित होता है।
4. बंध्यता / बांझपन (Infertility)
- परिभाषा: असुरक्षित सहवास के बावजूद संतान उत्पन्न करने में असमर्थता को बंध्यता कहते हैं। यह समस्या पुरुष, महिला या दोनों में हो सकती है।
- सहायक जनन प्रौद्योगिकी (Assisted Reproductive Technologies – ART): बंध्यता के उपचार के लिए कई तकनीकों का विकास हुआ है:
- टेस्ट-ट्यूब बेबी / इन-विट्रो निषेचन (In-Vitro Fertilization – IVF): इसमें अंडाणु और शुक्राणु का संलयन शरीर के बाहर, प्रयोगशाला में (“इन-विट्रो”) कराया जाता है। बनने वाले भ्रूण को फिर महिला के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है।
- ZIFT (Zygote Intra Fallopian Transfer): IVF द्वारा बने युग्मनज (zygote) को अंडवाहिनी में स्थानांतरित करना।
- IUI (Intra-Uterine Insemination): शुक्राणुओं को कृत्रिम रूप से सीधे गर्भाशय में डालना।
निष्कर्ष:
जनन स्वास्थ्य, व्यक्तिगत स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यौन शिक्षा, यौन संचारित रोगों के बारे में जागरूकता, और जन्म नियंत्रण के सुरक्षित तरीकों तक पहुंच एक स्वस्थ समाज के निर्माण में मदद करती है।
मानव स्वास्थ्य एवं रोग (Human Health and Diseases)
स्वास्थ्य (Health): विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, “स्वास्थ्य केवल रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की अवस्था है।”
रोग (Disease): “रोग” का शाब्दिक अर्थ है ‘आराम में बाधा’। यह शरीर या उसके किसी अंग की वह अवस्था है जब उसकी कार्यप्रणाली में कोई दोष या असामान्यता आ जाती है, जिससे विभिन्न लक्षण प्रकट होते हैं।
रोग मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
- संक्रामक रोग (Infectious Diseases): वे रोग जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं। ये रोगाणुओं (pathogens) जैसे जीवाणु, विषाणु, कवक, प्रोटोजोआ द्वारा होते हैं।
- असंक्रामक रोग (Non-infectious Diseases): वे रोग जो एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलते। ये आनुवंशिक, चयापचय संबंधी या जीवनशैली के कारण हो सकते हैं (जैसे- कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग)।
मानव में होने वाले सामान्य संक्रामक रोग
यहाँ रोगाणुओं के प्रकार के आधार पर वर्गीकृत कुछ प्रमुख संक्रामक रोग दिए गए हैं:
1. जीवाणु जनित रोग (Bacterial Diseases)
| रोग का नाम | कारक जीवाणु (Bacterium) | प्रभावित अंग / लक्षण | संचरण का माध्यम |
| टाइफाइड (Typhoid) | साल्मोनेला टाइफी | छोटी आंत, लगातार तेज बुखार, कमजोरी, पेट दर्द, सिरदर्द। (विडाल टेस्ट से पुष्टि) | दूषित भोजन एवं जल |
| निमोनिया (Pneumonia) | स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी, हीमोफिलस इन्फ्लुएंजी | फेफड़ों की वायुकोष्ठिका (Alveoli), वायुकोष्ठिका में तरल भर जाना, तेज बुखार, खांसी, सांस लेने में कठिनाई। | संक्रमित व्यक्ति के खांसने/छींकने से निकले ड्रॉपलेट्स |
| हैजा (Cholera) | विब्रियो कॉलेरी | आंत, लगातार दस्त, उल्टी, गंभीर निर्जलीकरण (dehydration)। | दूषित भोजन एवं जल |
| क्षय रोग / टी.बी. (Tuberculosis – TB) | माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस | मुख्यतः फेफड़े, लगातार खांसी, बलगम में खून आना, सीने में दर्द, बुखार। (BCG का टीका रोकथाम के लिए) | वायु (हवा) द्वारा |
| डिप्थीरिया (Diphtheria) | कोरिनेबैक्टीरियम डिप्थीरिया | गला, सांस की नली, गले में एक झिल्ली बन जाना, सांस लेने में रुकावट, बुखार। | ड्रॉपलेट संक्रमण |
| टिटेनस (Tetanus) | क्लोस्ट्रीडियम टेटानी | तंत्रिका तंत्र, मांसपेशियों में जकड़न (विशेषकर जबड़े का बंद होना – ‘लॉक-जॉ’)। | चोट/घाव का मिट्टी के संपर्क में आना |
| प्लेग (Plague) | यर्सिनिया पेस्टिस | तीव्र बुखार, गिल्टियों में सूजन। | संक्रमित पिस्सू (चूहों पर पाए जाने वाले) |
2. विषाणु जनित रोग (Viral Diseases)
| रोग का नाम | कारक विषाणु (Virus) | प्रभावित अंग / लक्षण | संचरण का माध्यम |
| सामान्य जुकाम (Common Cold) | राइनोवायरस (Rhinovirus) | नाक, श्वसन पथ, नाक बहना, गले में खराश, खांसी, सिरदर्द। | ड्रॉपलेट संक्रमण, संक्रमित वस्तुओं को छूना |
| इन्फ्लुएंजा (Influenza / Flu) | मिक्सोवायरस | पूरा श्वसन तंत्र, तेज बुखार, बदन दर्द, खांसी, सिरदर्द। | ड्रॉपलेट संक्रमण |
| एड्स (AIDS) | HIV (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस) | प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System – T-कोशिकाएं), शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता खत्म हो जाना। (एलाइजा टेस्ट से पुष्टि) | असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित रक्त, माँ से बच्चे को |
| डेंगू (Dengue) | डेंगू वायरस (अरबोवायरस) | संपूर्ण शरीर, तेज बुखार, सिरदर्द, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, प्लेटलेट्स में कमी। | मादा एडीज एजिप्टी मच्छर |
| पोलियो (Polio) | पोलियो वायरस | तंत्रिका तंत्र (विशेषकर मेरु रज्जु), मांसपेशियों में पक्षाघात (paralysis)। | दूषित भोजन एवं जल |
| खसरा (Measles) | मोरबिलीवायरस | श्वसन तंत्र, त्वचा पर लाल चकत्ते, तेज बुखार। | हवा / ड्रॉपलेट संक्रमण |
| रेबीज (Rabies) / हाइड्रोफोबिया | रैबडोवायरस | केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, पानी से डर (hydrophobia), व्यवहार में परिवर्तन। | संक्रमित जानवर (कुत्ता, बंदर) के काटने से |
| छोटी माता / चेचक (Chicken Pox) | वैरिसेला-जोस्टर वायरस | संपूर्ण शरीर, बुखार, त्वचा पर खुजली वाले दाने और फफोले। | हवा, सीधे संपर्क से |
| हेपेटाइटिस (Hepatitis) | हेपेटाइटिस वायरस (A,B,C आदि) | यकृत (Liver), पीलिया (त्वचा, आंखों का पीला होना), पेट दर्द। | दूषित भोजन/जल (Hep-A), संक्रमित रक्त/शारीरिक तरल (Hep-B) |
3. प्रोटोजोआ जनित रोग (Protozoan Diseases)
| रोग का नाम | कारक प्रोटोजोआ | प्रभावित अंग / लक्षण | वाहक / संचरण का माध्यम |
| मलेरिया (Malaria) | प्लाज्मोडियम की विभिन्न प्रजातियाँ | यकृत, लाल रक्त कणिकाएं (RBCs), निश्चित अंतराल पर ठंड लगकर तेज बुखार आना। | मादा एनोफिलीज (Anopheles) मच्छर |
| अमीबता (Amoebiasis)/अमीबी पेचिश | एंटअमीबा हिस्टोलिटिका | बड़ी आंत, पेट में ऐंठन, श्लेष्मा और रक्त के साथ दस्त। | दूषित भोजन एवं जल (घरेलू मक्खी द्वारा फैलता है) |
| काला-जार (Kala-azar) | लीशमैनिया डोनोवानी | अस्थि मज्जा, प्लीहा, कई हफ्तों तक बुखार। | बालू मक्खी (Sand Fly) |
| निद्रा रोग (Sleeping Sickness) | ट्रिपैनोसोमा | मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, बुखार, अत्यधिक नींद आना। | सीसी मक्खी (Tse-tse Fly) |
4. कवक जनित रोग (Fungal Diseases)
| रोग का नाम | कारक कवक | प्रभावित अंग / लक्षण |
| दाद (Ringworm) | माइक्रोस्पोरम, ट्राइकोफाइटॉन | त्वचा, नाखून, सिर की त्वचा पर सूखी, परतदार और खुजली वाली लाल चकत्ते। |
| एथलीट फुट (Athlete’s Foot) | टीनिया पेडिस | पैरों की उंगलियों के बीच की त्वचा का संक्रमित होना, खुजली। |
| दाद (Scabies) | एकेरस स्केबीज | त्वचा पर अत्यधिक खुजली वाले छोटे दाने और दरारें। |
5. कृमि जनित रोग (Helminthic Diseases)
| रोग का नाम | कारक कृमि | प्रभावित अंग / लक्षण |
| एस्केरिऐसिस | एस्केरिस (गोल कृमि) | छोटी आंत, आंतरिक रक्तस्राव, पेट दर्द, एनीमिया। |
| फाइलेरिया / हाथीपाँव (Filariasis / Elephantiasis) | वुचेरेरिया बैनक्रॉफ्टी (फाइलेरिया कृमि) | लसीका वाहिकाएँ, पैरों और जननांगों में दीर्घकालिक सूजन। (क्यूलेक्स मच्छर द्वारा फैलता है) |
प्रतिरक्षा प्रणाली और टीके
1. प्रतिरक्षा या असंक्राम्यता (Immunity)
परिभाषा:
प्रतिरक्षा (Immunity), हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की समग्र क्षमता है। यह बाहरी रोगाणुओं (pathogens) जैसे बैक्टीरिया, वायरस, कवक आदि को पहचानने, उन्हें निष्क्रिय करने और नष्ट करने की एक जटिल प्रणाली है। यह प्रणाली हमें संक्रमणों से बचाती है।
प्रतिरक्षा प्रणाली का अध्ययन प्रतिरक्षा विज्ञान (Immunology) कहलाता है। इस प्रणाली के मुख्य योद्धा श्वेत रक्त कणिकाएँ (WBCs), विशेष रूप से लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes – B और T कोशिकाएँ) होते हैं।
प्रतिरक्षा मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:
A) सहज या जन्मजात प्रतिरक्षा (Innate Immunity)
- परिभाषा: यह प्रतिरक्षा हमारे शरीर में जन्म से ही मौजूद होती है। यह अविशिष्ट (non-specific) होती है, जिसका अर्थ है कि यह सभी प्रकार के रोगाणुओं के विरुद्ध एक समान तरीके से कार्य करती है। यह हमारे शरीर की रक्षा की पहली पंक्ति है।
- घटक: इसमें कई प्रकार के अवरोध (barriers) शामिल हैं:
- शारीरिक अवरोध (Physical Barriers):
- त्वचा (Skin): यह शरीर का मुख्य भौतिक अवरोध है जो सूक्ष्मजीवों को प्रवेश करने से रोकती है।
- श्लेष्मा झिल्ली (Mucus Membrane): श्वसन पथ, जठरांत्र पथ आदि में मौजूद श्लेष्मा (म्यूकस) रोगाणुओं को फँसा लेती है।
- कारिकीय अवरोध (Physiological Barriers):
- आमाशय में अम्ल (HCl): भोजन के साथ आए जीवाणुओं को नष्ट कर देता है।
- मुँह में लार और आँखों में आँसू: इनमें लाइसोजाइम (Lysozyme) नामक एंजाइम होता है जो बैक्टीरिया को मारता है।
- कोशिकीय अवरोध (Cellular Barriers):
- श्वेत रक्त कणिकाएँ (WBCs): जैसे न्यूट्रोफिल और मोनोसाइट्स, जो भक्षकाणु क्रिया (phagocytosis) द्वारा रोगाणुओं को निगलकर नष्ट कर देती हैं।
- साइटोकाइन अवरोध (Cytokine Barriers):
- वायरस से संक्रमित कोशिकाएँ इंटरफेरॉन (Interferon) नामक प्रोटीन स्रावित करती हैं, जो आस-पास की स्वस्थ कोशिकाओं को वायरस के संक्रमण से बचाती हैं।
- शारीरिक अवरोध (Physical Barriers):
B) उपार्जित या अर्जित प्रतिरक्षा (Acquired or Adaptive Immunity)
- परिभाषा: यह वह प्रतिरक्षा है जिसे कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल के दौरान प्राप्त (acquire) करता है। यह जन्मजात नहीं होती।
- विशेषताएँ:
- विशिष्टता (Specificity): यह रोगाणु-विशिष्ट होती है, यानी यह किसी विशेष बैक्टीरिया या वायरस के लिए विशेष रूप से विकसित होती है।
- स्मृति (Memory): इस प्रतिरक्षा प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी “स्मृति” है। जब हमारा शरीर पहली बार किसी रोगाणु के संपर्क में आता है, तो वह एक प्रतिक्रिया (प्राथमिक अनुक्रिया) करता है। यदि वही रोगाणु भविष्य में दोबारा शरीर में प्रवेश करता है, तो प्रतिरक्षा प्रणाली उसे तुरंत पहचान लेती है और बहुत तेजी से तथा अधिक तीव्रता से प्रतिक्रिया (द्वितीयक अनुक्रिया) करती है, जिससे हम बीमार नहीं पड़ते।
- घटक: यह मुख्य रूप से लिम्फोसाइट्स द्वारा संचालित होती है:
- B-लिम्फोसाइट्स: ये रक्त में प्रतिरक्षी या एंटीबॉडी (Antibodies) नामक प्रोटीन का निर्माण करती हैं। एंटीबॉडी रोगाणुओं से चिपककर उन्हें निष्क्रिय कर देती हैं।
- T-लिम्फोसाइट्स: ये सीधे संक्रमित कोशिकाओं को नष्ट करती हैं और B-कोशिकाओं को एंटीबॉडी बनाने में मदद करती हैं।
उपार्जित प्रतिरक्षा के प्रकार:
- सक्रिय प्रतिरक्षा (Active Immunity):
- जब शरीर रोगाणुओं (प्राकृतिक संक्रमण से) या टीके के संपर्क में आने पर स्वयं एंटीबॉडी का निर्माण करता है।
- यह धीमी होती है लेकिन लंबे समय तक (long-lasting) बनी रहती है।
- उदाहरण: किसी बीमारी (जैसे चेचक) का होना, टीकाकरण (Vaccination)।
- निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Passive Immunity):
- जब व्यक्ति को संक्रमण से तत्काल सुरक्षा के लिए पहले से तैयार (readymade) एंटीबॉडी सीधे दिए जाते हैं।
- यह तेजी से काम करती है लेकिन कुछ समय के लिए (short-lived) ही रहती है क्योंकि शरीर स्वयं एंटीबॉडी बनाना नहीं सीखता।
- उदाहरण:
- माँ के दूध (कोलोस्ट्रम – Colostrum) के माध्यम से शिशु को मिलने वाली एंटीबॉडी।
- टिटेनस के संक्रमण पर दिए जाने वाले एंटी-टॉक्सिन (ATS) इंजेक्शन।
2. टीके (Vaccines)
टीकाकरण (Vaccination): प्रतिरक्षा प्रणाली को “शिक्षित” करने और उसे भविष्य के संक्रमणों के लिए तैयार करने की एक प्रक्रिया है।
सिद्धांत:
टीकाकरण उपार्जित प्रतिरक्षा की “स्मृति” के गुण पर आधारित है।
टीका क्या है? (What is a Vaccine?)
एक टीका (Vaccine) एक जैविक तैयारी है जिसमें किसी विशिष्ट बीमारी के निष्क्रिय (inactivated) या कमजोर (weakened) किए गए रोगाणु, या उसके प्रोटीन का एक अंश होता है।
यह कैसे काम करता है?
- जब एक टीका शरीर में इंजेक्ट किया जाता है, तो ये कमजोर या मृत रोगाणु वास्तविक बीमारी का कारण नहीं बनते हैं।
- लेकिन, हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें एक बाहरी आक्रमणकारी के रूप में पहचान लेती है।
- इसके जवाब में, प्रतिरक्षा प्रणाली (B-लिम्फोसाइट्स) उस रोगाणु के खिलाफ एंटीबॉडी बनाना और स्मृति कोशिकाओं (memory cells) का निर्माण करना शुरू कर देती है।
- ये स्मृति कोशिकाएँ शरीर में लंबे समय तक बनी रहती हैं।
- अब, यदि भविष्य में वास्तविक, सक्रिय रोगाणु शरीर पर हमला करता है, तो पहले से तैयार स्मृति कोशिकाएँ उसे तुरंत पहचान लेती हैं और बहुत बड़ी मात्रा में तेजी से एंटीबॉडी का उत्पादन करके उस पर काबू पा लेती हैं, और हमें वह बीमारी होने से बचाती हैं।
इस प्रकार, टीका शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को पहले से ही अभ्यास (practice) करा देता है।
टीकों के प्रकार:
- जीवित-क्षीण टीके (Live-attenuated): इनमें रोगाणु को प्रयोगशाला में कमजोर कर दिया जाता है। (उदाहरण: MMR (खसरा, मम्प्स, रूबेला), BCG (टी.बी.), ओरल पोलियो वैक्सीन)।
- निष्क्रिय टीके (Inactivated): इनमें रोगाणु को ऊष्मा या रसायनों से मार दिया जाता है। (उदाहरण: इनैक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (IPV), हेपेटाइटिस-A)।
- टॉक्सोइड टीके (Toxoid): ये बैक्टीरिया द्वारा उत्पन्न विष (toxin) के निष्क्रिय रूप से बने होते हैं। (उदाहरण: डिप्थीरिया, टिटेनस)।
- सबयूनिट टीके: ये रोगाणु के केवल एक अंश, जैसे उसके प्रोटीन या कैप्सूल से बने होते हैं। (उदाहरण: हेपेटाइटिस-B)।
महत्व:
टीकाकरण, संक्रामक रोगों को रोकने और दुनिया भर में चेचक और पोलियो जैसी बीमारियों को खत्म करने या नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी और सफल सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों में से एक है।
मानव स्वास्थ्य एवं रोग: कैंसर और एड्स
कैंसर और एड्स (AIDS), दोनों ही बहुत गंभीर और घातक रोग हैं। यद्यपि इनके कारण और प्रकृति पूरी तरह से अलग हैं, लेकिन ये विश्व भर में स्वास्थ्य संबंधी प्रमुख चिंताएँ हैं।
1. कैंसर (Cancer)
परिभाषा:
कैंसर किसी भी ऐसे रोगों के बड़े समूह को दिया गया नाम है जिनमें असामान्य कोशिकाओं (abnormal cells) का अनियंत्रित विभाजन और प्रसार (uncontrolled division and growth) होता है।
सामान्य कोशिका बनाम कैंसर कोशिका:
- सामान्य स्थिति में: हमारे शरीर की कोशिका वृद्धि और विभेदन की प्रक्रियाएँ अत्यधिक नियंत्रित और नियमित होती हैं।
- संपर्क संदमन (Contact Inhibition): सामान्य कोशिकाओं का एक महत्वपूर्ण गुण होता है “संपर्क संदमन”। जब सामान्य कोशिकाएं विभाजित होकर एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं, तो उनकी अनियंत्रित वृद्धि रुक जाती है।
- कैंसर में: कैंसर कोशिकाओं में ‘संपर्क संदमन’ का यह गुण खत्म हो जाता है। परिणामस्वरूप, ये कोशिकाएँ विभाजित होती रहती हैं और ट्यूमर (Tumour) या अर्बुद नामक कोशिकाओं का एक ढेर या गाँठ बना लेती हैं।
ट्यूमर के प्रकार:
- सुदम्य या बेनाइन ट्यूमर (Benign Tumour):
- ये ट्यूमर अपने उत्पत्ति स्थान तक सीमित रहते हैं और शरीर के अन्य भागों में नहीं फैलते हैं।
- ये कैप्सूल से घिरे होते हैं और धीरे-धीरे बढ़ते हैं।
- ये अपेक्षाकृत कम हानिकारक होते हैं और शल्य चिकित्सा द्वारा हटाए जा सकते हैं। (उदाहरण: मस्से)
- दुर्दम या मैलिग्नेंट ट्यूमर (Malignant Tumour):
- ये कोशिकाएँ ही “वास्तविक कैंसर” कोशिकाएँ होती हैं।
- ये ट्यूमर तेजी से बढ़ते हैं और आस-पास के सामान्य ऊतकों पर आक्रमण करते हैं और उन्हें नष्ट कर देते हैं।
- मेटास्टेसिस (Metastasis): यह कैंसर का सबसे खतरनाक गुण है। मैलिग्नेंट ट्यूमर की कोशिकाएँ टूटकर रक्त या लसीका प्रवाह द्वारा शरीर के दूरस्थ स्थानों तक पहुँच जाती हैं और वहां भी नये ट्यूमर का निर्माण शुरू कर देती हैं।
कैंसर के कारण (Carcinogens):
सामान्य कोशिकाओं के कैंसर कोशिकाओं में बदलने के लिए जिम्मेदार कारकों को कैंसरजन (Carcinogens) कहते हैं।
- भौतिक कारक: आयनकारी विकिरण (जैसे- X-किरणें, गामा किरणें) और अनआयनकारी विकिरण (जैसे- UV-किरणें), जो DNA को क्षतिग्रस्त करती हैं।
- रासायनिक कारक: तंबाकू के धुएं में पाए जाने वाले रसायन फेफड़ों के कैंसर का प्रमुख कारण हैं। अन्य रसायन जैसे एस्बेस्टस, डाई आदि।
- जैविक कारक: कुछ विषाणु (Viruses) जिन्हें ओंकोजेनिक वायरस (Oncogenic viruses) कहते हैं (जैसे- HPV से गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर)।
- आनुवंशिक कारक: शरीर में मौजूद कुछ प्रोटो-ओंकोजीन (Proto-oncogenes) होते हैं जो सामान्यतः निष्क्रिय रहते हैं, लेकिन कार्सिनोजेन्स द्वारा प्रेरित होने पर ओंकोजीन (Oncogenes) में बदल जाते हैं और कैंसर का कारण बनते हैं।
पता लगाना और उपचार:
- निदान: बायोप्सी (Biopsy) (कैंसर निदान की सबसे पुख्ता जाँच), एमआरआई (MRI), सीटी स्कैन।
- उपचार:
- शल्य क्रिया (Surgery): ट्यूमर को काटकर निकालना।
- विकिरण चिकित्सा (Radiotherapy): ट्यूमर कोशिकाओं पर विकिरण (जैसे- कोबाल्ट-60 से गामा किरणें) डालना।
- कीमोथेरेपी (Chemotherapy): कैंसर-विरोधी दवाओं (रसायनों) का उपयोग कोशिकाओं के विभाजन को रोकने के लिए। (इसके साइड-इफेक्ट होते हैं जैसे बालों का झड़ना, एनीमिया)।
2. एड्स (AIDS – Acquired Immuno Deficiency Syndrome)
पूरा नाम: एक्वायर्ड (उपार्जित) इम्यूनो (प्रतिरक्षा) डेफिशिएंसी (कमी) सिन्ड्रोम (लक्षणों का समूह)।
- इसका अर्थ है कि यह रोग जीवनकाल के दौरान उपार्जित किया जाता है (जन्मजात नहीं), और यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की कमी या विफलता का कारण बनता है, जिसके परिणाम स्वरूप विभिन्न रोगों का समूह (सिंड्रोम) हो जाता है।
रोगकारक (Causative Agent):
यह ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) नामक रेट्रोवायरस (Retrovirus) के कारण होता है (जिसका आनुवंशिक पदार्थ RNA होता है)।
संक्रमण और प्रभाव:
- HIV शरीर में प्रवेश करने के बाद सीधे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) की प्रमुख कोशिकाओं, सहायक टी-लिम्फोसाइट्स (Helper T-lymphocytes) पर हमला करता है।
- वायरस इन टी-कोशिकाओं के अंदर गुणन करता है और उन्हें नष्ट करता रहता है।
- समय के साथ, व्यक्ति के शरीर में टी-कोशिकाओं की संख्या बहुत कम हो जाती है।
- इसके परिणामस्वरूप, व्यक्ति की रोगों से लड़ने की क्षमता (प्रतिरक्षा) इतनी कमजोर हो जाती है कि वह ऐसे सामान्य जीवाणु, फफूंद या वायरल संक्रमणों से भी नहीं लड़ पाता जो स्वस्थ लोगों को नुकसान नहीं पहुँचाते। इसे “अवसरवादी संक्रमण” (Opportunistic Infections) कहते हैं।
- रोगी अंततः इन विभिन्न संक्रमणों के कारण दम तोड़ देता है। HIV से एड्स विकसित होने में 5 से 10 साल या उससे अधिक का समय (incubation period) लग सकता है।
संचरण के तरीके (Mode of Transmission):
HIV केवल विशिष्ट शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है:
- संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध द्वारा (सर्वाधिक सामान्य कारण)।
- संदूषित रक्त या रक्त उत्पादों के आधान (transfusion) द्वारा।
- संक्रमित सुई या सिरिंजों के साझे प्रयोग द्वारा (ड्रग्स लेने वालों में आम है)।
- संक्रमित माँ से उसके बच्चे को (गर्भनाल द्वारा गर्भावस्था के दौरान, प्रसव के समय, या स्तनपान द्वारा)।
- HIV स्पर्श करने, हाथ मिलाने, खांसने, मच्छर के काटने या शौचालय का साझा उपयोग करने से नहीं फैलता है।
निदान और उपचार:
- निदान: HIV संक्रमण का पता लगाने के लिए एलाइजा (ELISA – Enzyme-Linked Immunosorbent Assay) टेस्ट का व्यापक उपयोग होता है। पुष्टि के लिए वेस्टर्न ब्लॉट (Western Blot) टेस्ट किया जाता है।
- उपचार: एड्स का कोई स्थायी इलाज नहीं है।
- हालांकि, एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं (ART – Anti-Retroviral Therapy) का उपयोग करके वायरस के गुणन को धीमा किया जा सकता है और जीवनकाल को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इससे रोग पूरी तरह ठीक नहीं होता।
रोकथाम:
- जानकारी ही बचाव है। सुरक्षित यौन व्यवहार, एक साथी के प्रति वफादारी, और कंडोम का प्रयोग।
- हमेशा नई/डिस्पोजेबल सीरिंज और सुइयों का उपयोग।
- आधान से पहले रक्त की HIV जाँच।
- जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 1 दिसंबर को ‘विश्व एड्स दिवस (World AIDS Day)’ मनाया जाता है। रेड रिबन (Red Ribbon) एड्स के प्रति जागरूकता का प्रतीक है।
विटामिन और खनिज की कमी से होने वाले रोग (Deficiency Diseases)
परिभाषा:
हीनताजन्य रोग या अभावजन्य रोग (Deficiency Diseases) वे रोग हैं जो आहार में एक लंबे समय तक किसी विशिष्ट पोषक तत्व (nutrient), जैसे विटामिन या खनिज, की कमी के कारण होते हैं। ये रोग संक्रामक नहीं होते हैं और उचित आहार द्वारा इनकी रोकथाम और उपचार किया जा सकता है।
1. विटामिन की कमी से होने वाले रोग (Vitamin Deficiency Diseases)
विटामिन (Vitamins) सूक्ष्म पोषक तत्व (micronutrients) हैं जिनकी शरीर को सामान्य वृद्धि, विकास और विभिन्न उपापचयी क्रियाओं को करने के लिए अल्प मात्रा में आवश्यकता होती है। विटामिन मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
- वसा में घुलनशील (Fat-Soluble): विटामिन A, D, E, K
- जल में घुलनशील (Water-Soluble): विटामिन B समूह और विटामिन C
| विटामिन का नाम | रासायनिक नाम (Chemical Name) | कमी से होने वाला रोग (Deficiency Disease) | मुख्य लक्षण | प्रमुख स्रोत (Major Sources) |
| विटामिन A | रेटिनॉल (Retinol) | रतौंधी (Night Blindness)<br>जीरोफ्थैल्मिया (Xerophthalmia) | रात में या कम प्रकाश में दिखाई न देना,<br>आँखों का शुष्क होना। | गाजर, पपीता, आम, मछली का तेल, हरी पत्तेदार सब्जियाँ। |
| विटामिन B₁ | थायमिन (Thiamine) | बेरी-बेरी (Beri-beri) | मांसपेशियों का कमजोर होना, तंत्रिका तंत्र की कमजोरी, भूख न लगना। | अनाज, नट्स, माँस, सूखी खमीर (yeast)। |
| विटामिन B₂ | राइबोफ्लेविन (Riboflavin) | कीलोसिस (Cheilosis),<br> त्वचा का फटना | मुंह और होठों के कोनों का फटना, जीभ में सूजन। | दूध, अंडा, हरी सब्जियाँ, माँस। |
| विटामिन B₃ | नियासिन (Niacin) | पेलाग्रा (Pellagra) | त्वचा पर दाने (त्वचाशोथ), डायरिया, स्मृति में कमी (3-डी रोग)। | अनाज, दालें, माँस, मछली, मूंगफली। |
| विटामिन B₅ | पैंटोथैनिक एसिड | चर्म रोग, बाल सफेद होना | पैरों में जलन, बाल सफेद होना। | दूध, अंडा, मशरूम, टमाटर। |
| विटामिन B₆ | पाइरिडॉक्सिन | एनीमिया (रक्ताल्पता), त्वचा रोग | रक्त की कमी, चर्म रोग। | अनाज, मांस, सोयाबीन। |
| विटामिन B₇ | बायोटिन | लकवा, शरीर में दर्द, बालों का गिरना | शरीर में दर्द, बालों का झड़ना। | अंडा, गेहूँ, चॉकलेट, सब्ज़ियाँ। |
| विटामिन B₁₂ | साइनोकोबालामिन (Cyanocobalamin) | पर्निशियस एनीमिया | लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) का अपरिपक्व रहना, रक्त की भारी कमी, तंत्रिका संबंधी क्षति। (इसमें कोबाल्ट होता है) | माँस, अंडा, दूध, जिगर। |
| विटामिन C | एस्कॉर्बिक एसिड (Ascorbic Acid) | स्कर्वी (Scurvy) | मसूड़ों से खून आना, सूजन, घाव का देर से भरना। | सभी खट्टे फल (नींबू, संतरा, आँवला), अमरूद, टमाटर। |
| विटामिन D | कैल्सिफेरॉल (Calciferol) | बच्चों में रिकेट्स (Rickets),<br> वयस्कों में ऑस्टियोमलेशिया | हड्डियों का कमजोर और मुड़ जाना,<br> हड्डियों में दर्द। (इसे ‘सनशाइन विटामिन’ भी कहते हैं) | सूर्य का प्रकाश (शरीर खुद बनाता है), दूध, अंडा, मछली का तेल। |
| विटामिन E | टोकोफेरॉल (Tocopherol) | जनन शक्ति में कमी (बांझपन) | मांसपेशियों की कमजोरी, जनन क्षमता प्रभावित। | वनस्पति तेल, नट्स, बादाम, बीज, अंकुरित अनाज। |
| विटामिन K | फाइलोक्विनोन (Phylloquinone) | रक्त का थक्का न जमना | चोट लगने पर रक्त का बहाव न रुकना। | हरी पत्तेदार सब्जियाँ (पालक), गोभी, टमाटर। |
2. खनिज लवणों की कमी से होने वाले रोग (Mineral Deficiency Diseases)
खनिज (Minerals) भी सूक्ष्म पोषक तत्व हैं जो शरीर के समुचित कार्य के लिए आवश्यक होते हैं, जैसे हड्डियों का निर्माण, द्रव संतुलन, और तंत्रिका कार्य।
| खनिज (Mineral) | कमी से होने वाला रोग | मुख्य लक्षण / कार्य | प्रमुख स्रोत (Major Sources) |
| आयोडीन (Iodine) | घेंघा या गलगंड (Goitre), <br> बच्चों में बौनापन (Cretinism) | थायराइड ग्रंथि में सूजन, शारीरिक और मानसिक विकास का रुकना। (यह थायरॉक्सिन हार्मोन का मुख्य घटक है)। | आयोडीन युक्त नमक, समुद्री भोजन, मछली। |
| लोहा / आयरन (Iron) | एनीमिया / रक्ताल्पता (Anemia) | रक्त की कमी, कमजोरी, थकान, साँस फूलना। (यह हीमोग्लोबिन का मुख्य घटक है जो ऑक्सीजन का परिवहन करता है)। | पालक, हरी सब्जियाँ, गुड़, सेब, चुकंदर, माँस। |
| कैल्शियम (Calcium) | हड्डियाँ कमजोर होना, <br> ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) | हड्डियाँ और दाँत कमजोर और भंगुर हो जाते हैं। | दूध, पनीर, अंडा, हरी सब्जियाँ, रागी। |
| फॉस्फोरस (Phosphorus) | हड्डियों और दांतों की कमजोरी | हड्डियों का कमजोर होना। (कैल्शियम के साथ मिलकर काम करता है)। | दूध, पनीर, अनाज, बाजरा। |
| सोडियम (Sodium) | रक्तचाप कम होना (Low BP), <br> मांसपेशियों में ऐंठन | शरीर में द्रव संतुलन और तंत्रिका आवेगों का संचरण। | साधारण नमक। |
| पोटैशियम (Potassium) | निम्न रक्तचाप, <br>मांसपेशियों में कमजोरी | तंत्रिका आवेग संचरण, हृदय की धड़कन का नियंत्रण। | केला, आलू, टमाटर। |
| फ्लोरीन (Fluorine) | दाँतों का क्षय | दांतों के इनेमल (enamel) को मजबूत बनाता है। | पीने का पानी, टूथपेस्ट। |