पादप कार्यकीय (Plant Physiology)
परिभाषा:
पादप कार्यकीय (Plant Physiology), वनस्पति विज्ञान (Botany) की वह शाखा है जिसके अंतर्गत पौधों में होने वाली विभिन्न जैविक क्रियाओं (vital functions) जैसे- पोषण, श्वसन, वृद्धि, जनन, और विभिन्न उत्तेजनाओं के प्रति अनुक्रिया का अध्ययन किया जाता है। सरल शब्दों में, यह अध्ययन करता है कि पौधे कैसे “जीवित” रहते हैं, कैसे भोजन बनाते हैं, और कैसे अपने वातावरण के साथ अंतःक्रिया करते हैं।
पौधों में परिवहन (Transport in Plants)
पौधों को, विशेष रूप से ऊँचे पेड़ों को, अपनी जड़ों से पत्तियों तक जल और खनिजों को तथा पत्तियों से बने भोजन को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाने के लिए एक सुविकसित परिवहन तंत्र की आवश्यकता होती है। यह परिवहन मुख्य रूप से दो संवहन ऊतकों (vascular tissues) द्वारा किया जाता है: जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem)।
1. जल और खनिजों का परिवहन (Transport of Water and Minerals)
जल पौधों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है। यह प्रकाश संश्लेषण के लिए कच्चा माल है, पौधों को संरचनात्मक सहारा देता है और विभिन्न पदार्थों को घोलता है।
- कौन करता है? यह कार्य जाइलम (Xylem) ऊतक द्वारा किया जाता है।
- प्रक्रिया:
- अवशोषण (Absorption): पौधे की जड़ें (Roots), विशेष रूप से मूल रोम (root hairs), परासरण (osmosis) की प्रक्रिया द्वारा मिट्टी से जल और खनिजों का अवशोषण करती हैं।
- जड़ में जल की गति: जल मूल रोम से होकर जाइलम वाहिकाओं तक पहुँचता है।
- ऊपर की ओर परिवहन (Upward Transport – रसारोहण): जाइलम वाहिकाओं में जल और खनिजों का एक सतत स्तंभ (continuous column) बनता है, जो गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर की ओर पत्तियों तक पहुँचता है। इस प्रक्रिया को रसारोहण (Ascent of Sap) कहते हैं।
- रसारोहण के लिए जिम्मेदार बल:
- मूल दाब (Root Pressure): जड़ों की कोशिकाओं द्वारा सक्रिय रूप से आयनों के अवशोषण से उत्पन्न एक दाब जो पानी को जाइलम में कुछ ऊँचाई तक धकेलता है। यह छोटे पौधों के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन ऊँचे पेड़ों के लिए अपर्याप्त है।
- संसंजन-तनाव सिद्धांत (Cohesion-Tension Theory): यह सबसे मान्य सिद्धांत है।
- वाष्पोत्सर्जन-खिंचाव (Transpiration Pull): पत्तियों की सतह (स्टोमेटा से) पर होने वाले वाष्पोत्सर्जन (transpiration) या जल की हानि के कारण जाइलम में एक खिंचाव या तनाव (tension) उत्पन्न होता है। यह एक सक्शन बल की तरह काम करता है जो पानी को ऊपर की ओर खींचता है।
- संसंजन (Cohesion): जल के अणुओं के बीच आपसी आकर्षण बल (cohesive force) होता है, जिसके कारण जल का एक अटूट स्तंभ बना रहता है।
- आसंजन (Adhesion): जल के अणुओं का जाइलम की दीवारों के साथ आकर्षण बल (adhesive force) होता है, जो स्तंभ को टूटने से रोकता है।
2. भोजन का परिवहन (Transport of Food)
पत्तियाँ प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन (मुख्य रूप से सुक्रोज – sucrose) बनाती हैं। इस भोजन को पौधे के उन सभी भागों तक पहुँचाना आवश्यक होता है जहाँ ऊर्जा की आवश्यकता होती है या जहाँ इसे संग्रहीत किया जाता है (जैसे- जड़, फल, बीज)।
- कौन करता है? यह कार्य फ्लोएम (Phloem) ऊतक द्वारा किया जाता है।
- प्रक्रिया: पत्तियों में बने भोजन का पौधे के विभिन्न भागों तक परिवहन स्थानान्तरण (Translocation) कहलाता है।
- स्रोत और सिंक (Source and Sink):
- स्रोत (Source): वह भाग जहाँ भोजन बनता है (आमतौर पर पत्तियाँ)।
- सिंक (Sink): वह भाग जहाँ भोजन की आवश्यकता या भंडारण होता है (जैसे- जड़ें, फल, कलियाँ)।
- फ्लोएम में लदान (Phloem Loading): स्रोत (पत्तियों) से, सुक्रोज को सक्रिय परिवहन (active transport) द्वारा फ्लोएम की चालनी नलिकाओं (sieve tubes) में भेजा जाता है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा (ATP) खर्च होती है।
- दाब-प्रवाह परिकल्पना (Pressure-Flow Hypothesis):
- जब सुक्रोज फ्लोएम में आता है, तो वहाँ का परासरण दाब बढ़ जाता है।
- इस दाब को संतुलित करने के लिए, आस-पास के जाइलम से पानी फ्लोएम में प्रवेश करता है।
- इससे फ्लोएम के स्रोत सिरे पर एक उच्च जलविभव दाब (high turgor pressure) उत्पन्न हो जाता है।
- यह उच्च दाब, भोजन (शर्करा) युक्त तरल को कम दाब वाले क्षेत्र (यानी सिंक) की ओर धकेलता है।
- फ्लोएम से उतारना (Phloem Unloading): सिंक पर पहुँचने के बाद, सुक्रोज को फिर से सक्रिय परिवहन द्वारा फ्लोएम से बाहर निकाल कर भंडारण ऊतकों में भेज दिया जाता है।
- स्रोत और सिंक (Source and Sink):
जाइलम और फ्लोएम परिवहन में अंतर:
| आधार | जाइलम (Xylem) | फ्लोएम (Phloem) |
| परिवहन | जल एवं खनिज लवण | भोजन (सुक्रोज) |
| प्रवाह की दिशा | केवल एकदिशीय (Unidirectional): जड़ों से पत्तियों की ओर (नीचे से ऊपर) | द्विदिशीय (Bidirectional): स्रोत से सिंक की ओर (ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर भी) |
| क्रियाविधि | निष्क्रिय प्रक्रिया (Passive): मुख्यतः वाष्पोत्सर्जन खिंचाव पर निर्भर | सक्रिय प्रक्रिया (Active): ऊर्जा (ATP) की आवश्यकता होती है। |
| कोशिकाओं की प्रकृति | अधिकांश कोशिकाएँ मृत (Dead) होती हैं। | अधिकांश कोशिकाएँ जीवित (Living) होती हैं। |
खनिज पोषण (Mineral Nutrition)
परिभाषा:
खनिज पोषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पौधे अपने सामान्य वृद्धि (growth), विकास (development) और जनन (reproduction) के लिए विभिन्न प्रकार के अकार्बनिक तत्वों (inorganic elements) का अवशोषण और उपयोग करते हैं।
पौधे अपना कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन मुख्यतः हवा (CO₂) और पानी (H₂O) से प्राप्त करते हैं, लेकिन शेष सभी तत्वों के लिए वे पूरी तरह से मृदा (soil) पर निर्भर होते हैं। मृदा से जड़ों द्वारा अवशोषित किए गए इन तत्वों को ही खनिज तत्व (mineral elements) कहा जाता है।
पौधों के लिए अनिवार्य खनिज तत्व (Essential Mineral Elements)
सभी पौधों में लगभग 60 से अधिक विभिन्न तत्व पाए जा सकते हैं, लेकिन सभी उनके लिए अनिवार्य नहीं होते। किसी तत्व को “अनिवार्य” तभी माना जाता है जब वह निम्नलिखित मानदंडों को पूरा करता हो:
- वह तत्व पौधे की सामान्य वृद्धि और जनन के लिए अत्यंत आवश्यक हो, और उसकी कमी में पौधा अपना जीवन चक्र पूरा न कर सके।
- उसकी कमी के लक्षणों को केवल उसी तत्व को प्रदान करके दूर किया जा सके।
- वह तत्व सीधे पौधे के उपापचय (metabolism) में शामिल हो।
इस आधार पर, पौधों के लिए 17 अनिवार्य तत्व माने गए हैं। इन्हें उनकी आवश्यक मात्रा के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:
1. वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients)
- परिभाषा: ये वे तत्व हैं जिनकी पौधों को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है (पौधे के शुष्क भार में 1 से 10 mg/L से अधिक)।
- संख्या: इनकी संख्या 9 है।
- याद रखने का तरीका (Trick): “C H O N S P K Ca Mg” (चॉन्स्पक कैफे मग)
- तत्वों की सूची:
- कार्बन (C)
- हाइड्रोजन (H)
- ऑक्सीजन (O) – (ये तीनों पौधे हवा और पानी से लेते हैं)
- नाइट्रोजन (N)
- फॉस्फोरस (P)
- पोटैशियम (K) – (N, P, K को प्राथमिक वृहत् पोषक कहते हैं क्योंकि इनकी कमी मृदा में सबसे आम होती है)।
- सल्फर (S)
- कैल्शियम (Ca)
- मैग्नीशियम (Mg) – (Ca, Mg, S को द्वितीयक वृहत् पोषक कहते हैं)।
2. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)
- परिभाषा: ये वे तत्व हैं जिनकी पौधों को बहुत कम मात्रा (अल्प मात्रा) में आवश्यकता होती है (पौधे के शुष्क भार में 0.1 mg/L से कम)।
- संख्या: इनकी संख्या 8 है।
- तत्वों की सूची:
- आयरन / लोहा (Fe)
- मैंगनीज (Mn)
- कॉपर / तांबा (Cu)
- मोलिब्डेनम (Mo)
- जिंक / जस्ता (Zn)
- बोरॉन (B)
- क्लोरीन (Cl)
- निकल (Ni)
अनिवार्य तत्वों की भूमिका और कमी के लक्षण
प्रत्येक अनिवार्य तत्व की पौधे की वृद्धि और उपापचय में एक विशिष्ट भूमिका होती है। जब मृदा में इन तत्वों की कमी हो जाती है, तो पौधे विशिष्ट लक्षण दिखाते हैं।
प्रमुख तत्वों की भूमिकाएँ:
- नाइट्रोजन (N):
- भूमिका: प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल (DNA, RNA), क्लोरोफिल और विटामिन का मुख्य घटक। यह पौधों की वानस्पतिक वृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- कमी के लक्षण: हरिमाहीनता (Chlorosis) – पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं, विशेषकर पुरानी पत्तियाँ। वृद्धि रुक जाती है।
- फॉस्फोरस (P):
- भूमिका: कोशिका झिल्ली, न्यूक्लिक अम्ल, और ऊर्जा के सिक्के ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) का एक प्रमुख घटक है। जड़ों के विकास और बीज निर्माण में महत्वपूर्ण।
- कमी के लक्षण: पत्तियाँ गहरे हरे या बैंगनी रंग की हो जाती हैं, वृद्धि रुक जाती है।
- पोटैशियम (K):
- भूमिका: रंध्रों (stomata) के खुलने और बंद होने को नियंत्रित करता है, कई एंजाइमों को सक्रिय करता है और पौधे के आयनिक संतुलन को बनाए रखता है।
- कमी के लक्षण: पत्तियों के किनारे पीले पड़ जाते हैं और जलने (scorch) लगते हैं, तना कमजोर हो जाता है।
- मैग्नीशियम (Mg):
- भूमिका: क्लोरोफिल अणु का केंद्रीय धातु आयन है। यह प्रकाश संश्लेषण के लिए अत्यंत आवश्यक है। राइबोसोम को बांधने में भी मदद करता है।
- कमी के लक्षण: पत्तियों में शिराओं के बीच हरिमाहीनता (interveinal chlorosis)।
- कैल्शियम (Ca):
- भूमिका: कोशिका भित्ति (मध्य पटलिका) का संरचनात्मक घटक है। कोशिका विभाजन और कोशिका झिल्ली की कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक है।
- कमी के लक्षण: वृद्धि वाले क्षेत्रों (जैसे नई पत्तियाँ, कलियाँ) का मर जाना।
- आयरन (Fe):
- भूमिका: यह क्लोरोफिल के संश्लेषण के लिए आवश्यक है (हालांकि यह इसका घटक नहीं है)। यह श्वसन और नाइट्रोजन स्थिरीकरण में शामिल कई एंजाइमों का हिस्सा है।
- कमी के लक्षण: नई पत्तियों में हरिमाहीनता (क्योंकि यह अगतिशील तत्व है)।
खनिज तत्वों का अवशोषण
पौधे खनिजों को आयनों (ions) के रूप में मृदा जल से अवशोषित करते हैं। यह अवशोषण मुख्य रूप से मूल रोम (root hairs) द्वारा होता है। खनिज आयनों का अवशोषण सक्रिय परिवहन (active transport) के माध्यम से होता है, जिसका अर्थ है कि इसमें कोशिका की उपापचयी ऊर्जा (ATP) खर्च होती है, क्योंकि मृदा में आयनों की सांद्रता जड़ों की कोशिकाओं की तुलना में अक्सर कम होती है।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)
पौधे वायुमंडल में मौजूद विशाल नाइट्रोजन गैस (N₂) का सीधे उपयोग नहीं कर सकते। वे नाइट्रोजन को केवल आयनों (जैसे अमोनियम – NH₄⁺, नाइट्रेट – NO₃⁻) के रूप में ही ग्रहण कर सकते हैं। वायुमंडलीय नाइट्रोजन (N₂) को उपयोगी अमोनिया (NH₃) में बदलने की प्रक्रिया को नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहते हैं।
यह प्रक्रिया राइजोबियम (Rhizobium) जैसे जीवाणुओं द्वारा की जाती है, जो फलीदार पौधों (leguminous plants – जैसे मटर, चना, दालें) की जड़ों में सहजीवी के रूप में रहते हैं।
प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis)
परिभाषा:
प्रकाश संश्लेषण वह जैव-रासायनिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हरे पौधे, शैवाल और कुछ जीवाणु, सूर्य के प्रकाश (light energy) की उपस्थिति में, क्लोरोफिल (chlorophyll) नामक वर्णक की सहायता से, वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O) का उपयोग करके अपना भोजन (ग्लूकोज – C₆H₁₂O₆) बनाते हैं। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन (O₂) एक सह-उत्पाद (by-product) के रूप में मुक्त होती है।
यह एक उपचयी (Anabolic) प्रक्रिया है, जिसमें सरल अकार्बनिक यौगिकों से जटिल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण होता है।
समग्र रासायनिक समीकरण (Overall Chemical Equation)
प्रकाश संश्लेषण की पूरी प्रक्रिया को निम्नलिखित समीकरण द्वारा सारांशित किया जा सकता है:
6CO₂ + 12H₂O —(सूर्य का प्रकाश / क्लोरोफिल)—> C₆H₁₂O₆ + 6O₂ + 6H₂O
- कार्बन डाइऑक्साइड + जल — (ऊर्जा स्रोत / वर्णक) —> ग्लूकोज + ऑक्सीजन + जल
प्रकाश संश्लेषण का स्थल: क्लोरोप्लास्ट (Site of Photosynthesis: Chloroplast)
यह प्रक्रिया पादप कोशिकाओं के एक विशेष कोशिकांग, क्लोरोप्लास्ट या हरितलवक (Chloroplast) के भीतर होती है। क्लोरोप्लास्ट की संरचना में दो महत्वपूर्ण भाग होते हैं जहाँ प्रकाश संश्लेषण की विभिन्न अभिक्रियाएँ होती हैं:
- ग्रैना (Grana): ये थाइलाकोइड्स (thylakoids) के ढेर होते हैं। प्रकाशीय अभिक्रिया यहीं होती है।
- स्ट्रोमा (Stroma): यह क्लोरोप्लास्ट के अंदर का तरल मैट्रिक्स है। अप्रकाशीय अभिक्रिया यहीं होती है।
प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक घटक (Essential Components for Photosynthesis)
- सूर्य का प्रकाश (Sunlight):
- यह प्रक्रिया के लिए ऊर्जा का एकमात्र स्रोत है।
- प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदला जाता है।
- पौधे मुख्य रूप से लाल और नीले प्रकाश का उपयोग करते हैं। हरे प्रकाश को वे परावर्तित कर देते हैं, इसीलिए पत्तियाँ हरी दिखाई देती हैं।
- क्लोरोफिल (Chlorophyll):
- यह पत्तियों में पाया जाने वाला हरा वर्णक (green pigment) है, जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करने का कार्य करता है।
- क्लोरोफिल अणु का केंद्रीय धातु आयन मैग्नीशियम (Mg) होता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂):
- पौधे इसे वायुमंडल से पत्तियों में उपस्थित छोटे-छोटे छिद्रों, जिन्हें रंध्र या स्टोमेटा (Stomata) कहते हैं, के माध्यम से ग्रहण करते हैं।
- CO₂ का उपयोग ग्लूकोज के निर्माण में होता है।
- जल (H₂O):
- पौधे इसे जड़ों द्वारा मिट्टी से अवशोषित करते हैं और जाइलम ऊतक द्वारा पत्तियों तक पहुँचाते हैं।
- जल के अणु टूटते हैं, जिससे ऑक्सीजन मुक्त होती है और इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन प्राप्त होते हैं।
प्रकाश संश्लेषण की क्रियाविधि (Mechanism of Photosynthesis)
यह प्रक्रिया दो मुख्य चरणों में पूरी होती है:
1. प्रकाशीय अभिक्रिया (Light-Dependent Reaction)
- स्थान: क्लोरोप्लास्ट के ग्रैना (Grana) में।
- आवश्यकता: इस चरण के लिए प्रकाश अनिवार्य है।
- मुख्य घटनाएँ:
- प्रकाश का अवशोषण: क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित किया जाता है।
- जल का विघटन (Photolysis of Water): प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके जल (H₂O) के अणुओं को ऑक्सीजन (O₂), प्रोटॉन (H⁺) और इलेक्ट्रॉनों (e⁻) में तोड़ा जाता है। ऑक्सीजन इसी चरण में मुक्त होती है।
- ऊर्जा वाहकों का निर्माण: इस प्रक्रिया में उच्च-ऊर्जा वाले अणु ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) और NADPH (निकोटिनामाइड एडेनिन डाइन्यूक्लियोटाइड फॉस्फेट) का निर्माण होता है। इन अणुओं को “आत्मसात् शक्ति (Assimilatory Power)” कहा जाता है।
2. अप्रकाशीय अभिक्रिया (Light-Independent Reaction) या केल्विन चक्र (Calvin Cycle)
- स्थान: क्लोरोप्लास्ट के स्ट्रोमा (Stroma) में।
- आवश्यकता: इस चरण के लिए प्रकाश की प्रत्यक्ष रूप से आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन यह पूरी तरह से प्रकाशीय अभिक्रिया के उत्पादों (ATP और NADPH) पर निर्भर करता है। इसीलिए इसे “अप्रकाशीय” कहना थोड़ा भ्रामक हो सकता है; यह प्रकाश की उपस्थिति में ही होता है।
- मुख्य घटनाएँ:
- CO₂ का स्थिरीकरण (CO₂ Fixation): प्रकाशीय अभिक्रिया में बने ATP और NADPH की ऊर्जा का उपयोग करके, वायुमंडल से ली गई कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को शर्करा (ग्लूकोज) में बदला जाता है।
- यह एक चक्रीय प्रक्रिया है जिसे इसके खोजकर्ता मेल्विन केल्विन के नाम पर केल्विन चक्र कहा जाता है।
| आधार | प्रकाशीय अभिक्रिया (Light Reaction) | अप्रकाशीय अभिक्रिया (Dark Reaction) |
| स्थान | ग्रैना (Grana) | स्ट्रोमा (Stroma) |
| प्रकाश की आवश्यकता | अनिवार्य | प्रत्यक्ष रूप से नहीं (लेकिन उत्पादों पर निर्भर) |
| कच्चा माल | जल (H₂O), प्रकाश | कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) |
| मुख्य उत्पाद | ऑक्सीजन (O₂), ATP, NADPH | ग्लूकोकोज (C₆H₁₂O₆) |
प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Photosynthesis)
- बाह्य कारक:
- प्रकाश की तीव्रता (Light Intensity): एक सीमा तक तीव्रता बढ़ाने पर दर बढ़ती है, फिर स्थिर हो जाती है।
- कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता (CO₂ Concentration): CO₂ की सांद्रता बढ़ाने पर एक सीमा तक दर बढ़ती है।
- तापमान (Temperature): एक इष्टतम तापमान (Optimum temperature, ~25°C-35°C) पर दर अधिकतम होती है। बहुत कम या बहुत अधिक तापमान पर दर घट जाती है क्योंकि एंजाइम निष्क्रिय हो जाते हैं।
- जल (Water): जल की कमी से रंध्र बंद हो जाते हैं, जिससे CO₂ का प्रवेश रुक जाता है और दर घट जाती है।
- आंतरिक कारक: क्लोरोफिल की मात्रा, पत्ती की आयु और संरचना।
पादपों में श्वसन (Respiration in Plants)
जैसे मनुष्यों और अन्य जंतुओं को जीवित रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार पौधों को भी अपनी विभिन्न जैविक क्रियाओं (जैसे वृद्धि, खनिज अवशोषण, परिवहन) को करने के लिए निरंतर ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा उन्हें श्वसन (Respiration) की प्रक्रिया से प्राप्त होती है।
परिभाषा और अवधारणा
श्वसन वह अपचयी (catabolic) प्रक्रिया है जिसमें सजीव कोशिकाओं के अंदर जटिल कार्बनिक यौगिकों (मुख्य रूप से ग्लूकोज) का ऑक्सीकरण (oxidation) होता है, जिसके फलस्वरूप ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊर्जा ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) के रूप में संग्रहीत होती है। इस प्रक्रिया में आमतौर पर कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O) सह-उत्पाद के रूप में निकलते हैं।
यह प्रकाश संश्लेषण का उल्टा नहीं है!
हालांकि श्वसन का समग्र समीकरण प्रकाश संश्लेषण के समीकरण का उल्टा प्रतीत होता है, लेकिन ये दोनों प्रक्रियाएँ मौलिक रूप से भिन्न हैं:
- प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis): एक उपचयी (anabolic) प्रक्रिया है, जिसमें ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाया जाता है। यह केवल क्लोरोफिल युक्त कोशिकाओं में, प्रकाश की उपस्थिति में होती है।
- श्वसन (Respiration): एक अपचयी (catabolic) प्रक्रिया है, जिसमें भोजन को तोड़कर ऊर्जा मुक्त की जाती है। यह पौधे की सभी जीवित कोशिकाओं (जड़, तना, पत्ती) में, दिन और रात दोनों समय निरंतर होती रहती है।
समग्र रासायनिक समीकरण (Overall Chemical Equation for Aerobic Respiration):
C₆H₁₂O₆ (ग्लूकोज) + 6O₂ —> 6CO₂ + 6H₂O + ऊर्जा (ATP)
पौधों में गैसों का आदान-प्रदान (Gaseous Exchange in Plants)
जंतुओं की तरह पौधों में कोई विशेष श्वसन अंग (जैसे फेफड़े) नहीं होते हैं। पौधे के विभिन्न भाग स्वतंत्र रूप से गैसों का आदान-प्रदान करते हैं:
- पत्तियाँ (Leaves): पत्तियों की सतह पर पाए जाने वाले छोटे छिद्रों, जिन्हें रंध्र या स्टोमेटा (Stomata) कहते हैं, के माध्यम से गैसों (O₂ और CO₂) का विनिमय होता है।
- तने (Stems): काष्ठीय तनों में, गैसों का आदान-प्रदान छाल में मौजूद छोटे छिद्रों, जिन्हें वातरंध्र या लेंटिसेल्स (Lenticels) कहते हैं, के द्वारा होता है।
- जड़ें (Roots): जड़ें अपनी सतह (मूल रोम) से मिट्टी के कणों के बीच मौजूद हवा से विसरण (diffusion) द्वारा ऑक्सीजन लेती हैं।
दिन और रात में गैसों का आदान-प्रदान
- दिन के समय: प्रकाश संश्लेषण और श्वसन दोनों प्रक्रियाएँ होती हैं। प्रकाश संश्लेषण की दर श्वसन की दर से बहुत अधिक होती है।
- पौधा श्वसन के लिए कुछ ऑक्सीजन का उपयोग करता है, लेकिन प्रकाश संश्लेषण में उससे कहीं अधिक ऑक्सीजन (O₂) उत्पन्न होती है, जो वायुमंडल में छोड़ दी जाती है।
- पौधा श्वसन में उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को प्रकाश संश्लेषण में उपयोग कर लेता है और वायुमंडल से भी अतिरिक्त CO₂ लेता है।
- निष्कर्ष: दिन में, पौधा CO₂ लेता है और O₂ छोड़ता है।
- रात के समय: प्रकाश की अनुपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण पूरी तरह से बंद हो जाता है, लेकिन श्वसन निरंतर चलता रहता है।
- पौधा अपनी ऊर्जा की जरूरतों के लिए जंतुओं की तरह ही ऑक्सीजन (O₂) लेता है और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) छोड़ता है।
- निष्कर्ष: रात में, पौधा केवल श्वसन करता है और O₂ लेता है तथा CO₂ छोड़ता है। इसीलिए रात में पेड़ों के नीचे सोने की सलाह नहीं दी जाती है।
श्वसन के प्रकार (Types of Respiration)
श्वसन मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है, जो ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर निर्भर करता है।
1. ऑक्सी श्वसन / वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration)
- परिभाषा: यह श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है।
- ऊर्जा उत्पादन: इसमें ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण (complete oxidation) होता है, जिसके परिणामस्वरूप अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा (लगभग 38 ATP अणु प्रति ग्लूकोज अणु) मुक्त होती है।
- अंतिम उत्पाद: कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O)।
- स्थान: यह प्रक्रिया कोशिका द्रव्य (cytoplasm) और माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) दोनों में पूरी होती है।
ऑक्सी श्वसन के चरण:
- ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis): यह कोशिका द्रव्य में होता है। इसमें ग्लूकोज का एक अणु टूटकर पाइरुविक अम्ल (Pyruvic acid) के दो अणुओं में बदलता है। (यह ऑक्सी और अनॉक्सी दोनों में समान चरण है)।
- क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle): यह माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में होता है। इसमें पाइरुविक अम्ल पूरी तरह से CO₂, H₂O और ऊर्जा (ATP, NADH) में ऑक्सीकृत हो जाता है।
- इलेक्ट्रॉन परिवहन श्रृंखला (Electron Transport Chain – ETC): यह माइटोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली पर होता है, जहाँ अधिकांश ATP का उत्पादन होता है।
2. अनॉक्सी श्वसन / अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration)
- परिभाषा: यह श्वसन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।
- ऊर्जा उत्पादन: इसमें ग्लूकोज का अपूर्ण ऑक्सीकरण (incomplete oxidation) होता है, जिसके परिणामस्वरूप बहुत कम मात्रा में ऊर्जा (केवल 2 ATP अणु) मुक्त होती है।
- अंतिम उत्पाद:
- पौधों और यीस्ट (yeast) में: एथिल एल्कोहॉल (Ethyl Alcohol) और CO₂। इस प्रक्रिया को किण्वन (Fermentation) भी कहते हैं, जिसका उपयोग शराब और बेकरी उद्योग में होता है।
- जंतुओं की मांसपेशियों में (ऑक्सीजन की कमी होने पर): लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid), जिसके जमाव से मांसपेशियों में दर्द या ऐंठन होती है।
- स्थान: यह प्रक्रिया केवल कोशिका द्रव्य (cytoplasm) में ही पूरी हो जाती है।
पादप वृद्धि एवं विकास (Plant Growth and Development)
वृद्धि (Growth): पौधे के आकार, आयतन और शुष्क भार में होने वाला अनुत्क्रमणीय (irreversible) और स्थायी बढ़ाव पादप वृद्धि कहलाता है। यह कोशिका विभाजन (cell division) और कोशिका दीर्घीकरण (cell enlargement) का परिणाम है।
विकास (Development): एक बीज के अंकुरण से लेकर पौधे के परिपक्व होने और मृत्यु तक, उसके जीवन चक्र में आने वाले सभी परिवर्तनों (जैसे- वृद्धि, विभेदन, पुष्पन, फलन) के अनुक्रम को पादप विकास कहते हैं।
पौधों की वृद्धि और विकास की प्रक्रियाएँ बहुत जटिल होती हैं और ये बाहरी कारकों (जैसे- प्रकाश, ताप, जल) के साथ-साथ कुछ आंतरिक रासायनिक पदार्थों द्वारा भी नियंत्रित और समन्वित होती हैं। इन आंतरिक रासायनिक नियंत्रकों को पादप हार्मोन (Plant Hormones) या फाइटोहार्मोन (Phytohormones) कहा जाता है।
पादप हार्मोन (Plant Hormones)
पादप हार्मोन अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न होने वाले जटिल कार्बनिक यौगिक हैं, जो पौधे के एक भाग में बनकर दूसरे भाग में स्थानांतरित होते हैं और वहाँ की वृद्धि और उपापचयी क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।
इन्हें मुख्य रूप से दो समूहों में बांटा गया है:
- वृद्धि प्रवर्धक हार्मोन (Growth Promoters): ये वृद्धि को बढ़ावा देने वाली क्रियाओं (जैसे कोशिका विभाजन, पुष्पन) को प्रेरित करते हैं।
- वृद्धि रोधक हार्मोन (Growth Inhibitors): ये वृद्धि को बाधित करने वाली क्रियाओं (जैसे प्रसुप्ति, विलगन) को प्रेरित करते हैं।
I. वृद्धि प्रवर्धक हार्मोन (Growth Promoters)
1. ऑक्सिन (Auxin)
- खोज: F.W. Went ने जई (oat) के पौधे के प्रांकुर चोल में इसकी खोज की।
- संश्लेषण का स्थान: मुख्य रूप से तने के शीर्ष (apical buds) और नई पत्तियों में बनता है।
- प्रमुख कार्य:
- कोशिका दीर्घीकरण (Cell Elongation): यह तने और जड़ों की कोशिकाओं को लंबा करने में मदद करता है, जिससे पौधे की लंबाई बढ़ती है।
- शीर्ष प्रमुखता (Apical Dominance): जब तक शीर्षस्थ कली मौजूद रहती है, यह पार्श्व (axillary) कलियों की वृद्धि को रोकता है। (इसीलिए माली पौधों को घना बनाने के लिए उनकी ऊपरी कलियों को काट देते हैं)।
- जड़ों का विकास: कटिंग (cuttings) में जड़ें निकालने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
- अनिषेकफलन (Parthenocarpy): बिना निषेचन के फल (बीज रहित फल जैसे केला, अंगूर) के विकास को प्रेरित करता है।
- फलों और पत्तियों के विलगन (गिरने) को रोकता है।
2. जिबरेलिन (Gibberellin)
- खोज: जापानी वैज्ञानिकों ने धान के पौधे में “बैकेन (मूर्खतापूर्ण नवोद्भिद)” रोग का अध्ययन करते हुए की, जो एक कवक जिबरेला फ्यूजीकुरोई से होता था।
- प्रमुख कार्य:
- पर्वों का दीर्घीकरण (Internode Elongation): यह तने की लंबाई को बढ़ाता है, खासकर उन पौधों में जो आनुवंशिक रूप से बौने होते हैं। अंगूर के डंठल की लंबाई बढ़ाने में इसका उपयोग होता है।
- बीज अंकुरण और प्रसुप्ति को तोड़ना (Seed Germination & Breaking Dormancy): यह बीजों और कलियों की प्रसुप्ति (dormancy) को तोड़कर उनके अंकुरण को बढ़ावा देता है।
- फलों के आकार को बढ़ाने में मदद करता है (जैसे- सेब)।
- पुष्पन को प्रेरित करता है।
3. साइटोकाइनिन (Cytokinin)
- प्रमुख कार्य:
- कोशिका विभाजन (Cell Division – Cytokinesis): इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य कोशिका विभाजन को तेजी से प्रेरित करना है।
- शीर्णता में विलंब (Delay in Senescence): यह पत्तियों और फूलों को लंबे समय तक ताजा बनाए रखने में मदद करता है, यानी उनके बुढ़ापे को रोकता है।
- ऑक्सिन के साथ मिलकर, यह ऊतक संवर्धन (tissue culture) में जड़ों और तनों के विकास को नियंत्रित करता है।
- पार्श्व कलियों की वृद्धि को बढ़ावा देता है (शीर्ष प्रमुखता के विपरीत)।
- यह बीजों की प्रसुप्ति को तोड़ने में भी सहायक है।
II. वृद्धि रोधक हार्मोन (Growth Inhibitors)
4. एबसिसिक अम्ल (Abscisic Acid – ABA)
- प्रकृति: यह एक वृद्धि संदमक (growth inhibiting) हार्मोन है।
- प्रमुख कार्य:
- प्रसुप्ति (Dormancy): यह कलियों और बीजों में प्रसुप्ति को प्रेरित करता है और बनाए रखता है, जिससे वे प्रतिकूल परिस्थितियों (जैसे- अत्यधिक ठंड) में भी जीवित रह सकें।
- रंध्रों को बंद करना (Closure of Stomata): जल की कमी (तनाव) की स्थिति में, यह रंध्रों को बंद करने का संकेत देता है ताकि वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल की हानि को कम किया जा सके। इसीलिए इसे “तनाव हार्मोन (Stress Hormone)” भी कहते हैं।
- विलगन (Abscission): यह पत्तियों, फूलों और फलों के झड़ने या गिरने की क्रिया को बढ़ावा देता है।
- यह जिबरेलिन के प्रभाव के विपरीत कार्य करता है।
5. एथिलीन (Ethylene)
- प्रकृति: यह एकमात्र गैसीय (gaseous) पादप हार्मोन है। यह मुख्य रूप से एक वृद्धि रोधक है, लेकिन कुछ प्रवर्धक क्रियाएँ भी करता है।
- प्रमुख कार्य:
- फलों को पकाना (Fruit Ripening): यह फलों को पकाने वाला मुख्य हार्मोन है। इसका उपयोग व्यावसायिक रूप से कच्चे फलों (जैसे केला, आम) को पकाने के लिए किया जाता है।
- विलगन और शीर्णता: यह पत्तियों, फूलों और फलों के विलगन (झड़ने) और शीर्णता (बुढ़ापे) को तेज करता है।
- कुछ पौधों में पुष्पन को प्रेरित करता है (जैसे- अनानास)।
सभी हार्मोन मिलकर काम करते हैं: पौधे का विकास किसी एक हार्मोन से नहीं, बल्कि इन सभी हार्मोनों के आपसी संतुलन और अंतःक्रिया से नियंत्रित होता है।
मानव शरीर क्रिया विज्ञान (Human Physiology): पाचन एवं अवशोषण
परिभाषा:
मानव शरीर क्रिया विज्ञान जीव विज्ञान की वह शाखा है जो मानव शरीर के विभिन्न अंगों और अंग तंत्रों के कार्यों (functions) और उनकी क्रियाविधि (mechanisms) का अध्ययन करती है। यह बताती है कि हमारा शरीर जीवित रहने, बढ़ने और विभिन्न कार्य करने के लिए कैसे काम करता है।
पाचन एवं अवशोषण (Digestion and Absorption)
भोजन वह मूल आवश्यकता है जो हमें ऊर्जा, वृद्धि और मरम्मत के लिए आवश्यक कार्बनिक पदार्थ प्रदान करता है। हम जो भोजन (जैसे- रोटी, दाल, चावल) खाते हैं, वह जटिल, अघुलनशील अणुओं (जैसे- कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा) से बना होता है। हमारा शरीर इन जटिल अणुओं को सीधे उपयोग नहीं कर सकता।
पाचन (Digestion):
पाचन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जटिल, बड़े और अघुलनशील खाद्य पदार्थों को विभिन्न एंजाइमों (enzymes) की सहायता से सरल, छोटे और घुलनशील अणुओं में तोड़ा जाता है, ताकि उन्हें शरीर द्वारा अवशोषित किया जा सके।
यह एक अपचयी (catabolic) प्रक्रिया है जो यांत्रिक और रासायनिक दोनों तरीकों से होती है।
अवशोषण (Absorption):
अवशोषण वह प्रक्रिया है जिसमें पचा हुआ भोजन (सरल अणु) आंत्र की दीवारों से होकर रक्त या लसीका में प्रवेश करता है।
मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System)
मानव पाचन तंत्र दो मुख्य भागों से मिलकर बना होता है:
- आहार नाल (Alimentary Canal): यह मुख से लेकर गुदा तक फैली एक लंबी, कुंडलित नली है।
- संबद्ध पाचक ग्रंथियाँ (Associated Digestive Glands): ये वे ग्रंथियाँ हैं जो पाचन में मदद करने वाले रस (एंजाइम) का स्राव करती हैं।
1. आहार नाल के अंग और उनमें पाचन क्रिया:
A) मुख एवं मुख गुहा (Mouth and Buccal Cavity):
- भोजन का अंतर्ग्रहण यहीं होता है।
- यांत्रिक पाचन: दाँत (Teeth) भोजन को चबाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं।
- रासायनिक पाचन: जीभ (Tongue) भोजन को लार के साथ मिलाती है।
- लार (Saliva): लार ग्रंथियों से स्रावित होती है। इसमें टायलिन (Ptyalin) या लार एमाइलेज (Salivary Amylase) नामक एंजाइम होता है, जो स्टार्च (एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट) को माल्टोज (सरल शर्करा) में बदलना शुरू कर देता है। कार्बोहाइड्रेट का पाचन मुख से ही प्रारंभ हो जाता है।
B) ग्रसनी (Pharynx) और ग्रसिका (Oesophagus):
- ग्रसनी, भोजन और वायु दोनों के लिए एक साझा मार्ग है।
- ग्रसिका (भोजन नली): यह एक लंबी नली है जो भोजन को मुख गुहा से आमाशय तक ले जाती है। इसकी दीवारों में होने वाली क्रमाकुंचन गति (Peristalsis) (तरंग जैसी गति) भोजन को नीचे की ओर धकेलती है। यहाँ कोई पाचन नहीं होता है।
C) आमाशय (Stomach):
- यह एक J-आकार का पेशीय थैला है। भोजन यहाँ लगभग 4-5 घंटे तक रहता है।
- आमाशय की दीवारें जठर रस (Gastric Juice) का स्राव करती हैं, जिसमें तीन मुख्य चीजें होती हैं:
- हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl): यह भोजन के माध्यम को अम्लीय (acidic) बनाता है, भोजन के साथ आए हानिकारक बैक्टीरिया को मारता है, और पेप्सिन को सक्रिय करता है।
- पेप्सिन (Pepsin): यह एक एंजाइम है जो अम्लीय माध्यम में प्रोटीन को छोटे पेप्टोन और प्रोटियोज में तोड़ता है। प्रोटीन का पाचन आमाशय से प्रारंभ होता है।
- श्लेष्मा (Mucus): यह आमाशय की आंतरिक दीवार को HCl अम्ल के प्रभाव से बचाता है।
D) छोटी आंत (Small Intestine):
- यह आहार नाल का सबसे लंबा भाग है। यह भोजन के पूर्ण पाचन और अवशोषण का मुख्य स्थल है।
- इसे तीन भागों में बांटा गया है: ग्रहणी (Duodenum), जेजुनम (Jejunum), और इलियम (Ileum)।
- छोटी आंत में तीन अलग-अलग स्रोतों से पाचक रस आकर मिलते हैं:
- यकृत (Liver): यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह पित्त रस (Bile Juice) का स्राव करती है जो पित्ताशय (Gall Bladder) में संग्रहीत होता है। पित्त रस आमाशय से आए अम्लीय भोजन को क्षारीय (alkaline) बनाता है और वसा के इमल्सीकरण (emulsification) (वसा की बड़ी गोलिकाओं को छोटी गोलिकाओं में तोड़ना) में मदद करता है। इसमें कोई एंजाइम नहीं होता।
- अग्न्याशय (Pancreas): यह अग्न्याशयिक रस (Pancreatic Juice) का स्राव करता है, जिसमें सभी प्रकार के भोजन को पचाने वाले एंजाइम होते हैं, जैसे:
- ट्रिप्सिन (Trypsin): प्रोटीन को पचाता है।
- अग्न्याशयिक एमाइलेज (Pancreatic Amylase): कार्बोहाइड्रेट को पचाता है।
- लाइपेज (Lipase): इमल्सीकृत वसा को वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल में तोड़ता है।
- आंत्रीय रस (Intestinal Juice / Succus Entericus): यह छोटी आंत की दीवारों से स्रावित होता है और इसमें कई एंजाइम होते हैं जो पाचन की अंतिम क्रिया को पूरा करते हैं (जैसे- पेप्टाइड को अमीनो अम्ल में, माल्टोज को ग्लूकोज में बदलना)।
पचे हुए भोजन का अवशोषण:
- पाचन के बाद भोजन के सरल अणु (जैसे- ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसीय अम्ल) छोटी आंत के अंतिम भाग, विशेष रूप से इलियम (Ileum) में अवशोषित होते हैं।
- छोटी आंत की आंतरिक दीवार पर उँगलियों जैसी लाखों छोटी संरचनाएँ होती हैं जिन्हें दीर्घरोम या रसांकुर (Villi) कहते हैं। ये अवशोषण के लिए सतही क्षेत्रफल को कई गुना बढ़ा देते हैं।
- अवशोषित भोजन विसरण (diffusion) और सक्रिय परिवहन (active transport) द्वारा रक्त वाहिकाओं में पहुँचता है।
E) बड़ी आंत (Large Intestine):
- यहाँ कोई पाचन क्रिया नहीं होती है।
- इसका मुख्य कार्य अपचित भोजन से जल और कुछ खनिजों का अवशोषण करना है।
- शेष अपशिष्ट पदार्थ (मल) मलाशय (Rectum) में संग्रहीत होता है और अंत में गुदा (Anus) द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है (बहिःक्षेपण – Egestion)।
पाचन का सारांश
| भोजन का प्रकार | पाचन का स्थल | एंजाइम | अंतिम उत्पाद |
| कार्बोहाइड्रेट (Starch) | मुख, छोटी आंत | लार एमाइलेज, अग्न्याशयिक एमाइलेज | ग्लूकोज (सरल शर्करा) |
| प्रोटीन | आमाशय, छोटी आंत | पेप्सिन, ट्रिप्सिन | अमीनो अम्ल (Amino Acids) |
| वसा (Fat) | छोटी आंत | लाइपेज (पित्त की मदद से) | वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल (Fatty Acids & Glycerol) |
मानव शरीर क्रिया विज्ञान: श्वसन तंत्र (Respiratory System)
परिभाषा:
श्वसन (Respiration) वह जैव-रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें कोशिकाएँ भोजन (ग्लूकोज) का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा (ATP) मुक्त करती हैं। इस प्रक्रिया के लिए ऑक्सीजन आवश्यक होती है और कार्बन डाइऑक्साइड एक अपशिष्ट उत्पाद के रूप में बनती है।
श्वसन तंत्र (Respiratory System) उन अंगों का समूह है जो शरीर को इस कोशिकीय श्वसन के लिए आवश्यक गैसों का आदान-प्रदान (exchange of gases) करने में मदद करता है। इसके दो मुख्य कार्य हैं:
- वातावरण से ऑक्सीजन (O₂) को ग्रहण करना और उसे रक्त में पहुँचाना।
- शरीर की कोशिकाओं में बनी कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को रक्त से ग्रहण करना और उसे वातावरण में छोड़ना।
श्वसन और श्वास में अंतर (Difference between Respiration and Breathing)
| आधार | श्वास लेना / श्वासोच्छ्वास (Breathing) | श्वसन (Respiration) |
| प्रक्रिया | यह एक भौतिक (physical) प्रक्रिया है। | यह एक जैव-रासायनिक (biochemical) प्रक्रिया है। |
| क्या होता है? | केवल गैसों का आदान-प्रदान (O₂ अंदर लेना, CO₂ बाहर छोड़ना)। | भोजन (ग्लूकोज) का ऑक्सीकरण होकर ऊर्जा (ATP) बनना। |
| ऊर्जा | इसमें ऊर्जा खर्च होती है। | इसमें ऊर्जा मुक्त होती है। |
| एंजाइम | कोई एंजाइम शामिल नहीं है। | कई एंजाइम शामिल होते हैं। |
| स्थान | यह फेफड़ों (lungs) में होती है। | यह शरीर की प्रत्येक जीवित कोशिका (विशेषकर माइटोकॉन्ड्रिया) में होती है। |
मानव श्वसन तंत्र के अंग (Organs of Human Respiratory System)
श्वसन मार्ग वह पथ है जिससे होकर हवा फेफड़ों तक पहुँचती है। इसके अंग क्रम में इस प्रकार हैं:
- नासाद्वार और नासागुहा (Nostrils and Nasal Cavity):
- हवा नासाद्वार (nostrils) से शरीर में प्रवेश करती है।
- नासागुहा (nasal cavity) में मौजूद श्लेष्मा (mucus) और बारीक बाल हवा को नम करते हैं, उसे शरीर के तापमान तक गर्म करते हैं, और धूल तथा अन्य अशुद्धियों को फँसाकर उसे फ़िल्टर (filter) करते हैं।
- ग्रसनी (Pharynx):
- यह नासागुहा के पीछे स्थित एक कक्ष है जो भोजन और वायु दोनों के लिए एक साझा मार्ग है।
- यह श्वसन मार्ग को भोजन नली (ग्रसिका) से जोड़ता है।
- कंठ या स्वरयंत्र (Larynx or Voice Box):
- यह ग्रसनी को श्वास नली से जोड़ता है।
- इसका मुख्य कार्य ध्वनि उत्पन्न करना है। इसमें स्वर रज्जु (vocal cords) होते हैं, जो हवा के गुजरने पर कंपन करके ध्वनि पैदा करते हैं।
- एपिग्लॉटिस (Epiglottis): भोजन निगलते समय, एपिग्लॉटिस नामक एक पत्ती जैसी संरचना श्वास नली के द्वार को बंद कर देती है ताकि भोजन फेफड़ों में न जा सके।
- श्वास नली (Trachea or Windpipe):
- यह एक लंबी नली है जो गर्दन से नीचे वक्ष गुहा (thoracic cavity) तक जाती है।
- यह उपास्थि (cartilage) के ‘C’ आकार के छल्लों से बनी होती है जो इसे हवा की अनुपस्थिति में भी पिचकने से रोकते हैं।
- श्वसनी और श्वसनिकाएँ (Bronchi and Bronchioles):
- वक्ष गुहा में, श्वास नली दो शाखाओं में बँट जाती है, जिन्हें श्वसनी (bronchi) कहते हैं। प्रत्येक श्वसनी एक फेफड़े में प्रवेश करती है।
- फेफड़ों के अंदर, श्वसनी आगे चलकर पतली-पतली शाखाओं में विभाजित हो जाती है जिन्हें श्वसनिकाएँ (bronchioles) कहते हैं।
- वायुकोष्ठिका या कूपिका (Alveoli):
- प्रत्येक श्वसनिका के अंत में अंगूर के गुच्छे जैसी बहुत छोटी, गुब्बारेनुमा संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें वायुकोष्ठिका (alveoli) कहते हैं।
- ये गैसों के विनिमय की मुख्य इकाई हैं। यहीं पर ऑक्सीजन रक्त में प्रवेश करती है और कार्बन डाइऑक्साइड रक्त से बाहर आती है।
- इनकी दीवारें बहुत पतली होती हैं और ये रक्त केशिकाओं (blood capillaries) के घने जाल से घिरी होती हैं, जो गैसों के कुशल विसरण (diffusion) के लिए एक बड़ा सतही क्षेत्रफल प्रदान करती हैं।
- फेफड़े (Lungs):
- ये मानव श्वसन तंत्र के मुख्य अंग हैं। ये वक्ष गुहा में स्थित एक जोड़ी स्पंजी अंग हैं।
- दायाँ फेफड़ा बाएँ फेफड़े से थोड़ा बड़ा होता है।
- ये फुस्फुसावरण या प्लूरा (pleura) नामक दोहरी झिल्ली से घिरे होते हैं।
- डायाफ्राम (Diaphragm):
- यह वक्ष गुहा के नीचे स्थित एक बड़ी, गुंबद के आकार की मांसपेशी है।
- यह श्वास लेने की क्रियाविधि में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
श्वास लेने की क्रियाविधि (Mechanism of Breathing)
श्वास लेने की प्रक्रिया में दो चरण होते हैं:
A) अंतःश्वसन (Inhalation – सांस अंदर लेना):
- डायाफ्राम सिकुड़ता है और नीचे की ओर चला जाता है (सपाट हो जाता है)।
- पसलियों के बीच की मांसपेशियाँ भी सिकुड़ती हैं, जिससे पसलियाँ ऊपर और बाहर की ओर उठती हैं।
- इन दोनों क्रियाओं से वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता है।
- आयतन बढ़ने से, फेफड़ों के अंदर का वायु दाब वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है।
- इस दाब अंतर के कारण, हवा बाहर से अंदर फेफड़ों में भर जाती है।
यह एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसमें ऊर्जा खर्च होती है।
B) उच्छ्वसन (Exhalation – सांस बाहर छोड़ना):
- डायाफ्राम शिथिल होता है और वापस अपनी गुंबद जैसी स्थिति में ऊपर आ जाता है।
- पसलियों की मांसपेशियाँ भी शिथिल होती हैं, जिससे पसलियाँ नीचे और अंदर की ओर आ जाती हैं।
- इन क्रियाओं से वक्ष गुहा का आयतन घट जाता है।
- आयतन घटने से, फेफड़ों के अंदर का वायु दाब वायुमंडलीय दाब से अधिक हो जाता है।
- इस दाब अंतर के कारण, फेफड़ों से हवा बाहर निकल जाती है।
यह सामान्यतः एक निष्क्रिय प्रक्रिया है।
गैसों का परिवहन (Transport of Gases)
- ऑक्सीजन का परिवहन: फेफड़ों में, ऑक्सीजन रक्त में प्रवेश करती है और लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) में मौजूद हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) से जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन (Oxyhaemoglobin) बनाती है। इसी रूप में रक्त के साथ ऑक्सीजन शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचती है।
- कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन: कोशिकाओं में बनी CO₂ रक्त में घुल जाती है। इसका अधिकांश परिवहन बाईकार्बोनेट आयनों (Bicarbonate ions) के रूप में प्लाज्मा द्वारा, और कुछ हिस्सा हीमोग्लोबिन (कार्बामिनोहीमोग्लोबिन के रूप में) और प्लाज्मा में घुलकर फेफड़ों तक होता है, जहाँ से इसे बाहर निकाल दिया जाता है।
मानव शरीर क्रिया विज्ञान: परिसंचरण तंत्र (Circulatory System)
परिभाषा:
परिसंचरण तंत्र (Circulatory System) मानव शरीर का वह परिवहन तंत्र है जो आवश्यक पदार्थों जैसे ऑक्सीजन (oxygen), पोषक तत्वों (nutrients), हार्मोन (hormones) को शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाता है और कोशिकाओं में उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों (waste products) जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) को उन अंगों तक ले जाता है जहाँ से उन्हें शरीर से बाहर निकाला जा सके।
इस तंत्र के मुख्य घटक हैं – रक्त (Blood), रक्त वाहिकाएँ (Blood Vessels), और हृदय (Heart)।
1. रक्त (Blood)
रक्त एक तरल संयोजी ऊतक (liquid connective tissue) है। एक स्वस्थ वयस्क में औसतन 5 से 6 लीटर रक्त होता है। इसके दो मुख्य भाग होते हैं:
A) प्लाज्मा (Plasma):
- यह रक्त का तरल, निर्जीव भाग है, जो कुल रक्त का लगभग 55% होता है।
- यह हल्के पीले रंग का होता है और इसमें लगभग 90-92% जल होता है, तथा शेष भाग में प्रोटीन (जैसे एल्ब्यूमिन, ग्लोब्युलिन, फाइब्रिनोजेन), ग्लूकोज, हार्मोन, लवण और अपशिष्ट पदार्थ घुले होते हैं।
- कार्य: पचे हुए भोजन, हार्मोन और अपशिष्ट पदार्थों का परिवहन करता है।
B) रक्त कणिकाएँ / रक्ताणु (Blood Corpuscles):
ये रक्त का ठोस, जीवित भाग हैं, जो कुल रक्त का लगभग 45% होती हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं:
- लाल रक्त कणिकाएँ (Red Blood Cells – RBCs or Erythrocytes):
- संरचना: ये उभयावतल (biconcave), डिस्क के आकार की होती हैं और इनमें केंद्रक का अभाव होता है ताकि अधिक हीमोग्लोबिन समा सके।
- कार्य: इनमें हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) नामक एक लाल रंग का प्रोटीन वर्णक होता है, जो ऑक्सीजन (O₂) के परिवहन का कार्य करता है। हीमोग्लोबिन फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है। रक्त का लाल रंग हीमोग्लोबिन के कारण ही होता है।
- जीवन काल: लगभग 120 दिन।
- निर्माण: अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में।
- श्वेत रक्त कणिकाएँ (White Blood Cells – WBCs or Leucocytes):
- संरचना: ये अनियमित आकार की, केंद्रक युक्त और रंगहीन होती हैं।
- कार्य: ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये शरीर में प्रवेश करने वाले रोगाणुओं (pathogens) जैसे बैक्टीरिया और वायरस से लड़कर संक्रमण से शरीर की रक्षा करती हैं। इन्हें “शरीर का सैनिक (Soldiers of the Body)” भी कहा जाता है।
- जीवन काल: कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक।
- बिम्बाणु या प्लेटलेट्स (Platelets or Thrombocytes):
- संरचना: ये अत्यंत छोटी, अनियमित आकार की और केंद्रक रहित होती हैं।
- कार्य: इनका मुख्य कार्य रक्त का थक्का (Blood Clotting) बनाने में मदद करना है। चोट लगने पर, ये रक्तस्राव को रोकती हैं।
- जीवन काल: लगभग 7-10 दिन।
रक्त समूह (Blood Groups)
मनुष्य का रक्त चार मुख्य समूहों में वर्गीकृत किया गया है: A, B, AB, और O। यह वर्गीकरण RBCs की सतह पर पाए जाने वाले विशेष प्रतिजन (Antigens) A और B पर आधारित है।
- सार्वभौमिक दाता (Universal Donor): रक्त समूह O (विशेष रूप से O निगेटिव), क्योंकि इसमें कोई प्रतिजन (A या B) नहीं होता।
- सार्वभौमिक ग्राही (Universal Recipient): रक्त समूह AB (विशेष रूप से AB पॉजिटिव), क्योंकि इसके प्लाज्मा में कोई प्रतिरक्षी (anti-A या anti-B) नहीं होता।
- Rh कारक (Rh Factor): यह RBCs पर पाया जाने वाला एक और प्रतिजन है। यदि यह उपस्थित है, तो रक्त Rh-पॉजिटिव (+) कहलाता है; यदि अनुपस्थित है, तो Rh-निगेटिव (-) कहलाता है।
2. रक्त वाहिकाएँ (Blood Vessels)
ये वे नलिकाएँ हैं जिनमें रक्त पूरे शरीर में बहता है। ये तीन प्रकार की होती हैं:
- धमनियां (Arteries):
- ये रक्त को हृदय से दूर शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती हैं।
- इनमें ऑक्सीजन युक्त (oxygenated) या शुद्ध रक्त बहता है (अपवाद: फुफ्फुसीय धमनी / Pulmonary Artery जिसमें अशुद्ध रक्त होता है)।
- इनकी दीवारें मोटी और लचीली होती हैं क्योंकि इनमें रक्त उच्च दाब पर बहता है।
- शिराएँ (Veins):
- ये रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों से वापस हृदय की ओर लाती हैं।
- इनमें ऑक्सीजन रहित (deoxygenated) या अशुद्ध रक्त बहता है (अपवाद: फुफ्फुसीय शिरा / Pulmonary Vein जिसमें शुद्ध रक्त होता है)।
- इनकी दीवारें धमनियों की तुलना में पतली होती हैं और इनमें रक्त को वापस बहने से रोकने के लिए वॉल्व (valves) होते हैं।
- केशिकाएँ (Capillaries):
- ये अत्यंत पतली रक्त वाहिकाएँ हैं जो धमनियों और शिराओं को जोड़ती हैं।
- वास्तविक आदान-प्रदान (ऑक्सीजन, CO₂, पोषक तत्व, अपशिष्ट) रक्त और कोशिकाओं के बीच इन्हीं केशिकाओं की पतली दीवारों के माध्यम से होता है।
3. हृदय (Heart)
परिभाषा:
हृदय एक पेशीय पंपिंग अंग (muscular pumping organ) है जो रक्त वाहिकाओं के एक नेटवर्क के माध्यम से पूरे शरीर में रक्त को पंप करता है।
संरचना:
- स्थान: यह वक्ष गुहा (thoracic cavity) में फेफड़ों के बीच, थोड़ा बाईं ओर स्थित होता है।
- कक्ष (Chambers): मानव हृदय में चार कक्ष (four chambers) होते हैं:
- ऊपरी दो कक्ष: अलिंद (Atria/Auricles) (दायाँ और बायाँ), जो रक्त को ग्रहण करते हैं।
- निचले दो कक्ष: निलय (Ventricles) (दायाँ और बायाँ), जो रक्त को पंप करते हैं।
कार्यविधि: दोहरा परिसंचरण (Double Circulation)
मानव में दोहरा परिसंचरण होता है, जिसका अर्थ है कि शरीर का एक पूरा चक्कर लगाने के लिए रक्त हृदय से दो बार गुजरता है।
- प्रणालीगत परिसंचरण (Systemic Circulation):
- बायाँ निलय (Left Ventricle) महाधमनी (Aorta) के माध्यम से शुद्ध रक्त को पूरे शरीर में पंप करता है।
- शरीर की कोशिकाएँ ऑक्सीजन का उपयोग कर लेती हैं और रक्त अशुद्ध हो जाता है।
- यह अशुद्ध रक्त शिराओं द्वारा वापस हृदय के दाएँ अलिंद (Right Atrium) में लाया जाता है।
- फुफ्फुसीय परिसंचरण (Pulmonary Circulation):
- दायाँ निलय (Right Ventricle) इस अशुद्ध रक्त को फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary Artery) के माध्यम से शुद्ध होने के लिए फेफड़ों (Lungs) में भेजता है।
- फेफड़ों में रक्त CO₂ छोड़ता है और O₂ ग्रहण कर शुद्ध हो जाता है।
- यह शुद्ध रक्त फुफ्फुसीय शिरा (Pulmonary Vein) के माध्यम से वापस हृदय के बाएँ अलिंद (Left Atrium) में आता है।
- वहाँ से यह बाएँ निलय में जाता है और चक्र फिर से शुरू होता है।
हृदय की धड़कन (Heartbeat): हृदय का एक संकुचन (Systole) और एक शिथिलन (Diastole) मिलकर एक हृदय धड़कन बनाते हैं। एक स्वस्थ वयस्क में यह लगभग 72 बार प्रति मिनट होती है।
रक्तचाप (Blood Pressure): वह दाब जो रक्त द्वारा धमनियों की दीवारों पर डाला जाता है। एक सामान्य रक्तचाप 120/80 mmHg होता है (Systolic/Diastolic)।
मानव शरीर क्रिया विज्ञान: उत्सर्जन तंत्र (Excretory System)
परिभाषा:
उत्सर्जन (Excretion) वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा शरीर में उपापचयी क्रियाओं (metabolic activities) के फलस्वरूप बने हानिकारक और विषाक्त अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकाला जाता है।
ये अपशिष्ट पदार्थ, विशेष रूप से नाइट्रोजन युक्त यौगिक (nitrogenous wastes) जैसे यूरिया (Urea), यूरिक अम्ल, और अमोनिया, यदि शरीर में जमा हो जाएँ तो विषैले हो सकते हैं। उत्सर्जन तंत्र इन पदार्थों को छानकर बाहर निकालता है और शरीर के आंतरिक वातावरण (जैसे जल और लवणों का संतुलन) को स्थिर बनाए रखता है।
मानव का मुख्य उत्सर्जी उत्पाद यूरिया (Urea) है, इसलिए मनुष्य को यूरियोटेलिक (Ureotelic) जीव कहा जाता है।
मानव उत्सर्जन तंत्र के अंग (Organs of Human Excretory System)
मानव उत्सर्जन तंत्र, जिसे मूत्रीय तंत्र (Urinary System) भी कहा जाता है, में निम्नलिखित अंग शामिल हैं:
- वृक्क (Kidneys) – (एक जोड़ी): ये मुख्य उत्सर्जी अंग हैं।
- मूत्रवाहिनी (Ureters) – (एक जोड़ी): वृक्क से मूत्राशय तक मूत्र ले जाने वाली नलिकाएँ।
- मूत्राशय (Urinary Bladder): एक पेशीय थैली जो मूत्र का अस्थायी भंडारण करती है।
- मूत्रमार्ग (Urethra): वह नली जिसके माध्यम से मूत्र शरीर से बाहर निकलता है।
वृक्क (Kidney): मुख्य उत्सर्जी अंग
- स्थान: वृक्क उदर गुहा में रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित सेम के बीज (bean-shaped) के आकार के अंग हैं।
- मुख्य कार्य:
- रक्त को छानकर उसमें से अपशिष्ट पदार्थों (जैसे यूरिया) को अलग करना।
- मूत्र (urine) का निर्माण करना।
- शरीर में जल और लवणों (इलेक्ट्रोलाइट्स) के संतुलन को बनाए रखना (परासरणनियमन)।
- रक्तदाब को नियंत्रित करने में मदद करना।
वृक्काणु (Nephron): वृक्क की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई
प्रत्येक वृक्क लगभग दस लाख (एक मिलियन) सूक्ष्म, कुंडलित नलिकाओं से बना होता है, जिन्हें वृक्काणु या नेफ्रॉन (Nephrons) कहते हैं। वास्तव में, रक्त को छानने और मूत्र बनाने का कार्य नेफ्रॉन में ही होता है।
एक नेफ्रॉन के मुख्य भाग:
- बोमन-संपुट (Bowman’s Capsule):
- यह नेफ्रॉन के ऊपरी सिरे पर स्थित एक कप के आकार की दोहरी दीवार वाली संरचना है।
- केशिकागुच्छ (Glomerulus):
- यह बोमन-संपुट के कप के अंदर स्थित रक्त केशिकाओं का एक गुच्छा होता है। रक्त यहाँ उच्च दाब पर आता है।
- वृक्क नलिका (Renal Tubule):
- यह बोमन-संपुट से जुड़ी एक लंबी, कुंडलित नलिका है। इसके अलग-अलग भाग होते हैं जहाँ पुनरावशोषण और स्रवण की क्रिया होती है।
मूत्र निर्माण की क्रियाविधि (Mechanism of Urine Formation)
मूत्र का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जो नेफ्रॉन में तीन मुख्य चरणों में पूरी होती है:
चरण 1: गुच्छीय निस्यंदन या परानिस्यंदन (Glomerular Filtration or Ultrafiltration)
- क्या होता है: जब रक्त उच्च दाब के साथ केशिकागुच्छ (Glomerulus) से गुजरता है, तो रक्त का छनन होता है।
- प्रक्रिया: दाब के कारण, रक्त के तरल भाग (प्लाज्मा) से जल, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण, यूरिया जैसे छोटे अणु छनकर बोमन-संपुट में आ जाते हैं।
- रक्त की बड़ी कोशिकाएँ (RBCs, WBCs) और प्रोटीन जैसे बड़े अणु छन नहीं पाते और रक्त में ही रह जाते हैं।
- इस छने हुए द्रव को गुच्छीय निस्यंद (glomerular filtrate) कहते हैं।
चरण 2: चयनात्मक पुनरावशोषण (Selective Reabsorption)
- क्या होता है: गुच्छीय निस्यंद में यूरिया जैसे अपशिष्ट पदार्थों के साथ-साथ कई उपयोगी पदार्थ (जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, अधिकांश लवण और जल) भी होते हैं। यदि ये सब मूत्र के साथ बाहर निकल जाएं, तो शरीर को भारी नुकसान होगा।
- प्रक्रिया: इसलिए, जब निस्यंद वृक्क नलिका (Renal Tubule) से होकर गुजरता है, तो नलिका की दीवारें शरीर के लिए आवश्यक लगभग सभी उपयोगी पदार्थों का चयन करके उन्हें वापस रक्त में अवशोषित कर लेती हैं।
- यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि केवल अपशिष्ट पदार्थ ही आगे जाएं।
चरण 3: नलिकीय स्रवण (Tubular Secretion)
- क्या होता है: यह मूत्र निर्माण का अंतिम चरण है।
- प्रक्रिया: कुछ अतिरिक्त अपशिष्ट पदार्थ (जैसे यूरिक एसिड, पोटेशियम आयन) और दवाइयाँ, जो निस्यंदन के दौरान रक्त से नहीं छन पाए थे, उन्हें नलिका के चारों ओर मौजूद रक्त केशिकाओं से सक्रिय रूप से (ऊर्जा खर्च करके) नलिका के अंदर स्रावित कर दिया जाता है।
- यह प्रक्रिया रक्त के pH और आयनिक संतुलन को बनाए रखने में भी मदद करती है।
इन तीन चरणों के बाद जो तरल पदार्थ संग्राहक नली में बचता है, वही मूत्र (Urine) कहलाता है। यह मूत्रवाहिनी से होकर मूत्राशय में इकट्ठा होता है और फिर मूत्रमार्ग द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
मूत्र का संघटन (Composition of Urine):
सामान्य मूत्र में लगभग 95% जल, 2.5% यूरिया, और 2.5% अन्य अपशिष्ट पदार्थ जैसे यूरिक एसिड, क्रिएटिनिन और लवण होते हैं। इसका हल्का पीला रंग यूरोक्रोम (Urochrome) नामक वर्णक के कारण होता है।
उत्सर्जन में सहायक अन्य अंग (Other Accessory Excretory Organs)
वृक्क के अलावा, कुछ अन्य अंग भी उत्सर्जन में मदद करते हैं:
- त्वचा (Skin): पसीने (sweat) के रूप में अतिरिक्त जल, लवण और थोड़ी मात्रा में यूरिया का उत्सर्जन करती है।
- फेफड़े (Lungs): कोशिकीय श्वसन में बनी कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) जैसी गैसीय अपशिष्ट का उत्सर्जन करते हैं।
- यकृत (Liver): यह शरीर में बने अत्यधिक विषाक्त अमोनिया (Ammonia) को कम विषाक्त यूरिया (Urea) में परिवर्तित करता है, जिसे फिर वृक्क रक्त से छानकर अलग करता है।
वृक्क निष्क्रियता एवं अपोहन (Kidney Failure and Dialysis)
जब किसी संक्रमण, चोट या बीमारी के कारण वृक्क काम करना बंद कर देते हैं, तो शरीर में विषाक्त अपशिष्ट (यूरिया) जमा होने लगता है, जिससे मृत्यु हो सकती है। ऐसी स्थिति में, एक मशीन का उपयोग करके कृत्रिम रूप से रक्त को छाना जाता है। इस प्रक्रिया को अपोहन (Dialysis) कहते हैं, और इस मशीन को कृत्रिम वृक्क (Artificial Kidney) कहा जाता है।
मानव शरीर क्रिया विज्ञान: कंकाल एवं मांसपेशी तंत्र
परिचय:
कंकाल तंत्र और मांसपेशी तंत्र मिलकर शरीर का गति तंत्र (Locomotory System) बनाते हैं। कंकाल तंत्र शरीर को एक कठोर ढाँचा प्रदान करता है, जबकि मांसपेशी तंत्र इस ढाँचे पर बल लगाकर गति उत्पन्न करता है। ये दोनों तंत्र एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं और मिलकर हमें चलने, दौड़ने, उठने, बैठने और अन्य सभी शारीरिक गतिविधियाँ करने में सक्षम बनाते हैं।
1. कंकाल तंत्र (Skeletal System)
परिभाषा:
कंकाल तंत्र हड्डियों (bones), उपास्थियों (cartilages), स्नायु (ligaments), और कंडरा (tendons) का वह ढाँचा है जो शरीर को आकृति, सहारा और संरक्षण प्रदान करता है, और मांसपेशियों की मदद से गति में सहायक होता है।
एक वयस्क मानव के कंकाल में 206 हड्डियाँ होती हैं, जबकि नवजात शिशु में लगभग 300 हड्डियाँ होती हैं, जिनमें से कुछ बाद में जुड़कर एक हो जाती हैं।
कंकाल तंत्र के कार्य (Functions of the Skeletal System):
- सहारा और आकृति (Support and Shape): यह शरीर के लिए एक फ्रेमवर्क का काम करता है, जो उसे एक निश्चित आकार और सहारा देता है।
- संरक्षण (Protection): यह शरीर के कोमल और महत्वपूर्ण आंतरिक अंगों की रक्षा करता है।
- खोपड़ी (Skull) मस्तिष्क की रक्षा करती है।
- पसलियाँ (Ribs) हृदय और फेफड़ों की रक्षा करती हैं।
- रीढ़ की हड्डी (Vertebral Column) मेरु रज्जु की रक्षा करती है।
- गति (Movement): यह मांसपेशियों के जुड़ने के लिए स्थान प्रदान करता है और एक लीवर प्रणाली की तरह काम करता है, जिससे गति संभव होती है।
- रक्त कोशिकाओं का निर्माण (Blood Cell Formation): लंबी हड्डियों के भीतर मौजूद अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs), श्वेत रक्त कोशिकाओं (WBCs) और प्लेटलेट्स का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया को हीमोपोइसिस (Haemopoiesis) कहते हैं।
- खनिज भंडारण (Mineral Storage): हड्डियाँ कैल्शियम और फॉस्फोरस जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भंडार गृह का काम करती हैं।
मानव कंकाल के भाग (Parts of the Human Skeleton):
मानव कंकाल को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:
A) अक्षीय कंकाल (Axial Skeleton) – (80 हड्डियाँ):
यह शरीर के मुख्य अक्ष पर स्थित होता है। इसमें शामिल हैं:
- खोपड़ी (Skull): 29 हड्डियाँ (कपाल, चेहरे और कान की हड्डियाँ मिलाकर)।
- रीढ़ की हड्डी / कशेरुक दंड (Vertebral Column): 26 कशेरुकाएँ (vertebrae)।
- उरोस्थि (Sternum): 1 हड्डी (छाती की हड्डी)।
- पसलियाँ (Ribs): 12 जोड़े = 24 हड्डियाँ।
B) उपांगीय कंकाल (Appendicular Skeleton) – (126 हड्डियाँ):
यह अक्षीय कंकाल से जुड़ा होता है और इसमें हाथ-पैर की हड्डियाँ शामिल हैं। इसमें शामिल हैं:
- अंश मेखला (Pectoral Girdle): कंधे की हड्डियाँ (4 हड्डियाँ)।
- अग्र पाद (Forelimbs): हाथ की हड्डियाँ (प्रत्येक में 30 हड्डियाँ = 60 हड्डियाँ)।
- श्रोणि मेखला (Pelvic Girdle): कूल्हे की हड्डियाँ (2 हड्डियाँ)।
- पश्च पाद (Hindlimbs): पैर की हड्डियाँ (प्रत्येक में 30 हड्डियाँ = 60 हड्डियाँ)।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- सबसे लंबी हड्डी: फीमर (Femur) – जांघ की हड्डी।
- सबसे छोटी हड्डी: स्टेपीज (Stapes) – मध्य कान की हड्डी।
- सबसे मजबूत हड्डी: फीमर।
संधि या जोड़ (Joints):
शरीर में वह स्थान जहाँ दो या दो से अधिक हड्डियाँ मिलती हैं, संधि या जोड़ कहलाता है। ये हमें गति करने की अनुमति देते हैं।
- स्नायु या लिगामेंट (Ligament): वह मजबूत, लचीला संयोजी ऊतक है जो एक हड्डी को दूसरी हड्डी से जोड़ता है।
2. मांसपेशी तंत्र (Muscular System)
परिभाषा:
मांसपेशी तंत्र विशेष प्रकार के ऊतकों (पेशीय ऊतकों) से बना होता है, जिनमें संकुचन (contraction) और शिथिलन (relaxation) की क्षमता होती है। इसी क्षमता के कारण ये हड्डियों को खींचकर गति उत्पन्न करते हैं।
मानव शरीर में 639 से अधिक मांसपेशियाँ होती हैं।
मांसपेशियों के प्रकार (Types of Muscles):
मांसपेशियों को उनकी संरचना और कार्य के आधार पर तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:
1. कंकालीय या रेखित या ऐच्छिक पेशी (Skeletal, Striated or Voluntary Muscle):
- संरचना: इन पर सूक्ष्मदर्शी से देखने पर गहरी और हल्की धारियाँ (striations) दिखाई देती हैं, इसलिए इन्हें रेखित कहते हैं।
- नियंत्रण: इनकी गति हमारी इच्छा के नियंत्रण में होती है, इसीलिए इन्हें ऐच्छिक कहते हैं।
- जुड़ाव: ये कंडरा या टेंडन (Tendon) द्वारा हड्डियों से जुड़ी होती हैं।
- टेंडन: वह मजबूत संयोजी ऊतक है जो मांसपेशी को हड्डी से जोड़ता है।
- कार्य: शरीर को गति प्रदान करना (चलना, दौड़ना), मुद्रा बनाए रखना।
- उदाहरण: हाथ, पैर, गर्दन की मांसपेशियाँ।
2. चिकनी या अरेखित या अनैच्छिक पेशी (Smooth, Unstriated or Involuntary Muscle):
- संरचना: इन पर धारियाँ नहीं होती हैं, इसलिए इन्हें अरेखित कहते हैं।
- नियंत्रण: इनकी गति हमारी इच्छा के नियंत्रण में नहीं होती है, इसीलिए इन्हें अनैच्छिक कहते हैं। ये स्वचालित रूप से काम करती हैं।
- स्थान: ये शरीर के आंतरिक खोखले अंगों (जैसे आमाशय, आंत, मूत्राशय, रक्त वाहिकाओं) की दीवारों में पाई जाती हैं।
- कार्य: भोजन का पाचन, रक्त का प्रवाह, मूत्र का उत्सर्जन जैसी आंतरिक क्रियाओं को नियंत्रित करना।
3. हृदय पेशी (Cardiac Muscle):
- संरचना: ये संरचना में रेखित होती हैं, लेकिन कार्य में अनैच्छिक होती हैं। यह केवल हृदय (Heart) की दीवारों में पाई जाती हैं।
- नियंत्र-ण: ये अनैच्छिक होती हैं और जन्म से मृत्यु तक बिना थके, लयबद्ध (rhythmically) रूप से संकुचित और शिथिल होती रहती हैं।
- कार्य: हृदय को पंप करने और पूरे शरीर में रक्त का संचार करने का कार्य करती हैं।
| विशेषता | कंकालीय पेशी | चिकनी पेशी | हृदय पेशी |
| रेखांकन | उपस्थित | अनुपस्थित | उपस्थित |
| नियंत्रण | ऐच्छिक (Voluntary) | अनैच्छिक (Involuntary) | अनैच्छिक (Involuntary) |
| स्थान | हड्डियों से जुड़ी | आंतरिक अंगों की दीवारें | केवल हृदय की दीवारें |
| थकान | जल्दी थक जाती हैं | धीरे-धीरे थकती हैं | कभी नहीं थकती |
मानव शरीर क्रिया विज्ञान: तंत्रिका तंत्र (Nervous System)
परिभाषा:
तंत्रिका तंत्र (Nervous System) शरीर का संचार (communication) और नियंत्रण (control) केंद्र है। यह तंत्रिका कोशिकाओं (neurons) का एक जटिल नेटवर्क है जो बाहरी और आंतरिक वातावरण से सूचनाओं (संवेदनाओं) को ग्रहण करता है, उनका विश्लेषण करता है, और उनके प्रति उचित प्रतिक्रिया के लिए शरीर के विभिन्न अंगों (जैसे मांसपेशियों और ग्रंथियों) को आदेश भेजता है।
यह हमारे विचारों, स्मृतियों, भावनाओं और सभी शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
तंत्रिका कोशिका या न्यूरॉन (Nerve Cell or Neuron)
न्यूरॉन, तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है। यही वे कोशिकाएँ हैं जो विद्युत-रासायनिक संकेतों (electro-chemical signals) के रूप में संदेशों का संचार करती हैं।
एक न्यूरॉन के मुख्य भाग:
- कोशिका काय या साइटॉन (Cell Body or Cyton):
- यह न्यूरॉन का मुख्य भाग है, जिसमें एक केंद्रक और अन्य कोशिकांग होते हैं।
- द्रुमिका या डेन्ड्राइट्स (Dendrites):
- ये कोशिका काय से निकलने वाली छोटी, वृक्ष जैसी शाखाएँ हैं।
- इनका कार्य दूसरे न्यूरॉन से आने वाले संकेतों को ग्रहण करना और उन्हें कोशिका काय की ओर भेजना है।
- तंत्रिकाक्ष या एक्सॉन (Axon):
- यह कोशिका काय से निकलने वाला एक लंबा, एकल प्रवर्ध (process) है।
- इसका कार्य विद्युत संकेतों (तंत्रिका आवेग) को कोशिका काय से दूर, अगले न्यूरॉन या किसी मांसपेशी/ग्रंथि तक ले जाना है।
- सिनैप्स (Synapse):
- यह दो न्यूरॉनों के बीच का संधि-स्थल (junction) होता है। एक न्यूरॉन का एक्सॉन, दूसरे न्यूरॉन के डेन्ड्राइट से लगभग मिलता है (पूरी तरह से नहीं)।
- यहाँ पर विद्युत संकेत, न्यूरोट्रांसमीटर (neurotransmitters) नामक रासायनिक पदार्थों के माध्यम से एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक पहुँचते हैं।
मानव तंत्रिका तंत्र के भाग (Parts of the Human Nervous System)
मानव तंत्रिका तंत्र को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है:
I. केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System – CNS)
यह शरीर का मुख्य प्रसंस्करण (processing) और नियंत्रण केंद्र है। इसमें शामिल हैं:
1. मस्तिष्क (Brain):
- परिचय: मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र का सर्वोच्च नियंत्रक है। यह खोपड़ी (Skull) के अंदर सुरक्षित रहता है और शरीर की सभी ऐच्छिक और अनैच्छिक क्रियाओं, सोच, स्मृति, भावनाओं और बुद्धि का केंद्र है।
- मस्तिष्क के मुख्य भाग:
- A) अग्र मस्तिष्क (Forebrain): यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा और सबसे जटिल भाग है। इसमें शामिल हैं:
- प्रमस्तिष्क (Cerebrum): यह सोचने, याददाश्त, बुद्धिमत्ता, चेतना, और तर्क शक्ति का केंद्र है। यह सभी ऐच्छिक क्रियाओं (voluntary actions) को नियंत्रित करता है।
- थैलेमस (Thalamus): यह संवेदी (sensory) और प्रेरक (motor) संकेतों के लिए एक रिले केंद्र का काम करता है।
- हाइपोथैलेमस (Hypothalamus): यह भूख, प्यास, शरीर के तापमान का नियंत्रण (thermoregulation), और भावनाओं (जैसे- गुस्सा, खुशी) को नियंत्रित करता है। यह अंतःस्रावी तंत्र को भी नियंत्रित करता है।
- B) मध्य मस्तिष्क (Midbrain): यह अग्र मस्तिष्क और पश्च मस्तिष्क को जोड़ता है। यह दृष्टि और श्रवण से संबंधित कुछ प्रतिवर्ती क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
- C) पश्च मस्तिष्क (Hindbrain): इसमें शामिल हैं:
- अनुमस्तिष्क (Cerebellum): यह शरीर के संतुलन, मुद्रा (posture) और ऐच्छिक पेशियों की गति में समन्वय बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है। शराब का सेवन इसी भाग को प्रभावित करता है।
- पॉन्स (Pons): यह श्वसन जैसी कुछ क्रियाओं को नियंत्रित करने में मदद करता है।
- मेडुला ऑब्लांगेटा (Medulla Oblongata): यह मस्तिष्क का सबसे निचला भाग है जो मेरु रज्जु से जुड़ता है। यह शरीर की सभी अनैच्छिक क्रियाओं (involuntary actions) जैसे हृदय की धड़कन, रक्तचाप, श्वसन, और छींकने-खांसने को नियंत्रित करता है।
- A) अग्र मस्तिष्क (Forebrain): यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा और सबसे जटिल भाग है। इसमें शामिल हैं:
2. मेरु रज्जु (Spinal Cord):
- परिचय: यह मेडुला ऑब्लांगेटा से शुरू होकर रीढ़ की हड्डी के भीतर से गुजरने वाली एक लंबी, बेलनाकार तंत्रिका संरचना है।
- कार्य:
- प्रतिवर्ती क्रियाओं का केंद्र: यह प्रतिवर्ती क्रियाओं (Reflex Actions) को नियंत्रित करता है (नीचे वर्णित)।
- संदेशों का संवाहक: यह मस्तिष्क और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच तंत्रिका आवेगों (messages) के लिए एक मुख्य मार्ग के रूप में कार्य करता है।
II. परिधीय तंत्रिका तंत्र (Peripheral Nervous System – PNS)
यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) से निकलने वाली सभी तंत्रिकाओं का एक नेटवर्क है जो शरीर के बाकी हिस्सों तक फैली होती हैं। इसका मुख्य कार्य CNS को शरीर के अंगों से जोड़ना है।
प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action)
परिभाषा:
यह किसी उद्दीपन (stimulus) के प्रति होने वाली एक तत्काल, स्वतःस्फूर्त और अनैच्छिक अनुक्रिया है, जिसे मस्तिष्क द्वारा सचेत रूप से नियंत्रित नहीं किया जाता है।
- यह हमारे शरीर का एक रक्षात्मक तंत्र है जो हमें खतरे से बचाने के लिए बनाया गया है।
- उदाहरण:
- गर्म वस्तु को छूते ही हाथ का तुरंत पीछे हट जाना।
- आँख में कुछ पड़ने पर पलक का झपकना।
- तेज रोशनी में पुतली का सिकुड़ना।
- घुटने पर चोट लगने से पैर का आगे बढ़ना (Knee-jerk reflex)।
प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc):
वह तंत्रिका पथ जिस पर प्रतिवर्ती क्रिया के दौरान तंत्रिका आवेग यात्रा करते हैं, उसे प्रतिवर्ती चाप कहते हैं।
- प्रक्रिया: संवेदी अंग (जैसे त्वचा) → संवेदी न्यूरॉन → मेरु रज्जु (Spinal Cord) → प्रेरक न्यूरॉन → कार्यकारी अंग (जैसे मांसपेशी)।
- इसमें मस्तिष्क सीधे तौर पर शामिल नहीं होता, इसलिए प्रतिक्रिया बहुत तेज होती है। सूचना बाद में मस्तिष्क तक पहुँचती है।
मानव शरीर क्रिया विज्ञान: अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System)
परिभाषा:
अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) हमारे शरीर का एक रासायनिक समन्वय (chemical coordination) तंत्र है, जो हार्मोन (hormones) नामक रासायनिक संदेशवाहकों का उपयोग करके शरीर की विभिन्न उपापचयी क्रियाओं, वृद्धि, विकास, जनन और मूड को नियंत्रित और समन्वित करता है।
यह तंत्र अंतःस्रावी ग्रंथियों (endocrine glands) से मिलकर बना होता है।
अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (Endocrine Glands):
ये नलिकाविहीन ग्रंथियाँ (ductless glands) होती हैं। इसका अर्थ है कि ये अपने स्राव (हार्मोन) को किसी नलिका के माध्यम से नहीं, बल्कि सीधे रक्त प्रवाह (bloodstream) में छोड़ती हैं। रक्त इन हार्मोनों को उनके लक्ष्य अंगों (target organs) तक पहुँचाता है, जहाँ वे अपना प्रभाव दिखाते हैं।
यह बहिःस्रावी ग्रंथियों (Exocrine Glands) से अलग हैं, जिनमें नलिकाएँ होती हैं (जैसे- लार ग्रंथि, पसीने की ग्रंथि)।
प्रमुख अंतःस्रावी ग्रंथियाँ और उनके हार्मोन
1. हाइपोथैलेमस (Hypothalamus)
- स्थान: यह अग्र मस्तिष्क (forebrain) का एक हिस्सा है।
- कार्य: इसे “मास्टर ऑफ मास्टर ग्लैंड” कहा जाता है, क्योंकि यह पीयूष ग्रंथि (Master Gland) के कार्यों को नियंत्रित करता है।
- हार्मोन: यह मोचक हार्मोन (Releasing Hormones) और निरोधी हार्मोन (Inhibitory Hormones) का स्राव करता है, जो पीयूष ग्रंथि को हार्मोन स्रावित करने या रोकने का संकेत देते हैं।
2. पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland)
- स्थान: यह मस्तिष्क के आधार में हाइपोथैलेमस के नीचे स्थित एक छोटी, मटर के दाने के आकार की ग्रंथि है।
- कार्य: इसे “मास्टर ग्लैंड” कहा जाता है, क्योंकि यह कई अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों (जैसे थायराइड, अधिवृक्क) की गतिविधियों को नियंत्रित करती है।
- प्रमुख हार्मोन:
- वृद्धि हार्मोन (Growth Hormone – GH): शरीर की सामान्य वृद्धि, विशेष रूप से हड्डियों और मांसपेशियों की वृद्धि को नियंत्रित करता है।
- कमी से: बौनापन (Dwarfism)।
- अधिकता से: विशालकायता (Gigantism) (बचपन में) या एक्रोमिगेली (Acromegaly) (वयस्क अवस्था में)।
- TSH (Thyroid Stimulating Hormone): थायराइड ग्रंथि को हार्मोन बनाने के लिए उत्तेजित करता है।
- ADH (Antidiuretic Hormone) / वैसोप्रेसिन: वृक्क द्वारा जल के पुनरावशोषण को नियंत्रित करता है।
- प्रोलैक्टिन (Prolactin): स्तन ग्रंथियों में दूध के निर्माण को प्रेरित करता है।
- ऑक्सीटोसिन (Oxytocin): प्रसव के दौरान गर्भाशय के संकुचन और दूध के स्राव को प्रेरित करता है।
- वृद्धि हार्मोन (Growth Hormone – GH): शरीर की सामान्य वृद्धि, विशेष रूप से हड्डियों और मांसपेशियों की वृद्धि को नियंत्रित करता है।
3. पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland)
- स्थान: मस्तिष्क के केंद्र में स्थित होती है।
- हार्मोन: मेलाटोनिन (Melatonin)।
- कार्य: यह शरीर की जैविक घड़ी (Biological Clock) या दैनिक लय (Circadian Rhythm) को नियंत्रित करती है, जैसे सोने-जागने का चक्र।
4. थायराइड ग्रंथि (Thyroid Gland)
- स्थान: यह गर्दन में श्वास नली के दोनों ओर स्थित H-आकार की ग्रंथि है।
- हार्मोन: थायरॉक्सिन (Thyroxine)। थायरॉक्सिन के निर्माण के लिए आयोडीन (Iodine) अनिवार्य है।
- कार्य:
- यह शरीर की उपापचयी दर (metabolic rate) को नियंत्रित करता है (भोजन से ऊर्जा उत्पादन की गति)।
- यह शारीरिक, मानसिक और लैंगिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- रोग:
- घेंघा या गलगंड (Goitre): आयोडीन की कमी से थायराइड ग्रंथि में सूजन आ जाती है।
- हाइपोथायरायडिज्म (Hypothyroidism): थायरॉक्सिन की कमी से उपापचय धीमा हो जाता है, जिससे मोटापा, सुस्ती आदि होती है।
5. पैराथायराइड ग्रंथि (Parathyroid Gland)
- स्थान: ये चार छोटी ग्रंथियाँ थायराइड ग्रंथि के पीछे धँसी होती हैं।
- हार्मोन: पैराथाइरॉइड हार्मोन (PTH)।
- कार्य: यह रक्त में कैल्शियम (Calcium) और फॉस्फेट के स्तर को नियंत्रित करता है। यह हड्डियों से कैल्शियम निकालकर रक्त में इसके स्तर को बढ़ाता है।
6. थाइमस ग्रंथि (Thymus Gland)
- स्थान: यह हृदय के ऊपर, उरोस्थि के पीछे स्थित होती है।
- हार्मोन: थाइमोसिन (Thymosin)।
- कार्य: यह प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, विशेष रूप से T-लिम्फोसाइट्स (एक प्रकार की WBC) के परिपक्वन में।
- यह ग्रंथि बचपन में सक्रिय होती है और यौवन के बाद धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती है।
7. अग्न्याशय (Pancreas)
- प्रकृति: यह एक मिश्रित ग्रंथि (Mixed Gland) है, यानी यह अंतःस्रावी और बहिःस्रावी दोनों के रूप में कार्य करती है।
- अंतःस्रावी कार्य: इसकी लैंगरहैंस की द्वीपिकाओं (Islets of Langerhans) में स्थित कोशिकाएँ हार्मोन का स्राव करती हैं:
- इंसुलिन (Insulin): बीटा (β) कोशिकाओं द्वारा स्रावित। यह रक्त में शर्करा (ग्लूकोज) के स्तर को कम करता है (ग्लूकोज को कोशिकाओं में प्रवेश करने और ग्लाइकोजन के रूप में यकृत में संग्रहीत होने में मदद करके)।
- कमी से: मधुमेह या डायबिटीज मेलिटस (Diabetes Mellitus) रोग होता है, जिसमें रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है।
- ग्लूकागॉन (Glucagon): अल्फा (α) कोशिकाओं द्वारा स्रावित। यह इंसुलिन के विपरीत काम करता है और यकृत में संग्रहीत ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में बदलकर रक्त में शर्करा के स्तर को बढ़ाता है।
- इंसुलिन (Insulin): बीटा (β) कोशिकाओं द्वारा स्रावित। यह रक्त में शर्करा (ग्लूकोज) के स्तर को कम करता है (ग्लूकोज को कोशिकाओं में प्रवेश करने और ग्लाइकोजन के रूप में यकृत में संग्रहीत होने में मदद करके)।
8. अधिवृक्क ग्रंथि / एड्रिनल ग्रंथि (Adrenal Gland)
- स्थान: ये दोनों वृक्क (kidney) के ऊपरी सिरे पर एक टोपी की तरह स्थित होती हैं।
- कार्य: ये तनाव और आपातकालीन स्थितियों के लिए शरीर को तैयार करती हैं।
- हार्मोन:
- एड्रेनालाईन (Adrenaline) / एपिनेफ्रीन: यह मेडुला भाग से स्रावित होता है। इसे “आपातकालीन हार्मोन” (Emergency Hormone) या “लड़ो या उड़ो” (Fight or Flight) हार्मोन कहा जाता है। यह तनाव या खतरे की स्थिति में स्रावित होता है और हृदय की धड़कन, रक्तचाप, और श्वसन दर को बढ़ा देता है ताकि शरीर को तत्काल ऊर्जा मिल सके।
9. जनन ग्रंथियाँ (Gonads)
ये ग्रंथियाँ लिंग का निर्धारण करती हैं और जनन हार्मोन का उत्पादन करती हैं।
- वृषण (Testes) – (पुरुष में):
- हार्मोन: टेस्टोस्टेरोन (Testosterone)।
- कार्य: यह पुरुषों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (जैसे- दाढ़ी-मूंछ का आना, आवाज का भारी होना) के विकास और शुक्राणु उत्पादन को नियंत्रित करता है।
- अंडाशय (Ovaries) – (महिला में):
- हार्मोन: एस्ट्रोजन (Estrogen) और प्रोजेस्टेरोन (Progesterone)।
- कार्य:
- एस्ट्रोजन: महिलाओं में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों (जैसे- स्तनों का विकास) को नियंत्रित करता है।
- प्रोजेस्टेरोन: गर्भाशय को गर्भावस्था के लिए तैयार करता है और गर्भावस्था को बनाए रखने में मदद करता है।