जीव जगत का वर्गीकरण (Classification of Living World)
1. जीव क्या है? और वर्गीकरण की आवश्यकता (What is Living? & Need for Classification)
जीव क्या है? (What is Living?)
जीव विज्ञान (Biology) सजीवों का अध्ययन है, लेकिन “जीवन” को परिभाषित करना जटिल है। किसी एक गुण के आधार पर हम सजीव को निर्जीव से अलग नहीं कर सकते। इसलिए, हम सजीवों को उनके कुछ विशिष्ट अभिलक्षणों (defining characteristics) के आधार पर पहचानते हैं:
- वृद्धि (Growth):
- सभी जीव वृद्धि करते हैं (आकार और संख्या में)।
- सजीवों में यह वृद्धि आंतरिक (internal) होती है, जो कोशिका विभाजन (cell division) द्वारा होती है।
- निर्जीव वस्तुएँ (जैसे पर्वत) भी वृद्धि करती हैं, लेकिन उनकी वृद्धि बाहरी (external) होती है, जिसमें पदार्थ सतह पर जमा होता है। अतः, वृद्धि सजीवों का एक विशिष्ट गुण नहीं है।
- जनन (Reproduction):
- सजीव अपने समान संतान उत्पन्न करते हैं, जिसे जनन कहते हैं। यह लैंगिक (sexual) या अलैंगिक (asexual) हो सकता है।
- हालांकि, कुछ सजीव (जैसे खच्चर, श्रमिक मधुमक्खी, अनुर्वर मानव) जनन नहीं कर सकते। इसलिए, जनन भी सजीवों का एक समग्र विशिष्ट गुण नहीं माना जा सकता।
- उपापचय (Metabolism):
- सजीवों के शरीर में होने वाली सभी रासायनिक क्रियाओं (जैसे ऊर्जा का निर्माण, अणुओं का टूटना) के योग को उपापचय कहते हैं।
- यह क्रिया निर्जीवों में नहीं होती है।
- अतः, उपापचय सजीवों का एक विशिष्ट गुण है।
- कोशिकीय संगठन (Cellular Organization):
- सभी सजीव कोशिकाओं (cells) से बने होते हैं। कोशिका जीवन की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।
- अतः, कोशिकीय संगठन सजीवों का एक मूलभूत और विशिष्ट गुण है।
- चेतना / अनुक्रिया (Consciousness / Response to Stimuli):
- सभी सजीव अपने आस-पास के भौतिक, रासायनिक या जैविक वातावरण के प्रति संवेदनशील होते हैं और प्रतिक्रिया करते हैं (जैसे प्रकाश, ताप, ध्वनि)।
- यह सजीवों का सबसे स्पष्ट और तकनीकी रूप से जटिल, परन्तु एक विशिष्ट गुण है।
निष्कर्ष: उपापचय, कोशिकीय संगठन और चेतना वे तीन अभिलक्षण हैं जिन्हें सजीवों के परिभाषित गुण माना जाता है।
वर्गीकरण की आवश्यकता (Need for Classification)
पृथ्वी पर लाखों प्रकार के जीव-जंतु और पेड़-पौधे पाए जाते हैं। इन सभी का एक-एक करके अध्ययन करना असंभव है। इसलिए, हमें वर्गीकरण की आवश्यकता होती है जिसके मुख्य कारण हैं:
- अध्ययन में सुगमता: जीवों को उनकी समानताओं और असमानताओं के आधार पर समूहों में बाँटने से उनका अध्ययन सरल और व्यवस्थित हो जाता है।
- जीवों की पहचान: वर्गीकरण से किसी नए खोजे गए जीव की पहचान करने और उसे सही समूह में रखने में मदद मिलती है।
- संबंधों का पता लगाना: यह विभिन्न जीव समूहों के बीच विकासीय संबंधों (evolutionary relationships) को समझने में मदद करता है।
- सार्वभौमिक प्रणाली: यह वैज्ञानिकों को एक ऐसी मानक प्रणाली प्रदान करता है जिसे दुनिया भर में समझा जा सके, जिससे स्थानीय नामों के कारण होने वाला भ्रम दूर हो।
2. पाँच जगत वर्गीकरण (Five Kingdom Classification)
यह वर्गीकरण की सबसे आधुनिक और मान्य प्रणाली है, जिसे आर. एच. व्हिटेकर (R. H. Whittaker) ने 1969 में प्रस्तावित किया था। उन्होंने जीवों को निम्नलिखित पाँच प्रमुख जगतों (Kingdoms) में विभाजित किया।
वर्गीकरण के मुख्य आधार:
- कोशिका की संरचना (प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक)।
- शारीरिक संगठन (एककोशिकीय या बहुकोशिकीय)।
- पोषण की विधि (स्वपोषी या विषमपोषी)।
- पारिस्थितिक भूमिका (उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटक)।
- विकासीय संबंध (Phylogenetic relationships)।
पाँच जगत इस प्रकार हैं:
I. जगत मोनेरा (Kingdom Monera)
- प्रमुख लक्षण:
- ये प्रोकैरियोटिक (Prokaryotic) और एककोशिकीय (Unicellular) जीव हैं।
- इनमें सुविकसित केंद्रक और कोशिकांगों का अभाव होता है।
- कोशिका भित्ति पेप्टिडोग्लाइकन की बनी होती है।
- पोषण: स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी या रसायनसंश्लेषी) और विषमपोषी दोनों हो सकते हैं।
- उदाहरण: जीवाणु (Bacteria), नील-हरित शैवाल (Blue-Green Algae or Cyanobacteria), माइकोप्लाज्मा।
II. जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista)
- प्रमुख लक्षण:
- ये यूकैरियोटिक (Eukaryotic) और एककोशिकीय (Unicellular) जीव हैं।
- इनमें सुविकसित केंद्रक और झिल्ली युक्त कोशिकांग पाए जाते हैं।
- पोषण: स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी) और विषमपोषी दोनों होते हैं।
- यह पादप, जंतु और कवक के बीच की कड़ी माना जाता है।
- उदाहरण: अमीबा (Amoeba), पैरामीशियम (Paramecium), युग्लीना (Euglena), डायटम।
III. जगत कवक (Kingdom Fungi)
- प्रमुख लक्षण:
- ये यूकैरियोटिक (Eukaryotic), प्रायः बहुकोशिकीय (Multicellular) जीव हैं (अपवाद: यीस्ट एककोशिकीय है)।
- इनकी कोशिका भित्ति काइटिन (Chitin) नामक जटिल शर्करा की बनी होती है।
- पोषण: ये पूर्ण रूप से विषमपोषी (Heterotrophic) होते हैं। वे मृत कार्बनिक पदार्थों से भोजन ग्रहण करते हैं (मृतोपजीवी – Saprophytes) या अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं (परजीवी – Parasites)।
- ये अपघटक (Decomposers) की भूमिका निभाते हैं।
- उदाहरण: यीस्ट (Yeast), मशरूम (Mushroom), राइजोपस (ब्रेड मोल्ड), पेनिसिलियम।
IV. जगत पादप (Kingdom Plantae)
- प्रमुख लक्षण:
- ये यूकैरियोटिक (Eukaryotic) और बहुकोशिकीय (Multicellular) जीव हैं।
- इनकी कोशिका भित्ति मुख्य रूप से सेल्यूलोज (Cellulose) की बनी होती है।
- पोषण: ये स्वपोषी (Autotrophic) होते हैं, यानी क्लोरोफिल की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
- ये पारिस्थितिकी तंत्र में उत्पादक (Producers) की भूमिका निभाते हैं।
- उदाहरण: सभी प्रकार के पेड़-पौधे, शैवाल (Algae), ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा।
V. जगत प्राणि (Kingdom Animalia)
- प्रमुख लक्षण:
- ये यूकैरियोटिक (Eukaryotic) और बहुकोशिकीय (Multicellular) जीव हैं।
- इनमें कोशिका भित्ति का अभाव (Lack of Cell Wall) होता है।
- पोषण: ये विषमपोषी (Heterotrophic) होते हैं और भोजन को निगलकर ग्रहण करते हैं (होलोजोइक पोषण)।
- अधिकांश जंतु गतिशील (motile) होते हैं।
- ये पारिस्थितिकी तंत्र में उपभोक्ता (Consumers) की भूमिका निभाते हैं।
- उदाहरण: कीड़े, मछलियाँ, पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी (जैसे मनुष्य)।
पाँच जगत वर्गीकरण की सारांश तालिका
| लक्षण | मोनेरा (Monera) | प्रोटिस्टा (Protista) | कवक (Fungi) | पादप (Plantae) | प्राणि (Animalia) |
| कोशिका का प्रकार | प्रोकैरियोटिक | यूकैरियोटिक | यूकैरियोटिक | यूकैरियोटिक | यूकैरियोटिक |
| शारीरिक संगठन | एककोशिकीय | एककोशिकीय | अधिकांश बहुकोशिकीय | ऊतक/अंग/अंग तंत्र | ऊतक/अंग/अंग तंत्र |
| कोशिका भित्ति | पेप्टिडोग्लाइकन | कुछ में उपस्थित | काइटिन की बनी | सेल्यूलोज की बनी | अनुपस्थित |
| पोषण की विधि | स्वपोषी/विषमपोषी | स्वपोषी/विषमपोषी | केवल विषमपोषी | केवल स्वपोषी | केवल विषमपोषी |
| उदाहरण | जीवाणु, नील-हरित शैवाल | अमीबा, युग्लीना | यीस्ट, मशरूम | पेड़, घास, शैवाल | कीड़े, मनुष्य |
पादप जगत का वर्गीकरण (Classification of the Plant Kingdom)
जगत पादप (Kingdom Plantae) में वे सभी बहुकोशिकीय (multicellular), यूकैरियोटिक (eukaryotic) जीव शामिल हैं जो स्वपोषी (autotrophic) होते हैं, अर्थात क्लोरोफिल की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इनकी कोशिका भित्ति मुख्य रूप से सेल्यूलोज की बनी होती है।
पादप जगत का वर्गीकरण मुख्य रूप से इस आधार पर किया जाता है कि पौधे का शरीर कितना विकसित है, उसमें संवहन ऊतक (vascular tissues) हैं या नहीं, और उसमें बीज और फल बनते हैं या नहीं। इस आधार पर पादप जगत को निम्नलिखित मुख्य समूहों में बांटा गया है।
1. शैवाल (Algae / Division: Thallophyta)
यह पादप जगत का सबसे सरल समूह है।
- प्रमुख लक्षण:
- इनका शरीर थैलस (Thallus) कहलाता है, जिसका अर्थ है कि इसमें वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ नहीं पाई जाती हैं।
- ये स्वपोषी होते हैं क्योंकि इनमें क्लोरोफिल पाया जाता है।
- इनमें संवहन ऊतक (xylem and phloem) अनुपस्थित होते हैं।
- वास-स्थान: ये मुख्य रूप से जलीय (aquatic) होते हैं, जो अलवणीय (freshwater) और लवणीय (marine) दोनों प्रकार के जल में पाए जाते हैं।
- महत्व / उदाहरण:
- ये पृथ्वी पर प्रकाश संश्लेषण के मुख्य उत्पादक हैं और वायुमंडल में ऑक्सीजन का एक बड़ा हिस्सा छोड़ते हैं।
- भोजन के रूप में: क्लोरेला, स्पाइरुलिना (प्रोटीन युक्त), सारगासम।
- औद्योगिक उपयोग: अगार-अगार (Agar-agar) का उपयोग आइसक्रीम और जेली बनाने में होता है, जो कुछ शैवाल से प्राप्त होता है।
- उदाहरण: स्पाइरोगाइरा (Spirogyra), यूलोथ्रिक्स (Ulothrix), वोल्वॉक्स (Volvox)।
2. ब्रायोफाइटा (Bryophyta)
इन्हें पादप जगत का उभयचर (Amphibians of the plant kingdom) भी कहा जाता है।
- प्रमुख लक्षण:
- इनका शरीर शैवाल की तुलना में अधिक विकसित होता है, लेकिन इसमें भी वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ नहीं होती हैं। इनमें जड़ों के स्थान पर राइजोइड्स (Rhizoids) पाए जाते हैं।
- ये स्थलीय पौधे हैं लेकिन इन्हें निषेचन (fertilization) के लिए जल की आवश्यकता होती है, इसीलिए इन्हें उभयचर कहा जाता है।
- इनमें भी संवहन ऊतक (xylem and phloem) अनुपस्थित होते हैं।
- वास-स्थान: ये नम, आर्द्र और छायादार स्थानों पर उगते हैं।
- महत्व / उदाहरण:
- स्फेगनम (Sphagnum) या पीट मॉस (Peat Moss) का उपयोग ईंधन के रूप में और पैकिंग सामग्री के रूप में (इसकी उच्च जल-अवशोषण क्षमता के कारण) किया जाता है।
- ये मृदा अपरदन को रोकने में सहायक होते हैं।
- उदाहरण: मॉस (जैसे फ्यूनेरिया), लिवरवर्ट (जैसे मार्केन्शिया)।
3. टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)
ये संवहन ऊतक वाले पहले स्थलीय पौधे हैं।
- प्रमुख लक्षण:
- इनका शरीर वास्तविक जड़, तना और पत्तियों में विभाजित होता है।
- इनमें जल और खनिजों के संवहन के लिए संवहन ऊतक (xylem and phloem) उपस्थित होते हैं।
- ये पुष्प और बीज उत्पन्न नहीं करते हैं, इसीलिए इन्हें क्रिप्टोगैम (Cryptogams – अपुष्पोद्भिद) कहा जाता है।
- वास-स्थान: ये ठंडे, नम और छायादार स्थानों पर पाए जाते हैं।
- महत्व / उदाहरण:
- सजावटी पौधे: कई फर्न को बगीचों में सजावट के लिए उगाया जाता है।
- मृदा-बंधक (Soil binders): ये मिट्टी को बांधकर कटाव को रोकते हैं।
- उदाहरण: फर्न (Ferns), हॉर्सटेल (Equisetum)।
4. जिम्नोस्पर्म / अनावृतबीजी (Gymnosperms)
ये बीज उत्पन्न करने वाले पौधे हैं जिनके बीज नग्न होते हैं।
- प्रमुख लक्षण:
- Gymno = नग्न, Sperma = बीज। अर्थात इनके बीज नग्न (naked) होते हैं और अंडाशय (ovary) या फल के अंदर बंद नहीं होते हैं।
- ये संवहन ऊतक (xylem and phloem) युक्त पौधे हैं।
- इनमें पुष्प नहीं लगते हैं, इनके जननांग शंकु (Cones) के रूप में होते हैं।
- अधिकांश पौधे काष्ठीय (woody), बहुवर्षीय वृक्ष या झाड़ियाँ होते हैं।
- वास-स्थान: ये ठंडी और शुष्क जलवायु में पाए जाते हैं।
- महत्व / उदाहरण:
- लकड़ी: चीड़ (Pine), देवदार (Cedar) की लकड़ी का उपयोग इमारती लकड़ी, कागज आदि बनाने में होता है।
- खाद्य पदार्थ: चिलगोजा (Chilgoza) पाइनस के बीज से प्राप्त होता है।
- औषधियाँ: एफेड्रा पौधे से एफेड्रिन नामक दवा प्राप्त होती है।
- उदाहरण: साइकस (Cycas), पाइनस / चीड़ (Pinus), देवदार (Cedrus)।
5. एंजियोस्पर्म / आवृतबीजी (Angiosperms)
ये वर्तमान समय में पृथ्वी पर सबसे विकसित और सबसे अधिक पाए जाने वाले पौधे हैं।
- प्रमुख लक्षण:
- Angio = ढका हुआ, Sperma = बीज। अर्थात इनके बीज अंडाशय (ovary) के अंदर बंद होते हैं, जो बाद में विकसित होकर फल (Fruit) बन जाता है।
- इनमें वास्तविक पुष्प (Flower) लगते हैं, इसीलिए इन्हें पुष्पी पादप (Flowering Plants) भी कहा जाता है।
- इनमें दोहरा निषेचन (Double Fertilization) होता है, जो इनकी एक अनूठी विशेषता है।
- वास-स्थान: ये लगभग सभी प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं।
- वर्गीकरण: इन्हें दो वर्गों में बांटा गया है:
- एकबीजपत्री (Monocots): इनके बीजों में केवल एक बीजपत्र (cotyledon) होता है (जैसे- गेहूँ, चावल, मक्का, बाँस)।
- द्विबीजपत्री (Dicots): इनके बीजों में दो बीजपत्र होते हैं (जैसे- चना, मटर, आम, गुलाब)।
- महत्व / उदाहरण:
- ये हमारे भोजन (अनाज, दालें, फल, सब्जियाँ), कपड़ों (कपास), दवाइयों, ईंधन और लकड़ी का मुख्य स्रोत हैं।
- उदाहरण: आम, गेहूँ, चावल, गुलाब, सरसों, बरगद (लगभग सभी फल, फूल और फसलें)।
पादप जगत की सारांश तालिका
| लक्षण | शैवाल (Algae) | ब्रायोफाइटा (Bryophyta) | टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) | जिम्नोस्पर्म (Gymnosperm) | एंजियोस्पर्म (Angiosperm) |
| शरीर संरचना | थैलस (जड़, तना, पत्ती नहीं) | जड़-तना-पत्ती नहीं | वास्तविक जड़, तना, पत्ती | वास्तविक जड़, तना, पत्ती | वास्तविक जड़, तना, पत्ती |
| संवहन ऊतक | अनुपस्थित | अनुपस्थित | उपस्थित | उपस्थित | उपस्थित |
| पुष्प (Flower) | अनुपस्थित | अनुपस्थित | अनुपस्थित | अनुपस्थित (शंकु होते हैं) | उपस्थित |
| बीज (Seed) | अनुपस्थित | अनुपस्थित | अनुपस्थित | उपस्थित (नग्न) | उपस्थित (ढके हुए) |
| फल (Fruit) | अनुपस्थित | अनुपस्थित | अनुपस्थित | अनुपस्थित | उपस्थित |
| प्रमुख उदाहरण | स्पाइरोगाइरा | मॉस, लिवरवर्ट | फर्न, हॉर्सटेल | साइकस, पाइनस | आम, गुलाब, गेहूँ |
प्राणि जगत का वर्गीकरण (Classification of Animal Kingdom)
प्राणि जगत (Kingdom Animalia) में वे सभी जीव शामिल हैं जो बहुकोशिकीय (multicellular), यूकैरियोटिक (eukaryotic) और विषमपोषी (heterotrophic) होते हैं। इनमें कोशिका भित्ति का अभाव होता है और अधिकांश जंतु गतिशील होते हैं।
जंतुओं का वर्गीकरण उनकी शारीरिक संरचना की जटिलता, सममिति (symmetry), शारीरिक गुहा (body cavity or coelom) और अन्य शारीरिक विशेषताओं के आधार पर विभिन्न संघों (Phyla) में किया गया है। यहाँ सरल से जटिल की ओर प्रमुख संघों का संक्षिप्त वर्गीकरण दिया गया है।
अकशेरुकी (Invertebrates) – (जिनमें रीढ़ की हड्डी नहीं होती)
1. संघ पोरिफेरा (Phylum Porifera)
- अर्थ: “छिद्र धारक” (Pore bearers)।
- प्रमुख लक्षण: ये सबसे सरल बहुकोशिकीय जीव हैं। इनका शरीर छिद्रों (pores) से भरा होता है, जिन्हें ऑस्टिया (Ostia) कहते हैं। शरीर में जल परिवहन के लिए नाल प्रणाली (Canal System) पाई जाती है।
- उदाहरण: स्पंज (Sponges), साइकॉन, स्पंजिला (मीठे पानी का स्पंज)।
2. संघ सीलेन्ट्रेटा / निडेरिया (Phylum Coelenterata / Cnidaria)
- प्रमुख लक्षण: ये जलीय जीव हैं जिनमें ऊतक स्तर (tissue level) का संगठन होता है। इनमें दंश कोशिकाएँ (Cnidoblasts or Stinging cells) पाई जाती हैं, जो शिकार पकड़ने और रक्षा में मदद करती हैं। शरीर में एक केंद्रीय गुहा होती है जिसे सीलेन्ट्रॉन कहते हैं।
- उदाहरण: हाइड्रा (Hydra), जेलीफिश (Aurelia), सी-एनीमोन (Sea anemone), कोरल (प्रवाल)।
3. संघ प्लेटीहेल्मिन्थीज (Phylum Platyhelminthes)
- अर्थ: “चपटे कृमि” (Flatworms)।
- प्रमुख लक्षण: इनका शरीर पृष्ठाधार रूप से चपटा (dorso-ventrally flattened) होता है। ये प्रायः परजीवी (parasitic) होते हैं।
- उदाहरण: फीता कृमि (Tapeworm), प्लेनेरिया (Planaria), यकृत कृमि (Liver fluke)।
4. संघ एस्केल्मिन्थीज / निमेटोडा (Phylum Aschelminthes / Nematoda)
- अर्थ: “गोल कृमि” (Roundworms)।
- प्रमुख लक्षण: इनका शरीर अनुप्रस्थ काट में गोलाकार होता है। ये परजीवी या स्वतंत्र रूप से रहने वाले हो सकते हैं।
- उदाहरण: एस्केरिस (Ascaris – पेट का कीड़ा), फाइलेरिया कृमि (Wuchereria – हाथीपाँव रोग का कारण)।
5. संघ एनिलिडा (Phylum Annelida)
- अर्थ: “खंडित कृमि” (Segmented worms)।
- प्रमुख लक्षण: इनका शरीर बाहर और अंदर दोनों तरफ से खंडों या विखंडों (segments or metameres) में विभाजित होता है। इनमें वास्तविक देहगुहा (true coelom) पाई जाती है।
- उदाहरण: केंचुआ (Earthworm), जोंक (Leech), नेरीस।
6. संघ आर्थ्रोपोडा (Phylum Arthropoda)
- अर्थ: “संयुक्त पैर वाले” (Jointed-legged animals)।
- प्रमुख लक्षण: यह प्राणि जगत का सबसे बड़ा संघ (largest phylum) है, जिसमें लगभग दो-तिहाई जातियाँ शामिल हैं। इनका शरीर काइटिन (chitin) के बने बाह्य कंकाल (exoskeleton) से ढका होता है।
- उदाहरण:
- कीट (Insects): तिलचट्टा (Cockroach), तितली, मक्खी, मच्छर।
- क्रस्टेशियन: झींगा (Prawn), केकड़ा (Crab)।
- अन्य: बिच्छू (Scorpion), मकड़ी (Spider), कनखजूरा (Centipede)।
7. संघ मोलस्का (Phylum Mollusca)
- अर्थ: “कोमल शरीर वाले” (Soft-bodied animals)।
- प्रमुख लक्षण: यह प्राणि जगत का दूसरा सबसे बड़ा संघ है। इनका शरीर कोमल और अखंडित होता है तथा प्रायः कैल्शियम कार्बोनेट के बने कवच (shell) से ढका रहता है।
- उदाहरण: घोंघा (Snail), सीप (Oyster), ऑक्टोपस (Octopus), स्क्विड, पाइला।
8. संघ इकाइनोडर्मेटा (Phylum Echinodermata)
- अर्थ: “शूलयुक्त त्वचा वाले” (Spiny-skinned animals)।
- प्रमुख लक्षण: ये केवल समुद्री (exclusively marine) जीव हैं। इनकी त्वचा पर कैल्शियम युक्त काँटे (spines) होते हैं। इनमें जल संवहन तंत्र (Water vascular system) पाया जाता है, जो गति और भोजन ग्रहण में सहायक होता है। वयस्क जीवों में अरीय सममिति (radial symmetry) होती है।
- उदाहरण: तारा मछली (Starfish), समुद्री अर्चिन (Sea urchin), समुद्री खीरा (Sea cucumber)।
कशेरुकी (Vertebrates) – (जिनमें रीढ़ की हड्डी होती है)
9. संघ कॉर्डेटा (Phylum Chordata)
इस संघ के जीवों में जीवन की किसी न किसी अवस्था में नोटोकॉर्ड (notochord) (एक लचीली छड़ जैसी संरचना) पाई जाती है, जो बाद में कशेरुक दंड (vertebral column or backbone) में विकसित हो जाती है।
उपसंघ वर्टिब्रेटा (Subphylum Vertebrata) को निम्नलिखित वर्गों (Classes) में बांटा गया है:
i. वर्ग पिसीज / मत्स्य (Class Pisces)
- प्रमुख लक्षण: ये जलीय (aquatic), अनियततापी / असमतापी (cold-blooded) जीव हैं। श्वसन गिल्स (gills) द्वारा होता है। शरीर शल्कों (scales) से ढका होता है और गति के लिए पंख (fins) होते हैं। हृदय दो कक्षीय (two-chambered) होता है।
- उदाहरण: रोहू (Rohu), शार्क (Shark), समुद्री घोड़ा (Sea horse)।
ii. वर्ग एम्फीबिया / उभयचर (Class Amphibia)
- प्रमुख लक्षण: ये जल और स्थल दोनों पर रह सकते हैं। त्वचा नम और शल्क-रहित होती है। श्वसन गिल्स, फेफड़ों और त्वचा तीनों से हो सकता है। हृदय तीन कक्षीय (three-chambered) होता है।
- उदाहरण: मेंढक (Frog), टोड (Toad), सैलामैंडर (Salamander)।
iii. वर्ग रेप्टीलिया / सरीसृप (Class Reptilia)
- प्रमुख लक्षण: ये रेंगकर चलने वाले (crawling) जीव हैं। त्वचा सूखी और शल्कीय (scaly) होती है। हृदय सामान्यतः तीन कक्षीय होता है, लेकिन मगरमच्छ (crocodile) में चार कक्षीय होता है।
- उदाहरण: साँप (Snake), छिपकली (Lizard), कछुआ (Turtle), मगरमच्छ।
iv. वर्ग एवीज / पक्षी (Class Aves)
- प्रमुख लक्षण: इनका शरीर पंखों (feathers) से ढका होता है। अग्रपाद (Forelimbs) पंखों में रूपांतरित हो जाते हैं। हड्डियाँ खोखली (hollow or pneumatic) होती हैं। ये नियततापी / समतापी (warm-blooded) होते हैं। हृदय चार कक्षीय (four-chambered) होता है।
- उदाहरण: कबूतर (Pigeon), मोर (Peacock), तोता (Parrot), शुतुरमुर्ग (Ostrich)।
v. वर्ग मैमेलिया / स्तनधारी (Class Mammalia)
- प्रमुख लक्षण: ये नियततापी / समतापी (warm-blooded) होते हैं। इनकी त्वचा पर बाल (hair or fur) पाए जाते हैं और इनमें बच्चों को दूध पिलाने के लिए स्तन ग्रंथियाँ (mammary glands) होती हैं। हृदय चार कक्षीय होता है।
- उदाहरण: मनुष्य (Human), बिल्ली, कुत्ता, व्हेल, चमगादड़, कंगारू।
वायरस, वायरोइड्स एवं लाइकेन
व्हिटेकर के पाँच जगत वर्गीकरण में कुछ ऐसे जीवों को स्थान नहीं दिया गया है जो पारंपरिक रूप से ‘सजीव’ की परिभाषा में पूरी तरह फिट नहीं होते, क्योंकि उनमें कोशिकीय संगठन का अभाव होता है। वायरस, वायरोइड्स और लाइकेन इसी श्रेणी में आते हैं।
1. वायरस (Virus)
अर्थ: ‘वायरस’ लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “विषैला तरल” (venom or poisonous fluid)।
परिभाषा और प्रकृति:
वायरस अकोशिकीय (non-cellular) और अतिसूक्ष्म (ultramicroscopic) कण होते हैं, जिन्हें केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से ही देखा जा सकता है। इनकी प्रकृति को लेकर एक लंबा विवाद रहा है क्योंकि ये सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी (connecting link between living and non-living) माने जाते हैं।
- निर्जीव के रूप में लक्षण (Non-living characters):
- ये जीवित कोशिका के बाहर एक निष्क्रिय कण (क्रिस्टल) की तरह व्यवहार करते हैं।
- इनमें स्वतंत्र रूप से जनन करने की क्षमता नहीं होती है।
- इनमें उपापचयी (metabolic) क्रियाएँ नहीं होती हैं।
- सजीव के रूप में लक्षण (Living characters):
- ये एक जीवित पोषी कोशिका (host cell) के अंदर प्रवेश करने पर ही सक्रिय होते हैं।
- पोषी कोशिका की मशीनरी का उपयोग करके ये अपनी संख्या को बढ़ाते हैं (जनन / गुणन)।
- इनमें आनुवंशिक पदार्थ (DNA या RNA) पाया जाता है, जिसमें उत्परिवर्तन (mutation) हो सकता है।
संरचना:
एक सामान्य वायरस दो मुख्य घटकों से बना होता है:
- आनुवंशिक पदार्थ (Genetic Material): केंद्र में या तो DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) होता है या RNA (राइबोन्यूक्लिक अम्ल)। किसी भी वायरस में दोनों एक साथ नहीं पाए जाते।
- कैप्सिड (Capsid): आनुवंशिक पदार्थ के चारों ओर एक प्रोटीन का बना आवरण होता है, जिसे कैप्सिड कहते हैं। यह आनुवंशिक पदार्थ की रक्षा करता है।
खोज:
- डी.जे. इवानोवस्की (D. J. Ivanowsky) ने 1892 में तंबाकू मोजेक वायरस (TMV) की खोज की थी, जब उन्होंने पाया कि यह बैक्टीरिया प्रूफ फिल्टर से भी निकल जाता है।
- डब्ल्यू. एम. स्टेनले (W. M. Stanley) ने 1935 में वायरस को क्रिस्टल रूप में अलग किया।
विषाणु-जनित रोग (Viral Diseases):
मनुष्यों में – जुकाम (Common Cold), इन्फ्लुएंजा, पोलियो (Polio), एड्स (AIDS), खसरा, कोरोना (COVID-19), डेंगू।
पौधों में – तंबाकू मोजेक रोग, पत्तियों का मुड़ना और पीला होना।
2. वायरोइड्स (Viroids)
परिभाषा:
वायरोइड्स, वायरस से भी छोटे, संक्रामक (infectious) कण होते हैं।
संरचना और अंतर:
वायरोइड्स और वायरस में मुख्य अंतर यह है:
- वायरोइड्स में केवल एकल-रज्जुक, वृत्ताकार RNA (single-stranded, circular RNA) का एक छोटा अणु होता है।
- इनमें वायरस की तरह कोई प्रोटीन का आवरण (capsid) नहीं पाया जाता है।
- इनका आणविक भार (molecular weight) भी वायरस से बहुत कम होता है।
खोज:
इनकी खोज 1971 में टी. ओ. डाइनर (T. O. Diener) ने की थी, जिन्होंने पोटैटो स्पिंडल ट्यूबर रोग (Potato Spindle Tuber disease) के कारक के रूप में वायरोइड की पहचान की।
रोग:
ये मुख्य रूप से पौधों में रोग उत्पन्न करते हैं।
3. लाइकेन (Lichens)
परिभाषा:
लाइकेन एक अद्वितीय जीव है जो दो अलग-अलग जीवों – एक शैवाल (algae) और एक कवक (fungus) – के सहजीवी (symbiotic) संबंध से बनता है। ये दोनों जीव एक साथ इस प्रकार रहते हैं कि वे एक ही जीव की तरह प्रतीत होते हैं।
सहजीवी संबंध (Symbiotic Relationship):
सहजीविता एक ऐसा संबंध है जिसमें दोनों सहभागी एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।
- शैवालीय घटक (Phycobiont):
- यह स्वपोषी (autotrophic) होता है और प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाता है।
- कवकीय घटक (Mycobiont):
- यह विषमपोषी होता है।
- यह शैवाल को सुरक्षा, रहने के लिए स्थान, जल और खनिज लवण अवशोषित करके प्रदान करता है।
इस प्रकार, शैवाल कवक के लिए भोजन बनाता है और कवक शैवाल के लिए एक घर और कच्ची सामग्री प्रदान करता है। यह संबंध इतना गहरा होता है कि वे एक-दूसरे के बिना स्वतंत्र रूप से जीवित नहीं रह सकते।
महत्व और उपयोग:
- प्रदूषण के सूचक (Indicators of Pollution): लाइकेन वायु प्रदूषण, विशेषकर सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। वे प्रदूषित क्षेत्रों में नहीं उगते। अतः, किसी स्थान पर उनकी अनुपस्थिति वायु प्रदूषण का संकेत देती है।
- मृदा निर्माण में सहायक: ये चट्टानों पर उगने वाले पहले जीवों में से हैं और अम्ल स्रावित करके चट्टानों को तोड़ने तथा मिट्टी के निर्माण में मदद करते हैं।
- अन्य उपयोग: कुछ लाइकेन का उपयोग लिटमस पेपर (अम्ल-क्षार सूचक) बनाने, मसालों, इत्र और पारंपरिक औषधियों में किया जाता है।
| आधार | वायरस (Virus) | वायरोइड्स (Viroid) | लाइकेन (Lichen) |
| प्रकृति | अकोशिकीय (निर्जीव-सजीव की कड़ी) | अकोशिकीय (केवल आनुवंशिक पदार्थ) | कोशिकीय (दो जीवों का सहजीवन) |
| संरचना | प्रोटीन कोट (कैप्सिड) + आनुवंशिक पदार्थ (DNA या RNA) | केवल RNA (कोई प्रोटीन कोट नहीं) | शैवाल (भोजन बनाता) + कवक (आश्रय देता) |
| पोषी (Host) | पौधे, जंतु, जीवाणु | केवल पौधे | ये स्वयं एक जीव हैं। |
| विशेषता | अविकल्पी परजीवी | वायरस से भी छोटे संक्रामक कारक | प्रदूषण के अच्छे सूचक। |
कोशिका: जीवन की इकाई (Cell: The Unit of Life)
कोशिका क्या है? (What is a Cell?)
परिभाषा:
कोशिका (Cell) किसी भी सजीव (living organism) की संरचनात्मक (structural) और क्रियात्मक (functional) इकाई है।
इसका अर्थ है:
- संरचनात्मक इकाई: सभी जीवधारी, चाहे वे एक छोटी चींटी हों या एक विशाल वृक्ष, कोशिकाओं से ही मिलकर बने होते हैं। जैसे एक इमारत ईंटों से बनती है, वैसे ही सजीवों का शरीर कोशिकाओं से बनता है।
- क्रियात्मक इकाई: जीवन को बनाए रखने वाली सभी आवश्यक क्रियाएँ (जैसे श्वसन, पोषण, उत्सर्जन, जनन) एक कोशिका के स्तर पर ही संपन्न होती हैं।
कोशिकाओं का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है और वे जीवन की सभी मौलिक क्रियाओं को करने में सक्षम होती हैं। इसीलिए कोशिका को “जीवन की इकाई” कहा जाता है।
खोज (Discovery):
- रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने 1665 में, अपने द्वारा बनाए गए सूक्ष्मदर्शी से कॉर्क (पेड़ की छाल) की पतली काट में मधुमक्खी के छत्ते जैसी छोटी-छोटी कोठरियों को देखा और उन्हें “सेल” (Cell) नाम दिया (लैटिन में ‘cellula’ का अर्थ है ‘एक छोटा कमरा’)। हालांकि, उन्होंने एक मृत कोशिका की खोज की थी।
- एंटनी वॉन ल्यूवेनहॉक (Antonie van Leeuwenhoek) ने पहली बार जीवित कोशिकाओं (जैसे बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ) को देखा।
कोशिका सिद्धांत (The Cell Theory)
कोशिका की खोज के बाद, विभिन्न वैज्ञानिकों ने इसके महत्व को समझाने का प्रयास किया। 19वीं शताब्दी के मध्य में, कोशिका के बारे में एकत्रित ज्ञान को संक्षेप में प्रस्तुत करने के लिए कोशिका सिद्धांत प्रतिपादित किया गया।
प्रारंभिक कोशिका सिद्धांत:
इस सिद्धांत का श्रेय मुख्य रूप से दो वैज्ञानिकों को दिया जाता है:
- मैथियास श्लाइडन (Matthias Schleiden) (1838): एक जर्मन वनस्पतिशास्त्री, जिन्होंने अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि सभी पौधे विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं।
- थियोडोर श्वान (Theodor Schwann) (1839): एक जर्मन जंतुशास्त्री, जिन्होंने अध्ययन किया और बताया कि सभी जंतुओं का शरीर भी कोशिकाओं से मिलकर बना होता है।
श्लाइडन और श्वान ने संयुक्त रूप से कोशिका सिद्धांत को प्रस्तुत किया, जिसके मूल बिंदु थे:
- सभी जीवधारी (पौधे और जंतु) कोशिकाओं और उनके उत्पादों से मिलकर बने होते हैं।
- कोशिका, जीवन की मूल संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।
सिद्धांत की कमी (Limitation):
यह प्रारंभिक सिद्धांत यह समझाने में विफल रहा कि नई कोशिकाएँ कैसे बनती हैं?
आधुनिक कोशिका सिद्धांत (Modern Cell Theory):
रुडोल्फ विर्चो (Rudolf Virchow) ने 1855 में कोशिका सिद्धांत में एक महत्वपूर्ण बात जोड़ी। उन्होंने लैटिन में एक प्रसिद्ध कथन दिया:
“Omnis cellula-e cellula”
जिसका अर्थ है:
“सभी कोशिकाएँ अपनी पूर्ववर्ती कोशिकाओं (pre-existing cells) से ही उत्पन्न होती हैं।”
इस कथन ने कोशिका सिद्धांत को पूर्ण किया।
आधुनिक कोशिका सिद्धांत के मुख्य बिंदु:
- सभी जीवधारी कोशिकाओं और उनके उत्पादों से बने होते हैं।
(All living organisms are composed of cells and products of cells.) - कोशिका, सभी सजीवों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।
(The cell is the basic structural and functional unit of all living organisms.) - सभी नई कोशिकाएँ, पूर्व में उपस्थित कोशिकाओं के विभाजन से ही बनती हैं।
(All new cells arise from the division of pre-existing cells.)
इस प्रकार, कोशिका सिद्धांत जीव विज्ञान का एक केंद्रीय और unifying सिद्धांत है, जो जीवन की निरंतरता और सभी जीवों के बीच एक आम वंश (common ancestry) को दर्शाता है।
प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिकाएँ (Prokaryotic and Eukaryotic Cells)
संरचनात्मक जटिलता के आधार पर, सभी सजीव कोशिकाओं को दो मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक। यह वर्गीकरण कोशिका में केंद्रक (Nucleus) और अन्य झिल्ली-युक्त कोशिकांगों (membrane-bound organelles) की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर आधारित है।
1. प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ (Prokaryotic Cells)
अर्थ: ‘Pro’ = आदिम (Primitive), ‘Karyon’ = केंद्रक (Nucleus)।
इसका अर्थ है “आदिम केंद्रक वाली कोशिकाएँ”।
परिभाषा:
ये वे सरल और आदिम प्रकार की कोशिकाएँ हैं जिनमें सुसंगठित केंद्रक (well-organized nucleus) और अन्य झिल्ली-युक्त कोशिकांगों का अभाव होता है।
प्रमुख लक्षण (Key Characteristics):
- केंद्रक (Nucleus):
- इनमें एक झिल्ली-बाध्य, वास्तविक केंद्रक नहीं होता है।
- आनुवंशिक पदार्थ (DNA) कोशिका द्रव्य में एक अनियमित आकार के क्षेत्र में नग्न पड़ा रहता है, जिसे केंद्रकाभ या न्यूक्लियोइड (Nucleoid) कहते हैं।
- झिल्ली-युक्त कोशिकांग (Membrane-bound Organelles):
- इनमें माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, लाइसोसोम, प्लास्टिड जैसे झिल्ली से घिरे कोशिकांग अनुपस्थित होते हैं।
- राइबोसोम (Ribosomes):
- इनमें 70S प्रकार के राइबोसोम पाए जाते हैं, जो आकार में छोटे होते हैं।
- कोशिका भित्ति (Cell Wall):
- अधिकांश प्रोकैरियोट्स में कोशिका झिल्ली के बाहर पेप्टिडोग्लाइकन (Peptidoglycan) से बनी एक मजबूत कोशिका भित्ति होती है।
- कोशिका विभाजन (Cell Division):
- विभाजन सरल तरीके से, विखंडन (fission) या मुकुलन (budding) द्वारा होता है। इनमें समसूत्री विभाजन (mitosis) नहीं होता।
- आकार (Size):
- ये आमतौर पर बहुत छोटी होती हैं (0.1 से 5.0 माइक्रोमीटर)।
किसमें पाई जाती हैं?
यह कोशिकाएँ केवल जगत मोनेरा (Kingdom Monera) के सदस्यों में पाई जाती हैं।
- उदाहरण: जीवाणु (Bacteria), नील-हरित शैवाल (Blue-Green Algae or Cyanobacteria), माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma)।
2. यूकैरियोटिक कोशिकाएँ (Eukaryotic Cells)
अर्थ: ‘Eu’ = वास्तविक (True), ‘Karyon’ = केंद्रक (Nucleus)।
इसका अर्थ है “वास्तविक केंद्रक वाली कोशिकाएँ”।
परिभाषा:
ये वे जटिल और विकसित प्रकार की कोशिकाएँ हैं जिनमें एक झिल्ली-युक्त, सुसंगठित केंद्रक और अन्य सभी झिल्ली-युक्त कोशिकांग पाए जाते हैं।
प्रमुख लक्षण (Key Characteristics):
- केंद्रक (Nucleus):
- इनमें एक वास्तविक, सुविकसित केंद्रक होता है जो एक दोहरी झिल्ली (केंद्रक झिल्ली – Nuclear Membrane) से घिरा होता है।
- आनुवंशिक पदार्थ (DNA) केंद्रक के अंदर गुणसूत्रों (chromosomes) के रूप में व्यवस्थित रहता है।
- झिल्ली-युक्त कोशिकांग (Membrane-bound Organelles):
- इनमें माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, लाइसोसोम, रसधानियाँ जैसे सभी झिल्ली-युक्त कोशिकांग उपस्थित होते हैं, जो कोशिका को विभिन्न कार्यों के लिए कक्षों (compartments) में विभाजित करते हैं।
- राइबोसोम (Ribosomes):
- इनमें 80S प्रकार के राइबोसोम पाए जाते हैं (कोशिका द्रव्य में)। हालांकि, माइटोकॉन्ड्रिया और प्लास्टिड के अंदर 70S राइबोसोम भी होते हैं।
- कोशिका भित्ति (Cell Wall):
- पादप कोशिकाओं और कवक में उपस्थित होती है, लेकिन जंतु कोशिकाओं में अनुपस्थित होती है।
- पादपों में यह सेल्यूलोज की और कवक में काइटिन की बनी होती है।
- कोशिका विभाजन (Cell Division):
- विभाजन जटिल प्रक्रिया, समसूत्री विभाजन (Mitosis) और अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा होता है।
- आकार (Size):
- ये प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं की तुलना में आकार में बड़ी होती हैं (5 से 100 माइक्रोमीटर)।
किसमें पाई जाती हैं?
ये कोशिकाएँ चार जगतों के सदस्यों में पाई जाती हैं:
- जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista): (अमीबा, पैरामीशियम)
- जगत कवक (Kingdom Fungi): (मशरूम, यीस्ट)
- जगत पादप (Kingdom Plantae): (पेड़-पौधे)
- जगत प्राणि (Kingdom Animalia): (मनुष्य, कीड़े)
प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिकाओं के बीच मुख्य अंतर (Summary of Differences)
| विशेषता (Feature) | प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell) | यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell) |
| केंद्रक (Nucleus) | अनुपस्थित (केंद्रकाभ/न्यूक्लियोइड होता है) | उपस्थित (सुविकसित, झिल्ली युक्त) |
| झिल्ली-युक्त कोशिकांग | अनुपस्थित | उपस्थित (माइटोकॉन्ड्रिया, ER, गॉल्जीकाय आदि) |
| राइबोसोम (Ribosome) | 70S प्रकार के | 80S प्रकार के |
| कोशिका भित्ति (Cell Wall) | पेप्टिडोग्लाइकन की बनी होती है। | पादप में सेल्यूलोज की, जंतु में अनुपस्थित। |
| आनुवंशिक पदार्थ (DNA) | वृत्ताकार (Circular), नग्न। | रैखिक (Linear), हिस्टोन प्रोटीन के साथ। |
| कोशिका विभाजन | सरल (विखंडन/मुकुलन)। | जटिल (समसूत्री/अर्धसूत्री)। |
| श्वसन (Respiration) | कोशिका झिल्ली (मीसोसोम) द्वारा। | माइटोकॉन्ड्रिया द्वारा। |
| आकार (Size) | सामान्यतः छोटी (0.1 – 5 µm)। | सामान्यतः बड़ी (5 – 100 µm)। |
| उदाहरण (Examples) | जीवाणु, नील-हरित शैवाल। | प्रोटिस्ट, कवक, पादप, जंतु। |
कोशिकांगों की संरचना एवं कार्य (Structure and Function of Cell Organelles)
कोशिकांग (Cell Organelles) कोशिका द्रव्य (cytoplasm) में मौजूद छोटी-छोटी संरचनाएँ होती हैं, जिनमें से प्रत्येक एक विशिष्ट कार्य (specific function) करने के लिए अनुकूलित होती है। ये कोशिका के “छोटे अंगों” की तरह होते हैं जो कोशिका को जीवित रखने और सुचारू रूप से चलाने के लिए मिलकर काम करते हैं।
1. कोशिका झिल्ली (Cell Membrane / Plasma Membrane)
- संरचना: यह कोशिका का सबसे बाहरी आवरण (जंतु कोशिका में) या कोशिका भित्ति के ठीक नीचे (पादप कोशिका में) स्थित एक पतली, लचीली और चयनात्मक पारगम्य (selectively permeable) झिल्ली है। यह लिपिड और प्रोटीन से बनी होती है (फ्लूइड मोजैक मॉडल)।
- कार्य:
- यह कोशिका को एक निश्चित आकार देती है और बाहरी वातावरण से अलग करती है।
- सबसे महत्वपूर्ण कार्य: यह कोशिका के अंदर और बाहर जाने वाले पदार्थों के आवागमन को नियंत्रित करती है। यह केवल कुछ चुनिंदा अणुओं को ही अंदर या बाहर जाने देती है।
- इसे कोशिका का द्वारपाल (Gatekeeper of the Cell) भी कहा जाता है।
2. कोशिका भित्ति (Cell Wall)
- संरचना: यह केवल पादप कोशिकाओं (plants), कवक (fungi), और बैक्टीरिया (bacteria) में कोशिका झिल्ली के बाहर पाया जाने वाला एक कठोर और निर्जीव आवरण है।
- पादपों में यह सेल्यूलोज की बनी होती है।
- कवक में यह काइटिन की बनी होती है।
- कार्य:
- यह कोशिका को एक निश्चित आकृति और दृढ़ता (rigidity) प्रदान करती है।
- यह कोशिका को बाहरी आघातों और संक्रमण से संरक्षण देती है।
- यह पूरी तरह से पारगम्य (fully permeable) होती है, यानी यह जल और विलेय पदार्थों को बिना रोक-टोक के जाने देती है।
- विशेष: जंतु कोशिकाओं (Animal Cells) में यह अनुपस्थित होती है।
3. माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria)
- संरचना: यह एक दोहरी झिल्ली वाली संरचना है। बाहरी झिल्ली चिकनी होती है, जबकि भीतरी झिल्ली अंदर की ओर कई तहों (folds) में मुड़ी होती है, जिसे क्रिस्टी (cristae) कहते हैं। इसके अपने DNA और राइबोसोम (70S) होते हैं।
- कार्य:
- यह कोशिकीय श्वसन (cellular respiration) का स्थल है। यहाँ भोजन (ग्लूकोज) का ऑक्सीकरण होता है और ऊर्जा मुक्त होती है।
- यह ऊर्जा ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) नामक अणुओं के रूप में संग्रहीत होती है।
- इसी कारण, माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा घर या पावर हाउस (Powerhouse of the Cell) कहा जाता है।
4. प्लास्टिड / लवक (Plastids)
- संरचना: ये दोहरी झिल्ली वाले अंगक हैं जो केवल पादप कोशिकाओं (Plant Cells) और कुछ प्रोटिस्टा (जैसे युग्लीना) में पाए जाते हैं। इनके पास भी अपना DNA और राइबोसोम होता है। जंतु कोशिकाओं में यह अनुपस्थित होते हैं।
- प्रकार और कार्य: वर्णक (pigment) की उपस्थिति के आधार पर ये तीन प्रकार के होते हैं:
- क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast – हरितलवक):
- ये हरे रंग के होते हैं क्योंकि इनमें क्लोरोफिल नामक वर्णक होता है।
- ये प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की क्रिया द्वारा भोजन बनाते हैं। इसलिए इन्हें “कोशिका का रसोई घर (Kitchen of the Cell)” कहते हैं।
- क्रोमोप्लास्ट (Chromoplast – वर्णीलवक):
- ये रंगीन होते हैं (हरे रंग को छोड़कर) और फूलों तथा फलों को लाल, पीला, नारंगी जैसा आकर्षक रंग प्रदान करते हैं, जो परागण में सहायक होता है।
- ल्यूकोप्लास्ट (Leucoplast – अवर्णीलवक):
- ये रंगहीन होते हैं और इनका मुख्य कार्य खाद्य पदार्थों का भंडारण (storage) करना है (जैसे- मंड/स्टार्च, तेल, प्रोटीन)।
- क्लोरोप्लास्ट (Chloroplast – हरितलवक):
5. अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum – ER)
- संरचना: यह झिल्ली-युक्त नलिकाओं और शीट का एक बहुत बड़ा तंत्र है जो पूरे कोशिका द्रव्य में फैला रहता है और केंद्रक झिल्ली से जुड़ा होता है।
- प्रकार और कार्य: यह दो प्रकार का होता है:
- खुरदरी ER (Rough ER – RER): इसकी सतह पर राइबोसोम लगे होते हैं। इसका मुख्य कार्य राइबोसोम द्वारा बनाए गए प्रोटीन का संश्लेषण (synthesis) और परिवहन करना है।
- चिकनी ER (Smooth ER – SER): इसकी सतह पर राइबोसोम नहीं होते। इसका मुख्य कार्य वसा (लिपिड) और स्टेरॉयड का संश्लेषण करना है और साथ ही कोशिका में विषाक्त पदार्थों को निराविषीकरण (detoxification) करना है।
- इसे कोशिका का “कंकाल तंत्र (Skeletal System)” भी कहते हैं।
6. गॉल्जीकाय / गॉल्जी उपकरण (Golgi Apparatus / Golgi Complex)
- संरचना: यह चपटी, झिल्ली-युक्त पुटिकाओं (cisternae) का एक समूह है जो एक-दूसरे के ऊपर समानांतर रूप से व्यवस्थित होती हैं।
- कार्य:
- ER में बने पदार्थों (प्रोटीन, लिपिड) की पैकेजिंग, रूपांतरण (modification), और उनका परिवहन करना इसका मुख्य कार्य है। यह उन्हें पुटिकाओं (vesicles) में पैक करके कोशिका के अंदर या बाहर उनके गंतव्य तक भेजता है।
- इसी कारण इसे “कोशिका का यातायात प्रबंधक (Traffic Police of the Cell)” या “पोस्ट ऑफिस (Post Office)” भी कहते हैं।
- यह लाइसोसोम का निर्माण भी करता है।
7. लाइसोसोम (Lysosomes)
- संरचना: यह एक एकल झिल्ली वाली थैलीनुमा संरचना है जिसके अंदर शक्तिशाली पाचक एंजाइम (digestive enzymes) भरे होते हैं।
- कार्य:
- इसका मुख्य कार्य कोशिका के अंदर आने वाले बाहरी पदार्थों (जैसे बैक्टीरिया) और टूटे-फूटे, पुराने कोशिकांगों को पाचित (digest) करना और कोशिका को साफ रखना है (कोशिका का अपशिष्ट निपटान तंत्र)।
- आत्मघाती थैली (Suicidal Bag): जब कोशिका क्षतिग्रस्त या पुरानी हो जाती है, तो लाइसोसोम फट जाते हैं और उनके पाचक एंजाइम अपनी ही कोशिका को पचाकर नष्ट कर देते हैं।
8. राइबोसोम (Ribosomes)
- संरचना: ये अत्यंत सूक्ष्म, दानेदार कण होते हैं जो या तो कोशिका द्रव्य में स्वतंत्र रूप से तैरते हैं या खुरदरी ER की सतह पर लगे होते हैं। इनमें कोई झिल्ली नहीं होती है।
- कार्य:
- यह प्रोटीन संश्लेषण (protein synthesis) का स्थल है। कोशिका के लिए सभी आवश्यक प्रोटीन यहीं बनते हैं।
- इसी कारण, राइबोसोम को “कोशिका की प्रोटीन फैक्टरी (Protein Factory of the Cell)” कहा जाता है।
जंतु कोशिका और पादप कोशिका में मुख्य अंतर
| कोशिकांग | जंतु कोशिका (Animal Cell) | पादप कोशिका (Plant Cell) |
| कोशिका भित्ति (Cell Wall) | अनुपस्थित | उपस्थित (सेल्यूलोज की) |
| लवक (Plastids) | अनुपस्थित | उपस्थित (क्लोरोप्लास्ट आदि) |
| रसधानी (Vacuole) | छोटी और अस्थायी | एक बड़ी, केंद्रीय और स्थायी |
| लाइसोसोम (Lysosomes) | प्रायः उपस्थित | प्रायः अनुपस्थित |
| तारककाय (Centrosome) | उपस्थित | प्रायः अनुपस्थित |
केंद्रक एवं गुणसूत्र (Nucleus and Chromosomes)
कोशिका के भीतर, केंद्रक उसका सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख कोशिकांग है। यह कोशिका की सभी गतिविधियों का नियंत्रण करता है, और इसी के भीतर हमारे आनुवंशिक ब्लूप्रिंट, यानी गुणसूत्र, सुरक्षित रहते हैं।
केंद्रक (Nucleus)
परिभाषा:
केंद्रक (Nucleus) यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक दोहरी झिल्ली युक्त (double membrane-bound), गोलाकार कोशिकांग है, जिसमें कोशिका की अधिकांश आनुवंशिक सामग्री (genetic material) संग्रहीत होती है।
- इसे “कोशिका का मस्तिष्क (Brain of the Cell)” या “नियंत्रण केंद्र (Control Center)” भी कहा जाता है, क्योंकि यह कोशिका की लगभग सभी उपापचयी क्रियाओं और कोशिका विभाजन को नियंत्रित करता है।
- खोज: इसकी खोज रॉबर्ट ब्राउन (Robert Brown) ने 1831 में की थी।
केंद्रक की संरचना (Structure of the Nucleus)
एक सुविकसित केंद्रक में निम्नलिखित चार मुख्य भाग होते हैं:
- केंद्रक झिल्ली / केंद्रक आवरण (Nuclear Membrane / Nuclear Envelope):
- यह केंद्रक को चारों ओर से घेरने वाली एक दोहरी परत वाली झिल्ली है।
- यह केंद्रक को कोशिका द्रव्य से अलग करती है।
- इस झिल्ली में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें केंद्रकीय छिद्र (Nuclear Pores) कहते हैं। ये छिद्र केंद्रक और कोशिका द्रव्य के बीच पदार्थों (जैसे RNA और प्रोटीन) के आवागमन को नियंत्रित करते हैं।
- केंद्रक द्रव्य (Nucleoplasm):
- केंद्रक झिल्ली के अंदर भरे हुए तरल, दानेदार पदार्थ को केंद्रक द्रव्य कहते हैं। यह कोशिका द्रव्य के समान होता है।
- इसी के भीतर केंद्रिका और क्रोमैटिन धागे डूबे रहते हैं।
- केंद्रिका (Nucleolus):
- यह केंद्रक द्रव्य के अंदर स्थित एक सघन, गोलाकार संरचना है। इसमें कोई झिल्ली नहीं होती है।
- इसका मुख्य कार्य राइबोसोम का संश्लेषण (synthesis of ribosomes) करना है।
- इसीलिए इसे “राइबोसोम की फैक्टरी (Ribosome Factory)” भी कहा जाता है।
- क्रोमैटिन (Chromatin):
- जब कोशिका विभाजित नहीं हो रही होती है (विश्राम अवस्था में), तो केंद्रक में धागे जैसी एक उलझी हुई जालीनुमा संरचना दिखाई देती है, जिसे क्रोमैटिन कहते हैं।
- क्रोमैटिन DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल) और हिस्टोन प्रोटीन (Histone Proteins) से मिलकर बना होता है।
- वास्तव में, यही क्रोमैटिन कोशिका विभाजन के समय संघनित (condense) होकर मोटे और छोटे धागों में बदल जाता है, जिन्हें गुणसूत्र (Chromosomes) कहते हैं।
केंद्रक के कार्य (Functions of the Nucleus)
- कोशिका की सभी उपापचयी क्रियाओं पर नियंत्रण रखना।
- आनुवंशिक सूचना (genetic information) को संग्रहीत करना।
- कोशिका विभाजन (cell division) का नियंत्रण और नियमन करना।
- राइबोसोम का निर्माण करना।
गुणसूत्र (Chromosomes)
परिभाषा:
गुणसूत्र (Chromosomes) केंद्रक में पाई जाने वाली धागे जैसी संरचनाएं हैं जो क्रोमैटिन के संघनित होने से बनती हैं। ये केवल कोशिका विभाजन के समय ही स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
- ये DNA और प्रोटीन से बने होते हैं और इन्हीं पर जीन (Genes) स्थित होते हैं।
- जीन (Gene) DNA का वह खंड है जो किसी विशिष्ट लक्षण (जैसे आँखों का रंग, बालों का प्रकार) के लिए कोड करता है।
गुणसूत्र की संरचना (Structure of a Chromosome)
एक विशिष्ट गुणसूत्र में निम्नलिखित भाग होते हैं (यह कोशिका विभाजन के समय की संरचना है):
- क्रोमैटिड (Chromatid): कोशिका विभाजन से पहले, DNA अपनी प्रतिकृति (replication) बनाता है। इसके बाद एक गुणसूत्र में दो समान धागे होते हैं, जिनमें से प्रत्येक को अर्ध-गुणसूत्र या क्रोमैटिड कहते हैं। ये दोनों “सिस्टर क्रोमैटिड” कहलाती हैं।
- सेंट्रोमियर (Centromere): यह वह बिंदु है जहाँ एक गुणसूत्र के दोनों सिस्टर क्रोमैटिड एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।
गुणसूत्रों के कार्य (Functions of Chromosomes)
- गुणसूत्रों का मुख्य कार्य आनुवंशिक सूचना (माता-पिता के लक्षणों) को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित करना है।
- ये यह सुनिश्चित करते हैं कि कोशिका विभाजन के दौरान प्रत्येक नई कोशिका को आनुवंशिक सामग्री का एक पूरा और सटीक सेट प्राप्त हो।
मनुष्य में गुणसूत्र (Chromosomes in Humans)
मानव की प्रत्येक कायिक कोशिका (somatic cell) में 46 गुणसूत्र होते हैं, जो 23 जोड़ों (pairs) में व्यवस्थित रहते हैं।
- अलिंग गुणसूत्र (Autosomes):
- इनमें से 22 जोड़े (यानी 44 गुणसूत्र) स्त्री और पुरुष दोनों में एक समान होते हैं।
- ये शारीरिक लक्षणों (जैसे ऊँचाई, त्वचा का रंग) को नियंत्रित करते हैं।
- लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosomes):
- 23वाँ जोड़ा लिंग गुणसूत्र कहलाता है, जो व्यक्ति के लिंग का निर्धारण करता है।
- महिला (Female): इनमें दो X गुणसूत्र होते हैं (XX)।
- पुरुष (Male): इनमें एक X और एक Y गुणसूत्र होता है (XY)।
क्रोमैटिन बनाम गुणसूत्र
| आधार | क्रोमैटिन (Chromatin) | गुणसूत्र (Chromosome) |
| प्रकृति | पतले, उलझे हुए धागों का जाल। | मोटे, छोटे और संघनित धागे। |
| दृश्यता | कोशिका की अविभाजित (interphase) अवस्था में। | केवल कोशिका विभाजन के समय। |
| संरचना | DNA + हिस्टोन प्रोटीन (फैली हुई अवस्था)। | DNA + हिस्टोन प्रोटीन (अत्यधिक कुंडलित अवस्था)। |
| कार्य | DNA को संकुलित करना, जीन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करना। | कोशिका विभाजन के दौरान DNA का समान वितरण सुनिश्चित करना। |
कोशिका चक्र एवं कोशिका विभाजन (Cell Cycle and Cell Division)
सभी सजीवों का अस्तित्व और वृद्धि कोशिकाओं के विभाजन की क्षमता पर निर्भर करती है। कोशिका विभाजन (Cell Division) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक जनक कोशिका (parent cell) विभाजित होकर दो या दो से अधिक पुत्री कोशिकाएँ (daughter cells) बनाती है।
कोशिका का विभाजन एक बड़ी और समन्वित प्रक्रिया का हिस्सा है जिसे कोशिका चक्र कहते हैं।
कोशिका चक्र (Cell Cycle)
परिभाषा:
उन घटनाओं का अनुक्रम जिसके द्वारा एक कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन (duplicates its genome) करती है, अन्य कोशिकीय संघटकों का संश्लेषण (synthesizes other constituents) करती है और अंततः विभाजित होकर दो नई पुत्री कोशिकाओं का निर्माण करती है, उसे कोशिका चक्र कहते हैं।
मानव कोशिका के लिए, यह चक्र लगभग 24 घंटे में पूरा होता है। इसे मुख्य रूप से दो अवस्थाओं में बांटा गया है:
1. अंतरावस्था (Interphase)
यह दो क्रमिक विभाजनों के बीच की तैयारी की अवस्था (preparatory phase) है। कोशिका इस चरण में अपना अधिकांश समय (लगभग 95%) व्यतीत करती है। यह केवल एक “विश्राम अवस्था” नहीं है, बल्कि अत्यधिक उपापचयी सक्रियता की अवस्था है।
इसे तीन उप-अवस्थाओं में बांटा गया है:
- G₁ (गैप 1) अवस्था: कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है और सामान्य रूप से वृद्धि करती है। इसमें RNA और प्रोटीन का संश्लेषण होता है।
- S (संश्लेषण) अवस्था: इस अवस्था में DNA की प्रतिकृति (replication) होती है। DNA की मात्रा दोगुनी हो जाती है।
- G₂ (गैप 2) अवस्था: कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक प्रोटीन का संश्लेषण होता है और कोशिका वृद्धि जारी रखती है।
2. M अवस्था / विभाजन प्रावस्था (M Phase / Division Phase)
यह कोशिका चक्र की वह अवस्था है जहाँ वास्तविक कोशिका विभाजन होता है। इसमें दो मुख्य चरण शामिल हैं:
- केंद्रक विभाजन (Karyokinesis): जनक कोशिका के केंद्रक का विभाजन होता है।
- कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis): कोशिका द्रव्य का विभाजन होता है, जिससे दो अलग-अलग पुत्री कोशिकाएँ बनती हैं।
केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) दो प्रकार का होता है: समसूत्री विभाजन और अर्धसूत्री विभाजन।
समसूत्री विभाजन (Mitosis)
परिभाषा:
समसूत्री विभाजन वह प्रक्रिया है जिसमें एक जनक कोशिका विभाजित होकर दो आनुवंशिक रूप से समान (genetically identical) पुत्री कोशिकाओं का निर्माण करती है, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका के बराबर (equal) होती है।
- इसीलिए इसे समीकरणीय विभाजन (Equational Division) भी कहा जाता है।
किसमें होता है?
यह मुख्य रूप से सजीवों की कायिक कोशिकाओं (somatic cells) में होता है।
- उदाहरण: त्वचा, रक्त, और अन्य शारीरिक अंगों की कोशिकाएँ।
समसूत्री विभाजन के चरण:
यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसे अध्ययन की सुविधा के लिए चार चरणों में बांटा गया है:
- पूर्वावस्था (Prophase): क्रोमैटिन धागे संघनित होकर स्पष्ट गुणसूत्र (chromosomes) बनाते हैं। केंद्रक झिल्ली और केंद्रिका विलुप्त हो जाती है।
- मध्यावस्था (Metaphase): सभी गुणसूत्र कोशिका के मध्य में एक प्लेट (मेटाफेज प्लेट) पर व्यवस्थित हो जाते हैं।
- पश्चावस्था (Anaphase): प्रत्येक गुणसूत्र के सेंट्रोमियर विभाजित हो जाते हैं, और सिस्टर क्रोमैटिड अलग होकर विपरीत ध्रुवों (poles) की ओर जाने लगते हैं।
- अंत्यावस्था (Telophase): क्रोमैटिड ध्रुवों पर पहुँच जाते हैं, फिर से फैलकर क्रोमैटिन धागे बनाते हैं। केंद्रक झिल्ली और केंद्रिका पुनः प्रकट हो जाते हैं, जिससे दो पुत्री केंद्रक बन जाते हैं।
महत्व:
- वृद्धि और विकास: यह बहुकोशिकीय जीवों की वृद्धि का आधार है।
- मरम्मत और पुनर्जनन: यह क्षतिग्रस्त या पुरानी कोशिकाओं को बदलने में मदद करता है (जैसे- घाव का भरना)।
- अलैंगिक जनन: कुछ जीवों (जैसे अमीबा) में यह अलैंगिक जनन की विधि है।
- गुणसूत्रों की संख्या को स्थिर बनाए रखना।
अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)
परिभाषा:
अर्धसूत्री विभाजन एक विशेष प्रकार का कोशिका विभाजन है जिसमें एक द्विगुणित (diploid, 2n) जनक कोशिका विभाजित होकर चार आनुवंशिक रूप से भिन्न (genetically different), अगुणित (haploid, n) पुत्री कोशिकाओं का निर्माण करती है, जिनमें गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका से आधी (half) हो जाती है।
- इसीलिए इसे न्यूनकारी विभाजन (Reductional Division) भी कहा जाता है।
- इसमें दो क्रमिक विभाजन होते हैं: अर्धसूत्री विभाजन-I (Meiosis I) और अर्धसूत्री विभाजन-II (Meiosis II)।
किसमें होता है?
यह केवल लैंगिक जनन करने वाले जीवों की जनन कोशिकाओं (germ cells) में होता है, जिससे युग्मक (gametes) बनते हैं।
- उदाहरण: पुरुषों में शुक्राणु (sperm) का निर्माण, महिलाओं में अंडाणु (egg) का निर्माण, और पौधों में पराग कण और बीजांड का निर्माण।
महत्वपूर्ण घटनाएँ:
- जीन विनिमय (Crossing Over): अर्धसूत्री विभाजन-I की पूर्वावस्था-I (Prophase-I) के दौरान, समजात गुणसूत्रों (homologous chromosomes) के बीच आनुवंशिक सामग्री का आदान-प्रदान होता है। यह घटना आनुवंशिक पुनर्संयोजन (genetic recombination) को जन्म देती है, जो संतानों में विभिन्नता का मुख्य कारण है।
महत्व:
- युग्मक निर्माण: यह लैंगिक जनन के लिए आवश्यक अगुणित युग्मक (sperm and egg) बनाता है।
- गुणसूत्र संख्या का संरक्षण: निषेचन (fertilization) के बाद जब नर और मादा युग्मक मिलते हैं, तो संतान में गुणसूत्रों की संख्या (2n) पुनः स्थापित हो जाती है। इस प्रकार, यह प्रजातियों में गुणसूत्रों की संख्या को पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिर बनाए रखता है।
- आनुवंशिक विभिन्नता लाना: जीन विनिमय के कारण, संतानों में अपने माता-पिता से नए गुण संयोजन उत्पन्न होते हैं, जो जैव विकास (evolution) का आधार है।
| आधार | समसूत्री विभाजन (Mitosis) | अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) |
| कोशिका का प्रकार | कायिक कोशिकाएँ (Somatic cells) | जनन कोशिकाएँ (Germ cells) |
| जनक और पुत्री कोशिका | 1 जनक → 2 पुत्री | 1 जनक → 4 पुत्री |
| गुणसूत्रों की संख्या | समान रहती है (2n → 2n) | आधी हो जाती है (2n → n) |
| आनुवंशिक समानता | पुत्री कोशिकाएँ आनुवंशिक रूप से समान होती हैं। | पुत्री कोशिकाएँ आनुवंशिक रूप से भिन्न होती हैं। |
| जीन विनिमय | नहीं होता है। | होता है (पूर्वावस्था-I में)। |
| कार्य/महत्व | वृद्धि, मरम्मत, अलैंगिक जनन। | लैंगिक जनन (युग्मक निर्माण), आनुवंशिक विभिन्नता। |