जीव जगत का वर्गीकरण (Classification of Living World)


1. जीव क्या है? और वर्गीकरण की आवश्यकता (What is Living? & Need for Classification)

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जीव क्या है? (What is Living?)

जीव विज्ञान (Biology) सजीवों का अध्ययन है, लेकिन “जीवन” को परिभाषित करना जटिल है। किसी एक गुण के आधार पर हम सजीव को निर्जीव से अलग नहीं कर सकते। इसलिए, हम सजीवों को उनके कुछ विशिष्ट अभिलक्षणों (defining characteristics) के आधार पर पहचानते हैं:

  1. वृद्धि (Growth):
    • सभी जीव वृद्धि करते हैं (आकार और संख्या में)।
    • सजीवों में यह वृद्धि आंतरिक (internal) होती है, जो कोशिका विभाजन (cell division) द्वारा होती है।
    • निर्जीव वस्तुएँ (जैसे पर्वत) भी वृद्धि करती हैं, लेकिन उनकी वृद्धि बाहरी (external) होती है, जिसमें पदार्थ सतह पर जमा होता है। अतः, वृद्धि सजीवों का एक विशिष्ट गुण नहीं है।
  2. जनन (Reproduction):
    • सजीव अपने समान संतान उत्पन्न करते हैं, जिसे जनन कहते हैं। यह लैंगिक (sexual) या अलैंगिक (asexual) हो सकता है।
    • हालांकि, कुछ सजीव (जैसे खच्चर, श्रमिक मधुमक्खी, अनुर्वर मानव) जनन नहीं कर सकते। इसलिए, जनन भी सजीवों का एक समग्र विशिष्ट गुण नहीं माना जा सकता।
  3. उपापचय (Metabolism):
    • सजीवों के शरीर में होने वाली सभी रासायनिक क्रियाओं (जैसे ऊर्जा का निर्माण, अणुओं का टूटना) के योग को उपापचय कहते हैं।
    • यह क्रिया निर्जीवों में नहीं होती है।
    • अतः, उपापचय सजीवों का एक विशिष्ट गुण है।
  4. कोशिकीय संगठन (Cellular Organization):
    • सभी सजीव कोशिकाओं (cells) से बने होते हैं। कोशिका जीवन की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।
    • अतः, कोशिकीय संगठन सजीवों का एक मूलभूत और विशिष्ट गुण है।
  5. चेतना / अनुक्रिया (Consciousness / Response to Stimuli):
    • सभी सजीव अपने आस-पास के भौतिक, रासायनिक या जैविक वातावरण के प्रति संवेदनशील होते हैं और प्रतिक्रिया करते हैं (जैसे प्रकाश, ताप, ध्वनि)।
    • यह सजीवों का सबसे स्पष्ट और तकनीकी रूप से जटिल, परन्तु एक विशिष्ट गुण है।

निष्कर्ष: उपापचय, कोशिकीय संगठन और चेतना वे तीन अभिलक्षण हैं जिन्हें सजीवों के परिभाषित गुण माना जाता है।

वर्गीकरण की आवश्यकता (Need for Classification)

पृथ्वी पर लाखों प्रकार के जीव-जंतु और पेड़-पौधे पाए जाते हैं। इन सभी का एक-एक करके अध्ययन करना असंभव है। इसलिए, हमें वर्गीकरण की आवश्यकता होती है जिसके मुख्य कारण हैं:

  1. अध्ययन में सुगमता: जीवों को उनकी समानताओं और असमानताओं के आधार पर समूहों में बाँटने से उनका अध्ययन सरल और व्यवस्थित हो जाता है।
  2. जीवों की पहचान: वर्गीकरण से किसी नए खोजे गए जीव की पहचान करने और उसे सही समूह में रखने में मदद मिलती है।
  3. संबंधों का पता लगाना: यह विभिन्न जीव समूहों के बीच विकासीय संबंधों (evolutionary relationships) को समझने में मदद करता है।
  4. सार्वभौमिक प्रणाली: यह वैज्ञानिकों को एक ऐसी मानक प्रणाली प्रदान करता है जिसे दुनिया भर में समझा जा सके, जिससे स्थानीय नामों के कारण होने वाला भ्रम दूर हो।

2. पाँच जगत वर्गीकरण (Five Kingdom Classification)

यह वर्गीकरण की सबसे आधुनिक और मान्य प्रणाली है, जिसे आर. एच. व्हिटेकर (R. H. Whittaker) ने 1969 में प्रस्तावित किया था। उन्होंने जीवों को निम्नलिखित पाँच प्रमुख जगतों (Kingdoms) में विभाजित किया।

वर्गीकरण के मुख्य आधार:

  1. कोशिका की संरचना (प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक)।
  2. शारीरिक संगठन (एककोशिकीय या बहुकोशिकीय)।
  3. पोषण की विधि (स्वपोषी या विषमपोषी)।
  4. पारिस्थितिक भूमिका (उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटक)।
  5. विकासीय संबंध (Phylogenetic relationships)।

पाँच जगत इस प्रकार हैं:

I. जगत मोनेरा (Kingdom Monera)

II. जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista)

III. जगत कवक (Kingdom Fungi)

IV. जगत पादप (Kingdom Plantae)

V. जगत प्राणि (Kingdom Animalia)


पाँच जगत वर्गीकरण की सारांश तालिका

लक्षणमोनेरा (Monera)प्रोटिस्टा (Protista)कवक (Fungi)पादप (Plantae)प्राणि (Animalia)
कोशिका का प्रकारप्रोकैरियोटिकयूकैरियोटिकयूकैरियोटिकयूकैरियोटिकयूकैरियोटिक
शारीरिक संगठनएककोशिकीयएककोशिकीयअधिकांश बहुकोशिकीयऊतक/अंग/अंग तंत्रऊतक/अंग/अंग तंत्र
कोशिका भित्तिपेप्टिडोग्लाइकनकुछ में उपस्थितकाइटिन की बनीसेल्यूलोज की बनीअनुपस्थित
पोषण की विधिस्वपोषी/विषमपोषीस्वपोषी/विषमपोषीकेवल विषमपोषीकेवल स्वपोषीकेवल विषमपोषी
उदाहरणजीवाणु, नील-हरित शैवालअमीबा, युग्लीनायीस्ट, मशरूमपेड़, घास, शैवालकीड़े, मनुष्य

पादप जगत का वर्गीकरण (Classification of the Plant Kingdom)

जगत पादप (Kingdom Plantae) में वे सभी बहुकोशिकीय (multicellular), यूकैरियोटिक (eukaryotic) जीव शामिल हैं जो स्वपोषी (autotrophic) होते हैं, अर्थात क्लोरोफिल की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इनकी कोशिका भित्ति मुख्य रूप से सेल्यूलोज की बनी होती है।

पादप जगत का वर्गीकरण मुख्य रूप से इस आधार पर किया जाता है कि पौधे का शरीर कितना विकसित है, उसमें संवहन ऊतक (vascular tissues) हैं या नहीं, और उसमें बीज और फल बनते हैं या नहीं। इस आधार पर पादप जगत को निम्नलिखित मुख्य समूहों में बांटा गया है।


1. शैवाल (Algae / Division: Thallophyta)

यह पादप जगत का सबसे सरल समूह है।

2. ब्रायोफाइटा (Bryophyta)

इन्हें पादप जगत का उभयचर (Amphibians of the plant kingdom) भी कहा जाता है।

3. टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)

ये संवहन ऊतक वाले पहले स्थलीय पौधे हैं।

4. जिम्नोस्पर्म / अनावृतबीजी (Gymnosperms)

ये बीज उत्पन्न करने वाले पौधे हैं जिनके बीज नग्न होते हैं।

5. एंजियोस्पर्म / आवृतबीजी (Angiosperms)

ये वर्तमान समय में पृथ्वी पर सबसे विकसित और सबसे अधिक पाए जाने वाले पौधे हैं।


पादप जगत की सारांश तालिका

लक्षणशैवाल (Algae)ब्रायोफाइटा (Bryophyta)टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)जिम्नोस्पर्म (Gymnosperm)एंजियोस्पर्म (Angiosperm)
शरीर संरचनाथैलस (जड़, तना, पत्ती नहीं)जड़-तना-पत्ती नहींवास्तविक जड़, तना, पत्तीवास्तविक जड़, तना, पत्तीवास्तविक जड़, तना, पत्ती
संवहन ऊतकअनुपस्थितअनुपस्थितउपस्थितउपस्थितउपस्थित
पुष्प (Flower)अनुपस्थितअनुपस्थितअनुपस्थितअनुपस्थित (शंकु होते हैं)उपस्थित
बीज (Seed)अनुपस्थितअनुपस्थितअनुपस्थितउपस्थित (नग्न)उपस्थित (ढके हुए)
फल (Fruit)अनुपस्थितअनुपस्थितअनुपस्थितअनुपस्थितउपस्थित
प्रमुख उदाहरणस्पाइरोगाइरामॉस, लिवरवर्टफर्न, हॉर्सटेलसाइकस, पाइनसआम, गुलाब, गेहूँ

प्राणि जगत का वर्गीकरण (Classification of Animal Kingdom)

प्राणि जगत (Kingdom Animalia) में वे सभी जीव शामिल हैं जो बहुकोशिकीय (multicellular), यूकैरियोटिक (eukaryotic) और विषमपोषी (heterotrophic) होते हैं। इनमें कोशिका भित्ति का अभाव होता है और अधिकांश जंतु गतिशील होते हैं।

जंतुओं का वर्गीकरण उनकी शारीरिक संरचना की जटिलता, सममिति (symmetry), शारीरिक गुहा (body cavity or coelom) और अन्य शारीरिक विशेषताओं के आधार पर विभिन्न संघों (Phyla) में किया गया है। यहाँ सरल से जटिल की ओर प्रमुख संघों का संक्षिप्त वर्गीकरण दिया गया है।


अकशेरुकी (Invertebrates) – (जिनमें रीढ़ की हड्डी नहीं होती)

1. संघ पोरिफेरा (Phylum Porifera)

2. संघ सीलेन्ट्रेटा / निडेरिया (Phylum Coelenterata / Cnidaria)

3. संघ प्लेटीहेल्मिन्थीज (Phylum Platyhelminthes)

4. संघ एस्केल्मिन्थीज / निमेटोडा (Phylum Aschelminthes / Nematoda)

5. संघ एनिलिडा (Phylum Annelida)

6. संघ आर्थ्रोपोडा (Phylum Arthropoda)

7. संघ मोलस्का (Phylum Mollusca)

8. संघ इकाइनोडर्मेटा (Phylum Echinodermata)


कशेरुकी (Vertebrates) – (जिनमें रीढ़ की हड्डी होती है)

9. संघ कॉर्डेटा (Phylum Chordata)

इस संघ के जीवों में जीवन की किसी न किसी अवस्था में नोटोकॉर्ड (notochord) (एक लचीली छड़ जैसी संरचना) पाई जाती है, जो बाद में कशेरुक दंड (vertebral column or backbone) में विकसित हो जाती है।

उपसंघ वर्टिब्रेटा (Subphylum Vertebrata) को निम्नलिखित वर्गों (Classes) में बांटा गया है:

i. वर्ग पिसीज / मत्स्य (Class Pisces)

ii. वर्ग एम्फीबिया / उभयचर (Class Amphibia)

iii. वर्ग रेप्टीलिया / सरीसृप (Class Reptilia)

iv. वर्ग एवीज / पक्षी (Class Aves)

v. वर्ग मैमेलिया / स्तनधारी (Class Mammalia)


वायरस, वायरोइड्स एवं लाइकेन

व्हिटेकर के पाँच जगत वर्गीकरण में कुछ ऐसे जीवों को स्थान नहीं दिया गया है जो पारंपरिक रूप से ‘सजीव’ की परिभाषा में पूरी तरह फिट नहीं होते, क्योंकि उनमें कोशिकीय संगठन का अभाव होता है। वायरस, वायरोइड्स और लाइकेन इसी श्रेणी में आते हैं।


1. वायरस (Virus)

अर्थ: ‘वायरस’ लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “विषैला तरल” (venom or poisonous fluid)

परिभाषा और प्रकृति:
वायरस अकोशिकीय (non-cellular) और अतिसूक्ष्म (ultramicroscopic) कण होते हैं, जिन्हें केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से ही देखा जा सकता है। इनकी प्रकृति को लेकर एक लंबा विवाद रहा है क्योंकि ये सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी (connecting link between living and non-living) माने जाते हैं।

संरचना:
एक सामान्य वायरस दो मुख्य घटकों से बना होता है:

  1. आनुवंशिक पदार्थ (Genetic Material): केंद्र में या तो DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) होता है या RNA (राइबोन्यूक्लिक अम्ल)। किसी भी वायरस में दोनों एक साथ नहीं पाए जाते।
  2. कैप्सिड (Capsid): आनुवंशिक पदार्थ के चारों ओर एक प्रोटीन का बना आवरण होता है, जिसे कैप्सिड कहते हैं। यह आनुवंशिक पदार्थ की रक्षा करता है।

खोज:

विषाणु-जनित रोग (Viral Diseases):
मनुष्यों में – जुकाम (Common Cold), इन्फ्लुएंजा, पोलियो (Polio), एड्स (AIDS), खसरा, कोरोना (COVID-19), डेंगू।
पौधों में – तंबाकू मोजेक रोग, पत्तियों का मुड़ना और पीला होना।


2. वायरोइड्स (Viroids)

परिभाषा:
वायरोइड्स, वायरस से भी छोटे, संक्रामक (infectious) कण होते हैं।

संरचना और अंतर:
वायरोइड्स और वायरस में मुख्य अंतर यह है:

खोज:
इनकी खोज 1971 में टी. ओ. डाइनर (T. O. Diener) ने की थी, जिन्होंने पोटैटो स्पिंडल ट्यूबर रोग (Potato Spindle Tuber disease) के कारक के रूप में वायरोइड की पहचान की।

रोग:
ये मुख्य रूप से पौधों में रोग उत्पन्न करते हैं।


3. लाइकेन (Lichens)

परिभाषा:
लाइकेन एक अद्वितीय जीव है जो दो अलग-अलग जीवों – एक शैवाल (algae) और एक कवक (fungus) – के सहजीवी (symbiotic) संबंध से बनता है। ये दोनों जीव एक साथ इस प्रकार रहते हैं कि वे एक ही जीव की तरह प्रतीत होते हैं।

सहजीवी संबंध (Symbiotic Relationship):
सहजीविता एक ऐसा संबंध है जिसमें दोनों सहभागी एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।

इस प्रकार, शैवाल कवक के लिए भोजन बनाता है और कवक शैवाल के लिए एक घर और कच्ची सामग्री प्रदान करता है। यह संबंध इतना गहरा होता है कि वे एक-दूसरे के बिना स्वतंत्र रूप से जीवित नहीं रह सकते।

महत्व और उपयोग:

आधारवायरस (Virus)वायरोइड्स (Viroid)लाइकेन (Lichen)
प्रकृतिअकोशिकीय (निर्जीव-सजीव की कड़ी)अकोशिकीय (केवल आनुवंशिक पदार्थ)कोशिकीय (दो जीवों का सहजीवन)
संरचनाप्रोटीन कोट (कैप्सिड) + आनुवंशिक पदार्थ (DNA या RNA)केवल RNA (कोई प्रोटीन कोट नहीं)शैवाल (भोजन बनाता) + कवक (आश्रय देता)
पोषी (Host)पौधे, जंतु, जीवाणुकेवल पौधेये स्वयं एक जीव हैं।
विशेषताअविकल्पी परजीवीवायरस से भी छोटे संक्रामक कारकप्रदूषण के अच्छे सूचक।

कोशिका: जीवन की इकाई (Cell: The Unit of Life)


कोशिका क्या है? (What is a Cell?)

परिभाषा:

कोशिका (Cell) किसी भी सजीव (living organism) की संरचनात्मक (structural) और क्रियात्मक (functional) इकाई है।

इसका अर्थ है:

कोशिकाओं का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है और वे जीवन की सभी मौलिक क्रियाओं को करने में सक्षम होती हैं। इसीलिए कोशिका को “जीवन की इकाई” कहा जाता है।

खोज (Discovery):


कोशिका सिद्धांत (The Cell Theory)

कोशिका की खोज के बाद, विभिन्न वैज्ञानिकों ने इसके महत्व को समझाने का प्रयास किया। 19वीं शताब्दी के मध्य में, कोशिका के बारे में एकत्रित ज्ञान को संक्षेप में प्रस्तुत करने के लिए कोशिका सिद्धांत प्रतिपादित किया गया।

प्रारंभिक कोशिका सिद्धांत:

इस सिद्धांत का श्रेय मुख्य रूप से दो वैज्ञानिकों को दिया जाता है:

  1. मैथियास श्लाइडन (Matthias Schleiden) (1838): एक जर्मन वनस्पतिशास्त्री, जिन्होंने अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि सभी पौधे विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं
  2. थियोडोर श्वान (Theodor Schwann) (1839): एक जर्मन जंतुशास्त्री, जिन्होंने अध्ययन किया और बताया कि सभी जंतुओं का शरीर भी कोशिकाओं से मिलकर बना होता है

श्लाइडन और श्वान ने संयुक्त रूप से कोशिका सिद्धांत को प्रस्तुत किया, जिसके मूल बिंदु थे:

  1. सभी जीवधारी (पौधे और जंतु) कोशिकाओं और उनके उत्पादों से मिलकर बने होते हैं।
  2. कोशिका, जीवन की मूल संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।

सिद्धांत की कमी (Limitation):
यह प्रारंभिक सिद्धांत यह समझाने में विफल रहा कि नई कोशिकाएँ कैसे बनती हैं?

आधुनिक कोशिका सिद्धांत (Modern Cell Theory):

रुडोल्फ विर्चो (Rudolf Virchow) ने 1855 में कोशिका सिद्धांत में एक महत्वपूर्ण बात जोड़ी। उन्होंने लैटिन में एक प्रसिद्ध कथन दिया:

“Omnis cellula-e cellula”

जिसका अर्थ है:

“सभी कोशिकाएँ अपनी पूर्ववर्ती कोशिकाओं (pre-existing cells) से ही उत्पन्न होती हैं।”

इस कथन ने कोशिका सिद्धांत को पूर्ण किया।

आधुनिक कोशिका सिद्धांत के मुख्य बिंदु:

  1. सभी जीवधारी कोशिकाओं और उनके उत्पादों से बने होते हैं।
    (All living organisms are composed of cells and products of cells.)
  2. कोशिका, सभी सजीवों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।
    (The cell is the basic structural and functional unit of all living organisms.)
  3. सभी नई कोशिकाएँ, पूर्व में उपस्थित कोशिकाओं के विभाजन से ही बनती हैं।
    (All new cells arise from the division of pre-existing cells.)

इस प्रकार, कोशिका सिद्धांत जीव विज्ञान का एक केंद्रीय और unifying सिद्धांत है, जो जीवन की निरंतरता और सभी जीवों के बीच एक आम वंश (common ancestry) को दर्शाता है।


प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिकाएँ (Prokaryotic and Eukaryotic Cells)

संरचनात्मक जटिलता के आधार पर, सभी सजीव कोशिकाओं को दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक। यह वर्गीकरण कोशिका में केंद्रक (Nucleus) और अन्य झिल्ली-युक्त कोशिकांगों (membrane-bound organelles) की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर आधारित है।


1. प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ (Prokaryotic Cells)

अर्थ: ‘Pro’ = आदिम (Primitive), ‘Karyon’ = केंद्रक (Nucleus)।
इसका अर्थ है “आदिम केंद्रक वाली कोशिकाएँ”

परिभाषा:
ये वे सरल और आदिम प्रकार की कोशिकाएँ हैं जिनमें सुसंगठित केंद्रक (well-organized nucleus) और अन्य झिल्ली-युक्त कोशिकांगों का अभाव होता है।

प्रमुख लक्षण (Key Characteristics):

  1. केंद्रक (Nucleus):
    • इनमें एक झिल्ली-बाध्य, वास्तविक केंद्रक नहीं होता है।
    • आनुवंशिक पदार्थ (DNA) कोशिका द्रव्य में एक अनियमित आकार के क्षेत्र में नग्न पड़ा रहता है, जिसे केंद्रकाभ या न्यूक्लियोइड (Nucleoid) कहते हैं।
  2. झिल्ली-युक्त कोशिकांग (Membrane-bound Organelles):
    • इनमें माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, लाइसोसोम, प्लास्टिड जैसे झिल्ली से घिरे कोशिकांग अनुपस्थित होते हैं।
  3. राइबोसोम (Ribosomes):
    • इनमें 70S प्रकार के राइबोसोम पाए जाते हैं, जो आकार में छोटे होते हैं।
  4. कोशिका भित्ति (Cell Wall):
    • अधिकांश प्रोकैरियोट्स में कोशिका झिल्ली के बाहर पेप्टिडोग्लाइकन (Peptidoglycan) से बनी एक मजबूत कोशिका भित्ति होती है।
  5. कोशिका विभाजन (Cell Division):
    • विभाजन सरल तरीके से, विखंडन (fission) या मुकुलन (budding) द्वारा होता है। इनमें समसूत्री विभाजन (mitosis) नहीं होता।
  6. आकार (Size):
    • ये आमतौर पर बहुत छोटी होती हैं (0.1 से 5.0 माइक्रोमीटर)।

किसमें पाई जाती हैं?
यह कोशिकाएँ केवल जगत मोनेरा (Kingdom Monera) के सदस्यों में पाई जाती हैं।


2. यूकैरियोटिक कोशिकाएँ (Eukaryotic Cells)

अर्थ: ‘Eu’ = वास्तविक (True), ‘Karyon’ = केंद्रक (Nucleus)।
इसका अर्थ है “वास्तविक केंद्रक वाली कोशिकाएँ”

परिभाषा:
ये वे जटिल और विकसित प्रकार की कोशिकाएँ हैं जिनमें एक झिल्ली-युक्त, सुसंगठित केंद्रक और अन्य सभी झिल्ली-युक्त कोशिकांग पाए जाते हैं।

प्रमुख लक्षण (Key Characteristics):

  1. केंद्रक (Nucleus):
    • इनमें एक वास्तविक, सुविकसित केंद्रक होता है जो एक दोहरी झिल्ली (केंद्रक झिल्ली – Nuclear Membrane) से घिरा होता है।
    • आनुवंशिक पदार्थ (DNA) केंद्रक के अंदर गुणसूत्रों (chromosomes) के रूप में व्यवस्थित रहता है।
  2. झिल्ली-युक्त कोशिकांग (Membrane-bound Organelles):
    • इनमें माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, लाइसोसोम, रसधानियाँ जैसे सभी झिल्ली-युक्त कोशिकांग उपस्थित होते हैं, जो कोशिका को विभिन्न कार्यों के लिए कक्षों (compartments) में विभाजित करते हैं।
  3. राइबोसोम (Ribosomes):
    • इनमें 80S प्रकार के राइबोसोम पाए जाते हैं (कोशिका द्रव्य में)। हालांकि, माइटोकॉन्ड्रिया और प्लास्टिड के अंदर 70S राइबोसोम भी होते हैं।
  4. कोशिका भित्ति (Cell Wall):
    • पादप कोशिकाओं और कवक में उपस्थित होती है, लेकिन जंतु कोशिकाओं में अनुपस्थित होती है।
    • पादपों में यह सेल्यूलोज की और कवक में काइटिन की बनी होती है।
  5. कोशिका विभाजन (Cell Division):
    • विभाजन जटिल प्रक्रिया, समसूत्री विभाजन (Mitosis) और अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा होता है।
  6. आकार (Size):
    • ये प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं की तुलना में आकार में बड़ी होती हैं (5 से 100 माइक्रोमीटर)।

किसमें पाई जाती हैं?
ये कोशिकाएँ चार जगतों के सदस्यों में पाई जाती हैं:


प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिकाओं के बीच मुख्य अंतर (Summary of Differences)

विशेषता (Feature)प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell)
केंद्रक (Nucleus)अनुपस्थित (केंद्रकाभ/न्यूक्लियोइड होता है)उपस्थित (सुविकसित, झिल्ली युक्त)
झिल्ली-युक्त कोशिकांगअनुपस्थितउपस्थित (माइटोकॉन्ड्रिया, ER, गॉल्जीकाय आदि)
राइबोसोम (Ribosome)70S प्रकार के80S प्रकार के
कोशिका भित्ति (Cell Wall)पेप्टिडोग्लाइकन की बनी होती है।पादप में सेल्यूलोज की, जंतु में अनुपस्थित।
आनुवंशिक पदार्थ (DNA)वृत्ताकार (Circular), नग्न।रैखिक (Linear), हिस्टोन प्रोटीन के साथ।
कोशिका विभाजनसरल (विखंडन/मुकुलन)।जटिल (समसूत्री/अर्धसूत्री)।
श्वसन (Respiration)कोशिका झिल्ली (मीसोसोम) द्वारा।माइटोकॉन्ड्रिया द्वारा।
आकार (Size)सामान्यतः छोटी (0.1 – 5 µm)।सामान्यतः बड़ी (5 – 100 µm)।
उदाहरण (Examples)जीवाणु, नील-हरित शैवाल।प्रोटिस्ट, कवक, पादप, जंतु।

कोशिकांगों की संरचना एवं कार्य (Structure and Function of Cell Organelles)

कोशिकांग (Cell Organelles) कोशिका द्रव्य (cytoplasm) में मौजूद छोटी-छोटी संरचनाएँ होती हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशिष्ट कार्य (specific function) करने के लिए अनुकूलित होती है। ये कोशिका के “छोटे अंगों” की तरह होते हैं जो कोशिका को जीवित रखने और सुचारू रूप से चलाने के लिए मिलकर काम करते हैं।


1. कोशिका झिल्ली (Cell Membrane / Plasma Membrane)

2. कोशिका भित्ति (Cell Wall)

3. माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria)

4. प्लास्टिड / लवक (Plastids)

5. अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum – ER)

6. गॉल्जीकाय / गॉल्जी उपकरण (Golgi Apparatus / Golgi Complex)

7. लाइसोसोम (Lysosomes)

8. राइबोसोम (Ribosomes)


जंतु कोशिका और पादप कोशिका में मुख्य अंतर

कोशिकांगजंतु कोशिका (Animal Cell)पादप कोशिका (Plant Cell)
कोशिका भित्ति (Cell Wall)अनुपस्थितउपस्थित (सेल्यूलोज की)
लवक (Plastids)अनुपस्थितउपस्थित (क्लोरोप्लास्ट आदि)
रसधानी (Vacuole)छोटी और अस्थायीएक बड़ी, केंद्रीय और स्थायी
लाइसोसोम (Lysosomes)प्रायः उपस्थितप्रायः अनुपस्थित
तारककाय (Centrosome)उपस्थितप्रायः अनुपस्थित

केंद्रक एवं गुणसूत्र (Nucleus and Chromosomes)

कोशिका के भीतर, केंद्रक उसका सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख कोशिकांग है। यह कोशिका की सभी गतिविधियों का नियंत्रण करता है, और इसी के भीतर हमारे आनुवंशिक ब्लूप्रिंट, यानी गुणसूत्र, सुरक्षित रहते हैं।


केंद्रक (Nucleus)

परिभाषा:
केंद्रक (Nucleus) यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक दोहरी झिल्ली युक्त (double membrane-bound), गोलाकार कोशिकांग है, जिसमें कोशिका की अधिकांश आनुवंशिक सामग्री (genetic material) संग्रहीत होती है।

केंद्रक की संरचना (Structure of the Nucleus)

एक सुविकसित केंद्रक में निम्नलिखित चार मुख्य भाग होते हैं:

  1. केंद्रक झिल्ली / केंद्रक आवरण (Nuclear Membrane / Nuclear Envelope):
    • यह केंद्रक को चारों ओर से घेरने वाली एक दोहरी परत वाली झिल्ली है।
    • यह केंद्रक को कोशिका द्रव्य से अलग करती है।
    • इस झिल्ली में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें केंद्रकीय छिद्र (Nuclear Pores) कहते हैं। ये छिद्र केंद्रक और कोशिका द्रव्य के बीच पदार्थों (जैसे RNA और प्रोटीन) के आवागमन को नियंत्रित करते हैं।
  2. केंद्रक द्रव्य (Nucleoplasm):
    • केंद्रक झिल्ली के अंदर भरे हुए तरल, दानेदार पदार्थ को केंद्रक द्रव्य कहते हैं। यह कोशिका द्रव्य के समान होता है।
    • इसी के भीतर केंद्रिका और क्रोमैटिन धागे डूबे रहते हैं।
  3. केंद्रिका (Nucleolus):
    • यह केंद्रक द्रव्य के अंदर स्थित एक सघन, गोलाकार संरचना है। इसमें कोई झिल्ली नहीं होती है।
    • इसका मुख्य कार्य राइबोसोम का संश्लेषण (synthesis of ribosomes) करना है।
    • इसीलिए इसे “राइबोसोम की फैक्टरी (Ribosome Factory)” भी कहा जाता है।
  4. क्रोमैटिन (Chromatin):
    • जब कोशिका विभाजित नहीं हो रही होती है (विश्राम अवस्था में), तो केंद्रक में धागे जैसी एक उलझी हुई जालीनुमा संरचना दिखाई देती है, जिसे क्रोमैटिन कहते हैं।
    • क्रोमैटिन DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) और हिस्टोन प्रोटीन (Histone Proteins) से मिलकर बना होता है।
    • वास्तव में, यही क्रोमैटिन कोशिका विभाजन के समय संघनित (condense) होकर मोटे और छोटे धागों में बदल जाता है, जिन्हें गुणसूत्र (Chromosomes) कहते हैं।

केंद्रक के कार्य (Functions of the Nucleus)


गुणसूत्र (Chromosomes)

परिभाषा:
गुणसूत्र (Chromosomes) केंद्रक में पाई जाने वाली धागे जैसी संरचनाएं हैं जो क्रोमैटिन के संघनित होने से बनती हैं। ये केवल कोशिका विभाजन के समय ही स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

गुणसूत्र की संरचना (Structure of a Chromosome)

एक विशिष्ट गुणसूत्र में निम्नलिखित भाग होते हैं (यह कोशिका विभाजन के समय की संरचना है):

गुणसूत्रों के कार्य (Functions of Chromosomes)

मनुष्य में गुणसूत्र (Chromosomes in Humans)

मानव की प्रत्येक कायिक कोशिका (somatic cell) में 46 गुणसूत्र होते हैं, जो 23 जोड़ों (pairs) में व्यवस्थित रहते हैं।

  1. अलिंग गुणसूत्र (Autosomes):
    • इनमें से 22 जोड़े (यानी 44 गुणसूत्र) स्त्री और पुरुष दोनों में एक समान होते हैं।
    • ये शारीरिक लक्षणों (जैसे ऊँचाई, त्वचा का रंग) को नियंत्रित करते हैं।
  2. लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosomes):
    • 23वाँ जोड़ा लिंग गुणसूत्र कहलाता है, जो व्यक्ति के लिंग का निर्धारण करता है।
    • महिला (Female): इनमें दो X गुणसूत्र होते हैं (XX)
    • पुरुष (Male): इनमें एक X और एक Y गुणसूत्र होता है (XY)

क्रोमैटिन बनाम गुणसूत्र

आधारक्रोमैटिन (Chromatin)गुणसूत्र (Chromosome)
प्रकृतिपतले, उलझे हुए धागों का जाल।मोटे, छोटे और संघनित धागे।
दृश्यताकोशिका की अविभाजित (interphase) अवस्था में।केवल कोशिका विभाजन के समय।
संरचनाDNA + हिस्टोन प्रोटीन (फैली हुई अवस्था)।DNA + हिस्टोन प्रोटीन (अत्यधिक कुंडलित अवस्था)।
कार्यDNA को संकुलित करना, जीन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करना।कोशिका विभाजन के दौरान DNA का समान वितरण सुनिश्चित करना।

कोशिका चक्र एवं कोशिका विभाजन (Cell Cycle and Cell Division)

सभी सजीवों का अस्तित्व और वृद्धि कोशिकाओं के विभाजन की क्षमता पर निर्भर करती है। कोशिका विभाजन (Cell Division) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक जनक कोशिका (parent cell) विभाजित होकर दो या दो से अधिक पुत्री कोशिकाएँ (daughter cells) बनाती है।

कोशिका का विभाजन एक बड़ी और समन्वित प्रक्रिया का हिस्सा है जिसे कोशिका चक्र कहते हैं।


कोशिका चक्र (Cell Cycle)

परिभाषा:

उन घटनाओं का अनुक्रम जिसके द्वारा एक कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन (duplicates its genome) करती है, अन्य कोशिकीय संघटकों का संश्लेषण (synthesizes other constituents) करती है और अंततः विभाजित होकर दो नई पुत्री कोशिकाओं का निर्माण करती है, उसे कोशिका चक्र कहते हैं।

मानव कोशिका के लिए, यह चक्र लगभग 24 घंटे में पूरा होता है। इसे मुख्य रूप से दो अवस्थाओं में बांटा गया है:

1. अंतरावस्था (Interphase)

यह दो क्रमिक विभाजनों के बीच की तैयारी की अवस्था (preparatory phase) है। कोशिका इस चरण में अपना अधिकांश समय (लगभग 95%) व्यतीत करती है। यह केवल एक “विश्राम अवस्था” नहीं है, बल्कि अत्यधिक उपापचयी सक्रियता की अवस्था है।
इसे तीन उप-अवस्थाओं में बांटा गया है:

2. M अवस्था / विभाजन प्रावस्था (M Phase / Division Phase)

यह कोशिका चक्र की वह अवस्था है जहाँ वास्तविक कोशिका विभाजन होता है। इसमें दो मुख्य चरण शामिल हैं:

केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) दो प्रकार का होता है: समसूत्री विभाजन और अर्धसूत्री विभाजन


समसूत्री विभाजन (Mitosis)

परिभाषा:

समसूत्री विभाजन वह प्रक्रिया है जिसमें एक जनक कोशिका विभाजित होकर दो आनुवंशिक रूप से समान (genetically identical) पुत्री कोशिकाओं का निर्माण करती है, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका के बराबर (equal) होती है।

किसमें होता है?
यह मुख्य रूप से सजीवों की कायिक कोशिकाओं (somatic cells) में होता है।

समसूत्री विभाजन के चरण:
यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसे अध्ययन की सुविधा के लिए चार चरणों में बांटा गया है:

  1. पूर्वावस्था (Prophase): क्रोमैटिन धागे संघनित होकर स्पष्ट गुणसूत्र (chromosomes) बनाते हैं। केंद्रक झिल्ली और केंद्रिका विलुप्त हो जाती है।
  2. मध्यावस्था (Metaphase): सभी गुणसूत्र कोशिका के मध्य में एक प्लेट (मेटाफेज प्लेट) पर व्यवस्थित हो जाते हैं।
  3. पश्चावस्था (Anaphase): प्रत्येक गुणसूत्र के सेंट्रोमियर विभाजित हो जाते हैं, और सिस्टर क्रोमैटिड अलग होकर विपरीत ध्रुवों (poles) की ओर जाने लगते हैं।
  4. अंत्यावस्था (Telophase): क्रोमैटिड ध्रुवों पर पहुँच जाते हैं, फिर से फैलकर क्रोमैटिन धागे बनाते हैं। केंद्रक झिल्ली और केंद्रिका पुनः प्रकट हो जाते हैं, जिससे दो पुत्री केंद्रक बन जाते हैं।

महत्व:

  1. वृद्धि और विकास: यह बहुकोशिकीय जीवों की वृद्धि का आधार है।
  2. मरम्मत और पुनर्जनन: यह क्षतिग्रस्त या पुरानी कोशिकाओं को बदलने में मदद करता है (जैसे- घाव का भरना)।
  3. अलैंगिक जनन: कुछ जीवों (जैसे अमीबा) में यह अलैंगिक जनन की विधि है।
  4. गुणसूत्रों की संख्या को स्थिर बनाए रखना।

अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

परिभाषा:

अर्धसूत्री विभाजन एक विशेष प्रकार का कोशिका विभाजन है जिसमें एक द्विगुणित (diploid, 2n) जनक कोशिका विभाजित होकर चार आनुवंशिक रूप से भिन्न (genetically different), अगुणित (haploid, n) पुत्री कोशिकाओं का निर्माण करती है, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका से आधी (half) हो जाती है।

किसमें होता है?
यह केवल लैंगिक जनन करने वाले जीवों की जनन कोशिकाओं (germ cells) में होता है, जिससे युग्मक (gametes) बनते हैं।

महत्वपूर्ण घटनाएँ:

महत्व:

  1. युग्मक निर्माण: यह लैंगिक जनन के लिए आवश्यक अगुणित युग्मक (sperm and egg) बनाता है।
  2. गुणसूत्र संख्या का संरक्षण: निषेचन (fertilization) के बाद जब नर और मादा युग्मक मिलते हैं, तो संतान में गुणसूत्रों की संख्या (2n) पुनः स्थापित हो जाती है। इस प्रकार, यह प्रजातियों में गुणसूत्रों की संख्या को पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिर बनाए रखता है।
  3. आनुवंशिक विभिन्नता लाना: जीन विनिमय के कारण, संतानों में अपने माता-पिता से नए गुण संयोजन उत्पन्न होते हैं, जो जैव विकास (evolution) का आधार है।
आधारसमसूत्री विभाजन (Mitosis)अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)
कोशिका का प्रकारकायिक कोशिकाएँ (Somatic cells)जनन कोशिकाएँ (Germ cells)
जनक और पुत्री कोशिका1 जनक → 2 पुत्री1 जनक → 4 पुत्री
गुणसूत्रों की संख्यासमान रहती है (2n → 2n)आधी हो जाती है (2n → n)
आनुवंशिक समानतापुत्री कोशिकाएँ आनुवंशिक रूप से समान होती हैं।पुत्री कोशिकाएँ आनुवंशिक रूप से भिन्न होती हैं।
जीन विनिमयनहीं होता है।होता है (पूर्वावस्था-I में)।
कार्य/महत्ववृद्धि, मरम्मत, अलैंगिक जनन।लैंगिक जनन (युग्मक निर्माण), आनुवंशिक विभिन्नता।