कंडेल नहर सत्याग्रह — अध्ययन और अभ्यास
इतिहास अध्ययन
छत्तीसगढ़ का किसान आंदोलन

कंडेल नहर सत्याग्रह

1920 में धमतरी तहसील के कंडेल गाँव में किसानों ने नहर-कर और जुर्माने के विरोध में संगठित अहिंसक प्रतिरोध किया। नीचे दिए नोट्स संलग्न शोध-पत्र के आधार पर व्यवस्थित किए गए हैं।

📍 कंडेल, धमतरी 🗓️ अगस्त–दिसंबर 1920 ✊ किसान सत्याग्रह

अध्ययन नोट्स

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सत्याग्रह और असहयोग की विचारधारा का प्रभाव बढ़ रहा था। छत्तीसगढ़ का दक्षिण-पूर्वी भाग कृषि-प्रधान था और ग्रामीण जनता की आजीविका मुख्यतः खेती पर निर्भर थी। किसानों को कर, लगान और सरकारी वसूली जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

कंडेल नहर सत्याग्रह छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक शुरुआती किसान सत्याग्रह के रूप में महत्वपूर्ण है। यह स्थानीय अन्याय के विरोध को राष्ट्रीय आंदोलन की अहिंसक राजनीति से जोड़ता है।

2. तत्काल कारण: नहर-कर और जुर्माना

सत्याग्रह का मुख्य कारण नहर के पानी के उपयोग के संबंध में किसानों पर कर वसूली और उसके बाद लगाया गया जुर्माना था। किसानों ने नहर-कर देने से इनकार किया। सरकार ने ग्रामीणों पर जुर्माना लगाया और उसे वसूलने का प्रयास किया।

  • किसानों का विरोध नहर-कर चुकाने से इनकार के रूप में शुरू हुआ।
  • सरकार ने कथित पानी-चोरी के आरोप और कर-वसूली के मामले में जुर्माना लगाया।
  • किसानों ने जुर्माना न देने का निर्णय बनाए रखा; विरोध सामूहिक सत्याग्रह में बदल गया।
  • शोध-पत्र के अनुसार, जाँच में किसानों पर पानी चोरी का आरोप उचित नहीं पाया गया, फिर भी जुर्माना वसूलने की कोशिश हुई।

3. समयरेखा

अगस्त 1920 कंडेल के किसानों तथा आसपास के ग्रामीणों का नहर-कर और जुर्माने के खिलाफ प्रतिरोध आरंभ हुआ।
लगभग पाँच महीने ग्रामीणों ने कर और जुर्माना न देने के निर्णय पर टिके रहकर अहिंसक विरोध जारी रखा।
दिसंबर 1920 सरकार ने जुर्माना माफ करने की घोषणा की और किसानों के कुछ जब्त पशु लौटाए गए।
गांधीजी का धमतरी आगमन: शोध-पत्र में 21 दिसंबर 1920 को गांधीजी के धमतरी पहुँचने का उल्लेख है। उनके आगमन तक कंडेल का सत्याग्रह समाप्त हो चुका था।

4. नेतृत्व और संगठन

आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय कार्यकर्ताओं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े नेताओं ने किया। शोध-पत्र में कंडेल सत्याग्रह के संदर्भ में छोटेलाल श्रीवास्तव, नारायणराव मेघावाले और पंडित सुंदरलाल शर्मा का उल्लेख मिलता है।

स्थानीय नेतृत्व ने किसानों के बीच संपर्क, जनसभाओं और संगठन के माध्यम से आंदोलन को मजबूत किया। शोध-पत्र के अनुसार, बाद में डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित कांग्रेस के नेताओं ने मामले की जाँच और रिपोर्ट तैयार करने के सिलसिले में क्षेत्र का दौरा किया।

गांधीजी के आगमन से पहले पंडित सुंदरलाल शर्मा उन्हें धमतरी लाने के लिए कलकत्ता रवाना हुए थे, ताकि सत्याग्रह के संचालन का कार्य गांधीजी को सौंपा जा सके।

5. सत्याग्रह का स्वरूप और परिणाम

  • आंदोलन का आधार अहिंसक असहयोग और सामूहिक प्रतिरोध था।
  • किसानों ने नहर-कर और जुर्माना देने से इनकार किया।
  • सरकारी दबाव और पशुओं की जब्ती के बावजूद ग्रामीणों ने अपना निर्णय नहीं बदला।
  • अंततः सरकार ने जुर्माने की पूरी राशि माफ करने की घोषणा की और जब्त पशुओं को लौटाया गया।

6. ऐतिहासिक महत्व

कंडेल का आंदोलन दिखाता है कि राष्ट्रीय आंदोलन की भावना केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी; गाँवों के किसान भी स्थानीय शोषण और अन्याय के विरुद्ध संगठित हो रहे थे। इसकी सफलता ने यह प्रमाणित किया कि स्थानीय जनता और कार्यकर्ता अहिंसक आंदोलन का संचालन कर सकते हैं।

यह घटना गांधीवादी असहयोग की व्यापक लोकप्रियता से पहले घटित हुई, लेकिन उसका तरीका अहिंसा और असहयोग के सिद्धांतों के अनुरूप था। क्षेत्रीय स्तर पर इसने किसानों की राजनीतिक भागीदारी को सामने लाया और मध्यप्रांत के राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया।

परीक्षा के लिए त्वरित पुनरावृत्ति

  • स्थान: कंडेल गाँव, धमतरी तहसील, तत्कालीन रायपुर जिला।
  • वर्ष: 1920; लगभग अगस्त से दिसंबर तक।
  • मुख्य मुद्दा: नहर-कर का विरोध और जुर्माने की वसूली।
  • प्रतिरोध का तरीका: कर और जुर्माना न देना, अहिंसक सामूहिक सत्याग्रह।
  • परिणाम: जुर्माना माफ; जब्त पशु वापस किए गए।
  • संबंधित नेता: छोटेलाल श्रीवास्तव, नारायणराव मेघावाले, पंडित सुंदरलाल शर्मा।

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